Crime Story In Hindi: एक मौत ऐसी भी

Crime Story In Hindi: रेशमा एक गरीब परिवार की खूबसूरत लड़की थी, पर उस की चाहत हमेशा अमीरों वाली थी. महंगे मोबइल, महंगी ड्रैस और बड़ी गाडि़यों में घूमने के सपने के चक्कर में वह इतनी अंधी हो गई कि उस ने अपने इस खूबसूरत बदन को ही अमीर बनने का रास्ता बनाने का इरादा कर लिया.

रेशमा मुंबई के गोवंडी इलाके में अपने अम्मीअब्बा के साथ रहती थी. उस का बाप आटोरिकशा चला कर अपने परिवार का पेट पालता था. उस ने कड़ी मेहनत कर के रेशमा को खूब पढ़ाने का सपना संजो रखा था, इसलिए उस ने अपनी बेटी को एक अच्छे इंगलिश स्कूल में दाखिला दिलवा दिया था.

रेशमा पढ़ाईलिखाई में काफी होशियार थी. यही वजह थी कि वह हर क्लास में अव्वल आती थी.

पढ़ाईलिखाई के साथसाथ रेशमा के सपने भी बड़े ऊंचे थे. वह किसी भी कीमत पर अमीर होना चाहती थी, क्योंकि उस के स्कूल में ज्यादातर अमीर मांबाप के बच्चे पढ़ते थे, जिन्हें देख कर रेशमा के मन में भी अमीर बनने का सपना जन्म लेने लगा. वह रातदिन सोचती रहती कि आखिर पैसा कैसे कमाया जाए.

एक दिन रेशमा जब बाथरूम से नहा कर बाहर निकली और उस की नजर अपने उठे हुए उभारों पर पड़ी, तो उसे अपनेआप पर हंसी आ गई. वह यह सोचने लगी कि अमीरजादों को फंसाने वाली उस की ये ऊंची छातियां आखिर कब काम आएंगी. यही तो वह चीज है, जिस के हमेशा से सब दीवाने हैं.

रेशमा के दिमाग में फौरन एक प्लान ने जन्म लिया. उस ने टाइट टीशर्ट पहनी और स्कूल गई. स्कूल छूटने के बाद उस ने कुछ अमीर लड़को के सामने ऐसी अंगड़ाई भरी कि वे उस की तरफ देखने को मजबूर हो गए.

उन अमीर लड़कों में रिजवान भी शामिल था, जो एक बिल्डर का बेटा था.

रेशमा थी भी कमाल की. अच्छी कदकाठी और खूबसूरत गदराए बदन की मलिका होने के साथसाथ सुर्ख गाल, गुलाबी होंठ और ऊंची उठी हुई छातियां किसी को भी अपना दीवाना बनाने के लिए काफी थीं.

जब रिजवान से रहा न गया तो वह छूटते ही बोला, ‘‘क्या बात… आप तो आज कयामत ढा रही हो.’’

रेशमा ने रिजवान की इस बात का हंस कर जवाब दिया, ‘‘आप को कोई एतराज…’’

रिजवान बोला, ‘‘हमें क्या एतराज… हम तो आप के साथ एक कौफी पीने के तलबगार हैं. अगर आप की इजाजत हो तो चलें?’’

रेशमा ने कहा, ‘‘सोच लो… मेरे साथ कौफी पीने में कहीं आप की शान कम न हो जाए.’’

‘‘हमारी शान कम नहीं होगी, बल्कि बढ़ जाएगी,’’ रिजवान ने रेशमा की तारीफ करते हुए कहा.

‘‘ठीक है, तो चलो फिर कहीं चलते हैं,’’ रेशमा ने कार में बैठते हुए कहा.

रिजवान रेशमा को एक महंगे कैफे में ले गया, जहां दोनों ने प्यारभरी बातें कीं और कौफी पी कर वापस आ गए. बातों ही बातों में दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर भी ले लिया.

अब वे दोनों मोबाइल पर एकदूसरे से खूब देर तक बातें करते, मिलने का वादा करते, शौपिंग करते और होटलों में खातेपीते.

रेशमा अपने हुस्न की अदाओं के बल पर रिजवान को लूट रही थी, उसे क्या मालूम था कि एक दिन वह उस के प्यार में खुद पागल हो जाएगी.

2 दिन बाद रेशमा का बर्थडे था. वह रिजवान से पूछ रही थी, ‘‘तुम मेरे बर्थडे पर क्या गिफ्ट देने वाले हो?’’

रिजवान बोला, ‘‘तुम्हें जो चाहिए मैं वह गिफ्ट दूंगा, लेकिन तुम्हें मेरी एक बात माननी पड़ेगी.’’

