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हनीमून और गांव की लड़कियां

विका की शादी तय हो गई थी. हर लड़की की तरह उस के मन में भी शादी को ले कर बहुत उतावलापन था. पर जब उसे यह याद आता था कि शादी के बाद नए घर जाना है, नए-नए लोगों के बीच तालमेल बैठाना है, तब वह परेशान हो जाती थी. सब से ज्यादा परेशानी की वजह पति के साथ बनने वाले जिस्मानी संबंधों को ले कर थी.

इस उलझन में देविका को रात में नींद नहीं आती थी. उसे लगता था कि जिस शरीर को कभी किसी को छूने नहीं दिया, उसे किस तरह दूसरे को सौंप सकती है. जिस्मानी संबंधों को ले कर भी उस के मन में एक हिचक थी. वह यह समझती थी कि हनीमून मतलब पति के साथ सैक्स करने के लिए घूमने जाना होता है. सैक्स करने से बच्चा ठहर जाता है.

देविका गांव की रहने वाली लड़की थी. हनीमून को ले कर उस ने जोकुछ फिल्मों और सीरियलों में देखा था, वही पता था. कुछ भाभियां और बड़ी बहन जैसी लड़कियां उसे जानकारी कम देती थीं, मजाक ज्यादा करती थीं.

देविका की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपने हनीमून को ले कर क्या तैयारी करे? एक बार तो उस ने सोचा कि हनीमून के लिए मना ही कर दे. फिर उसे अपनी एक सहेली की हनीमून की तसवीर याद आई, उस की खुशी देखी तो उस का भी मन

होने लगा. उस ने सोचा कि सैक्स तो होना ही है, हनीमून न जाने से कौन सा बच जाना है.

देविका ही नहीं, बल्कि ब्याहता होने जा रही तमाम लड़कियों की हालत एकजैसी ही होती है. हां, शहरों की लड़कियों के लिए हनीमून की जानकारी होना कोई बड़ी बात नहीं है. गांव की लड़कियों के लिए यह अभी भी नई बात जैसा है.

पहले गांव की लड़कियों की शादी 17 से ले कर 20 साल की उम्र तक हो जाती थी, लेकिन अब यह उम्र 20 सेले कर 24 साल तक में हो रही है. ऐसे में उन की समझदारी और चाहत दोनों बढ़ गई हैं. हनीमून उन के लिए अब फिल्मी सपने जैसा नहीं रह गया है.

गांव की लड़कियों को सब से ज्यादा पहाड़ी और समुद्री इलाके पसंद आते हैं. कई लोग तो अभी भी संकोच के चलते हनीमून के लिए धार्मिक पर्यटन स्थलों का चुनाव करते हैं. कई बार तो लड़का और लड़की के साथसाथ उन के मातापिता व सगेसंबंधी भी चले जाते हैं.

कविता की शादी के बाद पहले तो घर से हनीमून जाने की इजाजत नहीं मिल रही थी. बड़ी मुश्किल से इजाजत मिली तो सास भी बेटेबहू के साथ जाने को तैयार हो गईं. उन्हें मना भी नहीं किया जा सकता था और वे खुद भी मानने के लिए तैयार नहीं थीं, क्योंकि उन के मन में यह डर बैठ गया था कि कहीं बहू बेटे पर अकेले में जादू न कर दे.

कविता बताती है, ‘‘मैं ने जिस को भी बताया कि हनीमून में मेरे साथ पति और सास दोनों गए थे, तो वह मेरा खूब मजाक उड़ाते थे.’’वैसे, अब गांवों में भी हनीमून पर जाने का चलन बढ़ गया है. ऐसे मेंगांव की लड़कियों को यह समझना जरूरी है कि वह अपने हनीमून पर क्या और कैसे करें?कम सामान सफर आसानशादी के तुरंत बाद ही हनीमून पर जाने का प्लान न करें. कुछ समय ससुराल में रह लें. ससुराल वालोंको भरोसे में ले कर फिर हनीमून का प्लान बनाएं.

हनीमून में बहुत सारा सामान ले कर भी न जाएं. वहां पर बहुत खरीदारी करने की कोशिश न करें. याद रखें कि हनीमून आप को एकदूसरे को समझने में मदद करता है, जिस से आप का बाकी समय प्यार से कट सके.

हनीमून के दौरान एकदूसरे की खामियां निकालने का काम न करें. पतिपत्नी दोनों ही एकदूसरे के शादी के पहले के संबंधों को ले कर बहुत उत्सुक रहते हैं. हनीमून के समय इस तरह की चर्चा नहीं करनी चाहिए.

हनीमून पर जहां जा रहे हों, तो वहां पहनने के लिए कुछ नए कपड़े जरूर ले लें. बैडरूम में पहनने के लिए इनरवियर के बहुत सारे डिजाइन मिलते हैं. इन में हनीमून ड्रैस, ब्रापैंटी का सैट, गाउन, मैक्सी, नाइटी और बरमूडा जैसे कपड़े खास होते हैं. हनीमून ड्रैस में नैट और साटन के कपड़े वाली ड्रैस ज्यादा पसंद की जाती हैं. अलगअलग स्टाइल की ब्रा भी खूब पसंद की जाती हैं.

झिल्ली हटने का डर

हनीमून का मतलब जिस्मानी संबंध ही नहीं होता है, बल्कि शादी के बाद और हनीमून के पहले कुछ समय एकदूसरे को समझने में लगाना चाहिए. इस के बाद ही जिस्मानी संबंध बनाना सहज हो जाता है.

जिस्मानी संबंध बनाते समय सहज भाव रखना चाहिए. पहली रात को ले कर सब से ज्यादा डर अंग की झिल्ली को ले कर होता है. इस दौरान शरीर को कड़ा नहीं करना चाहिए. हाथपैरों को ढीला छोड़ने से सैक्स में परेशानी कम हो जाती है.

कुछ लोग झिल्ली को कुंआरेपन की निशानी से जोड़ कर देखते हैं. उन का यह सोचना होता है कि हर लड़की में जिस्मानी संबंध के दौरान झिल्ली हटने से खून निकलना जरूरी होता है.

लड़कियों को यह लगता है कि झिल्ली के हटने से बहुत दर्द होता है. यह झिल्ली योनि के भीतरी हिस्से में होती है. यह खेलकूद, साइकिलिंग और मेहनत के काम करने से भी हट जाती है.

जिस लड़की में यह झिल्ली होती है, सैक्स के दौरान उस के हटने के समय थोड़ा दर्द हो सकता है. जरूरी नहीं कि खून निकले. अगर दर्द ठीक न हो तो पेन किलर दवाओं का इस्तेमाल कर सकती हैं.

गर्भनिरोधक दवा

शादी के बाद अगर जल्दी बच्चा नहीं चाहते हैं, तो गर्भनिरोधक दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए. अगर आप के पीरियड सही समय पर आ रहे हों, तो शादी के पहले पीरियड आने के बाद गर्भनिरोधक दवा खाना शुरू कर दें. इस से शादी के बाद जिस्मानी संबंध से बच्चा ठहरने का खतरा नहीं रहता है.

लड़कों के साथ दिक्कत यह होती है कि उन को सही तरह से कंडोम का इस्तेमाल करना नहीं आता. एक गलतफहमी और होती है कि कंडोम का इस्तेमाल करने से सैक्स में मजा नहीं आता है.

ऐसे में लड़की के लिए गर्भनिरोधक गोली का इस्तेमाल करना जरूरी हो जाता है. एक इमर्जैंसी पिल्स भी आती है, जिस का इस्तेमाल 72 घंटे के अंदर करने से बच्चा ठहरने का खतरा कम हो जाता है.

शादी के तुरंत बाद जब पीरियड आ जाता है, तो लड़की के लिए बहुत परेशानी वाली बात हो जाती है. नए माहौल में जल्दी पीरियड आने से एक मानसिक तनाव भी आ जाता है.

इस को दूर करने के लिए अपने पीरियड की डेट को जोड़ कर देख लें. अगर शादी या हनीमून का समय इसी बीच आ रहा हो, तो दवाओं के सहारे पीरियड को कुछ दिन तक आगे बढ़ाया जा सकता है. पीरियड की सही गणना अपनी डाक्टर की मदद से भी कर सकती हैं.

हनीमून पर जा रहे हों, तो अपने साथ सैनेटरी पैड का पैकेट जरूर रखें, जिस से जरूरत पड़ने पर उस का इस्तेमाल किया जा सके.

ताजा रहें सांसें

हनीमून और शादी के लिए अपनेआप को फिट रखने के लिए सही डाइट रखें. हाई प्रोटीन वाली चीजें लें. कार्बोहाइड्रेट और औयली फूड कम से कम लें. हाथपैर के नाखूनों की सफाई रखें. इस समय पानी भी ज्यादा से ज्यादा पीना चाहिए.

बगल यानी अंडर आर्म और बिकिनी एरिया यानी जननांग के आसपास के बालों की सफाई भी जरूर करनी चाहिए. अंडर आर्म साफ करने के लिए ब्लीच और बिकिनी एरिया की सफाई के लिए हेयर रिमूवर क्रीम का इस्तेमाल कर सकती हैं.

गंदे दांत और बदबूदार सांस भी बहुत खराब लगती हैं. इस को दूर करने के लिए शादी के कुछ समय पहले से ही तैयारी करें. अपने दांतों की सफाई का खयाल रखें. दांतों को साफ करने के लिए सुबह सो कर उठने के बाद और रात में सोने से पहले अपने दांत और जीभ को ठीक तरह से साफ करें.

हनीमून पर जाते समय कभी भी सफर के दौरान सिरदर्द और उलटी की शिकायत होती है, तो इस से बचने के लिए सफर से पहले खाना कम खाएं और परेशानी होने पर उलटी रोकने वाली दवाओं का इस्तेमाल कर सकती हैं.

प्यार के वीडियो न बनाएं

हनीमून पर जाने वालों में कुछ लोग अपने ही सैक्स संबंधों के वीडियो या फोटो खींचते हैं. हनीमून में अपने सैक्स संबंधों या उसी तरह के प्यार भरे पलों वाले फोटो या वीडियो न बनाएं. इस की वजह यह है कि इन को डिलीट करने के बाद भी वापस लाया जा सकता है. ये मैमोरी कार्ड में पड़े होते हैं. इस तरह से ये दूसरे के हाथों में जा सकते हैं. सामान्य फोटो खींचें और वीडियो बनाएं. इस तरह से कुछ सावधानी के साथ अपने हनीमून का मजा लें.

गांव के लोग और वहां का माहौल थोड़ा अलग होता है. ऐसे में अपने मातापिता को समझा कर बात करें, जिस से वे हनीमून की अहमियत को समझ सकें और सहयोग करें. मातापिता को भी समझना चाहिए कि समय बदल रहा है. बदलते समय में नए दूल्हादुलहन को अपने शौक पूरे करने का हक है.

मंदिरों के भरम में दलित

यह धर्म ही बताता है कि किसी भी जने का ऊंची या नीची जाति में पैदा होना उस के पिछले जन्म में किए गए पुण्य या पाप का नतीजा होता है. समाज में सब से निचले पायदान पर दलित हैं. सब से ऊपर ब्राह्मण, जिसे समाज का दिमाग कहा गया, इसी तरह से क्षत्रिय को छाती, बनिए को पेट या उदर और शूद्र को सब से नीचे पैरों का हिस्सा बताया गया. शूद्र वे हैं, जिन्हें आज बैकवर्ड कहा जाता है.

धार्मिक कहानियों के जरीए बारबार इस बात को बताया गया कि मंदिरों में पूजापाठ, धर्मकर्म करना अपने आने वाले जन्म को बेहतर बनाने के काम आता है. दलितों को 5वीं जाति यानी अछूत या जाति के बाहर के लोग कहा जाता था. उन को इस बात का बारबार एहसास कराया गया कि मंदिरों में पूजापाठ करना या धार्मिक ग्रंथ पढ़ना, यह सब उन के लिए नहीं है.

