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Family Story : मंदिर

परमहंस गांव से उकता चुका था. गांव के मंदिर के मालिक से उसे महीने भर का राशन ही तो मिलता था, बाकी जरूरतों के लिए उसे और उस की पत्नी को भक्तों द्वारा दिए जाने वाले न के बराबर चढ़ावे पर निर्भर रहना पड़ता था. अब तो उस की बेटी भी 4 साल की हो गई है और उस का खर्च भी बढ़ गया है. तन पर न तो ठीक से कपड़ा, न पेट भर भोजन. एक रात परमहंस अपनी पत्नी को विश्वास में ले कर बोला, ‘‘क्यों न मैं काशी चला जाऊं.’’ ‘‘अकेले?’’ पत्नी सशंकित हो कर बोली.

‘‘अभी तो अकेले ही ठीक रहेगा लेकिन जब वहां काम जम जाएगा तो तुम्हें भी बुला लूंगा,’’ परमहंस खुश होते हुए बोला. ‘‘काशी तो धरमकरम का स्थान है. मुझे पूरा भरोसा है कि वहां तुम्हारा काम जम जाएगा.’’ पत्नी की विश्वास भरी बातें सुन कर परमहंस की बांछें खिल गईं. दूसरे दिन पत्नी से विदा ले कर परमहंस ट्रेन पर चढ़ गया. चलते समय रामनामी ओढ़ना वह नहीं भूला था, क्योंकि बिना टिकट चलने का यही तो लाइसेंस था. माथे पर तिलक लगाए वह बनारस के हसीन खयालों में कुछ ऐसे खोया कि तंद्रा ही तब टूटी जब बनारस आ गया. बनारस पहुंचने पर परमहंस ने चैन की सांस ली.

प्लेटफार्म से बाहर आते ही उस ने अपना दिमाग दौड़ाया. थोडे़ से सोचविचार के बाद गंगाघाट जाना उसे मुनासिब लगा. 2 दिन हो गए उसे घाट पर टहलते मगर कोई खास सफलता नहीं मिली. यहां पंडे़ पहले से ही जमे थे. कहने लगे, ‘‘एक इंच भी नहीं देंगे. पुश्तैनी जगह है. अगर धंधा जमाने की कोशिश की तो समझ लेना लतियाए जाओगे.’’ निराश परमहंस की इस दौरान एक व्यक्ति से जानपहचान हो गई. वह उसे घाट पर सुबहशाम बैठे देखता.

बातोंबातों में परमहंस ने उस के काम के बारे में पूछा तो वह हंस पड़ा और कहने लगा, ‘‘हम कोई काम नहीं करते. सिपाही थे, नौकरी से निकाल दिए गए तो दालरोटी के लिए यहीं जम गए.’’ ‘‘दालरोटी, वह भी यहां?’’ परमहंस आश्चर्य से बोला, ‘‘बिना काम के कैसी दालरोटी?’’ वह सोचने लगा कि वह भी तो ऐसे ही अवसर की तलाश में यहां आया है. फिर तो यह आदमी बड़े काम का है. उस की आंखें चमक उठीं, ‘‘भाई, मुझे भी बताओ, मैं बिहार के एक गांव से रोजीरोटी की तलाश में आया हूं.

क्या मेरा भी कोई जुगाड़ हो सकता है?’’ ‘‘क्यों नहीं,’’ बडे़ इत्मीनान से वह बोला, ‘‘तुम भी मेरे साथ रहो, पूरीकचौरी से आकंठ डूबे रहोगे. बाबा विश्वनाथ की नगरी है, यहां कोई भी भूखा नहीं सोता. कम से कम हम जैसे तो बिलकुल नहीं.’’ इस तरह परमहंस को एक हमकिरदार मिल गया. तभी पंडा सा दिखने वाला एक आदमी, सिपाही के पास आया, ‘‘चलो, जजमान आ गए हैं.’’ सिपाही उठ कर जाने लगा तो इशारे से परमहंस को भी चलने का संकेत दिया. दोनों एक पुराने से मंदिर के पास आए.

वहां एक व्यक्ति सिर मुंडाए श्वेत वस्त्र में खड़ा था. पंडे ने उसे बैठाया फिर खुद भी बैठ गया. कुछ पूजापाठ वगैरह किया. उस के बाद जजमान ने खानेपीने का सामान उस के सामने रख कर खाने का आग्रह किया. तीनों ने बडे़ चाव से देसी घी से छनी पूरी व मिठाइयों का भोजन किया. जजमान उठ कर जाने को हुआ तो पंडे ने उस से पूरे साल का राशनपानी मांगा. जजमान हिचकिचाते हुए बोला, ‘‘इतना कहां से लाएं. अभी मृतक की तेरहवीं का खर्चा पड़ा था.’’ वह चिरौरी करने लगा, ‘‘पीठ ठोक दीजिए महाराज, इस से ज्यादा मुझ से नहीं होगा.’’

बिना लिएदिए जजमान की पीठ ठोकने को पंडा तैयार नहीं था. परमहंस इन सब को बडे़ गौर से देख रहा था. कैसे शास्त्रों की आड़ में जजमान से सबकुछ लूट लेने की कोशिश पंडा कर रहा था. अंतत: 1,001 रुपए लेने के बाद ही पंडे ने सिर झुकवा कर जजमान की पीठ ठोकी. उस ने परम संतोष की सांस ली. अब मृतक की आत्मा को शांति मिल गई होगी, यह सोच कर उस ने आकाश की तरफ देखा. लौटते समय पंडे को छोड़ कर दोनों घाट पर आए. कई सालों के बाद परमहंस ने तबीयत से मनपसंद भोजन का स्वाद लिया था. सिपाही के साथ रहते उसे 15 दिन से ऊपर हो चुके थे. खानेपीने की कोई कमी नहीं थी मगर पत्नी को उस ने वचन दिया था कि सबकुछ ठीक कर के वह उसे बुला लेगा.

कम से कम न बुला पाने की स्थिति में रुपएपैसे तो भेजने ही चाहिए पर पैसे आएं कहां से? परमहंस चिंता में पड़ गया. मेहनत वह कर नहीं सकता था. फिर मेहनत वह करे तो क्यों? पंडे को ही देखा, कैसे छक कर खाया, ऊपर से 1,001 रुपए ले कर भी गया. उसे यह नेमत पैदाइशी मिली है. वह उसे भला क्यों छोडे़? इसी उधेड़बुन में कई दिन और निकल गए. एक दिन सिपाही नहीं आया. पंडा भी नहीं दिख रहा था. हो सकता हो दोनों कहीं गए हों. परमहंस का भूख के मारे बुरा हाल था. वह पत्थर के चबूतरे पर लेटा पेट भरने के बारे में सोच रहा था कि एक महिला अपने बेटे के साथ उस के करीब आ कर बैठ गई और सुस्ताने लगी. परमहंस ने देखा कि उस ने टोकरी में कुछ फल ले रखे थे. मांगने में परमहंस को पहले भी संकोच नहीं था फिर आज तो वह भूखा है, ऐसे में मुंह खोलने में क्या हर्ज?

‘‘माता, आप के पास कुछ खाने के लिए होगा. सुबह से कुछ नहीं खाया है.’’ साधु जान कर उस महिला ने परमहंस को निराश नहीं किया. फल खाते समय परमहंस ने महिला से उस के आने की वजह पूछी तो वह कहने लगी, ‘‘पिछले दिनों मेरे बेटे की तबीयत खराब हो गई थी. मैं ने शीतला मां से मन्नत मांगी थी.’’ परमहंस को अब ज्यादा पूछने की जरूरत नहीं थी. इतने दिन काशी में रह कर कुछकुछ यहां पैसा कमाने के तरीके सीख चुका था. अत: बोला, ‘‘माताजी, मैं आप की हथेली देख सकता हूं.’’ वह महिला पहले तो हिचकिचाई मगर भविष्य जानने का लोभ संवरण नहीं कर सकी. परमहंस कुछ जानता तो था नहीं. उसे तो बस, पैसे जोड़ कर घर भेजने थे. अत: महिला का हाथ देख कर बोला, ‘‘आप की तो भाग्य रेखा ही नहीं है.’’ उस का इतना कहना भर था कि महिला की आंखें नम हो गईं, ‘‘आप ठीक कहते हैं. शादी के 2 साल बाद ही पति का फौज में इंतकाल हो गया.

यही एक बच्चा है जिसे ले कर मैं हमेशा परेशान रहती हूं. एक प्राइवेट स्कूल में काम करती हूं. बच्चा दाई के भरोसे छोड़ कर जाती हूं. यह अकसर बीमार रहता है.’’ ‘‘घर आप का है?’’ परमहंस ने पूछा. ‘‘हां’’ बातों के सिलसिले में परमहंस को पता चला कि वह विधवा थी, और उस ने अपना नाम सावित्री बताया था. विधवा से परमहंस को खयाल आया कि जब वह छोटा था तो एक बार अपने पिता मनसाराम के साथ एक विधवा जजमान के घर अखंड रामायण पाठ करने गया था. रामायण पाठ खत्म होने के बाद पिताजी रात में उस विधवा के यहां ही रुक गए. अगली सुबह पिताजी कुछ परेशान थे. जजमान को बुला कर पूछा, ‘बेटी, यहां कोई बुजुर्ग महिला जल कर मरी थी?’ यह सुन कर वह विधवा जजमान सकते में आ गई. ‘जली तो थी और वह कोई नहीं मेरी मां थी. बाबूजी बहरे थे. दूसरे कमरे में कुछ कर रहे थे. उसी दौरान चूल्हा जलाते समय अचानक मां की साड़ी में आग लग गई.

वह लाख चिल्लाई मगर बहरे होने के कारण पास ही के कमरे में रहते हुए बाबूजी कुछ सुन न सके. इस प्रकार मां अकाल मृत्यु को प्राप्त हुई.’ मनसाराम के मुख से मां के जलने की बात जान कर विधवा की उत्सुकता बढ़ गई और वह बोली, ‘आप को कैसे पता चला?’ ‘बेटी, कल रात मैं ने स्वप्न में देखा कि एक बुजुर्ग महिला जल रही है. वह मुक्ति के लिए छटपटा रही है,’ मनसाराम रहस्यमय ढंग से बोले, ‘इस घटना को 20 साल गुजर चुके थे फिर भी मां को मुक्ति नहीं मिली. मिलेगी भी तो कैसे? अकाल मृत्यु वाले बिना पूजापाठ के नहीं छूटते. उन की आत्मा भटकती रहती है.’

यह सुन कर वह विधवा जजमान भावुक हो उठी. उस ने मुक्ति पाठ कराना मंजूर कर लिया. इस तरह मनसाराम को जो अतिरिक्त दक्षिणा मिली तो वह उस का जिक्र घर आने पर अपनी पत्नी से करना न भूले. परमहंस छोटा था पर इतना भी नहीं कि समझ न सके. उसे पिताजी की कही एकएक बात आज भी याद है जो वह मां को बता रहे थे. जजमान अधेड़ विधवा थी. पास के ही गांव में ग्रामसेविका थी. पैसे की कोई कमी नहीं थी. सो चलतेचलते सोचा, क्यों न कुछ और ऐंठ लिया जाए. शाम को रामायण पाठ खत्म होने के बाद मैं गांव में टहल रहा था कि एक जगह कुछ लोग बैठे आपस में कह रहे थे कि इस विधवा ने अखंड रामायण पाठ करवा कर गांव को पवित्र कर दिया और अपनी मां को भी. मां की बात पूछने पर गांव वालों ने उन्हें बताया कि 20 बरस पहले उन की मां जल कर मरी थी.

बस, मैं ने इसी को पकड़ लिया. स्वप्न की झूठी कहानी गढ़ कर अतिरिक्त दक्षिणा का भी जुगाड़ कर लिया. और इसी के साथ दोनों हंस पडे़. परमहंस के मन में भी ऐसा ही एक विचार जागा, ‘‘आप के पास कुंडली तो होगी?’’ ‘‘हां, घर पर है,’’ सावित्री ने जवाब दिया. ‘‘आप चाहें तो मुझे एक बार दिखा दें, मैं आप को कष्टनिवारण का उपाय बता दूंगा,’’ परमहंस ने इतने निश्छल भाव से कहा कि वह ना न कर सकी. सावित्री तो परमहंस से इतनी प्रभावित हो गई कि घर आने तक का न्योता दे दिया.

परमहंस यही तो चाहता था. सावित्री का अच्छाखासा मकान था. देख कर परमहंस के मन में लालच आ गया. वह इस फिराक में पड़ गया कि कैसे ऐसी कुछ व्यवस्था हो कि कहीं और जाने की जरूरत ही न हो और यह तभी संभव था जब कोई मंदिर वगैरह बने और वह उस का स्थायी पुजारी बन जाए. काशी में धर्म के नाम पर धंधा चमकाने में कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़ती.

वह तो उस ने घाट पर ही देख लिया था. मानो दूध गंगा में या फिर बाबा विश्वनाथ को लोग चढ़ा देते हैं. भले ही आम आदमी को पीने के लिए न मिलता हो. सावित्री ने उस की अच्छी आवभगत की. परमहंस कुंडली के बारे में उतना ही जानता था जितना उस का पिता मनसाराम. इधरउधर का जोड़घटाना करने के बाद परमहंस तनिक चिंतित सा बोला, ‘‘ग्रह दोष तो बहुत बड़ा है. बेटे पर हमेशा बना रहेगा.’’ ‘‘कोई उपाय,’’ सावित्री अधीर हो उठी. उपाय है न, शास्त्रों में हर संकट का उपाय है, बशर्ते विश्वास के साथ उस का पालन किया जाए,’’ परमहंस बोला, ‘‘होता यह है कि लोग नास्तिकों के कहने पर बीच में ही पूजापाठ छोड़ देते हैं,’’ कुंडली पर दोबारा नजर डाल कर वह बोला, ‘‘रोजाना सुंदरकांड का पाठ करना होगा व शनिवार को हनुमान का दर्शन.’’

‘‘हनुमानजी का आसपास कोई मंदिर नहीं है. वैसे भी जिस मंदिर की महत्ता है वह काफी दूर है,’’ सावित्री बोली. परमहंस कुछ सोचने लगा. योजना के मुताबिक उस ने गोटी फेंकी, ‘‘क्यों न आप ही पहल करतीं, मंदिर यहीं बन जाएगा. पुण्य का काम है, हनुमानजी सब ठीक कर देंगे.’’ सावित्री ने सोचने का मौका मांगा. परमहंस उस रोज वापस घाट चला आया. सिपाही पहले से ही वहां बैठा था. ‘‘कहां चले गए थे?’’ सिपाही ने पूछा तो परमहंस ने सारी बातें विस्तार से उसे बता दीं. ‘‘ये तुम ने अच्छा किया. भाई मान गए तुम्हारे दिमाग को. महीना भी नहीं बीता और तुम पूरे पंडे हो गए,’’ सिपाही ने हंसी की.

उस के बाद परमहंस सावित्री का रोज घाट पर इंतजार करने लगा. करीब एक सप्ताह बाद वह आते दिखाई दी. परमहंस ने जल्दीजल्दी अपने को ठीक किया. रामनामी सिरहाने से उठा कर बदन पर डाली. ध्यान भाव में आ कर वह कुछ बुदबुदाने लगा. सावित्री ने आते ही परमहंस के पांव छुए. क्षणांश इंतजारी के बाद परमहंस ने आंखें खोलीं. आशीर्वाद दिया. ‘‘मैं ने आप का ध्यान तो नहीं तोड़ा?’’ ‘‘अरे नहीं, यह तो रोज का किस्सा है. वैसे भी शास्त्रों में ‘परोपकार: परमोधर्म’ को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है. आप का कष्ट दूर हो इस से बड़ा ध्यान और क्या हो सकता है मेरे लिए.’’ परमहंस का निस्वार्थ भाव उस के दिल को छू गया. ‘‘महाराज, कल रात मैं ने स्वप्न में हनुमानजी को देखा,’’ सावित्री बोली. ‘‘इस से बड़ा आदेश और क्या हो सकता है, रुद्रावतार हनुमानजी का आप के लिए.

अब इस में विलंब करना उचित नहीं. मंदिर का निर्माण अति शीघ्र होना चाहिए,’’ गरम लोहे पर चोट करने का अवसर न खोते हुए परमहंस ने अपनी शातिर बुद्धि का इस्तेमाल किया. ‘‘पर एक बाधा है,’’ सावित्री तनिक उदास हो बोली, ‘‘मैं ज्यादा खर्च नहीं कर सकती.’’ परमहंस सोच में पड़ गया. फिर बोला,‘‘कोई बात नहीं. आप के महल्ले से चंदा ले कर इस काम को पूरा किया जाएगा.’’ और इसी के साथ सावित्री के सिर से एक बड़ा बोझ हट चुका था. परमहंस कुछ पैसा घर भेजना चाह रहा था मगर जुगाड़ नहीं बैठ रहा था. उस के मन में एक विचार आया कि क्यों न ग्रहशांति के नाम से हवनपूजन कराया जाए. सावित्री मना न कर सकेगी. परमहंस के प्रस्ताव पर सावित्री सहर्ष तैयार हो गई.

2 दिन के पूजापाठ में उस ने कुल 2 हजार बनाए. कुछ सावित्री से तो कुछ महल्ले की महिलाओं के चढ़ावे से. मौका अच्छा था, सो परमहंस ने मंदिर की बात छेड़ी. अब तक महिलाएं परमहंस से परिचित हो चुकी थीं. उन सभी ने एक स्वर में सहयोग देने का वचन दिया. परमहंस ने इस आयोजन से 2 काम किए. एक अर्थोपार्जन, दूसरे मंदिर के लिए प्रचार. सावित्री का पति फौज में था. फौजी का गौरव देश के लिए हो जाने वाली कुरबानी में होता है. देश के लिए शहीद होना कोई ग्रहों के प्रतिकूल होने जैसा नहीं. जैसा की सावित्री सोचती थी. सावित्री का बेटा हमेशा बीमार रहता था.

यह भी पर्याप्त देखभाल न होने की वजह से था. सावित्री का मूल वजहों से हट जाना ही परमहंस जैसों के लिए अपनी जमीन तैयार करने में आसानी होती है. परमहंस सावित्री की इसी कमजोरी का फायदा उठा रहा था. दुर्गा पूजा नजदीक आ रही थी, सो महल्ला कमेटी के सदस्य सक्रिय हो गए. अच्छाखासा चंदा जुटा कर उन्होंने एक दुर्गा की प्रतिमा खरीदी. पूजा पाठ के लिए समय निर्धारित किया गया तो पता चला कि पुराने पुरोहितजी बीमार हैं. ऐसे में किसी ने परमहंस का जिक्र किया. आननफानन में सावित्री से परमहंस का पता ले कर कुछ उत्साही युवक उसे घाट से लिवा लाए. परमहंस ने दक्षिणा में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई क्योंकि उस ने दूर तक की सोच रखी थी.

पूजापाठ खत्म होने के बाद उस ने कमेटी वालों के सामने मंदिर की बात छेड़ी. युवाओं ने जहां तेजी दिखाई वहीं लंपट किस्म के लोग, जिन का मकसद चंदे के जरिए होंठ तर करना था, ने तनमन से इस पुण्य के काम में हाथ बंटाना स्वीकार किया. घर से दुत्कारे ऐसे लोगों को मंदिर बनने के साथ पीनेखाने का एक स्थायी आसरा मिल जाएगा. इसलिए वे जहां भी जाते मंदिर की चर्चा जरूर करते, ‘‘चचा, जरा सोचो, कितना लाभ होगा मंदिर बनने से. कितना दूर जाना पड़ता है हमें दर्शन करने के लिए. बच्चों को परीक्षा के समय हनुमानजी का ही आसरा होता है. ऐसे में उन्हें कितना आत्मबल मिलेगा. वैसे भी राम ने कलयुग में अपने से अधिक हनुमान की पूजा का जिक्र किया है.’’ धीरेधीरे लोगों की समझ में आने लगा कि मंदिर बनना पुण्य का काम है. आखिर उन का अन्नदाता ईश्वर ही है.

हम कितने स्वार्थी हैं कि भगवान के रहने के लिए थोड़ी सी जगह नहीं दे सकते, जबकि खुद आलिशान मकानों के लिए जीवन भर जोड़तोड़ करते रहते हैं. इस तरह आसपास मंदिर चर्चा का विषय बन गया. कुछ ने विरोध किया तो परमहंस के गुर्गों ने कहा, ‘‘दूसरे मजहब के लोगों को देखो, बड़ीबड़ी मीनार खड़ी करने में जरा भी कोताही नहीं बरतते. एक हम हिंदू ही हैं जो अव्वल दरजे के खुदगर्ज होते हैं. जिस का खाते हैं उसी को कोसते हैं. हम क्या इतने गएगुजरे हैं कि 2-4 सौ धर्मकर्म के नाम पर नहीं खर्च कर सकते?’’ चंदा उगाही शुरू हुई तो आगेआगे परमहंस पीछेपीछे उस के आदमी.

उन्होंने ऐसा माहौल बनाया कि दूसरे लोग भी अभियान में जुट गए. अच्छीखासी भीड़ जब न देने वालों के पास जाती तो दबाववश उन्हें भी देना पड़ता. परमहंस ने एक समझदारी दिखाई. फूटी कौड़ी भी घालमेल नहीं किया. वह जनता के बीच अपने को गिराना नहीं चाहता था क्योंकि उस ने तो कुछ और ही सोच रखा था. मंदिर के लिए जब कोई जगह देने को तैयार नहीं हुआ तो सड़क के किनारे खाली जमीन पर एक रात कुछ शोहदों ने हनुमान की मूर्ति रख कर श्रीगणेश कर दिया और अगले दिन से भजनकीर्तन शुरू हो गया. दान पेटिका रखी गई ताकि राहगीरों का भी सहयोग मिलता रहे.

फिरकापरस्त नेता को बुलवा कर बाकायदा निर्माण की नींव रखी गई ताकि अतिक्रमण के नाम पर कोई सरकारी अधिकारी व्यवधान न डाले. सावित्री खुश थी. चलो, परमहंसजी महाराज की बदौलत उस के कष्टों का निवारण हो रहा था. तमाम कामचोर महिलाओं को भजनपूजन के नाम पर समय काटने की स्थायी जगह मिल रही थी. सावित्री के रिश्तेदारों ने सुना कि उस ने मंदिर बनवाने में आर्थिक सहयोग दिया है तो प्रसन्न हो कर बोले, ‘‘चलो उस ने अपना विधवा जीवन सार्थक कर लिया.’’ मंदिर बन कर तैयार हो गया. प्राणप्रतिष्ठा के दिन अनेक साधुसंतों व संन्यासियों को बुलाया गया

यह सब देख कर परमहंस की छाती फूल कर दोगुनी हो गई. परमहंस ने मंदिर निर्माण का सारा श्रेय खुद ले कर खूब वाहवाही लूटी. उस का सपना पूरा हो चुका था. आज उस की पत्नी भी मौजूद थी. काशी में उस के पति ने धर्म की स्थायी दुकान खोल ली थी इसलिए वह फूली न समा रही थी. इस में कोई शक भी नहीं था कि थोड़े समय में ही परमहंस ने जो कर दिखाया वह किसी के लिए भी ईर्ष्या का विषय हो सकता था. परमहंस के विशेष आग्रह पर सावित्री भी आई जबकि उस के बच्चे की तबीयत ठीक नहीं थी.

