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हिकमत- क्या गरीब परिवार की माया ने दिया शादी के लिए दहेज?- भाग 1

दावतों में जाना माया को पसंद नहीं था क्योंकि वह बदले में किसी को दावत नहीं दे सकती थी, खासकर उस घर में जहां यह इंतजार रहता था कि कब वह शादी कर के विदा हो और उस की चारपाई की जगह पर उस के भतीजे की पढ़ने की मेज लग सके. लेकिन यह दावत विभागाध्यक्ष मनोरमाजी ने अपने पति मनोज की तरक्की होने की खुशी में दी थी, न जाने पर मनोरमाजी नाराज हो जातीं और उन्हें नाराज करना जल में रह कर मगर से बैर मोल लेना था.

दावत में मनोरमाजी के ही नहीं मनोज के औफिस के लोग भी थे. परस्पर परिचय के बाद, सदाबहार विषय देश की वर्तमान स्थिति पर बहस छिड़ गई.

‘‘वर्तमान स्थिति तो बहुत ही हास्यास्पद है भई, सुबह के समय सरेआम यानी खुले में फारिग होते लोग मोबाइल पर बतिया रहे होते हैं, कहीं और मिलेगी पिछड़ेपन और आधुनिकीकरण की ऐसी मिसाल?’’ मिर्जा साहब की बात पर जोरदार ठहाका लगा.

‘‘एक मिसाल और भी है, हमारे समाज में एक ओर तो लिव इन रिलेशनशिप जीरो है और दूसरी ओर आधुनिक उच्च जातियां अभी भी जातिबिरादरी और दहेज के लेनदेन में बुरी तरह पिछड़ी हुई हैं. उन के उत्थान के आसार मुझे अपनी जिंदगी में तो नजर नहीं आ रहे,’’ एक युवक ने उत्तेजित स्वर में कहा.

‘‘ऐसी क्या नाराजगी है अपनी उच्च जाति से, विद्याधर, साफसाफ बताओ बंधु?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘आप सब अकसर पूछते रहते हैं न कि शादी कब कर रहे हो तो सुनिए, मेरी शादी इस जन्म में तो होने से रही क्योंकि हमारे श्रीपंथ समाज में लड़कों का मूल्य निर्धारित है यानी उतनी मोटी रकम दहेज में लिए बगैर मेरे मांबाप  मेरी शादी नहीं करेंगे, बिरादरी में इज्जत का सवाल है और मेरे जैसे मामूली सूरतशक्ल, नौकरी और परिवार यानी हर तरह से औसत लड़के के लिए कोई उतनी रकम क्यों देगा जबकि उतने में मुझ से बेहतर घरवर मिल सकता है.

‘‘अपनी पसंद की या दूसरी जाति में शादी करने का मतलब है, अपनी जाति से बहिष्कार और आजकल जो यह औनर किलिंग का चलन शुरू हो गया है, वह सोच कर तो बिरादरी से बगावत करते हुए भी डर लगता है. कहिए, क्या यह सब पिछड़ापन नहीं है?’’ विद्याधर ने पूछा, ‘‘अगर अपनी बिरादरी की लड़की से भी कम दहेज ले कर शादी कर लूं तो इसे बगावत समझा जाएगा और इस के अलावा मेरी मां, बहनें और मामीचाची वगैरह ताने देदे कर उस लड़की का जीना दुश्वार कर देंगी कि सस्ते में हमारा लाखों का बेटा फंसा लिया. सो, मेरे लिए तो बेहतर यही है कि शादी ही न करूं.’’

माया को लगा जैसे विद्याधर उसी की भावनाएं या व्यथा व्यक्त कर रहा था.

‘‘मूल्य निर्धारण या औनर किलिंग छोटे कसबों की बातें हैं विद्याधर, देश की राजधानी में रहने वाले तुम पर लागू नहीं होतीं,’’ मनोरमाजी बोलीं.

‘‘बात कसबे या राजधानी की नहीं, पिछड़ेपन की हो रही है भाभीजी. और वह तो राजधानी में भी घटने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है, खासकर दहेज और जाति के मामले में.’’

किसी अन्य की टिप्पणी पर माया की हिम्मत बढ़ी और वह बोली, ‘‘आप लोग ठीक कह रहे हैं, औनर किलिंग का तो मालूम नहीं लेकिन राजधानी में भी श्रीपंथ संप्रदाय में तो लड़कों का मूल्य या दहेज की रकम तय है. लड़की चाहे कितनी भी अच्छी हो उस राशि से कम में उस की शादी का सवाल ही नहीं उठता और लड़का चाहे लूलालंगड़ा भी हो, बिकेगा फिक्स्ड रेट पर ही.’’

‘‘तुम्हें यह सब कैसे मालूम है?’’ मनोरमाजी ने पूछा.

‘‘क्योंकि मैं भी श्रीपंथ समाज से ही हूं. मेरी योग्यता और तगड़ी तनख्वाह से दहेज की रकम में कोई रियायत करने को तैयार नहीं है.’’

‘‘तो तनख्वाह से दहेज की रकम जोड़ लो…’’

‘‘और उस के लिए बरसों मन मार कर जीओ,’’ माया ने उस की बात काटी, ‘‘यह सुझाव अकसर मिलता रहता है मगर मुझे यह सौदा मंजूर नहीं है.’’

‘‘होना भी नहीं चाहिए,’’ विद्याधर ने सराहना के स्वर में कहा, ‘‘अगर युवा वर्ग इस प्रथा के सामने घुटने न टेके तो समाज के ठेकेदार स्वयं ही इस प्रथा को समाप्त करने पर मजबूर हो जाएंगे.’’

‘‘हमारे समाज में एक नहीं, कई कुरीतियां ऐसी हैं जिन के सामने घुटने टेकने बंद कर दिए जाएं तो यह जहान जन्नत बन जाए. तुम्हारे से पहले न जाने कितने लोग यह सपना देख चुके हैं विद्याधर…’’

‘‘और न जाने कितने देखेंगे, मिश्राजी,’’ मनोज ने मिश्राजी की बात काटी, ‘‘पत्तागोभी के छिलके छीलने के बजाय आप फूलगोभी के पकौड़े खाइए.’’

मनोज ने तो बात बदल दी लेकिन मनोरमाजी के दिमाग में यह बात जैसे घर कर गई. सब के जाने के बाद उन्होंने मनोज से कहा, ‘‘माया और विद्याधर दोनों जब एक ही जाति के हैं तो क्यों न हम कोशिश कर के दोनों की शादी करवा दें?’’

‘‘विद्याधर से यह सुनने के बाद भी कि दहेज लाने वाली सजातीय लड़की का भी उस की मांबहनें जीना दुश्वार कर देंगी?’’ मनोज ने कहा, ‘‘उन दोनों ने अपने हालात से समझौता कर के जीना सीख लिया है, सो तुम भी उन्हें चैन से जीने दो.’’

लेकिन मनोरमाजी जानती थीं कि दोनों चैन से नहीं बड़ी बेचैनी से जी रहे थे. माया की तनख्वाह से जुटाई गई सुखसुविधाओं का मजा लूटने वाले भाईभाभी उसे परिवार का अनचाहा सदस्य समझते थे और मां भी उन का साथ देती थीं.

यही हाल तकरीबन विद्याधर का भी था, मां उसे चायखाना देते हुए यह याद दिलाना नहीं भूलती थीं कि उन की उमर अब काम करने की नहीं, बहू से सेवा करवाने की है और अकसर आने वाली बहनें भी यह कह कर बिसूरती रहती थीं कि वे अपने पतियों को इसलिए साथ नहीं ला सकतीं कि मां पर काम का बोझ बढ़ जाएगा. जैसे माया जानबूझ कर ससुराल नहीं जा रही थी और विद्याधर शादी से मना कर रहा था. मनोरमाजी ने सोच लिया कि वह माया और विद्याधर को अकसर मिलवाया करेंगी. जल्दी ही संयोग भी बन गया. मनोज को औफिस के काम से कुछ सप्ताह के लिए विदेश जाना पड़ा. औफिस में बकाया काम तो रहता ही है सो, उसे निबटाने के बहाने मनोरमाजी ने एक रोज माया को देर तक रुकने को कहा.

एक नई दिशा : क्या अपना मुकास हासिल कर पाई वसुंधरा – भाग 1

पोस्टमैन के जाते ही वसुंधरा ने जैसे ही लिफाफा खोला वह खुशी से उछल पड़ी और जोर से आवाज लगा कर मां को बुलाने लगी.

मां गायत्री ने कमरे में प्रवेश करते हुए घबरा कर पूछा, ‘‘क्यों, क्या हो गया?’’

‘‘मां, आप की बेटी बैंक में अफसर बन गई. यह देखो, मेरा नियुक्तिपत्र आया है,’’ और इसी के साथ वसुंधरा मां से लिपट गई.

‘‘क्या…’’ कहने के साथ गायत्री का मुंह विस्मय से खुला का खुला रह गया.

‘‘मां, मैं न कहती थी कि मैं एक दिन अपने पैरों पर खड़े हो कर दिखाऊंगी. बस, आप मुझे सहयोग दो. देखो, मां, आज वह दिन आ गया,’’ वसुंधरा भावुक हो कर बोली.

मां की आंखों से खुशी के छलकते आंसू पोंछते हुए उस ने गले में चुन्नी डाली और बैग उठाते हुए बोली, ‘‘मां, मैं ममता मैडम के घर जा रही हूं, उन्हें अपना नियुक्तिपत्र दिखाने. मैडम कालिज से अब वापस आ चुकी होंगी.’’

वसुंधरा का बस चलता तो वह उड़ कर ममता मैडम के पास चली जाती, जो बी.एससी. में पहले साल से ले कर तीसरे साल तक उस को फिजिक्स पढ़ाती रहीं और उस का मार्गदर्शन भी करती रहीं. आज खुशी का यह दिन उन के मार्गदर्शन का ही नतीजा है.

वसुंधरा को याद हैं अतीत के वे दिन जब प्राइमरी स्कूल के अध्यापक और 4 बेटियों के पिता दीनानाथ को अपनी बेटी वसुंधरा का सदैव अपनी कक्षा में प्रथम आना भी कोई तसल्ली नहीं दे पा रहा था. उन्होंने हड़बड़ाहट में उस का विवाह वहां तय कर दिया जहां के बारे में वसुंधरा कभी सोच भी नहीं सकती थी. वह भी उस समय जब वह बी.एससी. द्वितीय वर्ष में थी.

राजू उस की सहेली मंजू की मौसी का लड़का था. मंजू ने उस के बारे में सबकुछ बता दिया था. अपार संपत्ति ने राजू को गैरजिम्मेदार ही नहीं विवेकहीन भी बना दिया था. कोई ऐसा व्यसन न था जिस का वह आदी न हो. बड़ों का सम्मान करना तो वह जानता ही न था.

वसुंधरा को यह जान कर घोर आश्चर्य और दुख हुआ कि राजू के बारे में सबकुछ जानने के बाद भी उस के पिता वहां उस के रिश्ते की बात चला रहे हैं.

‘पिताजी, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती और उस लड़के से तो हरगिज नहीं जिस से आप मेरा रिश्ता करना चाहते हैं,’ वसुंधरा ने पिता से स्पष्ट शब्दों में अपने विचार रखते हुए कहा.

‘तुम कौन होती हो यह फैसला लेने वाली? मैं पिता हूं और यह मेरा अधिकार व जिम्मेदारी है कि मैं तुम्हारा विवाह समय से कर दूं,’ दीनानाथ गरजते हुए बोले.

‘पिताजी, मैं अभी पढ़ना चाहती हूं, जिंदगी में कुछ बनना चाहती हूं,’ वसुंधरा गिड़गिड़ाते हुए बोली.

‘तुम्हारी 3 बहनें और भी हैं. मुझे उन के बारे में भी सोचना है.’

‘वसु, तू तो हमारी स्थिति जानती है बेटी, वह एक संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार है, फिर उन्होंने खुद ही तेरा हाथ मांगा है. तू खुद सोच, हम कैसे मना कर दें,’ मां ने वसुंधरा को प्यार से समझाते हुए कहा.

‘अरे, जवानी में थोड़ी नासमझी तो सभी दिखाते हैं लेकिन परिवार की जिम्मेदारी पड़ते ही सब ठीक हो जाते हैं,’ दीनानाथ ने लड़के का बचाव करते हुए कहा.

‘पिताजी, वह  खुद अपनी जिम्मे- दारी उठाने के काबिल तो है नहीं, फिर परिवार की जिम्मेदारी क्या उठाएगा?’ वसुंधरा ने आवेश में आ कर कहा.

