Politics. डाक्टर भीमराव अंबेडकर के बाद भारतीय राजनीति में दलित समाज से कई नेता उभरे, लेकिन वे दलितों के हित के लिए कोई क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए. दलित समाज से जो भी हाल में नेता हुए, अवसरवादी राजनीति का शिकार हो कर रह गए. ज्यादातर दलित नेताओं ने दलितों की भलाई के नाम पर वोटों को बेचने का ही काम किया. यही हाल मुसलिमों का भी रहा.

मुसलिम समाज के बीच से नेता तो कई उभरे, लेकिन यह किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के दलाल ही बने रहे. मुसलिम नेताओं से मुसलिम समाज को कोई फायदा नहीं हुआ. मुसलिमों के हित की राजनीति करने की आड़ में इन मुसलिम नेताओं ने गैरमुसलिमों की पार्टी का ही भला किया.

आज की राजनीति में दलितों और मुसलिमों का कोई सर्वमान्य नेता नजर नहीं आता. आज की राजनीति में दलितों के बड़े नेताओं में मायावती, चंद्रशेखर आजाद रावण, रामदास अठावले, चिराग पासवान, जीतनराम मांझी जैसे लोग ही नजर आते हैं, जिन के लिए विचारधारा की कोई कीमत नहीं रह गई है. मायावती सिर्फ जाटवों की नेता बन कर रह गई हैं. चिराग पासवान दुसाध जाति के नेता हैं. चंद्रशेखर आजाद रावण भी दलितों की कुछ जातियों के नेता हैं और जीतनराम मांझी मुसहर समाज के नेता हैं. इस से ज्यादा इन नेताओं की कोई पहचान नहीं रह गई है.

https://youtube.com/shorts/g13l4HKPLyU?si=SHLCU3O2PavhM1BK

बिना नायक की आबादी

भारत में दलितों की आबादी तकरीबन 24 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का 17 फीसदी है. आदिवासी समाज कुल आबादी का 9 फीसदी है यानी तकरीबन 11 करोड़ है. वहीं मुसलिमों की कुल आबादी तकरीबन 14 फीसदी यानी 20 करोड़ के आसपास है. दलित, मुसलिम और आदिवासी समाज के हालात तकरीबन एकजैसे ही हैं.

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