Hindi story : डर – क्यों मंजू के मन में नफरत जाग गई

Hindi Story : मंजू और श्याम की शादी को 4 साल हो गए थे. जैसा नाम, वैसा रूप. लंबीचौड़ी कदकाठी, पक्के रंग का श्याम पुलिस महकमे की रोबदार नौकरी के चलते मंजू के मातापिता व परिवार को एक नजर में पसंद आ गया. इस तरह वह सुंदर, सुशील व शालीन मंजू का पति बन गया. आम भारतीय पत्नियों की तरह मंजू भी दिल की गहराई से श्याम से प्यार करती थी.

शादी के शुरुआती दिन कपूर की तरह उड़ गए. तकरीबन 2 साल गुजर गए, लेकिन मंजू की गोद हरी न हुई. अब तो घरपरिवार के लोग इशारोंइशारों में पूछने भी लगे. मंजू खुद भी चिंतित रहने लगी, पर श्याम बेफिक्र था.

मंजू ने जब कभी बात छेड़ी भी तो श्याम हंसी में टाल गया. एक दिन तो हद हो गई. उस ने बड़ी बेरहमी से कहा, ‘‘कहां बच्चे के झमेले में डालना चाहती हो? जिंदगी में ऐश करने दो.’’

मंजू को बुरा तो बहुत लगा, पर श्याम के कड़े तेवर देख वह डर गई और चुप हो गई.

शुरू से ही मंजू ने देखा कि श्याम के दफ्तर आनेजाने का कोई तय समय नहीं था. कभीकभी तो वह दूसरे दिन ही घर आता था. खैर, पुलिस की नौकरी में तो यह सब लगा रहता है. पर इधर कुछ अजीब बात हुई. एक दिन श्याम के बैग से ढेर सारी चौकलेट गिरीं. यह देख मंजू हैरान रह गई.

जब मंजू ने श्याम से पूछा तो पहले तो वह गुस्सा हो गया, फिर थोड़ा शांत होते ही बात बदल दी, ‘‘तुम्हारे लिए ही तो लाया हूं.’’

‘लेकिन मुझे तो चौकलेट पसंद ही नहीं हैं और फिर इतनी सारी…’ मन ही मन मंजू ने सोचा. कहीं श्याम गुस्सा न हो जाए, इस डर से वह कुछ नहीं बोली.

डोरबैल बजने से मंजू की नींद टूटी. रात के ढाई बज रहे थे. नशे में धुत्त श्याम घर आया था. आते ही वह बिस्तर पर लुढ़क गया. शराब की बदबू पूरे घर में फैल गई. मंजू की नींद उचट गई. श्याम के मोबाइल फोन पर लगातार मैसेज आ रहे थे.

‘चलो, मैसेज की टोन औफ कर दूं,’ यह सोचते हुए मंजू ने हाथ में मोबाइल फोन लिया ही था कि उस की नजर एक मैसेज पर पड़ी. कोई तसवीर लग रही थी. उस ने मैसेज खोल लिया. किसी गरीब जवान होती लड़की की तसवीर थी. तसवीर के नीचे ‘40,000’ लिखा था.

मंजू का सिर भन्ना गया. वह खुद को रोक नहीं पाई, उस ने सारे मैसेज पढ़ डाले. जिस पति और उस की नौकरी को ले कर वह इतनी समर्पित थी, वह इतना गिरा हुआ निकला. वह अनाथालय की बच्चियों की दलाली करता था.

मंजू खुद को लुटा सा महसूस कर रही थी. उस का पति बड़ेबड़े नेताओं और अनाथालय संचालकों के साथ मिल कर गांवदेहात की गरीब बच्चियों को टौफीचौकलेट दे कर या फिर डराधमका कर शहर के अनाथालय में भरती कराता था और सैक्स रैकेट चलाता था.

प्रेम में अंधी मंजू पति के ऐब को नजरअंदाज करती रही. काश, उसी दिन चौकलेट वाली बात की तह में जाती, शराब पीने पर सवाल उठाती, उस के देरसवेर घर आने पर पूछताछ करती. नहीं, अब नहीं. अब वह अपनी गलती सुधारेगी.

रोजमर्रा की तरह जब श्याम नाश्ता कर के दफ्तर के लिए तैयार होने लगा, तो मंजू ने बात छेड़ी. पहले तो श्याम हैरान रह गया, फिर दरिंदे की तरह मंजू पर उबल पड़ा, ‘‘तुम ने मेरे मैसेज को पढ़ा क्यों? अब तुम सब जान चुकी हो तो अपना मुंह बंद रखना. जैसा चल रहा है चलने दो, वरना तेरी छोटी बहन के साथ भी कुछ गंदा हो सकता है.’’

मंजू को पीटने के बाद धमकी दे कर श्याम घर से निकल गया.

डर, दर्द और बेइज्जती से मंजू बुरी तरह कांप रही थी. सिर से खून बह रहा था. चेहरा बुरी तरह सूजा हुआ था.

श्याम का भयावह चेहरा अभी भी मंजू के दिलोदिमाग पर छाया हुआ था. बारबार उसे अपनी छोटी बहन अंजू का खयाल आ रहा था जो दूसरे शहर के होस्टल में रह कर पढ़ाई कर रही थी.

गरमी और उमस से भरी वह रात भारी थी. बिजली भी कब से गायब थी. इनवर्टर की बैटरी भी जवाब देने लगी थी. इन बाहरी समस्याओं से ज्यादा मंजू अपने भीतर की उथलपुथल से बेचैन थी. क्या करे? औरतों की पहली प्राथमिकता घर की शांति होती है. घर की सुखशांति के लिए चुप रहना ही बेहतर होगा. जैसा चल रहा है, चलने दो… नहीं, दिल इस बात के लिए राजी नहीं था. जिंदगी में ऐसा बुरा दिन आएगा, सोचा न था. कहां तो औलाद की तड़प थी और अब पति से ही नफरत हो रही थी. अभी तक जालिम घर भी नहीं आया, फोन तक नहीं किया. जरूरत भी क्या है?

‘केयरिंग हसबैंड’ का मुलम्मा उतर चुका था. उस की कलई खुल चुकी थी. नहीं आए, वही अच्छा. कहीं फिर पीटा तो? एक बार फिर डर व दर्द से वह बिलबिला उठी. तभी बिजली आ गई. पंखाकूलर चलने लगे तो मंजू को थोड़ी राहत मिली. वह निढाल सी पड़ी सो गई.

सुबह जब नींद खुली तो मंजू का मन एकदम शांत था. एक बार फिर पिछले 24 घंटे के घटनाक्रम पर ध्यान गया. लगा कि अब तक वह जिस श्याम को जानती थी, जिस के प्यार को खो देने से डरती थी, वह तो कभी जिंदगी में था ही नहीं. वह एक शातिर अपराधी निकला, जो उसे और सारे समाज को वरदी की आड़ में धोखा दे रहा था.

एक नई हिम्मत के साथ मंजू ने अपना मोबाइल फोन उठाया. सामने ही श्याम का मैसेज था, ‘घर आने में मुझे 2-3 दिन लग जाएंगे.’

मंजू का मन नफरत से भर गया. वह मोबाइल फोन पर गूगल सर्च करने लगी. थोड़ी ही देर के बाद मंजू फोन पर कह रही थी, ‘‘हैलो, महिला आयोग…’’

Hindi Story: बबली की व्यथा… बब्बन की प्रेमकथा

अपने त्रिलोकीनाथ मामाजी परेशान हैं. उन से भी ज्यादा परेशान मामी त्रिदेवी हैं, जो अपनेआप को श्रीदेवी से कभी कम नहीं समझतीं. हां, तो मामामामी दोनों इसलिए परेशान हैं कि उन के भांजे की धर्मपत्नी बबली परेशान है और इस समय रात के 10 बजे उन के घर बिना भांजे को साथ लिए आ पहुंची है.

मामी की परेशानी बढ़ती जा रही है क्योंकि ‘बबली रात को यहीं रुकेगी’ का डर उन के बदन में कंपकंपी पैदा कर रहा है. वैसे मामामामी दोनों बबली और बब्बन से दो हाथ दूर रहने में ही अपनी सलामती समझते हैं पर आफत कभी फोन कर के तो आती नहीं.

मामी को आज तसल्ली इस बात की है कि हमेशा मामाजी के गले लग कर हंसने वाली बबली मामी के गले लग कर रो रही है.

रोती हुईर् बबली की तरफ देख कर मामाजी दहाड़े, ‘‘तो बब्बन की यह हिम्मत? अपनी सोने जैसी बीवी को छोड़ कर कोयले जैसी काम वाली का हाथ पकड़ता है?’’

‘‘हां मामाजी, सिर्फ हाथ ही नहीं पकड़ता बल्कि चोटी भी पकड़ता है और उसे पे्रमा कह कर बुलाता है. और भी बहुत कुछ कहता है…’’ कहतेकहते बबली रुक गई.

‘‘क्या कहता है वह भूतनीका?’’ मामी ने बब्बन के बहाने अपनी ननद को भी लपेटा. ननदभाभी के बीच होगी कोई पुरानी रंजिश.

‘‘देवी,’’ मामाजी बोले, ‘‘दीदी का इस में क्या दोष? बब्बन के घर तो होलीदीवाली के सिवा आती भी नहीं और हमारे घर आए तो 2-3 साल हो ही गए.’’

वह बहन के बारे में और कुछ कह डालें इस से पहले मामी फिर बोल उठीं, ‘‘अरे वाह, वह कितनी चटोरी हैं ये तो मैं ही जानती हूं. सारी कढ़ी चट कर जाती थीं और नाम मेरा आता था.’’

बबली उन दोनों के बीच कूदते हुए बोली, ‘‘वैसे माताजी तो अच्छी हैं पर मेरे से उन की सेवा नहीं होती है. उन की मरजी का खाना मैं पका नहीं सकती और बेचारी भूखी रह जाती हैं इसलिए जेठानी के घर रहती हैं. गलती मेरी ही है. काश, मैं उन के लिए बढि़या खाना पकाती कुछ नहीं तो कढ़ी ही अच्छी बना लेती तो वह मेरे यहां रहतीं और बब्बन की हिम्मत न पड़ती कि वह काम वाली की राहों में फूल बिछाएं और प्यार में पागल हो जाएं.’’

कल की ही बात है मामाजी, सुनिए, वे बाजार से फूल

खरीद कर लाए थे. सुबह दरवाजे

पर डालते हुए कहने लगे कि प्रेमा के आने का समय हो गया है उस की राहों में फूल बिछा रहा हूं. उस के बिना मेरे दिल को सुकून कहां? दुनिया चाहे इधर की उधर हो जाए…मैं उस का साथ नहीं छोडूंगा. मेरी सुबह, दोपहर और शाम उसी के साथ गुजरेगी. उस जानेमन के बगैर अब चैन कहां रे…’’

‘‘लेकिन बबली, बब्बन की सुबह, दोपहर और शाम उस कलूटी प्रेमवल्ली के साथ गुजरेगी यह बब्बन ने कह दिया लेकिन रात के लिए तो कुछ नहीं कहा,’’ मामी ने ऐसी शक्ल बनाते हुए कहा जैसे बहुत बड़ी ‘रिसर्च’ की हो.

‘‘देवी, तुम्हारा भी जवाब नहीं. मेरे साथ रह कर सोचनेसमझने की शक्ति तुम में भी आ गई, यह बहुत अच्छा हुआ,’’

‘‘अजी, सोचनेसमझने की शक्ति  यदि पहले आ गई होती तो आप से शादी कभी न करती,’’ मामी ने कहा और मामाजी चुप हो गए.

बबली ने बात का सिरा फिर पकड़ लिया और बोली, ‘‘रात अब तक तो मेरे साथ ही गुजर रही है पर कल का क्या पता,’’ कहते हुए बबली ने मामाजी के कंधे का सहारा लिया तो मामी ने फिर उसे अपनी तरफ खींचा.

समस्या वाकई गंभीर थी. आपस में लड़ाईझगड़ा करने का समय नहीं था. बबली और बब्बन की ओछी हरकतों से हमेशा मुसीबत  में फंसने वाले मामामामी आज बबली का साथ दे रहे

थे. कहीं बब्बन

ने बबली को तलाक दे दिया और प्रेमवल्ली के साथ घर

बसा लिया तो रिश्तेदारों में मामामामी की नाक कट जाने का डर था. सभी रिश्तेदार उन्हीं से जवाबतलब करेंगे कि इतना सबकुछ हुआ तो शहर में होते हुए भी आप क्या कर रहे थे?

हुआ यह था कि घर के कामों से जी चुराने वाली बबली ने घर की साफसफाई के साथ खाना बनाने, कपड़े धोने और बाजार से सब्जी आदि लाने के काम के लिए एक काम वाली का सहारा लिया था. उस का पति बब्बन काल सेंटर की नौकरी पर लग गया था. पैसे अच्छे मिल रहे थे. दिन भर वह घर पर ही रहता था. रात को ड्यूटी पर जाता था. बबली या तो किटी पार्टियों में या फिर महल्ले के भजनकीर्तनों में चली जाती थी. घर पर रहती तो टेलीविजन पर आने वाले धारावाहिकों में खोई रहती थी. बब्बन के लिए उस के पास समय ही कहां बचता था. अब दिन भर घर में रह कर बब्बन सोएगा भी कितना? वह चाहता था कि बबली उस के पास बैठे. दो मीठी बातें करे, बढि़या खाना खिलाए, चाय के साथ कभी पकौड़े तो कभी समोसे खिलाए, बाजार घूमने जाए…पर बबली इस में से कुछ भी करती नहीं थी और बब्बन को मन मार कर दिन गुजारना पड़ता था.

एक दिन बबली को लगा कि बब्बन अब पहले से खुश रहने लगा है. वह जब  भी रेडियो पर रोमांटिक गाने आते उन्हें आवाज तेज कर सुनने लगा है. बाजार खरीदारी भी करने जाने लगा है. उस की खुशी का कारण बबली को जल्दी ही पता चल गया. एक दिन बबली ने देखा कि वह बाजार से खरीदारी कर के आ रहा था और उस के स्कूटर के पीछे प्रेमवल्ली हाथ में सब्जी का थैला पकड़े बैठी हुई थी जो अब स्कूटर के रुकते नीचे उतर रही थी. यह दृश्य देखते ही बबली के तनमन में आग लग गई.

‘‘प्रेमवल्ली को स्कूटर पर बैठा कर बाजार क्यों गए?’’ घर में घुसते ही बबली ने सवाल किया.

‘‘पता है, प्रेमवल्ली सब्जीभाजी के बहाने बीच में से कितने पैसे मार लेती है? इसलिए उस को साथ ले कर खुद ही सब्जी लेने चला गया,’’ बब्बन के पास जवाब ‘रेडी’ था.

अब प्रेमवल्ली को घर जाने में देर हो जाती थी तो बब्बन स्कूटर पर बैठा कर उसे छोड़ने भी जाने लगा. बबली के पूछने पर कहता, ‘‘जमाना कितना खराब है. जवान लड़की को इस तरह रात में अकेले कैसे जाने दूं. आखिर हमारी भी तो कुछ जिम्मेदारी बनती है.’’

बबली ने एक दिन बहाने से प्रेमवल्ली को हटा कर दूसरी बूढ़ी काम वाली रख ली लेकिन 2 दिन काम कर के वह चली गई, क्योंकि प्रेमवल्ली ने उस से झगड़ा किया कि मेरा घर तू ने कैसे ले लिया. उस के बाद कोई काम वाली काम करने के लिए राजी नहीं हुई और हार कर बबली को दोबारा प्रेमवल्ली को ही तनख्वाह बढ़ा कर काम पर रखना पड़ा.