आज भी देश में तमाम मंदिर ऐसे हैं, जहां दलितों के लिए पूजापाठ करना मना है. कई बार ऐसे मंदिरों में प्रवेश को ले कर लड़ाईझगड़ा तक होता रहता है. मंदिरों में पुजारी के रूप में कहीं भी दलित नहीं हैं. धर्म के इसी भेदभाव का शिकार हो कर डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था.

आजादी के समय देश में धार्मिक लैवल पर भेदभाव और छुआछूत बड़े पैमाने पर था. यही वजह है कि दलित समाज को बराबरी का दर्जा देने के लिए सरकारी नौकरियों और चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक हलकों में रिजर्वेशन दिया गया. इस वजह से दलित समाज का एक बड़ा तबका माली और सामाजिक रूप से आगे बढ़ गया.

लेकिन इस तबके ने दलित समाज की सामाजिक भलाई के लिए किसी तरह का कोई सहयोग नहीं किया. यह तबका पूरी तरह से इस कोशिश में लग गया कि वह सामाजिक रूप से दलित की पहचान से छूट जाए. साथ ही, इस तबके ने दलित तबके से अपना रिश्ता वहीं तक रखा, जहां उसे रिजर्वेशन की जरूरत पड़ी.

अपने नाम के आगे दलित जाति से अलग ‘सरनेम’ रख लिया. यही नहीं, यह तबका मंदिरों में जा कर पूजापाठ करने लगा. अपने घर में ही मंदिर बना लिया. यह तबका दलित समाज के कमजोर और गरीब तबके को यह समझाने लगा कि पूजापाठ का ही नतीजा है कि वह आज ऊंच तबके के बराबर खड़ा है.

दलितों का मंदिरों से कोई भला नहीं होगा, यह इस बात से समझा जा सकता है कि कारसेवा करने वाले दलित तो हैं, पर उन के साथ जब गैरदलित हों तो घर वाले उन का शुद्धीकरण कराते हैं. जब वे घर लौटते हैं, तो उन्हें गाय छूने को कहा जाता है और उन पर गंगाजल छिड़का जाता है.

अहमदाबाद के एक रिटायर्ड आईएएस अफसर राजन प्रियदर्शी कहते हैं, ‘‘दलितों को गैरदलित पड़ोसी तक बनाने को तैयार नहीं हैं. गुजरात में कोई दलित अपनी मनपसंद जगह नहीं रह सकता. 98.1 फीसदी गांवों में दलितों को पूजापाठ करने के बावजूद गैरदलितों के यहां मकान किराए पर नहीं मिल सकता. मुझे खुद मजबूरन दलित बहुल इलाके में ही रहना पड़ा है.’’

2014 में पिलखुवा, उत्तर प्रदेश के शुकलान महल्ले में चंडी मंदिर में पूजा करने गए एक दंपती को पुजारी ने पूजा नहीं करने दी और अंजू वाल्मीकि व प्रमोद वाल्मीकि को रोक दिया. ये वहां करने ही क्या गए थे?

चंदौली, उत्तर प्रदेश के एक स्कूल से इसी अक्तूबर महीने में एक छात्रा को निकाल दिया गया, क्योंकि वह दलित जाति की थी. जब स्कूलों में उन्हें स्वीकारा नहीं जा रहा, जो सरकारी पैसों पर चल रहे हैं, जहां पूजापाठ नहीं हो रहा, तो मंदिरों में क्या स्वीकार होंगे और वहां दलितों को मिलेगा क्या?

कांग्रेस की नेता कुमारी शैलजा 2013 में जब द्वारका गईं, तो उन से पुजारी ने उन की जाति पूछी. पूर्व मंत्री कुमारी शैलजा कांग्रेस की दलित नेता हैं, फिर भी उन्हें इस अपमान से मुक्ति नहीं मिली. अफसोस यह है कि कुमारी शैलजा मंदिर देखने नहीं गईं, वहां मत्था टेकने गईं और यही गलत है.

कुछ साल पहले नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बनवाया था, पर मधुबनी जिले में एक मंदिर में बतौर मुख्यमंत्री जाने के बावजूद उसे धोया गया और उस बिहार में उसी जीतनराम मांझी के संरक्षक रहे नीतीश कुमार आज उसी भाजपा के पैरों पर गिरे पड़े हैं, जो दलितों को अपनी औकात में रखना चाहती है और मंदिर उस की साजिश की धुरी हैं.

दलितों में बढ़ रहा पाखंड

धर्म के नाम पर चल रहे तमाम पाखंड चढ़ावा चढ़ाने के लिए होते हैं. दलित तबके के ‘नवहिंदुत्व’ में शामिल हुए लोग चढ़ावा चढ़ाने में सवर्णों से भी आगे होने लगे हैं. वे अपने घर पर पूजापाठ करने के लिए पुजारियों को बुलाने लगे हैं.

गरीब दलित के यहां जाने से आनाकानी करने वाले पुजारी यहां पूजा कराने आने लगे. इस की वजह यह नहीं थी कि पुजारी के मन से छुआछूत की भावना मिट गई थी. इस की वजह यह थी कि यहां मुंहमांगा चढ़ावा मिलने लगा था.

एक पुजारी ने बताया, ‘‘नवरात्र के दिनों में मैं एक ऐसे ही परिवार के यहां रोज पूजापाठ और हवन करने जाता था. उन लोगों ने हर दिन के लिए नए कपड़े दिए और कहा कि आप को रोज नए कपड़े पहन कर ही हवन करना है.

‘‘उन्होंने हमारी सोच से ज्यादा चढ़ावा दिया. नवरात्र के खत्म होने पर मुझे दक्षिणा दे कर विदा किया. हमें वहां इतना चढ़ावा मिला, जितना 5 सवर्ण परिवार मिल कर भी नहीं देते थे.’’

आजादी के कुछ सालों तक दलितों के तमाम संगठन ऐसे थे, जो यह बताते थे कि दलितों की हालत के लिए जिम्मेदार धार्मिक कुरीतियां, रूढि़वाद और छुआछूत है. जब तक यह है, तब तक दलितों को समाज में बराबरी का हक नहीं मिलने वाला.

डाक्टर भीमराव अंबेडकर के बाद उत्तर प्रदेश में कांशीराम ने दलितों को जागरूक करने का काम किया. उन्हें यह लगता था कि राजनीतिक सत्ता हासिल कर के ही दलितों की तरक्की की जा सकती है.

कांशीराम के बाद बसपा की नेता मायावती को अपने सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले के बाद लगा कि जो सवर्ण मंच पर उन के पैर छू रहे हैं, उस से दलितों के हालात बदल जाएंगे, जबकि अगड़ों का मायावती के पैर छूना एक राजनीतिक मजबूरी थी. इस का सामाजिक बराबरी से कोई लेनादेना नहीं था.

पूजापाठ में दिलचस्पी

दलितों की ताकत समझ चुके अगड़ों को समझ आ गया था कि जातिवाद के सहारे ताकत हासिल करना मुश्किल है. ऐसे में दलितों को धार्मिक पाखंड से जोड़ा जाने लगा. जिन मंदिरों में कभी दलितों को घुसने नहीं दिया जाता था, वहां उन को प्रवेश दिया जाने लगा.

अब बहुत ही कम ऐसे मंदिर बचे हैं, जहां दलितों को प्रवेश न मिलता हो. दलितों को इस बात के लिए दिमागी रूप से तैयार किया जाने लगा कि वे अपने मंदिर खुद बना लें.

अब दलितों की नौजवान पीढ़ी इस धार्मिक पूजापाठ में ज्यादा दिलचस्पी रखने लगी है. यह पीढ़ी ऐसी है, जो थोड़ीबहुत पढ़ीलिखी है. वह किताबें पढ़ लेती है. बड़े घरों को देख कर अपने घर में धार्मिक कहानियों की किताबें पढ़ने लगी है. किताबों में लिखी विधि के हिसाब से पूजापाठ करने लगी है.

गणेश, दुर्गा और सरस्वती की पूजा कर के उन की मूर्तियों के विसर्जित करते समय देखा जाता है कि बहुत सी दलित बस्तियों में यह शुरू हो चुका है. पहले यह रिवाज शहरों में था, पर अब गांव और कसबों में भी दिखने लगा है. रातरातभर आरकेस्ट्रा पर फिल्मी गानों की धुनों पर भजन बजते हैं.

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘हैरानी की बात तो यह है कि दलित और पिछड़े तबके के ये नौजवान पढ़ेलिखे होने के बाद भी धर्म की कहानियों में लिखी बातों को समझने की कोशिश नहीं करते. जिन चौपाइयों और कहानियों में दलित तबके की बुराई की गई है, उस लाइन को भी वह जोरशोर से पढ़ते हैं. वे यह भी नहीं सोचते हैं कि इन लाइनों में दलित तबके को ही गलत बताया गया है.

‘‘असल में इन नौजवानों का कुसूर भी नहीं है. पहले दलितों के लिए काम करने वाले संगठन बताते थे कि किनकिन धर्मग्रंथों में धार्मिक कहानियों के जरीए दलितों की बुराई की गई है. उस समय बहुत सारे दलित होलीदीवाली नहीं मनाते थे. ये त्योहार धार्मिक रूप से हिंदुओं की अगड़ी जातियों के त्योहार माने जाते थे. राम की आलोचना होती थी. ये बातें आज की नौजवान पीढ़ी को नहीं पता. धर्म का प्रचार करने वाले धर्म की सचाई बताने वालों से अधिक संगठित हो गए हैं.’’

बढ़ रहे हैं धार्मिक मेले

दलित परिवारों में धार्मिक मेलों की अहमियत बढ़ रही है. आज भी गांवकसबों की औरतों को घूमनेफिरने की बहुत आजादी नहीं है. ऐसे में जब कोई उन के आसपास मेला लगता है, तो उन का वहां जाना आसान हो जाता है. ऐसे मेले किसी मंदिर या फिर धार्मिक जगह पर होते हैं.

यहां जाने वालों को 2 तरह का फायदा हो जाता है. वे मेला भी घूम लेते हैं और घरों की जरूरत का सामान भी खरीद लेते हैं. बीमारी से ले कर बाकी जरूरतों के लिए ये लोग मंदिरों, बाबाओं और ओझाओं की शरण में जाने से नहीं चूकते हैं. दलित औरतें पहले से ही धर्म को ले कर बहुत डरी रहती हैं. ऐसे में वे बाबाओं की हर बात मान लेती हैं.

लखनऊ के पास बाराबंकी जिले में एक बाबा की सीडी सामने आई, जिस में वे तमाम औरतों का बांझपन दूर करने का उपाय करते थे. कई सीडी में वे सैक्स करते भी दिखे. इन औरतों में बड़ी तादाद दलित औरतों की थी.

जागरूकता की कमी

धार्मिक मेलों में भगदड़ के समय मरने वालों में अगर देखें, तो उन में इन गरीब लोगों की तादाद सब से ज्यादा होती है. धार्मिक भरोसे के मामले में दलित सब से अधिक धर्मभीरु बनते जा रहे हैं. उन के धर्म से प्रभावित होने की वजह गरीबी है.

गरीब को लगता है कि यह सब उस के पिछले जन्म के किए गए बुरे कामों का नतीजा है. ऐसे में वे इस जन्म में अपने काम के प्रति धार्मिक हो जाते हैं.

अब दलित तबके के पास भी पैसा है. वह रोज न सही, पर 2-4 महीने में किसी न किसी धार्मिक आयोजन में शामिल होता है. मीडिया भी ऐसी खबरों को प्रमुखता से दिखाता है.

