Heart Touching Story. शाम धीरेधीरे अपने आंचल को फैलाती जा रही थी. आसमान में धूप की हलकी पड़ती किरणें जैसे किसी बिछड़ते रिश्ते की आखिरी चमक बन कर ठहर गई थीं.
रेलवे स्टेशन पर हलचल थी, आवाजें थीं, चाय वालों की पुकार थी, कुलियों की भागदौड़ थी, लेकिन इस शोर के बीच भी अर्जुन के भीतर एक ऐसा सन्नाटा था, जिसे कोई सुन नहीं सकता था.
प्लेटफार्म नंबर 3 पर खड़ी ट्रेन जैसे केवल यात्रियों को नहीं, बल्कि यादों को भी अपने साथ ले जाने के लिए तैयार थी. अर्जुन हाथ में टिकट लिए खड़ा था, लेकिन उस की उंगलियां हलकेहलके कांप रही थीं.
वह बारबार भीड़ में झांकता, जैसे किसी खोई हुई चीज को ढूंढ़ रहा हो. उस की आंखों में एक बेचैनी थी… वह बेचैनी जो केवल उस इनसान के आने से खत्म हो सकती थी, जिस के बिना उस की दुनिया अधूरी थी. और फिर वह दिखी. नैना.
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हलके गुलाबी सूट में, खुले बालों के बीच उस का चेहरा वैसा ही था… मासूम, शांत, लेकिन आज उस में एक गहरा दर्द भी छिपा हुआ था. वह धीरेधीरे उस की ओर बढ़ रही थी, जैसे हर कदम उसे अर्जुन से नहीं, बल्कि खुद से दूर कर रहा हो.
दोनों आमनेसामने थे, लेकिन शब्द कहीं खो गए थे. उन के बीच केवल खामोशी थी और वह खामोशी ही सब से ज्यादा बोल रही थी.
‘‘तुम आ गई…’’ अर्जुन ने जैसे अपने ही भीतर से आवाज निकालते हुए कहा.
नैना ने हलका सा सिर हिलाया, ‘‘नहीं आती तो शायद जिंदगीभर खुद को माफ नहीं कर पाती,’’ उस की आवाज में एक कंपन था, जो सीधे अर्जुन के दिल तक उतर गया.
कुछ पल दोनों चुप रहे, फिर नैना ने धीरे से पूछा, ‘‘सच में जा रहे हो?’’ यह सवाल नहीं था, एक शिकायत थी. एक उम्मीद थी कि शायद वह कह दे, ‘‘नहीं.’’
अर्जुन ने उस की आंखों में देखा. वह जानता था कि यह जवाब उस के अपने दिल को भी तोड़ देगा, लेकिन सच से भागना अब मुमकिन नहीं था.
‘‘हां, जाना पड़ेगा.’’ नैना की आंखों में आंसू भर आए, ‘‘इतनी आसानी से?’’ ‘‘आसानी से?’’ अर्जुन की आवाज अचानक भारी हो गई, ‘‘अगर यह आसान होता, तो मैं यहां खड़ा नहीं होता नैना. मैं तो कब का चला गया होता.’’
नैना ने नजरें झुका लीं, ‘‘तो फिर क्यों जा रहे हो? क्यों नहीं रुक जाते?’’
यह सवाल सीधा था, लेकिन उस का जवाब बहुत पेचीदा. अर्जुन ने गहरी सांस ली, ‘‘क्योंकि कभीकभी जिंदगी में हम जो चाहते हैं, वह नहीं कर पाते. हमें वह करना पड़ता है, जो जरूरी होता है.’’
‘‘और हमारा प्यार?’’ नैना ने तुरंत पूछा. अर्जुन कुछ पल चुप रहा, फिर उस ने धीमे से कहा, ‘‘प्यार कभी जरूरी नहीं होता नैना, प्यार बस होता है.’’
यह सुन कर नैना की आंखों से आंसू बह निकले, ‘‘अगर प्यार बस होता है तो फिर उसे छोड़ कर कैसे जा सकते हो?’’ अर्जुन ने उस की ओर देखा. उस की आंखों में दर्द था, लेकिन साथ ही एक मजबूरी भी.