अब बब्बन को किसी बहाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. वह रसोई में खड़ा रह कर प्रेमवल्ली से कौफी बनवाता था और वहीं खड़ाखड़ा उस के साथ हंसीठठोली करता हुआ पीता था. खाना भी वहीं खड़ा हो कर अपनी पसंद का बनवाता था और बबली के सामने बैठ कर खाता हुआ उस की तारीफ के पुल बांधता था.

यह सब देखते हुए बबली का घर से निकलना कम हो गया. उधर टेलीविजन पर सीरियल चल रहा होता था पर बबली की आंख और कान घर में चल रहे धारावाहिक की ओर ही होते थे. धीरेधीरे बबली का ध्यान धारावाहिकों से इतना हट गया कि वह सास को बहू और बहू को सास समझ बैठी.

उस दिन तो हद हो गई. बब्बन के पीछे स्कूटर पर बैठी प्रेमवल्ली नीचे उतर रही थी कि ऊंची एड़ी की सैंडिल की वजह से संतुलन खो बैठी और गिरने ही वाली थी कि बब्बन ने उसे कंधे से पकड़ कर संभाल लिया. बबली पहले से ही आगबबूला थी. जब प्रेमवल्ली मटकती हुई घर में घुसी तो बबली चिल्लाई…

‘‘मेरी सैंडिल पहनने की तेरी हिम्मत कैसे हो गई?’’

‘‘अय्यो अम्मां, यह आप का सैंडिल नई है, ये तो बब्बनजी ने मुझ को खरीद के दिया. जा के कमरे में देख लें मैडम, आप का सैंडल वहीं पड़ा होगा.’’

‘‘रहने दे…रहने दे. ज्यादा बकवास मत कर. जा कर अपना काम कर,’’ बबली ने बात छोटी करनी चाही पर बब्बन तो अपने पूरे मूड में था. कहने लगा, ‘‘बबली, आज तो प्रेमा ने कमाल किया. 700 वाली सैंडिल सेल में इस ने 500 रुपए में खरीदी है.’’

‘‘क्या कहा? प्रेमा…अब काम वाली को ‘प्रेमा’ कहा जाने लगा. उसे सब्जी की खरीदारी के बहाने बाजार की सैर करानी शुरू कर दी आज 500 रुपए की मेरे जैसी सैंडिल ले कर दी और वह भी आप को साहब की जगह बब्बनजी कह रही है. यह सब क्या है?’’ बबली दहाड़ी. बब्बन ने बबली को कोई जवाब नहीं दिया और बाथरूम से हाथमुंह धो कर जो निकला तो सीधा रसोई में कौफी पीने चला गया. बबली आने वाले संकट को भांप कर कांप उठी.

उस दिन छुट्टी होने की वजह से बब्बन रात में घर पर ही था. बेडरूम में उस के साथ प्यार से पेश आती बबली उस के बालों को सहलाती हुई कहने लगी, ‘‘हम पहलेपहल प्रयाग में संगम पर मिले थे. कितनी भीड़ थी. कुंभ का मेला था पर दो दिलों का मिलन तो गंगायमुना की तरह हो कर ही रहा. क्यों न हम अपने पहले प्यार को याद करने प्रयाग चले जाएं.’’

‘‘प्रेमा से पूछना पड़ेगा. उस की अम्मां शायद मना कर दे,’’ बब्बन को इस समय भी प्रेमा याद आई.

‘‘यह कैसा मजाक मेरे साथ कर रहे हो?’’ बबली अपने गुस्से पर काबू रखते हुए बोली.

‘‘यह मजाक नहीं है बबलीजी. आप की कसम, मैं सचमुच ही प्रेमा से प्रेम करने लगा हूं. उस की बलखाती लंबी नागिन सी चोटी जब हाथ में लेता हूं तो लगता है इस से बढ़ कर कोई और सहारा क्या होगा? और उस के बालों में अटका फूलों का गजरा तो मुझे इस दुनिया से उठा कर उस दुनिया की सैर कराता है. मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि मैं अब तक उस के बगैर जिंदा कैसे रहा. आप के साथ जो प्यार हुआ था वह प्यार नहीं था बबलीजी, एक धोखा था, बेकार में हम उसे प्यार समझ बैठे. भूल जाइए वह सब और सो जाइए,’’ कहते हुए बब्बन सो गया.

आखिर में यह सोच कर कि गृहस्थी में लगी हुई आग को बुझाने का काम केवल मामाजी ही कर सकते हैं क्योंकि उन के पास हर समस्या का हल होता है,  सोच कर बबली उन की शरण में आ पहुंची थी. रात का समय था, बब्बन नाइट शिफ्ट में चला गया था. आधी रात तो बबली ने बब्बन की प्रेम कहानी सुनाने में ही निकाल दी. प्रेमवल्ली के साथ बब्बन के प्रेमप्रसंग को वह कभी आंखों में आंसू भर कर तो कभी गुस्से की लाली भर कर सुनाती रही. नींद के झोंके आ रहे थे फिर भी मामी जागने की जीतोड़ कोशिश करती रहीं क्योंकि मामाजी का भरोसा नहीं था वह कब बबली के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे अपनी गोदी में सुला दें. जब कहीं मामाजी ही सोने चले गए तब मामी बबली के साथ ड्राइंग रूम में ही सो गईं.

सुबह जब बब्बन घर लौटा और लटकते हुए ताले ने उस का स्वागत किया तो सोचने में ज्यादा समय खर्च किए बगैर वह सीधा मामाजी के यहां चला आया. उस का यहां ठंडा स्वागत हुआ. सुबह का समय था पर किसी ने चाय तक नहीं पूछी. बबली तो अभी तक सो रही थी. बब्बन ढीठ था सीधा रसोई में गया और 3 कप चाय बना लाया. मामामामी को चाय का एकएक कप पकड़ा कर वह खुद भी पीने बैठ गया, साथ में अखबार भी पढ़ने लगा.

‘‘क्यों आया बब्बन?’’ मामाजी ने चुप्पी तोड़ी.

‘‘बबली आ सकती है तो क्या मैं नहीं आ सकता?’’ बब्बन ने अखबार पलटते हुए जवाब दिया.

‘‘तो तू जानता है कि बबली यहां आई है,’’ मामी आड़ातिरछा मुंह बनाते हुए बोलीं.

‘‘आप से ज्यादा मैं बबली को जानता हूं,’’ बब्बन ने अखबार मामाजी को पकड़ाया.

इतने में बबली भी आ धमकी और मामाजी की कुरसी के डंडे पर बैठने लगी थी पर मामी ने पकड़ कर उसे दूसरी कुरसी पर बिठाया. थोड़ी देर खामोशी छाई रही.

‘‘बब्बन, तू अपनेआप को समझता क्या है?’’ मामाजी ने बब्बन की तरफ मोरचा खोला.

‘‘बब्बन ही समझता हूं मामाजी, कोई और नहीं,’’ बब्बन बबली की तरफ देख कर बोला.

‘‘उस कामवल्ली…क्या नाम…प्रेम- वल्ली को इतना मुंह क्यों लगाया है?’’ मामाजी सीधे मुद्दे पर आ गए.

‘‘क्या प्यार करना गुनाह है और आप को पता भी है कि वह मेरी कितनी देखभाल करती है, उस के हाथ का बना इडलीसांबर, करारा डोसा और आलू के परांठे मामाजी खा कर तो देखिए, आप भी उस से प्यार करने लगेंगे,’’ बब्बन ने कहा और उधर मामाजी के मुंह में पानी  आ गया.

‘‘बस कर भूतनीके…’’ मामी ने कहा तो इस बार मामाजी को अपनी बहन की याद नहीं आई. वह मन ही मन प्रेमवल्ली का रेखाचित्र बना रहे थे और उस में इडली का सफेद, सांबर का मटमैला और डोसे का सुनहरा रंग भर रहे थे. आलू के परांठे का बैकग्राउंड उन्हें मनोहारी लग रहा था.

मामाजी की मौन साधना को देख कर मामी आगे बढ़ीं…

‘‘बब्बन, तेरी अक्ल को क्या काठ मार गया? घर में सुंदर, शरीफ, खानदानी बीवी के होते हुए तेरी नजर काम वाली पर कैसे टिक गई नमूने? बेचारी बबली अच्छा हुआ कि यहां चली आई, नहीं तो तेरी इन हरकतों से वह आत्महत्या भी कर सकती थी.’’

‘‘आत्महत्या तो एक बार मामाजी भी करने चले थे…की तो नहीं,’’ बब्बन ने मामाजी पर कटाक्ष किया.

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‘‘बब्बन, तू अपनी हद से गुजर रहा है. मैं आत्महत्या करूं या न करूं, इस से तुझे क्या? तू अपने घर की सोच. घर फूंक कर तमाशा मत देख. माना कि प्रेमवल्ली अच्छा खाना बनाती है, घर साफसुथरा रखती है, बरतनचौका सबकुछ करती है पर उस की बराबरी पत्नी से तो नहीं हो सकती, फिर बबली तुझे कितना प्यार करती है,’’ मामाजी ने समझाने के अंदाज में बब्बन से कहा.

‘‘पत्नी के सिर्फ मन ही मन प्यार करने से या मैं तुम से प्यार करती हूं, कह देने से पेट तो नहीं भरता मामाजी, सुखी गृहस्थी के लिए और भी बहुत कुछ चाहिए होता है. घर का वातावरण आनंददायक होना चाहिए. घर व्यवस्थित होना चाहिए. पति काम पर से घर लौटे तो टीवी बंद कर के पति को चायनाश्ता पूछना चाहिए. कुछ अपनी बातें बतानी चाहिए, कुछ उस की पूछनी चाहिए. अगर अपने हाथ का बना कोई व्यंजन पति को पत्नी प्रेम से खिलाती है तो उसे भी लगता है कि घर में उस का चाहने वाला कोई है.

 

आप ने एक बार कहा था कि किसी के दिल तक पहुंचने का रास्ता पेट से हो कर गुजरता है. बस, प्रेमा उस रास्ते से मेरे दिल तक पहुंच चुकी है. अब बबली के लिए कोई गुंजाइश नहीं है,’’ बब्बन बोला और बबली ने माथा पीट लिया.

‘‘बबली, तू यहां आ कर बैठ. कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा,’’ मामाजी ने बबली को अपनी कुरसी के डंडे पर बिठाया. मामी तिलमिला कर रह गईं.

‘‘देख बब्बन, अगर बबली बढि़या खाना बना कर खिलाए, तेरे साथ गुटरगूं करे और घर में व्यवस्था पूरी तरह बनाए रखे तो क्या तू उस प्रेमवल्ली को दिल से बाहर निकाल सकता है?’’ मामाजी ने पूछा.

‘‘छोडि़ए मामाजी, इस के लिए थोड़े ही बबली राजी होगी?’’ बब्बन तिरछी नजरों से बबली की तरफ देख रहा था.

‘‘मैं तो सबकुछ करने के लिए तैयार हूं मामाजी, यह तो आप की इज्जत का सवाल है. कल को हमारी गृहस्थी धूलमिट्टी में मिल जाती है तो रिश्तेदारी में नाक तो आप ही की कटेगी. मैं ऐसा नहीं होने दूंगी. अच्छा खाना बनाना मुश्किल काम थोड़े ही है, जरा सा ध्यान देना पड़ेगा. मामाजी, आप की इज्जत की खातिर मैं वह सारे व्यंजन बना कर इन को खिलाऊंगी जो प्रेमवल्ली बनाती है. मामाजी सिर्फ…’’ बबली ने गिरने के बाद भी अपनी टांग ऊपर रखी.

‘‘तो काम वाली की कल से छुट्टी?’’ मामाजी ने बब्बन से पूछा.

‘‘उस बेचारी के पेट पर लात क्यों मारनी मामाजी, वह सफाई, बरतन करती रहे.’’ बब्बन ने इस आखिरी दृश्य में सच से परदा उठाते हुए कहा, ‘‘मैं सिर्फ बबली को डराने के लिए ही उस से प्यार करने का दिखावा कर रहा था ताकि वह अपनी जिम्मेदारी समझे.’’

बब्बन ने बबली की तरफ देख कर कहना शुरू किया, ‘‘मामाजी, प्रेमा को मैं सिर्फ महल्ले के नुक्कड़ तक ही स्कूटर पर बैठा कर ले जाता था और वहीं से वापस ले आता था. हां, 500 रुपए की सैंडिल जरूर खरीद कर दी जिस के 250 रुपए वह अपनी तनख्वाह से कटवाने को राजी हुई है, मैं ने न तो कभी उस की चोटी पकड़ी, न तो उस का गजरा सहलाया.

इस तरह बबली के ऊपर आए हुए संकट के बादल छंट गए. ऐसे में मामी और बब्बन ने पिकनिक पर जाने का कार्यक्रम बनाया. मामाजी के बच्चे अब तक कहीं दुबक कर बैठे तमाशा देख रहे थे, वे भी पिकनिक का नाम सुनते ही प्रकट हो गए. पर मामाजी को दाल में कुछ काला नजर आ रहा था. उन के मन में यह आशंका जोर पकड़ती गई कि इस नाटक का कलाकार भले ही बब्बन हो लेकिन लेखक कोई और ही है.

‘‘अभी आ रहा हूं,’’ कह कर मामाजी श्रीमती खोटे के घर आ धमके.

‘‘भाभीजी, सचसच बताइए क्या बब्बन कभी यहां आया था?’’ मामाजी श्रीमती खोटे को घूरते हुए बोले.

‘‘हां, पिछले माह जब आप सपरिवार पर्यटन पर गए हुए थे तब आप के घर पर ताला देख कर वह यहां आया था. बस 5-10 मिनट बैठा था…’’ श्रीमती खोटे मामाजी को बताने लगीं.

‘‘बसबस, मैं समझ गया. ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है कि वह कितनी देर बैठा था,’’ बड़बड़ाते हुए मामाजी चले गए. काफी गुस्से में लग रहे थे.

थोड़ी ही देर में मामाजी के घर का दरवाजा खुला और गरजदार आवाज गूंज उठी, ‘‘निकल जा मेरे घर से…नासपीटे.’’

 

‘‘पर मामाजी, आप के दरवाजे पर ताला देख कर मैं मिसेज खोटे के यहां पूछने गया था…’’

‘‘मैं कुछ सुनना नहीं चाहता. मेरे होते हुए मेरे पड़ोसियों से सलाह लेता है तू?’’ मामाजी बरस रहे थे.

‘‘आप भी तो वहीं से सलाह ले कर मुझे देते. इसलिए मैं सीधे चला गया,’’ बब्बन मिनमिनाया.

‘‘उलटा जवाब देता है, भूतनीके…’’ कह कर मामाजी रुक गए. शायद बहन की याद आ गई.

‘‘अजी, पहले पिकनिक हो आते हैं, बब्बन को तो बाद में भी घर से निकाल सकते हैं,’’ मामी बाहर निकलते हुए बोलीं.

‘‘ठीक है, पिकनिक के बाद तू सीधा अपने घर चला जाएगा,’’ मामाजी का आदेश था.

‘‘बबली भी तेरे साथ ही जाएगी, यहां नहीं आएगी समझे,’’ मामी को डर था शायद बबली वापस आ जाए.

 

डा. अरुणा कपूर

Hindi Story: वो हो गया नाचने वाली का दीवाना

Hindi Story: ‘‘कितना ही कीमती हो… कितना भी खूबसूरत हो… बाजार के सामान से घर सजाया जाता है, घर नहीं बसाया जाता. मौजमस्ती करो… बड़े बाप की औलाद हो… पैसा खर्च करो, मनोरंजन करो और घर आ जाओ.

