Editorial: जुमलेबाजी या हकीकत?

Editorial: रेल मंत्री ने बड़ी शान से घोषणा की है कि दीवाली और छठ के मौके पर भारत में 12,000 स्पैशल ट्रेनें उन लोगों के लिए चलाई जाएंगी जो अपने घरों को जाना चाहते हैं. जिस देश में वैसे ही 22,000 ट्रेनें चलती हैं वहां 12,000 स्पैशल ट्रेनें आसमान से कैसे टपकेंगी, यह अतापता किए बिना दिए गए बयान को जुमला न कहा जाए तो क्या कहा जाए.

एक जमाना था जब ट्रेन का सफर करना होता था तब स्टेशन पर पहुंच कर टिकट ले कर आसानी से बैठा जा सकता था. आज महीनों पहले दलालों से जुगत भिड़ा कर टिकट का इंतजाम करना पड़ता है. इन बयानों से बहक कर जो स्टेशनों पर पहुंच जाते हैं उन में से हर साल 20-30 भगदड़ में मर जाते हैं क्योंकि प्लेटफौर्म और स्टेशन के बाहर इतनी जगह ही नहीं होती कि आनेजाने वालों को खड़े होने की भी जगह मिल सके.

इतने बड़े देश के लिए ट्रेनों का इंतजाम करना मुश्किल नहीं है. लोग इन्हीं ट्रेनों में लदपद कर सफर कर ही लेते हैं और एक से दूसरी जगह पहुंच ही जाते हैं पर उस में दिक्कतें क्यों हों. ये दिक्कतें इसलिए हैं कि रेल का हर कर्मचारी जनता पर एहसान करता नजर आता है जैसा मंत्रीजी करते हैं कि वे 12,000 स्पैशल ट्रेनें चलाने वाले हैं–जनता पर दया करने वाले हैं.

रेलें जरूरी हैं क्योंकि भारत जैसे बड़े देश में वे ही सब से तेज सस्ते तरीके हैं आनेजाने के. अफसोस यह है कि जब से हवाईजहाज शुरू हुए हैं, उन का रुतबा जीरो हो गया है. आज रेलें सिर्फ वोट पाने के लिए चलाई जा रही हैं ऐसा लगता है. वंदे भारत ट्रेनों को पैसे वालों के लिए बनवा दिया गया है पर देश के एक हिस्से के मजदूर और गरीब या तो बिना जाए मनमसोस कर रह जाते हैं या फिर धक्के खाते हैं.

बरसों से मुंबई की लोकल ट्रेनें पीक समय पर खचाखच भरी होती हैं पर रेलों के मंत्री दिनभर काम से थके
लोगों को घंटेभर की यात्रा को आसान बनाने के लिए तैयार नहीं हैं, वे ज्यादा, इतनी ज्यादा ट्रेनें चलाना ही नहीं चाहते कि हर कोई बैठ कर जा सके. देश के हर शहर में ऐसा है. जहां मैट्रो है वहां भीड़ कम है पर मैट्रो मुंबई की लोकल से कहीं ज्यादा महंगी है. दिल्ली में भी लोग मैट्रो की जगह 6 सवारियों वाले ईरिकशा में 10-12 बैठ कर सफर करने को मजबूर हैं.

यह सरकारों का दिवालियापन नहीं, कोरी गरूरता की निशानी है. सरकार सोचती है कि ट्रेन एक दान है जो वह जनता को देती हैं. जनता जो टिकट खरीदती है, टैक्स की शक्ल में जो पैसा देती है वह तो उस के जीने की कीमत है जो सरकार को वसूलने का हक है, बिना बदले में कुछ देने के. जो मिल गया, वह कृपा है, भीख है. स्पैशल ट्रेनें भीख के रूप में दी जाएंगी तो हल्ला करना तो बनता है और भीख लेने वाले हर साल की तरह हजारों की गिनती में हर स्टेशन पर जमा होंगे, हर ट्रेन में आटे की बोरियों की तरह भरे जाएंगे और घर पहुंच कर रेल भगवान के आका की पूजा करेंगे.

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देश में गरीबी का आलम देखने के लिए सरकारी आंकड़े देखना जरूरी नहीं है. सरकारी आंकड़े तो बहकाते हैं. जमीनी हालत यह है कि बिहार में, जहां कई दशकों से नीतीश कुमार का सुशासन चल रहा है, 5 जनों को बैठाने वाले ईरिकशा में ठुंस कर 10-12 लोगों को बैठाया जाता है. नालंदा से ये औरतें गंगा में नहा कर पाप धोने के लिए ईरिकशा में चली थीं. जब एक ट्रक ने उसे जबरदस्त तरीके से टक्कर मारी कि 7 की वहीं मौत हो गई और 2 ने अस्पताल में दम तोड़ दिया.

देशभर में सड़कों और रेलों का जाल बिछ रहा है और नरेंद्र मोदी अकसर उन के उद्घाटन करते दिखते हैं पर असलियत यह है कि अपना स्वर्ग सुधारने के नाम पर इतने बेचैन हो चुके लोग बेतरतीब बनी सड़कों, ओवरलोड वाहनों पर चल कर पहले ही स्वर्गवासी हो जाते हैं.

बिहार से ही नहीं सारे देश में तीर्थों में जाने वाले लोगों के मरने की खबरें अकसर आती रहती हैं. जब लोग तीर्थ पर निकलते हैं तो पंडेपुजारी उन्हें भरभर कर भेजते हैं ताकि उन्हें दानदक्षिणा में ज्यादा पैसा मिले, रास्ते की सुविधाओं पर खर्च न हो जाए. चार धाम यात्रा में हर साल सैकड़ों मौतें होती हैं पर फिर भी सरकार न इन्हें रोक रही है और न बेवकूफ जनता जाना बंद कर रही है.

तीर्थों में खासतौर पर खटारा बसों, रिकशाओं और टैक्सियों का इस्तेमाल किया जाता है. उन के रास्ते भी अकसर टूटे रहते हैं क्योंकि वहां ओवरलोडेड वाहन चलते हैं. तीर्थ में जाने वाला शिकायत भी कम करता है क्योंकि बदन को मिले कष्ट को भगवान की परीक्षा समझता है. तीर्थों पर लूटखसोट में पुलिस, सड़कें बनाने वाले ठेकेदार, सफाई करने वाले, किराए पर वाहन चलाने वाले सभी ग्राहक की बेहद फिक्र करने वाले नहीं होते हैं क्योंकि ग्राहकों को भजन और कीर्तन गाने से ही फुरसत नहीं होती. बीचबीच में जयकारा लगा कर वे समझते हैं कि सबकुछ ठीक हो रहा है.

अगस्त 2025 में ही अयोध्या जाने वाले तीर्थयात्रियों में 11 की मौत हो गई जब 15 लोगों से खचाखच भरी उन की 7 जनों के लिए बनी एसयूवी नहर में जा गिरी और सब डूब गए.

अप्रैल में लता मंगेशकर चौक पर अयोध्या में 2 जने मरे, 3 घायल हुए थे.

चार धाम यात्रा में जून में ही कम से कम 75 लोग पहले महीने में मारे गए थे.

देश की सड़कें और उन पर चलने वाले वाहन असल में उस नकली भगवान का काम करते रहते हैं जिसे मारने वाला बताया जाता है. भगवान चाहे न हो पर सड़कें बनाने वाले और खराब वाहन वाले हैं न जो मारने को तैयार बैठे हैं, मरे देश में. Editorial

Untouchability: फलफूल रही है छुआछूत

Untouchability: राजग सरकार का खुला नारा है कि न स्कूल, न अस्तपाल, न सड़क, न पुल बस मंदिर ही मंदिर. अगर कभी प्योर मंदिर विरोधी रहे रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान अपनी मरजी से या दलित होने की वजह से नहीं बुलाए जाने पर सीतामढ़ी में जानकी मंदिर के बनाने पर हुए पाखंड में मौजूद नहीं थे तो अच्छा ही कहा जाएगा.

सदियों से दलितों को, जिन्हें वर्णव्यवस्था में मनुष्यों से भी बाहर रखा गया है, अगर आज भी देशभर के गांवों में, कसबों में, शहरों की स्लम बस्तियों में, स्कूलों, कालेजों में, दफ्तरों में नीचा दिखाने की कोशिश की जाती रहती है तो इसलिए कि 1932 के गोल मेज सम्मेलन के बाद गांधी अंबेडकर पूना पैक्ट और संविधान के बावजूद दलित अपनी पहचान बनाने और समझने को तैयार नहीं हैं.

जो सताया गया है, लड़ाई उसे लड़ने होती है. उसे सताने वालों की भीड़ में शामिल हो कर बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

यह चालबाजी की सफलता है कि जो पौराणिक ग्रंथों में समाज से बाहर माने गए. जिन्हें मुगलों और अंगरेजों ने थोड़ी इज्जत भी दी, वे आजादी के 75 साल बाद आज भी, उसी तरह छुआछूत, मजाक, पिटाई, लूट, शोषण के शिकार हैं और उसी पौराणिक सोच की वजह से आज भी उसे कर्मों का फल मानते हैं.

बहुजन समाज पार्टी की मायावती, रामनाथ कोविंद, प्रकाश अंबेडकर, सोनकर शास्त्री खुद व उन के पुत्र, वे बीसियों सांसद व विधायक जो राममंदिर लहर में रिजर्व सीटों से मंदिर वाली पार्टी से जीत कर अपना कल्याण आम दलितों की इज्जत की लाशों पर करते आ रहे हैं, कभी समझ नहीं पाएंगे कि वे कैसे ठगे जा रहे हैं.

हर दलित नेता आसानी से बिका और फिर उदित राज की तरह निकाल फेंका गया. चिराग पासवान को भी अपमान का सामना करना पड़ा था जब दिल्ली में रामविलास पासवान के मकान का सामान निकाल बाहर सड़क पर पटक दिया गया था. जब चिराग पासवान ने मंदिर पार्टी फिर जौइन कर ली तो ही इज्जत मिली.

अब अगर वे किसी वजह से जानकी मंदिर के कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे तो उन्हें भी समझ लेना चाहिए, उन के वोटरों को भी कि इस देश के सत्ताधारी अभी भी दलितों को बराबरी की जगह देने को तैयार नहीं हैं.

इस में बड़ी बात नहीं हैं. चुनाव आतेआते उन्हें मना लिया जाएगा और औकात भी दिखा दी जाएगी. साम
दाम दंड भेद हमारे यहां सब से ज्यादा दलितों के साथ चल रहा है और चूंकि वे इस के शिकार बनने को तैयार बैठे रहे हैं, ऊंचे इस का फायदा उठा रहे हैं.

जिन के कंधों पर पूरी जाति को कीचड़ से निकालने की जिम्मेदारी है, वे कीचड़ की नाली अपनों की बस्ती की ओर मोड़ देते हैं ताकि उन के पैर बचे रह जाएं. छुआछूत इसी वजह से हजारों साल जिंदा रही और आज भी फलफूल रही है. Untouchability

News Story: खौफनाक दांत

News Story: यह छोटा सा होटल शहर से दूर था. आज विजय और अनामिका दोपहर से ही यहीं पर थे. लंच से ले कर डिनर तक. इस बीच उन दोनों ने भरपूर प्यार भी किया था. फिलहाल वे दोनों बिस्तर पर लेटे हुए थे. डिनर हो चुका था और थोड़ी देर बाद वे अपनेअपने घर जाने वाले थे.

रात के 9 बजे वे दोनों होटल से बाहर निकले. विजय बोला, ‘‘मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं. यह सड़क थोड़ी सुनसान लगती है.’’

‘‘अरे, तुम क्यों तकलीफ करते हो. मैं अकेले ही चली जाऊंगी. मैं ने रैपिडो बाइक बुला ली है. बाइक वाले ने कहा था कि वह इस बड़ी सड़क से दूसरी तरफ खड़ा मिलेगा. 2 मिनट का ही तो रास्ता है. तुम निकलो. सुबह लाइब्रेरी में मिलते हैं, ठीक 8 बजे,’’ अनामिका ने विजय के होंठों को चूमते हुए कहा.

विजय ने अनामिका को ‘बाय’ कहा और बाइक स्टार्ट करने लगा.

अनामिका सड़क के दूसरी तरफ चलने लगी. अभी वह कुछ ही दूर गई थी कि अचानक रात के अंधेरे से कुछ आवारा कुत्ते निकल आए. वे भौंक नहीं रहे थे, बल्कि अनामिका को देख कर गुर्रा रहे थे.

अनामिका संभलती, उस से पहले ही एक कुत्ते ने उस पर हमला कर दिया. पीछे हटने की हड़बड़ाहट में अनामिका गिर गई और उस के बाद कई कुत्ते उस पर झपट पड़े.

अनामिका ने होश नहीं खोया, बल्कि एक हाथ में कस कर बैग पकड़ कर उस ने कुत्तों को मारना शुरू किया और दूसरे हाथ से मोबाइल पर विजय का नंबर डायल कर दिया.

विजय ने फोन उठाया तो उसे अनामिका की दबी सी आवाज आई, ‘‘जल्दी आओ, मुझ पर कुछ कुत्ते झपट पड़े हैं.’’

विजय को लगा कि अनामिका कुछ बदमाशों को ‘कुत्ता’ कह रही है और उस की इज्जत पर आंच आई है. उस ने जल्दी से अपनी बाइक मोड़ी और तेज रफ्तार से अनामिका की तरफ बढ़ गया.

इस बीच रैपीडो बाइक वाला लड़का भी वहां आ गया था. उस ने शोर मचा कर कुत्तों को भगाना चाहा, पर वे कुत्ते उस पर भी झपटने लगे, लेकिन काट नहीं पाए.

इस बीच अनामिका को थोड़ा समय मिल गया और वह किसी तरह उठ कर वहां से जाने लगी. उसे कुत्तों ने काट खाया था. वह दर्द से तड़प रही थी.

तभी विजय वहां आ गया और उस ने झट से अनामिका को अपनी बाइक पर बिठाया और पास के प्राइवेट अस्पताल की तरफ चल दिया. तब तक रैपीडो बाइक वाला भी वहां से निकल गया था.

अस्पताल में डाक्टर ने अनामिका के जख्म देख कर कहा, ‘‘आवारा कुत्तों के खौफनाक दांतों का कहर बढ़ने लगा है. अब तो इस तरह के केस बढ़ने लगे हैं. आप चिंता मत करें. हम रेबीज का टीका लगा देंगे और आप के घाव अच्छे से साफ कर देंगे.’’

‘‘डाक्टर साहब, मैं तो कहता हूं कि आवारा कुत्तों के साथसाथ उन कुत्तों पर भी बैन लगना चाहिए, जिन्हें लोग अपने घरों में पालते हैं. मैं ने कुछ वीडियो देखे हैं, जिन में आवारा कुत्ते ही नहीं, बल्कि पालतू कुत्ते भी अचानक से किसी पर भी हमला कर देते हैं. कुत्तों की कुछ नस्लें तो इतनी ज्यादा खतरनाक हैं कि अगर वे बिदक जाएं, तो अपने मालिक को भी काटने से गुरेज नहीं करती हैं,’’ विजय बोला.

‘‘बात सिर्फ कुत्तों के काटने की नहीं है, बल्कि उन से होने वाले लाइलाज रोग रेबीज की भी है. जिसे होता है वह तो अपनी जान से जाता ही है, दूसरों में भी दहशत हो जाती है,’’

डाक्टर के पास खड़ी एक नर्स ने कहा.

‘‘पर डाक्टर साहब, यह रेबीज बला क्या है?’’ विजय ने सवाल किया.

डाक्टर ने बताया, ‘‘आसान भाषा में समझें तो रेबीज एक खतरनाक वायरस है जो कुत्ते, लोमड़ी, बंदर या बिल्ली जैसे जानवरों के काटने से फैल सकता है. अगर किसी इनसान के घाव पर संक्रमित जानवर की लार लग जाए, तो वह रेबीज से संक्रमित हो सकता है. इस का एक ही इलाज है कि तुरंत रेबीज से बचाव का टीका लगवाएं.

