Story in Hindi : गाड़ी का रजिस्ट्रेशन – दो दोस्तों की कहानी

Story in Hindi. मैं ने एक बार एक कामर्शियल गाड़ी खरीदी. मेरे दोस्त रमाकांत ने भी कुछ दिन बाद एक कामर्शियल गाड़ी खरीद ली. उस का ट्रांसपोर्ट का लंबाचौड़ा कारोबार था और इस क्षेत्र में उसे काफी महारत हासिल थी. अपनी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन कराने में मेरी हालत खराब हो गई, क्योंकि कभी पैन कार्ड, तो कभी आधार कार्ड और न जाने कितने कागजात देखे, तब जा कर मैं रजिस्ट्रेशन करा पाया.

नए आरटीओ अफसर से मेरा पहली बार वास्ता पड़ा था और मैं भुक्तभोगी था, यही जान कर मेरे दोस्त रमाकांत ने मुझ से सलाह लेने की सोची और एक दिन घर आ कर वह मुझ से रजिस्ट्रेशन के बारे में जानकारी लेने लगा.

मैं ने उसे बताया, ‘‘इस बार जो आरटीओ अफसर आया है, वह बहुत नियमकानून मानने वाला कड़क अफसर है. सारे कागजात खुद देखता है और गाड़ी के मालिक से भी मिल कर बात करता है.’’

‘‘क्याक्या कागजात देखता है यार?’’ रमाकांत ने पूछा.

मैं ने बताया, ‘‘आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर कार्ड, बिजली का बिल, टैलीफोन का बिल, 4 पासपोर्ट साइज फोटो… तब कहीं जा कर रजिस्ट्रेशन करता है. इन 5 कागजात में से 3 को दिखाना जरूरी कर रखा है.’’

रमाकांत ने मजाक में कहा, ‘‘देखो यार, मैं तो केवल वोटर कार्ड और फोटो ले जा कर अपनी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन करा लूंगा और रजिस्ट्रेशन भी उसी दिन ही होगा. इस के बाद पार्टी.’’

मैं ने सहमति में सिर हिला दिया. बात आईगई हो गई. नियम के मुताबिक कुछ दिन बाद मेरे दोस्त रमाकांत को भी आरटीओ दफ्तर से बुलावा आया. उस दिन वह अपने ट्रक ड्राइवर की गंदी सी लुंगी और कुरता पहन कर अफसर के कमरे में रसीद समेत दाखिल हुआ.

जब उस आरटीओ अफसर ने अंगरेजी में पूछा कि वाट डू यू ब्रिंग? तो जवाब में रमाकांत ने कहा, ‘‘साहब, मैं तो केवल हिंदी और उर्दू जानता हूं.’’

वह आरटीओ अफसर बंगाली था. उस ने अपनी टूटीफूटी हिंदी में पूछा, ‘‘क्याक्या कागज लाया है?’’

रमाकांत ने तुरंत अपना वोटर कार्ड और लुंगी में खींचे गए 2 फोटो आरटीओ अफसर के आगे कर दिए.

आरटीओ अफसर ने जैसे ही पैन कार्ड कहने की कोशिश की, तो रमाकांत ने उसे बीच में ही टोक दिया और बोला, ‘‘साहब, मेरे पास पैंट नहीं है. 2 लुंगी और 2 कुरते हैं. मैं एक धोता हूं, एक पहनता हूं.’’

तब आरटीओ अफसर ने समझाया, ‘‘पैंट नहीं…’’ तो रमाकांत ने बीच में बात काटते हुए कहा, ‘‘हांहां, मुझे मालूम है कि पैंट पहनी जाती है, पर मेरे पास पैंट नहीं है. जब मैं ने डीलर से गाड़ी खरीदी थी, तब भी मैं ने लुंगी ही पहनी थी. देखिए, मेरे ये लुंगी वाले 2 फोटो,’’ कह कर वह आरटीओ अफसर के सामने फोटो वाला हाथ नचाने लगा.

इस से घबरा कर आरटीओ अफसर ने कहा, ‘‘और क्या कागज हैं?’’

‘‘और कुछ नहीं हैं. मैं ट्रक चलाता हूं, उसी में सोता हूं. कभीकभार मैं इधरउधर सो जाता हूं. मेरे पास केवल वोटर कार्ड है. जब पैसा लिया, तब तो डीलर बोला नहीं था कि रजिस्टे्रशन कराने के लिए पैंट पहननी होगी. मैं 53 साल का हूं, अभी तक पैंट नहीं पहनी. मैं लुंगी पहन कर ही गाड़ी चलाता हूं.’’

आरटीओ अफसर ने माथे पर आए पसीने को अपने सफेद रूमाल से पोंछा. वह उस घड़ी को कोस रहा था, जब उस ने इस देहाती ट्रक ड्राइवर को दफ्तर में बुलाया था.

इधर मेरा दोस्त यही सुर अलाप रहा था, ‘‘आप के दफ्तर में जब टैंपरेरी रजिस्ट्रेशन हुआ था और पैसा ले कर रसीद दी थी, तब भी नहीं बोला गया था कि पैंट पहनने वाला आदमी ही गाड़ी खरीद सकता है और उस का रजिस्ट्रेशन करा सकता है.

‘‘मैं किसी को नहीं छोड़ूंगा, टैंपरेरी रजिस्ट्रेशन के नाम से जो पैसा लिया है, वह भी वापस दो. अपनी रसीद रखो. मैं थाने में जाऊंगा और शिकायत करूंगा. मुझे अनपढ़ जान कर आरटीओ अफसर और डीलर ने मिल कर मेरी 35 साल की कमाई हजम कर ली.’’