‘खामोश…अपने पिता से बात करने की तमीज भी भूल गई. मैं ने फैसला ले लिया है, तुम्हारा विवाह वहीं होगा,’ दीनानाथ चिल्लाते हुए बोले.

वसुंधरा समझ गई कि उस के विरोध का कोई फायदा नहीं है. वह सोचने लगी कि वादविवाद प्रतियोगिताओं में निर्णायकगण और अपार जन समूह को अपने प्रभावशाली वक्तव्यों से प्रभावित करने वाली लड़की आज अपने विचारों से अपने ही मातापिता को सहमत नहीं करा पा रही है.

घर पर उस के पिताजी ने सगाई की सभी तैयारियां शुरू कर दी थीं. वसुंधरा का मन बहुत बेचैन रहने लगा. किसी भी काम में उस का मन नहीं लग रहा था.

‘वसुंधरा, तुम्हारी फाइल पूरी हो गई?’ ममता मैडम ने ऊंची आवाज में पूछा.

‘मैडम, बस थोड़ा सा काम रह गया है,’ वसुंधरा ने झेंपते हुए कहा.

‘क्या हो गया है तुम्हें आजकल? प्रैक्टिकल की डेट आने वाली है और अभी तक तुम्हारी फाइल पूरी नहीं हुई. अभी फाइल पूरी कर के स्टाफ रूम में ले आना,’ मैडम ने जातेजाते आदेश दिया.

वसुंधरा ने जल्दीजल्दी फाइल पूरी की और सीधे स्टाफरूम की ओर भागी. संयोग से ममता मैडम उस समय वहां पर अकेली बैठी फाइलें चेक कर रही थीं. जैसे ही वसुंधरा ने अपनी फाइल मैडम को दी उन्होंने उस की परेशानी को भांपते हुए कहा, ‘क्या बात है, वसुंधरा, आजकल तुम कुछ परेशान लग रही हो. टेस्ट में भी तुम्हारे नंबर अच्छे नहीं आए. तुम तो बहुत होशियार लड़की हो और हमें तुम से बहुत उम्मीदें हैं.’

अपनी ही दुश्मन : जिस्म और पैसे की भूखी कविता – भाग 1

कविता भी एकदम गजब लड़की थी. उसे हर बात की जल्दी रहती थी. बचपन में उसे जितनी जल्दी खेल शुरू करने की रहती थी, उतनी ही जल्दी उस खेल को खत्म कर के दूसरा शुरू करने की रहती थी. लड़कों को तो बेवकूफ बना कर वह खूब खुश होती थी. युवा होने पर लड़कों की टोली उस के इर्दगिर्द घूमा करती थी. उस टोली में हर महीने एकदो सदस्य बढ़ जाते थे. कविता उन से खुल कर बातें करती थी.

लेकिन उस की यही स्वच्छंदता उस के वैवाहिक जीवन में बाधक बन गई थी. बचपन गया, किशोरावस्था आई, तब तक तो सब कुछ ठीक था. लेकिन जवानी की ड्यौढ़ी पर कदम रखते ही उसे जीवन के कठोर धरातल पर उतरना पड़ा. उस की शादी सुरेश के साथ कर दी गई. भूल या गलती किस की थी, यह तो नहीं पता, लेकिन एक दिन कविता अपने बेटे मोनू को गोद में थामे, हाथ में ट्रौली बैग खींचती आंगन में आ खड़ी हुई.

आंगन के तीनों ओर कमरे बने थे. आवाज सुनते ही तीनों ओर से दादी, बड़की अम्मा, छोटी अम्मा, भाभी, पापा और चचेरे भाईबहन बाहर निकल कर आंगन में एकत्र हो गए. कविता की शादी को अभी कुल डेढ़ साल ही हुआ था. उसे इस तरह आया देख कर सभी हैरत में थे. खुशी किसी के चेहरे पर नहीं थी. मम्मी पापा ने घबरा कर एक साथ पूछा, ‘‘क्या हुआ बिटिया, तू इस तरह…?’’

‘‘इसे संभालो.’’ कविता मोनू को मां की गोद में थमाते हुए बोली, ‘‘मैं अब सुरेश के साथ वापस नहीं जा सकती.’’ इसी के साथ वह ट्रौली बैग को आंगन में ही छोड़ कर एक कमरे की ओर बढ़ गई.

‘‘अरी चुप कर, जो मुंह में आया बक दिया. शर्म नहीं आती अपने मर्द का नाम लेते.’’ दादी ने नाराजगी दिखाई. लेकिन कविता ने उन की बात पर ध्यान नहीं दिया. भाभी ने मोनू को मां की गोद में से ले कर सीने से लगा लिया.

अंदर जाते ही कविता ने इस तरह जूड़ा खोला मानो चैन की सांस लेना चाहती हो. लंबे घने काले बाल उस की पीठ पर इस तरह पसर गए, जैसे उस के आधे अस्तित्व को ढंक लेना चाहते हों. सब लोग बाहर से अंदर आ गए थे. कविता पर सवालों की बौछार होने लगी. लेकिन कविता ने सब को 2 शब्दों में चुप करा दिया, ‘‘मुझे थकान भी है और भूख भी लगी है. पहले मैं नहाऊंगीखाऊंगी, उस के बाद बात करना.’’

चचेरा भाई कविता का ट्रौली बैग अंदर ले आया था. उस ने उठ कर बैग खोला और अपने कपड़े ले कर इस तरह नहाने के लिए बाथरूम में चली गई, जैसे उसे किसी की परवाह ही न हो. इस बीच भाभी और बच्चे मोनू को हंसाने और खेलाने में लग गए थे. जबकि कविता के मातापिता दूसरे कमरे में एकदूसरे पर कविता को बिगाड़ने का दोषारोपण कर रहे थे.

तभी उन की बातें सुन कर दादी अंदर आ गई और आते ही बोलीं, ‘‘अरे चुप करो दोनों. तुम दोनों ने ही बिगाड़ा है इसे. मैं तो इस के लच्छन पहले ही जानती थी. सुरेश शादी न हुई होती तो अब तक पता नहीं क्या गुलखिलाती. न सुनने की तो आदत ही नहीं है इसे. हर जगह मनमानी करती है. देखो 20-22 साल की हो गई और ससुराल से बच्चा लटका कर मायके लौट आई.’’

‘‘अरे अम्मा, बेकार परेशान हो रही हो, सुरेश को यहीं बुला कर दोनों का समझौता करा देंगे.’’ मोहन ने अंदर आते हुए कहा, ‘‘मियांबीबी में छोटेमोटे झगड़े तो चलते ही रहते हैं. कविता को तो जानती ही हो, सुरेश ने कुछ कह दिया होगा और यह तैश में आ कर भाग आई.’’

कविता नहा कर आ गई तो भाभी उस की बांह पकड़ कर छत पर ले गईं. ऊपर जा कर भाभी ने पूछा, ‘‘लाडो, दामादजी से कोई गलती हो गई क्या?’’

‘‘अब तुम से क्या छिपाना भाभी, अब सुरेश मुझ से पहले की तरह प्यार नहीं करते.’’ कहते हुए कविता के आंसू छलक आए.

जाएं तो जाएं कहां : चार कैदियों का दर्द – भाग 1

वे चारों दिल्ली के तिहाड़ जेल में विचाराधीन कैदी थे. वे दिल्ली में ही पकड़े गए थे. चारों की उम्र 40 से 45 साल के आसपास थी. वे जानते थे कि कुछ समय बाद उन को अपने इलाके के जेलों में भेज दिया जाएगा. पुलिस के मुताबिक, उन्होंने अपराध किए थे. विचाराधीन कैदियों से काम करवाने का कोई कानून नहीं था, लेकिन कानून उस का जिस के हाथ में ताकत. हर बैरक का एक इंचार्ज होता है, जिसे जेल की भाषा में वार्डन कहते हैं. जेल में आते ही कैदियों से उन के बारे में जान लिया जाता है कि वे क्या काम कर सकते हैं. वे चारों बहुत तगड़े नहीं थे. उन से पानी भरवाने या साफसफाई का मेहनत वाला काम नहीं लिया जा सकता था. उन से पूछा गया कि वे क्या काम कर सकते हैं  उन्होंने कुछ नहीं कहा. वे चुप ही रहे.

जेल में 5 सौ लोगों के लिए दोनों वक्त का भोजन, दलिया, चाय बनाना होता है. इस के लिए रसोई में काम करने वालों को सुबह 4 बजे उठना पड़ता है. उन्हें एक अलग बैरक दे दिया जाता है, जिस में रसोई में काम करने वाले कैदी रहते हैं.

लेकिन रसोई में काम करने का एक फायदा यह भी था कि उन्हें 100-150 आदमियों के बीच जानवरों की तरह रहने की जरूरत नहीं थी, न ही बारबार की मारपिटाई, बेइज्जती की चिंता थी और न ही गुंडेटाइप लोगों की सेवा करने की जरूरत पड़ती थी. जेल के वार्ड सुबह 7 बजे खुलते थे. जिन कैदियों की जेल में सत्ता थी, पकड़ थी, वे अपना चायनाश्ता ले कर रसोई में आ जाते और रसोइए बड़ीबड़ी भट्ठियों में किनारे की थोड़ी सी जगह उन के लिए छोड़ देते. रसोई में काम करने वाले पुराने कैदी रिहा हो चुके थे या दूसरे जेलों में ट्रांसफर हो चुके थे. शुरू में आए कैदियों को जेल के दूसरे कैदी और जेल प्रशासन उसी नजर से देखता है, जो केस पुलिस ने बताया है. धीरेधीरे उन के तौरतरीकों से समझ आता है कि वे आदतन अपराधी नहीं हैं. अपराध या तो गुस्से में आ कर जोश में हुआ है या पुलिस ने झूठे केस में फंसाया है.

शुरूशुरू में उन चारों पर बड़ी सख्ती होती. उन पर निगरानी रखी जाती. उन के साथ वही होता, जो नए कैदी के साथ होता है. गालीगलौज, मारपीट. बड़े अपराधियों द्वारा अपने निजी काम कराना. बैरक की साफसफाई से ले कर झाड़ू लगाना. सीनियर कैदियों के कपड़े धोना. उन की हर तरह से सेवा करना. जब बैरक नंबर एक का कैदी अनुपम परेशान हो गया, तो उस ने हिम्मत कर के हवलदार से कहा, ‘‘साहब, ऐसे तो मैं मर जाऊंगा. आप कुछ कीजिए.’’ अनुपम ने जिस हवलदार से कहा, वह उसी की जाति का था. हवलदार ने कहा, ‘‘मैं क्या कर सकता हूं  यह जेल है, घर नहीं. यहां तो यह सब होता ही है.’’ अनुपम की बारबार की गुजारिश से पसीज कर हवलदार ने कहा, ‘‘रसोई का काम ले लो. काम ज्यादा है, लेकिन बाकी मुसीबतों से बच जाओगे.’’

यह सुनते ही अनुपम मान गया. बैरक नंबर 2 में बंद बिशनलाल को खाना बनाना आता था. जब यह बात जेलर को पता चली, तो उसे बुला कर पूछा, ‘‘रसोई में काम कर सकते हो ’’

बिशनलाल ने तुरंत हां कर दी. बैरक नंबर 3 में चांद मोहम्मद और राकेश थे. वे भी दबंग कैदियों की सेवा से थक चुके थे. उन्होंने गार्ड मोहम्मद आसिफ से अपनी तकलीफ कही. गार्ड मोहम्मद आसिफ ने कहा, ‘‘मैं साहब से बात कर के रसोईघर में रखवा सकता हूं, लेकिन कोई शिकायत नहीं मिलनी चाहिए. मन लगा कर ईमानदारी से काम करना.’’ उन दोनों ने हामी भर दी. गार्ड मोहम्मद आसिफ ने जेलर से उन को रसोईघर में काम पर रखने के लिए कहा. जेलर ने यह कह कर मना कर दिया कि ये तो संगीन और बड़े अपराध में आते हैं. अगर कहीं उन्होंने भागने की कोशिश की या कुछ और गड़बड़ की, तो जेल प्रशासन मुसीबत में आ जाएगा.

गार्ड मोहम्मद आसिफ ने कहा कि ये 2 साल से बंद हैं. इन का कोई भी नहीं है. इतने समय में आदमी की पहचान हो जाती है. दोनों बहुत ही सीधे हैं.

जेलर ने अपनी बात रखते हुए कहा, ‘‘लेकिन, विचाराधीन कैदियों को काम देना नियम के खिलाफ है.’’

इस पर गार्ड मोहम्मद आसिफ ने कहा, ‘‘साहब, यहां कौन से काम नियम से होते हैं. जेल में गांजा बिकता है. बड़े विचाराधीन कैदियों के पास मोबाइल फोन हैं. हथियार हैं. उन का खानापीना अलग बनता है. वे सब कौन से नियम का पालन करते हैं या हम उन से करवा सकते हैं.

