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जातपांत : निर्मला से क्यों नाराज था उसका परिवार

निर्मला अपने पति राजन के साथ जिद कर के अपनी दादी के श्राद्ध में मायके आई थी. हालांकि राजन ने उसे बारबार यही कहा था कि बिन बुलाए वहां जाना ठीक नहीं है, फिर भी वह नहीं मानी और अपना हक समझते हुए वहां पहुंच ही गई.

निर्मला ने सोचा था कि दुख की इस घड़ी में वहां पहुंचने पर परिवार के सभी लोग गिलेशिकवे भूल कर उसे अपना लेंगे और दादी की मौत का दुख जताएंगे. पर उस का ऐसा सोचना गलत साबित हुआ.

सभी ने निर्मला को देख कर भी नजरअंदाज कर दिया, मानो वह कोई अजनबी हो.

इस के बावजूद भी निर्मला को उम्मीद थी कि परिवार वाले भले ही उसे नजरअंदाज करें, मां ऐसा नहीं कर सकतीं.

तभी निर्मला ने राजन की तरफ इस तरह देखा, मानो वह मां के पास जाने की उस से इजाजत ले रही हो. फिर वह अकेली ही मां की तरफ बढ़ गई.

उस समय निर्मला की मां औरतों के हुजूम में आगे बैठी हुई थीं. जब मां ने निर्मला को अपने करीब आते देखा, तो वे उठ कर तेजी से दूसरे कमरे में चली गईं.

मां के पीछेपीछे निर्मला भी वहां पहुंच गई और प्यार से बोली, ‘‘मां, यह सब कैसे हुआ? क्या दादी बहुत दिनों से बीमार थीं?’’

‘‘तुम से मतलब? आखिर तुम पूछने वाली होती कौन हो? चली जाओ यहां से. फिर कभी भूल कर भी इस घर की तरफ मत देखना, नहीं तो तुम मेरा मरा हुआ मुंह देखोगी,’’ गुस्से से चीखते हुए उस की मां बोलीं.

‘‘ऐसा न कहो, मां. नहीं तो मैं अनाथ हो जाऊंगी. आखिर तुम्हारा ही तो सहारा है मुझे. मां हो कर भी तुम मेरे मन की भावना को नहीं समझोगी, तो और कौन समझेगा?’’ रोते हुए निर्मला बोली.

‘‘नहीं समझना है मुझे. कुछ नहीं समझना,’’ चीखते हुए उस की मां ने कहा.

‘‘क्यों नहीं समझना है, मां? तुम्हें समझना ही पड़ेगा. अपनी बेटी के दुख को महसूस करना ही पड़ेगा. आखिर मेरा इतना ही कुसूर था न कि मैं ने राजन से सच्चा प्यार किया? उस से शादी की, जो हमारी बिरादरी का नहीं है?

‘‘लेकिन मां, तुम मुझे गौर से देखो कि मैं राजन के साथ कितनी खुश हूं. मुझे किसी बात का दुख नहीं है,’’ खुशी जताते हुए निर्मला ने कहा.

‘‘मुझे कुछ नहीं देखना है और न ही सुनना है, बस. तुम अभी और इसी समय उस राजन को ले कर यहां से चली जाओ, ताकि तुम्हारी दादी का श्राद्ध शांति से पूरा हो सके,’’ मां बोलीं.

‘‘हम यहां से चले जाएंगे, मां, रहने के लिए नहीं आए हैं. केवल दादी के श्राद्ध में आए हैं. बस, उसे पूरा हो जाने दो. क्योंकि दादी से मेरा और मुझ से उन का कितना गहरा लगाव था, यह तुम अच्छी तरह से जानती हो. मेरे बिना तो वे कुछ भी नहीं खातीपीती थीं,’’ सुबकते हुए निर्मला ने कहा.

‘‘इसीलिए तो तुम उस कलमुंहे राजन के साथ भाग गई और कोर्ट में जा कर शादी कर ली. तब तुम्हें दादी का इतना खयाल नहीं था, जबकि उन्होंने तुम्हारी याद में अपनी जान दे दी?’’

‘‘मुझे दादी का बहुत खयाल था, मां. परंतु मैं क्या करती, आप सभी तो मुझ से खफा थे. डर के चलते मैं नहीं आ सकी,’’ रोते हुए निर्मला ने कहा.

‘‘बड़ी आई डर वाली. जब इतना ही डर था, तो घर से कदम बाहर निकालते समय हजार बार सोचती? फिर भी कुछ नहीं सोचा.

‘‘अरे, क्या अपनी बिरादरी में लड़कों की कमी हो गई थी, जो उस नाशपीटे राजन के साथ भाग गई?’’ तीखी आवाज में उस की मां ने कहा.

मां के सवालों का जवाब देने के बजाय निर्मला ने कहा, ‘‘मां, मुझे जी भर कर कोस लो, लेकिन उन्हें कुछ न कहो, क्योंकि अब वे मेरे पति हैं.’’

‘‘तुम तो ऐसे कह रही हो, जैसे दुनिया में केवल एक तुम ही पति वाली हो, बाकी सब दिखावे वाली हैं,’’ खिल्ली उड़ाते हुए उस की मां बोलीं.

‘‘मां, मेरी अच्छी मां, तुम तो मुझे ऐसा न कहो. हर मांबाप का सपना होता है कि मेरी बेटी अच्छे घर में ब्याहे, सुखशांति से रहे. उन्हीं में से मैं एक हूं.

‘‘तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि मैं ने अपने जीवनसाथी का खुद ही चुनाव कर तुम लोगों की परेशानी को दूर किया है. इस के बावजूद भी सभी की तरह तुम भी मुझे नजरअंदाज कर रही हो?’’ दुखी हो कर निर्मला ने कहा.

‘‘हां, तुम इसी काबिल हो, इसीलिए नहीं मिलेगा अब तुम्हें वह लाड़प्यार और अपनापन, जो कभी यहां मिला करता था…’’

निर्मला की मां की बातें अभी पूरी भी नहीं हो पाई थीं कि पिता, भाई, बहन व भाभी सभी वहां आ गए और गुस्से से निर्मला को घूरने लगे.

तभी उस के पिता दयाशंकर ने गुस्से में कहा, ‘‘कलंकिनी, मुझे तो तेरा नाम लेते हुए भी नफरत हो रही है. आखिर तुम ने मेरे घर में कदम रखने की हिम्मत कैसे की?’’

‘‘ऐसा न कहिए, पापा. आखिर इस घर से मेरा भी तो कोई रिश्ता है? उसी रिश्ते के वास्ते तो मैं यहां आई हूं. मुझे और मेरे पति को अपना लीजिए, पापा,’’ रोतेगिड़गिड़ाते हुए निर्मला ने कहा.

‘‘खबरदार, जो मुझे पापा कहा. तेरा पापा तो उसी दिन मर गया था, जिस दिन तू इस घर को छोड़ कर गई थी. रहा सवाल अपनाने का, तो यह हक अब तुम खो चुकी हो.’’

‘‘नहीं, पापा नहीं. ऐसा न कहो और ठंडे दिमाग से सोचो कि प्यार करना क्या कोई जुर्म है?

‘‘आखिर मैं भी तो बालिग हूं. जब मैं अपना भलाबुरा सोचसमझ सकती हूं, तो फिर मुझे फैसला लेने का हक क्यों नहीं है? और फिर चाहे बातें भविष्य की हों या जीवनसाथी चुनने की, लड़कियों को यह हक जरूर मिलना चाहिए,’’ थोड़ा खुश हो कर निर्मला ने कहा.

‘‘तू मुझे हक के बारे में समझा रही है? अगर तू इतनी ही समझदार होती, तो अपनी ही जाति के लड़के से शादी करती, न कि किसी दूसरी जाति के लड़के से,’’ निर्मला के पिता ने कहा.

‘‘दूसरी जाति के लड़के क्या इनसान नहीं होते? क्या उन में समझदारी नहीं होती? इस की मिसाल तो राजन ही हैं, जिन्होंने मुझे जिंदगी की सारी खुशियां दे रखी हैं, कोई कमी महसूस नहीं होने दी है उन्होंने. मैं इस तरह के जातपांत के भेदभाव को नहीं मानती, जो एक इनसान को दूसरे इनसान से अलग करता हो, आपस में दूरियां बढ़ाता हो…

‘‘मैं केवल इनसानियत की जात को जानती व मानती हूं,’’ निर्मला बोलती चली गई.

‘‘बस करो अपनी यह बकवास और उस राजन के साथ यहां से चलती बनो,’’ इस बार चीखते हुए निर्मला का भाई विशाल बोला.

‘‘भैया, मुझे जो चाहो कह लो, मैं सब बरदाश्त कर लूंगी. लेकिन उन के बारे में कुछ भी नहीं सुन सकती. क्योंकि एक पत्नी अपने सामने पति की बेइज्जती कभी बरदाश्त नहीं कर सकती.’’

‘‘अच्छा, तब तो मुझे तुम्हारे पति की बेइज्जती करनी ही होगी, वह भी तुम्हारे सामने,’’ नजरें तिरछी करते हुए विशाल बोला.

‘‘क्या…? यह तुम कह रहे हो? जबकि तुम भी किसी के पति हो और तुम्हारी पत्नी तुम्हारे सामने खड़ी है. महाभारत मचा दूंगी मैं यहां. तुम क्या समझते हो अपनेआप को कि वे तुम से कमजोर हैं?

‘‘वे जूडोकराटे में ब्लैकबैल्ट हैं और साथ ही पुलिस में भी हैं. उन से टकराना तुम्हें महंगा पड़ेगा, भैया.

‘‘हां, मैं यदि चाहूं, तो तुम्हारी पत्नी के सामने तुम्हारी बेइज्जती जरूर करवा सकती हूं, ताकि तुम बेइज्जती के दर्द को महसूस कर सको.

‘‘लेकिन, मैं इतनी बेवकूफ भी नहीं हूं कि तुम्हारी तरह कुछ करने से पहले कुछ सोचसमझ न सकूं. औरत हूं, इसलिए औरत का दर्द समझती हूं. लिहाजा, ऐसा कुछ नहीं करना चाहूंगी, जिस से कि भाभी के मन में दुख हो.’’

निर्मला की बातें सुन कर उस की भाभी सुबक पड़ी और उस ने आगे बढ़ कर निर्मला को गले लगा लिया.

‘‘माधुरी, यह तुम क्या कर रही हो? दूर हटो उस से. इस से हमारा कोई रिश्ता नहीं है,’’ चीखते हुए विशाल बोला.

‘‘रिश्ता है क्यों नहीं? खून का रिश्ता है हमारा, इसलिए अपनी बहन को अपना लीजिए. इस ने ठीक ही कहा है कि जातपांत कुछ नहीं होता. होती है तो केवल इनसानियत, और इनसानियत का रिश्ता,’’ निर्मला की तरफदारी लेते हुए उस की भाभी माधुरी ने कहा, मानो वह भी इनसानियत के रिश्ते को ही अहमियत दे रही हो.

लेकिन माधुरी की बातें सुन कर विशाल बौखला गया. वह गुस्से से बोला, ‘‘माधुरी, लगता है इस के साथसाथ तुम्हारा भी दिमाग खराब हो गया है, कहीं…’’

अभी विशाल अपनी बातें पूरी भी नहीं कर पाया था कि तभी वहां राजन आ गया और सूझबूझ का परिचय देते हुए गंभीरता से बोला, ‘‘निर्मला, अब चलो यहां से. बहुत हो चुकी तुम्हारी बेइज्जती. मैं अब और सहन नहीं कर सकता.

‘‘मैं ने सबकुछ सुन लिया है और जान लिया है कि ये लोग ऐसे पत्थरदिल इनसान हैं, जो जातपांत का ढोंग रच कर समाज को गंदा करते हैं.’’

‘‘आप बिलकुल ठीक कहते हैं. अब मुझे समझ में आया कि मैं ने यहां आ कर कितनी बड़ी भूल की है?

‘‘ले चलिए मुझे. अब एक पल भी मैं यहां रुकना नहीं चाहूंगी,’’ उठते हुए निर्मला बोली और अपने पति राजन का हाथ थाम कर घर से बाहर जाने लगी.

उस की छोटी बहन उर्मिला ने दौड़ कर निर्मला का हाथ थाम लिया और सिसकते हुए बोली, ‘‘दीदी, मत जाओ. मुझे छोड़ कर मत जाओ.’’

‘‘पगली, मैं कहां तुम्हें छोड़ कर जा रही हूं? हां, जातपांत और उन बुरे रिवाजों को छोड़ कर जा रही हूं, जिसे मां, पापा व भैया ने अपनी मुट्ठियों में जकड़ रखा है.

‘‘मैं यहां नहीं आऊंगी तो क्या हुआ, तुम तो अपनी दीदी के घर आ सकती हो?’’ निर्मला बोली.

‘‘जरूर आऊंगी दीदी,’’ उर्मिला ने खुश हो कर कहा.

‘‘मैं इंतजार करूंगी,’’प्यार से उस के सिर पर अपना हाथ फेरते हुए निर्मला ने कहा और अपने पति राजन के साथ घर से बाहर निकल गई.

अपारदर्शी सच: किस रास्ते पर चलने लगी तनुजा

रात के 11 बज चुके थे. तनुजा की आंखें नींद और इंतजार से बोझिल हो रही थीं. बच्चे सो चुके थे. मम्मीजी और मनीष लिविंगरूम में बैठे टीवी देख रहे थे. तनुजा का मन हो रहा था कि मनीष को आवाज दे कर बुला ले, लेकिन मम्मी की उपस्थिति के लिहाज के चलते उसे ठीक नहीं लगा. पानी पीने के लिए किचन में जाते हुए उस ने मनीष को देखा पर उन का ध्यान नहीं गया. पानी पी कर भी अतृप्त सी वह वापस कमरे में आ गई.

बिस्तर पर बैठ कर उस ने एक नजर कमरे पर डाली. उस ने और मनीष ने एकदूसरे की पसंदनापसंद का खयाल रख कर इस कमरे को सजाया था.

हलके नीले रंग की दीवारों में से एक पर खूबसूरत पहाड़ी, नदी से गिरते झरने और पेड़ों की पृष्ठभूमि से सजी पूरी दीवार के आकार का वालपेपर. खिड़कियों पर दीवारों से तालमेल बिठाते नैट के परदे, फर्श से छत तक की अलमारियां, तरहतरह के सौंदर्य प्रसाधनों से भरी अंडाकार कांच की ड्रैसिंगटेबल, बिस्तर पर साटन की रौयल ब्लू चादर और टेबल पर सजा महकते रजनीगंधा के फूलों का गुलदस्ता. उसे लगा, सभी मनीष का इंतजार कर रहे हैं.

तनुजा की आंख खुली, तब दिन चढ़ आया था. उस का इंतजार अभी भी बदन में कसमसा रहा था. मनीष दोनों हाथ बांधे बगल में खर्राटे ले कर सो रहे थे. उस का मन हुआ, उन दोनों बांहों को खुद ही खोल कर उन में समा जाए और कसमसाते इंतजार को मंजिल तक पहुंचा दे. लेकिन घड़ी ने इस की इजाजत नहीं दी. फुरफुराते एहसासों को जूड़े में लपेटते वह बाथरूम चली गई.

बेटे ऋषि व बेटी अनु की तैयारी करते, सब का नाश्ताटिफिन तैयार करते, भागतेदौड़ते खुद की औफिस की तैयारी करते हुए भी रहरह कर एहसास कसमसाते रहे. उस ने आंखें बंद कर जज्बातों को जज्ब करने की कोशिश की, तभी सासुमां किचन में आ गईं. वह सकपका गई. उस ने झटके से आंखें खोल लीं और खुद को व्यस्त दिखाने के लिए पास पड़ा चाकू उठा लिया पर सब्जी तो कट चुकी थी, फिर उस ने करछुल उठा लिया और उसे खाली कड़ाही में चलाने लगी. सासुमां ने चश्मे की ओट से उसे ध्यान से देखा.

कड़ाही उस के हाथ से छूट गई और फर्श पर चक्कर काटती खाली कड़ाही जैसे उस के जलते एहसास उस के जेहन में घूमने लगे और वह चाह कर भी उन्हें थाम नहीं पाई.

एक कोमल स्पर्श उस के कंधों पर हुआ. 2 अनुभवी आंखों में उस के लिए संवेदना थी. वह शर्मिंदा हुई उन आंखों से, खुद को नियंत्रित न कर पाने से, अपने यों बिखर जाने से. उस ने होंठ दबा कर अपनी रुलाई रोकी और तेजी से अपने कमरे में चली गई.

बहुत कोशिश करने के बावजूद उस की रुलाई नहीं रुकी, बाथरूम में शायद जी भर रो सके. जातेजाते उस की नजर घड़ी पर पड़ी. समय उस के हाथ में न था रोने का. तैयार होतेहोते तनुजा ने सोते हुए मनीष को देखा. उस की बेचैनी से बेखबर मनीष गहरी नींद में थे.

तैयार हो कर उस ने खुद को शीशे में निहारा और खुद पर ही मुग्ध हो गई. कौन कह सकता है कि वह कालेज में पढ़ने वाले बच्चों की मां है? कसी हुई देह, गोल चेहरे पर छोटी मगर तीखी नाक, लंबी पतली गरदन, सुडौल कमर के गिर्द लिपटी साड़ी से झांकते बल. इक्कादुक्का झांकते सफेद बालों को फैशनेबल अंदाज में हाईलाइट करवा कर करीने से छिपा लिया है उस ने. सब से बढ़ कर है जीवन के इस पड़ाव का आनंद लेती, जीवन के हिलोरों को महसूस करते मन की अंगड़ाइयों को जाहिर करती उस की खूबसूरत आंखें. अब बच्चे बड़े हो कर अपने जीवन की दिशा तय कर चुके हैं और मनीष अपने कैरियर की बुलंदियों पर हैं. वह खुद भी एक मुकाम हासिल कर चुकी है. भविष्य के प्रति एक आश्वस्ति है जो उस के चेहरे, आंखों, चालढाल से छलकती है.