‘‘आप को बता दूं कि उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में रेबीज संक्रमण फैलने से एक मासूम की मौत हो गई थी. कुत्ते द्वारा उस का घाव चाटने के कुछ दिनों बाद 2 साल के अदनान की जान चली गई थी. इस घटना के बाद पूरे गांव में दहशत फैल गई थी. यह एक मामला नहीं है, बल्कि हर जगह से ऐसी खबरें आती रहती हैं.’’

‘‘रेबीज से पीडि़त कुत्ते की पहचान क्या होती है?’’ विजय ने दूसरा सवाल किया.

‘‘रेबीज से पीडि़त कुत्ते की पहचान कुछ साफसाफ लक्षणों से होती है, जैसे बिना उकसाए बारबार काटना, आवाज बदलना या भौंकने में दिक्कत, मुंह से झाग निकलना, अजीब चाल, गिरनालड़खड़ाना, इलाके को न पहचान पाना, जबड़ा ढीला होना, आंखों में खालीपन और अजीबोगरीब बरताव.

‘‘अगर कोई कुत्ता रेबीज से संक्रमित होता है, तो वह सिर्फ इनसानों को नहीं, बल्कि किसी भी चीज को काट सकता है. ऐसे कुत्तों का जीवनकाल बहुत छोटा होता है,’’ डाक्टर ने बताया.

‘‘मैं ने भी एक खबर पढ़ी थी कि किस तरह आवारा कुत्तों का खौफ दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी बढ़ गया है.

‘‘उस खबर के मुताबिक, गलीमहल्ले में आवारा कुत्तों के बढ़ते आतंक को ले कर केंद्रीय मंत्री रह चुके और लोक अभियान के अध्यक्ष विजय गोयल ने 15 मार्च, 2023 को जंतरमंतर पर धरना भी दिया था. उन्होंने तब कहा था कि कुत्तों के डर से लोग पार्कों और गलियों में नहीं जा सकते हैं. उन्होंने बताया कि 28 फरवरी, 2023 को उन्होंने इसे ले कर उपराज्यपाल को चिट्ठी भी लिखी थी,’’ विजय बोला.

‘‘पर डाक्टर साहब, आवारा कुत्तों के आक्रामक होने की वजहें क्या होती हैं?’’ इस बार अनामिका ने डाक्टर से सवाल किया.

‘‘आवारा कुत्तों के आक्रामक बरताव की कई वजहें हैं. अगर ऐसे कुत्तों को लगता है कि कोई शख्स उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है, तो वे उस पर हमला कर सकते हैं. आवारा कुत्तों के निशाने पर बच्चे और बुजुर्ग ही होते हैं. जैसे ही उन्हें मौका मिलता है, वे उन पर हमला कर देते हैं. इस के अलावा कुत्तों के इलाकों में कोई जाता है, तो भी उन्हें अटपटा लगता है और वे लोगों पर हमला कर देते हैं.

‘‘अगर आप को आवारा कुत्ते देखते ही भौंकने लगें, तो आप सतर्क हो जाएं. इस के अलावा अगर कोई आवारा कुत्ता परेशान सा घूम रहा हो, तो भी सतर्क हो जाएं. अगर बच्चे बाहर खेलने जाएं, तो वहां किसी बड़े को भी जरूर होना चाहिए,’’ डाक्टर ने बताया.

‘‘यही वजह है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया. आवारा कुत्ते रेबीज की बढ़ती घटनाओं की बड़ी वजहों में से एक हैं और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता जताई है.

‘‘रेबीज और आवारा कुत्तों की समस्या दुनियाभर में है. इस को ले कर सब से अहम सवाल यह उठता है कि भारत और दुनियाभर में आवारा कुत्तों पर काबू पाने के लिए किस तरह की नीति का पालन किया जाता है?

‘‘वर्ल्ड हैल्थ और्गेनाइजेशन का कहना है कि भारत में रेबीज के असली आंकड़ों की जानकारी नहीं है, लेकिन मुहैया जानकारी के मुताबिक, हर साल इस से 18 हजार से 20 हजार मौतें होती हैं.

‘‘सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में साल 2024 में रेबीज से 54 मौतें दर्ज की गईं, जो साल 2023 में दर्ज 50 मौतों से ज्यादा थीं,’’ विजय ने बताया.

यह सुन कर नर्स बोली, ‘‘जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा था कि इस समस्या की सब से बड़ी वजह जिम्मेदार महकमों की लापरवाही है. लोकल अथौरिटी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी.’’

विजय ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘11 अगस्त, 2025 को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की 2 जजों वाली खंडपीठ ने आवारा कुत्तों से जुड़े मसले पर फैसला सुनाते हुए सख्त निर्देश दिया था कि पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 (एबीसी नियम) के तहत एक बार पकड़े जाने और नसबंदी किए जाने के बाद आवारा कुत्तों को उन के इलाकों में वापस नहीं छोड़ा जाना चाहिए.

‘‘इस के बाद देशभर में डौग लवर्स ने एक मुहिम चलाई कि यह आवारा कुत्तों के साथ नाइंसाफी है. हर कुत्ते को शहर में या कहीं भी इनसान के साथ रहने का हक है.

‘‘इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले आदेश में बदलाव करते हुए नया निर्देश दिया कि दिल्ली में सभी आवारा कुत्तों को पकड़ कर नसबंदी और टीकाकरण किया जाएगा. उन्हें जहां से उठाया गया है, वहीं छोड़ दिया जाएगा.

‘‘रेबीज से संक्रमित और आक्रामक कुत्तों को सड़क पर नहीं छोड़ा जाएगा. इस के अलावा नगरनिगम को कुत्तों के लिए अलग फीडिंग पौइंट बनाने होंगे और सड़क या सार्वजनिक जगहों पर खाना खिलाना मना रहेगा. यह आदेश पूरे देश में लागू होगा.

‘‘आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का कहना है कि यह फैसला जनता को राहत देने वाला है और सरकार ईमानदारी से इस समस्या का समाधान करेगी.

‘‘दूसरी ओर दिल्ली के मेयर इकबाल सिंह ने बताया है कि दिल्ली नगरनिगम के पास कोई शैल्टर होम नहीं हैं. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली नगरनिगम के पास 10 नसबंदी केंद्र हैं, जिन्हें बढ़ाया जा सकता है और कुछ शैल्टर होम बनाए जाएंगे.’’

‘‘यह तो सरकारी काम हुआ न. पर क्या इस से आवारा कुत्तों की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा? क्या दिल्ली जैसे बड़े शहर आवारा पशुओं के रहने लायक बचे हैं? कुत्तों के साथसाथ गाय और सांड़ भी खुलेआम सड़कों पर घूमते दिखते हैं. कई बार तो उन्हें बचाने के चक्कर में सड़क पर हादसे भी हो जाते हैं.

2 सांड़ों की लड़ाई में कोई बेकुसूर इनसान भी घायल हो जाता है,’’ अनामिका ने अपनी बात रखी.

इस पर विजय ने कहा, ‘‘तुम सही कहती हो. दिल्ली जैसे शहर जहां हर जगह कंक्रीट की सड़कें बन गई हैं, वहां आवारा कुत्तों का रहना ही सब से बड़ी समस्या बन गया है. वे सड़कों पर ही गंदगी करते हैं, जिस से लोगों का चलना तक दूभर हो जाता है. रात को उन के भौंकने से नींद में खलल पड़ता है. पार्कों में भी आवारा कुत्ते घूमते रहते हैं.

‘‘यही समस्या कुत्ते पालने वालों के साथ भी है. पहले घर ज्यादा मंजिला नहीं होते थे, तो उन्हें संभालना इतना मुश्किल नहीं था, पर अब बहुमंजिला इमारतों का जमाना है. अपार्टमैंट्स कल्चर में हमें अपनी सुविधा के साथसाथ दूसरों की सहूलियत भी देखनी पड़ती है.

‘‘पर लोग समझते ही नहीं हैं. वे अपने कुत्तों को टहलाने के बहाने कहीं भी गंदगी करा देते हैं और साफ भी नहीं करते हैं. इस बात पर आएदिन उन का दूसरों के साथ झगड़ा होता है.

‘‘कई बार तो लोग लिफ्ट से अपने पालतू कुत्ते को ले जाते हैं. क्या लिफ्ट पालतू कुत्तों के लिए बनी है? बिलकुल नहीं, पर वे इसे अपना हक समझते हैं और जब कुत्ता किसी को काट ले, तो वे पीडि़त पर ही दोष लगाते हैं कि तुम बाद में लिफ्ट में आ जाते.’’

डाक्टर ने अनामिका को रेबीज का टीका लगा दिया था और जख्मों पर मरहमपट्टी भी कर दी थी. उन्होंने कहा, ‘‘एक बात और यह कि दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में तकरीबन 10 लाख आवारा कुत्ते हैं, इसलिए सभी के लिए तय फीडिंग स्पौट बनाना बहुत मुश्किल काम है.

‘‘इन हालात में जरूरी है कि नगरनिगम, एनजीओ और ऐक्टिविस्ट मिल कर ऐसे समाधान खोजें, जो आवारा जानवरों के फायदे में हों और साथ ही प्रशासन के लिए भी अपना काम करना आसान हो जाए.

‘‘केवल आपसी सहयोग और समझदारी से ही यह समस्या हल हो सकेगी. वैसे भी कुत्ते हमारे दुश्मन
नहीं है, बल्कि ये बहुत प्यारे होते हैं और सदियों से इनसान के साथ रहते आए हैं.’’ News Story

Hindi Story: खन्नाजी की शहादत

Hindi Story: खन्नाजी खुद में जीने वाले आदमी थे. दुनिया से उन का कोई ज्यादा वास्ता न था. न उन्हें दुनिया से ज्यादा मतलब था और न ही दुनिया को उन से. सब उन्हें ‘खन्नाजी’ के नाम से ही जानते थे. उन का असली नाम क्या था, महल्ले के ‘काने कौए’ को भी नहीं पता था.

असल में उन का असली नाम जानने की कभी किसी को जरूरत ही नहीं पड़ी. न खन्नाजी कभी किसी को अपने घर बुलाते थे, न कोई खन्नाजी को.

खन्नाजी की खासीयत यह थी कि वे सरकारी सेवा में थे, वह भी केंद्र सरकार की. हां जी, वे रेलवे के डाक महकमे में थे. इस महकमे को बोलचाल की भाषा में ‘आरएमएस’ के नाम से जाना जाता है.

खन्नाजी की एक और खासीयत यह थी कि वे जरूरत से ज्यादा अंधविश्वासी और टोनेटोटकों में यकीन करने वाले थे.

खन्नाजी जब इस शहर में आए थे, तब वे शादीशुदा और बालबच्चेदार थे. मतलब उन की एक सगी पत्नी और एक बेटी थी. उन की पत्नी का नाम जानना जरूरी नहीं है, क्योंकि वे बहुत जल्दी हम से विदा लेने वाली हैं. हां, बेटी का नाम उर्मिला है और उस का नाम जानना जरूरी है, क्योंकि वह आखिर तक हमारे साथ रहने वाली है.

हां जी, जैसे बताया जा चुका है, खन्नाजी की पत्नी एक दिन बाकायदा चली गईं यानी अपने प्रेमी के साथ फुर्र हो गईं. आप सोच रहे होंगे कि खन्नाजी इस से खासे परेशान हुए होंगे, तो जनाब आप को बता दूं कि इस से खन्नाजी की सेहत पर रत्तीभर फर्क नहीं पड़ा. उन्होंने अपनी पत्नी को ढूंढ़ने तक की भी जहमत न उठाई.

खन्नाजी सुबह उठ कर उर्मिला को स्कूल छोड़ कर खुद औफिस चले गए. वैसे, उन की पत्नी जेवर और रुपयापैसा ले कर भागी थीं, तो भी उन्होंने इस की रिपोर्ट थाने में दर्ज नहीं कराई, मानो सबकुछ आपसी रजामंदी से हुआ हो.

महल्ले वालों को तो कई दिनों के बाद खन्नाजी की पत्नी के भागने का पता चला. महल्ले वालों से संबंध न रखने का यह भी खास फायदा है कि मतलब न रखो तो उन्हें ऐसी खास बातों का पता ही नहीं चलता, जिन पर चटकारे लिए जा सकें. सामने अफसोस और पीछे हंसा जा सके.

खन्नाजी का कोई सगा रिश्तेदार भी हमदर्दी जताने नहीं आया. किसी को कोई जानकारी भी नहीं थी कि खन्नाजी का कोई रिश्तेदार है भी कि नहीं.

किसी को यह उम्मीद भी नहीं थी कि खन्नाजी जैसे आदमी का कोई रिश्तेदार होता भी होगा.

खैर, खन्नाजी को किसी की हमदर्दी की जरूरत थी भी नहीं. इस बात को आप अब तक समझ ही गए होंगे. खन्नाजी को इज्जत और बेइज्जती की कोई फिक्र नहीं थी. वे इन दोनों बातों से बहुत पहले ही बहुत ऊपर उठ चुके थे. कोई उन के बारे में क्या कहता है, उन की बला से.

खन्नाजी अपने सुखदुख के खुद साथी थे, इसलिए आप उन को हरदम बड़बड़ाते हुए और बेवजह मुसकराते हुए देख सकते थे. यह उन का पागलपन नहीं, बल्कि अपने दुखसुख बांटने के अजबगजब तरीके थे.

सचमुच ऐसे लोग धरती पर बहुत कम हैं, जो अपने दुखों को किसी के संग बांट कर बेवजह किसी को पीड़ा नहीं देते. नहीं तो आज की तारीख में किसी से बात करो, कुछ ही देर में वह अपना दुखड़ा रोने लगता है.

वैसे, आप यह कतई मत सोचिए कि खन्नाजी की पत्नी भाग गईं, तो दूसरी आईं नहीं. सरकारी नौकरी के यही तो फायदे हैं. आमदनी का पक्का जरीया.

खन्नाजी को अच्छीखासी मासिक तनख्वाह मिलती थी, फिर उन्हें बीवियों का अकाल कैसे सता सकता था? कुछ ही दिनों में खन्नाजी फिर शादीशुदा हो गए. दूसरी बीवी आईं बाद में, भाग पहले गईं. मतलब जितनी जल्दी आई थीं, उतनी ही जल्दी वे चली भी गईं, मानो कोई मेहमानदारी निभाने आई हों.

लेकिन कमाल देखिए, खन्नाजी के चेहरे पर इस बार भी जरा सी शिकन नहीं. उन्हें अपनी सरकारी नौकरी पर पूरा भरोसा था कि जब तक उन के पास यह ‘पारस पत्थर’ है तब तक पत्नियां आती रहेंगी. एक ढूंढ़ेंगे, चार मिलेंगीं.

तीसरी पत्नी हाजिर. लेकिन जैसे खन्नाजी की सरकारी नौकरी पक्की थी वैसे ही यह घरवाली भी पक्की निकली. चट्टान की तरह अचल. खन्नाजी हैरान. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि उन्हें इतनी टिकाऊ पत्नी भी मिल सकती है.

लेकिन टिकाऊ पत्नी के साइड इफैक्ट भी टिकाऊ थे. खन्नाजी की पूरी तनख्वाह उन की तीसरी पत्नी राजबाला के हाथों में पहली तारीख को ही आ जाती थी.

राजबाला ने घर को अच्छे से संभाल लिया. घर क्या संभाल लिया, पूरा राजपाट ही अपने हाथ में ले लिया. खन्नाजी अब 2 जगह नौकरी बजाने लगे, एक औफिस में और दूसरी घर पर. घर के हिसाबकिताब से उन्हें कोई लेनादेना नहीं था. हां, कभी पैसे दे कर उन से कोई सामान मंगवाया जाता, तो उस का पाईपाई का हिसाब उन्हें राजबाला को देना होता था. उन की पासबुक, चैकबुक और एटीएम कार्ड पर राजबाला का कब्जा था.

खन्नाजी कीपैड वाला मोबाइल इस्तेमाल करते थे और राजबाला स्मार्ट फोन. औनलाइन शौपिंग में भी राजबाला माहिर हो गई थीं.

धीरेधीरे राजबाला खन्नाजी के कान उमेठना भी सीख गईं. कभीकभी वे उन की पिटाई भी कर देती थीं, तो वे उसे ‘पत्नी का प्रसाद’ समझ कर खा लिया करते थे.