‘‘उन की मुलाकात जब चाहे तब होती है. वे जब तक चाहें, तब तक मिल सकते हैं. उन के पास बाहर से हफ्ता आता है. हम उन पर रोक नहीं लगा सकते.

‘‘और फिर, इन का तो अपराध भी साबित नहीं हुआ है. पहली बार जेल आए हैं. न ही इन की कोई जमानत कराने वाला है, न ही कोई मिलने आने वाला. अनुपम और बिशनलाल भी तो बड़े अपराध में बंद हैं. वे भी रसोई में काम कर रहे हैं.’’

जेलर ने कुछ देर सोचा, फिर कहा, ‘‘ठीक है.’’

इस तरह उन चारों को रसोई वाला छोटा सा बैरक मिल गया, जो उन के लिए सुकून की जगह थी.

वे सुबह 4 बजे उठते. जेल का गार्ड आ कर उन के बैरक का ताला खोलता, उन्हें बाहर निकालता. वे रसोई में चाय और दलिया बनाना शुरू कर देते.

इस बीच जेल के गार्डों के लिए और साथ में खुद के लिए अच्छी चाय बनाते. गार्ड अपनी ड्यूटी करते और वे चारों मिलजुल कर जेल में बंद 5 सौ कैदियों के लिए जेलछाप चाय बनाते.

जेलछाप चाय मतलब बहुत बड़े बरतन में 5 सौ लोगों के लिए चाय, जिस में शक्कर भी कम, चायपत्ती भी कम और दूध भी कम.

कैदियों के हिस्से की शक्कर, चायपत्ती, दूध वगैरह जेलर, सुपरिंटैंडैंट व उपजेलर के घर पहुंचते थे. इस का कोई विरोध नहीं करता था. यह नियम सा बन गया था. एक लिटर वाले 5 पैकेट दूध में 500 लोगों की चाय. बाकी 45 पैकेट दूध जेल प्रशासन के पास जाता.

जेल में सामग्री सप्लाई करने वाले ठेकेदार और जेल सुपरिंटैंडैंट, जेलर के बीच सब तय हो जाता था. अंदर जो आता, वही कैदियों के हिस्से का माना जाता.

साथ काम करतेकरते उन चारों में अपनापन हुआ, जुड़ाव हुआ. उन्होंने एकदूसरे के बारे में पूछना शुरू किया.

उन चारों प्रमुख रसोइयों के अलावा उन के जूनियर भी थे, जो रहते थे मुख्य बैरकों में, लेकिन सुबह 7 बजे बैरक खुलने के बाद वे मुख्य रसोइयों द्वारा बनाई गई चाय व दलिया 2 बड़ेबड़े बरतनों में ले कर सब को बांटते थे.

दोपहर के 12 बजे तक खाना बंटने के बाद वे चारों अपने छोटे से बैरक में आ कर अपने लिए बनाया स्वादिष्ठ भोजन करते. इस बीच गिनती के साथ सभी बैरक बंद हो जाते.

वे चारों भी अपने बैरक में आराम करते. फिर शाम की चाय बनाते. फिर 6 बजे तक खाना बनता और बंटता. बांटने वाले अलग थे. चारों अपने लिए बनाया खाना ले कर अपने बैरक में आते.

शाम 6 से साढ़े 6 बजे के बीच फिर से सभी कैदियों की गिनती होती. गार्ड बाहर से ताला लगाते और कैदी बैरक के अंदर खाना खाते, टैलीविजन देखते और सेवा करने वाले गरीब, कमजोर हाथपैर दबाते हुए अमीर, ताकतवर कैदियों से बदले में बीड़ीतंबाकू इनाम के तौर पर पाते, फिर सो जाते.

टैलीविजन में सिर्फ दूरदर्शन आता, बाकी के चैनल नहीं. कुछ बैरकों में रंगीन टैलीविजन, कुछ में ब्लैक ऐंड ह्वाइट. जो सब के लिए खाना बनाते, उन्हें इतना हक खुद ब खुद मिला हुआ था कि वे अपने लिए अच्छी रोटी और तड़का लगी दाल और अच्छी सब्जी बना सकते थे.

ताकतवर कैदी भी अपने लिए ये साधन जुटा लेते. बाकियों का भोजन ऐसा था कि दाल में दाल के दाने ढूंढ़ने से भी नहीं मिलते थे. रोटियां कच्ची या जली हुई होतीं.

वे चारों रसोई के बैरक में थे. सिपाही बैरक का ताला लगा कर अपनी ड्यूटी पर तैनात था. शाम के 7 बज चुके थे. चारों ने मिल कर खाना खाया.

चांद मोहम्मद ने बिशनलाल से पूछा, ‘‘तुम्हारी जमानत का क्या हुआ ’’

‘‘खारिज हो गई है…’’ बिशनलाल ने उदास लहजे में कहा.

अनुपम ने बीच में कहा, ‘‘जुर्म भी तो बड़ा है.’’

‘‘मैं बेकुसूर हूं,’’  बिशनलाल ने विरोध में कहा.

‘‘हर कुसूरवार जेल में आ कर यही कहता है, ‘‘अनुपम ने ताना कसा.

‘‘तो तुम मानते हो कि तुम ने गुनाह किया है ’’ राकेश ने अनुपम से पूछा.

‘‘मेरे कहने या न कहने से क्या होता है. एक बार पुलिस ने जो केस बना दिया, लग गया वही ठप्पा. मैं बेकुसूर हूं, इस बात को कौन मानेगा ’’

‘‘तुम फंसे कैसे इस चक्कर में  लगता तो नहीं…’’ राकेश ने पूछा.

‘‘सुनने में दिलचस्प है न मेरी कहानी ’’ अनुपम ने कहा.

‘‘सुनाओ, एकदूसरे की सुन कर मन भी हलका होगा और समय भी कटेगा,’’ चांद मोहम्मद ने कहा.

अनुपम उन्हें अपनी आपबीती सुनाते हुए समय को पीछे की ओर खींच ले गया.

‘‘मैं कश्मीरी ब्राह्मण हूं. जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर में अपने परिवार के साथ मैं भी जन्नत की सी जिंदगी जी रहा था. खूबसूरत बीवी. 2 प्यारी बेटियां. बैंक की नौकरी. अपना घर.

‘‘मेरी बीवी मनोरमा घरेलू औरत थी. बेटियां पलक और अलका 10वीं और 11वीं जमात में पढ़ रही थीं. जिंदगी बड़े आराम से गुजर रही थी.

‘‘आतंकवाद ने फिर से दस्तक दी. हमें लगा कि आतंक का एक दौर गुजर चुका है. कई बेकुसूर मारे जा चुके थे. आतंकवादी मारे जा चुके थे या सरैंडर कर चुके थे. चारों ओर सैनिकों के कदमों की आवाजें सुनाई देती थीं, लेकिन हम जैसे मिडिल क्लास लोग सुकून महसूस कर रहे थे.

‘‘हमें लगा कि सेना है, तो हम महफूज हैं, लेकिन कुदरत का नियम हर जगह लागू होता है. हर कमजोर भोजन होता है ताकतवर का.

‘‘रात का वक्त था. अचानक घर की पिछली दीवार से किसी के कूदने की आवाज सुनाई दी. मैं पीछे देखने के लिए गया. सामने का नजारा देख कर मेरी रूह कांप गई.

‘‘मैं दरवाजा बंद करने के लिए तेजी से मुड़ा कि आवाज आई, ‘अपनी जगह से हिले तो गोली चला दूंगा.’

‘‘वे 3 थे. तीनों की एके 47 मेरी तरफ ही तनी हुई थी.

‘‘मेरे हलक से बड़ी मुश्किल से आवाज निकली, ‘क्या…चाहिए ’

‘‘उन में से एक ने कहा, ‘हमें आज रात आसरा चाहिए. कल सुबह हम चले जाएंगे. लेकिन अगर तुम ने कोई हरकत की, तो गोली मार दूंगा.’

‘‘इस के बाद वे मुझे धकेलते हुए मेरे ही घर के अंदर ले गए और वहां जा कर एक आतंकवादी ने कहा, ‘कौनकौन हैं घर में  सब सामने आओ.’

‘‘मेरी पत्नी समझदार थी. उस ने दोनों बेटियों को दूसरे कमरे में अलमारी के पीछे छिपा दिया.

‘‘पत्नी सामने आई. उस ने कहा, ‘हम दोनों ही हैं. बेटियां अपने मामा के घर गई हुई हैं.’

‘‘उन्होंने घर की तलाशी ली. इस के बाद वे निश्चिंत हुए. उन में से एक ने कहा, ‘हमें भूख लगी है. खाना चाहिए.’

‘‘पत्नी ने डरते हुए कहा, ‘अभी बनाती हूं.’

‘‘पत्नी खाना बनाने लगी. वे चारों टैलीविजन देखने लगे. मुझे उन्होंने अपने बीच बिठा लिया और एक ने कहा, ‘डरो मत. हम सुबह चले जाएंगे. पर तुम कोई बेवकूफी मत करना, नहीं तो…’

‘‘मैं समझ गया था उन की धमकी. उन के पास शराब की बोतल थी. उन्होंने मुझे गिलास लाने का इशारा किया.

‘‘मैं रसोईघर में गया. उन में से एक अपनी एके 47 के साथ मेरे पीछेपीछे आया.

‘‘मैं रसोईघर से कांच के 3 गिलास लाया. तब तक खाना बन चुका था. मेरी पत्नी ने उन्हें खाना परोसा. वे खाना खाते रहे, शराब पीते रहे. खाना खाने के बाद उन्होंने बाकी शराब भी खत्म की.

‘‘उन में से एक ने कहा, ‘हमें औरत चाहिए.’ ‘‘यह सुन कर मैं सकते में था और मेरी पत्नी दहशत में. ‘‘एक आतंकवादी ने मुझे कुरसी पर जबरदस्ती बिठा कर अपनी एके 47 मेरे सिर पर लगा दी. दूसरे ने मेरी पत्नी से कहा, ‘हम बहुत दिनों से भटक रहे हैं. कल सुबह चले जाएंगे. अपनी और अपने पति की सलामती चाहती हो, तो हमें अपनी मनमानी करने दो. आवाज निकली, तो समझो कि तुम दोनों की लाशें बिछीं.’ ‘‘बाकी 2 मेरी पत्नी के साथ बारीबारी से बलात्कार करते रहे. ‘‘जब दोनों मनमानी कर चुके, तो तीसरा मेरी पत्नी के पास पहुंचा. पहले ने मुझ पर एके 47 तान दी. रात के 12 बजे से 4 बजे तक वे बारीबारी से मेरी पत्नी के साथ बलात्कार करते रहे और मैं सिर झुकाए बैठा रहा.

‘‘हमें चिंता अपनी बेटियों की थी. विरोध करने पर हमारे साथ कुछ होता, तो  दोनों बाहर आ जातीं. ‘‘सुबह के 4 बजे वे निकल गए. हमें हमारे ही घर में लाश की तरह बना कर. बस तसल्ली थी तो इतनी कि बेटियों की आबरू बची रही.

‘‘सुबह के 8 बजे थे. टैलीविजन पर खबर आई कि सुबह 5 बजे सेना ने मुठभेड़ में 2 आतंकी मार गिराए. तीसरा पकड़ा गया. उस आतंकी ने बताया कि वे रात में एक घर में पनाह लिए हुए थे.

‘‘खबर सुन कर पत्नी ने घबरा कर कहा, ‘मैं बेटियों को ले कर अपने भाई के घर जा रही हूं. यहां कभी भी पुलिस आ सकती है. आप तुरंत किसी वकील के पास जाइए, नहीं तो आतंकियों को पनाह देने के जुर्म में पता नहीं हमें क्याक्या भुगतना पड़े ’

‘‘पत्नी रोते हुए बच्चों को ले कर घर से निकल गई. मैं वकील के घर पहुंचा. ‘‘वकील ने गुस्से में कहा, ‘अपने साथ क्या हमें भी मरवाओगे  यहां कोई नहीं सुनेगा. तुम दिल्ली जा कर किसी वकील से मिलो.’

‘‘उस ने मुझे फौरन घर से बाहर कर दिया. मैं छिपतेछिपाते दिल्ली पहुंचा, पर गिरफ्तार कर लिया गया.

‘‘मैं जितनी बार खुद को बेकुसूर कहता, उतनी ही बार मुझ पर कानून की थर्ड डिगरी चलती. मैं ने पुलिस के दिए कागजों पर दस्तखत कर दिए. तब से  यहां 2 साल हो गए.’’