आरटीओ अफसर हैरानपरेशान था. यह उस की जिंदगी का पहला और कड़वा अनुभव था. वह निढाल हो कर कुरसी पर बैठ गया. मेज पर रखे गिलास का पूरा पानी एक ही सांस में गटक गया, फिर रमाकांत को बैठाया, अपने हाथों से पीने के लिए पानी दिया और बोला, ‘‘ठीक है, तुम दस्तखत कर दो.’’

दस्तखत करते ही आरटीओ अफसर ने तुरंत रमाकांत को गाड़ी का रजिस्ट्रेशन कर के सर्टिफिकेट थमा दिया और हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘आप बेफिक्र हो कर लुंगी में ही गाड़ी चलाइए, कोई आप को पैंट पहनने को नहीं कहेगा.’’

रमाकांत हंसतेहंसते बाहर आ गया. दूसरे दिन मुझे रमाकांत ने चटकारे ले कर सारा मामला बताया कि कैसे उस ने गंवार बन कर एक पढ़ेलिखे अफसर को दिन में तारे दिखा दिए. Story in Hindi

Light-hearted Story: आयुर्वेदिक प्रेम – कैसा था प्रेम का इफैक्ट

Light-hearted Story-

प्रेम, प्यार, मुहब्बत के विषय में हमारी सोच थोड़ी अलग है. सस्ता, सरल और टिकाऊ प्रेम की अवधारणा में हमारी लाजवाब खोज आयुर्वेदिक प्रेम है. भ्रमित न हों, यहां हम चिकित्सा विज्ञान पर चर्चापरिचर्चा नहीं कर रहे हैं. विषय पर टिके रह कर हम प्रेम विषय पर आते हैं. ज्ञानीजन जानते हैं, प्रेम बहुत कठिन है, इस के साइड इफैक्ट्स प्रेमीप्रेमिका को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष रूप से घरपरिवार, आसपड़ोस, गलीमहल्ले, गांवबस्ती, शहर या यों कहें कि पूरे समाज को प्रभावित करते हैं, तो भी गलत नहीं होगा.

प्रत्यक्षतया 2 जीवों से जुड़े लेकिन उन के प्रेम को देख जलन, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, आन, बान, शान जैसे दूसरे अनिवार्य पहलू अन्य लोगों को भी इस में देरसवेर घसीट ही लेते हैं. ‘फटे में पैर न उलझाएं’ ऐसा भला कैसे संभव है? यदि पी नहीं पाए तो उसे लुढ़काने, फैलाने या बिखेर कर औचित्यहीन करना मानव स्वभाव है. सो, प्रेम 2 जीवों तक सीमित रह ही नहीं सकता. यह शाश्वत सत्य है. ‘इश्कमुश्क छिपाए नहीं छिपते,’ इस कहावत को इसीलिए बुजुर्ग गढ़ गए थे.

अब दोबारा आयुर्वेद कौन्सैप्ट पर लौटते हैं. सब जानते हैं कि भारतीय संस्कृति की विश्व को जो भी देन हैं उन में आयुर्वेद काफी महत्त्वपूर्ण है. हींग लगे न फिटकरी, रंग निकले चोखा, चमकदार बनाने का बेहतरीन नुसखा आयुर्वेद में छिपा है. प्रेम की पहली शर्त यही है कि यह सरलता से निबटे, ज्यादा खर्च या इतर प्रभाव पैदा न करे तो आयुर्वेद तकनीक बैस्ट रहेगी. यह हमारे अघोषित शोध का सुपरिणाम है.

आजकल चायनीज लव ज्यादा प्रचलित है जो सस्ता, सरल तो बहुत है, लेकिन टिकाऊपन के मामले में एकदम जीरो है. कब लव हो गया और कब उस की समाप्ति या खात्मा हुआ, कुछ पता ही नहीं चलता. न इति का पता, न आदि का. चायनीज लव कम उम्र के छोकरेछोकरी टाइप के जीवों में ज्यादा उपयोग के कारण उन्हें स्थायित्व से लेनादेना नहीं रहता. यूज ऐंड थ्रो संस्कृति के इस जज्बे को सच्चे प्रेम की श्रेणी में रखा भी नहीं जा सकता.

एलोपैथिक प्रेम भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. यह प्रेम खासतौर पर उस एज ग्रुप में ज्यादा लोकप्रिय है जो इंस्टैंट लव तो चाहते हैं, लेकिन उन में सब्र व धैर्य नाम की चीज नहीं है. चटपट प्रेमानुभूति और पूर्णतया फलदायी प्रक्रिया, इसलिए उन्हें एलोपैथी में प्रेम ज्यादा मुफीद रहता है. एलोपैथी की खासीयत ही यह है कि सबकुछ तुरतफुरत बिना रोग के लक्षणों की सही पहचान के एंटीबायोटिक्स के माध्यम से तुरंत आराम मिल जाता है. यही खूबी इस श्रेणी के प्रेम में भी पाई जाती है.

प्रेमीप्रेमिका को कुछ समय के लिए रिलीफ मिलने की शर्तिया गारंटी हो सकती है, लेकिन उस के साइड इफैक्ट्स का उन के पास कोई उपाय नहीं है. इस विधा के प्रेम के नजारे भी कड़वी टैबलेट्स, इंजैक्शन और औपरेशन जैसे हैं. खुद चीरफाड़ या पोस्टमौर्टम न करें तो प्रेम के दर्शक इस जिम्मेदारी को बिना समय गवांए निबटा देते हैं. जितनी स्पीड से लवेरिया फीवर चढ़ता है उसी तेजी से नीचे भी गिर जाता है. न नब्ज का पता न दिल की धड़कनों का. ऐसे गायब होता है जैसे गधे के सिर से सींग. हम इस तकनीक को कतई लाभप्रद नहीं मानते.