कुंभ के मौके पर दलितों के लिए नहाने का अलग से इंतजाम होता है. यह बात इस तरह से सामने रखी गई, जिस से कुंभ में नहाने के बाद दलितों की सारी परेशानियों का खात्मा हो जाएगा. केवल पूजापाठ ही नहीं, अब दलित भी परिवार में किसी के मरने के बाद तेरहवीं जैसे भोज करने लगे हैं.

इस बारे में रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘छुआछूत और गैरबराबरी की बात धर्म की ही देन है. इस के बाद भी धर्म पर भरोसा बढ़ता जा रहा है. आज कई दलित इस बात के लिए आंदोलन करते हैं कि उन को मंदिर में घुसने नहीं दिया जाता.

‘‘सोचने वाली बात यह है कि जिस मंदिर में उन को बराबरी का हक नहीं दिया जाता, वहां जा कर वे क्या हासिल कर लेंगे? इस के बाद भी वे ऐसे मंदिरों में जाने की जिद करने लगते हैं.

‘‘असल में आजादी के बाद दलितों में जिस तरह से मंदिर का भरम कम हुआ था, वह अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के बाद फिर से उभर आया है.

‘‘अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के समय समाज दलितपिछड़ों और अगड़ों की जमात में खड़ा था, पर अब जातिवाद पर धर्म हावी हो गया है.’’

दलित नेता बने मार्गदर्शक

पहले दलितों के नेता अपने लोगों को जागरूक करते थे और खुद भी ऐसे आंडबरों से दूर रहते थे. डाक्टर भीमराव अंबेडकर और कांशीराम दोनों ने अपनी निजी जिंदगी में पाखंड को कभी अहमियत नहीं दी. बाद में आने वाले नेताओं में पाखंड बढ़ने लगा. ये लोग न केवल मंदिर जाने लगे, बल्कि  खुद भी पूजापाठ, हाथ में अंगूठी, कलावा बांधने लगे. अपने पद को बचाए रखने के लिए हवन और जाप कराने लगे. इन को देख कर इन के समर्थक और अनुयायी भी उसी दिशा में बढ़ने लगे.

शहरों में बस चुके दलित केवल रिजर्वेशन का फायदा लेते समय ही दलित होने का प्रमाणपत्र दाखिल करते हैं. उस के बाद वे खुद को सवर्ण समझ लेते हैं. धर्म के कामों में लग कर वे ऊंची जातियों की बराबरी का सपना देखने लगते हैं.

दलितों को यह समझ नहीं आता कि मंदिरों में पूजापाठ करने से समाज में उसे बराबरी का दर्जा हासिल नहीं होगा. समाज में बराबरी का दर्जा हासिल करने के लिए उसे कुरीतियों से मुकाबला करना होगा. वे कुरीतियां धर्म के पाखंड के चलते ही समाज में फैली हुई हैं.

दलितों को समाज से छुआछूत और भेदभाव को दूर करना है, तो मंदिरों के भरम से उसे बाहर निकलना होगा. जब तक वह पापपुण्य, पिछला जन्म भूल कर  पढ़लिख नहीं जाएगा, तब तक समाज में गैरबराबरी का शिकार होता रहेगा.

मणिपुर में इंसानियत शर्मसार

मणिपुर के हालात से सभी वाकिफ हैं. वहां पर बिते कई दिनों से हिंसा चल रही लेकिन बुधवार को जो वायरल वीडियो आया, जिसमें दो महिलाओं को नग्न करके सड़क पर दौड़ाया गया. जिसनें इंसानियत और महिलाओं की इज्जत को तार-तार किया वो बेहद ही शर्मनाक है. मणिपुर हिंसा को लेकर अभी तक कोई कार्रवाई भी नहीं हुई, लेकिन जैसे ही ये वायरल वीडियो सबके सामने आया इस पर हंगामा शुरू हो गया. मणिपुर में इस घटना ने इंसानियत पर सवाल उठा दिया. वहशी दरिंदों के नए चेहरे दिखा दिए. मणिपुर में कुछ लोग इतने वहशी हो गए कि उन्होंने दो लड़कियों को निर्वस्त्र किया, उन्हें बिना कपड़ों के घुमाया.

प्रधानमंत्री अब तक चुप क्यों ?

मणिपुर में 3 मई से हिंसा हो रही थी, वायरल वीडियो 4 मई का है. 77 दिन तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस मामले में कोई कमेंट नहीं आया जबकि विपक्षी नेता लगातार इस मामले में पीएम के दखल की मांग कर रहे थे. गृह मंत्री अमित शाह ने मोर्चा जरूर संभाला लेकिन उनके दिल्ली वापस होते ही हिंसा से शुरु हो गई. संसद के मानसून सत्र का पहला दिन था प्रधानमंत्री मीडिया के सामने आए और वायरल वीडियो के मामले में 36 सेकंड में अपनी बात कह गए. इस दौरान उन्होंने राजस्थान और छत्तीसगढ़ का नाम भी गिना दिया. अब सवाल यह उठता है कि मणिपुर जैसे जघन्य अपराध को किसी दूसरे अपराध से तुलना कैसे की जा सकती है ? सवाल यह भी उठता है आखिरकार कब तक दूसरे अपराधों की तुलना में अपने अपराधों को छुपाया जाएगा ? जब भी कभी भाजपा पर सवाल उठते हैं तो वह तुरंत कांग्रेस के 70 सालों का इतिहास बनाने लगते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी इसलिए भी सवाल खड़ी करती है कि वह हर छोटे छोटे मसलों पर ट्वीट करते हैं लेकिन मणिपुर 77 दिनों से जल रहा था लेकिन पीएम खामोश थे. वायरल वीडियो और मणिपुर हिंसा को देखते हुए पीएम मोदी ने चुप्पी तो तोड़ी, साथ ही दो और प्रदेशों का नाम जोड़कर उन्होंने यह जता दिया कि सिर्फ बीजेपी शासित राज्य में ऐसे कांड नहीं होते जहां पर कांग्रेस की सरकार है वहां पर भी ऐसी शर्मनाक हरकतें हो रही हैं

मणिपुर में जब से हिंसा हो रही है तब से प्रधानमंत्री ने एक भी शब्द मणिपुर पर नहीं कहा ना ही किसी एक्शन की बात कही. मानसून सत्र की शुरुआत में मीडिया से सिर्फ इतना कहा कि- मणिपुर की घटना से मेरा हृदय दुख से भरा है. ये घटना शर्मसार करने वाली है. पाप करने वाले कितने हैं, कौन हैं वो अपनी जगह है, पर बेइज्जती पूरे देश की हो रही है. 140 करोड़ देशवासियों को शर्मसार होना पड़ रहा है. दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा. नारी का सम्मान सर्वोपरि.

संसद में क्यों मणिपुर पर बहस नहीं कर रहे पीएम ?

विपक्ष लगातार सवाल कर रहा है कि आखिर प्रधानमंत्री संसद में मणिपुर पर चर्चा क्यों नहीं कर रहे हैं. इस मुद्दे पर बात करना बाकी सभी मुद्दों से ज्यादा जरूरी है, क्योंकि बाकी सभी मुद्दों की तुलना में ये महत्वपूर्ण मुद्दा है. समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने कहा सरकार चर्चा के लिए तैयार नहीं जबकि मणिपुर पर नियम के तहत चर्चा चाहता है विपक्ष. कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने मणिपुर सीएम पर हमला बोला, कहा- अपने बयान के बाद भला सीएम की कुर्सी पर कैसे बैठे है मुख्यमंत्री. और देखा जाए तो बात सही भी है.इतने दिनों से मणिपुर जल रहा लेकिन सरकार ने चुप्पी साध रखी है.

मणिपुर मामला है क्या ?

दरअसल मणिपुर में तीन मई को मैतेई (घाटी बहुल समुदाय) और कुकी जनजाति (पहाड़ी बहुल समुदाय) के बीच हिंसा शुरू हुई थी. मणिपुर में मैतेई समाज की मांग है कि उसको कुकी की तरह राज्य में ST का दर्जा दिया जाए, लेकिन कुकी समुदाय को ये बात नागवार गुजरी. वो नहीं चाहता कि मैतेई समाज के लोग उनके बराबर आए और यही कारण है कि इसके खिलाफ कुकी समाज ने आवाज उठाई और आदिवासी एकजुटता रैली निकाली. जिसका विरोध होते-होते बात हिंसा तक पहुंच गई और मणिपुर इतने दिनों से हिंसा की आग में जल रहा है.

BBC के रिपोर्ट के मुताबिक- वायरल वीडियो को शर्मनाक बताते हुए मैतेई समुदाय से आने वाले फ़िल्ममेकर निंगथोउजा लांचा ने कहा- हम किसी अपराध या अपराधी के बचाव में ये नहीं कह रहे लेकिन हमारे पास इससे भी भयावह वीडियो हैं. पीएम मोदी को टिप्पणी करने से पहले इस वीडियो की जाँच होनी चाहिए थी. इसके बिना किसी एक समुदाय पर आरोप लगाना गलत है.” बहुत से ऐसे वीडियो और तस्वीरें हैं जिनमें कुकी समुदाय के लोग मैतेई लोगों को मार रहे हैं. पीएम उन पर क्या कहेंगे? इतना एकतरफ़ा रुख क्यों? प्रधानमंत्री को हमेशा निष्पक्ष रहना चाहिए.”

मणिपुर में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

BBC की रिपोर्ट के मुताबिक- सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के इस वायरल वीडियो पर स्वत: संज्ञान लिया, कहा- इस मामले में 28 जुलाई को सुनवाई करेगा कोर्ट.
चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि सरकार को इस मामले में दखल देना चाहिए और एक्शन लेना चाहिए. ये पूरी तरह अस्वीकार्य है. ये संविधान और मानवाधिकारों का उल्लंघन है. कोर्ट ने कहा कि “सरकार बताए कि ऐसी घटनाएं फिर ना हो, इसके लिए क्या कदम उठाए गए, सरकार इसका जवाब दे.

प्रेग्नेंसी का नौवां महीना, फिर भी लगाई दौड़

अमूमन गर्भवती महिलाएं आठवें महीने तक न तो सही से चल पाती हैं और ना ही कोई भारी काम कर पाती हैं क्योंकि आठवां और नौवां महीना बेहद ही नाजुक होता है. कभी भी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. उस वक्त ज्यादातर महिलाएं आराम चाहती हैं. वर्किंग वुमन हैं तो ऑफिस जाना बंद कर देती हैं. मैटर्निंटी लीव पर जाती हैं, लेकिन यहां हम जिसकी महिला की बात कर रहे हैं उसके बारे में जानकर हैरानी ही होगी. आखिर कैसे कोई नौंवे महीने में रेस लगा सकता है. डिलीवरी से मात्र एक महीने पहले रेस में भाग लेकर रिकॉर्ड कायम किया. ये खबर पुरानी जरूर है लेकिन हिम्मत के नजरिए से शायद हर महिला को इनके बारे में जानना चाहिए.

दरअसल हम बात कर रहे हैं 30 साल की माकेना माइलर की, जो कैलिफोर्निया के ऑरेंज काउंटी की रहने वाली हैं और काफी तेज धाविका हैं. माकेना माइलर नौ महीने की गर्भवती हैं और उन्होंने 5.17 मिनट में एक मील पूरा किया… हालांकि ये बच्चे और मां के लिए काफी नुकसानदेह हो सकता है, लेकिन डेली मेल में छबे खबर के मुताबिक माकेना ने इसकी पूरी ट्रेनिग ली. प्रशिक्षकों के संरक्षण में रह कर रोज प्रैक्टिस किया उसके बाद किया ये कमाल. माकेना ने गर्भावस्था को अपने प्रशिक्षण के आड़े नहीं आने दिया.
2020 में अपनी पहली गर्भावस्था के दौरान प्रशिक्षण की दिनचर्या को जारी रखा – जिसमें उसने पांच मिनट और 25 सेकंड में एक मील पूरा किया ‘सिर्फ यह देखने के लिए कि क्या यह संभव है.