मनीष उठ चुके थे. रात के अधूरे इंतजार के आक्रोश को परे धकेल एक मीठी सी मुसकान के साथ उस ने गुडमौर्निंग कहा. मनीष ने एक मोहक नजर उस पर डाली और उठ कर उसे बांहों में भर लिया. रीढ़ में फुरफुरी सी दौड़ गई. कसमसाती इच्छाएं मजबूत बांहों का सहारा पा कर कुलबुलाने लगीं. मनीष की आंखों में झांकते हुए तपते होंठों को उस के होंठों के पास ले जाते शरारत से उस ने पूछा, ‘‘इरादा क्या है?’’ मनीष जैसे चौंक गए, पकड़ ढीली हुई, उस के माथे पर चुंबन अंकित करते, घड़ी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘इरादा तो नेक ही है, तुम्हारे औफिस का टाइम हो गया है, तुम निकल जाना.’’ और वे बाथरूम की तरफ बढ़ गए.

जलते होंठों की तपन को ठंडा करने के लिए आंसू छलक पड़े तनुजा के. कुछ देर वह ऐसे ही खड़ी रही उपेक्षित, अवांछित. फिर मन की खिन्नता को परे धकेल, चेहरे पर पाउडर की एक और परत चढ़ा, लिपस्टिक की रगड़ से होंठों को धिक्कार कर वह कमरे से बाहर निकल गई.

करीब सालभर पहले तक सब सामान्य था. मनीष और तनुजा जिंदगी के उस मुकाम पर थे जहां हर तरह से इतमीनान था. अपनी जिंदगी में एकदूसरे की अहमियत समझतेमहसूस करते एकदूसरे के प्यार में खोए रहते.

इस निश्चितता में प्यार का उछाह भी अपने चरम पर था. लगता, जैसे दूसरा हनीमून मना रहे हों जिस में अब उत्सुकता की जगह एकदूसरे को संपूर्ण जान लेने की तसल्ली थी. मनीष अपने दम भर उसे प्यार करते और वह पूरी शिद्दत से उन का साथ देती. फिर अचानक यों ही मनीष जल्दी थकने लगे तो उसी ने पूरा चैकअप करवाने पर जोर दिया.

सबकुछ सामान्य था पर कुछ तो असामान्य था जो पकड़ में नहीं आया था. वह उन का और ध्यान रखने लगी. खाना, फल, दूध, मेवे के साथ ही उन की मेहनत तक का. उस की इच्छाएं उफान पर थीं पर मनीष के मूड के अनुसार वह अपने पर काबू रखती. उस की इच्छा देखते मनीष भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते लेकिन वह अतृप्त ही रह जाती.

हालांकि उस ने कभी शब्दों में शिकायत दर्ज नहीं की, लेकिन उस की झुंझलाहट, मुंह फेर कर सो जाना, तकिए में मुंह दबा कर ली गई सिसकियां मनीष को आहत और शर्मिंदा करती गईं. धीरेधीरे वे उन अंतरंग पलों को टालने लगे. तनुजा कमरे में आती तो मनीष कभी तबीयत खराब होने का बहाना बनाते, कभी बिजी होने की बात कर लैपटौप ले कर बैठ जाते.

कुछकुछ समझते हुए भी उसे शक हुआ कि कहीं मनीष का किसी और से कोई चक्कर तो नहीं है? ऐसा कैसे हो सकता है जो व्यक्ति शाम होते ही उस के आसपास मंडराने लगता था वह अचानक उस से दूर कैसे होने लगा? लेकिन उस ने यह भी महसूस किया कि मनीष

अब भी उस से प्यार करते हैं. उस की छोटीछोटी खुशियां जैसे सप्ताहांत में सिनेमा, शौपिंग, आउटिंग सबकुछ वैसा ही तो था. किसी और से चक्कर होता तो उसे और बच्चों को इतना समय वे कैसे देते? औफिस से सीधे घर आते हैं, कहीं टूर पर जाते नहीं.

शक का कीड़ा जब कुलबुलाता है तब मन जितना उस के न होने की दलीलें देता है उतना उस के होने की तलाश करता. कभी नजर बचा कर डायरी में लिखे नंबर, तो कभी मोबाइल के मैसेज भी तनुजा ने खंगाल डाले पर शक करने जैसा कुछ नहीं मिला.

उस ने कईकई बार खुद को आईने में निहारा, अंगों की कसावट को जांचा, बातोंबातों में अपनी सहेलियों से खुद के बारे में पड़ताल की और पार्टियों, सोशल गैदरिंग में दूसरे पुरुषों की नजर से भी खुद को परखा. कहीं कोई बदलाव, कोई कमी नजर नहीं आई. आज भी जब पूरी तरह से तैयार होती है तो देखने वालों की नजर एक बार उस की ओर उठती जरूरी है.

हर ऐसे मौकों पर कसौटी पर खरा उतरने का दर्प उसे कुछ और उत्तेजित कर गया. उस की आकांक्षाएं कसमसाने लगीं. वह मनीष से अंतरंगता को बेचैन होने लगी और मनीष उन पलों को टालने के लिए कभी काम में, कभी बच्चों और टीवी में व्यस्त होने लगे.

अधूरेपन की बेचैनी दिनोंदिन घनी होती जा रही थी. उस दिन एक कलीग को अपनी ओर देखता पा कर तनुजा के अंदर कुछ कुलबुलाने लगा, फुरफुरी सी उठने लगी. एक विचार उस के दिलोदिमाग में दौड़ कर उसे कंपकंपा गया. छी, यह क्या सोचने लगी हूं मैं? मैं ऐसा कभी नहीं कर सकती. मेरे मन में यह विचार आया भी कैसे? मनीष और मैं एकदूसरे से प्यार करते हैं, प्यार का मतलब सिर्फ यही तो नहीं है. कितना धिक्कारा था तनुजा ने खुद को लेकिन वह विचार बारबार कौंध जाता, काम करते हाथ ठिठक जाते, मन में उठती हिलोरें पूरे शरीर को उत्तेजित करती रहीं.

अतृप्त इच्छाएं, हर निगाह में खुद के प्रति आकर्षण और उस आकर्षण को किस अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है, वह यह सोचने लगी. संस्कारों के अंकुश और नैसर्गिक प्यास की कशमकश में उलझी वह खोईखोई सी रहने लगी.

उस दिन दोपहर तक बादल घिर आए थे. खाना खा कर वह गुदगुदे कंबल में मनीष के साथ एकदूसरे की बांहों में लिपटे हुए कोई रोमांटिक फिल्म देखना चाहती थी. उस ने मनीष को इशारा भी किया जिसे अनदेखा कर मनीष ने बच्चों के साथ बाहर जाने का प्रोग्राम बना लिया. वे नासमझ बन तनुजा से नजरें चुराते रहे, उस के घुटते दिल को नजरअंदाज करते रहे. वह चिढ़ गई. उस ने जाने से मना कर दिया, खुद को कमरे में बंद कर लिया और सारा दिन अकेले कमरे में रोती रही.

तनुजा ने पत्रपत्रिकाएं, इंटरनैट सब खंगाल डाले. पुरुषों से जुड़ी सैक्स समस्याओं की तमाम जानकारियां पढ़ डालीं. परेशानी कहां है, यह तो समझ आ गया लेकिन समाधान? समाधान निकालने के लिए मनीष से बात करना जरूरी था. बिना उन के सहयोग के कोई समाधान संभव ही नहीं था. बात करना इतना आसान तो नहीं था.

शब्दों को तोलमोल कर बात करना, एक कड़वे सच को प्रकट करना इस तरह कि वह कड़वा न लगे, एक ऐसी सचाई के बारे में बात करना जिसे मनीष पहले से जानते हैं कि तनुजा इसे नहीं जानती और अब उन्हें बताना कि वह भी इसे जानती है, यह सब बताते हुए भी कोई आक्षेप, कोई इलजाम न लगे, दिल तोड़ने वाली बात पर दिल न टूटे, अतिरिक्त प्यारदेखभाल के रैपर में लिपटी शर्मिंदगी को यों सामने रखना कि वह शर्मिंदा न करे, बेहद कठिन काम था.

दिन निकलते गए. कसमसाहटें बढ़ती गईं. अतृप्त प्यास बुझाने के लिए वह रोज नए मौकेरास्ते तलाशती रही. समाज, परिवार और बच्चे उस पर अंकुश लगाते रहे. तनुजा खुद ही सोचती कि क्या इस एक कमी को इस कदर खुद पर हावी होने देना चाहिए? तो कभी खुद ही इस जरूरी जरूरत के बारे में सोचती जिस के पूरा न होने पर बेचैन होना गलत भी तो नहीं. अगर मनीष अतृप्त रहते तो क्या ऐसा संयम रख पाते? नहीं, मनीष उसे कभी धोखा नहीं देते या शायद उसे कभी पता ही नहीं चलने देते.

निशा उस की अच्छी सहेली थी. उस से तनुजा की कशमकश छिपी न रह सकी. तनुजा को दिल का बोझ हलका करने को एक साथी तो मिला जिस से सहानुभूति के रूप में फौरीतौर पर राहत मिल जाती थी. निशा उसे समझाती तो थी पर क्या वह समझना चाहती है, वह खुद भी नहीं समझ पाती थी. उस ने कई बार इशारे में उसे विकल्प तलाशने को कहा तो कई बार इस के खतरे से आगाह भी किया. कई बार तनुजा की जरूरत की अहमितयत बताई तो कई बार समाज, संस्कार के महत्त्व को भी समझाया. तनुजा की बेचैनी ने उस के मन में भी हलचल मचाई और उस ने खुद ही खोजबीन कर के कुछ रास्ते सुझाए.

धड़कते दिल और डगमगाते कदमों से तनुजा ने उस होटल की लौबी में प्रवेश किया था. साड़ी के पल्लू को कस कर लपेटे वह खुद को छिपाना चाह रही थी पर कितनी कामयाब थी, नहीं जानती. रिसैप्शन पर बड़ी मुश्किल से रूम नंबर बता पाई थी. कितनी मुश्किल से अपने दिल को समझा कर वह खुद को यहां तक ले कर आई थी. खुद को लाख मनाने और समझाने पर भी एक व्यक्ति के रूप में खुद को देख पाना एक स्त्री के लिए कितना कठिन होता है, यह जान रही थी.

अपनी इच्छाओं को एक दायरे से बाहर जा कर पूरा करना कितना मुश्किल होता है, लिफ्ट से कमरे तक जाते यही विचार उस के दिमाग को मथ रहे थे. कमरे की घंटी बजा कर दरवाजा खुलने तक 30 सैकंड में 30 बार उस ने भाग जाना चाहा. दिल बुरी तरह धड़क रहा था. दरवाजा खुला, उस ने एक बार आसपास देखा और कमरे के अंदर हो गई. एक अनजबी आवाज में अपना नाम सुनना भी बड़ा अजीब था. फुरफुराते एहसास उस की रीढ़ को झुनझुना रहे थे. बावजूद इस के, सामने देख पाना मुश्किल था. वह कमरे में रखे एक सोफे पर बैठ गई, उसे अपने दिमाग में मनीष का चेहरा दिखाई देने लगा.

क्या वह ठीक कर रही? इस में गलत क्या है? आखिर मैं भी एक इंसान हूं. अपनी इच्छाएं, अपनी जरूरतें पूरी करने का हक है मुझे. मनीष को पता चला तो?

कैसे पता चलेगा, शहर के इस दूसरे कोने में घरऔफिस से दसियों किलोमीटर दूर कुछ हुआ है, इस की भनक तक इतनी दूर नहीं लगेगी. इस के बाद क्या वह खुद से नजरें मिला पाएगी? यह सब सोच कर उस की रीढ़ की वह सनसनाहट ठंडी पड़ गई, उठ कर भाग जाने का मन हुआ. वह इतनी स्वार्थी नहीं हो सकती. मनीष, मम्मी, बच्चे, जानपहचान वाले, रिश्तेदार सब की नजरों में वह नहीं गिर सकती.

वेटर 2 कौफी रख गया. कौफी की भाप के उस पार 2 आंखें उसे देख रही थीं. उन आंखों की कामुकता में उस के एहसास फिर फुरफुराने लगे. उस ने अपने चेहरे से हो कर गरदन, वक्ष पर घूमती उन निगाहों को महसूस किया. उस के हाथ पर एक स्पर्श उस के सर्वांग को थरथरा गया. उस ने आंखें बंद कर लीं. वह स्पर्श ऊपर और ऊपर चढ़ते बाहों से हो कर गरदन के खुले भाग पर मचलने लगा. उस की अतृप्त कामनाएं सिर उठाने लगीं. अब वह सिर्फ एक स्त्री थी हर दायरे से परे, खुद की कैद से दूर, अपनी जरूरतों को समझने वाली, उन्हें पूरा करने की हिम्मत रखने वाली.

सहीगलत की परिभाषाओं से परे अपनी आदिम इच्छाओं को पूरा करने को तत्पर वह दुनिया के अंतिम कोने तक जा सकने को तैयार, उस में डूब जाने को बेचैन. तभी वह स्पर्श हट गया, अतृप्त खालीपन के झटके से उस ने आंखें खोल दीं. आवाज आई, ‘कौफी पीजिए.’

कामुकता से मुसकराती 2 आंखें देख उसे एक तीव्र वितृष्णा हुई खुद से, खुद के कमजोर होने से और उन 2 आंखों से. होटल के उस कमरे में अकेले उस अपरिचित के साथ यह क्या करने जा रही थी वह? वह झटके से उठी और कमरे से बाहर निकल गई. लगभग दौड़ते हुए वह होटल से बाहर आई और सामने से आती टैक्सी को हाथ दे कर उस में बैठ गई. तनुजा बुरी तरह हांफ रही थी. वह उस रास्ते पर चलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई.

दोनों ओर स्थितियां चरम पर थीं. दोनों ही अंदर से टूटने लगे थे. ऐसे ही जिए जाने की कल्पना भयावह थी. उस रात तनुजा की सिसकियां सुन मनीष ने उसे सीने से लगा लिया. उस का गला रुंध गया, आंसू बह निकले. ‘‘मैं तुम्हारा दोषी हूं तनु, मेरे कारण…’’

तनु ने उस के होंठों पर अपनी हथेली रख दी, ‘‘ऐसा मत कहो, लेकिन मैं करूं क्या? बहुत कोशिश करती हूं लेकिन बरदाश्त नहीं कर पाती.’’

‘‘मैं तुम्हारी बेचैनी समझता हूं, तनु,’’ मनीष ने करवट ले कर तनुजा का चेहरा अपने हाथों में ले लिया, ‘‘तुम चाहो तो किसी और के साथ…’’ बाकी के शब्द एक बड़ी हिचकी में घुल गए.

वह बात जो अब तक विचारों में तनुजा को उकसाती थी और जिसे हकीकत में करने की हिम्मत वह जुटा नहीं पाई थी, वह मनीष के मुंह से निकल कर वितृष्णा पैदा कर गई.

तनुजा का मन घिना गया. उस ने खुद ऐसा कैसे सोचा, इस बात से ही नफरत हुई. मनीष उस से इतना प्यार करते हैं, उस की खुशी के लिए इतनी बड़ी बात सोच सकते हैं, कह सकते हैं लेकिन क्या वह ऐसा कर पाएगी? क्या ऐसा करना ठीक होगा? नहीं, कतई नहीं. उस ने दृढ़ता से खुद से कहा.

जो सच अब तक संकोच और शर्मिंदगी का आवरण ओढ़े अपारदर्शी बन कर उन के बीच खड़ा था, आज वह आवरण फेंक उन के बीच था और दोनों उस के आरपार एकदूसरे की आंखों में देख रहे थे. अब समाधान उन के सामने था. वे उस के बारे में बात कर सकते थे. उन्होंने देर तक एकदूसरे से बातें कीं और अरसे बाद एकदूसरे की बांहों में सो गए एक नई सुबह मेें उठने के लिए.

बट स्टिल आई लव हिम

‘‘बटस्टिल आई लव हिम, बट स्टिल आई लव हिम, बट आई…’’  मंजू के ये शब्द तीर की तरह मेरे कानों में चुभ रहे थे. मैं यह सोच कर हैरान थी कि शहर की जानीमानी डाक्टर मंजू सिंह, जो प्रतिदिन न जाने कितने लोगों के दुखदर्द मिटाती है, खुद कितने गहरे दर्द में डूबी है और उस से उबरना भी नहीं चाहती है. पुरानी यादों के पन्ने

1-1 कर के मेरी आंखों के सामने फड़फड़ाने लगे…

हम दोनों बचपन की गहरी सखियां, एक ही महल्ले में रहती थीं तथा ही कक्षा में पढ़ती थीं. हमारी मित्रता उस दिन हुई जब बस में एक बड़ी दीदी ने मुझे सीट से उठा दिया और स्वयं उस पर बैठ गई.

यह देख मंजू उन से भिड़ गई, ‘‘दीदी, आप ने उस की सीट ले ली. वह इतना भारी बैग टांग कर कैसे खड़ी रहेगी?’’

दीदी के धमकाने पर उस ने कंडक्टर से शिकायत कर के मुझे मेरी सीट दिलवा कर ही दम लिया और फिर हम मित्रता की डोर से ऐसे बंधे जो समय के साथ और मजबूत हो गई.

इस घटना के बाद से हम बच्चों के बीच मंजू दबंग गर्ल के नाम से मशहूर हो गई. वह स्कूल की हर गतिविधि में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती. उस की संगत के प्रभाव से मुझे भी

कुछ अवसर प्राप्त हो जाते थे. अपने नैसर्गिक सौंदर्य, नेतृत्व क्षमता, अभिनय कौशल व वाकपटुता से वह सब की चहेती थी. जो उस से ईर्ष्या करते थे, वे भी मन ही मन उस की प्रशंसा करते थे.

फर्स्ट ईयर तक पहुंचतेपहुंचते न जाने कितने लड़के उस पर जान छिड़कने लगे. हर कोई उसे अपनी गर्लफ्रैंड बनाने के लिए आतुर रहता पर वह किसी को घास नहीं डालती.

मैं उसे छेड़ती, ‘‘मंजू, क्या तुझे कोई

भी पसंद नहीं आता? किसी का तो दिल रख लिया कर.’’

वह मुझे समझाती, ‘‘प्यारव्यार के लिए तो सारी जिंदगी पड़ी है, मुझे तो पापा की तरह प्रसिद्ध डाक्टर बनना है.’’