प्रेम में होम्योपैथी तकनीक भी बेकार है. यह स्वीट मगर स्लो तकनीक है. रक्त में शुगर की उपलब्धता पर रोग की पहचान और उपचार करती है, लेकिन इस का धीमा असर उपभोक्ता के मन में कोफ्त पैदा करता है. नौ दिन चले अढ़ाई कोस, किस शख्स में होगा इतना धैर्य? प्रेम जनून है तो जादू भी जो प्रेमाकुल के सिर चढ़ कर बोलता है. तो, इस शर्त पर यह तकनीक भी फिट नहीं बैठती. यह सच है कि होम्योपैथी भी साइड इफैक्ट से मुक्त है, लेकिन ऐसा सोना किस काम का जो समय पर अपनी चमक ही न दिखाए. इसी तरह यूनानी पैथी का हाल है. इस की कमी इस का कड़वापन है. रसायनों के घालमेल में लव कैमेस्ट्री का इंबैलेंस होना स्वाभाविक है.

आयुर्वेद तकनीक ही प्रेम के लिए सौ फीसदी मुफीद नजर आती है. धीमेधीमे ही सही लेकिन रोग के लक्षणों की पूर्णतया पहचान कर तदनुरूप प्रेमव्यवहार से परिपक्व प्रेम की संभावना बढ़ जाती है. ऐसे प्रेम का सब से बड़ा फायदा यह रहता है कि बात बनी तो ठीक, वरना प्रयुक्त जड़ीबूटियां शरीर को निरोगी और मजबूत बनाने के काम में तो आएंगी ही. ऋषिमुनियों की इस नायाब खोज का हम इस रूप में इस्तेमाल करें तो भारतीय संस्कृति के संरक्षण का प्रयास भी लगेहाथों पूरा हो सकता है.

आयुर्वेद में अधिकतर दवाएं शहद के साथ सेवन की जाती हैं. हनी के स्वीट यूज की इस से बढि़या सीख क्या होगी? वात, पित्त और कफ की आधारशिला पर टिका आयुर्वेद प्रेम तनमनधन के समस्त पहलुओं को सोचसमझ कर प्रेमदरिया में डूबने का संदेश देता है. शरीर की नब्ज, दिल और दिमाग की तंदुरुस्ती का खयाल रख कर प्रेम करना और उस से उत्पन्न प्रभावों को झेल लेना इस नायाब तकनीक में संभव है.

सो, भारतीय होने पर गर्व करें और यदि प्रेम कर रहे हैं या करने की तैयारी में हैं, तो इस बिंदु पर एक बार जरूर गौर फरमाएं. स्वदेशी तकनीक इतिहास रचती है, इतिहास स्वदेशी आंदोलनों से भरा पड़ा है. इसलिए, प्रेम के मामले में इसे जरूर अपनाएं, जनहित में रचित. Light-hearted Story

Hasya Vayngye : मैं मायके चली जाऊंगी

Hasya Vayngye. दफ्तर में ज्यादा काम की मार से हमारा कामकाजी दिमाग चरचराया हुआ था. शाम को हम घर को चले तो सोचा कि आज श्रीमतीजी के हाथों की गरमागरम चाय पी कर उन के साथ अपने गमों को साझा करेंगे.

उधर डोरबैल बजाने के बाद भी जब श्रीमतीजी ने दरवाजा नहीं खोला, तो हम ने गुस्से में आ कर दरवाजे को जोर से धकेल दिया. देखा तो वह खुला पड़ा था. सोचा कि श्रीमतीजी अंदर से बंद करना भूल गई होंगी. घर में घुसते ही हम ने इधरउधर नजर दौड़ाई. हमारी श्रीमतीजी हमें कहीं नजर नहीं आईं.

हम घबराए हुए सीधे बैडरूम में जा पहुंचे. वहां श्रीमतीजी अंधेरा किए बैड पर ऐसे फैली पड़ी थीं, जैसे किसी ने उन के कीमती जेवरों पर हाथ साफ कर दिए हों और अब उसी का गम मना रही हों.

हम ने जैसे ही कमरे की बत्ती जलाई, तो श्रीमतीजी ने गुस्से में मोटीमोटी लाललाल आंखें हमें दिखाईं, तो हम तुरंत समझ गए कि आज हमारी शामत आई है.

हम ने धीरे से श्रीमती से पूछा, ‘‘क्या तबीयत खराब है या मायके में कोई बीमार है?’’

वे गुस्से में फट पड़ीं, ‘‘खबरदार, जो मेरी या मेरे मायके वालों की तबीयत खराब होने की बात मुंह से निकाली.’’

श्रीमतीजी बालों को बांधते हुए बैडरूम से निकल कर ड्राइंगरूम में आ कर सोफे पर पसर गईं. हम भी अपने कपड़े बदल कर उन के पास आ कर बैठ गए. फिर उन के शब्दों के बाणों की बौछारें शुरू हो गईं, ‘‘शादी को अभी सालभर भी नहीं हुआ है और तुम ने मुझे इस फ्लैट की चारदीवारी में कैद कर दिया है. तुम न तो मुझे कभी फिल्म दिखाने ले जाते हो, न कहीं घुमाते हो और न ही किसी अच्छे से रैस्टोरैंट में खाना खिलाते हो.

‘‘आज तो तुम को मुझे कहीं न कहीं घुमाने ले जाना पड़ेगा और मेरे नाजनखरों को उठाना पड़ेगा, वरना मैं मायके चली जाऊंगी और फिर कभी वापस नहीं आऊंगी.’’