‘‘मैं तुम्हें छोड़ कर नहीं जा रहा, मैं बस इस शहर को छोड़ कर जा रहा हूं.’’ ‘‘और मैं?’’ नैना की आवाज टूट गई, ‘‘मैं भी तो इसी शहर में हूं.’’
अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था. उस ने बस इतना कहा, ‘‘तुम हमेशा मेरे साथ रहोगी यहां,’’ उस ने अपने दिल पर हाथ रखा. नैना हलकी सी मुसकराई… एक दर्दभरी मुसकान. ‘‘दिल में रह कर क्या होगा अर्जुन? जिंदगी को तो साथ जिया जाता है.’’
यह बात अर्जुन के दिल में तीर की तरह चुभ गई. उसे याद आया… वह पहली मुलाकात. कालेज का वह पहला दिन जब नैना लाइब्रेरी के कोने में बैठी थी और वह अनजाने में उसी टेबल पर जा कर बैठ गया था.
‘‘यह सीट खाली है?’’ अर्जुन ने पूछा था. नैना ने बिना ऊपर देखे कहा था, ‘‘अब नहीं है.’’
और उस एक जवाब ने उस की जिंदगी बदल दी थी. धीरेधीरे बातें शुरू हुईं, दोस्ती हुई और फिर वही दोस्ती कब प्यार में बदल गई, यह दोनों को पता ही नहीं चला. वे साथ चलते थे, साथ हंसते थे, छोटीछोटी बातों पर झगड़ते थे और फिर एकदूसरे को मनाते भी थे.
नैना अकसर कहती, ‘‘अगर कभी तुम मुझ से दूर गए न, तो मैं एक पल भी जी नहीं पाऊंगी.’’ और अर्जुन हंस कर कहता, ‘‘मैं कहीं नहीं जाऊंगा. मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा.’’
लेकिन आज वही अर्जुन जा रहा था. वादा टूट रहा था और उस के साथ एक सपना भी. ट्रेन की सीटी ने उन्हें वर्तमान में लौटा दिया. समय जैसे हाथ से फिसल रहा था.
अर्जुन ने बैग उठाया. उस के कदम भारी हो गए थे पर जाना जरूरी था. वह एक अति पिछड़े घर का गरीब लड़का और नैना साधारण आमदनी वाले ब्राह्मण परिवार की लड़की. दोनों को जल्दी एहसास हो गया था कि यह मिलन न जाने कितने दिन का है.
अर्जुन ने हाथपैर मारे तो कई हजार किलोमीटर दूर एक जगह नौकरी किसी ने दिलाई. शहर में तो उसे सही नजर से भी कम ही लोग देखते थे.
नैना ने अचानक उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मत जाओ.’’
उस एक वाक्य में इतनी ताकत थी कि अर्जुन का दिल एक पल के लिए सच में रुक गया. उस ने नैना की ओर देखा. उस की आंखों में विनती थी, डर था और सब से ज्यादा… प्यार था.
‘‘अगर तुम कहो तो मैं नहीं जाऊंगा,’’ अर्जुन ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा.
नैना चौंक गई. यह वही पल था जब वह चाहती थी कि वह रुक जाए, लेकिन वह यह भी जानती थी कि उस के रुकने की कीमत बहुत बड़ी होगी.
नैना ने धीरेधीरे अपना हाथ छोड़ दिया, ‘‘नहीं जाओ,’’ उस की आवाज कांप रही थी, ‘‘मैं तुम्हें रोक कर तुम्हारे सपनों को नहीं तोड़ सकती.’’
अर्जुन की आंखों में आंसू आ गए, ‘‘और हमारे सपने?’’ उस ने पूछा. नैना ने मुसकराने की कोशिश की, ‘‘कुछ सपने पूरे होने के लिए नहीं होते. कुछ सपने बस महसूस करने के लिए होते हैं.’’