राजबाला हमेशा सोचती थीं कि खन्नाजी की पहली वाली दोनों पत्नियां कितनी बेवकूफ थीं, जो इतने आज्ञाकारी पति को छोड़ कर चली गईं. आखिर सोने का अंडा देने वाली मुरगी को भी कोई छोड़ कर जाता है क्या?

आखिरकार राजबाला को संतान सुख हुआ और उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया. उस का नाम रखा गया दिवाकर. वैसे वे उर्मिला को भी बेटी की तरह ही प्यार करती थीं. मांबेटी में बहुत अच्छे से पटती थी, क्योंकि दोनों ही खन्नाजी को बेवकूफ समझती थीं.

खन्नाजी को इन बातों से कोई मतलब नहीं था, कोई उन को क्या समझाता था. उन की जिंदगी उन के हिसाब से बढि़या चल रही थी. बच्चे बड़े होने लगे तो खन्नाजी बुढ़ाने लगे.

बुढ़ाने का मतलब केवल इतना सा है कि उन के कुछ बालों पर सफेदी आ गई, लेकिन उन की कदकाठी को देख कर यही लगता था ‘अभी तो मैं जवान हूं’.

खन्नाजी ने अपनी सारी जिंदगी किराए के मकान में निकाल दी थी, क्योंकि उन की पत्नियों को उन से ज्यादा लगाव उन की तनख्वाह से रहा था, इसलिए वे कभी मकान खरीदने या बनाने का सपना नहीं देख पाए थे.

तभी कोरोना की दूसरी लहर आ गई. वैसे तो खन्नाजी हमेशा मास्क लगा कर रखते थे, पर नाक के नीचे. फिर कोरोनाजी खन्नाजी को कहां छोड़ने वाले थे. उस ने एक दिन खन्नाजी को धरदबोचा और अजगर की तरह बढि़या से लपेट लिया.

खन्नाजी ने ‘खोंखों’ करना शुरू किया, तो राजबाला ने उन्हें अलग कमरे में डाल दिया. खन्नाजी के रिटायरमैंट में अभी 4 साल बाकी थे.

राजबाला के दिमाग में एक बढि़या विचार आया. उन्होंने फर्रुखाबाद से अपने भाई को बुला कर उस से सलाहमशवरा किया. सलाहमशवरा अव्वल दर्जे का था जैसे साहित्य में अव्वल दर्जे की ‘क्लासिकल रचनाएं’ होती हैं.

तो भाई, सलाहमशवरे का असर यह हुआ कि खन्नाजी को अस्पताल तब ले जाया गया, जब उन में कुछ ही सांसें ही बची थीं. अस्पताल वालों ने उन की बचीखुची सांसें ले कर उन की डैड बौडी को बढि़या से पैक कर के वापस कर दिया.

जब राजबाला और उन का भाई खन्नाजी की डैड बौडी को वापस ला रहे थे, तो वे अंदर से मुसकरा और बाहर से बेतरतीब रो रहे थे.

आप सोच रहे होंगे बेचारे खन्नाजी दुनिया से यों ही चले गए. नहीं भाई नहीं, कोरोना में खन्नाजी की शहादत बहुत काम आई.

श्रीमती खन्नाजी यानी राजबाला की पैंशन बन गई और रेलवे ने दिवाकर को बालिग होने पर कोटे से खन्नाजी की जगह नौकरी देने का वचन दिया. बहनभाई का सलाहमशवरा सौ फीसदी कामयाब रहा.

इस का मतलब यह नहीं कि राजबाला ने खन्नाजी के गुजर जाने पर उन की शहादत पर कुछ किया ही न हो. उन की तेरहवीं धूमधाम से मनाई गई. सब को बढि़या पकवान खिलाए गए. हम भी मेवे वाली खीर और रसगुल्ले डकोस कर आए. खन्नाजी की शहादत सच में शानदार रही. Hindi Story

Long Hindi Story: बस खाली करो – आखिरी भाग

Long Hindi Story, लेखक – सैयद परवेज

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था: हसामुद्दीन बस में यह सोच कर बैठा कि आज कनाट प्लेस घूमने जाएगा. बस में भीड़ थी. पर उसे सीट मिल गई. बस में एक ट्रांसजैंडर चढ़ी, जिस को ले कर लोगों ने बातें बनाई फिर 2 जेबकतरे टाइप लड़के बस में हुड़दंग करने लगे. जब वे उतरे तो जैसे बस वालो ने चैन की सांस ली. अब पढि़ए आगे…

उस लड़के ने बात तो ठीक कही थी. इस जमाने में पैसे कीमत ही कहां है. महंगाई के दौर में आम आदमी की जिंदगी कितनी मुश्किल हो गई है.

उन दोनों लड़कों के उतरने पर बस कंडक्टर ने सवारियों से कहा, ‘‘ये दोनों जेबकतरे थे. इन से कौन बहस करे…’’

बस कंडक्टर ने एक बात और कही, ‘‘शनिवार के दिन दिल्ली की बसों में किसी की जेब नहीं कटती है.’’

हसामुद्दीन की बाईं तरफ एक सीट छोड़ कर एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा था.

हसामुद्दीन ने उस आदमी से कहा, ‘‘ये लड़के पहले ऐसे नहीं होंगे, जैसा हम ने इन्हें फिलहाल देखा है.

किसी के हालात उसे क्या से क्या बना देते हैं. मुझे लगा कि मैं ने एक लड़के को कहीं देखा है. जन्म से कोई बुरा या अच्छा नहीं होता है. अच्छा या बुरा बनने में भी समय लगता है. यह समाज उसे अच्छा या बुरा बनाता है.

उस अधेड़ आदमी ने हसामुद्दीन की तरफ देख कर कहा, ‘‘आप की बात तो ठीक है, पर बच्चे समझते कहां हैं…’’

हसामुद्दीन ने उस आदमी से पूछा, ‘‘आप कहां जा रहे हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘केंद्रीय सचिवालय.’’

‘‘क्या आप सरकारी नौकरी में हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘नहीं… एक क्लब है, वहीं पर काम करता हूं.’’

‘‘आप कब से वहां काम कर रहे हैं?’’ हसामुद्दीन ने पूछा.

उस आदमी ने कहा, ‘‘तकरीबन पिछले 3 साल से.’’

‘‘बड़ा क्लब है?’’ हसामुद्दीन ने पूछा.

‘‘हां. उस क्लब में बहुत से लोग काम करते हैं, लेकिन सब ठेकेदारी पर हैं.’’

‘‘आप पहले कहां काम करते थे?’’

‘‘साउथ ऐक्सटैंशन में एक होटल है, मैं वहीं पर कुक था.’’

हसामुद्दीन ने पूछा, ‘‘आप ने कितने साल वहां काम किया?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘25 साल से ज्यादा ही.’’

‘‘फिर तो आप को वह काम छोड़ना नहीं चाहिए था.’’

‘‘क्या करें, मालिक ने लौकडाउन का फायदा उठाते हुए एकदम से 18 लोगों को निकाल दिया, जिन में मैं भी शामिल था.’’

‘‘वहां पर तो आप परमानैंट होंगे?’’

‘‘हां, छुट्टियां भी मिलती थीं. अभी भी वहां पर बहुत लोग काम करते हैं, लेकिन सब ठेकेदारी पर हैं. हमारी तो वहां एक यूनियन भी थी. पर मालिक ने धीरेधीरे सभी को निकालना शुरू कर दिया था.’’

हसामुद्दीन ने पूछा, ‘‘क्या मालिक को यूनियन से डर होता है?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘डर तो होता है, क्योंकि यूनियन होने से कामगार को एक तरह की सिक्योरिटी मिलती है. अगर किसी ने कामगार को उचित वेतन नहीं दिया है, तब यूनियन मैनेजमैंट के सामने अपनी बात रखती है.

यूनियन न होने से कामगार अपनी बात को मजबूती से और बिना डर के नहीं रख सकता है.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘आप उस क्लब में क्यों नहीं एक यूनियन बना लें?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘अब ट्रेड यूनियन बनाना आसान काम नहीं है. सरकार ने ट्रेड यूनियन बनाने के लिए नियमों में बड़ी कड़ाई की है. पहले जहां 7 लोग मिल कर यूनियन बना लेते थे, अब कुल कामगारों का 10 फीसदी कर दिया गया है. न 10 फीसदी कामगार होंगे, न यूनियन बनेगी.

अब कारखाने और फैक्टरी के अंदर धरनाप्रदर्शन करने की भी छूट नहीं है. सरकार केवल पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए काम कर रही है.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘जब ट्रेड यूनियनें नहीं होंगी, तब कामगारों की आवाज कौन उठाएगा?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘अब आवाज ही कौन उठा रहा है… जो हैं वे बहुत कमजोर हैं. देखिए, इस क्लब में काम करते हुए मुझे 3 साल हो गए हैं, लेकिन कोई छुट्टी नहीं मिलती है. जिस दिन काम करने नहीं गए, उस दिन की दिहाड़ी नहीं मिलती है.’’

हसामुद्दीन ने पूछा, ‘‘आप को यहां कितने पैसे मिलते हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘15,000 मिलते हैं, लेकिन आनेजाने का किराया और छुट्टी निकाल लूं, तो 10,000 बच जाते हैं. लेकिन भाई साहब, बगैर छुट्टी के कैसे काम चलेगा. बस, यही सोचता हूं कि खाली बैठने से अच्छा है कि कुछ करता रहूं.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘आप के बच्चे तो बड़े हो गए होंगे…’’

‘‘जी…’’ उस आदमी ने कहा.

‘‘आप कहां रहते हैं भाई साहब?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘विनय नगर, फरीदाबाद में.’’

‘‘किराए पर रहते हैं?’’

‘‘नहीं. 30 गज का प्लौट ले कर घर बना लिया है. उसी में रहते हैं.’’

हसामुद्दीन ने उस आदमी के पीले और जंग लगे हुए दांत देख कर पूछा, ‘‘क्या आप गुटका या पान मसाला खाते हैं?’’

‘‘नहीं, पर बीड़ी जरूर पीता हूं.’’

हसामुद्दीन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा, ‘‘आप वादा कीजिए कि आज से बीड़ी नहीं पीएंगे?’’

उस आदमी ने अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया, लेकिन कहा, ‘‘वादा कर के तोड़ना नहीं चाहता हूं.’’

हसामुद्दीन ने उसे एक सलाह दी, ‘‘आप आलू, प्याज, फल बेचने का अपना काम करें. इतना पैसा तो आप फरीदाबाद में ही कमा लेंगे.

उस आदमी ने कहा, ‘‘एक बार ढाबा शुरू किया था, लेकिन चला नहीं.’’

वह आदमी केंद्रीय सचिवालय उतरने लगा, तब हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘मैं ने आप को 2 बातें बताई हैं. एक बीड़ी न पीने की और दूसरी अपना कोई काम करने की.’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘मैं आप की बात हमेशा याद रखूंगा.’’

हसामुद्दीन सोचने लगा, ‘आमजन में बेरोजगारी के चलते ही ठेकेदारी प्रथा फलफूल रही है और नवउदारवादी नीति का मतलब है कि काम ज्यादा, पैसे कम और न कोई छुट्टी, न कोई स्वास्थ्य सुरक्षा और न ही कोई दूसरा फायदा.

‘इस नीति ने केवल पूंजीपतियों को मजबूत किया है. सरकार की इच्छाशक्ति से ही इस देश में ठेकेदारी प्रथा को खत्म किया जा सकता है या लोग ठेकेदारी पर काम ही न करें.’

निजीकरण पर हसामुद्दीन को अपनी कालोनी के एक साथी दशरथ ठाकुर की बात याद आई. वे कहते हैं, ‘‘सरकारी मुलाजिम खुद इस के लिए जिम्मेदार हैं. जिस की नौकरी लग जाती है, वह खुद को सरकारी दामाद समझने लगता है.’’

दशरथ ठाकुर रेलवे महकमे से रिटायर हो चुके हैं. हसामुद्दीन ने उन से एक बार पूछा था, ‘‘क्या रेलवे में सभी मुलाजिम काम नहीं करते हैं?’’

तब उन्होंने कहा था, ‘‘सरकारी मुलाजिम देरी से आता है और जल्दी घर चला जाता है.’’

हसामुद्दीन इस बारे में विचार करता है कि कैंटीन में चाय पीना, सिगरेट फूंकना या किसी से बात करने का मतलब यह नहीं है कि वह काम नहीं करता है.

कुछ मुलाजिम कामचोर जरूर होते हैं, लेकिन उन्हें कड़ाई से दुरुस्त किया जा सकता है न कि उदारवादी लोककल्याणकारी व्यवस्था को बदल कर पूंजीवादी व्यवस्था लागू कर.

अंगरेजी राज में भी तो सरकारी स्कूल थे. सरकारी रेलवे और डाक महकमे थे. तब वहां काम होता था, तो आज क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या केवल डर से ही लोग सही से काम करेंगे? निजीकरण तो इस का कोई हल नहीं है.

फैक्टरी मालिक ग्रैच्युटी नहीं देना चाहते हैं, क्योंकि नवउदारवादी नीति तो केवल टैंपरेरी नौकरी देने के पक्ष में है. आज बड़ेबड़े उद्योगों में भी टैंपरेरी नौकरियां ही दी जा रही हैं.

पूंजीपतियों के पक्षधर कहते हैं, ‘भाई, सभी को परमानैंट नौकरी नहीं दी जा सकती है…’ यह सोच हमारे समाज में तेजी से बढ़ाई गई है.

पर लोग यह क्यों नहीं सोचते कि कोई पूंजीपति खुद पूंजीपति नहीं बनता है, उसे मजदूर तबका पूंजीपति बनाता है. क्या पूंजीपति मजे नहीं करते हैं? उन के बच्चों की शादी में करोड़ों रुपए खर्च नहीं होते हैं?

खर्च करना गलत नहीं है, क्योंकि एक का खर्च होना भी तो अर्थशास्त्र में दूसरे की आमदनी है. सरकारी मुलाजिमों की आड़ में तो प्राइवेट कंपनियों में काम कर रहे मजदूरों, दूसरे मुलाजिमों के हकों को इन बीते दशकों में तेजी से हड़प लिया गया है.

7 लोग मिल कर यूनियन क्यों नहीं बना सकते हैं, जबकि धर्म को बचाने के लिए 4 लोग खड़े हो कर होहल्ला कर सकते हैं? कामगारों का हक क्या हक नहीं है? किसी कंपनी के मालिक ने किसी को रोजगार दे कर क्या उसे अपना गुलाम बना लिया है?

हसामुद्दीन को बस की सीढि़यों पर बैठे उस बड़े लड़के की याद आई, जिस के शरीर पर टैटू खुदे थे. क्या वे पैदाइशी थे या समाज ने ही उसे इतना धर्मभीरू बना दिया? अच्छेबुरे की परवाह न करते हुए उस ने अपने धर्म को ज्यादा अहमियत दी, लेकिन धर्म भी एक पदार्थ है… निकालने वाले तो उस में से अच्छीअच्छी चीजें निकाल कर अपनी जिंदगी संवार लेते हैं.

दूसरी तरफ सांप्रदायिक और धार्मिक अवसरवादी तत्त्व हैं, जो ऐसे लड़कों का इस्तेमाल हैं, क्योंकि धर्मभीरुता और पक्षधरता तो हर आदमी में होती है, लेकिन सांप्रदायिकता उस के अनुपात को बढ़ा देती है.
वे दोनों लड़के भयमुक्त लग रहे थे, लेकिन उन्हें भी भूख और प्यास लगती है. उन्होंने बस में कुछ लोगों को धमकाया भी था.

आदमी में डर होता है, पर जिसे सजा का डर न हो तो वह भयमुक्त हो जाता है या व्यवस्था ही अमानवीय हो जाए, तब आदमी का डर खत्म हो जाता है. अगर आदमी की जीने की चाह ही मर जाए, तब भी आदमी को डर नहीं लगता है.

कालोनी के साथी दशरथ ठाकुर को अब सरकारी नौकरियों में कमियां नजर आती हैं, जबकि वे खुद सरकारी मुलाजिम थे. उन का पैर रेल से कट गया था. रेलवे ने उन्हें अपने महकमे में दूसरा काम दिया, उन का इलाज करवाया. यहां तक कि नकली पैर भी लगवाया.