हम दोनों साथसाथ पढ़ते. कभी वह मेरे घर आ जाती, कभी मैं उस के घर चली जाती. हम दोनों को संयोगवश एक ही मैडिकल कालेज में प्रवेश भी मिल गया. वहां पहुंचते ही वह सभी शिक्षकों व जूनियरसीनियर विद्यार्थियों की लाडली बन गई.

कालेज के वार्षिकोत्सव में मंजू राधा बनी और सुधीर कृष्ण. सुधीर में न जाने कैसा सम्मोहन था कि मंजू उस की ओर खिंचती चली गई. मैं उस का प्यार व समय बंट जाने पर स्वयं को जितना अकेला महसूस कर रही थी, उस से अधिक चिंता मुझे इस बात की थी कि जब उस के घर वालों को पता चलेगा तो क्या होगा. सुधीर यादव था और वह परंपरावादी क्षत्रिय परिवार की.

जब तक कालेज में थे किसी को कुछ नहीं पता चला पर एमबीबीएस पूरा होने के बाद जब उस के विवाह की चर्चा शुरू हुई तब मंजू ने डरतेडरते मां को सुधीर के बारे में बताया. उस के बाद तो मानों घर में विस्फोट हो गया. सब ने उसे समझाने का बहुत प्रयास किया पर उस ने दृढ़तापूर्वक अपना निर्णय सुना दिया कि वह शादी करेगी तो सिर्फ सुधीर से वरना जीवन भर विवाह नहीं करेगी.

सारे प्रयास विफल होने के बाद उस के पापा ने एक सादे विवाह समारोह में उसे बिदा कर उस से सदा के लिए मुंह मोड़ लिया. मां कभीकभी हालचाल पूछ लेती थी. मैं भी एक एनआरआई से विवाह होने के बाद आस्ट्रेलिया चली गई पर हम सदैव फेसबुक, व्हाट्सऐप से संपर्क में बने रहते.

मैं जब भी इंडिया आती उस से जरूर मिलती. वह भी 2 बार आस्ट्रेलिया घूमने आई.

15 वर्ष कब बीत गए पता ही नहीं चला. जब मैं इंडिया आई तो हर बार की तरह इस बार भी मां व परिवार के अन्य लोगों से मिलने के बाद कानपुर से सीधे मुंबई उस के पास पहुंची. मंजू और सुधीर के स्वागत में इस बार पहले जैसा उत्साह व गर्मजोशी नजर नहीं आई. सुधीर आवश्यक काम बता कर बाहर चला गया तो मनीष भी अपने कुछ जानपहचान वालों से मिलने चले गए.

उस के चेहरे पर छाई उदासीनता का कारण जानने के लिए जब मैं ने उसे कुरेदा तो थोड़ी नानुकुर के बाद उस के सब्र का बांध टूट गया. वह मेरे गले लग फफकफफक कर बच्चों की तरह रो पड़ी.

थोड़ा दिल हलका होने के बाद उस ने मुझे बताया, ‘‘सुधीर का उस के नर्सिंगहोम की एक नर्स के साथ अफेयर चल रहा है. पहले तो पूछने पर कहता था कि मैं बेवजह उस पर शक करती हूं पर अब वह ढीठ हो गया है. कहता है कि, तुम्हें जो करना है कर लो, जहां जाना है जाओ, पर मैं उसे नहीं छोड़ सकता.’’

यह सुन कर तो जैसे मुझ पर वज्रपात ही हो गया. मुझे कालेज का वह जमाना याद

आ गया कि कैसे सुधीर मंजू से दोस्ती करने के लिए दीवानों की तरह उस के पीछेपीछे घूमता रहता था और किस प्रकार से मंजू ने सब का विरोध सह कर उस से विवाह किया था.

मैं ने उसे समझाया कि यदि वह शहर का प्रतिष्ठित चाइल्ड स्पैशलिस्ट है तो तू भी प्रसिद्ध गाइनोकोलौजिस्ट. तू पढ़ीलिखी, आत्मनिर्भर नारी है, तेरी समाज में अलग पहचान है, तू अपनी

व अपने बच्चों की देखभाल करने में सक्षम है.

तू ऐसे बेवफा, चरित्रहीन इंसान को छोड़ क्यों

नहीं देती?

वह रोते हुए बोली, ‘‘मम्मीपापा से दूर हो कर मैं ने जीवन में अपनों के प्यार एवं संरक्षण का महत्त्व जाना. आज भी मेरा मन मायके जाने को तरसता है. मायके के दरवाजे मेरे लिए बंद नहीं हैं, पर मेरी भूल मेरे स्नेह पर ज्यादा भारी पड़ती है. पापा के आशीर्वाद के लिए उठे हाथ मेरे सिर तक पहुंचतेपहुंचते रुक जाते हैं. मां के आलिंगन में भी वह गरमाहट महसूस नहीं होती जो प्रांजू को गले लगाते समय होती है. अपना घर अब मुझे अपना नहीं लगता. तुझे याद है न पापा ने कैसे धूमधाम से प्रांजू की शादी की थी.

घर व संपत्ति का बंटवारा करते समय मां ने मुझे बुलाया और कहा, ‘‘पापा अपनी संपत्ति तुम दोनों बहनों के बीच बांटना चाहते हैं, आ जाओ.’’

मैं ने मां से कहा, ‘‘मुझे कुछ नहीं चाहिए. बस मुझे अपना आशीर्वाद दे दो. पर मां के बहुत जोर देने पर मैं कानपुर चली गई. वहां पहुंच कर देखा पापा ने वह नर्सिंगहोम, जिस में वे अपनी जगह सदा अपनी डाक्टर बेटी को बैठा हुआ देखना चाहते थे, वह घर जिस से मेरी यादें जुड़ी थीं, सब प्रांजू व देवेश के नाम कर दिया था. मुझे उन्होंने कैश, जेवर व प्लाट्स दिए थे. यह देख मैं अपने कमरे की दीवारों से चिपक कर फूटफूट कर रोई थी. मन में आया कि कह दूं कि पापा मुझे कुछ नहीं चाहिए. बस आप मेरे पहले वाले पापा बन कर मुझे गले लगा लो, अपनी मंजू को माफ कर दो.

‘‘जड़ से विच्छिन्न शाखा के समान स्वयं को अकेला महसूस कर रही थी. फिर सोचा दोष तो मेरा ही है. मैं ने ही उन के मानसम्मान, भरोसे और सपनों को धूमिल किया था. भौतिक संपदा तो उन्होंने बराबर बांटी पर स्नेह नहीं. श्वेता, तू नहीं जानती कि अपनों से अलग होना व उन की उपेक्षा सहना कितनी पीड़ा पहुंचाता है.

‘‘सुधीर मुझ से प्यार नहीं करता, वह मेरे साथ रहना भी नहीं चाहता पर मैं उस के बिना नहीं रह सकती. आई हैव लौस्ट माई लव बट स्टिल आई लव हिम, बट स्टिल आई लव हिम. उस के बिना मैं जी नहीं पाऊंगी. उसे अपने बच्चों के साथ हंसताखेलता देख कर, उन की परवाह करते देख कर ही मैं खुश हो लेती हूं. अपना न होते हुए भी अपना होने के एहसास के साथ जी लेती हूं,’’ कहने के बाद वह मेरे कांधे पर सिर रख कर बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगी.

हम ने सुधीर को समझाने की कोशिश की पर वह न समझा. मैं दुखी मन से अपने घर लौट आई, पर उस के ये शब्द अब भी मेरे कानों को पिघला रहे हैं, ‘‘बट स्टिल आई लव हिम, बट स्टिल आई लव हिम…’’

घबराना क्या: जिंदगी जीने का क्या यह सही फलसफा था

‘‘देखो बेटा, यह जीवन इतना लचीला भी नहीं है कि हम जिधर चाहें इसे मोड़ लें और यह मुड़ भी जाए. कुछ ऐसा है जिसे मोड़ा जा सकता है और कुछ ऐसा भी है जिसे मोड़ा नहीं जा सकता. मोड़ना क्या मोड़ने के बारे में सोचना ही सब से बड़ा भुलावा देने जैसा है, क्योंकि हमारे हाथ ही कुछ नहीं है. हम सोच सकते हैं कि कल यह करेंगे पर कर भी पाएंगे इस की कोई गारंटी नहीं है.

‘‘कल क्या होगा हम नहीं जानते मगर कल हम क्या करना चाहेंगे यह कार्यक्रम बनाना तो हमारे हाथ में है न. इसलिए जो हाथ में है उसे कर लो, जो नहीं है उस की तरफ से आंखें मूंद लो. जब जो होगा देखा जाएगा. ‘‘कुछ भी निश्चित नहीं होता तो कल का सोचना भी क्यों?

‘‘यह भी तो निश्चित नहीं है न कि जो सोचोगे वह नहीं ही होगा. वह हो भी सकता है और नहीं भी. पूरी लगन और फ र्ज मेहनत से अपना कर्म निभाना तो हमारे हाथ में है न. इसलिए साफ नीयत और ईमानदारी से काम करते रहो. अगर समय ने कोई राह आप को देनी है तो मिलेगी जरूर. और एक दूसरा सत्य याद रखो कि प्रकृति ईमानदार और सच्चे इनसान का साथ हमेशा देती है. अगर तुम्हारा मन साफ है तो संयोग ऐसा ही बनेगा जिस में तुम्हारा अनिष्ट कभी नहीं होगा. मुसीबतें भी इनसान पर ही आती हैं और हर मुसीबत के बाद आप को लगता है आप पहले से ज्यादा मजबूत हो गए हैं. इसलिए बेटा, घबरा कर अपना दिमाग खराब मत करो.’’

ताऊजी की ये बातें मेरा दिमाग खराब कर देने को काफी लग रही थीं कि कल क्या होगा इस की चिंता मत करो, आज क्या है उस के बारे में सोचो. कल मेरा इंटरव्यू है. उस के बारे में कैसे न सोचूं. कल का न सोचूं तो आज उस की तैयारी भी नहीं न कर पाऊंगा. परेशान हूं मैं, हाथपैर फूल रहे हैं मेरे. ताऊजी के जमाने में इतनी परेशानियां कहां थीं. उन के जमाने में इतनी स्पर्धा कहां थी. आज का सच यह है कि ठंडे दिमाग से पढ़ाई करो. मन में कोई दुविधा मत पालो. अपनेआप पर भरोसा रखो उसी में तुम्हारा कल्याण होगा.

‘‘क्या कल्याण होगा? नौकरी किसी और को मिल जाएगी,’’ स्वत: मेरे होंठों से निकल गया. ‘‘तुम्हें कैसे पता कि नौकरी किसी और को मिल जाएगी. तुम अंतरयामी कब से हो गए. ‘‘किसे क्या मिलने वाला है उसी में क्यों उलझे पड़े हो. अपना समय और ताकत इस तरह बरबाद मत करो, पढ़ने में समय क्यों नहीं खर्च कर रहे?’’ इतना कहते हुए ताऊजी ने एक हलकी सी चपत मेरे सिर पर लगा दी.

‘‘कब से यही कथा दोहरा रहे हो. मिल जाएगी किसी और को नौकरी तो मिल जाए. क्या उस से दुनिया में आग लग जाएगी और सबकुछ भस्म हो जाएगा. ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, कुछ भी तो नहीं. यही दुनिया होगी और यही हम होंगे. संसार इसी तरह चलेगा. किसी दूसरी नौकरी का मौका मिलेगा. यहां नहीं तो कहीं और सही.’’

‘‘आप इतनी आसानी से ऐसी बातें कैसे कर सकते हैं, ताऊजी. अगर मैं कल सफल न हो पाया तो…’’ ‘‘तो क्या होगा? वही तो समझा रहा हूं. जीवन का अंत तो नहीं हो जाएगा, दो हाथ तुम्हारे पास हैं. हिम्मत और ईमानदारी से अगर तुम ओतप्रोत हो तो क्या फर्क पड़ता है. मनचाहा अवश्य मिल जाएगा.’’

‘‘क्या सचमुच?’’ क्षण भर को लगा, कितना आसान है सब. ताऊजी जैसा कह रहे हैं वैसा ही अगर सच में जीवन का फलसफा हो तो वास्तव में दुविधा कैसी, कैसी परेशानी. जो हमारा है वह हम से कोई छीन नहीं सकता. मेहनती हूं, ईमानदार हूं. मेरे पास अपनी योग्यता प्रमाणित करने का एक यही तो रास्ता है न कि मैं पूरी तरह इंटरव्यू की तैयारी करूं. जो मैं कर सकता हूं उसी को पूरा जोर लगा कर कर डालूं, न कि इस दुविधा में समय बरबाद कर डालूं कि अगर किसी और को नौकरी मिल गई तो मेरा क्या होगा?

ताऊजी की बातें मुझे अब शीशे की तरह पारदर्शी लगने लगीं. दूसरी शाम आ गई. 24 घंटे बीत चुके और मेरा इंटरव्यू हो गया. अपनी तरफ से मैं ने सब किया जो भी मेरी क्षमता में था. मेरे मन में कहीं कोई मलाल न था कि अगर इस से भी अच्छा हो पाता तो ज्यादा अच्छा होता. गरमी की शाम जब उमस गहरा गई तो सभी बाहर बालकनी में आ बैठे. ताऊजी ने पुन: चुसकी ली :

‘‘हमारे जमाने में आंगन हुआ करते थे. आज आंगन की जगह बालकनी ने ले ली है. हर दौर की समस्या अलगअलग होती है. हर दौर का समाधान भी अलगअलग होता है. ऐसा नहीं कि हमारे जमाने में हमारा जीवन आसान था. अपनी मां से पूछो जब मिट्टी के तेल का स्टोव जलाने में कितना समय लगता था. आज चुटकी बजाते ही गैस का चूल्हा जला लो. मसाला चुटकी में पीस लो आज. हमारी पत्नी पत्थर की कूंडी और डंडे से मसाला पीसा करती थी. अकसर मसाले की छींट आंख में चली जाती थी…क्यों राघव, याद है न.’’

ताऊजी ने मेरे पापा से पूछा और दोनों हंसने लगे. चाय परोसती मां ने भी नजरें झुका ली थीं. ‘‘क्यों शोभा, तुम ने क्या अपने बेटे को बताया नहीं कि उस के मांबाप को किस ने मिलाया था. अरे, इसी डंडेकूंडे ने. मसाले की छींट तुम्हारी मां की आंख में चली गई थी और तुम्हारा बाप पानी का गिलास लिए पीछे भागा था.’’

‘‘मेरी मां आप के घर कैसे चली आई थीं?’’ ‘‘तुम्हारी बूआ की सहेली थीं न. दोनों कपड़े बदलबदल कर पहना करती थीं. कदकाठी भी एक जैसी थी. राघव नौकरी पर रहता था. काफी समय बाद घर आया और अभी आंगन में पैर ही रखा था कि तुम्हारी मां को आंख पर हाथ रख कर भागते देखा. समझ गया, मसाला आंख में चला गया होगा. सो तुम्हारी बूआ समझ झट से पानी ले कर पीछे भागा. मुंह धुलाया, तौलिया ला कर मुंह पोंछा और जब शक्ल देखी तो हक्काबक्का. तभी सामने तुम्हारी बूआ को भी देख लिया. गलती हो गई है समझ तो गया पर क्या करता.’’

‘‘फिर?’’ सहसा पूछा मैं ने. ताऊजी हंसने लगे थे. पापा भी मुसकरा रहे थे और मेरी मां भी. ‘‘फिर क्या बेटा, कभीकभी गलती हो जाना बड़ा सुखद होता है. राघव बेचारा परेशान. जानबूझ कर तो इस की बांह नहीं पकड़ी थी न और न ही गरदन पकड़ कर जबरदस्ती जो मुंह पोंछा था उस में इस का कोई दोष था. तुम्हारी मां अब तक यही समझ रही थी कि तुम्हारी बूआ उस की आंखें धुला रही है.’’ हंसने लगे पापा भी.

‘‘यह भी सोचने लगी थी कि एकाएक उस के हाथ इतने सख्त कैसे हो गए हैं. बारबार कहने लगी, ‘इतनी जोर से क्यों पकड़ रही है. धीरेधीरे पानी डाल,’ और मैं सोचूं कि मेरी बहन की आवाज बदलीबदली सी क्यों है?’’ पहली बार अपने मातापिता के मिलन के बारे में जान पाया मैं उस दिन. आज भी मेरे पिता का स्वभाव बड़ा स्नेहमयी है. किसी की पीड़ा उन से देखी नहीं जाती. बूआ से आज भी बहुत प्यार करते हैं. बूआ की आंख में मसाले की छींट का पड़ जाना उन्हें पीड़ा पहुंचा गया होगा. बस, हाथ का सामान फेंक उन की ओर लपके होंगे. ताऊजी से आगे की कहानी जाननी चाही तो बड़ी गहरी सी मुसकान लिए मेरी मां को ताकने लगे.

‘‘बड़ी प्यारी बच्ची थी तुम्हारी मां. इसी एक घटना ने ऐसी डोरी बांधी कि बस, सभी इन दोनों को जोड़ने की सोचने लगे.’’ ‘‘आप दोनों की दोस्ती हो गई थी क्या उस के बाद?’’ सहज सवाल था मेरा जिस पर पापा ने गरदन हिला दी. ‘‘नहीं तो, दोस्ती जैसा कुछ नहीं था. कभी नजर आ जाती तो नमस्ते, रामराम हो जाती थी.’’ ‘‘आप के जमाने में इतना धीरे क्यों था सब?’’

‘‘धीरे था तो गहरा भी था. जरा सी घटना अगर घट जाती थी तो वह रुक कर सोचने का समय तो देती थी. आज तुम्हारे जमाने में क्या किसी के पास रुक कर सोचने का समय है? इतनी गहरी कोई भावना जाती ही कब है जिसे निकाल बाहर करना तुम्हें मुश्किल लगे. रिश्तों में इतनी आत्मीयता अब है कहां?’’ पुराना जमाना था. लोग घर के बर्तनों से भी उतना ही मोह पाल लेते थे. हमारी दादी मरती मर गईं पर उन्होंने अपने दहेज की पीतल की टूटी सुराही नहीं फेंकी. आज डिस्पोजेबल बर्तन लाओ, खाना खाओ, कूड़ा बाहर फेंक दो. वही हाल दोस्ती में है भई, जल्दी से ‘हां’ करो नहीं तो और भी हैं लाइन में. तू नहीं तो और सही और नहीं तो और सही.

