हमारे पौराणिक व धार्मिक ग्रंथों में ऐसे कई कर्मकांडों की व्याख्या है जिन का कोई सार्थक उद्देश्य नहीं. महज दानदक्षिणा के मतलब से प्राणप्रतिष्ठा जैसे कर्मकांड चढ़ावे का पाखंड मात्र हैं.