उन की रेलवे की पैंशन है, पर प्राइवेट सैक्टर में काम कर रहे कामगारों के साथ होने वाले हादसों में मालिक उन्हें बाहर का रास्ता ही दिखा देते हैं.

इतने में हसामुद्दीन को कंडक्टर की आवाज सुनाई देने लगी, ‘‘अरे भाई, बस खाली कर दो…’’ हसामुद्दीन बस से उतर कर मिंटो ब्रिज से होता हुआ रीगल सिनेमा की तरफ चल दिया. Long Hindi Story

Hindi Romantic Story: कौन तुम्हें यों प्यार करेगा…

Hindi Romantic Story ‘‘दादी, मैं बाहर खेलने जाऊं?’’ सुरभि ने सोफिया से इजाजत मांगी.

‘‘हां, लेकिन ज्यादा दूर मत जाना. यहीं अहाते में खेलना. और हां, शोर बिलकुल भी नहीं करना. दोपहर का वक्त है. सब लोग अपनेअपने घरों में सो रहे होंगे.’’

‘‘ठीक है दादी,’’ कहते हुए सुरभि दौड़ कर नीचे खेलने चली गई.

सोफिया टीवी के चैनल बदलने लगीं. सुरभि उन के बेटे कमलेश और बहू निम्मी की बेटी है. कमलेश एक सरकारी बैंक में काम करता है. बारबार तबादले से परेशान हो कर उस ने कठुआ में ही अपनी बेटी का दाखिला करा दिया था.

दोनों पतिपत्नी कामकाजी लोग हैं और बैंक में ही कभी अंबाला तो कभी चंडीगढ़ में काम करते हैं. उन का बेटा सुनील और सुरभि यहां कठुआ में अपनी दादी के साथ रहते हैं.

सोफिया अब विधवा हो चुकी हैं. उन के पति देश के दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे.

इस साल सोफिया 97 साल की हो गई थीं. अब तो उन से हिला भी नहीं जाता था. घर में मेड आती थी, जो सुबहशाम खाना बनाती, कपड़े धो देती, बच्चों को खाना खिला देती.

बुढि़या सोफिया के पास अब कोई काम नहीं था. वे बच्चों से अखबार पढ़वाती थीं. जासूसी उपन्यासों का उन को शुरू से शौक था. वे अपने पोते सुनील को जबतब बिठा लेती थीं. कभी अखबार पढ़ने को कहती थीं, तो कभी जासूसी कहानियों को पढ़ कर सुनाने की इच्छा जाहिर करती थीं.

यह सब काम इतवार को या सरकारी छुट्टी या फिर किसी पर्वत्योहार पर ज्यादा होता था. जब थोड़ाबहुत पढ़ कर बच्चे इधरउधर भागने लगते या खेलने जाने की जिद करने लगते, तो सोफिया का एक ही सहारा होता था, टैलीविजन पर न्यूज चैनल देखना.

आज एक न्यूज चैनल बदलते हुए सोफिया के हाथ एकाएक रुक गए. आज फिर एक फौजी की लाश तिरंगे में लिपटी हुई आई थी. उस फौजी की उम्र 25 साल के आसपास रही होगी. सीमा पर आतंकवादियों से मुठभेड़ करते हुए वह जवान शहीद हो गया था. उस शहीद जवान को हवा में बंदूक की गोलियां चला कर सलामी दी जा रही थी. सब लोग सावधान की स्थिति में खड़े थे.

सोफिया के पति की विदाई भी ऐसे ही हुई थी. उन को भी ऐसे ही गोलियों की सलामी दी गई थी. गोलियों की आवाज के बीच सोफिया अपने अतीत की खोह में गुम होती चली गईं.

‘‘माफ कीजिए, क्या मैं यहां थोड़ी देर के लिए बैठ जाऊं? मैं आप को बहुत देर तक तकलीफ नहीं देने वाला हूं. बस, मुझे कठुआ तक जाना है. अगले किसी स्टेशन पर उतर कर मैं जनरल डब्बे में चला जाऊंगा. अगर आप को एतराज न हो तो…’’ उस नौजवान ने बहुत सधे हुए शब्दों में कहा था.

लेकिन पता नहीं क्यों सोफिया को गुस्सा आ गया था. बिना सौरभ की तरफ देखे ही वह बोली, ‘‘आप को पता नहीं है कि यह रिजर्वेशन वाला कंपार्टमैंट है… आप को इस कंपार्टमैंट में नहीं आना चाहिए था. अगर चढ़ना ही था, तो किसी जनरल कंपार्टमैंट में चढ़ जाते.

‘‘हम लोग जनरल कंपार्टमैंट की परेशानियों से बचने के लिए ही रिजर्वेशन कराते हैं, ताकि आराम से सफर कर सकें.’’

सोफिया पहले से ही बहुत परेशान थी. धनबाद से उस की ट्रेन थी. उसे जम्मू जाना था. घर पर उस के मांबाप अकेले थे. उधर जम्मूकठुआसांभा बौर्डर पर लगातार सीजफायर का उल्लंघन हो रहा था. मोर्टार और गोलियों की बरसात हो रही थी.

सोफिया अपने मांबाप को ले कर बहुत चिंतित थी. उसे ऐसा लग रहा था कि वह किसी तरह जल्द से जल्द जम्मू पहुंच जाए.

सोफिया दिल्ली में काम करती थी. धनबाद अपने किसी काम से आई थी. तब तक पाकिस्तान की तरफ से गोलाबारी शुरू हो गई थी. वह अभी अपना काम निबटा भी नहीं पाई थी, तब तक युद्ध जैसे हालात शुरू हो गए थे. लोगों में एक तरह का डर पैदा हो गया था. चारों तरफ अफरातफरी का माहौल बन गया था.

सोफिया को अपने मांबाप की चिंता सताने लगी थी. पहले तो उसे ट्रेन की टिकट ही नहीं मिल रही थी, पर किसी तरह इधरउधर से जुगाड़ बिठा कर उस ने टिकट का बंदोबस्त किया था.

उस नौजवान ने एक बार फिर कोशिश की, ‘‘प्लीज, केवल अगले स्टेशन तक मुझे यहां बैठने दीजिए. मुझे मालूम है कि आप बहुत नेकदिल हैं. आप का दिल मोम की तरह कोमल है और खूबसूरत लोग किसी का दिल नहीं दुखाते, बल्कि दूसरों की हमेशा मदद ही करते हैं. ऐसा पता नहीं मुझे क्यों आप को देख कर लगता है. वैसे, मेरा नाम सौरभ है.’’

इस बार सोफिया को मुड़ कर सौरभ को देखना बड़ा जरूरी हो गया. वह बोली, ‘‘अच्छा तो मैं खूबसूरत और रहमदिल भी हूं. यह तो मुझे पता ही नहीं था. आप की मेहरबानी से आज मुझे पता चल गया… शुक्रिया. आप पीछे से भी लोगों का चेहरा देख लेते हैं क्या या आप ने झूठ बोलने में पीएचडी कर रखी है?’’

सौरभ झेंप गया. उस ने सचमुच सोफिया को सामने से नहीं देखा था. वह तो हड़बड़ी में ट्रेन में चढ़ गया था. खिड़की से उस ने बस सोफिया का आधा चेहरा ही देखा था.

सौरभ झेंपते हुए बोला, ‘‘नहीं, मैं ने खिड़की से आप को देख लिया था.’’

‘‘अच्छा जी, आप कहीं इसलिए तो इस कंपार्टमैंट में नहीं चढ़ गए कि आप को एक खूबसूरत लड़की दिख गई थी और आप उस के पीछेपीछे हो लिए? आप को कहीं जाना भी है या बस यों ही ट्रेन में चढ़ गए? मैं खूब जानती हूं आप जैसे लोगों को. लड़की देखी नहीं और लगे हाथ साफ करने.’’

सौरभ बस इतना ही कह सका, ‘‘नहीं, ऐसा नहीं है. मुझे ड्यूटी जौइन करनी है.’’

सोफिया को अब अफसोस हुआ. उस ने सौरभ को बहुत भलाबुरा कह दिया था. वह बोली, ‘‘अच्छा, बैठ जाइए.’’

सौरभ ने कहा, ‘‘जी, मैं ठीक हूं. मुझे तो खड़े रहने की आदत है.’’

‘‘फिर भी बैठ जाइए. अगला स्टेशन अभी घंटेभर बाद आएगा.’’

सौरभ पर सोफिया ने सरसरी नजर दौड़ाई. चौड़ी छाती, तांबई रंग, कद साढ़े 6 फुट. मजबूत कंधे. गोरा उम्र कोई 30-32 साल. जींसटीशर्ट में वह बेहद खूबसूरत लग रहा था. हाथ में एक बैग. बंधा हुआ एक कंबल. कुल इतना ही सामान था.

‘‘क्या करते हैं वहां जम्मू में?’’ सोफिया ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, बस घोड़ों के अस्तबल में काम करता हूं और मुसाफिरों को ऊपर पहाड़ पर ले जाता हूं.’’

‘‘मुझे बना रहे हैं. आप की कदकाठी और आप की पर्सनैलिटी देख कर तो ऐसा नहीं लगता कि आप कोई अस्तबल या घोड़े के सईस हो. सचसच बताइए कि कौन हैं आप?’’

सौरभ का दिल इस बार तेजी से धड़का था. वह नहीं चाहता था कि अपनी असलियत सोफिया को बताए.

दरअसल, उस को कठुआ जाना था. सीमा पर हालात बहुत खराब चल रहे थे. वह अपनी बहन की शादी में यहां धनबाद आया था. शादी अभी 2 दिन पहले ही निबटी थी. तब तक देश में युद्ध जैसे हालात बन गए थे.

सौरभ अपनी पहचान किसी को बताना नहीं चाहता था कि वह एक फौजी है. इस तरह से सब को अपनी असलियत बताना उसे ठीक नहीं लगता था. वह बहुत ही शांत स्वभाव का था. ज्यादा बात करना उस के स्वभाव में नहीं था.

सौरभ बोला, ‘‘नहीं, मैं घोड़ों की देखभाल ही करता हूं. पहाड़ की चोटी पर मुसाफिर सीधे नहीं चढ़ पाते, इसलिए घोड़ों की मदद से ऊपर पहाड़ पर जाते हैं. मैं छोटामोटा काम करने वाला ही आदमी हूं. पता नहीं आप को क्यों ऐसा लगता है कि मैं झूठ बोल रहा हूं.’’

सौरभ की बातों में पता नहीं ऐसा क्या था कि न चाहते हुए भी सोफिया को यकीन करना पड़ गया कि सौरभ जोकुछ कह रहा है, वह सच है. शाम कब की हो चुकी थी. ट्रेन अपनी रफ्तार में दौड़ती जा रही थी.

अगला स्टेशन आने ही वाला था. उस स्टेशन से सोफिया का मुंहबोला भाई मुरारी आ कर ट्रेन में चढ़ने वाला था. उस को भी सोफिया के साथ जम्मू जाना था.

सोफिया बहुत बेचैन हो कर पहलू बदल रही थी. दरअसल, मुरारी आईटीआई का इम्तिहान दे कर सीधे स्टेशन आ कर उस के साथ ही जम्मू तक जाने वाला था.

सोफिया के पास वाली अपर बर्थ मुरारी के नाम से बुक थी. स्टेशन आया, लेकिन उस का भाई नहीं दिखा.
सोफिया ने मुरारी को फोन लगाया, ‘‘हां, मुरारी तुम कहां हो? आ जाओ स्टेशन, गाड़ी स्टेशन पर खड़ी है.’’

‘दीदी, मैं ट्रैफिक में फंस गया हूं. मुझे स्टेशन आने में करीब एकसवा घंटे से कम नहीं लगेगा,’ मुरारी ने बताया.

‘‘ट्रेन तो केवल 10 मिनट ही रुकती है इस स्टेशन पर. किसी तरह कोशिश करो जल्दी पहुंचने की,’’ सोफिया बोली.

‘दीदी, नहीं हो पाएगा. आप चली जाओ. मैं एकदो दिन बाद आ जाऊंगा,’ मुरारी ने कहा.

‘‘लेकिन मैं अकेले कैसे इतनी दूर तक का सफर करूंगी. मेरे साथ सामान भी तो है.’’

‘अरे दीदी, मैं कठुआ में अपने किसी दोस्त को फोन कर दूंगा. वह सामान उतरवा देगा. घबराने की कोई जरूरत नहीं है. सब ठीक होगा. अच्छा, रखता हूं. ट्रैफिक खुल गया है. अब स्टेशन न जा कर सीधा घर चला जाऊंगा. चलो, ठीक है. हैप्पी जर्नी दीदी.’

‘‘ठीक है, रखो फोन,’’ सोफिया ने बेमन से कहा.

सौरभ और मुरारी की कदकाठी और चेहरा एक सा था. वह सोचने लगी कि जगहजगह युद्ध जैसे हालात चल रहे हैं. पता नहीं पड़ोसी दुश्मन देश कब हमला कर दे. क्यों न वह सौरभ को ही अपने साथ ले चले? स्टेशन पर मुरारी का दोस्त तो आ ही जाएगा उस का सामान लेने.

सौरभ उतरने ही वाला था कि तभी सोफिया को परेशान देख कर बोला, ‘‘आप कुछ परेशान सी लग रही हैं.’’

‘‘हां, मेरा मुंहबोला भाई मुरारी अभी स्टेशन पर आने ही वाला था, लेकिन ट्रैफिक में फंस गया. अब मुझे अकेले ही सफर करना पड़ेगा.’’

‘‘ओह, यह तो बहुत बुरा हुआ. खैर, मैं चलता हूं,’’ सौरभ ने कहा.

सौरभ जब सोफिया के पास से गुजरा, तब सोफिया ने टोका, ‘‘सुनिए, आप चाहें तो मेरे भाई की सीट पर बैठ सकते हैं. अकेली लड़की के साथ में किसी विश्वासी आदमी का होना बेहद जरूरी है. अगर आप को कोई दिक्कत न हो तो.’’

‘‘लेकिन जब टीटी आएगा तब?’’ सौरभ ने पूछा.

‘‘अरे, टीटी से मैं बात कर लूंगी. बस आप यहीं रहिए,’’ सोफिया बोली.

सौरभ मान गया. थोड़ी देर के बाद सोफिया ने सौरभ से पूछा, ‘‘आप चाय लेंगे?’’

‘‘आप किसी ऐरेगैरे को चाय पिलाएंगी?’’ सौरभ ने चुटकी ली.

‘‘अरे, मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था. आप उस बात को अब भी पकड़े हुए हैं. आदमी को पहचानने में कभीकभी गलती हो जाती है,’’ सोफिया बोली.

‘‘यानी कि आप के हिसाब से मैं गलत आदमी हूं?’’

‘‘ऐसा मैं उस समय तक ही सोचती थी, लेकिन अब नहीं. आदमीआदमी में फर्क होता है. इतनी तो परख है मुझ में,’’ सोफिया ने कहा.

‘‘तो क्या परखा आप ने? कैसा आदमी हूं मैं?’’

‘‘आप भले आदमी हैं.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘आप भले आदमी न होते, तो मैं आप को अपने साथ सफर करने की इजाजत नहीं देती.’’

‘‘अच्छा, तो यह बात है.’’

‘‘हां, और क्या…’’

‘‘यह तो आप की जरूरत है कि आप के साथ कोई मर्द सफर करने के लिए नहीं है, नहीं तो आप मुझे अपने साथ इस कंपार्टमैंट में रुकने को न कहतीं. खैर, ऐसा होना लाजिमी भी है,’’ सौरभ ने जैसे सफाई देनी चाही.

सोफिया ने चाय की प्याली बनाई और सौरभ की तरफ बढ़ा दी. इस बार सौरभ के हाथ से सोफिया का हाथ छू गया.

ठंड के मौसम में सोफिया का हाथ बिलकुल ठंडा हो गया था. सौरभ ने चाय की प्याली थाम ली और धीरेधीरे चाय पीने लगा.

सौरभ ने गौर से सोफिया के चेहरे को निहारा. गोरा रंग, हरी आंखें. भरीभरी छातियां. जींसटौप में वह बेहद खूबसूरत लग रही थी.