‘‘जेट का जमाना है. इनसान जल्दी- जल्दी सब जी लेना चाहता है और इसी जल्दी में वह जीना ही भूल गया है. न उसे खुश रहना याद रहा है और न ही उसे यही याद रहता है कि उस ने किस पल किस से क्या नाता बांधा था. रिश्तों में गहराई नहीं रही. स्वार्थ रिश्तों पर हावी होता जा रहा है. जहां आप का काम बन गया वहीं आप ने वह संबंध कूड़ेदान में फेंक दिया.’’

ताऊजी ने बात शुरू की तो कहते ही चले गए, ‘‘मैं यह नहीं कहता कि दादी की तरह घर को कूड़ेदान ही बना दो, जहां घर अजायबघर ही लगने लगे. पुरानी चीजों को बदल कर नई चीजों को जगह देनी चाहिए. जीवन में एक उचित संतुलन होना चाहिए. नई चीजों को स्वीकारो, पुरानी का भी सम्मान करो. इतना तेज भी मत भागो कि पीछे क्याक्या छूट गया याद ही न रहे और इतना धीरे भी मत चलो कि सभी साथ छोड़ कर आगे निकल जाएं. इतने बेचैन भी मत हो जाओ कि ऐसा लगे जो करना है आज ही कर लो कल का क्या भरोसा आए न आए और निकम्मे हो कर भी इतना न पसर जाओ कि कल किस ने देखा है कौन कल के लिए आज सोचे.

‘‘तुम्हारे पापा की शादी हुई. शोभा हमारे घर चली आई. इस ने भी कोई ज्यादा सुख नहीं पाया. हमारी मां बीमार थीं, दमा की मरीज थीं और उसी साल मेरी पत्नी को ऐसा भयानक पीलिया हुआ कि एक ही साल में दोनों चली गईं. इस जरा सी बच्ची पर पूरा घर ही आश्रित हो गया. ‘‘इस से पूछो, इस ने कैसेकैसे सब संभाला होगा. जरा सोचो इस ने अपना चाहा कब जिया. जैसेजैसे हालात मुड़ते गए यह बेचारी भी मुड़ती गई. मेरी छोटी भाभी है न यह, पर कभी लगा ही नहीं. सदा मेरी मां बन कर रही यह बच्ची. जरा सी उम्र में इस ने कब कैसे सभी को संभालना सीखा होगा, पूछो इस से.

‘‘मेरे दोनों बच्चे कब इसे अपनी मां समझने लगे मुझे पता ही नहीं चला. तुम्हारे दादा और हम तीनों बापबेटे इसे कभी कहीं जाने ही नहीं देते थे क्योंकि हम अंधे हो जाते थे इस के बिना. इस का भी मन होता होगा न अपनी मां के घर जाने का. 18-20 साल की बच्ची क्या इतनी सयानी हो जाती है कि हर मौजमस्ती से कट जाए.’’ ताऊजी कहतेकहते रो पड़े. मेरे पापा और मां गरदन झुकाए चुपचाप बैठे रहे. सहसा हंसने लगे ताऊजी. एक फीकी हंसी, ‘‘आज याद आता है तो बहुत आत्मग्लानि होती है. पूरे 10 साल यह दोनों पतिपत्नी मेरे परिवार को पालते रहे. अपनी संतान का तब सोचा जब मेरे दोनों बच्चे 15-15 साल के हो गए. कबकब अपना मन मारा होगा इन्होंने, सोच सकते हो तुम?’’

मन भर आया मेरा भी. ताऊजी चश्मा उतार आंखें पोंछने लगे. ताऊजी के दोनों बेटे आज बच्चों वाले हैं. मुझ से बहुत स्नेह करते हैं और मां को तो सिरआंखों पर बिठाते हैं. बहुत मान करते हैं मेरी मां का. ‘‘क्या जीवन वास्तव में आसान होता है, बताना मुझे. नहीं होता न. मुश्किलें तो सब के साथ लगी हैं. प्रकृति ने सब का हिस्सा निश्चित कर रखा है. हमारा हिस्सा हमें मिलेगा जरूर. नौकरी के इंटरव्यू पर ही तुम इतना घबरा रहे थे. कल पहाड़ जैसे जीवन का सामना कैसे करोगे?’’ सुनता रहा मैं सब.

सच ही कह रहे हैं ताऊजी. मेरा बचपन तो सरलसुगम है और जवानी आराम से भरपूर. क्या स्वस्थ तरीके से बिना घबराए, ठंडे मन से मैं अपनी नौकरी के अलगअलग साक्षात्कार की तैयारी नहीं कर सकता? आखिर घबराने जैसा इस में है ही क्या? कल का कल देखा जाएगा पर ऐसी भी क्या बेचैनी कि जो सुखसुविधा आज मेरे पास है उस का सुख भी नकार कर सिर्फ कल की ही चिंता में घुलता रहूं. क्यों जीना ही भूल जाऊं?

जो मेरा है वह मुझे मिलेगा जरूर. मैं ईमानदार हूं, मेहनती हूं प्रकृति मेरा साथ अवश्य देगी. सच कहते हैं ताऊजी, आखिर घबराने जैसा इस में है ही क्या? कल क्या होगा देख लेंगे न. हम हैं तो, कुछ न कुछ तो कर ही लेंगे.

मृगतृष्णा: क्या विजय और राखी की शादी हुई

लौकडाउन में काम छूट जाने के चलते लखन अपने परिवार समेत पैदल ही दिल्ली से अपने गांव मीरपट्टी लौट आया था.

लखन के परिवार में उस की पत्नी के अलावा एक बेटी और बेटा थे. बेटी का नाम राखी और बेटे का नाम सूरज था.

दिल्ली में राखी अपनी मां के साथ दूसरों के घरों में चौकाबरतन का काम करती थी. सूरज अभी छोटा था और सरकारी स्कूल में पढ़ने जाता था. लखन कपड़े की एक फैक्टरी में मजदूर था.

लखन गांव के जमींदार चौधरी साहब का पुराना कारिंदा था, इसलिए चौधरी साहब ने तरस खा कर उसे खेत और बगीचे की देखभाल के लिए रख लिया.

लखन की पत्नी और बेटी राखी चौधरी साहब के घर में महरी का काम करने लगीं. इस तरह परिवार की गुजरबसर का इंतजाम हो गया.

राखी 17 साल की थी और गजब की खूबसूरत थी. कदकाठी लंबी, गोरी छरहरी काया, बड़ीबड़ी आंखें, मासूम चेहरा और चंचल स्वभाव के चलते वह किसी की भी नजरों में चढ़ जाती थी.

राखी को अपनी खूबसूरती का एहसास था. वह उस के प्रदर्शन में कोई कोताही नहीं बरतती थी. उस का प्रेमी जुगल दिल्ली में राजमिस्त्री का काम करता था. लौकडाउन के चलते वह भी गांव वापस आ गया था.

गांव में जुगल को कोई काम नहीं मिल रहा था. वह दिल्ली लौटने के बारे में सोच रहा था. गांव में उसे राखी से मिलने का कभीकभार ही मौका मिलता था.

चौधरी साहब का सब से छोटा बेटा विजय पटना में रह कर पढ़ाई कर रहा था. छुट्टी में वह घर आया हुआ था और लौकडाउन हो जाने के चलते वहीं फंस गया था.

विजय ने एक दिन राखी को दालान में काम करते देखा, तो देखता ही रह गया. राखी की बिखरी हुई लटें, उभरी हुई छाती और कसा बदन देख कर विजय बेचैन हो उठा. वह उस से दोस्ती बढ़ाने की जुगत बैठाने लगा.

मौका देख कर विजय ने राखी से अपने मन की बात रखी, ‘‘राखी, मैं तुम्हें पसंद करता हूं और तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘छोटे मालिक, आप बड़े लोग हैं. और, आप मु?ा जैसी गरीब लड़की से शादी करेंगे…?’’ राखी ने अंगड़ाई लेते हुए पूछा.

‘‘राखी, जमाना बदल गया है. अब कोई बड़ाछोटा नहीं है…’’ विजय ने कहा.

राखी विजय के ?ांसे में आ तो गई, पर फिर भी उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह इस परिवार की बहू भी बन सकती है. उस ने यह बात जुगल को बताई.

जुगल ने समझते हुए कहा, ‘‘विजय बाबू शादी का ?ांसा दे कर तेरी जवानी को भोगना चाहते हैं. वे पढ़ेलिखे अमीर लोग हैं. किसी गरीब, 5वीं जमात पढ़ी लड़की से कभी शादी नहीं करेंगे.’’

जुगल के सम?ाने पर राखी सम?ा गई. एक दिन विजय ने अकेले में राखी को खेत के मचान पर बैठा कर बहलानेफुसलाने वाली बातें कीं, तो वह फिर से उस के ?ांसे में आ गई.

विजय राखी को यह यकीन दिलाने में कामयाब रहा कि जुगल को राखी की किस्मत देख कर जलन हो रही है. लालच में पड़ कर राखी ने विजय को हां कह दी और पलभर में जुगल के प्यार को भुला बैठी.

‘‘क्या सोच रही हो मेरी जान, आओ न रोमांस करें,’’ राखी के उभारों को सहलाते हुए विजय ने कहा, तो राखी का तनमन मचल उठा.

विजय ने अपने होंठ राखी के दहकते होंठ पर रख दिए और हाथों से उस के बदन को सहलाने लगा. राखी तड़प कर विजय से लिपट गई. दोनों ने जी भर कर अपनी प्यास बु?ाई.

अब विजय का जब भी मन करता, वह राखी के साथ जिस्मानी रिश्ता बनाता था.

राखी भी अब जुगल से मिलने से कतराने लगी थी. जुगल सम?ा गया कि राखी विजय के चंगुल में फंस गई है. उस ने राखी को कई बार सम?ाने की कोशिश की, लेकिन वह जुगल से बात ही नहीं करना चाहती थी.

इसी बीच लौकडाउन खुल गया. मजदूर वापस काम पर जाने लगे थे. जुगल दिल्ली लौट आया. लखन को भी उस की फैक्टरी से काम पर आने का फोन आया. फैक्टरी का मालिक पहले से ज्यादा तनख्वाह देने के लिए तैयार था.

गांव में बस किसी तरह गुजरबसर हो रही थी, इसलिए लखन भी दिल्ली आने की सोच रहा था. यह बात राखी ने विजय को बताई.

‘‘मेरा भी कालेज शुरू होने वाला है.  मैं भी यहां से चला जाऊंगा. तुम भी अपने पिताजी के साथ दिल्ली चली जाओ. समय आने पर मैं शादी के लिए घर में बात करूंगा. ध्यान रहे कि समय से पहले किसी को इस की भनक न लगे,’’ विजय ने राखी को चूमते हुए सम?ाया.

राखी अपने पापा के साथ दिल्ली चली आई. विजय पटना चला गया. पहले तो उन दोनों में फोन पर बात होती रहती थी, पर धीरेधीरे विजय ने पढ़ाई का हवाला दे कर बात करना बंद कर दिया. राखी को विजय का यह बरताव अजीब लग रहा था.

एक दिन जुगल ने राखी को फोन कर के मिलने की गुजारिश की. राखी ने हां कर दी. वे एक पार्क में मिले. इधरउधर की बात करने के बाद जुगल ने जो बात बताई, वह सुन कर राखी का कलेजा धक से रह गया.

जुगल ने बताया, ‘‘राखी, विजय बाबू ने धूमधाम से अपनी जाति की एक पढ़ीलिखी लड़की से शादी कर ली है.’’

राखी का मन जुगल की बात मानने को तैयार नहीं था. जुगल ने राखी को अपने मोबाइल फोन में विजय की शादी की तसवीर दिखाई. राखी को लगा कि जैसे आसमान उस के सिर पर गिर गया हो. वह जुगल को पकड़ कर रोने लगी.

‘‘चुप कर पगली, हर वादा सच्चा नहीं होता. जो भरम था उसे भूल जाना बेहतर है. मैं हूं न तेरे साथ,’’ राखी के माथे को सहलाते हुए जुगल ने प्यार से कहा.

राखी कुछ बोल नहीं पाई. बस, जुगल की गोद में मुंह छिपा कर रोती रही.

लेखक- सुजीत सिन्हा

वे तीन शब्द: क्या आरोही को अपना हमसफर बना पाया आदित्य ?

दीवाली की उस रात कुछ ऐसा हुआ कि जितना शोर घर के बाहर मच रहा था उतना ही शोर मेरे मन में भी मच रहा था. मुझे आज खुद पर यकीन नहीं हो रहा था. क्या मैं वही आदित्य हूं, जो कल था… कल तक सब ठीक था… फिर आज क्यों मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था… आज मैं अपनी ही नजरों में गुनाहगार हो गया था. किसी ने सही कहा है, ‘आप दूसरे की नजर में दोषी हो कर जी सकते हैं, लेकिन अपनी नजर में गिर कर कभी नहीं जी सकते.’

मुझे आज भी आरोही से उतना ही प्यार था जितना कल था, लेकिन मैं ने फिर भी उस का दिल तोड़ दिया. मैं आज बहुत बड़ी कशमकश में गुजर रहा हूं. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं? मैं गलत नहीं हूं, फिर भी खुद को गुनाहगार मान रहा हूं. क्या दिल सचमुच दिमाग पर इतना हावी हो जाता है? प्यार की शुरुआत जितनी खूबसूरत होती है उस का अंत उतना ही डरावना होता है.

मैं आरोही से 2 साल पहले मिला था. क्यों मिला था, इस का मेरे पास कोई जवाब नहीं है, क्योंकि उस से मिलने की कोई वजह मेरे पास थी ही नहीं, जहां तक सवाल है कैसे मिला था, तो इस का जवाब भी बड़ा अजीब है. मैं एटीएम से पैसे निकाल रहा था, उस के हाथ में पहले से ही इतना सारा सामान था कि उस को पता ही नहीं चला कि कब उस का एक बैग वहीं रह गया. मैं ने फिर उस को ‘ऐक्सक्यूज मी’ कह कर पुकारा और कहा, ‘‘आप का बैग वहीं रह गया था.’’

बस, यहां हुई थी हमारी पहली मुलाकात. अपने बैग को सहीसलामत देख कर वह खुशी से ऐसे उछल पड़ी मानो किसी ने आसमान से चांद भले ही न सही, लेकिन कुछ तारे तोड़ कर ला दिए हों. लड़कियों का खुशी में इस तरह का बरताव करने वाला फंडा मुझ को आज तक समझ नहीं आया. उस की मधुर आवाज में ‘थैंक्यू’ के बदले जब मैं ने ‘इट्स ओके’ कहा तो बदले में जवाब नहीं सवाल आया और वह सवाल था, ‘‘आप का नाम?’’

मैं ने भी थोड़े स्टाइल से, थोड़ी शराफत के साथ अपना नाम बता दिया, ‘‘जी, आदित्य.’’ ‘‘ओह, मेरा नाम आरोही है,’’ उस ने मेरे से हाथ मिलाते हुए कहा.

‘‘भैया, कनाटप्लेस चलोगे?’’ मैं ने आश्चर्य से उस की तरफ देखा. यह सवाल उस ने मुझ से नहीं बल्कि साथ खड़े औटो वाले से किया था.

‘‘नहीं मैडमजी, मैं तो यहां एक सवारी को ले कर आया हूं. यहां उन का 5 मिनट का काम है, मैं उन्हीं को ले कर वापस जाऊंगा.’’ ‘‘ओह,’’ मायूसी से आरोही ने कहा.

‘‘अम्म…’’ मैं ने मन में सोचा ‘पूछूं या नहीं, अब जब इनसानियत निभा रहा हूं तो थोड़ी और निभाने में मेरा क्या चला जाएगा?’ ‘‘जी दरअसल, मैं भी कनाटप्लेस ही जा रहा हूं, लेकिन मुझे थोड़ा आगे जाना है. अगर आप कहें तो मैं आप को वहां तक छोड़ सकता हूं,’’ मैं ने आरोही की तरफ देखते हुए कहा.

उस का जवाब हां में था. यह उस की जबान से पहले उस की आंखों ने कह दिया था. मैं ने उस का बैग कार में रखा और उस के लिए कार का दरवाजा खोला.

रास्ते में हम ने एकदूसरे से काफी बातचीत की. ‘‘ क्या आप यहीं दिल्ली से हैं?’’ मैं ने आरोही से पूछा.

‘‘नहीं, यहां तो मैं अपने चाचाजी के घर आई हूं. उन की बेटी यानी मेरी दीदी की शादी है इसलिए आज मैं शौपिंग के लिए आई थी,’’ आरोही ने मुसकान के साथ कहा. ‘‘कमाल है, दिल्ली जैसे शहर में अकेले शौपिंग जबकि आप दिल्ली की भी नहीं हैं,’’ मैं ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘अरे, नहींनहीं, दिल्ली मेरे लिए बिलकुल भी नया शहर नहीं है. मैं दिल्ली कई बार आ चुकी हूं. मेरी स्कूल की छुट्टियों से ले कर कालेज की छुट्टियां यहीं बीती हैं इसलिए न दिल्ली मेरे लिए नया है और न मैं दिल्ली के लिए.’’ मैं ने और आरोही ने कार में बहुत सारी बातें कीं. वैसे मेरे से ज्यादा उस ने बातें की, बोलना भी उस की हौबी में शामिल है. यह उस के बिना बताए ही मुझे पता चल गया था.

उस के साथ बात करतेकरते पता ही नहीं चला कि कब कनाटप्लेस आ गया. ‘‘थैंक्यू सो मच,’’ आरोही ने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा.

‘‘प्लीज यार, मैं ने कोई बड़ा काम नहीं किया है. मैं यहां तक तो आ ही रहा था तो सोचा आप भी वहां तक जा रही हैं तो क्यों न लिफ्ट दे दूं, और आप के साथ तो बात करते हुए रास्ते का पता ही नहीं चला कि कब क्नाटप्लेस आ गया,’’ मैं ने उस की तरफ देखते हुए कहा. ‘‘चलिए, मुझे भी दिल्ली में एक दोस्त मिला,’’ आरोही ने कहा.

