Hindi Story : दंश

Hindi Story : कविता के साथ मेरा दिनरात का उठनाबैठना ही नहीं उस घर से मेरा पारिवारिक संबंध भी रहा था. शिवेन भैया दोनों परिवारों में हम सब भाईबहनों में बड़े थे. जब सोना भाभी ब्याह कर आईं तो मुझे लगा ही नहीं कि वह मेरी अपनी सगी भाभी नहीं थीं.

सोना भाभी का नाम उषा था. उन का पुकारने का नाम भी सोना नहीं था, न हमारे घर बहू का नाम बदलने की कोई प्रथा ही थी पर चूंकि भाभी का रंग सोने जैसा था अत: हम सभी भाईबहन यों ही उन्हें सोना भाभी बुलाने लगे थे. बस, वह हमारे लिए उषा नहीं सोना भाभी ही बनी रहीं. सुंदर नाकनक्श, बड़ीबड़ी भावपूर्ण आंखें, मधुर गायन और सब से बढ़ कर उन का अपनत्व से भरा व्यवहार था. उन के हाथ का बना भोजन स्वाद से भरा होता था और उसे खिलाने की जो चिंता उन के चेहरे पर झलकती थी उसे देख कर हम उन की ओर बेहद आकृष्ट होते थे.

शिवेन भैया अभी इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे कि उन्हें मातापिता ही नहीं दादादादी के अनुरोध से विवाह बंधन में बंधना पड़ा. पढ़ाई पूरी कर के वह दिल्ली चले गए फिर वहीं रहे. हम लोग भी अपनेअपने विवाह के बाद अलगअलग शहरों में रहने लगे. कभी किसी खास आयोजन पर मिलते तो सोना भाभी का प्यार हमें स्नेह से सराबोर कर देता. उन का स्नेहिक आतिथ्य हमेें भावविभोर कर देता.

आखिरी बार जब सोना भाभी से मिलना हुआ उस समय उन्होंने सलवार सूट पहना हुआ था. वह मेरे सामने आने में झिझकीं. मैं ड्राइंगरूम में बैठने वाली तो थी नहीं, भाग कर दूसरे कमरे में पहुंची तो वह साड़ी पहनने जा रही थीं.

मैं ने छूटते ही कहा, ‘‘यह क्या भाभी, आज तो आप बड़ी सुंदर लग रही हो, खासकर इस सलवार सूट में.’’

‘‘नहीं,’’ उन्होंने जोर देते हुए कहा.

मैं ने उन्हें शह दी, ‘‘भाभी आप की कमसिन छरहरी काया पर यह सलवार सूट तो खूब फब रहा है.’’

‘‘नहीं, माया, मुझे संकोच लगता है. बस, 2 मिनट में.’’

‘‘पर क्यों? आजकल तो हर किसी ने सलवार सूट अपने पहनावे में शामिल कर लिया है. यहां तक कि उन बूढ़ी औरतों ने भी जिन्होंने पहले कभी सलवार सूट पहनने के बारे में सोचा तक नहीं था… सुविधाजनक होता है न भाभी, फिर रखरखाव में भी साड़ी से आसान है.’’

‘‘यह बात नहीं है, माया. मुझे कमर में दर्द रहता है तो सब ने कहा कि सलवार सूट पहना करूं ताकि उस से कमर अच्छी तरह ढंकी रहेगी तो वह हिस्सा गरम रहेगा.’’

‘‘हां, भाभी, सो तो है,’’ मैं ने हामी भरी पर मन में सोचा कि सब की देखादेखी उन्हें भी शौक हुआ होगा तो कमर दर्द का एक बहाना गढ़ लिया है…

सोना भाभी ने इस हंसीमजाक के  बीच अपनी जादुई उंगलियों से खूब स्वादिष्ठ भोजन बनाया. इस बीच कई बार मोबाइल फोन की घंटी बजी और भाभी मोबाइल से बात करती रहीं. कोई खास बात न थी. हां, शिवेन भैया आ गए थे. उन्होंने हंसीहंसी में कहा कि तुम्हारी भाभी को उठने में देर लगती थी, फोन बजता रहता था और कई बार तो बजतेबजते कट भी जाता था, इसी से इन के लिए मोबाइल लेना पड़ा.

साल भर बाद ही सुना कि सोना भाभी नहीं रहीं. उन्हें कैंसर हो गया था. सोना भाभी के साथ जीवन की कई मधुर स्मृतियां जुड़ी हुई थीं इसलिए दुख भी बहुत हुआ. लगभग 5 सालों के बाद कविता से मिली तब भी हम दोनों की बातों में सोना भाभी ही केंद्रित थीं. बातों के बीच अचानक मुझे लगा कि कविता कुछ कहतेकहते चुप हो गई थी. मैं ने कविता से पूछ ही लिया, ‘‘कविता, मुझे ऐसा लगता है कि तुम कुछ कहतेकहते चुप हो जाती हो…क्या बात है?’’

‘‘हां, माया, मैं अपने मन की बात तुम्हें बताना चाहती हूं पर कुछ सोच कर झिझकती भी हूं. बात यह है…

‘‘एक दिन सोना भाभी से बातोंबातों में पता लगा कि उन्हें प्राय: रक्तस्राव होता रहता है. भाभी बताने लगीं कि पता नहीं मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है. 50 से 5 साल ऊपर की हो रही हूं्…

‘‘भाभी पहले से भी सुंदर, कोमल लग रही थीं. बालों में एक भी रजत तार नहीं था. वह भी बिना किसी डाई के. वह इतनी अच्छी लग रही थीं कि मेरे मुंह से निकल गया, ‘भाभी, आप चिरयौवना हैं न इसीलिए. देखिए, आप का रंग पहले के मुकाबले और भी निखरानिखरा लग रहा है और चेहरा पहले से भी कोमल, सुंदर. आप बेकार में चिंता क्यों कर रही हैं.

‘‘यही कथन, यही सोच मेरे मन में आज भी कांटा सा चुभता रहता है. क्यों नहीं उस समय उन पर जोर दिया था कि आप के साथ जो कुछ हो रहा है वह ठीक नहीं है. आप डाक्टर से परामर्श लें. क्यों झूठा परिहास कर बैठी थी?’’

मुझे भी उन के कमर दर्द की शिकायत याद आई. मैं ने भी तो उन की बातों को गंभीरता से नहीं लिया था. मन में सोच कर मैं खामोश हो गई.

भाभी और भैया दोनों ही अस्पताल जाने से बहुत डरते थे या यों कहें कि कतराते थे. शायद कुछ कटु अनुभव हों. वहां बातबात में लाइन लगा कर खड़े रहना, नर्सो की डांटडपट, बेरहमी से सूई घुसेड़ना, अटेंडेंट की तीखी उपहास करती सी नजर, डाक्टरों का शुष्क व्यवहार आदि से बचना चाहते थे.

भाभी को सब से बढ़ कर डर था कि कैंसर बता दिया तो उस के कष्टदायक उपचार की पीड़ा को झेलना पड़ेगा. उन्हें मीठी गोली में बहुत विश्वास था. वह होम्योपैथिक दवा ले रही थीं.

‘‘माया, बहुत सी महिलाएं अपने दर्द का बखान करने लगती हैं तो उन की बातों की लड़ी टूटने में ही नहीं आती,’’ कविता बोली, ‘‘उन के बयान के आगे तो अपने को हो रहा भीषण दर्द भी बौना लगने लगता है. सोना भाभी को भी मैं ने ऐसा ही समझ लिया. उन से हंसी में कही बात आज भी मेरे मन को सालती है कि कहीं उन्होंने मेरे मुंह से अपनी काया को स्वस्थ कहे जाने को सच ही तो नहीं मान लिया था और गर्भाशय के अपने कैंसर के निदान में देर कर दी हो.

‘‘माया, लगता यही है कि उन्होंने इसीलिए अपने पर ध्यान नहीं दिया और इसे ही सच मान लिया कि रक्तस्राव होते रहना कोई अनहोनी बात नहीं है. सुनते हैं कि हारमोन वगैरह के इंजेक्शन से यौवन लौटाया जा रहा है पर भाभी के साथ ऐसा क्यों हुआ? मैं यहीं पर अपने को अपराधी मानती हूं, यह मैं किसी से बता न सकी पर तुम से बता रही हूं. भाभी मेरी बातों पर आंख मूंद कर विश्वास करती थीं. 3-4 महीने भी नहीं बीते थे जब रोग पूरे शरीर में फैल गया. सोने सी काया स्याह होने लगी. अस्पताल के चक्कर लगने लगे, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी.’’

मुझे भी याद आने लगा जब मैं अंतिम बार उन से मिली थी. मैं ने भी उन्हें कहां गंभीरता से लिया था.

‘‘माया, तुम कहानियां लिखती हो न,’’ कविता बोली, ‘‘मैं चाहती हूं कि सोना भाभी के कष्ट की, हमारे दुख की, मेरे अपने मन की पीड़ा तुम लिख दो ताकि जो भी महिला कहानी पढ़े, वह अपने पर ध्यान दे और ऐसा कुछ हो तो शीघ्र ही निदान करा ले.’’

कविता बिलख रही थी. मेरी आंखें भी बरस रही थीं. उसे सांत्वना देने वाले शब्द मेरे पास नहीं थे. वह मेरी भी तो बहुत अपनी थी. कविता का अनुरोध नहीं टाल सकी हूं सो उस की व्यथाकथा लिख रही हूं.

लेखक- नारायणी

Hindi Story : अनोखी तरकीब

Hindi Story : कहते हैं कि जिस घर में बेटी-दामाद शादी के बाद भी बैठे हों उस घर में अपनी लड़की कभी नहीं ब्याहनी चाहिए, क्योंकि वहां बेटी के आगे बहू की कोई इज्जत नहीं होती. पर सबीहा के घर वालों ने तो कभी यह सोचा ही नहीं था. उन्होंने तो बस, लड़का देखा, उस के चालचलन को परखा, कामधंधा का पता किया और बेटी को ब्याह दिया.

उन्हें तो यह तब पता चला जब सबीहा पहली विदाई के बाद घर आई. मां के हालचाल पूछने पर सबीहा ने बडे़ ही उदासीन अंदाज में बताया, ‘‘बाकी तो वहां सब ठीकठाक है पर एक गड़बड़ है कि जरीना आपा शादी के बाद भी वहीं मायके में पड़ी हुई हैं. उन के मियां के आगेपीछे कोई भी नहीं था और वह दूर के भाई लगते थे इसलिए उन लोगों ने उन्हें घरदामाद बना रखा है.

‘‘जरीना आपा तो वहां ऐसे रहा करती हैं मानो वही उस घर की सबकुछ हों. उन के आगे किसी की भी नहीं चलती है और उन की जबान भी खूब चला करती है. आप लोगों को वहां रिश्ता करने से पहले यह सब पता कर लेना चाहिए था.’’

बेटी की बात सुन कर उस की मां सन्न रह गईं पर अब वह कर भी क्या सकती थीं इसलिए बेटी को समझाने लगीं, ‘‘यह तो वाकई हम से बहुत बड़ी भूल हो गई. जब हम तुम्हारा रिश्ता ले कर वहां गए थे तो जरीना को वहां देखा भी था लेकिन हम ने यही समझा कि शादीशुदा लड़की है, ससुराल आई होगी, इसलिए पूछना जरूरी नहीं समझा और हम धोखा खा गए.

‘‘खैर, तुम्हें इस की ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है. बस, तुम्हें अपने काम से काम रखना है, और मैं समझती हूं कि यह कोई बहुत बड़ी बात भी नहीं है. हो सकता है कल को वे अपना हंडि़याबर्तन अलग कर लें.’’

सबीहा का पति अनवर जमाल भारतीय स्टेट बैंक में कैशियर था. वह अच्छीखासी कदकाठी का खूबसूरत नवयुवक था लेकिन उस के साथ एक गड़बड़ थी, वह उन मर्दों में से था जो अपनी बीवियों को दोस्त बना कर नहीं सिर्फ बीवी बना कर रखना जानते हैं.

जरीना के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. चारों बच्चे बेहद शरारती और जिद्दी थे. वे घर में हर वक्त हुड़दंग मचाते रहते और सबीहा से तरहतरह की फरमाइशें करते रहते. अकसर वह उन की फरमाइशें पूरी कर देती लेकिन कभी तंग आ कर कुछ बोल देती तो बस, जरीना का भाषण शुरू हो जाता, ‘‘बच्चों से ऐसे पेश आया जाता है. जरा सा घर का काम क्या करती हो इन मासूमों पर गुस्सा उतारने लगती हो.’’

बेटी की चिल्लाहट सुन कर सबीहा की सास भी बिना कुछ जानेबूझे उसे कोसने लगतीं, ‘‘इतनी सी जिम्मेदारी भी तुम से निभाई नहीं जाती. इसीलिए कहती हूं कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ानालिखाना नहीं चाहिए. ज्यादा पढ़लिख लेने के बाद उन का मन घरेलू कामों में नहीं लगता है.’’

अगर कभी सबीहा की कोई शिकायत अनवर तक पहुंच जाती तो उस को अलग डांटफटकार सुनने को मिलती लेकिन वह किसी को कुछ बोल नहीं सकती थी. अपनी सफाई नहीं दे सकती थी, केवल उन की सुन सकती थी. वह इस सच को जान चुकी थी कि उस के कुछ भी बोलने का मतलब है सब मिल कर उसे चीलकौवे की तरह नोच खाएंगे.

सबीहा मायके में अपने ससुराल वालों की कोई शिकायत करती तो वे उलटे उसे ही नसीहत देने लगते और सब्र से काम लेने को कहते. इसलिए शुरुआत में वह जो भी वहां की बात मायके वालों को बताती थी, बाद में उस ने वह भी बताना बंद कर दिया.

एक दिन सबीहा अपने हालात से भरी बैठी थी कि ननद ने कुछ कहा तो वह उस से जबान लड़ा बैठी और जवाब में उसे ऐसी बातें सुनने को मिलीं जिस की उस ने कल्पना भी नहीं की थी.

सास और ननद की झूठी और बेसिरपैर की बातों को सुन वह स्तब्ध रह गई और सोचने लगी कि कहां से वह जरीना के मुंह लग गई.

लेकिन उन का अभी इतने से पेट नहीं भरा था और जब अनवर बैंक से आया तो मौका मिलते ही उन्होंने उन बातों में कुछ और मिर्चमसाला लगा कर उस के कान भर दिए और वह भी सबीहा की खबर लेने लगा, ‘‘क्या यही सिखा के भेजा है तुम्हारे मांबाप ने कि सासननद का एहतेराम मत करना? उन के बच्चों को नीची नजर से देखना. घर में अपनी मनमानी करती रहना और मौका मिलते ही शौहर को लेके अलग हो जाना.’’

‘‘अरे, यह आप क्या कह रहे हैं? मैं ने तो ऐसा कभी सोचा भी नहीं और कभी किसी को कुछ कहा भी नहीं  है. पता नहीं वह क्याक्या अपने मन से लगाती रहती हैं.’’

अनवर के सामने सबीहा जैसे डरतेडरते पहली बार इतना बोली तो वह और भी भड़क उठा, ‘‘खामोश, यहां यह जबानदराजी नहीं चलेगी. यहां रहना है तो सभी का आदरसम्मान करना सीखना होगा और सब से मिलजुल कर  रहना पड़ेगा. समझीं.’’

पति की डांट के बाद सबीहा अंदर ही अंदर फूट पड़ी और मन में बड़बड़ाने लगी कि मैं इन्हें क्या तकलीफ पहुंचाती हूं जो ये मेरे पीछे पड़ी रहती हैं. मुझ से ऐसा कौन सा कर्म हो गया था जो मैं ऐसे घर में चली आई. जब मुझे शादी के बाद यही सब देखना था तो इस से बेहतर था कि मैं घर में ही कुंआरी पड़ी रहती.

उसे पति की बात उतनी बुरी नहीं लगी थी, उसे तो पति के कान भरने वाली सासननद पर गुस्सा आ रहा था. उस ने मन में सोच लिया था कि अब खामोश बैठने से काम नहीं चलेगा. इन्हें कुछ न कुछ सबक सिखाना ही पड़ेगा, तभी उस की जान छूटेगी. लेकिन उसे करना क्या होगा? लड़ाईझगडे़ से तो उस का यह काम बनने वाला नहीं था. फिर कौन सी तरकीब लगाई जाए कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

सबीहा काफी देर तक अपनी इस समस्या के समाधान के लिए बिस्तर पर पड़ी दिमागी कसरत करती रही. अचानक उसे एक अनोखी तरकीब सूझ गई और वह मन में बड़बड़ाई, ‘हां, यह ठीक रहेगा. ऐसे लोग उलटे दिमाग के होते हैं. इन्हें उलटी बात कहो तो सीधा समझते हैं और सीधा बोलो तो उलटा समझते हैं. इन्हें उलटे हाथ से ही हांकना पड़ेगा. निहायत नरमी से इन्हें उलटी कहानी सुनानी पड़ेगी, तब ये मेरी बात को सीधा समझेंगे और तब ही यह झंझट खत्म होगा.’

सबीहा कई दिनों तक अपनी योजना में उलझी उस के हर पहलू पर विचार करती रही और जब योजना की पूरी रूपरेखा उस के दिमाग में बस गई तब एक दिन मौका पा कर वह सास की तेलमालिश करने बैठ गई. कुछ देर उन से इधरउधर की बातें करने के बाद वह बोली, ‘‘जानती हैं अम्मी, इस बार मैं अपने घर गई थी तो एक दिन मेरे पड़ोस में एक अजब ही तमाशा हो गया.’’

‘‘अच्छा, क्या हुआ था? जरा मैं भी तो सुनूं,’’ उस की कहानी में दिलचस्पी लेते हुए सास बोलीं.

सबीहा उन्हें अपनी पूरी कहानी सुनाने लगी:

‘‘मेरे मायके में एक खातून मेरे मकान से कुछ मकान छोड़ के रहती हैं. उन के पास दोमंजिला मकान था और 2 शादीशुदा लड़के थे. आधे मकान में वे एकसाथ रहते थे और आधे को उन्होंने किराए पर दे रखा था. वे रहते तो मिलजुल कर थे पर उन की मां अपने बडे़ बेटे को बहुत मानती थीं. मां का यही नजरिया दोनों बहुओं और उन के बच्चों के साथ भी था.