सोफिया ने पूछा, ‘‘ऐसे क्या देख रहे हैं?’’

‘‘आप का खूबसूरत चेहरा.’’

‘‘मैं कहां खूबसूरत हूं. मेरी तो उम्र भी अब ढलने लगी है. मेरी उम्र के लोगों के तो बड़ेबड़े बच्चे होते हैं.’’

‘‘नहीं, मैं सच कह रहा हूं. आप बहुत खूबसूरत हैं. आप के जिस्म के हर हिस्से को कुदरत ने बहुत फुरसत से बनाया है.’’

फिर सौरभ को लगा कि वह कुछ ज्यादा ही बोल गया है. वह अब चुप हो गया था. वह खिड़की से बाहर देखने लगा था.

‘‘उधर क्या देख रहे हो? अभी मेरी खूबसूरती की बात कर रहे थे और अभी बाहर क्या निहारने लगे?’’

‘‘कुछ नहीं, कुदरत की बनाई हुई चीजें ही देख रहा था. नदी, तालाब, पहाड़, चांद की चांदनी…’’

‘‘क्या ये मुझ से भी खूबसूरत हैं?’’

सौरभ केवल हंस कर रह गया.

‘‘शादी हो गई तुम्हारी?’’ सोफिया ने सौरभ के चेहरे को निहारते हुए पूछा.

‘‘नहीं,’’ सौरभ बाहर के नजारे में कहीं खोता हुआ बोला.

‘‘शादी लायक तो तुम्हारी उम्र हो ही गई है. अब तक क्यों नहीं की?’’

‘‘यह सवाल तो मैं तुम से भी पूछ सकता हूं.’’

‘‘जिम्मेदारियां… और क्या वजह हो सकती है. मैं अपने मांबाप की अकेली बेटी हूं. मेरे मांबाप बूढ़े हैं. उन की उम्र हो गई है. आखिर किन के भरोसे उन को छोड़ूं? मेरे चले जाने के बाद उन को कौन देखेगा?

लेकिन तुम ने शादी क्यों नहीं की? तुम्हारी भी तो शादी लायक उम्र हो गई है?’’ सोफिया बोली.

‘‘वही जिम्मेदारी की बात आ जाती है. तुम्हारी वाली हालत. घर में बहन थी. उस की शादी करनी थी. उस के बाद ही तो अपनी शादी के बारे में सोचता,’’ सौरभ बोला.

दोनों अपनी हालत पर मुसकराने लगे.

‘‘अरे, मैं ने अपना फोन कहां रख दिया,’’ सौरभ को अचानक अपना फोन याद आया.

‘‘ठीक से देखो, यहींकहीं होगा.’’

सुनो, तुम अपने मोबाइल से जरा मेरे नंबर पर रिंग कर दो. हो सकता है, यहींकहीं गिरा हो. मिल जाए.’’

सोफिया ने नंबर पूछ कर मिलाया और मोबाइल की घंटी पर एक प्यारी सी रिंगटोन बजने लगी, ‘सुनो न संगेमरमर… कुछ भी नहीं है…’

मोबाइल सौरभ की सीट के बगल में ही गिरा था. रिंग मारने पर आसानी से मिल गया.

‘‘रिंगटोन तो तुम ने बहुत अच्छी लगा रखी है.’’

‘‘हां, मुझे यह गाना बेहद पसंद है.’’

‘‘तुम ने मेरी कौलर ट्यून सुनी है?’’

‘‘नहीं,’’ सौरभ ने कहा.

‘‘फिर मेरा मोबाइल नंबर डायल करो.’’

सौरभ ने स्पीकर औन कर दिया. आवाज आई, ‘कौन तुम्हें यूं प्यार करेगा, जैसे मैं करती हूं…’

सोफिया का चेहरा खुशी के मारे चमकने लगा.

सौरभ बोला, ‘‘ये दोनों मेरे फेवरेट गाने हैं.’’

‘‘तुम बहुत स्मार्ट हो.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘तुम ने बहाना बना कर मेरा मोबाइल नंबर ले लिया,’’ सोफिया बोली.

‘‘नहीं, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था. तुम कहो तो डिलीट कर दूं?’’

‘‘नहीं, लेकिन तुम्हें पता है कि लड़कियां अपना नंबर किस को देती हैं?’’

‘‘किस को?’’

‘‘किसी खास को.’’

‘‘अच्छा, तो क्या चलोगी मेरे साथ डेट पर?’’ सौरभ ने पूछा.

‘‘लेकिन तुम उम्र में मुझ से बहुत छोटे हो. कहां तुम 30 के और कहां मैं 40 की. एक दशक का अंतर है हमारी और तुम्हारी उम्र में,’’ सोफिया बोली.

‘‘प्यार में उम्र, ऊंचनीच, जातपांत, अमीरगरीब कुछ माने नहीं रखता, बस दिल मिलना चाहिए,’’ सौरभ ने बताया.

‘‘10 साल बीतने के बाद तुम ही किसी नईनवेली को खोजने लगोगे. तब मैं तुम्हारे लिए बूढ़ी हो जाऊंगी,’’ सोफिया बोली.

‘‘ऐसा नहीं होगा. मैं तुम्हें रूह की गहराइयों से चाहता हूं. तुम्हारा प्यार मेरे लिए पल दो पल का नहीं है,’’ सौरभ ने कहा.

‘‘सच में?’’ सोफिया ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘अच्छा, इस नंबर का क्या करना है? हो सकता है, हम फिर कभी मिलें ही न. यह हमारी आखिरी मुलाकात हो,’’ सौरभ ने कहा.

सोफिया चुप रही. ट्रेन रफ्तार से आगे बढ़ रही थी. आगे का सफर बहुत अच्छा रहा. ट्रेन कठुआ स्टेशन पर पहुंची. मुरारी का दोस्त मयंक सोफिया को लेने आया था. आखिरी बार सौरभ और सोफिया मिल रहे थे.

सौरभ ने सोफिया को इशारे से कहा कि फोन करना. थोड़ी देर में गाड़ी जम्मू के लिए आगे बढ़ गई.

घर पहुंचने के बाद सोफिया का दिल किसी काम में नहीं लगता था. उस को बारबार सौरभ की याद आती थी.

एक तय समय तक लड़के वाले सोफिया को देखने और रिश्ते की बात करने के लिए आते थे, लेकिन सोफिया जिम्मेदारियों के बो?ा तले खुद को दबाती चली गई. उस ने शादी के इरादे को ही एक सिरे से खारिज कर दिया था. लेकिन सौरभ से मिल कर उस में उमंगें जागने लगी थीं.

एक दिन सोफिया ने सौरभ को फोन लगाया और शिकायत करती हुई बोली, ‘‘तुम्हें तो मेरी याद भी नहीं आती होगी न?’’

‘ऐसा नहीं है मेरी जान. तुम्हें तो मैं एक पल भी भूल नहीं सका, लेकिन केवल बात करने से काम नहीं चलता. काम भी तो करना पड़ता है. अगर घोड़े की सेवाटहल न करूं, तो मालिक मेरी जान खा जाएगा.

मेरा ज्यादातर समय टूरिस्टों के साथ ही बीतता है. पेट के लिए सब करना पड़ता है,’ सौरभ बोला.

‘‘तुम यहीं आ जाओ. चार घोड़े तुम्हारे लिए खरीद देती हूं. तुम उन की सेवा करना और मुझे उन घोड़ों पर घुमाना. जो मजदूरी तुम वहां पाते हो, यहां आ कर मुझ से ले लेना,’’ सोफिया बोली.

सौरभ ने कहा, ‘सो तो ठीक है, लेकिन मेरी नौकरी का सवाल है, नहीं तो मैं जरूर आता. एक बार नौकरी चली गई, तो फिर न मिलेगी. और तुम्हें तो पता है कि नौकरी मिलना आज के समय में कितना मुश्किल है.’
सोफिया बोली, ‘‘और तुम ने मु?ो डेट पर ले जाने को कहा था. उस का क्या हुआ?’’

‘डेट पर भी चलेंगे. अभी इधर सीजन चल रहा है. दो पैसे कमाने के दिन हैं, इसलिए मालिक से छुट्टी की बात भी नहीं कर सकता. मैं आऊंगा तुम से मिलने, लेकिन अभी तुम थोड़ा समय दो.’

‘‘सौरभ, मैं तुम्हें जीजान से चाहती और प्यार करती हूं. मैं तुम से मिलना चाहती हूं. तुम को छूना चाहती हूं. तुम में समाना चाहती हूं,’’ सोफिया ने अपना दिल खोल कर रख दिया.

‘मैं भी तुम से सच्चा प्यार करता हूं. तुम को तो भूलने का सवाल ही पैदा नहीं होता,’ सौरभ ने कहा.

‘‘ओह सौरभ, तुम कितने अच्छे हो,’’ सोफिया खुश हो गई.

किसी तरह 2 महीने बीते. बर्फ पिघलने के बाद पाकिस्तानी सेना ने भारत में घुसपैठ कर दी. पहलगाम, कठुआ और कारगिल के अलावा श्रीनगर, अखनूर, बारामूला में बेकुसूर नागरिक मारे जा रहे थे. अब युद्ध को किसी भी हालत में टाला नहीं जा सकता था.

एक दिन सौरभ का फोन आया. उस समय सोफिया बाजार में सामान खरीदने गई थी. घर आ कर मोबाइल देखा तो कई मिस्ड काल थे.

सोफिया ने फोन मिलाया, ‘‘बोलो मेरे चरवाहे, मेरी जान ने कैसे याद किया मुझे?’’

‘मैं अब तुम्हें देखे बगैर नहीं रह सकता. तुम्हारी बहुत याद आती है. तुम्हारी आवाज सुनते ही मेरे शरीर में अजीब सी हरकत होने लगती है,’ सौरभ ने कहा.

सोफिया बोली, ‘‘आ जाओ न फिर मुझ से मिलने, तुम को किस ने रोक रखा है.’’

सौरभ बोला, ‘आ जाता, लेकिन मेरा काम मुझे रोक लेता है. तुम समझ रही हो न…’

सोफिया नाराज हो कर बोली, ‘‘ये सब कहने की बातें हैं क्या…’’

सौरभ ने कहा, ‘‘सुनो सोफिया, मैं तुम से एक बेहद जरूरी बात करना चाहता हूं. मेरा काम अब ज्यादा बढ़ गया है. मैं ज्यादातर ऊंचाई पर ही रहूंगा और उतनी ऊंचाई पर कोई नैटवर्क भी नहीं आता, इसलिए फोन से बहुत मुमकिन है बात न हो पाए. पर जब भी मौका मिलेगा मैं तुम्हें फोन कर लूंगा. फोन न कर सका, तो मैं तुम्हें हर हफ्ते खत लिखा करूंगा.

‘अपना खयाल रखना. खत का भी ज्यादा इंतजार मत करना. देश में अभी इमर्जैंसी जैसे हालात हैं.

बारामूला में मेरा पूरा परिवार दादादादी, चाचाचाची सब लोग रहते हैं.

‘इधर जम्मू में हालात बिगड़े तो मेरा एक और मकान धनबाद में है. मेरे दादादादी, अपने मांपिताजी को ले कर वहीं चली जाना. रुपएपैसों की बिलकुल चिंता मत करना. एक एटीएम कार्ड तुम्हें कुरियर से भेज रहा हूं. पिन की जानकारी ह्वाट्सएप कर दी है. ये सब मोटीमोटी बातें हैं, जिन की तुम को आने वाले समय में जरूरत पड़ेगी.’

‘तुम जा कहां रहे हो? मुझे बताओगे भी या मुझे इसी तरह अपना आदेश सुनाते रहोगे फोन पर?’
‘यह जान कर तुम क्या करोगी कि मैं कहां जा रहा हूं. सेफ्टी रीजन से तुम को ये बातें बताई हैं. बस, तुम इन बातों को मानना और एक बात यह कि सेना हैडक्वार्टर के पास ही एक डाकखाना है, जिस में एक डाक बाबू ‘नील चाचा’ काम करते हैं. कोई खास जानकारी चाहिए हो, तो उन से ले लेना.’

‘‘फिर भी तुम कहां जा रहे हो, मुझे कुछ तो पता होना चाहिए.’’

सौरभ ने कहा, ‘सोफिया, मुझे भी कुछ पता नहीं है कि मुझे कहां भेजा जा रहा है. बस, मुझे भेजा रहा है और मैं जा रहा हूं और मुझे जाना भी चाहिए.

‘देश में हालात बेहद खराब हैं. लोगों की छुट्टियां रद्द हो रही हैं. सब लोग काम पर लौट रहे हैं. होमगार्ड के सिपाही, पुलिस, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ, एसएसबी, आर्मी, एयरफोर्स. सब लोग. बीएसएफ तो मोरचे पर पहले से ही डटी हुई है.’

सोफिया बोली, ‘‘लेकिन इन का तुम से क्या संबंध है? तुम तो आम नागरिक हो. आम नागरिक को युद्ध से भला क्या मतलब है और खासकर एक सईस को?’’

‘मैं इस देश का एक नागरिक हूं और मुझे लगता है कि जब देश को युद्ध जैसी इमर्जैंसी का सामना करना पड़े, तो हर आदमी को युद्ध लड़ने के लिए तैयार होना चाहिए.’

अब सोफिया का माथा ठनका. सौरभ का डीलडौल और साढ़े 6 फुट लंबा कद देख कर उस को पहले ही इस बात का शक था कि वह फौज में काम करने वाला कोई आदमी है.

सोफिया ने कहा, ‘‘अच्छा तुम ठीकठीक बताओ कि तुम कौन हो? तुम सेना में काम करते हो? गुप्तचर विभाग में हो या कौन हो? तुम को मैं जितना समझाने की कोशिश करती जा रही हूं, तुम उतना ही उलझते जा रहे हो. प्लीज, मुझे सही जानकारी दो…’’

सौरभ ने कहा, ‘‘मेरा एक फोन आ रहा है. रुको, मैं तुम से बाद में बात करता हूं.’’

सौरभ का फोन कट गया था, लेकिन भीतर में कहीं गहरा था सौरभ और उस की बातें भी. कुछ भी साफसाफ नहीं बताता सौरभ. जितना सोफिया सौरभ को सम?ाना चाहती थी, कहीं गहरे में उलझती जाती थी. उस को ट्रेन में ही चेत जाना चाहिए था कि ऐसे लोगों पर जल्दी यकीन नहीं करना चाहिए था.

तभी मोबाइल पर टिंग से एक मैसेज गिरा. सोफिया ने गौर से देखा. वह एटीएम कार्ड का पिन था. 0169.
तकरीबन 15 दिनों के बाद सोफिया को डाक से एटीएम कार्ड भी मिल गया. उस में एक लिहाफा था, जिस में एक बैंक खाता था. एचडीबीसी नाम का कोई बैंक था. उस की शाखा सोफिया के घर के बहुत पास में ही थी यानी सौरभ यहां आया था और उस ने लोकेशन भी देखी थी.

अजीब बात है. सौरभ को मेरे घर और मेरे घर के पास इस बैंक के बारे में अच्छे से पता था. मेरे घर तक आ कर वह मुझ से मिले बगैर चला गया और कहता है कि मुझ से बहुत प्यार करता है. खाक प्यार करता है. जरूर कोई मायावी किस्म का आदमी है सौरभ.

लेकिन लोकलाज का भी तो डर है सौरभ को. शादी से पहले अगर कोई लड़का मिलने आता है, तो लड़की को लोग गलत नजरों से देखते हैं, लेकिन केवल मायावी कह देने भर से काम नहीं चलेगा. वह जिम्मेदार भी तो है. वह भी शादी से पहले. लोग शादी के बाद जिम्मेदारी नहीं स्वीकारते, यह तो शादी से पहले ही जिम्मेदारी स्वीकार रहा है.

पड़ोसी देश के लिए अब नाक बचाने की बात आ गई थी. हमारी फौज ने पड़ोसी मुल्क को नाकों चने चबवा दिए थे, लेकिन हमारी तरफ भी कैजुअल्टी हुई थी. चीन और नेपाल भी इन खराब हालात में पाकिस्तान का साथ दे रहे थे. पूरे देश में ब्लैकआउट चल रहा था. हर जगह अंधेरा. हर जगह डर का माहौल. दिन में ही सोता पड़ जाता था.

