Editorial. जरात मौडल की पढ़ाई, इकोनौमी, सत्ता, कारखानों का बड़ा बखान किया जाता है पर असलियत यह है कि गुजरात के ही 44,000 सरकारी स्कूलों के साढ़े 6 लाख स्टूडैंट्स पिछले साल पढ़ाई छोड़ कर या तो मांबाप के साथ उन के पुश्तैनी धंधे में लग गए या फिर भगवा  झंडा ले कर किसी धर्म की जगह सफाई, दंगाई, चंदा उगाहने का काम करने लगे.

गुजरात हिंदुत्व का गढ़ है और यहां और चीजों के साथ यह भी माना जाता है कि गरीब अछूत, दलित, पिछड़ों के बच्चों को पढ़ने की जरूरत क्या है. वे या तो सड़कों की सफाई करें, मजदूरी करें, स्टेशनों पर कुली का काम करें या फिर कांवड़ यात्रा में जा कर जुड़ें.

जो 6 लाख स्टूडैंट्स पढ़ाई छोड़ बैठे उन के मांबाप असल में दोषी नहीं हैं, वे समाज के सिस्टम के दोषी हैं. जब से राम मंदिर के नाम पर हिंदुत्व ने सिर उठाया है, कास्ट को ले कर भेदभाव भी बहुत फैल गया है. गुजरातियों की ऊंची जातियों के पास पैसा टपका है, कुछ धर्म की वजह से, कुछ राजनीति की कृपा से और कुछ उन की मेहनत से.

पर इस पैसे के साथ इन का यह अहसास भी बढ़ गया है कि दलित, ओबीसी, मुसलिम को पढ़ने की जरूरत क्या है. ये नए पैसे वाले चाहे सरकारी स्कूलों से पढ़ कर आए हों, अब जम कर उन स्वामियों के प्रवचनों में जाते हैं जहां रातदिन यह बताया जाता है कि पैसा या तो पिछले जन्मों के कर्मों के फल से आता है या आज किसी पूजा की जगह सिर नवा कर पूजापाठ, दानपुण्य कर के.

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