रनर वर्ल्ड के अनुसार, एक पेशेवर एथलीट होने के बावजूद, माकेना ने कहा कि बहुत से लोगों ने उन्हे ऐसा करने से मना किया, लेकिन फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने जज्बे को कायम रखा. उन्होंने कहा, ‘मैंने सोचा था कि गर्भावस्था के दौरान प्रशिक्षण लेना काफी सामान्य बात है, लेकिन ऐसे बहुत से लोग हैं जो सोचते हैं कि यह सामान्य नहीं है.
माकेना ने आगे कहा- मुझसे लोग पूछ रहे थे कि नौ महीने की गर्भवती होने के दौरान मैं ऐसा कैसे कर सकती हूं, जबकि अन्य महिलाएं मुश्किल से सोफे से उठ पाती हैं.
उन्होंने बताया कि इसका बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप गर्भवती होने से पहले अपने शरीर को कैसे मजबूत बनाती हैं – मैं गर्भावस्था से पहले भी दौड़ रही थी जिससे मुझे मदद मिली और मैं ये कर पाई.

हालांकि ये तो बात थी माकेना की जो ट्रेंड थीं, उसके बाद ये रिस्क उठाया लेकिन सामान्य नागरिक ऐसा कुछ भी करने से बचे. क्योंकि ट्रेनिंग करके कुछ करना और बिना ट्रेनिग के कुछ करने में बहुत फर्क है.. इसलिए सभी महिलाओं से ऐसा कोई भी स्टंट ना करने की अपील है.

इंस्टाग्राम पर हुआ प्यार तो झारखंड पहुंची पोलैंड की महिला

अभी सीमा हैदर और सचिन मीणा की लव स्टोरी का एंगल खतम भी नहीं हुआ कि यहां एक नया ही मामला सामने आ गया. आजकल सोशल मीडिया का प्रेम जाल इतना बढ़ गया है कि लोग सात समंदर पार से न जाने कहां-कहां चले जा रहे हैं. हालांकि हम यहां बात करेंगे पोलैंड की बारबरा पोलाक की, जो प्रेमी शादाब मल्लिक से मिलने पोलैंड से झारखंड के हजारीबाग पहुंच गईं.

कैसे हुई मुलाकात

प्रेम एक ऐसा जादू है जो किसी पर चलने के बाद उसे अपनी और आकर्षित करता चला जाता है। जब प्रेम सात समुंदर पार का हो तो लोग भी जानना चाहते हैं कि यह प्रेमी जोड़ी आखिर है कौन. लोगों की दिलचस्पी काफी बढ़ जाती है. दरअसल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम के जरिए हजारीबाग के शादाब से विदेश की पोलैंड निवासी बारबरा पोलाक की साल 2021 में बातचीत शुरू हुई और दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो गया. बातचीत यहां तक पहुंच गई कि लड़की उनसे मिलने के लिए उनके गांव झारखंड के हजारीबाग आ पहुंची. कुछ दिनों के बाद यह दोनों शादी के बंधन में बंध जाएंगे. बारबरा पोलाक की एक 6 साल की बेटी अनन्या भी है जिसको शादाब ने अपनाया है. बेटी अनन्या शादाब को डैड कह कर बुलाती है. इनके पहुंचने के बाद गांव के कुछ लोग काफी खुश नजर आए तो कुछ लोग ने एतराज जताया. इस बीच कई लोगों ने अपने घरों में बुलाकर विदेशी मेहमान का स्वागत भी किया.

बारबरा और शादाब ने क्या कहा ?

एक खबर के मुताबिक शादाब ने बारबरा पोलाक की तारीफ करते हुए कहा कि उसे भारत आकर काफी अच्छा लग रहा है. हम लोग बहुत जल्द शादी के बंधन में बंध जाएंगे. साथ ही कहा कि मैं काम की तलाश में हूं एक अच्छा काम करना चाहता हूं. बारबरा पोलक और बेटी अनन्या से बहुत प्रेम करता हूं. साथ ही विदेशी मेहमान बारबरा पोलाक ने कहा कि मुझे भारत और हजारीबाग बहुत अच्छा लगा. मैं जब हजारीबाग पहुंची तो मुझे देखने के लिए काफी लोग आए और मुझे सेलिब्रिटी जैसा फील हुआ. साथ ही कहा की पोलैंड में मेरा खुद का घर और कार है.वहां मेरे पास सब कुछ है नौकरी भी है, मैं तो यहां सिर्फ शादाब के लिए आई हूं. मैं शादाब के साथ काफी खुश हूं और हम लोग बहुत जल्द एक दूजे के होने वाले हैं.

यूं तो विदेशी मुल्कों से आकर भारत में बसने की खबरें बहुत आती हैं, लेकिन किसी से शादी करके भारत में बसना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं है, लेकिन बारबरा पोलक की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि उनकी बेटी को भी शादाब ने अपनाया है. भारत ने हमेशा विदेशी मेहमानों का स्वागत और सम्मान किया है. वो बात अलग है कि दशकों पहले विदेशी लोगों ने ही भारत पर अपना कब्जा जमा लिया था और देश पर जुल्मों सितम की अति कर दी थी, लेकिन अभ परिस्थितियां बदल चुकी हैं. हमारा देश आजाद देश है और यहां सतर्कता के साथ हर कदम उठाया जाता है. विदेशों में भारत की तारीफ भी होती है. कई ऐसे विदेशी ब्लॉगर और यूट्यूबर हैं जो भारत के उपर ब्लॉग और वीडियो बनाते हैं. सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो की भरमार है. इससे एक बात तो साबित है कि विदेशी लोगों को भारत का खान-पान और संस्कृति पसंद आती है. शायद यही कारण है बारबरा पोलाक ही नहीं ऐसी कई विदेशी लड़कियां है जो शादी करके भारत में ही बस जाती हैं.

बीवी के सैक्स पर बहाने

कत्ल की यह गुत्थी सुलझाने में पुलिस को हालांकि 10 दिन लग गए, लेकिन जब वजह का खुलासा हुआ, तो हर कोई हैरान रह गया कि ऐसा भी होता है.

दरअसल, 24 साला जातवथ तरुण तेलंगाना के नगरकुरनूल में आटोरिकशा चलाता था. 2 साल पहले ही उस ने अपनी माशूका झांसी से लव मैरिज की थी. जल्द ही उन दोनों के प्यार की निशानी एक प्यारी सी बेटी पैदा हुई. जिंदगी मजे में नन्ही बच्ची के लिए सपने बुनती कट रही थी. 20 मई, 2023 को तरुण ने बड़े प्यार से हमबिस्तरी की ख्वाहिश जाहिर की, तो झांसी ने बेरुखी से मना कर दिया.

यह बेरुखी असल में थकान थी, जिस से तरुण ने कोई वास्ता नहीं रखा और जबरदस्ती करने लगा तो झांसी भी बिफर उठी. इसे विरोध या बचाव जो भी कह लें, पर तरुण को गुस्सा आ गया और वह थकीहारी झांसी को दबोचने लगा. इस पर भी वह काबू में नहीं आई, तो उस ने बीवी का मुंह अपने हाथ से दबा दिया और फिर देखते ही देखते गुस्से में झांसी का गला घोंट दिया.

बाद में घबराए तरुण ने अपने घर वालों को खबर दी, जो भागेभागे आए और झांसी को नजदीक के ओबेसी अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने झांसी को मरा बता दिया. लाश को पोस्टमार्टम के लिए उस्मानिया अस्पताल ले जाया गया. मौत चूंकि शक के दायरे में थी, इसलिए अस्पताल वालों ने पुलिस को बुला लिया.

शुरुआती पूछताछ में तो तरुण और उस के घर वालों ने पुलिस को चकमा दे दिया, लेकिन झूठ 10 दिन ही टिक पाया. 1 जून, 2023 की पूछताछ में तरुण ने अपना गुनाह कबूलते हुए सच उगल दिया और झांसी की हत्या की वजह भी बता दी.

जाहिर है कि झांसी बहाना नहीं बना रही थी और तरुण की मंशा भी उसे जान से मार देने की नहीं थी, लेकिन इस से उस का गुनाह कमतर नहीं हो जाता.

यह थी बहानेबाजी

बीवी के बिस्तरबाजी के लिए राजी न होने पर हत्या की एक और वारदात तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से सामने आई थी, जब 34 साला श्रीनिवासन ने अपनी बीवी अम्मू की हत्या कर दी थी.

इस मामले में श्रीनिवासन की सैक्स की मांग अम्मू ने यह कहते हुए ठुकरा दी थी कि वह सैक्स करेगी तो सिर्फ अपने आशिक से, तो श्रीनिवासन को मरनेमारने की हद तक गुस्सा आना कुदरती बात थी. उस ने चाकू से अम्मू को मार डाला.

अदालत में मामला गया, तो श्रीनिवासन के वकील की दलीलों से इत्तिफाक रखते हुए उस की उम्रकैद की सजा जज ने कम करते हुए 10 साल कर दी.

अदालत ने महसूस किया कि श्रीनिवासन का इरादा हत्या करने का नहीं था. अम्मू ने उसे बिस्तर से धक्का देते हुए उकसाया था और सैक्स करने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि वह दूसरे मर्द के साथ सैक्स करेगी. नतीजतन, मियांबीवी में झगड़ा हुआ.

क्या करें जब…

तरुण को चाहिए था कि वह झांसी के इनकार को दिल पर नहीं लेता, क्योंकि छोटे बच्चे की देखभाल में औरत बहुत थक जाती है और उस की सैक्स की इच्छा भी दम तोड़ने लगती है. यह हालत कुछ दिनों में ठीक भी हो जाती है और बीवी पहले की तरह सैक्स का मजा लेने और देने भी लगती है.

सैक्स करने की इच्छा पत्नी की नहीं थी, लेकिन पति की तो थी, लिहाजा उसे संतुष्ट करने के लिए वह उस के अंग की मालिश करते हुए उस का हस्तमैथुन कर सकती थी या मुख मैथुन से भी उसे संतुष्ट कर सकती थी, जो आजकल के नए शादीशुदा जोड़ों में आम बात है. इस से सांप भी मर जाता और लाठी भी नहीं टूटती.

श्रीनिवासन ने जो किया, कोई भी मर्द गुस्से में वही करता. इस मामले में पत्नी गलत थी, लेकिन श्रीनिवासन के इस जुर्म को सही नहीं ठहराया जा सकता.

जब बीवी बिलकुल मना कर दे

इन 2 मामलों से जाहिर होता है कि अगर बीवी बिस्तरबाजी के लिए बहाना बनाए या मना करे, तो नतीजे खतरनाक और जानलेवा भी हो सकते हैं. असल दिक्कत तो उन शौहरों को होती है, जिन की बीवी सैक्स के लिए बिना वजह उन्हें तरसाती हैं.

भोपाल के 28 साला मुकेश नामदेव (बदला हुआ नाम) की कहानी कुछ ऐसी ही है, जिस की बीवी रंजना  (बदला हुआ नाम) हमबिस्तरी के लिए पिछले 2 साल से राजी नहीं हो रही है. वजह पूछने पर वह साफसाफ कुछ नहीं बताती, तो मुकेश की परेशानी और बढ़ जाती है.

रंजना घरगृहस्थी के बाकी कामकाज ठीक से करती है और पति व दोनों बच्चों का ध्यान भी बराबर रखती है, लेकिन जब कभी रात को मुकेश की इच्छा सैक्स की होती है, तो वह मना कर देती है.

शुरू में उस ने सिरदर्द, थकान और ‘आज मन नहीं कर रहा’ जैसे चलताऊ बहाने बनाए, तो मुकेश मान जाता था, पर बाद में मुकेश समझ गया कि बात कुछ और है. अब तो उस की पहल करने की भी इच्छा नहीं होती. सैक्स की अपनी भूख मिटाने के लिए वह हस्तमैथुन करने लगा है. लेकिन नाश्ते से पेट नहीं भरता.