अर्जुन अब और कुछ नहीं कह पाया. वह ट्रेन में चढ़ गया. खिड़की के पास खड़ा हो कर वह नैना को देख रहा था. नैना वहीं खड़ी थी, जैसे समय ने उसे जकड़ लिया हो.
ट्रेन धीरेधीरे चलने लगी. नैना दौड़ी. उस ने हाथ बढ़ाया, ‘‘अर्जुन…’’ उस की आवाज इस बार बाहर आ गई.
अर्जुन ने भी हाथ बढ़ाया, लेकिन उन के बीच की दूरी हर पल बढ़ती जा रही थी. कुछ ही क्षणों में हाथ हवा में रह गए.
और फिर ट्रेन प्लेटफार्म छोड़ गई. नैना वहीं रुक गई. उस की सांसें तेज थीं, आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे. वह धीरेधीरे उसी बैंच पर बैठ गई, जहां वे कभी साथ बैठा करते थे. उस ने अपनी आंखें बंद कीं और अर्जुन की आवाज उस के कानों में गूंजने लगी, ‘‘मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा.’’
उस ने धीमे से खुद से कहा, ‘‘झूठ,’’ लेकिन उसी पल उस के होंठों पर एक हलकी मुसकान भी आ गई, क्योंकि वह जानती थी, वह झूठ नहीं था. बस अधूरा सच था.
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उस रात स्टेशन की भीड़ खत्म हो गई. रोशनी धीमी पड़ गई, लेकिन नैना वहीं बैठी रही. उस के भीतर एक सफर शुरू हो चुका था. एक ऐसा सफर जिस में कोई मंजिल नहीं थी, सिर्फ यादें थीं.
और उन यादों में एक प्यार था, जो सफर में छूट गया था, लेकिन दिल से कभी नहीं उतरा.
कहते हैं, समय हर घाव भर देता है, लेकिन कुछ घाव ऐसे होते हैं, जिन्हें समय केवल ढकता है, मिटाता नहीं.
अर्जुन और नैना की जिंदगी में भी समय बीतता रहा… दिन महीनों में, महीने सालों में बदलते गए, लेकिन जो उस एक शाम प्लेटफार्म नंबर 3 पर छूट गया था, वह वहीं का वहीं ठहरा रहा.
नैना अब शहर के एक छोटे से स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी. उस के चेहरे पर एक शांत मुसकान रहती थी, लेकिन उस की आंखों में एक गहराई थी… एक ऐसा खालीपन, जिसे कोई बच्चा, कोई साथी, कोई रिश्तेदार भर नहीं पाता था.
वह बच्चों को कहानियां सुनाती थी… राजकुमार और राजकुमारी की, अधूरी प्रेम कहानियों की, बिछड़ते लोगों की. और हर कहानी के आखिर में उस की आवाज थोड़ी धीमी हो जाती.
एक दिन एक बच्चे ने पूछ लिया, ‘‘मैम, क्या सच में प्यार कभी अधूरा रह जाता है?’’
नैना कुछ पल के लिए चुप रह गई, फिर उस ने मुसकरा कर कहा, ‘‘हां, कभीकभी प्यार पूरा हो कर भी अधूरा रह जाता है.’’
बच्चे समझ नहीं पाए, लेकिन उस की आंखों की नमी ने उस जवाब को और गहरा बना दिया. स्कूल से लौटते समय वह अकसर उसी रास्ते से गुजरती, जहां कभी वह और अर्जुन साथ चला करते थे. हर मोड़, हर पेड़, हर चाय की दुकान… सब उसे उस की याद दिलाते.
वह चाहती तो उन रास्तों को बदल सकती थी, लेकिन उस ने नहीं बदला, क्योंकि वह जानती थी, यादों से भागने से वे खत्म नहीं होतीं, वे और गहरी हो जाती हैं.
उधर अर्जुन, वह अब एक बड़े शहर में एक बड़ी कंपनी में काम कर रहा था. उस के पास सबकुछ था… अच्छी नौकरी, एक घर, नाम, पहचान लेकिन रात को जब वह अपने कमरे में अकेला होता, तो उस की सारी उपलब्धियां उस के सामने छोटी पड़ जातीं.