‘‘अच्छा, अगर हम अब दोस्त बन ही गए हैं तो मेरी अपनी इस नई दोस्त से कब और कैसे बात हो पाएगी?’’ मैं ने आरोही की तरफ देखते हुए पूछा. वह कुछ देर के लिए शांत हो गई. उस ने फिर कहा, ‘‘अच्छा, आप मुझे अपना नंबर दो, मैं आप को फोन करूंगी.’’

मैं ने उसे अपना नंबर दे दिया. आरोही ने मेरा नंबर अपने मोबाइल में सेव कर लिया और बाय कह कर चली गई.

मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था कि मैं भी तो आरोही से उस का नंबर ले सकता था. अगर उस ने फोन नहीं किया तो… ‘चलो, कोई बात नहीं,’ मैं ने स्वयं को सांत्वना दी.

उस दिन मेरे पास जो भी फोन आ रहा था मुझे लग रहा था कि यह आरोही का होगा, लेकिन किसी और की आवाज सुन कर मुझे बहुत झुंझलाहट हो रही थी. मुझे लगा कि आरोही सच में मुझे भूल गई है. वैसे भी किसी अनजान शख्स को कोई क्यों याद रखेगा और अगर उसे सच में मुझ से बात करनी होती तो वह मुझे भी अपना नंबर दे सकती थी.

अगले दिन सुबह मैं औफिस के लिए तैयार हो रहा था कि अचानक मेरे मोबाइल पर एक मैसेज आया, ‘‘हैलो, आई एम आरोही.’’ मैसेज देख कर मेरी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा. मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उस ने मुझे मैसेज किया है.

मैं ने तुरंत उसे मैसेज का जवाब दिया, ‘‘तो आखिर आ ही गई याद आप को अपने इस नए दोस्त की.’’ उधर से आरोही का मैसेज आया, ‘‘सौरी, दरअसल, कल मैं काम में बहुत व्यस्त थी और जब फ्री हुई तो बहुत देर हो चुकी थी तो सोचा इस वक्त फोन या मैसेज करना ठीक नहीं है.’’

मैं ने आरोही को मैसेज किया, ‘‘दोस्तों को कभी भी डिस्टर्ब किया जा सकता है.’’ आरोही का जवाब आया, ‘‘ओह, अब याद रहेगा.’’

बस, यहीं से शुरू हुआ हमारी बातों का सिलसिला. जहां मुझे अभी कुछ देर पहले तक लगता था कि अब शायद ही उस से दोबारा मिलना होगा. लेकिन कभीकभी जो आप सोचते हैं उस से थोड़ा अलग होता है. आरोही की बड़ी बहन की शादी मेरे ही औफिस के सहकर्मी से थी. जब औफिस के मेरे दोस्त ने मुझे शादी का कार्ड दिया तो शादी की बिलकुल वही तारीख और जगह को देख कर मैं समझ गया कि हमारी दूसरी मुलाकात का समय आ गया है.

पहले तो शायद मैं शादी में न भी जाता, लेकिन अब सिर्फ और सिर्फ आरोही से दोबारा मिलने के लिए जा रहा था. मैं ने झट से उसे मैसेज किया, ‘‘मैं भी तुम्हारी दीदी की शादी में आ रहा हूं.’’

आरोही का जवाब में मैसेज आया, ‘‘लेकिन आदित्य, मैं ने तो तुम्हें बुलाया ही नहीं.’’ उस का मैसेज देख कर मुझे बहुत हंसी आई, मैं ने ठिठोली करते हुए लिखा, ‘‘तो?’’

उस का जवाब आया, ‘‘तो क्या… मतलब तुम बिना बुलाए आओगे, किसी ने पूछ लिया तो?’’ मुझे बड़ी हंसी आई, मैं ने अपनी हंसी रोकते हुए उसे फोन किया, ‘‘हैलो, आरोही,’’ मैं ने हंसते हुए कहा.

‘‘तुम बिना बुलाए आओगे शादी में,’’ आरोही ने एक सांस में कहा, ‘‘हां, तो मैं डरता हूं्र्र क्या किसी से, बस, मैं आ रहा हूं,’’ मैं ने थोड़ा उत्साहित हो कर कहा. ‘‘लेकिन किसी ने देख लिया तो,’’ आरोही ने बेचैनी के साथ पूछा.

‘‘मैडम, दिल्ली है दिल वालों की,’’ यह कह कर मैं हंस दिया. लेकिन मेरी हंसी को उस की हंसी का साथ नहीं मिला तो मैं ने सोचा, ‘अब राज पर से परदा हटा देना चाहिए.’ मैं ने कहा, ‘‘अरे बाबा, डरो मत, मैं बिना बुलाए नहीं आ रहा हूं, बाकायदा मुझे निमंत्रण मिला है आने का.’’

‘‘ओह,’’ कह कर आरोही ने गहरी सांस ली. ‘‘तो अब तो खुश हो तुम,’’ मैं ने आरोही से पूछा.

‘‘हां, बहुत…’’ आरोही की आवाज में उस की खुशी साफ झलक रही थी. उस दिन बरात के साथ जैसे ही मैं मेनगेट पर पहुंचा तो बस मेरी निगाहें एक ही शख्स को ढूंढ़ रही थीं. वहां पर बहुत सारे लोग मौजूद थे, लेकिन आरोही नहीं थी.

काफी देर तक जब इधरउधर देखने के बाद भी मुझे आरोही नहीं दिखाई दी तो मैं ने उस के मोबाइल पर कौल की, ‘‘कहां हो तुम…, मैं कब से तुम को इधरउधर ढूंढ़ रहा हूं,’’ मैं ने बेचैनी से पूछा. ‘‘ओह, पर क्यों… हम्म…’’ उस ने चिढ़ाते हुए कहा.

मैं ने भी उस को चिढ़ाते हुए कहा, ‘‘ओह, ठीक है फिर लगता है हमारी वह मुलाकात पहली और आखिरी थी.’’ ‘‘अरे, क्या हुआ, बुरा लग गया क्या, अच्छा बाबा, मैं आ रही हूं,’’ उस ने हंसते हुए कहा.

‘‘लेकिन तुम हो कहां?’’ मैं ने आरोही से पूछा. ‘‘जनाब, पीछे मुड़ कर देखिए,’’ आरोही ने हंसते हुए कहा.

मैं ने पीछे मुड़ कर देखा तो बस देखता ही रह गया. हलकी गुलाबी रंग की साड़ी में एक लड़की मेरे सामने खड़ी थी. हां, वह लड़की आरोही थी. उस के खुले हुए बाल, हाथों में साड़ी की ही मैचिंग गुलाबी चूडि़यां, आज वह बहुत खूबसूरत लग रही थी. आज मुझे 2 बातों का पता चला, पहला यह कि लोग यह कहावत क्यों कहते हैं कि मानो कोई अप्सरा जमीन पर उतर आई हो, और दूसरी बात यह कि शादी में क्यों लोग दूल्हे की सालियों के दीवाने हो जाते हैं.

मैं ने उसी की तरफ देख कर कहा, ‘‘जी, आप कौन, मैं तो आरोही से मिलने आया हूं, आप ने देखा उस को.’’ उस ने बड़ी बेबाकी से कहा, ‘‘मेरी शक्ल भूल गए क्या, मैं ही तो आरोही हूं.’’

मैं ने उस की तरफ अचरज भरी निगाहों से देख कर कहा, ‘‘जी, आप नहीं, आप झूठ मत बोलिए, वह इतनी खूबसूरत है ही नहीं जितनी आप हैं.’’ आरोही ने गुस्से से घूरते हुए कहा, ‘‘ओह, तो तुम मेरी बुराई कर रहे हो.’’

मैं ने कहा, ‘‘नहींनहीं, मैं तो आप की तारीफ कर रहा हूं.’’ वह दिन मेरे लिए बहुत खुशी का दिन था, मैं ने आरोही के साथ बहुत ऐंजौय किया. उस ने मुझे अपने मम्मीपापा और भाईबहन से मिलवाया. पूरी शादी में हम दोनों साथसाथ ही रहे.

जातेजाते वह मुझे बाहर तक छोड़ने आई. मैं ने आरोही की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘अच्छा सुनो, मैं उस समय मजाक कर रहा था. तुम जितनी मुझे आज अच्छी लगी हो न उतनी ही अच्छी तुम मुझे उस दिन भी लगी थी जब हम पहली बार मिले थे,’’ यह सुन कर वह शरमा गई. अब हम दोनों घंटों फोन पर बातें करते. वह अपनी शरारतभरी बातों से मुझे हंसाती और कभी चिढ़ा दिया करती थी. मैं कभी बहुत तेज हंसता तो कभीकभी मजाक में गुस्सा कर दिया करता. हम दोनों के मन में एकदूसरे के लिए इज्जत और दिल में प्यार था. जिस की वजह से हम दोनों बिना एकदूसरे से सवाल किए बात करते थे. कुछ चीजों के लिए कभीकभी शब्दों की जरूरत ही नहीं पड़ती. आप की निगाहें ही आप के दिल का हाल बयां कर देती हैं. फिर भी वे 3 शब्द कहने से मेरा दिल डरता है.

अब मुझे रोमांटिक फिल्में देखना अच्छा लगता है. उन फिल्मों को देख कर मुझे ऐसा नहीं लगता था कि क्या बेवकूफी है. जहन में आरोही का नाम आते ही चेहरा एक मुसकान अपनेआप ओढ़ लेता था और बहुत अजीब भी लगता था, जब कोई अनजान शख्स मुझे इस तरह मुसकराता देख पागल समझता था. अपनी मुसकान को रोकने की जगह मैं उस जगह से उठ जाना ज्यादा अच्छा समझता था. ‘‘हाय, गुडमौर्निंग,’’ आज यह मैसेज आरोही की तरफ से आया.

हमेशा की तरह आज भी मैं ने आरोही को फोन किया, लेकिन आज पहली बार उस ने मेरा फोन नहीं उठाया. मैं पूरे दिन उस का नंबर मिलाता रहा, लेकिन उस ने मेरा फोन नहीं उठाया. आज दीवाली है और आरोही मुझे जरूर फोन करेगी, लेकिन आज भी जब उस का कोई फोन नहीं आया तो मैं ने उस को फिर फोन किया. आज आरोही ने फोन उठा लिया.

‘‘कहां हो आरोही, कल से मैं तुम्हारा फोन मिला रहा हूं, लेकिन तुम फोन ही नहीं उठा रही थी,’’ मैं ने गुस्से में आरोही से कहा. ‘‘यह सब परवा किसलिए आदित्य,’’ आरोही ने रोते हुए पूछा.

‘‘परवा, क्या हो गया तुम्हें, सब ठीक तो है न… और तुम रो क्यों रही हो?’’ मैं ने बेचैनी से आरोही से पूछा. ‘‘प्लीज आदित्य, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो. कानपुर मेरी शादी की बात चल रही थी इसलिए बुलाया गया था, लेकिन तुम्हें तो कोई फर्क नहीं पड़ता. तुम्हें तब भी कोई फर्क नहीं पड़ा था जब मैं उस दिन रेस्तरां में तुम्हें घर वापस आने की बात कहने आई थी,’’ आरोही एक सांस में बोले जा रही थी. मानो कई दिन से अपने दिल पर रखा हुआ बोझ हलका कर रही हो.

‘‘तुम्हारे लिए मैं कभी कुछ थी ही नहीं आदित्य, शायद यह सब बोलने का कोई हक नहीं है मुझे… और न ही कोई फायदा, शायद अब हम कभी नहीं मिल पाएंगे, अलविदा…’’ यह कह कर आरोही ने फोन रख दिया. मैं एकटक फोन को देखे जा रहा था, जो आरोही हमेशा खिलखिलाती रहती थी आज वही फूटफूट कर रो रही थी. इसलिए आज मैं खुद को गुनाहगार मान रहा था, लेकिन अब मैं ने फैसला कर लिया था कि मैं अपनी आरोही को और नहीं रुलाऊंगा, मैं जान चुका हूं कि आरोही भी मुझे उतना ही प्यार करती है जितना कि मैं उसे करता हूं.

मैं ने फैसला कर लिया कि मैं कल सुबह ही टे्रन से कानपुर जाऊंगा. आज की यह रात बस किसी तरह सुबह के इंतजार में गुजर जाए. मैं ने अगली सुबह कानपुर की टे्रन पकड़ी. 10 घंटे का यह सफर मेरे लिए, मेरे जीवन के सब से मुश्किल पल थे. मैं नहीं जानता था कि आरोही मुझे देख कर क्या कहेगी, कैसा महसूस करेगी, इंतजार की घडि़यां खत्म हुईं, मैं ने जैसे ही आरोही के घर पहुंच कर उस के घर के दरवाजे की घंटी बजाई तो आरोही ने ही दरवाजा खोला. आरोही मुझे देख कर चौंक गई.

मैं ने आरोही को गले लगा लिया, ‘‘मुझे माफ कर दो आरोही… सारी मेरी ही गलती है. मुझे हमेशा यही लगता था कि अगर मैं तुम से अपने दिल की बात कहूंगा तो तुम को हमेशा के लिए खो दूंगा. मैं भूल गया था कि मैं कह कर नहीं बल्कि खामोश रह कर तुम्हें खो दूंगा.’’ आरोही की आंखों में आंसू थे. उस के घर के सभी लोग वहां मौजूद थे. मैं ने आरोही की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘कल तक मुझ में हिम्मत नहीं थी, लेकिन आज मैं तुम्हारे प्यार की खातिर यहां आया हूं, आई लव यू आरोही, बोलो, तुम दोगी मेरा साथ…’’ मैं ने अपना हाथ आरोही की तरफ बढ़ाते हुए कहा.

आरोही ने अपना हाथ मेरे हाथ में रखते हुए कहा, ‘‘आई लव यू टू.’’ आज आरोही और मेरे इस फैसले में उस के परिवार वालों का आशीर्वाद भी शामिल था.

मेरा वसंत: क्या निधि को समझ पाया वसंत

मैं ने तुम से पूछा, ‘बुरा लगा?’
‘नहीं,’ तुम्हारा यह जवाब सुन मैं स्तब्ध रह गई कि क्या मेरे बात करने न करने से तुम को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता? पर मैं जब भी तुम से नाराज़ हो कर बात करना बंद करती हूं, दिल धड़कना भूल जाता है और दिमाग सोचना. मन करता है कि तुम मुझे आवाज़ दो और मैं उस आवाज़ में खो दूं अपनेआप को. कभी लगता, क्यों न कौल कर के सुन लूं तुम्हारी आवाज़, पर है न मेरे पास भी अहं की भावना कि क्यों करूं जब तुम्हें चाहत ही नहीं मुझे सुनने की.

मैं ने कहीं सुना था- ‘ज़िंदगी को लाइटली लेने का’. लेकिन ज़िदंगी का हरेक पन्ना जब तुम से जुड़ा हो तो कैसे इस को हलके में ले लूं.

कुछ लोग कहते हैं कि प्यारव्यार कुछ नहीं होता. बस, रासायनिक क्रिया है जो दिल और दिमाग़ को बंद कर देती है और सोचनेसमझने की क्रिया समाप्त कर देती है. पर अगर ऐसा है तो किसी एक के लिए ही दिल क्यों धड़कता है. समझ के बाहर है न, यह ये प्यारव्यार…

कितना अच्छा होता न, मेरी तरह तुम्हारा भी दिल सिर्फ़ मेरे लिए धड़कता और मेरा ही नाम तुम्हारी ज़बान पर होता. पर तुम्हारे लिए तो मेरे सिवा सभी लोग ख़ास हैं और हां, काम की अधिकता भी तो कारण है न मुझ से दूर जाने का.

कुछ प्यार अधूरा ही रहता है, क्या मेरे प्यार को भी अधूरापन ही मिलेगा. पर, मैं तो तुम्हारे ही रंगों में रंगी हूं, सो, तुम्हारा द्वारा दिया हुआ अधूरापन भी स्वीकार है मुझे.

तुम खुश रहो. जानते हो, चाहती हूं कि अपनी खुशी भी तुम्हें दे दूं, पर अपनी खुशी तुम्हें नहीं दे सकती क्योंकि मैं अधूरी हो कर कभी खुश नहीं रह सकती.

जा रही हूं तुम से दूर, कुछ दूर जहां से मैं तुम्हें तो देख सकूं पर तुम मुझे न देख सकोगे. जब मुझे लगेगा कि जितनी बेक़रारी मेरे दिल में है उतनी ही तुम्हारे दिल में पनपने लगी, तब मैं वापस आ जाऊंगी. तुम्हारी बांहों की गरमाहट मुझे बेचैन करेगी. पर इस बेचैनी में भी बहुत प्यारा एहसास कैद रहेगा.

फिर से आतुर मन मिलन के लिए.

तुम्हारी,

निधि.

यह पत्र पढ़ कर मैं कुछ देर सन्न रह गया. काठ बना खड़ा चुपचाप इस खत को बारबार पढ़ता रहा. परसों रात ही तो आया था एक सप्ताह के बाद. नाराज़ निधि को मनाने में एक घंटा लग गया. उस की नाराज़गी दूर नहीं हुई. अबोलापन 2 दिन रहा घर में. आज रात ही तो इस घुटनभरे अबोलापन से छुटकारा मिला था. फिर उस ने पूछा तो था, ‘मेरे नाराज़ होने से तुम को बुरा लगता है न?’ और मैं ने सहजता से कह दिया था, ‘नहीं.’

ओह, निधि, तुम बात नहीं करती हो, तो मैं भी परेशान हो जाता हूं. लेकिन मैं दर्शाना नहीं चाहता. मुझे लगता, अगर इस बात को तुम्हारे सामने कहूंगा तो तुम और ज़्यादा रूठने लगोगी और अगर मैं कह दूं कि नहीं बुरा लगता तुम बात करो या न करो तो तुम रूठना कम कर दोगी. मैं ने अपना फ़ायदा देखा, तुम्हारी भावनाओं को नजरअंदाज किया. मुझे माफ़ कर दो, निधि. तुम आ जाओ वापस. अब मैं सबकुछ तुम्हारे हिसाब से करूंगा. मैं चाहता हूं कि तुम्हें समय दूं, पर…

मुझे पता है, तुम मुझे बहुत प्यार करती हो. तभी तो इतना गुस्सा करती हो. गुस्सा भी प्यार का ही एक रूप है. पर मैं उस समय इसलिए नहीं मनाता क्योंकि तुम उस समय मेरी बात बिलकुल नहीं समझ पातीं. इंसान जब किसी से नाराज़ होता है तो वह उस समय हर हाल में गलत लगता है. तब समझाना गुस्से को बढ़ाना ही होता है. तुम समझती हो कि उन लमहों में मैं बहुत आराम से रहता हूं, तुम्हें क्या पता कि मैं हर रात जागता हूं सिर्फ तुम्हारी याद में, शायद कौल आ जाए और मैं सुन न पाऊं. लमहालमहा बेचैनी और बेक़रारी छाई रहती है. तब सिर्फ तुम खयालों में मेरे रहती हो. वक्त का पता नहीं चलता और खानापीना सब भूला रहता.