‘‘फिर बेटाबहू ने मां की एकतरफा मोहब्बत का गलत फायदा उठाते हुए मकान का वह एक हिस्सा जो देखने में अच्छा था, अपने नाम लिखवा लिया और जो खंडहर जैसा था उस हिस्से को छोटे भाई के लिए छोड़ दिया. यही नहीं बडे़ बेटे ने धोखे से मां के कीमती जेवर आदि भी हड़प लिए.

‘‘छोटे भाई को जब इस बात का पता चला तो वह बडे़ भाई से भिड़ गया और दोनों भाइयों के बीच जम कर झगड़ा हुआ, जिस में बीचबचाव करते समय मां भी घायल हो गईं. इस घटना के बाद मां तो बड़े बेटे के साथ रहने लगीं लेकिन छोटे बेटे से उन का नाता लगभग टूट सा गया.’’

सबीहा ने एक पल रुक कर अपनी सास की ओर देखा तो उसे यों लगा जैसे वह अंदर से कांप रही हैं. उस ने फिर अपनी कहानी को आगे बढ़ा दिया :

‘‘अम्मीजी, सच कह रही हूं, जब उस लड़ाई के बारे में मुझे पता चला तो इतना गुस्सा आया कि जी चाहा जा कर उन दोनों कमबख्तों के तलवार से टुकड़े- टुकडे़ कर दूं. भाई भाई से लडे़ तो बात अलग है लेकिन बूढ़ी मां के साथ ऐसा सुलूक. उन पर हाथ उठाना कितना बड़ा गुनाह है.

‘‘उस लड़ाईझगडे़ का मां के दिल पर ऐसा असर हुआ कि वह बुरी तरह बीमार पड़ गईं. अब बडे़ लड़के ने उन से साफ कह दिया कि मेरे पास तुम्हारे इलाज के लिए पैसे नहीं हैं, जिस बेटे के नाम की बैठेबैठे माला जपती हो उसी के पास जा कर इलाज कराओ.

‘‘छुटके ने यह सुना तो जैसे उसे ताव आ गया और तुरंत एक अच्छे डाक्टर के पास ले जा कर मां का इलाज कराया. उन्हें अपने पास रख कर खूब देखभाल की. और अब वह एकदम ठीक हो कर बडे़ मजे में छोटे बेटे के पास रह रही हैं.

‘‘अब मुझे उन के बडे़ बेटाबहू पर गुस्सा आ रहा था कि उन्होंने उस बेचारी बुढि़या का सबकुछ लूट लिया था और फिर बेरहमी से खदेड़ भी दिया. यह तो जमाना आ गया है. जिस पर हद से ज्यादा प्यार लुटाइए वही बरबाद करने पर तुल जाता है. इस से तो अच्छा है कि हम सभी को एक नजर से देखते चलें. चाहे वह बेटा हो या बेटी. क्यों अम्मीजी?’’

‘‘हां, बिलकुल,’’ इतना कह कर वह किसी गहरी सोच में डूब गईं. उन्हें खोया हुआ देख कर सबीहा धीरे से मुसकराई और कुछ देर उन की सेवा करने के बाद धीरे से उठ कर चली गई.

दरअसल, सबीहा की सास उस की कहानी सुन कर जो खो गई थीं तो उस दौरान वह अपने प्रति एक फिल्म सी देखने लगी थीं कि बेटीदामाद पर अंधाधुंध प्यारमोहब्बत, धनदौलत सब- कुछ लुटा रही हैं जिस का फायदा उठाते हुए वह उन्हें कंगाल कर के निकल गए. उस के बाद उन की नफरत के मारे हुए बेटाबहू ने भी उन से नाता तोड़ लिया और वह भरी दुनिया में एकदम से अकेली और बेसहारा हो कर रह गई हैं.

शायद इस भयानक खयाल ने ही उन्हें इतनी जल्दी बदल कर रख दिया था. सबीहा की उलटी कहानी सचमुच में काम कर गई थी.

सबीहा अपनी इस पहली सफलता से खुश थी लेकिन अभी उसे ननद से भी निबटना था. उस के भी दिमाग को घुमाना था. इसलिए वह अपनी सफलता पर बहुत ज्यादा खुश न हो कर मन ही मन एक और कहानी बनाने में जुट गई.

जब उस की दूसरी कहानी भी तैयार हो गई तो एक दिन वह ननद के पास भी धीरे से जा बैठी और उन से इधरउधर की बातें करते हुए सोचने लगी कि उन्हें किस तरह कहानी सुनाई जाए. अभी वह यह सोच ही रही थी कि जरीना बोलीं, ‘‘जानती हो सबीहा, आगे पत्थर वाली गली में एक करीम साहब रहते हैं. उन के लड़के की शादी को अभी कुछ ही माह हुए थे कि वह अपनी बीवी को ले कर अलग हो गया. कितनी बुरी बात है. मांबाप कितने अरमानों से बच्चों को पालते हैं और बच्चे उन्हें कितनी आसानी से छोड़ कर चले जाते हैं.’’

यह सुनते ही सबीहा की आंखें चमक उठीं. वह गहरी सांस लेते हुए बोली, ‘‘क्या कीजिएगा बाजी, यही जमाना आ गया है. जिधर देखिए, लोग परिवार से अलग होते जा रहे हैं. यह करीम साहब का बेटा तो कुछ माह बाद अलग हुआ है लेकिन मेरी एक सहेली तो शादी के कुछ ही हफ्ते बाद मियां को ले कर अलग हो गई थी.

‘‘जब मैं ने उस का यह कारनामा सुना तो मुझे उस पर बेहद गुस्सा आया था. मेरी जब उस से मुलाकात हुई और मैं उस पर बिगड़ी तो जानती हैं वह बड़ी ही अदा से मेरे गले में बांहें डाल कर बोली थी, ‘तुम क्या जानो मेरी जान कि अलग रहने के क्या फायदे हैं. जो जी चाहे खाओपिओ, जब दिल चाहे काम करो जहां मन चाहे घूमोफिरो और घर में कहीं पर भी, किसी भी वक्त शौहर के गले में बेधड़क झूल जाओ. कोई रोकनेटोकने वाला नहीं. ये सब आजादियां भला संयुक्त परिवार में कहां मिल पाती हैं?

‘‘‘और सब से बड़ी बात, सभी को कभी न कभी तो अलग होना ही पड़ता है. महंगाई बढ़ती जा रही है. जमीन के दाम भी आसमान छूते जा रहे हैं. अब हिस्से के बाद किसी को मिलता भी क्या है? बस, एक छोटा सा मुरगी का दरबा. इसलिए आज के दौर में जो जितनी जल्दी अलग हो जाएगा वह उतनी ही अच्छी रिहाइश बना सकता है. समझ में आया मेरी जान?’

‘‘उस की फालतू बकबक सुन कर मेरी खोपड़ी और भी गरम हो गई और मैं उसे झिड़कते हुए बोली, ‘यह सब तुम्हारे दिमाग का फितूर है वरना तो संयुक्त परिवार में रहने में जो मजा है वह अकेले रहने में नहीं है, क्योंकि जीवन की असली खुशी इसी में प्राप्त होती है.’

‘‘बाजी, आप ही बताओ, क्या मैं ने उस से कुछ गलत कहा था?’’

‘‘नहीं भई, तुम ने वही कहा था जिसे दुनिया सच मानती आई है.’’

इतना बोल कर जरीना चुपचाप सोचने लगीं कि इस की सहेली ने जो कुछ कहा है वह तो मैं ने कभी देखा ही नहीं. जो भी यहां मिलता रहा हम खातेपीते रहे. जहां ये घुमानेफिराने ले गए हम बस, वहीं गए और शौहर से प्यार, इस छोटे से घर में हम खुल के कभी प्यार भी नहीं कर सके. भला ये भी कोई जिंदगी है?

जरीना को गुमसुम देख सबीहा को अपनी यह योजना भी सफल होती नजर आने लगी, लेकिन उसे पता नहीं था कि वह अपनी इस दूसरी योजना में कहां तक कामयाब होगी.

रात को जरीना के पति जब दुकान से आए तो वह उन के पैर दबाते हुए बोली, ‘‘अजी जानते हैं, कल रात मैं ने एक अजीब सपना देखा था और सोचा था कि उस के बारे में सुबह आप को बताऊंगी लेकिन बताना याद ही नहीं रहा.

‘‘मैं ने सपने में देखा कि एक बेहद बुजुर्ग फकीर मेरे सिरहाने खडे़ हैं और वह बड़ी भारी आवाज में मुझ से कह रहे हैं कि तू जितनी जल्दी इस घर से निकल जाएगी जिंदगी भर उतनी ही ज्यादा खुशहाल रहेगी. समझ ले ये चंद दिन तेरे लिए बड़ी ही रहमतोबरकत के बन कर आए हैं. इसलिए तू अपने इस नेक काम को बिना देर किए कर डाल. और फिर वह साए की तरह लहराते हुए गायब हो गए.’’

‘‘अच्छा, वह तुम से कहां जाने के लिए कह रहे थे?’’ जरीना के पति ने बडे़ ही भोलेपन से पूछा तो उस ने अपना माथा ठोंक लिया.

‘‘अरे, बुद्धू, आप इतना भी नहीं समझे. वह हमें किराए के मकान में जाने के लिए कह रहे थे और कहां?’’

‘‘ठीक है, मैं कोशिश करता हूं.’’

‘‘कोशिश नहीं, एकदम से लग जाइए और 1-2 दिन के अंदर ही इस काम को कर डालिए.’’

अगले दिन जरीना के मियां अपना कामधाम छोड़ कर मकान की तलाश में निकल गए और शाम होतेहोते उन्हें

2 कमरे का एक अच्छा मकान मिल गया. फिर सुबह होते ही उन का सामान भी जाने लगा.

यह देख जरीना के भाई अनवर व अम्मी की आंखें हैरत से फैल गईं. लेकिन यह देख कर सबीहा की तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस की दूसरी कहानी भी सफल हो गई थी और उस की ये अनोखी तरकीब बेहद कारगर साबित हुई थी, जिस में उस का न तो किसी से कोई लड़ाईझगड़ा हुआ था और न ही उस ने किसी को सीधे मुंह कुछ कहा था.

Hindi Story : बहादुर लड़की मिसाल बनी

Hindi Story : आदिवासियों के जीने का एकमात्र साधन और बेहद खूबसूरत वादियों वाले हरेभरे पहाड़ी जंगलों को स्थानीय और बाहरी नक्सलियों ने छीन कर अपना अड्डा बना लिया था. उन्हें अपने ही गांवघर, जमीन से बेदखल कर दिया था. यहां के जंगलों में अनेक जड़ीबूटियां मिलती हैं. जंगल कीमती पेड़पौधों से भरे हुए हैं.

3 राज्यों से हो कर गुजरने वाला यह पहाड़ी जंगल आगे जा कर एक चौथे राज्य में दाखिल हो जाता था. जंगल के ऊंचेनीचे पठारी रास्तों से वे बेधड़क एक राज्य से दूसरे राज्य में चले जाते थे.

दूसरे राज्यों से भाग कर आए नक्सली चोरीचुपके यहां के पहाड़ी जंगलों में पनाह लेते और अपराध कर के दूसरे राज्यों के जंगल में घुस जाते थे.

कोई उन के खिलाफ मुंह खोलता तो उसे हमेशा के लिए मौत की नींद सुला देते. यहां वे अपनी सरकारें चलाते थे. गांव वाले उन के डर से सांझ होने से पहले ही घरों में दुबक जाते. उन्हें जिस से बदला लेना होता था, उस के घर के बाहर पोस्टर चिपका देते और मुखबिरी का आरोप लगा कर हत्या कर देते थे.

नक्सलियों के डर से गांव वाले अपना घरद्वार, खेतखलिहान छोड़ कर शहरों में रहने वाले अपने रिश्तेदारों के यहां चले गए थे.

डुमरिया एक ऐसा ही गांव था, जो चारों ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ था. पहाड़ी जंगल के कच्चे रास्ते को पार कर के ही यहां आया जा सकता था. यहां एक विशाल मैदान था. कभी यहां फुटबाल टूर्नामैंट भी होता था जो अब नक्सलियों के कब्जे में था. एक उच्च माध्यमिक स्कूल भी था जहां ढेर सारे लड़केलड़कियां पढ़ते थे.

पिछले दिनों नक्सलियों ने अपने दस्ते में नए रंगरूटों को भरती करने के लिए जबरदस्ती स्कूल पर हमला कर दिया और अपने मनपसंद स्कूली बच्चों को उठा ले गए. गांव वाले रोनेपीटने के सिवा कुछ न कर सके.

नक्सली उन बच्चों की आंखों पर पट्टी बांध कर ले गए थे. बच्चे उन्हें छोड़ देने के लिए रोतेचिल्लाते रहे, दया की भीख मांगते रहे, लेकिन उन्हें उन मासूमों पर दया नहीं आई. जंगल में ले जा कर उन्हें अलगअलग दस्तों में गुलामों की तरह बांट दिया गया. सभी लड़केलड़कियां अपनेअपने संगीसाथियों से बिछुड़ गए.

अगवा की गई एक छात्रा सालबनी को संजय पाहन नाम के नक्सली ने अपने पास रख लिया. वह रोरो कर उस दरिंदे से छोड़ देने की गुहार करती रही, लेकिन उस का दिल नहीं पसीजा. पहले तो सालबनी को उस ने बहलाफुसला कर मनाने की कोशिश की, लेकिन सालबनी ने अपने घर जाने की रट लगाए रखी तो उस ने उसे खूब मारा. बाद में सालबनी को एक कोने में बिठाए रखा.

सोने से पहले उन के बीच खुसुरफुसुर हो रही थी. वे लोग अगवा किए गए बच्चों की बात कर रहे थे.

एक नक्सली कह रहा था, ‘‘पुलिस हमारे पीछे पड़ गई है.’’

‘‘तो ठीक है, इस बार हम सारा हिसाबकिताब बराबर कर लेते हैं,’’ दूसरा नक्सली कह रहा था.

‘‘पूरे रास्ते में बारूदी सुरंग बिछा दी जाएंगी. उन के साथ जितने भी जवान होंगे, सभी मारे जाएंगे और अपना बदला भी पूरा हो जाएगा.’’

इस गुप्त योजना पर नक्सलियों की सहमति हो गई.

सालबनी आंखें बंद किए ऐसे बैठी थी जैसे उन की बातों पर उस का ध्यान नहीं है लेकिन वह उन की बातों को गौर से सुन रही थी. फिर बैठेबैठे वह न जाने कब सो गई. सुबह जब उस की नींद खुली तो देखा कि संजय पाहन उस के बगल में सो रहा था. वह हड़बड़ा कर उठ गई.

तब तक संजय पाहन की भी नींद खुल गई. उस ने हंसते हुए सालबनी को अपनी बांहों में जकड़ना चाहा. उस के पीले दांत भद्दे लग रहे थे जिन्हें देख कर सालबनी अंदर तक कांप गई.

सुबह संजय पाहन ने सालबनी से जल्दी खाना बनाने को कहा. खाना खाने के बाद वे लोग तैयार हो कर निकल गए. सालबनी भी उन के साथ थी.

उस दिन जंगल में घुसने वाले मुख्य रास्ते पर बारूदी सुरंग बिछा कर वे लोग अपने अड्डे पर लौट आए.

मौत के सौदागरों का खतरनाक खेल देख कर सालबनी की रूह कांप गई. उस ने मन ही मन ठान लिया कि चाहे जो हो जाए, वह इन्हें छोड़ेगी नहीं. वह मौका तलाशने लगी.

खाना बनाने का काम सालबनी का था. रात के समय वह खाना बनाने के साथ ही साथ भागने का जुगाड़ भी बिठा रही थी. खाना खा कर जब सभी सोने की तैयारी करने लगे तो उन के सामने सवाल खड़ा हो गया कि आज रात सालबनी किस के साथ सोएगी. संजय पाहन ने सब से पहले सालबनी का हाथ पकड़ लिया.

‘‘इस लड़की को मैं लाया हूं, इसे मैं ही अपने साथ रखूंगा.’’

‘‘क्या यह तुम्हारी जोरू है, जो रोज रात को तुम्हारे साथ ही सोएगी? आज की रात यह मेरे साथ रहेगी,’’ दूसरा बोला और इतना कह कर वह सालबनी का हाथ पकड़ कर अपने साथ ले जाने लगा.

संजय पाहन ने फुरती से सालबनी का हाथ उस से छुड़ा लिया. इस के बाद सभी नक्सली सालबनी को अपने साथ सुलाने को ले कर आपस में ही एकदूसरे पर पिल पड़े, वे मरनेमारने पर उतारू हो गए.

इसी बीच मौका देख कर सालबनी अंधेरे का फायदा उठा कर भाग निकली.

वह पूरी रात तेज रफ्तार से भागती रही. भौर का उजाला फैलने लगा था. दम साधने के लिए वह एक ऊंचे

टीले की ओट में छिप कर खड़ी हो गई और आसपास के हालात का जायजा लेने लगी.

सालबनी को जल्दी ही यह महसूस हो गया कि वह जहां खड़ी है, उस का गांव अब वहां से महज 2-3 किलोमीटर की दूरी पर रह गया है. मारे खुशी के उस की आंखों में आंसू आ गए.

सालबनी डर भी रही थी कि अगर गांव में गई तो कोई फिर से उस की मुखबिरी कर के पकड़वा देगा. वह समझदार और तेजतर्रार थी. पूछतेपाछते सीधे सुंदरपुर थाने पहुंच गई.

जैसे ही सालबनी थाने पहुंची, रातभर भागते रहने के चलते थक कर चूर हो गई और बेहोश हो कर गिर पड़ी.

सुंदरपुर थाने के प्रभारी बहुत ही नेक पुलिस अफसर थे. यहां के नक्सलियों का जायजा लेने के लिए कुछ दिन पहले ही वे यहां ट्रांसफर हुए थे. उन्होंने उस अनजान लड़की को थाने में घुसते देख लिया था. पानी मंगा कर मुंह पर छींटे मारे. वे उसे होश में लाने की कोशिश करने लगे.

सालबनी को जैसे ही होश आया, पहले पानी पिलाया. वह थोड़ा ठीक हुई, फिर एक ही सांस में सारी बात बता दी.