पूजापाठ के दौरान ही किसी ने सावित्री को खबर दी कि उस के बेटे की हालत ठीक नहीं है. वह भागते हुए घर आई. बच्चा एकदम सुस्त पड़ गया था. उसे सांस लेने में दिक्कत आ रही थी. वह किस से कहे जो उस की मदद के लिए आगे आए. सारा महल्ला तो मंदिर में जुटा था. अंतत वह खुद बच्चे को ले कर अस्पताल की ओर भागी परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी. निमोनिया के चलते बच्चा रास्ते में ही दम तोड़ चुका था.

खो गई जीनत : अम्मी और अब्बू में किसी हुई जीत

अम्मी और अब्बू की सिर्फ तसवीर ही देखी थी जीनत ने. उन का प्यार कैसा होता है, इस का उसे कोई अहसास ही नहीं था.

अम्मी और अब्बू के एक सड़क हादसे में मारे जाने के बाद मामी और मामू ही जीनत का सहारा थे.

मामू ने जीनत को पढ़ायालिखाया और इस लायक बनाया कि बड़ी हो कर वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके और मामू का सहारा बने.

मामू की माली हालत भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी. एक कमरे के मकान के बाहर मामू ने एक छोटा सा खोखा रख रखा था. वे उस में बिसातखाने का सामान रख कर बेचते थे.

जो औरतें सामान खरीदने आ भी जातीं, वे मामू से इतना मोलभाव करतीं कि किसी चीज पर मिलने वाला मुनाफा कम हो जाता और वैसे भी मामू को बाहर की औरतों से बहुत लगाव महसूस होता था और वे चाहते थे कि औरतें उन के खोखे पर

आ कर मामू से बातें करती ही रहें. उन की इसी कमजोरी का फायदा चालाक औरतें खूब उठाती थीं. वे मामू से खूब रसीली बातें करतीं और सामान सस्ते में खरीद लेतीं.

घर में 5 लोग थे. मामू, मामी, उन के 2 बच्चे और एक जीनत. इन सब का खर्च चलाने की जिम्मेदारी जीनत के कंधों पर ही थी, इसीलिए वह शहर के ही एक स्कूल में कंप्यूटर पढ़ाने का काम करने लगी थी.

जीनत के मामू जितने लापरवाह किस्म के थे, मामी उतनी ही सख्त थीं.

‘‘मैं तो कहती हूं कि घर में अगर लड़की हो तो उस पर एक नजर टेढ़ी ही रखनी चाहिए और घर की अंदरूनी बातों में लड़की जात को ज्यादा शामिल नहीं करना चाहिए,’’ मामी ने पड़ोस में रहने वाली शकीला से कहा और शकीला ने भी हां में हां मिलाई.

‘‘हां… सही कहा आप ने और इसीलिए मैं ने अपनी बेटी सलमा का स्कूल जाना बंद करवा दिया है. अब 8वीं जमात तो पास हो ही गई है, आगे की पढ़ाई के लिए लड़कों वाले स्कूल में भेजना पड़ेगा और हम ने तो सुना है

कि वहां लड़का और लड़की एकसाथ बैठते हैं.’’

मामी की इसी सख्ती का नतीजा था कि जीनत ने अपनेआप को बहुत संभाल रखा था और हमेशा ही डरीसहमी सी रहती थी.

इस सहमेपन के साथ जीतेजीते जीनत 30 साल की हो गई थी और अभी तक कुंआरी थी. ऐसा नहीं था कि उस के लिए शादी के पैगाम नहीं आए, पर भला मामू उस की शादी करा देता तो घर के लिए पैसे कौन लाता.

मामूमामी की सोच यही थी कि जीनत इसी घर में ही रहे और पैसे लाती रहे.

मामू और मामी के दोनों बेटे भी अब जवान हो चले थे. उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को भरपूर सम?ाते हुए कुछ पैसे जोड़े, कुछ पैसा बैंक से लोन लिया और अपने अब्बा की बिसातखाने की दुकान को अब एक बढि़या मेकअप  सैंटर में तबदील कर दिया था.

जीनत भी मेहनत से स्कूल में अपनी ड्यूटी पूरी करती और घर आ कर मामी के साथ रसोईघर में मदद करती.

जीनत ने अपनी जवान होती भावनाओं को अच्छी तरह से काबू कर रखा था, पर फिर भी जवानी में किसी की तरफ ?ाकाव होना बड़ा ही लाजिमी होता है और जीनत भी कोई अलग नहीं थी.

‘‘अरे जीनत मैडम… मैं ने एक शायरी लिखी है… जरा इस पर गौर तो फरमाइएगा,’’ जीनत के साथ ही स्कूल में पढ़ाने वाले एक साथी टीचर आफताब ने कहा.

‘‘अजी, आप की शायरी का क्या सुनना… वह तो हमेशा की तरह अच्छी ही होती हैं… हां, अगर आप फिर भी अपनी और तारीफ सुनना चाहते हैं तो सुना सकते हैं.’’

‘‘किसी आशिक के कलेजे को जलाया होगा, तब जा कर खुदा ने सूरज को बनाया होगा.’’

‘‘अरे वाह… क्या बात है… बहुत ही उम्दा… लगता है, सूरज से कुछ ज्यादा ही प्यार है आप को और तभी तो आप ने तखल्लुस भी सूरज ही रखा है.’’

‘‘जी, बिलकुल सही कहा आप ने, इसीलिए मेरा नाम तो आफताब भले ही है, पर मैं चाहता हूं कि अब लोग मुझे सूरज के नाम से ही पुकारें,’’ आफताब ने कहा.

‘‘हां जी… ऐसी बात है तो मैं

आप को सूरज के नाम से ही बुलाऊंगी,’’ जीनत ने कहा.

2 जवां दिलों के बीच प्यार को पनपने के लिए कुछ खास की जरूरत नहीं होती, बस थोड़ा सा अपनापन का पानी, खूबसूरती की खाद और प्यार के फल आने लगते हैं.

आफताब एक सीधासादा लड़का था, जो जिंदगी से जूझ रहा था, फिर भी हमेशा मुसकराता रहता और अपनी जिंदगी के गम को शायरी में कह कर उड़ा दिया करता था. पर माली हालत की बात करें तो आफताब जीनत से तो बेहतर ही था.

इस बार नए साल पर आफताब ने जीनत को एक मोबाइल फोन गिफ्ट कर दिया. जीनत ने बहुत नानुकर की, पर आफताब ने ऐसी दलील दी कि उसे चुप हो जाना पड़ा.

‘‘देखिए मैडम, यह मैं आप को इसलिए गिफ्ट कर रहा हूं, ताकि मैं आप को ह्वाट्सएप पर अपने शेर भेज सकूं और आप उस की अच्छाइयां और कमियां मुझे बताएं, जिस से मुझे और बेहतर शायर बनने में मदद मिल सकेगी. क्या अब भी आप यह मोबाइल नहीं लेंगी?’’

‘‘ठीक है, ठीक है… ले लेती हूं… पर जब मैं अपने घर पर रहूंगी, तब आप फोन नहीं करेंगे… हां, मैसेज में बात जरूर कर सकते हैं.’’

‘‘ठीक है जीनतजी.’’

जीनत और आफताब को एकदूसरे का साथ अच्छा लग रहा था और दोनों ही अपनी आगे की जिंदगी एकदूसरे के साथ गुजरने की बात सोच रहे थे, पर हमेशा ही इनसान का सोचा हुआ कहां होता है?

इतनी जिंदगी गुजरने के बाद एक बात तो जीनत मन ही मन जान चुकी थी कि मामू और मामी उस की शादी जानबूझ कर नहीं करना चाहते और वे लोग यही चाहते हैं कि जीनत उन के लिए बस ऐसे ही पैसे कमाती रहे और वे लोग आराम से मजे करते रहें, इसलिए जीनत इस बाबत मामी से खुद ही बात करने की सोचने लगी.

एक रात को आफताब ने कुछ शायरियां लिख कर जीनत के मोबाइल पर भेजीं और पूछा कि कोई सुधार की गुंजाइश हो तो बताए.

जीनत ने सारी शायरियां पढ़ीं और उन का जवाब भी आफताब को लिख दिया और सो गई. सुबह उठी तो स्कूल के लिए देर हो रही थी, इसलिए जल्दी में जीनत मोबाइल अपने बिस्तर पर ही भूल गई.

‘‘चलो फिर मैं आज तुम्हें घर तक छोड़ देता हूं,’’ अपनी बाइक की तरफ इशारा करता हुआ आफताब बोला.

जीनत पहले तो हिचकिचाई, क्योंकि गली के नुक्कड़ पर ही तो मामू की दुकान है. बहुत मुमकिन है कि घर के लोग आफताब के साथ उसे देख लें.

‘देख लें तो देख लें, मैं कोई चोरी तो नहीं कर रही. और फिर आज तो मुझे वैसे भी आफताब के बारे में बात करनी ही है,’ ऐसा सोच कर जीनत ने बाइक पर जाने के लिए हां कर दी और आफताब के साथ बैठ कर चल दी.

जीनत कुछ देर बाद घर के सामने पहुंचने वाली थी. उस ने आफताब को उसे वहीं उतार देने को कहा और वह घर तक पैदल ही चली गई.

घर में अंदर का नजारा ही अलग था. मामू, उन का बेटा असलम और मामी एकसाथ बैठे हुए थे. वे जीनत को घूर रहे थे.

‘‘अरे जीनत बेटी… बहुत थक गई होगी,’’ मामू ने कहा.

‘‘हां… मामू… स्कूल में काम ही इतना होता है, थोड़ीबहुत थकान आना तो लाजिमी ही है,’’ जीनत ने कहा.

जीनत का इतना कहना ही था कि मामी बिफर उठीं, ‘‘हां… हां थकान तो आएगी ही, जब देर रात तक किसी दूसरे लड़के से चक्कर चलाया जाएगा.’’

जीनत को तुरंत ही याद आया कि आज वह अपना मोबाइल घर में ही भूल गई थी और इसीलिए मामी ऐसा बोल रही हैं.

‘‘वह मामी, मैं आप से बात करने ही वाली थी… आज,’’ जीनत हकला गई.

‘‘अरे, तू क्या बात करेगी… तू तो चक्कर चला रही है. और वह भी किसी गैरधर्म के लड़के के साथ…’’

‘‘अरे नहीं मामी… वह तो आफताब…’’

‘‘बता कौन है यह सूरज… जो तुझे से अपनी मुहब्बत का इजहार शेरोशायरी से कर रहा है? और जिस का जवाब भी तू खूब वाहवाह कर के दे रही है…

‘‘अरे, मैं कह रही हूं कि हमारी जात में कोई लड़के नहीं रह गए थे, क्या जो तू किसी हिंदू लड़के से…’’

‘‘नहीं मामी… वह सूरज नहीं, आफताब है और हमारे ही धर्म का है… मैं खुद ही आज आप से अपनी शादी के बारे में बात करने वाली थी,’’ जीनत बोलती चली गई.

‘‘अरे, तू दोचार शब्द पढ़ क्या गई है, मुझे ही शब्दों के मतलब समझाने लगी है… और तू समझ क्या रही है, तू किसी भी जात वाले से शादी करने को कहेगी और हम कर देंगे. तुझे ऐसे ही हमारे लिए पैसे कमाने होंगे. भूल जा कि तेरी कभी शादी भी होगी,’’ मामी का पारा चढ़ चुका था.

‘‘शादी तो मैं सूरज से ही करूंगी… और आप सब को बताना चाहूंगी कि मैं सूरज के बच्चे की मां बनने वाली हूं…’’ जीनत ने यह बात सिर्फ इसलिए कह दी थी कि ऐसा सुन कर मामू और मामी का पारा कम हो जाएगा, पर इस बात ने आग में घी डालने का काम किया था.

‘‘आप लोग नहीं मानोगे, तो जबरदस्ती ही सही… देखती हूं कि मुझे कौन रोकता है,’’ जीनत भी अड़ गई थी.

‘‘मैं रोकूंगी तु?ो… नमकहराम… हमारी नाक कटवाती है… महल्ले में हमारा जीना मुश्किल करना चाहती है,’’ मामी चिल्ला रही थीं.

जीनत ने सोचा कि जब बात इतनी बढ़ ही चुकी है, तो आफताब को भी फोन कर के यहीं बुला लेती हूं और इस गरज से उस ने मामी के हाथ से अपना मोबाइल छीन कर आफताब को फोन कर दिया.

‘‘हां… तुम मेरे घर आ जाओ… सब लोग घर पर ही हैं… आमनेसामने बैठ कर बात हो जाएगी.’’

आफताब अभी ज्यादा दूर नहीं गया था, वह तुरंत ही लौट पड़ा.

मामू ने जीनत के विद्रोही सुर देखे तो मामी को शांत कराने लगे.

‘‘ठीक है जीनत… तुम्हारे फैसले को हमारी भी हां है… जैसा तुम चाहो वैसा करो,’’ मामू ने कहा.

पर असलम को काटो तो खून नहीं, उसे यह बात कतई मंजूर नहीं हो पा रही थी कि किसी लड़के को घर बुला कर जीनत खुद ही अपनी शादी की बात करे.

कुछ देर बाद ही आफताब वहां आ गया. अभी उस ने दरवाजे के अंदर पहला कदम रखा ही था कि असलम उसे देख कर भड़क गया.

असलम ने तुरंत ही आफताब का कौलर पकड़ लिए और उस को जमीन पर गिरा कर लातघूंसे चलाने लगा.

आफताब को अचानक इस हमले की उम्म्मीद नहीं थी, इसलिए वह असलम का विरोध नहीं कर सका. अब तो मौका देख कर जीनत के मामू ने भी आफताब को मारना शुरू कर दिया. वे दोनों आफताब को मारते हुए बाहर ले आए, जीनत आफताब को बचाने दौड़ी, तो मामी ने उसे पकड़ लिया.

बाहर महल्ले के लोग जमा होने लगे थे.

‘‘दिनदहाड़े चोरी करने घुसता है. आज तुझे नहीं छोड़ेंगे,’’ असलम चीख रहा था.

एक चोर को पिटता देख कर जमा हुई भीड़ की हथेलियों में भी खुजली होने लगी थी. बिना जाने कि सच क्या है, भीड़ ने भी बेतहाशा आफताब को मारना शुरू कर दिया.

जीनत ने बड़ी कोशिशों से अपनेआप को मामी की गिरफ्त से आजाद किया और आफताब को बचाने दौड़ी.

भीड़ अब भी आफताब को मारे जा रही थी… जीनत आफताब तक पहुंच ही नहीं पा रही थी… वह लगातार चीख रही थी, ‘‘मत मारो इसे… यह चोर नहीं है…’’ पर भीड़ तो खुद ही वकील होती है और खुद ही जज…

इतने में जीनत पिटते हुए आफताब को बचाने की गरज से उस से जा चिपकी, पर गुस्साई भीड़ को वह दिखाई तक न दी और भीड़ लाठीडंडे बरसाती रही. कुछ ही देर बाद जीनत और आफताब के सिर से खून की धारा निकल पड़ी थी और उन दोनों की लाशें एकदूसरे से लिपटी हुई पड़ी थीं. भीड़ ने अपनी ताकत दिखाते हुए इंसाफ कर दिया था.

ख्वाहिश: ‘बांझ’ होने का ठप्पा

ट्रिंग… ट्रिंग… फोन की घंटी बज रही थी. घड़ी में देखा, तो रात के साढ़े 12 बजे थे. इतनी रात में किस का फोन हो सकता है. किसी बुरी आशंका से मन कांप उठा. रिसीवर उठाया तो दूसरी ओर से अशोक की भर्राई हुई आवाज थी, “दीदी शोभा शांत हो गई. वह हम सब को छोड़ कर दिव्यलोक को चली गई.”

कुछ पल को मैं ठगी सी बैठी रही. फोन की आवाज से मेरे पति सुनील भी जाग गए थे. मैं ने उन्हें स्थिति से अवगत कराया. हम ने आपस में सलाह की और फिर मैं ने अशोक को फोन मिलाया, “अशोक, हम जल्दी ही सुबह जयपुर पहुंच जाएंगे, हमारा इंतजार करना.”

सुबह 5 बजे हम दोनों अपनी गाड़ी से जयपुर के लिए रवाना हो गए. दिल्ली से जयपुर पहुंचने में 5 घंटे लगते हैं. वैसे भी सुबहसुबह सड़कें खाली थीं. अत: 4 घंटे में ही पहुंच जाने की आशा थी. रास्तेभर शोभा का खयाल आता रहा.

अतीत की यादें चलचित्र की भांति आंखों के आगे घूमने लगीं.

शोभा मेरे छोटे भाई अशोक की पत्नी थी. वह बहुत मृदुभाषी, कार्यकुशल और खुशमिजाज की थी. याद हो आया वह दिन, जब विवाह के बाद वरवधू का स्वागत करने के लिए मां ने पूजा का थाल मेरे हाथ में पकड़ा दिया. वैसे, बड़ी भाभी का हक बनता था वरवधू को गृहप्रवेश करवाने का. किंतु बड़ी भाभी की तबियत ठीक नहीं थी, वह पेट से थीं और डाक्टर ने उन्हें बेडरेस्ट के लिए कहा हुआ था. अत: आरती का थाल सजा कर मैं ने ही वरवधू को गृहप्रवेश कराया था. बनारसी साड़ी में लिपटी हुई सिमटी सी संकुचित सी खड़ी थी.

अशोक ने उसे मेरा परिचय देते हुए कहा, “ये मेरी बड़ी दीदी हैं, मुझ से 10 साल बड़ी हैं, मेरे लिए मां समान हैं.”

दोनों ने मेरे पैर छुए. मैं ने भी दोनों को प्यार से गले लगा लिया. विवाह के बाद की प्रथाएं संपन्न करवा कर मैं वापस दिल्ली लौट आई.
2 महीने बाद भाभी की जुड़वा बच्चियों हुईं, जिन का नाम सिया और जिया रखा गया.

प्रसव के बाद भाभी बहुत कमजोर हो गई थीं. अत: घर का सारा कार्यभार शोभा ने संभाल लिया. उसे बच्चों से बहुत प्यार था. वह बच्चों का खयाल बहुत उत्साहित हो कर रखती थी.

मां सारी रिपोर्ट विस्तार से मुझे फोन पर बतलाया करती थीं. बच्चों के प्रति शोभा का अपनत्व देख कर भाभी को बहुत अच्छा लगता था.

जब सिया और जिया का नर्सरी स्कूल में दाखिला हुआ तो शोभा उन्हें तैयार करने से ले कर उन के जूते पौलिश करती, उन्हें नाश्ता करवा के टिफिन पैक कर के उन के स्कूल बैग में रख देती और टिफिन पूरा खत्म करना है, यह भी हिदायत दे देती थी. कभीकभी उन को होमवर्क करने में भी वह मदद करती थी. घर में सब सुचारू रूप से चल रहा था.
शोभा के विवाह को 4 वर्ष हो गए थे. मां जब भी मुझे फोन करती थीं, उन की बातों में कुछ बेचैनी का आभास होता था. वे दिल की मरीज थीं. मैं ने जोर दे कर उन की बेचैनी का कारण जानना चाहा, तो उन्होंने बताया, “अब अशोक की शादी को 4 साल हो गए हैं. अगर उस को एक बेटा हो जाता तो मैं पोते का मुंह देख कर दुनिया से जाती.

“न जाने कब मुझे बुला लें,” मैं उन्हें सांत्वना देती रहती थी कि धैर्य रखो. सब ठीक हो जाएगा.

मैं ने मां की इच्छा शोभा तक पहुंचा दी तो वह हंस कर बोली, “दीदी आजकल पोता और पोती में कोई फर्क नहीं होता. सिया और जिया भी तो अपनी हैं. वही मेरे बच्चे हैं,” बच्चों के प्रति उस की आत्मीयता मुझे बहुत अच्छी लगी.

जिस बात का डर था, वही हुआ. अचानक मां को दिल का दौरा पड़ा और पोते की चाहत लिए हुए वे इस दुनिया से चल बसीं.

शोभा के विवाह को 6 वर्ष हो चुके थे. मैं ने लक्ष्य किया कि अब उस के मन में संतान की चाह प्रबल हो रही थी. अशोक ने कई डाक्टरों से संपर्क किया. कुछ डाक्टरी जांच भी हुई, किंतु नतीजा संतोषप्रद नहीं था. मेरे आग्रह पर दोनों दिल्ली भी आए. मेरी जानकार डाक्टर ने रिपोर्ट देख कर यही निष्कर्ष निकाला कि शोभा मां नहीं बन सकती.

अशोक ने सब तरह के उपचार किए, चाहे आयुर्वेदिक हो या होमियोपैथी. यहां तक कि कुछ रिश्तेदारों के कहने पर झाड़फूंक का भी सहारा लिया, किंतु निराश ही होना पड़ा. इस का असर शोभा के स्वास्थ्य पर पड़ने लगा.
शोभा प्राय: फोन कर के मुझे इधरउधर की बहुत सी खबरें देती रहती थी. उस ने एक घटना का जिक्र किया कि कुछ दिन पहले उस के किसी दूर के रिश्तेदार के यहां पुत्र जन्म का उत्सव था. वहां अशोक और शोभा के साथसाथ बड़े भैयाभाभी भी आमंत्रित थे. वहां पहुंच कर जब शोभा ने नवागत शिशु को पालने में झूलते देखा तो वह अपने को रोक ना पाई और आगे बढ़ कर बच्चे को गोद में उठा लिया. तभी पीछे से बच्चे की दादी ने उस के हाथ से बच्चे को छीन लिया और अपनी बहू को डांटते हुए कहा, “तेरा ध्यान कहां है? देख नहीं रही बच्चे को बांझ ने उठा लिया है.”

शोभा ने बताया कि बड़ी भाभी भी वहीं खड़ी थीं. यह बात बतलाते समय शोभा की आवाज में पीड़ा झलक रही थी. मेरा मन संवेदना से भर उठा.

आशोभा ने बतलाया कि अब सिया और जिया उस के पास नहीं आती हैं. या यों कहिए कि भाभी उन बच्चों को शोभा के पास नहीं आने देतीं. इस का कारण भी वह समझ गई थी.