वह आह सी भरते हुए बताता है, ‘खाना तो खाना ही पड़ता है और मेरी हालत तो नदी किनारे पड़े प्यासे जैसी हो गई है. जो पानी देख तो सकता है, पर उस से प्यास नहीं बुझा सकता.’

रंजना की बहानेबाजी की वजह मुकेश को पता चले तो वह कुछ करे, अब वह दिक्कत में है कि किस से परेशानी बता कर इस का हल पूछे. खुद फिट है या नहीं, इस के लिए 2 साल में वह 2 दफा कालगर्ल्स के पास जा चुका है, लेकिन वहां उसे मजा नहीं आया, क्योंकि एक तो कालगर्ल्स महंगी पड़ती हैं, दूसरे पुलिस और बीमारियों का डर भी सिर पर सवार रहता है. ‘जल्दी निबट लो’ की नसीहत का गर्ल्स पहले ही दे देती हैं और पूरी रात के लिए उन्हें रखने की मुकेश की हैसियत नहीं.

पति ध्यान दें

मुकेश अब दिमाग के डाक्टर या सैक्सोलाजिस्ट के पास जाने का विचार कर रहा है, जिस से रंजना के बाबत कुछ हो सके. दरअसल, वह कई औरतों की तरह ठंडेपन का शिकार हो चली है, लेकिन मुकेश को इस की जानकारी नहीं, जबकि छिंदवाड़ा के 30 साला राजेश पंवार (बदला हुआ नाम) ने समय रहते अपनी बीवी सलोनी (बदला हुआ नाम) की परेशानी को समझा और उसे डाक्टर के पास ले गया तो कुछ दिनों में ही सलोनी बिस्तरबाजी में पहले की तरह दिलचस्पी लेने लगी.

बकौल राजेश, डाक्टरनी ने कुछ दवाएं देते हुए बताया था कि कई बार औरतें कई कारणों से सैक्स में दिलचस्पी लेना कम या बंद कर देती हैं. इन में खास हैं सैक्स से डरने लगना, जिंदगी में कोई हादसा हो जाना जैसे किसी अपने की मौत, जरूरत से ज्यादा धर्मकर्म में लग जाना या फिर सैक्स को गलत ढंग से करना.

राजेश ने डाक्टरनी की दी टिप्स को अपनाया, तो नतीजे उस के हक में आए. उस ने पहले फोरप्ले पर ध्यान दिया कि इसे जितना हो सके लंबा खींचा जाए और जरूरी नहीं कि हर बार सैक्स किया ही जाए. जब तक पत्नी मना न

करे या कोई बहाना न बनाए तब तक फोरप्ले जारी रखा जाए. इस के अलावा सैक्स करते समय पोजीशन बदलना भी जरूरी है.

कई बार पत्नियों को कुछ अलग चाहिए रहता है, लेकिन वे शर्म और पति क्या सोचेगा के चलते सैक्स को मशीनी ढंग से करती रहती हैं और इस से न केवल बोर होने लगती हैं, बल्कि धीरेधीरे कतराने भी लगती हैं, जिस का पति को अंदाजा भी नहीं होता.

पहले बहाने को गंभीरता से लें

यही वह स्थिति होती है, जहां से बात बिगड़ती है, इसलिए जब बीवी पहली बार बहाना बनाए तो पति को अलर्ट हो जाना चाहिए और जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए. पत्नी से प्यार से इस की वजह जाननी चाहिए, लेकिन उसे उस के हाल पर नहीं छोड़ देना चाहिए.

बीवी सिरदर्द, बदनदर्द और आज मूड नहीं है जैसे बहाना बनाए, तो दर्द भगाने के बहाने उस के बदन की मालिश करना शुरू कर देना चाहिए, जिस से उसे लगे कि आप उस का ध्यान रखते हैं. इसी मालिश के चलते उस के नाजुक अंगों को सहलाते रहने से वह तैयार भी हो सकती है. लेकिन इस के लिए शौहर में सब्र का होना जरूरी है.

एकदम न टूट पड़ें

बीवी इसलिए भी बहाने बनाना शुरू कर देती है कि पति सैक्स का मूड बनते ही जानवरों की तरह उस पर टूट पड़ता है और खुद का काम निकलते ही करवट बदल कर सो जाता है.

पत्नी को नींद की गोली समझने वाले पति की पत्नी असंतुष्ट रह जाती है और ऐसा अगर बारबार होता है तो फिर वह बहाने गढ़ना शुरू कर देती है, इसलिए मौका पाते ही बीवी से छेड़छाड़, सैक्सी बातें जरूर करते रहना चाहिए और कभीकभी उस के साथ बैठ कर पोर्न फिल्में भी देखनी चाहिए.

शक से बचें

किसी भी शौहर के लिए पत्नी से न सुनना जिंदगी के वाहियात तजरबों में से एक होता है. ऐसे में ज्यादातर शौहर खुद की मर्दानगी और पत्नी के चालचलन पर शक करने लगते हैं. जरूरी नहीं कि पत्नी अगर बिस्तर में बहाने बना रही है, तो उस का कहीं और चक्कर शुरू हो गया हो.

हालांकि श्रीनिवासन के मामले से लगता है कि ऐसा होता होगा तभी तो बीवी मना कर रही है यानी अपनी जिस्मानी भूख कहीं और से मिटा रही है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है, इसलिए बिना सुबूत के बीवी के चालचलन

पर शक नहीं करना चाहिए और न ही खुद की फिटनैस को ले कर चिंतित होना चाहिए.

सैक्स के अलावा भी बहुतकुछ

गलत नहीं कहा जाता कि मियांबीवी गाड़ी के दो पहियों की तरह होते हैं, जिन की घरेलू और सामाजिक जिम्मेदारियां भी होती हैं. दोनों पहिए ठीकठाक चलते रहें, इस के लिए सैक्स के अलावा जमाने में और भी चीजें हैं.

पतिपत्नी की दीगर जरूरतों और सेहत का ध्यान रखें. खाली समय में उस से बातचीत करते रहें, उसे कभीकभार घुमानेफिराने ले जाएं, जन्मदिन और शादी की सालगिरह पर उसे तोहफा दें और खानेपीने यानी किचन में भी दिलचस्पी लें तो पत्नी से बौंडिंग बढ़ती है और सैक्स कोई बड़ी समस्या नहीं रह जाती.

लेकिन इन का क्या

दिक्कत तब खड़ी होती है, जब मियांबीवी में किसी भी मसले पर तकरार होती है और दोनों में से कोई भी झुकने के लिए तैयार नहीं होता. तब पत्नी को लगता है कि वह सैक्स के लिए तरसा और तड़पा कर पति को सबक सिखा सकती है, तो भी वह बहाने बनाने लगती है. दोनों में कलह अगर होती है, तो भी पत्नी बिस्तरबाजी में नखरे दिखा कर बदला लेने पर उतारू हो आती है.

ऐसे में सैक्स होना तो दूर की बात है, रिश्ता ही टूटने के कगार पर आ जाता है और दोनों अदालत में एकदूसरे के खिलाफ सच्चे कम, झूठे इलजाम ज्यादा लगाते नजर आते हैं यानी बहाना बनाना जिंदगी के सुकून और गृहस्थी के सलामत बने रहने पर भी असर डालता है. किसी बात पर गुस्सा हो कर पत्नी लंबे समय के लिए मायके चली जाती है तो भी उस की सैक्स की इच्छा खत्म होने लगती है.

क्या कहती हैं अदालतें

सैक्स बेहद अहम है और शादी का एक बड़ा मकसद भी है, लेकिन जब मियांबीवी बिस्तर में करवट बदल कर सोने लगें तो कई विवाद और फसाद भी खड़े होने लगते हैं, जो अदालत की चौखट तक भी पहुंचते हैं.

जून के महीने में एक मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था कि पति या पत्नी द्वारा सैक्स के लिए मना करना क्रूरता नहीं है. हिंदू विवाह अधिनियम में क्रूरता को तलाक का आधार माना गया है, लेकिन जीवनसाथी द्वारा सैक्स से इनकार करना आईपीसी नियमों के तहत क्रूरता नहीं है.

लेकिन एक दूसरे मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने ही तलाक की डिक्री दे दी थी. इस मामले में पत्नी ने कहा था कि उस का पति हमेशा ब्रह्मचर्य की वकालत करता है और आध्यात्मिक संस्था ब्रह्माकुमारी के वीडियो देखता है. इसी तरह के एक मामले में 25 मई, 2023 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि बिना किसी पर्याप्त कारण के जीवनसाथी के साथ लंबे समय तक सैक्स से इनकार करना मानसिक क्रूरता के समान है.

यह मामला हालांकि उलझा हुआ है, जिस में शादी 1979 में हुई थी और 1994 में पंचायत ने पतिपत्नी का तलाक रजामंदी से करा दिया था. तब पति ने कहा था कि उस ने कई बार शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की, लेकिन पत्नी ने इस से साफ इनकार कर दिया.

न झांसी बनें, न तरुण बनें

साफ दिख रहा है कि अदालतें भी इस मसले पर अभी एक राय नहीं हैं, लेकिन पति और खासतौर पर बहानेबाज पत्नियों को तो बिस्तर पर एक राय होना ही पड़ेगा, कि हां हम सैक्स के लिए इनकार नहीं करेंगे और इसे सबक सिखाने का हथियार नहीं बनाएंगे, नहीं तो हमारी हंसतीखेलती घरगृहस्थी खतरे में पड़ जाएगी और सैक्स का मजा भी हम से छिन जाएगा.

हां, पत्नी अगर कभीकभार यह कहे कि पहले साड़ी दिलाओ या सिनेमा ले जाओ या बाजार ले जा कर चाटपकौड़ी, मिठाई खिलाओ, तो इस को बहानेबाजी नहीं माना जाएगा. पति अपनी हैसियत के मुताबिक पत्नी की ऐसी मांगें पूरी करेगा. भलाई इसी में है कि पति तरुण और पत्नी झांसी जैसे कभी न बनें.

 

अनियंत्रित मधुमेह से छिन सकती है आंखों की रोशनी

55 वर्षीय सुशीलकांत 10 वर्षों से मधुमेह यानी डायबिटीज के मरीज हैं. पिछले कई दिनों से उन की शुगर भी नियंत्रण में नहीं है. एक शाम उन को लगा कि उन की आंखों के आगे अंधेरा सा छा रहा है, फिर कुछ देर ठीक रहा और थोड़ी देर बाद फिर वही स्थिति हो गई. 2 दिनों के बाद अचानक उन्हें लगा कि उन्हें नहीं के बराबर यानी बहुत ही कम दिख रहा है. तुरंत चिकित्सक से संपर्क किया गया.

जांच से मालूम हुआ कि मधुमेह का असर आंख पर पड़ा है और उन का रेटिना क्षतिग्रस्त हो गया है. चिकित्सक की सलाह पर शहर के बाहर विशेषज्ञ रेटिना सर्जन से संपर्क किया गया. रेटिना सर्जन के इलाज से उन की आंखों की रोशनी को बचाया जा सका वरना वे नेत्रहीन हो जाते.

मधुमेह यदि ज्यादा पुराना हो या अनियंत्रित हो तो उस का कुप्रभाव आंखों पर अवश्य पड़ता है. इसे चिकित्सा शास्त्र में ‘डायबिटिक रेटिनोपैथी’ कहा गया है. इस जटिलता, जो मधुमेहजन्य है, में आंखों के परदे, जिसे ‘रेटिना’ कहा गया है, की रक्तवाहिनियां नष्ट हो जाती हैं और इस से रक्त बहने लगता है या रिसाव होने लगता है. यह जटिलता समाज के  उच्चवर्ग में अधिक देखने को मिलती है. ऐसे में हरेक मधुमेह रोगी को चाहिए कि वह वर्ष में 2 बार अपना नेत्रपरीक्षण अवश्य करवाएं.

