Journalism Challenges Story. समाचार छप गया था. बहुत तफसील से सारी बातें लिखी थीं. सोहन के चेहरे पर संतोष के भाव उभर आए थे, पर इन भावों के पीछे अनजाना डर भी दिखाई दे रहा था.

यह तो सोहन की आदत में शुमार हो चुका था. वह जो सच है लिख देता, फिर उस की प्रतिक्रिया को देखता रहता. वह जानता था कि दिनभर उसे गालियां मिलने वाली हैं, पर ऐसा भी नहीं था कि केवल गालियां ही मिलती हों. लोग उस के लिखने की तारीफ भी करते थे.

‘अब पत्रकार का जीवन तो ऐसा ही होता है. यदि डर गए तो समझ  मर गए...’ सोहन फिल्म ‘शोले’ का डायलौग अपने हिसाब से बना कर मन ही मन ही दोहरा लेता था.

पत्रकारिता के क्षेत्र में आए सोहन को लंबा समय नहीं हुआ था, पर उस के लिखने के अंदाज से वह सीनियर पत्रकारों को पीछे छोड़ता जा रहा था.

https://youtube.com/shorts/RXuXKnScOeA?si=v4hQRe0351aCZ_NN

‘‘अभी नयानया है, जब एकाध झटका लग जाएगा तो सारी हेकड़ी निकल जाएगी,’’ सीनियर पत्रकार सोहन के बेखौफ लिखने से और अपनेआप को उस से पीछे होते जाने से जलन के मारे ऐसा बोल देते थे.

‘‘अरे, हम भी जब पत्रकारिता के क्षेत्र में आए थे, तो ऐसा ही जोश था. खूब खुल कर लिखते थे, पर...’’ इस के आगे वे बताना नहीं चाहते थे. लोग अंदाजा लगा लेते थे कि इन के साथ क्या हुआ होगा.

सोहन ने इस समाचार के लिए बहुत मेहनत की थी. वैसे तो वह समाचार के लिए हर बार मेहनत करता ही था. वह कभी रेडीमेड समाचार नहीं लगाता था. एक समाचार को अच्छी तरह पढ़ कर फिर अपने हिसाब से लिख कर भेजता था अपने अखबार में. यही कारण था कि उस का समाचार दूसरे अखबारों से अलग भी होता और लोग ढूंढ़ कर अखबार पढ़ते भी.

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