Social Story: हद हुई पार

Social Story: आज से 10 साल पहले अफरोज से रहमान का निकाह बहुत धूमधाम से उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के एक गांव नारायणपुर में हुआ था. उस वक्त रहमान की उम्र 32 साल थी, जबकि अफरोज की उम्र महज 19 साल थी.

रहमान देखने में जितना साधारण था, उस के उलट अफरोज देखने में उतनी ही खूबसूरत और स्मार्ट थी. तकरीबन साढ़े 5 फुट कद की गोरीचिट्टी, गदराए बदन की अफरोज की खूबसूरती के क्या ही कहने थे. जो भी उसे देखता, बस देखता रह जाता.

और देखता भी क्यों न. अफरोज थी ही बला की खूबसूरत. सुर्ख गाल, गुलाबी होंठ, कालेघने लंबे बाल, संगमरमर की तरह चमकता बदन और मोती की तरह दमकते दांत, ऊपर से उठी हुई उस की मदमस्त छातियां, जो उस की खूबसूरती में चार चांद लगा देती थीं.

खूबसूरती के मुकाबले अगर अफरोज आसमान थी, तो रहमान जमीन था. उन दोनों का मिलन होना कोई आसान काम नहीं था, पर रहमान का मुंबई में अच्छाखासा कारोबार और खूब पैसा होने की वजह से उन दोनों का निकाह आसानी से हो गया था.

शादी के 10 दिन बाद ही रहमान अपने अब्बा, भाईबहन और सब रिश्तेदारों को छोड़ कर अफरोज को मुंबई अपने साथ ले गया था.

शादी के एक साल बाद ही अफरोज एक बेटी की मां बन गई. बेटी पा कर वे दोनों बहुत खुश थे. उन की जिंदगी बड़े मजे से गुजर रही थी. यही वजह रही कि अफरोज ने शादी के 9 साल में ही 4 बच्चों को जन्म दे दिया था, जिन में सब से बड़ी 2 बेटियां थीं और उन के बाद 2 बेटे थे.

शादी के इतने साल के बाद अफरोज काफी मोटी हो गई थी. उसे अपने बढ़ते हुए वजन की चिंता होने लगी थी, तो खुद को फिट रखने के लिए उस ने जिम जाना शुरू कर दिया था, जिस में रहमान को कोई एतराज नहीं था. वह तो उस की खुशी में ही अपनी खुशी समझता था.

अफरोज जिम जाती और 1-2 घंटे में वापस आ जाती. उस का वजन कम होने लगा और कुछ ही महीनों की कड़ी मेहनत से उस ने अपनेआप को फिट बना लिया था.

अब अफरोज की पतली कमर और उभरी हुई मस्त छातियां एक अलग ही गजब ढाती थीं. कोई भी उसे देख कर यह नहीं कह सकता था कि वह 4 बच्चों की मां है. 30 साल की उम्र के करीब होने के बाद भी वह 20 साल की लड़की दिखाई देती थी.

अफरोज का ज्यादातर पहनावा टीशर्ट और जींस था. रहमान को भी उस के इस पहनावे से कोई एतराज नहीं था, क्योंकि उस की खुशी में ही वह अपनी खुशी समझता था.

वक्त के साथसाथ और काम के दबाव में रहमान जल्दी बूढ़ा दिखाई देने लगा था. उन दोनों को साथ देख कर कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा पाता था कि वे मियांबीवी हैं. रहमान तो उस के सामने अब ‘अंकल’ लगने लगा था.

धीरेधीरे अफरोज को रहमान के साथ चलने में भी शर्म महसूस होने लगी और वह जब कहीं बाहर जाती, तो उस से कहती, ‘‘तुम घर पर बच्चों को देखो. मैं अकेले ही शौपिंग कर के आती हूं. बस, तुम अपना एटीएम कार्ड मुझे दे दो.’’

पर कहते हैं कि जब कोई इनसान गुनाह करता है, तो वह भले ही कितनी भी सावधानी बरत ले, उस का राज खुल ही जाता है. ऐसा ही कुछ अफरोज के साथ भी हुआ.

रहमान के कई मिलने वालों और पड़ोसियों ने अफरोज को किसी लड़के के साथ बाइक पर आतेजाते देखा और उसे यहां तक बता दिया कि अफरोज का चक्कर उस के जिम ट्रेनर के साथ चल रहा है.

यह सुन कर रहमान के पैरों तले जमीन ही खिसक गई कि जिसे वह दिलोजान से प्यार करता है, जिस की हर ख्वाहिश वह पूरी करता है, वह उसे धोखा दे रही है.

शाम को जब अफरोज देर से घर आई, तो रहमान ने उस से देर से आने की वजह पूछी.

अफरोज ने रहमान को यह कह कर टाल दिया, ‘‘मैं अपनी एक सहेली के घर चली गई थी.’’

अफरोज का यह झूठ सुन कर रहमान को बहुत गुस्सा आया और वह चिल्लाया, ‘‘तुम अपनी सहेली या बौयफ्रैंड के साथ थी?’’

यह सुन कर अफरोज हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘क्या बोल रहे हो तुम… मैं भला तुम से झूठ बोलूंगी क्या? मैं अपनी सहेली के साथ थी.’’

रहमान ने उस से पूछा, ‘‘कौन सी सहेली? जरा उस का मोबाइल नंबर दो. मैं उस से बात करता हूं.’’
इस पर अफरोज गुस्से से पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गई और बोली, ‘‘हां, मैं अपने बौयफ्रैंड के साथ बाहर गई थी.’’

यह सुन कर रहमान ने उस से कहा, ‘‘अब तुम्हें जिम जाने की कोई जरूरत नहीं है. आज से तुम घर में ही रहोगी और जब भी कहीं बाहर जाओगी, मेरे साथ ही जाओगी.’’

इस पर अफरोज गुस्से से बोली, ‘‘मैं देखती हूं कि कौन मुझे अकेले जाने से रोकता है.’’

रहमान ने अफरोज को सख्ती से कहा, ‘‘मेरे जीतेजी तुम बिना मेरी इजाजत के इस घर से बाहर कदम नहीं रख सकती. अगर तुम ने ऐसा किया, तो अच्छा नहीं होगा. मैं दूसरी शादी कर लूंगा. फिर करना अपने मन की.’’

अफरोज हंसते हुए बोली, ‘‘इस उम्र में कौन तुम से शादी करेगी… यह तो मेरा अहसान समझ जो मैं अपने से इतनी बड़ी उम्र के आदमी से शादी की और तुम्हें इतनी खूबसूरत बीवी मिली’’

यह सुन कर रहमान को और गुस्सा आ गया और वह बोला, ‘‘तुम्हारा घमंड तभी चकनाचूर होगा, जब मैं दूसरी शादी कर के इसी घर में नई दुलहन ले कर आऊंगा,’’ कहते हुए वह अपने कमरे में सोने चला गया.

रहमान दूसरी शादी की सिर्फ धमकी दे कर अफरोज का घमंड तोड़ना चाहता था, ताकि वह सही रास्ते पर आ जाए, पर उस का ऐसा सोचना गलत साबित हुआ.

एक दिन रहमान ने अफरोज के सामने अपने एक दोस्त को फोन किया और उन से अपनी दूसरी शादी करने के लिए लड़की देखने को कहा.

यह सुन कर अफरोज ने एक कातिल हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘एक बीवी तो संभाली नहीं जाती, उस की जिस्मानी जरूरत पूरी नहीं की जाती, दूसरी का ख्वाब देख रहे हो. वह 2-4 दिन में ही तुम्हें छोड़ कर चली जाएगी. पहले अपना इलाज तो करा लो. औरत को खुश करने के लायक तो बन जाओ.

‘‘तुम क्या सम?ाते हो कि औरत को केवल पैसा चाहिए? अरे पागल इनसान, उसे अपनी जिस्मानी जरूरत भी पूरी करनी होती है, जो तुम्हारे बस की बात नहीं.’’

अफरोज का यह जुमला सुन कर रहमान दंग रह गया और उसे यह समझते देर न लगी कि अफरोज उस से संतुष्ट नहीं होती, उस की जिस्मानी इच्छा अधूरी रह जाती है, इसलिए उस ने बाहर का रुख किया.

रहमान ने कहा, ‘‘ओह, अगर जवान लड़की न सही, तो मैं किसी हमउम्र औरत से ही शादी कर लूंगा.’’

यह बात सुन कर अफरोज के दिमाग में एक जुर्म ने जन्म ले लिया और उस ने रहमान को अपने रास्ते से हटाने का प्लान बना लिया.

अब अफरोज ने रोजाना रहमान के दूध में नशे की गोलियां मिलाना शुरू कर दिया, लेकिन जब इस से बात नहीं बनी, तो एक दिन उस ने रहमान के खाने में चूहेमार दवा डाल दी.

रहमान ने जैसे ही खाना खाया तो कुछ ही देर में उस की हालत बिगड़ने लगी और वह तड़पने लगा. तभी उस की बड़ी बेटी रोने लगी और पड़ोस वाले अंकल को अपने पापा की तबीयत खराब होने के बारे में बोली.

तभी फौरन 2-3 लोगों ने रहमान को अस्पताल पहुंचाया, जहां कुछ देर के इलाज के बाद उस की तबीयत में सुधार आ गया.

डाक्टर ने रहमान से पूछा, ‘‘आखिर तुम क्यों खुदकुशी करना चाहते हो, जो तुम ने जहर खा लिया?’’

रहमान कुछ नहीं बोला, पर वह इतना समझ गया कि हो न हो अफरोज ने खाने में उसे कुछ दिया था.
कुछ दिन बाद जब रहमान अस्पताल से घर वापस आया तो उसे चूहेमार दवा रसोईघर में मिल गई, जो न कभी वह लाया था और न ही उन के घर में चूहे थे.

रहमान ने वह चूहेमार दवा अफरोज को दिखाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती जो अपने ही शौहर को मार कर बेवा होना चाहती हो… अगर तुम्हें अपना खयाल नहीं है, तो कम से कम इन बच्चों का तो खयाल करती, जिन्हें तुम यतीम बनाना चाहती हो.’’

अफरोज बोली, ‘‘कौन से बच्चे? इन बच्चों को क्या मैं अपने घर से लाई थी? तुम्हारी औलाद है, तुम जानो. मुझे किसी से कोई मतलब नहीं.

‘‘तुम भी तो दूसरी शादी कर के इन बच्चों और मेरा हक छीन कर दूसरों को देना चाहते हो. जब तुम्हें अपने बच्चों की परवाह नहीं, तो मैं क्यों करूं?’’

रहमान ने अफरोज को समझाते हुए कहा, ‘‘अगर मुझे कुछ हो जाता, तो तुम भी जेल जाती और बच्चों के सिर से मांबाप दोनों का साया उठ जाता. अफरोज, इस घर को मत तोड़ो. बच्चों की खातिर तुम भी सुधर जाओ.’’

इस पर अफरोज बोली, ‘‘तो तुम मुझ पर पाबंदी क्यों लगा रहे हो? तुम ने मुझे घर में कैद क्यों किया है?

मेरी भी जिंदगी है, मेरे भी कुछ अरमान हैं. मैं इस चारदीवारी में घुटघुट कर नहीं जीना चाहती, भले ही उस के लिए कुछ भी करना पड़े.’’

अफरोज किसी भी कीमत पर मानने को तैयार न थी. फिर कुछ दिन बाद रहमान काम पर जा रहा था, तो एक कार वाले ने उसे टक्कर मार दी और वह जमीन पर गिर कर बेहोश हो गया.

वहां मौजूद कुछ लोगों ने रहमान को अस्पताल पहुंचाया और जब उसे होश आया, तो उस का एक हाथ टूट चुका था, सिर पर कई जगह गहरी चोट आई थी.

रहमान के होश में आने के बाद 2 पुलिस वाले आए और उन में से एक पुलिस वाले ने उस से सवाल पूछा, ‘‘तुम्हारी किसी से कोई दुश्मनी है क्या, जो तुम्हारी जान लेने की खातिर तुम पर हमला हुआ? कार वाला तुम्हें जानबूझ कर टक्कर मार कर वहां से भाग गया था. क्या यह एक सोचीसमझी साजिश तो नहीं थी?’’

रहमान सम?ा गया कि यह हमला अफरोज ने ही कराया होगा, पर अगर वह उस के खिलाफ पुलिस को बता देता, तो पुलिस अफरोज को गिरफ्तार कर लेती, तब बच्चों का क्या होता?

रहमान की हालत तो ऐसी थी कि वह उठ भी नहीं सकता था, इसलिए उस ने पुलिस से कहा, ‘‘नहीं, मेरी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. और भला कोई मुझे मारने की कोशिश क्यों करेगा?’’

पुलिस वाले रहमान का स्टेटमैंट ले कर चले गए. 10 दिन बाद उसे भी अस्पताल से छुट्टी मिल गई और वह घर आ गया.

रहमान ने अफरोज से पूछा, ‘‘यह हमला तुम ने ही कराया था न?’’

अफरोज गुस्से में बोली, ‘‘मैं क्यों कराऊंगी?’’

रहमान ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘क्यों तुम मेरी जान के पीछे पड़ी हो? अगर मेरा खयाल नहीं है, तो कम से कम इन बच्चों का खयाल तो करो.’’

अफरोज ने कहा, ‘‘तुम मुझ पर झूठा इलजाम लगा रहे हो. अगर तुम्हें मुझे अपने साथ नहीं रखना, तो मेरा हक दे दो, फिर मैं तुम्हारी जिंदगी से चली जाऊंगी.’’

रहमान ने उस से कहा, ‘‘यह मेरे सवाल का जवाब नहीं हुआ. तुम कहां जाना चाहती हो और कौन सा हक मांग रही हो?’’

अफरोज बोली, ‘‘वह हक जो एक बीवी का उस के शौहर की जायदाद में होता है. वही हक जो मेरा तुम्हारी जायदाद में इसलाम के हिसाब से और कानून के हिसाब से बनता है.’’

रहमान ने अफरोज को साफ शब्दों में समझा दिया, ‘‘मेरी सारी प्रोपर्टी और पैसा सिर्फ मेरे बच्चों का है, उसे मैं किसी को नहीं दूंगा. तुम कुछ भी कर लो… चाहे मुझे मार दो, पर मैं वह तुम्हें और तुम्हारे उस आशिक को नहीं दूंगा, जिस के लिए तुम यह हरकतें कर रही हो.’’

यह सुन कर अफरोज चिल्लाई, ‘‘इस जायदाद पर मेरा भी हक है और वह मैं ले कर रहूंगी, चाहे उस के लिए मुझे कोई भी हद पार करनी पड़े. अगर तुम अपनी खैरियत चाहते हो, तो मुझे मेरा हक दे दो, उस के बाद तुम अपने रास्ते और मैं अपने रास्ते.’’

रहमान ने उस से कहा, ‘‘मैं वकील को बुला कर अपनी सारी जायदाद अपने बच्चों के नाम कर दूंगा, फिर ले लेना तुम आप हक.’’

अफरोज ने भी अपना फैसला सुना दिया, ‘‘ठीक है… तुम अपना काम करो और मैं अपना. आज से तुम्हारा रास्ता अलग और मेरा रास्ता अलग…’’ कहते हुए उस ने अपना बैग पैक किया और घर छोड़ कर चली गई.
अफरोज के जाने से रहमान को दुख तो बहुत हुआ, पर उसे यह भी उम्मीद थी कि 1-2 दिन में वह थकहार कर वापस आ जाएगी.

पर रहमान का ऐसा सोचना गलत साबित हुआ और अफरोज नहीं आई, बल्कि उस का कानूनी नोटिस आया, जिस में उस ने रहमान पर मारपीट और जबरन कैद के साथसाथ रेप और दहेज का मुकदमा दर्ज कर दिया. साथ ही, उस ने रहमान के घर वालों, जो गांव में रहते थे, को भी इस सब में लपेट दिया.

मुकदमा चालू हो चुका था. अब अफरोज रहमान से एक ही बात कहती कि या तो 50 लाख रुपए नकद और एक फ्लैट उस के नाम किया जाए, वरना वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगी.

रहमान अफरोज की धमकी में इतनी आसानी से नहीं आने वाला था, क्योंकि बच्चे उस के पास थे और उस ने भी इरादा कर लिया था कि चाहे जो हो जाए, पर वह उसे इतनी आसानी से कुछ नहीं देगा.

मुकदमा चलता रहा. तारीख पर तारीख लगती रही. रहमान और उस के परिवार वालों ने अपनी जमानत करा ली थी. फिर एक दिन रहमान के पास अफरोज का फोन आया और वह बोली, ‘तुम मेरा हक दे दो, वरना तुम्हारे लिए ठीक नहीं होगा.’

रहमान ने उस से साफसाफ कह दिया, ‘‘तुम भले ही मुझे मरवा दो, पर मैं तुम्हें कुछ नहीं दूंगा. यह सब मेरे बच्चों का है,’’ यह सुन कर अफरोज ने गुस्से में फोन काट दिया.

इस के बाद अफरोज का कोई अतापता नहीं चला कि वह कहां है, किस के साथ है और क्या कर रही है. न उस ने कभी रहमान और बच्चों से मिलने की कोशिश की, न कभी कोई फोन किया और न ही उन का तलाक हुआ. केस की तारीख पर भी वह नहीं आई, तो केस खत्म हो गया.

अब रहमान अपने बच्चों को पाल रहा है, पर उस के भीतर एक अनजाना डर भी है कि कहीं अफरोज उसे या बच्चों को कोई नुकसान न पहुंचा दे.

Social Story: धंधेबाज

Social Story: चालाक आंखें, दिमाग में खुराफात और हर पल रुपया कमाने की उधेड़बुन के साथ वह अपनी आवाज को एकदम मधुर रखता है. अपनी बनावटी आवाज को उस ने एक कामयाब मुखौटा बना रखा है.

उस का नाम छलिया है. जैसा नाम वैसा गुण. छलिया अपनी फितरत और हर हरकत में कपटी है, चालबाज है. आज वह इस शहर में जमीन का दलाल है, मगर कभी वह निपट देहाती हुआ करता था और उस के काम ही ऐसे थे कि एक दिन उसे अपना गांव रातोंरात छोड़ कर वहां से भागना पड़ा था.

दरअसल, छलिया कुछ रुपयों के लालच में गांव के लड़कों को बीड़ीसिगरेट पीने की लत लगा रहा था. वह गांव की अच्छीभली कालेज जाती लड़कियों को मौडल बन कर ऐशोआराम की जिंदगी जीने के खूबसूरत सपने दिखाया करता था. अपने भाईबहनों में सब से छोटा छलिया अपनी बुजुर्ग, लाचार मां के लिए भी एक नासूर बन चुका था.

यह सोच कर छलिया का ब्याह कराया गया कि वह अपनी खुराफात से तोबा कर लेगा, मगर पत्नी को भी उस ने अपने जैसा बना लिया था. खेती में उस का मन लगता नहीं था. उसे मवेशी की देखभाल करना पसंद नहीं था. सुबह से रात तक वह कुछ न कुछ प्रपंच करता रहता था.

दमा से पीडि़त छलिया की बीमार मां एक दिन उसे ‘अब तो सुधर जा रे छल्लू’ कहते हुए इस दुनिया से विदा हो गई. इस के बाद तो छलिया और ज्यादा आजाद हो गया.

मगर एक दोपहर छलिया को गांव की पंचायत ने यहां से फौरन दफा हो जाने का आदेश दे ही दिया और यह होना ही था. उस ने काम ही ऐसा किया था. शहर के एक राजनीतिक दल से सांठगांठ कर के उस ने गांव के इंटर कालेज और स्कूल के छात्रों को गलत रास्ते पर चल कर आत्मदाह और प्रदर्शन के लिए उकसाया था. मिठाई, सिगरेट, शराब और मांस भी बांटा था.

इस में कमीशन के तौर पर छलिया को भी खूब रुपया मिला था, मगर समय रहते किसी ने मुखबिरी कर दी थी. उस का भांडा फूट गया था और छलिया को आननफानन में पंचायत के सामने पेश किया गया था.