हृदय परिवर्तन : क्या सुनंदा अपने सौतेले बच्चों को मां जैसा प्यार दे पाई- भाग 3

अमन ने बी.टैक कर के अपने पसंद  की लड़की से शादी कर ली, जान कर विनय ने उस से बात करना छोड़ दिया. वहीं अमन का कहना था, ‘‘जब उन्हें हमारी परवाह नहीं तो हम क्यों उन की परवाह करें. क्या दूसरी शादी उन्होंने हम से पूछ कर की थी? कौन संतान चाहेगी कि उस के हिस्से का प्रेम कोई और बांटे?’’ ‘‘ऐसा नहीं कहते. उन्होंने तुम्हें पढ़ायालिखाया,’’ मैं बोला. ‘‘पढ़ाना तो उन्हें था ही. पढ़ा कर उन्होंने हमारे ऊपर कौन सा एहसान किया है? नानी हमारे नाम काफी रुपयापैसा छोड़ गई थीं. आज भी पापा जिस मकान में रहते हैं वह मेरी नानी का है और मेरे नाम है.’’ ‘आज के लड़के काफी समझदार हो गए हैं. उन्हें बरगलाया नहीं जा सकता,’ यही सोच कर मैं ने ज्यादा तूल नहीं दिया. मोनिका की शादी कर के विनय पूरी तरह सुनंदा का हो कर रह गया. न कभी अमन के बारे में हाल पूछता न ही मोनिका का. समय बीतता रहा. विनय ने सुनंदा के लिए एक फ्लैट खरीदा. फिर वहीं जा कर रहने लगा. अमन को पता चला तो बनारस आया और अपने मकान की चाबी ले कर दिल्ली लौट गया. विनय ने उसे काफी भलाबुरा कहा. खिसिया कर यह भी कहा कि पुश्तैनी मकान में उसे फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा. अमन ने उस की बात का कोई जवाब नहीं दिया, क्योंकि वह जानता था कि यह उतना आसान नहीं जितना पापा सोचते हैं.

सुनंदा की लड़की भी शादी योग्य हो गई थी. सुनंदा उस की शादी किसी अधिकारी लड़के से करना चाहती थी, जबकि विनय उतना दहेज दे पाने में समर्थ नहीं था. बस यहीं से दोनों में मनमुटाव शुरू हो गया. सुनंदा उसे आए दिन ताने मारने लगी. कहती, ‘‘अमन को पढ़ाने के लिए 10 लाख खर्च कर दिए वहीं मेरी बेटी की शादी के लिए रुपए नहीं हैं?’’ ‘‘ऐसी बात नहीं है. फ्लैट खरीदने के बाद मेरे पास 10 लाख ही बचे हैं. 35 लाख कहां से लाऊं?’’

‘‘अमन से मांगो,’’ सुनंदा बोली.

‘‘बेमलतब की बात न करो. मैं ने तुम्हारे लिए उस से अपना रिश्ता हमेशा के लिए खत्म कर लिया है.’’

‘‘मेरे लिए?’’ सुनंदा ने त्योरियां चढ़ाईं, ‘‘यह क्यों नहीं कहते दो पैसे आने लगे तो तुम्हारे बेटे के पर निकल आए?’’

‘‘कुछ भी कह लो. मैं उस से फूटी कौड़ी भी मांगने वाला नहीं.’’

‘‘ठीक है न मांगो. पुश्तैनी मकान बेच दो.’’

‘‘विनय को सुनंदा की यह मांग जायज लगी. वैसे भी संयुक्त परिवार के उस मकान में अब रहने को रह नहीं गया था. अमन को भनक लगी तो भागाभागा आया.’’ ‘‘मकान बिकेगा तो सब को बराबरबराबर हिस्सा मिलेगा,’’ अमन विनय से बोला.

‘‘सब का मतलब?’’

‘‘मोनिका को भी हिस्सा मिलेगा.’’

‘‘मोनिका की शादी में मैं ने जो रुपए खर्च किए उस में सब बराबर हो गया.’’ ‘‘आप को कहते शर्म नहीं आती पापा? मोनिका क्या आप की बेटी नहीं थी, जो उस की शादी का हिसाब बता रहे हैं?’’‘‘तुम दोनों के पास मकान है.’’ ‘‘वह मकान मेरी नानी का दिया है. यह मकान मेरे दादा का है. कानूनन इस पर मेरा हक भी है. बिकेगा तो मेरे सामने. हिसाब होगा तो मेरे सामने,’’ अमन का हठ देख कर सामने तो सुनंदा कुछ नहीं बोली, मगर जब विनय को अकेले में पाया तो खूब लताड़ा, ‘‘बहुत पुत्रमोह था. मिल गया उस का इनाम. मेरे बेटेबेटी के मुंह का निवाला छीन कर उसे पढ़ायालिखाया, बड़ा आदमी बनाया. अब वही आंखें दिखा रहा है.’’ ‘‘मैं ने किसी का निवाला नहीं छीना. वह भी मेरा ही खून है.’’

‘‘खून का अच्छा फर्ज निभाया,’’ सुनंदा ने तंज कसा.

‘‘बेटी तुम्हारी है मेरी नहीं,’’ विनय की सब्र का बांध टूट गया.

सुन कर सुनंदा आगबबूला हो गई, ‘‘तुम्हारे जैसा बेशर्म नहीं देखा. शादी के समय तुम्हीं ने कहा था कि मैं इस को पिता का नाम दूंगा. अब क्या हुआ, आ गए न अपनी औकात पर. मैं तुम्हें छोड़ने वाली नहीं.’’ ‘‘हां, आ गया अपनी औकात पर,’’ विनय भी ढिठाई पर उतर आया, ‘‘मेरे पास इस के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं है. भेज दो इसे इस के पिता के पास. वही इस की शादी करेगा. मैं इस का बाप नहीं हूं.’’ सुन कर सुंनदा आंसू बहाने लगी. फिर सुबकते हुए बोली, ‘‘क्या यह भी तुम्हारा तुम्हारा बेटा नहीं है? क्या इस से भी इनकार करोगे?’’ सुनंदा ने अपने बेटे की तरफ इशारा किया. उसे देखते ही विनय का क्रोध पिघल गया. सुनंदा की चाल कामयाब हुई. आखिरकार अमन की ही शर्तों पर मकान बिका. मोनिका रुपए लेने में संकोच कर रही थी. अमन ने जोर दिया तो रख लिए. उस रोज के बाद विनय का मन हमेशा के लिए अमन से फट गया.  रिटायर होने के बाद विनय अकेला पड़ गया. सुनंदा का बेटा अभी 15 साल का था. उस का ज्यादातर लगाव अपनी मां से था. सुनंदा की बेटी भी मां से ही बातचीत करती. वह सिर्फ उन दोनों का नाम का ही पिता था. ऐसे समय विनय को आत्ममंथन का अवसर मिला तो पाया कि उस ने अमन और मोनिका के साथ किए गए वादे ठीक से नहीं निभाए. उसे तालमेल बैठा कर चलना चाहिए था. अपनी गलती सुधारने के मकसद से विनय ने मुझे याद किया. मैं ने उस से कोई वादा तो नहीं किया, हां विश्वास जरूर दिलाया कि अमन को उस से मिलवाने का भरसक कोशिश करूंगा. इसी बीच विनय को हार्टअटैक का दौरा पड़ा. मुझे खबर लगी तो मैं भागते हुए अस्पताल पहुंचा. सुनंदा नाकभौं सिकोड़ते हुए बोली, ‘‘इस संकट की घड़ी में कोई साथ नहीं है. बड़ी मुश्किल से महल्ले वालों ने विनय को  पहुंचाया.’’

मैं ने मन ही मन सोचा कि आदमी जो बोता है वही काटता है. चाहे विनय हो या सुनंदा दोनों की आंख पर स्वार्थ की पट्टी पड़ी रही. विनय कुछ संभला तो अमन को ले कर भावुक हो गया. मोनिका विनय को देखने आई, मगर अमन ने जान कर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई. रात को मैं ने अमन को फोन किया. विनय की इच्छा दुहराई तो कहने लगा,‘‘अंकल, कोई भी संतान नहीं चाहेगी कि उस की मां की जगह कोई दूसरी औरत ले. इस के बावजूद अगर पापा ने शादी की तो इस आश्वासन के साथ कि हमारे साथ नाइंसाफी नहीं होगी. बल्कि नई मां आएगी तो वह हमारा बेहतर खयाल रखेगी. हमें भी लगा कि पापा नौकरी करें कि हमें संभालें. लिहाजा इस रिश्ते को हम ने खुशीखुशी स्वीकार कर लिया. हमें सुनंदा मां से कोई शिकायत नहीं. शिकायत है अपने पापा से जिन्होंने हमें अकेला छोड़ दिया और सुनंदा मां के हो कर रह गए. मोनिका की शादी जैसेतैसे की, वहीं सुनंदा मां की बेटी के लिए पुश्तैनी मकान तक बेच डाला. मुझे संपत्ति का जरा सा भी लोभ नहीं है. मैं तो इसी बहाने पापा की नीयत को और भी अच्छी तरह जानसमझ लेना चाहता था कि वे सुनंदा मां के लिए कहां तक जा सकते हैं. देखा जाए तो उस संपत्ति पर सिर्फ मेरा हक है. पापा ने सुनंदा मां के लिए फ्लैट खरीदा. अपनी सारी तनख्वाह उन्हें दी. तनख्वाह ही क्यों पी.एफ., बीमा और पैंशन सभी के सुख वे भोग रही हैं. बदले में हमें क्या मिला?’’

‘‘क्या तुम्हें रुपयों की जरूरत है?’’

‘‘हमें सिर्फ पापा से भावनात्मक लगाव की जरूरत थी, जो उन्होंने नहीं दिया. वे मां की कमी तो पूरी नहीं कर सकते थे, मगर रात एक बार हमारे कमरे में आ कर हमें प्यार से दुलार तो सकते थे. इतना ही संबल हमारे लिए काफी था,’’ कहतेकहते अमन भावुक हो गया. ‘‘उन्हें अपने किए पर अफसोस है.’’ ‘‘वह तो होगा ही. उम्र के इस पड़ाव पर जब सुनंदा मां ने भी उपेक्षात्मक रुख अपनाया होगा तो जाहिर है हमें याद करेंगे ही.’’ ‘‘तुम भी क्या उसी लहजे में जवाब देना चाहते हो? उस ने प्रतिशोध लेना चाहते हो?’’

‘‘मैं क्या लूंगा, वे अपनी करनी का फल भुगत रहे हैं.’’

‘जो भी हो वे तुम्हारे पिता हैं. उन्होंने जो किया उस का दंड भुगत रहे हैं. तुम तो अपने फर्ज से विमुख न होओ, वे तुम से कुछ मांग नहीं रहे हैं. वे तो जिंदगी की सांध्यबेला में सिर्फ अपने किए पर शर्मिंदा हैं. चाहते हैं कि एक बार तुम बनारस आ जाओ ताकि तुम से माफी मांग कर अपने दिल पर पड़े नाइंसाफी के बोझ को हलका का सकें. मेरे कथन का उस पर असर पड़ा. 2 दिन बाद वह बनारस आया. हम दोनों विनय के पास गए, सुनंदा ने देखा तो मुंह बना लिया. विनय अमन को देख कर भावविह्वल हो गया. भर्राए गले से बोला, ‘‘तेरी मां से किया वादा मैं नहीं निभा पाया. हो सके तो मुझे माफ कर देना,’’ फिर थोड़ी देर में भावुकता से जब वह उबरा तो आगे बोला, ‘‘मां की कमी पूरी करने के लिए मैं ने सुनंदा से शादी की, मगर मैं उस पर इस कदर लट्टू हो गया कि तुम लोगों के प्रति अपने दायित्वों को भूल गया. मुझे सिर्फ अपने निजी स्वार्थ ही याद रहे.’’

‘‘सुनंदा मां को सोचना चाहिए था कि आप ने शादी कर के उन्हें सहारा दिया. बदले में उन्होंने हमें क्या दिया? आदमी को इतना स्वार्थी नहीं होना चाहिए,’’ अमन बोला. सुनंदा बीच में बोलना चाहती थी पर विनय ने रोक दिया. मुझे लगा यही वक्त है वर्षों बाद मन की भड़ास निकालने का सो किचिंत रोष में बोला, ‘‘भाभी, जरूरत इस बात की थी कि आप सब मिल कर एक अच्छी मिसाल बनते. न अमन आप की बेटी में फर्क करता न ही आप की बेटी अमन में. दोनों ऐसे व्यवहार करते मानों सगे भाईबहन हों. मगर हुआ इस का उलटा. आप ने आते ही अपनेपराए में भेद करना शुरू कर दिया. विनय की कमजोरियों का फायदा उठाने लगीं. जरा सोचिए, अगर विनय आप से शादी नहीं करता तब आप का क्या होता? क्या आप विधवा होने के सामाजिक कलंक के साथ जीना पसंद करतीं? साथ में असुरक्षा की भावना होती सो अलग.’’

