सुगिया के नशीले हुस्न में न जाने कितने नेताओं और चंदनधारियों ने गोता लगा कर खुद को खुश किया था, पर वही सुगिया जब छोटे से सुख की तलाश में भोला का दामन थाम बैठी, तो जाति के नाम पर सभी ने जैसे बवंडर सा खड़ा कर दिया. आखिर क्यों?
गांव के अगड़ों ने फरमान जारी कर दिया, ‘सुगिया को नंगा कर के गांव में घुमाया जाएगा और उसे भगाने वाले भोला की गरदन उतार ली जाएगी.
‘उन दोनों ने मिल कर हमारी इज्जत को धूल में मिला दिया है, अगर हमारी नाक ही नहीं रहेगी, तो हम सब यहां रह कर क्या करेंगे, फिर यह पैसा किस काम आएगा?’
जाति की नाक बचाने के नाम पर राघो सिंह जैसे कंजूस आदमी ने भी अपनी ओर से जाति की कटी नाक फिर से जोड़ने के लिए ढाई हजार रुपए के दान का ऐलान कर दिया.
जाति की कटी नाक से शिवन सिंह की विधवा रेणुका को भी परेशानी थी. उस के पति की मौत 3 साल पहले हो गई थी. जब जवान थी, तब उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था, लेकिन किसी जाति वाले ने उस की कोई मदद नहीं की थी. आखिर नाथूराम ने उसे अपने बच्चों को पढ़ानेलिखाने का काम दिया. इस तरह रेणुका को जीने के लिए एक रास्ता मिल गया.
वैसे, लोगों को शक था कि रेणुका नाथूराम के बच्चों की सिर्फ मास्टरनी ही नहीं थी, बल्कि उन दोनों के बीच एक नजदीकी संबंध भी था. हां, इस रिश्ते में कभी भी इतना खुलापन नहीं आया कि उस की बू किसी के बरदाश्त की हद लांघ जाती. फिर चोरी जब तक पकड़ी न जाए, चोरी कैसे कही जा सकती है.
तभी तो अब रेणुका कहती है, ‘‘उस बेशर्म को भागना ही था, तो किसी अपनी जाति वाले को ले कर भाग जाती. नाक कटा दी…’’
देवी मंदिर के बाबा युगल किशोर को इस घटना के पीछे घोर कलियुग का हाथ दिखता है. वे कहते हैं, ‘‘घोर कलियुग आ गया है… पहले भी ऐसा होता था, पर तब राजघरानों में छोटे कुल की लड़कियां आती थीं. अब तो सब उलटा हो गया…’’
सुगिया व भोला को गांव से गए हुए तकरीबन 15 दिन हो गए थे, पर अभी भी हर कहीं यही चर्चा होती.
एक तरफ ऊंची जाति के लोग बदला लेने की तैयारी में जुटे थे, वहीं पिछड़े एकदम खामोश थे.
कुछ ऐसे नौजवान जरूर थे, जिन्हें इस बात की खुशी थी कि भोला ने हिम्मत का काम किया है.
अगड़ों में भी 2-3 लोग ऐसे थे, जो इस सारी घटना पर एक अलग सोच रखते थे. उन की नजर में अपने जीवनसाथी को चुनना कोई गलत हरकत नहीं है, इसलिए इसे ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए. फिर सुगिया ने तो यह कदम बेबसी की हालत में उठाया था.
सुगिया का जन्म तकरीबन 20 साल पहले हुआ था. जब वह मां के पेट में थी, तभी उस के पिता को किसी गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया था. उस के जन्म के डेढ़ साल बाद वे मर गए थे.
तब सुगिया का इस दुनिया में उस की मां के अलावा और कोई न था. कहने को तो उस के 2-2 चाचा भी थे, पर सालों पहले बंटवारा हो चुका था. वैसे, सुगिया के पिता कुछ जमीन छोड़ गए थे.
पति की मौत के बाद सुगिया की मां ने वह जमीन अपने एक देवर के जिम्मे कर दी थी. उसी से उन दोनों मांबेटी का गुजारा चलता रहा.
कुछ समय बाद सुगिया के चाचा ने कुछ भी देने से इनकार कर दिया. सुगिया की मां ने अपनी बिरादरी के कई लोगों से इंसाफ की गुहार लगाई, पर कोई उस की मदद करने के लिए आगे नहीं आया. जमीन उस के हाथ से निकल गई.
आखिर में सुगिया की मां ने पेट की खातिर अपनी बिरादरी के ही भरत मुखिया के यहां काम करना शुरू किया. वह खुद ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, उस के पास पैसे भी नहीं थे, पर उस ने सुगिया को स्कूल भेजना शुरू किया. पहली, दूसरी, तीसरी…छठी जमात, वह लगातार आगे बढ़ती जा रही थी.