छलिया इतनी मोटी चमड़ी का बना हुआ था कि वह पत्नी और अपने एक साल के बेटे को ले कर बेशर्मी से कोई टपोरी सा गीत गाता हुआ गांव की सरहद पार कर गया. शहर में बलुआ तो उस का पुराना यार था ही.

बलुआ ही तो तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, पान मसाला का सप्लायर था. उस ने छलिया को एक गैस्ट हाउस में 150 रुपए प्रतिदिन पर कमरा दिलवा दिया. छलिया को रोजगार की चिंता थी ही नहीं. कितनी ही तरकीबें थीं उस के शातिर दिमाग में.

कबाड़ी महल्ले जा कर बलुआ के होलसेल के गोदाम से छलिया ने 2 थैले उठाए और अगले दिन सुबह 8 बजे रेलवे स्टेशन के बाहर की सड़क से मटर गली, वहां से पुरानी मंडी, फिर सदर बाजार और मेला मैदान होता हुआ दोपहर तक 8-9 किलोमीटर तक हो आया. तब तक उस के थैले से पान मसाला, सुपारी, अगरबत्ती, बीड़ी, सिगरेट, कंडोम वगैरह अच्छेखासे बिक चुके थे.

दोपहर को उसी गैस्ट हाउस में छलिया ने पत्नी के साथ लंच किया. इस के बाद वह गहरी नींद में ऐसा सोया कि रात को साढ़े 10 बजे ही जागा.

छलिया ने बगल में गौर से देखा कि पत्नी और बेटा तो बेसुध पड़े हुए थे. जागते ही भविष्य की सोच में मगन छलिया ने अंदाजा लगाया कि अभी 1-2 महीने तक इसी गैस्ट हाउस में समय काट लेना चाहिए.

खानापीना, रहना सब मिला कर 700 रुपए लग रहे हैं.

यही सब सोचता हुआ छलिया गैस्ट हाउस से बाहर आ गया. बाहर काफी सुनसान था. वह पैदल चलता रहा. इस से पहले भी वह शहर आता रहता था, मगर इतनी रात के समय उस ने शहर को पहली बार ही देखा था.

छलिया को तेज पेशाब आया. एक कोना खोज कर वह पेशाब कर रहा था कि एक महंगी कार आ कर रुकी. कुछ ही पल में एक बाइक आई. घने अंधेरे में 2-3 लोग आए और आपस में बातें करने लगे.

एक आदमी कह रहा था, ‘‘आजकल तो फोन पर बात करना बहुत खतरनाक हो गया है. दफ्तर में तो जासूस हैं.

कोई भी जगह महफूज नहीं है, इसीलिए यहां बुला कर आमनेसामने बात कर रहा हूं.’’

वह बाइक सवार था. सब ने गरदन हिलाई. वह बाइक वाला आगे बोला, ‘‘यह जो रामनगर में औषधि वाला सरकारी पार्क बन रहा है न, उस के आसपास की बहुत सारी जमीन कब्जे की है, बेनामी है. वहां अगर तुम लोग अपने फड़ लगा लो या कोई धार्मिक स्थल बना लो या फिर कोई प्याऊ भी लगा लो, तो बाद में हौलेहौले इसे किसी बाहरी को बेच देना. मुझे यही बताना था. और हां, यह रहा इस जगह का पूरा नक्शा.’’

बाकी सभी लोग बेहद खुश लग रहे थे. बताने वाले आदमी के कंधे थपथपाए जा रहे थे.

कुछ और बातें आपस में कहसुन कर कार वाला एक दिशा में, तो बाइक वाला दूसरी दिशा में चल दिया.

उधर कोने में छिपा छलिया एकएक बात सुन चुका था. इस वक्त के घने अंधकार में उस को जगमग रोशनी दिखने लगी. वह हंसने लगा. उस शातिर की बांछें खिल उठीं.

अगली सुबह छलिया थैला उठा कर फेरी वाला बनने के बजाय सीधा बलुआ के पास गया. उस को पिछली रात का सारा मामला कह सुनाया.

बलुआ ने उसे गले से लगा लिया. अब वे दोनों सामान जमा करने निकल पड़े. दोपहर तक रामनगर के उस पार्क के साथ सटी जमीन का एक कोना घेर लिया और वहां पर तुलसी और पीपल के पौधे रोप दिए.

छोटेछोटे पोस्टर लगा दिए, जिन में लिखा था कि ‘यह पावन जगह है. थूकने और पेशाब करने की सख्त मनाही’.

देवताओं के चित्र लगा कर गुल्लक रख दिए. ?ाडि़यां लगा दीं. चारों तरफ गेरू का लेपन कर के उसे आकर्षण का केंद्र बना दिया. इस के बाद वे दोनों गैस्ट हाउस चले गए.

उन को देखते ही छलिया की पत्नी ने बताया कि वह और बेटा तो नाश्ता और लंच कर चुके हैं. छलिया ने बेटे को खूब प्यार किया. पत्नी को कुछ रुपए दिए और कान में कुछ समझा कर बाहर टहलने भेज दिया.

पत्नी और बेटा जैसे ही बाहर गए, बलुआ और छलिया ने सिगरेट जलाई. अब उन दोनों का दिमाग चलने लगा कि कैसे इस जमीन के टुकड़े को लाखों रुपए में बेच कर रकम अपनी अंटी में डाली जाए. उन को इस बात का तोड़ भी मिल गया. गैरकानूनी धंधे में घुसे किसी भूमाफिया की सरपरस्ती.

10-12 दिन की जुगत के बाद बलुआ को एक ऐसा जमीन माफिया मिल ही गया. इतने दिन में एक बात और हो चुकी थी. उस खाली जमीन के 90 फीसदी हिस्से पर जबरन कब्जा हो गया था. एक प्याऊ, एक बंजारा परिवार, एक मूर्ति बनाने और बेचने वाला, एक कबाड़ वाला समेत कुछ छिटपुट प्लास्टिक की मड़ई लग चुकी थीं.

छलिया और बलुआ को अच्छी तरह से पता था कि जिस जरा सी जमीन पर उन दोनों ने कब्जा किया है, उस पर कोई कुछ नहीं कहेगा. वजह यह थी कि यह जमीन कम से कम 2000 वर्गगज तो थी ही, तो 150 वर्गगज में कोई बवाल किसलिए खड़ा करेगा. दूसरा, उन दोनों ने इस में धार्मिक प्रतीक लगा कर इसे संवेदनशील बना दिया था.

चारों तरफ के कब्जे को अच्छी तरह से देखते हुए बलुआ ने छलिया को बताया, ‘‘देखो, ये सब लोग फर्जी हैं, बनावटी हैं. इन सब को दिहाड़ी दे कर बिठाया गया है. जमीन का सौदा होते ही ये सब ऐसे गायब होंगे जैसे कि यहां थे ही नहीं,’’ कह कर वह खामोश हो गया.

‘‘तुम इन के बारे में इतना सब जानते हो?’’ छलिया ने हैरत से पूछ लिया, तो बलुआ बोला, ‘‘अरे हां, मैं तो इन के परिवारों को भी जानता हूं. आज 6 राजनीतिक दल हैं शहर में. ये लोग 300 रुपए रोज के हिसाब से सभी की रैली, प्रदर्शन, जुलूस, नारेबाजी में शामिल होते हैं. बाकी समय में ये लोग शादी में रोटियां बनाने का, लाइट उठाने का काम करते हैं.

‘‘एक और बात… सूने घरों की रेकी भी इन से कराई जाती है. एक रात की रेकी और पुख्ता जानकारी के 500 रुपए तक मिल जाते हैं इन को. छलिया, यह सब सच है. यह शहर इसी तरह इन को पाल रहा है.’’

वैसे छलिया को इस शहर के काफी सारे दबेछिपे रंग और काली करतूतें पहले से ही पता थीं, आज एक और जानकारी मिल गई थी. इस बीच कभीकभार वह थैले ले कर फेरी लगा लेता था. बस, 5 घंटे के दौरान ही वह दिन के 500 रुपए आराम से कमा लेता था, मगर छलिया को इतने से संतुष्टि कहां मिलने वाली थी.

उसे तो अपनी दोनों जेब लाखों रुपए से लबालब चाहिए थीं.

इसी बीच छलिया की पत्नी ने भी एकाध बार शिकायत कर दी थी कि कुछ दिन तो आराम करते हुए मजा आया, मगर अब तो गैस्ट हाउस में बैठेबैठे दम घुट रहा है. टैलीविजन भी कितना देखे. आंखें दुखने लग गई हैं.

तब छलिया ने पत्नी के लिए सिलाई मशीन खरीद दी. बेटे के लिए इतने खिलौने थे कि जरूरत से ज्यादा. वह इतना छोटा था कि अभी ढंग से बोल नहीं सकता था, शिकायत नहीं कर सकता था. छलिया ने पत्नी को भी सुनहरे सपने दिखा रखे थे.

कुछ दिन बाद बलुआ और छलिया को एक भूमाफिया मिल ही गया. नगरपालिका से नकली कागज और नक्शे निकलवाना उस के लिए बाएं हाथ का खेल था. उस ने चारों तरफ देखा. यह जमीन उस की जहरीली नजर से आज तक बच कर रह कैसे गई. वह हैरत में था.

बलुआ और छलिया की कब्जाई 150 गज जमीन की असली कीमत तो 60-70 लाख रुपए के आसपास थी, मगर उन को केवल 7 लाख रुपए नकद दे कर भूमाफिया ने उन को धमका कर, खबरदार भी कर दिया कि खयाल रहे, यह बात कहीं खुलनी नहीं चाहिए… बलुआ और छलिया ने वहीं के वहीं कसम खा ली.

छलिया ने सारी रकम बलुआ को थमा दी. बलुआ ने उस के हिस्से के रुपए से पगड़ी की रकम दे कर एक फ्लैट किराए पर दिला दिया. बचे रुपयों से घरगृहस्थी का जरूरी सामान आ गया.

छलिया की पत्नी को इस बात से कोई लेनादेना नहीं था कि अचानक इतने सारे रुपए किधर से और कैसे आ गए हैं. उसे तो अपना घर अच्छा लगा, चाहे वह किराए का ही था.

छलिया समझ गया कि अब पत्नी को सारा दिन बिजी रहने का काफी काम मिल गया है. अब वह आगे की खुराफात में लग गया.

छलिया ने एक साल के अंदर नशे के कारोबार में भी कुरियर बन कर लाखों रुपए के वारेन्यारे कर लिए थे. अब वह भी प्रोपर्टी डीलर बन गया था. बेटा अब 4 साल का था और नर्सरी स्कूल में जा रहा था. छलिया काले धंधे में रमने लगा था. अपने घर की कोई कहानी उसे पता नहीं थी.

एक दिन छलिया को किसी अनजान आदमी का फोन आया, ‘‘तुम बलुआ को समझाओ, वरना वह जेल जाएगा.’’

बलुआ ने ऐसी कौन सी चूक कर दी? छलिया तुरंत फोन करने वाले से मिलने गया.

फोन करने वाला एक दमदार पुलिस वाला था. उस को पक्की खबर मिली थी कि उस के थाने के तहत जो रंगोली कालोनी है, वहां बलुआ एक शादीशुदा औरत के साथ एक साल से गलत रिश्ता बनाए हुए है. उस औरत के पति ने रिपोर्ट दर्ज कराई है. एक वीडियो भेजा है, जिस में बलुआ और उस आदमी की पत्नी आपस में जिस्मानी रिश्ता बना रहे हैं.

वहां जा कर छलिया ने यह सब सुना, तो अपना पसीना पोंछ कर अपनी घबराहट को छिपाया. बलुआ को फोन लगाया, पर वह उठा ही नहीं रहा था. मन में कुछ शक पैदा हुआ. वह सीधा रंगोली कालोनी पहुंच गया. बलुआ वहीं मिल गया. एक औरत और बलुआ दोनों चाय पी रहे थे.

उस औरत ने बहुत ही बेढंगे कपड़े पहने हुए थे. बाल बिखरे हुए थे. बलुआ भी काफी थकाथका सा लग रहा था.

छलिया को अचानक देखा तो बलुआ कुछ झेंप गया. बहाना बना कर उस ने चाय जैसेतैसे गटक ली. कुछ पल ठहर कर वह चलता बना. छलिया से वह नजरें नहीं मिला पा रहा था और छलिया इस समय खुद भी उस से नजरें नहीं मिलाना चाहता था.

‘‘शरम नहीं आती. इतना अच्छा पति है, बालबच्चे हैं और उस पर यह करतूत?’’ छलिया ने फटकारा, तो वह औरत अपने जिस्म को हिलाडुला कर बोली, ‘‘प्यार में कैसी शरम?’’

‘‘अगर तेरे पति को बता दूं तो?’’ छलिया ने धमकाया.

‘‘तो मैं अभी आप से लिपट कर एक सैल्फी लूंगी. आप को अपराधी साबित कर दूंगी. फिर आप का दोस्त बलुआ ही आप का दुश्मन होगा. बहुत मजा आएगा.’’

छलिया को समझते देर न लगी कि यह बहुत ही शातिर औरत है. इस ने कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं. लगता है घाटघाट का पानी पी चुकी है, इसीलिए शरम तक नहीं है.

छलिया ने उस औरत को नमस्कार किया. उस के पास और भी काम थे. वह उठा और सीधा पुलिस वाले के पास गया. उस को 1,000 रुपए थमा कर कहा कि 2-4 दिन में सब ठीक हो जाएगा.

अब छलिया ने अपना काम किया. उस के पास सीधी उंगली से घी निकालने के अनेक रास्ते थे. सब से पहले उस ने बलुआ पर अपनी नाराजगी जाहिर तक न होने दी, मगर उस औरत के पति का सारा हिसाबकिताब पता लगाता रहा. वह हर महीने 7 दिन के दौरे पर बाहर जाता ही जाता था. छलिया ने पुलिस वाले को 2-3 हजार और टिका दिए. उस ने मुंह बंद रखा.

उधर बलुआ बहुत खुश था कि चलो सब ठीक है. उन दोनों का मिलना बदस्तूर जारी था. छलिया जानता था
कि ईमानदार पति किसी न किसी दिन कांड कर के ही छोड़ेगा. कुछ न कुछ तो करना ही था. इसी में छलिया की भी सुरक्षा थी.

अगर बलुआ गिरफ्तार होता तो छलिया के बचने की भी न के बराबर गुंजाइश थी. कुछ न कुछ ऐसा हो ही जाता कि छलिया को भी सलाखों के पीछे जाना होता.

अब छलिया ने अगला कदम यह उठाया कि इधर उस औरत का पति दौरे पर गया और उधर उस औरत के मासूम बालक का स्कूल के बाहर से अपहरण किया गया. फिरौती की रकम के तौर पर लाखों रुपए की मांग की गई और पति से यह अपहरण छिपाए रखने को भी कहा गया.

साथ ही, उस औरत के सारे फोन टेप कराए. उस औरत ने सीधे बलुआ से बात की और बलुआ ने छलिया से. हर तरह से कठपुतली की डोर अब छलिया के हाथ में ही थी.

उधर जैसे ही बलुआ से 2 लाख रुपए की मांग की, तो बलुआ ने उस से हमदर्दी जताने की जगह उस को खरीखोटी सुना दी. पिछले ही महीने महंगी दारू की शौकीन वह औरत 70 हजार की दारू बलुआ के रुपयों से गटक गई थी.

बलुआ ने अब उस से कन्नी काटने का संकल्प कर लिया था. छलिया ने उस के हावभाव पढ़ लिए थे. यही मौका था. छलिया ने अपनी पत्नी को फोन किया कि उस के दोस्त का जो बालक उस के घर पर रह रहा है, उस को तैयार कर के बाहर भेजो. उस के मातापिता लौट आए हैं.

छलिया की पत्नी ने बताया कि वह बालक तो यहां बहुत खुश है. उस को छलिया के बेटे के रूप में एक बड़ा भैया मिल गया है. खैर, बहुत ही होशियारी से उस मासूम को सकुशल घर भेज दिया गया.

अब तक बलुआ को खबर नहीं थी कि उस के पीछे क्या साजिश चल रही थी. छलिया ने शहर के बड़े साहब से मिल कर उस औरत के पति का तबादला करवा दिया. 10 दिन में कहीं दूरदराज तबादला भी हो गया था. सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी.

अब तो धंधेबाज छलिया इतने रुतबे वाला था कि दौलतमंद होने के साथसाथ सरकार में भी असर रखता था. 1-2 दिन बाद छलिया और बलुआ वापस अपने काले धंधे पर लग गए.

हैरानी की बात उस औरत के साथ थी. उस का साढ़े 3 साल का मासूम बालक उन लोगों की रहरह कर तारीफ करता था, जो उस का अपहरण कर के ले गए थे. उस घर में एक बड़ा भाई भी था, जो उसे गिनती और कविता सिखाता था. बगैर फिरौती के उस औरत के बेटे को 2-3 दिन में छोड़ दिया गया था.

Family Story: बुढ़ापे का सहारा

Family Story, लेखक – एस. अग्रवाल

‘‘मां जी, ओ मांजी, कुछ खाने के लिए दे दो, बहुत भूखा हूं. सुबह से कुछ भी खाया नहीं है.’’

बाहर से आती इस आवाज ने मेरा ध्यान खींचा. जो किताब मैं पढ़ रही थी, उसे मेज पर रख कर मैं ने खिड़की से बाहर झांका. 9-10 साल का एक हट्टाकट्टा एक लड़का बेचारे की तरह खड़ा था.

ऐसे भिखारियों को देख कर मैं नफरत से भर उठती हूं. देश की देह पर मुझे कोढ़ जैसे दिखते हैं. ये ही तो हैं, जो देश को खाए जा रहे हैं. निठल्ला रह कर पेट भरते रहना ही इन का काम है और फिर हमारे देश में भिखारियों को भीख दे कर ‘पुण्य’ कमाने वाले लोग जब मौजूद हों, तो ये लोग बिना काम किए क्यों नहीं खाना चाहेंगे?

गुस्सा तो तब और आता है, जब मैं किसी भिखारी को नसीहत देती हूं. यह समझाने की कोशिश करती हूं कि वह काम कर के क्यों पेट नहीं भरता, तो वह बड़े ढीठपन से जवाब देता है, ‘देना है तो दो नहीं तो भाषण मत झाड़ो…’ और बड़ी बेशर्मी से गालियां देते वह आगे बढ़ जाता है. किसी दूसरे के सामने हाथ फैला देता है.

इसी गुस्से से भर कर मैं ने खिड़की के पास से ही उस लड़के से कह दिया, ‘‘शर्म नहीं आती भीख मांगते हुए? काम क्यों नहीं करते?’’

वह लड़का बोला, ‘‘मांजी, आप किवाड़ तो खोलिए. मैं भिखारी नहीं हूं.’’

न जाने क्यों उस की आवाज सुन कर मैं ने चाहा कि उस बच्चे के बारे में जानूं. मैं ने दरवाजा खोला और थोड़ी कड़क आवाज में पूछा, ‘‘क्या है?’’

वह सामने खड़ा था. मैलेकुचैले कपड़े, थकी हुई देह पर जमी हुई गंदगी, जैसे कई दिनों से नहाया न हो.

मुझे देखते ही वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘मांजी, मैं ने सुबह से कुछ नहीं खाया है. बहुत भूखा हूं. कुछ खाने के लिए हो तो दे दो.’’

न जाने क्यों, मुझे उस लड़के पर दया आई. सुबह यह सोच कर अपने लिए खाना बना गई थी कि कालेज से आ कर खा लूंगी, लेकिन मन कुछ ठीक नहीं था, इसलिए वह खाना वैसे ही पड़ा हुआ था. खाने की इच्छा भी नहीं थी.

मैं ने उस से कहा, ‘‘अभी रुक, मैं खाना लाई.’’

पहले चिटकनी बंद की. सोचा कि पता नहीं कौन है? कैसा है? उस के सामने किवाड़ खुले छोड़ कर रसोई में जाना ठीक नहीं था. किसी अनजाने पर भरोसा करना मुसीबत को न्योता देना था, चाहे वह बच्चा ही क्यों न हो.

