Romantic Story: धोखा – काश वासना के उस खेल को समझ पाती शशि

Romantic Story: घर में चहलपहल थी. बच्चे खुशी से चहक रहे थे. घर की साजसज्जा और मेहमानों के स्वागतसत्कार का प्रबंध करने में घर के बड़ेबुजुर्ग व्यस्त थे. किंतु शशि का मन उदास था. उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. दरअसल, आज उस की सगाई थी. घर की महिलाएं बारबार उसे साजश्रृंगार के लिए कह रही थीं लेकिन वह चुपचाप खिड़की से बाहर देख रही थी. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करे?

2 महीने पहले जब उस की शादी तय हुई थी तो वह खूब रोई थी. वह किसी और को चाहती थी. लेकिन उस के मातापिता ने उस से पूछे बगैर एक व्यवसायी से उस की शादी पक्की कर दी थी. वह अभी शहर में होस्टल में रह कर बीएड कर रही थी. वहीं अपने साथ पढ़ने वाले राकेश को वह दिल दे बैठी थी. लेकिन उस ने यह बात अपने मातापिता को नहीं बताई थी क्योंकि वह खुद या राकेश अभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाए थे. पढ़ाई पूरी होने में भी 2 साल बाकी थे. इसलिए वह चाहती थी कि शादी 2 साल के लिए किसी तरह से रुकवा ले. उस ने सोचा कि जब परिस्थितियां ठीक हो जाएंगी तो मन की बात अपने मातापिता को बता कर राकेश के लिए उन्हें राजी कर लेगी.

इसीलिए, पिछली छुट्टी में वह घर आई तो अपनी शादी की बात पक्की होने की सूचना पा कर खूब रोई थी. शादी के लिए मना कर दिया था, लेकिन किसी ने उस की एक न सुनी. पिताजी तो एकदम भड़क गए और चिल्लाते हुए बोले थे, ‘शादी वहीं होगी जहां मैं चाहूंगा.’ राकेश को उस ने फोन पर ये बातें बताई थीं. वह घबरा गया था. उस ने कहा था, ‘शशि, तुम शादी के लिए मना कर दो.’

‘नहीं, यह इतना आसान नहीं है. पिताजी मानने को तैयार नहीं हैं.’ ‘लेकिन मैं कैसे रहूंगा? अकेला हो जाऊंगा तुम्हारे बिना.’

‘मैं भी तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगी, राकेश,’ शशि का गला भर आया था. ‘एक काम करो. तुम पहले होस्टल आ जाओ. कोई उपाय निकालते हैं,’ राकेश ने कहा था, ‘मैं रेलवे स्टेशन पर तुम्हारा इंतजार करूंगा. 2 नंबर गेट पर मिलना. वहीं से दोनों होस्टल चलेंगे.’

उदास स्वर में शशि बोली थी, ‘ठीक है. मैं 2 नंबर गेट पर तुम्हारा इंतजार करूंगी.’ तय योजना के अनुसार, शशि रेल से उतर कर 2 नंबर गेट पर खड़ी हो गई. तभी एक कार आ कर शशि के पास रुकी. उस में से राकेश बाहर निकला और शशि के गले लग कर बोला, ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’

शशि रोआंसी हो गई. राकेश ने कहा, ‘आओ, गाड़ी में बैठ कर बातें करते हैं.’ ‘राकेश कितना सच्चा है,’ शशि ने सोचा, ‘तभी होस्टल जाने के लिए गाड़ी ले आया. नहीं तो औटो से 20 रुपए में पहुंचती. 2 किलोमीटर दूर है होस्टल.’

गाड़ी में बैठते ही राकेश ने शशि का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘शशि, मैं तुम से प्यार करता हूं. तुम नहीं मिलीं, तो अपनी जान दे दूंगा.’ कार सड़क पर दौड़ने लगी.

शशि बोली, ‘नहीं राकेश, ऐसा नहीं करना. मैं तुम्हारी हूं और हमेशा तुम्हारी ही रहूंगी.’ ‘इस के लिए मैं ने एक उपाय सोचा है,’ राकेश ने कहा.

‘क्या,’ शशि बोली. ‘हम लोग शादी कर लेते हैं और अपनी नई जिंदगी शुरू करते हैं.’

शशि आश्चर्यचकित हो कर बोली, ‘यह क्या कह रहे हो, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है न.’ ‘तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है,’ तभी उस ने ड्राइवर से कार रोकने को कहा.

कार एक पुल पर पहुंच गई थी. नीचे नदी बह रही थी. राकेश कार से बाहर आ कर बोला, ‘तुम शादी के लिए हां नहीं कहोगी तो मैं इसी पुल से नदी में कूद कर जान दे दूंगा,’ यह कह कर राकेश पुल की तरफ बढ़ने लगा. ‘यह क्या कर रहे हो, राकेश?’ शशि घबरा गई.

‘तो मैं जी कर क्या करूंगा.’ ‘चलो, मैं तुम्हारी बात मानती हूं. लेकिन जान न दो,’ यह कह कर उस ने राकेश को खींच कर वापस कार में बिठा दिया और खुद भी बगल में बैठ कर बोली, ‘लेकिन यह सब होगा कैसे?’

शशि के हाथों को अपने सीने से लगा कर राकेश बोला, ‘अगर तुम तैयार हो तो सब हो जाएगा. हम दोनों आज ही शादी करेंगे.’ शशि चकित रह गई. इस निर्णय पर वह कांप रही थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? न कहे तो प्यार टूट जाता और राकेश जान दे देता. हां कहे तो मातापिता, रिश्तेदार और समाज के गुस्से का शिकार बनना पड़ेगा.

‘क्या सोच रही हो?’ राकेश ने पूछा. शशि बोली, ‘यह सब अचानक और इतनी जल्दी ठीक नहीं है, मुझे कुछ सोचनेसमझने का समय तो दो.’

‘इस का मतलब तुम्हें मुझ से प्यार नहीं है. ठीक है, मत करो शादी. मैं भी जिंदा नहीं रहूंगा.’ ‘अरे, यह क्या कर रहे हो? मैं तैयार हूं, लेकिन शादी कोई खेल नहीं है. कैसे शादी होगी. हम कहां रहेंगे? घर के लोग नाराज होंगे तो क्या करेंगे? हमारी पढ़ाई का क्या होगा?’ शशि ने कहा.

‘तुम इस की चिंता मत करो. मैं सब संभाल लूंगा. एक बार शादी हो जाने दो. कुछ दिनों बाद सब मान जाएंगे. वैसे अब हम बालिग हैं. अपने जीवन का फैसला स्वयं ले सकते हैं,’ राकेश ने समझाया. ‘लेकिन मुझे बहुत डर लग रहा है.’

‘मैं हूं न. डरने की क्या बात है?’ ‘चलो, फिर ठीक है. मैं तैयार हूं,’ डरतेडरते शशि ने शादी के लिए हामी भर दी. वह किसी भी कीमत पर अपना प्यार खोना नहीं चाहती थी.

राकेश खुश हो कर बोला, ‘तुम कितनी अच्छी हो.’ थोड़ी देर बाद कार एक होटल के गेट पर रुकी. राकेश बोला, ‘डरो नहीं, सब ठीक हो जाएगा. हम लोग आज ही शादी कर लेंगे, लेकिन किसी को बताना नहीं. शादी के बाद कुछ दिन हम लोग होस्टल में ही रहेंगे. 15 दिनों बाद मैं तुम्हें अपने घर ले चलूंगा. मेरी मां अपनी बहू को देखना चाहती हैं. वे बहुत खुश होंगी.’

‘तो क्या तुम ने अपनी मम्मीपापा को सबकुछ बता दिया?’ ‘नहीं, सिर्फ मम्मी को, क्योंकि मम्मी को गठिया है. ज्यादा चलफिर नहीं पातीं. इसीलिए वे जल्दी बहू को घर लाना चाहती हैं. किंतु पापा नहीं चाहते कि मेरी शादी हो. वे चाहते हैं कि मैं पहले पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊं, लेकिन वे भी मान जाएंगे फिर हम दोनों की सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी,’ राकेश बोला.

‘सच, तुम बहुत अच्छे हो.’ ‘तो मेरी प्यारी महबूबा, तुम होटल में आराम करो और हां, इस बैग में तुम्हारी जरूरत की सारी चीजें हैं. तुम रात 8 बजे तक तैयार हो जाना. फिर हम दोनों पास के मंदिर में चलेंगे. वहां शादी कर लेंगे. फिर हम होटल में आ जाएंगे. आज हमारी जिंदगी का सब से खुशी का दिन होगा.’

कुछ प्रबंध करने राकेश बाहर चला गया. शशि उधेड़बुन में थी. उस के कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अपने मातापिता को धोखा देने की बात सोच कर उसे बुरा लग रहा था, लेकिन राकेश जिद पर अड़ा था और वह राकेश को खोना नहीं चाहती थी. कब रात के 8 बज गए, पता ही नहीं चला. तभी राकेश आ कर बोला, ‘अरे, अभी तक तैयार नहीं हुई? समय कम है. तैयार हो जाओ. मैं भी तैयार हो रहा हूं.’

‘लेकिन राकेश यह सब ठीक नहीं हो रहा है,’ शशि ने कहा. ‘यदि ऐसा है तो चलो, तुम्हें होस्टल पहुंचा देता हूं. किंतु मुझे हमेशा के लिए भूल जाना. मैं इस दुनिया से दूर चला जाऊंगा. जहां प्यार नहीं, वहां जी कर क्या करना?’ राकेश उदास हो कर बोला.

‘तुम बहुत जिद्दी हो, राकेश. डरती हूं कहीं कुछ बुरा न हो जाए.’ ‘लेकिन मैं किसी कीमत पर अपना प्यार पाना चाहता हूं, नहीं तो…’

‘बस राकेश, और कुछ मत कहो.’ 1 घंटे में तैयार हो कर दोनों पास के एक मंदिर में पहुंच गए. वहां राकेश के कुछ दोस्त पहले से मौजूद थे.

राकेश मंदिर के पुजारी से बोला, ‘पंडितजी, हमारी शादी जल्दी करा दीजिए.’ जल्दी ही शादी की प्रक्रिया पूरी हो गई. शशि और राकेश एकदूसरे के हो गए. शशि को अपनी बाहों में ले कर राकेश बोला, ‘चलो, अब हम होटल चलते हैं. आज की रात वहीं बितानी है.’

दोनों होटल में आ गए. लेकिन यह दूसरा होटल था. शशि को घबराहट हो रही थी. राकेश बोला, ‘चिंता न करो. अब सब ठीक हो जाएगा. आज की रात हम दोनों की खास रात है न.’ शशि मन ही मन डर रही थी, किंतु राकेश को रोक न सकी. फिर उसे भी अच्छा लगने लगा था. दोनों एकदूसरे में समा गए. कब 2 घंटे बीत गए, पता ही नहीं चला.

‘थक गई न. चलो, पानी पी लो और सो जाओ,’ पानी का गिलास शशि की तरफ बढ़ाते हुए राकेश बोला. शशि ने पानी पी लिया. जल्द ही उसे नींद आने लगी. वह सो गई. सुबह जब शशि की नींद खुली तो वह हक्काबक्का रह गई. उस के शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं था. उस के मुंह से चीख निकल गई. जब उस ने देखा कि कमरे में राकेश के अलावा 3 और लड़के थे. सब मुसकरा रहे थे.

तभी राकेश बोला, ‘चुप रहो जानेमन, यहां तुम्हारी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है. ज्यादा इधरउधर की तो तेरी आवाज को हमेशा के लिए खामोश कर देंगे.’ ‘यह तुम ने अच्छा नहीं किया, राकेश,’ अपने शरीर को ढकने का प्रयास करती हुई शशि रोने लगी, ‘तुम ने मुझे बरबाद कर दिया. मैं सब को बता दूंगी. पुलिस में शिकायत करूंगी.’

‘नहीं, तुम ऐसा नहीं करोगी अन्यथा हम तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ेंगे. वैसे ऐसा करोगी तो तुम खुद ही बदनाम होगी,’ कह कर राकेश हंसने लगा. उस के दोस्त भी हंसने लगे. शशि का बदन टूट रहा था. उस के शरीर पर जगहजगह नोचनेखसोटने के निशान थे. वह समझ गई कि रात में पानी में नशीला पदार्थ मिला कर पिलाया था राकेश ने. उस के बेहाश हो जाने पर सब ने उस के साथ…

शशि का रोरो कर बुरा हाल हो गया. राकेश बोला, ‘अब चुप हो जा. जो हो गया उसे भूल जा. इसी में तेरी भलाई है और जल्दी से तैयार हो जा. तुझे होस्टल पहुंचा देता हूं. और हां, किसी से कुछ कहना नहीं वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा.’

शशि को अपनी व अपने परिवार की खातिर चुप रहना पड़ा था. ‘‘अरे, खिड़की के बाहर क्या देख रही हो? जल्दी तैयार हो जा. मेहमान आने वाले होंगे,’’ तभी मां ने उसे झकझोरा तो वह पिछली यादों से वर्तमान में लौटी.

‘‘वह प्यार नहीं धोखा था. उस ने अपने मजे के लिए मेरी सचाई और भावना का इस्तेमाल किया,’’ शशि ने मन ही मन सोचा. अपने आंसू पोंछते हुए शशि बाथरूम में घुस गई. उसे अपनी नासमझी पर गुस्सा आ रहा था. अपनी जिंदगी का फैसला उस ने दूसरे को करने का हक दे दिया था जो उस की भलाई के लिए जिम्मेदार नहीं था. इसीलिए ऐसा हुआ, लेकिन अब कभी वह ऐसी भूल नहीं करेगी. मुंह पर पानी के छींटे मार कर वह राकेश के दिए घाव के दर्द को हलका करने की कोशिश करने लगी.

मेहमान आ रहे हैं. अब उसे नई जिंदगी शुरू करनी है. हां, नई जिंदगी…वह जल्दीजल्दी सजनेसंवरने लगी.

Hindi Story: आया – कैसी थी अधेड़ उम्र की नौकरानी लक्ष्मी?

Hindi Story: तुषार का तबादला मुंबई हुआ तो रश्मि यह सोच कर खुश हो उठी कि चलो इसी बहाने फिल्मी कलाकारों से मुलाकात हो जाएगी, वैसे कहां मुंबई घूमने जा सकते थे. तुषार ने मुंबई आ कर पहले कंपनी का कार्यभार संभाला फिर बरेली जा कर पत्नी व बेटे को ले आया.

इधरउधर घूमते हुए पूरा महीना निकल गया, धीरेधीरे दंपती को महंगाई व एकाकीपन खलने लगा. उन के आसपास हिंदीभाषी लोग न हो कर महाराष्ट्र के लोग अधिक थे, जिन की बोली अलग तरह की थी.

काफी मशक्कत के बाद उन्हें तीसरे माले पर एक कमरे का फ्लैट मिला था, जिस के आगे के बरामदे में उन्होंने रसोई व बैठने का स्थान बना लिया था.

रश्मि ने सोचा था कि मुंबई में ऐसा घर होगा जहां से उसे समुद्र दिखाई देगा, पर यहां से तो सिर्फ झुग्गीझोंपडि़यां ही दिखाई देती हैं.

तुषार रश्मि को चिढ़ाता, ‘‘मैडम, असली मुंबई तो यही है, मछुआरे व मजदूर झुग्गीझोंपडि़यों में नहीं रहेंगे तो क्या महलों में रहेंगे.’’

जब कभी मछलियों की महक आती तो रश्मि नाक सिकोड़ती. घर की सफाई एवं बरतन धोने के लिए काम वाली बाई रखी तो रश्मि को उस से भी मछली की बदबू आती हुई महसूस हुई. उस ने उसी दिन बाई को काम से हटा दिया. रश्मि के लिए गर्भावस्था की हालत में घर के काम की समस्या पैदा हो गई. नीचे जा कर सागभाजी खरीदना, दूध लाना, 3 वर्ष के गोलू को तैयार कर के स्कूल भेजना, फिर घर के सारे काम कर के तुषार की पसंद का भोजन बनाना अब रश्मि के वश का नहीं था. तुषार भी रात को अकसर देर से लौटता था.

तुषार ने मां को आने के लिए पत्र लिखा, तो मां ने अपनी असमर्थता जताई कि तुम्हारे पिताजी अकसर बीमार रहते हैं, उन की देखभाल कौन करेगा. फिर तुम्हारे एक कमरे के घर में न सोने की जगह है न बैठने की.

तुषार ने अपनी पहचान वालों से एक अच्छी नौकरानी तलाश करने को कहा पर रश्मि को कोई पसंद नहीं आई. तुषार ने अखबार में विज्ञापन दे दिया, फिर कई काम वाली बाइयां आईं और चली गईं.

एक सुबह एक अधेड़ औरत ने आ कर उन का दरवाजा खटखटाया और पूछा कि आप को काम वाली बाई चाहिए?

‘‘हां, हां, कहां है.’’

‘‘मैं ही हूं.’’

तुषार व रश्मि दोनों ही उसे देखते रह गए. हिंदी बोलने वाली वह औरत साधारण  मगर साफसुथरे कपडे़ पहने हुए थी.

‘‘मैं घर के सभी काम कर लेती हूं. सभी प्रकार का खाना बना लेती हूं पर मैं रात में नहीं रुक पाऊंगी.’’

‘‘ठीक है, तुम रात में मत रुकना. तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘लक्ष्मी.’’

‘‘देखो लक्ष्मी, हमारी छोटी सी गृहस्थी है इसलिए अधिक काम नहीं है पर हम साफसफाई का अधिक ध्यान रखते हैं,’’ रश्मि बोली.

‘‘बीबीजी, आप को शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.’’ लक्ष्मी ने प्रतिमाह 3 हजार रुपए वेतन मांगा, पर थोड़ी नानुकुर के बाद वह ढाई हजार रुपए पर तैयार हो गई और उसी दिन से वह काम में जुट गई, पूरे घर की पहले सफाईधुलाई की, फिर कढ़ीचावल बनाए और गोलू की मालिश कर के उसे नहलाया.

तुषार व रश्मि दोनों ही लक्ष्मी के काम से बेहद प्रभावित हो गए. यद्यपि उन्होंने लक्ष्मी से उस का पता तक भी नहीं पूछा था. लक्ष्मी शाम को जब चली गई तो दंपती उस के बारे में देर तक बातें करते रहे.

तुषार व रश्मि आश्वस्त होते चले गए जैसे लक्ष्मी उन की मां हो. वे दोनों उस का सम्मान करने लगे. लक्ष्मी परिवार के सदस्य की भांति रहने लगी.

सुबह आने के साथ ही सब को चाय बना कर देना, गोलू को रिकशे तक छोड़ कर आना, तुषार को 9 बजे तक नाश्ता व लंच बाक्स तैयार कर के देना, रश्मि को फलों का रस निकाल कर देना, यह सब कार्य लक्ष्मी हवा की भांति फुर्ती से करती रहती थी.

लक्ष्मी वाकई कमाल का भोजन बनाना जानती थी. रश्मि ने उस से ढोकला, डोसा बनाना सीखा. भांतिभांति के अचार चटनियां बनानी सीखीं.

‘‘ऐसा लगता है अम्मां, आप ने कुकिंग स्कूल चलाया है?’’ एक दिन मजाक में रश्मि ने पूछा था.

‘‘हां, मैं सिलाईकढ़ाई का भी स्कूल चला चुकी हूं’’

रश्मि मुसकराती मन में सोचती रहती कि उसे तो बढ़चढ़ कर बोलने की आदत है. डिलीवरी के लिए रश्मि को अस्पताल में दाखिल कराया गया तो लक्ष्मी रात को अस्पताल में रहने लगी.

तुषार और अधिक आश्वस्त हो गया. उस ने मां को फोन कर दिया कि तुम पिताजी की देखभाल करो, यहां लक्ष्मी ने सब संभाल लिया है.

रश्मि को बेटी पैदा हुई. तीसरे दिन रश्मि नन्ही सी गुडि़या को ले कर घर लौटी. लक्ष्मी ने उसे नहलाधुला कर बिस्तर पर लिटा दिया और हरीरा बना कर रश्मि को पिलाया.

‘‘लक्ष्मी अम्मां, आप ने मेरी सास की कमी पूरी कर दी,’’ कृतज्ञ हो रश्मि बोली थी.

‘‘तुम मेरी बेटी जैसी हो. मैं तुम्हारा नमक खा रही हूं तो फर्ज निभाना मेरा कर्तव्य है.’’

तुषार ने भी लक्ष्मी की खूब प्रशंसा की. एक शाम तुषार, रश्मि व बच्ची को ले कर डाक्टर को दिखाने गया तो रास्ते में लोकल ट्रेन का एक्सीडेंट हो जाने के कारण दंपती को घर लौटने में रात के 12 बज गए.

घर में ताला लगा देख दोनों अवाक् रह गए. अपने पास रखी दूसरी चाबी से उन्होंने ताला खोला व आसपास नजरें दौड़ा कर लक्ष्मी को तलाश करने लगे.

चिंता की बात यह थी कि लक्ष्मी, गोलू को भी अपने साथ ले गई थी. तुषार व रश्मि के मन में लक्ष्मी के प्रति आक्रोश उमड़ पड़ा था. रश्मि बोली, ‘‘यह लक्ष्मी भी अजीब नौकरानी है, एक रात यहीं रह जाती तो क्या हो जाता, गोलू को क्यों ले गई.’’