रेशमा बोली, ‘‘मैं तो तुम्हारी हर बात मानने को तैयार हूं, बोलो तो सही.’’

‘‘मैं तुम्हारा बर्थडे तुम्हारे साथ अकेले किसी तनहा जगह पर मनाना चाहता हूं,’’ रिजवान ने मन की बात कही.

‘‘तो इस में इतना घबराने की क्या बात है. आप मु झे जहां ले चलोगे, मैं तैयार रहूंगी,’’ रेशमा ने अंगड़ाई लेते हुए कहा.

रेशमा के बर्थडे पर रिजवान ने एक आलीशान होटल में कमरा बुक किया और उसे अच्छी तरह सजवा दिया. इस के बाद रिजवान ने रेशमा को फोन किया और उसे बताए हुए पते पर आने को कहा.

कुछ ही देर में रेशमा वहां आ गई. रिजवान ने उसे अपनी गाड़ी में बैठाया और कुछ ही देर में वे दोनों उस होटल के कमरे में पहुंच गए, जो रिजवान ने पहले ही बुक किया हुआ था.

रेशमा जब उस कमरे में पहुंची तो वहां की सजावट देख कर वह दंग रह गई. रिजवान ने एक खूबसूरत और कीमती केक का इंतजाम पहले ही कर रखा था, जिसे देख कर रेशमा खुशी के मारे पागल हो गई.

तभी रेशमा बोली, ‘‘चलो, केक काटते हैं, मु झे घर भी जाना है.’’

‘‘केक काटने से पहले तुम्हें मेरी एक हसरत पूरी करनी पड़ेगी,’’ रिजवान ने कहा.

‘‘कैसी हसरत, मैं सम झी नहीं? और हां, मेरा गिफ्ट कहां है?’’ रेशमा ने पूछा.

रिजवान ने एक महंगा मोबाइल रेशमा को दिखाते हुए कहा, ‘‘यह है गिफ्ट, लेकिन केक काटने के बाद ही तुम्हें मिलेगा.’’

रेशमा बोली, ‘‘तो ठीक है, मैं जल्दी से केक काट देती हूं.’’

‘‘लेकिन केक काटने से पहले तुम्हें मेरी हसरत पूरी करनी पड़ेगी,’’ रिजवान ने दोबारा कहा.

‘‘अच्छा, बताओ कि तुम क्या चाहते हो?’’ रेशमा ने पूछा.

रिजवान ने एक गिफ्ट रेशमा की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘पहले तुम इसे पहन कर दिखाओ.’’

रेशमा बोली, ‘‘अरे, इस में ऐसा क्या है, जो तुम इतने उतावले हो रहे हो?’’

रेशमा ने जैसे ही वह गिफ्ट खोला, तो उस में एक गुलाबी रंग की खूबसूरत नाइटी देख कर वह खुशी से झूम उठी और बोली, ‘‘इसे देते हुए तुम इतना घबरा क्यों रहे थे… मैं अभी इसे पहन कर आती हूं.’’

रिजवान बोला, ‘‘तुम्हें यह मेरे सामने ही पहननी पड़ेगी.’’

‘‘अरे बाबा नहीं, मु झे शर्म आती है. भला मैं अभी तुम्हारे सामने अपने कपड़े कैसे उतार सकती हूं,’’ रेशमा बोली.

रिजवान ने रूठते हुए कहा, ‘‘बस, यही प्यार है तुम्हारा… तुम मेरे सामने इसे नहीं पहन सकती…’’

रेशमा बोली, ‘‘ठीक है, नाराज मत होना. बस, तुम लाइट बंद कर दो.’’

रिजवान ने फौरन लाइट बंद कर दी.

लाइट बंद होते ही रेशमा ने अपने कपड़े उतारे. जैसे ही उस के बदन से कपड़े हटे, उस का गोरा
बदन उस अंधेरे में रोशनी की तरह चमक उठा.

रिजवान रेशमा के गोरे बदन की झलक देख कर रोमांटिक हो उठा. तभी रेशमा बोली, ‘‘लाइट जला दो, पर नाइट बल्ब.’’

लाल रंग की धीमी लाइट में भी रेशमा का गदराया बदन कयामत ढा रहा था.

उस की ऊंची उठी छातियां नाइटी से बाहर निकलने के लिए बेताब हो रही थीं.

तभी रेशमा बोली, ‘‘जल्दी से केक काटते हैं, वरना देर हो जाएगी.’’ रिजवान बोला, ‘‘ठीक है.’’

रेशमा ने केक काटा. रिजवान ने उसे बर्थडे विश किया और अपने हाथ से केक खिलाने लगा.

रेशमा ने जैसे ही रिजवान को अपने हाथ से केक खिलाया, उस ने उस की नाजुक उंगलियां प्यार से चूम लीं.