दृष्टि पर प्रभाव : कैसे कैसे

एक तरह की रेटिनोपैथी तो अधिकतर लोगों में देखने को मिलती है. इस का कोई लक्षण या संकेत नहीं मिलता. इस में रेटिना में सूजन आ सकती है तथा आंखों के पास गंदगी या मैल जमा हो सकता है. चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, आंख की इस छोटी से रक्तवाहिनी को काफी नुकसान झेलना पड़ता है. यह रेटिनोपैथी फैलती नहीं है.

दूसरी तरह की रेटिनोपैथी में नई रक्तवाहिनियां रेटिना के आसपास बनने लगती हैं, जिस से रक्तस्राव होने लगता है. इस में कई बार व्यक्ति की दृष्टि चली जाती है. नई रक्तवाहिनियों के पनपने से रेटिना पर खिंचाव आ सकता है जिस से वह अलग भी हो सकती है. रेटिना की आगे की जैली में भी खून आ सकता है.

जब रेटिना से द्रव्य बाहर निकलता है तो वह रेटिना के बीच ‘मैक्यूला’ पर आने लगता है. इसे ‘मैक्युलोपैथी’ कहा जाता है.

इस के अलावा मधुमेह के रोगियों में मोतियाबिंद भी जल्दी पनपता है. अल्पआय वर्ग में यह ज्यादा देखने को मिलता है क्योंकि उन का ज्यादातर कार्य सूर्य की रोशनी में होता है. रक्त संचार अव्यवस्थित व अपूर्ण होने के कारण आंखों को लकवा भी मार सकता है.

मधुमेह के पुराने मरीजों की दृष्टि में शुरूशुरू में धुंधलापन आता है, रेटिना की सतह तथा दृष्टि के लिए उत्तरदायी मुख्य नाड़ी ‘औप्टिक नर्व’ पर नई रक्त वाहिनियां बनने लगती हैं.

बचाव : कैसे हो मजबूत

-मधुमेह हो या उच्च रक्तचाप या दोनों, इन्हें हर हालत में नियंत्रित रखें. चाहे     दवा से या परहेज से.

-अपने रक्तशर्करा व रक्तचाप की नियमित जांच कराएं.

-धूम्रपान या तंबाकू का सेवन त्याग दें.

-हरी सब्जियों का अधिक सेवन करें.

-खुराक में विटामिन ए, विटामिन सी व विटामीन ई आदि का भरपूर सेवन करें.

-फिश या फिशऔयल का सेवन करें.

प्रमुख कारण

-आंख की रेटिना पर कुप्रभाव का पहला महत्त्वपूर्ण कारण है मधुमेह कितने समय से है. एक चिकित्सकीय आंकड़े के अनुसार, करीब 10 वर्षों से मधुमेह के रोगी पर इस के होने की संभावना 50 फीसदी, 20 वर्षों से मधुमेह के रोगी पर 70 फीसदी तथा 30 वर्षों से मधुमेह के रोगी पर 90 फीसदी संभावना रहती है.

-यदि मधुमेह के साथ उच्च रक्तचाप भी है तो संभावना और अधिक बढ़ जाती है.

-गर्भावस्था में भी इस की संभावना बढ़ जाती है.

-यह स्थिति वंशानुगत भी होती है.

-स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा यह स्थिति अधिक पाईर् जाती है.

निदान तकनीकें

-रक्त शर्करा स्तर की नियमित जांच कराते रहें.

-‘फंडस फ्लोरिसीन एजिंयोग्राफी’ नामक विशिष्ट जांच से यह स्थिति स्पष्ट हो जाती है कि लेजर तकनीक द्वारा उपचार की जरूरत कहांकहां है.

-‘औफ्थालमोस्कोप’ नामक उपकरण द्वारा आंखों की नियमित जांच करवाएं.

इस प्रकार, इस वैज्ञानिक जानकारी के साथ मधुमेह के रोगी अपनी आंखों की रोशनी को बचा सकते हैं क्योंकि अंधेपन के कारणों में इस स्थिति की विशेष भूमिका रहती है.

लेजर पद्धति से उपचार

लेजर फोटो कोएगुलेशन द्वारा लेजर बीम प्रभावित रेटिना पर डाली जाती है जिस से रक्तस्राव या रिसाव बंद हो जाता है, साथ ही, दूसरी असामान्य रक्तवाहिनियों का बनना भी बंद हो जाता है. यह उपचार यदि रोगी को समय पर मिल जाए तो परिणाम अच्छे रहते हैं.

यदि रोग काफी ज्यादा बढ़ गया हो तो शल्यक्रिया द्वारा उपचार संभव है, जिसे ‘वीट्रेक्टौमी सर्जरी’ कहा गया है. इस में अलग हुए रेटिना को फिर जोड़ा जाता है.

एक नया इंजैक्शन वीईजीएफ आंखों में लगाया जाता है, जिस के प्रभाव से इस के अतिरिक्त अन्य खामियां भी ठीक हो जाती हैं. इस के साथसाथ लेजर द्वारा भी उपचार लिए जाने के अच्छे परिणाम आते हैं.

यात्राओं में बढ़ती बेरोजगारों की भीड़ : इन की बरबादी में ही पंडों का फायदा

सावन में होने वाली कांंवड़ यात्रा को अब तथाकथित ऊंची जाति के तबके ने तकरीबन छोड़ दिया है. सवर्ण समाज के बच्चे अब इंगलिश स्कूलों यहां तक कि विदेशों तक में पढ़ते हैं. कांवड़ यात्रा अब सिर्फ पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासियों के बच्चे करते हैं. आप चाहें तो कांंवड़ यात्रियों का सर्वे कर सकते हैं, उन के जनेऊ भी चैक कर सकते हैं.

मांं लोगों के घरों में चौकाबरतन कर के घर चला रही है, पिता मजदूरी कर रहे हैं या फिर किसी प्राइवेट कंपनी में छोटीमोटी नौकरी कर के परिवार के लिए रोजीरोटी का बंदोबस्त कर रहे हैं और जवान बेटा भगवा गमछा गले में लटका कर धर्म की रक्षा में जुटा है. ऐसे बेरोजगार ज्यादातर एससी, एसटी और ओबीसी में ही बहुतायात से पाए जाते हैं.

सावनभादों के मौसम में अकसर लोगों को रंगबिरंगे, पचरंगे, सतरंगे झंडेझंडिया लिए जयकारे लगाते पैदल सड़कों पर यात्रा करते देखा जा सकता है. जयपुर इलाके में कहीं डिग्गी कल्याण की पदयात्राएं, तो कहीं अजमेर की तरफ जाने वाले रास्तों पर ख्वाजा के जायरीन, कहीं सवाईभोज के दीवाने, तो कहीं जोगमाया के चाहने वाले… सब से ज्यादा भीड़ सड़कों पर इन दिनों रामदेवरा जाने वाले जातरुओं की होती है. भगवा रंग में रंगे कांवड़िए तो देशभर में नजर आते ही हैं.

झंडा उठाए इन भक्तगणों की सोशल प्रोफाइल देखने, इन के चेहरे पढ़ने, इन की माली, सामाजिक बैकग्राउंड पर ध्यान देते हैं, तो साफ जाहिर होता है कि ये दलित, पिछड़े व आदिवासी जमात के गरीबगुरबे, किसानमजदूर ही होते हैं.

हालांकि यह कीमती समय इन के खेतों में होने का है. इस समय फसलें आकार ले रही होती हैं, खेतों को निराईगुड़ाई की सख्त जरूरत रहती है, नदीनाले, तालाबएनीकट व खेतों के भरनेफूटने के दिन होते हैं, जलसंचय का मौसम होता है, अपनी आजीविका के साधनसंसाधनों को सहेजनेसंभालने का समय होता है, लेकिन ये अपना घरबार छोड़ कर निकल पड़ते हैं. इन गरीबों, मेहनतकशों को ईश्वर की तथाकथित कृपा चाहिए, इन्हें देवीदेवताओं का आशीर्वाद हासिल करना है, सो ये झंडा ले कर निकल पड़ते हैं.

घरबार, गायभैंस, बैलबकरी, बालबच्चे सब छोड़ जाते हैं. इन्हें कल्याण धणी, रामसा पीर और ख्वाजा साहब की रहमत की दरकार रहती है. ये मेहनत करने वाले हाथ भिक्षा की मुद्रा में होते हैं. इन का खुद से भरोसा उठ चुका होता है और ये सड़कों, मंदिरों और मजारों पर धोक लगाते फिर रहे होते हैं. इन पर आसमानी कृपा बरसेगी, ऐसा इन को यकीन होता है.

इन पैदल चल रहे लोगों में बहुत ही कम दुकानदार, फैक्टरी के मालिक, मिल वाले होंगे या सरकारी कर्मचारी ने छुट्टी ले कर इस तरह पैदल जाना गवारा किया होगा.

कौन समझदार इस मच्छरों और सांपों के सीजन में, बारिश और कीचड़ में अपनी परेशानी भोगने इस तरह सड़क पर निकलेगा, लेकिन आस्था के नाम पर जो निकल पड़े हैं, उन में से कई लोग दुर्घनाग्रस्त होंगे, वापस घर नहीं पहुंचेंगे, कई सांप के काटने के शिकार होंगे, कइयों को कुचल कर मरना पड़ेगा, कुछेक बारिश के पानी में बह जाएंगे, पर हाल साल ऐसे धर्म यात्रियों की तादाद बढ़ती ही जाती है.

इस जंजाल में फंसे लोग बड़ी मासूमियत से कहते हैं कि उन्होंने बाबा के पैदल जाने की मनौती कर रखी है. पैदल चलना ठीक है, पर अक्ल से पैदल होना बहुत खतरनाक है. अपने समय और संसाधनों की ऐसी बरबादी मत कीजिए. हर साल पैदल निकल कर क्या हासिल हुआ है? जब आज तक नहीं हुआ तो आगे भी नहीं होगा.

यह आध्यात्म का नहीं, बल्कि बरबादी का रास्ता है. अपने खेतखलिहान, रोजीरोटी और घरपरिवार को संभालनेसंवारने के इस कीमती वक्त में अंधभक्ति की अंधेरी सुरंग में नहीं धंसना चाहिए.

इस मसले पर सामाजिक कार्यकर्ता व विचारक प्रेमाराम सियाग कहते हैं, “ये पदयात्रा या कांवड़ यात्रा नहीं, बल्कि अपनी दुर्गति को बुलावा है. सिर्फ रामरसोड़ों के चायनाश्ते और खानेपीने के चक्कर मे अपना कीमती वक्त बरबाद करना है. इस तरह चलने से कुछ भी हासिल नहीं होगा. थोड़ा ठहर कर सोचिए और घर लौट जाइए. अच्छा काम कीजिए, मस्त रहिए, कानून को मानिए, सभ्य नागरिक बनिए, क्योंकि मेहनत से ही खुशहाली आएगी.”

बेकारी में कामकाजी होने का भरम

पैदल और कांवड़ यात्राएं ही नहीं, बल्कि मेहनतकश दलित, पिछड़े व आदिवासी समाज के नौजवान आजकल घरघर घूम कर चंदा जमा कर के भजन संध्याओं का आयोजन कर रहे हैं. भागवत व सत्यनारायण की कथाओं के बड़ेबड़े पंडाल खड़े कर रहे हैं. रामलीलाओं में जयकारे लगा रहे हैं. शोभायात्राओं की झांकियां कंधों पर उठाए घूम रहे हैं. मंदिर निर्माण के लिए चंदा जमा कर के बड़ेबड़े झंडे चढ़वा रहे हैं. धार्मिक जुलूसों में रंगबिरंगे झंडे लहरा रहे हैं. लेकिन इन सब का नतीजा कुछ नहीं निकलता है.