बच्चे की चिंता पतिपत्नी को काटने लगी. पता नहीं लक्ष्मी का घर किस प्रकार का होगा, गोलू चैन से सो पाएगा या नहीं.

पूरी रात चिंता में गुजारने के पश्चात जब सुबह होने पर भी लक्ष्मी अपने निर्धारित समय पर नहीं लौटी तो रश्मि रोने लगी, ‘‘नौकरानी मेरे बेटे को चोरी कर के ले गई, पता नहीं मेरा गोलू किस हाल में होगा.’’

तुषार को भी यही लग रहा था कि लक्ष्मी ने जानबूझ कर गोलू का अपहरण कर लिया है. नौकरों का क्या विश्वास, बच्चे को कहीं बेच दें या फिर मोटी रकम की मांग करें.

लक्ष्मी के प्रति शक बढ़ने का कारण यह भी था कि वह प्रतिदिन उस वक्त तक आ जाती थी. रश्मि के रोने की आवाज सुन कर आसपास के लोग जमा हो कर कारण पूछने लगे. फिर सब लोग तुषार को पुलिस को सूचित करने की सलाह देने लगे.

तुषार को भी यही उचित लगा. वह गोलू की तसवीर ले कर पुलिस थाने जा पहुंचा. लक्ष्मी के खिलाफ बेटे के अपहरण की रिपोर्ट पुलिस थाने में दर्ज करा कर वह लौटा तो पुलिस वाले भी साथ आ गए और रश्मि से पूछताछ करने लगे.

रश्मि रोरो कर लक्ष्मी के प्रति आक्रोश उगले जा रही थी. पुलिस वाले तुषार व रश्मि का ही दोष निकालने लगे कि उन्होंने लक्ष्मी का फोटो क्यों नहीं लिया, बायोडाटा क्यों नहीं बनवाया, न उस के रहने का ठिकाना देखा, जबकि नौकर रखते वक्त यह सावधानियां आवश्यक हुआ करती हैं.

अब इतनी बड़ी मुंबई में एक औरत की खोज, रेत के ढेर में सुई खोजने के समान है. अभी यह सब हो ही रहा था कि अकस्मात लक्ष्मी आ गई, सब भौचक्के से रह गए.

‘‘हमारा गोलू कहां है?’’ तुषार व रश्मि एकसाथ बोले.

लक्ष्मी की रंगत उड़ी हुई थी, जैसे रात भर सो न पाई हो, फिर लोगों की भीड़ व पुलिस वालों को देख कर वह हक्की- बक्की सी रह गई थी.

‘‘बताती क्यों नहीं, कहां है इन का बेटा, तू कहां छोड़ कर आई है उसे?’’ पुलिस वाले लक्ष्मी को डांटने लगे.

‘‘अस्पताल में,’’ लक्ष्मी रोने लगी.

‘‘अस्पताल में…’’ तुषार के मुंह से निकला.

‘‘हां साब, आप का बेटा अस्पताल में है. कल जब आप लोग चले गए थे तो गोलू सीढि़यों पर से गिर पड़ा. मैं उसे तुरंत अस्पताल ले गई, अब वह बिलकुल ठीक है. मैं उसे दूध, बिस्कुट खिला कर आई हूं. पर साब, यहां पुलिस आई है, आप ने पुलिस बुला ली…मेरे ऊपर शक किया… मुझे चोर समझा,’’ लक्ष्मी रोतेरोते आवेश में भर उठी.

‘‘मैं मेहनत कर के खाती हूं, किसी पर बोझ नहीं बनती, आप लोगों से अपनापन पा कर लगा, आप के साथ ही जीवन गुजर जाएगा… मैं गोलू को कितना प्यार करती हूं, क्या आप नहीं जानते, फिर भी आप ने…’’

‘‘लक्ष्मी अम्मां, हमें माफ कर दो, हम ने तुम्हें गलत समझ लिया था,’’ तुषार व रश्मि लक्ष्मी के सामने अपने को छोटा समझ रहे थे.

‘‘साब, अब मैं यहां नहीं रहूंगी, कोई दूसरी नौकरी ढूंढ़ लूंगी पर जाने से पहले मैं आप को आप के बेटे से मिलाना ठीक समझती हूं, आप सब मेरे साथ अस्पताल चलिए.’’

तुषार, लक्ष्मी, कुछ पड़ोसी व पुलिस वाले लक्ष्मी के साथ अस्पताल पहुंच गए. वहां गोलू को देख दंपती को राहत मिली. गोलू के माथे पर पट्टी बंधी हुई थी और पैर पर प्लास्टर चढ़ा हुआ था.

डाक्टर ने बताया कि लक्ष्मी ने अपने कानों की सोने की बालियां बेच कर गोलू के लिए दवाएं खरीदी थीं.

‘‘साब, आप का बेटा आप को मिल गया, अब मैं जा रही हूं.’’

तुषार और रश्मि दोनों लक्ष्मी के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए, ‘‘माफ कर दो अम्मां, हमें छोड़ कर मत जाओ.’’

दोनों पतिपत्नी इतनी अच्छी आया को खोना नहीं चाहते थे इसलिए बारबार आग्रह कर के उन्होंने उसे रोक लिया.

लक्ष्मी भी खुश हो उठी कि जब आप लोग मुझे इतना मानसम्मान दे रहे हैं, रुकने का इतना आग्रह कर रहे हैं तो मैं यहीं रुक जाती हूं. ‘‘साब, मेरा मुंबई का घर नहीं देखोगे,’’ एक दिन लक्ष्मी ने आग्रह किया.

तुषार व रश्मि उस के साथ गए. वह एक साधारण वृद्धाश्रम था, जिस के बरामदे में लक्ष्मी का बिस्तर लगा हुआ था. आश्रम वालों ने उन्हें बताया कि लक्ष्मी अपने वेतन का कुछ हिस्सा आश्रम को दान कर देती है और रातों को जागजाग कर वहां रहने वाले लाचार बूढ़ों की सेवा करती है.

अब तुषार व रश्मि के मन में लक्ष्मी के प्रति मानसम्मान और भी बढ़ गया था. लक्ष्मी के जीवन की परतें एकएक कर के खुलती गईं. उस विधवा औरत ने अपने बेटे को पालने के लिए भारी संघर्ष किए मगर बहू ने अपने व्यवहार से उसे आहत कर दिया था, अत: वह अपने बेटे- बहू से अलग इस वृद्धाश्रम में रह रही थी.

‘‘संघर्ष ही तो जीवन है,’’ लक्ष्मी, मुसकरा रही थी.

Family Story: दोस्तियाप्पा – आखिर दादी की डायरी में क्या लिखा था?

Family Story: दादी अकसर दादाजी से कहा करती थीं कि जिंदगी में एक यार तो होना ही चाहिए. सुनते ही दादाजी बिदक जाया करते थे.

‘किसलिए?’ वे चिढ़ कर पूछते.

‘अपने सुखदुख सा?ा करने के लिए,’ दादी का जवाब होता, जिसे सुन कर दादाजी और भी अधिक भड़क जाते.

‘क्यों? घरपरिवार, मातापिता, भाईबहन, पतिसहेलियां काफी नहीं हैं जो यार की कमी खल रही है. भले घरों की औरतें इस तरह की बातें करती कभी देखी नहीं. हुंह, यार होना चाहिए,’ दादाजी देर तक बड़बड़ाते रहते. यह अलग बात थी कि दादी को उस बड़बड़ाहट से कोई खास फर्क नहीं पड़ता था. वे मंदमंद मुसकराती रहती थीं.

मैं अकसर सोचा करती थी कि हमेशा सखीसहेलियों और देवरानीजेठानी से घिरी रहने वाली दादी का ऐसा कौन सा सुखदुख होता होगा जिसे सा?ा करने के लिए उन्हें किसी यार की जरूरत महसूस होती है.

‘‘दादी, आप की तो इतनी सारी सहेलियां हैं, यार क्या इन से अलग होता है?’’ एक दिन मैं ने दादी से पूछा तो दादी अपनी आदत के अनुसार हंस दीं. फिर मु?ो एक कहानी सुनाने लगीं.

‘‘मान ले, तुझे कुछ पैसों की जरूरत है. तू ने अपने बहुत से दोस्तों से मदद मांगी. कुछ ने सुनते ही बहाना बना कर तुझे टाल दिया. ऐसे लोगों को जानपहचान वाला कहते हैं. कुछ ने बहुत सोचा और हिसाब लगा कर देखा कि कहीं उधार की रकम डूब तो नहीं जाएगी. आश्वस्त होने के बाद तु?ो समयसीमा में बांध कर मांगी गई रकम का कुछ हिस्सा दे कर तेरी मदद के लिए जो तैयार हो जाते हैं उन्हें मित्र कहते हैं. और जो दोस्त बिना एक भी सवाल किए चुपचाप तेरे हाथ में रकम धर दे, उसे ही यार कहते हैं. कुछ सम?ां?’’ दादी ने कहा.

‘‘जी समझ यही कि जो दोस्त आप से सवालजवाब न करे, आप को व्यर्थ सलाहमशवरा न दे और हर समय आप के साथ खड़ा रहे वही आप का यार है. है न?’’ मैं ने अपनी समझ से कहा.

‘‘बिलकुल सही. लेकिन तेरे दादाजी को ये तीनों एक ही लगते हैं,’’ कहते हुए दादी की आंखों में उदासी उतर आई. यार न होने की टीस उन्हें सालने लगी.

मैं बचपन से ही अपने दादादादी के साथ रहती हूं, क्योंकि मेरे मम्मीपापा दोनों नौकरी करते हैं. चूंकि दादाजी भी सरकारी सेवा में थे, इसलिए दादी न तो उन्हें अकेला छोड़ सकती थीं और न ही वे चाहती थीं कि उन की पोती आया और नौकरों के हाथों में पले. इसलिए, सब ने मिल कर तय किया कि मैं अपनी दादी के पास ही रहूंगी. बस, इसीलिए मेरा और दादी का दोस्तियाप्पा बना हुआ है.

जब से हमारे सामने वाले घर में सीमा आंटी रहने के लिए आई हैं तब से हमारे घर में भी रौनक बढ़ गई है. सीमा आंटी हैं ही इतनी मस्तमौला. जिधर से निकलती हैं, हंसी के अनार फोड़ती जाती हैं. चूंकि हमारे घर आमनेसामने हैं, इसलिए इन अनारों की रोशनी सब से ज्यादा हमारे घर पर ही होती है.

सीमा आंटी शायद कहीं नौकरी करती हैं. आंटी को गप्पें मारने का बहुत शौक है. औफिस से आने के बाद वे शाम ढलने तक दादीदादाजी के साथ गप्पें मारती रहती हैं. दादी कहीं इधरउधर गई भी हों तो भी उन्हें कोई खास फर्क नहीं पड़ता. चायकौफी के दौर में डूबी वे दादाजी के साथ ही देर तक गपियाती रहती हैं.

मैं ने कई बार नोटिस किया है कि जब दादाजी अकेले होते हैं तब सीमा आंटी के ठहाकों में गूंज अधिक होती है. उस समय दादाजी के चेहरे पर भी ललाई बढ़ जाती है. पिछले कुछ दिनों से तो तीनों का बाहर आनाजाना भी साथ ही होने लगा है.

जब से सीमा आंटी हमारी जिंदगी का हिस्सा बनी हैं तब से दादाजी दादी के प्रति जरा नरम हो गए हैं. आजकल वे दादी के इस तर्क पर बहस नहीं करते कि जिंदगी में यार होना चाहिए कि नहीं. लेकिन हां, खुल कर इस की वकालत तो वे अब भी नहीं करते.

‘‘आप को नहीं लगता कि सीमा आंटी दादाजी में ज्यादा ही इंटरैस्ट लेने लगी हैं,’’ एक दिन मैं ने दादी को छेड़ा. दादी हंस दीं और बोलीं, ‘‘शायद इसी से उन्हें जिंदगी में यार की अहमियत सम?ा में आ जाए.’’

दादी की सहजता मुझे आश्चर्य में डाल रही थी. ‘‘आप को जलन नहीं होती?’’ मैं ने पूछा.

‘‘किस बात की जलन?’’ अब आश्चर्यचकित होने की बारी दादी की थी.

‘‘अरे, आप उन की पत्नी हो. आप के पति के साथ कोई और समय बिता रहा है. आप को इसी बात की जलन होनी चाहिए और क्या?’’ मैं ने अपनी बात साफ की.

‘‘तो क्या हुआ, यार कहां पति या पत्नी के अधिकारों का अतिक्रमण करता है?’’ दादी ने उसी सहजता से कहा. मैं उन की सरलता पर हंस दी.

आज दादी हमारे बीच नहीं हैं. अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे हम सब को हतप्रभ सा छोड़ कर अनंत यात्रा पर चल दीं. 15 दिनों बाद मम्मीपापा सामाजिक औपचारिकताएं निभा कर वापस चले गए. वे तो मु?ो और दादाजी को भी अपने साथ ले जाने की जिद कर रहे थे लेकिन दादाजी किसी सूरत में इस घर को छोड़ कर जाने को तैयार नहीं हुए. मैं उन की देखभाल करने के लिए उन के पास रुक गई. वैसे भी, मेरी स्नातक की पढ़ाई अभी चल ही रही थी.

एक दोपहर दादी की अलमारी सहेजते समय मु?ो उन के पुराने पर्स के अंदर एक छोटी सी चाबी मिली. सभी ताले टटोल लिए, लेकिन उस चाबी का कोई ताला मु?ो नहीं मिला. बात आईगई हो गई. फिर एक दिन जब मैं ने दादी का पुराना बक्सा खोल कर देखा तो उस में एक छोटी सी कलात्मक मंजूषा मु?ो दिखाई दी. उस पर लगा छोटा सा ताला मु?ो उस छोटी चाबी की याद दिला गया. लगा कर देखा तो ताला खुल गया.

मंजूषा के भीतर मुझे एक पुरानी पीले पड़ते पन्नों वाली छोटी सी डायरी मिली. ताले का रहस्य जानने के लिए मैं दादाजी को बिना बताए उसे छिपा कर अपने साथ ले आई. रात को दादाजी के सोने के बाद मैं ने वह डायरी निकाल कर पढ़ना शुरू किया.

पन्नादरपन्ना दादी खुलती जा रही थीं. डायरी में जगहजगह किसी धरम का जिक्र था. डायरी में लिखी बातों के अनुसार मैं ने सहज अनुमान लगाया कि धरम दादी की प्रेम कहानी का नायक नहीं था, वह उन का यार था. जब भी वे परेशान होतीं तो सिर्फ धरम से बात करती थीं.

मु?ो याद आया कि दादी अकसर छत पर जा कर फोन पर किसी से बात किया करती थीं. दादाजी के आते ही तुरंत नीचे दौड़ आती थीं. जब वे वापस नीचे आती थीं तो एकदम हवा सी हलकी होती थीं. मैं अंदाजा लगा रही हूं कि शायद वे धरम से ही बात करती होंगी.

दादी की डायरी क्या थी, दुखों का दस्तावेज थी. हरदम मुसकराती दादी अपनी हंसी के पीछे कितने दर्द छिपाए थीं, यह मुझे आज पता चल रहा है. पता नहीं क्यों दादाजी एक खलनायक की छवि में ढलते जा रहे हैं.

दादी और दादाजी का विवाह उन के समय के चलन के अनुसार घर के बड़ों का तय किया हुआ रिश्ता था. धरम उन दोनों के उन के बचपन का यार था. हालांकि, दुनियाजहान की बातेंशिकायतें दादी दादाजी से ही करती थीं लेकिन दादाजी का जिक्र या उन के प्रति उपजी नाराजगी को जताने के लिए भी तो कोई अंतरंग साथी होना चाहिए न. भावनाओं के मटके जहां छलकते थे, वह पनघट था धरम. यह बात दादाजी भी जानते थे लेकिन वे कभी भी स्त्रीपुरुष के याराने के समर्थक नहीं थे.

धीरेधीरे प्यार को अधिकार ढकने लगा और धरम दादाजी की आंखों में रेत सा अड़ने लगा. दादाजी को धरम के साथ दादी की निकटता डराने लगी. खोने का डर उन्हें अपराध करने के लिए उकसाने लगा. उन्होंने अपने प्यार का वास्ता दे कर दादी को उन के यार से दूर करने की साजिश की. दादाजी की खुशी और परिवार की सुखशांति बनाए रखने के लिए दादी ने धरम से दूरियां बना लीं. वे अब दादाजी के सामने धरम का जिक्र नहीं करती थीं. दादाजी को लगा कि वे अपने षड्यंत्र में कामयाब हो गए, लेकिन वे दादी को धरम से दूर कहां कर पाए.

डायरी इस बात की गवाह है कि दादी अपने आखिरी समय तक धरम से जुड़ी हुई थीं और मैं इस बात की गवाही पूरे होशोहवास में दे सकती हूं कि दादी की जिंदगी धरम को कलंकरहित यार का दर्जा दिलवाने की आस में ही पूरी हो गई.

आखिरी पन्ना पढ़ कर डायरी बंद करने लगी तो पाया कि मेरा चेहरा आंसुओं से तर था. दादी ने अपनी अंतिम पंक्तियों में लिखा था, ‘‘हमारे समाज में सिर्फ व्यक्ति ही नहीं, बल्कि कुछ शब्द भी लैंगिक भेदभाव का दंश ?ोलते हैं. स्त्री और पुरुष के संदर्भ में उन की परिभाषा अलग होती है. उन्हीं अभागे शब्दों में से एक शब्द है ‘यार’. उस का सामान्य अर्थ बहुत जिगरी होने से लगाया जाता है लेकिन जब यही शब्द कोई महिला किसी पुरुष के लिए इस्तेमाल करे तो उस के चरित्र की चादर पर काले धब्बे टांक दिए जाते हैं.’’

पता नहीं दादी द्वारा लिखा गया यही पन्ना आखिरी था या इस के बाद दादी का कभी डायरी लिखने का मन ही नहीं हुआ, क्योंकि दादी ने किसी भी पन्ने पर कोई तारीख अंकित नहीं की थी. लेकिन इतना तो तय था कि दादी के याराने को न्याय नहीं मिला. काश, कोई जिंदगी में यार की अहमियत सम?ा सकता. काश, समाज याराने को स्त्रीपुरुष की सीमाओं से बाहर स्वीकार कर पाता.

दादी के न रहने पर दादाजी एकदम चुप से हो गए थे. कितने दिन तो घर से बाहर ही नहीं निकले. सीमा आंटी के आने पर जरूर उन का अबोला टूटता था. सीमा आंटी भी उन्हें अकेलेपन के खोल से बाहर लाने की पूरी कोशिश कर रही थीं. कोशिश थी, आखिर तो कामयाब होनी ही थी. दादाजी फिर से हंसनेबोलने लगे. रोज शाम सीमा आंटी का इंतजार करने लगे. जब भी कभी परेशान या दादी की याद में उदास होते, सब से पहला फोन सीमा आंटी को ही जाता.

आंटी भी अपने सारे जरूरी काम छोड़ कर उन का फोन अटैंड करतीं. मैं कई बार देखती कि जब दादाजी बोल रहे होते तब आंटी चुपचाप उन्हें सुनतीं. न वे अपनी तरफ से कोई सलाह देतीं और न ही कभी किसी काम में दादाजी की गलती निकाल कर उन्हें कठघरे में खड़ा करतीं. क्या वे दादाजी की यार थीं?

सीमा आंटी दादाजी के लिए उस दीवार जैसी हो गई थीं जिस के सहारे इंसान अपनी पीठ टिका कर बैठ जाता है और मौन आंसू बहा कर अपना दिल भी हलका कर लेता है, यह जानते हुए भी कि यह दीवार उस की किसी भी मुश्किल का हल नहीं है. लेकिन हां, दुखी होने पर रोने के लिए हर समय हाजिर जरूर है.

दादी को गए साल होने को आया.  2 दिनों बाद उन की बरसी है. दादाजी पूरी श्रद्धा के साथ आयोजन में जुटे हैं. सीमा आंटी उन की हरसंभव सहायता कर रही हैं. मेरे मम्मीपापा भी आ चुके हैं. घर में एक उदासी सी छाई है. लग रहा है जैसे दादाजी के भीतर कोई मंथन चल रहा है.

‘‘मिन्नी, आज शाम मेरा एक दोस्त धरम आने वाला है,’’ दादाजी ने कहा. सुनते ही मैं चौंक गई. ‘धरम यानी दादी का यार… तो क्या दादाजी सब जान गए? क्या दादी की डायरी उन के हाथ लग गई?’ मैं ने लपक कर अपनी अलमारी संभाली. दादी की डायरी तो जस की तस रखी थी. धरम अंकल के आने का कारण मेरी समझ में नहीं आ रहा था. मैं ने टोह लेने के लिए दादाजी को टटोला.

‘‘धरम अंकल कौन हैं, पहले तो कभी नहीं आए हमारे घर?’’ मैं ने पूछा.

‘‘धरम तेरी दादी का जिगरी था. वह बेचारी इस रिश्ते को मान्यता दिलाने के लिए जिंदगीभर संघर्ष करती रही. लेकिन मैं ने कभी स्वीकार नहीं किया. आज जब अपने मन के पेंच खोलने के लिए किसी चाबी की जरूरत महसूस करता हूं तो उस का दर्द समझ में आता है,’’ दादाजी की आंखों में आंसू थे.