रसोई में जा कर अपना खाना एक थाली में रखा और उस के सामने ले आई. हलके मजाक के अंदाज में कहा, ‘‘देख भई, मैं तो अकेली हूं. इतना ही खाना खाती हूं. पता नहीं, तेरा पेट भरेगा या नहीं.’’

वह लड़का खाने की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘मांजी, यह तो बहुत है. मेरा पेट भर जाएगा.’’

वह लड़का मेरे सामने ही बैठ कर खाने लगा. उस के खाने के ढंग से ऐसा नहीं लग रहा था कि वह भुक्खड़ या भिखारी हो. जब वह दोनों रोटियां खा चुका तो पानी के लिए मेरी ओर देखने लगा.

मैं ने अंदर जा कर दरवाजे की चिटकनी बंद की और एक गिलास में पानी उस के सामने ला कर रख दिया. हालांकि, बारबार चिटकनी लगाना और फिर खोलना मुझे बहुत खल रहा था और वह भी उस काम के लिए, जिसे मैं ने कभी सपने में भी बढ़ावा नहीं दिया. हालांकि, मैं मशीन की तरह उस के लिए सब कर रही थी. शायद उस में ऐसी कोई बात थी.

जब वह लड़का पानी पी चुका तो मैं ने सवाल भरी निगाहों से उस की ओर देखा. वह मेरे सवाल को ताड़ गया, इसलिए खुद ही बोल पड़ा, ‘‘मांजी, मैं भिखारी नहीं हूं. सुबह से अपने बाप को ढूंढ़ रहा हूं. वह न जाने कहां चला गया है. भीख मांगने की मेरी थोड़ी भी इच्छा नहीं थी, इसलिए सुबह से कई बार पानी पीपी कर अपनी भूख को शांत करता रहा, लेकिन अभी भूख काबू से बाहर हो गई थी, इसीलिए आप के पास चला आया.’’

बातचीत के ढंग से वह लड़का ठीक लग रहा था. शायद कुछ पढ़ालिखा भी था.

मैं ने पूछा, ‘‘क्यों? क्या हुआ तेरे बाप को?’’

उस ने जो कहानी सुनाई, उसे सुनने के बाद मेरा दिल दहल उठा.

वह लड़का गरीब तबके का था, फिर भी उस के परिवार का 2 समय का खर्चापानी खेतीबारी से चल जाता था. वे लोग 3 भाई थे. फिर हालात ने ऐसा पलटा खाया कि उस की मां बच्चा जनने के दौरान चल बसी.

नन्ही सी जान भी 2 दिनों के बाद मर गई. गांव वालों ने जिद कर के उस के बाप की दूसरी शादी करा दी. उस से एक लड़की है.

नई मां कड़क है. दिनभर कंघीचोटी, साजसिंगार में ही लगी रहती है. घर में उस के आते ही खेतीबारी सब बिक गई. अब बाप मजदूरी करता है, लेकिन उस से सब का पेट नहीं भरता, इसलिए वह उसे यहां ले आया, ताकि उसे कहीं नौकरी दिलवाई जा सके.

इतना सब बता कर वह लड़का थोड़ी देर रुका. मैं मन ही मन सोचने लगी, ‘हमारे यहां अभी कहां खिला है बचपन? यह बेचारा भी किसी बड़े साहब की नखरैल लुगाई की डांट और गाली सहेगा और किसी पालतू
कुत्ते की तरह दुम हिलाता उन्हीं के दरवाजे पर पड़ा रहेगा. बलि का बकरा बनाने के लिए ही तो इस का बाप इसे यहां…’

लेकिन फिर तुरंत इस विचार को मैं ने झटक दिया, सोचा, ‘अगर काम नहीं करेगा तो बेचारा खाएगा क्या? हम लोग बातें चाहे जितनी ऊंचीऊंची करें लेकिन कड़वी सचाई यही है कि गरीबी सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी है. छोटे बच्चे अगर काम नहीं करेंगे तो पेट नहीं भर सकते.’

मैं ने उस लड़के से पूछा, ‘‘तेरा नाम क्या है?’’

‘‘जी, सोमा. मैं सोमवार को पैदा हुआ था न, इसीलिए मेरा नाम सोमा रख दिया,’’ कह कर वह मुसकरा दिया. इतनी देर में पहली बार मैं ने उसे मुसकराते हुए देखा था.

उस लड़के की यह कहानी सुन कर मेरा कलेजा पिघल आया था. मैं ने पूछा, ‘‘कहां गए तेरे पिताजी?’’ उसी की तरह ही पिता को बाप कहना अब मुझे अच्छा नहीं लग रहा था.

उस लड़के ने बताया, ‘‘उस रिश्तेदार का जो पता बापू साथ लाए थे, वह कागज न जाने कहां गिर गया. कल से हम इस शहर में मारेमारे फिर रहे हैं. आज सुबह बापू ने चाय की एक दुकान के सामने मुझे बैठा दिया और अभी आया कह कर न जाने कहां चला गया. ‘‘मैं 4-5 घंटे दुकान के बाहर बैठा रहा, उस के बाद से बापू को खोजते हुए इधरउधर भटक रहा हूं. 3-4 बार वापस जा कर, चाय की दुकान पर भी पूछ आया लेकिन वहां सब ने मना ही कहा.’’

हालात की भयंकरता को भांप कर मैं यह जान गई थी कि वह कभी नहीं आएगा. गरीबी के सांप ने ममता को डंस लिया था. सोमा का पिता उसे इस अनजान शहर में अकेले अपने भरोसे छोड़ कर खिसक गया था.

‘‘अब क्या करेगा तू?’’

‘‘मांजी, मुझे मालूम है कि वह मुझे अकेला छोड़ गया है, अब वह कभी लौट कर नहीं आएगा,’’ उस ने कहा. उस के तेज दिमाग पर मुझे अचरज हुआ.

‘‘फिर?’’

‘‘अब मैं वापस नहीं जाऊंगा. जा कर करूंगा भी क्या? मेरा बाप मुझे फिर धोखे से किसी दूसरे शहर में छोड़ देगा. घर जाऊंगा तो मां बहुत मारेगी,’’ उस के चेहरे पर खौफ झलक आया.

मेरे सामने पहला सवाल यही था कि मैं उसे कहां रखवाऊंगी? मैं तो इस शहर में किसी को ज्यादा जानती भी नहीं थी. मैं ने मन ही मन फैसला लिया, फिर उस से पूछा, ‘‘कुछ पढ़ेलिखे हो?’’

‘‘चौथी पास की थी गांव की पाठशाला में. फिर नई मां आई तो उस ने पढ़ना छुड़ा दिया.’’

फिर कोई भी बात कहने पर वह लड़का घर की सब बातें और सौतेली मां के जोरजुल्म को बताने लगता.

‘‘आगे पढ़ना चाहते हो?’’

‘‘हां,’’ वह चहक कर बोला.

‘‘तो तुम आज से मेरे पास ही रहो. यहीं काम करना, पढ़नालिखना. खाना, कपड़ा सब दूंगी.’’

उस की बांछें खिल गईं. मेरे पैरों पर पड़ता हुआ वह बोला, ‘‘मांजी, मैं यहीं रहूंगा.’’

मैं ने उसे उठाते हुए कहा, ‘‘अरे… यह क्या कर रहे हो? और देखो, मुझे मांजी नहीं, सिर्फ ‘मां’ कहा करना.’’

उस ने खड़े हो कर मुझे देखा. उस की नजरों से अपनापन झलक रहा था. मुझे भी न जाने क्यों यह अहसास हो रहा था कि उस पर भरोसा किया जा सकता है.

उसे अपने पास रखने में शायद मुझे भी फायदा था. इन दिनों हमारे कालेज में बुजुर्ग लोगों की पढ़ाईलिखाई पर काफी जोर दिया जा रहा था. यहां तक कि प्रौढ़ शिक्षण संस्थान केंद्र के निदेशक वगैरह भी आ कर पढ़ाया करते थे. अगर बुजुर्ग न मिले तो अनपढ़ बच्चों को ही पढ़ाने की बात वे लोग कहते थे, क्योंकि इस संस्थान का असल मकसद अनपढ़ता को दूर करना था, फिर वह बड़ों में हो या बच्चों में.

हालांकि, सोमा बिलकुल अनपढ़ नहीं था, फिर भी ज्यादा पढ़ने की लगन उस में थी. मैं ने भी सोचा कि पढ़ालिखा कर अगर मैं ने उसे होनहार नागरिक बना दिया, तो देश के प्रति मैं अपना थोड़ा सा फर्ज
निभा सकूंगी.

शुरूशुरू में 2-3 दिनों तक उसे परखने की नजर से मैं अंदर के कमरे में ताला लगा कर कालेज जाती थी. बाहर का छोटा कमरा ही उस के लिए खुला छोड़ती. पता नहीं पीछे से घर का सामान ले कर ही चंपत हो जाए. धीरेधीरे मुझे उस पर भरोसा हो गया और मैं पूरा घर उसी के भरोसे छोड़ कर जाने लगी.

सोमा मेरे यहां रह कर कई काम सीख गया. मैं ने उस के लिए किताबें ला दी थीं, जिन्हें वह बड़े मन से पढ़ता था. घर का सब काम भी वह कर लेता था. लेकिन गैस के चूल्हे का काम मैं ने उसे जानबूझ कर अभी नहीं सिखाया था. बच्चा ही तो था, कहीं कोई अनहोनी न हो जाए, इसीलिए मैं सुबह खाना बना कर जाती थी. जब मैं लौटती, तब उस के साथ खाना खाती.

कभीकभी वह मेरे पास आ कर बैठ जाता और अपने परिवार वालों की बातें बताता. अपने दोनों भाइयों और बहन की उसे बहुत याद आती थी.

सोमा खूब मन लगा कर पढ़ता.

5-6 साल में वह इस लायक हो गया कि हाई स्कूल का इम्तिहान दे सके. खुद पढ़ने वाले छात्र के रूप में उस का आवेदनपत्र भरवा कर मैं ने दिया. उस में उस का नाम सोमप्रकाश लिखाया. तब मेरी हैरानी की सीमा नहीं रही, जब वह पहले दर्जे में पास हुआ.

इसी तरह वह हर साल इम्तिहान देता रहा. देखते ही देखते उस ने राजनीतिशास्त्र में अच्छे अंकों से एमए कर लिया और फिर पास के ही एक स्कूल में टीचर के रूप में उस की नौकरी लग गई.

अब वह अच्छी कदकाठी का नौजवान हो गया था. अपने कालेज के एक क्लर्क की बेटी से मैं ने उस की शादी करा दी थी.

कुछ ही दिनों के बाद उस का दूसरे शहर में तबादला हो गया. वह अपनी घरवाली को ले कर वहां चला गया था. अकसर उस की चिट्ठी आती रहती थी. वह मजे में था. वहां आने के लिए मुझ से कहता था. जबतब मुझ से आ कर मिल भी जाता.

दिन, महीने और साल पंख लगा कर उड़ते रहे. आज मैं अपनी नौकरी पूरी कर के खाली बैठी थी. 35 साल की नौकरी के बाद बड़ा खालीपन और अकेलापन लग रहा है. शायद इसी समय के लिए कही गई मेरी मां की यह बात मुझे याद हो आई, ‘बेटी, शादी कर ले वरना बुढ़ापा काटना मुश्किल हो जाएगा.’

मां की याद आते ही मेरी आंखों में आंसू झलक आए. तभी दरवाजे पर थपथपाहट हुई.

चश्मा उतार कर साड़ी के पल्ले से अपनी आंखें पोंछते हुए मैं ने दरवाजा खोला तो देखा कि सामने सोमप्रकाश अपनी पत्नी के साथ खड़ा था. दोनों ने मेरे पैर छुए.

सोमप्रकाश बोला, ‘‘मां, आज आप मेरे साथ चलेंगी.’’

मैं चौंकी. सोचा कि उसे मेरे रिटायरमैंट का दिन याद है. मेरा गला भर आया.

मैं ने आशीर्वाद देते हुए रुंधे गले से कहा, ‘‘हां बेटा, जरूर चलूंगी.’’

अगले ही पल मैं ने सोचा कि मैं अकेली कहां हूं. कभी मैं ने सोमा को सहारा दिया था. मुझे संतोष इस बात का था कि मैं ने एक इनसान को दुनिया की अंधेरी गलियों में भटकने से बचा लिया था और आज वही मेरी रोशनी बन गया था.

Romantic Story: सच्चा प्यार

Romantic Story: कामना एक मिडिल क्लास परिवार की लड़की थी. वह 3 बहनों में सब से बड़ी थी. बड़ी होने के चलते घर की जिम्मेदारी भी उसी पर थी. मम्मी या पापा बीमार हो जाएं, तो उसे ही स्कूल से छुट्टी लेनी पड़ती थी.

कामना पढ़ाई में होशियार थी. पड़ोस में रहने वाले पंकज से नोट्स ले कर अपना कोर्स पूरा कर लेती थी और हमेशा अच्छे नंबरों से पास हो जाती थी. उम्र बढ़ने के साथसाथ ही उस की क्लास भी बढ़ रही थी. अब वह कालेज में आ गई थी.

पंकज और कामना दोनों एक ही कालेज और एक ही क्लास में थे, इसलिए एकसाथ ही कालेज आतेजाते थे.

पंकज अमीर परिवार से था, इसलिए वह पैसों की कीमत नहीं सम?ाता था. वह हमेशा अपने दोस्तों से घिरा रहता था और क्लास में न जा कर कालेज की कैंटीन में अपना समय बिताता था.

कामना हमेशा पंकज को यही समझाती, ‘‘तुम समय और पैसों की कीमत समझो. अच्छे समय में सब साथ देते हैं, लेकिन बुरे समय में जो साथ दे वही सच्चा साथी है. तुम अपने दोस्तों पर पैसा खर्च करना बंद कर दो, तो तुम्हारे पास जो दोस्तों की भीड़ है, वह चुटकी में गायब हो जाएगी.’’

लेकिन पंकज कामना की बातों को हवा में उड़ा देता था. पंकज के घर वाले कामना को बहुत प्यार करते थे. वे जानते थे कि कामना ही वह लड़की है, जो उन के एकलौते बेटे की जिंदगी में बहार ला सकती है.

दरअसल, पंकज अपनी दादी के लाड़दुलार से बिगड़ गया था. स्कूल में तक तो ठीकठाक नंबरों से पास हो जाता था, कामना भी पढ़ाई में उस की मदद कर देती थी, लेकिन कालेज में आ कर तो उस के रंगढंग ही बदल गए थे. दादी तो उसे जेबखर्च के पैसे देती ही थीं, वह अपने पापा से भी कई बहानों से पैसे मांग लेता था.

इस तरह पूरा साल बीत गया. जब इम्तिहान नजदीक आए, तो पंकज को पढ़ाई याद आई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. उस ने कामना से कहा, ‘‘यार, पढ़ाई में मेरी मदद कर दे.’’

कामना ने अपने सारे नोट्स पंकज को पढ़ने को दे दिए, लेकिन उसे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि नोट्स में क्या लिखा है. उस की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा. अगर वह इस साल फेल हो गया, तो सभी उस का मजाक उड़ाएंगे. पापा और दादी भी पैसे देना बंद कर देंगे.

पूरे इम्तिहान के दौरान पंकज बहुत खामोश रहा. उस ने अपने दोस्तों से मिलना भी बंद कर दिया. लेकिन अब पछताने से क्या होता, कीमती समय तो निकल गया था.

इम्तिहान का रिजल्ट आ गया. पंकज सिर्फ एक सब्जैक्ट में पास हुआ, बाकी सब में फेल हो गया था. घर में सब से डांट पड़ी और कामना का साथ अलग छूट गया.

कामना फर्स्ट डिवीजन में पास हुई थी. उस ने फिर भी पंकज को सम?ाया, ‘‘तुम अब भी मेहनत कर के पास हो सकते हो, बस अपने चापलूस दोस्तों का साथ छोड़ कर पढ़ाई में ध्यान लगाओ.’’

तब तो पंकज ने चुपचाप कामना की बात सुन ली, पर कुछ ही दिनों के बाद पंकज का वही रवैया शुरू हो गया. अब तो कामना ने उस पर ध्यान देना ही बंद कर दिया.

पंकज की दोस्ती इस साल कालेज में आई एक नई लड़की रीना से हो गई. रीना देखने में खूबसूरत थी, लेकिन उस की दोस्ती पंकज के अलावा और भी कई लड़कों से थी. उस का काम लड़कों के साथ घूमनाफिरना और उन से गिफ्ट लेना था.

रीना अपनी सहेली के साथ एक कमरे में रहती थी. उस के चाचाचाची ने उसे पाला था. चाचाजी समय से पैसे भेज देते थे. बाकी समय वे रीना के बारे में कोई खोजखबर नहीं लेते थे. इसी बात का फायदा रीना उठाती थी.

कामना ने जब पंकज को रीना से दूर रहने की सलाह दी, तो पंकज ने उस से कहा, ‘‘तुम रीना की खूबसूरती से जलती हो, इसलिए ऐसा कह रही हो. रीना बहुत अच्छी लड़की है. वह मुझे बहुत चाहती है.’’

पंकज की बात सुन कर कामना ने सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘रीना तुम्हें कितना चाहती है, यह तो वक्त आने पर पता चल ही जाएगा.’’

इस के बाद कामना ने पंकज से बात करना छोड़ दिया.

फरवरी का महीना आ गया था. सभी लोग वैलेंटाइन डे के लिए बेहद जोश में थे. सभी अपने खास दोस्त को खूबसूरत गिफ्ट देना चाह रहे थे.

पंकज ने रीना के लिए खूबसूरत सूट खरीदा और उसे उम्मीद थी कि रीना उस दिन जरूर अपने प्यार का इजहार करेगी, लेकिन होनी को तो और कुछ ही मंजूर था.

एक दिन बाजार से लौटते समय पंकज का कार से एक्सीडैंट हो गया. उसे अस्पताल में एडमिट कराया गया. खबर मिलते ही उस के मम्मीपापा और दादी अस्पताल आए.

पंकज की हालत काफी खराब थी. पत्थर पर गिरने के चलते उस के चेहरे पर काफी चोट थी. सिर पर भी गहरी चोट आई थी. तुरंत ही उस का आपरेशन किया गया.

डाक्टर का कहना था कि पंकज को ब्रेन हेमरेज हुआ है. ठीक होने में थोड़ा समय लगेगा.

कामना भी अपने मम्मीपापा के साथ दूसरे दिन अस्पताल पहुंची. पंकज की मम्मी और दादी का रोरो कर बुरा हाल था. कामना के परिवार ने उन्हें हिम्मत दी.

अगले दिन पंकज के कुछ ही दोस्त उसे देखने आए और कालेज में यह अफवाह फैला दी कि पंकज अब कालेज नहीं आ पाएगा.

कुछ दिन में ही पंकज की हालत में सुधार होने लगा. कामना उस से मिलने आती रहती थी.

पंकज अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था. उसे बोलने में परेशानी थी, लेकिन बात सारी समझ रहा था.

आज 14 फरवरी वैलेंटाइन डे का दिन था. कामना हलके गुलाबी रंग का सूट पहन कर आई थी. आते ही पंकज की मम्मी को खाने का टिफिन दिया और वापस जाने लगी, तो उसे लगा कि अचानक पंकज कुछ बोलने की कोशिश कर रहा है.

कामना ने पंकज की मम्मी को कहा, ‘‘चाची, देखो शायद पंकज कुछ कहना चाह रहा है.’’

पंकज की निगाह दरवाजे पर टिकी थी. उसे रीना का इंतजार था, पर वह एक बार भी उस से मिलने नहीं आई थी.

पंकज की मम्मी ने कामना से पूछा, ‘‘पंकज दरवाजे पर क्यों टकटकी लगाए हुए है?’’

तब न चाहते हुए भी कामना ने रीना और पंकज की दोस्ती के बारे में सब बता दिया.