थाना प्रभारी यह सुन कर सकते में आ गए. उन्हें इस बात की गुप्त जानकारी अपने बड़े अफसरों से मिली थी कि डुमरिया स्कूल के अगवा किए गए छात्रछात्राओं का पता लगाने के लिए गांव से सटे पहाड़ी जंगलों में आज रात 10 बजे से पुलिस आपरेशन होने वाला है. लेकिन पुलिस को मारने के लिए नक्सलियों ने बारूदी सुरंग बिछाई है, यह जानकारी नहीं थी.

उन्होंने सालबनी से थोड़ा सख्त लहजे में पूछा, ‘‘सचसच बताओ लड़की, तुम कोई साजिश तो नहीं

कर रही, नहीं तो मैं तुम्हें जेल में बंद

कर दूंगा?’’

‘‘आप मेरे साथ चलिए, उन लोगों

ने कहांकहां पर क्याक्या किया है, वह सब मैं आप को दिखा दूंगी,’’ सालबनी ने कहा.

थाना प्रभारी ने तुरंत ही अपने से बड़े अफसरों को फोन लगाया. मामला गंभीर था. देखते ही देखते पूरी फौज सुंदरपुर थाने में जमा हो गई. बारूदी सुरंग नाकाम करने वाले लोग भी आ गए थे.

सालबनी ने वह जगह दिखा दी, जहां बारूदी सुरंग बिछाई गई थी. सब से पहले उसे डिफ्यूज किया गया.

सालबनी ने नक्सलियों का गुप्त ठिकाना भी दिखा दिया. वहां पर पुलिस ने रेड डाली, पर इस से पहले ही नक्सली वहां से फरार हो गए थे. वहां से अगवा किए गए छात्रछात्राएं तो नहीं मिले, मगर उन के असलहे, तार, हथियार और नक्सली साहित्य की किताबें जरूर बरामद हुईं.

इस तरह सालबनी की बहादुरी और समझदारी से एक बहुत बड़ा हादसा होतेहोते टल गया.

Hindi Story : फैसला – सुगंधा ने फैमिली के लिए अपने प्यार की दी कुर्बानी

Hindi Story : सुगंधा लौन में इधरउधर देख अपने  लिए एक कोना तलाश रही थी कि सामने खंभे के पास खड़े व्यक्ति के चेहरे की झलक ने उसे चौंका दिया. अपना शक दूर करने के लिए वह थोड़ा और करीब आ गई. वह मयंक ही था जो विवाह के अवसर पर सामने लगे सजावटी बल्बों को निहारते हुए जाने किस दुनिया में खोया हुआ था. उसे देख सुगंधा को लगा सारी दुनिया थम सी गई है. पहलू में धड़कते दिल को संभालना उस के लिए मुश्किल हो रहा था. पूरे 15 वर्षों के बाद वह मयंक को देख पा रही थी.

समय के इस लंबे अंतराल ने मयंक  में कहीं कुछ नहीं बदला था. वही छरहरा बदन और मुसकराता हुआ चेहरा. समय सिर्फ उस के बालों को छू कर निकल गया था. बालों पर जहांतहां सफेदी झलक रही थी.

मुड़ते ही मयंक की नजर सुगंधा पर पड़ी और उसे इस तरह अपने सामने पा कर वह भी स्तब्ध रह गया. उस के चेहरे पर आताजाता रंग बता रहा था कि उसे भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था.

‘‘सुगंधा, तुम यहां कैसे? कब आईं दिल्ली? क्या तुम्हारे पति का तबादला यहां हो गया है?’’

एक ही सांस में मयंक ने कई प्रश्न पूछ लिए थे. उस की आवाज में आश्चर्य और उत्सुकता साफ झलक रही थी पर आवाज की मिठास पहले की तरह ही कायम थी.

सुगंधा ने तबतक अपनेआप को काफी हद तक संभाल लिया था फिर भी आवाज की लड़खड़ाहट शब्दों में झलक ही आई थी.

‘‘नहीं, तबादला नहीं हुआ है, यह सौरभ के मामाजी का घर है और हम इस शादी में आमंत्रित हैं,’’ सुगंधा बोली.

‘‘अच्छा, कैसी हो?’’

‘‘ठीक हूं, अपनी कहो. तुम ने शादी कर ली या…’’ सुगंधा न चाहते हुए भी अपनी उत्सुकता रोक नहीं पाई थी.

‘‘किसी ने खुद को बेगाना बना इंतजार करने का अवसर ही नहीं दिया तो शादी करनी ही पड़ी. मांपापा का इकलौता, आशाओं का केंद्र जो था.’’

दोनों में अभी इतनी ही बात हो पाई थी कि एक खूबसूरत सी आधुनिका वहां आ धमकी थी.

‘‘इतनी देर से कहां गायब थे? जल्दी चलो, सब लोग तुम्हारा कब से इंतजार कर रहे हैं,’’ इतना कह कर वह लगभग मयंक को खींचते हुए वहां से ले जाने लगी.

‘‘रुको यार, क्या कर रही हो?’’ मयंक अपनेआप को उस से छुड़ाते हुए बोला था.

‘‘यह मेरी सहपाठी सुगंधा है. अचानक आज हम वर्षों बाद मिले हैं. कालिज के दिनों में हम दोनों के बीच अच्छी निभती थी.’’

फिर मयंक सुगंधा से बोला, ‘‘यह मेरी पत्नी सुकन्या है.’’

सुकन्या शायद जल्दी में थी इसीलिए बिना किसी भाव के उस ने यंत्रवत अपने दोनों हाथ जोड़ दिए. सुगंधा के हाथ भी स्वत: जुड़ गए थे जैसे. हवा के झोंके की तरह आई सुकन्या तेजी से मयंक को ले कर वहां से चली गई और अकेली खड़ी सुगंधा उसे देखती ही रह गई, ठीक वैसे ही जैसे आज से 15 वर्ष पहले मयंक उस से दूर हो गया था और वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकी थी. बस, चुपचाप टुकड़ेटुकडे़ होते तकदीर के खेल को देखती रही थी.

जिंदगी भी जाने कैसेकैसे रंग दिखाती है, जिस अतीत को अपनी जिंदगी की राहों पर हमेशाहमेशा के लिए वह पीछे छोड़ आई थी, आज मृगतृष्णा बन स्वयं उस के सामने आ खड़ा हुआ था.

आज मयंक के मुंह से अपने लिए ‘यह मेरी सहपाठी’ सुन सुगंधा के कलेजे में टीस सी उठी थी. सिर्फ सहपाठी और कुछ नहीं. एक समय था जब सबकुछ उस की मुठ्ठी में था जिसे उस ने रेत की तरह मुट्ठी से जानबूझ कर फिसल जाने दिया था.

उस ने ही मयंक से शादी न करने का फैसला किया था. यद्यपि मयंक ने उस पर फैसला बदलने के लिए भरपूर दबाव डाला था पर सुगंधा टस से मस नहीं हुई थी.

सच पूछो तो वह फैसला भी उस का कहां था, वह तो भैया और पापा का फैसला था जिसे उस ने अपना दायित्व समझ कर सिर्फ निबाहा था. तब उस ने अपने सुखों से ज्यादा पापा और भैया के सुखों को अहमियत दी थी, अपने परिवार के सुखों की रक्षा और समाज से जोड़े रखने की कीमत दी थी.

फिर सुगंधा के सामने अपनी 2 छोटी बहनों के भविष्य का सवाल भी था जो उस के दूसरी जाति में विवाह करने के साथ ही तहसनहस हो सकता था. दुनिया ने चाहे जितनी तरक्की कर ली हो पर जातियों में बंटा हमारा समाज आज भी 18वीं शताब्दी में ही जी रहा है. वैसे भी घरबार त्याग कर, परिवार के सभी सदस्यों को दुखी कर वह मयंक के साथ कभी भी सुखी वैवाहिक जीवन नहीं व्यतीत कर सकती थी.

जिंदगी हमेशा मनमुताबिक नहीं मिलती. सब को कहीं न कहीं समझौता तो करना ही पड़ता है. सौरभ के साथ शादी कर के जो समझौता उस ने अपनेआप से किया था वह उसे बहुत भारी पड़ा था. उस के और सौरभ के विचार कहीं नहीं मिलते थे. सौरभ उन दंभी पतियों में से था जिस के दिमाग में हमेशा यही रहता कि जो वह करता है, कहता है, सोचता है सब सही है, गलत तो हमेशा उस की पत्नी होती है.

सौरभ के दोहरे व्यक्तित्व से अकसर वह अचंभित रह जाती थी. जो व्यक्ति बाहर इतना हंसमुख, मिलनसार और सहयोगी दिखता था वही घर पहुंचतेपहुंचते कैसे दंभी, गुस्सैल और झगड़ालू व्यक्ति में बदल जाता था, बातबात में उसे नीचा दिखा अपमानित कर सुखी होता था, पर अपना वजूद खो कर भी सुगंधा ने अपनी सहनशीलता और समझौते से इस रिश्ते को अब तक बिखरने नहीं दिया था.

सौरभ के उद्दंड स्वभाव से कभीकभी पापा और भैया भी सहम जाते थे. सुगंधा के दुखों का एहसास कर अकसर उन के चेहरे पर पछतावे की परछाईं साफ दिखती थी जिस में मयंक जैसे सुशील लड़के को खो देने का गम भी शामिल होता था. न जाने क्यों उन क्षणों में सुगंधा को एक अजीब सी आत्मसंतुष्टि मिलती थी. चलो, पापा और भैया को अपनी गलती का एहसास तो हुआ.

सुगंधा और मयंक के घरों के बीच बस, एक सड़क का ही तो फासला था. यह अलग बात है कि उस का घर कोठीनुमा था और मयंक अपने परिवार के साथ 2 कमरों के फ्लैट में रहता था. उस के पिता सिंचाई विभाग में ऊंचे ओहदे पर थे जबकि मयंक के पिता एक सरकारी आफिस में मामूली क्लर्क थे पर मयंक की गिनती कालिज के मेधावी छात्रों में होती थी और सभी का विश्वास था कि एक दिन जरूर वह अपने मांबाप का ही नहीं अपने कालिज का भी नाम रोशन करेगा.

दिनप्रतिदिन की मुलाकातों और पढ़ाई की कठिनाइयों को हल करतेकरते जाने कब दोनों की दोस्ती के बीच प्यार का नन्हा सा अंकुर फूट पड़ा जो समय के साथ बढ़तेबढ़ते परिणयसूत्र में बंधने की आकांक्षा तक बढ़ गया. इस का थोड़ाबहुत आभास घर के लोगों को भी होने लगा था. भैया ने उस की शादी के लिए लड़का देखना शुरू कर दिया था, पर इन सब बातों से अनजान दोनों के प्यार की पेंगें मुक्त आकाश को छूने लगी थीं.

मयंक अपनी पढ़ाई में भी जोरशोर से जुटा हुआ था. उसे पूरा विश्वास था कि अगर वह एक अच्छी नौकरी पाने में सफल हो गया तो सुगंधा के मातापिता उन की शादी से कभी इनकार नहीं करेंगे पर नियति को कुछ और ही मंजूर था.

अचानक एक दिन सुगंधा के भैया उस की शादी सौरभ से लगभग पक्की कर आए. घर में लड़की दिखाने की तैयारियां जोरशोर से शुरू हो गई थीं. इस अप्रत्याशित फैसले के लिए सुगंधा कतई तैयार नहीं थी. सुनते ही सुगंधा पर मानो बिजली गिर पड़ी. वह अच्छी तरह जानती थी कि मयंक और उस की शादी का घर में काफी विरोध होगा, फिर भी वह उसे आसानी से गंवा नहीं सकती थी.

भाभी को सबकुछ बता कर सुगंधा ने अंतिम कोशिश की थी. भाभी भी सब सुन सकते में आ गई थीं. वह उसे इस तरह की शादियों से होने वाली परेशानियों को समझाती रही थीं, पर सुगंधा का अत्यंत उदास चेहरा देख मौका पा भाभी ने भैया से बात की थी.

भैया के कान में बात पड़ते ही जैसे भूचाल आ गया. गुस्से से उबलते हुए भैया ने थोड़ी ही देर में भाभी और ननद के रिश्ते को ले कर न जाने कितनी बातों के पिन भाभी को चुभाए थे. दरवाजे की ओट में खड़ी सुगंधा भाभी की बेइज्जती से आहत और पछताती अपने कमरे में आ गई थी. उस का एकमात्र आसरा भाभी ही थीं, वह भी टूट गया था.

भैया बैठे उसे घंटों समझाते रहे थे, पर सुगंधा के बोल नहीं फूटे थे. भैया के विनीत भाव, कमरे के दरवाजे पर खड़ी अम्मां के चेहरे की बेचैनी और बहनों के अंधकारमय होते भविष्य ने उसे अपना फैसला बदलने के लिए मजबूर कर दिया था. सारे अपनों को दुखी कर वह कैसे सुखी रह सकती थी.

जब उस ने अपना यह फैसला मयंक को सुनाया था तो वह भी कम आहत नहीं हुआ था.

पटना छोड़तेछोड़ते सुगंधा के परिवार के लोग सिर्फ इतना ही जान पाए थे कि मयंक सिविल सर्विसेज में चुन लिया गया था और टे्रनिंग के लिए गया हुआ था. 15 वर्षों बाद यों मुलाकात हो जाएगी उस ने कभी सोचा भी नहीं था.

अगले दिन दोपहर में वह कपड़े बदल कर लेटने जा ही रही थी कि दरवाजे की घंटी बज उठी. दरवाजा खोलते ही अप्रत्याशित रूप से मयंक को सामने पा सुगंधा बुरी तरह से चौंक गई थी.

‘‘अब अंदर भी आने दोगी या इसी तरह खड़ा रहूं,’’ मयंक ने कहा.

बिना कुछ बोले सुगंधा ने मयंक को रास्ता दे दिया. ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठते ही बिना किसी भूमिका के मयंक ने सीधेसीधे बात शुरू कर दी थी.

‘‘तुम ने मेरी जिंदगी के साथ इतना बड़ा मजाक क्यों किया?’’

अचानक मयंक के इस सवाल और उस की आंखों के कोर पर चमकते हुए आंसुओं ने सुगंधा को बेहद व्याकुल बना दिया था. उस ने कल्पना भी नहीं की थी कि मयंक यों सीधेसीधे बात करेगा.

अपने को संयत करने का प्रयास करते हुए सुगंधा बोली, ‘‘क्या बचपना है, मयंक? अब हम बच्चे नहीं रहे. हम दोनों की एक बसीबसाई गृहस्थी और जिम्मेदारियां हैं जिस से हम भाग नहीं सकते.’’

‘‘सिद्धांत की बातें छोड़ो सुगंधा, मैं क्या करूं यह बताओ? मेरे लिए तुम्हें भुला देना आज भी आसान नहीं है.’’

अब सुगंधा के शब्द भी उस के भर्राए गले और भर आईं आंखों में खो गए थे. थोड़ी देर की चुप्पी को सुगंधा ने ही तोड़ा.

‘‘मैं जानती हूं, मयंक मेरे फैसले ने तुम्हें बहुत आहत किया है. इस फैसले ने मुझे भी कम आहत नहीं किया था. मेरे लिए तुम्हारे बिना जीना और भी कठिन था फिर भी मेरी अंतरात्मा ने मुझे स्वार्थ की डोर पकड़ने से रोक दिया था. उस समय अपने कर्तव्य से पलायन और अपनों को आहत करने का साहस मैं जुटा नहीं पाई थी.

‘‘ऐसा भी नहीं था कि मैं ने प्रयास नहीं किए. जब अत्यधिक प्रयास के बाद भी मुझे मेरे अपनों की मंजूरी नहीं मिली और मेरे अंदर उन्हें आहत करने का साहस चुक गया, मेरी कितनी रातें बेचैनी और छटपटाहट में गुजरीं. मेरे पास दो ही रास्ते थे, विद्रोह या अपनी इच्छाओं की कुरबानी. जी तो चाहता था समाज की पुरानी जीर्णशीर्ण मान्यताओं को रौंद, जीवन भर दूसरों के लिए जीने के बजाय खुद के लिए जीऊं. लेकिन सारी जद्दोजेहद के बाद मेरे अंतस ने मुझे कुरबानी के रास्ते पर ही ढकेला था.

‘‘मुझे लगा, प्यार के बंधन के अलावा दुनिया में और भी बंधन होते हैं जिन से इनकार नहीं किया जा सकता. जिन अपनों के स्नेह की छांव में हम पलते हैं, जिन के संग खेल कर, लड़ कर हम बड़े होते हैं, ये सभी रिश्ते भी तो प्यार के बंधन होते हैं. उन के सुखदुख भी तो हमारे सुखदुख होते हैं इसलिए मेरे कारण सभी के जीवन में घुलते जहर को खुद ही पी लेना मुझे कल्याणकारी लगा था.’’

एक गहरी सांस ले सुगंधा ने फिर अपनी बात कहनी शुरू की, ‘‘पर मन के बंधन क्या इतनी आसानी से टूट जाते हैं? मेरी समझ से शारीरिक आकर्षण से परे प्यार एक एहसास है जो हमेशा मन के कोने में सुरक्षित रहता है, जो सहजता से जीवन का फैसला लेने और निभाने का साहस देता है. आज मेरे जीवन में भी मेरा प्यार ही जीवन जीने की शक्ति है. अपने अंदर की उसी शक्ति के बलबूते मैं ने जीवन में आई कठिन परिस्थितियों को झेला है.

‘‘आज तुम्हें देख कर न मेरे दिल के तार झनझनाए न ही मन में कोई घंटी बजी, फिर भी यह सोच कर मेरी आंखें भर आईं कि आज भी तुम से ज्यादा अंतरंग मित्र और मुझे समझने वाला कोई नहीं है. यह विश्वास शायद उसी अछूते प्यार का एहसास है.

‘‘आज का सत्य यही है कि ढेर सारी कमियों के बावजूद मैं अपने पति और बच्चों से बेहद प्यार करती हूं. इतने दिनों के वैवाहिक जीवन में चाहे जितनी भी कमियां रही हों फिर भी एक अटूट विश्वास का रिश्ता जरूर हम दोनों के बीच कायम हो गया है जिसे तोड़ने का साहस हम में से कोई नहीं कर सकता.’’