दादी की बरसी पर धरम अंकल आए. पता नहीं दादाजी ने उन से क्या कहा कि दोनों देर तक एकदूसरे से लिपटे रोते रहे. सीमा आंटी भी उन के पास ही खड़ी थीं. थोड़ा सहज हुए दादाजी ने सीमा आंटी की तरफ इशारा करते हुए धरम अंकल से उन का परिचय करवाया. ‘‘यह सीमा है. हमारी पड़ोसिन… मेरी यार.’’ और तीनों मुसकरा उठे.

मैं भी खुश थी. आज दादी के याराने को मान्यता मिल गई थी.

Romantic Story: सबक – आखिर कैसे बदल गई निशा?

Romantic Story, Writer- Nima Sharma

सुबह सैर कर के लौटी निशा ने अखबार पढ़ रहे अपने पति रवि को खुशीखुशी बताया, ‘‘पार्क में कुछ दिन पहले मेरी सपना नाम की सहेली बनी है. आजकल उस का अजय नाम के लड़के से जोरशोर के साथ इश्क चल रहा है.’’ ‘‘मुझे यह क्यों बता रही हो?’’ रवि ने अखबार पर से बिना नजरें उठाए पूछा.

‘‘यह सपना शादीशुदा महिला है.’’ ‘‘इस में आवाज ऊंची करने वाली क्या बात है? आजकल ऐसी घटनाएं आम हो गई हैं.’’

‘‘आप को चटपटी खबर सुनाने का कोई फायदा नहीं होता. अभी औफिस में कोई समस्या पैदा हो जाए तो आप के अंदर जान पड़ जाएगी. उसे सुलझाने में रात के 12 बज जाएं पर आप के माथे पर एक शिकन नहीं पड़ेगी. बस मेरे लिए आप के पास न सुबह वक्त है, न रात को,’’ निशा रोंआसी हो उठी. ‘‘तुम से झगड़ने का तो बिलकुल भी वक्त नहीं है मेरे पास,’’ कह रवि ने मुसकराते हुए उठ कर निशा का माथा चूमा और फिर तौलिया ले कर बाथरूम में घुस गया.

निशा ने माथे में बल डाले और फिर सोच में डूबी कुछ पल अपनी जगह खड़ी रही. फिर गहरी सांस खींच कर मुसकराई और रसोई की तरफ चल पड़ी. उस दिन औफिस में रवि को 4 परचियां मिलीं. ये उस के लंच बौक्स, पर्स, ब्रीफकेस और रूमाल में रखी थीं. इन सभी पर निशा ने सुंदर अक्षरों में ‘आईलवयू’ लिखा था.

इन्हें पढ़ कर रवि खुश भी हुआ और हैरान भी क्योंकि निशा की यह हरकत उस की समझ से बाहर थी. उस के मन में तो निशा की छवि एक शांत और खुद में सीमित रहने वाली महिला की थी.

रोज की तरह उस दिन भी रवि को औफिस से लौटने में रात के 11 बज गए. उन चारों परचियों की याद अभी भी उस के दिल को गुदगुदा रही थी. उस ने निशा को अपनी बांहों में भर कर पूछा, ‘‘आज कोई खास दिन है क्या?’’ ‘‘नहीं तो,’’ निशा ने मुसकराते हुए

जवाब दिया. ‘‘फिर वे सब परचियां मेरे सामान में क्यों रखी थीं?’’

‘‘क्या प्यार का इजहार करते रहना गलत है?’’ ‘‘बिलकुल नहीं, पर…’’

‘‘पर क्या?’’ ‘‘तुम ने शादी के 2 सालों में पहले कभी ऐसा नहीं किया, इसलिए मुझे हैरानी हो रही है.’’

‘‘तो फिर लगे हाथ एक नई बात और बताती हूं. आप की शक्ल फिल्म स्टार शाहिद कपूर से मिलती है.’’ ‘‘अरे नहीं. मजाक मत उड़ाओ, यार,’’ रवि एकदम से खुश हो उठा था.

‘‘मैं मजाक बिलकुल नहीं उड़ा रही हूं, जनाब. वैसे मेरा अंदाजा है कि आप बन रहे हो. अब तक न जाने कितनी लड़कियां आप से यह बात कह चुकी होंगी.’’ ‘‘आज तक 1 ने भी नहीं कही है यह बात.’’

‘‘चलो शाहिद कपूर नहीं कहा होगा, पर आप के इस सुंदर चेहरे पर जान छिड़कने वाली लड़कियों की कालेज में तो कभी कमी नहीं रही होगी,’’ निशा ने अपने पति की ठोड़ी बड़े स्टाइल से पकड़ कर उसे छेड़ा. ‘‘मैडम, मेरी दिलचस्पी लड़कियों में नहीं, बल्कि पढ़नेलिखने में थी.’’

‘‘मैं नहीं मानती कि कालेज में आप की कोई खास सहेली नहीं थी. आज तो मैं उस के बारे में सब कुछ जान कर ही रहूंगी,’’ निशा बड़ी अदा से मुसकराई और फिर स्टाइल से चलते हुए चाय बनाने के लिए रसोई में घुस गई. उस दिन से रवि के लिए अपनी पत्नी के बदले व्यवहार को समझना कठिन होता चला

गया था. उस रात निशा ने रवि से उस की गुजरी जिंदगी के बारे में ढेर सारे सवाल पूछे. रवि शुरू में झिझका पर धीरेधीरे काफी खुल गया. उसे पुराने दोस्तों और घटनाओं की चर्चा करते हुए बहुत मजा आ रहा था.

वैसे वह पलंग पर लेटने के कुछ मिनटों बाद ही गहरी नींद में डूब जाता था, लेकिन उस रात सोतेसोते 1 बज गया.

‘‘गुड नाइट स्वीट हार्ट,’’ निशा को खुद से लिपटा कर सोने से पहले रवि की आंखों में उस के लिए प्यार के गहरे भाव साफ नजर आ रहे थे.

अगले दिन निशा सैर कर के लौटी तो उस के हाथ में एक बड़ी सी चौकलेट थी. रवि के सवाल के जवाब में उस ने बताया, ‘‘यह मुझे सपना ने दी है. उस का प्रेमी अजय उस के लिए ऐसी 2 चौकलेट लाया था.’’ ‘‘क्या तुम्हें चौकलेट अभी भी पसंद है?’’

‘‘किसी को चौकलेट दिलवाने का खयाल आना बंद हो जाए, तो क्या दूसरे इंसान की उसे शौक से खाने की इच्छा भी मर जाएगी?’’ निशा ने सवाल पूछने के बाद नाटकीय अंदाज में गहरी सांस खींची और अगले ही पल खिलखिला कर हंस भी पड़ी. रवि ने झेंपे से अंदाज में चौकलेट के कुछ टुकड़े खाए और साथ ही साथ मन में निशा के लिए जल्दीजल्दी चौकलेट लाते रहने का निश्चय भी कर लिया.

‘‘आज शाम को क्या आप समय से लौट सकेंगे?’’ औफिस जा रहे रवि की टाई को ठीक करते हुए निशा ने सवाल किया. ‘‘कोई काम है क्या?’’

‘‘काम तो नहीं है, पर समय से आ गए तो आप का कुछ फायदा जरूर होगा.’’ ‘‘किस तरह का फायदा?’’

‘‘आज शाम को वक्त से लौटिएगा और जान जाइएगा.’’ निशा ने और जानकारी नहीं दी तो मन में उत्सुकता के भाव समेटे रवि को औफिस जाना पड़ा.

मन की इस उत्सुकता ने ही उस शाम रवि को औफिस से जल्दी घर लौटने को मजबूर कर दिया था. उस शाम निशा ने उस का मनपसंद भोजन तैयार किया था. शाही पनीर, भरवां भिंडी, बूंदी का रायता और परांठों के साथसाथ उस ने मेवा डाल कर खीर भी बनाई थी.

‘‘आज किस खुशी में इतनी खातिर कर रही हो?’’ अपने पसंदीदा भोजन को देख कर रवि बहुत खुश हो गया. ‘‘प्यार का इजहार करने का यह क्या बढि़या तरीका नहीं है?’’ निशा ने इतराते हुए पूछा तो रवि ठहाका मार कर हंस पड़ा.

भर पेट खाना खा कर रवि ने डकार ली और फिर निशा से बोला, ‘‘मजा आ गया, जानेमन. इस वक्त मैं बहुत खुश हूं… तुम्हारी किसी भी इच्छा या मांग को जरूर पूरा करने का वचन देता हूं.’’ ‘‘मेरी कोई इच्छा या मांग नहीं है, साहब.’’

‘‘फिर पिछले 2 दिनों से मुझे खुश करने की इतनी ज्यादा कोशिश क्यों की जा रही है?’’ ‘‘सिर्फ इसलिए क्योंकि आप को खुश देख कर मुझे खुशी मिलती है, हिसाबकिताब रख कर काम आप करते होंगे, मैं नहीं.’’ निशा ने नकली नाराजगी दिखाई तो रवि फौरन उसे मनाने के काम में लग गया.

रवि ने मेज साफ करने में निशा का हाथ बंटाया. फिर उसे रसोई में सहयोग दिया. निशा जब तक सहज भाव से मुसकराने नहीं लगी, तब तक वह उसे मनाने का खेल खेलता रहा. उस रात खाना खाने के बाद रवि निशा के साथ कुछ देर छत पर भी घूमा. बड़े लंबे समय के बाद दोनों ने इधरउधर की हलकीफुलकी बातें करते हुए यों साथसाथ समय गुजारा.

अगले दिन रविवार होने के कारण रवि देर तक सोया. सैर से लौट आने के बाद निशा ने चाय बनाने के बाद ही उसे उठाया. दोनों ने साथसाथ चाय पी. रवि ने नोट किया कि निशा लगातार शरारती अंदाज में मुसकराए जा रही है. उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या आज भी मुझे कोई सरप्राइज मिलने वाला है?’’

‘‘बहुत सारे मिलने वाले हैं,’’ निशा की मुसकान रहस्यमयी हो उठी. ‘‘पहला बताओ न?’’

‘‘मैं ने अखबार छिपा दिया है.’’ ‘‘ऐसा जुल्म न करो, यार. अखबार पढ़े बिना मुझे चैन नहीं आएगा.’’

‘‘आप की बेचैनी दूर करने का इंतजाम भी मेरे पास है.’’ ‘‘क्या?’’

‘‘आइए,’’ निशा ने उस का हाथ पकड़ा और छत पर ले आई. छत पर दरी बिछी हुई थी. पास में सरसों के तेल से भरी बोतल रखी थी. रवि की समझ में सारा माजरा आया तो उस का चेहरा खुशी से खिल उठा और उस ने खुशी से पूछा, ‘‘क्या तेल मालिश करोगी?’’

‘‘यस सर.’’ ‘‘आई लव तेल मालिश.’’ रवि फटाफट कपड़े उतारने लगा.

‘‘ऐंड आईलवयू,’’ निशा ने प्यार से उस का गाल चूमा और फिर अपने कुरते की बाजुएं चढ़ाने लगी.

रवि के लिए वह रविवार यादगार दिन बन गया.

तेल मालिश करातेकराते वह छत पर ही गहरी नींद सो गया. जब उठा तो आलस ने उसे घेर लिया.

‘‘गरम पानी तैयार है, जहांपनाह और आज यह रानी आप को स्नान कराएगी,’’ निशा की इस घोषणा को सुन कर रवि के तनमन में गुदगुदी की लहर दौड़ गई.

रवि तो उसे नहाते हुए ही जी भर कर प्यार करना चाहता था पर निशा ने खुद को उस की पकड़ में आने से बचाते हुए कहा, ‘‘जल्दबाजी से खेल बिगड़ जाता है, साहब.

अभी तो कई सरप्राइज बाकी हैं. प्यार का जोश रात को दिखाना.’’ ‘‘तुम कितनी रोमांटिक…कितनी प्यारी…कितनी बदलीबदली सी हो गई हो.’’

‘‘थैंक यू सर,’’ उस की कमर पर साबुन लगाते हुए निशा ने जरा सी बगल गुदगुदाई तो वह बच्चे की तरह हंसता हुआ फर्श पर लुढ़क गया. निशा ने बाहर खाना खाने की इच्छा जाहिर की तो रवि उसे ले कर शहर के सब

से लोकप्रिय होटल में आ गया. भर पेट खाना खा कर होटल से बाहर आए तो यौन उत्तेजना का शिकार बने रवि ने घर लौटने की इच्छा जाहिर की. ‘‘सब्र का फल ज्यादा मीठा होता है, सरकार. पहले इस सरप्राइज का मजा तो ले लीजिए,’’ निशा ने अपने पर्स से शाहरुख खान की ताजा फिल्म के ईवनिंग शो के 2 टिकट निकाल कर उसे पकड़ाए तो रवि ने पहले बुरा सा मुंह बनाया पर फिर निशा के माथे में पड़े बलों को देख कर फौरन मुसकराने लगा.

निशा को प्यार करने की रवि की इच्छा रात के 10 बजे पूरी हुई. निशा तो कुछ देर पार्क में टहलना चाहती थी, लेकिन अपनी मनपसंद आइसक्रीम की रिश्वत खा कर वह सीधे घर लौटने को राजी हो गई. रवि का मनपसंद सैंट लगा कर जब वह रवि के पास पहुंची तो उस ने अपनी बांहें प्यार से फैला दीं.

‘‘नो सर. आज सारी बातें मेरी पसंद से हुई हैं, तो इस वक्त प्यार की कमान भी आप मुझे संभालने दीजिए. बस, आप रिलैक्स करो और मजा लो.’’ निशा की इस हिदायत को सुन कर रवि ने खुशीखुशी अपनेआपको उस के हवाले कर दिया.

रवि को खुश करने में निशा ने उस रात कोईर् कसर बाकी नहीं छोड़ी. अपनी पत्नी के इस नए रूप को देख कर हैरान हो रहा रवि मस्ती भरी आवाज में लगातार निशा के रंगरूप और गुणों की तारीफ करता रहा. मस्ती का तूफान थम जाने के बाद रवि ने उसे अपनी छाती से लगा कर पूछा, ‘‘तुम इतनी ज्यादा कैसे बदल गईर् हो, जानेमन? अचानक इतनी सारी शोख, चंचल अदाएं कहां से सीख ली हैं?’’

‘‘तुम्हें मेरा नया रूप पसंद आ रहा है न?’’ निशा ने उस की आंखों में प्यार से झांकते

हुए पूछा. ‘‘बहुत ज्यादा.’’

‘‘थैंक यू.’’ ‘‘लेकिन यह तो बताओ कि ट्रेनिंग कहां से ले रही हो?’’

‘‘कोई देता है क्या ऐसी बातों की ट्रेनिंग?’’ ‘‘विवाहित महिला एक पे्रमी बना ले तो उस के अंदर सैक्स के प्रति उत्साह यकीनन बढ़ जाएगा. कम से कम पुरुषों के मामले में तो ऐसा पक्का होता है. कहीं तुम ने भी तो अपनी उस पार्क वाली सहेली सपना की तरह किसी के साथ टांका फिट नहीं कर लिया है?’’

‘‘छि: आप भी कैसी घटिया बात मुंह से निकाल रहे हो?’’ निशा रवि की छाती से और ज्यादा ताकत से लिपट गई, ‘‘मुझ पर शक करोगे तो मैं पहले जैसा नीरस और उबाऊ ढर्रा फिर से अपना लूंगी.’’ ‘‘ऐसा मत करना, जानेमन. मैं तो तुम्हें जरा सा छेड़ रहा था.’’

‘‘किसी का दिल दुखाने को छेड़ना नहीं कहते हैं.’’ ‘‘अब गुस्सा थूक भी दो, स्वीटहार्ट. आज तुम ने मुझे जो भी सरप्राइज दिए हैं, उन के लिए बंदा ‘थैंकयू’ बोलने के साथसाथ एक सरप्राइज भी तुम्हें देना चाहता है.’’

‘‘क्या है सरप्राइज?’’ निशा ने उत्साहित लहजे में पूछा. ‘‘मैं ने तुम्हारी गर्भनिरोधक गोलियां फेंक

दी है?’’ ‘‘क्यों?’’ निशा चौंक पड़ी.

‘‘क्योंकि अब 3 साल इंतजार करने के बजाय मैं जल्दी पापा बनना चाहता हूं.’’ ‘‘सच.’’ निशा खुशी से उछल पड़ी.

‘‘हां, निशा. वैसे तो मैं भी अब ज्यादा से ज्यादा समय तुम्हारे साथ बिताने की कोशिश किया करूंगा, पर अकेलेपन के कारण तुम्हारे सुंदर चेहरे को मुरझाया सा देखना अब मुझे स्वीकार नहीं. मेरे इस फैसले से तुम खुश हो न?’’ निशा ने उस के होंठों को चूम कर अपना जवाब दे दिया.

रवि तो बहुत जल्दी गहरी नींद में सो गया, लेकिन निशा कुछ देर तक जागती रही. वह इस वक्त सचमुच अपनेआप को बेहद खुश व सुखी महसूस कर रही थी. उस ने मन ही मन अपनी सहेली सपना और उस के प्रेमी को धन्यवाद दिया. इन दोनों के कारण ही उस के विवाहित जीवन में आज रौनक पैदा हो गई थी.

पार्क में जानपहचान होने के कुछ दिनों बाद ही अजय ने सपना को अपने प्रेमजाल में फंसाने के प्रयास शुरू कर दिए थे. सपना तो उसे डांट कर दूर कर देती, लेकिन निशा ने उसे ऐसा करने से रोक दिया.

‘‘सपना, मैं देखना चाहती हूं कि वह तुम्हारा दिल जीतने के लिए क्याक्या तरकीबें अपनाता है. यह बंदा रोमांस करने में माहिर है और मैं तुम्हारे जरीए कुछ दिनों के लिए इस की शागिर्दी करना चाहती हूं.’’

निशा की इस इच्छा को जान कर सपना हैरान नजर आने लगी थी. ‘‘पर उस की शागिर्दी कर के तुम्हें हासिल क्या होगा?’’ आंखों में उलझन के भाव लिए सपना ने पूछा.

‘‘अजय के रोमांस करने के नुसखे सीख कर मैं उन्हें अपने पति पर आजमाऊंगी, यार.

उन्हें औफिस के काम के सिवा आजकल और कुछ नहीं सूझता है. उन के लिए कैरियर ही सबकुछ हो गया है. मेरी खुशी व इच्छाएं ज्यादा माने नहीं रखतीं. उन के अंदर बदलाव लाना मेरे मन की सुखशांति के लिए जरूरी हो गया

है, यार.’’ अपनी सहेली की खुशी की खातिर सपना ने अजय के साथ रोमांस करने का नाटक चालू रखा. सपना को अपने प्रेमजाल में फंसाने को वह जो कुछ भी करने की इच्छा प्रकट करता, निशा उसी तरकीब को रवि पर आजमाती.

पिछले दिनों निशा ने रवि को खुश करने के लिए जो भी काम किए थे, वे सब अजय की ऐसी ही इच्छाओं पर आधारित थे. उस ने कुछ महत्त्वपूर्ण सबक भविष्य के लिए भी सीखे थे. ‘विवाहित जीवन में ताजगी, उत्साह और नवीनता बनाए रखने के लिए पतिपत्नी दोनों को एकदूसरे का दिल जीतने के प्रयास 2 प्रेमियों की तरह ही करते रहना चाहिए,’ इस सबक को उस ने हमेशा के लिए अपनी गांठ में बांध लिया.

‘अपने इस मजनू को अब हरी झंडी दिखा दो,’ सपना को कल सुबह यह संदेशा देने की बात सोच कर निशा पहले मुसकराई और फिर सो रहे रवि के होंठों को हलके से चूम कर उस ने खुशी से आंखें मूंद लीं.

News Story: क्रिकेट और फिक्सिंग का गड़बड़झाला

News Story: अनामिका ने सोचा, ‘मैं ने केक का कोई और्डर नहीं दिया था और न ही किसी और से कहा था, तो फिर यह किस ने सरप्राइज दिया? विजय से तो अभी कहासुनी हुई है. कहीं उसी ने तो यह केक नहीं भिजवाया है?’

अनामिका ने दरवाजा खोला, तो विजय को डिलीवरी बौय की ड्रैस में देख कर हंसने लगी और बोली, ‘‘तुम पागलवागल तो नहीं हो… यह क्या हुलिया बना रखा है. पर, सच कहूं, तो इस ड्रैस में जंच रहे हो…’’

‘‘हो गई तुम्हारी मसखरी. यार, जैसे तुम नाक फुला कर आई हो न, मु झे तो लगा था कि तुम मु झे भगा दोगी. सौरी, मैं ने वह सब कहा, जो तुम से कहना नहीं चाहिए था,’’ विजय ने ईमानदारी के साथ कहा.

‘‘अरे बेबी, ठीक है. बहस अपनी जगह है और रिश्ता अपनी जगह. लेकिन कभी किसी को उस की जाति से जज नहीं करना चाहिए. मु झे दुख हुआ था, क्योंकि तुम ने मानो मेरे पापा की सारी मेहनत को एकदम से ही खारिज कर दिया था.’’