‘‘मैं ने भी जवानी देखी है, इसलिए नहीं पूछता कि इतनी रात गए घर क्यों आते हो? लेकिन बाजार को घर में लाने की भूल मत करना. धर्म, समाज, जाति, अपने खानदान की इज्जत का ध्यान रखना,’’ ये शब्द एक अरबपति पिता के थे… अपने जवान बेटे के लिए. नसीहत थी. चेतावनी थी.

लेकिन पिछले एक हफ्ते से वह लगातार बाजार की उस नचनिया का नाच देखतेदेखते उस का दीवाना हो चुका था.

वह जानता था कि उस के नाच पर लोग सीटियां बजाते थे, गंदे इशारे करते थे. वह अपनी अदाओं से महफिल की रौनक बढ़ा देती थी. लोग दिल खोल कर पैसे लुटाते थे उस के नाच पर. उस के हावभाव में वह कसक थी, वह लचक थी कि लोग ‘हायहाय’ करते उस के आसपास मंडराते, नाचतेगाते और पैसे फेंकते थे.

वह अच्छी तरह से जानता था कि जवानी से भरपूर उस नचनिया का नाचनागाना पेशा था. लोग मौजमस्ती करते और लौट जाते. लौटा वह भी, लेकिन उस के दिलोदिमाग पर उस नचनिया का जादू चढ़ चुका था. वह लौटा, लेकिन अपने मन में उसे साथ ले कर. उफ, बला की खूबसूरती उस की गजब की अदाएं. लहराती जुल्फें, मस्ती भरी आंखें. गुलाब जैसे होंठ.वह बलखाती कमर, वह बाली उमर. वह दूधिया गोरापन, वह मचलती कमर. हंसती तो लगता चांद निकल आया हो.

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वह नशीला, कातिलाना संगमरमर सा तराशा जिस्म. वह चाल, वह ढाल, वह बनावट. खरा सोना भी लगे फीका. मोतियों से दांत, हीरे सी नाक, कमल से कान, वे उभार और गहराइयां. जैसे अंगूठी में नगीने जड़े हों.

अगले दिन उस ने पूछा, ‘‘कीमत क्या है तुम्हारी?’’

नचनिया ने कहा, ‘‘कीमत मेरे नाच की है. जिस्म की है. तुम महंगे खरीदार लगते हो. खरीद सकते हो मेरी रातें, मेरी जवानी. लेकिन प्यार करने लायक तुम्हारे पास दिल नहीं. और मेरे प्यार के लायक तुम नहीं. जिस्म की कीमत है, मेरे मन की नहीं. कहो, कितने समय के लिए? कितनी रातों के लिए? जब तक मन न भर जाए, रुपए फेंकते रहो और खरीदते रहो.’’

उस ने कहा, ‘‘अकेले तन का मैं क्या करूंगा? मन बेच सकती हो? चंद रातों के लिए नहीं, हमेशा के लिए?’’

नचनिया जोर से हंसते हुए बोली, ‘‘दीवाने लगते हो. घर जाओ. नशा उतर जाए, तो कल फिर आ जाना महफिल सजने पर. ज्यादा पागलपन ठीक नहीं. समाज को, धर्म के ठेकेदारों को मत उकसाओ कि हमारी रोजीरोटी बंद हो जाए. यह महफिल उजाड़ दी जाए. जाओ यहां से मजनू, मैं लैला नहीं नचनिया हूं.’’

पिता को बेटे के पागलपन का पता लगा, तो उन्होंने फिर कहा, ‘‘बेटे, मेले में सैकड़ों दुकानें हैं. वहां एक से बढ़ कर एक खूबसूरत परियां हैं. तुम तो एक ही दुकान में उलझ गए. आगे बढ़ो. और भी रंगीनियां हैं. बहारें ही बहारें हैं. बाजार जाओ. जो पसंद आए खरीदो. लेकिन बाजार में लुटना बेवकूफों का काम है.

‘‘अभी तो तुम ने दुनिया देखनी शुरू की है मेरे बेटे. एक दिल होता है हर आदमी के पास. इसे संभाल कर रखो किसी ऊंचे घराने की लड़की के लिए.’’

लेकिन बेटा क्या करे. नाम ही प्रेम था. प्रेम कर बैठा. वह नचनिया की कातिल निगाहों का शिकार हो चुका था. उस की आंखों की गहराई में प्रेम का दिल डूब चुका था. अगर दिल एक है, तो जान भी तो एक ही है और उसकी जान नचनिया के दिल में कैद हो चुकी थी.

पिता ने अपने दीवान से कहा, ‘‘जाओ, उस नचनिया की कुछ रातें खरीद कर उसे मेरे बेटे को सौंप दो. जिस्म की गरमी उतरते ही खिंचाव खत्म हो जाएगा. दीवानगी का काला साया उतर जाएगा.’’

नचनिया सेठ के फार्महाउस पर थी और प्रेम के सामने थी. तन पर एक भी कपड़ा नहीं था. प्रेम ने उसे सिर से पैर तक देखा.

नचनिया उस के सीने से लग कर बोली, ‘‘रईसजादे, बुझा लो अपनी प्यास. जब तक मन न भर जाए इस खिलौने से, खेलते रहो.’’

प्रेम के जिस्म की गरमी उफान न मार सकी. नचनिया को देख कर उस की रगों का खून ठंडा पड़ चुका था.

उस ने कहा, ‘‘हे नाचने वाली, तुम ने तन को बेपरदा कर दिया है, अब रूह का भी परदा हटा दो. यह जिस्म तो रूह ने ओढ़ा हुआ है… इस जिस्म को हटा दो, ताकि उस रूह को देख सकूं.’’

नचनिया बोली, ‘‘यह पागलपन… यह दीवानगी है. तन का सौदा था, लेकिन तुम्हारा प्यार देख कर मन ही मन, मन से मन को सौसौ सलाम.

‘‘पर खता माफ सरकार, दासी अपनी औकात जानती है. आप भी हद में रहें, तो अच्छा है.’’

प्रेम ने कहा, ‘‘एक रात के लिए जिस्म पाने का नहीं है जुनून. तुम सदासदा के लिए हो सको मेरी ऐसा कोई मोल हो तो कहो?’’

नचनिया ने कहा, ‘‘मेरे शहजादे, यह इश्क मौत है. आग का दरिया पार भी कर जाते, जल कर मर जाते या बच भी जाते. पर मेरे मातापिता, जाति के लोग, सब का खाना खराब होगा. तुम्हारी दीवानगी से जीना हराम होगा.’’

प्रेम ने कहा, ‘‘क्या बाधा है प्रेम में, तुम को पाने में? तुम में खो जाने में? मैं सबकुछ छोड़ने को राजी हूं. अपनी जाति, अपना धर्म, अपना खानदान और दौलत. तुम हां तो कहो. दुनिया बहुत बड़ी है. कहीं भी बसर कर लेंगे.’’

नचनिया ने अपने कपड़े पहनते हुए कहा, ‘‘ये दौलत वाले कहीं भी तलाश कर लेंगे. मैं तन से, मन से तुम्हारी हूं, लेकिन कोई रिश्ता, कोई संबंध हम पर भारी है. मैं लैला तुम मजनू, लेकिन शादी ही क्यों? क्या लाचारी है? यह बगावत होगी. इस की शिकायत होगी. और सजा बेरहम हमारी होगी. क्यों चैनसुकून खोते हो अपना. हकीकत नहीं होता हर सपना. यह कैसी तुम्हारी खुमारी है. भूल जाओ तुम्हें कसम हमारी है.’’

अरबपति पिता को पता चला, तो उन्होंने एकांत में नचनिया को बुलवा कर कहा, ‘‘वह नादान है. नासमझ है. पर तुम तो बाजारू हो. उसे धिक्कारो. समझाओ. न माने तो बेवफाईबेहयाई दिखाओ. कीमत बोलो और अपना बाजार किसी अनजान शहर में लगाओ. अभी दाम दे रहा हूं. मान जाओ.

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‘‘दौलत और ताकत से उलझने की कोशिश करोगी, तो न तुम्हारा बाजार सजेगा, न तुम्हारा घर बचेगा… क्या तुम्हें अपने मातापिता, भाईबहन और अपने समुदाय के लोगों की जिंदगी प्यारी नहीं? क्या तुम्हें उस की जान प्यारी नहीं? कोई कानून की जंजीरों में जकड़ा होगा. कैद में रहेगा जिंदगीभर. कोई पुलिस की मुठभेड़ में मारा जाएगा. कोई गुंडेबदमाशों के कहर का शिकार होगा. क्यों बरबादी की ओर कदम बढ़ा रही हो? तुम्हारा प्रेम सत्ता और दौलत की ताकत से बड़ा तो नहीं है.

‘‘मेरा एक ही बेटा है. उस की एक खता उस की जिंदगी पर कलंक लगा देगी. अगर तुम्हें सच में उस से प्रेम

है, तो उस की जिंदगी की कसम… तुम ही कोई उपाय करो. उसे अपनेआप से दूर हटाओ. मैं जिंदगीभर तुम्हारा कर्जदार रहूंगा.’’

नचनिया ने उदास लहजे में कहा, ‘‘एकांत में यौवन से भरे जिस्म को जिस के कदमों में डाला, उस ने न पीया शबाब का प्याला. उसे तन नहीं मन चाहिए. उसे बाजार नहीं घर चाहिए.

उसे हसीन जिस्म के अंदर छिपा मन का मंदिर चाहिए. उपाय आप करें. मैं खुद रोगी हूं. मैं आप के साथ हूं प्रेम को संवारने के लिए,’’ यह कह कर नचनिया वहां से चली गई.

दौलतमंद पिता ने अपने दीवान से कहा, ‘‘बताओ कुछ ऐसा उपाय, जिस का कोई तोड़ न हो. उफनती नदी पर बांध बनाना है. एक ही झटके में दिल की डोर टूट जाए. कोई और रास्ता न बचे उस नचनिया तक पहुंचने का. उसे बेवफा, दौलत की दीवानी समझ कर वह भूल जाए प्रेमराग और नफरत के बीज उग आए प्रेम की जमीन पर.’’

दीवान ने कहा, ‘‘नौकर हूं आप का. बाकी सारे उपाय नाकाम हो सकते हैं, प्रेम की धार बहुत कंटीली होती है. सब से बड़ा पाप कर रहा हूं बता कर. नमक का हक अदा कर रहा हूं. आप उसे अपनी दासी बना लें. आप की दौलत से आप की रखैल बन कर ही प्रेम उस से मुंह मोड़ सकता है.

‘‘फिर अमीरों का रखैल रखना तो शौक रहा है. कहां किस को पता चलना है. जो चल भी जाए पता, तो आप की अमीरी में चार चांद ही लगेंगे.’’

नचनिया को बुला कर बताया गया. प्रस्ताव सुन कर उसे दौलत भरे दिमाग की नीचता पर गुस्सा भी आया. लेकिन यदि प्रेम को बचाने की यही एक शर्त है, तो उसे सब के हित के लिए स्वीकारना था. उस ने रोरो कर खुद को बारबार चुप कराया. तो वह बन गई अपने दीवाने की नाजायज मां.

प्रेम तक यह खबर पहुंची कि बाजारू थी बिक गई दौलत के लालच में. जिसे तुम्हारी प्रेमिका से पत्नी बनना था, वह रुपए की हवस में तुम्हारे पिता की रखैल बन गई.

प्रेम ने सुना, तो पहली चोट से रो पड़ा वह. पिंजरे में बंद पंछी की तरह फड़फड़ाया, लड़खड़ाया, लड़खड़ा कर गिरा और ऐसा गिरा कि संभल न सका.

वह किस से क्या कहता? क्या पिता से कहता कि मेरी प्रेमिका तुम्हारी हो गई? क्या जमाने से कहता कि पिता

ने मेरे प्रेम को अपना प्रेम बना लिया? क्या समझाता खुद को कि अब वह मेरी प्रेमिका नहीं मेरी नाजायज सौतेली मां है.

वह बोल न सका, तो बोलना बंद कर दिया उस ने. हमेशाहमेशा के लिए खुद को गूंगा बना लिया उस ने.

पिता यह सोच कर हैरान था कि जिंदगीभर पैसा कमाया औलाद की खुशी के लिए. उसी औलाद की जान छीन ली दौलत की धमक से. क्या पता दीवानगी. क्या जाने दिल की दुनिया. प्यार की अहमियत. वह दौलत को ही सबकुछ समझता रहा.

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अब दौलत की कैद में वह अरबपति पिता भटक रहा है अपने पापों का प्रायश्चित्त करते हुए हर रोज. Hindi Story

Hindi Stories: हीरोइन

कहानी-शैलेंद्र सागर

Hindi Stories.स्थानांतरण हमारे जीवन का एक अंग बन चुका था किंतु लखनऊ स्थानांतरण के नाम पर मेरी पत्नी सदैव आतंकित रहती थी. पहले तो सरकारी मकान की दिक्कत और दूसरे, घर पर कामकाज करने वालों की किल्लत. घर के बाकी सब काम तो जैसेतैसे हो जाते थे किंतु बरतन साफ करना, झाड़ू-पोंछा करना ऐसे काम थे जिन्हें सुन कर ही पत्नी का तापमान सामान्य से ऊपर पहुंच जाता था. पूरे घर का वातावरण तनावपूर्ण हो जाता था. दिन भर पत्नी मुझ पर, बच्चों पर और खुद पर भी झल्लाती रहती थी. बच्चों के दोचार थप्पड़ भी लग जाना स्वाभाविक ही था. इसलिए लगभग 5 वर्ष पूर्व जब मैं लखनऊ स्थानांतरित हो कर आया था तो इस आशंका से भयंकर रूप से त्रस्त था.

भागदौड़ कर के दारुलशफा (विधायक निवास) के चक्कर काट कर मुझे कालोनी में मकान मिल गया था. वह मेरे लिए कई दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था. किराए के मकानों की दशा से कौन परिचित नहीं है. खुशामद और सामर्थ्य से परे किराया और दिनप्रतिदिन की कहासुनी. तनाव का एक छोटा हिस्सा मकान मिलने से अवश्य कम हुआ था किंतु उस का अधिकांश भाग तब तक घर पर मंडराता रहा जब तक चौकाबासन करने वाली महरी की व्यवस्था नहीं हो गई.

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वास्तव में पत्नी से अधिक महरी की चिंता मुझे थी. मैं ने लखनऊ आते ही पूछताछ करनी प्रारंभ कर दी थी. आसपास के घरों में सुबहशाम आतीजाती महरीनुमा औरतों पर निगाह रखना शुरू कर दिया था. 1-2 महरियां दीख पड़ीं, लेकिन उन्होंने बात करते ही ‘खाली नहीं’ की तख्ती दिखा दी. एक सप्ताह बाद पत्नी का धैर्य तेज धूप में कच्ची दीवार सा चटखने लगा. 15 दिन बीततेबीतते उस के चेहरे पर तनाव भी परिलक्षित होना स्वाभाविक ही था.

इतनी बड़ी कालोनी में मेरे ही विभाग के अनेक अधिकारी निवास करते थे. धीरेधीरे मैं ने सभी के सामने महरी की समस्या रखी. अंतत: कमला के बारे में मुझे पता चला किंतु सहयोगी अरविंदजी ने मुझे उस की चर्चा के साथ ही सचेत करते हुए कह दिया था, ‘‘भाई, कालोनी की हीरोइन है कमला, एकदम आधुनिका. बड़ी नखरेबाज. उस की हर किसी के साथ निभ पाना संभव नहीं है.’’ मैं ने पत्नी को आ कर सब बता दिया था और कमला को बुलाने का आग्रह किया था.