वर्षों पहले अपने द्वारा लिए गए फैसले की अबूझ पहेली के सूत्र मयंक के हाथों में थमा कर सुगंधा यकायक चुप हो गई. थोड़ी देर तक उन दोनों के बीच एक सन्नाटा व्याप्त रहा. अब तक निढाल से बैठे मयंक का दुखी और मुरझाया चेहरा काफी कुछ सहज हो चला था. थोड़ी देर पहले आंखों में छाया दर्द पिघलने लगा था.

‘‘शायद तुम ठीक ही कह रही हो  सुगंधा. आज तक मैं भी एक मृगतृष्णा के पीछे ही तो भाग रहा था. जिस सचाई को जानते हुए भी मानने को तैयार नहीं था, संयोग से आज मिलते ही तुम ने उस का दूसरा पहलू दिखा कर मेरी सारी उलझन ही दूर कर दी. आज मुझे तुम्हारी दोस्ती पर गर्व हो रहा है. क्या मैं आशा रखूं कि आगे भी हम अच्छे दोस्त बने रहेंगे,’’ कुछ देर पहले मयंक की आवाज में जो दर्द भरा था वह अब गायब हो चुका था.

‘‘क्यों नहीं? आज और इसी वक्त से हम अपनी टूटी हुई दोस्ती की नई शुरुआत करेंगे.’’

शाम को खाने पर सौरभ से सुगंधा ने गर्व के साथ मयंक को मिलवाया, ‘‘इन से मिलो, यह मेरे सहपाठी और यहां के कमिश्नर मयंक अग्रवाल हैं.’’

‘‘हमारी दोस्ती बचपन के दिनों की तरह मजबूत है, चाहे हम 15 साल बाद मिल रहे हों,’’ मयंक ने सौरभ को गले लगाते हुए कहा, ‘‘हां, आज मुझे एक नया दोस्त मिल रहा है, सौरभ?’’

लेखिका- रीता कुमारी

Hindi Story : देवी

Hindi Story : मंदार का जिक्र सपना के मन में ही नहीं बल्कि घर में भी एक नई चेतना भर देता. आखिर क्यों न हो, इतना सुशील, पढ़ालिखा और सुंदर दामाद, उस से भी ज्यादा सभ्य और समझदार उस के पिताजी आज के इस दहेज लोलुप समाज में कहां मिलते हैं. तभी तो उस के पिताजी कहते हैं, ‘‘आज लोग भले ही रहनसहन और पहनावे से आधुनिक हो गए हों पर शादी की बात चलते ही एकदम पुरातनपंथी हो जाते हैं. कुंडलियां देखेंगे, गोत्र मिलाएंगे और नाड़ी भी मिलाएंगे. लड़की पढ़ी- लिखी भी हो, नौकरी करती हो, साथ ही घर के काम में भी कुशल हो. लेकिन मंदार के पिता इस भीड़ से बिलकुल अलग हैं.मंदार के खयालों में खोई सपना को एक साल पहले की घटना याद आ गई जब वह पहली बार मंदार से मिली थी. पिछले साल जब आई.आई.टी. दिल्ली से कंप्यूटर साइंस में बी. टेक. करने के बाद वह अमेरिका जाने की तैयारी कर रही थी तब पड़ोस के खन्ना अंकल ने उस से अपनी साफ्टवेयर कंपनी ज्वाइन करने को कहा था. पहले तो सपना का इरादा नहीं था पर बाद में उस ने सोचा कि जब तक वीजा आदि की औपचारिकता पूरी नहीं हो जाती तब तक थोड़ा अनुभव लेने में हर्ज क्या है. पहले ही दिन खन्ना अंकल की कंपनी में मंदार को देखने के बाद जो सपना के दिल में हुआ था, वह पहली नजर का प्यार नहीं तो और क्या था?

मंदार आई.आई.टी. मुंबई से बी.टेक. कर के यहां दिल्ली में अपने पिताजी के साथ रहता था. जब सपना ने मंदार से अपने अमेरिका के प्लान के बारे में पूछा तो बिना नजर उठाए उस ने कहा था कि यहां पिताजी अकेले रह जाएंगे.

बस, एक सीधा सा जवाब. शायद उस की नजरों में इस सवाल की कोई खास अहमियत नहीं थी. इसीलिए तो उस ने नजरें उठा कर सपना की ओर देखा भी नहीं था.

हमेशा चुपचुप रहने वाले मंदार की आंखों में एक अजीब सा आकर्षण था, जिसे देखे बिना न तो समझ पाना आसान था और न ही शब्दों में बता पाना संभव था. कई बार तो बिना बोले भी अपनी आंखों से वह सारी बातें कह जाता था जिस का अर्थ ढू़ंढ़ने में सपना रातरात भर जागती रहती थी.

वह कब मंदार के करीब आ गई उसे पता भी नहीं चल पाया. हर वह प्रोजेक्ट जिस पर मंदार काम करता था उस में खन्ना अंकल से कह कर वह भी शामिल हो जाती थी. इस तरह वह जितना मंदार के करीब होने की कोशिश करती वह सपना से उतना ही दूरी बना के रहता.

सपना के दिल में पल रही इन हसरतों को उस की सहेली रागिनी जानती थी. पर उस का कहना था कि अगर मंदार पहल नहीं करता तो सपना तो पहल कर ही सकती है. अरे, भाई, बराबरी का जमाना है. पर सपना कुछ भी कह कर अपने पहले प्यार को असफल होता देखने से डरती थी.

रागिनी का मकान मंदार के घर से कुछ आगे की ओर था अत: आफिस से घर जाते समय वह मंदार को लिफ्ट दे दिया करती थी. कई बार रागिनी जानबूझ कर कह देती कि आज उसे मार्केट में कुछ काम है अत: सपना तुम मंदार को उस के घर तक लिफ्ट दे देना. ऐसे किसी मौके पर सपना देखती कि पूरे रास्ते मंदार अपनी फाइलों में ही सिर झुकाए रहता. अगर सपना कुछ पूछ बैठती तो बस, हां हूं कर के चुप हो जाता.

दूसरे दिन जब रागिनी छेड़ते हुए सपना से पूछती, ‘‘कल अपने मंदनाथ को डेटिंग पर कहां ले गई थी,’’ तो वह न चाहते हुए भी मुसकरा देती. फिर रागिनी हमेशा की तरह कहती, ‘‘बालिके, ऐसे में तो तेरा बैंड बजने से रहा.’’

एक दिन मंदार के घर के बाहर उस के पिता शर्माजी खड़े थे. सपना की कार देखते ही वह उस की तरफ आए. उन्हें अपनी ओर आते देख सपना कार के बाहर आ गई. बडे़ प्यार से उन्होंने सपना से कहा, ‘‘बेटी, अगर जल्दी न हो तो  अंदर आओ, हम साथ बैठ कर ठंडा पी लेते हैं.’’ उन के आग्रह को सपना मना न कर सकी.

घर काफी सादगी से सजाया हुआ था. सपना को पिताजी के पास बैठा छोड़  मंदार अपने कमरे में चला गया. उस के इस व्यवहार पर शर्माजी नाराज हुए और सपना से कहने लगे कि बेटी, यह तुम्हें बहुत चाहता है पर थोड़ा शर्मीला है. फिर डरता भी है कि हमारे अतीत के बारे में जान कर अगर तुम ने उसे ठुकरा दिया तो दोबारा वह यह सबकुछ झेल नहीं पाएगा.

सपना के लिए तो यह सबकुछ किसी मनपसंद फिल्म के फास्ट फारवर्ड होने जैसा था. उस का मन मंदार का अपने प्रति लगाव की अनपेक्षित खुशी के साथ ही उस के रहस्यमय डर के बीच झूलने लगा. और यह सब बातें शर्माजी के मुंह से बिना किसी प्रस्तावना के सुन कर उसे कुछ अजीब सा लगा.

शर्माजी ने धीरेधीरे उसे अपने बारे में सबकुछ सचसच बता दिया कि मंदार के जन्म के बाद से ही उस की मां नीला का ध्यान घर में कम और भजनपूजन में ज्यादा लगने लगा था. मंदार तो अपनी दादी की गोद में ही रहता था और नीला साधुसंन्यासियों के चक्कर में इस मंदिर से उस मंदिर तक घूमती रहती थी. कईकई बार मैं ने हंसीहंसी में पत्नी से कहा भी कि मंदिर को छोड़ कर जरा अपने मंदार पर ध्यान दे दो तो हम सब का कल्याण हो जाएगा. कुछ दिनों बाद नीला का भगवान प्रेम इतना बढ़ा कि साधु और बाबा घर में भी आने लगे थे.

उन्हीं दिनोंएक बाबा का मेरे घर में काफी आनाजाना हो गया था. जब मंदार 7 साल का था तो एक दिन नीला अपना बसा- बसाया घर छोड़ कर बाबा के साथ सन्ंयासिन बन कर न जाने कहां चली गई. बदनामी से बचने के लिए मैं

ने अपना तबादला दिल्ली करवा लिया और अम्मां व मंदार को ले कर यहां आ गया.

इस घटना का मंदार के बालमन पर काफी गहरा असर हुआ. वह अपनेआप में सिमट गया, न तो कोई दोस्त और न ही किसी तरह के शौक, बस, अपनी पढ़ाई में ही डूबा रहता. जिस साल मंदार का आई.आईर्.टी. मुंबई में दाखिला हुआ उस की दादी की मृत्यु हो गई. बस, तब से मंदार के सूने जीवन में और कोई औरत नहीं आई.

इस खालीपन में बापबेटे के बीच का रिश्ता बहुत हद तक दोस्तों जैसा हो गया. मंदार अपने दिल की कोई बात मुझ से छिपाता नहीं था. इसीलिए जब उस ने तुम्हारे लिए अपने दिल में पैदा हुए लगाव को मुझ से बताया तो मैं ने सीधे तुम से ही बात करना ठीक समझा.

बेटी, मैं अकसर देखता हूं कि तुम अपनी कार से मंदार को छोड़ने आती हो तो वह जब तक घर के अंदर नहीं आ जाता तुम उसी को देखती रहती हो. तुम्हारी आंखों की चाहत की भाषा को मैं ने पढ़ लिया था इसीलिए तुम से ही सारी बात करना ठीक समझा.

यह सुन सपना जोर से हंसने लगी.

जाते समय शर्माजी ने कहा, ‘‘बेटी, तुम अपने मातापिता को मेरे बारे में सबकुछ बता कर उन की राय पूछ लेना. अगर उन्हें कोई एतराज न हो तो मैं उन से बात करने आऊंगा.’’

घर आने पर सपना ने मां और पिताजी को शर्माजी के परिवार टूटने की कहानी बताई तो उन्हें मंदार में कोई बुराई नजर नहीं आई. दूसरे ही दिन वे दोनों शर्माजी के घर जा कर सपना और मंदार की शादी तय कर आए.

शादी का दिन नजदीक आ रहा था इसलिए गांव से दादादादी भी आ गए. दादी नाराज थीं कि एक तो इस मामले में उन की कोई राय नहीं ली गई, दूसरे लड़कालड़की की कुंडलियां भी नहीं मिलवाई गईं. अत: दादी ने जब पापा से कहा कि वह सपना को अपने गुरु महाराज के पास ले जाना चाहती हैं तो इच्छा होते हुए भी पापा मना नहीं कर पाए.

दादी के साथ सपना गुरु महाराज के आश्रम में पहुंची तो वहां का वातावरण उसे कुछ अजीब सा लगा. एक अजीब सी महक के बीच साधु इधरउधर आराम कर रहे थे. दादी से पहले मोटी दक्षिणा रखवाने के बाद रात 8 बजे मिलने का समय दिया गया. वहां की व्यवस्था देख कर सपना को हिंदी फिल्मों के खलनायक का अड्डा याद आया.

दादी बड़ी खुश थीं कि आज इतनी जल्दी गुरुमहाराज ने दर्शन का समय दे दिया. वह सपना के भाग्य को सराहने लगीं. रात को ठीक 8 बजे दादी और सपना को गुरु महाराज के शयनकक्ष में भेजा गया.

एक बडे़ से कमरे में गुरु महाराज रेशमी वस्त्र पहने मोटे आरामदायक गद्दे पर लेटे हुए थे. उन से कुछ ही दूरी पर एक प्रौढ़ा बैठी माला जप रही थी. कमरे में चंदन की खुशबू फैली हुई थी. जाने क्यों सपना वहां असहज महसूस कर रही थी. तभी दादी ने उस से कहा, ‘‘बेटी, गुरुमहाराज और गुरुमाई के चरण स्पर्श करो.’’

गुरुमहाराज के बाद सपना गुरुमाई के पास पहुंची तो उन का चेहरा कुछ जानापहचाना सा लगा.

सपना पर गुरुमहाराज की नजरें टिकी देख कर दादी ने कहा, ‘‘गुरु महाराज, इस के पिता ने इस का विवाह इस के साथ काम करने वाले मंदार शर्मा से करना तय किया है. मैं दोनों की कुंडलियां आप को दिखाने आई हूं. अब आप का आशीर्वाद मिल जाए तो मैं निश्ंिचत हो जाऊं.’’

सपना को दादी का इस तरह गुरु महाराज को अपनी शादी का निर्णय करने का अधिकार देना अच्छा नहीं लगा मगर वह कुछ बोली नहीं. उधर उस के चेहरे पर अपनी नजरें टिकाए हुए गुरु महाराज ने दादी से कहा, ‘‘बेटी, मुझे कुंडली पढ़ने की क्या जरूरत है. मैं तो इस का चेहरा देख कर ही बता सकता हूं कि कन्या तो साक्षात ‘देवी मां’ का अवतार है. इस का एक सामान्य इनसान की तरह सांसारिक बातों में पड़ना एक बड़ी भूल होगी. इस संसार में ऐसा कोई मानव नहीं है जो ‘देवी मां’ से विवाह कर सके. इसे तो आश्रम की अधिष्ठात्री बनना है. तुम कल सुबह अपने बेटेबहू के साथ यहां आ जाना. मैं एक यज्ञ का अनुष्ठान कर के कन्या को विधिवत देवी के रूप में स्थापित करूंगा.’’

अब सपना में गुरुमहाराज की बकवास सुनने की ताकत नहीं रही. वह बिजली की गति से वहां से उठी और तेज आवाज में दादी से बोली, ‘‘दादी, मैं यह तमाशा देखने नहीं आई थी. मैं जा रही हूं. आप का काम हो जाए तो घर पर आ जाना.’’

घर आ कर उस ने मां और पापा से पूरी रामकहानी बता दी तो पापा ने कहा, ‘‘बेटी, तुम डरो मत. मेरे रहते हुए अम्मां इस तरह की बेवकूफी नहीं कर पाएंगी.’’

रात भर दादी आश्रम में ही रहीं.

सारी रात सपना काफी परेशान रही. उस ने सुबह होते ही मंदार को फोन कर सारा किस्सा बता दिया. थोड़ी ही देर में शर्माजी और मंदार उस के घर आ गए. शर्माजी ने पापा और मां को समझाते हुए कहा, ‘‘आज विज्ञान के इस युग में हमें ऐसी पुरानी सड़ीगली मान्यताओं और उन्हें फैलाने वाले ढोंगी बाबाओं से बचना चाहिए.’’

शर्माजी की बातों से घर का वातावरण फिर से खुशनुमा हो गया. मां चाय बना कर ले आईं तो सब चाय पीने लगे. तभी पापा ने शर्माजी से कहा कि आप थोड़ी देर और रुकें तो मैं अम्मां को आश्रम से ले कर आता हूं.

शर्माजी ने हंसते हुए कहा, ‘‘चलिए, मैं भी तो वह जगह देख आऊं, जहां मेरे घर की लक्ष्मी देवी बन कर विराजने वाली थी.’’

सपना और मंदार बातों में ऐसे खो गए कि गुजरते समय का पता ही नहीं चला. टेलीफोन की घंटी कब बजी और मां ने कब रिसीवर उठाया इस का भी उन्हें पता नहीं चला. पर जब मां के मुंह से खून, गुरुमहाराज, जैसे शब्द सुने तो दोनों भागते हुए मां के पास आए.

मां के हाथ से रिसीवर ले कर सपना ने पापा से बात की तो पापा ने बताया कि आज सुबह जब लोग गुरुमहाराज के दर्शन के लिए उन के कमरे में गए तो देखा कि महाराज की लाश के पास गुरुमाई हाथ में देवी का त्रिशूल ले कर बैठी हैं और पुलिस के पूछने पर गुरुमाई ने सिर्फ यही कहा कि इस का वध मैं ने किया है.

मामला काफी संवेदनशील था. गुरु महाराज के भक्तों में काफी राजनेता, अभिनेता, बडे़बडे़ उद्योगपति और विदेशी भी थे इसलिए पुलिस कोई चूक नहीं करना चाहती थी.

चूंकि पुलिस को घटनास्थल से सपना और मंदार की कुंडलियां और फोटो मिले थे इसलिए उन्हें अंदर ले जाया गया. उन दोनों ने देखा कि गुरुमाई सिर झुका कर बैठी थीं और उन के चरणों में पुलिस महानिरीक्षक बैठे हुए पूछ रहे थे, ‘‘मां, तुम ने यह क्या कर डाला?’’

आहट सुन कर गुरुमाई ने जैसे ही सिर उठाया शर्माजी के मुंह से अपनेआप निकल पड़ा, ‘‘नीला, तुम यहां.’’

यह सुनते ही मंदार, सपना और उस के पापा ने चौंक कर गुरुमाई की ओर देखा. सपना को अब समझ में आया कि क्यों उसे कल रात गुरुमाई का चेहरा जानापहचाना लग रहा था.

शर्माजी और मंदार को सामने देख कर गुरुमाई के धैर्य का बांध टूट गया. वह उठीं और शर्माजी के पैरों में गिर पड़ीं. जब शर्माजी ने उन्हें उठाया तो वह पास में स्तब्ध खडे़ मंदार का चेहरा अपने हाथों में ले कर उसे पागलों की तरह चूमने लगीं.

पुलिस महानिरीक्षक की ओर देख गुरुमाई बोलीं, ‘‘तुम जानना चाहते हो कि मैं ने इस पापी की हत्या क्यों की तो सुनो, मुझ जैसी कितनी ही औरतों का सर्वनाश कर अब यह पापी सपना पर अपनी गंदी नजर डाल रहा था. जब मैं ने मंदार का नाम सुना और उस की कुंडली देखी तो समझ गई कि यह मेरा ही बेटा है. मैं एक बार पहले भी अपना बसाबसाया घरसंसार इस पापी की वजह से उजाड़ चुकी थी. अब दूसरी बार इसे अपने बेटे का बसता हुआ चमन कैसे उजाड़ने देती.’’