बांझपन का एहसास शोभा को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था. मैं अपनी गृहस्थी में बहुत व्यस्त हो गई थी. मेरे दोनों बच्चे विवाह योग्य थे. अगले वर्ष मेरे पति रिटायर होने वाले थे. अतः हम भविष्य की योजनाओं में व्यस्त हो गए थे. कभीकभी मैं शोभा को फोन कर के उन की कुशलक्षेम जान लेती थी.
फिर एक दिन अशोक का फोन आया. बातचीत से लगा कि वह बहुत परेशान है. मैं ने 3-4 दिन के लिए जयपुर का प्रोग्राम बना लिया. फीकी मुसकराहट से शोभा ने स्वागत किया. वह बहुत कमजोर हो गई थी. अशोक उस की स्थिति से बहुत चिंतित हो गया था. मुझे लगा कि ‘बांझ’ शब्द ने उस को भीतर तक आहत कर दिया है. वह बोली, “अब तो सिया और जिया भी मेरे पास नहीं आती.”

मैं ने प्यार से शोभा को अपने पास बैठाया और कहा, “मेरी बात ध्यान से सुनो और समझने की कोशिश करो. मैं चाहती हूं कि तुम किसी नवजात शिशु को गोद ले लो या कुछ अच्छी संस्थाएं हैं, जहां से बच्चे को लिया जा सकता है. ऐसा करने से एक बच्चे का भला हो जाएगा. उसे एक प्यारी मां मिल जाएगी और तुम्हें एक प्यारा बच्चा मिल जाएगा. यह एक नेक कार्य होगा. एक बच्चे का जीवन अच्छा बन जाएगा. तुम चाहो तो इस में मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं.”

लेकिन शोभा ने गंभीरता से उत्तर दिया, “दीदी, मैं अपनी तकदीर तो बदल नहीं सकती. यदि मेरी तकदीर में संतान का सुख लिखा ही नहीं है तो गोद ले कर भी मैं सुखी नहीं रह पाऊंगी,” कुछ रुक कर वह फिर बोली, “दीदी, मैं अपनी कोख से जन्मा बच्चा चाहती हूं, गोद लिया हुआ नहीं.”

वह अपने फैसले पर अडिग थी और मैं उस के फैसले के आगे निरुतर हो गई.

15 दिन बाद अशोक का फोन आया, वह आवाज से बहुत परेशान लग रहा था. उस ने बताया कि शोभा अब अकसर बीमार रहती है. उसे भूख नहीं लगती है और जबरदस्ती कुछ खाती है तो हजम नहीं होता उलटी हो जाती है. मैं ने सलाह दी कि तुरंत डाक्टरी जांच करवाओ. शोभा की तरफ से मुझे चिंता हो गई. अत: अशोक को सहारा देने के मकसद से मैं ने 3-4 दिन का जयपुर जाने का कार्यक्रम बना लिया.

अशोक ने शोभा के सारे टेस्ट करवा लिए थे. मेरे पहुंचने के अगले दिन वह अस्पताल से रिपोर्ट ले आया. वह बहुत उदास था. मेरे पूछने पर उस ने बताया कि शोभा की किडनी में कैंसर है, जो बहुत फैल गया है. अगर एक महीने पहले जांच करवा लेते तो शायद आपरेशन द्वारा किडनी निकाल देते, लेकिन अब तो कैंसर किडनी के बाहर तक फैल गया है. एक और विशेष बात जो डाक्टर ने बतलाई, वह यह कि शोभा प्रेग्नेंट भी है. प्रेगनेंसी की अभी शुरुआत ही है. एक हफ्ते बाद निश्चित तौर पर पता चल पाएगा. अचरज से मेरा मुंह खुला रह गया. समझ नहीं आया कि दुखी होऊं या खुशी मनाऊं.

शोभा ने मेरी और अशोक की बातें सुन ली थीं. वह मुसकराते हुए बोली, “दीदी, अशोक तो यों ही घबरा जाते हैं. मैं सहज में इन का पीछा छोड़ने वाली नहीं हूं और अब तो मुझे जीना ही है. उस की बातें आज भी मेरे कानों में गूंज रही हैं.
बाद में अशोक ने मुझे बतला दिया था कि डाक्टरों के अनुसार गर्भ को गिरा देने में ही बेहतरी है, क्योंकि कैंसर किडनी से बाहर निकल कर फैल रहा है, अगर तुरंत आपरेशन कर के किडनी निकाल भी दें, फिर भी शोभा का जीवन एक वर्ष से अधिक नहीं होगा और अगर गर्भपात नहीं करवाया तो कैंसर के आपरेशन के बाद की थेरेपी से बच्चे पर बुरा असर पड़ सकता है. या तो वह बचेगा ही नहीं और अगर बच भी जाए तो एब्नार्मल भी हो सकता है. अत: डाक्टर की राय में गर्भपात ही उचित होगा.

शोभा ने सबकुछ सुन लिया था. वह खुश नजर आ रही थी. वह बोली, ”दीदी, मुझे यही खुशी है कि अब मुझे कोई बांझ नहीं कहेगा. डाक्टरों का निर्णय ठीक ही है. मेरे जीवन का सूर्य अस्त हो रहा है. मैं बच्चे को देख पाऊंगी या नहीं, पता नहीं. अगर बच्चा बच भी गया और विकलांग हो गया तो और भी दुःख होगा. तसल्ली यही है कि अब मेरे ऊपर से ‘बांझ’ होने का लांछन हट गया. अब मैं शांतिपूर्वक मर सकूंगी.”

सहसा कार एक झटके के साथ रुक गई. सुनील ने ब्रेक मारा था, क्योंकि सामने एक बड़ा सा गड्ढा आ गया था. मेरी विचार श्रृंखला टूट गई. अब हम जयपुर की सीमा में पहुंच गए थे. बाजार के बीच से गुजरते हुए याद आया कि यहां कई बार शोभा के साथ चाट खाने आती थी, फिर खूब शौपिंग कर के हम दोनों शाम तक घर पहुंचते थे. अब तो केवल याद ही बाकी है.

ठीक साढ़े 9 बजे हम घर पहुंच गए. गाड़ी की आवाज सुन कर अशोक बाहर आ गया. सहारा दे कर उस ने गाड़ी से उतारा और मेरे गले से लग कर जोर से रो पड़ा. अंदर पहुंच कर देखा, शोभा का शव भूमि पर रखा था, बड़ी शांत मुख मुद्रा थी जैसे कुछ कहना चाहती हो. मैं अपने को ना रोक सकी और फफक कर रो पड़ी.
वह समाप्त हो गई. 2 दिन बाद बहुत बोझिल मन से हम दोनों वापस लौट आए. रास्तेभर सोचती रही कि समाज के उलाहनों ने शोभा को बहुत चोट पहुंचाई, लेकिन मरने से पहले उसे यह खुशी थी कि वह बांझ नहीं थी, पर बच्चे की ख्वाहिश अधूरी ही रह गई.

अब मैं नहीं आऊंगी पापा : पापा की सताई एक बेटी

मैं अपने जीवन में जुड़े नए अध्याय की समीक्षा कर रही थी, जिसे प्रत्यक्ष रूप देने के लिए मैं दिल्ली से मुंबई की यात्रा कर रही थी और इस नए अध्याय के बारे में सोच कर अत्यधिक रोमांचित हो रही थी. दूसरी ओर जीवन की दुखद यादें मेरे दिमाग में तांडव करने लगी थीं.

उफ, मुझे अपने पिता का अहंकारी रौद्र रूप याद आने लगा, स्त्री के किसी भी रूप के लिए उन के मन में सम्मान नहीं था. मुझे पढ़ायालिखाया, लेकिन अपने दिमाग का इस्तेमाल कभी नहीं करने दिया. पढ़ाई के अलावा किसी भी ऐक्टिविटी में मुझे हिस्सा लेने की सख्त मनाही थी. घड़ी की सुई की तरह कालेज से घर और घर से कालेज जाने की ही इजाजत थी.

नीरस जीवन के चलते मेरा मन कई बार कहता कि क्या पैदा करने से बच्चे अपने मातापिता की संपत्ति बन जाते हैं कि जैसे चाहा वैसा उन के साथ व्यवहार करने का उन्हें अधिकार मिल जाता है? लेकिन उन के सामने बोलने की कभी हिम्मत नहीं हुई.

मां भी पति की परंपरा का पालन करते हुए सहमत न होते हुए भी उन की हां में हां मिलाती थीं. ग्रेजुएशन करते ही उन्होंने मेरे विवाह के लिए लड़का ढूंढ़ना शुरू कर दिया था. लेकिन पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद ही मेरा विवाह विवेक से हो पाया. मेरी इच्छा या अनिच्छा का तो सवाल ही नहीं उठता था. गाय की तरह एक खूंटे से खोल कर मुझे दूसरे खूंटे से बांध दिया गया.

मेरे सासससुर आधुनिक विचारधारा के तथा समझदार थे. विवेक उन का इकलौता बेटा था. वह अच्छे व्यक्तित्व का स्वामी तो था ही, पढ़ालिखा, कमाता भी अच्छा था और मिलनसार स्वभाव

का था. इकलौती बहू होने के चलते सासससुर ने मुझे भरपूर प्यार दिया. बहुत जल्दी मैं सब से घुलमिल गई. मेरे मायके में पापा की तानाशाही के कारण दमघोंटू माहौल के उलट यहां हरेक के हक का आदर किया जाता था, जिस से पहली बार मुझे पहचान मिली, तो मुझे अपनेआप पर गर्व होने लगा था.

विवाह के बाद कई बार पापा का, पगफेरे की रस्म के लिए, मेरे ससुर के पास मुझे बुलाने के लिए फोन आया. लेकिन मेरे अंदर मायके जाने की कोई उत्सुकता न देख कर उन्होंने कोई न कोई बहाना बना कर उन को टाल दिया. उन के इस तरह के व्यवहार से पापा के अहं को बहुत ठेस पहुंची. सहसा एक दिन वे खुद ही मुझे लेने पहुंच गए और मेरे ससुर से नाराजगी जताते हुए बोले, ‘मैं ने बेटी का विवाह किया है, उस को बेचा नहीं है, क्या मुझे अपनी बेटी को बुलाने का हक नहीं है?’

‘अरे, नहीं समधी साहब, अभी शादी हुई है, दोनों बच्चे आपस में एकदूसरे को समझ लें, यह भी तो जरूरी है. अब हमारा जमाना तो है नहीं…’

‘परंपराओं के मामले में मैं अभी भी पुराने खयालों का हूं,’ पापा ने उन की बात बीच में ही काट कर बोला तो सभी के चेहरे उतर गए.

मुझे पापा के कारण की तह तक गए बिना इस तरह बोलना बिलकुल अच्छा नहीं लगा, लेकिन मैं मूकदर्शक बनी रहने के लिए मजबूर थी. उन के साथ मायके आने के बाद भी उन से मैं कुछ नहीं कह पाई, लेकिन जितने दिन मैं वहां रही, उन के साथ नाराजगी के कारण मेरा उन से अनबोला ही रहा.

परंपरानुसार विवेक मुझे दिल्ली लेने आए, तो पापा ने उन से उन की कमाई और उन के परिवार के बारे में कई सवालजवाब किए. विवेक को अपने परिवार के मामले में पापा का दखल देना बिलकुल नहीं सुहाया. इस से उन के अहं को बहुत चोट पहुंची. पापा से तो उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन मुझे सबकुछ बता दिया. मुझे पापा पर बहुत गुस्सा आया कि वे बात करते समय यह भी नहीं सोचते कि कब, किस से, क्या कहना है.

मैं ने जब पापा से इस बारे में चर्चा की तो वे मुझ पर ही बरस पड़े कि ऐसा उन्होंने कुछ नहीं कहा, जिस से विवेक को बुरा लगे. बात बहुत छोटी सी थी, लेकिन इस घटना के बाद दोनों परिवारों के अहं टकराने लगे. उस के बाद, पापा एक बार मुझे मेरी ससुराल से लेने आए, तो विवेक ने उन से बात नहीं की. पापा को बहुत अपमान महसूस हुआ. जब ससुराल लौटने का वक्त आया तो विवेक ने फोन पर मुझ से कहा कि या तो मैं अकेली आ जाऊं वरना पापा ही छोड़ने आएं.

पापा ने साफ मना कर दिया कि वे छोड़ने नहीं जाएंगे. मैं ने हालत की नजाकत को देखते हुए, बात को तूल न देने के लिए पापा से बहुत कहा कि समय बहुत बदल गया है, मैं पढ़ीलिखी हूं, मुझे छोड़ने या लेने आने की किसी को जरूरत ही क्या है? मुझे अकेले जाने दें. मां ने भी उन्हें समझाया कि उन का इस तरह अपनी बात पर अड़ना रिश्ते के लिए नुकसानदेह होगा. लेकिन वे टस से मस नहीं हुए. मेरे ज्यादा जिद करने पर वे अपनी इज्जत की दुहाई देते हुए बोले, ‘तुम्हें मेरे मानसम्मान की बिलकुल चिंता नहीं है.’

मैं अपने पति को भी जानती थी कि जो वे सोच लेते हैं, कर के छोड़ते हैं. न विवेक लेने आए, न मैं गई. कई बार फोन से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने बात नहीं की.

पापा के अहंकार के कारण मेरा जीवन त्रिशंकु बन कर रह गया. इन हालात को न सह सकने के कारण मां अवसाद में चली गईं और अचानक एक दिन उन की हृदयाघात से मृत्यु हो गई. इस दुखद घटना के बारे में भी पापा ने मेरी ससुराल वालों को सूचित नहीं किया तो मेरा मन उन के लिए वितृष्णा से भर उठा. इन सारी परिस्थितियों के जिम्मेदार मेरे पापा ही तो थे.

मां की मृत्यु की खबर सुन कर आए हुए सभी मेहमानों के वापस जाते ही मैं ने गुस्से के साथ पापा से कहा, ‘क्यों हो गई तसल्ली, अभी मन नहीं भरा हो तो मेरा भी गला घोंट दीजिए. आप तो बहुत आदर्श की बातें करते हैं न, तो आप को पता होना चाहिए कि हमारी परंपरानुसार दामाद को और उस के परिजनों को बहुत आदर दिया जाता है और बेटी का कन्यादान करने के बाद उस के मातापिता से ज्यादा उस के पति और ससुराल वालों का हक रहता है. जिस घर में बेटी की डोली जाती है, उसी घर से अर्थी भी उठती है. आप ने अपने ईगो के कारण बेटी का ससुराल से रिश्ता तुड़वा कर कौन सा आदर्श निभाया है. मेरी सोच से तो परे की बात है, लेकिन मैं अब इन बंधनों से मुक्त हो कर दिखाऊंगी. मेरा विवाह हो चुका है, इसलिए मेरी ससुराल ही अब मेरा घर है. मैं जा रही हूं अपने पति के पास. अब आप रहिए अपने अहंकार के साथ इस घर में अकेले. अब मैं यहां कभी नहीं आऊंगी, पापा.’

इतना कह कर, पापा की प्रतिक्रिया देखे बिना ही, मैं घर से निकल आई और मेरे कदम बढ़ चले उस ओर जहां मेरा ठौर था और वही थी मेरी आखिरी मंजिल.

तालीम: क्या वारसी साहब की तमन्ना पूरी हुई?

अमन अपने पिता का लख्तेजिगर था, क्योंकि उस खानदान में एक भी बेटा नहीं था. वैसे, वहां धनदौलत की कोई कमी नहीं थी. वारसी साहब खानदानी रईस थे. कई गाडि़यां कीं और कई बंगले थे. वे राजामहाराजा की जिंदगी जी रहे थे, लेकिन बेटे जैसी नेमत से महरूम थे.

वारसी साहब की शादी मुद्दत पहले हो गई थी, पर फिर भी कोई औलाद नहीं हुई. बेटा होने की तमन्ना दिल में बहुत थी. कई मिन्नतों के बाद अमन जैसा चांद सा बेटा वारसी साहब को हुआ. लेकिन शक्ल से तो पर अक्ल से नहीं. उसे अपने पिता की धनदौलत पर ज्यादा ही नाज था. उसे लगता था कि दुनिया में धनदौलत ही सबकुछ है.

वारसी साहब अपने एकलौते बेटे से बहुत ज्यादा लाड़प्यार करते थे, पर उन्हें कंपनी के कामों से इतनी भी फुरसत नहीं मिलती थी कि वे अपने बेटे को तालीम हासिल करने के लिए बोल सकें. वारसी साहब की यही मुहब्बत धीरेधीरे अमन के लिए घातक साबित हो रही थी.

‘‘तुम्हारे पास क्या है छोटू? देखो, मेरे पास कई गाडि़यां हैं, कई बंगले हैं, चहलकदमी के लिए कई बाग है, जबकि तुम्हारे पास खाने के लिए तो दो कौडि़यां होंगी,’’ एक दिन अमन ने अपने पिता के ड्राइवर के बेटे से कहा.

रजा उर्फ छोटू की मां भी वारसी साहब के घर बरतन साफ करती थी, पर वह अच्छे स्कूल में पढ़ता था, क्योंकि उस के मांबाप उस के भविष्य के लिए कुछ भी करने को तैयार थे.

रजा ने अमन के सवाल का जवाब दिया, ‘‘मेरे पास वह सबकुछ है, जो शायद तुम्हारे पास नहीं है.’’

अमन यह सुन कर गुस्से से आगबबूला हो कर बोला, ‘‘अरे, जरा बता तो सही कि ऐसी क्या ऐसी चीज है तेरे पास, जो मेरे पास नहीं है? तुम्हारी मां मेरे घर पर काम करती है. तुम्हारे पिता मेरे पिताजी के कार ड्राइवर हैं. आखिर ऐसी भी तुम्हारे पास क्या जायदाद है?’’

‘‘मेरे पास तालीम जैसी नेमत है, लेकिन तुम्हारे पास नहीं है. तालीम के बिना इनसान गरीब की तरह है. तुम चाहो तो पैसों से डिगरियां खरीद सकते हो, लेकिन सच्ची और अच्छी तालीम नहीं.’’

उन दोनों की बहस को बगीचे में बैठी अमन की दादी सुन रही थीं. अपनी लाठी पकड़ते हुए उन्होंने आवाज लगाई, ‘‘अरे, तुम दोनों मेरे पास आ जाओ. खेलतेखेलते आपस में नाहक झगड़ क्यों रहे हो?’’

अमन ने फरियाद रखी, ‘‘दादी, देखो न छोटू को कि यह क्या बोल रहा है. इस के पास खाने के लिए सही से राशन भी नहीं होगा, पहनने के लिए कपड़े भी नहीं होंगे, लेकिन देखो कैसे बोल रहा है कि जो इस के पास है, वह मेरे पास नहीं है.’’

बूढ़ी दादी ने अपने पोते को समझाते हुए कहा, ‘‘बेटा, छोटू की बात बिलकुल सही है. तालीम की तुलना धनदौलत से नहीं और धनदौलत की तुलना तालीम से नहीं की जा सकती, क्योंकि तालीम दौलतों की दौलत है. हर कोई इसे हासिल नहीं कर सकता.

‘‘रजा के मातापिता गरीब तो हैं और वे अपने घर में नौकरी करते हैं, पर गरीब होने के बाद भी उन्होंने इसे अच्छी तालीम देने की कोशिश की है.

‘‘पर, तुम्हारे मातापिता ने तुम्हें अच्छी तालीम देने में लापरवाही की है, क्योंकि उन दोनों को यही लगता है कि वे इतनी धनदौलत छोड़ कर जाएंगे कि अगर तुम्हारी आने वाली सात नस्लें भी बैठ कर खाएंगी तो खत्म नहीं होगी.’’

‘‘दादी, तुम छोटू की तरफदारी क्यों कर रही हो? मैं आप का पोता हूं या छोटू?’’ अमन ने दादी से पूछा.

‘‘बेटा, अभी मैं तुम्हारी दादी नहीं हूं, बल्कि तुम दोनों की बात का फैसला करने वाली हूं. फैसला करने के समय रिश्तेदारी खत्म. अगर मैं तुम्हारे हक में फैसला करूंगी, तो छोटू के साथ नाइंसाफी होगी. जो सच है, वही मैं कहूंगी.

‘‘आओ, तुम दोनों एक जगह बैठ जाओ. एक बार बचपन में जब मैं अपनी सहेली के साथ झगड़ रही थी, तो मेरी दादी ने एक कहानी सुनाई थी. आज वही कहानी मैं तुम दोनों को सुनाती हूं.

‘‘कई साल पहले एक राजा हुआ करते थे. वे बहुत पढ़ेलिखे थे और उन के पास धनदौलत की कोई कमी नहीं थी. उन का एक बेटा भी था, पर वह अव्वल दर्जे का बेवकूफ था. वह पढ़ाईलिखाई को कुछ नहीं समझता था.

‘‘एक दिन राजा की तबीयत खराब हो गई. कई हकीमों ने राजा का इलाज किया, पर वे राजा को नहीं बचा पाए. अब राजा के मरने के बाद सिंहासन पर उस का बेवकूफ और अनपढ़ बेटा बैठ गया, क्योंकि वह राजा का वारिस जो था.

‘‘वह राजा तो बन बैठा, पर ज्यादा दिन तक नहीं. उस की बेवकूफी का फायदा उठा कर लोगों ने उसे ठग लिया और उसे राजा से रंक बनते देर नहीं लगी.

‘‘कहने का मतलब यह है कि तुम बिना तालीम के अपनी जायदाद को ज्यादा समय तक के लिए नहीं बचा पाओगे. पर अगर तुम्हारे पास अच्छी तालीम होगी, तो बहुत सी जायदाद बना सकते हो…’’

अमन की समझ में दादी की सारी बातें आ चुकी थीं. उसे अपनी भूल पर पछतावा हो रहा था.

‘‘दादी, मुझे माफ कर देना. मैं आज से ही तालीम हासिल करने स्कूल जाया करूंगा. छोटू, तुम भी मुझे माफ कर दो.’’

इस के बाद अमन अब छोटू के साथ तालीम हासिल करने स्कूल जाने लगा था. वे दोनों अच्छे दोस्त भी बन गए थे.

प्यार है: लड़ाई को प्यार से जीत पाए दो प्यार करने वाले

हाइड पार्क सोसाइटी वैसे तो ठाणे के काफी पौश इलाके में स्थित है, यहां के लोग भी अपनेआप को सभ्य, शिष्ट, आधुनिक और समृद्ध मानते हैं, पर जैसाकि अपवाद तो हर जगह होते हैं, और यहां भी है. कई बार ऊपरी चमकदमक से तो देखने में तो लगता है कि परिवार बहुत अच्छा है, सभ्य है पर जब असलियत सामने आती है तो हैरान हुए बिना नहीं रह सकते. ऐसे ही 2 परिवारों के जब अजीब से रंगढंग सामने आए तो यहां के निवासियों को समझ ही नहीं आया कि इन का क्या किया जाए, हंसें या इन्हे टोकें.