श्रीमतीजी के मायके जाने की धमकी ने हमारी आंखों को उन के पहलवान पिताजी कल्लू के साक्षात दर्शन करा दिए थे, जिन्होंने अपनी बेटी को विदा करते समय हमें चेतावनी दी थी कि अगर कभी हमारी बेटी यहां रोतीबिलखती आई, तो हम से बुरा कोई न होगा. बेटी राधिका को परेशान करने के एवज में तुम्हें हमारे बेटे भूरा से गांव के वार्षिक दंगल में लड़ना होगा.

भूरा की कदकाठी कुछ ऐसी ही थी कि हाथी भी सामने आ जाए, तो उस सांड़ को देख कर अपना रास्ता बदल ले.

हम ने तुरंत श्रीमतीजी के पैर पकड़ लिए और उन के नाजनखरों को उठाने को तैयार हो गए.

अगले दिन दफ्तर में श्रीमतीजी का फोन आया. वे बोलीं, ‘‘आज हमारा सलमान खान की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ देखने का मन कर रहा है. उस के बाद डिनर भी हम बाहर ही करेंगे.’’

सो, इंटरनैट के जरीए हम ने ‘बजरंगी भाईजान’ के 2 टिकट बुक करा दिए. शाम को जब हम घर पहुंचे, तो श्रीमतीजी दरवाजे पर तैयार खड़ी गुस्से से कलाई घड़ी की तरफ देख रही थीं. उधर गरमी के मारे हमारी हालत बुरी थी.

सकपकाते हुए हम धीरे से घर के अंदर घुसे. फिर फ्रिज से हम ने ठंडा पानी निकाला और 2-4 घूंट पानी गले में डाला, जल्दी से कपड़े बदले और श्रीमतीजी के साथ स्कूटर पर निकल पड़े.

मगर रास्ते में ही स्कूटर ने धोखा दे दिया. उधर श्रीमतीजी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. स्कूटर का पिछला पहिया पंक्चर हो गया.

हम ने श्रीमतीजी के तमतमाए चेहरे की तरफ देखा और फिर घड़ी में समय देखा, तो शाम के 7 बज चुके थे. एक घंटे का शो पहले ही निकल चुका था. जब तक हम पंक्चर लगवा कर सिनेमाघर तक पहुंचे, तब तक रात के 9 बज चुके थे. लोग सिनेमाघर से बाहर निकल रहे थे.

अब हमारा दिल डर के मारे बुरी तरह धड़क रहा था.

हम ने श्रीमतीजी को समझाया, ‘‘कल हम तुम्हें मौर्निंग शो में फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ दिखा लाएंगे. इस के एवज में हम कल ड्यूटी पर भी नहीं जाएंगे.’’

यह सुन कर श्रीमतीजी के चेहरे पर गुस्से की लकीरें थोड़ी कम होने लगी थीं. फिर वहीं पास ही के एक अच्छे से रैस्टोरैंट में श्रीमतीजी को ले गए. वहां हम दोनों ने लजीज खाने का लुत्फ उठाया. जब पैसे देने का समय आया, तो हमारी जेब से पर्स गायब था.

हम ने रैस्टोरैंट के मालिक को बहुत समझाया. आखिरकार हमें अपना स्कूटर उन के पास बतौर गिरवी छोड़ना पड़ा और पैदल ही घर जाना पड़ा.

अभी हमारी मुसीबत कम नहीं हुई थी, क्योंकि सुनसान सड़क पर चलती हुई हमारी श्रीमतीजी सोने के जेवरों से दमक रही थीं. जब हम ने उन्हें समझाया कि पल्लू से अपने गहनों को ढक लो, तो वे अकड़ते हुए बोलीं, ‘‘मैं कल्लू पहलवान की बेटी हूं. चोरउचक्कों से डर तुम जैसे शहरियों को लगता होगा. मैं एक धोबीपछाड़ दांव में अच्छेअच्छों को पटक दूंगी और अपनी हिफाजत मैं खुद कर लूंगी.’’

श्रीमतीजी की बहादुरी से हमारे हौसले भी बढ़ चुके थे कि तभी वही हो गया, जिस का हमें डर था. 2 लुटेरों ने हमें धरदबोचा. चाकूपिस्तौल देख हमारी हालत पतली हुई जा रही थी, तभी एक लुटेरा हमारी श्रीमतीजी के गहनों पर झपट पड़ा.

इस के बाद श्रीमतीजी ने उन दोनों की जो हालत बनाई, वह नजारा हम अपनी जिंदगी में कभी भूल नहीं सकते हैं.

कुछ ही देर में पुलिस की एक गाड़ी वहां आ पहुंची. उन दोनों इनामी बदमाशों को पकड़वाने के एवज में श्रीमतीजी को 50 हजार रुपए का चैक बतौर इनाम मिला.

हम ने उन रुपयों से एक सैकंडहैंड कार ले ली है. अब तो हम हर शाम श्रीमतीजी के साथ कार में घूमने जाते हैं. इस बात की उम्मीद करते हैं कि दोबारा किसी लुटेरे गैंग से हमारी श्रीमतीजी की भिड़ंत हो जाए और उसे पकड़वाने के एवज में इनाम के तौर पर फिर कोई चैक मिल जाए. Hasya Vayngye

Humor Story :जुमे का दिन और मिर्जा की मिजाजपुरसी

Humor Story. जुमे का दिन था और मैं भी मूड में था, इसलिए सोचा कि चलो, कुछ देर मिर्जा के साथ गपें लड़ाएं. हो सकता है कि लंच से पहले एक टी पार्टी भी हो जाए.

मैं ने जल्दी से नहाधो कर शेरवानी पहनी, गुलाब का बढि़या इत्र लगाया, पीतल जड़ी नक्काशी वाली बेंत हाथ में ली, सुबह के 11 बजे घर से निकल कर सीधे मिर्जा के घर का रुख किया.