तुम सोचती हो कि मैं तुम्हें अनदेखा करता हूं पर कभी तुम खुद को मेरी जगह रख कर देखो तब समझ आएगा कि काम का कितना प्रैशर रहता है मेरे ऊपर. तब तुम कहोगी कि क्यों करते हो इतना काम. तो मेरी जान, काम नहीं करूंगा तो तुम्हारी ज़रूरतें और रोज की फ़रमाइश कौन पूरा करेगा.

ऐसा क्यों किया निधि? तुम जानती हो मैं तुम्हारे बगैर एक पल नहीं रह सकता. थोड़ी व्यस्तता थी और कभीकभी दोस्तों के पास बैठ जाता था, लेकिन मैं फिर भी समय निकालता था तुम्हारे लिए. हां, इधर कुछ ज़्यादा झगड़ा होने लगा था. लेकिन वज़ह मैं या तुम नहीं थीं. वज़ह थीं परिस्थितियां. पर क्या करता, नौकरी ही ऐसी है कि उस के लिए चौबीस घंटे भी कम ही हैं. तुम को कितनी बार समझाया- तुम नहीं समझोगी तो और कौन समझेगा, बताओ.

रोने का मन हुआ मेरा. दिल किया नौकरी छोड़ वहां भाग जाऊं जहां निधि मेरी प्रतीक्षा कर रही है. पर उस ने बताया ही नहीं कि कहां गई है. वसंत के मौसम में मेरी वसंत पता नहीं कहां चली गई? दिल ने जैसे धड़कना ही बंद कर दिया. कुछ पलों की जुदाई इतनी तकलीफदेह. अब समझ आ रहा है कि क्यों निधि मेरे कईकई दिनों बाद घर आने पर रूठ जाती थी. सच, अकेलापन बहुत उबाऊ होता है.

खिड़की के खुली रहने के बावजूद दम घुट रहा था. हवा ने भी जैसे मुंह मोड़ लिया हो. बाहर निकला. बागबानी की शौकीन निधि क्यारियों में एक से बढ़ कर एक पौधे लगाए हुए थी. इस पर पहले कभी ध्यान नहीं गया था मेरा. मन वहां भी नहीं लगा.

आज फिर लखनऊ जाना था. मन नहीं कर रहा था. फिर भी जाना तो था ही. और फिर इस अकेलेपन से दूर भी जाना चाहता था.

चाय पीने की इच्छा हुई. किचेन में जाते ही निधि की याद आई और मैं लौट आया. आंसुओं को पोंछते हुए तैयार हुआ और निकल गया घर से. महसूस हुआ, पीठ पर किसी की आंखों का स्पर्श. पलट कर देखा, कोई न था.

लखनऊ जाने के बाद मेरा मन वापस अपने घर जाने के लिए बेचैन होने लगा. ऐसा लगता, निधि मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी.

वापस आ गया इलाहाबाद.

घर पहुंच कर जब देखा नहीं है निधि, मन झुंझलाया और निधि पर गुस्सा भी आया. क्या वह नहीं जानती कि नौकरी उसी के सुखसुविधा के लिए करता हूं. सोचता हूं कि उसे दुनिया की सारी खुशियां मिलें. मेरा मन भी करता कि उस के साथ बैठ सारी ज़िंदगी गुजार दूं. पर बैठने से सबकुछ नहीं मिल जाता- वह यह क्यों नहीं समझती है. मन खीझ आया अपनेआप पर. निकल गया घर से. निरुद्देश्य घूमता रहा सड़कों पर. बनारस जाने वाली बस दिखी. और मैं जा बैठा उसी में.

भूख से पेट में जलन उठी. प्यास भी महसूस हुई. 2 दिनों से भूखेप्यासे बेवजह चलते जा रहा था मैं.

एक जगह बस रुकी. पारले जी बिस्कुट के साथ एक कप चाय गटक लिया. दुख हो या सुख, पेट कब शांत रहा है.

गंगाघाट पर घंटों बैठा रहा. पानी को रौंदते हुए नाव, स्टीमर की आवाज़, पंक्षियों की चहचहाहट, मछलियों का बारबार उछल कर पानी की सतह पर आना, बच्चों की हंसी, प्रेमीप्रेमिकाओं की प्यारभरी बातें, प्यारेप्यारे जोड़ों की मदमस्त हंसी, बुजुर्ग की आस्थाभरी निगाह- उदासी के गर्त में मुझे धकेलने लगीं.

सब खुश है, सिवा मेरे. मेरे हिस्से दुख क्यों दे गई निधि? गंगाआरती की तैयारी शुरू हो गई. भीड़ का बढ़ता रेला और मेरा मन इस भीड़ से मुक्ति के लिए छटपटाने लगा. मन किया कि आरती देख लूं, पर आस्था-अनास्था के बीच त्रिशंकु जैसा मन डोलने लगा और मैं चुपचाप वहां से निकल गया.

मन किया एक बार निधि को फोन करूं, शायद वह मान जाए और आ जाए फिर से मेरी बांहों में. पौकेट में हाथ डाला, मोबाइल नहीं था. बेचैन मन ने सोचा, कहां छोड़ दिया मोबाइल. फिर मन ने ही समझाया कि शायद हड़बड़ी में छोड़ आया हूं घर पर.

ठंडी हवा का झोंका आया, चला गया. आसमान की ओर देखा- साफ और सफेद बादल तैर रहे थे. कुछेक तारे भी दिख रहे थे. चांद बादलों में छिप शरारत कर रहा था. यही चांद कई बार हमारे प्यार को देखा करता था जब खुले छत पर, आसमान के नीचे मैं और निधि एकदूसरे की बांहों में खोए रहते थे. निधि कभीकभी शरमा कर कहती, ‘धत, चांद मुझे देख रहा है.’

मैं हंसते हुए कहता, ‘चांद भी तुम्हारी तरह शरमा कर छिप रहा है.’

‘कहां हो गुड़िया?’ मैं यह कहता और हंसी आ जाती. जब भी उसे गुड़िया कहता, वह आंखों को गोलगोल घुमा कर कहती, ‘मैं निधि हूं, छोटी सी गुड़िया नहीं. जिसे जब चाहो, चाबी से चला लो. यहां मेरी मरजी चलती है, समझे.’

तुम्हारी मरजी ही तो चलती थी सोना. सोना कहने पर वह मूर्ति जैसी खड़ी हो जाती और कहती, ‘सोना में सजीव का लक्षण कहां से लाओगे.’

पलकों पर आंसू आ गए. क्या कभी लौट कर नहीं आएगी निधि…

रात एक ढाबे पर सो कर गुजारा. सुबह हुई. समझ नहीं आ रहा था कि कहां जाऊं. आखिरकार घर जाने के लिए बस में बैठ गया. तभी ‘मूंगफली ले लो मूंगफली’ की आवाज़ आई. 9 या 10 साल के बच्चे की आवाज़ थी. मैं ने उस के चेहरे पर भोली मुसकान देखी. खरीद लिया एक पाव मूंगफली. निधि को बहुत पसंद है. जब भी हम सफ़र पर होते, वह जरूर खरीदती.

बस चलने लगी. कुछ यात्री ऊंघने लगे, कुछ बातों में मशगूल और कुछ खिड़की से बाहर का नज़ारा देखने में. ऊब कर मैं भी बाहर की ओर देखने लगा. मन कहीं भी नहीं लग रहा था.

वापस घर ही जाने का मन हुआ. सोचा, वहां निधि की यादों के साथ रह लूंगा.

घर पहुंचा, लौन में लगे पौधे मुरझा रहे थे. निधि की याद इन को भी आती होगी. सुना था कि पेड़पौधे भी उस के लिए उदास होते हैं जो उन्हें प्यार से सींचते व उन की देखभाल करते हैं. प्यारभरी नजरों से उन्हें देख, मुख्य दरवाजे का ताला खोल अंदर गया. अंदर किचेन से बरतन की आवाज़ आ रही थी. देखा, निधि चाय बना रही थी. मैं पागलों की तरह उस से लिपट गया, “मेरी जान, कहां चली गई थीं, तुम जानती हो कि तुम्हारे बगैर मैं नहीं रह सकता. एकएक पल एकएक बरस जैसा लग रहा था.”

निधि मुसकराई, “एहसास होना जरूरी है मेरी जान. किसी ने सच कहा है, ‘दूरियां प्यार को बढ़ाती हैं.’ मैं देख रही थी तुम्हारी बेचैनी, दिल कर रहा था, आ जाऊं तुम्हारे पास. पर कुछ देर और परेशान हाल देखने की चाहत के कारण मैं छिपी रही. तुम मुझे बहुत प्यार करते हो, राज. मैं तुम्हें छोड़ कर कभी नहीं जाऊंगी.”

“आज का दिन मेरे लिए खुशियोंभरा है. आज ही मेरा वसंत है और तुम मेरी बसंती,” मैं ने उसे चूमते हुए कहा.

पछतावा : आखिर दीनानाथ की क्या थी गलती

दीनानाथ नगरनिगम में चपरासी था. वह स्वभाव से गुस्सैल था. दफ्तर में वह सब से झगड़ा करता रहता था. उस की इस आदत से सभी दफ्तर वाले परेशान थे, मगर यह सोच कर सहन कर जाते थे कि गरीब है, नौकरी से हटा दिया गया, तो उस का परिवार मुश्किल में आ जाएगा.

दीनानाथ काम पर भी कई बार शराब पी कर आ जाता था. उस के इस रवैए से भी लोग परेशान रहते थे. उस के परिवार में पत्नी शांति और 7 साल का बेटा रजनीश थे. शांति अपने नाम के मुताबिक शांत रहती थी. कई बार उसे दीनानाथ गालियां देता था, उस के साथ मारपीट करता था, मगर वह सबकुछ सहन कर लेती थी.

दीनानाथ का बेटा रजनीश तीसरी जमात में पढ़ता था. वह पढ़ने में होशियार था, मगर अपने एकलौते बेटे के साथ भी पिता का रवैया ठीक नहीं था. उस का गुस्सा जबतब बेटे पर उतरता रहता था.

‘‘रजनीश, क्या कर रहा है? इधर आ,’’ दीनानाथ चिल्लाया.

‘‘मैं पढ़ रहा हूं बापू,’’ रजनीश ने जवाब दिया.

‘‘तेरा बाप भी कभी पढ़ा है, जो तू पढ़ेगा. जल्दी से इधर आ.’’

‘‘जी, बापू, आया. हां, बापू बोलो, क्या काम है?’’

‘‘ये ले 20 रुपए, रामू की दुकान से सोडा ले कर आ.’’

‘‘आप का दफ्तर जाने का समय हो रहा है, जाओगे नहीं बापू?’’

‘‘तुझ से पूछ कर जाऊंगा क्या?’’ इतना कह कर दीनानाथ ने रजनीश के चांटा जड़ दिया.

रजनीश रोता हुआ 20 रुपए ले कर सोडा लेने चला गया. दीनानाथ सोडा ले कर शराब पीने बैठ गया.

‘‘अरे रजनीश, इधर आ.’’

‘‘अब क्या बापू?’’

‘‘अबे आएगा, तब बताऊंगा न?’’

‘‘हां बापू.’’

‘‘जल्दी से मां को बोल कि एक प्याज काट कर देगी.’’

‘‘मां मंदिर गई हैं… बापू.’’

‘‘तो तू ही काट ला.’’

रजनीश प्याज काट कर लाया. प्याज काटते समय उस की आंखों में आंसू आ गए, पर पिता के डर से वह मना भी नहीं कर पाया. दीनानाथ प्याज चबाता हुआ साथ में शराब के घूंट लगाने लगा. शाम के 4 बज रहे थे. दीनानाथ की शाम की शिफ्ट में ड्यूटी थी. वह लड़खड़ाता हुआ दफ्तर चला गया.

यह रोज की बात थी. दीनानाथ अपने बेटे के साथ बुरा बरताव करता था. वह बातबात पर रजनीश को बाजार भेजता था. डांटना तो आम बात थी. शांति अगर कुछ कहती थी, तो वह उस के साथ भी गालीगलौज करता था. बेटे रजनीश के मन में पिता का खौफ भीतर तक था. कई बार वह रात में नींद में भी चीखता था, ‘बापू मुझे मत मारो.’

‘‘मां, बापू से कह कर अंगरेजी की कौपी मंगवा दो न,’’ एक दिन रजनीश अपनी मां से बोला.

‘‘तू खुद क्यों नहीं कहता बेटा?’’ मां बोलीं.

‘‘मां, मुझे बापू से डर लगता है. कौपी मांगने पर वे पिटाई करेंगे,’’ रजनीश सहमते हुए बोला.

‘‘अच्छा बेटा, मैं बात करती हूं,’’ मां ने कहा.

‘‘सुनो, रजनीश के लिए कल अंगरेजी की कौपी ले आना.’’

‘‘तेरे बाप ने पैसे दिए हैं, जो कौपी लाऊं? अपने लाड़ले को इधर भेज.’’

रजनीश डरताडरता पिता के पास गया. दीनानाथ ने रजनीश का कान पकड़ा और थप्पड़ लगाते हुए चिल्लाया, ‘‘क्यों, तेरी मां कमाती है, जो कौपी लाऊं? पैसे पेड़ पर नहीं उगते. जब तू खुद कमाएगा न, तब पता चलेगा कि कौपी कैसे आती है? चल, ये ले 20 रुपए, रामू की दुकान से सोडा ले कर आ…’’

‘‘बापू, आज आप शराब बिना सोडे के पी लो, इन रुपयों से मेरी कौपी आ जाएगी…’’

‘‘बाप को नसीहत देता है. तेरी कौपी नहीं आई तो चल जाएगा, लेकिन मेरी खुराक नहीं आई, तो कमाएगा कौन? अगर मैं कमाऊंगा नहीं, तो फिर तेरी कौपी नहीं आएगी…’’ दीनानाथ गंदी हंसी हंसा और बेटे को धक्का देते हुए बोला, ‘‘अबे, मेरा मुंह क्या देखता है. जा, सोडा ले कर आ.’’

दीनानाथ की यह रोज की आदत थी. कभी वह बेटे को कौपीकिताब के लिए सताता, तो कभी वह उस से बाजार के काम करवाता. बेटा पढ़ने बैठता, तो उसे तंग करता. घर का माहौल ऐसा ही था. इस बीच रात में शांति अपने बेटे रजनीश को आंचल में छिपा लेती और खुद भी रोती.

दीनानाथ ने बेटे को कभी वह प्यार नहीं दिया, जिस का वह हकदार था. बेटा हमेशा डराडरा सा रहता था. ऐसे माहौल में भी वह पढ़ता और अपनी जमात में हमेशा अव्वल आता. मां रजनीश से कहती, ‘‘बेटा, तेरे बापू तो ऐसे ही हैं. तुझे अपने दम पर ही कुछ बन कर दिखाना होगा.’’

मां कभीकभार पैसे बचा कर रखती और बेटे की जरूरत पूरी करती. बाप दीनानाथ के खौफ से बेटे रजनीश के बाल मन पर ऐसा डर बैठा कि वह सहमासहमा ही रहता. समय बीतता गया. अब रजनीश 21 साल का हो गया था. उस ने बैंक का इम्तिहान दिया. नतीजा आया, तो वह फिर अव्वल रहा. इंटरव्यू के बाद उसे जयपुर में पोस्टिंग मिल गई. उधर दीनानाथ की झगड़ा करने की आदत से नगरनिगम दफ्तर से उसे निकाल दिया गया था.

घर में खुशी का माहौल था. बेटे ने मां के पैर छुए और उन से आशीर्वाद लिया. पिता घर के किसी कोने में बैठा रो रहा था. उस के मन में एक तरफ नौकरी छूटने का दुख था, तो दूसरी ओर यह चिंता सताने लगी थी कि बेटा अब उस से बदला लेगा, क्योंकि उस ने उसे कोई सुख नहीं दिया था.

मां रजनीश से बोलीं, ‘‘बेटा, अब हम दोनों जयपुर रहेंगे. तेरे बापू के साथ नहीं रहेंगे. तेरे बापू ने तुझे और मुझे जानवर से ज्यादा कुछ नहीं समझा…

‘‘अब तू अपने पैरों पर खड़ा हो गया है. तेरी जिंदगी में तेरे बापू का अब मैं साया भी नहीं पड़ने दूंगी.’’

रजनीश कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘नहीं मां, मैं बापू से बदला नहीं लूंगा. उन्होंने जो मेरे साथ बरताव किया, वैसा बरताव मैं नहीं करूंगा. मैं अपने बेटे को ऐसी तालीम नहीं देना चाहता, जो मेरे पिता ने मुझे दी.’’

रजनीश उठा और बापू के पैर छू कर बोला, ‘‘बापू, मैं अफसर बन गया हूं, मुझे आशीर्वाद दें. आप की नौकरी छूट गई तो कोई बात नहीं, मैं अब अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूं. चलो, आप अब जयपुर में मेरे साथ रहो, हम मिल कर रहेंगे.‘‘

यह सुन कर दीनानाथ की आंखों में आंसू आ गए. वह बोला, ‘‘बेटा, मैं ने तुझे बहुत सताया है, लेकिन तू ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. मुझे तुझ पर गर्व है.’’

दीनानाथ को अपने किए पर खूब पछतावा हो रहा था. रजनीश ने बापू की आंखों से आंसू पोंछे, तो दीनानाथ ने खुश हो कर उसे गले लगा लिया.

फुल टाइम मेड: क्या काजोल के नखरे झेलने में कामयाब हुई सुमी ?