सब जगह लोग महफूज ठिकानों में छिप गए थे. देश के किसी भी हिस्से से कभी भी भयानक खबरें आ जाती थीं. सड़कों पर लोगों के कहीं हाथ के टुकड़े तो कहीं पैर के टुकड़े जहांतहां दिखाई देते थे. दिनरात अस्पतालों में भीड़ लगी रहती थी.

मिलिटरी अस्पतालों में कैजुअल्टी ज्यादा हुई थी. वहां एंबुलैंस में भरभर कर लोग आते थे. लोगों का हुजूम अस्पतालों के बाहर अपनों की शिनाख्त कर रहा था. सायरन बजता और लोग बंकरों की तरफ भाग जाते.

अरुणाचल प्रदेश और सियाचिन से डरावनी और भयावह खबरें आ रही थीं. रूस और इजराइल हमारे देश के साथ खड़े थे. रूस ने हमारे लिए 2 दर्जन लड़ाकू बमवर्षक हवाईजहाज भेजे थे. इजराइल भी प्रचुर मात्रा में हमें हथियार मुहैया करा रहा था, लेकिन दोनों तरफ कैजुअल्टी बढ़ रही थीं.

सोफिया का दिल हलकान हो रहा था. वह बारबार सौरभ के बारे में ही सोच रही थी कि इस युद्ध में सौरभ की क्या हालत होगी? वह क्या कर रहा होगा? वह ठीक तो होगा या नहीं? महीनाभर हो चुका था, उस से बात किए. अब तक उस का कोई फोन नहीं आया था.

फोन आता भी तो कैसे… ज्यादातर टावर पहले ही बमबारी में बरबाद हो चुके थे. कुछ थोड़ेबहुत टावर जो थे, सिक्योरिटी की वजह से वहां इंटरनैट बंद कर दिया गया था.

अब लेदे कर सेना हैडक्वार्टर और उस के डाकघर का सहारा था. सेना हैडक्वार्टर और डाकघर सोफिया के
घर के करीब था, लेकिन वह वहां सिक्योरिटी की वजह से नहीं जाना चाहती थी.

पर एक दिन अलसुबह ही सोफिया निकल पड़ी. सेना का हैडक्वार्टर और डाकघर ऊंचाई पर थे.

चलतेचलते उस की सांसें फूलने लगीं. पूछतीपाछती वह किसी तरह काउंटर पर पहुंची. वहां के पोस्टमास्टर का नाम नीलमणि था, जिन्हें सब ‘नील चाचा’ कहते थे.

सोफिया ने पूछा, ‘‘आप में से ‘नील चाचा’ कौन हैं?’’

एक दुबलापतला आदमी वहां डाक छांट रहा था. उस ने पतली ऐनक से खिड़की की तरफ देखा और कहा, ‘‘कौन?’’

सोफिया को लगा जैसे उस का आना कामयाब रहा. वह बोली, ‘‘आप ही ‘नील चाचा’ हैड पोस्टमास्टर हैं?’’
बूढ़े ने ‘हां’ में गरदन हिलाई और कहा, ‘‘डाकिया परसों डाक बांटते समय मोर्टार के छर्रे से जख्मी हो गया है. अभी वह अस्पताल में है. उस की जगह मैं उस का काम कर रहा हूं.’’

‘‘अगर आप को कोई तकलीफ न हो, तो आप मेरी डाक देख देंगे… मेरी कोई चिट्ठी आई हो तो… आप समझ रहे हैं मैं जो कह रही हूं…’’

‘नील चाचा’ ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है बेटी?’’

‘‘मेरा नाम सोफिया है.’’

सोफिया नाम सुनते ही ‘नील चाचा’ जबरदस्ती मुसकराते हुए वे बोले, ‘‘अच्छा, तो तुम सौरभ की मंगेतर हो… नहीं बेटी, तुम्हारी कोई चिट्ठी नहीं आई है. सौरभ तुम्हारे बारे में मु?ा से अकसर बातें करता था.’’

‘‘आप सौरभ को जानते हैं ‘नील चाचा’?’’

‘‘अरे, सौरभ को कौन नहीं जानता… वह बहुत ही प्यारा लड़का है.’’

‘‘वैसे क्या करते हैं वे सेना में?’’

इस बार ‘नील चाचा’ ने बहुत जोर से सोफिया को घूरा और कुछ देर तक वे उस के चेहरे को देखते रहे, फिर बोले, ‘‘तुम सोफिया ही हो न… सौरभ की मंगेतर?’’

‘‘हां,’’ सोफिया ने ‘नील चाचा’ को बहुत हैरत से देखा.

‘‘हां, तो तुम्हें सचमुच नहीं पता कि सौरभ सेना का जवान है. वह भारतीय सेना में अफसर है.’’

‘‘देखो, उस ने बताया था मुझे, लेकिन मैं भूल गई,’’ सोफिया को झिझक हुई. उसे अपने बरताव पर कोफ्त हो रही थी. नाहक ही उस ने ‘नील चाचा’ से सौरभ के बारे में पूछ लिया. आखिर क्या सोचेंगे वे…
‘‘मेरी कोई डाक आए तो बताइएगा,’’ सोफिया बोली.

‘‘जरूर,’’ ‘नील चाचा’ बोले.

सोफिया घर पहुंची तो वह सौरभ के बारे में ही सोचती रही. सेना में अफसर… और अपने आप को घोड़े की सेवा करने वाला एक मामूली सेवक बता रहा था. इंडियन आर्मी में अफसर और अपने आप को मामूली गाइड बता रहा था.

आने दो इस बार, फिर खबर लेती हूं. महीनों बात नहीं करूंगी. सम?ाता क्या है अपने आप को. बहुत स्मार्ट बनते हो, बच्चू. अब खत लिखेंगे तो जवाब भी नहीं दूंगी. इस बार मजा चखा कर दम लूंगी.

जब हम किसी से मिल नहीं पाते और उस से प्यार भी करते हैं, तो हालात बहुत मुश्किल हो जाते हैं. प्यार में पड़ी सोफिया का हाल भी कुछ ऐसा ही था. वह सौरभ से मिल तो नहीं सकती थी, लेकिन मिलने की जो भी उम्मीद होती उस पर विचार करती. उस की गैरमौजूदगी में उस से लड़तीझगड़ती और फिर खुद अपनी बेबसी पर रोने भी लगती.

सोफिया का जो था, सौरभ ही था और वह तो बस यह चाहती थी कि किसी तरह उस से बात हो जाए. कहीं से उस का खत आ जाए. कहीं से उस की सलामती की खबर मिल जाए या कम से कम वह सौरभ को एक नजर भर देख ले.

इतने भर से ही सोफिया को संतोष हो जाता, लेकिन इस युद्ध ने सब मटियामेट कर दिया था. जो युद्ध में गए, वे वापस नहीं लौटे, लेकिन सोफिया का दिल कहता था कि उस का सौरभ एक दिन जरूर लौटेगा.

उस का सौरभ उस को जरूर मिलेगा.

सोफिया अपने सौरभ के प्यार में दिनोंदिन मानो गलती जा रही थी. उस का खिलाखिला रहने वाला चेहरा मुरझाने लगा था.

वह जाड़े की एक दोपहर थी, जिस दिन वह खत सोफिया को डाकिया थमा गया था. खत का मजमून देख कर वह वहीं ‘धम्म’ से आंगन में रखी कुरसी पर गिर पड़ी थी. पुरानी टूटी हुई कुरसी पर से संतुलन गड़बड़ाया और बेहोश हो कर वह गिरी तो टाइल्स से चोट लग गई.

2 महीने अस्पताल में बिताए. ठीक हुई तो सोफिया घर लौटी. सौरभ दुश्मनों से बहादुरी से लड़ता हुआ सियाचीन में शहीद हो गया था.

सोफिया की उम्र भी हो रही थी. मांपिताजी के बहुत जोर देने पर वह पहले तो 3-4 साल तक शादी के लिए तैयार ही नहीं हुई, लेकिन मांबाप की जिद के आगे उस की एक न चली और उस ने सेना के एक अफसर मेजर राजीव से शादी कर ली. अभी 4 साल पहले मेजर साहब भी नहीं रहे थे.

‘‘दादी, आप टीवी देख रही हैं या आराम करेंगी?’’ सुनील ने टोका तो सोफिया का ध्यान टूटा. घड़ी शाम के
5 बजा रही थी.

सुनील ने गलती से चैनल बदल दिया. टीवी पर एक धुन तैर रही थी, ‘कौन तुम्हें यूं प्यार करेगा जैसे मैं करती हूं…’ Hindi Romantic Story

Story In Hindi: एक म्यान दो तलवार

Story In Hindi: ‘‘बिटिया नीलू, आज काम पर तू ही चली जाना. मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है,’’ बूढ़े थपरू ने अपनी बेटी से कहा.

‘‘ठीक है बाबा, मैं ही चली जाऊंगी,’’ नीलू ने खुश हो कर कहा.

थपरू चौधरी सुखराम के खेतों पर काम करता था. अगर किसी वजह से वह काम पर नहीं जा पाता था, तो अपनी बेटी नीलू को काम पर भेज देता था. इस से उस की मजदूरी नहीं कटती थी.

जटपुर के चौधरी दलितों पर अपना हक ऐसे ही सम?ाते थे, जैसे अंगरेज हिंदुस्तानियों पर. चौधरी जमीनों के मालिक थे. उन के पास धनदौलत की कमी न थी. जो दलित अपनी मेहनत, हुनर या फिर सरकार की रिजर्वेशन पौलिसी की मदद से नौकरी पा गए थे, वे शहरों में जा बसे थे. रहेसहे दलित आज भी चौधरियों के खेतों पर मजदूरी करने के लिए मजबूर थे.

चौधरी सुखराम 60 बीघे का अमीर काश्तकार था. किसी चीज की कोई कमी न थी. सबकुछ बढि़या चल रहा था. उस ने अपनी दोनों बेटियों का समय से ब्याह कर उन को ससुराल भेज दिया था. दोनों बेटों खगेंद्र और जोगेंद्र की भी अच्छे घरों में शादी कर दी थी. खगेंद्र की 2 बेटियां थीं, जो स्कूल जाने लायक हो गई थीं.

धनदौलत किसे नहीं रिझती है? खगेंद्र ने नीलू को पटा लिया. वह उस के चंगुल में फंस गई. धीरेधीरे उन के संबंधों की चर्चा पूरे गांव में फैल गई.

बूढ़े थपरू ने नीलू को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन इश्क का भूत जिस पर सवार हो जाए, तो फिर आसानी से नहीं उतरता. उस के जवाब को सुन कर बूढ़ा थपरू भी अवाक रह गया.

नीलू ने भयावह हकीकत उगलते हुए कहा, ‘‘बाबा, मुझे क्यों रोकते हो? गांव में हमारी जात की कितनी ही लोंडियां और औरतें हैं, जो चौधरियों के लड़कों से नैन मटक्का करती हैं और उन के पैसों पर मौज करती हैं. उन से संबंध बना कर नाक ऊंची कर के चलती हैं.’’

‘‘करमजली, धीरे बोल. कमबख्त, वे ऐसा करती हैं तो नाशपिटी तू भी ऐसा ही करेगी. बुढ़ापे में कुलच्छिनी मेरी नाक कटाएगी…’’ थपरू ने कहा.

इस पर नीलू खूब हंसी. उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘बाबा, दिखाओ तुम्हारी नाक कहां है? हमारी जात के लोग तो बिना नाक के पैदा होते हैं. नाक तो उन की कटती है जिन के नाक हो. नाक होती है चौधरियों की. उन की लड़की और औरत को हमारी जात का कोई लोंडा छू कर तो दिखाए…’’

‘‘चुप कर बेहया,’’ थपरू बोला.

‘‘मैं कोई तेरी गुलाम न हूं. कमा के लाती हूं और तब तेरा और अपना पेट भरती हूं. तेरे तो दोनों मुस्टंडे बेटे ब्याह कर के तुझ से अलग हो गए और तुझे मेरी छाती पर मरने के लिए छोड़ गए. अब मैं चाहे जो करूं, मुझे रोकने वाला कौन होता है. ले रोटी खा,’’ नीलू ने खाट पर थाली पटकते हुए कहा.

बूढ़ा थपरू नीलू की बात सुन कर सिहर गया. वह चुपचाप दाल के पानी में रोटी भिगो कर खाने लगा. नीलू गाय का दूध निकालने चली गई.

बूढ़ा थपरू सोच रहा था, ‘काश, मैं ने नीलू की शादी बेटों से पहले कर दी होती, तो आज यह दिन न देखना पड़ता.’

उधर नीलू को ले कर खगेंद्र के घर में भी कोहराम मचा हुआ था. खगेंद्र की पत्नी अनीता को यह बरदाश्त नहीं था कि उस का पति नीलू से किसी तरह का कोई संबंध रखे, लेकिन खगेंद्र के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

शादी के 12 साल बाद भी अनीता खगेंद्र को बेटे का सुख नहीं दे पाई थी. और बच्चे जनने से उस ने मना कर दिया था. वह पढ़ीलिखी सम?ादार औरत थी. उस का कहना था कि बेटाबेटी एकसमान होते हैं. छोटा परिवार, सुखी परिवार.

लेकिन खगेंद्र के अंदर की जमींदारों वाली पुरानी सोच जोर मार रही थी, जहां वंश चलाने के लिए बेटा होना जरूरी था. वह नीलू को रखैल बना कर उस से बेटे का सुख चाहता था.

उस का बाप सुखराम और उस की मां नंदो भी उस के साथ थी. वे भी चाहते थे कि खगेंद्र अपनी इच्छा पूरी करे, लेकिन उस का भाई जोगेंद्र इस के सख्त खिलाफ था.

जब बखेड़ा बढ़ गया तो इस मामले को ले कर एक दिन गांव में पंचायत हुई. खगेंद्र की पत्नी अनीता ने साफसाफ कह दिया, ‘‘पंचो, कान खोल कर सुन लो… एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती हैं. अगर इन्हें उस नीलू के साथ रहना तो खुशी से रहें, मेरे हिस्से की जमीनजायदाद मुझे दे दी जाए. मैं उसी से अपनी बेटियों और अपना पेट पाल लूंगी.’’

खगेंद्र और सुखराम को इस में कोई एतराज नहीं था. वे इस के लिए राजी हो गए. पंचायत में हुए समझौते के मुताबिक पहले जमीन 3 हिस्सों में बंटी. 25-25 बीघा जमीन खगेंद्र और जोगेंद्र के हिस्से में आई और 10 बीघा जमीन सुखराम को मिली.

खगेंद्र की जमीन के 2 हिस्से हुए. आधी जमीन यानी साढ़े 12 बीघा जमीन अनीता के हिस्से में आई. बाकायदा पंचायत के समझौते के मुताबिक सारी जमीनों के बैनामे लिखे गए, जिस से आने वाले समय में कोई झगड़ा न हो. अनीता और खगेंद्र का तलाक हो गया.

खगेंद्र ने नीलू से कोर्ट मैरिज कर ली और वह उस के साथ शहर में रहने लगा. उस के मांबाप भी उस के साथ आ गए.

गांव में रहने और शहर में रहने में जमीनआसमान का फर्क होता है. शहर में रह कर गांव में जा कर खेती करना खगेंद्र के बस की बात न थी, इसलिए उस ने और सुखराम ने अपनी जमीन बंटाई पर उठा दी.

बंटाईदार सालभर में पैसा पहुंचाता तो कुछ दिन तो मौसम बासंती रहता. खगेंद्र और नीलू खूब मौज उड़ाते. सुखराम भी चौधरी बना घूमता. अंगरेजी शराब की दुकान के चक्कर लगाता.

खगेंद्र भी खाली था. वह दोस्तों के साथ खूब पार्टी करता और फिर पैसा खत्म होते ही कर्जा लेने की शुरुआत होती.

लेकिन ऐसा कब तक चलता और कर्जा पहाड़ सा होता गया. जमीन का एक टुकड़ा बेचने के सिवा कोई रास्ता न था. जमीन बेचने का रोग एक बार लग जाए, तो फिर छूटता नहीं. पहले सुखराम की जमीन बिकी, फिर धीरेधीरे खगेंद्र के खूड़ बिकने लगे.