गुरुमाई एक पल को रुकीं फिर बोलीं, ‘‘शायद मैं ने आज वह काम किया जो मुझे काफी पहले करना चाहिए था क्योंकि यह पापी जब तक जीवित रहता, तब तक धर्म के नाम पर भोलेभाले लोगों को लूटता रहता.’’

शर्माजी कहने लगे, ‘‘नीला, ऐसे पापियों को प्रश्रय देने वाले भी हम ही हैं, हमें अपने मन से अंधविश्वास के राक्षस को भगाना होगा.’’

नीला ने पुलिस महानिरीक्षक से कहा, ‘‘चलिए, मुझे अपने कर्मों का फल भी तो पाना है.’’

जातेजाते नीला के कानों में शर्माजी के शब्दों ने शहद घोल दिया, ‘‘नीला, तुम्हें जल्दी घर वापस आना है, अपनी बहू का स्वागत करने के लिए.’’

लेखक- नितीन उपाध्ये

Hindi Story : मोहभंग – सीमा का अपने मायके से क्यों मोहभंग हुआ ?

Hindi Story : बारबार मुझे अपनेआप पर ही क्रोध आ रहा है कि क्यों गई थी मैं वहां. यह कोई एक बार की तो बात है नहीं, हर बार यही होता है. पर हर बार चली जाती हूं. आखिर मायके का मोह जो होता है, पर इस बार जैसा मोहभंग हुआ है, वह मुझे कुछ निर्णय लेने के लिए जरूर मजबूर करेगा.

मैं उठ कर बैठ जाती हूं. थर्मस से पानी निकाल कर पीती हूं.

‘‘कौन सा स्टेशन है?’’ मैं सामने बैठी महिला से पूछती हूं.

‘‘बरेली है शायद. कहां जा रही हैं आप?’’

‘‘दिल्ली,’’ मैं सपाट सा उत्तर देती हूं.

‘‘किस के घर जा रही हैं?’’ फिर प्रश्न दगा.

‘‘अपने घर.’’

एक पल की खामोशी के बाद वह महिला पुन: पूछती है, ‘‘कानपुर में कौन रहता है आप का?’’

‘‘मायका है,’’ मैं संक्षिप्त सा उत्तर देती हूं.

‘‘कोई काम था क्या?’’

‘‘हां, शादी थी भाई की?’’ कह कर मैं मुंह फेर लेती हूं.

‘‘तब तो बहुत मजे रहे होंगे,’’ वह बातों का सिलसिला पुन: जोड़ती है.

मेरा मन आगे बातें करने का बिलकुल नहीं था. बहुत सिरदर्द हो रहा था.

‘‘आप के पास कोई दर्द की गोली है? सिरदर्द हो रहा है,’’ मैं उस से पूछती हूं.

‘‘नहीं, बाम है. लीजिएगा?’’

‘‘हूं. दीजिए.’’

‘‘शादीविवाह में अनावश्यक शोरगुल से सिरदर्द हो ही जाता है. मैं पिछले साल बहन की शादी में गई थी. सिर तो सिर, मेरा तो पेट भी खराब हो गया था,’’ वह अपने थैले में से बाम निकाल कर देती है.

मैं उसे धन्यवाद दे बाम लगा कर चुपचाप सो जाती हूं.

उन बातों को याद कर के मेरा सिर फिर से दर्द करने लगता है. भुलाना चाह कर भी नहीं भूल पाती. बारबार वही दृश्य आंखों के सामने तैरने लगते हैं.

‘यहीं की दी हुई तो साड़ी पहनती हो तुम. क्या जीजाजी कभी तुम्हें साड़ी नहीं दिलाते?’ छोटी बहन रेणु कहती है.

‘सुनो जीजी, मामी के आगे यह मत बताना कि जीजाजी लेखापाल ही हैं. हम ने उन्हें शाखा प्रबंधक बता रखा है, समझीं.’

‘क्यों? झूठ क्यों बोला?’ मैं चिहुंक कर पूछती हूं.

‘अरे, तुम्हारी तो कोई इज्जत नहीं, पर हमारी तो है न. पिताजी ने सभी को यही बता रखा है,’ मुझ से 5 वर्ष छोटी रेणु एक ही वाक्य में समझा गई कि अब मेरी इस घर में क्या इज्जत है.

मेरे मन में कहीं कुछ चटक सा जाता है. वैसे यह चटकन तो हर वर्ष मायके आने पर होती है, पर इस बार इतने रिश्तेदार जुटे हैं कि इन के सामने इतनी बेइज्जती सहन नहीं होती मुझ से. मैं उठ कर ऊपर चली जाती हूं.

ऊपर की सीढि़यों पर ताई मिल जाती हैं, ‘क्यों बेटी, अकेली ही आई है इस बार. छोटे से मुन्ने को भी छोड़ आई? न तेरा दूल्हा ही आया है. क्या बात है, बेटी?’

‘कुछ नहीं, ताईजी, बस, दफ्तर का काम था कुछ. फिर मुन्ना उन के बगैर रहता ही नहीं है. छमाही परीक्षा भी है, इसीलिए छोड़ आई,’ मैं पिंड छुड़ा कर भागती हूं.

छोटी बहन रेणु यहां भी आ धमकती है, ‘अरे, तुम यहां बैठी हो. तैयार नहीं हुईं अभी तक? तुम्हें तो आरती करनी है. देखो, 4 बज गए. औरतें आने लगी हैं.’

‘चल रही हूं. चिल्ला मत,’ मैं उसे डांट देती हूं.

‘हूं. पता नहीं क्या समझती हो अपने को. कुछ काम नहीं होता. शादी के बाद एकदम बौड़म हो गई हो तुम तो.’

‘तुम से होता है? बातें बनाने के अलावा कोई काम है तेरे पास?’ मैं बिफर पड़ती हूं.

वह बड़बड़ करती हुई नीचे उतर जाती है. न जाने मां को क्याक्या भड़काती है.

‘क्या बात है सीमा, 4 बज रहे हैं, घुड़चढ़ी का समय हो रहा है. तुम से अभी थाल भी नहीं सजाया गया आरती के लिए? किसी भी काम का होश नहीं रहता इसे,’ मां औरतों के सामने डांटती हैं.

‘क्यों सीमा, जमाई बाबू नहीं आए?’ बड़ी मामी पूछती हैं.

मां व्यंग्य से मुसकरा कर मुंह पीछे कर लेती हैं. मैं चुपचाप बिना कुछ उत्तर दिए थाल उठा कर भीतर कमरे में आ जाती हूं.

सारा काम हो चुका था. बरात लड़की वालों के यहां जा चुकी थी. मैं निढाल हो कर धम से चारपाई पर लेट जाती हूं कि रेणु की आवाज सुनाई पड़ती है, ‘हाय जीजी, तुम अभी से सो गईं क्या? कितना काम पड़ा है.’

‘मुझे नींद आ रही है, रेणु. कुछ तू ही कर ले बहन. मेरा सिर फटा जा रहा है.’

वह बड़बड़ करती चली गई. यद्यपि यह मेरा मायका था, जहां मैं ने जिंदगी के 19 वर्ष काटे थे. फिर भी न जाने क्यों आज इतना पराया लग रहा था. सुबह से न किसी ने खाने के लिए पूछा, न मैं ने खाया ही. यही घर है वह जहां मैं हर समय फ्रिज में से कुछ न कुछ निकाल कर खाती रहती थी. मुझे लगता है कि मैं ने सच ही यहां आ कर गलती की है. राकेश नहीं आए, ठीक ही हुआ.

‘जरा उधर खिसक सीमा, मुन्ने को सुला दूं. इसे ओढ़ा ले. देख, हलकीहलकी सर्दी पड़ने लगी है और तू कैसे लेट गई? कुछ खायापिया भी नहीं है,’ दीदी के करुण स्वर से मैं पिघल गई. मुझ में और दीदी में सिर्फ ढाई वर्ष का ही अंतर है. दीदी की शादी कोलकाता में हुई है. जीजाजी का रेशमी साडि़यों का काफी बड़ा व्यापार है.

दीदी ने मुझ से दोबारा कहा, ‘सीमा, तू कुछ खा ले बहन. और तेरे पति क्यों नहीं आए?’

‘जानबूझ कर क्यों पूछती हो, दीदी. तुम्हें लेने तो बड़े भैया गए थे. मुझे लेने कौन गया? सिर्फ कार्ड डाल दिया. यह तो कहो, मैं आ गई. तुम्हारे सामने मेरी क्या कीमत है?’ मैं ने कहा.

‘हां, सीमा, मेरे साथ भी पहले कुछ ऐसा ही व्यवहार किया जाता था. शादी से पहले मुझे मां कितना डांटती थीं, पर  अब सब उलटा हो गया है.’

‘तुम बड़े घर जो ब्याही हो, भई. मेरे पति बैंक में सिर्फ लेखापाल हैं. तुम्हारे पति की मासिक आय 20 हजार है, तो मेरे पति की सिर्फ 2 हजार. अंतर नहीं है क्या?’

‘नहीं सीमा, रो मत. राकेश कितना सुशील है, तुझे पता नहीं है. तेरे जीजाजी एक तो मुझ से 10 वर्ष बड़े हैं, रुचियों में कितना अंतर है. हर समय इन्हें पैसा ही पैसा चाहिए. न घर की चिंता और न बच्चों की. घर में हर समय बड़ेबड़े व्यापारी आते रहते हैं. नौकरों के बावजूद पूरे दिन रसोई में घुसी रहती हूं. यह भी कोई जिंदगी है? तू तो हर शाम राकेश के साथ घूमने चली जाती है. मुझे तो महीने बाद घर से निकलना होता है इन के साथ. देख, शादी में आए हैं, पर दिन भर पड़े सोते रहते हैं. अभी राकेश होता, तो दौड़दौड़ कर काम करता, मजमा लगा देता. कुछ नहीं तो हमें घुमा ही लाता. कुंआरे में मुझे घूमने की कितनी हसरत थी, पर सब धरी रह गई.’

कुछ देर रुक कर दीदी फिर बोलीं, ‘मैं पिछले वर्ष दिल्ली आई थी तेरे घर. 2 दिन रही. सच, राकेश ने कितना आदर दिया, इधर घुमाया, उधर घुमाया, खूब हंसाहंसा कर मन लगा दिया. तुम तो मियांबीवी हो और एक बच्चा. एक हम हैं कि पूरी गृहस्थी है, 2 छोटी ननदें, देवर, सास सभी की जिम्मेदारी है. कैसी बंध गई हूं मैं? पैसा होगा तेरे जीजाजी के पास बैंक में, पर मैं तो देख, पूरी चौधराइन बन गई. तू मुझ से केवल ढाई वर्ष छोटी है, पर नायिका जैसी लगती है अब भी,’ दीदी मेरी ओर निहारने लगीं.

‘ले देख, यह साड़ी पहन ले. तेरे ऊपर बहुत खिलेगी,’ कहते हुए दीदी ने गुलाबी रेशमी साड़ी मुझे दी.

‘मैं इतनी भारी साड़ी का क्या करूंगी?’ मैं झिझकी.

‘यह क्या हो रहा है?’ अचानक मां की आवाज सुन कर मैं ठिठक गई.

‘सीमा, तू यहां क्या कर रही है? इतना काम पड़ा है. कौन निबटाएगा. उठ, जा जल्दी से कर, फिर बैठियो. और यह साड़ी किस की है?’

‘जीजी की है. मुझे दे रही हैं,’ मैं ने उठते हुए उत्तर दिया.

‘अरे, इतनी भारी साड़ी का सीमा क्या करेगी? तू ही रख ले. तेरे यहां तो रिश्तेदारी काफी बड़ी है. आनाजाना लगा रहता है. क्यों दे रही है इसे?’ मां ने दीदी को समझाया.

मेरा मुंह तमतमा गया, पर चुपचाप काम में लग गई. सारा काम निबटा कर मैं फिर से लेट गई. विवाह की थकान से मेरा बदन चूरचूर हो रहा था.

दूसरे दिन बहू भी आ गई थी. उधर राकेश का फोन भी आ चुका था कि सीमा को भेजो. यद्यपि काम के कारण अम्मां मुझे रोकना चाहती थीं, पर मैं नहीं रुकी. मां ने बड़ी दीदी को विदा कर दिया था. जीजाजी को जल्दी थी. जीजाजी के चलने पर मां ने पूछा, ‘अब कब दर्शन देंगे?’

‘बस जी, अब क्या दर्शन देंगे? एक बार के दर्शन में हमारा लाखों का नुकसान हो जाता है,’ जीजाजी ने चांदी की डिबिया से पान निकाल कर खाते हुए कहा, ‘दर्शन देने वाले तो राकेश बाबू थे. बारबार दर्शन देते थे. जाने अब कहां लोप हो गए.’

मैं जीजाजी का कटाक्ष अच्छी तरह समझ चुकी थी. जीजी ने डांटते हुए कहा, ‘क्यों तंग करते हो उसे?’

जीजाजी के जाने के बाद मेरी भी जाने की बारी थी. शाम की गाड़ी से मुझे भी जाना था. मेरा सामान बंध चुका था. पिताजी ने पूछा, ‘अब राकेश की तरक्की कब होगी?’

‘पता नहीं,’ मैं ने धीरे से उत्तर दिया.

‘पता रखा कर. कुछ लोगों से मिलोजुलो. रेखा को देख. तेरे साथ ही विवाह हुआ था. बैंक में ही था. अफसर हो गया. कोशिश ही नहीं करते तुम लोग.’

मां ने ताना मारा, ‘रीमा को देख कितनी सुखी है. कितना पैसा, कोठी सभी कुछ है.’

‘मां, हमें क्या कमी है. हम भी तो मजे में हैं.’

‘वो मजे हमें दीख रहे हैं,’ मां ने कटाक्ष किया.

मैं नहीं जानती थी कि यह मां की सहानुभूति है या उन की गरिमा आहत होती है मेरे आने से. उन्हें मैं मखमल में टाट का पैबंद सा लगती हूं. जबतब राकेश को ले कर मुझे जलील करना शुरू कर देती हैं. बड़े भैयाभाभी सदा राकेश को ही पसंद करते हैं, पर मां को स्वभाव से क्या मतलब? जीजाजी चाहे कितनी बेइज्जती करें मां की, वे उन से ही खुश रहती हैं. पैसा जो है, उन के पास.

भैया मुझे छोड़ने स्टेशन आए थे. मैं मां की बातें याद कर के रोने लगी थी.

‘देख सीमा, मां और पिताजी की बातों का बुरा न मानना. पत्र जरूर डालना. राकेश क्यों नहीं आए, मुझे पता है. मैं जब दिल्ली आऊंगा तब मिलूंगा,’ भैया गाड़ी में बिठा कर चले गए थे.

अचानक एक सहानुभूति भरा स्वर मेरे कानों में पड़ा. मैं एकदम से वर्तमान में लौट आई.

‘‘अब आप का सिरदर्द कैसा है? चाय पिएंगी क्या?’’ थर्मस से चाय निकालते हुए सामने बैठी महिला बोली.

‘‘ठीक हूं,’’ मैं उठ बैठती हूं. उस के हाथ से शीशे के गिलास में चाय ले कर पूछती हूं, ‘‘कौन सा स्टेशन है?’’

‘‘बस, 1 घंटे का रास्ता और है. दिल्ली आ रही है. पूरी रात आप बेचैन सी रहीं.’’

‘‘हूं, तबीयत ठीक नहीं थी न,’’ मैं मुसकराने का प्रयास करती हूं.

‘‘कितने बच्चे हैं आप के?’’ वह पूछती है.

‘‘जी, सिर्फ एक.’’

‘‘उसे क्यों छोड़ आईं. लगता है दादादादी का प्यारा होगा,’’ वह मेरी ओर मुसकरा कर देखती है.

‘‘हूं. अब नहीं छोड़ूंगी कभी,’’ राकेश और मुन्ने की शक्ल बारबार मेरी आंखों के सामने तैरने लगती है. रहरह कर मुन्ने की याद आने लगती है. जाने कैसा होगा वह, राकेश ने कैसे रखा होगा उसे? बस, घंटे भर की तो बात है.

मैं उतावली हो जाती हूं उन दोनों से मिलने के लिए.

आखिर मैं उन को छोड़ कर क्यों गई थी? मायके का मोह छोड़ना होगा मुझे. इस से पहले कि मुझे वे घटनाएं फिर याद आएं, मैं नीचे से टोकरी खींच शादी की मिठाई निकाल कर सामने वाली महिला को देती हूं और सबकुछ बिसरा कर उन से बातों में लीन हो जाती हूं.

लेखक- कृष्णा गर्ग

Hindi Story : दुश्मन – सोम अपने रिश्तेदारों को क्यों दुश्मन मानता था

Hindi Story : ‘‘कभी किसी की तारीफ करना भी सीखो सोम, सुनने वाले के कानों में कभी शहद भी टपकाया करो. सदा जहर ही टपकाना कोई रस्म तो नहीं है न, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी सदा निभाया ही जाए.’’

टेढ़ी आंख से सोम मुझे देखने लगा.

‘‘50 के पास पहुंच गई तुम्हारी उम्र और अभी भी तुम ने जीवन से कुछ नहीं सीखा. हाथ से कंजूस नहीं हो तो जबान से ही कंजूसी किस लिए?’’ बड़बड़ाता हुआ क्याक्या कह गया मैं.

वह चुप रहा तो मैं फिर बोला, ‘‘अपने चारों तरफ मात्र असंतोष फैलाते हो और चाहते हो तुम्हें संतोष और चैन मिले, कभी किसी से मीठा नहीं बोलते हो और चाहते हो हर कोई तुम से मीठा बोले. सब का अपमान करते हो और चाहते हो तुम्हें सम्मान मिले…तुम तो कांटों से भरा कैक्टस हो सोम, कोई तुम से छू भर भी कैसे जाए, लहूलुहान कर देते हो तुम सब को.’’