उस के कमरे की एक दीवार पर एक छोटी सी तसवीर लगी थी, नैना की. वह फोटो कालेज के दिनों की थी… जब नैना हंस रही थी, बेफिक्र, खुश और अर्जुन उस तसवीर को घंटों देखता रहता.
‘‘तुम अभी भी वैसे ही हंसती हो क्या?’’ वह अकसर खुद से पूछता.
लेकिन जवाब में केवल खामोशी मिलती. कई बार उस ने कोशिश की आगे बढ़ने की, किसी और को अपनी जिंदगी में लाने की, लेकिन हर बार उसे लगता, जैसे वह किसी और के साथ नहीं, बल्कि अपने ही दिल के साथ धोखा कर रहा हो.
उस ने खुद को काम में डुबो दिया. दिनरात, बस काम, लेकिन जब भी वह थक कर रुकता, तो उस की यादें फिर उसे उसी प्लेटफार्म पर ले जातीं, जहां उस ने अपना सबकुछ छोड़ दिया था. उस ने नैना के पास लौटने का सपना देखना छोड़ दिया था, क्योंकि कई साल बीत गए थे उसे अपने पैरों पर खड़ा होने में.
एक दिन, अचानक उसे उसी शहर में एक प्रोजैक्ट के सिलसिले में जाना पड़ा. वही शहर जहां उस की मुहब्बत अब भी सांस ले रही थी.
ट्रेन से उतरते ही उस का दिल तेजी से धड़कने लगा. हर चीज जानीपहचानी थी, लेकिन अब उस में एक अजनबीपन भी था. उस ने खुद को रोकने की कोशिश की, ‘‘नहीं, वहां नहीं जाना चाहिए.’’
लेकिन दिल दिल कहां मानता है? उस के कदम खुद ब खुद उसी दिशा में बढ़ने लगे. प्लेटफार्म नंबर 3. वह जगह, जहां से उस की जिंदगी 2 हिस्सों में बंट गई थी, पहले और बाद में.
वह धीरेधीरे उस बैंच की ओर बढ़ा, वही बैंच जहां नैना आखिरी बार बैठी थी. उस ने हाथ बढ़ा कर उस बैंच को छुआ, जैसे वह उस पल को फिर से महसूस करना चाहता हो.
‘‘तुम अभी भी यहां आते हो?’’ अचानक पीछे से आई आवाज ने जैसे उस की धड़कनें रोक दीं.
वह आवाज, जिसे वह हजारों आवाजों में भी पहचान सकता था. अर्जुन ने धीरेधीरे पीछे मुड़ कर देखा… नैना. समय जैसे थम गया. वह वहीं खड़ी थी, सालों बाद भी वैसी ही. बस, उस की आंखों में अब और गहराई थी और शायद थोड़ा और दर्द भी.
‘‘नैना,’’ अर्जुन के होंठों से बस इतना ही निकल पाया. दोनों कुछ पल तक बस एकदूसरे को देखते रहे, जैसे सालों की दूरी उन की आंखों के रास्ते पिघल रही हो.
‘‘तुम बदल गए हो,’’ नैना ने धीमे से कहा. अर्जुन हलका सा मुसकराया, ‘‘तुम नहीं बदली.’’
‘‘बदली हूं,’’ नैना ने धीरे से कहा, ‘‘पहले थोड़ा कम रोती थी.’’ दोनों हलका सा हंसे, लेकिन उस हंसी में भी दर्द था. कुछ देर दोनों चुप रहे. फिर अर्जुन ने हिम्मत जुटाई, ‘‘कैसी हो?’’
‘‘ठीक हूं.’’ नैना ने वही पुराना जवाब दिया. अर्जुन ने सिर हिलाया, ‘‘झूठ बोल रही हो.’’
नैना ने उस की आंखों में देखा, ‘‘तुम भी.’’ दोनों फिर मुसकरा दिए. एक ऐसी मुसकान, जो केवल वही समझ सकते थे.