कमला आई थी तो उसे देख कर मैं भी पहले दिन ही चकित रह गया था. वह देखने में 30 के आसपास थी. सांवला रंग किंतु तीखे नाकनक्श, सलीके से संवरी हुई आकृति और साफसुथरे कपड़े, अंगूठी से घिरी 2 उंगलियां, कलाई में घड़ी और साधारण एड़ी वाली चप्पलें. उसे देख कर यह विश्वास नहीं हुआ कि वह स्त्री घरों में बरतन मांजने और झाड़ ूपोंछे का काम करती थी.

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प्रारंभिक वार्त्ता के बाद कमला ने कार्य प्रारंभ कर दिया था. बाद में पता चला था कि वह इत्तफाक ही था कि एक अधिकारी के स्थानांतरण के फलस्वरूप कमला अभी हाल में ही खाली हुई थी. वरना उस का नियम था कि वह एक ही समय में 5 से अधिक घरों में काम नहीं करती थी.

कमला का काम जहां एक ओर अति स्वच्छ व व्यवस्थित था वहीं दूसरी ओर उस में स्वयं एक सौम्यता व गंभीरता दीख पड़ती थी. घड़ी की सूइयों के साथ वह प्रात: सवा 8 बजे आती थी और 45 मिनट में सारे कार्यों से निवृत्त हो कर चली जाती थी. सायं ठीक सवा 5 बजे कमला घर में घुसती थी और पौने 6 बजे तक घर से निकल जाती थी. न तो वह अधिक बोलती थी और न ही उसे सुनने की कोई आदत थी.

जैसेजैसे समय बीतता गया, हम कमला के बारे में और अधिक जानते गए. उस का पति बीमा कार्यालय में चपरासी था. 3 बच्चे थे उन के. बड़ा लड़का और 2 लड़कियां. कमला को देख कर हम तो यही सोचते थे कि अभी बच्चे छोटे ही होंगे. किंतु मुझे उस दिन घोर आश्चर्य हुआ जब एक 16-17 वर्षीय लड़के ने घर आ कर पूछा था, ‘‘मां आई थीं?’’

‘‘किस की मां?’’ पत्नी ने सकपका कर पूछा था.

‘‘मेरी मां, कमलाजी.’’

‘‘कमला,’’ पत्नी हतप्रभ सी धीरे से मुसकरा दी. फिर सहजता धारण कर के बोली, ‘‘हमारे यहां तो सवा 5 बजे आती है. अभी तो देर है.’’

वह लड़का अभिवादन कर के लौट गया.

पता नहीं क्यों पत्नी के हृदय में एक कुलबुलाहट सी हुई. उस दिन कमला के आने पर पत्नी ने उस के लड़के के आने के बारे में बताते हुए बातों का सिलसिला शुरू कर दिया.

‘‘जी, बीबीजी,’’ कमला ने बताया, ‘‘घर पर अचानक कुछ मेहमान आ गए थे. जल्दी में थे. इसलिए लड़का ढूंढ़ रहा था.’’

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‘‘मगर तुम्हारा लड़का और इतना बड़ा?’’ पत्नी रोक न सकी अपनी जिज्ञासा को.

कमला ने शरम से मुंह नीचे कर लिया. पहली बार उस के चेहरे पर स्मित की लहरें उभर आईं.

‘‘तुम देखने में तो इतनी बड़ी उम्र की नहीं लगती हो?’’ पत्नी ने धीरे से बात बनाई थी.

कमला हंसने लगी. फिर दबे स्वर में बोली, ‘‘बीबीजी, कुछ तो शादी ही जल्दी हो गई थी. वैसे अब 33 की तो हो ही रही हूं.’’

कमला ने आगे बताया था कि उस के पिता बरेली में एक स्कूल में अध्यापक थे. घर में पढ़नेलिखने का वातावरण भी था. कमला की 2 बहनों ने इंटर पास किया था. उन की शादी हो गई थी. छोटा भाई बी.ए. कर के कचहरी में बाबू हो गया था.

कमला जब केवल 15 वर्ष की ही थी तो पड़ोस में रह रहे नवयुवक के प्रेमजाल में फंस कर वह उस के साथ लखनऊ चली आई थी. उस समय वह 9वीं की परीक्षा दे चुकी थी. नवयुवक यानी उस के पति के मामा ने उन्हें शरण दी थी तथा कचहरी में विवाह कराया था. उस का पति हाईस्कूल पास था. मामा ने ही सिफारिश कर के उस की बीमा दफ्तर में नौकरी लगवा दी थी.

कमला के पिता और घर के अन्य सदस्य उस घटना के बाद इतने अपमानित व क्षुब्ध थे कि उन्होंने कमला से सदा के लिए अपने संबंध विच्छेद कर लिए थे. उधर पति के घर वाले भी उतने ही नाराज थे किंतु धीरेधीरे उन से संबंध सुधर गए थे.

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लगभग 1 वर्ष बाद पुत्र का जन्म हुआ था और बाद में 2 लड़कियों का. अब उन में से एक 15 साल की थी और दूसरी 9 साल की.

हमें लखनऊ में आए लगभग 3 साल बीत चुके थे. अब सब व्यवस्थित हो चला था. कमला से कभीकभार खुल कर बातें भी होने लगी थीं किंतु न तो उस के नित्यक्रम में कोई अंतर आया था और न ही उस में.

कमला की कुछ और भी विशिष्टताएं थीं. वह कभी हमारे घर पर कुछ खातीपीती नहीं थी. और तो और वह कभी चाय भी नहीं लेती थी. घर से खाने का कोई सामान स्वीकार न करना और न ही तीजत्योहार पर किसी अतिरिक्त पैसे, कपड़े या वस्तु की मांग करना. प्रारंभ में हमें लगा कि संभवत: महानगर की ऐसी ही प्रथा हो, किंतु बाद में यह भ्रांति भी दूर हो गई.

उस दिन के बाद कमला का लड़का भी कभी हमारे घर नहीं आया था. पता चला था कि वह हाईस्कूल की परीक्षा में 2 बार फेल हो चुका था. अब तीसरी बार परीक्षा दी थी.

कमला की लड़कियों का हमारे घर पर आने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था.

एक दिन जब पत्नी ने कमला से उस की 2 दिन की अनुपस्थिति में किसी लड़की को काम पर भेजने को कहा था तो पहली बार कमला रोष व खीज भरे स्वर में बोली थी, ‘‘नहीं, बीबीजी, मैं अपनी लड़की को नहीं भेज सकती. जो काम मैं उन बच्चों के लिए करती हूं वह उन को करते नहीं देख सकती हूं.’’

उस वर्ष जब हाईस्कूल बोर्ड का परीक्षाफल आया और कमला का लड़का तीसरी बार अनुत्तीर्ण हुआ तो कमला क्षोभ व यंत्रणा से टूटी सी लगती थी. पत्नी के पूछने पर उस के नेत्र छलछला उठे. फिर सिसकियां ले कर रोने लगी. साथ ही भरभराए स्वर में कहने लगी, ‘‘बीबीजी, सिर्फ इन बच्चों के लिए यह काम करना शुरू किया था, जिस से वे अच्छी तरह रह सकें, अच्छा पहनेंखाएं और पढ़लिख कर लायक बन जाएं.’’

कुछ पल शांत रही कमला. फिर बताने लगी, ‘‘बाबूजी, हमारे पूरे खानदान में यह काम किसी ने नहीं किया था, लेकिन मैं ने सिर्फ बच्चों की खातिर यह धंधा अपनाया था.’’

साड़ी का पल्लू निकाल कर कमला ने आंसू पोंछे. फिर आगे बोली, ‘‘मेरा आदमी मुझ से इस धंधे के पीछे बड़ा नाराज हुआ. दुखी भी हुआ. घर के गुजारे लायक उस को पैसा मिलता था. उस के साथ के चपरासी ऐसे ही रह रहे हैं, लेकिन मैं ने जिद कर के यह काम किया. जानती थी कि उस की आमदनी में काम तो चल जाएगा. लेकिन मैं बच्चों को पढ़ालिखा नहीं सकूंगी. उन्हें ठीक तरह नहीं रख पाऊंगी.

‘‘मैं ने मुन्ना को बड़े चाव से पढ़ाना चाहा था, लेकिन वह पढ़ता ही नहीं है. उस के पापा तो पिछले साल ही पढ़ाई बंद करा रहे थे. उसे कपड़े की दुकान पर लगवा भी दिया था, लेकिन मैं ने जिद कर के वह काम छुड़वाया और पढ़ने भेजा.

‘‘आज सुबह जब नतीजा आया तो मुन्ना को तो डांटाडपटा ही मेरे आदमी ने, मुझे भी बुराभला कहा. फिर आज ही मुन्ना काम पर चला गया उस दुकान पर.’’

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कहतेकहते कमला का स्वर बोझिल हो कर टूट सा गया.

‘‘कैसी दुकान है?’’ कुछ देर शांत रह कर कुछ न सूझते हुए पत्नी ने पूछ लिया.

‘‘कपड़े की, जनपथ में है.’’

‘‘कितना देंगे?’’

‘‘यही करीब 300-350 रुपए. मगर बीबीजी, मुझे पैसे का क्या करना है. मुन्ना पढ़ लेता तो जीवन की आस पूरी हो जाती. मेरा यों दरदर ठोकरें खाना सफल हो जाता,’’ कहते हुए कमला की आंखों में एक गीली परत सी जम गई.

कमला की व्यथा सुन कर मैं भी दुखित हो चला था. सचमुच एक विडंबना ही तो थी यह उस की.

उस घटना के बाद कमला दुखी व परेशान सी रहने लगी थी. ऐसा लगता था जैसे कोई दुख उस के हृदय को लगातार बरमे की तरह सालता था. मानो काले बादलों का साया उस के अंतरंग में घुटन सी पैदा कर रहा था. सब काम नियमित रूप से करते हुए भी कमला स्फूर्तिहीन व निस्पंद सी दीख पड़ती थी. कभीकभी यह आशंका होती थी कि कहीं वह काम करना ही न छोड़ दे. किंतु जब 6 माह बीत गए तो पत्नी आश्वस्त हो गई. कमला भी धीरेधीरे सामान्य हो चली थी.

एक दिन कमला ने एक सप्ताह के अवकाश के संबंध में पत्नी से कहा तो उस का आशंकित हो उठना स्वाभाविक था, ‘‘क्या कामवाम छोड़ने का विचार है?’’ अपने संदेह व आशंका को एक धीमी मुसकान से ढांपते हुए पत्नी ने पूछा था.

‘‘नहीं, बीबीजी, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ कमला ने सहजता से उत्तर दिया, ‘‘मेरी लड़की की शादी है.’’

‘‘सचमुच?’’ पत्नी ने अचंभे से कमला को देखा.

‘‘हां, बीबीजी. 17 पूरे कर चली है. लड़का मिल गया है सो शादी पक्की कर डाली है.’’

‘‘ठीक ही तो किया तुम ने.’’

‘‘और करती भी क्या. उस को भी पढ़ाने की लाख कोशिश की, लेकिन 9वीं से आगे नहीं पढ़ सकी. मेरी ही तरह रही,’’ कह कर हंस दी वह, ‘‘मैं ने सोचा कि कुछ और न हो इस से पहले ही उस के हाथ पीले कर दूं और छुट्टी पा लूं.’’

कमला के आग्रह पर हम दोनों विवाह में सम्मिलित हुए थे. पत्नी एक बार पहले भी उस के घर जा चुकी थी. उस ने मुझे कमला के घर के रखरखाव के बारे में बताया था. टीवी, सोफा, खाने की मेजकुरसियां, ड्रेसिंग टेबल, सबकुछ उस के घर में था.

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आज उस का घर देख कर मैं भी चकित रह गया था. शादी का स्तर भी मध्यवर्गीय परिवार जैसा ही था. कहीं कोई कमी नहीं दीख पड़ी. वह सब देख कर जाने क्यों मेरे हृदय में कहीं अंदर अतीव सुख व संतोष की भावना प्रवाहित हो गई थी.

लड़की के विवाह के बाद एक बार फिर हमें ऐसा लगा कि अब कमला अवश्य काम छोड़ देगी, किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ.

एक दिन पत्नी ने मुझे बताया कि कमला मुझ से कोई बात करना चाहती थी. सुन कर मुझे आश्चर्य हुआ. अगले दिन मैं ने स्वयं कमला से पूछा था, ‘‘कमला, तुम्हें कुछ बात करनी थी?’’

‘‘जी, बाबूजी,’’ हाथ धो कर वह मेरे पास आ कर नीचे जमीन पर बैठ गई, ‘‘कुछ काम था.’’

‘‘बोलो?’’ आत्मीयता भरे स्वर में मैं ने इजाजत दी थी.

‘‘छोटी मुन्नी का किसी अच्छे स्कूल में दाखिला करा दीजिए.’’

‘‘किस क्लास में?’’

‘‘जी, उस ने कानवेंट से 5वीं पास की है. क्लास में दूसरे नंबर पर आई है. अब छठी में जाएगी. उस की अध्यापिका उस की बड़ी तारीफ कर रही थीं. कह रही थीं कि मैं उसे खूब पढ़ाऊं. मैं उसे किसी अच्छे अंगरेजी स्कूल या सेंट्रल स्कूल में डालना चाहती हूं. मेरी हिम्मत नहीं पड़ती थी. इसलिए आप से ही विनती करने आई हूं.’’

मैं स्तंभित सा सुनता रहा.

‘‘क्यों नहीं. आज ही ले आओ उसे. मैं ले कर चला जाऊंगा. दाखिला भी करवा दूंगा,’’ मैं ने कमला को आश्वासन दिया.

कमला मेरे पैरों को छूने लगी, ‘‘मुझ पर बड़ा एहसान होगा आप का. यह लड़की पढ़ लेगी तो जीवनभर आप को याद करूंगी.’’

‘‘लेकिन तुम ने कभी बताया ही नहीं कि तुम्हारी लड़की कानवेंट में है और पढ़ने में इतनी अच्छी है.’’

‘‘बाबूजी, क्या बताती, मेरी तो आखिरी आशा है वह. कभी लगता है उस को दूसरों से ज्यादा मेरी ही नजर न लग जाए.’’

मैं सुन कर हंसने लगा. वातावरण की गंभीरता टूट चुकी थी. इसलिए मैं ने पूछ ही लिया, ‘‘मगर तुम ने उसे दोनों बच्चों के बीच कैसे पाला?’’

‘‘बस, बाबूजी, शुरू से छोटी मुन्नी को एकदम अलग ही रखा दोनों बच्चों से. उस के लिए अध्यापक लगाए, पढ़ाने से ज्यादा उस को अलग रखने के लिए. वह जो मांगती है, उसे देती हूं,’’ कुछ क्षण रुक कर फिर धीमे से कहने लगी कमला, ‘‘उसे आज तक यह नहीं मालूम कि मैं क्या काम करती हूं. बाबूजी, हो सकता है कि वह जान कर अच्छे बच्चों में खुल कर घुलमिल न पाए.’’

कमला की आंखें डबडबा उठी थीं. मेरे दिल के तार भी जैसे झंकृत हो उठे थे.

कमला उठ कर अपने काम में लग गई.

तब से मैं भी यह मानता हूं कि कमला वास्तव में हीरोइन है. उस रूप में नहीं जिस में लोग उसे कहतेसमझते हैं बल्कि एक नए अर्थ में, एक नए संदर्भ में. Hindi Stories

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Hindi Story: बिट्टू

Hindi Story.‘‘आज बिट्टू ने बहुत परेशान किया,’’ शिशुसदन की आया ने कहा.