विधवा कहने पर मुझे अफसोस हुआ. बाद में मैं ने माफी मांगी. फिर मैं आगे बोला,‘‘कौन आदमी दूसरे के जन्मे बच्चे की जिम्मेदारी उठाना चाहता है? विधुर हो या तलाकशुदा पुरुष हमेशा बेऔलाद महिला को ही प्राथमिकता देता है. इस के बावजूद विनय ने न केवल आप की बेटी को ही अपना नाम दिया, बल्कि उस की शादी के लिए अपना पुश्तैनी मकान तक बेच डाला.’’ अपनी बात कह कर हम दोनों अपनेअपने घर लौट आए, एक रोज खबर मिली कि सुनंदा और विनय दोनों दिल्ली अमन से मिलने जा रहे हैं. निश्चय ही अपनी गलती सुधारने जा रहे थे. मुझे खुशी हुई. देर से सही सुनंदा भाभी का हृदयपरिवर्तन तो हुआ.

हृदय परिवर्तन : क्या सुनंदा अपने सौतेले बच्चों को मां जैसा प्यार दे पाई- भाग 1

विनय का फोन आया. सहसा विश्वास नहीं हुआ. अरसा बीत गया था मुझे विनय से नाता तोड़े हुए. तोड़ने का कारण था विनय की आंखों पर पड़ी अहंकार की पट्टी. अहं ने उस के विवेक को नष्ट कर दिया था. तभी तो मेरा मन उस से जो एक बार तिक्त हुआ तो आज तक कायम रहा. न उस ने कभी मेरा हाल पूछा न ही मैं ने उस का पूछना चाहा. दोस्ती का मतलब यह नहीं कि उस के हर फैसले पर मैं अपनी सहमति की मुहर लगाता जाऊं. अगर मुझे कहीं कुछ गलत लगा तो उस का विरोध करने से नहीं चूका. भले ही किसी को बुरा लगे. परंतु विनय को इस कदर भी मुखर नहीं हो जाना चाहिए था कि मुझे अपने घर से चले जाने को कह दे. सचमुच उस रोज उस ने अपने घर से बड़े ही खराब ढंग से चले जाने के लिए मुझ से कहा. वर्षों की दोस्ती के बीच एक औरत आ कर उस पर इस कदर हावी हो गई कि मैं तुच्छ हो गया. मेरा मन व्यथित हो गया. उस रोज तय किया कि अब कभी विनय के पास नहीं आऊंगा. आज तक अपने निर्णय पर कायम रहा.

विनय और मैं एक ही महल्ले के थे. साथसाथ पढ़े, सुखदुख के साथी बने. विनय का पहला विवाह प्रेम विवाह था. उस की पत्नी शारदा को उस की मौसी ने गोद लिया था. देखने में वह सुंदर और सुशील थी. मौसी का खुद का बड़ा मकान था, जिस की वह अकेली वारिस थी. इस के अलावा मौसी के पास अच्छाखासा बैंक बैलेंस भी था जो उन्होंने शारदा के नाम कर रखा था. विनय के मांबाप को भी वह अच्छी लगी. भली लगने का एक बहुत बड़ा कारण था उस की लाखों की संपत्ति, जो अंतत: विनय को मिलने वाली थी. दोनों की शादी हो गई. शारदा बड़ी नेकखयाल की थी. हम दोनों की दोस्ती के बीच कभी वह बाधक नहीं बनी. मैं जब भी उस के घर जाता मेरी आवभगत में कोई कसर न छोड़ती. एक तरह से वह मुझ से अपने भाई समान व्यवहार करती. मैं ने भी उसे कभी शिकायत का मौका नहीं दिया और न ही मर्यादा की लक्ष्मणरेखा पार की.

इसी बीच वह 2 बच्चों की मां बनी. विनय की सरकारी नौकरी ऐसी जगह थी जहां ऊपरी आमदनी की सीमा न थी. उस ने खूब रुपए कमाए. पर कहते हैं न कि बेईमानी की कमाई कभी नहीं फलती. जब उस का बड़ा लड़का अमन 10 साल का था तो उस समय शारदा को एक लाइलाज बीमारी ने घेर लिया. उस के भीतर का सारा खून सूख गया. विनय ने उस का कई साल इलाज करवाया. लाखों रुपए पानी की तरह बहाए. एक बार तो वह ठीक हो कर घर भी आ गई, मगर कुछ महीनों के बाद फिर बीमार पड़ गई. इस बार वह बचाई न जा सकी. मुझे उस के जाने का बेहद दुख था. उस से भी ज्यादा दुख उस के 2 बच्चों का असमय मां से वंचित हो जाने का था. पर कहते हैं न समय हर जख्म भर देता है. दोनों बच्चे संभल गए. विनय की एक तलाकशुदा बेऔलाद बहन राधिका ने उस के दोनों बच्चों को संभाल लिया. इस से विनय को काफी राहत मिली.

शारदा के गुजर जाने के बाद राधिका और दूसरे रिश्तेदार विनय पर दूसरी शादी का दबाव बनाने लगे. विनय तब 42 के करीब था. मैं ने भी उसे दूसरी शादी की राय दी. अभी उस के बच्चे छोटे थे. वह अपनी नौकरी देखे कि बच्चों की परवरिश करे. घर का अकेलापल अलग काट खाने को दौड़ता. विनय में थोड़ी हिचक थी कि पता नहीं सौतली मां उस के बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करे? मेरे समझाने पर उस की आंखों में गम के आंसू आ गए. निश्चय ही शारदा के लिए थे. भरे गले से बोला, ‘‘क्यों बीच रास्ते में छोड़ कर चली गई? मैं क्या मां की जगह ले सकता हूं? मेरे बच्चे मां के लिए रात में रोते हैं. रात में मैं उन्हें अपने पास ही सुलाता हूं. भरसक कोशिश करता हूं उस की कमी पूरी करूं. औफिस जाता हूं तो सोचता हूं कि जल्द घर पहुंच कर उन्हें कंपनी दूं. वे मां की कमी महसूस न करें.’’ सुन कर मैं भी गमगीन हो गया. क्षणांश भावुकता से उबरने के बाद मैं बोला, ‘‘जो हो गया सो हो गया. अब आगे की सोच.’’

‘‘क्या सोचूं? मेरा तो दिमाग ही काम नहीं करता. अमन 17 साल का है तो मोनिका 14 साल की. वे कब बड़े होंगे कब उन के जेहन से मां का अक्स उतरेगा, सोचसोच कर मेरा दिल भर आता है.’’ ‘‘देखो, मां की कसक तो हमें भी रहेगी. हां, दूसरी पत्नी आएगी तो हो सकता है इन्हें कुछ राहत मिले.’’ ‘‘हो सकता है लेकिन गारंटेड तो नहीं. कहीं मेरा विवाह का फैसला गलत साबित हो गया तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा. बच्चों की नजरों में अपराधी बनूंगा वह अलग.’’

विनय की शंका निराधार नहीं थी. पर शंका के आधार पर आगे बढ़ने के लिए अपने कदम रोकना भी तो उचित नहीं. भविष्य में क्या होगा क्या नहीं, कौन जानता है? हो सकता है कि विनय ही बदल जाए? बहरहाल, कुछ रिश्ते आए तो राधिका ने इनकार कर दिया. कहने लगी कि सुंदर लड़की चाहिए. बड़ी बहन होने के नाते विनय ने शादी की जिम्मेदारी उसी को सौंप दी थी. लेकिन इस बात को जिस ने भी सुना उसे बुरा लगा. अब इस उम्र में भी सुंदर लड़की चाहिए. विनय के जेहन से धीरेधीरे शारदा की तसवीर उतरने लगी थी. अब उस के तसव्वुर में एक सुंदर महिला की तसवीर थी. ऐसा होने के पीछे राधिका व कुछ और शुभचिंतकों का शादी का वह प्रस्ताव था जिस में उसे यह आश्वासन दिया गया था कि उन की जानकारी में एक विधवा गोरीचिट्टी, खूबसूरत व 1 बच्ची की मां है. अगर वह तैयार हो तो शादी की बात छेड़ी जाए. भला विनय को क्या ऐतराज हो सकता था? अमूमन पुरुष का विवेक यहीं दफन हो जाता है. फिर विनय तो एक साधारण सा प्राणी था. उस विधवा स्त्री का नाम सुनंदा था. सुनने में आया कि उस का पति किसी निजी संस्थान में सेल्स अधिकारी था और दुर्घटना में मारा गया था.

राधिका को इस रिश्ते में कोई खामी नजर नहीं आई. वजह सुनंदा का खूबसूरत होना था. रही 8 वर्षीय बच्ची की मां होने की बात, तो थोड़ी हिचक के साथ विनय ने इसे भी स्वीकार कर लिया. सुनंदा वास्तव में खूबसूरत थी. मगर पता नहीं क्यों मैं इस रिश्ते से खुश नहीं था. मेरा मानना था कि विनय को एक घर संभालने वाली साधारण महिला से शादी करनी चाहिए थी. मजबूरी न होती तो शायद ही सुनंदा इस रिश्ते के लिए तैयार होती क्योंकि दोनों के व्यक्तित्व में जमीनआसमान का अंतर था. जुगाड़ से क्लर्की की नौकरी पाने वाला विनय कहीं से भी सुनंदा के लायक नहीं था. मुझे सुनंदा पर तरस भी आया कि काश उस का पति असमय न चल बसा होता तो उस का एक ऐश्वर्यपूर्ण जीवन होता.  विनय मेरा दोस्त था. पर जब मैं मानवता की दृष्टि से देखता था तो लगता था कि कुदरत ने सुनंदा के साथ बहुत नाइंसाफी की. उस की बेटी भी निहायत स्मार्ट व सुंदर थी, जबकि विनय की पहली पत्नी से पैदा दोनों संतानों में वह आकर्षण न था. अकेली स्त्री के लिए जीवन काटना आसान नहीं होता सो सुनंदा के मांबाप ने सामाजिक सुरक्षा के लिए सुनंदा को विनय के साथ बांधना मुनासिब समझा.

विदेशी दामाद: आखिर एक पिता अपने दामाद से क्या चाहता है?

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सिसकता शैशव : अमान का अबोध बचपन- भाग 1

जिस उम्र में बच्चे मां की गोद में लोरियां सुनसुन कर मधुर नींद में सोते हैं, कहानीकिस्से सुनते हैं, सुबहशाम पिता के साथ आंखमिचौली खेलते हैं, दादादादी के स्नेह में बड़ी मस्ती से मचलते रहते हैं, उसी नन्हीं सी उम्र में अमान ने जब होश संभाला, तो हमेशा अपने मातापिता को लड़तेझगड़ते हुए ही देखा. वह सदा सहमासहमा रहता, इसलिए खाना खाना बंद कर देता. ऐसे में उसे मार पड़ती. मांबाप दोनों का गुस्सा उसी पर उतरता. जब दादी अमान को बचाने आतीं तो उन्हें भी झिड़क कर भगा दिया जाता. मां डपट कर कहतीं, ‘‘आप हमारे बीच में मत बोला कीजिए, इस से तो बच्चा और भी बिगड़ जाएगा. आप ही के लाड़ ने तो इस का यह हाल किया है.’’

फिर उसे आया के भरोसे छोड़ कर मातापिता अपनेअपने काम पर निकल जाते. अमान अपने को असुरक्षित महसूस करता. मन ही मन वह सुबकता रहता और जब वे सामने रहते तो डराडरा रहता. परंतु उन के जाते ही अमान को चैन की सांस आती, ‘चलो, दिनभर की तो छुट्टी मिली.’

आया घर के कामों में लगी रहती या फिर गपशप मारने बाहर गेट पर जा बैठती. अमान चुपचाप जा कर दादी की गोद में घुस कर बैठ जाता. तब कहीं जा कर उस का धड़कता दिल शांत होता. दादी के साथ उन की थाली में से खाना उसे बहुत भाता था. वह शेर, भालू और राजारानी के किस्से सुनाती रहतीं और वह ढेर सारा खाना खाता चला जाता.

बीचबीच में अपनी जान बचाने को आया बुलाती, ‘‘बाबा, तुम्हारा खाना रखा है, खा लो और सो जाओ, नहीं तो मेमसाहब आ कर तुम्हें मारेंगी और मुझे डांटेंगी.’’