मैं जैसे ही मिर्जा के घर के करीब पहुंचा, तभी मुझ पर अचानक जैसे तड़ाक से बिजली सी गिर गई. दिमाग बिजली की तरह कौंधा और पलभर में हजारों बुरे खयालात दिमाग के एक कोने से दूसरे कोने तक कौंध गए.

देखा कि मिर्जा की बैठक का दरवाजा खुला था. बाहर धूपछांव में एक टूटे से खटोले पर कोई… शायद मिर्जा एक मैली सी चादर ओढ़े लेटे थे. गली के आसपास के दोचार बड़ेबूढ़े भी पास ही बैठे थे.

यह मंजर देख कर मेरी तो जैसे रूह ही निकल गई और टांगें तो जैसे वाइब्रेशन मोड पर आ गई थीं. मेरी बेंत ने मुझ गिरते हुए को सहारा दिया.

मैं ने बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए कांपती आवाज में पूछा, ‘‘यह जनाजा किस… क्या… मिर्जा…?’’

तभी वहां बैठे एक शख्स, जिन्हें गली के लड़के ‘चचा मुकुंदा’ कहते थे और जो चारपाई के सिरहाने बैठे थे, ने अपने मुंह पर उंगली रख कर इशारे से मुझे चुप रह कर बैठने का इशारा किया.

थोड़ी देर बाद वे दबी आवाज में बोले, ‘‘जनाब, आप को खबर भी है कि मिर्जा को चोट लगी है. नींद की दवा दे रखी है, ताकि दर्द का एहसास कम हो.’’

मेरे मुंह से एक हमदर्दी भरी चीख निकलने को हुई, मगर वह जैसे गले में घुट कर रह गई.

मैं ने सवाल पूछा, ‘‘क्या किसी मोटरसाइकिल वाले ने साइड मार दी?’’

‘‘नहीं…’’

‘‘तो क्या फिसल कर सीढि़यों से लुढ़क गए?’’

‘‘नहीं…’’

तभी वहां बैठे सभी लोगों के होंठों पर हलकी सी मुसकान तैर गई. यह देख कर मेरा दिमाग 360 डिगरी पर घूम गया.

‘‘तो क्या माजरा है…’’ मेरे मुंह से निकल पड़ा, ‘‘मिर्जा को चोट लगी है और आप बेशर्मों की तरह मुसकराते हो. कुछ तो शर्म करो. बेशर्मी की भी हद होती है.’’

तभी चचा मुकुंदा ने अपना हाथ मेरी गरदन पर रख कर मुझे अपनी तरफ खींचा और मेरा कान अपने मुंह के पास ले गए.

मैं डर गया कि शायद कहीं मेरा कान ही न चबा डालें. फिर भी मैं ने न जाने क्यों अपना कान उन के मुंह के सामने कर दिया.

चचा मुकुंदा मेरे कान में कुछ फुसफुसाए, जो बस मुझे ही सुनाई दिया.

मेरे मुंह से निकला, ‘‘क्या… ऐसा हुआ… क्यों?’’

मैं ने पूरे जोश के साथ मिर्जा के कफन… माफ कीजिए चादर को मुंह से पैर तक खींच कर साइड में डाल दिया और मिजाजपुरसी की रस्म अदा करते हुए हमदर्दी के तौर पर उन्हें हिलाया.

मैं ने देखा कि मिर्जा के दाहिने हाथ पर किसी ने बांस की खपच्चियां रख कर पट्टी लपेटी हुई थी. उन की बाईं आंख सूज कर काली पड़ गई थी और भौंह के ऊपर माथे को ढके हुए सिर के चारों तरफ पट्टी लिपटी थी, जिस पर लाल दवा के निशान थे, जो सूख कर काले पड़ने लगे थे.

मिर्जा ने अपनी दाईं आंख धीरे से खोली और एक बेबसी वाला गुस्सा मेरी तरफ बम की तरह फेंका.

मैं ने हमदर्दी दिखाते हुए मिर्जा के सिर के नीचे अपना एक हाथ रखा और दूसरा हाथ उन की कमर के नीचे रख कर सहारा दिया और उन का सिर

अपनी गोद में रख कर उन से पूछा, ‘‘यह सब क्या…’’

मिर्जा का गला रुंध गया और वे कुछ न बोल सके. तब मौके की नजाकत को भांपते हुए मैं ने ही पूछा, ‘‘यार मिर्जा, यह बेलन की बात तो अकसर तुम्हारे साथ होती ही रहती थी, पर ये प्लेटेंगिलास, चम्मच के चौकेछक्के कब से? अगर कहीं तुम्हारी आंख फूट जाती तो…?’’

मिर्जा, जो अब तक कुछ सामान्य हो चुके थे, बोले, ‘‘मैं खाना खा रहा था. गले में निवाला फंस गया था. पानी मांगा था, तभी बेगम ने गुस्से में खाली गिलास मेरे ऊपर फेंका और बोलीं, ‘ले, पी पानी.’

‘‘गिलास से तो मैं ने अपनेआप को साइड में झुक कर बचा लिया, लेकिन निशाना खाली जाने से बेगम तिलमिला गईं और फिर एकदम से एक प्लेट अर्जुन के तीर की तरह फेंकी, जो मेरी आंख पर लग जाती, तो आंख ही फूट गई होती.

‘‘इतने पर भी जब वे नहीं रुकीं, तो जो हाथ में आया फेंक कर मारती गईं. उन के इन तीरों की बौछार से बचने के लिए मैं हड़बड़ा कर बाहर की तरफ भागा कि तभी न जाने कमबख्त कौन से साहबजादे ने केला खाया होगा और छिलका दरवाजे में डाल दिया. मेरा पैर उस पर पड़ा और धड़ाम से जमीन पर. अब कुहनी का फ्रैक्चर न जाने कब ठीक होगा.’’