‘‘क्यों बिट्टू, क्या बात है? क्यों इन्हें परेशान किया?’’ अनिता ने बच्चे को गोद में उठा कर चूम लिया और गोद में लिएलिए ही आगे बढ़ गई.

बिट्टू खामोश और उदास था. चुपचाप मां की गोद में चढ़ा इधरउधर देखता रहा. अनिता ने बच्चे की खामोशी महसूस की. उस का बदन छू कर देखा. फिर स्नेहपूर्वक बोली, ‘‘बेटे, आज आप ने मां को प्यार नहीं किया?’’

‘‘नहीं करूंगा,’’ बिट्टू ने गुस्से में गरदन हिला कर कहा.

‘‘क्यों बेटे, आप हम से नाराज हैं?’’

‘‘हां.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’ अनिता ने पूछा और फिर बिट्टू को नीचे उतार कर सब्जी वाले से आलू का भाव पूछा और 1 किलो आलू थैले में डलवाए. कुछ और सब्जी खरीद कर वह बिट्टू की उंगली थामे धीरेधीरे घर की ओर चल दी.

‘‘मां, मैं टाफी लूंगा,’’ बिट्टू ने मचल कर कहा.

‘‘नहीं बेटे, टाफी से दांत खराब हो जाते हैं और खांसी आने लगती है.’’

‘‘फिर बिस्कुट दिला दो.’’

‘‘हां, बिस्कुट ले लो,’’ अनिता ने काजू वाले नमकीन बिस्कुट का पैकेट ले कर  2 बिट्टू को पकड़ा दिए और शेष थैले में डाल लिए.

अनिता बेहद थकी हुई थी. उस की इच्छा हो रही थी कि वह जल्दी से जल्दी घर पहुंच कर बिस्तर पर ढेर हो जाए. पंखे की ठंडी हवा में आंखें मूंदे लेटी रहे और अपने दिलोदिमाग की थकान उतारती रहे. फिर कोई उसे एक प्याला चाय पकड़ा दे और चाय पी कर वह फिर लेट जाए.

लेकिन ऐसा संभव नहीं था. घर जाते ही उसे काम में जुट जाना था. महरी भी 2-3 दिन की छुट्टी पर थी.

यही सब सोचते हुए अनिता घर पहुंची. साड़ी उतार कर एक ओर रख दी और पंखा पूरी गति पर कर के ठंडे फर्श पर लेट गई. बिट्टू ने अपने मोजे और जूते उतारे और उस के ऊपर आ कर बैठ गया.

‘‘मां…’’

‘‘हूं.’’

‘‘कल से मैं वहां नहीं जाऊंगा.’’

‘‘कहां?’’

‘‘वहीं, जहां रोज तुम मुझे छोड़ देती हो. मैं सारा दिन तुम्हारे पास रहूंगा,’’ कहते हुए बिट्टू अपना चेहरा अनिता के गाल से सटा कर लेट गया.

‘‘फिर मैं दफ्तर कैसे जाऊंगी?’’ अनिता ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘मत जाइए,’’ बिट्टू ने मुंह फुला लिया.

‘‘फिर मेरी नौकरी नहीं छूट जाएगी?’’

‘‘छूट जाने दीजिए…लेकिन कल मैं वहां नहीं जाऊंगा.’’

‘‘मत जाना,’’ अनिता ने झुंझलाते हुए कह दिया.

‘‘वादा,’’ बिट्टू ने बात की पुष्टि करनी चाही.

‘‘हां…देखूंगी,’’ कह कर अनिता अतीत में खो गई.

नौकरी करने की अनिता की बिलकुल इच्छा नहीं थी. वह तो घर में ही रहना चाहती थी. और घर में रह कर वह ऐसा काम जरूर करना चाहती थी, जिस से कुछ आर्थिक लाभ होता रहे.

शुरू में उस ने अपनी यह इच्छा अजय पर जाहिर की थी. सुन कर वे बेहद खुश हुए थे और वादा कर लिया था कि वे कोशिश करेंगे कि उसे जल्दी ही कोई काम मिल जाए.

बिट्टू डेढ़ साल का ही था, जब एक दिन अजय खुशी से झूमते हुए आए और बोले, ‘आज मैं बहुत खुश हूं.’

‘क्या हुआ?’ अनिता ने आश्चर्य से पूछा.

‘तुम्हें नौकरी मिल गई है.’

‘क्या?’ उस का मुंह खुला रह गया, ‘लेकिन अभी इतनी जल्दी क्या थी.’

‘क्या कहती हो. नौकरी कहीं पेड़ों पर लगती है कि जब चाहो, तोड़ लो. मिलती हुई नौकरी छोड़ना बेवकूफी है,’ अजय अपनी ही खुशी में डूबे, बोले जा रहे थे. उन्होंने अनिता के उतरे हुए चेहरे की तरफ नहीं देखा था.

‘लेकिन अजय, मैं अभी नौकरी नहीं करना चाहती. बिट्टू अभी बहुत छोटा है. जरा सोचो, भला मैं उसे घर में अकेले किस के पास छोड़ कर जाऊंगी.’

‘तुम इस की चिंता मत करो,’ अजय ने अपनी ही रौ में कहा.

‘क्यों न करूं. जब तक बिट्टू बड़ा नहीं हो जाता, मैं घर से बाहर जा कर नौकरी करने के बारे में सोच भी नहीं सकती.’

‘कैसी पागलों जैसी बातें करती हो.’

‘नहीं, अजय, तुम कुछ भी कहो, मैं बिट्टू को अकेले…’

‘मेरी बात तो सुनो, आजकल कितने ही शिशुसदन खुल गए हैं. वहां नौकरीपेशा महिलाएं अपने बच्चों को सुबह छोड़ जाती हैं और शाम को वापस ले जाती हैं,’ अजय ने मुसकराते हुए कहा.

‘नहीं, मैं अपने बच्चे को अजनबी हाथों में नहीं सौपूंगी,’ अनिता ने परेशान से स्वर में कहा.

‘बिट्टू वहां अकेला थोड़े ही होगा. सुनो, वहां तो 3-4 महीने तक के बच्चे महिलाएं छोड़ जाती हैं. क्या उन्हें अपने बच्चों से प्यार नहीं होता?’ अनिता के सामने कुरसी पर बैठा अजय उसे समझाने की कोशिश कर रहा था.

‘लेकिन…’

‘लेकिन क्या?’ अजय ने झुंझला कर कहा.

अनिता अभी भी असमंजस में पड़ी थी. भला डेढ़ साल का बिट्टू उस के बिना सारा दिन अकेला कैसे रहेगा. यही सोचसोच कर वह परेशान हुई जा रही थी.

‘तुम देखना, 4-5 दिन में ही बिट्टू वहां के बच्चों के साथ ऐसा हिलमिल जाएगा कि फिर घर आने को उस का मन ही नहीं करेगा,’ अजय ने कहा.

लेकिन अनिता का मन ऊहापोह में ही डूबा रहा. वह अपने मन को व्यवस्थित नहीं कर पा रही थी. बिट्टू को अपने से सारे दिन के लिए अलग कर देना उसे बड़ा अजीब सा लग रहा था.

जब पहले दिन अनिता बिट्टू को शिशुसदन छोड़ने गई थी तो वह इस तरह बिलखबिलख कर रोया था कि अनिता की आंखें भर आई थीं. अजय उस का हाथ पकड़ कर खींचते हुए वहां से ले गए थे.

दफ्तर में भी सारा दिन उस का मन नहीं लगा था. उस की इच्छा हो रही थी कि वह सब काम छोड़ कर अपने बच्चे के पास दौड़ी जाए और उसे गोद में उठा कर सीने से लगा ले.

कितना वक्त लगा था अनिता को अपनेआप को समझाने में. शुरूशुरू में वह यह देख कर संतुष्ट थी कि बिट्टू जल्दी ही और बच्चों के साथ हिलमिल गया था. लेकिन इधर कई दिनों से वह देख रही थी कि बिट्टू जैसेजैसे बड़ा होता जा रहा था, कुछ गंभीर दिखने लगा था.

वह जब भी दफ्तर से लौटती तो देखती कि बिट्टू सड़क की ओर निगाहें बिछाए उस का इंतजार कर रहा होता. अपने बेटे की आंखों में उदासी और सूनापन देख कर कभीकभी वह सहम सी जाती.

दरवाजे की घंटी बजी तो अनिता की तंद्रा टूटी. बिट्टू उस के चेहरे पर ही अपना चेहरा टिकाए सो गया था. उसे धीरे से उस ने बिस्तर पर लिटाया और जल्दी से गाउन पहन कर दरवाजा खोला तो अजय ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, आज बड़ी थकीथकी सी लग रही हो?’’

‘‘नहीं, ऐसे ही कुछ…तुम बैठो मैं चाय लाती हूं,’’ अनिता ने कहा और रसोई में आ गई. लेकिन रसोई में घुसते ही वह सिर पकड़ कर बैठ गई. वह भूल ही गई थी कि महरी छुट्टी पर है. सारे बरतन जूठे पड़े थे. उस ने जल्दी से कुछ बरतन धोए और चाय का पानी चढ़ा दिया.

‘‘बिट्टू क्या कर रहा है?’’ चाय का घूंट भरते हुए अजय ने पूछा.

‘‘सो रहा है.’’

‘‘इस समय सो रहा है?’’ सुन कर अजय को आश्चर्य हुआ.

‘‘हां, शायद दोपहर में सोया नहीं होगा,’’ अनिता ने कहा और फिर दो क्षण रुक कर बोली, ‘‘सुनो, आज बिट्टू बहुत परेशान था. उस ने मुझ से ठीक से बात भी नहीं की. बहुत गुमसुम और गंभीर दिखाई दे रहा था.’’

‘‘क्यों?’’ अजय ने हैरानी से पूछा.

‘‘कह रहा था कि मुझे वहां अच्छा नहीं लगता. मैं घर पर ही रहूंगा. दरअसल, वह चाहता है कि मैं सारा दिन उस के पास रहूं,’’ अनिता ने झिझकते हुए कहा.

अजय थोड़ी देर सोचते रहे, फिर बोले, ‘‘तुम खुद ही उस से चिपकी रहना चाहती हो.’’

‘‘क्या कहा तुम ने?’’ अनिता के अंदर जैसे भक्क से आग जल उठी, ‘‘मैं उस की मां हूं, दुश्मन नहीं. फिर तुम्हारी तरह निर्दयी भी नहीं हूं, समझे.’’

‘‘शांत…शांत…गुस्सा मत करो. जरा ठंडे दिमाग से सोचो. इस के अलावा और कोई हल है इस समस्या का?’’

‘‘खैर, छोड़ो इस बात को. तुम जल्दी से तैयार हो जाओ. साहब के लड़के के जन्मदिन पर देने के लिए कोई तोहफा खरीदना है.’’

‘‘तुम चले जाओ, आज मैं नहीं जा पाऊंगी,’’ अनिता उठते हुए बोली.

‘‘तुम्हारी बस यही आदत मुझे अच्छी नहीं लगती. जराजरा सी बात पर मुंह फुला लेती हो. उठो, जल्दी से तैयार हो जाओ.’’

‘‘नहीं, अजय, मुंह फुलाने की बात नहीं है. काम बहुत है. महरी भी छुट्टी पर है. अभी कपड़े भी धोने हैं.’’

‘‘अच्छा फिर रहने दो. मैं ही चला जाता हूं.’’

अनिता चाय के बरतन समेट कर जाने लगी तो अजय ने फिर पुकारा, ‘‘अरे, सुनो.’’

‘‘अब क्या है?’’ उस ने मुड़ कर पूछा.

‘‘जरा देखना, कोई ढंग की कमीज है, पहनने के लिए.’’

‘‘तुम उस की चिंता मत करो,’’ अनिता ने कहा और अंदर चली गई. अजय ने चप्पलें पैरों में डालीं और फिर बिना हाथमुंह धोए ही बाहर निकल गया. अनिता ने बिट्टू को उठा कर नाश्ता कराया और फिर उसे खिलौनों के बीच में बैठा दिया.

घर भर के काम से निबट कर अनिता खड़ी हुई तो देखा, घड़ी 12 बजा रही थी. कमरे में आई तो देखा कि अजय और बिट्टू दोनों फर्श पर गहरी नींद में डूबे हुए हैं. वह भी बत्ती बुझा कर बिट्टू के बगल में लेट गई. शीघ्र ही गहरी नींद ने उसे आ घेरा.

सुबह शिशुसदन जाने के लिए तैयार होते वक्त बिट्टू फिर बिगड़ने लगा, ‘‘मैं वहां नहीं जाऊंगा. मैं घर में ही रहूंगा. बगल वाली चाची को देखो, सारा दिन घर में रहती हैं बबली को वह हमेशा अपने पास रखती हैं. और तुम मुझे हमेशा दूसरों के पास छोड़ देती हो. तुम गंदी मां हो, अच्छी नहीं हो. मैं वहां नहीं जाऊंगा.’’

‘‘हम आप के लिए बहुत सारी चीजें लाएंगे. जिद नहीं करते बिट्टू. फिर तुम अकेले तो वहां नहीं होते. वहां कितने सारे तुम्हारे दोस्त होते हैं. सब के साथ खेलते हो. कितना अच्छा लगता होगा,’’ अनिता ने समझाने के लहजे में कहा.

‘‘नहीं, मुझे अच्छा नहीं लगता. मैं वहां नहीं जाऊंगा. आया डांटती रहती है. कल मेरी निकर खराब हो गई थी. मैं ने जानबूझ कर थोड़े ही खराब की थी.’’

‘‘हम आया को डांट देंगे. चलो, जल्दी उठो. देर हो रही है. जूतेमोजे पहनो.’’

‘‘मैं यहीं लेटा रहूंगा?’’ बिट्टू जमीन पर फैल गया.

अनिता को अब खीझ सी होती जा रही थी, ‘‘बिट्टू, जल्दी से उठ जा, वरना पिताजी बहुत गुस्सा होंगे. दफ्तर को भी देर हो रही है.’’

‘‘होने दो,’’ बिट्टू ने चीख कर कहा और दूसरी तरफ पलट गया. अनिता बारबार घड़ी देख रही थी. उसे गुस्सा आ रहा था, पर वह गुस्से को दबा कर बिट्टू को समझाने की कोशिश कर रही थी.

‘‘अरे भई, क्या बात है, कितनी देर लगाओगी?’’ बाहर से अजय ने पुकारा.

‘‘बस, 2 मिनट में आ रही हूं,’’ अनिता ने चीख कर अंदर से जवाब दिया और बिट्टू से बोली, ‘‘देख, अब जल्दी से उठ जा, नहीं तो मैं तुझे थप्पड़ मार दूंगी.’’

‘‘नहीं उठूंगा,’’ बिट्टू चिल्लाया.

‘‘नहीं उठेगा?’’

‘‘नहीं…नहीं…नहीं जाऊंगा…तुम जाओ…मैं यहीं रहूंगा.’’

‘तड़ाक.’ अनिता ने गुस्से से एक जोरदार तमाचा उस के गाल पर दे मारा, ‘‘अब उठता है कि नहीं, या लगाऊं दोचार और…’’

अनिता का गुस्से से भरा चेहरा देख कर और थप्पड़ खा कर बिट्टू सहम गया.

वह धीरे से उठ कर बैठ गया और डबडबाई आंखों से अनिता की ओर देखने लगा. फिर चुपचाप उठ कर जूतेमोजे पहनने लगा. अनिता उस का हाथ पकड़ कर करीबकरीब घसीटते हुए बाहर आई. दरवाजे पर ताला लगाया और स्कूटर पर पीछे बैठ गई. हमेशा की तरह बिट्टू आगे खड़ा हो गया.