बिल्डिंग नंबर 9 के फ्लैट 804 में रहते हैं रोहित, उन की पत्नी सुधा और बेटियां सोनिका और मोनिका. इन के सामने वाले फ्लैट 805 में रहते हैं आलोक, उन की पत्नी मीरा और बेटा शिविन. कभी दोनों परिवारों में अच्छी दोस्ती थी, दोनों के बच्चे एक ही स्कूलकलेज में पढ़ते रहे.

दोनों दंपत्ति बहुत ही जिद्दी, घमंडी और गुस्सैल हैं. जो भी इन परिवारों के बीच दोस्ती रही, वह सिर्फ इन के प्यारे, समझदार बच्चों के कारण ही. अब 1 साल के आगेपीछे शिविन और सोनिका दोनों आगे की पढ़ाई के लिए लंदन चले गए हैं. मोनिका मुंबई में ही फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही है. सब ठीक चल ही रहा था कि सोसाइटी में कुछ लोगों ने आमनेसामने के खाली फ्लैट खरीद लिए और अब उन का बड़ा सा घर हो गया, तो इन दोनों दंपत्तियों के मन में आया कि उन्हें भी सामने वाला फ्लैट मिल जाए तो उन का भी घर बहुत बड़ा हो जाएगा.

एक दिन सोसाइटी की मीटिंग चल रही थी कि वहां रोहित ने आलोक से कहा, ”आप का अपना फ्लैट बेचने का कोई मूड है क्या?”

”नहीं भाई, मैं क्यों बेचूंगा…”

”अगर बेचें तो हमें ही बताना, हम खरीद लेंगे.”

”आप भी कभी बेचें तो हमें ही बताना, हमें भी चाहिए आप का फ्लैट.”

”हम तो कहीं नहीं जा रहे, यही रहेंगे.”

“फिर भी जाओ तो हमें बता देना. आजकल तो आसपास बढ़िया सोसाइटी हैं, आप वहां भी देख सकते हैं बड़ा फ्लैट.”

”आप अपने लिए क्यों नहीं देख लेते वहां बड़ा फ्लैट?”

‘’हमें यही सोसाइटी अच्छी लगती है.’’

बात यहीं खत्म नहीं हुई. यह बात जो लोग भी सुन रहे थे, उन्होंने दोनों की आवाजों में बढ़ रही कड़वाहट महसूस की. घर जा कर रोहित ने सुधा से कहा,”इस आलोक को तो मैं यहां से भगा कर दम लूंगा. अपनेआप को समझता क्या है.”

उधर आलोक भी शुरू थे,”मीरा, यह मुझे जानता नहीं है. देखना, मैं इसे यहां से कैसे भगाता हूं.’’

अगले दिन जब दोनों लिफ्ट में मिले, दोनों ने बस एकदूसरे पर नजर ही डाली, हमेशा की तरह हायहैलो भी नहीं हुआ. अगले दिन जब मोनिका सुबह साइक्लिंग के लिए जाने लगी, देखा, साइकिल के ट्यूब कटे हुए हैं, वह वौचमैन को डांटने लगी,”यह किस ने किया है?”

”मैडम, बाहर से तो कोई नहीं आया,’’ वौचमैन बोला

”तो फिर मेरी साइकिल की यह हालत किस ने की?”

वौचमैन डांट खाता रहा, वह तो लगातार यहीं था, पर साइकिल को तो जानबूझ कर खराब किया गया था, यह साफसाफ समझ आ रहा था.मोनिका घर जा कर चिङचिङ करती रही, किसी को कुछ समझ नहीं आया कि किस ने किया. उधर आलोक घर में अपनेआप को शाबाशी दे रहे थे कि रोहित बाबू, अब आगे देखना क्याक्या करता हूं तुम सब के साथ.

जब 2 चालाक लोग आमनेसामने होते हैं तो किसी की कोई हरकत एकदूसरे से छिपी नहीं रह पाती, दोनों एकदूसरे की चालाकी तुरंत पकड़ लेते हैं. यहां भी रोहित समझ गए कि किसी बाहर वाले ने आ कर मोनिका की साइकिल खराब नहीं की है, यह कोई बिल्डिंग का ही रहने वाला है. पूरा शक आलोक पर था जो सच ही था. सोचने लगे कि यह हमें ऐसे परेशान करेगा. मैं करता हूं इसे ठीक.

उन्होंने सुबह बहुत जल्दी उठ कर अपना डस्टबिन आलोक के फ्लैट के बाहर ऐसे रखा कि जो भी दरवाजा खोले, डस्टबिन गिर जाए और सारा कचरा बिखर जाए. आलोक और मीरा सुबह सैर पर जाते थे, एक ही बेटा था जो बाहर है. सुबहसुबह आलोक ने दरवाजा खोला तो कचरा फैल गया. वह भी समझ गए कि किस का काम है. फौरन रोहित की डोरबेल बजा दी, एक बार नहीं, कई बार बजा दी. रोहित ने तो रात में ही डोरबेल बंद कर दी थी, रोहित कीहोल से आलोक को गुस्से में चिल्लाते देख रहे थे. फ्लोर पर जो 2 फ्लैट्स और थे, उन में बैचलर्स रहते थे. इस चिल्लीचिल्लम पर उन्होंने दरवाजा खोला और आलोक से पूछा,”क्या हुआ अंकल?”

”यह देखो, कैसे गंवार हैं. कैसे रखा डस्टबिन.”

बैचलर्स को इन बातों में जरा इंटरैस्ट नहीं था, उन्होंने सर को यों ही हिलाते हुए अपने फ्लैट का दरवाजा बंद कर लिया जैसे कह रहे हों, ”भाई, खुद ही देख लो, हम तो किराएदार हैं.’’

लंदन में साउथ हौल में शिविन और सोनिका एकदूसरे के हाथों में हाथ डाले बेफिक्र घूम रहे हैं. सोनिका के कालेज में ट्रैडिशनल डे है और उसे सूटसलवार पहनना है. यहां ट्रेन से उतरते ही इस एरिया में आते ही ऐसा लगता है जैसे पंजाब आ गए हों. पूरा एरिया पंजाबी है. इंडियन सामानों की दुकानें आदि सबकुछ मिलता है यहां.

सोनिका ने कहा,”शिवू, पहले रोड कैफे में बैठ कर छोलेभटूरे खा लें, फिर कपङे ले लेंगे.’’

”हां, बिलकुल, यह रोड कैफे तो हमारे प्यार से जुड़ा है, यहीं हम मिले थे न सब से पहले?”

सोनिका खिलखिलाई, ”हां, मैं तो गा ही उठी थी, ‘कब के बिछड़े हुए हम कहां आ के मिले…'”

दोनों ने और्डर दिया और एक कोना खोज कर बैठ गए. शिविन ने कहा, ”बस अब अच्छी जगह प्लैसमेंट हो जाए, जौब शुरू हो तो शादी करें.’’

”हां, सही कह रहे हो. यह बताओ, घर वालों का क्या करना है, मुझे नहीं लगता कि तुम्हारे पेरैंट्स नौन सिंधी लड़की को ऐक्सैप्ट करेंगे.”

”न करें, हमारी शादी तो हो कर रहेगी. तुम मेरे बचपन का प्यार हो, उन्हें यह पता नहीं है कि हम यहां लिवइन में ही रह रहे हैं, वक्त आने पर बात कर लूंगा उन से.‘’

शिविन और सोनिका एकदूसरे के प्यार में पोरपोर डूबे हैं और उधर इंडिया में किसी को भनक भी नहीं कि लंदन में क्या चल रहा है. शुरूशुरू में कुछ दिन दोनों किसी और फ्रैंड्स के साथ रूम शेयर कर रहे थे, फिर एक दिन यहीं रोड कैफे में दोनों टकरा गए तो तब से ही साथ हैं.

जो बात इंडिया में दोनों एकदूसरे से नहीं कह पाए थे, यहां आ कर कही कि दोनों एकदूसरे को हमेशा से पसंद करते रहे हैं. अब तो दोनों बहुत आगे निकल चुके हैं. दोनों के पेरैंट्स आजकल चल रहे आपस की लङाईयां और शीतयुद्ध को विदेश में पढ़ रहे अपने बच्चों को नहीं बताते कि बेकार में क्यों उन्हें पढाई में डिस्टर्ब करना. और बच्चे तो होशियार हैं ही, हवा भी नहीं लगने दे रहे कि इंडिया में तो आमनेसामने के पड़ोसी थे, अब तो एकसाथ ही रह रहे.

अब तो रोजरोज का किस्सा हो गया. रोहित और आलोक दोनों इसी कोशिश में थे कि परेशान हो कर सामने वाला फ्लैट बदल ले पर दोनों गजब का इंतजार कर रहे थे. नित नए प्लान बन रहे थे. दरवाजों पर जो मिल्क बैग टांगा जाता है, उस में से दूध 2 की जगह एक पैकेट ही निकलता. कभी उस दूध के पैकेट में 1 छेद कर दिया जाता जिस से सारा दूध रिस कर जमीन पर फैल जाए. सीढ़ियों से उतर कर आने वाले लोग दोनों परिवारों को कोसकोस कर चले जाते. सब को पता चल गया था कि क्या क्या हो रहा है, ऐसे में मैनेजिंग कमिटी की मुश्किल बहुत बढ़ गई थी.

दोनों लोग रोज औफिस जाते और एकदूसरे की शिकायत करते. हरकतें इतनी सफाई से की जा रही थीं कि कोई सुबूत किसी को न मिलता कि किस ने क्या किया है. रोज एक से एक हरकत की जाती, गिरी से गिरी प्लानिंग होती, यहां तक कि सुधा यह जानती थी कि मीरा कौकरोच से बहुत ज्यादा डरती है, इसलिए पैसेज में घूमने वाले कौकरोच को सुधा ने एक पेपर से पकड़ कर मीरा के डोर के अंदर छोड़ दिया. मीरा का गेट खुला हुआ था, मेड काम कर रही थी, उस ने देख लिया. बस, अब तो सुबूत सामने था.

आलोक तो सीधे पुलिस स्टैशन पहुंच गए और सुधा की शिकायत कर दी, साथ में मेड को भी ले गए थे. मेड डर रही थी फिर बाद में मीरा की रिक्वैस्ट पर उन के साथ चली ही गई. थोड़ीबहुत कानूनी काररवाई हुई और रोहित और सुधा को चेतावनी देते हुए छोड़ दिया गया.

सोसाइटी में रहने वाले लोग हैरान थे. अपने फ्लैट को बड़ा करने के लिए दूसरे फ्लैट वालों को कैसे परेशान किया जा रहा था, कैसी जिद और सनक थी अब दोनों परिवारों में जो इतनी बढ़ गई कि इस की खबर लंदन तक पहुंच ही गई. सोनिका और शिविन ने अपने सिर पकड़ लिए. दोनों अपने पेरैंट्स को अलगअलग कोने में बैठ कर समझा रहे थे, मगर कोई असर नहीं हो रहा था.

सोनिका ने कहा, ”यार, अब हमारा क्या होगा?”

”डोंट वरी, हमारे पेरैंट्स बहुत गलत कर रहे हैं, इस जिद में हम तो नहीं पड़ेंगे. पता नहीं क्या फालतू हरकतें कर रहे हैं. वैसे तो अपनी तबीयत और अकेलेपन का रोना रोते रहते हैं और अब देखो, इन सब बातों की कितनी ऐनर्जी है सब में.”

मुंबई में दोनों घरों का माहौल बहुत खराब होता जा रहा था. दोनों परिवार अपनेअपने तरीके से एकदूसरे को नुकसान पहुंचा रहे थे. रात में वीडियो कौल पर सोनिका और शिविन से अब हर बात बताते. शिविन तो इकलौती संतान था, आलोक और मीरा उसी से कह कर अपना दिल हलका करते. सोनिका और शिविन का दिल उदास हो रहा था कि यह तो बड़ा बुरा हो रहा है. कहां तो दोनों सपना देख रहे थे कि दोनों परिवारों का साथ भविष्य में एकदूसरे के लिए अब और कितना बड़ा सहारा होगा, सब एकदूसरे के सुखदुख में साथ रह लेंगे.

शिविन ने बहुत गंभीर मुद्रा में कहा, ”सोनू, कोई वहां एकदूसरे को कोई बड़ा नुकसान पहुंचा दे, इस से पहले उन्हें रोकना होगा. सोच रहा हूं कि हम उन्हें अपना संबंध बता देते हैं, शायद कोई असर हो.”

”ठीक है, कोशिश कर सकते हैं, अब अपने बारे में बता ही देते हैं.’’

उसी दिन जब दोनों अपने परिवार से वीडियो कौल कर रहे थे, दोनों ने बात करतेकरते साफसाफ कहा, ”आप लोग यह झगड़ा यहीं रोक दें क्योंकि जौब मिलते ही हम दोनों शादी कर लेंगे और हम अभी भी साथ ही रह रहे हैं. बहुत सोचसमझ कर हम ने एकदूसरे को अपना जीवनसाथी चुन लिया है और हमारा फैसला बदलेगा नहीं. अब आप लोग देख लीजिए क्या करना है. हमें तो प्यार है, तो है.’’

दोनों परिवारों में जैसे सन्नाटा फैल गया, सब एकदम चुप. कोई किसी से नहीं बोला. कई दिन दोनों तरफ बहुत शांति रही. किसी ने किसी को परेशान नहीं किया. सोनिका और शिविन ने घर कोई बात नहीं की. पूरा समय दिया अपने पेरैंट्स को. मोनिका लगातार सोनिका के टच में थी, वह पूरी कोशिश कर रही थी कि दोनों परिवार झगडे खत्म कर दें.

3 दिन बाद सोनिका से बात कर रहा था परिवार. रोहित बोले, ”इंसान अपनी संतान से ही हारता है, क्या कर सकते हैं, जैसी तुम्हारी मरजी.’’

मोनिका हंस पड़ी, ”पापा, यह हारजीत नहीं है, यह प्यार है.”

उधर मीरा मुसकराती हुई शिविन से कह रही थी, ”ठीक है फिर, प्यार है तो फिर हम क्या कर सकते हैं. बात ही खत्म.

फोन रखने के बाद शिविन और सोनिका चहकते हुए एकदूसरे की बांहों में खो गए थे.

जो बीत गई सो बात गई

अपनेमोबाइल फोन की स्क्रीन पर नंबर देखते ही वसंत उठ खड़ा हुआ. बोला, ‘‘नंदिता, तुम बैठो, वे लोग आ गए हैं, मैं अभी मिल कर आया. तुम तब तक सूप खत्म करो. बस, मैं अभी आया,’’ कह कर वसंत जल्दी से चला गया. उसे अपने बिजनैस के सिलसिले में कुछ लोगों से मिलना था. वह नंदिता को भी अपने साथ ले आया था.

वे दोनों ताज होटल में खिड़की के पास बैठे थे. सामने गेटवे औफ इंडिया और पीछे लहराता गहरा समुद्र, दूर गहरे पानी में खड़े विशाल जहाज और उन का टिमटिमाता प्रकाश. अपना सूप पीतेपीते नंदिता ने यों ही इधरउधर गरदन घुमाई तो सामने नजर पड़ते ही चम्मच उस के हाथ से छूट गया. उसे सिर्फ अपना दिल धड़कता महसूस हो रहा था और विशाल, वह भी तो अकेला बैठा उसे ही देख रहा था. नंदिता को यों लगा जैसे पूरी दुनिया में कोई नहीं सिवा उन दोनों के.

नंदिता किसी तरह हिम्मत कर के विशाल की मेज तक पहुंची और फिर स्वयं को सहज करती हुई बोली, ‘‘तुम यहां कैसे?’’

‘‘मैं 1 साल से मुंबई में ही हूं.’’

‘‘कहां रह रहे हो?’’

‘‘मुलुंड.’’

नंदिता ने इधरउधर देखते हुए जल्दी से कहा, ‘‘मैं तुम से फिर मिलना चाहती हूं, जल्दी से अपना नंबर दे दो.’’

‘‘अब क्यों मिलना चाहती हो?’’ विशाल ने सपाट स्वर में पूछा.

नंदिता ने उसे उदास आंखों से देखा, ‘‘अभी नंबर दो, बाद में बात करूंगी,’’ और फिर विशाल से नंबर ले कर वह फिर मिलेंगे, कहती हुई अपनी जगह आ कर बैठ गई.

विशाल भी शायद किसी की प्रतीक्षा में था. नंदिता ने देखा, कोई उस से मिलने आ गया था और वसंत भी आ गया था. बैठते ही चहका, ‘‘नंदिता, तुम्हें अकेले बैठना पड़ा सौरी. चलो, अब खाना खाते हैं.’’

पति से बात करते हुए नंदिता चोरीचोरी विशाल पर नजर डालती रही और सोचती रही अच्छा है, जो आंखों की भाषा पढ़ना मुश्किल है वरना बहुत से रहस्य खुल जाएं. नंदिता ने नोट किया विशाल ने उस पर फिर नजर नहीं डाली थी या फिर हो सकता है वह ध्यान न दे पाई हो.

आज 5 साल बाद विशाल को देख पुरानी यादें ताजा हो गई थीं. लेकिन वसंत के सामने स्वयं को सहज रखने के लिए नंदिता को काफी प्रयत्न करना पड़ा.

वे दोनों घर लौटे तो आया उन की 3 वर्षीय बेटी रिंकी को सुला चुकी थी. वसंत की मम्मी भी उन के साथ ही रहती थीं. वसंत के पिता का कुछ ही अरसा पहले देहांत हो गया था.

उमा देवी का समय रिंकी के साथ अच्छा कट जाता था और नंदिता के भी उन के साथ मधुर संबंध थे.

वसंत भी सोने लेट गया. नंदिता आंखें बंद किए लेटी रही. उस की आंखों के कोनों से आंसू निकल कर तकिए में समाते रहे. उस ने आंखें खोलीं. आंसुओं की मोटी तह आंखों में जमी थी. अतीत की बगिया से मन के आंगन में मुट्ठी भर फूल बिखेर गई विशाल की याद जिस के प्यार में कभी उस का रोमरोम पुलकित हो उठता था.

नंदिता को वे दिन याद आए जब वह अपनी सहेली रीना के घर उस के भाई विशाल से मिलती तो उन की खामोश आंखें बहुत कुछ कह जाती थीं. वे अपने मन में उपज रही प्यार की कोपलों को छिपा न सके थे और एक दिन उन्होंने एकदूसरे के सामने अपने प्रेम का इजहार कर दिया था.

लेकिन जब वसंत के मातापिता ने लखनऊ में एक विवाह में नंदिता को देखा तो देखते ही पसंद कर लिया और जब वसंत का रिश्ता आया तो आम मध्यवर्गीय नंदिता के मातापिता सुदर्शन, सफल, धनी बिजनैसमैन वसंत के रिश्ते को इनकार नहीं कर सके. उस समय नौकरी की तलाश में भटक रहे विशाल के पक्ष में नंदिता भी घर में कुछ कह नहीं पाई.

उस का वसंत से विवाह हो गया. फिर विशाल का सामना उस से नहीं हुआ, क्योंकि वह फिर मुंबई आ गई थी. रीना से भी उस का संपर्क टूट चुका था और आज 5 साल बाद विशाल को देख कर उस की सोई हुई चाहत फिर से अंगड़ाइयां लेने लगी थी.

नंदिता ने देखा वसंत और रिंकी गहरी नींद में हैं, वह चुपचाप उठी, धीरे से बाहर आ कर उस ने विशाल को फोन मिलाया. घंटी बजती रही, फिर नींद में डूबा एक नारी स्वर सुनाई दिया, ‘‘हैलो.’’

नंदिता ने चौंक कर फोन बंद कर दिया. क्या विशाल की पत्नी थी? हां, पत्नी ही होगी. नंदिता अनमनी सी हो गई. अब वह विशाल को कैसे मिल पाएगी, यह सोचते हुए वह वापस बिस्तर पर आ कर लेट गई. लेटते ही विशाल उस की जागी आंखों के सामने साकार हो उठा और बहुत चाह कर भी वह उस छवि को अपने मस्तिष्क से दूर न कर पाई.वसंत के साथ इतना समय बिताने पर भी नंदिता अब भी रात में नींद में विशाल को सपने में देखती थी कि वह उस की ओर दौड़ी चली जा रही है. उस के बाद खुले आकाश के नीचे चांदनी में नहाते हुए सारी रात वे दोनों आलिंगनबद्ध रहते. उन्हें देख प्रकृति भी स्तब्ध हो जाती. फिर उस की तंद्रा भंग हो जाती और आंखें खुलने पर वसंत उस के बराबर में होते और वह विशाल को याद करते हुए बाकी रात बिता देती.

आज तो विशाल को सामने देख कर नंदिता और बेचैन हो गई थी.

अगले दिन वसंत औफिस चला गया और रिंकी स्कूल. उमा देवी अपने कमरे में बैठी टीवी देख रही थीं. नंदिता ने फिर विशाल को फोन मिलाया. इस बार विशाल ने ही उठाया, पूछा, ‘‘क्या रात भी तुम ने फोन किया था?’’

‘‘हां, किस ने उठाया था?’’

‘‘मेरी पत्नी नीता ने.’’

पल भर को चुप रही नंदिता, फिर बोली, ‘‘विवाह कब किया?’’

‘‘2 साल पहले.’’

‘‘विशाल, मुझे अपने औफिस का पता दो, मैं तुम से मिलना चाहती हूं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘यह तुम मुझ से पूछ रहे हो?’’

‘‘हां, अब क्या जरूरत है मिलने की?’’

‘‘विशाल, मैं हमेशा तुम्हें याद करती रही हूं, कभी नहीं भूली हूं. प्लीज, विशाल, मुझ से मिलो. तुम से बहुत सी बातें करनी हैं.’’

विशाल ने उसे अपने औफिस का पता बता दिया. नंदिता नहाधो कर तैयार हुई. घर में 2 मेड थीं, एक घर के काम करती थी और दूसरी रिंकी को संभालती थी. घर में पैसे की कमी तो थी नहीं, सारी सुखसुविधाएं उसे प्राप्त थीं. उमा देवी को उस ने बताया कि उस की एक पुरानी सहेली मुंबई आई हुई है. वह उस से मिलने जा रही है. नंदिता ने ड्राइवर को गाड़ी निकालने के लिए कहा. एक गाड़ी वसंत ले जाता था. एक गाड़ी और ड्राइवर वसंत ने नंदिता की सुविधा के लिए रखा हुआ था. नंदिता को विशाल के औफिस मुलुंड में जाना था. जो उस के घर बांद्रा से डेढ़ घंटे की दूरी पर था.