मैं ने मिर्जा को हिम्मत दी और नकली हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘बस… इतना ही. अरे यार मिर्जा, तुम तो खुशकिस्मत हो, जो बीवी से पिटे… मुबारक हो…’’

तभी मिर्जा के चेहरे पर ऐसे भाव आए, जैसे वे मुझे कच्चा ही चबा जाएंगे, पर बेबस थे.

वे धीरे से बोले, ‘‘ठीक है… तुम भी उड़ा लो मजाक… जिस दिन पिटोगे, तब सब पता चल जाएगा.’’

मैं ने कहा, ‘‘यार मिर्जा, तुम जो गरीबी का रोना रोते हो, वह अब दूर होने वाली है. तुम बड़े आदमी बनने वाले हो. इतने बड़े कि… जैसे…’’

तभी मिर्जा बोल पड़े, ‘‘क्या मैं अमेरिका का राष्ट्रपति बन रहा हूं? क्यों तू मेरे जख्मों पर नमक छिड़क रहा है? एक तू ही तो था, जिस से मैं मन की बात कर लेता था. और अब तू भी… ठीक है, उड़ा ले मेरी हंसी… जिस दिन भाभी की मार पड़ेगी, तब पता चलेगा.’’

मैं ने मिर्जा से ऐसे दिखावटी हमदर्दी जताई, जैसे मैं उन पर दुनिया का सब से बड़ा एहसान कर रहा हूं.

मिर्जा से मुखातिब होते हुए मैं ने कहा, ‘‘नहीं यार मिर्जा, ऐसी बात भूल कर भी अपने दिमाग में मत लाना. मैं तुम्हारा सच्चा हमदर्द हूं. कभी शक की गुंजाइश मत रखना.

‘‘देखो मिर्जा, ध्यान से सुनो. वे हैं न हमारे… अरे, वे ही जनाब अमेरिका के बिल क्लिंटन साहब. क्या वे बड़े आदमी नहीं बने, वे भी ऐसे देश के जो पूरी दुनिया को तिगनी का नाच नचाता है…

‘‘तो…’’ मिर्जा बीच में ही बोल पड़े, ‘‘मेरा मिस्टर बिल से क्या ताल्लुक?’’

मैं ने मिर्जा को टोका, ‘‘यार, यही तो कमी है तुम्हारी सोच में? अबे, वे भी अपनी बीवी से पिट कर ही इतने बड़े आदमी बने हैं. उन पर बीवी की मिसाइलों जैसे गिलासप्लेट, चम्मच से अनेक बार हमले हुए हैं.

‘‘जैसे सोना तप कर और पिट कर कुछ बनता है, ऐसे ही हमारे चचा क्लिंटन साहब भी अपनी बीवी के मिसाइलोंबमों से पिट कर अमेरिका के राष्ट्रपति बने…

‘‘यह तो भला हो उन की सहायक का, जिस ने दुनिया के सभी मर्दों को बड़ा बनने का राज दुनिया के सामने खोल दिया, वरना…’’

यह सुनते ही मिर्जा कुछ देर के लिए शांत हुए और एक लंबी उबासी ली, जैसे सचमुच ही अमेरिका के राष्ट्रपति बनने जा रहे हों. अब तक उन की नींद की गोली का असर शायद खत्म हो चुका था, तभी वे और भड़क उठे और बोले, ‘‘क्या बकवास करते हो… वह अमेरिका है और यह हिंदुस्तान… यहां ऐसा कभी नहीं हो सकता.’’

मैं ने मिर्जा को फिर झूठी तसल्ली देने की कोशिश की और कहा, ‘‘यार, चचा क्लिंटन की बात छोड़ो. अगर तुम गलीमहल्ले के नेता भी बन गए, तो भी तुम गुजरबसर लायक अमीर तो बन ही सकते हो.’’

शायद यह बात मिर्जा को जंच गई थी. उन्होंने राहत की लंबी सांस ली और फिर करवट बदल कर खर्राटे लेने शुरू कर दिए, जैसे अमीरी के ख्वाबों की दुनिया में पहुंच गए हों.

दोपहर के साढ़े 12 बज चुके थे. मैं ने मिर्जा का सिर धीरे से तकिए पर रखा और कहीं दोपहर का खाना खाने के लिए रैस्टोरैंट ढूंढ़ने लगा. मिर्जा के यहां तो लंच की उम्मीद ही नहीं थी. Humor Story

Humor : मिस सेजल का स्वयंवर

Humor. मिस सेजल की उम्र 30 पार हो चुकी थी, लेकिन उन की शादी नहीं हुई थी. जब वे 17-18 साल की थीं, तब महल्ले के तकरीबन सारे लड़के उन के ऊपर फिदा थे. आतेजाते मुसकराते और उन को लव लैटर देते थे. उन को देख कर आहें भरते थे, लेकिन मिस सेजल किसी को भाव नहीं देती थीं.

मिस सेजल जब कालेज जाती थीं, तो कितने ही आवारा और मजनू किस्म के लड़के उन को देख कर मुस्कुरा कर मरमर जाते थे, लेकिन वे पलट कर देखती तक नहीं थीं.

इस वजह से मिस सेजल के बारे में धीरेधीरे महल्ले के लड़कों में यह बात फैल गई कि वे बहुत हद तक नकचढ़ी हैं और आसानी से किसी के हाथ नहीं आने वाली हैं.

जब मिस सेजल 24-25 साल की हुईं, तो उन के मांबाप को उन की शादी की चिंता हुई. मिस सेजल के पिताजी पड़ोसियोंरिश्तेदारों वगैरह के कहने पर इधरऊधर लड़का देखने जाते थे, लेकिन मिस सेजल को तो अपने सपनों का राजकुमार चाहिए था, जो लाखोंकरोड़ों में एक हो.