शिशुसदन में छोड़ते वक्त अनिता ने बिट्टू को प्यार किया और अपना गाल उस की तरफ बढ़ा दिया पर बिट्टू ने अपना मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया और आगे बढ़ गया.

‘‘अच्छा बिट्टू,’’ अनिता ने हाथ हिलाया पर बिट्टू ने मुड़ कर भी नहीं देखा.

अनिता को आघात लगा, ‘‘बिट्टू,’’ उस ने फिर पुकारा.

‘‘अब चलो भी. पहले ही इतनी देर हो गई है,’’ अजय ने अनिता का हाथ पकड़ कर लगभग घसीटते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा कोई भी काम समय से नहीं होता,’’ स्कूटर स्टार्ट करते हुए उस ने अनिता की ओर देखा.

वह अभी भी बिट्टू को जाते हुए देख रही थी.

‘‘अब बैठो न, खड़ीखड़ी क्या देख रही हो. तुम औरतों में तो बस यही खराबी होती है. जराजरा सी बात पर परेशान हो जाती हो,’’ अजय ने झल्लाते हुए कहा.

पर अनिता अब भी वैसे ही खड़ी थी, मानो उस ने अजय की आवाज को सुना ही न हो.

‘‘तुम चलती हो या मैं अकेला चला जाऊं?’’ अजय दांत पीसते हुए बोला.

लेकिन अनिता जैसे वहां हो कर भी नहीं थी. उस की आंखों में बिट्टू का सहमा हुआ चेहरा और उस की निरीह खामोशी तैर रही थी. वह सोच रही थी, बिट्टू छोटा है, हमारे वश में है. क्या इसी लिए हमें यह अधिकार मिल जाता है कि हम उस के जायज हक को भी इस तरह ठुकरा दें.

‘‘सुना नहीं…मैं ने क्या कहा?’’ अजय ने चिल्लाते हुए कहा तो अनिता चौंक गई.

‘‘नहीं…मैं कहीं नहीं जाऊंगी,’’ अनिता ने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा.

‘‘क्या? तुम्हारा दिमाग तो सही है.’’

‘‘हां, बिलकुल सही है,’’ अनिता ने कोमल स्वर में कहा, ‘‘सुनो, हम ने उसे पैदा कर के उस पर कोई एहसान नहीं किया है. अपने सुख और अपनी खुशियों के लिए उसे जन्म दिया है. क्या हमारा यह फर्ज नहीं बनता कि हम भी उस की खुशियों और उस के सुख का ध्यान रखें?

‘‘अजय, मैं घर पर ही रहूंगी. मैं नहीं चाहती कि अभी से उस के दिल में मांबाप के प्रति नफरत की चिंगारी पैदा हो जाए और फिर मांबाप का प्यार पाना उस का हक है. मैं नहीं चाहती कि उस के कोमल मनमस्तिष्क पर कोई गांठ पड़े. मैं उतने पैसे में ही काम चला लूंगी जितना तुम्हें मिलता है पर बिट्टू को उस के अधिकार मिलने ही चाहिए.’’

‘‘तो तुम्हें नहीं जाना?’’

‘‘नहीं,’’ अनिता ने दृढ़ स्वर में कहा.

अजय ने स्कूटर स्टार्ट किया और तेजी के साथ दूर निकल गया. अनिता धीमे कदमों से वापस लौट गई. उस का मन अब बेहद शांत था. उसे अपने निर्णय पर कोई दुख नहीं था. Hindi Story.

Short Story: मेरो मदन गोपाल

Short Story. रामपुरा गांव में बैरागिन माताश्री के सत्संग का काफी प्रचार हो रहा था. इस से पहले शहर में 7 दिन तक उन्होंने भागवत कथा की धूम मचा रखी थी. माताश्री से दीक्षा लेने के लिए लोगों की कतारें लग गई थीं. ईर्ष्यावश कृष्ण मंदिर के पुजारी के मुंह से निकल ही गया, ‘‘घर का जोगी जोगड़ा, बाहर का जोगी सिद्ध…माताश्री ने 7 दिन में ही लगभग 2 लाख रुपए बटोर लिए हैं. हमें कोई ससुरा 21 या 51 रुपए से ज्यादा दक्षिणा नहीं देता.’’

रामपुरा गांव के पहले के जमींदार और अब के सरपंच स्वरूप सिंह ने भी माताश्री की कथा को सुना था. उन के मन में भक्ति रस की लहरों ने जोर मारा तो अपने गांव में भी कथा करवाने की जिद सी ठान ली. उन के छोटे भाई योगेश और बेटे मनोज ने बहुत समझाया कि इन ढकोसलों में कुछ नहीं रखा. पर स्वरूप सिंह ने किसी की एक न मानी. माताश्री बड़ी मुश्किल से 21 हजार रुपए दक्षिणा पाने के प्रस्ताव पर 3 दिन तक सत्संग करने को राजी हुईं.

कथास्थल को काफी भव्य रूप प्रदान किया गया था. सुसज्जित मंच की शोभा देखने लायक थी. आसपास के 5-6 गांवों की भीड़ जमा हो गई थी. सुनने वालों के लिए रंगबिरंगे शामियाने तान दिए गए थे. रोशनी की जगमगाहट में पूरा माहौल भक्ति रस में डूबने को तैयार था. 7 बजे के लगभग भजनकीर्तन आरंभ हुआ. उस के बाद माताश्री के प्रवचन ने भक्तों को काफी प्रभावित किया. इस के बाद कीर्तन मंडली ने फिर से अपना रंग जमाया.

अलगअलग साजों के संग नईनई फिल्मी तर्जों पर तैयार किए गए भजनों को सुन कर पंडाल में बैठे ग्रामीण झूमझूम कर तालियां बजाने लगे. ‘धूम मचा दे…धूम मचा दे…’ गीत की तर्ज पर गाए भजन पर तो आगे बैठे 7-8 युवक मस्ती में ठुमके लगाने लगे. कार्यक्रम समाप्त होने से पहले माताश्री ने एक भजन गाया…

‘मेरो मदन गोपाल…मेरो मदन गोपाल…

सोनाचांदी मैं ना चाहूं ना चाहूं धनमाल…

मेरो मदन गोपाल…’

माताश्री के सुरीले कंठ से गाए गए इस भजन ने श्रोताओं को पूरी तरह सम्मोहित कर दिया. कथा की समाप्ति पर एक वृद्धा बोल उठी, ‘‘माताश्री कितना त्यागमय जीवन जी रही हैं. कोई लोभलालच नहीं, कोई ऐशोआराम नहीं…किसी तरह की सुखसुविधा की इच्छा नहीं…’’

माताश्री के रात्रि विश्राम के लिए सरपंच के सड़क किनारे बने नए दो- मंजिला मकान में शानदार प्रबंध था. भोजन में पुलाव, 3 सब्जियां, दाल, पूरी व खीर आदि का इंतजाम था.

दूसरे दिन भी रात में सत्संग का वैसा ही कार्यक्रम था, पर तीसरे दिन गड़बड़ हो गई. लगभग 70 किलोमीटर दूर के कसबे से फोन आया कि सरपंचजी के ससुर इस दुनिया से कूच कर गए हैं. अत: वे पत्नी के संग ससुराल जाने की तैयारी करने लगे. जातेजाते सरपंच अपने छोटे भाई और बेटे को समझा गए कि सत्संग में विघ्न नहीं पड़ना चाहिए. उन्हें डर था कि भाई और बेटा कोई चाल न चल जाएं, अत: भेंटपूजा के रूप में वस्त्र, मिठाई, फलों की 2 टोकरियां और 21 हजार रुपए माताश्री को उसी समय देते गए.

तीसरे दिन ठीक समय पर माताश्री का प्रवचन शुरू हुआ. फिर लगभग 1 घंटे तक श्रोताओं ने भजनों का आनंद लिया. कथा समाप्ति पर श्रोता घरों को लौटने लगे. अचानक सभी लोग पंडाल में प्रवेश करती बैलगाड़ी को कौतुक से देखने लगे. सरपंच के बेटे मनोज ने माताश्री के समक्ष जा कर हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘हमारे पापों को क्षमा करें…आप को विश्रामस्थल तक पहुंचाने के लिए हम ने नाहक ही कार का इस्तेमाल किया. आप के त्यागमयी शरीर को इस से कितना कष्ट हुआ होगा. चलिए, अब बैलगाड़ी में सवार हो जाइए, मौसम भी खराब है…किसी समय भी बरसात हो सकती है.’’

माताश्री और उन की मुख्य शिष्या क्रोध में भुनभुनाती हुई बैलगाड़ी पर सवार हो गईं. भजनमंडली पैदल चलने लगी.

माताश्री अभी पहले सदमे से उबरी भी नहीं थीं कि एक दूसरा हृदय विदारक दृश्य उन की आंखों के सामने साकार हो उठा. बैलगाड़ी खेत के किनारे बनी एक झोंपड़ी के सामने जा कर रुक गई. अब तो माताश्री से रहा न गया, गुस्से में उबलती हुई तीखी आवाज में बोलीं, ‘‘तुम्हारे पिता के आग्रह को हम ठुकरा न सके. अगर मालूम होता कि ऐसे भक्त के घर में कंस जैसा बेटा और रावण जैसा भाई मौजूद हैं तो 21 क्या, हम 51 हजार रुपए में भी इस ओर न झांकते. बच्चे, तुम अभी हमारी हस्ती से परिचित नहीं हो.’’

‘‘शांत, माताश्री, शांत…आप स्वयं ही भजन गा रही थीं कि ‘नहीं चाहिए महल चौबारे, रहूं झोंपड़ी में खुशहाल…’ अत: हम ने सोचा, चौबारे में पलंग पर बिछे मखमली गद्दे पर लेटने से आप की आत्मा को कितना कष्ट झेलना पड़ा होगा. अब आप स्वयं सोचिए, हम भला यह पाप क्योंकर करते?’’ सरपंच के भाई योगेश की व्यंग्य भरी वाणी सुन कर साथ खड़े युवक अपनी हंसी न रोक सके.

तभी 2 सूखी रोटियों और मूंग की दाल से सजी थाली को माताश्री के सामने रखते हुए मनोज ने धीरे से कहा, ‘‘क्षमा करें, हम ने 2 दिन तक हलवा, पूरी, पनीर और खीर खिला कर आप के साथ घोर अन्याय किया है. जैसा कि आप भजन गा रही थीं कि ‘खाने को न चाहिए हलवा पूरी, दो रोटी व मूंग की दाल…’ अत: आप की उसी फरमाइश को ध्यान में रखते हुए हम ने यह सादा व पवित्र भोजन तैयार करवाया है. धन्य हैं आप और धन्य हैं आप का त्यागमय जीवन…आप वास्तव में महान हैं…’’

‘‘शंभू,’’ माताश्री ने अपने ड्राइवर की ओर क्रोध से देखा, ‘‘तुम भी इन पापियों की बातें सुन कर दांत फाड़ रहे हो…जल्दी से अपनी गाड़ी ले कर आओ.’’

तभी एक देहाती ने ऊंचे स्वर में गाया, ‘‘अब तो हो गया बुरा हाल, टूट गई जोग की तलवार और बैराग की ढाल, मेरो तो मदन गोपाल…मेरो तो मदन गोपाल.’’

इन पंक्तियों को सुन कर सभी ने जोरदार ठहाका लगाया.

माताश्री शीघ्र ही अपनी मंडली के संग गांव से ही विदा नहीं हुईं, शहर के मंदिर में रखा बोरियाबिस्तर समेट कर रातोंरात वहां से भी नौ दो ग्यारह हो गईं. वह जानती थीं कि गांव की घटना तरहतरह के मिर्चमसालों के संग सुबह होतेहोते पूरे शहर में फैल चुकी होगी. अत: ऐसी स्थिति में भय, लज्जा और अपमान से बचने के लिए वे जल्द से जल्द वहां से बहुत दूर निकल जाना चाहती थीं.

कुछ दिनों बाद पता लगा, माताश्री की शादी उन के ड्राइवर शंभू से हो गई. दोबारा बैलगाड़ी पर न चढ़ना पड़े, लगता है माताश्री ने इस का पूरा इंतजाम कर लिया था. Short Story

Hindi Kahani: मजाक – लॉकडाउन: शटर डाउन  

Hindi Kahani: सुरेश सौरभ अपनी परचून की दुकान के बाहर दुकानदार बैठा है. उस की दुकान का शटर डाउन है. जैसे ही कोई ग्राहक सामने से दिखता है, उसे रोक कर वह फौरन दुकान की साइड वाली खिड़की से अंदर जा कर, उसी खिड़की से धीरेधीरे सामान सरकाते  हुए अपने ग्राहक को फौरन ही निबटा  देता है. ज्वैलरी वाला अपनी दुकान के खाली पड़े प्लाट में बैठा है.

वह अपने 1-1 परमानैंट कस्टमर को फोन करकर के बुला रहा है. अपने बैग में रखे जेवर दिखादिखा कर ग्राहकों को धीरेधीरे निबटा रहा है. उस की दुकान का शटर डाउन है. दूध डेरी खुली है, सरकारी आदेश पर. उस के पास में मिठाई वाले की दुकान बंद है. मिठाई वाले ने डेरी वाले को कमीशन बेस पर अपनी मिठाइयां सौंप दी हैं.  डेरी वाले ने कपड़े से उस की सारी मिठाइयां ढक दी हैं. अब अपने दूध के साथ उस की मिठाइयों को भी ग्राहकों तक पहुंचाने का सुफल हासिल कर रहा है.

मोटर साइकिल का पंचर बनाने वाला भला आदमी अपनी दुकान के पास ही सुलभ शौचालय के नजदीक कुरसी डाले मजे से बैठा है. वहां से अपनी दुकान के आसपास जब किसी पंचर गाड़ी वाले को ठिठकते देखता है, तो वह वैसे ही उस कस्टमर को सीटी बजा कर इशारे से बुलाता है और उस की सारी टैंशन का समाधान करने के लिए पास ही की एक पतली गली के अंदर उसे ले कर समा जाता है.

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सरकारी छूट पर ही फलों की रेहड़ी जहांतहां लगी है. उस रेहड़ी वाले से गोलगप्पे वाले ने तय शर्तों पर अपने कुछ भगौने उस की रेहड़ी पर रख दिए हैं, जिन में ताजा गोलगप्पे और गोलगप्पों में भरने के लिए मसाला, पानी, मटर, आलू आदि रखा है.  जो कस्टमर फल लेने आता, उन में से कुछ ग्राहकों को गोलगप्पे वाला पकड़ कर निबटा देता है. दूर से पता यही चल रहा है कि फल का ठेला लगा है. होटल वालों ने तो अपना शटर डाउन कर के नाश्तेखाने की होम डिलीवरी शुरू कर दी है. चाट, डोसे के ठेलेस्टाल  वालों ने अपने घर पर ही धंधा शुरू कर दिया है.

अपनेअपने महल्ले में घरघर जा कर कह दिया है, अगर ताजा चाट और डोसा खाना है, तो धीरेधीरे सरकते हुए हमारे घर तक आने की जहमत करें. उन के यहां सोशल डिस्टैंसिंग का पालन करते हुए धीरेधीरे कस्टमर आ रहे हैं. इसी तरह मीट और चिकन वालों ने भी अपनीअपनी दुकानों का शटर डाउन कर के अपने घरों पर ही धंधा शुरू कर दिया है, सारे कस्टमर फोन से बुलाए जा रहे हैं और धड़ाधड़ माल की सप्लाई हो रही है. कपड़े की दुकान का शटर डाउन है.