मम्मी ने पंकज के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटा, रीना तो आज तक एक बार भी तुम्हें देखने नहीं आई. अगर वह तुम से प्यार करती तो तुम्हें देखने तो आती. क्या उसे तेरी फ्रिक नहीं होती? मुझे तो वह लड़की ठीक नहीं लग रही है, लेकिन फिर भी तुम उसे चाहते हो तो हमें यह रिश्ता मंजूर है. लेकिन शादी कुछ साल बाद ही करेंगे.’’

मम्मी की बात सुन कर पंकज के चेहरे की रंगत ही बदल गई.

कामना भी अब वापस कालेज आ गई थी. आते ही उस ने रीना को देखा. वह क्लास के एक लड़के के साथ कार में घूमने जा रही थी.

कामना ने रीना से कहा, ‘‘रीना, तुम पंकज से मिलने एक बार भी नहीं गई. कालेज में तो दिनभर उस के साथ रहती थी. एक बार उस से मिलने चली जाओ, वह तुम्हारा इंतजार कर रहा है.’’

वैसे तो कामना को मालूम था कि रीना पंकज से मिलने नहीं जाएगी, पर पंकज की खुशी की खातिर ही उस ने रीना से यह बात कही.

कामना की बात सुन कर रीना ने हंसते हुए कहा, ‘‘कौन पंकज? मैं किसी पंकज को नहीं जानती. अब वह मेरे किसी काम का नहीं है और मैं बिना काम की चीजों को फेंक देती हूं.’’

तब कामना ने कहा, ‘‘पंकज कोई चीज नहीं है. वह तुम्हारा प्यार है.’’

रीना बोली, ‘‘कौन सा प्यार… मैं ने कभी उस से प्यार किया ही नहीं. बस, मतलब निकाला था. मतलब खत्म, दोस्ती खत्म,’’ इतना कह कर वह उस लड़के के साथ कार में बैठ कर चली गई.

कामना कुछ देर तक वहीं खड़ी रही, फिर क्लास में न जा कर अपने घर आ गई और मम्मी को सारी बातें बताईं.

शाम को कामना अपनी मम्मी के साथ पंकज से मिलने गई और रीना ने जो कहा था उस की पूरी रिकौडिंग पंकज की मम्मी को सुनाई.

पंकज की मम्मी ने कहा, ‘‘मुझे तो पहले से ही मालूम था कि रीना ठीक लड़की नहीं है, लेकिन पंकज को
यह बात समझ नहीं आ रही थी. खैर, जो होता है, अच्छे के लिए होता है.’’

थोड़े दिनों में पंकज काफी हद तक ठीक हो गया और थोड़ाथोड़ा बोलने की कोशिश भी करने लगा.
पंकज की जिद पर उस के मम्मीपापा उसे कालेज लाए. पंकज एक बार रीना को देखना चाह रहा था. कालेज में आते ही उस की नजर रीना को ढूंढ़ने लगी.

तभी रीना अपने नए दोस्त के साथ कैंटीन से निकल रही थी. रीना को देखते ही पंकज खुश हो गया. उसे लगा कि रीना उस के पास आएगी और न मिल पाने का अफसोस करेगी, लेकिन रीना ने पंकज को देख कर भी अनदेखा कर दिया और उस के सामने से निकल कर अपने नए दोस्त की कार में बैठ कर चली गई.

पंकज की आंखों से आंसू निकल पडे़ और वह धीमे और लड़खड़ाते कदमों से अपनी गाड़ी की ओर चल पड़ा. रास्तेभर वह रोता रहा. उस की मम्मी ने भी कहा, ‘‘बेटा, जीभर कर रो ले. ऐसे रिश्ते पर आज के बाद आंसू मत बहाना,’’ फिर उन्होंने कामना द्वारा दी गई रीना की रिकौडिंग सुनाई.

रिकौडिंग सुन कर पंकज फूटफूट कर रोने लगा. उस की मम्मी ने कहा, ‘‘अच्छा हुआ कि मतलबी रिश्ता खत्म हो गया. ऐसा रिश्ता ज्यादा दिन तक नहीं चलता.’’

कालेज से लौटते हुए पंकज के पापा ने कार कामना के घर पर रोक दी. उन का तो पहले से ही वहां आनाजाना था.

पंकज को देख कर कामना ने जल्दी से उस का हाथ पकड़ा और कमरे में ले आई. पुरानी बातों का दौर शुरू हुआ तो समय का पता ही नहीं चला. दोपहर को सब ने साथ ही खाना खाया.

पंकज अब धीरेधीरे ठीक हो रहा था. उस ने फिर से कालेज जाना शुरू कर दिया, लेकिन इस पंकज में और पहले के पंकज में जमीनआसमान का फर्क था.

अब पंकज बहुत चुपचुप सा रहने लगा था. उस के चापलूस दोस्त सब दूर हो गए थे, क्योंकि पंकज घर से कालेज और कालेज से सीधा घर जाता था. कभीकभार कामना के घर चला जाता था.

इसी तरह दिन निकल रहे थे. इस बार पंकज अच्छे नंबरों से पास हुआ था और इस का क्रेडिट उस ने कामना को दिया और अपने मम्मीपापा से कहा, ‘‘अगर कामना नहीं होती, तो मैं डिप्रैशन में चला जाता.’’

पंकज की मम्मी बोलीं, ‘‘जब तुम्हें मालूम है कि कामना ही तुम्हारी सब से अच्छी दोस्त है, तो क्यों मतलबी लोगों को अपना दोस्त बनाते हो?’’

तब पंकज के पापा ने कहा, ‘‘क्यों न पंकज की इस दोस्त को हमेशा के लिए घर ले आएं?’’

मम्मी ने पंकज को देखा, तो पंकज ने अनमने मन से कहा, ‘‘जैसी आप की इच्छा.’’

पापा ने कहा, ‘‘ठीक है. तेरी इच्छा नहीं है तो रहने दे. हम कामना की शादी कहीं और कर देते हैं.’’

यह सुन कर पंकज बोला, ‘‘नहीं पापा, अपनी बचपन की दोस्त को तो मैं किसी और का नहीं होने दूंगा. वैसे भी इस की कीमत मैं ने काफी समय बाद जानी है.’’

पंकज की बात सुन कर मम्मी ने क्यारी से एक गुलाब तोड़ कर पंकज को देते हुए कहा, ‘‘यह गुलाब कामना को दे आया. हमारे लिए तो आज ही वैलेंटाइन डे है.’’

इस के बाद पंकज का परिवार कामना के घर की ओर चल दिया. वहां पहुंच कर पंकज की मम्मी ने सारी बात कामना के परिवार को बताई. पंकज ने गुलाब कामना को दिया. सब ने एकदूसरे को बधाई दी और कामना की बहनों ने गुलाब की बारिश करते हुए पंकज से कहा, ‘हैप्पी वैलेंटाइन डे…’

Family Story: अधब्याहे

Family Story, लेखिका – सुमिता शर्मा

‘‘राघव, तू बहू को घर कब लाएगा?’’ शंभू चाचा ने खटिया पर लेटेलेटे ही सवाल किया.

शंभू चाचा को अनसुना करते हुए राघव तेजी से पुराना कपड़ा ले कर आंगन में खड़ी अपनी मोटरसाइकिल पोंछने लगा.

‘‘सब पर बोझ बन कर बैठे हैं. न घर बसाया, न परिवार. अब पराई औरतों की खबर न रखेंगे, तो भला और क्या करेंगे. अपनी पत्नी को एक बार मायके भेजने के बाद आज तक खोजखबर तक नहीं ली, अब सब की बहुओं की जानकारी चाहिए…’’ बड़बड़ाते हुए मोटरसाइकिल साफ कर के राघव नौकरी पर चला गया.

शंभू चाचा अपनी इस अनदेखी पर मुसकरा कर चुप रह गए.

शायद शंभू चाचा का यही एकमात्र प्रायश्चित था. कभी शंभू चाचा की कही बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी. उन के वचन की लोग गारंटी लेते थे. कहते थे कि बंदूक की गोली बदल सकती है, पर शंभू चाचा की बोली नहीं.

किसे पता था कि यही आन एक दिन शंभू चाचा की जिंदगी को यों तहसनहस कर देगी. अब फौज से रिटायर हो चुके शंभू चाचा की जगह पराई इच्छा पर रहने वाले बो?ा से ज्यादा नहीं थी परिवार में. वे जब तक खर्च करते थे, तब तक जरूरी थे और धीरेधीरे कब गैरजरूरी हो गए, वे खुद ही नहीं जान पाए.

शंभू चाचा को न शादीशुदा कह सकते थे, न ही कुंआरा. गृहस्थी होते हुए भी वे गृहस्थ न थे. उन का कमरा बस सफाई के नाम पर खुलता और बंद होता. दीवार पर टंगी उन के ब्याह की एकमात्र ब्लैक ऐंड ह्वाइट तसवीर ही थी.

चाची से जुड़ी राघव की तो बड़ी धुंधली सी यादें थीं. उन्हें उस ने कभी अपने घर में नहीं देखा था.

शंभू चाचा की जिम्मेदारी संभालना और उन की रोटीपानी करना सब को बोझ लगता, पर चाचा को कोई कभी बोझ न लगा. वे हरसिंगार के पेड़ के नीचे पड़े टिन के शैड के नीचे ही लेटते थे. उन की खटिया ही उन की दुनिया थी.

रात को जब राघव घर लौटा, तो शंभू चाचा ने उसे अपने पास बुला लिया और सम?ाते हुए कहा, ‘‘लल्ला, बात मान ले और गुस्सा थूक कर बहू को घर ले आ.’’

राघव ने गुस्से से दांत पीसते हुए कहा, ‘‘भुगत तो रहा हूं आप की बात मान कर. अगर उस दिन मंडप से उठ जाता, तो आज मजे से दूसरा ब्याह कर चैन से जी रहा होता. समझ भी कौन रहा है मुझे… आप… जिन का घरद्वार कभी बसा ही नहीं.’’

‘‘आज सही चोट किए हो भतीजे,’’ लौहपुरुष माने जाने वाले शंभू चाचा सिर झुकाए, आंखें आंसुओं से सजाए बैठे थे.

‘‘वह क्या है कि हम नहीं चाहते, इस आंगन में एक दूसरा शंभू और बने. अगर तुम्हें किसी की अधब्याही लड़की छोड़ना मर्दानगी लग रहा था, तो न मानते हमारी बात. कौन सा हम ने दुनाली लगा दी थी तुम्हारी कनपटी पर…’’ कहतेकहते शंभू चाचा उस पल में भीतर और बाहर दोनों ओर से मोमबत्ती से पिघलने लगे.

राघव पहली बार शंभू चाचा का यह रूप देख कर पसीज उठा और उन्हें सीने से लगाते हुए बोला, ‘‘बुरा मत मानो चाचा, मेरा आप का दिल दुखाने का मन नहीं था. 6 फुटा फौजी, जिस ने दुश्मन की गोली से खौफ न खाया, वह मेरी बोली से दहल गया?’’

‘‘रघुआ, मुझे भी तेरी चाची बड़ी प्यारी थी, पर उस में बड़ी ऐंठ थी और मु?ा में अपनी बात की टेक थी. मैं सरवन कुमार तो बन गया अपनी मां का, पर तेरी चाची का पति न बन पाया. बस, अपनी बात का धन ही हाथ लगा मेरे.

‘‘वह होती तो हम एकदूजे का सहारा होते, हमारा परिवार होता. आज बुढ़ापे की दहलीज छूने जा रहा हूं, मगर क्या जिंदगी है मेरी, दूसरों पर बोझ हूं,’’ शंभू चाचा के दिल का फोड़ा आज राघव के सामने फूटा था. मवाद ज्वालामुखी के लावे सा बह रहा था.

राघव ने सपने में भी नहीं सोचा था कि हंसमुख और चंचल नदी से बहने वाले शंभू चाचा के मन की तलहटी में दुख की इतनी गाद जमा होगी. उस ने उन्हें जीभर कर रो लेने दिया.

शंभू चाचा के मन का ज्वार अब मंद पड़ चुका था. वे खुद को काबू कर के बोले, ‘‘रघुआ, जो गलती मैं ने की है, उसे तू मत दोहराना बेटा…’’

‘‘गलती… कैसी गलती चाचा?’’ राघव ने हैरानी से पूछा.

शंभू चाचा उस पल में न जाने कितने बरसों पीछे लौट गए. वे शून्य में देखते हुए बोले, ‘‘मैं अपनी शादीशुदा जिंदगी की रत्तीरत्ती सी बात अपनी मां को बताया करता था. आज्ञाकारिता के बेताल ने कभी भी मेरी पीठ से उतरना मंजूर नहीं किया.

‘‘मेरी मां ने मुझे इतना प्यार दिया, मुझ पर इतना ज्यादा हक जमाया कि मुझे अपनी छाया से बाहर निकलने ही नहीं दिया. मां की जिद में तेरी चाची को देशनिकाला दे दिया. अगर मां को समझाया होता तो आज अमरबेल सा दूसरों की गृहस्थी पर न पल रहा होता. वह घर में होती, तो आज तेरे भाईबहन तेरे जितने होते.

‘‘जीवनसाथी की जरूरत इस उम्र में सब से ज्यादा होती है. समय रहते आंखें खोल ले. उस ने जो चाहा सो किया, जो दिखाया सो देखा, यह भांप ही नहीं पाया कि उस के लिए भी मेरा कुछ फर्ज है, जिसे आगपानी की कसमें खा कर अपने साथ ले कर आया हूं. तू खुद ही देख ले कि अब कौन मेरा है और मैं किस का हूं.’’

राघव ने शंभू चाचा को कस कर अपनी बांहों में भींच लिया और उन्हीं की चारपाई पर लेट गया. गृहस्थी का दर्द चाचा के चेहरे की लकीरों में किसी नदी के भंवर सा घूम रहा था.

राघव धीरे से बोला, ‘‘चाचा…’’

‘‘बोल…’’

‘‘दादीदादा तो कब के गुजर गए, तो यह चाची को न लाने की भीष्म प्रतिज्ञा आप कब तक निभाओगे? ले क्यों नहीं आते?’’

‘‘वह भी तो निभा रही है रघुआ, न जाने जिंदा है भी कि नहीं…’’ शंभू चाचा आसमान की ओर ताकते हुए बोले.

अगली सुबह शंभू चाचा देर तक सोए रहे. आंगन में चहलपहल कम थी. राघव की मोटरसाइकिल भी अपनी जगह पर थी.

आज 3 दिन हो गए, शंभू चाचा ने राघव की शक्ल तक नहीं देखी थी. भाभियां भी नाराज रहती थीं. सब को उन के खाली कमरे की जरूरत थी, पर उन्होंने किसी को नहीं सौंपा था.

पूरे 5 दिन के बाद राघव के मैले कपड़े तार पर टंगे देख कर शंभू चाचा को राहत मिली.

‘‘अरे रघुआ, बहू ले आया क्या?’’ शंभू चाचा ने ऊंची आवाज में पूछा.

‘‘हां, चाचा,’’ राघव बाहर आते हुए बोला. उस के पीछे बहू भी चली आ रही थी. उस ने धीरे से आंगन की बत्ती जला दी.

शंभू चाचा को बरसों बाद भी कोने की भीड़ में वह चेहरा न जाने क्यों दिखने लगा, थोड़ी चांदी के साथ.

‘‘शायद बहू के आने की खुशी में बौरा गया हूं मैं,’’ शंभू चाचा ने अपने सिर पर खुद ही चपत लगाते हुए कहा.

‘‘चाचा, जरा अपने कमरे की चाभी दीजिए,’’ राघव उन के पैर छूते हुए बोला, ‘‘बहू को मुंहदिखाई चाहिए.’’

‘‘क्यों नहीं, आज तू ने मेरी बात मान कर मुझे बेमोल खरीद लिया.’’

मगर, यह क्या… बहू तो शंभू चाचा के पैर छू कर सीधे रसोईघर में लौट गई. वे आराम करने के लिए अपनी खटिया खोजने लगे. न मिलने पर बाहर ही चबूतरे पर बैठ गए.

देर रात राघव ने शंभू चाचा को खाने के लिए आवाज लगाई, तब पाया कि उन के कमरे की बत्ती जल रही थी. खिले हुए हरसिंगार की महक आज उस बंद कमरे की सीलन निकाल कर आसपास छाई हुई थी.

चांद की छनती रोशनी में साड़ी पहने एक अजनबी आकृति थाली लिए शंभू चाचा की ओर बढ़ी. वे घबरा कर कमरे की ओर उलटे पैर लौट पड़े.

कमरे में बल्ब की रोशनी में पाया कि यह आकृति राघव की बहू की नहीं, बल्कि उन की पत्नी ब्रजेश कुमारी की थी. बरसों बाद इस तरह सामना होने पर वे कुछ न कह पाए. आंसू दोनों ओर थे.

‘‘खाइए न…’’ यह आवाज सुन कर शंभू चाचा वर्तमान में लौटे. आंगन में हाथ धोते हुए उन्होंने जोर से आवाज लगाई, ‘‘रघुआ…’’

‘‘क्या बात है चाचा…’’ राघव शर्ट पहनता हुआ आया.

‘‘बहू नहीं लाया क्या…?’’

‘‘लाया हूं न चाचा… आप की भी और अपनी दादी की भी. उस दिन आप की बातें और आप की सूनी आंखों ने मुझे विरह की बड़ी दुखद तसवीर दिखाई, तब मैं ने कसम खाई कि दुलहन के साथ चाची की भी वापसी होगी.’’

‘आप मुझ में खुद को देख रहे थे, तो क्या मैं आप में खुद को नहीं देख सकता… इतिहास नहीं दोहराया जाएगा,’ खुद से इतना कह कर राघव अपनी ससुराल निकल गया था उस दिन.

‘‘पता तो मालूम था चाचा मुझे, पर चाची इतने बरसों बाद दुलहन के साथ मुझे देख कर पहले तो पहचान ही न पाईं, पर जब पहचान लिया, तब लिपट कर खूब रोईं, तो एक लंबे अरसे का मवाद बह गया.

‘‘बस, हम भी अड़ कर बैठ गए और तभी माने, जब हम ने उन से वचन ले लिया हमारे साथ चलने का. अब उस कमरे में उस की मालकिन का स्वागत कीजिए. अब हम अधब्याहे नहीं हैं.’’

जीवनसाथी के साथ का जगमग दीया उन दोनों के विरह का अंधेरा दूर कर चुका था.

Romantic Story: मुझे कबूल नहीं – क्यों रेशमा ने सगाई तोड़ दी?

Romantic Story: अब्बाजान की प्राइवेट नौकरी के कारण 3 बड़े भाईबहनों की पढ़ाई प्राइमरी तक ही पूरी हो सकी थी. लेकिन मैं ने बचपन से ही ठान लिया था कि उच्चशिक्षा हासिल कर के रहूंगी.

‘‘रेशमा, हमारी कौम और बिरादरी में पढ़ेलिखे लड़के कहां मिलते हैं? तुम पढ़ाई की जिद छोड़ कर कढ़ाईबुनाई सीख लो,’’ अब्बू ने समझाया था.

मेरी देखादेखी छोटी बहन भी ट्यूशन पढ़ा कर पढ़ाई का खर्च खुद पूरा करने लगी. 12वीं कक्षा की मेरी मेहनत रंग लाई और मुझे वजीफा मिलने लगा. इस दरमियान दोनों बड़ी बहनों की शादी मामूली आय वाले लड़कों से कर दी गई और भाई एक दुकान में काम करने लगा. मैं ने प्राइवेट कालेजों में लैक्चरर की नौकरी करते हुए पीएचडी शुरू कर दी. अंत में नामचीन यूनिवर्सिटी में हिंदी अधिकारी के पद पर कार्यरत हो गई. छोटी बहन भी लैक्चरर के साथसाथ डाक्टरेट के लिए प्रयासरत हो गई.

मेरी पोस्टिंग दूसरे शहर में होने के कारण अब मैं ईदबकरीद में ही घर जाती थी. इस बीच मैं ने जरूरत की चीजें खुद खरीद कर जिंदगी को कमोबेश आसान बनाने की कोशिश की. लेकिन जब भी अपने घर जाती अम्मीअब्बू के ज्वलंत प्रश्न मेरी मुश्किलें बढ़ा देते.