मिस सेजल अपने मांबाप की एकलौती औलाद थीं. मांबाप ने उन को बड़े नाजों से पाला था. उन की हर बात मांबाप मानते थे.

मिस सेजल के लिए जब लड़का देखने की शुरुआत हुई, तो लड़के वालों के लिए उन की बहुत सी शर्तें थीं. यह इतिहास में शायद पहली बार हो रहा था कि एक लड़की की शर्तों पर शादी होनी थी. और जो इन शर्तों को पूरा करता, वही मिस सेजल का पति बनता.

मिस सेजल ने शादी को कभी गंभीरता से नहीं लिया. आसपड़ोस, नातेरिश्तेदार सब लोग 30 की उम्र होने के बाद जोर देने लगे, लेकिन मिस सेजल के कान पर जूं नहीं रेंग रही थी. वे पहले कैरियर बनाना चाह रही थीं. इसी खब्त में उन के शादी के दिन निकलने लगे.

मिस सेजल को लगता था कि शादी ही तो है, कोई बहुत बड़ी चीज तो है नहीं. ताजमहल नहीं है, जिस को बनवाने में 20 साल लगे थे. पलक झपकते ही हो जाएगी. कामयाब होने के बाद तो लोग उन के आगेपीछे शादी करने के लिए घूमेंगे.

खैर, इसी उधेड़बुन में समय निकलता रहा. मिस सेजल का न तो कैरियर बन सका, न ही शादी ही हो सकी. लिहाजा, उन को भी लगा कि चलो कैरियर तो न बना सकी, अब शादी कर ही लेनी चाहिए.

लेकिन मिस सेजल ऐसीवैसी लड़की नहीं थीं. वे व्यवस्था से टकराने वाली और कुछकुछ क्रांतिकारी थीं. उन्होंने कानून की पढ़ाई की थी. लिहाजा, उन के खून में हमेशा गरमी रहती थी.

मिस सेजल की शादी के लिए बहुत सी शर्तें थीं, जैसे लड़का पानबीड़ी, सिगरेट, तंबाकू जैसी किसी नशीली चीज का सेवन न करता हो. शराबियों से तो मिस सेजल को सख्त नफरत थी.

इतना ही नहीं, लड़का अकेला होना चाहिए यानी उस के कोई भाईबहन नहीं होने चाहिए. लड़का गांव में नहीं रहता हो, बल्कि शहर में रहता हो. घर अच्छा होना चाहिए, फिल्मी दुनिया में लगाए गए सैटों की तरह. घर अच्छी जगह पर होना चाहिए. लड़का गोराचिट्टा होना चाहिए. लड़के की कमाई 20-25 लाख रुपए सालाना होनी चाहिए. मतलब, लड़का लाखों में एक नहीं, बल्कि करोड़ों में एक हो.

मिस सेजल की और भी कई छोटीबड़ी शर्तें थीं, जैसे शादी के बाद मिस सेजल को खाना बनाना, कपड़े धोना, बरतन मांजना, घर की साफसफाई करना न पड़े. उन को तो  कदमकदम पर नौकरचाकर दिखने वाला घर चाहिए था.

इस के अलावा शादी के तुरंत बाद मिस सेजल को मां नहीं बनना था. 5-7 साल के बाद ही वे मां बनना चाहेंगी. वे बच्चे को अपना दूध पिलाना पसंद नहीं करेंगी, बल्कि डब्बे का दूध पिलाएंगी… और भी बहुतकुछ.

जब अब मिस सेजल 35 की नहीं, बल्कि 40 साल की हो गई हैं और उन की डिमांड के मुताबिक लड़का नहीं मिल रहा है, तो उन के मांबाप ने स्वयंवर का आयोजन किया है. जो लोग मिस सेजल की शर्तों के साथ शादी करना चाहते हैं, वे तुरंत संपर्क करें.

इस स्वयंवर की घोषणा हुए भी 2 साल बीत गए हैं, लेकिन किसी ने स्वयंवर में आने का कष्ट नहीं उठाया. लिहाजा, औनलाइन आवेदन भेजने की तारीख को अगले 5 साल के लिए बढ़ा दिया गया है.

Comedy Story: वोटर केयर सैंटर में आपका स्वागत है

Comedy Story: एक दिन मेरे मोबाइल फोन पर किसी अनजान नंबर से काल आई. जैसे ही मैं ने काल रिसीव की, दूसरी ओर से आवाज आई, ‘नमस्कार, वोटर केयर सैंटर में आप का स्वागत है.’

वह कंप्यूटराइज्ड आवाज सुन कर मेरे दिमाग के सैरेब्रल हैमिस्फीयर में दबाव बढ़ने लगा. कालर ट्यून, बैंकिंग लोन काल, क्रेडिट कार्ड देने वाले कस्टमर केयर या आधारकार्ड नंबर और ओटीपी मांगने वाले फ्राड काल के बारे में तो सुना था, पर अब यह वोटर केयर सैंटर कौन सी नई बला है.

इसी ऊहापोह में मैं फोन काटने ही वाला था कि तभी दूसरी ओर से आवाज आई, ‘चूंकि यह काल जनहित में जारी है, इसलिए पूरी जानकारी लिए बिना कृपया फोन काटने की हिमाकत न करें.’

वह चेतावनी सुन कर मैं थोड़ा हड़क गया और बगैर किसी बाधा के फोन की लाइन को जारी रखा.

‘नमस्कार, हम वोटर केयर हैल्पलाइन से बोल रहे हैं. आप के क्षेत्र में चुनाव की घोषणा हो चुकी है. क्षेत्रीय उम्मीदवार के चयन को सुविधाजनक बनाने के लिए अगर आप उन के चालचलन के बारे में जानना चाहते हैं, तो कृपया 1 दबाएं, वरना 2 दबाएं.’