नेताओं की रैलियों में झंडेजयकारों का भार उठा रहे हैं. रातदिन सोशल मीडिया पर धर्मरक्षा की जंग लड़ रहे हैं. अपने धार्मिक और राजनीतिक आकाओं के लिए अपने परिवार और रिश्तेदारों तक से लड़ाई लड़ कर रहे हैं, जबकि होना तो यह चाहिए था कि किसान, गरीब, दलित, पिछड़ी जमात के नौजवान बेहतर स्कूल व कालेज के लिए लड़ें. बेहतर डाक्टरी इंतजामों के लिए जद्दोजेहद करें. सर्दीगरमी में तड़पते किसानों के बेहतर इंतजाम के लिए काम करें. नाइंसाफी व जोरजुल्म के खिलाफ आवाज उठाएं. नए रोजगार पैदा करें. देश की हिफाजत के लिए बेहतर तकनीक व हथियार बनाएं.

पंडों की कमाई की नई तरकीब

अकसर धर्म को कर्म, सेवा व भक्तिभाव से जोड़ कर देखा जाता है. कांंवड़ उत्सव हो या पदयात्राएं, इन में भी आखिर सवर्ण तबका ही बाजी मार रहा है. पिछड़े, दलित और कमेरे लोग सोचते हैं कि पसीना निकालने से ही धर्म कमाया जाता है, पसीना निकालना ही भक्ति भावना है. सवर्ण तबके के लोग जो हमेशा दिमाग से खेलते हैं, हार्डवर्क की बजाय सौफ्टवर्क में यकीन रखते हैं.

इस सवर्ण तबके ने कांंवड़ उत्सव में भी धर्म कमाने की, भोले को मनाने की नई तरकीब खोज निकाली है. इन्होंने तदबीर बनाई है कि जितने भी कांवड़िए आते हैं, उन की सेवा के लिए शिविर लगाए जाएं. शिविरों में कांवड़ियों के लिए खानेपीने की हर तरह का इंतजाम किया जाता है. ये अपनी औरतों समेत कांवड़ियों के पैर गरम पानी से धोते हैं. इन का मानना होता है कि यह सेवा कांवड़ लाने से भी बड़ी सेवा व भक्ति है.

गरीब कांवड़िए इन की इस सेवा में ही खुश हो लेते हैं और मारे खुशी के अरंड के पौधे पर चढ़ जाते हैं कि असली शिवभक्त तो हम ही हैं. ये शिविर और सेवा देहातियों को कांवड़ लाने के लिए और ज्यादा बढ़ावा देती है, जिस से हर बार कावड़ उत्सव में कांवड़ियों की तादाद बढ़ती जाती है, जिस से ऊंची जाति के इन बामणबाणियों के बाजारों में रौनक आती है. उस रौनक में से वे कुछ हिस्सा शिविरों में लगा देते हैं.

बेकारी का आईना है ऐसी भीड़

कांवड़ियों की बढ़ती भीड़ के मद्देनजर ‘मानवतावादी विश्व समाज’ के अध्यक्ष व एसपी किशन सहाय एक बार कहा था कि कांवड़ियों की जो भीड़ बढ़ी है, वह साबित करती है कि बेरोजगारी कितनी विकराल हो गई है.

किशन सहाय के इस बयान को मीडिया ने भले ही हिंदू धर्म के खिलाफ विवादास्पद व हिंदुओं का अपमान बताया हो, लेकिन एक आम जागरूक नागरिक के नजरिए से देखें तो इस में गलत क्या है?

जब लोग व्यवस्था से नाराज होते हैं तो अंधविश्वास में फंसते हैं. जब बेरोजगारों को सत्ता रोजगार नहीं दे पाएगी तो बेरोजगार नौजवान ठाली बैठे क्या करेंगे? कांवड़ लाने ही तो जाएंगे. भांगअफीम के नशे का सुनहरा अवसर व साथ में इस गरमी में नहाने के लिए गंगा का ठंडा पानी हो तो किस  का मन नहीं करेगा कांवड़ लाने का. अगर किसी को शक हो तो इन यात्रियों का सामान चैक कर लो, भरम से परदा उठ जाएगा. अगर कोई सचाई को बोल दे तो सारे पाखंडी इकट्ठे हो कर आग उगलने लग जाते हैं.

पश्चिमी राजस्थान में रामदेवरा धाम है. वहां पर भी ऐसी ही यात्राओं का हुजूम लगता है. सब बेरोजगार व गरीब, दलितपिछड़े लोग सड़कों पर झंडा उठाए चलते हुए मिलेंगे. वहां इस मौसम में सांप भी बहुत ज्यादा होते हैं. सांप के काटने के चलते कई लोग मर जाते हैं. वाहनों में भेड़बकरियों की तरह भरभर कर चलते हैं और हादसे के शिकार हो जाते हैं.

शिक्षाविद शिवनारायण इनाणियां कहते हैं, “किसानोंदलितों का काम के समय को इस तरह धर्मांधता में फंस कर बरबाद करना ठीक नहीं है. इस से खुद का ही नुकसान होता है. गरीबों का शोषण होता है. काम ठप होता है. रसोई लगा कर लोग फर्जी धर्मगुरु व नेता बन जाते हैं. वैसे भी जिन को दान करना है, उन्हें अपने गांव के स्कूल में सुविधाएं बढ़ाने के लिए पैसा खर्च करना चाहिए. गांव में किसी गरीब बच्चे की शिक्षा का खर्चा उठाना चाहिए. किसी बेसहारा के इलाज में मदद करनी चाहिए.

“ऐसी उन्मादी भीड़ यात्राओं के फैशन को बढ़ावा दे कर शोषण की दुकानें चलाने वालों को फायदा नहीं पहुंंचाना चाहिए. जबजब सत्ता की तरफ से लोगों को निराशा मिलती है, तो लोगों का मानसिक स्तर कमजोर होता है. कमजोरी के इस समय का उपयोग धर्मांधता फैलाने वालों को नहीं करने देना चाहिए.”

धर्मांधता कमजोर सोच की देन

जब नेपाल में भूकंप आया तो लोग भूख व दर्द में तड़प रहे थे. सत्ता फेल हो चुकी थी, तब पौप फ्रांसिस ने एक ट्वीट किया था कि मिशनरी के लिए यह सही वक्त है. उस समय लोगों का मानसिक स्तर डांवांडोल था और उन का मतलब धर्म प्रचार से था.

दुनियाभर से उन का विरोध हुआ, नेपाल के जागरूक लोगों ने मिशनरियों को घुसने तक नहीं दिया तो पौप ने सफाई दे कर माफी मांगी थी. जिक्र करने का मतलब यह है कि कमजोर सोच ही धर्मांधता में फंसने की एकमात्र वजह है और धर्म के नाम पर दुकान चलाने वाले ठग इसे बखूबी समझते हैं.

भारत के नौजवानों के अलग सपने, अलग रास्ते हैं. ये बजरंग दल, बीएचपी, ब्रह्मकुमारी, इस्कोन, आर्ट औफ लिविंग, नागा, अखाड़ा परिषद आदि में भरती हो कर अध्यात्म के रास्ते मोक्ष हासिल करना चाहते हैं.

हमें गलतफहमी है कि रेलवे का निजीकरण होने से बेरोजगारी बढ़ेगी, लेकिन देखना यह है कि कांवड़ योजना कितनों को रोजगार दे रही है. पैदल यात्रा योजना के तहत चीन की सीमा से होते मानसरोवर तक पहुंचा जा रहा है.

यह हमारी गलतफहमी है कि लोक सेवा आयोग समय पर भरतियां नहीं करते, इसलिए नौजवानों की ऊर्जा फालतू के कामों में बरबाद हो रही है, जबकि नौजवनाओं ने बड़ी दूरदर्शिता दिखाते हुए अध्यात्म से ओतप्रोत सत्ता चुनी है जो तमाम भरती एजेंसियों को खत्म कर के, तमाम संस्थानों का निजीकरण कर के मोक्ष के रास्ते के रोड़े हटा रही है. नौजवानों का भरतियों में बहुत समय खराब हो रहा था और नौकरी कर के इस जन्म में गृहस्थी के जंजाल में फंस कर अगली जिंदगी खराब करना नहीं चाहते हैं.

– खेत में खुदकुशी करते किसानमजदूर

-इलाज की कमी में मरते बीमार

-कुपोषण में बिलखता भारत

-शिक्षा की कमी में भटकता बचपन

-कारखानों में वर्कलोड से मरते मजदूर

-महिलाओं के साथ होते बलात्कार व हिंसा

-दलितों के साथ होते अत्याचार

-जातीय भेदभाव में कराहता देश

-भुखमरी से मरते इनसान

-धार्मिक उन्माद की भेंट चढ़ता समाज

-रोजगार की कमी में अपराध को मिलता बढ़ावा

-भ्रष्टाचार द्वारा देश को नोचता सिस्टम

-देश को लूटते देशीविदेशी लुटेरे

ये सब दलितपिछड़े तबके की वर्तमान जिंदगी की छोटी समस्याएं हैं. इन को वैसे ही इस जिंदगी के साथ खत्म होना ही है, इसलिए नौजवानों का इन से कोई लेनादेना नहीं है.

पंडित रविशंकर ठीक कह रहे हैं कि सरकारी स्कूलों को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि यहां नक्सलवाद पैदा होता है. स्कूलें बंद होंगे तो एकाएक अध्यात्मिक सड़कों पर नौजवानों का रेला नजर आने लग जाएगा. अस्पताल भी बंद होने चाहिए. बूढ़े और बीमारों को वहां तक पहुंचाने में समय बरबाद होता है और धर्मस्थलों से भीड़ डाइवर्ट हो रही है.

शिक्षाविद केएल परास्या कटाक्ष करते हुए कहते हैं, “हर बुनियादी सुविधा दे रहे संस्थानों व योजनाओं को बंद कर देना चाहिए. फालतू में इस जन्म में उलझाए बैठे हैं. नौजवानों की चाहत के मुताबिक जल्द से जल्द मोक्ष की मंजिल पाने में हमे सहयोग करना चाहिए. भारत का नौजवान तबका बिलकुल जागा हुआ है और बहुत मेहनत कर रहा है. हमें हमारे नौजवानों का सहयोग करना चाहिए. आखिर उन के सपनों का सवाल जो है.”

जिम्मेदारियों से भागना

कांवड़ और पैदल यात्रियों के जत्थे डीजे पर भजनों की बेतुकी धुनों पर नशे में चूर हो कर नाचते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे पागलपन का दौरा पड़ा हो. अगर ये यात्रा में नहीं नाच कर कहीं दूसरी जगह ऐसी हरकत कर रहे होते तो घर वाले कब के किसी अच्छे दिमागी डाक्टर की शरण में ले जाते.

आस्था के नाम पर जो लोग यात्राओं पर निकलते हैं, असल में वे अपनी जिम्मेदारियों से भागने वाले लोग हैं. मातापिता, भाईबहन, देशसमाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को नहीं निभा पाने वाले लोग धर्म का सहारा लेते हैं. अपने मांबाप को उन के हाल पर छोड़ कर उन की इच्छा के खिलाफ अपनी मौजमस्ती के लिए जहां मरजी निकल पड़ते हैं, जबकि जो आदमी अपनी जिम्मेदारी व फर्ज निभा लेता है उसे कहीं पर भी जाने की जरूरत नहीं है.

आज से 40 साल पहले कोई यात्रा नहीं थी, तो क्या हमारे पुरखे धार्मिक नहीं थे? क्या पैदल यात्रा, कांवड़ यात्रा, गणेश उत्सव, गरबा, मटकी फोड़, करवाचौथ हमारे पुरखे मनाते थे? क्या ये किसी भी धर्म का हिस्सा थे? कौन लोग हैं, जिन्होंने ऐसे आयोजन शुरू किए? इन लोगों का मकसद क्या है? सच तो यह है कि इन आयोजनों को धर्म से जोड़ने वालों का मकसद इस देश के कमेरे तबके को लूट कर खुद के लिए रोजगार पैदा करना है.