अमान को उस की उबली हुई सब्जियां तथा लुगदी जैसे चावल जहर समान लगते. वह आया की बात बिलकुल न सुनता और दादी से लिपट कर सो जाता. परंतु जैसेजैसे शाम निकट आने लगती, उस की घबराहट बढ़ने लगती. वह चुपचाप आया के साथ आ कर अपने कमरे में सहम कर बैठ जाता.

घर में घुसते ही मां उसे देख कर जलभुन जातीं, ‘‘अरे, इतना गंदा बैठा है, इतना इस पर खर्च करते हैं, नित नए कपड़े लाला कर देते हैं, पर हमेशा गंदा रहना ही इसे अच्छा लगता है. ऐसे हाल में मेरी सहेलियां इसे देखेंगी तो मेरी तो नाक ही कट जाएगी.’’ फिर आया को डांट पड़ती तो वह कहती, ‘‘मैं क्या करूं, अमान मानता ही नहीं.’’

फिर अमान को 2-4 थप्पड़ पड़ जाते. आया गुस्से में उसे घसीट कर स्नानघर ले जाती और गुस्से में नहलातीधुलाती.

नन्हा सा अमान भी अब इन सब बातों का अभ्यस्त हो गया था. उस पर अब मारपीट का असर नहीं होता था. वह चुपचाप सब सहता रहता. बातबात में जिद करता, रोता, फिर चुपचाप अपने कमरे में जा कर बैठ जाता क्योंकि बैठक में जाने की उस को इजाजत नहीं थी. पहली बात तो यह थी कि वहां सजावट की इतनी वस्तुएं थीं कि उन के टूटनेफूटने का डर रहता और दूसरे, मेहमान भी आते ही रहते थे. उन के सामने जाने की उसे मनाही थी.

जब मां को पता चलता कि अमान दादी के पास चला गया है तो वे उन के पास लड़ने पहुंच जातीं, ‘‘मांजी, आप के लाड़प्यार ने ही इसे बिगाड़ रखा है, जिद्दी हो गया है, किसी की बात नहीं सुनता. इस का खाना पड़ा रहता है, खाता नहीं. आप इस से दूर ही रहें, तो अच्छा है.’’

सास समझाने की कोशिश करतीं, ‘‘बहू, बच्चे तो फूल होते हैं, इन्हें तो जितने प्यार से सींचोगी उतने ही पनपेंगे, मारनेपीटने से तो इन का विकास ही रुक जाएगा. तुम दिनभर कामकाज में बाहर रहती हो तो मैं ही संभाल लेती हूं. आखिर हमारा ही तो खून है, इकलौता पोता है, हमारा भी तो इस पर कुछ अधिकार है.’’

कभी तो मां चुप  हो जातीं और कभी दादी चुपचाप सब सुन लेतीं. पिताजी रात को देर से लड़खड़ाते हुए घर लौटते और फिर वही पतिपत्नी की झड़प हो जाती.

अमान डर के मारे बिस्तर में आंख बंद किए पड़ा रहता कि कहीं मातापिता के गुस्से की चपेट में वह भी न आ जाए. उस का मन होता कि मातापिता से कहे कि वे दोनों प्यार से रहें और उसे भी खूब प्यार करें तो कितना मजा आए. वह हमेशा लाड़प्यार को तरसता रहता.

इसी प्रकार एक वर्र्ष बीत गया और अमान का स्कूल में ऐडमिशन करा दिया गया. पहले तो वह स्कूल के नाम से ही बहुत डरा, मानो किसी जेलखाने में पकड़ कर ले जाया जा रहा हो. परंतु 1-2 दिन जाने के बाद ही उसे वहां बहुत आनंद आने लगा. घर से तैयार कर, टिफिन ले कर, पिताजी उसे स्कूटर से स्कूल छोड़ने जाते. यह अमान के लिए नया अनुभव था.

स्कूल में उसे हमउम्र बच्चों के साथ खेलने में आनंद आता. क्लास में तरहतरह के खिलौने खेलने को मिलते. टीचर भी कविता, गाना सिखातीं, उस में भी अमान को आनंद आने लगा. दोपहर को आया लेने आ जाती और उस के मचलने पर टौफी, बिस्कुट इत्यादि दिला देती. घर जा कर खूब भूख लगती तो दादी के हाथ से खाना खा कर सो जाता. दिन आराम से कटने लगे.

परंतु मातापिता की लड़ाई, मारपीट बढ़ने लगी, एक दिन रात में उन की खूब जोर से लड़ाई होती रही. जब सुबह अमान उठा तो उसे आया से पता चला कि मां नहीं हैं, आधी रात में ही घर छोड़ कर कहीं चली गई हैं.

पहले तो अमान ने राहत सी महसूस की कि चलो, रोज की मारपीट  और उन के कड़े अनुशासन से तो छुट्टी मिली, परंतु फिर उसे मां की याद आने लगी और उस ने रोना शुरू कर दिया. तभी पिताजी उठे और प्यार से उसे गोदी में बैठा कर धीरेधीरे फुसलाने लगे, ‘‘हम अपने बेटे को चिडि़याघर घुमाने ले जाएंगे, खूब सारी टौफी, आइसक्रीम और खिलौने दिलाएंगे.’’

पिता की कमजोरी का लाभ उठा कर अमान ने और जोरों से ‘मां, मां,’ कह कर रोना शुरू कर दिया. उसे खातिर करवाने में बहुत मजा आ रहा था, सब उसे प्यार से समझाबुझा रहे थे. तब पिताजी उसे दादी के पास ले गए. बोले, ‘‘मांजी, अब इस बिन मां के बच्चे को आप ही संभालिए. सुबहशाम तो मैं घर में रहूंगा ही, दिन में आया आप की मदद करेगी.’’

अंधे को क्या चाहिए, दो आंखें, दादी, पोता दोनों प्रसन्न हो गए.

नए प्रबंध से अमान बहुत ही खुश था. वह खूब खेलता, खाता, मस्ती करता, कोई बोलने, टोकने वाला तो था नहीं, पिताजी रोज नएनए खिलौने ला कर देते, कभीकभी छुट्टी के दिन घुमानेफिराने भी ले जाते. अब कोई उसे डांटता भी नहीं था.

स्कूल में एक दिन छुट्टी के समय उस की मां आ गईं. उन्होंने अमान को बहुत प्यार किया और बोलीं, ‘‘बेटा, आज तेरा जन्मदिन है.’’ फिर प्रिंसिपल से इजाजत ले कर उसे अपने साथ घुमाने ले गईं. उसे आइसक्रीम और केक खिलाया, टैडीबियर खिलौना भी दिया. फिर घर के बाहर छोड़ गईं.

जब अमान दोनों हाथभरे हुए हंसताकूदता घर में घुसा तो वहां कुहराम मचा हुआ था. आया को खूब डांट पड़ रही थी. पिताजी भी औफिस से आ गए थे, पुलिस में जाने की बात हो रही थी. यह सब देख अमान एकदम डर गया कि क्या हो गया.

पिताजी ने गुस्से में आगे बढ़ कर उसे 2-4 थप्पड़ जड़ दिए और गरज कर बोले, ‘‘बोल बदमाश, कहां गया था? बिना हम से पूछे उस डायन के साथ क्यों गया? वह ले कर तुझे उड़ जाती तो क्या होता?’’

दादी ने उसे छुड़ाया और गोद में छिपा लिया. हाथ का सारा सामान गिर कर बिखर गया. जब खिलौना उठाने को वह बढ़ा तो पिता फिर गरजे, ‘‘फेंक दो कूड़े में सब सामान. खबरदार, जो इसे हाथ लगाया तो…’’

वह भौचक्का सा खड़ा था. उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या? क्यों पिताजी इतने नाराज हैं?

2 दिनों बाद दादी ने रोतरोते उस का सामान और नए कपड़े अटैची में रखे. अमान ने सुना कि पिताजी के साथ वह दार्जिलिंग जा रहा है. वह रेल में बैठ कर घूमने जा रहा था, इसलिए खूब खुश था. उस ने दादी को समझाया, ‘‘क्यों रोती हो, घूमने ही तो जा रहा हूं. 3-4 दिनों में लौट आऊंगा.’’

दार्जिलिंग पहुंच कर अमान के पिता अपने मित्र रमेश के घर गए. दूसरे दिन उन्हीं के साथ वे एक स्कूल में गए. वहां अमान से कुछ सवाल पूछे गए और टैस्ट लिया गया. वह सब तो उसे आता ही था, झटझट सब बता दिया. तब वहां के एक रोबीले अंगरेज ने उस की पीठ थपथपाई और कहा, ‘‘बहुत अच्छे.’’ और टौफी खाने को दी.

परंतु अमान को वहां कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. वह घर चलने की जिद करने लगा. उसे महसूस हुआ कि यहां जरूर कुछ साजिश चल रही है.

उस के पिताजी कितनी देर तक न जाने क्याक्या कागजों पर लिखते रहे, फिर उन्होंने ढेर सारे रुपए निकाल कर दिए. तब एक व्यक्ति ने उन्हें स्कूल और होस्टल घुमा कर दिखाया. पर अमान का दिल वहां घबरा रहा था. उस का मन आशंकित हो उठा कि जरूर कोई गड़बड़ है. उस ने अपने पिता का हाथ जोर से पकड़ लिया और घर चलने के लिए रोने लगा.

बचाने वाला महान : क्यों खतरे में थी गुलाबो की जिंदगी

पंच मेलाराम की नजरें काफी दिनों से अपने घर के साथ चौराहे पर नुक्कड़ वाली जगह पर लगी हुई थीं. वहां पर गरीब हरिया की विधवा बहू गुलाबो मिट्टी की कच्ची झोंपड़ी में बच्चों के लिए टौफीबिसकुट, पैनपैंसिलों, कौपियों वगैरह की दुकान चलाती थी.

पंच मेलाराम नुक्कड़ वाली वह जगह हरिया से खरीदना चाहता था. दरअसल, उस का मझला बेटा निकम्मा व आवारा था, इसलिए मेलाराम गुलाबो की दुकान की जगह पर अपने उस बेटे को शराब की दुकान खोल कर देना चाहता था.

विधवा गुलाबो के घर में अपाहिज सास व 2 बेटियों के अलावा बूढ़ा शराबी ससुर हरिया भी था, जो दो घूंट शराब पीने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था.

पंच मेलाराम ने हरिया को शीशे में उतार लिया था. उसे हर रोज खूब देशी दारू पिला रहा था, ताकि नुक्कड़ वाली जगह उसे मिल जाए.

वह जगह हरिया के नाम नहीं थी. मकान की मालकिन पहले हरिया की अपाहिज पत्नी संतरा थी. बेटे नरपाल की शादी हो गई, तो बहू गुलाबो आ गई.

गुलाबो बेहद मेहनती, गुणवान, अच्छे चरित्र की औरत थी. वह अपनी सास की प्यारी बहू बन गई थी.

नरपाल भी बाप की तरह शराबी था. कभीकभी जंगल में जंगली जानवरों का शिकार कर के मांस बेच कर वह कुछ पैसे कमाता था.

सास ने मकान बहू गुलाबो के नाम कर दिया था. उसे यकीन था कि मकान बहू के नाम होगा तो बचा रहेगा, नहीं तो बापबेटा शराब के लालच में उसे बेच खाएंगे.

नरपाल एक दिन घने जंगल में जंगली जानवर का शिकार करने गया और वापस नहीं आया. 4 दिन बाद तलाश करने पर नरपाल के कपड़े मिले. कपड़े मिलने का सब ने यही मतलब लगाया कि कोई जंगली जानवर उसे खा गया है. अब वह दुनिया में नहीं रहा. बेचारी गुलाबो जवानी में विधवा हो गई. जवान होती बेटियों और अपाहिज सास की जिम्मेदारी उस पर आ गई थी.

एक दिन शाम के समय हरिया ने बहू से कहा कि अगर दुकान वाली जगह मेलाराम को बेच दी जाए, तो अच्छे पैसे मिल जाएंगे. अपने रहने वाले दोनों कच्चे मिट्टी के बने कमरे पक्के हो जाएंगे. खर्चे के लिए पैसा बच जाएगा.

‘‘पिताजी, दुकान वाली जगह बेच दी, तो घर का चूल्हा नहीं जलेगा. कच्चे मकान में रहा जा सकता है, पर भूखे पेट जिंदा रहना मुश्किल है. जगह बेच कर पैसा कितने दिन चलेगा?’’ गुलाबो ने दूर की बात सोचते हुए कहा, तो हरिया कुछ देर के लिए चुप हो गया.

दुकान के बाहर पंच मेलाराम खड़ा ससुरबहू की बातें सुन रहा था. वह भीतर आ गया और गुलाबो की भरीपूरी छाती पर नजरें टिकाते हुए चापलूसी भरे लहजे में बोला, ‘‘देखो हरिया, तुम्हारी बहू विधवा हो गई तो क्या हुआ, हमारे गांव की इज्जत है. शाम होते ही यहां चौक में कितने आवारा किस्म के लोग खड़े हो कर बेहूदा इशारे करते हैं.’’