उधर सब से बड़ी चिंता की बात यह थी कि नीलू के बेटा छोड़ बेटी भी पैदा नहीं हो रही थी. खगेंद्र ने नीलू का बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. बेटे से वंशबेल चलाने की बात तो बहुत दूर जमीन, जायदाद, जमींदारा सब जाता रहा.

सुखराम की चौधराहट की चूल हिल गई. वह एक आरा मशीन पर चौकीदार हुआ. उसे बहुत पछतावा हुआ कि उस के गलत फैसले से सबकुछ बिखर गया. उसे खगेंद्र को रोकना चाहिए था, लेकिन पुरानी जमींदारी सोच उसे ले डूबी.

खगेंद्र कोई छोटा काम करने से हिचकता था. अभी तक वह शान से जमींदारों वाली जिंदगी जीता आ रहा था, अब पेट पालने के लिए क्या करे, सबकुछ तो वह गंवा बैठा था.

तब एक दिन नीलू ने उसे खरीखोटी सुना दी, ‘‘बड़ा शौक पाल रखा था दूसरी औरत रखने का. अब कुछ करने के नाम पर मां मरी जाती है.’’

ऐसा कब तक चलता. एक दिन खगेंद्र की लाश नहर में तैरती मिली. किसी ने इसे खुदकुशी का मामला बताया, तो किसी ने नीलू की करतूत. गरीब आदमी का मुकदमा कौन लड़ता है. जोगेंद्र ने खगेंद्र का अंतिम संस्कार कर पल्ला झाड़ लिया.

सुखराम पहले ही अपने बेटे खगेंद्र से अलग रहने लगा था. नीलू दूसरों के घरों में झाड़ूपोंछा कर गुजरबसर करने लगी. फिर एक बूढ़े सेठ ने उसे अपनी सेवा में रख लिया. उस के बेटे विदेश में रहते थे और उस की कोई परवाह नहीं करते थे.

बूढ़े सेठ ने बेटों से चिढ़ कर और नीलू की सेवा से खुश हो कर अपनी बहुत सी जायदाद उस के नाम कर दी.

एक दिन बूढ़ा चल बसा. नीलू के दिन सुखचैन से कटने लगे. लोग उसे अब ‘सेठानी’ कह कर पुकारते हैं. Story In Hindi

Hindi Family Story: अपना सा घर

Hindi Family Story: ‘कुछ सुना तुम ने?’

‘क्या हुआ है?’

‘कामिनी ने अपने किराएदार विवेक से शादी कर ली.’

‘यह तो एक दिन होना ही था.’

‘यह सब उस की मां की सोचीसमझी चाल है.’

‘अरे, किराएदार होने के नाते उस ने इतनी छूट दे रखी थी.’

‘यों कहो कि दहेज बचा लिया.’

‘हां, दहेज तो बचा लिया, सो बचा लिया. मगर एक मां को इतनी खुली छूट नहीं देनी चाहिए थी.’

‘अरे, जवान बेटी के होते उस ने किसी कुंआरे को मकान किराए पर दिया ही क्यों?’

‘फिर उस ने किराए की कीमत ब्याज समेत वसूल कर ली.’

पूरे महल्ले में यही सब चर्चा चल रही थी.

रमा देवी विधवा थीं. उन के पति ज्वालाप्रसाद सेल्स टैक्स अफसर थे. जब वे जिंदा थे, तभी से उन्होंने रहने के लिए बड़ा मकान बना लिया था. रिटायरमैंट के एक साल के बाद उन की मौत हो गई. उन के 2 बेटे प्रदीप और नवीन सरकारी नौकरी में अच्छे पदों पर थे.

बड़ा बेटा प्रदीप जबलपुर में असिस्टैंट इंजीनियर था, तो छोटा बेटा नवीन सैंट्रल बैंक औफ इंडिया गुना में मैनेजर था. दोनों की शादी कर उन की गृहस्थी बसा दी गई. वे अपने बीवीबच्चों के साथ मजे में थे. बड़ी बेटी करुणा की शादी कर के वे निश्चिंत हो गए थे.

कामिनी सब से छोटी बेटी थी. वह अभी तक कुंआरी थी, जो कालेज में पढ़ रही थी. मकान का कुछ हिस्सा रमा देवी ने किराए पर दे रखा था. एक कमरा ऊपर वाला अभी 2 महीने पहले ही खाली हुआ था, इसलिए उस के लिए कोई किराएदार चाहिए था, जिस की खोजबीन जारी थी. आखिरकार किराएदार की खोज पूरी हुई.

उस दिन भरी दोपहर में ऐसे ही कामिनी ने दरवाजा खोला, तो सामने एक नौजवान को खड़ा पाया. दोनों की नजरें मिलीं. नौजवान कामिनी को एकटक देखता जा रहा था.

तब कामिनी संकोच से शरमा गई. वह बोली, ‘‘कहिए?’’

वह नौजवान बोला, ‘‘सुना है, आप के यहां कोई कमरा खाली है और उसे किराए पर देना है?’’

‘‘आप ने सही सुना है. क्या आप किराएदार बन कर आए हैं?’’

‘‘हां,’’ उस नौजवान ने कहा.

‘‘भीतर आइए,’’ कामिनी ने जब यह कहा, तब उस ने नौजवान के चेहरे को गौर से देखा, तो पाया कि वे तो उसी के कालेज के नए असिस्टैंट प्रोफैसर विवेक शर्मा हैं.

कामिनी उन्हें सोफे पर बैठा कर अंदर चली गई. थोड़ी देर बाद रमा देवी आ कर बोलीं, ‘‘कहिए मिस्टर, कमरा देखने आए हो?’’

‘‘जी हां अम्मांजी,’’ उस नौजवान ने हाथ जोड़ कर उठते हुए कहा.

‘‘फिलहाल तो एक कमरा खाली है, उसे किराए पर देना है. मगर किराए पर देने से पहले मैं आप की जानकारी लेना चाहती हूं,’’ रमा देवी ने कहा.

‘‘ले लीजिए अम्मांजी, मैं देने को तैयार हूं.’’

‘‘नाम क्या है? करते क्या हो? कहां के रहने वाले हो?’’ जब रमा देवी ने एकसाथ कई सवाल पूछ लिए, तब वह नौजवान बोला, ‘‘अम्माजी, मेरा नाम विवेक शर्मा है. मैं कालेज में असिस्टैंट प्रोफैसर हूं और उज्जैन का रहने वाला हूं.

‘‘जाति से ब्राह्मण हो. मगर यह बताओ, तुम शादीशुदा हो या कुंआरे?’’ रमादेवी का अगला सवाल सुन कर विवेक शर्मा कुछ पल तक नहीं बोला.

तब रमा देवी ने फिर पूछा, ‘‘तुम ने बताया नहीं.’’

‘‘जी अम्मांजी, अभी कुंआरा हूं.’’

‘‘तब तो कमरा नहीं मिलेगा,’’ रमा देवी इनकार करते हुए बोलीं.

‘‘मेरे साथ मेरी अम्मां भी रहेंगी.’’

‘‘ठीक है, तब तो चलेगा. आइए, चल कर कमरा देख लीजिए,’’ कह कर रमा देवी विवेक को कमरा दिखाने ऊपर ले गईं.

थोड़ी देर बाद वे दोनों लौटे, तब तक कामिनी चाय ला चुकी थी.

चाय पीते हुए विवेक ने कहा, ‘‘मुझे कमरा पसंद है. किराया बता दीजिए.’’

‘‘मगर मैं अनजान पर कैसे भरोसा कर लूं. किसी की गवाही चाहिए,’’ रमा देवी की यह बात सुन कर विवेक कोई जवाब नहीं दे पाया. अभी 2 महीने पहले ही वह ट्रांसफर हो कर यहां आया है. गवाही किस से दिलवाए, यह समस्या थी.

तभी रमा देवी उसे चुप देख कर बोलीं, ‘‘जवाब नहीं दिया.’’

‘‘अभी मैं इस शहर में नयानया आया हूं…’’ विवेक ने कहा, ‘‘मगर आप मुझ पर विश्वास रखिए, मैं आप को किराया हर महीने दूंगा. आप किराया बता दीजिए.’’

‘‘किराया 1,500 रुपए लगेगा,’’ रमा देवी बोलीं, ‘‘लाइट और पानी का खर्च अलग से देना होगा. मंजूर हो तो आ कर रह सकते हो.’’

‘‘आप एक छोटे से कमरे का किराया ज्यादा बता रही हैं,’’ विवेक बोला.

‘‘किराया तो यही लगेगा. इस से एक पैसा भी कम नहीं होगा…’’ रमा देवी अपना फैसला सुनाते हुए बोलीं, ‘‘रहना है तो रहो. हां, एक महीने का किराया एडवांस देना होगा.’’

‘‘ठीक है, मुझे मंजूर है,’’ कह कर विवेक ने कामिनी की तरफ देख कर अपने हथियार डाल दिए. फिर रमा देवी के हाथों में एडवांस थमाते हुए वह बोला, ‘‘लीजिए यह एडवांस किराया. मकान में सब तरह की सुविधाएं हैं, इसलिए महंगा किराया भी चलेगा.’’

इतना कह कर विवेक हाथ जोड़ कर बाहर निकल गया. एक बार उस ने कामिनी की ओर देखा, फिर कामिनी अपनी मां से बोली, ‘‘मम्मी, ये तो वही सर हैं, जो हमारे कालेज में आए हैं.’’

‘‘तुम ने पहले क्यों नहीं बताया?’’ रमा देवी जरा डांटते हुए बोलीं, ‘‘मगर है बड़ा समझदार. मैं ने उसे ब्राह्मण समझ कर किराए पर रखा है.’’

विवेक पहली तारीख को रमा देवी के मकान में किराएदार बन कर आ गया और थोड़े दिनों में ही उस ने रमा देवी का विश्वास जीत लिया. अब उस का ज्यादातर समय रमा देवी के यहां बीतने लगा. वह खुल कर बातें करने लगा. अगर कोई बाहरी आ जाए तो विवेक को किराएदार नहीं, बल्कि परिवार का एक जिम्मेदार सदस्य ही समझता था.

जब उन के बीच पारिवारिक संबंध बन गए, तब विवेक और कामिनी के बीच संकोच की दीवार भी टूट गई. दोनों के बीच खुल कर बातें होने लगीं. विवेक से पढ़ने के बहाने कामिनी बिना किसी रोकटोक के उस के कमरे में घंटों बैठी रहती थी.

कभीकभार विवेक कामिनी को घुमाने ले जाने लगा, जबकि रमा देवी ने कभी इस का विरोध नहीं किया. मगर धीरेधीरे यह बात महल्ले और रिश्तेदारों में फैलने लगी. विवेक किराएदार बन कर जरूर आया है, मगर अपने घर जमाई बनने का देख रहा है. अगर कोई अपरिचित उन्हें साथसाथ देख लेते थे, तब वे विवेक को कामिनी का पति समझते थे.

‘रमा देवी ने इन दोनों को इतनी छूट दे रखी है कि दोनों बेशर्मी से घूमते है.’

‘कामिनी तो पढ़ने के बहाने प्रोफैसर के कमरे में बैठ कर प्रेम गीत लिख रही है.’

‘देखो, रमा देवी इतनी अंधी हैं कि उसी के घर में प्रोफैसर रंगरेलियां मना रहा है. देखना एक दिन कामिनी को बरबाद कर के भाग जाएगा. तब रमा देवी की आंखें खुलेंगी.’

ये सारी बातें रमा देवी के कानों में जरूर पड़ती थीं, मगर उन्होंने इन बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया.

जब चर्चा ज्यादा होने लगी तब रमा देवी की खास सहेली कमला देवी आ कर बोलीं, ‘‘ऐ रमा, मैं क्या सुन रही हूं…’’

‘‘क्या सुन रही है कमला?’’ रमा देवी नाराजगी से बोलीं.

‘‘अरे वह प्रोफैसर, कामिनी के साथ ज्यादा ही दिख रहा है और तू अंधी बनी हुई है.’’

‘‘कमला, यह तू महल्ले वालों की भाषा बोल रही है.’’

‘‘क्या मतलब है तेरा?’’

‘‘मेरा मतलब यह है कि तू भी वही कह रही है, जो पूरा महल्ला कह रहा है.’’

‘‘अरे, महल्ले ने जो देखा है, वही मैं ने भी देखा है.’’

‘‘और तू महल्ले वालों की हां में हां मिला रही है.’’

‘‘महल्ले वालों की हां में हां नहीं मिला रही हूं, बल्कि इन आंखों से देखा है, इसलिए कह रही हूं…’’ कमला देवी बोलीं, ‘‘मेरा कहना मान, उस प्रोफैसर को निकाल दे. एक दिन वह कामिनी को बरबाद कर के भाग जाएगा.’’

‘‘मगर तुम लोगों में से किसी ने भी प्रोफैसर को नहीं समझा,’’ रमा देवी बचाव करते हुए बोलीं.

‘‘अच्छा तो तू उसे पूरी तरह समझ चुकी है. बता क्या समझी तू? जवाब दे? चुप क्यों है? इस प्रोफैसर पर तू घमंड कर रही है, देखना एक दिन कामिनी को ले कर भाग जाएगा. तब तेरी यह अंधी आंखें खुलेंगी… इसलिए कहती हूं कि तू प्रोफैसर से कमरा खाली करा कर निकाल दे.’’

‘‘मगर कमला, कामिनी मेरी बेटी है और उस की मुझे भी चिंता है.’’

‘‘क्या खाक चिंता है तुझे. चिंता होती तो जवान बेटी के होते उस प्रोफैसर को कमरा नहीं देती.’’

‘‘अरे, मैं ने कमरा दे दिया तब तेरे पेट में क्या मरोड़ उठ रही है?’’

‘‘मैं तेरी सहेली हूं, इस नाते कह रही हूं…’’ एक बार फिर कमला देवी समझाते हुए बोलीं, ‘‘अगर तेरी समझ में नहीं आता है. तो तू जान तेरा काम जाने. अब मैं कभी नहीं कहूंगी. और दे अपनी बेटी को मनचाही छूट.

‘‘अभी मेरी बात तेरी समझ में नहीं आ रही है. जब पानी सिर से गुजर जाएगा, तब मेरी बात तेरे समझ में आएगी. मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. अच्छा चलती हूं,’’ इतना कह कर कमला देवी नाराज हो कर वहां से चली गईं.

कामिनी और विवेक का प्यार अब तक पूरी तरह परवान चढ़ चुका था, मगर रमा देवी की तब भी आंखें नहीं खुलीं. लोगों में अब चर्चा बहुत गरम चलने लगी कि रमा देवी ने खुली छूट दे रखी है, तभी तो वे दोनों साथसाथ दिखाई देते हैं. कालेज में गुरुशिष्य का नाता घर आ कर बदल जाता है.

कामिनी विवेक के स्कूटर पर ही बैठ कर कालेज आती जाती है. महल्ले वाले अपनी निगाह से देख रहे थे और तरहतरह की बातें कर रहे थे.

यह बात रिश्तेदारों में भी पहुंच गई. वे भी मौका आने पर टिप्पणी करने से नहीं छूटते थे, सारा कुसूर रमा देवी को दे रहे थे. मगर रमा देवी की हालत यह थी कि जब भी वे अपने बेटों से कामिनी के लिए लड़का देखने की बातें करतीं, तब वे उन्हें उलटा कहते कि अम्मां तुम ही ढूंढ़ लो. हमें नौकरी के चलते फुरसत नहीं है.

इस तरह दोनों बेटे हाथ झटक लेते थे. विधवा रमा देवी ने कई जगह बात चलाई, मगर कुछ जगह दहेज ज्यादा मांगने के चलते बात टूट जाती, और कुछ को रमा देवी ने इसलिए खारिज कर दिया कि वे कोई नौकरी व कामधंधा नहीं करते थे. कामिनी को वे ऐसे घराने में ब्याहना चाहती थीं कि वह सुख से रह सके.

ऐसे में विधवा रमा देवी ने कहांकहां दौड़ नहीं लगाई. आगेपीछे उस की शादी तो करना ही है, इसी वजह से कामिनी और विवेक को उस ने ज्यादा छूट दे रखी थी.

