शहर के उस हिस्से को नगरनिगम के नक्शे में शायद कोई नाम दिया गया था, लेकिन लोग उसे झुग्गी बस्ती कहते थे. नामों की भी अपनी एक हैसियत होती है. कुछ नाम सुनते ही आदमी के सामने मकान, सड़क और बिजली के खंभे आ जाते हैं और कुछ नाम सुनते ही टिन, तिरपाल, कीचड़ और नालियां.
उसी बस्ती में सोनू रहता था. 11 साल का सोनू 5वीं क्लास में पढ़ता था. उस के पिता रामदीन पास की एक दुकान पर मजदूरी करते थे और मां सुशीला आसपास के घरों में बरतन मांजती थी. परिवार में सोनू के अलावा 8 साल की गुडि़या और 5 साल का मुन्ना थे.
घर इतना छोटा था कि उस में गरीबी को भी पैर सिकोड़ कर बैठना पड़ता था. बरसात में छत टपकती, गरमी में टिन तपता और सर्दी में हवा दीवारों के छेद गिनती हुई भीतर चली आती.
लेकिन सोनू के पास एक चीज थी, उस की किताब. वह किताब को ऐसे संभाल कर रखता जैसे कोई अमीर आदमी अपनी तिजोरी की चाबी रखता है.
बस्ती से कुछ दूर एक संस्था ने बच्चों के लिए मुफ्त पाठशाला खोल रखी थी. वहां न फीस थी, न यूनिफौर्म का झंझट, न जूतेमोजे का हिसाब. जिस के पास कौपी नहीं, उसे कौपी. जिस के पास पैंसिल नहीं, उसे पैंसिल.
सोनू रोज वहां जाता था. मैडम उस के अनुशासन के लिए उसे बहुत सराहती रहती थीं. वे पूछतीं, ‘‘सोनू, बताओ, बड़े हो कर क्या बनोगे?’’ ‘‘टीचर बनूंगा.’’
‘‘क्यों?’’ वे पूछतीं. ‘‘मैडम क्योंकि ऐसा बनने के लिए किसी की जातपांत नहीं पूछी जाती, उस की जेब नहीं देखी जाती.’’
50 साल की उषा मैडम टकटकी लगा कर उस बालक की ओर हैरानी से देखती ही रह जातीं.
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