‘‘यही बात तो मैं इसे समझ रहा हूं. नुक्कड़ वाली जगह बेच कर जो पैसा मिलेगा, उस से पक्का मकान बनवा लेंगे. कुछ पैसा जरूरत के लिए बच भी जाएगा. आगे की आगे देखी जाएगी. मेरी दोनों पोतियां बड़ी हो रही हैं. सभी मिल कर काम करेंगे, तो हमारे बुरे दिन गुजर जाएंगे,’’ हरिया ने अपनी बात कही.

‘‘पिताजी, जगह बेचने का पैसा तो सालभर का खर्चा नहीं चला पाएगा. दोनों बेटियां जवान हो रही हैं. इन की शादियां भी करनी हैं. सासू मां भी दूसरों की मुहताज हैं,’’ गुलाबो ने कहा.

गुलाबो की बात पर मेलाराम हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘गुलाबो, तू अपने रोजगार की चिंता मत कर. मैं सरकारी स्टांप पेपर पर लिख कर दूंगा. तुम्हारी दुकान पर मैं शराब की दुकान खोलूंगा. महीनेभर मैं कम से कम 10-12 लाख रुपए की आमदनी होगी. उस कमाई में से 25 फीसदी हिस्सा तुम्हारा होगा. महीने के महीने तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिल जाएगा.’’

‘‘वह तो बाद की बात है काका. काम चलने में सालभर लग जाएगा. इस से पहले हम खाएंगे क्या?’’

‘‘उस की चिंता मत कर गुलाबो. तुम हमारे खेतों में काम करो. 5 हजार रुपए हर महीना दूंगा. जब हमारी शराब की दुकान चल पड़ेगी, तुम काम छोड़ देना. लाखों रुपए तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिला करेगा. देखना मौज करोगी,’’ कहते हुए मेलाराम ने 5 हजार रुपए उस के सामने लहरा दिए.

‘‘रुपए रख लो बहू. 5 हजार रुपए हर महीने मिलेंगे. जब हमारी दुकान में दारू का कारोबार चल निकलेगा, तो तुम्हारा हिस्सा लाखों में मिलेगा. तब खेतों में काम करना छोड़ देना,’’ ससुर हरिया ने हरेहरे नोटों को ललचाई नजरों से देखते हुए कहा.

इधर गुलाबो भी सोच में पड़ गई. वह छोटी सी दुकान में हर महीने मुश्किल से हजारबारह सौ रुपए ही कमा पाती थी. इसी मामूली से काम में उस का सारा दिन खत्म हो जाता था.

अगर मेलाराम के खेतों में काम करने से 5 हजार रुपए महीना मिल जाए, तो

2 हजार रुपए में घर का खर्चा चला कर वह 3 हजार रुपए बचा सकती है. इस तरह 2-3 साल काम करेगी, तो अपनी दुकान की जगह बेचे बगैर ही वह अपने दोनों कमरे पक्के बनवा सकती है.

अभी गुलाबो सोच ही रही थी कि मेलाराम ने 5 हजार रुपए गुलाबो के सामने रख दिए. जब उस ने दूसरे दिन काम पर आने को कहा, तो गुलाबो ने गंभीर लहजे में अपने मन की बात कही, ‘‘ठीक है काका, आप के खेतों में काम जरूर करूंगी, मगर मैं अपनी सास और पति की निशानी अपने मकान का एक कोना तक नहीं बेचूंगी. पहले ही कहे देती हूं.’’

‘‘अरे हरिया, तू अपनी बहू को ठंडे दिमाग से समझना. मैं जो भी काम करूंगा, उस में तुम्हारा भी फायदा होगा,’’ कहते हुए मेलाराम चला गया.

‘‘बहू सारे रुपए संभाल ले. कल से काम पर जाना शुरू कर दे. तुम्हारी दुकान पर मैं काम कर लूंगा. बूढ़ा आदमी हूं, बैठा रहूंगा,’’ हरिया ने आगे की योजना बनाते हुए कहा.

रुपए ले कर गुलाबो सास के पास गई और सारी बात बताई, तो सास ने नुक्कड़ वाली दुकान की जगह बेचने से साफ मना कर दिया. वह बहू के मेलाराम के खेतों में काम करने के पक्ष में नहीं थी, मगर उसे अपनी बहू पर यकीन था.

गुलाबो को काम करते हुए महीनेभर से ऊपर हो गया था. दूसरे महीने का पैसा भी मेलाराम ने दिया नहीं था. शाम को जाते समय गुलाबो ने पैसे मांगे, तो मेलाराम ने उसे रुकने को कहा. उस के साथ काम करने वाली दूसरी औरतें जा चुकी थीं.

दरअसल, मेलाराम ने खेत पर भी मकान बना रखा था. वह उस में खेतों की रखवाली करने या फसल में रात को पानी देने के लिए रुकता था.

शाम हो चली थी. दूरदूर तक सन्नाटा पसरा था. गुलाबो को लगा कि अगर ज्यादा देर हो गई, तो अकेले गांव जाना मुश्किल होगा.

मेलाराम अपने कमरे में था. वह काफी समय से बाहर निकल नहीं रहा था. गुलाबो परेशान हो कर कमरे में घुस गई. महीने का पैसा मांगा, तो मेलाराम ने झपट कर उसे अपनी बांहों में कस लिया और उस की साड़ी खोलने लगा.

गुलाबो ने मेलाराम को अपने से दूर कर उसे उस की बूढ़ी उम्र का एहसास कराना चाहा, ‘‘यह क्या पागलपन है? तुम मेरे बाप की उम्र के हो. ऐसी घिनौनी हरकत तुम्हें शोभा नहीं देती.’’

तभी बाहर से गुलाबो की 12 साला बेटी उसे तलाश करती हुई वहां आ गई. उस ने अपनी मां से छेड़छाड़ करते मेलाराम को पीछे से काट खाया, तो वह गाली बकते हुए बुरी तरह बिदक गया.

मेलाराम ने मासूम बच्ची को जोर से धक्का दिया. वह दीवार से जा टकराई. उस के सिर से खून बह निकला. चोट लगने से वह बेहोश हो गई.

गुस्से में मेलाराम दूसरे कमरे से तलवार उठा लाया, जो उस ने पहले से छिपा कर रखी थी. वह दहाड़ते हुए बोला, ‘‘देख गुलाबो, अगर तू अपनी जवानी का खजाना मुझ पर नहीं लुटाएगी, तो मैं तेरी हत्या कर के तेरी जवान होती बेटी की इज्जत लूट लूंगा.’’

‘‘बेटी के साथ मुंह काला मत करना. हम मांबेटी तो पहले ही मुसीबत की मारी हैं,’’ बेचारी गुलाबो अपनी हालत पर सिसक उठी.

मेलाराम के हाथ में चमकती तलवार देख कर वह घबरा उठी थी. अगर उस की हत्या हो गई, तो उस की बेटी को बचाने कौन आएगा?

‘‘ठीक है. अगर अपनी जवान होती बेटी की आबरू बचाना चाहती है, तो तू पहले सफेद कागज पर लिख कि अपनी नुक्कड़ वाली दुकान मुझे बेच रही है. साथ ही, जिस्म से सारे कपड़े उतार दे.

‘‘बूढ़ा आदमी हूं, थोड़ेबहुत मजे लूटूंगा. तेरी बेटी को तेरे साथ हिफाजत से घर छोड़ आऊंगा. तेरा महीने का पैसा इस शर्त पर दूंगा कि हर शाम मेरी इच्छा पूरी कर के जाया करेगी.’’

‘‘कमीने, अपने घर की एक इंच जगह नहीं बेचूंगी. तेरी यह इच्छा कभी पूरी नहीं होगी,’’ गुलाबो नफरत से गरजी.

‘‘ठीक है, तू ऐसे नहीं मानेगी. पहले तेरी बेटी का गला धड़ से अलग करता हूं,’’ गुर्राते हुए उस ने चमकती तलवार उस की बेटी की गरदन पर रख दी.

ऐसा दिल दहला देने वाला नजारा देख कर गुलाबो कांप उठी. वह नीच गांव से दूर खेतों में मांबेटी की हत्या कर के लाशें दबा देगा. कोई पूछेगा नहीं. उन दोनों का खात्मा हो जाएगा. उस का पति जिंदा नहीं है. ससुर शराबी है. अपाहिज सास भीख मांगती फिरेगी.

अभी गुलाबो सोच में उलझ थी कि मेलाराम फिर गरजा, ‘‘अरे, सोच क्या रही है? जल्दी से सादा कागज पर अपना नाम लिख. अपने सुलगतेमचलते जिस्म से कपड़े उतार, नहीं तो तेरी बेटी का खात्मा हो गया, समझ ले.’’

मजबूर गुलाबो ने सामने पड़े कागज पर दस्तखत कर अपना बदन मेलाराम को सौंप दिया.

गुलाबो का मादक बदन मेलाराम के दिलोदिमाग में वासना का तूफान जगाने लगा था.

मेलाराम ने जवानी में ऐसा मचलता हुस्न नहीं देखा था. वह अभी आगे बढ़ता कि बाहर से आती कुछ आवाजें सुन कर चौंक उठा. आवाजें उस के मकान के नजदीक से आ रही थीं.

गुलाबो ने फटाफट अपने कपड़े पहन लिए, तभी उस की छोटी बेटी हांफती हुई आई और मां से लिपटते हुए बोली, ‘‘मां… मां, बाहर देखो, पापा आ रहे हैं. अपने साथ पुलिस को भी ला रहे हैं.’’

‘‘यह तू क्या कह रही है गुड़िया? तेरे पापा को तो जंगली जानवर…’’ गुलाबो इतना कह पाई थी कि आंधीतूफान की तरह गुस्से की आग में सुलगता हुआ उस का पति नरपाल वहां आ पहुंचा.

उस ने मेलाराम को देखते ही दबोच लिया और उसे इतना मारा कि उस के दोनों हाथ टूट गए और एक आंख फूट गई. अगर पुलिस वाले नहीं बचाते, तो नरपाल मेलाराम को मार ही डालता.

हैरानी में डूबी गुलाबो ने नरपाल से पूछा, ‘‘तुम्हें तो जंगली जानवर…’’

‘‘नहीं…नहीं, मुझे जंगली जानवर क्या खाएंगे, मुझे तो मेलाराम और इस के दोनों बेटों ने जंगल में पकड़ लिया था. मैं नशे में था. ये तीनों हमारा मकान हड़पना चाहते थे.

‘‘मना करने पर इन लोगों ने मुझे बुरी तरह मारापीटा और बेहोशी की हालत में नंगा कर के नदी में बहा दिया. इन का अंदाजा था कि लोग समझोंगे कि मुझे जंगली जानवर खा गए.’’

नरपाल की बात सुन कर तो गुलाबो ने वह कागज फाड़ डाला, जिस पर मेलाराम ने उस से दस्तखत कराए थे.

गुलाबो आगे बढ़ कर नरपाल से लिपट गई.

‘‘ऐसा हादसा तुम्हारे शराब पीने की आदत के चलते हुए था. पंच मेलाराम हमारे मकान की नुक्कड़ वाली जगह पर शराब की दुकान खोलना चाहता था,’’ गुलाबो ने पति की शराब पीने की आदत पर अपना विरोध जताया.

‘‘गुलाबो, नशा समाज के लिए अभिशाप है. मैं इस का बुरा नतीजा भुगत चुका हूं. अगर एक भला आदमी मुझे बेहोशी की हालत में बहती नदी से न बचाता, तो मेरी बेटी और पत्नी के साथ पता नहीं क्या हो जाता.

‘‘अब मैं न शराब पीऊंगा और न ही शराब की दुकान खुलेगी. अब ये शैतान जेल जाएंगे,’’ नरपाल ने इतना कहा, तो गुलाबो पति की बांहों में समा गई.

सोलर दीदी : मुनमुन ने कैसे बदली अपनी जिंदगी

‘मैं  यह क्या सुन रहा हूं मां… मुनमुन पति का घर छोड़ कर आ गई है. फौरन उसे वापस भेजो, वरना हमारी बहुत बदनामी होगी,’ पवन की गुस्से में भरी तेज आवाज रामेश्वरी के कानों से टकराई.