‘‘अनामिका, आई लव यू. चलो, अब मुंह मीठा करते हैं. तुम्हारा फेवरेट केक लाया हूं,’’ विजय बोला.

‘‘हमारी कैफे वाली डेट तो खराब हो गई थी, पर आज यह केक वाली डेट नहीं खराब होनी चाहिए. तुम अंदर आओ. मैं 5 मिनट में तैयार होती हूं. हम यह केक किसी पार्क में खाएंगे. मौसम भी अच्छा है और आज संडे भी है,’’ अनामिका बोली और सीधा अपने बाथरूम में जा घुसी.

थोड़ी देर के बाद अनामिका तैयार हो कर आई, तो उसे याद आया कि विजय तो डिलीवरी बौय की ड्रैस में है. वह बोली, ‘‘चलें, डिलीवरी बौय…’’

‘‘यार, तुम मेरी ज्यादा टांग मत खींचो. वैसे भी पार्क में किस के पास टाइम होगा मेरी ड्रैस पर ध्यान देने का.’’

पर विजय की एक ड्रैस वहां रखी थी. उस ने कपड़े बदल लिए थे. थोड़ी देर के बाद अनामिका और विजय एक बड़े से पार्कनुमा ग्राउंड में बैठे थे. चूंकि छुट्टी का दिन था, तो वहां कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे. वे दोनों एक बैंच पर जा कर बैठ गए और केक का लुत्फ उठाने लगे. रास्ते में उन्होंने कोल्डड्रिंक और कुछ चिप्स भी खरीद लिए थे.

‘‘अनामिका, याद है, जब उस दिन हम दोनों में जाति को ले कर तीखी बहस हुई थी, तब तुम्हारे जाने के बाद मैं ने सुधा दीदी को फोन कर के सब बता दिया था. यह केक लाने का आइडिया उन्हीं का था,’’ विजय ने कहा.

‘‘वही मैं सोचूं कि तुम में तो इतनी अक्ल है नहीं कि मेरे लिए केक ले आओ,’’ अनामिका हंसते हुए बोली.

‘‘वैरी फनी… और मारो ताना,’’ इतना कह कर विजय बच्चों का क्रिकेट मैच देखने लगा.

अनामिका जानती है कि विजय को क्रिकेट बहुत पसंद है. खेलना भी और देखना भी. वह बोली, ‘‘यार, इन बच्चों को देखो. सस्ते से बैट, गेंद भी ज्यादा महंगी नहीं, 3 विकेट और वे भी बिना बेल्स की… फिर भी इन सब के चेहरे ध्यान से देखो… कितना ऐंजौय कर रहे हैं ये सब.’’

‘‘वह सब तो ठीक है, पर जब मैच स्टेडियम में हो, जहां लाखों की भीड़ अपने पसंदीदा खिलाड़ी को चीयर कर रही हो, हर चौकेछक्के पर चीयरलीडर्स डांस कर रही हों, डीजे पर गाने बज रहे हों, तो मजा ही कुछ और आता है,’’ विजय ने अपनी ही धुन में कह दिया.

‘‘ओ हैलो, खेल तो खेल है. ये सामने खेल रहे बच्चे भी वही कर रहे हैं, जो स्टेडियम में स्टार क्रिकेटर करते हैं. वैसे भी मु झे यह खेल समझ ही नहीं आता है. मैदान पर अंपायर मिला कर 15 लोग होते हैं, पर हरकत में या तो गेंदबाज दिखता है या फिर बल्लेबाज. ज्यादा से ज्यादा वह फील्डर, जो बल्लेबाज के शौट पर गेंद उठाने जाता है. बाकी सब तो बुत ही बने खड़े रहते हैं.

‘‘सच कहूं, तो मु झे तो क्रिकेट पसंद ही नहीं है. इस से अच्छे खेल तो हमारे गुल्लीडंडा और पिट्ठू हैं. हर खिलाड़ी चौकस रहता है. थोड़ी ही देर में सब पसीनापसीना.’’

‘‘क्या तुम ने कभी आईपीएल का मैच स्टेडियम में देखा है? माहौल ही अलग होता है, जैसे कोई उत्सव.

नएनए खिलाड़ी एक मैच में बढि़या खेल कर रातोंरात स्टार बन जाते हैं,’’ विजय ने थोड़ा मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘पर, फिर भी मु झे इस खेल से बढि़या तो स्विमिंग लगता है. हर तैराक को अपना बैस्ट देना होता है. सब को बराबर का मौका मिलता है. जो ज्यादा बड़ा और तेज तैराक, वही जीतता है.

‘‘अमेरिका का महान तैराक माइकल फेल्प्स का नाम तो याद होगा ही. उन्होंने ओलिंपिक खेलों में अकेले कुल 28 मैडल जीते हैं. इन में कुल 23 गोल्ड मैडल, 3 सिल्वर मैडल और 2 ब्रौंज मैडल शामिल हैं.

‘‘और सिंक्रोनाइज्ड स्विमिंग तो सुना ही होगा. माइकल फेल्प्स तो अकेला तैराक था, जिस ने अपने दम पर इतना ज्यादा नाम कमाया, पर सिंक्रोनाइज्ड स्विमिंग में तो टीम वर्क होता है. इस में कई तैराकों को संगीत की लय पर पानी में अपनी तैराकी का प्रदर्शन करना पड़ता है, जिस में डांस और जिमनास्टिक शामिल रहते हैं.’’

‘‘तुम क्रिकेट पसंद नहीं करती तो क्या इस की वैल्यू खत्म हो जाती है… इस खेल में पैसा है, नाम है, इज्जत है… और क्या चाहिए किसी को…’’ विजय ने कहा.

‘‘और मैच फिक्सिंग भी… सट्टेबाजी भी… क्यों?’’ अनामिका बोली, ‘‘अभी आईपीएल में भी यही खबर चल रही है. इस पर भी थोड़ी रोशनी डालिए विजय सरजी…’’ अनामिका बोली.

विजय पहले तो चुप रहा, पर अनामिका के ज्यादा जोर देने पर वह बोला, ‘‘खबरों के मुताबिक तो इंडियन प्रीमियर लीग पर मैच फिक्सिंग का साया मंडरा रहा है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने मैच फिक्सिंग के डर को देखते हुए सभी फ्रैंचाइजी मालिकों, खिलाडि़यों और सहयोगी स्टाफ ही नहीं, बल्कि कमेंटेटर्स तक को चेतावनी जारी कर दी है.

‘‘बीसीसीआई की भ्रष्टाचार निरोधक सुरक्षा इकाई का मानना है कि हैदराबाद का एक तथाकथित कारोबारी के सट्टेबाजों से संबंध हैं. ऐसे में कोई भी उस के लालच के झांसे में न आए.

‘‘इतना ही नहीं, उस कारोबारी को टीम के होटलों और मैचों में भी देखा गया है, जहां वह खिलाडि़यों और कर्मचारियों से दोस्ती करने की कोशिश करता है और उन्हें निजी पार्टियों में इनवाइट करता है. ऐसी घटनाएं भी हुई हैं, जब उस ने न केवल खिलाडि़यों को, बल्कि उन के परिवारों को भी उपहार दिए हैं.

‘‘रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि इस शख्स द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफार्म के जरीए विदेश में रहने वाले खिलाडि़यों या कोचों के रिश्तेदारों से संपर्क करने की भी कोशिश की गई है.’’

‘‘पर आईपीएल के छठे सीजन में भी तो एक टीम के प्रदर्शन से ऐसा महसूस हुआ था कि मैच फिक्स किया गया था. यह क्या मामला था?’’ अनामिका ने पूछा.

‘‘अच्छा, वह मामला. आईपीएल के छठे सीजन में मैच फिक्सिंग के आरोप के बाद राजस्थान रौयल्स टीम के 3 खिलाड़ी एस. श्रीसंत, अजीत चंदीला और अंकित चव्हाण को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था.

हालांकि, लीग तो चलती रही थी, लेकिन राजस्थान रौयल्स पर 2 साल का बैन लगा था. खिलाडि़यों को कोर्ट से लंबी लड़ाई के बाद क्लीन चिट मिल गई थी, लेकिन उस के बाद उन का कैरियर चौपट हो गया था.

‘‘चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक एन. श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन पर भी धोखाधड़ी के आरोप लगे थे. इस के चलते इस टीम पर 2 साल का बैन भी लगा था. हालांकि, बाद में कोर्ट ने इस मामले में भी क्लीन चिट दे दी थी.’’

‘‘इस बार भी राजस्थान रौयल्स टीम पर आरोप लगे हैं. राजस्थान क्रिकेट संघ की तदर्थ समिति के संयोजक जयदीप बिहानी ने टीम पर मैच फिक्सिंग में शामिल होने का आरोप लगाया था,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘यह खबर भी आई थी. इंडियन प्रीमियर लीग की फ्रैंचाइजी राजस्थान रौयल्स टीम लखनऊ सुपर जायंट्स के खिलाफ चौंकाने वाली हार के बाद विवादों में घिर गई थी.

‘‘मैच नंबर 36 में 181 रनों के टारगेट का पीछा करते हुए संजू सैमसन की अगुआई वाली टीम को आखिरी ओवर में जीत के लिए सिर्फ 9 रन चाहिए थे और उस के पास 6 विकेट भी हाथ में थे, लेकिन सभी को चौंकाते हुए टीम 2 रन से मुकाबला हार गई थी.

‘‘इस से पहले भी राजस्थान रौयल्स टीम दिल्ली कैपिटल्स के खिलाफ एक और मैच में आखिरी ओवर में 9 रन नहीं बना सकी थी, जबकि 7 विकेट बाकी थे. राजस्थान रौयल्स यह मुकाबला सुपर ओवर में हार गई थी.

‘‘पर मैच फिक्सिंग के आरोप लगने से क्रिकेट की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है. आज भी लोग क्रिकेट मैच देखने के लिए हजारों रुपए खर्च करते हैं,’’ विजय बोला.

‘‘पर, यह गलत है. खेल मनोरंजन के लिए होता है. और अगर कोई मैच फिक्स है या उस पर सट्टा लग रहा है, तो यह खेल प्रेमियों के साथ चीटिंग है. उन्हें भरमाया जा रहा है. खेल पर पैसा हावी है और यह क्रिकेट की साख पर बट्टा लगा रहा है,’’ अनामिका बोली और विजय के पास से उठ कर उन बच्चों के पास जा बैठी, जो उस क्रिकेट मैच का मजा ले रहे थे. उन बच्चों में से एक मायूस बैठा था. अनामिका ने उस से पूछा, ‘‘क्या हुआ? तुम्हें क्रिकेट देखना पसंद नहीं है क्या?’’

वह बच्चा बोला, ‘‘ऐसा नहीं है दीदी, पर ये बड़े बच्चे मुझे खेलने का मौका ही नहीं देते हैं. हर रविवार को बुला लेते हैं, पर सिर्फ फील्डिंग करा कर भगा देते हैं. न बल्लेबाजी करने देते हैं और न ही गेंदबाजी.’’

इतने में एक बल्लेबाज ने एक ऐसा जोरदार शौट लगाया कि गेंद सीधा अनामिका के कंधे पर आ कर लगी. वह दर्द से बिलबिला उठी.

बल्लेबाज ने वहीं से कहा, ‘‘सौरी दीदी…’’

पर तब तक विजय भागता हुआ उस बल्लेबाज के पास पहुंच गया और उस का कान उमेठते हुए बोला, ‘‘खेलने की तमीज नहीं है. भला कोई इतनी तेज शौट मारता है क्या…’’

वह लड़का शर्मिंदा हो कर बोला, ‘‘भैया, मैं ने जानबू झ कर नहीं मारा.’’

इतने में अनामिका भी वहां पहुंच गई और विजय से बोली, ‘‘बच्चे को क्यों डांट रहे हो? अपनी भड़ास इस पर मत निकालो. खेल में तो छोटीमोटी चोट लगती रहती है. तुम इन्हें धमका कर इन सब का खेल मत खराब करो.’’

‘‘तुम्हारा दर्द कैसा है अब?’’ विजय ने पूछा.

‘‘तुम्हारी इस हरकत ने और बढ़ा दिया है. तुम्हें बच्चे को नहीं डांटना चाहिए था. मैं जा रही हूं,’’ इतना कह कर अनामिका वहां से जाने लगी.

विजय को लगा कि इतनी मुश्किल से तो अनामिका मानी थी, पर अब फिर नाराज हो गई है. वह उस के पीछे भागा और उस बच्चे से बोला, ‘‘सौरी, तुम सब खेलो. पर, आगे से ध्यान रखना कि किसी को चोट न लगे.’’

वह लड़का बोला, ‘‘कोई बात नहीं भैया, आप पहले दीदी को मनाओ. कहीं आप क्लीन बोल्ड न हो जाओ.’’

उस लड़के के इतना कहते ही बाकी बच्चे भी हंसने लगे. यह बात अनामिका ने भी सुन ली थी. वह मुसकराई जरूर, पर पलट कर नहीं देखा.

Funny Story: स से सरकारी शिक्षक, स से सत्यानाश

Funny Story: शर्माजी दिल्ली से पटना जाने वाली ट्रेन में सवार हुए. विंडो सीट पर बैठा साथी मुसाफिर हथेली पर खैनी रगड़ रहा था. तय समय पर ट्रेन चल पड़ी. थोड़ी देर बाद उस साथी मुसाफिर ने शर्माजी से बातचीत करना शुरू कर दिया और बीचबीच में खैनी मिले थूक को खिड़की से बाहर ट्रांसफर कर रहा था.

नाम, पता और मंजिल की जानकारी लेने के बाद वह साथी मुसाफिर पूछ बैठा, ‘‘और बताइए शर्माजी, क्या करते हैं आप?’’

शर्माजी ने कहा, ‘‘भाई, आज की तारीख में धरती पर कौन सा ऐसा काम है, जो हम नहीं करते.’’

साथी मुसाफिर ने चौंकते हुए पूछा, ‘‘आप का मतलब…?’’

शर्माजी ने बताया, ‘‘भाई साहब, हम लोगों के घर जाजा कर उन के परिवार की पूरी जानकारी जमा करते हैं. मसलन, परिवार में कितने लोग हैं, उन की उम्र, पढ़ाईलिखाई वगैरह…’’

साथी मुसाफिर ने बीच में टोकते हुए कहा, ‘‘अजी, हम सम झ गए… आप जनगणना महकमे में काम करते हैं.’’

शर्माजी ने हलकी मुसकान बिखेरते हुए कहा, ‘‘अरे, नहीं भाई. कैंप लगा कर कभी बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाते हैं, तो कभी अपने संस्थान में पेट के कीड़ों की गोली, एनीमिया की गोली, तो कभी हैपेटाइटिस का टीका भी लगवाते हैं.’’

साथी मुसाफिर तपाक से बोला, ‘‘सम झ गए, आप हैल्थ महकमे में कंपाउंडर हैं.’’

शर्माजी दोबारा मुसकराते हुए बोले, ‘‘अभी भी आप नहीं सम झे… हम न छोटेछोटे बच्चों को अपने संस्थान में दोपहर में मुफ्त भोजन करवाते हैं,

हर साल कपड़े, साइकिल वगैरह भी बांटते हैं…’’

साथी मुसाफिर ने बीच में टोकते हुए कहा, ‘‘तो ऐसा बोलिए न कि आप एनजीओ चलाते हैं. वाकई, बड़ा नेक काम कर रहे हैं भाई आप.’’

शर्माजी खिलखिला कर हंसते हुए बोले, ‘‘भैया, हम कोई एनजीओ या रिलायंस जियो नहीं चलाते हैं. हम तो संस्थान के लिए कपड़ा, चावल, अंडा, कौपीकिताब, जूताचप्पल, राजमा वगैरह की खरीदारी करते हैं और उस का हिसाबकिताब रखते हैं.’’

वह साथी मुसाफिर फिर बोला, ‘‘अच्छाअच्छा, आप अकाउंटैंट हैं.’’

शर्माजी भी अपनी गरदन हिलाते हुए बोले, ‘‘नहीं, वह भी नहीं हैं. दरअसल, मैं पंचायत चुनाव, विधानसभा चुनाव से ले कर संसदीय चुनाव तक करवाता हूं.’’

साथी मुसाफिर मुसकराते हुए बोला, ‘‘तो ऐसे बोलिए न महाराज कि इलैक्शन कमीशन में काम करते हैं.’’

शर्माजी फिर बोले, ‘‘न… अभी भी आप नहीं सम झ पाए. हम वह भी नहीं हैं. वैसे, हम छात्रों को हर महीने स्कौलरशिप भी बांटते हैं.’’

साथी मुसाफिर ने चौंकते हुए कहा, ‘‘कहीं आप जनकल्याण महकमे में बड़े अफसर तो नहीं हैं…’’

शर्माजी ने गरदन उचकाते हुए कहा, ‘‘अरे नहीं भाई, बड़ा अफसर बनना हमारे नसीब में कहां… वैसे, कभीकभी हम अपने हक के लिए सरकार के खिलाफ मोरचा खोल कर अधनंगा आंदोलन भी करते हैं. हालांकि, इस के एवज में हम पुलिस की लाठियां भी खा लेते हैं.’’

साथी मुसाफिर ने सिर खुजाते हुए कहा, ‘‘मतलब, आप या तो क्रांतिकारी हैं या फिर समाजसेवी…’’

शर्माजी तल्ख शब्दों में बोले, ‘‘कमाल करते हैं भाई, क्या मैं आप को असामाजिक तत्त्व दिख रहा हूं? आप की जानकारी के लिए मैं बता दूं कि असामाजिक तत्त्वों और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कभीकभी हमें दंडाधिकारी भी बनना पड़ता है.’’

साथी मुसाफिर हैरानी से देखते हुए बोला, ‘‘तो फिर आप किसी कोर्ट में मजिस्ट्रेट हैं…’’

शर्माजी ने यह सुन कर भी ‘न’ के संकेत में मुंह बनाया.

साथी मुसाफिर ने झुं झलाते हुए कहा, ‘‘गजब है जनाब, आप तो अपनेआप में एक पहेली हैं जी. आखिर आप किस महकमे में और किस पद पर काम करते हैं भाई?’’

शर्माजी ने लंबी सांस लेते हुए कहा, ‘‘देखिए, जब हम इन कामों से फ्री होते हैं, तो कभीकभी बच्चों को पढ़ालिखा भी देते हैं.’’

साथी मुसाफिर खैनी को खिड़की से बाहर थूकते हुए धीरे से कहा, ‘‘मतलब, कहीं आप सरकारी स्कूल मास्टर…’’

शर्माजी ने उस आदमी के कंधे पर हाथ रख कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘एकदम सही पकड़े हैं आप. दरअसल, मैं ‘शिक्षक दिवस’ पर हुए एक कार्यक्रम में सम्मानित होने के लिए दिल्ली आया था.’’

Hindi Story: एक अंबर सूना सा

Hindi Story: ‘‘अंबर, क्या कह रहे हो तुम… बहू को तलाक चाहिए… पर अभी तुम्हारी शादी को तो सिर्फ 4 महीने ही हुए हैं,’’ मां ने हैरान होते हुए कहा.

‘‘आप लोगों के कहने पर मैं ने शादी कर ली थी, पर अब दिल्ली की एक लड़की यहां इस छोटे से शहर में खुश नहीं रह पा रही है, तो मैं क्या करूं,’’ अंबर ने झल्लाते हुए कहा.

‘‘ठीक है, मैं बहू से बात करती हूं… देखती हूं कि माजरा क्या है,’’ मां ने कहा और अंदर चली गईं.

दिल्ली से 800 किलोमीटर की दूरी पर तराई के इलाके में बसा हुआ यह छोटा सा शहर था. यहां पर गन्ने की फसल ज्यादा होने के चलते लोग इसे ‘चीनी का कटोरा’ भी कहते थे.

इस जगह पर आज से 20 साल पहले देव रायजादा ने एक इंगलिश मीडियम स्कूल की स्थापना की थी और इसी जगह को अपनी कर्मभूमि भी बनाया था.

अच्छे स्कूलों की कमी के चलते देव रायजादा का ‘स्टार इंटरनैशनल स्कूल’ खूब चलने लगा था और देव रायजादा ने इस छोटी सी जगह पर अच्छा मुकाम हासिल कर लिया था.

देव रायजादा के 2 बेटे थे. बड़े बेटे का नाम अंबर और छोटे बेटे का नाम धीरज था. दोनों की पढ़ाईलिखाई नैनीताल में हुई थी. जब बड़ा बेटा अंबर नैनीताल में मैनेजमैंट का कोर्स पूरा कर के आया, तो देव रायजादा ने अपना स्कूल का बिजनैस उसे सौंपने में जरा भी देर नहीं की.

इस के बाद अंबर ने स्कूल में कई मौडर्न बदलाव किए. पहले से बेहतर स्टाफ बहाल किया और कुछ दिनों में ही ‘स्टार इंटरनैशनल स्कूल’ की गिनती शहर के ही नहीं, बल्कि पूरे जिले के अच्छे स्कूलों में होने लगी.

स्कूल चलने लगा, तो देव रायजादा निश्चिंत हो गए और अंबर की शादी के लिए लड़की तलाशने लगे. अब अगर लड़का अच्छी पढ़ाई कर के आया है, तो लड़की भी पढ़ीलिखी और ऊंचे घराने की होनी चाहिए.