शायद सोम को मुझ से ऐसी उम्मीद न थी. सोम मेरा छोटा भाई है और मैं उसे प्यार करता हूं. मैं चाहता हूं कि मेरा छोटा भाई सुखी रहे, खुश रहे लेकिन यह भी सत्य है कि मेरे भाई के चरित्र में ऐसा कोई कारण नहीं जिस वजह से वह खुश रहे. क्या कहूं मैं? कैसे समझाऊं, इस का क्या कारण है, वह पागल नहीं है. एक ही मां के शरीर से उपजे हैं हम मगर यह भी सच है कि अगर मुझे भाई चुनने की छूट दे दी जाती तो मैं सोम को कभी अपना भाई न चुनता. मित्र चुनने को तो मनुष्य आजाद है लेकिन भाई, बहन और रिश्तेदार चुनने में ऐसी आजादी कहां है.

मैं ने जब से होश संभाला है सोम मेरी जिम्मेदारी है. मेरी गोद से ले कर मेरे बुढ़ापे का सहारा बनने तक. मैं 60 साल का हूं, 10 साल का था मैं जब वह मेरी गोद में आया था और आज मेरे बुढ़ापे का सहारा बन कर वह मेरे साथ है मगर मेरी समझ से परे है.

मैं जानता हूं कि वह मेरे बड़बड़ाने का कारण कभी नहीं पूछेगा. किसी दूसरे को उस की वजह से दर्द या तकलीफ भी होती होगी यह उस ने कभी नहीं सोचा.

उठ कर सोम ऊपर अपने घर में चला गया. ऊपर का 3 कमरों का घर उस का बसेरा है और नीचे का 4 कमरों का हिस्सा मेरा घर है.

जिन सवालों का उत्तर न मिले उन्हें समय पर ही छोड़ देना चाहिए, यही मान कर मैं अकसर सोम के बारे में सोचना बंद कर देना चाहता हूं, मगर मुझ से होता भी तो नहीं यह कुछ न कुछ नया घट ही जाता है जो मुझे चुभ जाता है.

कितने यत्न से काकी ने गाजर का हलवा बना कर भेजा था. काकी हमारी पड़ोसिन हैं और उम्र में मुझ से जरा सी बड़ी होंगी. उस के पति को हम भाई काका कहते थे जिस वजह से वह हमारी काकी हुईं. हम दोनों भाई अपना खाना कभी खुद बनाते हैं, कभी बाजार से लाते हैं और कभीकभी टिफिन भी लगवा लेते हैं. बिना औरत का घर है न हमारा, न तो सोम की पत्नी है और न ही मेरी. कभी कुछ अच्छा बने तो काकी दे जाती हैं. यह तो उन का ममत्व और स्नेह है.

‘‘यह क्या बकवास बना कर भेज दिया है काकी ने, लगता है फेंकना पड़ेगा,’’ यह कह कर सोम ने हलवा मेरी ओर सरका दिया.

सोम का प्लेट परे हटा देना ही मुझे असहनीय लगा था. बोल पड़ा था मैं. सवाल काकी का नहीं, सवाल उन सब का भी है जो आज सोम के साथ नहीं हैं, जो सोम से दूर ही रहने में अपनी भलाई समझते हैं.

स्वादिष्ठ बना था गाजर का हलवा, लेकिन सोम को पसंद नहीं आया सो नहीं आया. सोम की पत्नी भी बहुत गुणी, समझदार और पढ़ीलिखी थी. दोषरहित चरित्र और संस्कारशील समझबूझ. हमारे परिवार ने सोम की पत्नी गीता को सिर- आंखों पर लिया था, लेकिन सोम के गले में वह लड़की सदा फांस जैसी ही रही.

‘मुझे यह लड़की पसंद नहीं आई मां. पता नहीं क्या बांध दिया आप ने मेरे गले में.’

‘क्यों, क्या हो गया?’

अवाक् रह गए थे मां और पिताजी, क्योंकि गीता उन्हीं की पसंद की थी. 2 साल की शादीशुदा जिंदगी और साल भर का बच्चा ले कर गीता सदा के लिए चली गई. पढ़ीलिखी थी ही, बच्चे की परवरिश कर ली उस ने.

उस का रिश्ता सोम से तो टूट गया लेकिन मेरे साथ नहीं टूट पाया. उस ने भी तोड़ा नहीं और हम पतिपत्नी ने भी सदा उसे निभाया. उस का घर फिर से बसाने का बीड़ा हम ने उठाया और जिस दिन उसे एक घर दिलवा दिया उसी दिन हम एक ग्लानि के बोझ से मुक्त हो पाए थे. दिन बीते और साल बीत गए. गीता आज भी मेरी बहुत कुछ है, मेरी बेटी, मेरी बहन है.

मैं ने उसे पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखने दिया. वह मेरी अपनी बच्ची होती तो भी मैं इसी तरह करता.

कुछ देर बाद सोम ऊपर से उतर कर नीचे आया. मेरे पास बैठा रहा. फिर बोला, ‘‘तुम तो अच्छे हो न, तो फिर तुम क्यों अकेले हो…कहां है तुम्हारी पत्नी, तुम्हारे बच्चे?’’

मैं अवाक् रह गया था. मानो तलवार सीने में गहरे तक उतार दी हो सोम ने, वह तलवार जो लगातार मुझे जराजरा सी काटती रहती है. मेरी गृहस्थी के उजड़ने में मेरी तो कोई भूल नहीं थी. एक दुर्घटना में मेरी बेटीबेटा और पत्नी चल बसे तो उस में मेरा क्या दोष. कुदरत की मार को मैं सह रहा हूं लेकिन सोम के शब्दों का प्रहार भीतर तक भेद गया था मुझे.

कुछ दिन से देख रहा हूं कि सोम रोज शाम को कहीं चला जाता है. अच्छा लगा मुझे. कार्यालय के बाद कहीं और मन लगा रहा है तो अच्छा ही है. पता चला कुछ भी नया नहीं कर रहा सोम. हैरानपरेशान गीता और उस का पति संतोष मेरे सामने अपने बेटे विजय को साथ ले कर खडे़ थे.

‘‘भैया, सोम मेरा घर बरबाद करने पर तुले हैं. हर शाम विजय से मिलने लगे हैं. पता नहीं क्याक्या उस के मन में डाल रहे हैं. वह पागल सा होता जा रहा है.’’

‘‘संतान के मन में उस की मां के प्रति जहर घोल कर भला तू क्या साबित करना चाहता है?’’ मैं ने तमतमा कर कहा.

‘‘मुझे मेरा बच्चा वापस चाहिए, विजय मेरा बेटा है तो क्या उसे मेरे साथ नहीं रहना चाहिए?’’ सफाई देते सोम बोला.

‘‘आज बच्चा पल गया तो तुम्हारा हो गया. साल भर का ही था न तब, जब तुम ने मां और बच्चे का त्याग कर दिया था. तब कहां गई थी तुम्हारी ममता? अच्छे पिता नहीं बन पाए, कम से कम अच्छे इनसान तो बनो.’’

आखिर सोम अपना रूप दिखा कर ही माना. पता नहीं उस ने क्या जादू फेरा विजय पर कि एक शाम वह अपना सामान समेट मां को छोड़ ही आया. छटपटा कर रह गया मैं. गीता का क्या हाल हो रहा होगा, यही सोच कर मन घुटने लगा था. विजय की अवस्था से बेखबर एक दंभ था मेरे भाई के चेहरे पर.

मुझे हारा हुआ जुआरी समझ मानो कह रहा हो, ‘‘देखा न, खून आखिर खून होता है. आ गया न मेरा बेटा मेरे पास…आप ने क्या सोचा था कि मेरा घर सदा उजड़ा ही रहेगा. उजडे़ हुए तो आप हैं, मैं तो परिवार वाला हूं न.’’

क्या उत्तर देता मैं प्रत्यक्ष में. परोक्ष में समझ रहा था कि सोम ने अपने जीवन की एक और सब से बड़ी भूल कर दी है. जो किसी का नहीं हुआ वह इस बच्चे का होगा इस की भी क्या गारंटी है.

एक तरह से गीता के प्रति मेरी जिम्मेदारी फिर सिर उठाए खड़ी थी. उस से मिलने गया तो बावली सी मेरी छाती से आ लगी.

‘‘भैया, वह चला गया मुझे छोड़ कर…’’

‘‘जाने दे उसे, 20-22 साल का पढ़ालिखा लड़का अगर इतनी जल्दी भटक गया तो भटक जाने दे उसे, वह अगर तुम्हारा नहीं तो न सही, तुम अपने पति को संभालो जिस ने पलपल तुम्हारा साथ दिया है.’’

‘‘उन्हीं की चिंता है भैया, वही संभल नहीं पा रहे हैं. अपनी संतान से ज्यादा प्यार दिया है उन्होंने विजय को. मैं उन का सामना नहीं कर पा रही हूं.’’

वास्तव में गीता नसीब वाली है जो संतोष जैसे इनसान ने उस का हाथ पकड़ लिया था. तब जब मेरे भाई ने उसे और बच्चे को चौराहे पर ला खड़ा किया था. अपनी संतान के मुंह से निवाला छीन जिस ने विजय का मुंह भरा वह तो स्वयं को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहा होगा न.

संतोष के आगे मात्र हाथ जोड़ कर माफी ही मांग सका मैं.

‘‘भैया, आप क्यों क्षमा मांग रहे हैं? शायद मेरे ही प्यार में कोई कमी रही जो वह…’’

‘‘अपने प्यार और ममता का तिरस्कार मत होने दो संतोष…उस पिता की संतान भला और कैसी होती, जैसा उस का पिता है बेटा भी वैसा ही निकला. जाने दो उसे…’’

‘‘विजय ने आज तक एक बार भी नहीं सोचा कि उस का बाप कहां रहा. आज ही उस की याद आई जब वह पल गया, पढ़लिख गया, फसल की रखवाली दिनरात जो करता रहा उस का कोई मोल नहीं और बीज डालने वाला मालिक हो गया.’’

‘‘बच्चे का क्या दोष भैया, वह बेचारा तो मासूम है…सोम ने जो बताया होगा उसे ही मान लिया होगा…अफसोस यह कि गीता को ही चरित्रहीन बता दिया, सोम को छोड़ वह मेरे साथ भाग गई थी ऐसा डाल दिया उस के दिमाग में…एक जवान बच्चा क्या यह सच स्वीकार कर पाता? अपनी मां तो हर बेटे के लिए अति पूज्यनीय होती है, उस का दिमाग खराब कर दिया है सोम ने और  फिर विजय का पिता सोम है, यह भी तो असत्य नहीं है न.’’

सन्नाटे में था मेरा दिलोदिमाग. संतोष के हिलते होंठों को देख रहा था मैं. यह संतोष ही मेरा भाई क्यों नहीं हुआ. अगर मुझे किसी को दंड देने का अधिकार प्राप्त होता तो सब से पहले मैं सोम को मृत्युदंड देता जिस ने अपना जीवन तो बरबाद किया ही अब अपने बेटे का भी सर्वनाश कर रहा है.

2-4 दिन बीत गए. सोम बहुत खुश था. मैं समझ सकता था इस खुशी का रहस्य.

शाम को चाय का पहला ही घूंट पिया था कि दरवाजे पर दस्तक हुई.

‘‘ताऊजी, मैं अंदर आ जाऊं?’’

विजय खड़ा था सामने. मैं ने आगेपीछे नजर दौड़ाई, क्या सोम से पूछ कर आया है. स्वागत नहीं करना चाहता था मैं उस का लेकिन वह भीतर चला ही आया.

‘‘ताऊजी, आप को मेरा आना अच्छा नहीं लगा?’’

चुप था मैं. जो इनसान अपने बाप का नहीं, मां का नहीं वह मेरा क्या होगा और क्यों होगा.

सहसा लगा, एक तूफान चला आया हो सोम खड़ा था आंगन में, बाजार से लौटा था लदाफंदा. उस ने सोचा भी नहीं होगा कि उस के पीछे विजय सीढि़यां उतर मेरे पास चला आएगा.

‘‘तुम नीचे क्यों चले आए?’’

चुप था विजय. पहली बार मैं ने गौर से विजय का चेहरा देखा.

‘‘मैं कैदी हूं क्या? यह मेरे ताऊजी हैं. मैं इन से…’’

‘‘यह कोई नहीं है तेरा. यह दुश्मन है मेरा. मेरा घर उजाड़ा है इस ने…’’

सोम का अच्छा होने का नाटक समाप्त होने लगा. एकाएक लपक कर विजय की बांह पकड़ ली सोम ने और यों घसीटा जैसे वह कोई बेजान बुत हो.

‘‘छोडि़ए मुझे,’’ बहुत जोर से चीखा विजय, ‘‘बच्चा नहीं हूं मैं. अपनेपराए और अच्छेबुरे की समझ है मुझे. सभी दुश्मन हैं आप के, आप का भाई आप का दुश्मन, मेरी मां आप की दुश्मन…’’

‘‘हांहां, तुम सभी मेरे दुश्मन हो, तुम भी दुश्मन हो मेरे, तुम मेरे बेटे हो ही नहीं…चरित्रहीन है तुम्हारी मां. संतोष के साथ भाग गई थी वह, पता नहीं कहां मुंह काला किया था जो तेरा जन्म हुआ था…तू मेरा बच्चा होता तो मेरे बारे में सोचता.’’

मेरा बांध टूट गया था. फिर से वही सब. फिर से वही सभी को लहूलुहान करने की आदत. मेरा उठा हुआ हाथ विजय ने ही रोक लिया एकाएक.

‘‘रहने दीजिए न ताऊजी, मैं किस का बेटा हूं मुझे पता है. मेरे पिता संतोष हैं जिन्होंने मुझे पालपोस कर बड़ा किया है, जो इनसान मेरी मां की इज्जत करता है वही मेरा बाप है. भला यह इनसान मेरा पिता कैसे हो सकता है, जो दिनरात मेरी मां को गाली देता है. जो जरा सी बात पर दूसरे का मानसम्मान मिट्टी में मिला दे वह मेरा पिता नहीं.’’

स्तब्ध रह गया मैं भी. ऐसा लगा, संतोष ही सामने खड़ा है, शांत, सौम्य. सोम को एकटक निहार रहा था विजय.

‘‘आप के बारे में जो सुना था वैसा ही पाया. आप को जानने के लिए आप के साथ कुछ दिन रहना बहुत जरूरी था सो चला आया था. मेरी मां आप को क्यों छोड़ कर चली गई होगीं मैं समझ गया आज…अब मैं अपने मांबाप के साथ पूरापूरा न्याय कर पाऊंगा. बहुत अच्छा किया जो आप मुझ से मिल कर यहां चले आने को कहते रहे. मेरा सारा भ्रम चला गया, अब कोई शक नहीं बचा है.

‘‘सच कहा आप ने, मैं आप का बच्चा होना भी नहीं चाहता. आप ने 20 साल पहले भी मुझे दुत्कारा था और आज भी दुत्कार दिया. मेरा इतना सा ही दोष कि मैं नीचे ताऊजी से मिलने चला आया. क्या यह इतना बड़ा अपराध है कि आप यह कह दें कि आप मेरे पिता ही नहीं… अरे, रक्त की चंद बूंदों पर ही आप को इतना अभिमान कि जब चाहा अपना नाम दे दिया, जब चाहा छीन लिया. अपने पुरुष होने पर ही इतनी अकड़, पिता तो एक जानवर भी बनता है. अपने बच्चे के लिए वह भी उतना तो करता ही है जितना आप ने कभी नहीं किया. क्या चाहते हैं आप, मैं समझ ही नहीं पाया. मेरे घर से मुझे उखाड़ दिया और यहां ला कर यह बता रहे हैं कि मैं आप का बेटा ही नहीं हूं, मेरी मां चरित्रहीन थी.’’

हाथ का सामान जमीन पर फेंक कर सोम जोरजोर से चीखने लगा, पता नहीं क्याक्या अनापशनाप बकने लगा.

विजय लपक कर ऊपर गया और 5 मिनट बाद ही अपना बैग कंधे पर लटकाए नीचे उतर आया.

चला गया विजय. मैं सन्नाटे में खड़ा अपनी चाय का प्याला देखने लगा. एक ही घूंट पिया था अभी. पहले और दूसरे घूंट में ही कितना सब घट गया. तरस आ रहा था मुझे विजय पर भी, पता नहीं घर पहुंचने पर उस का क्या होगा. उस का भ्रम टूट गया, यह तो अच्छा हुआ पर रिश्ते में जो गांठ पड़ जाएगी उस का निदान कैसे होगा.

‘‘रुको विजय, बेटा रुको, मैं साथ चलता हूं.’’

‘‘नहीं ताऊजी, मैं अकेला आया था न, अकेला ही जाऊंगा. मम्मी और पापा को रुला कर आया था, अभी उस का प्रायश्चित भी करना है मुझे.’’

Hindi Story : अंधेरे उजाले

Hindi Story : जीवन में बहुत कुछ अचानक, अनायास, अनजाने घट जाता है. आदमी उस के लिए तैयार नहीं होता इसलिए उस का अनचाहे शिकार हो जाता है. ये घटनाएं व्यक्ति की सोच, नजरिए और जिंदगी की धारा तक बदल देती हैं. सुदेश अपनी पत्नी तनवी के साथ एक होटल में ठहरा था. होटल के अपने कमरे में टीवी पर समाचार देख वह एकदम परेशान हो उठा.

राजस्थान अचानक गुर्जरों की आरक्षण की मांग को ले कर दहक उठा था. वहां की आग गुड़गांव, फरीदाबाद, गाजियाबाद, दनकौर, दादरी, मथुरा, आगरा आदि में फैल गई थी. वे दोनों बच्चों को घर पर नौकरानी के भरोसे छोड़ कर आए थे. तनवी दिल्ली अपने अर्थशास्त्र के शोध से संबंधित कुछ जरूरी किताबें लेने आई थी. सुदेश उस की मदद को संग आया था.

1-2 दिन में किताबें खरीद कर वे लोग घर वापस लौटने वाले थे लेकिन तभी गुर्जरों का यह आंदोलन छिड़ गया. अपनी कार से उन्हें वापस लौटना था. रास्ते में नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद का हाईवे पड़ेगा. वाहनों में आगजनी, बसों की तोड़फोड़, रेल की पटरियां उखाड़ना, हिंसा, मारपीट, गोलीबारी, लंबेलंबे जाम…क्या मुसीबत है. बच्चों की चिंता ने दोनों को परेशान कर दिया. उन के लिए अब जल्दी से जल्दी घर पहुंचना जरूरी है. ‘‘क्या होता जा रहा है इस देश को? अपनी मांग मनवाने का यह कौन सा तरीका निकाल लिया लोगों ने?’’ तनवी के स्वर में घबराहट थी.