‘‘फोन पर क्यों इतना चिल्ला रहा है. थोड़ा शांत हो जा. तुझे कौन सी सचाई का पता है… और देखा जाए, तो तुझे इस बात में कोई दिलचस्पी भी नहीं है. तुझे तो गांव छोड़े बरसों हो गए हैं. तू क्यों बदनामी की चिंता कर रहा है. जब से गया है, तू ने और तेरे बड़े भाई ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

‘‘ठीक भी है, आखिर अब तुम ऊंचे ओहदे पर हो, बड़े आदमी बन गए हो. शहरी चमकदमक तुम्हें इतनी रास आ गई है कि तुम दोनों ने मांबाप और गांव को ही भुला दिया है,’’ रामेश्वरी की आवाज में कड़वाहट थी.

‘मां, हम शहर में रह रहे हैं तो क्या… मुनमुन की शादी करने में तो हम ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी…’ पवन फिर भड़का, ‘इतनी सी बात पर कोई घर छोड़ कर आता है भला. थोड़ा सहना भी चाहिए. पति का हाथ तो उठ ही जाता है. इस में कौन सी नई बात है. इतना हक तो होता ही है पति का. मारपीट, लड़ाई झगड़ा किस पतिपत्नी में नहीं होता. लेकिन वह तो घर ही छोड़ कर आ गई.

‘क्या पता, अब मुनमुन कौन सा गुल खिलाएगी. सच तो यह है कि ऐसी बहन को चौराहे पर खड़ा कर के गोली मार देनी चाहिए. नाक कटवा दी उस ने हम सब की,’ पवन के शब्दों से कड़वाहट टपक रही थी.

‘‘वाह, मेरे काबिल बेटे. पढ़लिख कर भी तू ऐसी सोच रखता है. तुम दोनों भाइयों को न पढ़ा कर मैं ने मुनमुन की पढ़ाई पर ध्यान दिया होता, तो कम से कम आज वह अपने पैरों पर तो खड़ी हो जाती.

‘‘और बेटा, तू सही कह रहा है कि शादी में कोई कसर नहीं छोड़ी थी तुम दोनों भाइयों ने. मैं ने और तेरे बाबूजी ने कितना कहा था कि लड़के के बारे में पहले ठीक से जांच कर लो, पर तुम दोनों भाइयों को तो जल्दी थी उस की शादी करने की, ताकि जल्दी से शहर लौट सको.

‘‘तुम ने न घरपरिवार के बारे में पड़ताल की, न लड़के के बारे में. गाय की तरह मुनमुन को उस से बांध दिया और एहसान भी जताया कि देखो बहन की शादी कितनी धूमधाम से कर दी, कितने जिम्मेदार बेटे हैं हम तो…’’ लगातार बोलने से रामेश्वरी की सांस फूलने लगी थी.

‘‘मां, रहने भी दो अब. तुम्हारी तबीयत खराब हो जाएगी,’’ मुनमुन ने मां के हाथों से फोन लेने की कोशिश की.

‘‘बोलने दे मुझे आज…’’ रामेश्वरी ने फोन को कस कर पकड़े रखा, ‘‘सुन पवन, मैं नहीं भेजूंगी मुनमुन को वापस उस नरक में. शराबी पति की मार कब तक खाएगी वह. वह हमारे ऊपर बोझ नहीं है, जो रोटी की जगह मार और प्यार की जगह दुत्कार सहती रहे.

‘‘शर्म आनी चाहिए तुम्हें. बहन का साथ देने के बजाय तुम्हें बदनामी का डर सता रहा है. अपने ही जब कीचड़ उछालने से नहीं चूकते, तो समाज को उंगलियां उठाने से कैसे रोक सकते हैं,’’ रोते हुए रामेश्वरी ने खुद ही फोन काट दिया था.

‘‘मां, तुम किसकिस का मुंह बंद करोगी… यह लखीमपुर खीरी जिले का एक छोटा सा गांव है. घरघर में मेरे मायके आ जाने की बात फैल गई है. बाबूजी तो 2 दिनों से खेत पर भी नहीं गए हैं.

‘‘अच्छा यही होगा कि मैं ससुराल चली जाऊं. जो मेरी किस्मत में लिखा है, उसे सह लूंगी,’’ मुनमुन से मां की पीड़ा देखी नहीं जा रही थी.

‘‘तू क्या समझाती है, मैं नहीं जानती कि तेरे साथ वहां और क्याक्या होता होगा. मां हूं तेरी. पति की मार से तू ससुराल छोड़ कर आने वाली नहीं है. सच बता, बात क्या है?’’ रामेश्वरी की अनुभवी आंखें मानो भांप गई थीं कि बात कुछ और ही है.

‘‘मां…’’ मुनमुन सुबकते हुए बोली, ‘‘शादी को डेढ़ बरस हो गया है और मैं उन्हें बच्चा न दे सकी. मुझे बांझ कह कर वे डाक्टर के पास ले गए, पर जांच में सब ठीक आया. मैं ने पति से बोला कि तुम अपनी जांच करा लो, तो वह भड़क गया.

‘‘एक दिन सास और पति दूसरे गांव में गए हुए थे किसी के ब्याह में. रात को ससुर ने मेरे साथ जबरदस्ती करनी चाही. वह बोला, ‘मेरा बेटा तुझे बच्चा नहीं दे सकता तो क्या, मैं तो हूं.’

‘‘पति को बताया, तो सास और पति दोनों ही मुझे कोसने लगे कि मैं बदचलन हूं और ससुर पर झठा इलजाम लगा रही हूं.

‘‘ससुर हाथ जोड़े ऐसे बैठा था, जैसे उस का कुसूर न हो. उस के बाद तो ससुर की हिम्मत बढ़ गई और वह जबतब मेरा हाथ पकड़ने लगा. सास ने कई बार देखा भी, पर चुप रही.

‘‘बता मां, मैं कैसे रहती वहां? जहां हर समय यही डर लगा रहता था कि न जाने कब ससुर मेरे ऊपर झपट्टा मार लेगा.’’

रामेश्वरी कुछ कहती कि तभी बिसेसर वहां आ गए.

‘‘समझ नहीं आता कि क्या करें मेरी बच्ची. तुझे घर में रखते हैं, तो गांव वाले ताने देते रहेंगे और ससुराल भेजते हैं, तो तुझे घुटघुट कर जीना होगा. वैसे भी हमारे गांव की आबोहवा लड़कियों के लिए ठीक नहीं है,’’ बिसेसर की आवाज में छिपा बाप का दर्द मुनमुन को दर्द दे गया.

‘‘बाबूजी, आप बिलकुल भी परेशान मत हों. मैं लौट जाऊंगी. सच तो यह है कि औरत चाहे जिस कोने में चली जाए, उस के लिए सारे समाज की हवा ही ठीक नहीं है. कहां महफूज है वह?’’

‘‘क्या कहूं मेरी बच्ची. देखो, आज हमारे बेटे ही हमें दोष दे रहे हैं. हमारा कुसूर यह है कि दिनरात शराब पी कर पत्नी को पीटने वाले पति के घर बेटी को झोंटा पकड़ कर क्यों नहीं ठेल देते,’’ बिसेसर सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया.

‘‘तेरे दोनों भाइयों को पढ़ाने की खातिर तेरी पढ़ाई बीच में ही छुड़ानी पड़ी और देखो, वही तेरे लायक भाई तेरे दुश्मन बन बैठे हैं,’’ रामेश्वरी के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

‘‘मां, तुम जरा भी चिंता मत करो. मैं तुम पर बोझ नहीं बनूंगी. मैं कुछ न कुछ काम जरूर ढूंढ़ लूंगी,’’ मुनमुन ने कहा.

मुनमुन ने ठान लिया था कि वह बेबसी और लाचारी का दामन नहीं थामेगी, वह जीएगी और अपने मांबाबू का सहारा भी बनेगी. सफर आसान न था, क्योंकि उस के पास कोई ऐसी डिगरी नहीं थी, जिस के बल पर नौकरी कर लेती और न ही उस के पास पैसा था, जो कोई कारोबार शुरू कर पाती.

मुनमुन गांव में काम ढूंढ़ने निकलती, तो मर्दों की गंदी नजरें और फिकरे उस का पीछा करते, ‘अरे, पति को छोड़ आई, तो किसी के साथ तो बिस्तर पर सोएगी. तो हम ही क्या बुरे हैं…’

कोई कहता, ‘‘इस में ही दोष होगा, तभी तो पति मारता था. हमारी औरतें भी तो मार खाती हैं, तो क्या वे घर छोड़ कर चली गईं. आदमी अपनी जोरू को न मारे, ऐसा कभी हुआ है…’’

मुनमुन खून का घूंट पी कर रह जाती. बिना किसी कुसूर के उसे सजा मिल रही थी. लड़की हो कर कोई काम मिलना और वह भी एक पति का घर छोड़ कर आई लड़की के लिए… कोई आसान बात न थी.

तभी मुनमुन को एक सामाजिक संस्था ‘श्रमिक भारती’ के बारे में पता चला, जो केंद्र सरकार की टेरी योजना के तहत गांवों में सोलर लाइट का कार्यक्रम चलाती थी. वह उस से जुड़ गई. तब भी समाज उस पर हंसा कि देखोे, एक लड़की हो कर कैसा काम कर रही है. पर मुनमुन ने किसी की परवाह नहीं की.

मां ने जब मुनमुन के इस फैसले पर सवालिया नजरों से उसे देखा, तो वह बोली, ‘‘मां, किस ने कहा कि यह काम केवल मर्द ही कर सकते हैं. अब औरतें भी किसी काम में मर्दों से कम नहीं हैं. फिर मां, कभी न कभी तो किसी को इस सोच को तोड़ना होगा. औरत क्या सिर्फ पिटने के लिए ही होती है?’’

ससुराल वालों ने जब यह सुना, तो वे बहुत बिगड़े और फौरन उसे वापस ले जाने के लिए पति आ पहुंचा.

वह बोला, ‘‘बहुत पर निकल आए हैं तेरे मायके आ कर. चल वापस, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा,’’

वह उस पर हाथ उठाने ही वाला था कि रामेश्वरी ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘खबरदार, जो मेरी बेटी को मारने की कोशिश की, तो सीधे थाने पहुंचा दूंगी.’’

मांबेटी का यह भयानक रूप देख पति वहां से भाग गया.

धीरेधीरे मुनमुन ने सोलर लाइट से जुड़ा हर काम सीख लिया और उसे यह काम करने की धुन सवार हो गई.

बस, इसी धुन में उस ने सोलर लाइट का कार्यक्रम शुरू कर दिया. वह गांवगांव जा कर सोलर लाइट, सोलर चूल्हे, सोलर पंखे लगाने लगी. उस की लगन और मेहनत देख कर गांव वालों के ताने तो बंद हो ही गए, साथ ही उस की जैसी सताई हुई और भी लड़कियां उस के साथ जुड़ गईं.

गांव की औरतों में अपने हक के लिए लड़ने की जैसे एक क्रांति सी आ गई. गांव के लोग जो उसे बुरी नजरों से देखते थे, उन्होंने उसे ‘सोलर दीदी’ के नाम से बुलाना शुरू कर दिया. गांव में सोलर लाइट खराब हो, पंखा खराब हो या कुछ और, बस लोग ‘सोलर दीदी’ को फोन मिलाते और वह पूरे जोश से अपने बैग में औजार रख अपनी स्कूटी पर दौड़ी चली जाती.

‘‘मैं बहुत खुश हूं मुनमुन कि तू अपने पैरों पर खड़ी हो गई है, लेकिन बेटी, अकेले जिंदगी काटना आसान नहीं है. तू कहे तो मैं कहीं और तेरे लिए रिश्ते की बात चलाऊं. तेरा तलाक हुए भी

3 साल हो गए हैं,’’ मां की आंखों में अपने लिए गर्व देख मुनमुन की आंखें भर आईं.

‘‘मां, तुम ने और बाबूजी ने मेरा साथ दे कर ही मुझे इस मुकाम पर पहुंचाया है. अगर तुम दोनों ही मुझे घर से निकाल देते, तो मैं कुछ भी नहीं कर पाती. बस, किसी दिन कहीं कुएं या तालाब में मरी मिलती.

‘‘और मां, एक बार शादी कर के देख तो लिया. अभी भी हमारे समाज में औरत या तो बिस्तर पर ले जाने के लिए होती है या फिर बच्चा पैदा करने के लिए. मुझे ऐसी जिंदगी नहीं चाहिए.

‘‘अब तो मैं बस तुम दोनों की सेवा करूंगी और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीऊंगी. अभी तो मुझे काफी काम करना है. अपनी जैसी कितनी मुनमुन को राह दिखानी है,’’ मुनमुन के चेहरे पर आत्मविश्वास की जलती लौ को देख रामेश्वरी ने उसे सीने से लगा लिया.

बिसेसर पीछे खड़े उसे मन ही मन कामयाब होने का आशीर्वाद दे रहे थे.

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