अंबर ने शादी के लिए बहुत नानुकर भी की, पर देव रायजादा को अपने बेटे की शादी कराने की बड़ी हसरत थी, इसलिए अंबर भी कुछ कह न सका.

अंबर की शादी दिल्ली से हुई थी. लड़की विद्या भी बड़े घराने से थी. विदाई के बाद वह ससुराल आ गई.

जहां ससुराल आने के बाद लड़की के चेहरे पर चमक आनी चाहिए, वहां विद्या का चेहरा मुरझाने लगा.

सभी घर के लोगों ने भी इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि शादी के बाद पहली बार ससुराल आने पर थोड़ाबहुत एडजस्ट करने में समय तो लगता ही है.

पर आज अचानक से बहू के द्वारा तलाक दिए जाने की बात ने सब को हिला कर रख दिया था, पर अंबर अब भी सामान्य ही दिख रहा था.

मां ने जब बहू से तलाक की वजह जाननी चाही, तो उस ने नपेतुले शब्दों में उन से यह कह दिया, ‘‘तलाक के पीछे की वजह आप अपने बेटे से ही पूछिएगा,’’ कह कर विद्या अपने मायके जाने की तैयारी करने लगी.

सब को लग रहा था कि हो सकता है कि पतिपत्नी में कोई ?ागड़ा हुआ हो और बहुत मुमकिन है कि विद्या वापस आ जाए, पर काफी समय बीतने के बाद भी विद्या तो नहीं आई, अलबत्ता तलाक के लिए उस के वकील का फोन जरूर आ गया.

तलाक देने के लिए अंबर भी उत्सुक दिखा. इस तरह अंबर और विद्या में तलाक हो गया.

कितने नाजों से अंबर की शादी कराई थी देव रायजादा ने और शादी के बाद इतनी जल्दी बेटे का तलाक हो जाने से देव रायजादा और उन की पत्नी बहुत दुखी हो रहे थे. पूरे कसबे में उन की किरकिरी हो रही थी.

अपनी पूरी जिंदगी में देव रायजादा ने औरतों को दोयम दर्जे की निगाह से ही देखा था और अपने स्कूल में
काम करने वाली हर औरत का जिस्मानी और दिमागी शोषण करने में भी देव रायजादा का कोई सानी नहीं था.

स्कूल के होस्टल में महिला वार्डन के पद पर जो भी महिला आती, देव रायजादा उस से पहले तो बहुत शालीनता से पेश आते, फिर धीरेधीरे उस से हंसीठिठोली और मजाक का मौका देख कर उसे अपनी हवस का शिकार बना लेते.

अगर महिला वार्डन को अपना जिस्मानी शोषण कराना मंजूर होता, तो वह चुपचाप काम करती रहती और अगर कोई इस के खिलाफ आवाज उठाती तो देव रायजादा उस पर ?ाठे आरोप लगा कर उसे नौकरी से ही निकाल देते थे.

कुछ इस तरह की नजर देव रायजादा रखते थे अपने महिला स्टाफ पर और आज उसी का लड़का ऐसा नकारा निकेलगा, जिस से अपनी एक खूबसूरत बीवी भी नहीं संभाली जाएगी, यह बात देव रायजादा के लिए बहुत बेइज्जती वाली थी.

एक तरफ तो देव रायजादा कसबे के एक इज्जतदार आदमी के रूप में अपनेआप को दिखाते थे, तो वहीं दूसरी तरफ उन का असली चेहरा एक ऐयाश का था, पर उन की बीवी मालिनी उतनी ही अंधविश्वासी और तंत्रमंत्र में यकीन करने वाली थीं. अपने विशाल भवन में वास्तु के आधार पर कुछ न कुछ तोड़फोड़ कराना व साधु और तांत्रिकों को अनुष्ठान के नाम पर घर पर बुलवाना और कुछ न कुछ देते रहना देव रायजादा के परिवार का पसंदीदा काम था.

‘‘देखो, हमारा अंबर कितना हैंडसम है. शादी में घोड़ी पर बैठा हुआ कितना बांका जवान लग रहा था. मैं तो कहती हूं कि हो न हो, उसे किसी की बुरी नजर लग गई है,’’ मालिनी ने अपने पति देव रायजादा से चिंता जाहिर की, तो उन की हां में हां मिलाते हुए देव रायजादा भी सोच में पड़ गए.

‘‘आप कहें तो हम एक तांत्रिक को बुला कर अंबर की बुरी नजर उतरवा दें, ताकि उस की जिंदगी भी दोबारा पटरी पर आ सके?’’ मालिनी ने कहा, तो देव रायजादा भी उन का खुल कर विरोध नहीं कर सके. उस दिन सुबह से ही मालिनी और देव रायजादा ज्यादा जोश में नजर आ रहे थे. होते भी क्यों न, आज उन के यहां एक बड़े तांत्रिक जो आने वाले थे… स्वर्णकांत महाराज.

इन तांत्रिक का रुतबा और अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती थी, क्योंकि ये एक ‘पुण्यात्मा’ नाम के टैलीविजन चैनल पर आते थे और देखने वालों को तंत्रमंत्र की जानकारी देते थे.

पूरे घर में स्वर्णकांत महाराज के लिए खास इंतजाम किए गए थे. गुरुजी के लिए फूस की एक कुटिया बना दी गई थी, पर उन्हें गरमी न लग जाए, इसलिए उसी कुटिया में एक एयरकंडीशनर लगा दिया गया था और नौकरचाकरों को भी उन की सेवा में रहने के लिए आदेश दे दिया गया था.

ये कोई ऐसे तांत्रिक नहीं थे, जो हवनकुंड के सामने बैठ कर धुएं में कुछ नशीली चीज मिला कर लोगों को ठगते हों, बल्कि तांत्रिक स्वर्णकांत का लोगों को ठगने का तरीका कुछ मौडर्न सा था.

तांत्रिक स्वर्णकांत लोगों का हाथ पकड़ते, उन से कुछ सवाल पूछते और उस के बारे में सबकुछ जान लेने का दावा करते थे. अंबर को भी आज शाम को उन के पास लाया जाना था.

अपनी फूस की झांपड़ी में आंखों को बंद किए हुए स्वर्णकांत महाराज बैठे हुए थे. रायजादा दंपती अपने बेटे अंबर को ले कर आए और तांत्रिक को प्रणाम करते हुए अंबर को उन के पास जाने को कहा.

तांत्रिक स्वर्णकांत ने अंबर की ओर देखा, उस का दायां हाथ अपने हाथ में पकड़ा और कुछ देर तक बुदबुदाने का नाटक किया और रायजादा दंपती की ओर देख कर बोले, ‘‘अंबर कुछ परेशान है. इसे कुछ समय चाहिए. मैं इसे कुछ क्रियाएं बता दूंगा, जिन्हें करने से इसे आराम मिलेगा.’’

‘‘पर स्वामीजी, शादी के 4 महीने बाद ही बहू का इस तरह मेरे बेटे से मोह भंग हो जाना कैसे हुआ?’’ देव रायजादा ने हाथ जोड़ते हुए पूछा.

‘‘कुलटा थी वह…’’ स्वर्णकांत ने थोड़ा गुस्सा होते हुए कहा, ‘‘किसी दूसरे मर्द के चक्कर में थी तेरी बहू… वह भी एक शादीशुदा मर्द के साथ, इसीलिए तेरे इस राजमहल जैसे घर में भी उसे अच्छा नहीं लगा और वह भाग गई.’’

अपनी बहू के बारे में ऐसी बातें सुन कर रायजादा दंपती सन्न रह गए और दांतों तले उंगली दबाने लगे.

‘‘चलो, अच्छा हुआ, जो ऐसी लड़की से पिंड छूट गया,’’ मालिनी ने धीरे से कहा.

तकरीबन एक हफ्ते तक तांत्रिक स्वर्णकांत ‘रायजादा हाउस’ में रुके और उन की तमाम तरह की समस्याओं का कुछ न कुछ हल बताते रहे. जाते समय पूरे 5 लाख रुपए का चैक देव रायजादा ने स्वर्णकांत महाराज के चरणों में अर्पित कर दिया.

स्वर्णकांत महाराज ने जातेजाते यह भी बताया कि ‘रायजादा हाउस’ में पौजिटिव ऊर्जा की कमी है, इसीलिए उन पर आएदिन कुछ न कुछ संकट आता रहता है. इस पौजिटिव एनर्जी को बढ़ाने के लिए अपने घर के बीचोंबीच एनर्जी बढ़ाने वाले लाल रंग के बड़ेबड़े पत्थर लगवाने होंगे, जो सिर्फ स्वर्णकांत के आश्रम में ही अभिमंत्रित किए जाते हैं.

स्वर्णकांत ने यहां से पहुंचते ही उन पत्थरों को तैयार कर के देव रायजादा को भेजने की बात कह दी और स्वर्णकांत के एक चेले ने उन पत्थरों को अभिमंत्रित कर के यहां तक भेजने का खर्चा साढ़े 3 लाख रुपए बताया, जिस का भुगतान भी बड़ी ही श्रद्धा के साथ चैक के रूप में देव रायजादा ने तुरंत ही कर दिया था.

अगले कुछ महीनों में देव रायजादा ने अंबर के अंदर कुछ पौजिटिव से बदलाव होते देखे. अब अंबर ने अपनी जिंदगी को थोड़ा संवारने की कोशिश की थी और अपनेआप को स्कूल के कामकाजों में बिजी कर लिया था.

अंबर के पापा को उस का यह बदला हुआ रूप देख कर बहुत अच्छा लग रहा था और वे मन ही मन एक बार फिर से अंबर की शादी बड़े ही धूमधाम से कराने की बात सोच रहे थे.

देव रायजादा इस बार एक ऐसी बहू लाना चाहते थे, जो कम पैसे वाली हो, ताकि इस घर में अपना मुंह न खोल सके और हर हाल में रहने को तैयार रहे.

इस बाबत उन्होंने सब से पहले अपने गुरुजी से बात की और उन्हें बताया कि वे अंबर के लिए एक लड़की ढूंढ़ रहे हैं.

इतना सुनते ही तांत्रिक स्वर्णकांत ने उन्हें तुरंत अपने एक भक्त की लड़की के बारे में बताते हुए कहा कि वे उस के पूरे परिवार को जानते हैं और लड़की व परिवार बहुत शालीन है और अंबर के साथ जोड़ी एकदम परफैक्ट रहेगी.

अंबर को लड़की की तसवीर दिखाई गई, पर वह अब भी शादी करने के लिए राजी नहीं था. देव रायजादा ने समझा कि एक बार शादी नाकाम हो जाने के चलते बेटा दोबारा शादी करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है, पर धीरेधीरे नई बहू सब सही कर देगी, ऐसा मान कर स्वर्णकांत द्वारा बताई गई लड़की के साथ शादी की बात आगे बढ़ानी शुरू कर दी गई.

ठीक उसी दौरान देश में कोरोना की दूसरी लहर आई, जिस में लौकडाउन लगा दिया गया और शादी जैसे कार्यक्रमों में भीड़ के जमा होने पर भी रोक लगा दी गई.

देव रायजादा इस बात से परेशान हो उठे, क्योंकि वे अपने लड़के की शादी बड़े ही धूमधाम से करना चाहते थे. उन की यह परेशानी दूर करते हुए स्वर्णकांत ने कहा कि वरवधू एक सादा समारोह में तंत्र विद्या से शादी कर लेंगे और तांत्रिक स्वर्णकांत के चारों ओर फेरे ले लेंगे तो शादी हो जाएगी.

तांत्रिक के रंग में रंगे हुए रायजादा दंपती को भला इस से अच्छी बात और क्या लग सकती थी. स्वर्णकांत के बताए मुताबिक ही अंबर की शादी रूही नाम की लड़की से हो गई. इस शादी में घर के लोगों को छोड़ कर और किसी को न्योता नहीं दिया गया था.

शादी के बाद देव रायजादा ने अंबर और रूही से हनीमून पर जाने को कहा, तो रूही तपाक से बोल पड़ी, ‘‘पापाजी, ये हनीमून वगैरह तो अंगरेजों के चोंचले हैं. हमें तो यहां रह कर आप लोगों की सेवा करनी है बस.’’

नईनवेली बहू के इस तरह से प्यार जताने पर रायजादा दंपती बहुत खुश हुए.

रूही दूसरी बहुओं की तरह शरमा कर घर के अंदर बैठने वाली नहीं थी, बल्कि उस ने तो स्कूल के कामों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना भी शुरू कर दिया था और बहुत जल्दी ही वह सारा कामकाज भी समझ गई थी.

रूही की लगन और टैलेंट को देख कर देव रायजादा ने उसे स्कूल का मैनेजिंग डायरैक्टर बना दिया था.

इस दौरान कई बार तांत्रिक स्वर्णकांत भी अपनी मरजी से ‘रायजादा हाउस’ में आता और अपनी एसी वाली कुटिया में कई दिन तक रहता. देव रायजादा खुश थे कि गुरुजी का आशीर्वाद भी उन्हें भरपूर मिल रहा है.

अंबर की दूसरी शादी हुए तकरीबन 7 महीने बीत गए थे. रात के 11 बजे होंगे. अंबर अपने मम्मीपापा के पास आया. वह बहुत परेशान सा लग रहा था. उस ने अपने पापा की ओर देखा और बताया, ‘‘पापा, वह बात ऐसी है कि रूही पेट से हो गई है.’’

‘‘अरे वाह, यह तो बड़ी खुशी की बात है,’’ देव रायजादा अंबर को गले लगाने के लिए आगे बढ़े, तो अंबर दो कदम पीछे हट गया, ‘‘पर पापा, दिक्कत वह नहीं है.’’

‘‘अरे, इस में दिक्कत की क्या बात है, मेरा शेर आज पापा बन गया है. यह तो खुशी की बात है.’’

‘‘नहीं पापा, मैं इस बच्चे का बाप नहीं हूं, बल्कि मैं तो बाप बन ही नहीं सकता, क्योंकि मैं गे हूं,’’ कह कर अंबर ने अपना सिर नीचे ?ाका लिया था और उस का स्वर भी एकदम धीमा पड़ गया था.

‘‘तो फिर उस बच्चे का बाप कौन है? तुम ने यह बात मुझे पहले क्यों नहीं बताई?’’ देव रायजादा ने पूछा, तो अंबर ने उन्हें बताया कि वह तो पहले ही उन्हें सब सच बताना चाहता था, पर आप ने सुनने की कोशिश ही नहीं की. अपनी पहली बीवी को जिस दिन अंबर ने यह राज बताया था, वह उसी दिन उसे छोड़ कर चली गई थी.

‘‘पर, गुरुजी तो कह रहे थे कि वह कुलटा है,’’ मां ने कहा.

गुरुजी का नाम आने पर अंबर ने कहना शुरू किया, ‘‘दरअसल, आप लोग जब उस दिन मुझे गुरुजी के सामने ले कर गए थे और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा था, तभी मैं ने अपने बारे में उन्हें सब सचसच बता दिया था, जिस को सुनने के बाद उन्होंने मुझे निश्चिंत करते हुए कहा था कि मैं चिंता नहीं करूं, वे अपनी शक्ति से मुझे सही कर देंगे और जैसा वे कहते हैं, मैं वैसा ही करता चलूं,’’ कहते हुए अंबर की आंखों में आंसू तैरने लगे थे.

‘‘फिर तो तुम्हारे गे होने की बात गुरुजी को हम लोगों को भी बतानी चाहिए थी. शायद हम लोग तुम पर दूसरी शादी का दबाव ही नहीं डालते,’’ पापा ने कहा.

‘‘हमें अभी चल कर गुरुजी से इन सारी बातों और समस्याओं का हल पूछना होगा और फिर यह भी जानना होगा कि जब वह बच्चा तुम्हारा नहीं है, तो भला किस का है?’’ मां ने कहा.

वे तीनों स्वर्णकांत महाराज की कुटिया की ओर चल दिए, पर कुटिया के पास पहुंच कर उन्हें ठिठक जाना पड़ा, क्योंकि अंदर से रूही की आवाज आ रही थी, ‘‘मान गई तुम को… कितनी आसानी से इन पढ़ेलिखे और पैसे वाले लोगों को अंधविश्वास के चक्कर में फंसा कर बेवकूफ बनाते हो…

‘‘मैं ने अंबर के बैंक अकाउंट को खाली कर दिया है. जल्दी बताओ, अब हमें और क्या करना है?’’

बाहर खड़े रायजादा परिवार के कान यह सुनते ही सन्न रह गए थे.

‘‘करना क्या है मेरी मैना… यहां से सबकुछ बटोर कर किसी और मुरगे को तलाशना है, जो पैसे वाला भी हो और अंधविश्वासी भी. आखिर तुम्हें मेरे होने वाले बच्चे के लिए पैसे भी तो चाहिए,’’ स्वर्णकांत के बोलने का लहजा एकदम बदला हुआ था.

इतना सब सुनने के बाद अब और सहन कर पाने की ताकत देव रायजादा में नहीं थी. वे अंदर घुस गए और अपनी पिस्तौल स्वर्णकांत पर तान कर बोले, ‘‘मैं सब समझ गया. यह सब तुम दोनों का बनाबनाया खेल है. मैं अभी पुलिस को बुलाता हूं और तुम दोनो का गंदा खेल खत्म कराता हूं.’’

देव रायजादा कुछ और बोलते, इस से पहले ही स्वर्णकांत उलटा उन्हें ही धमकी देते हुए बोला कि अगर वे पुलिस को बुलाएंगे तो उन की ही बदनामी होगी कि उन का लड़का गे है और उन की बहू के पेट में एक तांत्रिक का बच्चा पल रहा है.

स्वर्णकांत महाराज की इस बात पर देव रायजादा खामोश ही रहे. इतना ही नहीं, अपनी इज्जत बचाने के लिए देव रायजादा को 10 लाख रुपए और देने पड़े.

Hindi Story: सवा किलो चांदी

Hindi Story, लेखक – सी. दुबे

आएदिन की कलह से ग्यारसीबाई तंग आ गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे और क्या न करे. अपने घर वाले को वह पचासों बार समझा चुकी थी, मगर वह सवा किलो चांदी को भूल ही नहीं पाता था. जब देखो, तब ग्यारसीबाई को ताना मारता रहता था, ‘‘चिराग ले कर ढूंढ़ने पर भी ऐसे अक्लमंद कहीं नहीं मिलेंगे. सवा किलो चांदी अपने हाथ से उतार कर दे दी. चोरडाकू को भी लोग इतने सस्ते में नहीं निबटाते.’’

ऐसे तानों से तिलमिला कर ग्यारसीबाई ने बारबार कैफियत दी थी, ‘‘मुझे क्या पता था कि मां जाया सगा भाई ही मुझे लूट लेगा. मैं ने तो भोलेपन में अपने बदन के सारे गहने उतार कर उसे दे दिए थे.

‘‘उस ने कहा था, ‘बाई, तेरे ये गहने मैं जल्दी ही छुड़वा दूंगा. अभी मेरे गले की यह फांसी तू निकलवा दे.

इन गहनों को गिरवी रख कर बैंक का कर्ज जमा कर देने दे, नहीं तो घर पर कुर्की आ जाएगी. घर, जमीन सब नीलाम हो जाएंगे. बापदादा की लाज अब तेरे हाथ में है.’

‘‘मैं ने बाप के घर की लाज रखने को उस मुए को सारे गहने दे दिए थे. मुझे क्या पता था कि वक्त निकल जाने पर वह तोते की तरह आंखें फेर लेगा. मैं ने आफत जान कर भाई के गले की फांसी निकाली. मुसीबत के वक्त एकदूसरे की मदद करते ही हैं. मुझे क्या पता था कि होम करते हाथ जलेंगे?

‘‘उस मुए के पेट में ‘पाप’ था. वह कुछ सालों तक मुझे झांसा देता रहा. कहता रहा कि इस साल हाथ तंग है, फसल बिगड़ गई. आते साल तेरे गहने छुड़ा दूंगा. आते साल भी उस ने ऐसा ही बहाना कर दिया. इसी तरह 3-4 साल निकल गए. बाद में उस ने कह दिया कि तेरे गहने तो साहूकार के यहां डूब गए, ब्याज ही ब्याज में गल गए.

‘‘मैं ने तकाजा किया कि डूब गए तो दूसरे बनवा कर दे. मुझे तो अपनी सवा किलो चांदी चाहिए. तब मुए ने हाथ खड़े कर दिए. वह बोला, ‘सवा किलो चांदी तो 100 बरस में भी मुझ से नहीं दी जाएगी.’

‘‘तो क्या बाप के दिए गहने तू खा जाएगा? तब मुए ने बेशरम की तरह जवाब दे दिया था, ‘मैं ने कहां खाए? तेरे गहने तो साहूकार खा गया.’

‘‘मैं ने जब ज्यादा ही तकाजा शुरू किया, तो उस ने साफ कह दिया था, ‘गहनों का नाम मत ले. समझ ले, दादा ने दिए ही नहीं थे.’

‘‘उस के इन छक्केपंजों से मैं समझ गई थी कि उस की नीयत खराब है, इसलिए मैं ने भी साफसाफ कह दिया था, ‘देख बाबू, मेरी सवा किलो चांदी तो तुझे हर हालत में देनी होगी. मेरे घर वाले मेरी नाक में दम कर रहे हैं.’