रेशमा शरमाते हुए बोली, ‘‘यह क्या कर रहे हो.’’

रिजवान ने रेशमा को अपनी बांहों में भरते हुए कहा, ‘‘मैं कितना खुशनसीब हूं, जो तुम्हारे इस गदराए बदन को छू पा रहा हूं.’’

रेशमा रिजवान की कैद से आजाद होने की झूठी कोशिश करते हुए बोली, ‘‘बस करो, मु झे छोड़ो.’’

पर रिजवान ने फौरन अपने होंठ रेशमा की गरदन पर रख दिए और चूमने लगा.

रेशमा कसमसाने लगी. तभी रिजवान उस की उठी हुई छातियों को बेतहाशा चूमने लगा.

कुछ ही देर में रेशमा पूरी तरह कामुक हो उठी और रिजवान को अपने ऊपर खींचने लगी.

रिजवान सम झ गया कि लोहा गरम है, बस अब चोट करने की जरूरत है. वह उसे बिस्तर पर ले गया और फिर दोनों की गरम सांसें और कामुक आवाजें कमरे में गूंजने लगीं. फिर वे निढाल हो कर बिस्तर पर ही पड़े रहे.

कुछ देर बाद वे दोनों उठे और अपनेअपने कपड़े पहन कर घर की ओर चल दिए.

रेशमा जैसे ही घर पहुंची, उस के अब्बा ने पूछा, ‘‘कहां थी इतनी रात तक?’’

रेशमा बोली, ‘‘अब्बा, 2 दिन बाद इम्तिहान हैं. उसी की तैयारी के लिए अपनी एक दोस्त के घर पढ़ाई कर
रही थी.’’

इधर रेशमा के अब्बा ने सब सच मान लिया, उधर रिजवान और रेशमा के बीच एक बार जिस्मानी रिश्ते बने तो फिर बनते ही चले गए. उन दोनों को जब भी मौका मिलता, तब वे अपनी जिस्मानी ख्वाहिश किसी होटल में जा कर पूरी कर लेते.

एक दिन रेशमा को पता चला कि उस की कोख में रिजवान का बच्चा पल रहा है. फिर क्या था, रेशमा ने रिजवान से शादी करने की जिद शुरू कर दी.

रिजवान एक अमीर बाप की बिगड़ी हुई औलाद था, भला वह रेशमा से शादी कैसे कर सकता था. वह तो बस उस के बदन के मजे लूटने के इरादे से उस पर पैसा खर्च कर रहा था और प्यार का नाटक कर के उसे अपने जाल में फंसाए रखना चाहता था.

वैसे तो रेशमा भी पहले अपने खूबसूरत जिस्म और ऊंची उठी छातियों से रिजवान से पैसा लूटना चाहती थी, पर जब वे दोनों मिलने लगे, तो रेशमा रिजवान से प्यार भी करने लगी.

कई महीनों तक रेशमा के जिस्म के मजे लूटने के बाद अब रिजवान का मन उस से ऊब गया था और उस ने उस से मिलनाजुलना भी कम कर दिया था. रेशमा के पेट से होने की खबर सुन कर वह हमेशा के लिए उस से छुटकारा पा लेना चाहता था.

इस के लिए रिजवान ने एक ऐसा प्लान बना डाला, जिस ने रेशमा की जिंदगी तबाह कर दी.

हुआ यों था कि एक रात रिजवान ने रेशमा से बहुत प्यारीप्यारी बातें कीं और उसे कुर्ला में कोहिनूर बिल्डिंग के सामने बन रही नई बिल्डिंग में मिलने के लिए बुलाया.

उस नई बनने वाली बिल्डिंग की छत पर रिजवान ने रेशमा को देखते ही अपने गले से लगाया और उसके होंठों को चूमते हुए एकएक कर के उस के कपड़े उतारने लगा.

जब रेशमा बिना कपड़ों के हो गई, तो वहां पहले से ही मौजूद रिजवान के 2 दोस्त उस्मान और फरमान भी अचानक रेशमा के सामने आ गए.

रेशमा उन्हें देखते हुए अपने बदन को छिपाने की कोशिश करने लगी.

लेकिन तभी फरमान बोला, ‘‘क्या बात भाभी, रिजवान को ही मजे देती रहोगी या फिर कुछ मजा अपने इन देवरों के लिए भी बचा कर रखोगी.’’

रेशमा घबराते हुए बोली, ‘‘क्या बकवास कर रहे हो… तुम्हे शर्म नहीं आती…’’

‘‘भाभी, आप को कौन सी शर्म आती है… देर रात इस सुनसान बिल्डिंग की छत पर आप बेशर्मी का ही काम कर रही हो न. कुछ मजे हमें भी लूटने दो,’’ कहते हुए उन दोनों ने रेशमा को अपनी बांहों में भर लिया.