वोटों की राजनीति, जातिवाद, लोकतंत्र के नाम पर चल रहा ढोंगतंत्र, आरक्षण, गरीबी, बेरोजगारी, बढ़ती आबादी आदि ऐसे मुद्दे थे जिन पर चाहता तो सुदेश घंटों भाषण दे सकता था पर इस वक्त वह अवसर नहीं था. इस वक्त तो उन की पहली जरूरत किसी तरह होटल से सामान समेट कर कार में ठूंस, घर पहुंचना था. उन्हें अपने बच्चों की चिंता लगातार सताए जा रही थी. फोन पर दोनों बच्चों, वैभव और शुभा से तनवी और सुदेश ने बात कर के हालचाल पूछ लिए थे. नौकरानी से भी बात हो गई थी पर नौकरानी ने यह भी कह दिया था कि साहब, दिल्ली का झगड़ा इधर शहर में भी फैल सकता है…

हालांकि अपनी सड़क पर पुलिस वाले गश्त लगा रहे हैं…पर लोगों का क्या भरोसा साहब… आदमी का आदमी पर से विश्वास ही उठ गया. कैसा विचित्र समय आ गया है. हम सब अपनी विश्वसनीयता खो बैठे हैं. किसी को किसी पर भरोसा नहीं रह गया. कब कौन आदमी हमारे साथ गड़बड़ कर दे, हमें हमेशा यह भय लगा रहता है. सामान पैक कर गाड़ी में रखा और वे दोनों दिल्ली से एक तरह से भाग लिए ताकि किसी तरह जल्दी से जल्दी घर पहुंचें. बच्चों की चिंता के कारण सुदेश गाड़ी को तेज रफ्तार से चला रहा था.

तनवी खिड़की से बाहर के दृश्य देख रही थी और वह तनवी को देख कर अपने अतीत के बारे में सोचने लगा. शहर में हो रही एक गोष्ठी में सुदेश मुख्य वक्ता था. गोष्ठी के बाद जलपान के वक्त अनूप उसे पकड़ कर एक युवती के निकट ले गया और बोला, ‘सुदेश, इन से मिलो…मिस तनवी…यहां के प्रसिद्ध महिला महाविद्यालय में अर्थशास्त्र की जानीमानी प्रवक्ता हैं.’ ‘मिस’ शब्द से चौंका था सुदेश, एक पढ़ीलिखी, प्रतिष्ठित पद वाली ठीकठाक रंगरूप की युवती का इस उम्र तक ‘मिस’ रहना, इस समाज में मिसफिट होने जैसा लगता है. अब तक मिस ही क्यों? मिसेज क्यों नहीं? यह सवाल सुदेश के दिमाग में कौंध गया था. ‘और मिस तनवी, ये हैं मिस्टर सुदेश कुमार…

यहां के महाविद्यालय में समाज- शास्त्र के जानेमाने प्राध्यापक, जातिवाद के घनघोर आलोचक….अखबारों में दलितों, पिछड़ों और गरीबों के जबरदस्त पक्षधर… इस कारण जाति से ब्राह्मण होने के बावजूद लोग इन की पैदाइश को ले कर संदेह जाहिर करते हैं और कहते हैं, जरूर कहीं कुछ गड़बड़ है वरना इन्हें किसी हरिजन परिवार में ही पैदा होना चाहिए था.’ अनूप की बातों पर सुदेश का ध्यान नहीं था पर ‘कुमार’ शब्द उस ने जिस तरह तनवी के सामने खास जोर दे कर उच्चारित किया था उस से वह सोच में पड़ गया था. अनूप ने कहा, ‘है तो यह अशिष्टता पर मिस तनवी की उम्र 28-29 साल, मिजाज तेजतर्रार, स्वभाव खरा, नकचढ़ा…टूटना मंजूर, झुकना असंभव. इन की विवाह की शर्तें हैं…कास्ट एंड रिलीजन नो बार. पति की हाइट एंड वेट नो च्वाइस. कांप्लेक्शन मस्ट बी फेयर, हायली क्वालीफाइड…सेलरी 5 अंकों में. नेचर एडजस्टेबल. स्मार्ट बट नाट फ्लर्ट.

नजरिया आधुनिक, तर्कसंगत, बीवी को जो पांव की जूती न समझे, बराबर की हैसियत और हक दे. दकियानूस और अंधविश्वासी न हो. अनूप लगातार जिस लहजे में बोले जा रहा था उस से सुदेश को एकदम हंसी आ गई थी और तनवी सहम सी गई थी, ‘अनूपजी, आप पत्रकार लोगों से मैं झगड़ तो सकती नहीं क्योंकि आज झगडं़ूगी, कल आप अखबार में खिंचाई कर के मेरे नाम में पलीता लगा देंगे, तिल होगा तो ताड़ बता कर शहर भर में बदनाम कर देंगे…पर जिस सुदेशजी से मैं पहली बार मिल रही हूं, उन के सामने मेरी इस तरह बखिया उधेड़ना कहां की भलमनसाहत है?’ ‘यह मेरी भलमनसाहत नहीं मैडम, आप से रिश्तेदारी निभाना है…असल में आप दोनों का मामला मैं फिट करवाना चाहता हूं…वह नल और दमयंती का किस्सा तो आप ने सुना ही होगा…बेचारे हंस को दोनों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभानी पड़ी थी…आजकल हंस तो कहीं रह नहीं गए कि नल और दमयंती की जोड़ी बनवा दें.

अब तो हम कौए ही रह गए हैं जो यह भूमिका निभा रहे हैं. ‘आप जानती हैं, मेरी शादी हो चुकी है, वरना मैं ही आप से शादी कर लेता…कम से कम एक बंधी हुई रकम कमाने वाली बीवी तो मुझे मिलती. अपने नसीब में तो घरेलू औरत लिखी थी…और अपन ठहरे पत्रकार…कलम घसीट कर जिंदगी घसीटने वाले…हर वक्त हलचल और थ्रिल की दुनिया में रहने वाले पर अपनी निजी जिंदगी एकदम रुटीन, बासी…न कोई रोमांस न रोमांच, न थ्रिल न व्रिल. सिर्फ ड्रिल…लेफ्टराइट, लेफ्ट- राइट करते रहो, कभी यहां कभी वहां, कभी इस की खबर कभी उस की खबर…दूसरों की खबरें छापने वाले हम लोग अपनी खबर से बेखबर रहते हैं.’ बाद में अनूप ने तनवी के बारे में बहुत कुछ टुकड़ोंटुकड़ों में सुदेश को बताया था और उस से ही वह प्रभावित हुआ था.

तनवी उसे काफी दबंग, समझदार, बोल्ड युवती लगी थी, एक ऐसी युवती जो एक बार फैसला सोचसमझ कर ले तो फिर उस से वापस न लौटे. सुदेश को ढुलमुल, कमजोर दिमाग की, पढ़ीलिखी होने के बावजूद बेकार के रीतिरिवाजों में फंसी रहने वाली अंधविश्वासी लड़कियां एकदम गंवार और जाहिल लगती थीं, जिन के साथ जिंदगी को सहजता से जीना उसे बहुत कठिन लगता था, इसी कारण उस ने तमाम रिश्ते ठुकराए भी थे.

तनवी उसे कई मानों में अपने मन के अनुकूल लगी थी, हालांकि उस के मन में एक दुविधा हमेशा रही थी कि ऐसी दबंग युवती पतिपत्नी के रिश्ते को अहमियत देगी या नहीं? उसे निभाने की सही कोशिश करेगी या नहीं? विवाह एक समझौता होता है, उस में अनेक उतारचढ़ाव आते हैं, जिन्हें बुद्धिमानी से सहन करते हुए बाधाओं को पार करना पड़ता है. कसबे में तनवी का वह निर्णय खलबली मचा देने वाला साबित हुआ था. देखा जाए तो बात मामूली थी, ऐसी घटनाएं अकसर शादीब्याह में घट जाया करती हैं पर मानमनौवल और समझौतों के बाद बीच का रास्ता निकाल लिया जाता है.

तनवी ने बीच के सारे रास्ते अपने फैसले से बंद कर दिए थे. तनवी की शादी जिस लड़के से तय हुई थी वह भौतिक विज्ञान के एक आणविक संस्थान में काम करने वाला युवक था. बरात दरवाजे पर पहुंची. औपचारिकताओं के लिए दूल्हे को घोड़ी से उतार कर चौकी पर बैठाया गया. लकड़ी की उस चौकी के अचानक एक तरफ के दोनों पाए टूट गए और दूल्हे राजा एक तरफ लुढ़क गए. द्वारचार के उस मौके पर मौजूद बुजुर्गों ने कहा कि यह अपशकुन है. विवाह सफल नहीं होगा. दूल्हे राजा उठे और लकड़ी की उस चौकी में ठोकर मारी, एकदम बौखला कर बोले, ‘ऐसी मनहूस लड़की से मैं हरगिज शादी नहीं करूंगा. इस महत्त्वपूर्ण रस्म में बाधा पड़ी है. अपशकुन हुआ है.’ क्रोध में बड़बड़ाते दूल्हे राजा दरवाजे से लौट गए. ‘मुझे नहीं करनी शादी इस लड़की से,’ उन का ऐलान था. पिता भी बेटे की तरफ. सारे बुजुर्ग भी उस की तरफ. रंग में भंग पड़ गया. बाद में पता चला कि चौकी बनाने वाले बढ़ई से गलती हो गई थी.

जल्दबाजी में एक तरफ के पायों में कीलें ठुकने से रह गई थीं और इस मामूली बात का बतंगड़ बन गया था. तनवी ने यह सब सुना तो फिर उस ने भी यह कहते हुए शादी से इनकार कर दिया, ‘ऐसे तुनकमिजाज, अंधविश्वासी और गुस्सैल युवक से मैं हरगिज शादी नहीं करूंगी.’ तनवी के इस फैसले ने एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया. लड़के वालों को उम्मीद थी कि लड़की वाले दबाव में आएंगे. अपनी इज्जत का वास्ता देंगे, मिन्नतें करेंगे, लड़की की जिंदगी का सवाल ले कर गिड़गिड़ाएंगे. तनवी के पिता और मामा लड़के के और उन के परिवार वालों के हाथपांव जोड़ने पहुंचे भी, किसी तरह मामला सुलटने वाला भी था पर तनवी के इनकार ने नई मुसीबत खड़ी कर दी. पिता और मामा ने तनवी को बहुत समझाया पर वह किसी प्रकार उस विवाह के लिए राजी नहीं हुई. उस ने कह दिया, ‘जीवन भर कुंआरी रह लूंगी पर इस लड़के से शादी किसी भी कीमत पर नहीं करूंगी. नौकरी कर रही हूं.

कमाखा लूंगी, भूखी नहीं मर जाऊंगी, न किसी पर बोझ बनूंगी. उस का निर्णय अटल है, बदल नहीं सकता.’ कसबे में तमाम चर्चाएं चलने लगीं…लड़की का पहले से किसी लड़के से संबंध है. कसबे के किन्हीं परमानंद बाबू ने इस अफवाह को और हवा दे दी. बताया कि जिस कालिज में तनवी नौकरी करती है, उस के प्रबंधक के लड़के के साथ वह दिल्ली, कोलकाता घूमतीफिरती है. होटलों में अकेली उस के साथ एक ही कमरे में रुकती है. चालचलन कैसा होगा, लोग स्वयं सोच लें. कसबे के भी 2-3 युवकों से उस के संबंध होने की बातें कही जाने लगीं. दूसरे के फटे में अपनी टांग फंसाना कसबाई लोगों को खूब आता है. पत्रकार अनूप तनवी का रिश्ते में कुछ लगता था. उस विवाह समारोह में वह भी शामिल हुआ था इसलिए उसे सारी घटनाओं और स्थितियों की जानकारी थी. ‘बदनाम हो जाओगी.

पूरी जाति- बिरादरी में अफवाह फैल जाएगी. फिर तुम से कौन शादी करेगा?’ मामा ने समझाना चाहा था. सुदेश ने अनूप से शंका प्रकट की, ‘ऐसी जिद्दी लड़की से शादी कैसे निभेगी, यार?’ ‘सुदेशजी, इस बीच गुजरे वक्त ने तनवी को बहुत कुछ समझा दिया होगा. 28-29 साल कुंआरी रह ली. बदनामी झेल ली. नातेरिश्तेदारों से कट कर रह ली. इन सब बातों ने उसे भी समझा दिया होगा कि बेकार की जिद में पड़ कर सहज जीवन नहीं जिया जा सकता. सहज जीवन जीने के लिए हमें अपना स्वभाव नरम रखना पड़ता है. कहीं खुद झुकना पड़ता है, कहीं दूसरे को झुकाने का प्रयत्न करना पड़ता है. इस सिलसिले में तनवी से बहुत बातें हुई हैं मेरी. उसे भी जिंदगी की ऊंचनीच अब समझ में आने लगी है.’ अनूप के इतना कहने पर भी सुदेश के भीतर संदेह का कीड़ा हमेशा रेंगता रहा. एक तरफ तनवी का दृढ़निश्चयी होना सुदेश को प्रभावित करता था.

दूसरी तरफ उस का अडि़यल रवैया उसे शंकालु भी बनाता था. अपनी सारी शंकाओं को उस दिन रिश्ता पक्का करने से पहले सुदेश ने अनूप के सामने तनवी पर जाहिर भी कर दिया था. तनवी सचमुच गंभीर थी, ‘मैं जैसी हूं, आप जान चुके हैं. विवाह का मतलब मैं अच्छी तरह जानती हूं. बिना समझौते व सामंजस्य के जीवन को नहीं जिया जा सकता, यह भी समझ गई हूं.

मेरी ओर से आप को कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.’ ‘विवाहित जिंदगी में छोटीमोटी नोकझोंक, झगड़े, विवाद होने स्वाभाविक हैं. मैं कोशिश करूंगा, तुम्हारी कसबाई घटनाओं को कभी बीच में न दोहराऊं…उन बातों को तूल न दूं जो बीत चुकी हैं.’ ‘मैं भी कोशिश करूंगी, जिंदगी पूरी तरह नए सिरे से, नई उमंग और नए उत्साह के साथ शुरू करूं…इतिहास दोहराने के लिए नहीं होता, दफन करने के लिए होता है.’ मुसकरा दिया था सुदेश और अनूप भी खुश हो गया था.

अचानक तनवी ने कुछ पूछा तो अतीत की यादों में खोया सुदेश उसे देख कर हंस दिया. उन की शादी को पूरे 8 साल गुजर गए थे. 2 बच्चे थे. शुभा 7 साल की, वैभव 5 साल का. ऐसा नहीं है कि इन 8 सालों में उन के बीच झगड़े नहीं हुए, विवाद नहीं हुए. पर पुराने गड़े मुर्दे जान- बूझ कर न सुदेश ने उखाड़े न तनवी ने उन्हें उखड़ने दिया. जीवन के अंधेरे- उजाले संगसंग गुजारे. Hindi Story

Hindi Story : जिंदगी

Hindi Story : चायनाश्ते और खाने का भी बढि़या इंतजाम है. मतलब, जेब से कुछ खर्च नहीं, फोकट में घूमना हो जाएगा. बस, पार्टी का झंडा भर साथ में ले कर चलना है. मंत्रीजी के प्रताप से मुफ्त में रेलगाड़ी में जाना है.’ मंगरू कुछ कहता, उस से पहले महेंद्र ने उस के कान में मंत्र फूंका था, ‘लगे हाथ किशना से भी मिल लेना. सुना है, गांधी मैदान में कोई होटल खोले बैठा है.’ बात तो ठीक थी. कितने दिन से मंगरू का मन कर रहा था कि बेटे किशना से मिल आए. मगर मौका ही हाथ नहीं लग रहा था, इसलिए वह नेताजी की रैली में शामिल होने के लिए तैयार हो गया था. गाड़ी से उतरते वक्त मंगरू ने जेब में से परची निकाल कर देखी. हां, यही तो पता दिया था किशना का. मगर टे्रन कमबख्त इतनी लेट थी कि दोपहर के बजाय रात 7 बजे पटना स्टेशन पहुंची थी. अब इस समय उसे कहां खोजेगा वह कि उस की जेब में रखा मोबाइल फोन घनघनाने लगा. मंगरू ने लपक कर मोबाइल फोन निकाला और तकरीबन चिल्लाने वाले अंदाज में बोला, ‘‘हां बबुआ, स्टेशन पहुंच गया हूं. अब कहां जाना है?’’