‘‘इतनी डिगरियां ले ली हैं रेशमा तुम ने कि तुम्हारे बराबर का लड़का ढूंढ़ने की हमारी सारी कवायद नाकाम हो गई है.’’

‘‘अब्बू अब लोग पढ़ाई की कीमत समझने लगे हैं. देखना आप की बेटियों के लिए घर बैठे रिश्ता आएगा. तब आप फख्र करेंगे अपनी पढ़ीलिखी बेटियों पर,’’ मैं कहती.

‘‘पता नहीं वह दिन कब आएगा,’’ अम्मी गहरी सांस लेतीं, ‘‘खानदान की तुम से छोटी लड़कियों की शादियां हो गईं. वे बालबच्चेदार भी हो गईं. सब टोकते हैं, कब कर रहे हो रेशमा और नसीमा की शादी? तुम्हारी शादी न होने की वजह से हम हज करने भी नहीं जा सकते हैं,’’ अम्मी ने अवसाद उड़ेला तो मैं वहां से चुपचाप उठ कर चली गई.

यों तो मेरे लिए रिश्ते आ रहे थे, लेकिन बिरादरी से बाहर शादी न करने की जिद अम्मीअब्बू को कोई फैसला नहीं लेने दे रही थी.

शिक्षा हर भारतीय का मूल अधिकार है, लेकिन हमारा आर्थिक रूप से कमजोर समाज युवाओं को शीघ्र ही कमाऊपूत बनाने की दौड़ में शिक्षित नहीं होने देता. नतीजतन पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी कौम आर्थिक तंगी, सीमित आय में ही गुजारा करने के लिए विवश होती है. यह युवा पीढ़ी की विडंबना ही है कि आगे बढ़ने के अवसर होने पर भी उस की मालीहालत उसे उच्च शिक्षा, ऊंची नौकरियों से महरूम कर देती है.

उस दिन अब्बू ने फोन किया. आवाज में उत्साह था, ‘‘तुम्हारे छोटे चाचा एक रिश्ता लाए हैं. लड़का पोस्ट ग्रैजुएट है. प्राइवेट स्कूल में नौकरी करता है तनख्वाह क्व8 हजार है… खातेपीते घर के लोग हैं… फोटो भेज रहा हूं.’’

‘‘दहेज की कोई मांग नहीं है. सादगी से निकाह कर के ले जाएंगे,’’ भाईजान ने भी फोन कर बताया.

अब्बू और भाईजान को तो मुंहमांगी मुराद मिल गई. मैंने फोटो देखा. सामान्य चेहरा. बायोडाटा में मेरी डिगरियों के साथ कोई मैच नहीं था, लेकिन मैं क्या करती. अम्मीअब्बू की फिक्र… बहन की शादी की उम्र… मैं भी 34 पार कर रही थी… भारी सामाजिक एवं पारिवारिक दबाव के तहत अब्बू ने मेरी सहमति जाने बगैर रिश्ते के लिए हां कर दी.

सगाई के बाद मैं वापस यूनिवर्सिटी आ गई. लेकिन जेहन में अनगिनत सवाल कुलबुलाते रहे कि पता नहीं उस का मिजाज कैसा होगा… उस का रवैया ठीक तो होगा न… मुझे घरेलू हिंसा से बहुत डर लगता है… यही तो देख रही हूं सालों से अपने आसपास. क्या वह मेरे एहसास, मेरे जज्बात की गहराई को समझ पाएगा?

तीसरे ही दिन मंगेतर का फोन आ गया. पहली बार बातचीत, लेकिन शिष्टाचार, सलीका नजर नहीं आया. अब तो रोज का ही दस्तूर बन गया. मैं थकीहारी औफिस से लौटती और उस का फोन आ जाता. घंटों बातें करता… अपनी आत्मस्तुति, शाबाशी के किस्से सुनाता. मैं मितभाषी बातों के जवाब में बस जी… जी… करती रहती. वह अगर कुछ पूछता भी तो बगैर मेरा जवाब सुने पुन: बोलने लगता.

चौथे महीने के बाद वह कुछ ज्यादा बेबाक हो गया. मेरे पुरुष मित्रों के बारे में, रिश्ते की सीमाओं के बारे में पूछने लगा. कुछ दिन बाद एक धार्मिक पर्व के अवसर पर बात करते हुए मैं ने महसूस किया कि वह और उस का परिवार पुरानी निरर्थक परंपराओं एवं रीतिरिवाजों के प्रति बहुत ही कट्टर और अडिग हैं. मैं आधुनिक प्रगतिशील विचारधारा वाली ये सब सुन कर बहुत चिंतित हो गई.

यह सच है कि बढ़ती उम्र की शादी महज मर्द और औरत को एक छत के नीचे रख कर सामाजिक कायदों को मानने एवं वंश बढ़ाने की प्रक्रिया के तहत एक समझौता होती है, फिर भी नारी का कोमल मन हमेशा पुरुष को हमसफर, प्रियतम, दोस्त, गमगुजार के रूप में पाने की ख्वाहिश रखता है… मैं ऐसे कैसे किसी संवेदनहीन व्यक्ति को जीवनसाथी बना कर खुश रह सकती हूं?

एक दिन उस ने फोन पर बताया कि वह पोस्ट ग्रैजुएशन का अंतिम सेमैस्टर देने के लिए छुट्टी ले रहा है… मुझे तो बतलाया गया था कि वह पोस्ट ग्रैजुएशन कर चुका है… मैं ने उस के सर्टिफिकेट को पुन: देखा तो आखिरी सेमैस्टर की मार्कशीट नहीं थी… मेरा माथा ठनका कि इस का मतलब मुझे झूठ बताया गया. मैं पहले भी महसूस कर चुकी थी कि उस की बातों में सचाई और साफगोई नहीं है.

उस ने फोन पर बताया कि वह प्राइवेट नौकरी की शोषण नीति से त्रस्त हो चुका है. अब घर में रह कर अर्थशास्त्र पर किताब लिखना चाहता है.

‘‘किताब लिखने के लिए नौकरी छोड़ कर घर में रहना जरूरी नहीं है. मैं ने 2 किताबें नौकरी करते हुए लिखी हैं.’’

मेरे जवाब पर प्रतिक्रिया दिए बगैर उस ने बात बदल दी. अनुभवों और परिस्थितियों ने मुझे ठोस, गंभीर और मेरी सोच को परिपक्व बना दिया था. उस का यह बचकाना निर्णय मुझे उस की चंचल, अपरिपक्व मानसिकता का परिचय दे गया.

एक दिन मुझे औफिस का काम निबटाना था, तभी उस का फोन आ गया. हमेशा की तरह बिना कौमा, पूर्णविराम के बोलने लगा, ‘‘यह बहुत अच्छा हो गया… आप मुझे मिल गईं. अब मेरी मम्मी को मेरी चिंता नहीं रहेगी.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘क्योंकि मेरी तमाम बेसिक नीड्स पूरी हो जाएंगी.’’

सुन कर मैं स्तब्ध रह गई. मैं ने संयम जुटा कर पूछा.

‘‘बेसिक नीड्स से क्या मतलब है आप को?’’

उस ने ठहाका लगा कर जवाब दिया, ‘‘रोटी, कपड़ा और मकान.’’

मैं सुन कर अवाक रह गई. भारतीय समाज में पुरुष परिवार की हर जरूरत पूरा करने का दायित्व उठाते हैं. यह मर्द तो औरत पर आश्रित हो कर मुझे बैसाखियों की तरह इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है. इस से पहले भी उस ने मेरी तनख्वाह और बैंकबैलेंस के बारे में पूछा था जिसे मैं ने सहज वार्त्ता समझ कर टाल दिया था.

अपने निकम्मेपन, अपने हितों को साधने के लिए ही शायद उस ने पढ़ीलिखी नौकरीपेशा लड़की से शादी करने की योजना बनाई थी. आज मेरे जीवन का यह अध्याय चरमसीमा पर आ गया. मैं ने चाचा, अब्बू व भाईजान को अपनी सगाई तोड़ देने की सूचना दे कर दूसरे ही दिन मंगनी में दिया सारा सामान उस के पते पर भिजवा दिया. मेरा परिवार काठ बन गया.

मुझे खुदगर्जी के चेहरे पर मुहब्बत का फरेबी नकाब पहनने वाले के साथ रिश्ता कबूल नहीं था. छलकपट, स्वार्थ, दंभ से भरे पुरुष के साथ जीवन व्यतीत करने से बेहतर है मैं अकेली अनब्याही ही रहूं.

Hindi Story: अंतिम निर्णय – कुछ तो लोग कहेंगे!

Hindi Story: सुहासिनी के अमेरिका से भारत आगमन की सूचना मिलते ही अपार्टमैंट की कई महिलाएं 11 बजते ही उस के घर पहुंच गईं. कुछ भुक्तभोगियों ने बिना कारण जाने ही एक स्वर में कहा, ‘‘हम ने तो पहले ही कहा था कि वहां अधिक दिन मन नहीं लगेगा, बच्चे तो अपने काम में व्यस्त रहते हैं, हम सारा दिन अकेले वहां क्या करें? अनजान देश, अनजान लोग, अनजान भाषा और फिर ऐसी हमारी क्या मजबूरी है कि हम मन मार कर वहां रहें ही. आप के आने से न्यू ईयर के सैलिब्रेशन में और भी मजा आएगा. हम तो आप को बहुत मिस कर रहे थे, अच्छा हुआ आप आ गईं.’’

उन की अपनत्वभरी बातों ने क्षणभर में ही उस की विदेशयात्रा की कड़वाहट को धोपोंछ दिया और उस का मन सुकून से भर गया. जातेजाते सब ने उस को जेट लैग के कारण आराम करने की सलाह दी और उस के हफ्तेभर के खाने का मैन्यू उस को बतला दिया. साथ ही, आपस में सब ने फैसला कर लिया कि किस दिन, कौन, क्या बना कर लाएगा.

सुहासिनी के विवाह को 5 साल ही तो हुए थे जब उस के पति उस की गोद में 5 साल के सुशांत को छोड़ कर इस दुनिया से विदा हो गए थे. परिजनों ने उस पर दूसरा विवाह करने के लिए जोर डाला था, लेकिन वह अपने पति के रूप में किसी और को देखने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी. पढ़ीलिखी होने के कारण किसी पर बोझ न बन कर उस ने अपने बेटे को उच्चशिक्षा दिलाई थी. हर मां की तरह वह भी एक अच्छी बहू लाने के सपने देखने लगी थी.

सुशांत की एक अच्छी कंपनी में जौब लग गई थी. उस को कंपनी की ओर से किसी प्रोजैक्ट के सिलसिले में 3 महीने के लिए अमेरिका जाना पड़ा. सुहासिनी अपने बेटे के भविष्य की योजनाओं में बाधक नहीं बनना चाहती थी, लेकिन अकेले रहने की कल्पना से ही उस का मन घबराने लगा था.

अमेरिका में 3 महीने बीतने के बाद, कंपनी ने 3 महीने का समय और बढ़ा दिया था. उस के बाद, सुशांत की योग्यता देखते हुए कंपनी ने उसे वहीं की अपनी शाखा में कार्य करने का प्रस्ताव रखा तो उस ने अपनी मां से भी विचारविमर्श करना जरूरी नहीं समझा और स्वीकृति दे दी, क्योंकि वह वहां की जीवनशैली से बहुत प्रभावित हो गया था.

सुहासिनी इस स्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं थी. उस ने बेटे को समझाते हुए कहा था, ‘बेटा, अपने देश में नौकरियों की क्या कमी है जो तू अमेरिका में बसना चाहता है? फिर तेरा ब्याह कर के मैं अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती हूं. साथ ही, तेरे बच्चे को देखना चाहती हूं, जिस से मेरा अकेलापन समाप्त हो जाए और यह सब तभी होगा, जब तू भारत में होगा. मैं कब से यह सपना देख रही हूं और अब यह पूरा होने का समय आ गया है, तू इनकार मत करना.’ यह बोलतेबोलते उस की आवाज भर्रा गई थी. वह जानती थी कि उस का बेटा बहुत जिद्दी है. वह जो ठीक समझता है, वही करता है.

जवाब में वह बोला, ‘ममा, आप परेशान मत होे, मैं आप को भी जल्दी ही अमेरिका बुला लूंगा और आप का सपना तो यहां रह कर भी पूरा हो जाएगा. लड़की भी मैं यहां रहते हुए खुद ही ढूंढ़ लूंगा.’ बेटे का दोटूक उत्तर सुन कर सुहासिनी सकते में आ गई. उस को लगा कि वह पूरी दुनिया में अकेली रह गई थी.

सालभर के अंदर ही सुशांत ने सुहासिनी को बुलाने के लिए दस्तावेज भेज दिए. उस ने एजेंट के जरिए वीजा के लिए आवेदन कर दिया. बड़े बेमन से वह अमेरिका के लिए रवाना हुई. अनजान देश में जाते हुए वह अपने को बहुत असुरक्षित अनुभव कर रही थी. मन में दुविधा थी कि पता नहीं, उस का वहां मन लगेगा भी कि नहीं. हवाई अड्डे पर सुशांत उसे लेने आया था. इतने समय बाद उस को देख कर उस की आंखें छलछला आईं.

घर पहुंच कर सुशांत ने घर का दरवाजा खटखटाया. इस से पहले कि वह अपने बेटे से कुछ पूछे, एक अंगरेज महिला ने दरवाजा खोला. वह सवालिया नजरों से सुशांत की ओर देखने लगी. उस ने उसे इशारे से अंदर चलने को कहा. अंदर पहुंच कर बेटे ने कहा, ‘ममा, आप फ्रैश हो कर आराम करिए, बहुत थक गई होंगी. मैं आप के खाने का इंतजाम करवाता हूं.’

सुहासिनी को चैन कहां, मन ही मन मना रही थी कि उस का संदेह गलत निकले, लेकिन इस के विपरीत सही निकला. बेटे के बताते ही वह अवाक उस की ओर देखती ही रह गई. उस ने इस स्थिति की कल्पना भी नहीं की थी. उस के बहू के लिए देखे गए सपने चूरचूर हो कर बिखर गए थे.

सुहासिनी ने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए कहा, ‘मुझे पहले ही बता देता, तो मैं बहू के लिए कुछ ले कर आती.’

मां की भीगी आखें सुशांत से छिपी नहीं रह पाईं. उस ने कहा, ‘ममा, मैं जानता था कि आप कभी मन से मुझे स्वीकृति नहीं देंगी. यदि मैं आप को पहले बता देता तो शायद आप आती ही नहीं. सोचिए, रोजी से विवाह करने से मुझे आसानी से यहां की नागरिकता मिल गई है. आप भी अब हमेशा मेरे साथ रह सकती हैं.’ उस को अपने बेटे की सोच पर तरस आने लगा. वह कुछ नहीं बोली. मन ही मन बुदबुदाई, ‘कम से कम, यह तो पूछ लेता कि विदेश में, तेरे साथ, मैं रहने के लिए तैयार भी हूं या नहीं?’

बहुत जल्दी सुहासिनी का मन वहां की जीवनशैली से ऊबने लगा था. बहूबेटा सुबह अपनीअपनी जौब के लिए निकल जाते थे. उस के बाद जैसे घर उस को काटने को दौड़ता था. उन के पीछे से वह घर के सारे काम कर लेती थी. उन के लिए खाना भी बना लेती थी, लेकिन उस को महसूस हुआ कि उस के बेटे को पहले की तरह उस के हाथ के खाने के स्थान पर अमेरिकी खाना अधिक पसंद आने लगा था. धीरेधीरे उस को लगने लगा था कि उस का अस्तित्व एक नौकरानी से अधिक नहीं रह गया है. वहां के वातावरण में अपनत्व की कमी होने के चलते बनावटीपन से उस का मन बुरी तरह घबरा गया था.

सुहासिनी को भारत की अपनी कालोनी की याद सताने लगी कि किस तरह अपने हंसमुख स्वभाव के कारण वहां पर हर आयुवर्ग की वह चहेती बन गई थी. हर दिन शाम को, सभी उम्र के लोग कालोनी में ही बने पार्क में इकट्ठे हो जाया करते थे. बाकी समय भी व्हाट्सऐप द्वारा संपर्क में बने रहते थे और जरा सी भी तबीयत खराब होने पर एकदूसरे की मदद के लिए तैयार रहते थे.

उस ने एक दिन हिम्मत कर के अपने बेटे से कह ही दिया, ‘बेटा, मैं वापस इंडिया जाना चाहती हूं.’

यह प्रस्ताव सुन कर सुशांत थोड़ा आश्चर्य और नाराजगी मिश्रित आवाज में बोला, ‘लेकिन वहां आप की देखभाल कौन करेगा? मेरे यहां रहते हुए आप किस के लिए वहां जाना चाहती हैं?’ वह जानता था कि उस की मां वहां बिलकुल अकेली हैं.

सुहासिनी ने उस की बात अनसुनी करते हुए कहा, ‘नहीं, मुझे जाना है, तुम्हारे कोई बच्चा होगा तो आ जाऊंगी.’ आखिर वह भारत के लिए रवाना हो गई.

सुहासिनी को अब अपने देश में नए सिरे से अपने जीवन को जीना था. वह यह सोच ही रही थी कि अचानक उस की ढलती उम्र के इस पड़ाव में भी सुनीलजी, जो उसी अपार्टमैंट में रहते थे, के विवाह के प्रस्ताव ने मौनसून की पहली झमाझम बरसात की तरह उस के तन के साथ मन को भी भिगोभिगो कर रोमांचित कर दिया था. उस के जीवन में क्या चल रहा है, यह बात सुनीलजी से छिपी नहीं थी.

सुहासिनी के हावभाव ने बिना कुछ कहे ही स्वीकारात्मक उत्तर दे दिया था. लेकिन उस के मन में आया कि यह एहसास क्षणिक ही तो था. सचाई के धरातल पर आते ही सुहासिनी एक बार यह सोच कर कांप गई कि जब उस के बेटे को पता चलेगा तो क्या होगा? वह उस की आंखों में गिर जाएगी? वैधव्य की आग में जलते हुए, दूसरा विवाह न कर के उस ने अपने बेटे को मांबाप दोनों का प्यार दे कर उस की परवरिश कर के, समाज में जो इज्जत पाई थी, वह तारतार हो जाएगी?

‘नहीं, नहीं, ऐसा मैं सोच भी नहीं सकती. ठीक है, अपनी सकारात्मक सोच के कारण वे मुझे बहुत अच्छे लगते हैं और उन के प्रस्ताव ने यह भी प्रमाणित कर दिया कि यही हाल उन का भी है. वे भी अकेले हैं. उन की एक ही बेटी है, वह भी अमेरिका में रहती है. लेकिन समाज भी कोई चीज है,’ वह मन ही मन बुदबुदाई और निर्णय ले डाला.

जब सुनीलजी मिले तो उस ने अपना निर्णय सुना दिया, ‘‘मैं आप की भावनाओं का आदर करती हूं, लेकिन समाज के सामने स्वीकार करने में परिस्थितियां बाधक हो जाती हैं और समाज का सामना करने की मेरी हिम्मत नहीं है, मुझे माफ कर दीजिएगा.’’ उस के इस कथन पर उन की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, जैसे कि वे पहले से ही इस उत्तर के लिए तैयार थे. वे जानते थे कि उम्र के इस पड़ाव में इस तरह का निर्णय लेना सरल नहीं है. वे मौन ही रहे.

अचानक एक दिन सुहासिनी को पता चला कि सुनीलजी की बेटी सलोनी, अमेरिका से आने वाली है. आने के बाद, एक दिन वह अपने पापा के साथ उस से मिलने आई, फिर सुहासिनी ने उस को अपने घर पर आमंत्रित किया. हर दिन कुछ न कुछ बना कर सुहासिनी, सलोनी के लिए उस के घर भेजती ही रहती थी. उस के प्रेमभरे इस व्यवहार से सलोनी भावविभोर हो गई और एक दिन कुछ ऐसा घटित हुआ, जिस की वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी.

