Relationship Drama. झोंपड़ी के भीतर उस समय 4 लोग ही थे. हरबिलास, उस की पत्नी दुर्गा और 2 नन्हे बच्चे. बच्चे दुर्गा से चिपट कर सोने की जिद कर रहे थे.

हरबिलास ढिबरी की रोशनी में उबले चावल और मछली का शोरबा खा रहा था. दुर्गा ने बांस की चटाई बिछाई और बच्चे उस पर लेट गए.

हरबिलास जल्दीजल्दी कौर निगल रहा था. उसे मालूम था कि दुर्गा अभी फट पड़ेगी. यह उस का हर रात का सिलसिला जो था.

कुछ देर दुर्गा बड़बड़ करती रही, फिर बरतन समेट कर सोने चली गई. थोड़ी देर बाद हरबिलास भी सोने चला गया. महीनों से हर दिन यही होता.

अगली सुबह दुर्गा ठेकेदार रामा के खेमे में छोटे बच्चे को गोद में उठाए चली गई. वहां गांव की कच्ची सड़क पक्की होने वाली थी. भला हो ठेकेदार का, जिस ने दुर्गा की जिंदगी की डूबती नैया को किनारे लगाया.

तब हरबिलास का काम होता पंचायतघर के पास वाली पान की दुकान में कैरम खेलना, जहां कुछ अनपढ़ किसान और मनचले लड़के आ धमकते. वहीं पर हरबिलास का दूसरा बच्चा उन के खेल से अनजान मिट्टी में खेलता. धूप के चढ़ते ही वे घर लौट आते... ठीक उसी समय दुर्गा भी काम से लौट आती.

घर आते ही दुर्गा चौकाबरतन संभालती. कुछ दालभात बना देती, मछली भी पका देती, तब बच्चों को कुछ ढंग का खाना मिलता. ऐसा कई महीनों से चल रहा था.

उस शाम वह अपने पति पर बरस ही पड़ी, ‘‘तुम मेरी न सोचो, पर इन बच्चों की तो सोचो. बस, उधार की चाय पीना और बीड़ी फूंकना... और तेरा फर्ज पूरा हो गया... दूसरों को देख, जो हजारों रुपए कमा रहे हैं... इसी जमीन से जो सरकार ने तुम्हें दी है... हाय, मेरी तो जिंदगी ही तबाह हो गई है...’’ और वह दोनों बच्चों को गोद में ले कर रोने लगी.

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