मैं मन ही मन सोचने लगा, ‘यह कैसा वोटर केयर सैंटर है… पहले तो कस्टमर केयर काल में हिंदी, इंगलिश, बंगला, भोजपुरी वगैरह भाषा के चयन का औप्शन पूछा जाता था…’

तभी दूसरी ओर से आवाज आई, ‘आप भाषा चयन को ले कर कतई परेशान न हों. हमें पता है कि आप हिंदी के जानकार हैं. वैसे भी इंगलिश में आप कच्चे हैं और दूसरी क्षेत्रीय भाषा को समझना आप की औकात और ज्ञान से बाहर है. तो एकदूसरे का समय बरबाद किए बिना वोटर केयर प्रक्रिया को जारी रखते हुए अपने क्षेत्रीय उम्मीदवार का चालचलन जानने के लिए कृपया 1 दबाएं, वरना 2 दबाएं.’

वोटर केयर सैंटर वालों की बात सुन कर मैं हैरान रह गया. बहरहाल, मैं ने सवाल पर फोकस किया. चूंकि नेताओं के चालचलन के बारे में बिहार से ब्रह्मांड तक सब को पता है, इसलिए समय की बरबादी से बचने के लिए मैं ने बटन नंबर 2 दबा दिया.

‘माफ करें, यह जनहित में जारी काल है और मजबूत वोटर होने के नाते आप लोकतंत्र के निर्माता हैं, इसलिए आप को नेता चयन संबंधित प्रक्रिया हर हाल में पूरी करनी है.

‘लोकलुभावन भाषण और आश्वासन देने वालों के लिए 1 दबाएं, शिलान्यास के बाद योजना पैंडिंग रख दुर्लभ दर्शन वालों के लिए 2 दबाएं, दबंग, आपराधिक चरित्र वालों के लिए 3 दबाएं, घोटालेबाज भ्रष्ट माननीय के लिए 4 दबाएं, वादा भूलने वाले दलबदलू के लिए 5 दबाएं, सर्वसुलभ कमीशनखोर खादीमानव के लिए 6 दबाएं और सच्चे जनसेवक के लिए 7 दबाएं या दोबारा सुनने के लिए स्टार दबाएं.’

पलभर विचार कर के मैं ने 7 का बटन दबा दिया.

‘आप ने चुना है 7 यानी सच्चा जनसेवक. इस की तसदीक के लिए हैश दबाएं वरना दोबारा सुनने के लिए स्टार दबाएं.’

मैं ने हैश बटन दबा दिया.

‘माफ कीजिए, अखिल भारतीय स्तर पर इस प्रजाति का लोप हो जाने के चलते फिलहाल आप के क्षेत्र में यह सेवक उपलब्ध नहीं है. दोबारा सुनने के लिए स्टार दबाएं, मेन मैन्यू में जाने के लिए 8 दबाएं.’

मैं ने स्टार दबा कर दोबारा सुना और इस बार 6 का बटन दबाया.

‘आप ने चुना है 6 यानी सर्वसुलभ कमीशनखोर खादीमानव. तसदीक के लिए हैश दबाएं.’

मैं ने हैश दबा दिया.

‘राहत योजना में लूटखसोट की भागीदारी हेतु बाढ़, महामारी, आपदा के दौरान जनता के बीच आसानी से उपलब्ध जनसेवक के लिए 1 दबाएं, मुआवजा दे कर मीडिया में छाए रहने वालों के लिए 2 दबाएं, सिर्फ चुनाव के समय दर्शन देने वालों के लिए 3 दबाएं और ज्यादा समय उपलब्ध रहने वाले मार्गदर्शक नेता के लिए 4 दबाएं.’

मैं ने बिना समय गंवाए 4 दबा कर हैश बटन से तसदीक भी कर दी. मंदिर निर्माता, गौरक्षक, सर्वसुलभ मार्गदर्शक नेता के लिए 1 दबाएं, सर्वव्यापी हिजाब और जिहाद समर्थक के लिए 2 दबाएं, गांवगांव उपलब्ध जातपांत खेलने वालों के लिए 3 दबाएं और खालिस धर्मनिरपेक्ष नेता के लिए 4 दबाएं.’

मैं ने 4 दबाया, साथ ही हैश बटन भी दबा दिया. ‘एक बार फिर से माफ करें, मार्केट में फिलहाल यह टाइप भी मुहैया नहीं है… फिर से सुनने के लिए स्टार दबाएं, मेन मैन्यू में जाने के लिए 8 दबाएं या अपने क्षेत्र के पढ़ेलिखे, कर्मठ, लगनशील, काबिल उम्मीदवार से संबंधित सभी तरह की छोटीबड़ी जानकारी हेतु हमारे वोटर केयर ऐक्जिक्यूटिव से बात करने के लिए 9 दबाएं.’

मैं ने कंप्यूटराइज्ड आवाज से उलझने के बजाय 9 दबा कर सीधेसीधे वोटर केयर ऐक्जिक्यूटिव से बात कर क्षेत्र के काबिल उम्मीदवार के बारे में जान लेना उचित समझ .

‘आप की काल हमारे लिए खास है. जल्दी ही आप की बात हमारे वोटर केयर ऐक्जिक्यूटिव से होने वाली है, कृपया लाइन पर बने रहें,’ की आवाज के साथ शास्त्रीय संगीत की रिंगटोन पर पूरे 15 मिनट तक लटकाए रखने के बाद दूसरी ओर से आवाज आई, ‘माफ कीजिए, आप ने गलत औप्शन चुना है…’ और आखिरकार दूसरी ओर से फोन डिस्कनैक्ट कर दिया गया. Comedy Story

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