रिजवान चुपचाप खड़ा यह तमाशा देख रहा था, तो रेशमा उस से बोली, ‘‘मु झे अपने इन बेशर्म दोस्तों
से बचाओ.’’

लेकिन रिजवान ने कहा, ‘‘रेशमा डार्लिंग, कुछ मजे इन्हें भी लेने दो. ये बेचारे भी तुम्हारे इस मखमली जिस्म के दीवाने हैं.’’

रेशमा चिल्लाई, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती… मैं तुम्हारी होने वाली बीवी हूं और मेरे पेट में तुम्हारा होने वाला बच्चा पल रहा है.’’

रिजवान ने कहा, ‘‘यह सब तुम्हारी उसी धमकी का तो नतीजा है कि आज मेरे दोस्त तुम्हारे इस खूबसूरत बदन को नोंचने वाले हैं.’’

कुछ ही देर में उस्मान और फरमान रेशमा पर टूट पड़े. वह चीखतीचिल्लाती रही, पर उस सुनसान बिल्डिंग में उस की चीखें सुनने वाला कोई मौजूद न था.

उन दोनों ने रेशमा के गदराए बदन को भूखे कुत्ते की तरह नोंचना शुरू कर दिया और उस का रेप करने के बाद मार डाला. फिर उस के मोबाइल से सिमकार्ड निकाल कर अपनेअपने रास्ते चले गए.

उधर रेशमा जब देर रात बाद भी घर न पहुंची, तो उस के अब्बा को उस की चिंता सताने लगी. सुबह होते ही उन्होंने गोवंडी पुलिस स्टेशन में रेशमा की गुमशुदगी की जानकारी दी.

पुलिस ने कई जगह नाकाबंदी कर के रेशमा की तलाश जारी रखी, पर कोई सुराग हाथ नहीं लगा.

रेशमा के अब्बा का रोरो कर बुरा हाल हो गया.

कुछ दिन बाद पुलिस को खबर लगी कि कोहिनूर सिटी में नई बन रही एक बिल्डिंग में एक लड़की की लाश मिली है. लाश की हालत इस तरह खराब हो चुकी थी कि किसी के लिए उसे पहचानना आसान नहीं था.

पुलिस ने लाश को अपने कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम की लिए भेज दिया और कातिल का सुराग ढूंढ़ने में वहां का अच्छी तरह मुआयना करने लगी. काफी मशक्कत के बाद वहां एक टूटा हुआ सिमकार्ड मिल गया.

उस सिमकार्ड से पुलिस को यह पता चल गया कि यह सिमकार्ड रेशमा नाम की एक लड़की का है, जो गोवंडी में रहती है. यह भी पता चल गया कि 8 दिन पहले रेशमा नाम की एक लड़की की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई गई थी.

पुलिस को अब यह सम झते देर न लगी कि यह लाश रेशमा की है. पुलिस ने अपनी जांच तेज कर दी और सिमकार्ड से पता चल गया कि आखिरी फोन रिजवान को किया गया था.

पुलिस सम झ गई कि अब इस जांच को आगे बढ़ाने में रिजवान ही काम आएगा.

तब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई, जिस से यह पता चल गया कि हत्या से पहले रेशमा के साथ कई लोगों ने रेप किया था और बाद में गला घोंट कर उस की हत्या कर दी गई.

पुलिस को हैरानी तब हुई जब उसे यह पता चला कि रेशमा के पेट में 3 महीना का बच्चा भी पल रहा था.

यह बात पुलिस को हजम नहीं हो रही थी कि रेशमा के साथ रेप कर के उसे मार दिया गया तो वह 3 महीने के पेट से कैसे हो गई, जबकि अभी तक उस की शादी भी नहीं हुई थी.

अब पुलिस ने अपनी जांच आगे बढ़ाते हुए रिजवान के फोन की डिटेल निकाली और जब रेशमा की हत्या हुई उस समय की उस की लोकेशन का पता किया. पुलिस को रिजवान की लोकेशन उसी बिल्डिंग की मिली, जहां रेशमा की हत्या की गई थी. यह भी पता चल गया कि रेशमा अकसर रिजवान से फोन पर बात करती रहती थी.

पुलिस को अब यह सम झते देर न लगी कि रेशमा के पेट में रिजवान का ही बच्चा था और उस की हत्या को भी इसी ने अंजाम दिया है.

अब पुलिस को यह पता लगाना था कि वे और कौन लोग थे, जिन्होंने इस हत्या को रिजवान के साथ मिल
कर अंजाम दिया और उस के साथ रेप किया.