नंदिता सीट पर सिर टिका कर सोच में गुम थी. वह सोच रही थी कि उस के पास सब कुछ तो है, फिर वह अपने जीवन से पूर्णरूप से संतुष्ट व प्रसन्न क्यों नहीं है? उस ने हमेशा विशाल को याद किया. अब तो जीवन ऐसे ही बिताना है यही सोच कर मन को समझा लिया था. लेकिन अब उसे देखते ही उस के स्थिर जीवन में हलचल मच गई थी.

नंदिता को चपरासी ने विशाल के कैबिन में पहुंचा दिया. नंदिता उस के आकर्षक व्यक्तित्व को अपलक देखती रही. विशाल ने भी नंदिता पर एक गंभीर, औपचारिक नजर डाली. वह आज भी सुंदर और संतुलित देहयष्टि की स्वामिनी थी.

विशाल ने उसे बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘‘कहो नंदिता, क्यों मिलना था मुझ से?’’

नंदिता ने बेचैनी से कहा, ‘‘विशाल, तुम ने यहां आने के बाद मुझ से मिलने की कोशिश भी नहीं की?’’

‘‘मैं मिलना नहीं चाहता था और अब तुम भी आगे मिलने की मत सोचना. अब हमारे रास्ते बदल चुके हैं, अब उन्हीं पुरानी बातों को करने का कोई मतलब नहीं है. खैर, बताओ, तुम्हारे परिवार में कौनकौन है?’’ विशाल ने हलके मूड में पूछा.

नंदिता ने अनमने ढंग से बताया और पूछने लगी, ‘‘विशाल, क्या तुम सच में मुझ से मिलना नहीं चाहते?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘क्या तुम मुझ से बहुत नाराज हो?’’

‘‘नंदिता, मैं चाहता हूं तुम अपने परिवार में खुश रहो अब.’’

‘‘विशाल, सच कहती हूं, वसंत से विवाह तो कर लिया पर मैं कहां खुश रह पाई तुम्हारे बिना. मन हर समय बेचैन और व्याकुल ही तो रहा है. हर पल अनमनी और निर्विकार भाव से ही तो जीती रही. इतने सालों के वैवाहिक जीवन में मैं तुम्हें कभी नहीं भूली. मैं वसंत को कभी उस प्रकार प्रेम कर ही नहीं सकी जैसा पत्नी के दिल में पति के प्रति होना आवश्यक है. ऐसा भी नहीं कि वसंत मुझे चाहते नहीं हैं या मेरा ध्यान नहीं रखते पर न जाने क्यों मेरे मन में उन के लिए वह प्यार, वह तड़प, वह आकर्षण कभी जन्म ही नहीं ले सका, जो तुम्हारे लिए था. मैं ने अपने मन को साधने का बहुत प्रयास किया पर असफल रही. मैं उन की हर जरूरत का ध्यान रखती हूं, उन की चिंता भी रहती है और वे मेरे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण भी हैं, लेकिन तुम्हारे लिए जो…’’

उसे बीच में ही टोक कर विशाल ने कहा, ‘‘बस करो नंदिता, अब इन बातों का कोई फायदा नहीं है, तुम घर जाओ.’’

‘‘नहीं, विशाल, मेरी बात तो सुन लो.’’

विशाल असहज सा हो कर उठ खड़ा हुआ, ‘‘नंदिता, मुझे कहीं जरूरी काम से जाना है.’’

‘‘चलो, मैं छोड़ देती हूं.’’

‘‘नहीं, मैं चला जाऊंगा.’’

‘‘चलो न विशाल, इस बहाने कुछ देर साथ रह लेंगे.’’

‘‘नहीं नंदिता, तुम जाओ, मुझे देर हो रही है, मैं चलता हूं,’’ कह कर विशाल कैबिन से निकल गया.

नंदिता बेचैन सी घर लौट आई. उस का किसी काम में मन नहीं लगा. नंदिता के अंदर कुछ टूट गया था, वह अपने लिए जिस प्यार और चाहत को विशाल की आंखों में देखना चाहती थी, उस का नामोनिशान भी विशाल की आंखों में दूरदूर तक नहीं था. वह सब भूल गया था, नई डगर पर चल पड़ा था.

नंदिता की हमेशा से इच्छा थी कि काश, एक बार विशाल मिल जाए और आज वह मिल गया, लेकिन अजनबीपन से और उसे इस मिलने पर कष्ट हो रहा था.

शाम को वसंत आया तो उस ने नंदिता की बेचैनी नोट की. पूछा, ‘‘तबीयत तो ठीक है?’’

नंदिता ने बस ‘हां’ में सिर हिला दिया. रिंकी से भी अनमने ढंग से बात करती रही.

वसंत ने फिर कहा, ‘‘चलो, बाहर घूम आते हैं.’’

‘‘अभी नहीं,’’ कह कर वह चुपचाप लेट गई. सोच रही थी आज उसे क्या हो गया है, आज इतनी बेचैनी क्यों? मन में अटपटे विचार आने लगे. मन और शरीर में कोई मेल ही नहीं रहा. मन अनजान राहों पर भटकने लगा था. वसंत नंदिता का हर तरह से ध्यान रखता, उसे घूमनेफिरने की पूरी छूट थी.

अपने काम की व्यस्तता और भागदौड़ के बीच भी वह नंदिता की हर सुविधा का ध्यान रखता. लेकिन नंदिता का मन कहीं नहीं लग रहा था. उस के मन में एक अजीब सा वीरानापन भर रहा था.

कुछ दिन बाद नंदिता ने फिर विशाल को फोन कर मिलने की बात की. विशाल ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि वह उस से मिलना नहीं चाहता. नंदिता ने सोचा विशाल को नाराज होने का अधिकार है, जल्द ही वह उसे मना लेगी.

फिर एक दिन वह अचानक उस के औफिस के नीचे खड़ी हो कर उस का इंतजार करने लगी.

विशाल आया तो नंदिता को देख कर चौंक गया, वह गंभीर बना रहा. बोला, ‘‘अचानक यहां कैसे?’’

नंदिता ने कहा, ‘‘विशाल, कभीकभी तो हम मिल ही सकते हैं. इस में क्या बुराई है?’’

‘‘नहीं नंदिता, अब सब कुछ खत्म हो चुका है. तुम ने यह कैसे सोच लिया कि मेरा जीवन तुम्हारे अनुसार चलेगा. पहले बिना यह सोचे कि मेरा क्या होगा, चुपचाप विवाह कर लिया और आज जब मुझे भूल नहीं पाई तो मेरे जीवन में वापस आना चाहती हो. तुम्हारे लिए दूसरों की इच्छाएं, भावनाएं, मेरा स्वाभिमान, सम्मान सब महत्त्वहीन है. नहीं नंदिता, मैं और नीता अपने जीवन से बेहद खुश हैं, तुम अपने परिवार में खुश रहो.’’

‘‘विशाल, क्या हम कहीं बैठ कर बात कर सकते हैं?’’

‘‘मुझे नीता के साथ कहीं जाना है, वह आती ही होगी.’’

‘‘उस के साथ फिर कभी चले जाना, मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रही थी, प्लीज…’’

नंदिता की बात खत्म होने से पहले ही पीछे से एक नारी स्वर उभरा, ‘‘फिर कभी क्यों, आज क्यों नहीं, मैं अपना परिचय खुद देती हूं, मैं हूं नीता, विशाल की पत्नी.’’

नंदिता हड़बड़ा गई. एक सुंदर, आकर्षक युवती सामने मुसकराती हुई खड़ी थी. नंदिता के मुंह से निकला, ‘‘मैं नंदिता, मैं…’’

नीता ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘जानती हूं, विशाल ने मुझे आप के बारे में सब बता रखा है.’’

नंदिता पहले चौंकी, फिर सहज होने का प्रयत्न करती हुई बोली, ‘‘ठीक है, आप लोग अभी कहीं जा रहे हैं, फिर मिलते हैं.’’

नीता ने गंभीरतापूर्वक कहा, ‘‘नहीं नंदिता, हम फिर मिलना नहीं चाहेंगे और अच्छा होगा कि आप भी एक औरत का, एक पत्नी का, एक मां का स्वाभिमान, संस्कारों और कर्तव्यों का मान रखो. जो कुछ भी था उसे अब भूल जाओ. जो बीत गया, वह कभी वापस नहीं आ सकता, गुडबाय,’’ कहते हुए नीता आगे बढ़ी तो अब तक चुपचाप खड़े विशाल ने भी उस के पीछे कदम बढ़ा दिए.

नंदिता वहीं खड़ी की खड़ी रह गई. फिर थके कदमों से गाड़ी में बैठी तो ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी.

वह अपने विचारों के आरोहअवरोह में चढ़तीउतरती रही. सोच रही थी जिस की छवि उस ने कभी अपने मन से धूमिल नहीं होने दी, उसी ने अपने जीवनप्रवाह में समयानुकूल संतुलन बनाते हुए अपने व्यस्त जीवन से उसे पूर्णतया निकाल फेंका था.

जिस रिश्ते को कभी जीवन में कोई नाम न मिल सका, उस से चिपके रहने के बदले विशाल को जीवन की सार्थकता आगे बढ़ने में ही लगी, जो उचित भी था जबकि वह आज तक उसी टूटे बिखरे रिश्ते से चिपकी थी जहां से वह विशाल से 5 साल पहले अलग हुई थी.

नंदिता अपना विश्लेषण कर रही थी, आखिरकार वह क्यों भटक रही है, उसे किस चीज की कमी है? एक सुसंस्कृत, शिक्षित और योग्य पति है जो अच्छा पिता भी है और अच्छा इंसान भी. प्यारी बेटी है, घर है, समाज में इज्जत है. सब कुछ तो है उस के पास फिर वह खुश क्यों नहीं रह सकती?

घर पहुंचतेपहुंचते नंदिता समझ चुकी थी कि वह एक मृग की भांति कस्तूरी की खुशबू बाहर तलाश रही थी, लेकिन वह तो सदा से उस के ही पास थी.

घर आने तक वह असीम शांति का अनुभव कर रही थी. अब उस के मन और मस्तिष्क में कोई दुविधा नहीं थी. उसे लगा जीवन का सफर भी कितना अजीब है, कितना कुछ घटित हो जाता है अचानक.

कभी खुशी गम में बदल जाती है तो कभी गम के बीच से खुशियों का सोता फूट पड़ता है. गाड़ी से उतरने तक उस के मन की सारी गांठें खुल गई थीं. उसे बच्चन की लिखी ‘जो बीत गई सो बात गई…’ पंक्ति अचानक याद हो आई.

8वीं पास : कैसे थे आदित्य के पापा

‘‘देखिए सेठजी, मेरा बेटा आप का बहुत लिहाज करता है. वह आप पर मुझ से ज्यादा भरोसा करता है. हमेशा आप के कहे मुताबिक चलता रहा है. लेकिन वह अपना पैर तुड़वा बैठा है.

‘‘मैं मानता हूं कि उस से गलती हुई है. बच्चों से गलती हो जाती है. मगर उस के इलाज में काफी पैसे लग रहे हैं. बमुश्किल उसे आईसीयू में होश आया है. और अब वह जनरल वार्ड में पहुंच गया है,’’ रामनरेश हाथ जोड़े सेठ सुखसागर से कह रहे थे.

‘‘आप के कहे मुताबिक मैं ने उसे सरकारी अस्पताल के बजाय प्राइवेट अस्पताल में भरती कराया. वहां की भारीभरकम फीस का खर्च उठाना मेरे बस की बात तो थी नहीं. वह सब खर्च आप ने उठाया. इस के लिए मैं आप का बहुत आभारी हूं. मगर अभी उस के पैर का आपरेशन होना है, जिस के लिए वे ढाई लाख रुपए मांग रहे हैं. अब आप ही का आसरा है,’’ उन्होंने आगे कहा.

‘‘मैं तो तुम्हारे बेटे के चक्कर में गजब की मुसीबत में फंस गया. ठीक है कि मैं ने उसे प्राइवेट अस्पताल में भरती कराने के लिए कहा था, मगर मुझे क्या पता था कि इस में मेरे लाखों रुपए खर्च हो जाएंगे.

‘‘खर्च की तो मैं परवाह नहीं करता. मगर डाक्टर कह रहा था कि उस का पैर ठीक होना मुश्किल है. उसे काटना ही होगा. और बताइए इस अपाहिज को ले कर मैं क्या करूंगा?’’ सेठ सुखसागर बोले.

‘‘मेरा बेटा अपाहिज नहीं है सेठजी,’’ रामनरेश चिल्लाए, ‘‘मैं मानता हूं कि उस से गलती हुई है और उसे इस की सजा भी मिल गई है. मगर इस का मतलब यह तो नहीं कि मैं उस के इलाज से

मुंह मोड़ लूं. मेरे बेटे का पैर अच्छा हो जाए, इस के लिए मैं अपना घरबार तक बेच दूंगा.’’

‘‘अब आप को जो भी करना हो कीजिए. अब मैं कुछ नहीं कर सकता.’’

‘‘वह तो मैं करूंगा ही. अगर आप उसे इस महंगे अस्पताल में भरती नहीं कराते, तो मैं उस का सस्ते सरकारी अस्पताल में ही इलाज कराता. अब भी देर नहीं हुई है. मैं उसे वहीं ले जाऊंगा.’’

अब आदित्य सरकारी अस्पताल में था. यहां उस के पापा रामनरेश के परिचित और बुजुर्ग डाक्टर कमल ने उन्हें भरोसा दिलाया कि सबकुछ ठीक से हो जाएगा.

इस बात को तो सभी जानते हैं कि प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने में कितना बड़ा खर्च आता है. मगर अब वहां के खर्चों को कौन उठाएगा, क्योंकि सेठ सुखसागर ने आगे और खर्च देने से इनकार कर दिया था, इसलिए वहां रहने का कोई मतलब नहीं था.

आदित्य तो यह जान कर हैरान रह गया कि सेठ सुखसागर ने उस के इलाज से अपना मुंह मोड़ लिया है.

‘‘देख ली न अपने चार्टर्ड अकांउंटैंट सेठजी की करामात. जब तक उन के लिए तुम जान देते रहे, तुम बहुत अच्छे थे. डाक्टर अब तुम्हारा पैर काटने को कह रहा है. अब उन्हें लग रहा है कि इस अपंगअपाहिज पर खर्च करने से क्या फायदा? अपंगअपाहिज उन के पीछे भागेगा कैसे. सो, इलाज से पीछे हट रहे हैं,’’ रामनरेश गुस्से में आ चुके थे.

‘‘मगर, मैं ऐसा कुछ होने नहीं दूंगा. अभी तो तुम्हें सरकारी अस्पताल में लिए चलता हूं. वहां मेरे एक परिचित डाक्टर कमल हैं. मु?ो पूरा भरोसा है कि वे तुम्हारा इलाज अच्छे से करेंगे. और जहां तक खर्चे की बात है, मैं अपना घर बेच दूंगा, मगर तुम्हें अपाहिज होने नहीं दूंगा. सेठ अपनेआप को सम?ाता क्या है,’’ उन्होंने आगे कहा.

सारे कागजात और एक्सरे रिपोर्ट देखने के बाद डाक्टर कमल बोले, ‘‘एक्सीडैंट हुआ है और चोट तो लगी ही है. थोड़ा समय लगेगा. मगर सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘मगर, वहां तो डाक्टर पैर काटने की बात बता रहे थे.’’

‘‘वहां इलाज करने का अपना ढंग है और मेरा इलाज करने का ढंग अलग है. मैं कोशिश करूंगा कि ऐसी नौबत ही न आए.’’

‘‘मैं कम पढ़ालिखा सही, मगर मेरा सहारा यही है डाक्टर साहब,’’ रामनरेश गिड़गिड़ाते हुए बोल रहे थे, ‘‘मैं अपनी सारी जमापूंजी खर्च कर दूंगा. घरमकान भी बेच दूंगा. भले ही बाद में मुझे मजदूरी क्यों न करनी पड़े. मगर, मैं यही चाहता हूं कि आदित्य अपाहिज न बने.’’

‘‘आप बिलकुल बेफिक्र रहें. वह ठीक हो जाएगा. मैं ने उस की सारी रिपोर्ट देखसमझ ली है. उस के पैर काटने की नौबत नहीं आएगी. वह पहले की तरह चलने और फुटबाल के पीछे भागने भी लगेगा. और आप तो यही चाहते हैं न? हां, उसे कुछ समय तक आराम करना होगा.’’

‘‘क्या आदित्य सचमुच ठीक हो जाएगा?’’ रामनरेश हैरानी से उन का मुंह देखते हुए बोले, ‘‘मैं आप का पूरे जन्म तक आभारी रहूंगा साहब.’’

आदित्य सारी बात को देख समझ रहा था, ‘तो क्या वह ठीक हो जाएगा. आइंदा ऐसी गलती मुझे से नहीं होगी,’ उस ने मन ही मन कहा.

फिर आदित्य सेठ सुखसागर के बारे में सोचने लगा कि उन के पीछे वह क्यों भागता रह गया, सिर्फ इसलिए कि वे पैसे वाले थे और पढ़ेलिखे भी थे. हमेशा वे उसे ले कर अपनी योजनाएं बनाते थे, जिस में वे उसे मोहरे की तरह इस्तेमाल करते आए थे. उस ने अपने प्लास्टर चढ़े पैर को देखा, तो उस के मुंह से आह सी निकल गई.

ओह, इस पैर को तो डाक्टर काटने को कह रहा था. इसे काटने के बाद तो वह हमेशा के लिए अपाहिज हो जाएगा. नहींनहीं, ऐसा कुछ होगा, तो वह कहीं का नहीं रहेगा. बिना पैर के वह दुनिया की इस दौड़ में कैसे आगे बढ़ेगा? और उस के सामने जैसे अपनी पुरानी यादें ताजा होने लगी थीं. पिछले कुछ समय पहले की ही तो बात थी.

‘‘वाह, आदित्य तुम ने तो कमाल कर दिया,’’ आदित्य की गर्लफ्रैंड सुरेखा

उसे देख कर मुसकराई थी, ‘‘दहीहांड़ी प्रतियोगिता में तो तुम ने कमाल कर दिया. 5 लाख रुपए का अवार्ड पाने के लिए बधाई. वैसे, इतने रुपए पा कर तुम क्या करोगे?’’

‘‘शुक्रिया सुरेखा. वैसे, मैं ने इसे अकेले नहीं जीता है, बल्कि मेरी टीम ने जीता है. ये रुपए तो सभी के बीच ही बंटेंगे.’’

आदित्य उसे देख कर मुसकराया था, ‘‘वैसे, तुम्हें भी इस में से कुछ हिस्सा दे दूंगा, क्योंकि तुम को देख कर ही मैं ने यह हिम्मत जुटाई थी. लेकिन जरा ठहरो, पहले मैं सेठ सुखसागर को तो शुक्रिया कह दूं.’’

एंकर बारबार माइक से अनाउंस कर रहा था कि विजेता टीम के सभी सदस्य मंच की ओर इकट्ठा हों. मगर जीत के जोश में वहां सभी जोश में थे और खुश थे. सो, उस की सुनता कौन. आदित्य को उस की टीम अपने कंधे पर उठा

कर विशाल गांधी मैदान का चक्कर काटने लगे थे. जीत का सुरूर कुछ ऐसा ही होता है.

आदित्य मन ही मन खुश हो रहा था. उसे जैसे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था कि उस ने वह कारनामा कर दिखाया है, जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी.

सेठ सुखसागर एंकर को समझ रहे थे, ‘‘अभी जीत का नशा है. जरा मैदान का चक्कर लगा लेने दो. हम भागे थोड़े ही जा रहे हैं. अपना ही लड़का और उस की टीम है. हमारे काम आता रहता है.’’

आखिरकार आदित्य अपनी टीम के साथ वापस मंच की ओर लौटा. उस ने और उस की टीम के सभी लड़कों ने नीली हाफ पैंट और सफेद टीशर्ट पहन रखी थी. दूर से ही देखने से लगता था कि ये सभी एक टीम के सदस्य हैं.

सुरेखा ने अब आदित्य को ध्यान से देखा. मिट्टीकीचड़ से सने आदित्य का चेहरा चमक से भरा जा रहा था. उस के गठीले बदन की मांसपेशियां जैसे धूप में सोने सी चमक रही थीं. बांहों में खिल रही मछलियां मचल रही थीं और उस का चौड़ा सीना टीशर्ट में से जैसे निकलना ही चाह रहा था और यह आदित्य उस का है, यह विचार मन में आते ही उस में गुदगुदी सी फैल गई.

अचानक ही अपनी टीम से घिरे आदित्य के जीत की ट्रौफी लेते ही पूरा गांधी मैदान जयकारों से गूंज उठा.

सेठ सुखसागर के होंठों पर गहरी मुसकान खेल गई. पिछले साल वे मुंबई गए थे, तो वहीं उन्होंने दहीहांड़ी प्रतियोगिता देखी थी. तभी उन के मन में विचार आया था कि वह पटना में भी इस का आयोजन करें, तो कैसा रहे. और फिर उन्होंने इसे पूरा भी कर दिया था.

सेठजी का धंधा कई तरह का था. इस के अलावा वे धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजन करते रहते थे. इस में उन्हें काफी सुख और संतोष भी मिलता था. पहली बार उन्हें ऐसा लगा कि नौजवानों के लिए ऐसा आयोजन कर के उन्होंने एक अच्छा काम किया है.

आदित्य उन के महल्ले का ही लड़का था और स्थानीय कौमर्स कालेज से बीकौम की पढ़ाई कर रहा था.

पिछले साल की बात थी, जब एक दिन कुछ बदमाश सेठ सुखसागर के बंगले में उन के चैंबर में घुस गए थे. उसी समय वह उधर से ही गुजर रहा था, तो उसे शोरगुल सुनाई दिया. वह चैंबर में घुसा और थोड़ी ही देर में उन बदमाशों को खदेड़ दिया.

बाद में उस से एक स्टाफ ने दबी जबान से कहा भी कि उसे इस तरह बदमाशों से भिड़ना नहीं चाहिए था. आजकल तमंचेबंदूक मिलते हैं. अगर किसी ने गोली चला दी होती तो क्या होता. सेठ का क्या है. उस के पास तो अपने बौडीगार्ड और सिक्योरिटी हैं. सो, उसे रिस्क नहीं लेना था.

आदित्य हंस कर रह गया था. लेकिन सेठ सुखसागर उस से बहुत प्रभावित हुए थे. उसे अपने चैंबर में बैठा कर बढि़या चायनाश्ता कराने के बाद 2,000 रुपए दिए और शाबाशी दी थी. और इसी के साथ वह उन का शागिर्द सा बन गया था. वह उधर कभी भी आएजाए, उसे कोई रोकताटोकता नहीं था और सेठ उसे

500-1,000 रुपए यों पकड़ा दिया करते थे, जिस से उस का अपना शाहखर्ची चलता था.