अचानक उन्हीं दिनों सुगिया पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. मुखिया की लड़की की शादी थी. उन का घर बिजली की रोशनी से जगमगा रहा था. ठीक समधी मिलन के समय जब लोग बाहर गए हुए थे, पता नहीं कैसे सुगिया की मां का हाथ बिजली के नंगे तार से छू गया और वह चल बसी.
सुगिया का स्कूल जाना बंद हो गया. 12 साल की लड़की का अपना कौन था, जिसे वह अपना कहती. वह दिनरात कोठरी में पड़ी रहती. कोई दूसरा होता तो मुखिया को लेने के देने पड़ जाते, पर यहां तो कोई सुगिया की खोजखबर लेने वाला नहीं था.
वैसे, मुखिया ने सुगिया की मां का अंतिम संस्कार करा दिया था और उसे 50 रुपए नकद व 10 किलो चावल भी दिए थे. साथ ही, उस ने यह संदेशा भी भिजवाया था कि अगर वह अपनी मां की जगह काम करना चाहती है, तो कर सकती है.
सुगिया जैसों का सत्कार हो या अनादर, उस से उन का क्या बनताबिगड़ता है. फिर रोटी का जुगाड़ हो जाने के बाद ही आदमी आदरअनादर की बात सोच पाता है. सुगिया को अगर मुखिया के यहां काम न मिलता, तो शायद उसे दरदर भटकना पड़ता.
मुखिया के यहां काम करतेकरते 2 साल बीत गए. अब सुगिया 14 साल की हो गई थी. उस का बदन गदराया हुआ था और आंखों में एक चमक आ गई थी. मैलेकुचैले कपड़ों में भी वह खूबसूरत लगने लगी थी. वह सुबहशाम मुखिया के घर जाती और काम कर के अपनी कोठरी में लौट आती.
एक दिन सुगिया शाम ढलने के बाद अपनी कोठरी में लौट रही थी, तो मुखिया के बेटे सतीश ने एक दोस्त के साथ उसे उठा लिया. वह चीखीचिल्लाई, पर किसी ने उस की आवाज न सुनी.
मुखिया के बेटे ने उस के हाथ में सौ रुपए का एक नोट पकड़ा दिया. वह चुप हो गई.
इस वारदात के बाद सुगिया ने मुखिया के घर काम करना छोड़ दिया. अब उस का धंधा ही बदल गया.
सुखिया अब मर्दों को जिस्मानी सुख देती, बदले में उसे कुछ पैसे मिल जाते. इस में उसे अजीब सी खुशी महसूस होती, क्योंकि जब वह मुखिया के यहां जूठे बरतन धोती थी, तो भरपेट खाना तक नहीं मिलता था. पीठ पीछे चाहे लोग जो कुछ भी कहते, पर उस के आगे आने पर तो उन्हें नाक ही रगड़नी पड़ती थी.
सुगिया ने कई लोगों की सेवा की. मुखिया के बेटे से ले कर खुद मुखिया तक की. कई चंदनधारी भी उस के तलवों में चंदन रगड़ कर अपने को खुश कर के लौटे और कई नेता भी बेहिचक उस के दरवाजे पर पहुंचे. उस ने सब के साथ एक सा बरताव किया. सब की हवस मिटाई. उस के यहां आने वालों में कोई जाति बंधन नहीं था.
भोला कई दिन से सुगिया को देखता आ रहा था. एक दिन सुगिया का इशारा पा कर वह निहाल हो उठा. फिर क्या था, वह बारबार सुखिया से जिस्मानी सुख पाने लगा. इस के लिए उसे सुगिया के यहां जाने की जरूरत न थी, क्योंकि वही उस के पास आ जाती थी.
सुगिया ने हर नौजवान के सामने इस नरक से अपने को उबार लेने की बात कही, पर किसी ने उसे कबूल न किया. एक भोला ही ऐसा था, जिस ने मर्दानगी दिखाई थी, ‘मैं तुम्हें जरूर अपनाऊंगा… चाहे इस के लिए मु झे जो भी मुसीबत उठानी पड़े.’
फिर एक रात दोनों गांव से भाग गए.
पता नहीं, गांव वालों की नाक इस में कैसे कट गई? उन्हें तो खुश होना चाहिए था कि अब सुगिया गांव की धंधे वाली नहीं, किसी की बीवी बन गई थी. पर उन सिरफिरों को कौन सम झाता?
-विपिन कुमार