पुलिस ने रिजवान को अपनी हिरासत में ले लिया और उस से सख्ती से पूछताछ शुरू कर दी, तो पहले यह पता चल गया कि इस हत्या में उस्मान और फरमान उस के भागीदार थे, जिन्होंने रेशमा की हत्या करने से पहले उस के साथ रेप किया था.

पुलिस की एक टीम ने कुर्ला के भारतीय नगर इलाके से उस्मान को गिरफ्तार कर लिया, पर फरमान अभी तक उन की गिरफ्त में नहीं आ पाया.

पुलिस ने जब रिजवान से हत्या की सख्ती से पूछताछ की तो रिजवान ने जो कहानी उन्हें सुनाई, उस ने सब के रोंगटे खड़े कर दिए.

रिजवान ने पुलिस को बताया कि रेशमा ने अपने हुस्न की वजह से जल्द अमीर बनने का जो सपना देख कर उसे अपने प्यार के जाल में फंसाया था, वह खुद उसी जाल में फंस गई.

रिजवान ने अपने पैसे के बलबूते पर रेशमा को महंगेमहंगे गिफ्ट दे कर उस से नाजायज रिश्ता बना लिया और उस के जिस्म के मजे लेने लगा. धीरेधीरे रेशमा उस से हकीकत में प्यार कर बैठी और अपने शरीर को रिजवान के हवाले करने लगी.

इसी बीच वह पेट से हो गई और शादी की धमकी देने लगी.

रिजवान केवल रेशमा के जिस्म को भोगना चाहता था, पर जब उस ने शादी के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया, तो मजबूर हो कर रिजवान को अपने दोस्तों की साथ मिल कर उस की हत्या की साजिश रचनी पड़ी.

इस तरह यह एक ऐसा अनोखा कत्ल हुआ, जिस ने रेशमा की जान ले ली.

फरमान अभी तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर था.

रेशमा के अब्बा का रोरो कर बुरा हाल था. उन्हें क्या मालूम था कि उन की एकलौती बेटी की इस तरह हत्या की जाएगी.

रिजवान और उस्मान पर हत्या और रेप जैसे अपराध का मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया गया और फरमान की तलाश जारी थी. Crime Story In Hindi

Family Story In Hindi: बदला जमाना

Family Story In Hindi: गांव में एक पेड़ के नीचे बैठे हरिया, गोपाल, सोमनाथ और बदरी ताश खेल रहे थे. उन के बीच दारू की खाली बोतल लुढ़की पड़ी थी.

बदरी पत्ता फेंकते हुए बोला, ‘‘हरिया, इस बार तो मैं बाजी जीतूंगा.’’

इस से पहले कि हरिया कुछ बोलता, गोपाल ने कहा, ‘‘उस्ताद, वह देख तेरी मंगेतर, सामने सिर पर पानी का घड़ा उठाए…’’

नशे की हालत में सब की नजरें उधर उठीं. रमिया सिर पर पानी का घड़ा उठाए बढ़ी चली आ रही थी.

हरिया का जवान जिस्म एक मीठी आग से जलने लगा था. अपने सूखे होंठों पर जीभ फिराते हुए वह रमिया के सांचे में ढले जिस्म को इस तरह देख रहा था, जैसे कोई बच्चा मिठाई को देखता है.

हरिया ने अचानक एक पत्थर का टुकड़ा उठाया. फिर… ‘धड़ाक’ की आवाज के साथ रमिया के सिर पर रखा घड़ा फूट गया और उस के कपड़े गीले हो गए.

गुस्से से बेकाबू होते हुए रमिया हरिया और उस के दोस्तों के पास पहुंची, जो उस की हालत पर ठहाके लगा रहे थे.

अचानक रमिया का दायां हाथ घूमा और ‘चटाक’ की आवाज के साथ हरिया का बायां गाल झनझना गया.

‘‘तेरी यह हिम्मत. तू… तू… मुझ पर हाथ उठाती है, अपने होने वाले पति पर… तू…’’ कहते हुए हरिया ने रमिया की बांह मरोड़ दी.

रमिया दर्द के मारे कराह उठी. आंखों में आंसू छलछला आए. अपनी बांह छुड़ाने की कोशिश में वह नाकाम रही. उस की मजबूरी पर हंसते हुए हरिया बोला, ‘‘हाथ थामा है तेरा… इतनी आसानी से यह नहीं छूटने वाला.’’

‘‘मैं तुझे अपना पति बनाऊंगी? कभी आईने में अपनी शक्ल देखी है तू ने. तुझ जैसे शराबी, जुआरी से शादी करने की बजाय मैं मरना पसंद करूंगी,’’ रमिया गुस्से से बोली.