आदित्य का खुद पर तो कुछ खास खर्च था भी नहीं. बस सुरेखा के लिए उसे कभीकभार गिफ्ट खरीदने होते या रैस्टोरैंट जाना होता, तो उसी का खर्च था.

आदित्य के पापा की फ्रैजर रोड में एक छोटी सी पान की दुकान थी. उन्होंने भी उस से यही कहा कि उसे बदमाशों से उलझाने की क्या जरूरत थी. सेठ का क्या है, लाखोंकरोड़ों में खेलता है. गुंडेबदमाश से उस का रोज का पाला पड़ता होगा. अगर उसे कुछ हो जाता, तो वे क्या कर लेते?

सेठ सुखसागर ने इस होनहार हीरे को पहचान लिया था. वे उसे गाहेबगाहे बुला भी लिया करते थे. वे थोड़ीबहुत मदद तो करते ही थे उस की, जिस से उस का जेबखर्च निकल आता था.

मगर उस के पापा कहते, ‘‘मैं इतनी मेहनत तुम्हारी खातिर करता हूं. तुम पढ़ाईलिखाई पर ध्यान दो. आगे यही काम देगा. ये पैसे वाले हम गरीबों का सिर्फ इस्तेमाल करते हैं.

‘‘ऐसी चर्चा है कि उन की नजर आने वाले विधानसभा चुनावों पर है, जिस के लिए वे उम्मीदवार होना चाहते हैं और इन चुनावों में तुम जैसों का वे लोग इस्तेमाल करेंगे,’’ वे इस के आगे डाक्टर भीमराव अंबेडकर के इस वाक्य को जोड़ देते, ‘‘पढ़ाईलिखाई शेरनी का वह दूध है, जिसे जो पीएगा, वह दहाड़ेगा.’’

यह सुन कर आदित्य हंस पड़ता था. पढ़ाई ही तो कर रहा हूं. मगर अभी सिपाहीचपरासी से ले कर लोक सेवा आयोग तक के इम्तिहान का जो हाल है, उसे वे भी तो पढ़तेसुनते होंगे. मगर 8वीं पास पापा को इस से क्या मतलब. उन्हें तो बस यही लगता है कि उस की पढ़ाई खत्म हुई नहीं कि वह गजटेड अफसर बन जाएगा.

रामनरेश ?ाल्ला कर कहते, ‘‘अभी कुछ ही दिनों बाद तुम्हारी ग्रेजुएशन के ऐग्जाम होने वाले हैं और तुम फालतू चक्कर में फंस कर अपना समय खराब कर रहे हो? कहीं ऐग्जाम खराब होंगे, तो तुम्हारी सारी मटरगश्ती हवा हो जाएगी, इसलिए अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो. तुम्हें ढंग की कोई नौकरी मिले, तो हमें भी चैन पड़े.

‘‘मैं ने तुम्हारे लिए कोई बहुत बड़ी इच्छा नहीं पाल रखी है. तुम साधारण ढंग से पढ़ोलिखो. कहीं टीचरक्लर्क भी लगे, तो मेरे लिए यही बहुत है. मैं तुम्हें कोई रिस्क लेते नहीं देखना चाहता. तुम ये सेठ के महल के चक्कर लगाने छोड़ो और अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो.’’

मगर जब से आदित्य की सुरेखा से जानपहचान हुई थी, उस के खर्चे बढ़ गए थे. आखिर गर्लफ्रैंड है उस की. उसे कुछ उपहार वगैरह तो देना बनता ही है. फिर अपने लिए कुछ बढि़या ड्रैस भी तो हो. लोगों पर, खासकर साथियों के बीच इसी ड्रैसिंग सैंस के वजह से ही तो रोबदाब बना रहता है.  वैसे, अपना कोई टूह्वीलर हो, तो क्या कहने.

मगर आदित्य के पास लेदे कर एक पुरानी, टूटी सी साइकिल थी, जिसे देख कर वह झल्ला उठता था. इस फास्ट लाइफ में आजकल साइकिल पर कौन चलता है. पापा तो टूह्वीलर खरीदने से रहे. उन्हें तो कहीं आनाजाना तो होता नहीं. कोई शौकमौज भी नहीं है उन की. आराम से घर से दुकान तक पैदल ही आतेजाते हैं. बहुत हुआ तो शेयरिंग आटोरिकशा से आए या गए. सारी जिंदगी बस खोखे में बिठा कर बिता दी. यह भी कोई जिंदगी है.

सेठ सुखसागर के यहां काम करने वालों के काम की सहूलियत और आनेजाने के लिए उन के मकान में कुछ स्कूटी और बाइकें थीं, जिन का इस्तेमाल उन का स्टाफ करता था. कभीकभार वह उन से मांग भी लेता था. उस में यह सहूलियत भी थी कि उसे उस में पैट्रोल भरवाने की चिंता नहीं रहती थी.

उधर सेठजी को भी लगता कि ऐसे फ्री के सिक्योरिटी गार्ड कहां मिलते हैं. थोड़े से ही काम चल जाता है, नहीं तो बाउंसर, शूटर कितनी डिमांड रखते हैं आजकल. दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा के समय भी वे उस के ग्रुप को मनचाही रकम दान में देते थे और इन सब से उन लोगों के नएनए शूज और ड्रैस के खर्चे निकल आते थे.

सचमुच सेठजी दयालु थे, मगर इस के साथ ही वे प्रैक्टिकल भी थे. वे जानते थे कि दान का लाभ परलोक में मिले या न मिले, इहलोक में तो निकल ही जाता है. इस तरह उन्होंने अपने इर्दगिर्द एक सुरक्षा घेरा बना लिया था.

सेठजी और शायद वह भी यही सोचता है कि दुनिया ऐसे ही चलती है. इस बार सेठजी ने जो दहीहांड़ी की प्लानिंग की थी, उस के केंद्र में वही था. अब नौजवान लड़का है, तो उस की टीम भी होगी ही.

आदित्य अपने कालेज में फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी था और उस की अपनी टीम भी थी. उन्होंने अपनी योजना उसे समझाई, तो वह खुशी से उछल पड़ा. इस में करना कुछ खास नहीं और 5 लाख रुपए का इनाम है.

ऊपर से सेठजी यह भी कह रहे हैं कि उस की टीम के सभी सदस्यों के लिए नई ड्रैस का भी वे इंतजाम करेंगे. तो उसे और क्या चाहिए. यह भी तो एक तरह का खेल है, जिस में उसे भाग लेना चाहिए.

आदित्य की मम्मी को भी कुछ दिन अजीब लगा कि यह लड़का रोजरोज अपने कपड़े गंदे क्यों करता है, तो उस ने इस का राज खोला.

मां गंभीर हो कर बोलीं, ‘‘कितना खतरनाक है यह दहीहांड़ी का खेल. और जो ऊपर से गिरा और नाकामी हाथ लगी, तो इनाम तो मिलेगा नहीं, उलटे हाथपैर जो टूटेंगे, तो इलाज का खर्चा कहां से आएगा? तुम्हारे पापा अलग गुस्सा होंगे, सो तुम समझ लेना.’’

‘‘अरे मम्मी, कुछ नहीं होगा. तुम बेकार में चिंता करती हो. सेठजी बड़े दयालु और समाजसेवी हैं. वे हमारा ध्यान रखते हैं. उन के रहते हमें जरा भी चिंता करने की जरूरत नहीं है. जानती हो, जब हम शाम को फील्ड में इस का अभ्यास करते हैं, तो उस समय सेठजी हमारे लिए चायनाश्ता भी भिजवा देते हैं.’’

लगभग बीसेक दिन तक आदित्य ने अपनी टीम के साथ मानव पिरामिड बनाने का मुश्किल अभ्यास किया था. इस बीच वह कई बार गिरा, चोटें भी आईं. मगर सभी जोश में थे. कुछ अलग, कुछ खास करने का जज्बा ही कुछ अलग होता है.

सुरेखा उन्हें देखती, तो शक में पड़ जाती. अगर ये नाकाम हुए, तो क्या होगा? कालेज के खेल टीचर भी अचरज से उन्हें देखते और कहते, ‘‘जो करना है, अपने रिस्क पर करना.’’

एक दिन तो मानव पिरामिड बनाने के चक्कर में आदित्य अपना बैलेंस संभाल नहीं पाया और औंधे मुंह गिर पड़ा. वह तो खैरियत थी कि मुंह पर चोट नहीं लगी, मगर दाएं हाथ की हथेली में मोच आ गई थी.

आदित्य ने सुरेखा से सलाहमशवरा किया, तो उस ने दवा बाजार जीएम रोड में अपने एक रिश्तेदार की दुकान में भेज दिया था. उन्होंने उसे कुछ दवाएं दीं, जिस से वह जल्दी ही ठीक हो गया था.

मगर इस बीच आदित्य के पापा ने तो हंगामा कर दिया, ‘‘इस लड़के को हुआ क्या है. पढ़ाईलिखाई तो करनी नहीं, खाली खेलकूद में लगा रहता है. क्या जरूरत है ऐसे खतरनाक खेल खेलने की, जिस में जान का खतरा हो?’’

‘‘इस में जान का खतरा कैसे हो सकता है?’’ आदित्य ने पलट कर जवाब दिया, ‘‘मुंबई और महाराष्ट्र में तो इस का आयोजन हर गलीमहल्ले में होता है. जब वहां कुछ नहीं होता, तो यहां क्या हो जाएगा?’’

‘‘मैं भी थोड़ीबहुत जानकारी रखता हूं रे,’’ पापा चिल्लाए, ‘‘वहां हर साल हादसे होते रहते हैं. लोग अपने हाथपैर तो तुड़वाते हैं ही, जान से भी हाथ धो बैठते हैं. यहां लोग इकमंजिले से गिरने पर घायल हो जाते हैं और तुम 50 फुट के मानव पिरामिड बना कर चढ़ोगे, तो सोचिए क्या होगा…’’

‘‘अब तैयारी तो पूरी है. फिर सेठजी  की इज्जत का भी सवाल है. मुझे तो यह करना ही है.’’

‘‘तुम्हें सेठजी की इतनी चिंता है और मेरी नहीं? सेठजी को अपनी इज्जत की इतनी ही चिंता है, तो वे अपने बेटे को क्यों नहीं तैयार करते? उसे तो मुंबई में महंगी तालीम दिला रहे हैं और तुम्हें बलि का बकरा बना रहे हैं.’’

‘‘आप तो हर बात को उलटी दिशा में ले जाते हैं. आप से तो बात करना ही बेकार है,’’ आदित्य झल्ला कर वहां से उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘‘उन की हैसियत है, तो वे अपने बेटे को मुंबई क्या, अमेरिका, रूस, जापान या इंगलैंड भी भेज सकते हैं.

आदित्य के पापा पैर पटकते हुए बाहर निकल गए.

अब आदित्य के सामने उस की मां थीं. वे समझ नहीं पा रही थीं कि अपने बेटे को समझाएं कि पति को. मगर उन्हें यह ठीक ही लगता था कि बेटा भी कुछ गलत नहीं कर रहा. अरे, यही उम्र तो है, खेलनेखाने की. फिर तो बाद में हायहाय में जुटना ही है.

सेठ उस के कुछ खर्चे उठाता है, तो क्या बुरा करता है. इन की दुकान से दालरोटी चल जाए, यही बहुत है. फिर भी उसे अपने पापा से ढंग से बात करनी चाहिए थी.

मां ने आदित्य से यही कहा ही था कि वह बिफर पड़ा, ‘‘सेठ सुखसागर सिर्फ रुपएपैसे से ही नहीं भरेपूरे हैं, उन्होंने भी चार्टर्ड अकाउंटैंट की पढ़ाई दिल्ली से की है. पापा की तरह वे 8वीं पास नहीं हैं, जो दरदर की ठोकरें खाते फिरते हैं. एक छोटे से खोखे में जिंदगी गुजार दी हम ने. क्या मिला हमें? हमेशा गरीबी के बीच रोते?ांकते रहे हैं हम.’’

मां एकदम से सन्न रह गईं. बेटा यह क्या बोल रहा है. इस को कुछ खबर भी है कि इसी खोखे के बूते ही रामनरेश ने पूरा परिवार पाल दिया है. पहले गांव के परिवार को देखा और उन की भरपाई की, फिर यहां अपना छोटा सा ही सही, मकान बनाया है. आदित्य की भी जो यह पढ़ाई चल रही है, उस में भी तो खर्च हो रहा है.

आदित्य ने कोचिंग जौइन करने को कहा, तो उस के लिए भी उन्होंने कभी मना नहीं किया. और यह आदित्य आज क्या उलटीसीधी बक रहा है. कहीं उन्होंने सुन लिया तो हंगामा मच जाएगा.

मगर सवाल यह है कि आदित्य के दिमाग में आया कैसे कि उस के पापा सिर्फ 8वीं पास हैं. इस का क्या मतलब हुआ कि वे कमअक्ल हैं, कि वे बेचारे हैं. आज तक कभी उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं पसारा, बल्कि दूसरों को अपनी हैसियत से बढ़ कर कुछ दिया ही है. मगर इस आदित्य को क्या हुआ है…

इनाम के रुपयों में से आदित्य के हिस्से में महज 40,000 रुपए ही आए थे, जिस से उस ने एक सैकंडहैंड बाइक खरीद ली थी.

पापा ने आदित्य से कहा था, ‘‘ठीक है, टूह्वीलर ही खरीदना है, तो स्कूटी ले लो. इस से कभीकभार उन की दुकान के लिए वह कुछ सामान की खरीदारी कर के ला दिया करेगा. इस से उन्हें सहूलियत होगी. अभी से वह इसी बहाने खरीदफरोख्त भी सीख लेगा.

मगर स्कूटी के नाम से आदित्य चिढ़ गया. यह भी कोई सवारी है… यह तो फुटकर बनियों की गाड़ी है, जो इस से इधरउधर का सामान खरीद कर यहांवहां ढोते फिरते हैं. डिलीवरी बौय की तरह वह अपनी मेहनत के पैसों को इस में नहीं लगाने वाला.

बाइक की बात ही दूसरी है. स्कूटी तो ऐसा लगता है कि किसी टेबल के आगे बैठे हैं और बाइक पर अहसास होता है कि टांगों के नीचे कुछ दबा हुआ है.

कितना मजा आएगा, जब वह तेज रफ्तार से बाइक चलाएगा. लहरिया कट गाड़ी चलाने में तो वह पूरा उस्ताद है ही. उस के पापा अनपढ़ तो नहीं, मगर 8वीं पास पापा को इस सुख का क्या पता है.

सुरेखा ठीक कहती है, ‘‘यह जिंदगी तो मजे लेने के लिए है. बाकी तो सब रोना है ही जिंदगी में.’’

आदित्य रोते हुए अपनी जिंदगी नहीं बिता सकता. आखिरकार उस ने बाइक खरीद ही ली थी. सुरेखा के साथ जब वह गंगा पाथवे पर जाता, तो जैसे वह हवा में होता. जिंदगी जीना इसी को ही तो कहते हैं.

मगर पिछले हफ्ते रविवार की शाम को आदित्य का गंगा पाथवे पर एक्सीडैंट हो गया था. एक पिकअप वैन ने उसे ऐसी टक्कर मारी कि वह दूर तक घिसट गया. उसे होश तो तब आया, जब उस ने अपनेआप को अस्पताल में पाया. पूरे शरीर में जख्मों पर पट्टियां बंधी थीं. बायां पैर बुरी तरह फ्रैक्चर था.

पिकअप वैन वाला तो कब का भाग चुका था और पुलिस ने आदित्य के पर्स में रखे परिचयपत्र से उस के पापा और सेठ सुखसागर को भी जानकारी दी थी.

पुलिस का तो यह भी आरोप था कि एक तो उस की बाइक की स्पीड तय सीमा से ज्यादा थी और दूसरे वह लहरिया कट गाड़ी चला रहा था. इस आधार पर पुलिस ने उसी के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर दिए थे, जिसे बमुश्किल अपनी पहुंच के बल पर सेठ सुखसागर ने रफादफा कराया था.

सुरेखा भी एक दिन आदित्य को देखने आई थी और फिर जो वह लापता हुई, तो उस की खबर ही नहीं मिली. आजकल उस का फोन भी स्विच औफ हो चुका था.

वह सब तो अपनी जगह, मगर क्या आदित्य सचमुच अपाहिज हो जाएगा? सेठ सुखसागर तो यही कह रहे थे. मगर डाक्टर कमल ने उसे भरोसा दिलाया था कि वह पूरी तरह ठीक हो जाएगा. उस के पापा का चेहरा उस समय कैसा निरीह हो गया था, जब वह सेठ सुखसागर से बातें कर रहे थे.

ये पैसे वाले ऐसे ही होते हैं क्या? सिर्फ इस्तेमाल करना भर जानते हैं? मगर उस के पापा कितनी मजबूती से बोले थे कि वे अपनी सारी जमापूंजी और घरबार तक उस के इलाज के लिए बेच डालेंगे. वे मजदूरी करने तक को तैयार हैं उस के लिए और वह उन्हें बेवकूफ, गंवार, 8वीं पास कहता रहा.

अब आदित्य की आंखें सही माने में पूरी तरह खुल चुकी थीं. मगर इस के पहले उसे पूरी तरह ठीक होना है. न सिर्फ अपने लिए, बल्कि अपने पापा के लिए. यही उस का प्रायश्चित्त होगा. अब उसे जिंदगी में कुछ अच्छा कर के दिखाना ही है.

बयार बदलाव की: नीला की खुशियों को किसकी नजर लग गई थी

रमन लिफ्ट से बाहर निकला, पार्किंग से गाड़ी निकाली और घर की तरफ चल दिया. वह इस समय काफी उल?ान में था. रात को 8 बजने वाले थे. वह साढ़े 8 बजे तक औफिस से घर पहुंच जाता था. घर पर नीला उस का बेसब्री से इंतजार कर रही होगी. पर उस का इस समय घर जाने का बिलकुल भी मन नहीं हो रहा था. कुछ सोच कर उस ने आगे से यूटर्न लिया और कार दूसरी सड़क पर डाल दी. थोड़ी देर बाद उस ने एक खुली जगह पर कार खड़ी की और पैदल ही समुद्र की तरफ चल दिया.

यह समुद्र का थोड़ा सूना सा किनारा था. किनारा बड़े बड़े पत्थरों से अटा पड़ा था. वह एक पत्थर पर बैठ गया और हिलोरें मारते समुद्र को एकटक निहारने लगा. समुद्र की लहरें किनारे तक आतीं और जो कुछ अपने साथ बहा कर लातीं वह सब किनारे पर पटक कर वापस लौट जातीं. वह बहुत देर तक उन मचलती लहरों को देखता रहा.

देखतेदेखते वह अपने ही खयालों में डूबने लगा. वह दुखी हो, ऐसा नहीं था. पर बहुत ही पसोपेश में था. उस के पिता का फोन आया आज औफिस में. उस के मातापिता अगले हफ्ते एक महीने के लिए उस के पास आने वाले थे. मातापिता के आने की उसे खुशी थी. वह हृदय से चाहता था कि उस के मातापिता उस के पास आएं. पर अपने विवाह के एक साल पूरा होने के बावजूद वह एक बार भी उन्हें अपने पास आने के लिए नहीं कह पाया. कारण कुछ खास भी नहीं था. न उस के मातापिता अशिक्षित या गंवार थे. न उस की पत्नी नीला कर्कश या तेज स्वभाव की थी. फिर भी वह सम?ा नहीं पा रहा था कि उस के मातापिता आधुनिकता के रंग में रंगी उस की पत्नी को किस तरह से लेंगे. यह बात सिर्फ नीला की ही नहीं, बल्कि उस की पूरी पीढ़ी की है. नीला दिल्ली में विवाह से पहले नौकरी करती थी. विवाह के बाद नौकरी छोड़ कर उस के साथ मुंबई आ गईर् थी. यहां वह दूसरी नौकरी के लिए कोशिश कर रही थी.

नीला हर तरह से अच्छी लड़की थी. कोमल स्वभाव, अच्छे विचारों व प्यार करने वाली लड़की थी. उस के मातापिता के आने से वह खुश ही होगी. लेकिन उस के संस्कारी मातापिता, खासकर उस की मम्मी, नीला की आदतों, उस के रहनसहन के तरीकों को किस तरह से लेंगे, वह सम?ा नहीं पा रहा था.

विवाह के बाद वह चंडीगढ़ अपने मातापिता के पास थोड़ेथोड़े दिनों के लिए 2 बार ही गया था. मम्मी और नीला की अधिकतर बातें फोन से ही होती थीं. मम्मी उस के स्वभाव की बहुत तारीफ करती थीं. नीला भी अपनी सास का बहुत आदर करती थी और उन को पसंद करती थी. पर यह एक महीने का सान्निध्य कहीं उन के बीच की आत्मीयता को खत्म न कर दे, वह इसी उधेड़बुन में था.

नीला देर से सो कर उठती थी. उस के औफिस जाने तक भी कभी वह उठ जाती, कभी सोई रहती थी. नाश्ते में वह सिर्फ दूध व कौर्नफ्लैक्स लेता था. इसलिए वह खुद ही खा कर नीला को दरवाजा बंद करने को कह कर औफिस चला जाता था. उसे मालूम था, नीला की नौकरी लगते ही उस की दिनचर्या बदल जाएगी. फिर उसे जल्दी उठना ही पड़ेगा. अभी शादी को समय ही कितना हुआ है. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. वह सारे दिन फ्लैट में अकेली रहती है. सुबह से उठ कर क्या करेगी.

खाना बनाना भी उसे बहुत ज्यादा नहीं आता था, मतलब का ही आता था. हालांकि एक साल में वह काफी कुछ सीख गई थी पर अभी तक उन का खाना अकसर बाहर ही होता था. मम्मीपापा के आने से काम भी बढ़ेगा. नीला इतना काम कहां संभाल पाएगी और मम्मी से अपने घर का पूरा काम संभालने की उम्मीद करना गलत था. वे नीला की सहायता करें, यह तो ठीक लगता है पर… फिर कपड़े तो नीला उस के मातापिता के सामने कितने भी शालीन पहनने की कोशिश करे, उस के बावजूद उस के मातापिता को उस का पहनावा नागवार गुजर सकता है.

मम्मी की पीढ़ी ने अपने पति की बहुत देखभाल की है. हाथ में सबकुछ उपलब्ध कराया है. औफिस जाते पति की हर जरूरत के लिए उस के पीछेपीछे घूमती पत्नी की पीढ़ी वाली उस की मम्मी क्या आज की पत्नी का तौरतरीका बरदाश्त कर पाएंगी, वह सम?ा नहीं पा रहा था. नीला से अगर थोड़े दिन अपना रवैया बदलने को कहता है तो नीला उस के मातापिता के बारे में क्या सोचेगी. उन दोनों के रिश्ते औपचारिक हो जाएंगे. यह रिश्ता एकदो दिन का तो है नहीं. उस के मातापिता तो अब उस के पास आतेजाते रहेंगे.