रितु यों मुझे कभी इतना इसरार कर के नहीं बुलाती थी. लेकिन आज उस ने ऐसा किया. मुझ से कहा कि शाम की चाय पर मैं उस के घर आ जाऊं, तो मुझे लगा कि कहीं नया एलसीडी टीवी तो नहीं खरीद लिया रितु ने या फिर नया फ्रिज, सोफा अथवा जरूर हीरे का सैट खरीदा होगा.

उस के घर पहुंची तो दरवाजा सलवारकमीज पहने एक युवती ने खोला.

मुझे देखते ही सिर झुका कर बोली,

‘‘गुड ईवनिंग.’’

मैं सकपकाई कि कौन हो सकती है यह बाला? रितु की बहन तो है नहीं, जहां तक मुझे पता है ननद भी नहीं है. इस से पहले कि मैं कुछ कहती, वह बड़े अदब से बोली, ‘‘प्लीज, कम इन, मैडम आप का वेट कर रही हैं.’’

मैं अपनेआप को संभालती कमरे में आई. मुझे देखते ही रितु उठ खड़ी हुई और गले लगाते हुए बोली, ‘‘क्या यार, बड़ी देर कर दी,’’ फिर बोली, ‘‘ममता, जल्दी से समोसे गरम कर ले आ. ब्रैडपकौड़े तल लेना और हां, 2 तरह की चटनी भी बना लेना.’’

मैं बेवकूफों की तरह उस का मुंह ताकने लगी. रितु ने हाथ पकड़ कर मुझे बैठाते हुए कहा, ‘‘सुमी, बड़ा आराम हो गया है, ममता के आने के बाद. ममता, मेरी फुल टाइम मेड, हर तरह का खाना बनाना जानती है. अपनी घरेलू बाइयों की तरह कोई खिटपिट नहीं. यहीं रहती है, जब चाहो, जो चाहो हाजिर.’’

और ममता मिनटों में समोसे और ब्रैडपकौड़े ले आई, तमीज से ट्रे में रख कर. साथ में एक मीठी चटनी और एक पुदीने की तीखी चटनी. इतनी स्वादिष्ठ कि मन हुआ ममता के हाथ चूम लूं. ‘तो यह थी वह नगीना, जिसे दिखाने के लिए रितु ने मुझे टी पार्टी पर बुलाया था,’ मैं ने मन ही मन सोचा.

समोसे का एक कौर खाने के बाद रितु मुझे विस्तार से जलाने लगी, ‘‘देख सुमी, अपनी काम वालियों से आप इसी बात की उम्मीद नहीं कर सकते कि वे मेहमानों की आवभगत करें. फिर स्टेटस की भी बात है.

मुझे घर का एक काम नहीं करना पड़ता. सुबहसवेरे बैड टी हाजिर. बाजार से सब्जी वगैरह लाने का काम भी यह कर देती है. हम तो भई सुबह बैड टी पी कर जिम जाते हैं. लौटते हैं तो गरमगरम नाश्ता तैयार होता है. दोपहर को लजीज खाना, शाम को चाय के साथ नाश्ता और रात को शाही डिनर. कभी चाइनीज, तो कभी मुगलई, कभी साउथ इंडियन तो कभी पंजाबी.’’

मैं रितु के उस नगीने पर से नजरें नहीं हटा पा रही थी. मुझे अपनी काम वाली की 100 कमियां सिरे से सताने लगीं. आज सुबह वह मुझ से पगार बढ़ाने की बात कह चुकी थी. हर सप्ताह 1 या 2 दिन गायब रहती. सुबह

6 बजे उस के 1 बार घंटी बजाने पर दरवाजा न खोलूं, तो वह तुरंत दूसरे घर चली जाती. फिर उस के दर्शन होते दोपहर बाद. अगर सिंक में कभी बरतनों की संख्या 2-4 अधिक हो जाए, तो वह कांच की एकाध आइटम तोड़ने के बाद भी बुदबुदाना जारी रखती मानो हमें बरतन की जगह पत्तलों में खाना चाहिए.

साफसफाई में अगर कभी कोई मीनमेख निकाल दो, तो झाड़ू वहीं पटक कर पूरा हिसाब देने बैठ जाती है कि उस से बेहतर काम कोई कर ही नहीं सकता.

रितु का भी महीने भर पहले तक कमोबेश यही हिसाब था, लेकिन आज उस की स्थिति ऐसी थी मानो वह जनरल मैनेजर हो और मैं उस की कंपनी में एक साधारण क्लर्क.

समोसे, ब्रैडपकौड़े और चाय गटकने के बाद मैं ने पूछ ही लिया, ‘‘तुम यह नगीना कहां से लाई हो?’’

रितु ने भेद भरे अंदाज में कहा, ‘‘यों तो मैं किसी को बताती नहीं, पर तुम मेरी बैस्ट फ्रैंड हो, इसलिए बता रही हूं. शहर में मेड सप्लाई करने वाली कई एजेंसियां हैं, लेकिन इस एजेंसी की बात ही अलग है. सारी लड़कियां ट्रैंड हैं.’’

मैं मुद्दे पर आती हुई पूछ बैठी, ‘‘पैसा तो बहुत लेती होगी?’’

रितु ने मुझ पर बेचारगी से निगाह डाली, फिर बोली, ‘‘सुमी, तुम जाने दो. तुम एफोर्ड नहीं कर पाओगी. मेरी बात अलग है. हसबैंड का प्रमोशन हुआ है, फिर मुझे…’’

मैं खीज कर बोली, ‘‘अब बता भी दो.’’

रितु ने धीरे से कहा, ‘‘डिपैंड करता है कि तुम अपनी मेड से क्याक्या करवाना चाहती हो. सिर्फ इंडियन खाना बनाने वाली थोड़ा कम चार्ज करती है. अगर उसी से तुम घर का सारा काम भी करवाओगी तो कुछ ज्यादा खर्च करना होगा. अब मैं तुम्हें ममता का रेट तो नहीं बता सकती, एजेंसी वाले मना करते हैं. हां, तुम चाहो तो मैं तुम्हें एजेंसी का फोन नंबर दे सकती हूं, साथ भी चल सकती हूं.’’

रितु के घर से लौटते हुए मेरी आंखों के आगे बस ममता ही घूम रही थी. घर पहुंचतेपहुंचते मैं ने तय कर लिया कि चाहे जो हो जाए, मुझे फुलटाइम मेड चाहिए ही चाहिए. बस दिक्कत थी, अपने पतिदेव को पटाने की और उस काम में तो मैं माहिर थी ही.

रितु के साथ मैं एजेंसी पहुंच गई मेड लेने. मैं इस तरह तैयार हो कर गई थी मानो शादी में जा रही हूं. मेड और एजेंसी वालों पर इंप्रैशन जो जमाना था. एजेंसी क्या थी, पूरा फाइव स्टार होटल था. जाते ही हमारे सामने कोल्ड ड्रिंक आ गया. फिर हम एसी की हवा खाने लगे.

तभी हीरो जैसे दिखने वाले एक व्यक्ति ने मेरे सामने एक फार्म रखा और फिर बड़ी मीठी आवाज में शुद्ध अंगरेजी में मेरा इंटरव्यू लेने लगा. मैं कहां तक पढ़ी हूं, कितने कमरों के घर में रहती हूं, पति क्या करते हैं, ऊपरी आमदनी है या नहीं, घर अपना है या किराए का, हम दिन में कितनी दफा खाते हैं, सप्ताह में कितनी बार मेहमान आते हैं, मेहमान किस किस्म का खाना खाते हैं, घर में कोई पानतंबाकू खाने वाला तो नहीं है, सब्जीभाजी वाले से 5-10 रुपए के लिए चिकचिक तो नहीं करते. वगैरहवगैरह.

फिर उस ने रेट कार्ड देते हुए कहा,

‘‘यह रहा हमारा रेट कार्ड, इस में देख कर टिक लगा दीजिए.’’

भारतीय खाना पकवाने के 2 हजार रुपए, चाइनीज के ढाई हजार, अगर कभीकभार मुगलई या कौंटीनैंटल बनवाना हो तो 3 हजार रुपए, इस के अलावा नाश्ते की आइटम के लिए हजार रुपए अलग से.

मैं ने सकपका कर रितु की तरफ देखा. रितु ने फिर से कुहनी मारी, बोली, ‘‘सुमी, तुम सिर्फ इंडियन खाने के लिए रख लो. मुगलई और चाइनीज बनवा कर क्या करोगी?’’

मेरे अहम को इतना जबरदस्त धक्का लगा कि मैं ने तुरंत लपक कर मुगलई वाले में टिक लगा दिया. हीरो ने हिसाबकिताब लगाना शुरू किया और अब की बार थोड़ी विनम्रता से बोला, ‘‘मैडम, आप को हर महीने मेड को

4 हजार रुपए देने होंगे. हफ्ते में 1 दिन की पूरी छुट्टी. साल में 15 दिन की अतिरिक्त तनख्वाह और गांव आनेजाने का सैकंड एसी का किराया. इस के अलावा हमें आप 2 महीने की तनख्वाह डिपौजिट के रूप में देंगी. अगर बीच में कभी आप मेड को निकाल देंगी, तो हम यह पैसा वापस नहीं करेंगे. अगर यह खुद छोड़ कर चली जाएगी, तो डिपौजिट वापस हो जाएगा.’’

तो क्या हुआ, जो मुझे अपनी नई स्कूल की नौकरी में इस मेड के बराबर तनख्वाह मिलती है, स्टेटस भी तो कोई चीज है. मैं अपने साथ सिर्फ 5 हजार रुपए लाई थी, बाकी रितु से उधार ले कर उसे थमाए, तो उस ने मेरे सामने एक सांवली, दुबलीपतली लड़की पेश कर दी.

‘‘मैडम, यह हमारी खास मेड है. नाम है काजोल. एक बार इस के हाथ का पका खाना  खाएंगी, तो बारबार हमें याद करेंगी.’’

काजोल अपना सूटकेस ले कर आई, तो रितु ने धीरे से टोका, ‘‘इसे टैक्सी में आने के पैसे दो. यह तुम्हारे साथ टू व्हीलर पर कैसे जाएगी?’’

मैं ने पर्स से एक आखिरी बचा 100 का नोट निकाल कर काजोल को थमा दिया.

रितु को उस के घर छोड़ते हुए मैं काजोल के संग घर आ गई. मेरा घर देख कर काजोल खास खुश नहीं दिखी. घर देखने के बाद पूछा, ‘‘मैडमजी, मैं कहां रहूंगी?’’

मैं ने घर के बाहर बने कमरे की ओर इशारा किया तो उस ने नाकभौं सिकोड़ते हुए कहा, ‘‘मैडम, कुछ तो मेरी इज्जत का खयाल करो. ऐसे अंधेरे कमरे में मुझे नहीं रहना. मुझे अटैच्ड बाथरूम वाला कमरा दो.’’

उस की निगाहें मेरे कमरे पर थीं. मैं ने सकुचा कर कहा, ‘‘काजोल, ऐसा तो कोई कमरा है नहीं. वैसे दिन भर हम हसबैंडवाइफ तो बाहर ही रहेंगे. तुम ऐसा करो, ड्राइंगरूम में रह लेना. यहां तो कूलर भी है.’’

काजोल को बात पसंद तो नहीं आई, पर उस ने सामान ड्राइंगरूम के कोने में रख दिया. मुझे लगा कि आते ही वह रसोई देखना चाहेगी, पर वह देखना चाहती थी बाथरूम. मेरे बाथरूम में देर तक नहाने के बाद वह बोली, ‘‘मैडम, चाय पीने का मन हो रहा है. रसोई कहां है?’’

मैं खुश हो गई, ‘‘हांहां, चाय के साथ समोसे भी बना लो. हसबैंड भी घर लौटते होंगे.’’

उस का मुंह बन गया, ‘‘मैडम, आज सुबह की ट्रेन से आई हूं. आज चाय पी कर रेस्ट करूंगी. रात को खाने पर कुछ सिंपल बनवा लेना.’’

मुझे बोलने का मौका ही नहीं दिया उस ने. खैर, मुझ से पूछपूछ कर उस ने चाय बनाई. उसे चूंकि ज्यादा दूध वाली चाय पसंद थी, इसलिए वह चाय मुझे पीनी पड़ी. इस के बाद वह ड्राइंगरूम में एक चादर बिछा कर लेट

गई. मुझे हिदायत दे गई कि 8 बजे से पहले उसे न उठाऊं.

पतिदेव घर पर पधारे. जैसे ही ड्राइंगरूम में उन के चरण पड़े, मैं ने उन्हें रोक लिया और मेड की तरफ इशारा किया, ‘‘देखो, कौन आया है.’’

पतिदेव ने मेरी तरफ बेचारगी वाली निगाह डाली और कहा, ‘‘चाय मिलेगी?’’

अभी 8 नहीं बजे थे, इसलिए चाय मैं ने ही बनाई, यह कहते हुए कि रात से पूरा काम मेड करेगी.

8 बजे तक किसी तरह जज्ब किया अपने को. ठीक 8 बजे उसे उठाया तो वह कुनमुन करती उठी, ‘‘मैडम, यह क्या, इतना शोर मचा दिया. मेरा तो सिर दर्द करने लगा.’’

खैर, मेरे बाथरूम में हाथमुंह धो कर वह किचन में आई. तब तक मैं घर में बची सब्जियां, लौकी, तुरई और आलू निकाल चुकी थी.

काजोल ने जैसे ही सब्जियों की तरफ निगाह डाली, हिकारत से बोली, ‘‘मैडम, आप को एजेंसी वाले ने बताया नहीं कि मैं लौकी और तुरई जैसी सब्जियां न बनाती हूं, न खाती हूं?’’

मैं ने बात संभालते हुए कहा, ‘‘मैं आज सुबह से बिजी थी न, इसलिए दूसरी कोई सब्जी ला नहीं पाई. जाने दो, आज दालचावल खा लेंगे, वैसे भी सुबह का खाना रखा है फ्रिज में.’’

जब मैं पतिदेव को दिन का खाना माइक्रोवेव में गरम कर के खिलाने लगी, तो उन्होंने मेरी तरफ करुणा भाव से देखा और बोले, ‘‘सुमी, कोई बात नहीं. मुझे तो जो खिला दोगी, खा लूंगा.’’

मैं ने कुछ मनुहार से कहा, ‘‘बस, आज की बात है. कल से रोज तुम्हें चाइनीज, कौटीनैंटल और मुगलई खाना मिला करेगा.’’

कल के सपनों में खोई जो सोई, तो नींद दरवाजा खटखटाने की आवाज से भी नहीं खुली. पतिदेव जाग गए. दरवाजा खोला तो सामने काजोल खड़ी थी.

‘‘सर, मुझे जमीन पर लेट कर नींद नहीं आ रही, आप कहें तो सोफे पर सो जाऊं?’’

पतिदेव ने हां में सिर हिला दिया. करते भी क्या. सुबह उठी, तो ड्राइंगरूम में सोफे पर काजोल को सोया देख, पारा चढ़ने लगा. इस से पहले मैं कुछ कहती, पतिदेव ने मेरा हाथ दबा कर धीरे से कहा, ‘‘बेचारी को जमीन पर नींद नहीं आ रही थी, मुझ से पूछा तो मैं ने ही कहा कि…’’

मैं चुप रह गई. चाय का पानी चढ़ा कर काजोल को आवाज लगाई. सुबह का नाश्ता कौन बनाएगा?

काजोल की मरी सी आवाज आई, ‘‘मैडम, देखिए बुखार आ गया है मुझे.’’

स्कूल से लौटी, तो काजोल सुबह वाली अवस्था में मुंह ढांपे सो रही थी. मैं ने घर के अंदर कदम रखा, तो लगा पता नहीं किस के घर आई हूं. रात से गंदा पड़ा घर वैसा ही था. कमरे में कूड़ा, ड्राइंगरूम में अस्तव्यस्त मेड का बिस्तर, किचन में हर तरफ गंदगी, सिंक में जूठे बरतन.

मैं ने किसी तरह अपने को नियंत्रित कर मेड एजेंसी में फोन घुमाया. हीरो लाइन पर आया, तो उसे अपने मन की पीड़ा बताई कि यह क्या, मेड तो घर आते ही बीमार पड़ गई.

हीरो ने उत्तेजित आवाज में कहा,

‘‘मैडम, हम ने तो आप को मेड बिलकुल सहीसलामत दी थी. आप उसे जल्दी से अच्छा करिए. वैसे भी हम डिफैक्टिव पीस वापस नहीं लेते.’’

मैं भन्नाती हुई रसोई में पहुंची. काजोल लड़खड़ाती हुई उठी, ‘‘मैडम, सुबह से चक्कर आ रहे हैं. लगता है आप के घर का पानी मुझे सूट नहीं किया.’’

मैं उस के सामने बरतन साफ करने लगी. पर उस ने उफ तक नहीं की. मैं ने

मरता क्या न करता की शैली में अपनी कालोनी के डाक्टर को घर बुलवा लिया. डाक्टर पुराने थे, पर काजोल की बीमारी नई थी. वे थक कर बोले, ‘‘वैसे तो कोई बीमारी नहीं लगती, पर एहतियात के लिए 2-4 गोलियां लिख देता हूं.’’

दवा खाने के बाद वह फिर सो गई. शाम ढली और रात की बारी आ गई. मुगलई, चाइनीज के सपने देखती हुई मैं बुरी सी शक्ल बनाती हुई रितु ऐंड फैमिली की बाट जोहने लगी. अब बाहर से खाना मंगवाने के अलावा चारा क्या था?

ठीक समय पर मेहमान आए. घर की हालत देख रितु पहले तो चौंकी, फिर मुझे कोने में बुला कर आवाज को भरसक मुलायम बनाते हुए बोली, ‘‘सुमी, देखो कुछ लोग होते हैं, जो नौकरों से काम निकलवाते हैं और कुछ लोग नौकरों के लिए काम करते हैं.’’

मेरा चेहरा फक्क पड़ गया. मेरा हाथ दबा कर वह कुछ धीरज बंधाती हुई बोली, ‘‘तुम रहने दो सुमी. तुम से मेड नहीं पाली जाएगी. इस के चोंचलों में चोंच दोगी, तो जल्द ही यह तुम्हारे बैडरूम में सोने लगेगी और तुम इस के कपड़े धोती नजर आओगी.’’