‘‘मगर, उस बेशरम के पास तो बस एक ही जवाब था, ‘नहीं हैं मेरे पास. जब होंगे, तब दे दूंगा.’

‘‘मैं खूब रोई, गिड़गिड़ाई, मांबाप की बेइज्जती होने की बात कही, मगर वह बेईमान टस से मस न हुआ. मेरी भौजाई ने तो मुझे धक्के दे कर घर से बाहर निकाल दिया.

‘‘जिस भाई को ‘बीरबीर’ कह के इतराती रही, वह मुआ देखता रहा. अपनी औरत को उस ने नहीं टोका. जिस भाई के लिए मैं ने ‘मनौतियां’ मानी, उसी ने मुझे चालबाजी से लूट लिया.

‘‘तब सारी बात मेरी समझ में आ गई. दुनिया के छलकपट मैं समझने लगी. मगर ब्याह के बाद के उन शुरुआती सालों में तो पीहर ही प्यारा लगता था, इसीलिए ठगी गई. उस समय भाई और भौजाई की पढ़ाई पट्टी में मैं आ गई. अभी जैसा समय होता तो मैं उन बेईमानों को चांदी की सलाई भी न देती.

‘‘उन बेईमानों ने मेरी सवा किलो चांदी भी हड़प ली और नाता भी तोड़ लिया. बोलना ही बंद कर दिया. पीहर का मेरा रास्ता बंद कर दिया. मेरा इस में क्या कुसूर है?’’

ग्यारसीबाई की ऐसी कैफियतों का उस के घर वाले पर कोई असर नहीं होता था. वह बस एक ही बात की रट लगाए था, ‘‘सवा किलो चांदी ला.’’

ग्यारसीबाई झुंझला कर पूछती थी, ‘‘कहां से लाऊं?’’

घर वाला तपाक से कह देता था, ‘‘कहीं से भी ला. तेरे मांबाप ने जमाने के सामने तो बड़ा नाम कर दिया कि सवा किलो चांदी दी बेटी को. मगर, ससुराल वालों को उस में से छल्ला भी नहीं मिला.’’

फूटफूट कर रोती हुई ग्यारसीबाई विलाप करने लगती थी, ‘‘अगर मेरे मांबाप जिंदा होते, तो मैं उन के पास फरियाद ले कर जाती. उस मुए राक्षस से कहकह कर मैं तो हार गई. फरियाद कहां ले जाऊं?’’

ग्यारसीबाई के आदमी को इन बातों से कोई मतलब नहीं था. वह तो बस एक ही बात जानता था, ‘सवा किलो चांदी’. इसलिए घर में आएदिन कलह मची रहती थी.

ग्यारसीबाई को अपने घर वाले का यह तकाजा गलत नहीं लगता था. वह मानती थी कि उन की सवा किलो चांदी की रट ठीक है, क्योंकि उस पर उन का भी हक है. शादी में नातेरिश्ते वालों ने और जातबिरादरी वालों ने सवा किलो चांदी देखी थी.

वह चांदी के गहने पहन कर ससुराल आई थी. वे अगर चाहते तो सारे गहने यहीं उतरवा लेते, बिना गहनों के पीहर भेजते. किंतु दोनों घरों की इज्जत के लिए उन्होंने ऐसा नहीं किया.

जब भी वह ससुराल से पीहर गई, तो गहनों से सजीधजी ही गई. भाई की कारिस्तानी से ही वह पीहर से बिना गहनों के आई. फिर भी इन लोगों ने धीरज रखा. सोचा कि मुसीबत में ऐसा होता है.

मगर जब भाई ने हाथ ही ऊंचे कर दिए, तो इन का धीरज कैसे कायम रह सकता था? इन के हक की चीज उस बेईमान ने छीन ली. दूसरे कोई होते तो मारे जूतों के उस को ठीक कर देते. मगर ये तो अभी भी शरीफों की तरह ही तकाजा कर रहे थे. वही मुआ बदमाशी पर उतर आया था. लड़नेझगड़ने को तैयार था.

किंतु ग्यारसीबाई को इसी बात का दुख होता था कि उस का घरवाला उस की मजबूरी क्यों नहीं समझ रहा है. उस ने अपने आदमी को अगर धोखा दिया होता, तो वह अपनेआप को दोषी मानती. किंतु यहां तो धोखा उस के खुद के साथ ही हुआ था. फिर भी घरवाला उसी को टोंचता रहता. वह सोचती कि ऐसा ही है तो वह अपने साले से जा कर झगड़े. बीवी से झगड़ने में क्या तुक है.

ऐसी सलाह देने पर बात हमेशा बढ़ जाती थी. ग्यारसीबाई इस सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल ही करती थी, ‘‘तुम और मैं क्या अलगअलग हैं?’’

‘‘अलगअलग भले ही नहीं हैं… मगर, भाईबहन के बीच में मैं कभी नहीं बोलूंगा.’’

‘‘क्यों नहीं बोलोगे? तुम उस से डरते हो क्या?’’

‘‘उस जैसे चार को पानी पिला सकता हूं मैं. उस से कम नहीं हूं.’’

‘‘नहीं हो… तभी तो कहती हूं कि जाओ, उस ठग को जूते मारो और अपनी सवा किलो चांदी ले आओ. बिना जूतों के वह खाक भी नहीं देगा.’’

‘‘नहीं, यह मुझ से नहीं होगा.’’

‘‘क्यों नहीं होगा?’’

‘‘उस ने कभी कुछ ऐसीवैसी बात कह दी, तो मामला बढ़ सकता है?’’

‘‘बढ़ सकता है तो बढ़ने दो. उस की लाश गिरा दोगे तो भी मैं उस के नाम ले कर नहीं रोऊंगी.’’

‘‘हां… तू तो यही चाहती है कि तेरी सवा किलो चांदी के लिए मैं फांसी पर चढ़ जाऊं?’’

‘‘तो चुपचाप बैठो. उठतेबैठते मुझे सुइयां क्यों चुभोते हो?’’

‘‘तुझे तो सुइयां चुभाऊंगा ही, क्योंकि तू ने ही यह बखेड़ा खड़ा किया है. सवा किलो चांदी कोई कम होती है? भाव मालूम है चांदी का? इतनी चांदी होती तो कई रुके काम पूरे हो जाते. मगर तू बैरिन बन गई. तू ने मुंह का कौर छीन लिया.’’

‘‘मैं ने छीना?’’

‘‘और नहीं तो किस ने छीना? हो सकता है कि यह सब भाईबहन की मिलीभगत हो?’’

अपने आदमी की यही तोहमत ग्यारसीबाई को जला देती थी. ऐसे में उस की मंशा होती थी कि कुछ खा कर सो जाए या किसी कुएं या नदी में छलांग लगा दे. किंतु आंचल से बंधी 3 औलादों की वजह से वह ऐसा नहीं कर पा रही थी. ऐसा इरादा करते ही उसे यह खयाल आ जाता था कि उन के न रहने से उस की औलाद यतीम हो जाएगी. घरवाले को तो दूसरी बीवी मिल जाएगी. वह सौत इन बच्चों की जिंदगी जहर बना देगी.

इसी खयाल से ग्यारसीबाई अपनी जिंदगी को खत्म नहीं कर पा रही थी. घर में घुसे कलह को वह बरदाश्त किए जा रही थी. अपने आदमी के तानों से उस का दिल छलनी सा हो गया था, फिर भी वह सहती जा रही थी.

एक रोज बात बहुत बढ़ जाने पर ग्यारसीबाई के घरवाले ने गुस्से में बावला सा हो कर उस की चोटी पकड़ कर दरवाजे के बाहर धकेलते हुए साफ कह दिया, ‘‘जा, सवा किलो चांदी ले कर आ, नहीं तो भाग यहां से.’’

‘फटाक’ से दरवाजा बंद हो जाने पर बच्चे फूटफूट कर रोने लगे. उन का बाप उन्हें डांटते हुए चुप कराने लगा. बच्चे जब चुप नहीं हुए तो वह उन्हें पीटने लगा. बाहर सीढि़यों पर बैठी ग्यारसीबाई से यह बरदाश्त नहीं हुआ.

उस ने अपने कानों में उंगलियां दे लीं. फिर वह भागने लगी. उस के पैर आगे नहीं बढ़ रहे थे, फिर भी वह अपनेआप को धकेलती हुई सी बढ़ती रही. गांव से बाहर पंचायती कुएं के पास जा कर उस ने सोचा कि इस में छलांग लगा दे और छुटकारा पा ले. बच्चे अपनी जिंदगी खुद भोगेंगे.

वह कुएं में छलांग लगाने ही वाली थी कि उसे खयाल आया कि सारे गांव के पानी को जहर बनाने से तो यही अच्छा होगा कि पीहर की देहरी पर जान दे दे. उस मुए पर जगत थूकेगा तो सही. यहां जान देने से तो उस पर आंच भी नहीं आएगी.

यही सोच कर ग्यारसीबाई ने अपनी बाट पकड़ ली. यादों का ज्वार सा उस के भीतर उठने लगा. उसे याद आया कि इसी राह से वह दुलहन बन कर ससुराल आई थी. उस समय इस राह को वह मुड़मुड़ कर देखती रही थी.

इसी राह ने उसे मौका मिलते ही पीहर की ओर दौड़ाया था. हर बार पीहर से लौटते समय वह आंसू बहाती हुई ससुराल लौटी थी. ससुराल में रहते हुए भी पीहर की याद उसे आती रहती थी.

बच्चे होने के बाद भी पीहर के प्रति उस का लगाव कम नहीं हुआ था. भाई ने मिठास में अगर खटाई नहीं घोली होती तो वह इस राह की दीवानी अभी भी रहती. भाई ने इस मनभावन राह पर कांटे बिछा दिए थे.

पर उस वक्त उस राह पर चलते हुए ग्यारसीबाई को यही लग रहा था कि जैसे वह कांटों पर चल रही है और उस के पैर लहूलुहान हो रहे हैं.

अपने पीहर के घर के पास आ कर ग्यारसीबाई ठिठक गई. वह आंखें फाड़फाड़ कर उस घर को देखने लगी.

उसे इस भरी दोपहरी में ऐसा लगा, जैसे उस के मांबाप खपरैल वाली छत पर बैठे हुए हाथ हिलाहिला कर
उसे बुला रहे हैं, ‘आ, ग्यारसी.’

ग्यारसीबाई ललक कर बढ़ी, तभी उस के भाई बाबू की तीखी आवाज गूंजी, ‘‘आगे कदम न बढ़ाना… नहीं तो टांगें तोड़ दूंगा.’’

ग्यारसीबाई ने गुस्से भरी आवाज में कहा, ‘‘तोड़.’’

बाबू ने राह रोकते हुए कहा, ‘‘देख, वापस हो जा, नहीं तो सच में…’’

‘‘मेरी चांदी दे दे… मैं अभी चली जाऊंगी.’’

‘‘कौन सी चांदी…? चांदी नहीं है मेरे पास.’’

‘‘क्यों नहीं है?’’

‘‘बस नहीं है.’’

‘‘नहीं देगा तो मैं इस देहरी पर धरना दूंगी. यहीं पर जान दे दूंगी.’’

‘‘तू यहां धरना देगी, तो मैं लात मार कर भगा दूंगा.’’

‘‘भगा… तू अगर ‘कंस’ है, तो यह भी कर ले,’’ कहते हुए ग्यारसीबाई देहरी की ओर बढ़ने लगी.

बाबू ने उस का हाथ थाम लिया और उसे खींचते हुए घर से दूर ले जाने लगा. ग्यारसीबाई जमीन पर बैठ गई और जोरजोर से चिल्लाने लगी, ‘‘बचाओ रे, बचाओ, यह ‘कंस’ मेरे गहने खा गया और अब मुझे यहां मरने भी नहीं दे रहा है.’’

शोर सुन कर आसपास के लोग आ गए. बाबू की बीवी और उस के बच्चे भी आ गए. वे ग्यारसीबाई का दूसरा हाथ पकड़ कर घसीटने लगे. लोगों ने बीचबचाव कर के उस के हाथ छुड़वाए.

उन लोगों ने बाबू को समझाया, ‘औरत जात पर हाथ मत उठा, नहीं तो फंस जाएगा. तू अपना दरवाजा बंद कर ले. यह कब तक बैठेगी? मरना आसान नहीं है. तू बेकार में परेशान न हो.’

ग्यारसीबाई को भी लोगों ने सलाह दी, ‘बाई, घर जा. इन तिलों में तेल नहीं है. यह समझ ले कि गहने चोरी
हो गए.’

ग्यारसीबाई अपना रोना रोने लगी. बाबू और उस के घर के लोग पड़ोसियों का कहना मान कर घर में चले गए और भीतर से दरवाजा बंद कर लिया.

ग्यारसीबाई को दिलासा देदे कर लोग अपनेअपने काम में लग गए. अब वह अपने मांबाप का नाम लेले कर स्यापा करने लगी. भाई को कोसने लगी.

तभी ‘धड़ाम’ से दरवाजा खुला और ग्यारसीबाई की भौजाई झाड़ू लिए बाहर आई. अपनी ननद को झाड़ू से पीटते हुए वह गरजी, ‘‘मेरे दरवाजे पर यह नाटक मत कर. भाग यहां से.’’

ग्यारसीबाई ने झाड़ू पकड़ते हुए भौजाई को कस कर लात जमा दी. वह धड़ाम से गिर पड़ी.

ग्यारसीबाई उस की छाती पर चढ़ कर गरजी, ‘‘तू ने ही मेरे भाई को बिगाड़ा है. मैं तेरा खून पी जाऊंगी.’’

ऐसा कहते हुए ग्यारसीबाई अपनी भौजाई का गला दबाने लगी. बरसों का रुका गुस्सा तब फट पड़ा. उस पल उस में इतनी ताकत आ गई कि वह अपने से तगड़ी भौजाई को दबाए रही.

गला दबाने पर भौजाई चीखी, ‘‘बचाओ… बचाओ…’’

घर में से बाबू और उस के दोनों बच्चे दौड़े आए. वे ग्यारसीबाई के हाथों को खींचखींच कर उस की पकड़ ढीली करने के लिए जूझने लगे. मगर ग्यारसीबाई पर तो जैसे पागलपन सवार हो गया था. वह इन तीनों के काबू में नहीं आ रही थी.

वे लातघूंसे जमा रहे थे, फिर भी वह भौजाई को छोड़ नहीं रही थी. उस का गला दबाते हुए गरज रही थी, ‘‘तू ने मेरी जिंदगी में जहर घोल दिया. सवा किलो चांदी के लिए ही तू ने बेईमानी कर ली.’’

बाबू ने पूरी ताकत लगा कर ग्यारसीबाई को खींचा. उस की बेटी ने ग्यारसीबाई के हाथ में काट लिया, तब कहीं उस के हाथों की कैंची छूटी. भौजाई की चीखें अब बंद हो गईं. वह फुरती से उठी और ग्यारसीबाई पर लातघूंसों की बरसात सी करने लगी. तभी ग्यारसीबाई के 15 और 13 बरस के दोनों बेटे दौड़े हुए आए और अपनी मां पर ढाल की तरह पसरते हुए बोले, ‘‘मत मारो हमारी मां को.’’

ग्यारसीबाई की भौजाई ने दांत पीसते हुए कहा, ‘‘मेरा गला घोंट रही थी, तब तुम ढाल बनने नहीं आए? अब आ गए तुम भी? लो प्रसाद.’’

भौजाई और उस के बेटेबेटी उन दोनों पर लातघूंसे जमाने लगे. ग्यारसीबाई गरजी, ‘‘इन पर हाथ उठाओगे, तो मैं तुम्हारी बोटीबोटी काट डालूंगी.’’

भाई से हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए ग्यारसीबाई बेटों को बचाने झपटी. हाथ छुड़ा पाने पर वे लातें
चलाने लगीं.

आसपास के लोग बीचबचाव की कोशिश करने लगे. जैसेतैसे वे दोनों तरफ के लोगों को अलगअलग कर पाए. ग्यारसीबाई और उस के दोनों बेटों को खींच कर घर से दूर ले जा कर वे बोले, ‘जाओ अब.’

मगर ग्यारसीबाई वापस जाने को राजी न हुई. वह बोली, ‘‘मैं तो यहीं मरूंगी.’’

आसपास वालों ने ग्यारसीबाई को समझाया, ‘बाई, तू जान भी दे देगी तो भी ये तेरी चांदी नहीं देंगे. इसलिए समझ ले कि चांदी चोर ले गए. ये बच्चे खालिस चांदी हैं. इन्हें संभाल.’

ग्यारसीबाई को समझाते हुए वे उस के बच्चों से बोले, ‘अपनी मां को ले जाओ.’

बच्चे तो यह चाहते ही थे. इसीलिए मां को धकेलते से वे ले चले.

घर आ कर उन दोनों ने अपने पिता से कहा, ‘‘अब सवा किलो चांदी का कभी नाम मत लेना. मां का यह कर्ज हम ने अपने सिर पर ले लिया है. उस सवा किलो चांदी के बदले हम ढाई किलो चांदी तुम को देंगे. हमारी मां से अब इस बाबत में एक लफ्ज भी मत कहना.’’

ग्यारसीबाई, उस का घरवाला और बड़ी बेटी इन उगते सूरज जैसे लड़कों को टकटकी लगा कर देखने लगे. हर चेहरा खुशियों और उम्मीदों के मीठे रस में डूब सा गया था.

Hindi Story: अनोखा मिलन

Hindi Story: शाम का समय था. मैं ग्राहकों की भीड़ में उलझ हुआ था कि अचानक एक लाल रंग की चमचमाती कार मेरी दुकान के सामने आ कर रुकी. मैं ने ग्राहकों को पिज्जा देते हुए जब उस गाड़ी पर नजर डाली, तो मेरी आंखें कुछ देर के लिए वहां टिकी रह गईं.

मेरी नजरें वहां टिकती भी क्यों न, उस गाड़ी में से 3 लड़कियां जींसटीशर्ट में बाहर निकली थीं, तो वहीं एक खूबसूरत हसीना सलवारसूट पहने उन के साथ मेरी दुकान की तरफ बढ़ती हुई आ रही थी.

उस लड़की की बड़ीबड़ी नीले रंग की आंखें, लहराते हुए सुनहरे घने लंबे बाल, सुर्ख गाल और पतलेपतले गुलाबी होंठ देख कर तो मैं पागल ही हो गया था.

यों तो मेरी दुकान पर रोजाना दर्जनों लड़कियां पिज्जा खाने आती रहती थीं, पर उन के चेहरे पर मैं ने कभी ऐसी कशिश नहीं देखी थी, जो इस लड़की के चेहरे में थी.

लाल रंग के सलवारसूट में तो वह लड़की कयामत ही ढा रही थी. उस ने भले ही अपने उभारों पर दुपट्टा डाल रखा था, पर उस की उठी हुई मदमस्त छाती उस के हुस्न पर चार चांद लगा रही थी.

मैं ने अपनी जिंदगी में इतनी हसीन और कमसिन लड़की आज तक नहीं देखी थी. उसे देख कर ऐसा लग रहा था मानो आसमान से कोई हूर उतर कर जमीन पर आ गई हो.

मैं न चाहते हुए भी उस के ऊपर से अपनी नजरें नहीं हटा पा रहा था. मैं अभी उसे एकटक देख ही रहा था कि अचानक उस लड़की ने बड़ी मीठी आवाज में कहा, ‘‘ऐ मिस्टर, जरा 4 तीखी चटनी वाले पिज्जा जल्दी से दो.’’

जैसे वह लड़की खूबसूरती की मलिका थी, उस से कहीं ज्यादा उस की मीठी आवाज थी.

मैं उस लड़की की खूबसूरती और मीठी आवाज में इतना खो गया था कि मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि कब मेरा हाथ ओवन के चिमटे से टकरा गया और मैं ने ‘आह’ करते हुए अपना हाथ झटका.

तभी वह खूबसूरती की मलिका हंसते हुए बोली, ‘‘ऐ मिस्टर, जितना ध्यान तुम मेरे ऊपर दे रहे हो, उतना ध्यान अगर अपने काम पर देते तो यह हाथ नहीं जलता.’’

हंसते हुए उस लड़की के मोती जैसे दांत उस की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे.

मैं तो पहली ही नजर में उस का दीवाना हो गया था. अब उस की हंसी ने मुझे और भी उस का दीवाना बना दिया था.

उस लड़की ने मुझ से क्या कहा था, मुझे इस का कोई होश ही नहीं रहा था.

मैं अपने काम में बिजी हो कर भी उसे अपनी तिरछी नजरों से देख रहा था, जो अपनी सहेलियों से हंसहंस कर बातें कर रही थी.

तभी वह लड़की उठी और मेरे पास आई और बोली, ‘‘ऐ मजनू की औलाद, पहले कभी लड़की नहीं देखी क्या?’’

मैं शरमा कर कर बोला, ‘‘जी मैडम, देखी तो बहुत हैं, पर आप जैसी खूबसूरत आज तक देखने को नहीं मिली. आप को देख कर तो ऐसा लग रहा है जैसे परियों के देश से कोई परी जमीन पर उतर कर मेरी दुकान में आ गई हो.’’