यही सब सोच कर वह अजीब सी उधेड़बुन में था. अंधकार घना हो गया था. समुद्र की लहरें किनारे पर सिर पटकपटक कर उसे उस के विचारों से बाहर लाने का असफल प्रयास कर रही थीं. उस ने घड़ी पर नजर डाली. 10 बजने वाले थे. तभी मोबाइल बज उठा. नीला थी.

‘‘हैलो, कहां हो? अभी औफिस से नहीं निकले क्या? कितनी बार फोन किया, उठा क्यों नहीं रहे थे, ड्राइव कर रहे हो क्या?’’ नीला चिंतित स्वर में कई सवाल कर बैठी. ‘‘हां, ड्राइव कर रहा था. बस, पहुंच ही रहा हूं,’’ उस ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और उठ कर कार की तरफ चला गया.

घर पहुंच कर भी वह गुमसुम ही रहा. नीला आदत के अनुसार चुहलबाजी कर रही थी. अपनी भोलीभाली बातों से उसे रि?ाने का प्रयास कर रही थी. पर उस की चुप्पी टूट ही नहीं रही थी. ‘‘क्या बात है रमन, आज कुछ अपसैट हो. सब ठीक तो है न?’’ वह उस के घने बालों में उंगलियां फेरती हुई उस की बगल में बैठ गई. उस ने नीला की तरफ देखा. नीला मीठे स्वभाव की सरल लड़की थी. इसलिए वह उसे बहुत प्यार करता था. उस की आदतों की कोई कमी उसे नहीं अखरती थी. फिर वह देखता कि नीला ही नहीं, उस के हमउम्र दोस्तों की बीवियां भी लगभग नीला जैसी ही हैं. यह पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से बिलकुल भिन्न है.

वह प्यार से नीला को बांहों में कसता हुआ बोला, ‘‘नहीं, कोई खास बात नहीं, बल्कि एक अच्छी बात है, चंडीगढ़ से मम्मीपापा आ रहे हैं एक महीने के लिए हमारे पास.’’

सुन कर नीला खुशी से उछल पड़ी, ‘‘अरे वाह, यह तो बहुत अच्छी खबर है. एक महीने के लिए मैं भी अकेले रहने की बोरियत से बच जाऊंगी. मम्मीपापा के साथ बहुत मजा आएगा. कब आ  रहे हैं?’’‘‘अगले हफ्ते की फ्लाइट है.’’

‘‘तो इतनी देर बाद क्यों बता रहे हो? आज तो देर हो गई. कल जल्दी आना, बहुत सारी चीजें खरीदनी हैं.’’ ‘‘हां, हां, तुम लिस्ट तैयार रखना. मैं जल्दी आ जाऊंगा. फिर चलेंगे.’’ मम्मीपापा के आने के नाम से नीला खुश व उत्साहित थी. उसे तो मम्मीपापा के साथ चंडीगढ़ वाली मस्ती करनी थी. इस से अधिक वह कुछ नहीं सोच पा रही थी. रमन उस के उत्साह को मुसकराते हुए देख रहा था.

चंडीगढ़ में तो सबकुछ हाथ में मिलता है. मम्मी की तैयारियां पहले से ही अपने बच्चों के लिए इतनी संपूर्ण रहती हैं कि उन्हें बीच में परेशान नहीं होना पड़ता. खानेपीने की चीजों से फ्रिज भर देती हैं. इस के अलावा काम करने वाले भी घर के पुराने नौकर हैं, तो नीला को चम्मच हिलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती है और न उस से थोड़े दिनों के लिए कोई ऐसी उम्मीद रखता है. उस ने खुद कुछ किया तो किया, नहीं किया तो नहीं किया. अपने प्यारे स्वभाव के कारण वह मम्मीपापा की इतनी लाड़ली है कि वे उसे पलकों पर बिठा कर रखते हैं.

नीला अपनी रौ में ढेर सारी प्लानिंग कर रही थी. रमन कुछ कह कर या उसे कुछ सम?ा कर उस की खुशी में विघ्न नहीं डालना चाहता था. इसलिए उस ने मन ही मन सोचा, जो होगा देखा जाएगा. ‘‘अब बातें ही करती रहोगी या कुछ खाने को भी दोगी. कुछ बनाया भी है या बाहर से और्डर करूं?’’ वह हंसता हुआ नीला को छेड़ता हुआ बोला.

‘‘आज तो मैं ने पास्ता बनाया है.’’ ‘‘पास्ता बनाया है? अरे, कुछ रोटीसब्जी बना देतीं. यह सब रोजरोज मु?ा से नहीं खाया जाता.’’ ‘‘पर मु?ा से रोटी अच्छी नहीं बनती है,’’ नीला मायूसी से बोली. ‘‘कोई बात नहीं,’’ वह उस के गालों को प्यार से सहलाता हुआ बोला, ‘‘अभी बाहर से और्डर कर देता हूं. मम्मी आएंगी तो इस बार तुम रोटी बनाना जरूर सीख लेना.’’

‘‘ठीक है, सीख लूंगी.’’ एक हफ्ते बाद उस के मातापिता आ गए. उन की दिल्ली से फ्लाइट थी. फ्लाइट शाम की थी. वह औफिस से जल्दी नहीं निकल पाया. नीला ही उन्हें एयरपोर्ट लेने चली गई. उस ने औफिस से मम्मीपापा से फोन पर बात कर ली. उस के मातापिता पहली बार उस के पास आए थे, इसलिए वह बहुत संतुष्टि का अनुभव कर रहा था.

शाम को वह घर पहुंचा तो नीला मम्मीपापा के साथ बातें करने में मशगूल थी. मम्मीपापा भी उस की गृहस्थी देख कर बहुत खुश थे. चारों बैठ कर बातें करने लगे. उन्हें पता ही नहीं चला कि कितना समय गुजर गया. डिनर तो आज बाहर ही कर लेंगे, उस ने सोचा, इसलिए बोला, ‘‘मम्मीपापा चलिए ड्राइव पर चलते हैं, घूम भी लेंगे और खाना भी खा कर आ जाएंगे.’’

चारों तैयार हो कर चले गए. सुबह उस का औफिस था. उस की नींद और दिनों से भी जल्दी खुल गई. उस ने एकदो बार नीला को हौले से उठाने की कोशिश की पर वह इतनी गहरी नींद में थी कि हिलडुल कर फिर सो गई. वह उठ कर मम्मीपापा के कमरे की तरफ चला गया. तभी उस ने देखा कि मम्मी किचन में गैस जलाने की कोशिश कर रही हैं. वह किचन में चला गया.

‘‘क्या कर रही हैं मम्मी?’’ ‘‘चाय बना रही थी बेटा, तू पिएगा चाय?’’ ‘‘हां, पी लूंगा.’’ ‘‘और नीला?’’ ‘‘वह तो अभी…’’ ‘‘सो रही होगी, कोई बात नहीं. जब उठेगी तब पी लेगी. हम तीनों की बना देती हूं,’’ मां के चेहरे से उसे बिलकुल भी नहीं लगा कि उन्हें नीला के देर तक सोने पर कोई आश्चर्य हो रहा है. बातें करतेकरते तीनों ने चाय खत्म की. पर दिल ही दिल में वह अनमयस्क सोच रहा था कि ‘काश, नीला भी उठ जाती.’

औफिस का समय हो रहा था. वह तैयार होने चला गया. वह रोज सुबह अपने कपड़े खुद ही प्रैस करता था. खासकर शर्ट तो रोज ही प्रैस करनी पड़ती थी. मम्मी बाथरूम में थीं. प्रैस की टेबल लौबी में लगी थी. उस ने सोचा जब तक मम्मी बाथरूम से आती हैं तब तक वह शर्ट प्रैस कर लेगा. अभी वह प्रैस कर ही रहा था कि मम्मी बाथरूम से निकल आईं.

‘‘अरे, तू प्रैस कर रहा है बेटा, ला मैं कर देती हूं.’’ ‘‘नहींनहीं मम्मी, मैं कर लूंगा,’’ वह कुछकुछ ?ोंपता हुआ सा बोला. ‘‘नहींनहीं, मैं कर देती हूं. तू तैयार हो जा और नाश्ते में क्या खाएगा?’’ ‘‘मैं तो कौर्नफ्लैक्स और दूध लेता हूं.’’ ‘‘आजकल तो कुछ और नाश्ता कर ले. कौर्नफ्लैक्स और दूध तो रोज ही लेते हो तुम दोनों. जो नीला को भी पसंद हो…’’

‘‘नीला को तो उत्तपम बहुत पसंद है. वहां अलमारी में पड़े हैं पैकेट,’’ उस के मुंह से निकला. ‘‘ठीक है, मैं उत्तपम ही बना देती हूं. मु?ो और तेरे पापा को भी बहुत पसंद है,’’ मम्मी ने हंस कर कहा. उसे लगा मम्मी ने कुछ कहा नहीं पर सोच रही होंगी कि बीवी सो रही है और वह औफिस जाने के लिए चीजों से जू?ा रहा है. पर मम्मी के चेहरे पर उसे ऐसा कोई भाव नजर नहीं आया.

उस ने तृप्ति से नाश्ता किया. तब तक नीला भी उठ गई. अपनी तरफ से तो वह भी रोज से जल्दी उठ गई थी. वह सब को बाय करता हुआ औफिस चला गया. नीला बाथरूम से फ्रैश हो कर आई तो मम्मी ने उसे भी नाश्ता पकड़ा दिया.

वह औफिस में बैठा लंच के बारे में सोच रहा था. पता नहीं घर में क्या बना होगा. उस के मातापिता तो रोज बाहर का भी नहीं खा पाएंगे. उस ने नीला को फोन किया.

‘‘हैलो,’’ नीला की सुरीली व मासूम सी आवाज सुन कर वह सबकुछ  भूल गया. ‘‘लंच में कुछ बनाया भी है या नहीं? नहीं तो बाहर से और्डर कर लो.’’ ‘‘मम्मी ने बढि़या राजमाचावल बनाए हैं और मेरी पसंद की गोभी की सब्जी भी,’’ नीला के स्वर में मां के आने का सा लाड़लापन था. इठलाते हुए बोली, ‘‘आप को भी खाना है तो घर आ जाओ.’’

‘‘नहीं, तुम ही खाओ. मैं शाम को बचा हुआ खा लूंगा,’’ वह हंसता हुआ बोला, ‘‘चाय तुम अच्छी बनाती हो. कम से कम शाम की बढि़या चाय पिला देना मम्मीपापा को,’’ जवाब में नीला भी बिना सोचेसम?ो हंस दी.

शाम को वह जल्दी घर पहुंच गया. तीनों बैठ कर चाय पी रहे थे. उस के आते ही मम्मीपापा ने नीला की बनाई चाय की तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए. वह मन ही मन मुसकरा दिया.’’ ‘‘मम्मी, नीला टमाटर का सूप भी बहुत अच्छा बनाती है. नीला, आज सूप बना कर पिला दो.’’

‘‘हां, आज मैं सूप बना दूंगी, ठीक है मम्मी?’’ ‘‘ठीक है. डिनर में क्या बनाऊं,’’ मम्मी किचन की तरफ जाती हुई बोलीं.

‘‘बाहर घूमने चलेंगे तो खाना खा कर आ जाएंगे,’’ वह बोला.‘‘नहींनहीं, कुछ तैयारी कर देती हूं. फिर घूमने जाएंगे. जब तक हम हैं,  तब तक घर का खा लो,’’ मम्मी बोलीं.

‘‘हां मम्मा,’’ नीला लाड़ से मम्मी के गले में बांहें डालती हुई बोली, ‘‘आज दमआलू बना दो जैसे आप ने चंडीगढ़ में बनाए थे. सारी तैयारी मैं कर देती हूं. आप मु?ो बता दीजिए. बना आप दीजिए.’’

‘‘ठीक है, मैं अपनी गुडि़या की पसंद बनाऊंगी,’’ मम्मी प्यार से नीला की बलैयां लेती हुई बोलीं.

रमन सुखद आश्चर्य से मम्मी को देख रहा था. बदली सिर्फ उस की पीढ़ी ही नहीं है. उस के मातापिता की पीढ़ी ने भी खुद को कितना बदल लिया है.

मम्मी ने आननफानन डिनर की तैयारी की और चारों घूमने चल दिए. बाहर वह देख रहा था. नीला मम्मीपापा से ही चिपकी हुई है. कभी एक का हाथ पकड़ रही है तो कभी दूसरे का. कभीकभी तो उसे लग रहा था कि शायद मांबाप नीला के आए हैं और वह दामाद है.

नीला छोटीछोटी बातों में मम्मीपापा का बहुत ध्यान रख रही थी. घुमाते समय भी एकएक जगह के बारे में उन्हें बता रही थी और उस के मातापिता तो अपनी लाड़ली बहू पर फिदा हुए जा रहे थे.

रोज की यही दिनचर्या बीत रही थी. मम्मी ने किचन का लगभग सारा भार अपने ऊपर ले लिया था. नीला को जो कुछ बनाना आता था, वह भी पूरे मनोयोग से बना कर खिलाने की कोशिश करती. शाम को चारों घूमने निकल जाते. घर आ कर जहां नीला कपड़े बदलने में लग जाती, मम्मी किचन में पहुंच कर डिनर का बचा हुआ कार्य खत्म करतीं और फिर बैठ जातीं. तब तक नीला आती और बढि़या चाय बना कर मम्मीपापा को पिलाती. गजब का सामंजस्य था. कहीं कोई हलचल नहीं. कहीं कुछ गड़बड़ नहीं.

एक दिन उस ने पापा से नाइट क्लब  में जाने की बात कही. उस के मम्मीपापा उच्चशिक्षित थे. सहर्ष तैयार हो गए. वे तैयार होने कमरे में चले गए. वे दोनों भी तैयार होने चले गए. वह तैयार हो कर ड्राइंगरूम में बैठ गया. मम्मीपापा भी बाहर आ कर बैठ गए. थोड़ी देर बाद नीला तैयार हो कर निकली तो रमन सन्न रह गया. नीला ने घुटनों से ऊपर की स्लीवलैस लाल रंग की मिनी पहनी हुई थी.

वह घबरा कर मम्मीपापा के चेहरे देखने लगा. अभी तक की उस की ड्रैसेज को तो वे सहर्ष पचा रहे थे पर… उसे पता होता कि नीला आज क्या पहनने वाली है तो वह उसे मना कर देता. हालांकि नीला जहां जा रही थी वहां के माहौल के अनुरूप ही उस ने ड्रैस पहनी थी.

मम्मीपापा की नजर उस पर पड़ी तो दोनों मुसकरा दिए, ‘‘अरे वाह, नीला, तू तो पहचान में ही नहीं आ रही है. बहुत स्मार्ट लग रही है. किसी फिल्म की हीरोइन लग रही है,’’ पापा बोले.

‘‘हमारी बेटी किसी फिल्म हीरोइन से कम है क्या. जो भी पहनती है उस पर सबकुछ अच्छा लगता है,’’ मम्मी भी हुलस कर बोलीं.

सुन कर वह चारों खाने चित्त हो गया. उस के मम्मीपापा की सोच उस की कल्पना से बहुत आगे व आधुनिक थी. वह अपने दोस्तों के घरों की स्थितियों के बारे में सोचने लगा. जब उन की बीवियों और उन के मातापिताओं का आमनासामना होता है तो इन्हीं छोटीछोटी बातों पर उन की अपने बेटों की आधुनिक मिजाज बीवियों से, जो लाड़ली बेटियां रही हैं, खटपट मची रहती है. उन के मातापिताओं को अपनी बहुओं के देर से उठने से ले कर पहननेओढ़ने के तौरतरीकों, ठीक से खाना खाना न आना, काम करने की आदत न होना आदि तमाम बातों से शिकायतें थीं. और बहुओं को सासससुर की टोकाटाकी वह पहननेओढ़ने के बंधनों से सख्त नफरत थी. जिस में बेचारे बेटे या पति की दुर्दशा हो जाती थी.

बेटा अपनी पत्नी से प्यार करता है. वह उस की अच्छीबुरी आदतों के साथ सम?ाता करना चाहता है पर यह बात मातापिता नहीं सम?ा पाते. उन्हें अपना बेटा बेचारा लगने लगता है. वे नहीं सम?ा पाते कि बहू की बुराई या उसे नापसंद करना बेटे के हृदय को तोड़ देता है, उन के बीच के नाजुक रिश्ते, जो समय के साथ मजबूती पाया है, को कमजोर करता है. खैर, यह उन की समस्या है. उस ने सोचा, वह तो खामखां ही डर रहा था इतने दिनों से. इसलिए अपने मम्मीपापा को खुलेदिल से आने के लिए भी नहीं कह पा रहा था.

वे चारों साथ में खूब मस्ती कर रहे थे. घूमने जाते, हंसतेबोलते. हंसीमजाक से उस का छोटा सा फ्लैट हर समय गुलजार रहता. नीला को भले ही किचन का बहुत अधिक काम नहीं आता था पर उस के प्यार व उस की भावनाओं में मम्मीपापा के प्रति कहीं कमी नहीं थी. बल्कि, उन की उपस्थिति से वह उस से अधिक आनंदित हो रही थी.

धीरेधीरे मम्मीपापा के जाने का दिन करीब आ रहा था. जैसेजैसे उन के जाने का दिन करीब आ रहा था, नीला उदास होती जा रही थी. वह बराबर मम्मीपापा से मीठा ?ागड़ा करने पर तुली हुई थी.

‘‘आप वापस क्यों जा रहे हैं मम्मी, वहां क्या रखा है? आप के बच्चे तो यहां पर हैं. यहीं रहिए न.’’

‘‘फिर आएंगे बेटा. अब तुम आ जाओगे छुट्टी पर. साल में 2 बार तुम आ जाओगे, एक बार हम आ जाएंगे. मिलनाजुलना होता रहेगा,’’ पापा उसे दुलार करते हुए बोले.

‘‘लेकिन आप दोनों यहीं क्यों नहीं रह सकते हमेशा,’’ नीला लगभग रोंआसी सी हो गई.

मम्मी ने उसे सीने से लगा लिया, ‘‘हम यहीं रह गए तो तुम घर किस के पास जाओगे. अगली बार आएंगे तो ज्यादा दिन रहेंगे,’’ फिर उसे प्यार करते हुए बोली, ‘‘बहुत दिन घर भी अकेला नहीं छोड़ा जाता. तू तो हमारी लाखों में एक लाड़ली बेटी है. तेरे साथ तो हमें बहुत अच्छा लगता है.’’ पर नीला की आंखें भर आई थीं. नीला की भरी आंखें देख कर उस का हृदय भी भावुक हो रहा था. ‘‘पापा, थोड़े दिन और रुक जाइए न. मैं फ्लाइट का टिकट आगे बढ़ा देता हूं,’’ रमन बोला.

‘‘नहीं बेटा. इस बार रहने दो, अगली बार आएंगे तो घर का प्रबंध ठीक से कर के आएंगे तब ज्यादा दिन रह लेंगे.’’

मम्मीपापा के जाने का दिन आ गया. उन की शाम की फ्लाइट थी. उस दिन रविवार था. मम्मीपापा के न… न… करतेकरते भी नीला ने उन के लिए ढेर सारे गिफ्ट खरीदवाए थे. सुबह वह काफी जल्दी उठ कर मम्मीपापा के कमरे में चला गया. पापा मौर्निंग वाक पर गए हुए थे. वह मम्मी के पास जा कर बैठ गया.

‘‘मैं तेरे लिए चाय बना कर ले आती हूं,’’ मम्मी उठने का उपक्रम करती  हुई बोलीं.

‘‘नहीं मम्मी, रहने दो. मु?ो रोज चाय पीने की आदत नहीं है. बैठो आप. कल से आप कहां होंगी. इतने दिन तो पता ही नहीं चला. कब एक महीना बीत गया, बहुत अच्छा लगा आप के और पापा के आने से.’’

‘‘हमें भी तो बहुत अच्छा लगा बेटा तुम्हारे पास आने से. कितना ध्यान रखा तुम दोनों ने, कितना घुमाया, कितना खर्च किया हमारे ऊपर, इतनी सारी चीजें भी खरीद लीं.’’

‘‘कुछ नहीं किया मम्मी, फिर मातापिता को खुश करने से आशीर्वाद तो हमें ही मिलेगा.’’

‘‘कितनी प्यारी और मीठी बातें करते हो तुम दोनों,’’ मम्मी खुशी से छलक आई अपनी आंखों को पोंछती हुई बोलीं, ‘‘दिल को छू जाती हैं तुम्हारी बातें, तुम्हारी भावनाएं. खुशनसीब हैं हम कि हमारे ऐसे प्यारे बच्चे हैं. एक महीना बहुत खुशी से बीता.’’

‘‘पर आप पर काम का भार पड़ गया,’’ रमन संकोच से बोला, ‘‘दरअसल, नीला को अभी गृहस्थी का ज्यादा काम नहीं आता. धीरेधीरे सीख रही है. नौकरी करेगी तो जल्दी उठने की आदत भी पड़ जाएगी.’’

‘‘काम कोई माने नहीं रखता बेटा. नीला कोशिश करती है, आलसी नहीं है. उस से जो भी हो पाता है वह पूरा प्रयत्न करती है. कुछ कर न पाना और कुछ करना ही न चाहना, दोनों बातों में फर्क है. मुख्य तो स्वभाव होता है, भावनाओं और विचारों से यदि इंसान अच्छा है तो ये बातें कोई अहमियत नहीं रखतीं. आदतें बदल जाती हैं. काम करना आ जाता है. आजकल एकदो बच्चे होते हैं. बेटियां बहुत लाड़प्यार और संपन्नता में बड़ी होती हैं. उन के जीवन का ध्येय किचन या गृहस्थी का काम सीखना नहीं, बल्कि पढ़ाईलिखाई कर के कैरियर बनाना होता है. इसलिए विवाह होते ही उन से ऐसी उम्मीद करना गलत है.

‘‘नीला बहुत प्यारी लड़की है, उस के हृदय का पूरा प्यार और भावना हम तक पूरी की पूरी पहुंच जाती है. हम तो ऐसी बहू पा कर बहुत खुश हैं,’’ मां उस के चेहरे पर मुसकराती नजर डाल कर बोलीं, ‘‘अभी वह बच्ची है. कल को बच्चे होंगे तो कई बातों में वह खुद ही परिपक्व हो जाएगी.’’

‘‘जी मम्मी, मैं भी यही सोचता हूं.’’