‘‘शादी तो तेरी मुझ से ही होगी. लड़कपन में ही तेरी शादी मुझ से करा दी गई थी. बस, अब तो बरात ले कर आने की बात है. तू मेरी होगी. तेरी यह जवानी मेरी बांहों में…’’ नशे में बड़बड़ा उठा हरिया.

‘‘तुझ से शादी कर के मैं अपनी जिंदगी खराब नहीं करूंगी. मेरी जूती भी तुझ से शादी नहीं करेगी.’’

बेइज्जती की आग में हरिया झुलस उठा था. अपने साथियों के बीच उस की मंगेतर कोरा जवाब दे, इस बात ने उस के गुस्से को और भड़का दिया था, ‘‘देख लेना रमिया, तेरी शादी तो मुझ से ही होगी. आज ही बापू को तेरे घर भेजता हूं. देखता हूं, कब तक बचेगी मुझ से. तेरे सारे कसबल न निकाले तो मेरा नाम हरिया नहीं… समझी?’’

‘‘हुं…’’ रमिया पैर पटकते हुए वहां से चली गई.

रमिया बनवारी लाल की एकलौती बेटी थी. पिता ने रमिया का रिश्ता बचपन में ही अपने दोस्त किशन लाल के बेटे हरिया से कर दिया था. बनवारी ने रमिया को हायर सैकेंडरी पास करवा दी थी.

उधर हरिया पढ़लिख न सका था. बुरे दोस्तों की सोहबत और बाप के लाड़दुलार ने उसे जिद्दी, आवारा व शराबी, जुआरी बना दिया था. गांव की बहूबेटियों को छेड़ना उस के लिए मामूली सी बात थी, गांव वाले कभीकभार किशन लाल को टोकते, शिकायतें करते तो वह कहता, ‘‘जवानी का जोश है न बस, शादी हो जाएगी तो वह खुद ही सुधर जाएगा.’’

पर क्या कुत्ते की दुम कभी सीधी हुई है? सभी सोचते, हरिया नहीं सुधर सकता. पर कहने की हिम्मत किसी में नहीं थी. सभी हरिया और उस की चांडाल चौकड़ी से डरते थे. वे सोचते कि इस से जो ब्याह करेगी, उस की तो जिंदगी ही बरबाद हो जाएगी.

इस बात को बनवारी भी जानता था, पर अपने पैरों पर वह खुद ही कुल्हाड़ी मार चुका था. वह रमिया का बाल विवाह कर चुका था, वह भी अपने दोस्त के बेटे से. चाह कर भी वह इस रिश्ते को तोड़ नहीं सकता था.

शाम का वक्त था. किशन लाल बनवारी के पास आया. बनवारी चेहरे पर खुशामदी मुसकान लिए बोला, ‘‘कैसे आना हुआ किशन लाल?’’

‘‘बताता हूं… बताता हूं… पहले लस्सी तो पिला.’’

बनवारी समझ गया कि आज कुछ खास बात है. उस ने रमिया को लस्सी और मिठाई लाने को कहा.

‘‘यार, तुम्हारे लिए खुशखबरी है. अब तुम्हारी सारी चिंता दूर हो जाएगी,’’ पहेली सी बुझाते हुए किशन लाल के चेहरे पर एक खास चमक थी.

‘‘कैसी चिंता? मैं समझा नहीं… जरा खुल कर बताओ कि क्या बात है?’’ बनवारी जल्दीजल्दी बोला, जबकि वह समझ गया था कि किशन लाल क्या कहना चाहता है.

‘‘अरे, बुद्धू है यार तू भी… हरिया शादी के लिए मान गया है. मैं तारीख ले कर आया हूं. बेटी की जिम्मेदारियों से अब तू बेफिक्र हो जाएगा.’’

बनवारी का चेहरा बुझ गया. हरिया की हरकतों से वह अनजान नहीं था. क्या कहे, समझ ही नहीं पा रहा था. उस के बुझे चेहरे को देख कर किशन लाल बोला, ‘‘क्या बात है, तुम्हें खुशी नहीं हुई?’’

‘‘नहींनहीं, ऐसी बात नहीं है,’’ बनवारी लाल धीरे से बोला, ‘‘सोच रहा था कि रमिया इस रिश्ते के लिए…’’

किशन लाल के माथे पर बल पड़ गए, ‘‘रमिया की आड़ में कहीं तुम अपनी राय तो नहीं बता रहे?’’

बनवारी लाल किशन लाल की नाराजगी को भांप गया था. वह संभलते हुए बोला, ‘‘नहींनहीं, तुम मुझे गलत समझ रहे हो. मैं…’’ इस से आगे वह कुछ बोलता कि रमिया एक हाथ में लस्सी का बड़ा गिलास और एक हाथ में मिठाई की प्लेट ले कर आ गई.