तभी वह लड़की गुस्से में बोली, ‘‘मैं कोई परीवरी नहीं हूं और न ही मेरा नाम मैडम है. हिना नाम है मेरा… हिना… समझे…’’

हिना के गुस्से में भी मुसकराहट शामिल थी. मैं ने भी मुसकरा कर कहा, ‘‘जी हिनाजी, नाम बताने का शुक्रिया…’’

‘‘मैं नाम बताने नहीं आई हूं. हमारा और्डर दो जल्दी… मुझे बहुत तेज भूख लगी है.’’

मैं ने फौरन 4 पिज्जा बनाए और उन में कुछ ज्यादा ही मक्खन डाल कर फौरन उन की टेबल पर सर्व कर दिया.

वे चारों पिज्जा खाने लगीं और आपस में मेरे बनाए पिज्जा की तारीफ करती रहीं.

हिना पिज्जा खा रही थी और अपनी तिरछी निगाहों से मुझे देख रही थी. जब भी मेरी निगाह उस से टकराती, मैं मुसकरा कर उसे अपने प्यार का इजहार करने की कोशिश करता.

कुछ देर बाद हिना अपनी एक सहेली के साथ उठ कर मेरे पास आई और बोली, ‘‘कितना पैसा हुआ मिस्टर?’’

मैं हंसते हुए बोला, ‘‘हिनाजी, मेरा नाम मिस्टर नहीं, बल्कि शान है. आप मुझे इसी नाम से पुकारें.’’
हिना ने कहा, ‘‘अच्छा शानजी, कितना पैसा हुआ?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘400 रुपए.’’

हिना ने पर्स से 500 का नोट निकाला और बोली, ‘‘रख लो… तुम्हारे पिज्जा का तो जवाब ही नहीं… यह हमें बहुत पसंद आया.’’

मैं बोला, ‘‘शुक्रिया. पर, मैं वही कीमत लेता हूं, जो मेरा हक है. ये लीजिए आप के 100 रुपए.’’

जब मैं ने हिना के हाथ में 100 रुपए दिए, तो उस के नाजुक हाथ की छुअन पा कर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. दूध की तरह सफेद हाथ… इतने कोमल कि दिल किया चूम लूं.

जब हिना अपनी गाड़ी में बैठ रही थी, तो उस ने एक नजर फिर से मेरे ऊपर डाली, तो मैं ने मुसकराते हुए अपने उस हाथ को चूम लिया.

यह देख कर हिना भी मुसकराते हुए गाड़ी में बैठ कर चली गई.

रातभर हिना का खूबसूरत चेहरा मेरी आंखों के सामने घूमता रहा. मैं नींद से कोसों दूर करवट बदलता रहा और इस उम्मीद में सुबह होने का इंतजार करता रहा कि आज फिर हिना मेरी दुकान पर पिज्जा खाने जरूर आएगी, पर सुबह से शाम हो गई और मैं हिना का इंतजार करता रहा, पर वह नहीं आई.

मैं उदास हो कर एक तरफ बैठ गया. न जाने क्यों आज दुकान पर ग्राहकी भी कम थी और मेरा मन भी दुकान पर नहीं लग रहा था.

मैं हिना के बारे में सोचसोच कर मायूस हो रहा था कि तभी हिना की गाड़ी मेरी दुकान के सामने आ कर रुकी.

मैं खुशी से झूम उठा और खड़े हो कर हिना का गाड़ी से बाहर निकलने का इंतजार करने लगा.

तभी कुछ देर बाद हिना गुलाबी रंग का सलवारसूट पहन कर मेरे सामने आई और बोली, ‘‘मुझे 3 पिज्जा जल्दी से पार्सल कर दो.’’

हिना के कहते ही मैं पिज्जा बनाने में लग गया. तब तक वह मेरे काउंटर के सामने खड़ी रही.

कुछ देर बाद वह खुद ही बोली, ‘‘लगता है कि आज रात तुम सो नहीं पाए. तुम्हारी आंखें सूजी हुई सी लग
रही हैं.’’

मैं हंसते हुए बोला, ‘‘क्या बताऊं हिनाजी… जब से तुम्हें देखा है, चारों तरफ तुम्हारा ही चेहरा दिखाई देता है.

मैं ने पूरी रात करवट बदलते हुए गुजारी है.’’

हिना ने धीरे से पूछा, ‘‘ऐसा क्या है मेरे चेहरे में…?’’

मैं बोला, ‘‘क्या नहीं है आप के चेहरे में… जिस ने मुझे आप का दीवाना बना दिया है. आप जैसी खूबसूरत

हसीन लड़की मैं ने अपनी जिंदगी में नहीं देखी है. मैं तो आप के हुस्न का दीवाना हो गया हूं.’’
हिना हंसते हुए बोली, ‘‘तुम पागल हो गए हो…’’

मैं ने कहा, ‘‘आप ने मुझे पागल बना दिया है. आप की आवाज, आप की खूबसूरती, आप का हुस्न… आप को देख कर ऐसा लगता ही नहीं कि आप कोई इनसान हो. मुझे तो आप परी देश से आई हुई कोई परी लगती हो.’’

हिना हंसते हुए बोली, ‘‘आप की बातों को सुन कर तो यहां से जाने का ही दिल नहीं करता.’’

मैं ने भी फौरन जवाब देते हुए कहा, ‘‘आप मत जाओ. मेरे दिल में तो बस चुकी हो, मेरी जिंदगी में भी आ जाओ.’’

हिना ने कहा, ‘‘अच्छा, तो आप मुझे अपनी जिंदगी में शामिल करना चाहते हो… पर, उस के लिए तुम्हें मुझ से निकाह करना पड़ेगा… समझे?’’

‘‘मैं आप से निकाह करने को तैयार हूं. बस, आप की हां का इंतजार था.’’

‘‘ठीक है, मैं सोच कर बताती हूं.’’

मैं ने हिना का मोबाइल नंबर ले लिया. अब हम दोनों घंटों प्यारभरी बातें करते, शादी के सपने देखते और खूब घूमतेफिरते.

मेरी और हिना की प्रेम कहानी खूब चल रही थी, फिर एक दिन वह वक्त भी आ गया, जब हमारे प्यार की खबर हिना के अब्बू को लग गई.

हिना के अब्बू उस इलाके के अमीर लोगों में शुमार थे और वे किसी भी कीमत पर हिना की शादी मुझ से करने को तैयार नहीं थे.

हिना मुझ से बहुत मुहब्बत करती थी, इसलिए उस ने मुझ से वादा किया कि वह शादी करेगी तो सिर्फ मुझ से, वरना अपने अब्बू का घर छोड़ कर मेरे पास आ जाएगी.

आज हिना अपने अब्बू से हमारी शादी की बात करने वाली थी. मेरा दिल बहुत घबरा रहा था, क्योंकि हिना के अब्बू कभी भी मुझ जैसे गरीब लड़के से अपनी बेटी की शादी के लिए राजी न होते और हिना उन का सामना कैसे करेगी, यह सोच कर मैं बहुत परेशान था.

मुझे हिना और उस के अब्बू के बीच क्या बात हुई, इस का तो कुछ पता न चला, पर 3 दिन बाद हिना के अब्बू ने दुकान मालिक से कह कर मेरी दुकान जरूर खाली करा दी और मेरा कामधंधा बंद हो गया.

उस के कुछ दिन बाद हिना के अब्बू एक सुनसान जगह पर 4-5 लोगों के साथ आए और मुझ से बोले, ‘‘तेरी भलाई इसी में है कि तू यह शहर छोड़ कर कहीं दूसरी जगह चला जा.’’

मैं ने इनकार किया, तो उन के साथ आए लोगों ने मेरी जम कर पिटाई की, फिर वे बोले, ‘‘देख, हिना ने अपनी मरजी से शादी कर ली है.’’

वे मुझे हिना की शादी का फोटो दिखाते हुए बोले, ‘‘अब उसे भूल जा और उस की जिंदगी से दूर चला जा. वैसे भी तुझे इस एरिया में कोई दुकान नहीं देगा और तू ने अगर हिना से मिलने की कोशिश की तो तेरे लिए अच्छा नहीं होगा.’’

हिना की शादी की तसवीर देख कर मैं पूरी तरह टूट चुका था. मैं हताश हो कर अपने एक दोस्त के पास दूसरे शहर चला गया और उस के कमरे पर रहने लगा.

मेरा अब कुछ काम करने में दिल नहीं लगता था. जिंदगी थम सी गई थी. न किसी से बोलना, न कोई काम और न हंसी… सब गायब हो चुका था.

मेरे दोस्त ने मुझे काफी समझाया और कहा, ‘‘अगर तुम यों ही अपनी जिंदगी बरबाद करते रहोगे, तो फिर
कैसे चलेगा…

‘‘मेरे दोस्त, हिम्मत मत हारो. जिंदगी में तो सुखदुख लगा ही रहता है. अगर तुम्हारा यहां काम करने को मन नहीं करता, तो मेरा एक दोस्त दुबई में रहता है. तुम उस के पास चले जाओ. मैं सब इंतजाम कर देता हूं. तुम अपनी मुहब्बत को अब भूल जाओ. वह अब किसी और की अमानत बन चुकी है.’’

उस की ये बातें सुन कर मेरी आंखों से खुद ब खुद आंसू बहने लगे और मैं ने उस से कहा, ‘‘ठीक है, मैं दुबई चला जाता हूं, पर मेरे दोस्त, मुझे मेरी मुहब्बत को भूलने के लिए मत कहो.’’

मेरे दोस्त ने मेरे लिए अपने एक खास दोस्त से बातचीत कर ली. उस का दुबई में होटल था, जहां उस ने मेरी नौकरी की बात पक्की कर ली.

दुबई के लिए एक हफ्ते बाद की टिकट हो चुकी थी. मैं ने अब दुबई जाना ही बेहतर समझा.

अगले दिन मैं जब सो कर उठा, तो मेरे दोस्त को तेज बुखार था. मैं उसे सहारा दे कर पास के दवाखाने पर ले गया. डाक्टर ने कुछ जांच करने के बाद मेरे दोस्त को एक हफ्ता आराम करने की हिदायत दी.

हम दवा ले कर घर आ गए. अभी एक दिन ही हुआ था कि उस की तबीयत में कुछ सुधार हुआ, तो वह काम पर जाने के लिए उठा. यह देख कर मैं ने उसे काम पर जाने से रोक लिया और बोला, ‘‘तुम्हारी हालत सही नहीं है. तुम अभी आराम करो.’’

मेरा दोस्त बोला, ‘‘यार, अगर मैं काम पर नहीं जाऊंगा, तो उस से मेरे ग्राहक तो टूटेंगे ही, साथ ही एक बेवा, जो अपने एक साल के बेटे के साथ टूटेफूटे घर में रहती है, उस की भी कमाई नहीं होगी.’’

मैं हैरान हो कर बोला, ‘‘क्या मतलब…? कौन बेवा…?’’

‘‘अरे भाई, यहां पास की ही एक बस्ती में एक बेवा घर पर खाना बना कर औनलाइन बेचती है, जिस की डिलीवरी मैं करता हूं.’’

मैं उस से बोला, ‘‘ठीक है, आज मैं डिलीवरी करता हूं. बस, तुम अच्छी तरह से आराम करो.’’

मैं ने उस से वह पता लिया, जहां से मुझे खाना लेना था और जहां खाना पहुंचाना था.

मैं जब खाना लेने वाले पते पर पहुंचा और कुंडी खटखटाई तो अंदर से एक औरत फटेपुराने कपड़े पहने बाहर आई और बोली, ‘‘जी, आप कौन…?’’

मैं ने जैसे ही उस औरत पर नजर डाली, मैं हैरान रह गया. वह औरत कोई और नहीं, मेरी हिना थी.

हिना ने भी मुझे पहचान लिया था और बोली, ‘‘शान, तुम यहां कैसे…? आओ, अंदर आओ.’’

मैं हिना के साथ उस के घर के अंदर पहुंच गया और उस से पूछने लगा, ‘‘तुम ने तो अपनी मरजी से किसी अमीर लड़के से शादी कर ली थी, फिर तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?’’

हिना ने रोते हुए बताया, ‘‘मैं तुम से शादी करने के लिए अपने अब्बू से लड़ कर जैसे ही घर से बाहर निकली कि अचानक उन के सीने में तेज दर्द शुरू हो गया और वे ‘धड़ाम’ से जमीन पर गिर पड़े.

‘‘मैं ने जल्दी से उन्हें उठाया और एंबुलैंस बुला कर उन्हें अस्पताल ले गई, जहां डाक्टर ने कुछ देर उन का ट्रीटमैंट करने के बाद मुझे बताया, ‘तुम्हारे अब्बू को हार्टअटैक आया है. इन की तबीयत काफी नाजुक है.

हालांकि, अब वे खतरे से बाहर हैं, पर यह ध्यान रखना कि उन्हें किसी भी तरह की कोई तकलीफ न हो और न ऐसी बात करना, जिसे सोच कर उन की तबीयत फिर से खराब हो जाए. वैसे, आप उन से मिल सकती हैं.’

‘‘मैं जैसे ही अपने अब्बू से मिली, उन्होंने मुझे देख कर मुंह फेर लिया. मैं सम?ा गई कि मेरी ही वजह से उन की यह हालत हुई है. उन्हें खुश रखने के लिए मैं ने उन से कहा कि आप नाराज मत होना, मैं वही करूंगी जो आप कहोगे.

‘‘मेरी बात सुन कर उन का चेहरा खिल उठा और मुसकराते हुए वे बोले, ‘तो फिर मैं जहां तुम्हारी शादी करूंगा, तुम्हें मंजूर होगा.’

‘‘मैं ने ‘हां’ में सिर हिला दिया और अपनी खुशी को अपने अब्बू की खुशी की खातिर बलिदान कर दिया.

‘‘उस के कुछ ही दिन बाद मेरे अब्बू ने मेरी शादी इस उम्मीद में कर दी कि बड़े घराने में उन की बेटी को सारी खुशियां मिलेंगी.

‘‘पर, उन का ऐसा सोचना गलत साबित हुआ. शादी के एक साल बाद ही एक हादसे में मेरे शौहर इस दुनिया से चल बसे.

‘‘सुसराल वालों ने यह कह कर मुझे और मेरे मासूम बेटे को घर से निकाल दिया कि इस मनहूस औरत की वजह से ही उन के जवान बेटे की मौत हुई है.

‘‘वहां से निकाले जाने के बाद मैं ने अपने अब्बू के घर जाना बेहतर नहीं समझा, क्योंकि मेरी बरबादी की वजह कुछ हद तक वे ही थे, जिन्होंने पैसे के लालच में मेरे प्यार को मुझ से जुदा कर दिया था.

‘‘उस के बाद मैं ने यह घर किराए पर ले लिया और जोकुछ बचत थी, उस से खाने का छोटा सा औनलाइन बिजनैस शुरू कर लिया.’’

मुझे हिना की बातें सुन कर बहुत दुख हुआ. तभी उस का छोटा सा बेटा मेरी गोद में आ कर बैठ गया, जिसे मैं प्यार करने लगा. यह देख कर हिना की आंखों के आंसू रुक गए और उस के चेहरे पर एक मुसकान दिखाई दी.

फिर हिना ने मुझ से पूछा, ‘‘तुम कहां थे इतने दिन और शादी वगैरह की या नहीं? कितने बच्चे हैं तुम्हारे?’’

मैं ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे सिवा मैं भला किसी और से शादी कैसे कर सकता था? मेरे रोमरोम में तो तुम बसी थी.’’

‘‘तुम्हारी शादी के बाद तुम्हारे अब्बू ने मेरी पिज्जा की दुकान बंद करा दी और अपनी ताकत के बल पर मुझे वहां कोई दुकान न लेने दी. उन का इस पर भी पेट न भरा, तो उन्होंने कुछ गुंडों से मेरी पिटाई कराई और तुम्हारा शादी का फोटो दिखाते हुए मु?ो यह शहर छोड़ कर जाने की धमकी दे डाली.

‘‘उस के बाद मैं इस शहर में अपने एक दोस्त के पास आ गया. कामधंधा करने को मन नहीं करता था, बस यों ही घर में पड़ा रहता और तुम्हें याद करता रहता, तुम्हारी यादों में तड़पता रहता था.

‘‘इसी तरह 2 साल निकल गए. मेरे दोस्त ने दुबई में मेरे लिए काम तलाश लिया और अब मैं ने वहां जाने का इरादा कर लिया है.

‘‘पिछले 2 दिन से उस दोस्त की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब थी. उसे डाक्टर ने आराम के लिए बोला था, पर वह जबरदस्ती काम पर आना चाहता था, तो मैं ने उसे आराम करने के लिए कहा और खुद उस के काम के लिए निकल पड़ा.

‘‘आज पहली बार मैं काम के लिए निकला, तो मेरी मुलाकात तुम से हो गई और हमारा यह मिलन एक अनोखा मिलन बन गया.’’

मैं ने हिना का हाथ अपने हाथ में पकड़ते हुए कहा, ‘‘अब तो तुम भी गरीब हो गई हो, अब तुम भी मेरे जैसी बन गई हो, अब तो तुम से शादी करने से मुझे कोई नहीं रोक सकेगा. अब हमारे बीच की अमीरी की दीवार ढह गई है.’’

इतना सुनते ही हिना मेरे गले से लग गई और बोली, ‘‘वाकई, यह मिलन एक अनोखा मिलन है.’’

मैं ने उसे अपनी बांहों में भरते हुए कहा, ‘‘अब तुम्हारी और तुम्हारे बेटे की जिम्मेदारी मेरी हुई.’’

यह सुन कर हिना की आंखों में आंसू आ गए और वह मेरे गले से लगते हुए बोली, ‘‘शादी के बाद तुम्हें मेरे लिए पिज्जा बनाना पड़ेगा… समझे?’’ कहते हुए हिना हंसने लगी.

हिना की बात सुन कर मुझे भी हंसी आ गई. मैं ने उस से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए पिज्जा की पूरी दुकान ही खोल लूंगा.’’

इस तरह हिना का और मेरा अनोखा मिलन हो गया और हम दोनों ने शादी कर ली.

Hindi Story: मोची का बेटा

Hindi Story: ‘‘कहो राजप्रसाद, कैसे हो?’’

‘‘आओ दिनेश भैया, बैठो. इस बार तो बहुत दिनों के बाद आए हो. बताइए भैया, कैसे आना हुआ?’’ राजप्रसाद ने मुसकराते हुए पूछा.

मैं ने उस की सामान की पेटी पर बैठते हुए कहा, ‘‘राजप्रसाद, तुम्हारे पास कोई किस काम के लिए आ सकता है? देखना, जरा इस सैंडल पर पौलिश कर देना.’’

राजप्रसाद ने सैंडल ले ली और मु झे पहनने के लिए चप्पल दे दी.

‘‘बस भैया, ये जूते टांक दूं और फिर मैं आप की सैंडल पर पौलिश करता हूं.’’

‘‘हां, राजप्रसाद, मु झे कोई जल्दी नहीं है. आराम से कर देना,’’ मैं ने सहजता से कहा.

राजप्रसाद उस जूते को गांठने में लग गया और मैं अपने विचारों में खो गया.

राजप्रसाद को मैं कई सालों से जानता था. वह न जाने कितने सालों से सड़क के किनारे इसी नीम के पेड़ के नीचे बैठा अपना मोची का काम करता आ रहा है.

बिना दीवारों और बिना छत की पेड़ की छांव ही उस की खुली दुकान है. इस दुकान पर कोई भी बिना रोकेटोके आ सकता है.

पेड़ की छांव पृथ्वी की घूर्णन गति से घूमती हुई सुबह से शाम तक अपना पाला बदल देती है, इसलिए राजप्रसाद ने एक लोहे की छड़ को धरती के सीने में गाड़ रखा है और उस पर एक बड़ी छतरी को बांध कर अपनी दुकान का शामियाना तान रखा है. चेहरे पर हरदम मुसकान उस की खुशहाल जिंदगी की गवाह है.

मेहनत के पसीने से भीगी उस की बनियान उस की श्रमशक्ति की खास पहचान है. उस की ईमानदारी और मेहनत देख कर मन में अपनेआप ही इज्जत का भाव पैदा होता है.

थोड़ी देर के बाद दिनेश ने पूछा, ‘‘राजप्रसाद, यहां बैठते हुए तुम्हें कितने साल हो गए?’’

‘‘अरे भैया, बस ये ही तकरीबन 30-35 साल.’’

‘‘एक लंबा अरसा हो गया फिर तो राजप्रसाद. तुम ने तो यहां की दुनिया को खूब बदलते देखा होगा, क्यों?’’

‘‘हां भैया, इतने अरसे में तो यहां की पूरी दुनिया ही बदल गई. सामने एकमंजिला दुकानें थीं, अब देखो, यहां बहुमंजिला इमारत खड़ी है. किराएदार, मकान मालिक, दुकान मालिक सब बदल गए.

‘‘पहले यह दुकान अखबारों और पत्रिकाओं की दुकान हुआ करती थी. यहां नौकरी के फार्म खूब बिका करते थे. जब से चीजें औनलाइन हुई हैं, यह दुकान स्टेशनरी और स्कूल की किताबों की दुकान बन कर रह गई.’’

