Bihar Politics. किसी भी लोकतंत्र में सरकार की संवेदनशीलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कौन सा समाज कितना बड़ा वोट बैंक है. सरकार का काम हर नागरिक के जीवन और सम्मान की रक्षा करना है. संविधान ने किसी नागरिक के वोट की कीमत अलगअलग नहीं तय की है.

बिहार सरकार की ओर से भरत तिवारी के परिवार को मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा के बाद बिहार की राजनीति में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है.

भरत तिवारी की मौत निश्चित रूप से दुखद और गंभीर घटना है और अगर किसी की मौत पुलिस कार्रवाई में हुई है तो उस के परिवार को इंसाफ, इज्जत और माली मदद मिलनी ही चाहिए. लेकिन सवाल यह है कि अगर सरकार एक पीडि़त परिवार के दर्द को सम?ा सकती है तो दूसरे पीडि़त परिवारों के दर्द को क्यों नहीं उसी गंभीरता से महसूस करती?

लोगों के बीच यह चर्चा है कि बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा की हार और ब्राह्मण समाज के वोटों के बिखराव ने सरकार को भरत तिवारी के परिवार के प्रति तत्काल संवेदनशील होने के लिए मजबूर किया. यह राजनीतिक चर्चा सही है

या गलत, इस का फैसला जनता करेगी, लेकिन इस चर्चा ने एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या बिहार में पीडि़त परिवारों के लिए इंसाफ और मुआवजे का पैमाना भी जाति और चुनावी गणित से तय होने लगा है.

अगर भरत तिवारी के परिवार को मुआवजा और नौकरी देना सरकार की संवेदनशीलता का उदाहरण है तो अरवल के अनिल कुशवाहा के परिवार का क्या? अनिल कुशवाहा को ताड़ी पीने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और उन की मौत पुलिस हिरासत में संदिग्ध हालात में हुई. परिजनों ने पुलिस द्वारा सताने और मारपीट के गंभीर आरोप लगाए.

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