‘‘नमस्ते चाचाजी,’’ रमिया ने कहा.

‘‘जीती रहो बेटी, कैसी हो?’’ आवाज को मुलायम रखते हुए किशन लाल बोला.

‘‘ठीक हूं चाचाजी.’’

‘‘लो बनवारी, बिटिया भी यहीं है… अब इसी से पूछ लेते हैं कि…?’’

बनवारी लाल अचानक घबरा गया और बोला, ‘‘क्या बेटी से यह सब पूछना अच्छा लगेगा?’’

‘‘क्यों, तुम्हीं तो कह रहे थे कि पता नहीं रमिया को यह रिश्ता पसंद है या नहीं?’’ किशन लाल ने चालाकी से बनवारी लाल की बात कह दी थी.

रमिया पलभर में ही सबकुछ समझ गई. वह अपने पिता के झुके चेहरे को देखती रह गई. फिर सोचते हुए बोली, ‘‘चाचाजी, मैं जानती हूं कि मुझे बड़ों के बीच नहीं बोलना चाहिए… पर जहां मेरी जिंदगी का फैसला होने जा रहा हो, तो मेरी राय को भी जानना चाहिए.’’

किशन लाल बोला, ‘‘तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘चाचाजी, शादी गुड्डेगुडि़यों का खेल नहीं हैं और बाल विवाह तो एकदम बेवकूफी है, ढकोसला है. आप मेरी शादी अपने बेटे से करना चाहते हैं, बाल विवाह की आड़ ले कर. मैं उस शराबी, जुआरी से शादी करने की बजाय मर जाना या कुंआरी रहना ज्यादा पसंद करूंगी.’’

‘‘अरे, तू चार जमात क्या पढ़ गई, खुद को अफलातून समझने लगी है. मानता हूं कि मेरा बेटा शराबी है, जुआरी है, पर बेटी, शादी के बाद वह सुधर भी तो सकता है.’’

‘‘और अगर वह न सुधरा तो?’’ रमिया उलट कर बोली.

‘‘तो… तो…?’’ किशन लाल को कुछ न सूझा. वह बगलें झांकने लगा.

‘‘तो आप के बेटे के साथसाथ मेरी जिंदगी भी खराब हो जाएगी,’’ रमिया बोली.

‘‘पर तुम्हारा बाल विवाह हुआ है, तुम अपने बाप के घर मेरे बेटे की अमानत हो,’’ किशन लाल ने आखिरी तीर चलाया.

‘‘बाल विवाह… हुं… एक घिसापिटा रिवाज. मैं ऐसे रिवाजों को नहीं मानती,’’ रमिया गुस्से से बोली.

‘‘देख बनवारी, अपनी बेटी को समझा, वरना बहुत बुरा होगा,’’ किशन लाल ने नीचता पर उतरते हुए धमकी दे डाली.

‘‘किशन लाल, हम वादे को निभाने के लिए पुराने रीतिरिवाजों की खातिर रमिया की जिंदगी से खिलवाड़ नहीं करेंगे,’’ बनवारी लाल बोला.

‘‘बनवारी,’’ किशन लाल चीख उठा, ‘‘देख लूंगा तुम दोनों को. अगर बिरादरी से मैं ने तुम्हारा हुक्कापानी बंद न करवा दिया, तो मेरा नाम किशन लाल नहीं. देख लेना, कल पंचायत बुलाऊंगा मैं. तुम ने मेरी दोस्ती देखी है, अब दुश्मनी देखना,’’ किसी भी तरह अपनी दाल न गलते देख किशन लाल नीचता पर उतर आया था.

फिर वही हुआ, जिस का बनवारी लाल को डर था. किशन लाल ने पंचायत बुलाई.

पंचायत ने अपना फैसला किशन लाल के हक में देते हुए कहा, ‘‘बनवारी लाल को अपनी बेटी रमिया की शादी हरिया से करनी होगी. अगर वह ऐसा नहीं करता तो उस का गांव में हुक्कापानी बंद. उसे अपना फैसला 24 घंटों में पंचायत को सुनाना होगा.’’

पंचायत उठ गई थी. पर बनवारी लाल का दिल बैठ गया. ठगा सा सोचता रह गया कि क्या करे और क्या न करे?

रमिया जानती थी, पंचायत का फैसला. लेकिन अभी पंचायत को उस के फैसले का पता नहीं था. पूरा गांव नींद की आगोश में डूबा था. बाहर घना अंधेरा फैला था. ऐसे में रमिया एक छोटी सी अटैची उठाए गांव से हमेशाहमेशा के लिए दूर जा रही थी. वह अपने पिता को घुटघुट कर मरते नहीं देख सकती थी. वह यह भी जानती थी कि उस के पिता कभी यह गांव नहीं?छोड़ेंगे, इसलिए उस ने गांव छोड़ कर खुद शहर जाने का फैसला कर लिया था.