दुनियादारी की बातों से हट कर कुछ सोचते हुए मैं ने कहा, ‘‘अच्छा राजप्रसाद, अगर बुरा न मानो तो एक बात पूछ लूं तुम से…’’

‘‘अरे भैया, बुरा क्यों मानेंगे? आप एक नहीं, दो बातें पूछो,’’ राजप्रसाद ने बड़े विश्वास के साथ कहा.
तब मैं ने थोड़ा हिचकिचाते हुए पूछा, ‘‘क्या इस मोचीगीरी के काम से तुम्हारा घरखर्च निकल जाता है?’’

‘‘अरे भैया, आप खर्चे की बात कर रहे हो, इसी की आमदनी से मैं ने अपना मकान बना लिया है. 2 बेटियों को पढ़ालिखा कर उन की अच्छे परिवारों में शादी कर दी है.

‘‘मेरी एक बेटी तो सरकारी मास्टरनी है, सरकारी. दूसरी बेटी भी शादी के बाद पीएचडी कर रही है.’’

‘‘अरे वाह राजप्रसाद. तुम ने तो कमाल कर दिया. मैं तो सोचता था कि इस काम से तुम्हारे घर का खर्चा भी बड़ी मुश्किल से निकलता होगा.’’

‘‘नहीं भैया, ऐसा कुछ नहीं है. मोचीगीरी में इतना काम है कि संभाले नहीं संभलता. लोग तो यह सम झते हैं कि हमारे पास केवल जूतेचप्पल टांकने और उन पर पौलिश करने का काम भर है, लेकिन हमारे पास इस के अलावा भी किसानों, दुकानदारों और यहां तक कि फैक्टरियों तक से चमड़े का सामान सिलाई के लिए आता है.’’

‘‘ये सब चीजें तो राजप्रसाद हम जैसों के खयाल में ही नहीं आती हैं,’’ दिनेश बोला.

‘‘भैया, दुनिया की सोच बदलने में जमाने गुजर जाते हैं. आज भी हमें सदियों पुराने मोची की ही नजर से देखा जाता है. वही फटेपुराने कपड़ों वाला, टूटेफूटे मकान में रहने वाला,’’ राजप्रसाद की बात को सुन कर मैं भी सोच में पड़ गया.

मैं ने भी वही सदियों पुरानी सोच पाल रखी थी. मैं ने सच स्वीकारते हुए कहा, ‘‘राजप्रसाद, तुम ने तो आज मेरी भी सोच बदल दी. मेरी सोच भी दूसरों की ही तरह थी. अच्छा, तुम्हारे क्या कोई बेटा भी है?’’

‘‘हां भैया, एक बेटा भी है. उस ने कुछ दिन पहले ही एमबीए किया है और नोएडा में एक कंपनी में उस की नईनई नौकरी लगी है. अभी उस का 3 लाख रुपए से कुछ ज्यादा का सालाना पैकेज है. इतना तो मैं यहां बैठेबैठे कमा लेता हूं.’’

‘‘तो फिर राजप्रसाद, तुम ने अपने बेटे को इसी काम में क्यों नहीं लगाया?’’

‘‘अब देखो भैया, मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूं, हमारे यहां कामधंधे को ले कर लोगों की सोच बड़ी खराब है. मोचीगीरी के काम को सब छोटा काम सम झते हैं. खुद मैं भी इसी सोच का शिकार हूं.

‘‘वह कंपनी में नौकरी कर रहा है, तो उस की इज्जत है. लेकिन दुनिया वाले नहीं सम झते हैं कि वह दूसरों की नौकरी ही कर रहा है. मैं खुद के धंधे का मालिक हूं, लेकिन मेरा कोई सम्मान नहीं. भैया, मैं तो बस मोची हूं, मोची.’’

राजप्रसाद की बात सच्ची, पर दमदार थी. उस की पते की बात पर मैं ने कहा, ‘‘राजप्रसाद, तुम बिलकुल सही कहते हो. कोई कुछ भी कहे, अपना काम अपना होता है और दूसरों की नौकरी बजाने से लाख बेहतर होता है.’’

‘‘है न भैया, मैं ने तो अपने बेटे से भी यही कहा था कि इसी जमेजमाए काम को संभाल ले. अगर यहां बैठने में लाज आती है, तो दुकान खुलवाए देता हूं, वहीं 2 लड़के रख लेना.’’

‘‘तो फिर उस ने क्या जवाब दिया राजप्रसाद?’’

‘‘कहने लगा, पापा, आप भी कैसी बातें करते हो? मैं एमबीए कर के दूसरों की जूतियां टांकूंगा क्या? आज छोटी पोस्ट पर हूं, कल बड़ी पोस्ट मिलेगी. आज छोटा पैकेज है, कल बड़ा पैकेज मिलेगा. मु झे भी लगा, बेटा कह तो सही रहा है.’’

‘‘हां, राजप्रसाद. तुम्हारे बेटे ने एमबीए किया है, उस की भी अपनी सोच, अपना स्वाभिमान है.’’

अब तक राजप्रसाद ने मेरी सैंडल पौलिश कर दी थी. मैं ने उस से विदा ली.

फिर बहुत लंबे समय तक उधर जाना नहीं हुआ. इस के बाद जब एक दिन उधर जाना हुआ तो मु झे अचानक से राजप्रसाद की याद आई. उस से मिलने को न जाने क्यों मन आतुर था. बहाना वही पुराना, लेकिन इस बार सैंडल नहीं जूतों पर पौलिश कराना था.

लेकिन आज नीम अकेला था. कुछ उदास. उस के नीचे की दुनिया गायब थी. उस जगह को देख कर लगता था, यहां से कोई बहुत पहले अपना तंबू उखाड़ कर ले जा चुका है.

एकबारगी लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि राजप्रसाद इस दुनिया से ही चला गया हो. आज की दुनिया में इस शरीर और सड़क हादसों पर कोई भरोसा नहीं… कब क्या हो जाए.

अब तो दिल की धड़कनों के साथ जिज्ञासा भी बढ़ गई. सामने वाले दुकानदार से पता किया तो उस ने अपने चमकीले दांतों से मुसकान बिखेरते हुए बड़े सम्मान के साथ कहा, ‘‘अच्छा, आप राजप्रसादजी के बारे में पूछ रहे हो.’’

उस के मुंह से ‘राजप्रसाद’ की जगह ‘राजप्रसादजी’ सुन कर तो मैं भी कुछ अचकचाया.

मैं ने सोचा कि कोई गलतफहमी न हो, इसलिए कहा, ‘‘हां, वह राजप्रसाद मोची ही है.’’

‘‘हां जी, हां. मैं भी उन्हीं की बात कर रहा हूं. अब तो उन की जिंदगी बदल चुकी है. वह देखो, वह रहा उन का शोरूम, जिस पर लिखा है ‘राजप्रसाद बूट्स ऐंड शूज’. अब वे वहीं बैठते हैं मालिक बन कर.’’

मैं ने हैरानी से कांच का दरवाजा खोल कर जैसे ही शोरूम में प्रवेश किया, तो मेरी नजर सामने रखे चमचमाते जूतों और चप्पलों पर पड़ी. तभी काउंटर से किसी जानीपहचानी आवाज ने पुकारा, ‘‘अरे भैया, इधर आओ. कितने दिनों के बाद दिखाई दिए हो. आओ बैठो. अरे गुड्डू जाओ, जरा भैया के लिए चाय बोल कर आओ.’’

‘‘अरे नहीं, राजप्रसादजी,’’ मैं उन का रुतबा और शानोशौकत देख कर उन के नाम में ‘जी’ लगाने से खुद को रोक नहीं पाया.

‘‘अरे भैया, हम कोई ‘जी’ नहीं हैं. हम वही पुराने वाले राजप्रसाद हैं. हमें ‘राजप्रसाद’ ही बोलिए, आप के मुंह से सुन कर अच्छा भी लगता है और प्रेम की मिठास भी आती है. पुराने दिन याद आते हैं.’’

मैं ने सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘‘लेकिन, यह तो बताओ कि यह सब हुआ कैसे?’’

‘‘भैया, यह सब तो बेटा देव ही बताएगा. उसी की जबान से सुनना. बड़ा मजा आएगा. बड़ी रोचक कहानी है. बस, कुछ ही देर में वह आने वाला है.’’

यह सुन कर मैं उस रोचक किस्से को सुनने के लिए उतावला हो उठा.

कुछ ही देर बाद उस शोरूम के सामने एक चमचमाती कार आ कर रुकी. उस में से बनाठना एक स्मार्ट नौजवान उतरा. वही हमारे मोची का बेटा था. ऐसा लगता था कुदरत ने जैसे उसे फुरसत के पलों में गढ़ा था, बेहद हैंडसम.

राजप्रसाद ने उस का और मेरा परिचय कराया. उस ने पैर छू कर मेरा आशीर्वाद लिया.

तब राजप्रसाद ने उस से कहा, ‘‘बेटा देव, ये मेरे बहुत पुराने परिचित हैं, लेखक भी हैं. ये तुम से कुछ जानना चाहते हैं. इन से कुछ भी मत छिपाना.’’

देव मुझे अपने केबिन में ले गया. तब उस ने मुझे अपना रोचक किस्सा सुनाना शुरू किया.

‘‘जी अंकल, एमबीए करने के बाद मेरी नौकरी एक बड़ी कंपनी में लग गई. जब मैं पहले दिन अपने औफिस गया, तो वहां बेला को देख कर चौंक गया.’’

‘‘यह बेला कौन है बेटा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अंकल, बेला से मेरी जानपहचान बचपन से थी. वह मेरे ही महल्ले में रहती थी. बेला को पहले से ही पता था कि मेरी नौकरी वहां लगने वाली है.

‘‘जैसे ही मैं अपने औफिस में पहुंचा, बेला खटाक से वहां आई और बोली, ’’आ गया चिकने. क्या तु झे पता नहीं था कि मैं यही पर हूं? चल, अब देखती हूं तुझे.’’

‘‘अरे बाप रे, कोई लड़की ऐसे बोलती है क्या?’’ मैं ने हैरानी से कहा.

‘‘अंकल, उस की बात मत पूछो. वह बचपन से ही मुंह भरभर कर गालियां बका करती थी. जैसे उस का मुंह न हो, गालियों की खान हो. मांबहन की गालियां तो हरदम उस के होंठों पर ही रहती थीं.

‘‘खैर, उस समय तो बेला वहां से चली गई, लेकिन मेरे दिल में सिहरन पैदा कर गई, क्योंकि वह क्या कर सकती है, इस का अंदाजा लगाना भी मुश्किल था.’’

‘‘अरे देव, ऐसा क्यों कहते हो? क्या बेला इतनी बुरी थी?’’

‘‘अंकल, आप आगे का किस्सा सुनो, फिर आप ही फैसला करना कि वह कैसी थी.’’

‘‘अच्छा सुनाओ, अब तो तुम ने इस किस्सागोई में मेरी दिलचस्पी और बढ़ा दी. आखिर कैसी थी बेला, यह जानने को मैं उतावला हो उठा हूं.’’

‘‘अंकल, मु झे भी अपना बचपन याद आ गया, जब बेला और मैं बचपन में साथसाथ खेला करते थे. जैसेजैसे हमारा बचपन पीछे छूटा और हमें लड़कालड़की के फर्क का पता चला, तो धीरेधीरे हमारा साथसाथ खेलनाकूदना भी छूट गया.

‘‘वह कदकाठी में भी मेरे से बड़ी लगती थी. आप को तो मालूम ही होगा कि लड़कियां लड़कों से पहले बड़ी हो जाती हैं.’’

‘‘हां बेटा, आगे सुनाओ.’’

‘‘अंकल, बेला अलग ही मिजाज की थी. उसे लड़कों से दोस्ती करना खूब पसंद था. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही उस ने कई बौयफैं्रड बना लिए थे. बातबात पर आंख मारना उस की आदत बन गई थी.

वह मु झे भी अपना बौयफ्रैंड बनाना चाहती थी, लेकिन मु झे तो पढ़नेलिखने से ही फुरसत नहीं थी.’’

इस कहानी में मुझे रस आ रहा था. मैं ने कहा, ‘‘देव, बड़ी अजीब और रसीली लड़की थी बेला.’’

‘‘हां अंकल, वह ऐसी ही थी रोमांटिक टाइप. बेला ने 12वीं क्लास तक आतेआते सारी हदें पार कर दी थीं.

वह अपने यारों के साथ खूब इधरउधर घूमा करती थी. उस के बारे में बहुतकुछ सुनने को मिलने लगा था.

‘‘ऐसा लगता था कि अब वह खुल कर खेलने लगी है. लेकिन एक दिन मेरे साथ कुछ अलग हुआ.’’

‘‘क्या हुआ था देव? क्या तुम ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था?’’

‘‘नहीं अंकल, मै इन बातों में था ही नहीं. हुआ यह कि एक दिन बेला ने मु झे किसी लड़की से बातें करते देख लिया.’’

‘‘तो इस में कौन सी बड़ी बात थी. आजकल तो यह बड़ी सामान्य सी बात है.’’

‘‘अंकल, यह किसी और के लिए सामान्य बात हो सकती थी, लेकिन बेला के लिए नहीं. अगले दिन कालेज से लौटते वक्त बेला ने मु झे एक सुनसान सी जगह पर रोक लिया और छूटते ही गाली दे कर बोली, ‘क्यों बे, बहन के… चिकने. उस लौंडिया से बहुत हंसहंस कर बातें कर रहा था. मु झ से बातें करते हुए तेरी… में आग लग जाती है. तु झे मजा चाहिए तो यह ले…’ कह कर उस ने मु झे दोनों हाथों से पकड़ लिया और जबरदस्ती मेरे होंठ और गाल चूम लिया.

मैं अपनेआप को उस से छुड़ा कर जाने लगा, तो वह मुसकराई और कहा, ‘जा बेटा, आज तो सड़क पर था छोड़ दिया, लेकिन तू बचने वाला नहीं. और अगर आज के बाद किसी और लौंडियाफौंडिया से बात की, तो फिर देख लेना…’’

‘‘अरे देव, बेला की इतनी हिम्मत?’’

‘‘अंकल, मेरे मन में बेला ने दहशत पैदा कर दी थी. इस के बाद किसी लड़की से बात करने से पहले मैं हजार बार सोचता था और पहले चारों तरफ नजरें घुमा कर देख लेता था कि कहीं आसपास बेला तो नहीं है.’’

‘‘ओह, पर वह लड़की थी ही ऐसी. न शर्म, न लिहाज.’’

‘‘लेकिन अंकल, वह पढ़ाई में भी बहुत काबिल थी, तभी तो औफिस में भी वह मेरे से ऊंचे ओहदे पर थी. फिर भी मैं सबकुछ भूल कर अपने काम में लग गया.

‘‘बाद में बेला के बारे में बहुतकुछ सुनने को मिलने लगा था. लेकिन औफिस में दिखावे के लिए बड़ी सतीसावित्री बनी घूमती थी और अपने काम में कोई चूक नहीं होने देती थी.’’

‘‘फिर भी देव, वह चैन से तो न बैठी होगी…’’

‘‘अंकल, कुछ दिन तो वह ऐसे ही मु झ से मिलने की नाकाम कोशिश करती रही, लेकिन बेला जैसी लड़की ऐसी अनदेखी को बरदाश्त नहीं कर पाती है. एक दिन बेला सीधे मेरे औफिस में पहुंच गई और उस ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. मु झे उस के इरादे का जरा सा भी अहसास नहीं था.’’

‘‘आखिर क्या था उस का इरादा देव?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अंकल, मु झे बताते हुए भी शर्म आती है. पहले वह मेरे पास आ कर मु झ से सट कर खड़ी हुई. मैं ने बचने की कोशिश की, तो मेरे गालों पर चिकोटी काटते हुए गंदी गाली दे कर बोली, ‘बच कर कहां भागता है. ले ले न तू भी जवानी के मजे.’

‘‘अंकल, तभी मैं ने उसे डपटते हुए कहा, ‘बेला, तुम पागल हो गई हो क्या? दूर हटो.’

‘‘लेकिन, ऐसा लगता था, जैसे वह आज हवस की पुजारिन बन कर आई हो. उस ने अपनी शर्ट के ऊपर के
2 बटन खोले, अपनी ब्रा ऊपर की और बोली, ‘ले ले जवानी का मजा.’’’

‘‘ओह देव, यह तो हद हो गई. कोई लड़की ऐसा करती है भला. यह तो सीधेसीधे जबरदस्ती की कोशिश थी.’’

‘‘अंकल, मैं ने खुद को बचाते हुए उसे जोर से धक्का दिया. उस का सिर दीवार में जा कर लगा. वह चिल्लाई, ‘बाहर जा कर बताऊंगी सब को. तू मु झ से जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहा था. आज भी दुनिया ऐसे मामलों में औरतों की बातों पर यकीन करती है मर्दों की नहीं.’

‘‘वह तो अपने कपड़े ठीक कर के मेरे औफिस से बाहर चली गई, लेकिन उस की बात सुन कर मैं घबरा गया. तभी मेरी नजर सामने सीसीटीवी कैमरे पर पड़ी.

कुछ देर के लिए मु झे तसल्ली हुई कि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. फिर भी अपना शक दूर करने के लिए चपरासी को बुला कर पूछा कि सीसीटीवी कैमरा काम कर रहा है कि नहीं. उस ने बताया कि यह खराब है और इस को बदला जाना है. अब मेरा पक्ष रखने वाला कोई नहीं था.’’

‘‘फिर तो तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ होगा?’’

‘‘हां अंकल, मु झे बहुत जलील कर के औफिस से निकाला गया. मेरी एक न सुनी गई. तब मु झे समाज में ऐसे मामलों में आदमी और औरत के होने का फर्क सम झ में आया.’’

‘‘क्या कोई पुलिस कंप्लैंट हुई तुम्हारे खिलाफ?’’

‘‘बस अंकल, यही एक मेहरबानी हुई. कंपनी ने किसी बखेड़े में न पड़ते हुए मु झे नौकरी से बरखास्त कर दिया. जब मैं कंपनी के औफिस से बाहर निकल रहा था, तब बेला के कड़वे करेले से शब्द मेरे कानों में पड़े, ‘मोची का बेटा है, मोची का बेटा ही रहेगा. अब जिंदगीभर उस नीम के पेड़ के नीचे बैठ कर दूसरों की जूतियां गांठ…’

‘‘मैं बेला के इन कड़वे शब्दों को सुन कर तिलमिला उठा.’’

‘‘यह सुन कर कोई भी तिलमिला जाता देव. यह तुम्हारा सब्र और सम झदारी थी, जो तुम ने इस जहर के प्याले को पी लिया. कोई और होता तो बखेड़ा खड़ा कर देता… फिर?’’

‘‘इस घटना के बाद मेरा मन नौकरी से भी उचट गया. मैं ने पापा से बात की, तो उन्होंने मु झे घर बुला लिया और मोची की दुकान खोलने की बात कही. लेकिन मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था.

‘‘मैं जूतों का एक शोरूम खोलने के मूड में था. कुछ पैसा पापा के पास था, कुछ बैंक से लोन लिया और कानपुर की एक जूता कंपनी 20 फीसदी रकम पहले देने पर शोरूम के लिए माल उठवाने के लिए तैयार हो गई. बाकी पापा का अनुभव और मेरी मेहनत थी. बस, यही मेरी कहानी थी अंकल.’’

‘‘लेकिन देव, मेरी नजर में तो कहानी अभी अधूरी है. आखिर बेला का क्या हुआ?’’

तब देव ने हंसते हुए कहा, ‘‘अंकल, आप ने भी कैसा सवाल पूछ लिया? वह जो चाहती थी, उसे वह मिला. मैं जो चाहता था, मुझे वह मिला.’’

‘‘मतलब…?’’ मैं ने हैरानी से पूछा. मु झे लगा कि कहानी में अभी भी कोई मोड़ है.

‘‘मतलब यह कि कंपनी को जल्दी ही बेला की असलियत पता चल गई. सुनने में आया कि उसे कंपनी से धक्के मार कर बाहर निकाला गया. उस की गंदी हरकतों की वजह से उस का अपने परिवार से पहले ही नाता टूट चुका था, किसी और ने भी उस का साथ नहीं दिया. उस का जोड़ा हुआ पैसा कब तक चलता?’’

‘‘फिर, क्या किया उस ने?’’

‘‘फिर उसे कहीं नौकरी न मिली. उस ने शहर तक बदले, लेकिन अपनी हरकतें न बदलीं. उस के बदनाम किस्से उस से पहले दूसरी जगह पहुंच जाते. वह जलील होती और उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता.

काश, उस ने कंपनी और शहर बदलने के बजाय अपनी हरकतें बदली होतीं.’’

‘‘अब कहां पर है वह देव?’’

‘‘अंकल सुना है कि वह अब मेरठ की बदनाम गली का हिस्सा बन चुकी है. वही दलदल, जिस में गिर कर कभी कोई औरत बाहर नहीं आती.’’

मेरी कहानी पूरी हो चुकी थी. मैं चाय पी कर और बापबेटे से विदा ले कर बाहर आया. मैं एक नजर कामयाबी की उस सीढ़ी पर डालने से खुद को रोक न सका, जिस पर एक मोची के बेटे का फलसफा लिखा था ‘राजप्रसाद बूट्स ऐंड शूज’.

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