Social Issue. झारखंड में रांची की सड़कों पर प्रतियोगी परीक्षाओं में तथाकथित धांधली और अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों के बीच जोकुछ हुआ वह केवल एक छात्र नेता के ऊपर स्याही फेंके जाने की घटना नहीं है. यह घटना उस सोच पर गंभीर सवाल खड़ा करती है जो सवालों का जवाब सवालों से नहीं तर्क का जवाब तर्क से नहीं और असहमति का जवाब संवाद से नहीं देना चाहती.
जब छात्र अपने भविष्य को ले कर सवाल पूछने सड़क पर उतरते हैं और उन के आंदोलन के बीच आल इंडिया स्टूडैंट्स एसोसिएशन की प्रदेश अध्यक्ष नेहा बोरा पर स्याही फेंकी जाती है तो हमें इस घटना को केवल निजी अपमान के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक असहमति के प्रति बढ़ती असहिष्णुता के लिहाज से भी देखना चाहिए.
नेहा बोरा पर स्याही फेंकने की घटना इसलिए भी खास है, क्योंकि इस के पीछे केवल एक शख्स का गुस्सा नहीं दिखाई देता, बल्कि यह सवाल सामने आता है कि आखिर छात्रों की आवाज से इतनी बेचैनी क्यों है? अगर नेहा गलत हैं तो उन के सवालों का जवाब दिया जाना चाहिए. अगर छात्र आंदोलन की मांगें गलत हैं तो सरकार और प्रशासन को तथ्यों के साथ उन्हें गलत साबित करना चाहिए. अगर परीक्षा में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं हुई है तो जांच के बाद हालात साफ होने चाहिए, लेकिन किसी के चेहरे और कपड़ों पर स्याही डाल देना किसी सवाल का जवाब नहीं हो सकता.
https://youtube.com/shorts/UxXbv7fvd6Y?si=4Tkmd9RmfZ0_3ijf
यह घटना हमें इतिहास के एक बहुत पुराने दृश्य की याद दिलाती है. 10वीं सदी में जब सावित्रीबाई फुले लड़कियों को पढ़ाने के लिए घर से निकलती थीं तब उन के रास्ते में भी विरोध खड़ा किया जाता था.
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