‘स्टेशन से बाहर निकल कर आटोस्टैंड पर आ जाइए,’ किशना बोल रहा था, ‘वहीं से गांधी मैदान के लिए आटोरिकशा पकड़ लेना. 5 मिनट में पहुंचा देगा.’ अपना झोला, लाठी और पोटली संभाल कर मंगरू बाहर निकला. बाहर रेलवे स्टेशन दूधिया रोशनी से नहाया हुआ था. हजारोंलाखों की भीड़ इधरउधर आजा रही थी. उस ने झोले को खोल कर देखा. पार्टी का झंडा सहीसलामत था. एक जोड़ी कपड़ा, गमछा और चनेचबेने भी ठीकठाक थे. किशना की मां ने कुछ पकवान बना कर उस के लिए बांध कर रख दिए थे. आटोरिकशा में बैठा मंगरू आंख फाड़े भागतीदौड़ती, खरीदारी करती, खातीपीती भीड़ को देखता रहा कि ड्राइवर ने उसे टोका, ‘‘आ गया गांधी मैदान. उतरिए न बाबा.’’ आटोस्टैंड की दूसरी तरफ गांधी मैदान के विशाल परिसर को उस ने नजर भर निहारा, ‘बाप रे,’ इतना बड़ा मैदान. बेटे किशना का होटल किधर होगा.’ एक बार फिर मोबाइल घनघनाया, ‘हां, आप गेट के पास ही खड़े रहिए…’ किशना बोल रहा था, ‘मैं आप को लेने वहीं आ रहा हूं.’ मंगरू मैदान के किनारे लोहे के विशाल फाटक के पास खड़ा ही था कि उसे किशना आता दिखा. उसे देख वह लपक कर उस के पास पहुंचा. पैर छूने के बाद किशना ने उसी मैदान में रखी हुई एक बैंच पर बिठा दिया. ‘‘कहां है तुम्हारा होटल?’’ अधीर सा होते हुए मंगरू बोला, ‘‘बहुत मन कर रहा है तुम्हारा होटल देखने का.’’ ‘‘वह भी देख लीजिएगा,’’ किशना कुछ बुझे स्वर में बोला, ‘‘चलिए, पहले कुछ चायनाश्ता तो करवा दूं आप को. ‘‘और हां, वह रहा आप की पार्टी का पंडाल. सुना है, तकरीबन 20 लाख रुपए खर्च हुए हैं पंडाल बनाने में. भोजनपानी और रहने का अच्छा इंतजाम है.’’ एक जगह पूरीसब्जी का नाश्ता करा और चाय पिला कर किशना बोला,

‘‘अब चलिए आप को पंडाल दिखा दूं.’’ ‘‘अरे, रात में तो वहीं रहना है…’’ मंगरू जोश में था, ‘‘आखिर उसी के लिए तो आया हूं. बाकी तुम्हारा गांधी मैदान बहुत बड़ा है.’’ ‘‘शहर भी तो बहुत बड़ा है बाऊजी,’’ किशना बिना लागलपेट के बोला, ‘‘इस शहर में ढेरों मैदान हैं. मगर उन में रात के 10 बजे के बाद कोई नहीं रह सकता. पुलिस पहरा देती है. भगा देती है लोगों को.’’ ‘‘देखो, तुम्हारी माई ने तुम्हारे खाने के लिए कुछ भेजा?है…’’ मंगरू झोले में से पोटली निकालते हुए बोला, ‘‘वह तो थोड़े चावलदाल भी दे रही थी कि लड़का कुछ दिन घर का अनाज पा लेगा. लेकिन मैं ने ही मना कर दिया कि इसे ढो कर कौन ले जाए.’’ ‘‘अच्छा किया आप ने जो नहीं लाए…’’ किशना की आवाज में लड़खड़ाहट सी थी, ‘‘यह शहर है. यहां सबकुछ मिलता है. बस, खरीदने की औकात होनी चाहिए.’’ ‘‘सब ठीक चल रहा है न?’’ ‘‘सब ठीक चल रहा है. कमाई भी ठीकठाक हो जाती है.’’ ‘‘तभी तो हर महीने 2-3 हजार रुपए भेज देते हो.’’ ‘‘भेजना ही है. अपना घर मजबूत रहेगा, तो हम बाहर भी मजबूत रहेंगे. जो काम मिला, वही कर रहा हूं. बाकी नौकरी कहां मिलती है.’’ ‘‘अरे, यह क्या,’’ मंगरू चौंका. एक ठेले के पास 2-4 लड़के कुछकुछ काम कर रहे थे और वहां ग्राहकों की भीड़ लगी थी. एक कड़ाही में पूरी या भटूरे तल रहा था. दूसरा उन्हें प्लेटों में छोले, अचार और नमकमिर्चप्याज के साथ ग्राहकों को दे रहा था. तीसरा जूठे बरतनों को धोने में लगा था, जबकि चौथा रुपएपैसे का लेनदेन कर रहा था. इधर एक तरफ से अनेक ठेलों की लाइनें लगी हुई थीं, जिन पर इडलीडोसा, लिट्टीचोखा, चाटपकौड़े, मोमो, मैगी, अंडेआमलेट और जाने क्या कुछ बिक रहा था. ‘‘यही है हमारा होटल बाऊजी…’’ फीकी हंसी हंसते हुए किशना बोल रहा था, ‘‘ठेके के साइड में पढि़ए. लिखा है ‘किशन छोलाभटूरा स्टौल’. इसी होटलरूपी ठेले से हम 5 जनों का पेट पल रहा है. ‘‘इतना बड़ा गांधी मैदान है. थक जाने पर यहीं कहीं आराम कर लेते हैं.

और रात के वक्त चारों तरफ सूना पड़ जाने पर यह सड़क, यह जगह बहुत बड़ी दिखने लगती है. सो, कहीं भी किसी दुकान के सामने चादर बिछा कर सो जाते हैं.’’ ‘‘यह भी कोई जिंदगी हुई?’’ मंगरू ने पूछा. ‘‘हां बाऊजी, यह भी जिंदगी ही है. बड़े शहरों में लाखों लोग ऐसी ही जिंदगी जीते हैं.’’ ‘‘और वह तुम्हारी पढ़ाई, जिस के पीछे तुम ने पटना में रह कर 7 साल लगाए, हजारों रुपए खर्च हुए.’’ ‘‘आज की पढ़ाई सिर्फ सपने दिखाती है, नौकरी या कामधंधा नहीं देती. मैं ने आप की जिंदगी को नजदीक से देखाजाना है. बस उसे अपनी जिंदगी में उतार लिया और जिंदगी आगे चल पड़ी. यही नहीं, मेरे साथ मेरे 4 साथियों की जिंदगी भी पटरी पर आ गई, नहीं तो यहां लाखों बेरोजगार घूम रहे हैं.’’ मंगरू एकटक कभी किशना को तो कभी गांधी मैदान को देखता रहा. ‘‘यह एक कार्टन है बाऊजी, जिस में आप लोगों के लिए नए कपड़े हैं. छोटे भाईबहनों के लिए खिलौने हैं. इसे साथ ले जाना.’’ थोड़ी देर के बाद किशना मंगरू को गांधी मैदान के पास लगे पार्टी के पंडाल में पहुंचा आया. वहां एक तरफ पुआल के ऊपर दरियां बिछी थीं, जिन पर हजारों लोग लेटे या बैठे हुए थे. पर मंगरू को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. वह वहीं अनमना सा लेट गया, चुपचाप.

Hindi Story : दर्पण

Hindi Story : ‘‘आजकल बड़ा लजीज खाना भेजती हो बेगम,’’ आफिस से आ कर जूते खोलते हुए सुजय ने कहा. ‘‘क्यों, अच्छा खाना न भेजा करूं,’’ मैं ने कहा, ‘‘इन दिनों कुकिंग कोर्स ज्वाइन किया है. सोचा, रोज नईनई डिश भेज कर तुम्हें सरप्राइज दूं.’’ ‘‘शौक से भेजिए सरकार, शौक से. आजकल तो सभी आप के खाने की तारीफ करते हैं,’’ सुजय ने हंस कर कहा. मैं ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘सभी कौन?’’ ‘‘अरे भई, अभी आप यहां किसी को नहीं जानती हैं. हमें यहां आए दिन ही कितने हुए हैं. जब एक बार पार्टी करेंगे तो सब से मुलाकात हो जाएगी. यहां ज्यादातर अधिकारी मैस में ही खाना खाते हैं.

हां, मैं तुम्हें बताना भूल गया था कि निसार भी पिछले हफ्ते ट्रांसफर पर यहीं आ गया है. उसे मेरी सब्जियां बहुत पसंद आती हैं. एक दिन कह रहा था कि जब ठंडे खाने में इतना मजा आता है तो गरम कितना लजीज होगा,’’ सुजय मेरे खाने की तारीफों के पुल बांध रहे थे. मैं ने पूछा, ‘‘यह निसार क्या सरनेम हुआ?’’ ‘‘वह निसार नाम से गजलें लिखता है, वैसे उस का नाम निश्चल है,’’ सुजय ने बताया. ‘‘अच्छा,’’ कह कर मैं चुप हो गई पर चाय के उबाल के साथसाथ मेरे विचारों में भी उबाल आ रहे थे. ‘‘तुम्हें याद नहीं क्या मौली? हमारी शादी में भी निसार आया था.’’ ‘‘हूं, याद है,’’ अतीत की यादें आंधी की तरह दिल के दरवाजे में प्रवेश करने लगी थीं. मुंह दिखाई की रस्म शुरू हो चुकी थी. घर के सभी बड़े, ताऊ, चाचा, मामी, मामा कोई भी उपहार या गहना ले कर आता और पास बैठी छोटी ननद मेरा घूंघट उठा देती. बड़ों को चरण स्पर्श और छोटों को प्रणाम में मैं हाथ जोड़ देती थी. इतना सब करने पर भी मेरी पलकें झुकी ही रहतीं. घूंघट की ओट से अब तक बीसियों अनजान चेहरे देख चुकी थी. अचानक स्टेज के पास निश्चल को देखा तो हैरत में पड़ गई. सोचा, कोई दोस्त होगा, पर वह जब पास आया तो वही अंदाज. ‘भाभी, ऐसे नहीं चलेगा.

आप को मुंह दिखाई के समय आंखें भी दिखानी होंगी. कहीं भेंगीवेंगी आंख वाली तो नहीं?’ कह कर किसी ने घूंघट उठाना चाहा तो आवाज सुन कर मेरा मन हुआ कि आंखें खोल कर पुकारने वाले को देख तो लूं, पर संकोचवश पलक झपक कर रह गए थे. ‘अरे, दुलहन, दिखा दो अपनी आंखें वरना तुम्हारा यह देवर मानने वाला नहीं,’ किसी बूढ़ी औरत का स्वर सुन कर मैं ने आंखें खोल दीं. ऐसा लगा जैसे शिराओं में खून जम सा गया हो. तो यह निश्चल और सुजय आपस में रिश्तेदार हैं. मन ही मन सोचती मैं कई वर्ष पीछे लौट गई थी. निश्चल और कोई नहीं, मेरे स्कूल के दिनों का सहपाठी था जो रिकशे में मेरे साथ जाता था. सारे बच्चे मिल कर धमा- चौकड़ी मचाते थे. इत्तेफाक से कालिज में भी वह साथ रहा और 2-3 बार हमारा पिकनिक भी साथ ही जाना हुआ था. पता नहीं क्यों निश्चल की आंखों की भाषा पढ़ कर हमेशा ऐसा लगता था जैसे उस की आंखें कुछ कहनासुनना चाहती हैं. तब कहां पता था कि एक दिन पापा मेरे रिश्ते के लिए उसी का दरवाजा खटखटाने पहुंचेंगे. निश्चल का बायोडाटा काफी दिनों तक पापा की जेब में पड़ा रहा था. वह उस समय न्यूयार्क में कंप्यूटर इंजीनियर था. 2 महीने बाद भारत आने वाला था. घर वालों को फोटो पसंद आ चुकी थी. बस, जन्मपत्री मिलानी बाकी थी. हरसंभव कोशिशों के बाद भी जन्मपत्री नहीं मिली थी. चूंकि निश्चल के मातापिता जन्मपत्री में विश्वास करते थे इसलिए शादी टल गई थी. उन्हीं दिनों वैवाहिक विज्ञापन के जरिए सुजय से शादी की बात चली. सुजय से जन्मपत्री मिलते ही शादी की रस्म पूरी होगी. ‘‘क्या सोच रही हो, मौली?’’ सुजय की आवाज से मैं अतीत से वर्तमान में आ गई. ‘‘कुछ नहीं,’’ होंठों पर बनावटी हंसी लाते हुए मैं ने कहा.

निश्चल कुछ ज्यादा मजाकिया स्वभाव का है. उस की बातों का बुरा नहीं मानना तुम. वैसे भी बेचारा अकेला है. न्यूयार्क में किसी अमेरिकन लड़की से शादी कर ली थी पर वह छोड़ कर चली गई…’’ उदार हृदय, पति बताते रहे और मैं हूं, हां करती चाय के कप से उड़ती हुई भाप देखती रही. निरीक्षण भवन में सुजय ने पार्टी का इंतजाम कराया था. खाने की प्लेट हाथ में लिए मैं खिड़की से बाहर का नजारा देखने लगी थी. रात के अंधेरे में मकानों की रोशनी आसमान में चमकते सितारों सी जगमगा रही थी. ‘‘आप बिलकुल नहीं बदलीं,’’ किसी ने पीछे से आवाज दी. निश्चल को देख कर मैं चौंक कर बोली, ‘‘आप ने मुझे पहचान लिया?’’ ‘‘लो, जिस के साथ बचपन से जवान हुआ उसे न पहचानने की क्या बात है. तब आप संगमरमर की तरह गोरी थीं, आज दूध की तरह सफेद हैं,’’ निश्चल ने कहा. ‘‘पर समय के साथ शक्ल और यादें दोनों बदल जाती हैं,’’ मैं ने यों ही कह दिया. ‘‘आप गलत कह रही हैं. समय का अंतराल यहां नहीं चल पाया. आप 13 साल पहले भी ऐसी ही थीं,’’ निश्चल ने हंसते हुए कहा तो शर्म से मेरी पलकें झुक गई थीं. तभी किसी को अपने आसपास यह कहते सुना, ‘‘ओहो, इस उम्र में भी क्या ब्लश कर रही हैं आप?’’ सुन कर मेरे गाल लाल हो गए थे. प्लेट रख कर हाथ धोने के बहाने दर्पण में अपना चेहरा देख कर मैं खुद ही शरमा गई थी. जब से निश्चल ने मेरी तारीफ में कसीदे पढ़े, मेरी जिंदगी ही बदल गई. जेहन में बारबार यह सवाल उठते कि क्यों कहा निश्चल ने मुझे संगमरमर की तरह गोरी और दूध की तरह सफेद…तब तो चौराहे की भीड़ की तरह मुझे छोड़ कर निश्चल ने पीछे मुड़ कर देखा तक नहीं और अपना रास्ता ही बदल लिया था.

अब, जब हमारे रास्ते अलग हो गए, मंजिलें बदल गईं फिर उस कहानी को याद दिलाने की जरूरत किसलिए? मुझे किसी से भी किसी बात की शिकायत नहीं है, न क्षोभ न पछतावा, पर नियति ने क्यों मेरी जिंदगी में उस व्यक्ति को सामने खड़ा कर दिया जिस को मैं ने बचपन से चाहा. मैं सोच नहीं पाती, क्यों मन बारबार संयम का बांध तोड़ना चाहता है? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उस से मुलाकात का कोई रास्ता ही न रह जाए. क्लब में तो हर हफ्ते ही मुलाकात होती है. उस पर भी अगर संतोष कर लिया जाए तो ठीक लेकिन गुस्सा तो मुझे अपने ऊपर इसलिए आता था कि जिस का अब जिंदगी से कोई वास्ता नहीं तो फिर क्यों मन उस चीज को पाना चाहता है. क्यों तिरछी बौछार में भीगने की चाहत है, क्या मैं समझती नहीं, निश्चल की आंखों की भाषा? सोचसोच कर मेरी रातों की नींद उड़ने लगी थी. मुलाकातों का सिलसिला अपने आप चलता जा रहा था. अपनी भांजी की शादी में जाना था. व्यस्तताओं के चलते सुजय दिल्ली आ कर मुझे प्लेन में बैठा गए थे. वहीं निश्चल को भी प्लेन में बैठा देख कर मैं हैरान थी कि अचानक उस का कार्यक्रम कैसे बन गया था, मैं समझ नहीं पा रही थी. प्लेन में कई सीटें खाली पड़ी थीं. निश्चल मेरे पास ही आ कर बैठ गया. धरती से हजारों मील ऊपर क्षितिज को अपने बहुत पास देख कर मन पुलकित हो रहा था या निश्चल का साथ पा कर, यह मैं समझ नहीं पा रही थी.

एक दिन पेट में तेज दर्द से अचानक तबीयत खराब हो गई. फोन कर के डाक्टर को घर पर बुला लिया था. उन्होंने ब्लड टेस्ट, अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट देख कर कहा था कि आपरेशन करना पड़ेगा. डाक्टर ने ब्लड का इंतजाम करने को कहा क्योंकि मेरा ब्लड गु्रप ‘ओ पाजिटिव’ था. ‘‘अब क्या होगा?’’ मैं घबरा गई. ‘‘होना क्या है, कोई न कोई दाता तो मिल ही जाएगा,’’ डाक्टर ने कहा. ‘‘यहां कौन है? अभी तो हम ने किसी को खबर भी नहीं दी है,’’ सुजय ने कहा. मैं ने निश्चल को फोन मिलाया. ‘‘क्या कोई खास बात, आप परेशान लग रही हैं, मैं अभी आता हूं,’’ कह कर निश्चल ने फोन रख दिया. 10 मिनट के बाद ही निश्चल मेरे सामने था. उस को देखते ही सुजय ने कहा, ‘‘ब्लड का इंतजाम करना पड़ेगा.’’ निश्चल तुरंत अपना ब्लड टेस्ट कराने चला गया और लौट कर बोला, ‘‘सुनो, तुम्हारा और मेरा एक ही ब्लड गु्रप है.’’ ‘‘काश, घर वाले जन्मपत्री की जगह ‘ब्लड गु्रप’ मिला कर शादी करने की बात सोचते तब तो मैं जरूर ही तुम्हें कहीं न कहीं से ढूंढ़ निकालता.’’ अवाक् सी मैं निश्चल को देखती रह गई. शर्म से मेरे गाल लाल हो गए.

सुजय ने हंस कर कहा, ‘‘फिर तो हम घाटे में रहते.’’ आपरेशन के बाद होश में आने में कई घंटे लग गए थे. पानीपानी कहते हुए मैं ने आंखें खोलीं तो सामने निश्चल को देखा. मेरी आंखें सुजय को तलाश रही थीं. मुझे देख कर निश्चल ने कहा, ‘‘सुजय सब को फोन करने गया है कि आपरेशन ठीक हो गया और होश आ गया है, लेकिन पता है भाभी, आपरेशन के बाद से अब तक सुजय ने एक बूंद पानी तक नहीं पिया है, क्योंकि आप को भी पानी नहीं देना है. वैसे आप को तो ड्रिप चढ़ाई जा रही है,’’ रूमाल से मेरे होंठों को गीला कर के निश्चल बाहर सुजय के इंतजार में खड़ा रहा. निश्चल के कहे शब्दों से मैं अंदर तक हिल गई. जिस दर्पण में भावुक, टूट कर चाहने वाले इनसान का प्रतिबिंब हो उसे मैं खंडित करने की सोच भी नहीं सकती. अगर उस में जरा सी दरार आ जाए तो वह बेकार हो जाता है. अपने मन के दर्पण को मैं खंडित नहीं होने दूंगी. ‘खंडित दर्पण नहीं बनूंगी मैं,’ मन ही मन बुदबुदा रही थी. सुजय की मेरे प्रति आस्था ने मेरी दिशा ही बदल दी. जरा सी दरार जो दर्पण को खंडित कर देती है उस से मैं अपने को संयत कर पाई.

लेखक- मंजरी सक्सेना

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