‘‘और बेटा, आजकल लड़की क्या और लड़का क्या, दोनों को ही समानरूप से गृहस्थी संभालनी चाहिए. वरना लड़कियां, खासकर महानगरों में, नौकरियां कैसे करेंगी जहां नौकरों की भी सुविधा नहीं है.’’

‘‘जी मम्मी, मैं इस बात का ध्यान रखूंगा.’’

थोड़ी देर दोनों चुप रहे, फिर एकाएक रमन बोल पड़ा, ‘‘मम्मी, सच बताऊं तो मैं नहीं सोच पा रहा था कि आप नीला की पीढ़ी की लड़कियों के रहनसहन की आदतों व पहननेओढ़ने के तरीकों को इतनी स्वाभाविकता से ले लेंगी, इसलिए…’’ कह कर उस ने नजरें ?ाका लीं.

‘‘इसीलिए हमें आने के लिए नहीं बोल रहा था,’’ मम्मी हंसने लगीं, ‘‘तेरे मातापिता अनपढ़ हैं क्या?’’

‘‘नहीं मम्मी, आप की पीढ़ी तो पढ़ीलिखी है. मेरे सभी दोस्तों के मातापिता उच्चशिक्षित हैं पर पता नहीं क्यों बदलना नहीं चाहते.’’

‘‘बदलाव बहुत जरूरी है बेटा. समय को बहने देना चाहिए. पकड़ कर बैठेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे? रिश्ते भी ठहर जाएंगे, दूरियां भी बढ़ेंगी…’’

‘‘यह सम?ा सब में नहीं होती मम्मी,’’ यह बोला ही था कि तभी उस के पापा आ गए. नीला भी आंखें मलतेमलते उठ कर आ गई और मम्मी की गोद में सिर रख कर गुडमुड कर लेट गई. मम्मी हंस कर प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरने लगीं.

‘चलोचलो उठो, तुम्हारी नहीं, मेरी मम्मी हैं. पूरे महीने मु?ो मम्मी के पास नहीं फटकने दिया. खुद ही चिपकी रहीं,’’ छेड़ता हुआ रमन उसे धकेलने लगा. नीला और भी बांहें फैला कर मम्मी की गोद से चिपक गई. देख कर रमन हंसने लगा.

शाम को जाने की सारी तैयारी हो गई. वे दोनों मम्मीपापा को छोड़ने एयरपोर्ट चले गए. एयरपोर्ट के बाहर मम्मीपापा को छोड़ने का समय आ गया. वह दोनों को नमस्कार कर उन के गले लग गया. उस का खुद का मन भी बहुत उदास हो रहा था. पर उसे पता था वह तो कल से काम में व्यस्त हो जाएगा पर नीला को मम्मीपापा की कमी शिद्दत से महसूस होगी.

पापा से गले लग कर नीला मम्मी के गले से चिपक गई. मम्मी ने भी प्यार से उसे बांहों में भींच लिया. वह थोड़ी देर तक अलग नहीं हुई तो वह सम?ा गया कि भावुक स्वभाव की नीला रो रही है. मम्मी की आंखें भी भर आई थीं. नीला को अपने से अलग कर उस की आंखें पोंछती हुई प्यार से बोलीं, ‘‘जल्दी आएंगे बेटा. अब तुम आओ छुट्टी ले कर,’’ रमन भी पास में जा कर खड़ा हो गया. नीला के इर्दगिर्द बांहों का घेरा बनाते हुए बोला, ‘‘जी मम्मी, जल्दी ही आएंगे.’’

‘‘अच्छा बेटा,’’ मम्मीपापा ने दोनों के गाल थपके और सामान की ट्रौली धकेलते, उन्हें हाथ हिलाते हुए एयरपोर्ट के अंदर चले गए. रमन और नीला भरी आंखों से उन्हें जाते हुए देखते रहे. रमन सोच रहा था, बदलाव की बयार तो बहनी ही चाहिए चाहे वह मौसम की हो या विचारों की, तभी जीवन सुखमय होता है.

’’ मां उस के चेहरे पर मुसकराती नजर डाल कर बोलीं, ‘‘अभी वह बच्ची है. कल को बच्चे होंगे तो कई बातों में वह खुद ही परिपक्व हो जाएगी.’’

‘‘जी मम्मी, मैं भी यही सोचता हूं.’’

‘‘और बेटा, आजकल लड़की क्या और लड़का क्या, दोनों को ही समानरूप से गृहस्थी संभालनी चाहिए. वरना लड़कियां, खासकर महानगरों में, नौकरियां कैसे करेंगी जहां नौकरों की भी सुविधा नहीं है.’’

‘‘जी मम्मी, मैं इस बात का ध्यान रखूंगा.’’

थोड़ी देर दोनों चुप रहे, फिर एकाएक रमन बोल पड़ा, ‘‘मम्मी, सच बताऊं तो मैं नहीं सोच पा रहा था कि आप नीला की पीढ़ी की लड़कियों के रहनसहन की आदतों व पहननेओढ़ने के तरीकों को इतनी स्वाभाविकता से ले लेंगी, इसलिए…’’ कह कर उस ने नजरें ?ाका लीं.

‘‘इसीलिए हमें आने के लिए नहीं बोल रहा था,’’ मम्मी हंसने लगीं, ‘‘तेरे मातापिता अनपढ़ हैं क्या?’’

‘‘नहीं मम्मी, आप की पीढ़ी तो पढ़ीलिखी है. मेरे सभी दोस्तों के मातापिता उच्चशिक्षित हैं पर पता नहीं क्यों बदलना नहीं चाहते.’’

‘‘बदलाव बहुत जरूरी है बेटा. समय को बहने देना चाहिए. पकड़ कर बैठेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे? रिश्ते भी ठहर जाएंगे, दूरियां भी बढ़ेंगी…’’

‘‘यह सम?ा सब में नहीं होती मम्मी,’’ यह बोला ही था कि तभी उस के पापा आ गए. नीला भी आंखें मलतेमलते उठ कर आ गई और मम्मी की गोद में सिर रख कर गुडमुड कर लेट गई. मम्मी हंस कर प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरने लगीं.

‘‘चलोचलो उठो, तुम्हारी नहीं, मेरी मम्मी हैं. पूरे महीने मु?ो मम्मी के पास नहीं फटकने दिया. खुद ही चिपकी रहीं,’’ छेड़ता हुआ रमन उसे धकेलने लगा. नीला और भी बांहें फैला कर मम्मी की गोद से चिपक गई. देख कर रमन हंसने लगा.

शाम को जाने की सारी तैयारी हो गई. वे दोनों मम्मीपापा को छोड़ने एयरपोर्ट चले गए. एयरपोर्ट के बाहर मम्मीपापा को छोड़ने का समय आ गया. वह दोनों को नमस्कार कर उन के गले लग गया. उस का खुद का मन भी बहुत उदास हो रहा था. पर उसे पता था वह तो कल से काम में व्यस्त हो जाएगा पर नीला को मम्मीपापा की कमी शिद्दत से महसूस होगी.

पापा से गले लग कर नीला मम्मी के गले से चिपक गई. मम्मी ने भी प्यार से उसे बांहों में भींच लिया. वह थोड़ी देर तक अलग नहीं हुई तो वह सम?ा गया कि भावुक स्वभाव की नीला रो रही है. मम्मी की आंखें भी भर आई थीं. नीला को अपने से अलग कर उस की आंखें पोंछती हुई प्यार से बोलीं, ‘‘जल्दी आएंगे बेटा. अब तुम आओ छुट्टी ले कर,’’ रमन भी पास में जा कर खड़ा हो गया. नीला के इर्दगिर्द बांहों का घेरा बनाते हुए बोला, ‘‘जी मम्मी, जल्दी ही आएंगे.’’

‘‘अच्छा बेटा,’’ मम्मीपापा ने दोनों के गाल थपके और सामान की ट्रौली धकेलते, उन्हें हाथ हिलाते हुए एयरपोर्ट के अंदर चले गए. रमन और नीला भरी आंखों से उन्हें जाते हुए देखते रहे. रमन सोच रहा था, बदलाव की बयार तो बहनी ही चाहिए चाहे वह मौसम की हो या विचारों की, तभी जीवन सुखमय होता है.

हयात : जज्बातों का समंदर

‘‘कल जल्दी आ जाना.’’

‘‘क्यों?’’ हयात ने पूछा.

‘‘कल से रेहान सर आने वाले हैं और हमारे मिर्जा सर रिटायर हो रहे हैं.’’

‘‘कोशिश करूंगी,’’ हयात ने जवाब तो दिया लेकिन उसे खुद पता नहीं था कि वह वक्त पर आ पाएगी या नहीं.

दूसरे दिन रेहान सर ठीक 10 बजे औफिस में पहुंचे. हयात अपनी सीट पर नहीं थी. रेहान सर के आते ही सब लोगों ने खड़े हो कर गुडमौर्निंग कहा. रेहान सर की नजरों से एक खाली चेयर छूटी नहीं.

‘‘यहां कौन बैठता है?’’

‘‘मिस हयात, आप की असिस्टैंट, सर,’’ क्षितिज ने जवाब दिया.

‘‘ओके, वह जैसे ही आए उन्हें अंदर भेजो.’’

रेहान लैपटौप खोल कर बैठा था. कंपनी के रिकौर्ड्स चैक कर रहा था. ठीक 10 बज कर 30 मिनट पर हयात ने रेहान के केबिन का दरवाजा खटखटाया.

‘‘में आय कम इन, सर?’’

‘‘यस प्लीज, आप की तारीफ?’’

‘‘जी, मैं हयात हूं. आप की असिस्टैंट?’’

‘‘मुझे उम्मीद है कल सुबह मैं जब आऊंगा तो आप की चेयर खाली नहीं होगी. आप जा सकती हैं.’’

हयात नजरें झुका कर केबिन से बाहर निकल आई. रेहान सर के सामने ज्यादा बात करना ठीक नहीं होगा, यह बात हयात को समझे में आ गई थी. थोड़ी ही देर में रेहान ने औफिस के स्टाफ की एक मीटिंग ली.

‘‘गुडआफ्टरनून टू औल औफ यू. मुझे आप सब से बस इतना कहना है कि कल से कंपनी के सभी कर्मचारी वक्त पर आएंगे और वक्त पर जाएंगे. औफिस में अपनी पर्सनल लाइफ को छोड़ कर कंपनी के काम को प्रायोरिटी देंगे. उम्मीद है कि आप में से कोई मुझे शिकायत का मौका नहीं देगा. बस, इतना ही, अब आप लोग जा सकते हैं.’’

‘कितना खड़ूस है. एकदो लाइंस ज्यादा बोलता तो क्या आसमान नीचे आ जाता या धरती फट जाती,’ हयात मन ही मन रेहान को कोस रही थी.

नए बौस का मूड देख कर हर कोई कंपनी में अपने काम के प्रति सजग हो गया. दूसरे दिन फिर से रेहान औफिस में ठीक 10 बजे दाखिल हुआ और आज फिर हयात की चेयर खाली थी. रेहान ने फिर से क्षितिज से मिस हयात को आते ही केबिन में भेजने को कहा. ठीक 10 बज कर 30 मिनट पर हयात ने रेहान के केबिन का दरवाजा खटखटाया.

‘‘मे आय कम इन, सर?’’

‘‘जी, जरूर, मुझे आप का ही इंतजार था. अभी हमें एक होटल में मीटिंग में जाना है. क्या आप तैयार हैं?’’

‘‘जी हां, कब निकलना है?’’

‘‘उस मीटिंग में आप को क्या करना है, यह पता है आप को?’’

‘‘जी, आप मुझे कल बता देते तो मैं तैयारी कर के आती.’’

‘‘मैं आप को अभी बताने वाला था. लेकिन शायद वक्त पर आना आप की आदत नहीं. आप की सैलरी कितनी है?’’

‘‘जी, 30 हजार.’’

‘‘अगर आप के पास कंपनी के लिए टाइम नहीं है तो आप घर जा सकती हैं और आप के लिए यह आखिरी चेतावनी है. ये फाइल्स उठाएं और अब हम निकल रहे हैं.’’

हयात रेहान के साथ होटल में पहुंच गई. आज एक हैदराबादी कंपनी के साथ मीटिंग थी. रेहान और हयात दोनों ही टाइम पर पहुंच गए. लेकिन सामने वाली पार्टी ने बुके और वो आज आएंगे नहीं, यह मैसेज अपने कर्मचारी के साथ भेज दिया. उस कर्मचारी के जाते ही रेहान ने वो फूल उठा कर होटल के गार्डन में गुस्से में फेंक दिए. ‘‘आज का तो दिन ही खराब है,’’ यह बात कहतेकहते वह अपनी गाड़ी में जा कर बैठ गया.

रेहान का गुस्सा देख कर हयात थोड़ी परेशान हो गई और सहमीसहमी सी गाड़ी में बैठ गई. औफिस में पहुंचते ही रेहान ने हैदराबादी कंपनी के साथ पहले किए हुए कौंट्रैक्ट के डिटेल्स मांगे. इस कंपनी के साथ 3 साल पहले एक कौंट्रैक्ट हुआ था लेकिन तब हयात यहां काम नहीं करती थी, इसलिए उसे वह फाइल मिल नहीं रही थी.

‘‘मिस हयात, क्या आप शाम को फाइल देंगी मुझे’’ रेहान केबिन से बाहर आ कर हयात पर चिल्ला रहा था.

‘‘जी…सर, वह फाइल मिल नहीं रही.’’

‘‘जब तक मुझे फाइल नहीं मिलेगी, आप घर नहीं जाएंगी.’’

यह बात सुन कर तो हयात का चेहरा ही उतर गया. वैसे भी औफिस में सब के सामने डांटने से हयात को बहुत ही इनसल्टिंग फील हो रहा था. शाम के 6 बज चुके थे. फाइल मिली नहीं थी.

‘‘सर, फाइल मिल नहीं रही है.’’

रेहान कुछ बोल नहीं रहा था. वह अपने कंप्यूटर पर काम कर रहा था. रेहान की खामोशी हयात को बेचैन कर रही थी. रेहान का रवैया देख कर वह केबिन से निकल आईर् और अपना पर्स उठा कर घर निकल गई. दूसरे दिन हयात रेहान से पहले औफिस में हाजिर थी. हयात को देखते ही रेहान ने कहा, ‘‘मिस हयात, आज आप गोडाउन में जाएं. हमें आज माल भेजना है. आई होप, आप यह काम तो ठीक से कर ही लेंगी.’’

हयात बिना कुछ बोले ही नजर झुका कर चली गई. 3 बजे तक कंटेनर आए ही नहीं. 3 बजने के बाद कंटेनर में कंपनी का माल भरना शुरू हुआ. रात के 8 बजे तक काम चलता रहा. हयात की बस छूट गई. रेहान और उस के पापा कंपनी से बाहर निकल ही रहे थे कि कंटेनर को देख कर वे गोडाउन की तरफ मुड़ गए. हयात एक टेबल पर बैठी थी और रजिस्टर में कुछ लिख रही थी.

तभी मिर्जा साहब के साथ रेहान गोडाउन में आया. हयात को वहां देख कर रेहान को, कुछ गलत हो गया, इस बात का एहसास हुआ.

‘‘हयात, तुम अभी तक घर नहीं गईं,’’ मिर्जा सर ने पूछा.

‘‘नहीं सर, बस अब जा ही रही थी.’’

‘‘चलो, जाने दो, कोई बात नहीं. आओ, हम तुम्हें छोड़ देते हैं.’’

अपने पापा का हयात के प्रति इतना प्यारभरा रवैया देख कर रेहान हैरान हो रहा था, लेकिन वह कुछ बोल भी नहीं रहा था. रेहान का मुंह देख कर हयात ने ‘नहीं सर, मैं चली जाऊंगी’ कह कर उन्हें टाल दिया. हयात बसस्टौप पर खड़ी थी. मिर्जा सर ने फिर से हयात को गाड़ी में बैठने की गुजारिश की. इस बार हयात न नहीं कह सकी.

‘‘हम तुम्हें कहां छोड़ें?’’

‘‘जी, मुझे सिटी हौस्पिटल जाना है.’’

‘‘सिटी हौस्पिटल क्यों? सबकुछ ठीक तो है?’’

‘‘मेरे पापा को कैंसर है, उन्हें वहां ऐडमिट किया है.’’

‘‘फिर तो तुम्हारे पापा से हम भी एक मुलाकात करना चाहेंगे.’’

कुछ ही देर में हयात अपने मिर्जा सर और रेहान के साथ अपने पापा के कमरे में आई.

‘‘आओआओ, मेरी नन्ही सी जान. कितना काम करती हो और आज इतनी देर क्यों कर दी आने में. तुम्हारे उस नए बौस ने आज फिर से तुम्हें परेशान किया क्या?’’

हयात के पापा की यह बात सुन कर तो हयात और रेहान दोनों के ही चेहरे के रंग उड़ गए.

‘‘बस अब्बू, कितना बोलते हैं आप. आज आप से मिलने मेरे कंपनी के बौस आए हैं. ये हैं मिर्जा सर और ये इन के बेटे रेहान सर.’’

‘‘आप से मिल कर बहुत खुशी हुई सुलतान मियां. अब कैसी तबीयत है आप की?’’ मिर्जा सर ने कहा.

‘‘हयात की वजह से मेरी सांस चल रही है. बस, अब जल्दी से किसी अच्छे खानदान में इस का रिश्ता हो जाए तो मैं गहरी नींद सो सकूं.’’

‘‘सुलतान मियां, परेशान न हों. हयात को अपनी बहू बनाना किसी भी खानदान के लिए गर्व की ही बात होगी. अच्छा, अब हम चलते हैं.’’

इस रात के बाद रेहान का हयात के प्रति रवैया थोड़ा सा दोस्ताना हो गया. हयात भी अब रेहान के बारे में सोचती रहती थी. रेहान को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए सजनेसंवरने लगी थी.

‘‘क्या बात है? आज बहुत खूबसूरत लग रही हो,’’ रेहान का छोटा भाई आमिर हयात के सामने आ कर बैठ गया. हयात ने एकबार उस की तरफ देखा और फिर से अपनी फाइल को पढ़ने लगी. आमिर उस की टेबल के सामने वाली चेयर पर बैठ कर उसे घूर रहा था. आखिरकार हयात ने परेशान हो कर फाइल बंद कर आमिर के उठने का इंतजार करने लगी. तभी रेहान आ गया. हयात को आमिर के सामने इस तरह से देख कर रेहान परेशान तो हुआ लेकिन उस ने देख कर भी अनदेखा कर दिया.

दूसरे दिन रेहान ने अपने केबिन में एक मीटिंग रखी थी. उस मीटिंग में आमिर को रेहान के साथ बैठना था. लेकिन वह जानबूझ कर हयात के बाजू में आ कर बैठ गया. हयात को परेशान करने का कोई मौका वह छोड़ नहीं रहा था. लेकिन हयात हर बार उसे देख कर अनदेखा कर देती थी. एक दिन तो हद ही हो गई. आमिर औफिस में ही हयात के रास्ते में खड़ा हो गया.

‘‘रेहान तुम्हें महीने के 30 हजार रुपए देता है. मैं एक रात के दूंगा. अब तो मान जाओ.’’

यह बात सुनते ही हयात ने आमिर के गाल पर एक जोरदार चांटा जड़ दिया. औफिस में सब के सामने हयात इस तरह रिऐक्ट करेगी, इस बात का आमिर को बिलकुल भी अंदाजा नहीं था. हयात ने तमाचा तो लगा दिया लेकिन अब उस की नौकरी चली जाएगी, यह उसे पता था. सबकुछ रेहान के सामने ही हुआ.

बस, आमिर ने ऐसा क्या कर दिया कि हयात ने उसे चाटा मार दिया, यह बात कोई समझ नहीं पाया. हयात और आमिर दोनों ही औफिस से निकल गए.

दूसरे दिन सुबह आमिर ने आते ही रेहान के केबिन में अपना रुख किया.

‘‘भाईजान, मैं इस लड़की को एक दिन भी यहां बरदाश्त नहीं करूंगा. आप अभी और इसी वक्त उसे यहां से निकाल दें.’’

‘‘मुझे क्या करना है, मुझे पता है. अगर गलती तुम्हारी हुई तो मैं तुम्हें भी इस कंपनी से बाहर कर दूंगा. यह बात याद रहे.’’

‘‘उस लड़की के लिए आप मुझे निकालेंगे?’’

‘‘जी, हां.’’

‘‘यह तो हद ही हो गई. ठीक है, फिर मैं ही चला जाता हूं.’’

रेहान कब उसे अंदर बुलाए हयात इस का इंतजार कर रही थी. आखिरकार, रेहान ने उसे बुला ही लिया. रेहान अपने कंप्यूटर पर कुछ देख रहा था. हयात को उस के सामने खड़े हुए 2 मिनट हुए. आखिरकार हयात ने ही बात करना शुरू कर दिया.

‘‘मैं जानती हूं आप ने मुझे यहां बाहर करने के लिए बुलाया है. वैसे भी आप तो मेरे काम से कभी खुश थे ही नहीं. आप का काम तो आसान हो गया. लेकिन मेरी कोई गलती नहीं है. फिर भी आप मुझे निकाल रहे हैं, यह बात याद रहे.’’

रेहान अचानक से खड़ा हो कर उस के करीब आ गया, ‘‘और कुछ?’’

‘‘जी नहीं.’’

‘‘वैसे, आमिर ने किया क्या था?’’

‘‘कह रहे थे एक रात के 30 हजार रुपए देंगे.’’

आमिर की यह सोच जान कर रेहान खुद सदमे में आ गया.

‘‘तो मैं जाऊं?’’

‘‘जी नहीं, आप ने जो किया, बिलकुल ठीक किया. जब भी कोई लड़का अपनी मर्यादा भूल जाए, लड़की की न को सम?ा न पाए, फिर चाहे वह बौस हो, पिता हो, बौयफ्रैंड हो उस के साथ ऐसा ही होना चाहिए. लड़कियों को छेड़खानी के खिलाफ जरूर आवाज उठानी चाहिए. मिस हयात, आप को नौकरी से नहीं निकाला जा रहा है.’’

‘‘शुक्रिया.’’

अब हयात की जान में जान आ गई. रेहान उस के करीब आ रहा था और हयात पीछेपीछे जा रही थी. हयात कुछ समझ नहीं पा रही थी.

रेहान ने हयात का हाथ अपने हाथ में ले लिया और आंखों में आंखें डालते हुए बोला, ‘‘मिस हयात, आप बहुत सुंदर हैं. जिम्मेदारियां भी अच्छी तरह से संभालती हैं और एक सशक्त महिला हैं. इसलिए मैं तुम्हें अपनी जीवनसाथी बनाना चाहता हूं.’’

हयात कुछ समझ नहीं पा रही थी. क्या बोले, क्या न बोले. बस, शरमा कर हामी भर दी.

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