अचानक एक दिन सलोनी उस के घर आई और बोली, ‘‘एक बात बोलूं, आप बुरा तो नहीं मानेंगी? आप मेरी मां बनेंगी? मुझे अपनी मां की याद नहीं है कि वे कैसी थीं, लेकिन आप को देख कर लगता है ऐसी ही होंगी. मेरे कारण मेरे पापा ने दूसरा विवाह नहीं किया कि पता नहीं नई मां मुझे मां का प्यार दे भी पाएगी या नहीं. लेकिन अब मुझ से उन का अकेलापन देखा नहीं जाता. मैं अमेरिका नहीं जाना चाहती थी. लेकिन विवाह के बाद लड़कियां मजबूर हो जाती हैं. उन को अपने पति के साथ जाना ही पड़ता है. मेरे पापा बहुत अच्छे हैं. प्लीज आंटी, आप मना मत करिएगा.’’ इतना कह कर वह रोने लगी. सुहासिनी शब्दहीन हो गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे. उस ने उसे गले लगा लिया और बोली, ‘‘ठीक है बेटा, मैं विचार करूंगी.’’ थोड़ी देर बाद वह चली गई.

कई दिनों तक सुहासिनी के मनमस्तिष्क में विचारों का मंथन चलता रहा. एक दिन सुनीलजी अपनी बेटी के साथ सुहासिनी के घर आ गए. वह असमंजस की स्थिति से उबर ही नहीं पा रही थी. सबकुछ समझते हुए सुनीलजी ने बोलना शुरू किया, ‘‘आप यह मत सोचना कि सलोनी ने मेरी इच्छा को आप तक पहुंचाया है. जब से वह आई है, हम दोनों की भावनाएं इस से छिपी नहीं रहीं. उस ने मुझ से पूछा, तो मैं झूठ नहीं बोल पाया. अभी तो उस ने महसूस किया है, धीरेधीरे सारी कालोनी जान जाएगी. इसलिए उस स्थिति से बचने के लिए मैं अपने रिश्ते पर विवाह की मुहर लगा कर लोगों के संदेह पर पूर्णविराम लगाना चाहता हूं.

‘‘शुरू में थोड़ी कठिनाई आएगी, लेकिन धीरेधीरे सब भूल जाएंगे. आप मेरे बाकी जीवन की साथी बन जाएंगी तो मेरे जीवन के इस पड़ाव में खालीपन के कारण तथा शरीर के शिथिल होने के कारण जो शून्यता आ गई है, वह खत्म हो जाएगी. इस उम्र की इस से अधिक जरूरत ही क्या है?’’ सुनील ने बड़े सुलझे ढंग से उसे समझाया.

सुहासिनी के पास अब तर्क करने के लिए कुछ भी नहीं बचा था. उस ने आंसूभरी आंखों से हामी भर दी. सलोनी के सिर से मानो मनों बोझ हट गया और वह भावातिरेक में सुनील के गले से लिपट गई.

अब सुहासिनी को अपने बेटे की प्रतिक्रिया की भी चिंता नहीं थी.

जीवन की मुसकान मैं इलाहाबाद में लोकनिर्माण विभाग में स्थानिक अभियंता के पद पर कार्यरत था. एक दिन मैं अपने स्कूटर से साइट निरीक्षण के लिए जा रहा था. मैं ने अपना ब्रीफकेस स्कूटर पर आगे रखा हुआ था, जिस कारण मेरा बायां पैर स्कूटर के बाहर लटका हुआ था.

मैं जब पुल पर पहुंचा, तभी एक स्कूल बस ने मुझे ओवरटेक किया और मेरे स्कूटर से आगे निकलने लगी. उस बस की खिड़की के पास एक 6-7 साल का छात्र बैठा था, उस ने स्कूटर से बाएं लटकते मेरे पैर को देखा और जोरजोर से मुझे आवाज देने लगा, ‘‘अंकल, अपना पैर अंदर कर लें वरना आप को चोट लग जाएगी.’’

इतनी कम उम्र में इतनी समझदारी व मुझ अनजान के प्रति प्रेम देख कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई. मैं ने मन ही मन अच्छे संस्कार देने के लिए उस छात्र के मातापिता व अध्यापकअध्यापिकाओं को धन्यवाद दिया.      राजेश कुमार सक्सेना पूरे 40 वर्षों तक सरकारी नौकरी करने के बाद मैं रिटायर हो गई. तब समकक्ष दोस्तों ने समझाया कि अब इंद्रियां शिथिल होने लगेंगी, इसलिए सक्रिय रहने के लिए स्वाध्याय कीजिए और समाज से जुड़ कर अपने अनुभव को प्रेमपूर्वक बांटिए.

मैं ने ऐसा ही किया और आसपास के इलाकों में घूमघूम कर लोगों से परिचय बढ़ाया. फिर इसी दौरान एक पोलियोग्रस्त युवक से लगाव हो गया. वह तसवीरों को फ्रेम करने का काम करता था और प्रतिदिन विकलांग वाली गाड़ी में बैठ कर महल्ले में घूमता था. उस की दुकान छोटी है, मगर ग्राहकों के बैठने के लिए एक छोटा सा स्टूल रखा हुआ है जिस पर बैठ कर मैं उस से बातें करती थी.

एक दिन पुरस्कारस्वरूप कुछ किताबें और एक प्रशस्तिपत्र कोरियर से मेरे पास आया. इस प्रशस्तिपत्र को फ्रेम कराने के लिए मै उसी युवक के पास गई और अपना पर्स स्टूल पर रख कर बतियाने लगी और फिर घर वापस आ गई.

घर आ कर मुझे अपने पर्स का ध्यान न रहा और दोपहर से शाम तक का वक्त गुजर गया. तभी वह युवक अपनी विकलांग गाड़ी चलाता हुआ मेरे दरवाजे तक आ गया और फ्रेम देने के बाद हंसता हुआ बोला, ‘‘यह लीजिए अपना पर्स, आप वहीं भूल आई थीं.’’

मैं उस की ईमानदारी देख कर हैरान रह गई.

Romantic Story: थोड़ी सी बेवफाई – क्या अतुल कह पाया दिल की बात?

Romantic Story: ‘हाय, पहचाना.’ व्हाट्सऐप पर एक नए नंबर से मैसेज आया देख मैं ने उत्सुकता से प्रोफाइल पिक देखी. एक खूबसूरत चेहरा हाथों से ढका सा और साथ ही स्टेटस भी शानदार…

जरूरी तो नहीं हर चाहत का मतलब इश्क हो… कभीकभी अनजान रिश्तों के लिए भी दिल बेचैन हो जाता है. मैं ने तुरंत पूछा, ‘‘हू आर यू? क्या मैं आप को जानता हूं?’’

‘‘जानते नहीं तो जान लीजिए, वैसे भी मैं आप की जिंदगी में हलचल मचाने आई हूं…’’

‘‘यानी आप कहना चाहती हैं कि आप मेरी जिंदगी में आ चुकी हैं? ऐसा कब हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अभी, इसी पल. जब आप ने मेरे बारे में पूछा…’’

मैं समझ गया था, युवती काफी स्मार्ट है और तेज भी. मैं ने चुप रहना ही बेहतर समझा, तभी फिर मैसेज आया देख कर मैं इग्नोर नहीं कर सका.

‘‘क्या बात है, हम से बातें करना आप को अच्छा नहीं लग रहा है क्या?’’

‘‘यह तो मैं ने नहीं कहा…’’ मैं ने तुरंत जवाब दिया.

‘‘तो फिर ठीक है, मैं समझूं कि आप को मुझ से बात करना अच्छा लग रहा है?’’

‘‘हूं… यही समझ लो. मगर मुझे भी तो पता चले कि आप हैं कौन?’’

‘‘इतनी भी क्या जल्दी है? आराम से बताऊंगी.’’

युवती ने स्माइली भेजी, तो मेरा दिल हौले से धड़कने लगा. मैं सोच में डूब गया कि यह युवती अजनबी है या उसे पहले से जानती है. कहीं कोई कालेज की पुरानी दोस्त तो नहीं, जो मजे लेने के लिए मुझे मैसेज भेज रही है. मुश्किल यह थी कि फोटो में चेहरा भी पूरा नजर नहीं आ रहा था. तभी मेरा मोबाइल बज उठा. कहीं वही तो नहीं, मैं ने लपक कर फोन उठाया. लेकिन बीवी का नंबर देख कर मेरा मुंह बन गया और तुरंत मैं ने फोन काट दिया. 10 सैकंड भी नहीं गुजरे थे कि फिर से फोन आ गया. झल्लाते हुए मैं ने फोन उठाया, ‘‘यार 10 मिनट बाद करना अभी मैं मीटिंग में हूं. ऐसी क्या आफत आ गई जो कौल पर कौल किए जा रही हो?’’

बीवी यानी साधना हमेशा की तरह चिढ़ गई, ‘‘यह क्या तरीका है बीवी से बात करने का? अगर पहली कौल ही उठा लेते तो दूसरी बार कौल करने की जरूरत ही नहीं पड़ती.’’ ‘‘पर आधे घंटे पहले भी तो फोन किया था न तुम ने, और मैं ने बात भी कर ली थी. अब फिर से डिस्टर्ब क्यों कर रही हो?’’

‘‘देख रही हूं, अब तुम्हें मेरा फोन उठाना भी भारी लगने लगा है. एक समय था जब मेरी एक कौल के इंतजार में तुम खानापीना भी भूल जाते थे…’’ ‘‘प्लीज साधना, समझा करो. मैं यहां काम करने आया हूं, तुम्हारा लैक्चर सुनने नहीं…’’

उधर से फोन कट चुका था. मैं सिर पकड़ कर बैठ गया. कभीकभी रिश्ते भी भार बन जाते हैं, जिन्हें ढोना मजबूरी का सबब बन जाता है और कुछ नए रिश्ते अजनबी हो कर भी अपनों से प्यारे लगने लगते हैं. जब अपनों की बातें मन को परेशान करने लगती हैं, उस वक्त मरहम की तरह किसी अजनबी का साथ जिंदगी में नया उत्साह और जीने की नई वजह बन जाता है. ऐसा नहीं है कि मैं अपनी बीवी से प्यार नहीं करता. मगर कई बार रिश्तों में ऐसे मोड़ आते हैं, जब जरूरत से ज्यादा दखलंदाजी बुरी लगने लगती है. प्यार अच्छा है, मगर पजेसिवनैस नहीं. हद से ज्यादा पजेसिवनैस बंधन लगने लगता है, तब रिश्ते भार बन जाते हैं और मन में खालीपन घर कर जाता है. मेरी जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही दौर आया था और इस खालीपन को भरने के लिहाज से उस अनजान युवती का दखल मुझे भाने लगा था. जिंदगी में एक नया अध्याय जुड़ने लगा था. नई ख्वाहिशों की आंच मन में अजीब सी बेचैनी पैदा कर रही थी. एक बार फिर से जिंदगी के प्रति मेरा रुझान बढ़ने लगा. दिलोदिमाग में बारबार उसी लड़की का खयाल उमड़ता कि कब उस का मैसेज आए और मेरी धड़कनों को बहकने का मौका मिले.

‘‘हाय, क्या सोच रहे हो?’’ अचानक फिर से आए उस युवती के मैसेज ने मेरे होंठों पर मुसकान बिखेर दी, ‘‘बस, तुम्हें ही याद कर रहा था.’’

‘‘हां, वह तो मैं जानती हूं. मैं हूं ही ऐसी बला जो एक बार जिंदगी में आ जाए तो फिर दिल से नहीं जाती.’’

मैं यह सुन कर हंस पड़ा था. कितनी सहज और मजेदार बातें करती है यह युवती. मैं ने फिर पूछा, ‘‘इस बला का कोई नाम तो होगा?’’

‘‘हां, मेरा नाम कल्पना है.’’

नाम बताने के साथ ही उस ने एक खूबसूरत सी शायरी भेजी. हसीं जज्बातों से लबरेज वह शायरी मैं ने कई दफा पढ़ी और फिर शायरी का जवाब शायरी से ही देने लगा.सालों पहले मैं शायरी लिखा करता था. कल्पना की वजह से आज फिर से मेरा यह पैशन जिंदा हो गया था. देर तक हम दोनों चैटिंग करते रहे. ऐसा लगा जैसे मेरा मन बिलकुल हलका हो गया हो. उस युवती की बातें मेरे मन को छूने लगी थीं. वह ब ड़े बिंदास अंदाज में बातें करती थी. समय के साथ मेरी जिंदगी में उस युवती का हस्तक्षेप बढ़ता ही चला गया. रोज मेरी सुबह की शुरुआत उस के एक प्यारे से मैसेज से होती. कभीकभी वह बहुत अजीब सेमैसेज भेजती. कभी कहती, ‘‘आप ने अपनी जिंदगी में मेरी जगह क्या सोची है, तो कभी कहती कि क्या हमारा चंद पलों का ही साथ रहेगा या फिर जन्मों का?’’

एक बात जो मैं आसानी से महसूस कर सकता था, वह यह कि मेरी बीवी साधना की खोजी निगाहें अब शायद मुझ पर ज्यादा गहरी रहने लगी थीं. मेरे अंदर चल रही भावनात्मक उथलपुथल और संवर रही अनकही दास्तान का जैसे उसे एहसास हो चला था. यहां तक कि यदाकदा वह मेरे मोबाइल भी चैक करने लगी थी. देर से आता तो सवाल करती. जाहिर है, मेरे अंदर गुस्सा उबल पड़ता. एक दिन मैं ने झल्ला कर कहा, ‘‘मैं ने तो कभी तुम्हारे 1-1 मिनट का हिसाब नहीं रखा कि कहां जाती हो, किस से मिलती हो?’’

‘‘तो पता रखो न अतुल… मैं यही तो चाहती हूं,’’ वह भड़क कर बोल पड़ी थी. ‘‘पर यह सिर्फ पजेसिवनैस है और कुछ नहीं.’’

‘‘प्यार में पजेसिवनैस ही जरूरी है अतुल, तभी तो पता चलता है कि कोई आप से कितना प्यार करता है और बंटता हुआ नहीं देख सकता.’’

‘‘यह तो सिर्फ बेवकूफी है. मैं इसे सही नहीं मानता साधना, देख लेना यदि तुम ने अपना यह रवैया नहीं बदला तो शायद एक दिन मुझ से हाथ धो बैठोगी.’’

मैं ने कह तो दिया, मगर बाद में स्वयं अफसोस हुआ. पूरे दिन साधना भी रोती रही और मैं लैपटौप ले कर परेशान चुपचाप बैठा रहा. उस दिन के बाद मैं ने कभी भी साधना से इस संदर्भ में कोई बात नहीं की. न ही साधना ने कुछ कहा. मगर उस की शक करने और मुझ पर नजर रखने की आदत बरकरार रही. उधर मेरी जिंदगी में नए प्यार की बगिया बखूबी खिलने लगी थी. कल्पना मैसेज व शायरी के साथसाथ अब रोमांटिक वीडियोज और चटपटे जोक्स भी शेयर करने लगी थी. कभीकभी मुझे कोफ्त होती कि मैं इन्हें देखते वक्त इतना घबराया हुआ सा क्यों रहता हूं? निश्चिंत हो कर इन का आनंद क्यों नहीं उठा पाता? जाहिर है, चोरीछिपे कुछ किया जाए तो मन में घबराहट तो होती ही है और वही मेरे साथ भी होता था. आखिर कहीं न कहीं मैं अपनी बीवी से धोखा ही तो कर रहा था. इस बात का अपराधबोध तो मुझे था ही. एक दिन कल्पना ने मुझे एक रोमांटिक सा वीडियो शेयर किया और तभी साधना भी बड़े गौर से मुझे देखती हुई गुजरी. मैं चुपके से अपना टैबलेट ले कर बाहर बालकनी में आ गया. वीडियो डाउनलोड कर इधरउधर देखने लगा कि कोई मुझे देख तो नहीं रहा. जब निश्चिंत हो गया कि साधना आसपास नहीं है, तो वीडियो का आनंद लेने लगा. उस वक्त मुझे अंदर से एक अजीब सा रोमांटिक एहसास हुआ. उस अजनबी युवती को बांहों में भरने की तमन्ना भी हुई मगर तुरंत स्वयं को संयमित करता हुआ अंदर आ गया.

साधना की अनुभवी निगाहें मुझ पर टिकी थीं. निगाहें चुराता हुआ मैं लैपटौप खोल कर बैठ गया. मुझे स्वयं पर आश्चर्य हो रहा था कि ऐसा कैसे हो गया? एक समय था जब साधना मेरी जिंदगी थी और आज किसी और के आकर्षण ने मुझे इस कदर अपनी गिरफ्त में ले लिया था. उधर समय के साथ कल्पना की हिमाकतें भी बढ़ने लगी थीं. मैं भी बहता जा रहा था. एक अजीब सा जनून था जिंदगी में. वैसे कभीकभी मुझे ऐसा लगता जैसे यह सब बिलकुल सही नहीं. इधर साधना को धोखा देने का अपराधबोध तो दूसरी तरफ अनजान लड़की का बढ़ता आकर्षण. मैं न चाहते हुए भी स्वयं को रोक नहीं पा रहा था और फिर एक दिन उस के एक मैसेज ने मुझे और भी ज्यादा बेचैन कर दिया.

कल्पना ने लिखा था, ‘‘क्या अब हमारे रिश्ते के लिए जरूरी नहीं है कि हम दोनों को एकदूसरे को मिल कर करीब से एकदूसरे का एहसास करना चाहिए.’’

‘‘जरूर, जब तुम कहो…’’ मैं ने उसे स्वीकृति तो दे दी मगर मन में एक कसक सी उठी. मन का एक कोना एक अनजान से अपराधबोध से घिर गया. क्या मैं यह ठीक कर रहा हूं?  मैं ने साधना की तरफ देखा.

साधना सामने उदास सी बैठी थी, जैसे उसे मेरे मन में चल रही उथलपुथल का एहसास हो गया था. अचानक वह पास आ कर बोली, ‘‘मां को देखे महीनों गुजर गए. जरा मेरा रिजर्वेशन करा देना. इस बार 1-2 महीने वहां रह कर आऊंगी.’’ उस की उदासी व दूर होने का एहसास मुझे अंदर तक द्रवित कर गया. ऐसा लगा जैसे साधना के साथ मैं बहुत गलत कर रहा हूं और मैं ही उस का दोषी हूं. मगर कल्पना से मिलने और उस के साथ वक्त बिताने का लोभ संवरण करना भी आसान न था. अजीब सी कशमकश में घिरा मैं सो गया. सुबह उठा तो मन शांत था मेरा. देर रात मैं कल्पना को एक मैसेज भेज कर सोया था. सुबह उस का जवाब पढ़ा तो होंठों पर मुसकान खेल गई. थोड़े गरम कपड़े पहन कर मैं मौर्निंग वाक पर निकल गया. लौट कर कमरे में आया तो देखा, साधना बिस्तर पर नहीं है. घर में कहीं भी नजर नहीं आई. थोड़ा परेशान सा मैं साधना को छत पर देखने गया तो पाया, एक कोने में चुपचाप खड़ी वह उगते सूरज की तरफ एकटक देख रही है.

मैं ने उसे पीछे से बांहों में भर लिया. उस ने मेरी तरफ चेहरा किया तो मैं यह देख कर विचलित हो उठा कि उस की आंखों से आंसू निकल रहे थे. मैं ने प्रश्नवाचक नजरों से उस की तरफ देखा तो वह सीने से लग गई, ‘‘आई लव यू…’’

‘‘आई नो डियर, बट क्या हुआ तुम्हें?’’

अचानक रोतीरोती वह हंस पड़ी, ‘‘तुम्हें तो ठीक से बेवफाई करनी भी नहीं आती.’’

‘‘क्या?’’ मैं ने चौंक कर उस की ओर देखा.

‘‘अपनी महबूबा को भला ऐसे मैसेज किए जाते हैं? कल रात क्या मैसेज भेजा था तुम ने?’’