आखिर वही हुआ, जिस की उम्मीद थी. कामिनी और विवेक ने गुपचुप तरीके से कोर्टमैरिज कर ली. शादी कर वे उज्जैन चले गए. तब यह बात सारे महल्ले के साथ रिश्तेदारों में भी फैल गई. रमा देवी जो चाहती
थीं, वह हो गया. मगर अब रिश्तेदारों व महल्ले वालों के ताने भी वे सुन रही थीं.

जब रमा देवी ने इस बात की खबर अपने दोनों बेटों को दी, उन्होंने भी यही राय दी कि हमें भी यह रिश्ता मंजूर है. कामिनी ने जिस से भी शादी की, वह कमाऊ है. तुम भी तो कमाऊ दामाद चाहती थीं. रहा रिश्तेदारों और महल्ले वालों का तो थोड़े दिनों तक कह कर वे भी चुप हो जाएंगे. Hindi Family Story

Bihar Politics: बिहार में रिजर्व्ड सीटें

Bihar Politics: बिहार की राजनीति हमेशा से जातपांत, सामाजिक न्याय और राजनीतिक दलों की खींचतान पर टिकी रही है. चुनाव आते ही विकास के वादे किए जाते हैं, लेकिन नतीजे ज्यादातर जातीय समीकरणों और वोट बैंक पर ही तय होते हैं.

खासकर रिजर्व्ड सीटें यानी दलित और आदिवासी समाज के लिए सुरक्षित 40 विधानसभा सीटें चुनावी राजनीति का असली रणक्षेत्र होती हैं. इन्हीं सीटों पर जीतहार से तय होता है कि सत्ता की चाबी किस गठबंधन के हाथ में जाएगी.

साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों ने इस बात को साफ कर दिया था कि इन 40 सीटों की अहमियत कितनी खास है. उस चुनाव में राजग और महागठबंधन के बीच रिजर्व्ड सीटों पर बेहद करीबी मुकाबला हुआ था. यही वजह है कि साल 2025 के विधानसभा चुनावों की तैयारी में दोनों गठबंधन अपनी पूरी ताकत इन सीटों पर झांकने वाले हैं.

जातीय समीकरण की जड़ें

बिहार का राजनीतिक इतिहास सामाजिक न्याय और जातीय समीकरणों की राजनीति से गहराई से जुड़ा है. 70 के दशक के आखिर और 80 के दशक में जब कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं ने पिछड़ों को रिजर्वेशन दिलाने की पहल की.

इस के बाद लालू प्रसाद यादव की अगुआई में 90 के दशक में ‘माय समीकरण’ (मुसलिमयादव) का नारा जोरदार तरीके से उभरा. इस दौरान दलित और अति पिछड़ा वर्ग भी इस राजनीति से जुड़ने लगे. दूसरी ओर, भाजपा और जद (यू) ने सवर्ण, अति पिछड़ा और दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति अपनाई.

आज हालत यह है कि किसी भी चुनाव में यादव और मुसलिम वोटर महागठबंधन की बुनियाद बनते हैं, जबकि अति पिछड़े और सवर्ण वोट बैंक राजग के साथ रहते हैं. दलित और महादलित वोट बैंक को ले कर दोनों गठबंधनों में सब से ज्यादा खींचतान रहती है.

राजनीतिक अहमियत

बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में से 40 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए रिजर्व्ड हैं. इन में 38 सीटें अनुसूचित जाति और 2 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व्ड हैं. इतिहास बताता है कि बिहार में सरकार बनाने की कुंजी अकसर इन सीटों से ही निकलती है.

साल 2010 का विधानसभा चुनाव : राजग ने इन सीटों पर भारी कामयाबी पाई थी.

साल 2015 का विधानसभा चुनाव : महागठबंधन (जद (यू), राजद और कांग्रेस) ने इन सीटों पर मजबूत पकड़ बनाई थी.

साल 2020 का विधानसभा चुनाव : राजग और महागठबंधन के बीच बेहद करीबी मुकाबला हुआ था.

साल 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव में इन 40 सीटों पर नतीजे चौंकाने वाले रहे. भाजपा को 11 सीटें मिलीं. जद (यू) को 7 सीटें मिलीं. राजग की सहयोगी वीआईपी पार्टी को 1 सीट. वहीं महागठबंधन में राजद को 9 सीटें. कांग्रेस को 2 सीटें. भाकपा (माले) को 10 सीटें. इस तरह राजग को कुल 19 सीटें मिलीं, जबकि महागठबंधन ने 21 सीटों पर कब्जा किया.

बिहार की राजनीति का असली संतुलन पिछड़ों और महादलितों पर टिका है. महादलित में पासवान, मुसहर, मांझ, भुइयां जैसी जातियां आती हैं. नीतीश कुमार ने महादलित को अलग पहचान दे कर योजनाओं का फायदा पहुंचाया.

अति पिछड़ा वर्ग में तकरीबन 110 जातियां इस वर्ग में आती हैं. राजग ने इन्हें संगठित करने में बड़ा रोल निभाया है.

पसमांदा मुसलिम में पिछड़े और दलित मुसलमान. राजद और कांग्रेस पर ज्यादा भरोसा करते हैं, लेकिन हाल के सालों में भाजपा ने भी इन के बीच पैठ बनाने की कोशिशें शुरू की हैं, पर इस का असर नहीं देखा जा रहा है.

दलित राजनीति की विरासत

रामविलास पासवान का नाम बिहार की दलित राजनीति में दर्ज है. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के जरीए उन्होंने दलित वोट खासकर पासवान जाति के वोट को अपने तरफ कर लिया.

उन के न रहने के बाद चिराग पासवान ने दलित राजनीति को ‘मौडर्न’ अंदाज देने की कोशिश की है. साल 2020 में लोजपा (रामविलास) ने राजग से अलग हो कर चुनाव लड़ा था, लेकिन भाजपा से नजदीकियां बनाए रखीं. चिराग पासवान की पकड़ भी दलितों में पासवान जाति पर ही खास है. दूसरी दलित जातियां इन के साथ नहीं हैं.

राजग की रणनीति

एनडीए (भाजपा, जद (यू) और लोजपा) का टारगेट दलित और अति पिछड़ा वोट बैंक को मजबूत बनाए रखना है. भाजपा दलित समाज में ‘गांवगांव तक पहुंच’ बनाने पर काम कर रही है. जद (यू) ‘महादलित योजना’ और ‘आरक्षण के विस्तार’ के जरीए समर्थन जुटा रही है.

चिराग पासवान का युवा और आक्रामक तेवर राजग के लिए दलित नौजवानों में आकर्षण पैदा कर सकता है खासकर पासवान जाति तो पूरी मुस्तैदी से इन के साथ है.

महागठबंधन की रणनीति

महागठबंधन (राजद, कांग्रेस और वाम दल) का आधार यादव और मुसलिम वोट बैंक है. लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए इन्हें दलित और अति पिछड़े वोटों की भी जरूरत है.

तेजस्वी यादव की अगुआई में राजद दलितों को ‘समान अवसर’ और ‘नौकरीरोजगार’ का वादा कर रही है.

माकपा (माले) गांवदेहात में दलितमजदूर वर्ग को संगठित कर रही है. कांग्रेस फिर से अपने परंपरागत दलित वोट बैंक को वापस लाने की कोशिश में है.

बिहार विधानसभा की 40 रिजर्व्ड सीटें केवल चुनावी गणित का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये समाजशास्त्रीय और राजनीतिक संघर्ष की धुरी हैं.

राजग और महागठबंधन दोनों को पता है कि इन सीटों पर मिली कामयाबी ही सरकार बनाने की कुंजी होगी. साल 2025 का चुनाव दलितपिछड़े समाज की आवाज से यह तय करेगा कि बिहार किस दिशा में आगे बढ़ेगा. Bihar Politics

Relationship Advice: आपसी कलह की नुमाइश न लगाएं

Relationship Advice: कुछ दिन पहले की बात है. दिल्ली मैट्रो में एक जोड़ा चढ़ा. लड़का और लड़की दोनों की उम्र 24-25 साल के आसपास रही होगी. दोनों ही कमाऊ लग रहे थे. लड़की खूबसूरत थी और लड़का हैंडसम. दोनों ने कपड़े भी अच्छे ब्रांडेड पहने हुए थे.

पर थोड़ी देर के बाद उन दोनों में ऐसा कुछ हुआ कि बाकी सवारियों के कान उन की बातों पर लग गए.

लड़की ने लड़के से पूछा, ‘‘क्या आप शुक्रवार की शाम को अपने दोस्तों के साथ बैठे थे?’’

लड़का बोला, ‘‘हां, बैठा था. तो क्या हुआ?’’

‘‘तुम सब ने ड्रिंक भी की थी न?’’ लड़की ने जैसे उस लड़के की पोल खोलते हुए कहा.

‘‘हां, की थी. तुम मुद्दे की बात करो न कि क्या पूछना चाहती हो?’’ लड़के की आवाज में थोड़ी कड़वाहट आ गई थी.

‘‘वहां तुम सब ने बकवास भी की थी…’’ लड़की ने तेज आवाज में कहा.

‘‘जब लड़के पीने बैठते हैं, तो बकवास ही करते हैं. पर तुम मेरी जासूसी क्यों कर रही हो?’’ लड़का अब और तेज आवाज में बोला.

लड़की कुछ बोलती उस से पहले ही लड़के ने उस का हाथ ?ाटक कर कहा, ‘‘तुम्हें यह सब किस ने बताया?’’

लड़की ने जबान नहीं खोली, जबकि लड़का उस पर हावी हो गया. वह गुस्से में तमतमाते हुए बोला, ‘‘कौन है, नाम बता? मुझे गुस्सा मत दिला. जब इतना कुछ जानती है, तो नाम भी बता दे. अब डर क्यों रही है?’’

लड़की ने पहले तो अपना हाथ छुड़ाया और बड़बड़ाते हुए एक खाली सीट पर जा कर ‘धम्म’ से बैठ गई.

उन दोनों की यह आपसी लड़ाई सब ने सुनी और अनसुना भी कर दिया. पर यहां एक सवाल जरूर मन में उठा कि लोग अपनी पर्सनल बातों में इतने ज्यादा क्यों खो जाते हैं, जो अनजान लोगों के सामने अपनी भड़ास निकाल देते हैं और ऐसा जताते हैं कि कोई सुने तो सुने उन की बला से?

मजे की बात तो यह है कि यह वही पीढ़ी है, जो अपने घर में मां, बूआ, मौसी, चाचा, चाची जैसी अपने से बड़ी पीढ़ी को इस बात पर कोसती है कि वे लोग पीठ पीछे एकदूसरे की बुराई क्यों करते हैं या पड़ोस में क्या चल रहा है, इस पर मजे ले कर बातें क्यों करते हैं?

मैट्रो या बस जैसी सार्वजनिक सवारियों में यह आम हो गया है कि लोग आमनेसामने या फिर फोन पर चुगलखोरी करते दिखाई देते हैं. सास अपनी बहू की पोल खोलती दिख जाती है, तो बहू अपनी ननद के किस्से अपनी मां को सुनाती नजर आती है.

मर्द और लड़के भी इस सब में पीछे नहीं हैं. कोई औफिस में बौस की बखिया उधेड़ रहा होता है, तो कोई अपनी प्रेमिका को ब्लौक करने के किस्से सुना रहा होता है.

ऐसा होता क्यों है? क्यों हम अनजान लोगों के सामने अपने घरकुनबे का पुराण बांचने लग जाते हैं? इस की वजह यह है कि हमें यह सीख देने वाला शायद कोई बचा ही नहीं है कि सार्वजनिक जगह पर हमें कैसे बरताव करना है. और जब से सोशल मीडिया में ‘रीलरील’ खेलने का दौर चला है, तब से ऐसा लगने लगा कि हर कोई ‘गौसिप गैंग’ का हिस्सा बन गया है.

यहां सीख देने वाला कौन है? दरअसल, कुदरत ने हमें सुनने और बोलने की सैंस (इंद्रियां) तो दे दी है, पर कब और कितना बोलना है और कितना सुनना है, यह जो ‘व्यावहारिक बुद्धि’, जिसे इंगलिश में ‘कौमन सैंस’ कहते हैं, को इस्तेमाल करना हम भूलते जा रहे हैं.

पहले टीचर, परिवार और आसपड़ोस के बड़ेबूढ़े नई पीढ़ी को बता दिया करते थे कि इस ‘कौमन सैंस’ का कैसे इस्तेमाल करना है, पर अब तो स्कूलों में ऐसी बातें सिखाना गुजरे जमाने की बात हो गई है और अपनों की सुनता ही कौन है.

कभीकभार इस के नतीजे बहुत बुरे भी होते हैं, जो सार्वजनिक जगहों पर अमूमन दिखाई दे जाते हैं. जैसे क्रिकेट एक खेल है, जो मनोरंजन के लिए खेला जाता है, पर नासमझी की वजह से यह खेल का मैदान खूनी लड़ाई में बदलते देर नहीं लगती है.

18 फरवरी, 2025 को आकाश नाम का एक लड़का शाम को अपने दोस्तों के साथ फरीदाबाद के अगवानपुर चौक के पास बने दुर्गा बिल्डर के खाली प्लाट में क्रिकेट खेल रहा था. खेल के दौरान गेंद वहां मौजूद एक लड़के को लग गई, जिस से झगड़ा हो गया.

आसपास के लोगों ने उस समय मामला शांत करा दिया, लेकिन तकरीबन 15 मिनट बाद वही लड़का 5-6 साथियों के साथ लाठीडंडे और हौकी ले कर लौटा और आकाश पर हमला कर दिया. उन लोगों ने आकाश को इतना पीटा कि एक महीने अस्पताल में रहने के बाद उस की मौत हो गई.

इस वारदात में एक की जान गई और बाकी कोर्टकचहरी के चक्कर में फंसेंगे. पर ऐसी वारदात से एक सीख लेनी चाहिए कि कोई भी विवाद छोटी सी बात से शुरू होता है और हमारा अहम उसे इतना ज्यादा तूल दे देता है कि खेल का मनोरंजन मौत के मातम में बदल जाता है.

ऐसा ही कुछ घरेलू समस्याओं को सार्वजनिक जगह पर जाहिर करने से होता है. बहुत बार मैट्रो या बस वगैरह में 2 जानपहचान वालों की चुगलखोरी हाथापाई तक में बदलते देर नहीं लगाती है.

एक बार एक जोड़ा इस बात पर बहस करने लगा कि लड़की का पहना हुआ टौप कितने का होगा. लड़की ने ज्यादा कीमत बताई तो लड़के ने कहा कि सस्ता माल है. इसी बात पर उन दोनों ने अपने रिश्ते को सब के सामने उघाड़ना शुरू कर दिया. आखिर में लड़की ने लड़के को चांटा जड़ दिया और मैट्रो से उतर गई.

दिक्कत यह है कि हम आपसी गपशप और चुगलखोरी के साथ निजी बातों को सार्वजनिक करने के फर्क को समझ गए हैं. पहले गांवदेहात में लोग गपशप ज्यादा किया करते थे. उसी में बीच में चुगलखोरी और निजी बातों का तड़का लगा दिया जाता था और बात आईगई हो जाती थी.

पर अब चूंकि बातें करने की जगह और समय की कमी से हम मोबाइल फोन पर या कहीं भी आमनेसामने निजी बातों का पिटारा खोल कर बैठ जाते हैं. वहीं सारी गड़बड़ होती है. भीड़ में लोग आप की बातों को अनुसना करते हुए भी बड़े ध्यान से सुनते हैं और अनचाहे में ऐसी बातों के राजदार बन जाते हैं, जो बेहद निजी होती हैं.

नई पीढ़ी को इस सामाजिक बुराई से बचने के लिए अपने घरपरिवार वालों पर ध्यान देना चाहिए. उन के साथ समय बिताना चाहिए और घर की बातों को घर पर ही सुलझाना चाहिए. इस आदत से आप अपने रिश्ते बचा सकते हैं और कभी बात लड़ाई तक पहुंच भी जाए तो ठंडे दिमाग से उसे सुलझाने की कोशिश कर सकते हैं. सैंस के साथसाथ कौमन सैंस का भी इस्तेमाल करें. Relationship Advice

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