अर्जुन ने धीरे से पूछा, ‘‘शादी?’’ नैना ने उस की बात पूरी होने से पहले ही सिर हिला दिया, ‘‘नहीं.’’
‘‘क्यों?’’ अर्जुन की आवाज में हलकी सी उम्मीद थी.
नैना ने गहरी सांस ली, ‘‘क्योंकि मैं ने किसी और को उस जगह बैठाने की कोशिश ही नहीं की, वह जगह अब भी तुम्हारी है.’’
अर्जुन की आंखें भर आईं, ‘‘मैं ने भी नहीं,’’ उस ने धीरे से कहा. नैना ने उस की ओर देखा, ‘‘क्यों?’’
अर्जुन ने हलकी सी मुसकान दी, ‘‘क्योंकि मुझे कभी लगा ही नहीं कि तुम गई हो.’’
यह सुन कर नैना की आंखों से आंसू बह निकले. वह कुछ पल तक कुछ नहीं बोल पाई, फिर उस ने धीमे से कहा, ‘‘तो फिर हम इतने साल अलग क्यों रहे?’’
यह सवाल बहुत गहरा था. अर्जुन ने आसमान की ओर देखा, ‘‘शायद क्योंकि हमें समझना था कि प्यार केवल साथ रहने का नाम नहीं है. प्यार किसी के बिना भी उसे महसूस करने का नाम है.’’
नैना ने सिर झुका लिया. ‘‘मैं ने हर दिन तुम्हें महसूस किया है. अब मेरे मांबाप नहीं रहे. मैं हूं और तुम्हारे बोल.’’
उस ने धीमे से कहा, ‘‘हर सुबह, हर शाम, हर रात.’’ अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाया, ‘‘मैं ने भी.’’
दोनों के बीच की दूरी अब बहुत कम रह गई थी, लेकिन उन के दिलों की दूरी तो कभी थी ही नहीं. ट्रेन की सीटी फिर गूंजी. दोनों ने एकसाथ उस ओर देखा.
नैना ने हलकी मुसकान के साथ कहा, ‘‘फिर से सफर?’’ अर्जुन ने उस की ओर देखा और कहा, ‘‘हां, लेकिन इस बार मैं अकेला नहीं जाऊंगा.’’
नैना चौंकी, ‘‘मतलब?’’ अर्जुन ने धीरे से उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘इस बार मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा, अगर तुम चलो तो.’’
नैना की सांसें तेज हो गईं, ‘‘इतने साल, इतने फासले, क्या सबकुछ फिर से शुरू हो सकता है?’’
अर्जुन ने उस की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘प्यार कभी खत्म नहीं हुआ.’’
‘‘तो फिर उसे फिर से शुरू करने की जरूरत ही क्या है?’’ नैना रो पड़ी. उस ने अर्जुन को कस कर पकड़ लिया, जैसे वह उसे फिर कभी खोना नहीं चाहती.
‘‘मैं थक गई हूं,’’ उस ने सिसकते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे बिना जीतेजीते.’’ अर्जुन ने उस के सिर पर हाथ रखा, ‘‘अब और नहीं. अब हम साथ चलेंगे.’’
ट्रेन खड़ी थी, लेकिन इस बार कोई जल्दी नहीं थी. इस बार कोई छूट नहीं रहा था.
नैना ने धीरे से कहा, ‘‘शायद कुछ सफर ऐसे होते हैं, जो अधूरे रह कर ही पूरे हो जाते हैं.’’
अर्जुन ने मुसकरा कर कहा, ‘‘और कुछ प्यार जो छूट कर भी कभी छूटते नहीं.’’
दोनों साथ खड़े थे, हाथों में हाथ लिए. इस बार, सफर शुरू हुआ था, लेकिन कोई पीछे नहीं छूटा था. छूटा था तो वह लिजलिजा सामाजिक ढांचा जिस ने 2 धड़कते दिलों को मिलने नहीं दिया था.
-डा. गोपालदास नायक