‘‘तुम ने लिखा था, डियर कल्पना, जिंदगी हमें बहुत से मौके देती है, नई खुशियां पाने के, जीवन में नए रंग भरने के… मगर वह खुशियां तभी तक जायज हैं, जब तक उन्हें किसी और के आंसुओं के रास्ते न गुजरना पड़े. किसी को दर्द दे कर पाई गई खुशी की कोई अहमियत नहीं. प्यार पाने का नहीं बस महसूस करने का नाम है. मैं ने तुम्हारे लिए प्यार महसूस किया. मगर उसे पाने की जिद नहीं कर सकता, क्योंकि मैं अपनी बीवी को धोखा नहीं दे सकता. तुम मेरे हृदय में खुशी बन कर रहोगी, मगर तुम्हें अपने अंतस की पीड़ा नहीं बनने दूंगा. तुम से मिलने का फैसला मैं ने प्यार के आवेग में लिया था मगर अब दिल की सुन कर तुम से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि रिश्तों में सीमा समझना जरूरी है.

‘‘हम कभी नहीं मिलेंगे… आई थिंक, तुम मेरी मजबूरी समझोगी और खुद भी मेरी वजह से कभी दुखी नहीं रहोगी… कीप स्माइलिंग…’’

मैं ने चौंकते हुए पूछा, ‘‘पर यह सब तुम्हें कैसे पता…?’’

‘‘क्योंकि तुम्हारी कल्पना भी मैं हूं और साधना भी…’’ कह कर साधना मुसकराते हुए मेरे हृदय से लग गई और मैं ने भी पूरी मजबूती के साथ उसे बांहों में भर लिया.

आज मुझे अपना मन बहुत हलका महसूस हो रहा था. बेवफाई के इलजाम से आजाद जो हो गया था मैं.

Crime Story: साइबर ट्रैप – मानवी का भरोसा क्या कायम रह पाया

Crime Story: ‘‘ओएमजी, कहां थे यार?’’

‘‘थोड़ा बिजी था, तुम सुनाओ, एनीथिंग न्यू? हाउ आर यू, कैसा चल रहा तुम्हारा काम?’’

‘‘के.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘ओके…शौर्ट फौर्म के.’’

‘‘हाहाहा…तुम और तुम्हारे शौर्ट फौर्म्स.’’

‘‘हाहाहा…को तुम एलओएल भी लिख सकते हो, मतलब, लाफिंग आउट लाउड.’’

‘‘हाहा, वही एलओएल.’’

‘‘पर एक पहेली अब तक नहीं सुलझी, अब टालो नहीं बता दो.’’

‘‘केपी.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘क्या पहेली…हाहाहा…’’

‘‘मतलब कुछ भी शौर्ट.’’

‘‘और क्या?’’

‘‘ओके, मुझे बहस नहीं करनी. अब पहेली बुझाना बंद करो और जल्दी से औनलाइन वाला नाम छोड़ कर अपना ‘रियल नेम’ बताओ?’’

‘‘द रौकस्टार.’’

‘‘उहुं, यह तो हो ही नहीं सकता. कुछ तो रियल बताओ, न चेहरा दिख रहा, न नाम रियल.’’

‘‘हाहाहा…तुम तो बस मेरे नाम के पीछे ही पड़ गई हो, अरे बाबा, यह तो बस फेसबुक के लिए है. जैसे तुम्हारा नाम ‘स्वीटी मनु’ वैसे मेरा नाम.’’

‘‘तो तुम्हारा असली नाम क्या है?’’

‘‘असलियत फिर कभी, बाय.’’

‘‘बाय, हमेशा ऐसे ही टाल जाते हो, कह देती हूं अगर अगली बार तुम ने अपना नाम नहीं बताया और अपना चेहरा नहीं दिखाया तो फिर सीधा ब्लौक कर दूंगी. याद रखना कोई मजाक नहीं.’’

‘‘एलओएल.’’

‘‘मजाक नहीं, बिलकुल सच.’’

‘‘चलचल देखेंगे.’’

‘‘ठीक है, फिर तो देख ही लेना.’’

हर रोज लड़की लड़के से उस का असली नाम और पहचान पूछती, लेकिन लड़का बात ही बदल देता. लड़की धमकी देती और लड़का हंस कर टाल देता. दरअसल, दोनों को ही पता था कि यह तो कोरी धमकी है, सच के धरातल से कोसों दूर दोनों एकदूसरे से बात किए बगैर रह नहीं पाते थे. कंप्यूटर की भाषा में चैटिंग उन की रोजमर्रा की जीवनचर्या का हिस्सा थी. दोनों के बीच दोस्ती की पहल लड़के की ओर से ही हुई थी. दोनों के सौ से अधिक म्यूचुअल फ्रैंड्स थे. लड़के ने लड़की की डीपी (प्रोफाइल फोटो) देखी और बस फ्रैंड रिक्वैस्ट भेज दी. लड़की ने भी इतने सारे म्यूचुअल फ्रैंड्स देख कर रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली. बस, बातचीत का सिलसिला चल निकला, कभी ऊटपटांग तो कभी गंभीर. दोनों एक ही शहर से थे, तो कई कौमन फ्रैंड्स भी निकल आए. एक दिन बातचीत करते हुए लड़की लड़के की पहचान पर अटक गई.

‘‘तुम ने अपना चेहरा क्यों छिपा रखा है यार, एकदम मिस्टीरियस मैन टाइप. बिलकुल अच्छा नहीं लगता, कभीकभी बिलकुल अजनबी सा लगता है.’’

‘‘एक बात बताऊं, मैं भीड़ में या सोशल साइट्स पर बहुत असहज महसूस करता हूं.’’

‘‘हम्म…क्यों? अगर ऐसा है तो सोशल साइट पर क्यों हो?’’

‘‘बिजनैस की वजह से यहां होना मजबूरी है.’’

‘‘ओके, ठीक है पर हम लोग इतने समय से एकदूसरे से बातें कर रहे हैं. हम दोनों के बीच राज जैसा तो कुछ होना नहीं चाहिए. मुझे तो अपना चेहरा दिखा ही सकते हो, प्लीज.’’

इस बार लड़का उस के आग्रह को टाल नहीं पाया. बिना नानुकुर के उस ने अपनी फोटो भेज दी.

‘‘ओएमजी. इस युग में भी इतनी घनी मूंछें, यहां आने के बाद तो सब की मूंछें सफाचट हो जाती हैं, एलओएल.’’

‘‘अच्छा, एक बात बताओ तुम्हारा नाम स्वीटी है या मनु?’’

‘‘गेस करो.’’

‘‘उम्म्म…स्वीटी.’’

‘‘नहीं… मानवी नाम है मेरा. सहेलियां मनु कह कर बुलाती हैं. तुम्हारा नाम भी मनु ही है न?’’

‘‘नहीं….मानव नाम है, एलओएल. ओके, बाद में बातें करते हैं, मीटिंग का समय हो गया है.’’

‘‘ओके, बीओएल.’’

‘‘अब ये बीओएल का मतलब क्या हुआ?’’

‘‘बैस्ट औफ लक, बुद्धू.’’

‘‘ओके, बाय.’’

‘‘मतलब कुछ भी तो शौर्टकट.’’

‘‘हां…हाहाहा…बाय.’’

छोटे शहरों से युवक जब महानगरों का रुख करते हैं तो दोस्तों की संगत में सब से पहली कुर्बानी मूंछों की ही होती है. भले ही जवानी कब की गुजर गईर् हो, पर मूंछें छिलवा कर जवान दिखने की ख्वाहिश बनी रहती है. इस मामले में मानव थोड़ा अलग था. उसे अपनी मूंछें बेहद प्रिय थीं. बड़े शहर ने उस की मूंछों को नहीं छीना था. अपने सपनों को मूर्तरूप देने के लिए वह घर से पैसे लिए बिना महानगर भाग आया था. अपनी मेहनत और लगन से उस ने नौकरी तो पा ली, लेकिन मूंछें कटने नहीं दी. घनी मूंछें उस के चेहरे पर फबती थीं.

वास्तविक दुनिया में वह महिलाओं से दूर रहता था. उन से जल्दी घुलमिल नहीं पाया था, लेकिन आभासी दुनिया में महिलाओं से चैटिंग और फ्लर्टिंग करना उस की आदत थी. लफ्फाजी में उस से कोई नहीं जीत पाता था. उस की इसी काबिलीयत पर महिलाएं रीझ जाती थीं.

मानवी और मानव दोनों के नाम बिलकुल एक से थे, लेकिन दोनों एकदूसरे से एकदम अलग थे. जहां मानव किसी भी बात को गंभीरता से नहीं लेता, चाहे वह रिश्ते की ही क्यों न हो, वहीं मानवी के लिए छोटीछोटी चीजें भी महत्त्वपूर्ण हुआ करती थीं. वह टूट रहे रिश्तों को जोड़ने की कोशिश में लगी रहती. उस ने अपने मातापिता को अलग होते देखा था. वह अपनों के खोने का दर्द अच्छी तरह जानती थी.

उसे लगता था कि मर रहे रिश्ते में भी जान फूंकी जा सकती है, बशर्ते सच्चे दिल से इस के लिए कोशिश की जाए. मानवी और मानव की रुचि लगभग एक सी थीं. दोनों को ही पढ़ने और नाटक का शौक था. शेक्सपियर और उन का लिखा ड्रामा रोमियोजूलिएट दोनों के ही पसंदीदा थे. चैटिंग करते हुए वे घंटों रोमियोजूलिएट के संवाद बोलते हुए उन्हें जी रहे होते.

उन दोनों के कुछ चुनिंदा दोस्तों को इस की भनक लग चुकी थी. दोनों के कौमनफ्रैंड्स उन्हें रोमियोजूलिएट कह कर छेड़ने लगे थे.

मानव और मानवी दोनों हमउम्र थे. वे एक ही शहर के रहने वाले थे और महानगर में अपना भविष्य संवार रहे थे. मानवी भी उसी महानगर में नौकरी कर रही थी, जहां मानव की नौकरी थी. शुरुआत में हलकीफुलकी बातचीत से शुरू होने वाली चैटिंग धीरेधीरे 24 घंटे वाली चैटिंग में बदल गई थी. कभी स्माइली, कभी इमोजी, कभी साइन लैंग्वेज तो कभी हम्म… नजदीकियां बढ़ीं और बात वीडियो कौलिंग तक पहुंच गई.

दोनों साइबर लव की गिरफ्त में आ चुके थे. अब तक साक्षात मुलाकात यानी आमनासामना नहीं हुआ था, लेकिन प्यार परवान चढ़ चुका था. साइबर दुनिया में एकदूसरे की बातों का वैचारिक विरोध करते हुए एक समय ऐसा आया जब दोनों एकदूसरे के कट्टर समर्थक हो गए. पहली बार दोनों एक कौफी शौप पर मिले. मोबाइल पर दिनरात चाहे जितनी भी बातें कर लें पर इस पहली मुलाकात में मानव की नजरें लगातार झुकी रहीं. मानवी की तरफ उस ने नजर उठा कर भी नहीं देखा. यही नहीं, उस से बातें करते हुए मानव के हाथपांव कांप रहे थे, जो लड़का सोशल नैटवर्किंग साइट पर इतना बिंदास हो, उस का यह रूप देख कर मानवी की हंसी रुक नहीं रही थी और मानव अपनी झेंप मिटाने के लिए इधरउधर की बातें करने और जबरदस्ती चुटकुले सुनाने की कोशिश कर रहा था. बीतते समय के साथ मानवी का मानव पर भरोसा गहरा होता चला गया.

दुनिया से बेखबर दोनों ने उस महानगर में एकसाथ, एक ही फ्लैट में रहने का निर्णय ले लिया. अब वे दोनों एकदूसरे के पूरक और साझेदार बन गए थे. मानव कभी खुल कर नहीं हंसता था. और मानवी की खुशी अकसर मानव के होंठों पर छिपी मुसकान में फंस कर रह जाती. गरमी अपने चरम पर थी, पर इश्क के मौसम ने दोनों के एहसास ही बदल डाले थे. एक रोज जब गरमी के उबाऊ मौसम से ऊब कर सूखी सी दोपहर उबासी ले रही थी. पारा 40 डिगरी पहुंचने को था. गरमी से बचने के लिए लोग अपने घरों में दुबके पड़े थे. प्यासी चिडि़यां पानी की खोज में इधरउधर भटक रही थीं. उस रोज दोनों ही जल्दी घर चले आए थे. उस उबाऊ और तपती दोपहरी में सारे बंधन टूट गए. उमस और इश्क अपने उत्कर्ष पर था.

उस दिन घर, घर नहीं रहा पृथ्वी बन गया और मानवमानवी पूरी पृथ्वी पर अकेले, बिलकुल आदमहौआ की तरह. तृप्त मानव गहरी नींद सो गया, लेकिन मानवी की आंखों में नींद नहीं थी. मानवी के होंठों पर मुसकान तैर गई. देर तक उस सुखद एहसास को वह महसूस करती रही.

उस दिन मानवी को एक पूर्ण महिला होने का एहसास हुआ. उस का अंगअंग खिल चुका था, चेहरे पर कांति महसूस हो रही थी. चाल में अल्हड़पन की जगह लचक आ गई थी. उन दोनों के बीच कोई कमिटमैंट नहीं था, कोई सात फेरे और वचन नहीं…. न ही मांग में सिंदूर या मंगलसूत्र का बंधन, लेकिन एक भरोसा था. उसी भरोसे पर तो मानवी ने अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया.

मानवी की दुनिया अब मानव के इर्दगिर्द सिमटने लगी थी. उसे अब सोशल साइट्स पर महिलाओं के संग मानव की फ्लर्टिंग पसंद नहीं आती थी. इस पर मानवी अकसर अपना गुस्सा जाहिर भी कर देती और मानव खामोश रह जाता.

छोटे शहर की यह लघु प्रेमकथा धीरेधीरे बड़ी कहानी में बदलती जा रही थी. मानव की बुलेट की आवाज मानवी दूर से ही पहचान जाती. जब दोनों अपने शहर जाते तो ये बुलेट ही थी जो दोनों को मिलवा पाती. मानव की बुलेट धड़धड़ाती, मानवी की खिड़की पर आ जाती. एकदूसरे की एक झलक पाने के लिए बेताब दोनों के होंठों पर मुसकान थिरक उठती. दोनों आपस में अकसर वैसे ही बातें करने लगते जैसे की सचमुच के रोमियोजूलिएट हों. दोनों की लवलाइफ भी बुलेट की तरह ही तेज गति से भाग रही थी, अंतर सिर्फ इतना था कि बुलेट शोर मचाती है और यह बेहद खामोश थी. दिन बीत रहे थे. कुछ करीबी दोस्तों के सिवा उन दोनों के इस सहजीवन की खबर किसी को नहीं थी.

उन्हें एकसाथ रहते 2 साल हो गए थे. एक दिन मानवी के मोबाइल पर उन दोनों की एक अंतरंग तसवीर किसी अनजान नंबर से आई. यह देख मानवी के होश उड़ गए. वह इस बारे में बात करने के लिए मानव को ढूंढ़ने लगी, पर मानव उसे पूरे घर में कहीं नहीं मिला. उस का फोन भी स्विच औफ आ रहा था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उन की यह तसवीर किस ने ली. इतनी अंतरंग तसवीर या तो वह खुद ले सकती थी या फिर मानव.

उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह तसवीर भेजने वाले तक पहुंची कैसे? उस ने तसवीर भेजने वाले नंबर पर फोन लगाया पर वह भी स्विच औफ था. उस के बाद मानवी ने एक कौमनफ्रैंड को फोन कर के सारी बातें उसे कह सुनाईं. उस ने थोड़ी ही देर में इस संबंध में बहुत सारी ऐसी सूचनाएं मानवी को दीं, जिस से उस के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. उस ने बताया कि उन दोनों की और भी ऐसी कई तसवीरें व वीडियोज मानव ने एक साइट पर अपलोड कर रखे हैं.

‘‘मानव ने?’’

‘‘हां, मानव ने.’’

मानवी को यह सुन कर अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था. उसे लग रहा था कि शायद उन दोनों के रिश्ते को वह कौमनफ्रैंड तोड़ना चाहता है, इसलिए ऐसा कह रहा है, लेकिन फिर मानव का फोन स्विच औफ क्यों आ रहा है? ऐसा तो वह कभी नहीं करता है. अब मानवी को पूरी दुनिया अंधकारमय लगने लगी. उसे अपने उस दोस्त की बातों पर यकीन होेने लगा था. क्या इसलिए उस ने कभी खुल कर अपने प्यार का इजहार नहीं किया? वह फूटफूट कर रोने लगी. ‘‘मैं मान नहीं सकती, ही लव्स मी, ही लव्स मी यार,’’ मानवी ने चिल्लाते हुए कहा. सिसकियों की वजह से उस के शब्द अस्पष्ट थे. जब अंदर का तेजाब बह निकला तो वह पुलिस स्टेशन की ओर चल पड़ी. शिकायत दर्ज करवाने के दौरान उसे कई जरूरी गैरजरूरी सवालों से दोचार होना पड़ा. मानवी हर सवाल का जवाब बड़ी दृढ़ता से दे रही थी.

बात जब बिना ब्याह के सहजीवन की आई और महिला कौंस्टेबल उसे ही कटघरे में खड़ी करने लगी, तो उस के सब्र का बांध टूट गया. उस का दम घुटने लगा. वह वहां से उठी और घर के लिए चल पड़ी. उस दिन हर नजर उसे नश्तर की तरह चुभ रही थी, सब की हंसी व्यंग्यात्मक लग रही थी. उस दिन उसे सभी पुरुषों की आंखों में हवस की चमक दिख रही थी. मानवी शर्म से पानीपानी हुए जा रही थी. किसी से नजर मिलाने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी. घर पहुंचने के साथ ही उस ने मानव पर चिल्लाना शुरू कर दिया. क्षोभ और शर्मिंदगी से वह पागल हुई जा रही थी. हर कमरे में जा कर वह मानव को ढूंढ़ रही थी, लेकिन मानव तो कहीं था नहीं. वह तो वहां से जा चुका था, हमेशा के लिए.

आभासी दुनिया से शुरू हुआ प्यार आभासी हो कर ही रह गया. उसे दुनिया के सामने नंगा कर मानव भाग चुका था. इस धोखे के लिए मानवी बिलकुल तैयार नहीं थी. उस ने संपूर्णता के साथ मानव को स्वीकार किया था. वह मानव के इस ओछेपन को स्वीकार नहींकर पा रही थी. 2 साल तक दोनों सहजीवन में रहे थे. मानवी उस की नसनस से वाकिफ थी, लेकिन ऐसे किसी धोखे की गंध से वह दूर रह गई. उसे आत्मग्लानि हो रही थी, दुख हो रहा था. वह दोबारा पुलिस के पास नहीं जाना चाहती थी. घर पर कुछ बता नहीं सकती थी.

मानव ने जो किया उस की माफी भी संभव नहीं थी. मानवी ने सोशल मीडिया के जरिए मानव को ट्रैक करना शुरू किया. जालसाजी करने वाला शख्स हमेशा अपने बचाव की तैयारी के साथ आगे बढ़ता है. मानव भी फेसबुक, व्हाट्सऐप, ट्वीटर सब की पुरानी आईडी को ब्लौक कर नई आईडी बना चुका था. लेकिन मानवी भी हार मानने वाली नहीं थी. एक पुरानी कड़ी से उस का नया प्रोफाइल मिल गया. मानवी ने अपना एक नकली प्रोफाइल बनाया और उस से दोस्ती कर ली. नकली प्रोफाइल के जरिए उस ने मानव को मजबूर कर दिया कि वह उस से मिले. एक बार फिर मानव आत्ममुग्ध हुआ जा रहा था. मिलने की बात सोच कर बारबार वह अपनी मूंछों पर ताव दे रहा था. उस की आंखों में वही शैतानी चमक थी और होंठों पर हंसी थिरक रही थी.

दोनों के मिलने का स्थान मानव के औफिस का टैरिस गार्डन तय हुआ. मानव बेसब्री से आभासी दुनिया की इस नई दोस्त का इंतजार कर रहा था. एकएक पल गुजारना उस के लिए मुश्किल हो रहा था.