तो अब धार्मिक रिवाजों से इंसाफ मिलेगा

आखिरकार धार्मिक रीति और नीतियां कैसे महिलाओं के इंसाफ के लिए रुकावट बनती हैं, इस का जीताजागता उदाहरण इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश से सामने आया, जो उस ने 23 मई, 2023 को दिया था.

मामला उत्तर प्रदेश के चिनहट क्षेत्र का है, जहां एक लड़की ने गोविंद राय उर्फ मोनू पर शादी का झांसा दे कर सैक्स संबंध बनाने का आरोप लगाया. अपने बचाव में आरोपी ने दलील दी

कि उस ने आरोप लगाने वाली लड़की से ब्याह करना तो चाहा, पर चूंकि लड़की मांगलिक थी, इसलिए उस ने शादी नहीं की.

यहां इस धार्मिक रिवाज का जिक्र करना जरूरी है कि मंगली या मांगलिक होना हिंदू परंपरा के अनुसार मंगल के प्रभाव में पैदा हुआ वह इनसान है, जिस की शादी सिर्फ किसी मांगलिक इनसान से ही हो सकती है.

धार्मिक रिवाजों के अनुसार इसे एक तरह का ‘भाग्यदोष’ कहा जाता है यानी लड़की की शादी इस दोष में आसान नहीं होती और कहा जाता है कि अगर वह किसी गैरमांगलिक लड़के से शादी करेगी तो भारी अनहोनी घट सकती है, जैसे शादी टूटना, परिवार में किसी की मौत होना, लड़ाईझगड़े या तरक्की न कर पाना वगैरह.

अब चूंकि उत्तर प्रदेश में पौराणिक सरकार है और सरकार ने आधिकारिक तौर पर ज्योतिष विद्या की पढ़ाई करनेकराने का कोर्स यूनिवर्सिटी में शुरू करा ही दिए हैं, तो लखनऊ बैंच के जस्टिस बृज राज सिंह ने सोचा कि लड़के की बात में तो दम है, आखिर भला कोई भारतीय संस्कृति को मानने वाला कैसे किसी मांगलिक लड़की से शादी कर सकता है? तो फौरन लखनऊ यूनिवर्सिटी के ज्योतिष विभाग के अध्यक्ष से 10 दिन के भीतर लड़की की कुंडली जांचने का आदेश दे दिया कि वह मांगलिक है भी कि नहीं.

यह तो उस दलील से भी घटिया बात निकली, जब कोई लड़का कहे कि चूंकि फलां लड़की घर से बाहर निकली, इसलिए उस के साथ रेप किया. इस में उस बेचारे की गलती नहीं, बल्कि सारी गलती तो लड़की की है और कोर्ट यह पता लगाने लग जाए कि लड़की घर से निकली थी या नहीं.

हालांकि 3 जून, 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस आदेश पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि ‘सवाल यह नहीं है कि मांगलिक तय किया जा सकता है या नहीं और ज्योतिष भी एक विज्ञान है, सवाल यह है कि क्या कोर्ट ऐसा आदेश दे सकता है?’

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही आदेश को रोक दिया, लेकिन इस से यह सवाल उठा कि क्या आने वाले समय में देश में इंसाफ की यही भाषा होने जा रही है? क्या ऐसे जज देशभर के कोर्टों में भरने नहीं लग गए हैं? सवाल यह भी है कि क्या अब इंसाफ करते समय वैज्ञानिक तर्कों की जगह धार्मिक रिवाजों को ऊपर रखा जाने लगा है?

अगर ऐसा होने लगता है, तो कल को कोई महिला अगर घरेलू हिंसा का मामला ले कर अदालत पहुंच कर कोर्ट में तलाक की अर्जी लगाती है, तो उस का मामला तो ऐसे ही रफादफा हो जाएगा कि धार्मिक रिवाज तो औरतों को पति की दासी बनी रहने का आदेश देता है, वह चाहे मारेपीटे, उसे चुपचाप सहना है और पति के आदेश का पालन करना है, क्योंकि ऐसे मौकों पर ही तो आरोपी पति अपने पक्ष में सती प्रथा में जलाई जाने वालों के तर्क रखेंगे.

ऐसा होता है तो कोई दलित कुएं से पानी पीने की फरियाद ले कर पहुंचेगा तो पहले चैक किया जाएगा कि हिंदू रिवाजों में दलित सवर्णों के बनाए कुओं से पानी पी सकता है कि नहीं? वह साथ बैठ कर खाना खा सकता है कि नहीं? या उसे पढ़नेलिखने का हक है कि नहीं?

जिस समाज में लड़की के रंगरूप वगैरह को ले कर इतना भेदभाव किया जाता है, जहां दहेज जैसी कुरीति का बोलबाला है, दहेज हत्या के मामले भयानक हैं, वहां ऐसे आदेश देशभर की लड़कियों का मजाक उड़ाने जैसे नहीं हैं क्या? इस तरह के आदेश कहीं न कहीं पंडोंज्योतिषियों की लूट की दुकान चलती रहे, इसलिए दिए जा रहे हैं.

जरूरत तो यह थी कि कुंडली जैसे फिजूल के रिवाजों और प्रथाओं से लड़ने की एक वैज्ञानिक चेतना जगाई जाए, लेकिन इस की जिम्मेदारी ही जिन्हें सौंपी जा रही है, वे ही ऐसे आदेश देंगे तो हो गया फिर सब का भला.

दोस्त के ब्रेकअप के बाद कैसे करें मदद

‘‘क्या हुआ, तुम इतनी उदास क्यों बैठी हो,’’ नीता ने पूछा तो नेहा फूट पड़ी, ‘‘अविनाश से मेरा ब्रेकअप हो गया है. काफी समय से हम दोनों साथ थे परंतु उस ने मुझे धोखा दे दिया. आई डोंट नो यार, वह तो हमेशा साथ निभाने की बातें करता था, लेकिन उस के मन में क्या चल रहा था यह मुझे पता नहीं था.’’

‘‘यार नेहा, छोड़ अब इन बातों को और अपनी जिंदगी की नए सिरे से शुरुआत कर,’’ नीता ने नेहा के आंसू पोंछते हुए समझाया.

अकसर देखने में आता है कि ब्रेकअप के बाद युवतियां अपनेआप को काफी हताश महसूस करने लगती हैं साथ ही मानसिक रूप से भी इतनी अधिक कमजोर पड़ जाती हैं कि उन्हें जरूरत होती है ऐेसे दोस्त की जो उन्हें समझ सके.

अगर आप की दोस्त का भी ब्रेकअप हो गया है तो आप अपनी दोस्त को इस मुश्किल घड़ी से निकालने में मदद कर सकते हैं जानिए कैसे :

समझदारी दिखाएं

सब से पहले जरूरी है कि आप उस की बात समझिए आखिर उन के बीच हुआ क्या था? उसे अपने मन की बात बोलने दें, इस से उस का मन हलका होगा और जब आप उस की बात सुनेंगे तो उसे अपनेपन का एहसास भी होगा.

ब्रेकअप के बाद वैसे भी दोनों पार्टनर के मन में काफी कुछ चलता रहता है. दोनों एकदूसरे को दोषी ठहराते नजर आते हैं. ऐसे में आप की दोस्त में भी काफी गुस्सा होना लाजमी है. यदि वह आप को सबकुछ बता देगी तो उस का मन शांत हो जाएगा इसलिए बिना कोई राय दिए उस की पूरी बात सुनें.

अनदेखा करना

कई बार ऐसा होता है कि शुरू में जब आप की दोस्त का दिल टूटा होता है, आप उस की सब बातें सुन लेते हैं, लेकिन थोड़े दिन बाद उसे अनदेखा करने लगते हैं. इस से वह मानसिक तौर पर भी टूट जाती है, क्योंकि जिस से वह प्यार करती थी वह तो दूर चला ही गया अब तो उस के सच्चे दोस्त भी उसे अनदेखा कर रहे हैं.

इसलिए जरूरी है कि इस दौरान जब भी उसे अकेलापन महसूस हो, तो आप उसे खुशी का एहसास कराएं. इस से वह बेहतर तरीके से आप से जुड़ पाएगी और मजबूत होती चली जाएगी. इस के लिए आप उसे ज्यादा से ज्यादा समय दें, जब वह निराश हो तो उस में अपनी पौजिटिव बातों से नई ऊर्जा भरने की कोशिश करें. इस से वह बहुत जल्दी इस गम से उभर पाएगी.

घूमने जाएं

यदि आप उस के साथ कहीं घूमने का प्रोग्राम बनाते हैं तो उसे अच्छा लगेगा, क्योंकि ब्रेकअप के बाद युवतियां काफी तनाव में आ जाती हैं. इस तनाव से उभारने के लिए जरूरी है कि  आप उस का ध्यान किसी और जगह पर लगाएं. सभी पुराने दोस्तों को इकट्ठा करें और कहीं घूमने का प्लान बनाएं. किसी ऐसी जगह, जहां आप सभी ऐंजौय कर सकें. जैसे किसी कौमेडी मूवी को देखने या ऐम्यूजमैंट पार्क आदि जगहों पर वह अपनेआप को बेहतर महसूस करेगी और वैसे भी पुराने दोस्तों के साथ मजा दोगुना हो जाएगा.

विश्वासघात न करें

यदि आप अपनी दोस्त का सच्चा मित्र बनना चाहते हैं तो जरूरी है कि आप उस से विश्वासघात न करें. जब वह आप के  सामने अपनी बातें शेयर कर रही हो तो जरूरी है कि आप उस की बातों को और कहीं किसी के सामने न बताएं, क्योंकि शायद उस ने अपने ब्रेकअप से पहले की कुछ सीक्रेट बातें आप से कह दी हों, लेकिन ऐसे में आप का फर्ज है कि उन की बातों को अपने तक ही रखें. धीरेधीरे आप उन के सब से भरोसेमंद फ्रैंड बन जाएंगे और वह आप से हर तरह की बात शेयर कर पाएगी.

बौयफ्रैंड की बुराई न करें

आप की दोस्त का बौयफ्रैंड जिस से उस का ब्रेकअप हुआ है, की बुराई न करें. इस से उस का मन और भी दुखी होगा. साथ ही वह बहुत ज्यादा तनाव महसूस करेगी बल्कि कोशिश करें कि  वह इन बातों से उबर सके, क्योंकि जितनी बातें आप उस से ब्रेकअप के बारे में करेंगे या उस के ऐक्स केबारे में करेंगे वह उतनी ही परेशान होगी. यह भी हो सकता है कि वह इरिटेट हो कर आप से बात करना ही छोड़ दे.

मजाक न बनाएं

कई लोगों की आदत होती है कि वे दूसरों की बातों का मजाक उड़ाते फिरते हैं. यह भी नहीं सोचते कि उस पर क्या गुजर रही है. जरूरी यह है कि आप किसी की भावनाओं को बिना ठेस पहुंचाए उस को ऐसी परिस्थितियों से उबारने की कोशिश करें. मुश्किलें तो हर किसी के जीवन में आती हैं, लेकिन यदि हम सच्चे दोस्त हैं तो जरूरी है कि इस मुश्किल घड़ी में उस का साथ दें.

नए रिश्ते बनाने की सलाह

ब्रेकअप के बाद जब आप की फ्रैंड सिंगल है तो इस का यह मतलब कतई न निकालें कि उसे एक बौयफ्रैंड की सख्त जरूरत है. उसे समझाएं कि उस का ऐक्स बौयफ्रैंड उस के लिए बना ही नहीं था, उसे किसी ऐसे का चुनाव करना चाहिए जो उसे समझ सके. इस से उसे भी लगेगा कि जल्दबाजी में किसी से भी दोस्ती करने का कोई फायदा नहीं होगा.

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