बंद शटर की रखवाली में बाहर गार्ड बैठा है. अगर भूलाबिसरा कस्टमर कोई आ जाए, तो वह गार्ड उसे पीछे के दरवाजे से अंदर दुकान में भेज देता है, जहां  कपड़ों की खरीदारी चल रही है. ‘‘पैंट की चैन बनवा लो, बैग की चैन लगवा लो…’’ यह चिल्लाते हुए एक आदमी मेरी कालोनी में अपने गले में बैग डाले घूम रहा था.  मैं ने उस से पूछा, ‘‘लौकडाउन का नियम तोड़ कर दुकानदारी क्यों कर रहे हो मेरे भाई?’’ वह बोला, ‘‘धंधे के टाइम में डिस्टर्ब न करो बड़े भाई.

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मेरे लिए जब सरकार की कोई गाइडलाइन ही नहीं है, तो मेरे लिए काहे का लौकडाउन…’’ शौपिंग माल वालों की मेन रोड पर दुकानें धुआंधार चल रही थीं. लौकडाउन के बाद उन का शटर डाउन है. अब वे पतलीपतली संकरी गलियों में परचून दुकान की तरह अपनी छोटीछोटी ब्रांचें डाल रहे हैं, जहां खिड़कियों से सामान सप्लाई हो रहा है, क्योंकि सयाने कहते हैं कि खिड़कियों से सामान आसानी से निकाला यानी बेचा जा सकता है और इस से पुलिस से सौ फीसदी तक बचा जा सकता है. Hindi Kahani

Short Story: कोरोना के तांत्रिक बाबा

लेखक- रंगनाथ द्विवेदी

Short Story: कोरोना के तांत्रिक बाबा मंगरू के 2 चेले भी थे, जिन का नाम खुर्शीद और संजय था. वे दोनों अपने काम में इतने माहिर थे कि कभीकभी तो तांत्रिक गुरु मंगरू की भी खाट खड़ी कर देते थे और इस समय तो कोरोना वायरस जैसी महामारी के चलते इन के तंत्रमंत्र के खेत की फसल खूब लहलहा रही है.

तांत्रिक बाबा के दोनों चेलों ने कोरोना वायरस के तंत्रमंत्र से इलाज से पहले अपने पास रखी पुरानी इनसानी खोपड़ी और हाथ की हड्डी को फेंक कर कब्रिस्तान से एक मजबूत व नई हड्डी और खोपड़ी को ला कर धोयापोंछा और उस का बढि़या सा मेकअप कर दिया. उसी गांव की ही एक औरत थी, जो तांत्रिक बाबा मंगरू की पुरानी और काफी खेलीखाई हुई कमीशन पर काम करने वाली एजेंट थी. वह दूसरी औरतों को  झाड़फूंक के नाम पर फुसलाने में माहिर थी.

तांत्रिक मंगरू के दोनों चेलों ने उस औरत से मिल कर पूरी योजना सम झाई और कहा कि वह शाम तक 10-12 औरतों का इंतजाम कर के उन्हें मंगरू से मिलवाए और यह बताए कि वे बहुत पहुंचे हुए तांत्रिक हैं, जिन्होंने बड़ेबड़े भूतप्रेत के अलावा कोरोना की भी शैतानी बाधा पर अपनी घोर शैतानी तपस्या से जीत पा ली है. उन्होंने तमाम घरगांव से न जाने कितने लोगों को कोरोना की शैतानी ताकत से नजात दिलाई है और वहां से हमेशा के लिए कोरोना को खत्म कर दिया है.

उन्होंने यह भी बताने को कहा कि कोरोना के तांत्रिक बाबा बंगाल, असम की तंत्र साधना जानने के अलावा लाल किताब के भी बड़े पहुंचे हुए जानकार हैं. वे एक हफ्ते तक ही इस गांव में रुकेंगे, फिर एक अनजानी अंधेरी गुफा में कोरोना के शैतान को मंत्र से बांधने के लिए चले जाएंगे. रात को तकरीबन 9 बजे वह औरत 20 औरतों के साथ बाबा मंगरू के आश्रम में आई. उस आश्रम में घुसते ही जैसे सभी औरतों की बुद्धि 50 फीसदी कोरोना के तांत्रिक बाबा मंगरू के वश में हो गई. इस की वजह थी अंदर का फैला वह धुआं, जो औरतें सम झ रही थीं कि जादू था.

कोरोना के तांत्रिक बाबा मंगरू भी अपनी तंत्रमंत्र के उस ड्रैस में थे, जो अकसर किसी सुपरहिट भुतहा फिल्म के तांत्रिकों की होती है. इतना ही नहीं, उन्होंने अपने पास तंत्रमंत्र साधना के वे सभी अस्त्रशस्त्र भी रखे हुए थे, जिन्हें देख कर कोई साधारण आदमी बुरी तरह से डर जाए.

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कोरोना के तांत्रिक बाबा मंगरू ने अपने घनघोर नाटकीय अंदाज में  कोरोना वायरस की ऐसीतैसी कर देने के लिए सिंदूर से एक लाल सुर्ख आड़ीतिरछी रेखा खींची, जो देखने से ही बहुत डरावनी लग रही थी. उस में से ऐसी चमक निकल रही थी, मानो वहां कोई रोशनी हो गई हो. फिर मुरदे की हड्डी से उस सिंदूरी रेखा के चारों तरफ अपने हाथों को घुमाना, चीखना, खोपड़ी को छूना, 3 नीबू, एक कागज में रखी लौंग, कपूर, अगरबत्ती… यह कोरोना वायरस को तंत्रमंत्र और इस देश से भगाने की उठापटक का एक अजीब सा सीन था.

तभी बाबा की चेली वह औरत अपने फिक्स तांत्रिक व नाटकीय तरीके से बाल खोले गाली देती हुई सिंदूर वाले घेरे के पास पहुंची और जोरजोर से अजीबअजीब आवाजें निकालने लगी. सारी औरतें एकटक डरीसहमी सी उस को देखने लगीं.

तभी वह औरत उठी और कोरोना के तांत्रिक बाबा मंगरू से उल झ गई. तांत्रिक जैसे हवा में कोरोना वायरस रूपी शैतान और उस के आसपास की चुड़ैलों को कहने लगा, ‘‘जा… मेरे तंत्रमंत्र को चैलेंज मत कर, नहीं तो तुम्हें नष्ट कर दूंगा…’’

इतना कहते ही कोरोना के तांत्रिक बाबा मंगरू ने पास में रखी हुई राख उस औरत पर फेंकी और हाथ से श्मशान वाली हड्डी से उसे पीटा. वह औरत गुर्राते हुए बेहोश हो गई.

उस औरत के बेहोश होते ही कोरोना के तांत्रिक बाबा मंगरू ने अपने तांत्रिक चेलों से चाकू मांगा, फिर उस चाकू से तीनों नीबू में से एक नीबू को काटा तो लाल खून बहने लगा. इस से वहां मौजूद तमाम औरतों को लगा जैसे उस औरत के अंदर बैठे कोरोना के शैतान व उस के साथ की चुड़ैल को बाबा ने अपने चाकू से काट दिया हो.

उस खून को उन्होंने सिंदूर में मिलाया, फिर दूसरे नीबू को उस औरत के ऊपर काट कर निचोड़ा तो वह औरत अचानक सकपका कर उठी, फिर इस के बाद उस ने कहा, ‘‘मैं कहां हूं? मु झे  क्या हुआ?’’

उस औरत के इतना पूछते ही कोरोना के तांत्रिक बाबा मंगरू ने  झट से तीसरा नीबू काट कर उस खोपड़ी के ऊपर निचोड़ दिया. इतना करते ही वह खोपड़ी और भी खतरनाक और डरावनी दिखने लगी.

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फिर बाबा मंगरू के दोनों चेले पैसे ऐंठने के अपने हुनर का इस्तेमाल करने लगे. जब वे इस काम को निबटा कर फारिग हुए, उस के तुरंत बाद ही वह औरत भी अपना हिस्सा लेने आ गई. ज्यों ही उसे अपने हिस्से का पैसा मिला, वह खिलखिला कर हंस पड़ी और बोली, ‘‘ये औरतें भी कितनी बेवकूफ होती हैं. अगर ये न हों तो इस तरह कमाने का मौका ही न मिले,’’ इतना कह कर वह अपने घर चली आई.

इस के बाद उस गांव से कोरोना वायरस के शैतान को तंत्रमंत्र से भगाने  के नाम पर बाबा मंगरू ने अपने दोनों चेलों और उस औरत की मिलीभगत से 80,000 रुपए ऐंठ लिए, जबकि वे जानते थे कि कोरोना का इलाज डाक्टर ही कर सकते हैं. Short Story

Hindi Story: लौकडाउन स्पेशल – मालती

लेखक- हीरा लाल मिश्र

Hindi Story: तेजा के शराब पीने की लत से मालती परेशान थी. लाख कोशिशों के बाद भी तेजा शराब पी कर घर आता तो कलह मचा देता था. एक दिन मालती को कुछ नहीं सूझा तो उस ने एक कड़ा फैसला ले लिया. क्या करना चाहती थी मालती?

कदमों के लड़खड़ाने और कुंडी खटखटाने की आवाज सुन कर मालती चौकन्नी हो उठी और बड़बड़ाई, ‘‘आज फिर…?’’

आंखों में नींद तो थी ही नहीं. झटपट दरवाजा खोला. तेजा को दुख और नफरत से ताकते हुए वह बुदबुदाई, ‘‘क्या करूं? इन का इस शराब से पिंड छूटे तो कैसे?’’

‘‘ऐसे क्या ताक रही है? मैं… कोई तमाशा हूं क्या…? क्या… मैं… कोई भूत हूं?’’ तेजा बहकती आवाज में बड़बड़ाया.

‘‘नहीं, कुछ नहीं…’’ कुछ कदम पीछे हट कर मालती बोली.

‘‘तो फिर… एं… तमाशा ही हूं… न? बोलती… क्यों नहीं…? ’’ कहता हुआ तेजा धड़ाम से सामने रखी चौकी पर पसर गया.

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मालती झटपट रसोईघर से एक गिलास पानी ले आई.

तेजा की ओर पानी का गिलास बढ़ा कर मालती बोली, ‘‘लो, पानी पी लो.’’

‘‘पी… लो? पी कर तो आया हूं… कितना… पी लूं? अपने पैसे से पीया… अकबर ने भी पिला दी… अब तुम भी पिलाने… चली हो…’’

मालती कुछ बोलती कि तेजा ने उस के हाथ से गिलास झपट कर दीवार पर पटकते हुए चिल्लाया, ‘‘मजाक करती है…एं… मजाक करती है मुझ से… पति के साथ… मजाक करती है. …पानी… पानी… देती है,’’ तेजा उठ कर मालती की ओर बढ़ा.

मालती सहम कर पीछे हटी ही थी कि तेजा डगमगाता हुआ सामने की मेज से जा टकराया. मेज एक तरफ उलट गई. मेज पर रखा सारा सामान जोर की आवाज के साथ नीचे बिखर गया. खुद उस का सिर दीवार से जा टकराया और गुस्से में बड़बड़ाता हुआ वह मालती की ओर झपट पड़ा.

मालती को सामने न पा कर तेजा फर्श पर बैठ कर फूटफूट कर रोने लगा.

तेजा के सामने से हट कर मालती एक कोने में दुबकी खड़ी थी. उसे काटो तो खून नहीं. वह एकटक नशे में धुत्त अपने पति को देख रही थी. उस का कलेजा फटा जा रहा था.

तेजा के रोने की आवाज सुन कर बगल के कमरे में सोए दोनों बच्चों की नींद टूट गई. आंखें मलती 10 साल की मुन्नी और उस के पीछे 8 साल का बेटा रमेश पिता की ऐसी हालत देख कर हैरानपरेशान थे.

पिता के इस तरह के बरताव के वे दोनों आदी थे. आज पिता के रोने से उन्हें बड़ी तकलीफ हो रही थी, पर मां के गालों से लुढ़कते आंसुओं को देख कर वे और भी दुखी हो गए.

बेटी मुन्नी मां का हाथ पकड़

कर रोने लगी. रमेश डरासहमा कभी बाप को देखता, तो कभी मां के आंसुओं को.

तेजा को लड़खड़ा कर खड़ा होता देख तीनों का कलेजा पसीज गया.

तभी तेजा मालती पर झपट पड़ा, ‘‘मुझे भूख नहीं लगती क्या?… तुझे मार डालूंगा… तुम ने मुझे नीचे… गिरा दिया और… आंसू बहा रही है… झूठमूठ

के आंसू… तुम ने मुझे मारा… मैं ने

तेरा क्या बिगाड़ा?… एं… क्या बिगाड़ा… बता…?’’

मालती के बाल उस के हाथों

की गिरफ्त में आ गए. वह उन्हें छुड़ाने की नाकाम कोशिश करने लगी. बेटी मुन्नी जोरों से रोने लगी. रमेश अपने पिता का हाथ अपने नन्हे हाथों से पकड़ कर हटाने की नाकाम कोशिश करने लगा.

मालती ने चिल्ला कर रमेश को मना किया, पर वह नहीं माना. इस बीच तेजा ने रमेश को धक्का दे कर नीचे गिरा दिया. उस का सिर फर्श से टकराया और देखते ही देखते खून का फव्वारा फूट पड़ा.

खून देख कर मालती बदहवास हो कर चिल्ला पड़ी, ‘‘खून… रमेश… मेरे बेटे के सिर से खून…’’

खून देख कर तेजा का हाथ ढीला पड़ा.

मालती और मुन्नी दहाड़ें मार कर रोने लगीं. पड़ोसियों ने आ कर सारा माजरा देखा और रमेश को अस्पताल ले जा कर मरहमपट्टी करवाई. खाना रसोईघर में यों ही पड़ा रहा. मालती रातभर रमेश को सीने से लगाए रोती रही. नींद आंखों से गायब थी.

अपनी औलाद के लिए घुटघुट कर जीने के लिए मजबूर थी मालती. मन ही मन उस ने तेजा से हार मान ली थी. हालात से समझौता कर मालती ने मान लिया था कि यही उस की किस्मत में लिखा है.

पर, तेजा ने शराब से हार नहीं मानी. रात के अंधेरे में तेजा राक्षस बन कर घर में कुहराम मचाता, तो दिन की रोशनी में भले आदमी की तरह मुसकान बिखेरता मालती और बेटीबेटे को लाड़प्यार करता. ऐसा लगता कि जैसे रात में कुछ हुआ ही नहीं. पर अंदर ही अंदर मालती की घुटन एक चिनगारी का रूप लेने लगी थी.

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एक दिन तो मालती की खिलाफत ने अजीब रंग दिखाया. उस दिन मालती ने दोनों बच्चों को स्कूल जाने से रोक दिया.

तेजा ने पूछा, ‘‘क्या आज स्कूल बंद है? ये तैयार क्यों नहीं हो रहे हैं?’’

‘‘नहीं, मेरी तबीयत ठीक नहीं है. इसी वजह से इन्हें रोक लिया,’’ मालती गंभीर हो कर बोली.

‘‘तो मैं आज काम पर नहीं जाता. तुम्हारे पास रहूंगा. इन्हें जाने दो,’’ तेजा बोला.

‘‘नहीं, ये आज नहीं जाएंगे. मेरे पास ही रहेंगे,’’ मालती बोली.

‘‘जैसी तुम्हारी मरजी. ज्यादा तबीयत खराब हो, तो मुझे बुलवा लेना. डाक्टर के  पास ले जाऊंगा,’’ तेजा बड़े प्यार से बोला.