थोड़े इंतजार के बाद मानवी उस के सामने थी. उसे देख कर मानव चौंक पड़ा. जब तक वह कुछ समझ पाता, कुछ बोलता, मानवी बिजली की तेजी से आई और तेजाब की पूरी शीशी उस के चेहरे पर उड़ेल दी. पहले ठंडक और फिर जलन व दर्द से वह छटपटाने लगा.

मानवी पर तो जैसे भूत सवार था. वह चिल्लाती जा रही थी, ‘‘तुम ने मेरी जिंदगी बरबाद की, अब मैं तुम्हें बरबाद करूंगी. इसी चेहरे से तुम सब को छलते हो न. अब यह चेहरा ही खत्म हो जाएगा.’’ मानव अवाक रह गया. उसे इस अंजाम की उम्मीद न थी. उस के सोचनेसमझने की शक्ति खत्म हो गई थी. मानवी चीख रही थी, ठहाके लगा रही थी. मानव का चेहरा धीरेधीरे वीभत्स हो रहा था. वह छटपुटा रहा था.

उस की इस हालत को देख कर मानवी को एहसास हुआ कि वह अब भी उस इंसान से प्यार करती है. उस की नफरत क्षणिक थी, लेकिन प्रेम स्थायी है. उस से उस की यह छटपटाहट बरदाश्त नहीं हो पा रही थी. देखते ही देखते मानवी ने भी उस ऊंची छत से छलांग लगा दी और इस तरह 2 जिंदगियां साइबर ट्रैप में फंस कर तबाह हो गईं.

Hindi Story: पहेली – कनिका ने अमित के साथ क्या किया?

Hindi Story: ‘‘है लो, आई एम कनिका सिंह, फ्राम राजस्थान.’’ इसखनकती आवाज ने अमित का ध्यान आकर्षित किया तो देखा, सामने एक असाधारण सुंदर युवती खड़ी है. क्लासरूम से वह अभी अपने साथियों के साथ ‘टी ब्रेक’ में बाहर आया था कि उस का परिचय कनिका से हो गया.

‘‘हैलो, मैं अमित शर्मा, राजस्थान से ही हूं,’’ अमित ने मुसकरा कर अपना परिचय दिया.

कनिका वास्तव में बहुत सुंदर थी. आकर्षक व्यक्तित्व, उम्र लगभग 26-27 की रही होगी. लंबा कद किंतु भरापूरा शरीर, तीखे नयननक्श उस की सुंदरता में और वृद्धि कर रहे थे. ‘टी ब्रेक’ खत्म होते ही सभी वापस क्लासरूम में पहुंच गए.

भारत के एक ऐतिहासिक शहर हैदराबाद में 1 माह के प्रशिक्षण का आज पहला दिन था. देश के अलगअलग प्रांतों से संभागियों के पहुंचने का क्रम अभी भी जारी था. कनिका भी दोपहर बाद ही पहुंची थी. पहले दिन की औपचारिक कक्षाएं खत्म होते ही सभी प्रशिक्षुओं को लोकसंगीत और नृत्य कार्यक्रम में शामिल होना था.

खुले रंगमंच में सभी लोग जमा हो चुके थे. कार्यक्रम शुरू हो गया था. लोककलाकार अपनीअपनी कला का बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे थे. संयोग से अमित के पास की सीट खाली थी. कनिका वहां आ गई तो अमित ने मुसकराते हुए उसे पास बैठने का इशारा किया. कनिका बैठते ही अमित से बातचीत करने लगी. उस ने बताया कि वह मनोविज्ञान की प्राध्यापक है. अमित ने कहा कि वह इतिहास विषय का है. कनिका ने बताया कि इतिहास उस का पसंदीदा विषय रहा है और वह चाहती है कि इस विषय का गहन अध्ययन करे. फिर हंसते हुए उस ने पूछा, ‘‘आप मुझे पढ़ाएंगे क्या?’’

अमित ने भी मजाक में उत्तर दिया, ‘‘अरे, मेरा विषय तो नीरस है. लड़कियां तो वैसे ही इस से दूर भागती हैं.’’

कनिका अपने कैमरे से कलाकारों की फोटो खींचने लगी. अमित के मन में उस के लिए न जाने क्यों एक खास आकर्षण पैदा हो चुका था. छोटी सी मुलाकात ने ही उसे बहुत प्रभावित कर दिया था. कनिका के उन्मुक्त व्यवहार से वह मानो उस के प्रति खिंचा जा रहा था.

होस्टल में अमित के दाईं ओर तमिलनाडु और बाईं ओर उड़ीसा के संभागी प्राध्यापक थे. इस अनोखे सांस्कृतिक समागम ने एकदूसरे को जानने और समझने का भरपूर अवसर प्रदान किया था. इसी होस्टल के ग्राउंड फ्लोर पर महिला संभागियों के रुकने की व्यवस्था थी. कुल 80 लोगों में 40 महिलाएं थीं जो भारत के विभिन्न राज्यों का प्रतिनिधित्व कर रही थीं.

रात्रि भोज के बाद सभी संभागियों का अपना सांस्कृतिक कार्यक्रम चलता था. हाल में सभी लोग जमा थे. इस कार्यक्रम में सभी को भाग लेना अनिवार्य था. कनिका ने राजस्थानी लोकगीत सुनाए जिस से उस की एक और प्रतिभा का पता चला कि वह संगीत में भी खासा दखल रखती थी.

दूसरे दिन सुबह चाय के समय कनिका ने अमित को अपने लैपटाप पर वे सारी फोटो दिखाईं जो उस ने रात्रि सांस्कृतिक कार्यक्रम में खींची थीं.

क्लासरूम में अमित बाईं ओर पहली कतार में बैठता था. आज उस ने नोट किया कि दाईं ओर की पहली कतार में असम और तमिलनाडु की महिला संभागियों के साथ कनिका भी बैठी है. पूरे दिन अमित ने जब भी कनिका को देखा, उसे अपनी ओर देखते, मुसकराते ही पाया. उस के दिल में एक सुखद एहसास जागृत हो रहा था.

लंच में अमित ने कनिका को अपने साथ खाने के लिए आमंत्रित किया. उस मेज पर उस के कुछ तमिल दोस्त भी थे. कनिका बिना किसी झिझक के पास की कुरसी पर बैठ कर खाना खाने लगी.

बातचीत में कनिका ने अमित से पूछा, ‘‘सर, आप की फैमिली में कौनकौन हैं?’’

अमित अब खुल चुका था सो उस ने विस्तार से अपने परिवार के बारे में बताया कि उस की पत्नी सरकारी नौकरी में किसी दूसरे शहर में नियुक्त है. एक छोटी 4 साल की बेटी है जो अपनी मम्मी के साथ ही रहती है. अमित ने कनिका से भी पूछा किंतु वह बात टाल गई और हंसीमजाक में मशगूल हो गई.

रात के 11 बजे थे. होस्टल के हाल में सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था. अचानक अमित के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से काल आई. उत्सुकता के चलते अमित ने उस काल को रिसीव किया.

‘‘हैलो सर, पहचाना?’’ अमित अभी असमंजस में था कि आवाज फिर आई, ‘‘मैं कनिका बोल रही हूं. आप 2 मिनट के लिए लान में आ सकते हैं?’’

अमित फौरन बाहर आया. कनिका बाहर कैंपस में खड़ी थी. यद्यपि बाहर इस समय और भी महिलापुरुष संभागी बातचीत में व्यस्त थे. किंतु अमित को अजीब महसूस हो रहा था, फिर कनिका ने पूछा, ‘‘सर, क्या आप के पास सिरदर्द की दवा है? आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है.’’

अमित ने घबरा कर कहा, ‘‘ज्यादा खराब हो तो डाक्टर के पास चलें?’’

कनिका के मना करने पर अमित तुरंत अंदर से अपनी मेडिकल किट ले आया और कुछ जरूरी दवाएं निकाल कर कनिका को दे दीं. कनिका ने धन्यवाद दिया और अपने कमरे में चली गई.

प्रशिक्षण के दिन खुशीखुशी बीत रहे थे. शुरू में 1 माह की अवधि बहुत लंबी लग रही थी किंतु अमित को अब लग रहा था कि जीवन का एकएक पल अमूल्य है जो बीता जा रहा है. कनिका के प्रति उस का लगाव बढ़ता जा रहा था. दूसरे दिन अमित इस उम्मीद में अपना मोबाइल देख रहा था कि शायद फिर से फोन आए. रात के 10 बज चुके थे. उस का मन सांस्कृतिक संध्या में नहीं लग रहा था. कुछ समय बाद काल आई. अमित तो जैसे इसी के इंतजार में था, तपाक से उस ने काल रिसीव की. फिर वही मधुर आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘परेशान कर दिया न सर, आप को.’’

अमित ने भी मजाक में पूछ लिया, ‘‘क्यों, नींद नहीं आ रही है क्या? शायद किसी की याद आ रही होगी?’’

कनिका ने खिलखिला कर हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों मजाक बनाते हो…मुझे आप से ही बात करनी थी,’’ फिर आगे बात बढ़ाते हुए बोली, ‘‘मुझे कोई याद नहीं करता, मैं इतनी खास तो नहीं कि कोई…’’ उस ने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया. फिर पूछा, ‘‘आप ने कल वाले प्रोजेक्ट वर्क की क्या तैयारी की है?’’

अमित उसे प्रोजेक्ट वर्क के बारे में समझाने लगा. फिर उस ने कनिका से पूछा कि उसे उस के फोन नंबर कैसे मिले. कनिका ने उस की जिज्ञासा शांत की और बताया कि रजिस्टे्रशन रजिस्टर में से मोबाइल नंबर लिए थे.

अमित को बहुत अच्छा लग रहा था कि कनिका उसे इतना महत्त्व दे रही है जबकि प्राय: सभी पुरुष संभागी उस से बातचीत करने और मेलजोल बढ़ाने के लिए लालायित थे.

कुछ दिन बाद आउटिंग का कार्यक्रम था. 2 रातें घने जंगल में औषधीय पौधों के अध्ययन में बितानी थीं. वहां बने रेस्टहाउस में सब के रहने की व्यवस्था थी. यात्रा में कनिका के हंसीमजाक ने पिकनिक जैसा माहौल बना दिया था. वहां पहुंचते ही फील्ड आफिसर ने सभी लोगों को 2 घंटे का समय लंच और थोड़ा आराम करने के लिए दिया. जिस का उपयोग सभी ने उस सुरम्य प्राकृतिक स्थल को और नजदीक से देखने में किया.

अमित अपना लंच ले कर साथियों के साथ झरने के टौप पर था कि नीचे उस की नजर कनिका पर पड़ी जो अपनी सहेलियों के साथ खड़ी उसे इशारे से नीचे बुला रही थी. उस का मन तो बहुत था लेकिन वह अपने दोस्तों में टारगेट बनना नहीं चाहता था.

कनिका के आमंत्रण को उस ने नजरअंदाज कर दिया. कुछ समय बाद जब वह मिली तो उस ने स्वाभाविक ढंग से शिकायत जरूर की, ‘‘आप आए क्यों नहीं, सर? बहुत अच्छा लगता.’’

बेचारा अमित मन मसोस कर रह गया. विषय बदलने के लिए उस ने कहा, ‘‘आज आप की राजस्थानी बंधेज की साड़ी बहुत सुंदर लग रही है.’’

कनिका खनकती आवाज में बोली, ‘‘सिर्फ साड़ी?’’

अमित ने कहा, ‘‘नहीं, और भी बहुत कुछ, ये वादियां, अमूल्य वनस्पति और आप.’’

कनिका ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘सर, आप बातों को इतना घुमाफिरा कर क्यों कहते हैं?’’

अमित क्या कहता. वह मन की बातों को अंदर दबा जाता था.

पौधों के बारे में जानकारी दी जा रही थी. सभी लोग नोटबुक थामे व्यस्त थे. यह पहला मौका था जब अमित को कनिका के स्पर्श का अनुभव हुआ. ग्रुप में वह सट कर खड़ी मुसकरा रही थी. उस की कुछ खास तमिल सहेलियां अमित से अंगरेजी में पौधों के बारे में पूछ रही थीं और वह उन्हें अंगरेजी में ही समझा रहा था. कनिका पहली बार अमित को धाराप्रवाह अंगरेजी बोलते हुए सुन रही थी. अब कनिका अपने गु्रप से अलग हो कर पास के कैक्टस के पौधों की ओर चली गई. अमित को भी आवाज दे कर उस ने अपने पास बुला लिया और बोली, ‘‘देखिए सर, यह इस जगह की सब से जीवट वनस्पति है. हम चाहे इसे सौंदर्य की प्रतिमूर्ति न मानें किंतु यह हमें जीना सिखाती है.’’

अमित उस की बात को समझने का प्रयास कर रहा था. बाकी ग्रुप आगे बढ़ चुका था. तभी एक फोटोग्राफर ने उन दोनों का फोटो ले लिया. अमित को लगा शायद फोटोग्राफर उस के दिल की भावनाओं को जानता है.

कनिका फिर बोली, ‘‘आप को ऐसा नहीं लगता कि ये हमें संदेश दे रहे हैं…सब के बीच हमारा अपना अस्तित्व है और हमें उसे खोने का डर नहीं.’’

रेस्टहाउस में कनिका ने अमित के सामने प्रस्ताव रखा कि क्यों न हम आज रात्रि में झरने के  किनारे चलें. मैं अपनी कुछ सहेलियों के साथ रात का नजारा देखना चाहती हूं. अमित तो जैसे पहले से ही अभिभूत था.

रात्रि विहार ने अमित को कनिका के और नजदीक आने का अवसर दिया. कारण, कनिका ने उसे आज वह सब बताया था जो किसी अनजान पुरुष को बताना संभव नहीं. पहली बार अमित को लगा, कनिका वैसी बिंदास नहीं है जैसी वह दिखती है.

कनिका ने बताया कि 4 साल पहले उस का विवाह हो चुका है. एक 3 साल का बेटा भी है. किंतु जीवन में उसे वह दुखद अनुभव भी झेलना पड़ा है जो एक स्त्री के लिए बहुत दुखद होता है. उस का पति एक बिगड़ा रईस निकला, जिस ने उस की कोई इज्जत नहीं की. कानूनन अब तलाक ले कर वह उस से मुक्ति पा चुका था. कनिका ने इस कठोर यथार्थ को स्वीकार किया और  जीवन को रोरो कर नहीं बल्कि मुसकरा कर जीने का फैसला किया.

ऐतिहासिक जगहों को घूमने वाले दिन कनिका बस में अमित के पास वाली सीट पर बैठी थी. अमित यह सोच कर बहुत खुश था कि आज कनिका पूरे दिन उस के साथ रहने वाली है. वे दोनों अंगरेजी भाषी ग्रुप में थे, जहां भीड़ कम थी, अत: पूरा दिन मौजमस्ती में बीत गया. अमित ने पहली बार आज कनिका को एक गिफ्ट दिया, जिसे बहुत मुश्किल से उस ने स्वीकार किया. आज कनिका ने बहुत फोटो लिए थे.

आखिर टे्रनिंग खत्म होने का अंतिम दिन आ ही गया. सभी के मन उदास थे. अमित आज कनिका से बहुत बातें करना चाहता था. तभी रात को कनिका का फोन आ गया. उस ने पूछा कि क्या वह एक दिन और नहीं रुक सकता. इधर बहुत सारे पर्यटक स्थल देखने को बचे हैं. अमित का तो जाने का मन ही नहीं था. इसलिए वह एक दिन और रुकने को तैयार हो गया. दोनों ने खूब बातें कीं.

औपचारिक विदाई समारोह के समय सभी बहुत भावुक हो गए. अनजान लोग इतने करीबी हो चुके थे कि बिछुड़ने का दुख सहन नहीं हो रहा था. ग्रुप फोटो मधुर यादों का हिस्सा बनने जा रहा था. फोटो तो इतने हो चुके थे कि अलबम ही तैयार हो गया था. भारी मन से गले लग कर सब विदा हुए.

अमित ने कनिका की डायरी में अपने हस्ताक्षर कर अपना संदेश लिखा. न जाने क्यों वह अभी भी अपने मन की बात कनिका को कह नहीं पाया था. कनिका ने भी अमित की डायरी में लिखा, ‘‘मैं इतिहास से बहुत प्यार करती हूं…बहुत… बहुत ज्यादा, लेकिन इतिहास नहीं दोहराती.’’ – कनिका सिंह.

इस विचित्र इबारत का अर्थ अमित की समझ में नहीं आया था.

कनिका के आग्रह पर अमित होटल में एक कमरा बुक करवा कर कल का इंतजार करने लगा. शाम को उस की कनिका से लंबी बातें हुईं, दूसरे दिन उस ने घूमने का कार्यक्रम बनाया था. अमित सोच रहा था, कल वह अवश्य ही कनिका को अपने दिल की बात बता देगा. सारी रात वह सो नहीं पाया.

दूसरे दिन 10 बजे वह तैयार हो कर कनिका से मिलने के लिए रवाना हुआ. 11 बजे कनिका ने चारमीनार के पास मिलने को कहा था. 11 बज गए. अमित की बेचैनी बढ़ने लगी. थोड़ा और समय बीता. वह अधीर हो गया. करीब साढ़े 11 बजे कनिका का फोन आया :

‘‘हैलो सर, आई एम वैरी सौरी. मैं आप को कैसे कहूं. मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा…सर, सुबह पापा का फोन आया था, इमरजेंसी है मुझे वापस घर जाना पड़ रहा है. सौरी, प्लीज आप कांटेक्ट बनाए रखना. मैं कभी आप को नहीं भूलूंगी… मैं कल आप को फोन करूंगी.’’

अमित का मूड उखड़ चुका था. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दे. कल रात का टे्रन का आरक्षण वह कैंसिल करा चुका था और अब सारा दिन वह अकेला क्या करेगा. उस ने फ्लाइट पकड़ी और अपने शहर रवाना हो गया.

दूसरे दिन भी कनिका का कोई फोन नहीं आया. वह बहुत परेशान हो गया. उस की उदासी बढ़ती जा रही थी. किसी भी काम में उस का मन नहीं लग रहा था.

अमित ने खुद कनिका को फोन लगाया तो वज्रपात हुआ क्योंकि जो नंबर उस के पास था वह सिम अब डेड हो चुकी थी. असम से एक मैडम का फोन आया तो अमित को पता चला कि कल उस के पास कनिका का फोन आया था. ऐसी ही बात उस की एक तमिल सहेली ने भी बताई.

अमित का दिल टूट गया. दोनों के साथ के फोटो अमित के सामने पड़े थे. वह निर्णय नहीं कर पा रहा था कि अब वह टे्रनिंग के दिनों को याद करे या भूलने का प्रयास करे. कनिका तो वैसे ही उस के लिए एक गूढ़ पहेली बन गई थी. अचानक उस की नजर अपनी डायरी पर पड़ी, धड़कते दिल से उस ने प्रथम पृष्ठ पढ़ा. उस पर कनिका का वह संदेश लिखा था जो उस ने विदाई के समय लिखा था : ‘‘मैं इतिहास से बहुत प्यार करती हूं… बहुत…बहुत ज्यादा लेकिन इतिहास नहीं दोहराती,’’ – कनिका सिंह.

आज अमित को उपरोक्त पंक्तियों का सही अर्थ समझ में आ रहा था लेकिन दिल अभी भी संतुष्ट नहीं था. अगर ऐसा ही था तो उस ने नजदीकी ही क्यों बढ़ाई. उस के दिमाग में कई संभावनाएं आजा रही थीं. अचानक अमित को कनिका के कहे वे शब्द याद आ रहे थे जो उस ने कईकई बार उस से कहे थे, ‘‘सर, मैं आप को कभी भुला नहीं पाऊंगी. आप भी मुझे याद रखेंगे न, कहीं भूल तो नहीं जाएंगे?’’

अमित उन शब्दों का अर्थ खोजता रहा लेकिन कनिका उस के लिए अब एक  अनसुलझी पहेली बन चुकी थी.

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