मैं रोआंसी हो उठी. वाकई 2 दिन के जद्दोजहद के बाद मुझे यह समझ में आने लगा कि फुलटाइम मेड नामक बला से निबटना मुझे नहीं आएगा.

जातेजाते रितु मुझे जरूरी टिप दे गई, ‘‘देखो, अगर तुम इसे निकालोगी, तो तुम्हें डिपौजिट के पैसे नहीं मिलेंगे. कुछ ऐसा करो कि यह खुद छोड़ जाए.’’

बात मेरी समझ में आ गई. रात में मैं ने काजोल का बिस्तर बाहर वाले कमरे में डलवा दिया और कुछ सख्त स्वर में कहा, ‘‘डाक्टर कह रहे थे, तुम्हें छूत की बीमारी हो सकती है. तुम अलग रहो. खानापीना मैं तुम्हें कमरे में पहुंचा दूंगी.’’

रितु की तरकीब कामयाब रही. अगले ही दिन काजोल की तबीयत ठीक हो गई. न सिर्फ वापस उस ने ड्राइंगरूम में डेरा जमाना चाहा, बल्कि सुबह उठ कर नाश्ता बनाने को भी तैयार हो गई. मैं ने उस के हाथ का बना मंचूरियन और कोफ्ते खाए, तो लगा कि जल्द ही बिस्तर पर पड़ जाऊंगी.

मैं ने कमर कस ली कि डिपौजिट के पैसे तो वापस ले कर रहूंगी. अत: न मैं ने उसे ड्राइंगरूम में आने दिया, न उसे लौकी और तुरई के अलावा बनाने के लिए कोई तीसरी सब्जी दी. चौथे दिन एजेंसी से फोन आ गया, ‘‘मैडम, आप आ कर डिपौजिट के पैसे वापस ले जाइए. काजोल आप के यहां काम नहीं करना चाहती.’’

इस बार मेरा सीना कुछ चौड़ा हुआ. मैं ने काजोल को बस के पैसे दिए और टू व्हीलर से जा कर अपने डिपौजिट के पैसे वापस ले आई. लौटते हुए मैं ने अग्रवाल स्वीट हाउस से गरमगरम समोसे खरीद लिए. आखिर अपनी औका

कालेजिया इश्क: इश्कबाजी की अनोखी कहानी

कालेज के दिन भी क्या थे. वैसे तो कालेज में न जाने कितने दोस्त थे, लेकिन सलीम और रजत के बिना न तो कभी मेरा कालेज जाना हुआ और न ही कभी कैंटीन में कुछ अकेले खाना.

सलीम दूसरे शहर का रहने वाला था. एक छोटे से किराए के कमरे में उस का सबकुछ था जैसे कि रसोईर् का सामान, बिस्तर और चारों तरफ लगीं हीरोइनों की ढेर सारी तसवीरें. हुआ यह कि एक दिन अचानक अपनी पूरी गृहस्थी साइकिल पर लादे मेरे घर आ गया. मैं ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘यार हुआ क्या, मकान मालिक से कहासुनी हो गई. मैं ने कमरा खाली कर दिया. चलो, कोई नया कमरा ढूंढ़ो चल कर,’’ उस ने जवाब दिया तो मैं ने कहा, ‘‘इतनी सुबह किस का दरवाजा खटखटाएं. तुम पहले चाय पियो, फिर चलते हैं.’’

सुबह 10 बजे मैं और सलीम नया कमरा ढूंढ़ने निकले. ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा, पड़ोसी इरफान चाचा का कमरा खाली था. इरफान चाचा पहले तैयार नहीं हुए तो मैं ने अपने ट्यूशन वाले इफ्तियार सर से कहा, ‘‘सर, मेरे दोस्त को कमरा चाहिए.’’ उन की इरफान चाचा से जान पहचान थी. उन के कहने पर सलीम को इरफान चाचा का कमरा मिल गया.’’

कुछ दिनों बाद सलीम ने बताया ‘‘यार, इरफान चाचा बड़े भले आदमी है, कभीकभी उन की बेटियां खाना दे जाती हैं.’’ मैं ने उस से कहा, ‘‘यार चक्कर में मत पड़ जाना.’’

‘‘यार मुझे कुछ लेनादेना नहीं, पढ़ाई पूरी हो जाए अपने शहर वापस चला जाऊंगा,’’ सलीम बोला.

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महीना भर बीता होगा सलीम को इरफान चाचा के यहां रहते हुए, एक सुबह वह फिर पूरी गृहस्थी साइकिल पर लादे मेरे घर आया. मैं ने पूछा, ‘‘अब क्या हुआ, तुम तो फिर बेघर हो गए?’’

उस ने कहा, ‘‘रुको, पहले मैं साइकिल खड़ी कर दूं, फिर बताता हूं. पिछले हफ्ते इरफान चाचा और उन की बेगम खुसरफुसुर कर रहे थे. मैं ने दरवाजे से सट कर उन की बातचीत सुनी. वे कह रहे थे, ‘लड़का तो अच्छा है अपनी जैनब के लिए सही रहेगा. इसे घर में ही खाना खिला दिया करो. जल्द ही निकाह कर देंगे.‘’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘यार इस में कमरा छोड़ने की कौन सी बात है. तुम्हारी बिना मरजी के कोई भला शादी कैसे कर देगा.’’

सलीम ने कागज का एक टुकड़ा निकाल कर पढ़ा जो कि उर्दू में था, ’आप तो बड़े जहीन हैं. मुझे तो पता ही नहीं चला कि मैं कब आप को दिल दे बैठी. अब्बू कह रहे थे, लड़का बहुत भला है, खयाल रखा करो. कल आप का इंतजार करती रही और आप हैं कि आप को अपने दोस्तों से फुरसत नहीं. वैसे जो आप का बड़े बालों वाला दोस्त है वह तो इसी महल्ले में रहता है. अब्बू कह रहे थे. अपनी शादी में उसे भी बुलाना. आज आप के लिए मेवे वाली खीर बनाऊंगी, मुझे पता है. आप को बहुत पसंद हैं.

‘तुम्हारी जैनब.’

खत पढ़ने के बाद सलीम ने कहा, ‘‘तुम्हें पता है, ये खत किस ने लिखा है.’’ ‘‘जैनब ने लिखा होगा,’’ मैं ने कहा.‘‘नहीं, यह जैनब ने नहीं लिखा. मुझे पता है कि जैनब को उर्दू लिखनी नहीं आती. मैं ने यह भी पता कर लिया है कि इसे किस ने लिखा है.’’

‘‘अगर तुम्हें पता है तो बताओ किस ने लिखा है,’’ मैं ने अचरज से पूछा.

सलीम ने कहा, ‘‘इसे जैनब के अब्बू ने खुद लिखा है.’’

‘‘वो तुम्हें कैसे पता?’’

सलीम ने बताया, ‘‘इरफान चाचा के 4 बेटियां हैं और उन्होंने एक को भी नहीं पढ़ाया. मैं उन्हें अब हिंदी वर्णमाला सिखा रहा हूं. उर्दू सिर्फ उन की बेटियों को रटी हुई है थोड़ीबहुत लेकिन वे लिख नहीं पातीं.’’

मैं ने कहा, ‘‘तो अब क्या करें?’’सलीम बोला,’’ कुछ नहीं, पुराने मकान मालिक के पास जा रहा हूं, माफी मांग लूंगा वहीं रहूंगा.’’

पहला साल था हमारा ग्रेजुएशन का. रजत शहर का ही रहने वाला था. एक दिन जैसे ही मैं इकोनौमिक्स की क्लास में घुसा, मेरे होश उड़ गए. ब्लैकबोर्ड पर लिखा था ‘आई लव यू अंजुला.’ नीचे मेरा नाम लिखा था, ‘तुम्हारा राहुल’ और अंजुला नाम की जो लड़की क्लासमेट थी, उस की मेज पर गुलाब का फूल रखा था और साथ में एक लैटर, जिस में लिखा था, ‘अंजुला, आज मैं पूरी क्लास के सामने यह स्वीकार करता हूं कि मैं तुम्हे बेइंतहा प्यार करता हूं.’

ये सब देख कर और लैटर पढ़ कर मेरा हाल बेहाल था. क्लास में रजत मुझे मिला नहीं. वह ये सब कर के निकल चुका था. क्लास में सब से पहले अंजुला ही आई और ये सब देख कर फूटफूट कर रोने लगी. मैं तो मेजों के नीचे से निकल कर कालेज के पिछले दरवाजे से भाग कर घर आ गया. मैं 7 दिनों तक कालेज गया ही नहीं.

ग्रेजुएशन का दूसरा साल था. लंबी छुट्टी के बाद कालेज खुला. सलीम अपने शहर से वापस आ गया. सलीम और मैं हमेशा क्लास की आगे की पंक्ति में बैठते थे. ऐडमिशन चल रहे थे, एक दिन सलमा नाम की लड़की क्लास में आई. उस ने क्लास में पढ़ा रहे सर से कहा, ‘‘सर, मेरा नाम रजिस्टर में लिख लीजिए, मेरे पापा जिला जज हैं. उन का यहां ट्रांसफर हुआ है. सर ने लिख लिया. वह हमारे साथ ही क्लास की अगली पंक्ति में बैठती थी.

सलीम की निगाहें अकसर सलमा की तरफ ही रहती थीं, एक दिन सलीम ने मुझ से कहा, ‘‘तुम ने देखा, सलमा मेरी तरफ देखती रहती है.’’

मैं ने कहा, ‘‘अबे ओए तेरी अक्ल घास चरने गई. कहां राजा भोज कहां गंगू तेली. वह तेरी तरफ नहीं, मुझे देखती है.’’

सलीम ने तुरंत बात काटते हुए कहा, ‘‘नहीं, वह तुम्हारी तरफ बिलकुल नहीं देखती, वह मेरी तरफ ही देखती है और तुम्हें एक बात और बता दूं, अमीर लड़कियों को गरीब लड़कों से ही प्यार होता है. हिंदी फिल्मों में भी तो यही दिखाया जाता है.’’

मैं ने कहा,’’चलो, छोड़ो यार पिछले साल हम लोगों के नंबर कम आए थे, इस बार मेहनत कर लो, पता चले इन बातों के चक्कर में ग्रेजुएशन 3 की जगह 4 साल का हो जाए.’’

एक दिन सलीम का भ्रम टूट ही गया जब उस ने मुझे बताया, ‘‘यार, वह न मेरी तरफ देखती है और न तुम्हारी तरफ. आज मैं कौफी शौप गया तो मैं ने देखा जो अपने क्लास का सुहेल है, उस के साथ सलमा हाथ में हाथ डाले एक ही कप में कौफी पी रही थी.’’

मुझे हंसी आ गई. मैं ने पूछा, ’’फिर तुम्हारी गरीब लड़का और अमीर लड़की वाली फिल्म का क्या होगा?’’

सलीम ने झेंपते हुए कहा, ‘‘मेरी फिल्म फ्लौप हो गई.’’

लेकिन उस ने भी मुझ से पूछ लिया, ‘‘तुम भी तो कह रहे थे, वह तुम्हारी तरफ देखती है. तुम भी तो रेल सी देखते रह गए?’’

मैं ने कहा ‘‘छोड़ो यार, हमारी दोस्ती सब से बढ़ कर है.’’कुछ दिनों से रजत की अजीब किस्म के शरारती लड़कों से दोस्ती हो गई थी. जब भी कोई सर क्लास में पढ़ाने आते, रजत अपने शरारती दोस्तों के साथ क्लास के बाहर कसरत करने लगता.

एक दिन सर ने चिल्ला कर पूछा, ‘‘यह हो क्या रहा है, तुम पढ़ते समय ये हरकतें क्यों करते हो?’’रजत अकड़ कर बोला, ’’सर, इसे हरकत मत बोलिए. जैसे आप किसी विषय को क्लास में पढ़ाते हो वैसे ही मैं इन्हें कसरत कर के शरीर हृष्टपुष्ट रखने की ट्रेनिंग देता हूं.’’

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रजत की हरकतों से सर गुस्से में पैर पटकते क्लास छोड़ कर चले गए, ‘‘बेकार है पढ़ाना, यह पढ़ाने ही नहीं देगा.’’

मैं ने रजत से कहा, ‘‘यार, कभीकभी तो क्लास लगती है, उस पर भी तुम ड्रामा कर देते हो.’’

रजत बोला, ‘‘तुम्हें ज्यादा पढ़ाई सूझ रही है तो घर पर पढ़ा करो. हमें तो पहले शरीर हृष्टपुष्ट करना है, फिर पढ़ाई.’’

एक दिन तो हद हो गई, सर इकोनौमिक्स पढ़ा रहे थे. रजत और उस के दोस्त शेख की वेशभूषा में क्लास में घुसे और सर से बोले, ’’ए मिस्टर, हमें आप से बात करनी है. हमारे अरब में सौ तेल के कुएं हैं, और हम आप को अपना बिजनैस पार्टनर बनाना चाहते हैं.’’

सर आगबबूला हो गए. उन्होंने प्रिंसिपल से तुरंत शिकायत की. प्रिंसिपल ने पुलिस बुला दी. सभी शेख पिछला दरवाजा फांद कर नौ दो ग्यारह हो गए.

कालेज की लाइब्रेरी में नीचे का फ्लोर लड़कों के बैठने के लिए था और ऊपर का फ्लोर लड़कियों के लिए. लाइब्रेरियन लड़कों से तो बड़े खुर्राट तरीके  से बात करता लेकिन जब कोई लड़की बात करने आती तो उस की बातें ही खत्म नहीं होतीं. यह दूसरी बात थी कि लड़कियां ही उस से कम बात किया करती थीं.

एक दिन जब मैं, रजत और सलीम साथ में लाइब्रेरी में घुसे, सलीम ने लाइब्रेरियन से कोई मैगजीन मांगी. उस ने मैगजीन दी ही नहीं और वही मैगजीन जब एक लड़की ने मांगी तो उसे दे दी. सलीम को बड़ा गुस्सा आया. उस ने लाइब्रेरियन से गुस्से में कहा, ‘‘यह बताओ, हमारे में क्या कांटे लगे हैं. तुम्हें सिर्फ लड़कियां ही दिखाई देती हैं.’’

मोनू सिंह और उस की बहन भी हमारे बैचमेट थे. दोस्ती तो नहीं थी, हां, कभीकभार बातचीत हो जाती थी. एक दिन मैं, सलीम, रजत लाइब्रेरी में बैठे पढ़ रहे थे. अचानक ताबड़तोड़ गोलियों की आवाज आनें लगी, बाद में पता चला कि मोनू सिंह की बहन का किसी ने दुपट्टा खींच दिया था. गांव से उस के साथ आए लोगों ने गोलियां चलाई थीं. खैर, मोनू सिंह और उन की बहन सैकंड ईयर में ही घर वापस चले गए.

पता ही नहीं चले कालेज के 2 साल कब फुर्र से उड़ गए. तीसरे साल में सलीम ने मुझे बताया, ‘‘यार, मुझे एक लड़की से प्यार हो गया है.’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारी एक मुहब्बत पहले भी फ्लौप हो चुकी है. चुपचाप पढ़ाई करो, वैसे भी यह थर्ड ईयर है.’’ लेकिन सलीम के ऊपर जैसे मुहब्बत का भूत सवार था. मैं ने पूछा, ‘‘बताओ कौन है वह लड़की?’’

‘‘अरे वही गुलनाज जो पीछे बैठती है.’’ गुलनाज कभीकभार सलीम से बात कर लेती थी.

एक दिन मैं कालेज नहीं गया. सलीम शाम को घर आया,’’यार, तुम तो कालेज गए नहीं लेकिन तुम्हारे लिए किसी ने लैटर दिया है. लो, पढ़ लो.’’

लैटर में यों लिखा था-

‘डियर राहुल, मुझे पता है जीसीआर (गर्ल कौमन रूम) के सामने खड़े हो कर तुम सिर्फ मुझे ही देखते हो. बड़ी अच्छी बात है. तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो, लेकिन क्या करूं, मुझे शर्म लगती है तुम से बात करने में. इसीलिए आज तक हम कोई बात नहीं कर पाए. वैसे, मिलना या बातें करने से भी ऊंचा है हमारा प्यार. कल तुम गांधीजी की मूर्ति के पास जो बैंच है, उस के पास अपने हिस्ट्री के नोट्स रख देना, मैं उन्हें उठा लूंगी.

‘ढेर सारा प्यार. तुम्हारी ममता.’

लैटर में ढेर सारी गुलाब की पंखुडि़यां रखी थी. लैटर पढ़ने के बाद सलीम बोला, ‘‘बधाई हो. कालेज जाते कई दिन हो गए, ममता ने कभी उड़ती नजर से भी मेरी तरफ नहीं देखा.’’

मैं ने सलीम से पूछा, ‘‘यार, लैटर लिखने के बाद उस ने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा.’’ सलीम ने बड़ी गंभीरता से कहा, ’’तुम ने पढ़ा नहीं. लैटर में उस ने खुद लिखा है उसे शर्म लगती है.

कालेज के दिन पता ही नहीं चले, कब वसंत के दिनों में पेड़ों पर आए बौर की तरह चले भी गए. आखिर ग्रेजुएशन के थर्ड ईयर की ऐग्जाम डेट्स आ गई. जब सभी पेपर हो गए, एक दिन शाम को सलीम घर पर मिलने आया. उस ने कहा, ‘‘आज तुम्हें एक राज वाली बात बतानी है.’’

‘‘बताओ.’’

सलीम ने लंबी सांस भरते हुए कहा, ‘‘ममता वाला लैटर मैं ने खुद लिखा था.’’

मैं ने अचरज से पूछा, ‘‘क्यों?’’ तो उस ने कहा, ‘‘मुझे डर था कि कहीं सलमा की तरह हमारीतुम्हारी एकतरफा मुहब्बत की तरह गुलनाज भी कौमन मुहब्बत न बन जाए.’’

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मैं ने कहा, ‘‘ओह, तो क्या गुलनाज तुम से प्यार करती है?’’ वह बोला, ‘‘नहीं यार, गुलनाज की सगाई लतीफ से हो गई है.’’ और हमेशा की तरह, गृहस्थी साइकिल पर लादे सलीम ने उसी रात महल्ला नहीं, बल्कि शहर ही छोड़ दिया.

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