मालती और बच्चों को छोड़ तेजा काम पर चला गया.

एक घंटे बाद मालती ने मुन्नी के हाथों शराब की भट्ठी से 4 बोतल शराब मंगवाई. दरवाजा बंद कर धीरेधीरे एक बोतल वह खुद पी गई. फिर मुन्नी व रमेश को पिलाने लगी. मुन्नी ज्यादा पीने की वजह से रोने लगी.

रमेश भी रोता हुआ बड़बड़ाने लगा, ‘‘मम्मी, अच्छी नहीं लग रही है. अब मत पिलाओ मम्मी.’’

‘‘पी लो, थोड़ी और पी लो… देखो, मैं भी तो पी रही हूं…’’ रुकरुक कर मालती बोली और दोनों के मुंह में पूरा गिलास उडे़ल दिया. दोनों ही फर्श पर निढाल हो कर गिर पड़े. मालती ने दूसरी बोतल भी पी डाली और वह भी फर्श पर लुढ़क गई.

थोड़ी देर बाद बच्चे उलटी करने लगे और चिल्लाने लगे.

बच्चों की दर्दभरी कराह और चिल्लाहट सुन कर पड़ोसी दरवाजा तोड़ कर घर में घुसे. वहां की हालत देख कर सभी हैरान रह गए. कमरे में शराब की बदबू पा कर उन्हें समझते देर नहीं लगी कि तेजा की हरकतों से तंग आ कर ही मालती ने ऐसा किया है.

पड़ोसियों ने तीनों को अस्पताल पहुंचाया.

खबर पा कर तेजा अस्पताल की ओर भागा. मालती और बच्चों का हाल देख कर वह पछाड़ खा कर गिर पड़ा और फूटफूट कर रोने लगा.

‘‘बचा लो भैया… इन्हें बचा लो… मेरी मालती को बचा लो… मेरे बच्चों को बचा लो…’’ कहता हुआ तेजा अपनी छाती पीट रहा था.

‘‘और शराब पियो तेजा… और पियो… और जुल्म करो अपने बीवीबच्चों पर… देख लिया…’’ एक पड़ोसी ने गुस्साते हुए कहा.

‘‘नहीं, नहीं… मैं कुसूरवार हूं… मेरी वजह से ही यह सब हुआ… उस ने कई बार मुझे समझाने की कोशिश की, पर मैं ही अपनी शराब की बुरी आदत की वजह से मामले को समझ नहीं पाया,’’ रोतेरोते तेजा बोला.

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करीब एक घंटे बाद डाक्टर ने आ कर बताया कि दोनों बच्चे तो ठीक हैं, पर मालती ने दम तोड़ दिया है. उसे बचाया नहीं जा सका. उस पर शराब के  असर के अलावा दिमागी दबाव बहुत ज्यादा था.

तेजा फूटफूट कर रोने लगा. उसे अक्ल तो आ गई थी, पर इतनी अच्छी बीवी को खोने के बाद. Hindi Story

Romantic Story: ठोकर – क्या इश्क में अंधी लाली खुद को संभाल पाई

Romantic Story: सतपाल गहरी नींद में सोया हुआ था. उस की पत्नी उर्मिला ने उसे जगाने की कोशिश की. वह इतनी ऊंची आवाज में बोली थी कि साथ में सोया उस का 5 साला बेटा जंबू भी जाग गया था. वह डरी निगाहों से मां को देखने लगा था. ‘‘क्या हो गया? रात को तो चैन से सोने दिया करो. क्यों जगाया मुझे?’’ सतपाल उखड़ी आवाज में उर्मिला पर बरस पड़ा.

‘‘बाहर गेट पर कोई खड़ा है. जोरजोर से डोर बैल बजा रहा है. पता नहीं, इतनी रात को कौन आ गया है? मुझे तो डर लग रहा है,’’ उर्मिला ने घबराई आवाज में बताया. ‘‘अरे, इस में डरने की क्या बात है? गेट खोल कर देख लो. तुम सतपाल की घरवाली हो. हमारे नाम से तो बड़ेबड़े भूतप्रेत भाग जाते हैं.’’

‘‘तुम ही जा कर देखो. मुझे तो डर लग रहा है. पता नहीं, कोई चोरडाकू न आ गया हो. तुम भी हाथ में तलवार ले कर जाना,’’ उर्मिला ने सहमी आवाज में सलाह दी. सतपाल ने चारपाई छोड़ दी. उस ने एक डंडा उठाया. गेट के करीब पहुंच कर उस ने गेट के ऊपर से झांक कर देखा, तो कांप उठा. बाहर उस की छोटी बहन खड़ी सिसक रही थी.

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सतपाल ने हैरानी भरे लहजे में पूछा, ‘‘अरे लाली, तू? घर में तो सब ठीक है न?’’

लाली कुछ नहीं बोल पाई. बस, गहरीगहरी हिचकियां ले कर रोने लगी. सतपाल ने देखा कि लाली के चेहरे पर मारपीट के निशान थे. सिर के बाल बिखरे हुए थे.

सतपाल लाली को बैडरूम में ले आया. वह बारबार लाली से पूछने की कोशिश कर रहा था कि ऐसा क्या हुआ कि उसे आधी रात को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा? उर्मिला ने बुरा सा मुंह बनाया और पैर पटकते हुए दूसरे कमरे में चली गई. उसे लाली के प्रति जरा भी हमदर्दी नहीं थी.

लाली की शादी आज से 10 साल पहले इसी शहर में हुई थी. तब उस के मम्मीपापा जिंदा थे. लाली का पति दुकानदार था. काम अच्छा चल रहा था. घर में लाली की सास थी, 2 ननदें भी थीं. उन की शादी हो चुकी थी. लाली के पति अजय ने उसे पहली रात को साफसाफ शब्दों में समझा दिया था कि उस की मां बीमार रहती हैं. उन के प्रति बरती गई लापरवाही को वह सहन नहीं करेगा.

लाली ने पति के सामने तो हामी भर दी थी, मगर अमल में नहीं लाई. कुछ दिनों बाद अजय ने सतपाल के सामने शिकायत की.

जब सतपाल ने लाली से बात की, तो वह बुरी तरह भड़क उठी. उस ने तो अजय की शिकायत को पूरी तरह नकार दिया. उलटे अजय पर ही नामर्दी का आरोप लगा दिया.

अजय ने अपने ऊपर नामर्द होने का आरोप सुना, तो वह सतपाल के साथ डाक्टर के पास पहुंचा. अपनी डाक्टरी जांच करा कर रिपोर्ट उस के सामने रखी, तो सतपाल को लाली पर बेहद गुस्सा आया. उस ने डांटडपट कर लाली को ससुराल भेज दिया. लाली ससुराल तो आ गई, मगर उस ने पति और सास की अनदेखी जारी रखी. उस ने अपनी जिम्मेदारियों को महसूस नहीं किया. अपने दोस्तों के साथ मोबाइल पर बातें करना जारी रखा.

आखिरकार जब अजय को दुकान बंद कर के अपनी मां की देखभाल के लिए घर पर रहने को मजबूर होना पड़ा, तब उस ने अपनी आंखों से देखा कि लाली कितनी देर तक मोबाइल फोन पर न जाने किसकिस से बातें करती थी. एक दिन अजय ने लाली से पूछ ही लिया कि वह इतनी देर से किस से बातें कर रही थी?

पहले तो लाली कुछ भी बताने को तैयार नहीं हुई, पर जब अजय गुस्से से भर उठा, तो लाली ने अपने भाई सतपाल का नाम ले लिया. उस समय तो अजय खामोश हो गया, क्योंकि उसे मां को अस्पताल ले जाना था. जब वह टैक्सी से अस्पताल की तरफ जा रहा था, तब उस ने सतपाल से पूछा, तो उस ने इनकार कर दिया कि उस के पास लाली का कोई फोन नहीं आया था.

अजय 2 घंटे बाद वापस घर में आया, तो लाली को मोबाइल फोन पर खिलखिला कर बातें करते देख बुरी तरह सुलग उठा था. उस ने तेजी से लपक कर लाली के हाथ से मोबाइल छीन कर 4-5 घूंसे जमा दिए. लाली चीखतीचिल्लाती पासपड़ोस की औरतों को अपनी मदद के लिए बुलाने को घर से बाहर निकल आई.

अजय ने उसी नंबर पर फोन मिलाया, जिस पर लाली बात कर रही थी. दूसरी तरफ से किसी अनजान मर्द की आवाज उभरी. अजय की आवाज सुनते ही दूसरी तरफ से कनैक्शन कट गया.

अजय ने दोबारा नंबर मिला कर पूछने की कोशिश की, तो दूसरी तरफ से मोबाइल स्विच औफ हो गया. अजय ने लाली से पूछा, तो उस ने भी सही जवाब नहीं दिया.

अजय का गुस्से से भरा चेहरा भयानक होने लगा. उस के जबड़े भिंचने लगे. वह ऐसी आशिकमिजाजी कतई सहन नहीं करेगा. लाली घबरा उठी. उसे लगा कि अगर वह अजय के सामने रही और किसी दोस्त का फोन आ गया, तो यकीनन उस की खैरियत नहीं. उस ने उसी समय जरूरी सामान से अपना बैग भरा और अपने मायके आ गई.

लाली ने घर आ कर अजय और उस की मां पर तरहतरह के आरोप लगा कर ससुराल जाने से मना कर दिया. कई महीनों तक वह अपने मायके में ही रही. अजय भी उसे लेने नहीं आया. इसी तनातनी में एक साल गुजर गया. आखिरकार अजय ही लाली को लेने आया. उस ने शर्त रखी कि लाली को मन लगा कर घर का काम करना होगा. वह पराए मर्दों से मोबाइल फोन पर बेवजह बातें नहीं करेगी.

सतपाल ने बहुत समझाया, मगर लाली नहीं मानी. लाली का तलाक हो गया. सतपाल ने उस के लिए 2 लड़के देखे, मगर वे उसे पसंद नहीं आए.

दरअसल, लाली ने शराब का एक ठेकेदार पसंद कर रखा था. उस का शहर की 4-5 दुकानों में हिस्सा था. वह शहर का बदनाम अपराधी था, मगर लाली को पसंद था. काफी अरसे से लाली का उस ठेकेदार जोरावर से इश्क चल रहा था. जोरावर सतपाल को भी पसंद नहीं था, मगर इश्क में अंधी लाली की जिद के सामने वह मजबूर था. उस की शादी जोरावर से करा दी गई.

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जोरावर शराब के कारोबार में केवल 10 पैसे का हिस्सेदार था, बाकी 90 पैसे दूसरे हिस्सेदारों के थे. उस की कमाई लाखों में नहीं हजारों रुपए में थी. वह जुआ खेलने और शराब पीने का शौकीन था. वह लाली को खुला खर्चा नहीं दे पाता था. अब तो लाली को पेट भरने के भी लाले पड़ गए. उस ने जोरावर से अपने खर्च की मांग रखी, तो उस ने जिस्म

बेच कर पैसा कमाने का रास्ता दिखाया. लाली ने मना किया, तो जोरावर ने घर में ही शराब बेचने का रास्ता सुझा दिया. अब लाली करती भी क्या. अपना मायका भी उस ने गंवा लिया था. जाती भी कहां? उस ने शराब बेचने का धंधा शुरू कर दिया. उस का जवान गदराया बदन देख कर मनचले शराब खरीदने लाली के पास आने लगे. उस का कारोबार अच्छा चल निकला.

जोरावर को लगा कि लाली खूब माल कमा रही है, तो उस ने अपना हिस्सा मांगना शुरू कर दिया. लाली ने पैसा देने से इनकार कर दिया. उस रात दोनों में झगड़ा हुआ. लाली जमा किए तमाम रुपए एक पुराने बैग में भर कर घर से भाग निकली. जोरावर ने देख लिया था. वह भी पीछेपीछे तलवार हाथ में लिए भागा. वह किसी भी सूरत में लाली से रुपए लेना चाहता था.

जोरावर नशे में था. उस के हाथों में तलवार चमक रही थी. वह उस की हत्या कर के भी सारा रुपया हासिल करना चाहता था. लाली बदहवास सी भागती हुई सड़क पर आ गई. उस ने पीछे मुड़ कर देखा, तो जोरावर तलवार लिए उस की तरफ भाग रहा था. उस ने बचतेबचाते सड़क पार कर ली.

लेकिन जब जोरावर सड़क पार करने लगा, तो वह किसी बड़ी गाड़ी की चपेट में आ गया और मारा गया. रात के 3 बज रहे थे. किसी ने भी जोरावर की लाश की तरफ ध्यान तक नहीं दिया.

सतपाल के यहां आ कर लाली ने रोतेसिसकते अपनी दुखभरी दास्तान सुनाई, तो सतपाल की भी आंखें भर आईं. मगर उसी पल उस ने अपनी बहन की गलतियां गिनाईं, जिन की वजह से उस की यह हालत हुई थी. ‘‘हां भैया, अजय का कोई कुसूर नहीं है. मैं ने ही अपनी गलतियों की सजा पाई है. अजय ने तो हर बार मुझे समझाने, सही रास्ते पर लाने की कोशिश की थी, इसलिए अब भी मैं अजय के पास ही जाना चाहती हूं,’’ लाली ने इच्छा जाहिर की.

‘‘अब तुझे वह किसी भी हालत में नहीं अपनाएगा. उस ने तो दूसरी शादी भी कर ली होगी,’’ सतपाल ने अंदाजा लगाया. ‘‘बेशक, उस ने शादी कर ली हो. उस के घर में नौकरानी बन कर रह लूंगी. मुझे अजय के घर जाना है, वरना मैं खुदकुशी कर लूंगी,’’ लाली ने अपना फैसला सुना दिया.

सतपाल बोला, ‘‘ठीक है लाली, पहले तू 4-5 दिन यहीं आराम कर.’’ एक हफ्ते बाद सतपाल ने लाली

को मोटरसाइकिल पर बैठाया और दोनों अजय के घर की तरफ चल दिए. अजय घर पर अकेला ही सुबह का नाश्ता तैयार कर रहा था. सुबहसवेरे लाली को अपने भाई सतपाल के साथ आया देख वह बुरी तरह भड़क उठा.

दोनों को धक्के मार कर घर से बाहर निकालते हुए अजय ने कहा, ‘‘अब तुम लोग मेरे जख्मों पर नमक छिड़कने आए हो. चले जाओ यहां से. अब तो मेरी मां भी मर चुकी है. मेरी पत्नी तो बहुत पहले मर चुकी थी. अब मेरा कोई नहीं है.’’

सतपाल ने लाली को घर चलने को कहा, तो वह वहीं पर रहने के लिए अड़ गई. सतपाल अकेला ही घर चला गया. लाली सारा दिन भूखीप्यासी वहीं पर खड़ी रही. रात को अजय वापस आया. लाली को खड़ा देख वह बेरुखी से बोला, ‘‘अब यहां खड़े रहने का कोई फायदा नहीं है.’’

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‘‘अजय, मैं ने तो अपनी गलतियों को पहचाना है और मैं तुम्हारी सेवा करने का मौका एक और चाहती हूं.’’ मगर अजय ने उस की तरफ ध्यान नहीं दिया और घर का दरवाजा बंद कर लिया. अगली सुबह अजय ने दरवाजा खोला, तो लाली को बाहर बीमार हालत में देख चौंक उठा. वह बुरी तरह कांप रही थी. वह उसे तुरंत डाक्टर के पास ले गया. बीमार लाली को देख कर अजय को लगा कि ठोकर खा कर लाली सुधर गई है, इसलिए उस ने उसे माफ कर दिया.

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