जैसतैसे रमिया स्टेशन पहुंच गई. पर कहां जाए? कुछ सूझा नहीं. जैसे ही गाड़ी आई, वह सामने वाले डब्बे में चढ़ गई. वह पहले दर्जे का डब्बा था.

एक केबिन में घुस कर रमिया एक खाली सीट पर बैठ गई. अटैची उस ने एक तरफ रखी. खुली खिड़की से बाहर फैले अंधेरे को देखने लगी. गाड़ी चल पड़ी थी. गांव पीछे छूटता जा रहा था और वह अनजानी मंजिल की ओर चल पड़ी थी. पिता के बारे में सोच कर उस की आंखों में आंसू छलक आए थे.

रमिया को याद आया कि जब मां मरी थी तो पिताजी बहुत रोए थे. नन्ही रमिया को सीने से लगाए वह अकसर मां की बातें करते थे. बेटी की खातिर ही उन्होंने दूसरी शादी नहीं की थी. आज उन्हीं पिता को वह गांव में छोड़ आई थी, अकेला और बेसहारा.

सरला देवी उसी डब्बे में सफर कर रहीं थीं. जब से रमिया गाड़ी में चढ़ी थी, वह एकटक उस की हरकतें देख रही थीं. उन की आंखों से यह छिपा नहीं था कि लड़की घर से भागी है. काफी देर सोचने के बाद उन्होंने रमिया से पूछा, ‘‘क्या बात है बेटी, तुम रो क्यों रही हो?’’

भीगी पलकें ऊपर उठीं थीं. रमिया ने सरला देवी को पहली बार देखा. चेहरे पर तेज व चमक लिए एक अधेड़ औरत उस से अपनेपन से पूछ रही थी, ‘‘घर से भागी हो क्या?’’

रमिया चुप रही. सिर झुकाए, कुछ सोचती रही.

‘‘देखो बेटी, मुझे गलत मत समझना. मेरा नाम सरला है. ‘नारी मुक्ति संगठन,’ दिल्ली की मुखिया हूं. अगर तुम्हें कोई परेशानी है तो मुझे बताओ. कहीं तुम हीरोइन बनने के चक्कर में…?’’

‘‘नहींनहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो… मैं…’’ और फिर अंदर की दुखभरी कहानी आंसुओं के संग बहती चली गई. अपनी हर बात उस ने बताई.

‘‘तुम ने ठीक किया बेटी, औरत को अपनी मरजी से फैसले लेने का हक मिलना ही चाहिए. मैं तुम्हारी मदद करूंगी. क्या तुम बालिग हो?’’ सरला देवी ने पूछा.

‘‘जी हां, मैं 19वें साल में हूं.’’

‘‘देखो बेटी, तुम्हारी अभी कोई मंजिल नहीं है. तुम हायर सैकेंडरी पास हो… तुम मेरे पास रह कर कंप्यूटर वगैरह सीख सकती हो. नर्स का कोर्स भी कर सकती हो… आगे अपनी पढ़ाई भी जारी रख सकती हो.’’

सरला देवी के शब्दों ने रमिया को राहत पहुंचाई. उसे लगा कि घर से भाग कर उस ने कोई गलती नहीं की.
सरला देवी की छत्रछाया में 5 साल पंख लगा कर कब उड़ गए, पता ही नहीं चला. इस दौरान रमिया, ‘रमा’ बन चुकी थी. उस ने बीए पास कर लिया था और नर्स का कोर्स भी कर लिया था.

इस दौरान वह अपने पिता को खो चुकी थी. बनवारी लाल ने खुदकुशी कर ली थी. यह सुन कर वह बेहद दुखी हुई थी. पर समय ने उस के इन घावों पर मरहम लगा दिया था.

अब रमा सरकारी अस्पताल में नर्स का काम करती थी. उस के साथ डाक्टर थे, प्रभाकर, बेहद सुलझे हुए, सुंदर और लायक आदमी. वह रमा को चाहने लगे थे. पर अपने प्यार की बात वह होंठों तक न ला पाए थे. इस बात को रमा भी जानती थी.

एक दिन प्रभाकर ने अपनी दिल की बात रमा को कह देने का फैसला कर लिया था. वह बोले, ‘‘रमा, शाम को क्या कर रही हो?’’

‘‘कुछ खास नहीं.’’

‘‘ठीक है, आज घूमने चलेंगे.’’

‘‘ठीक है,’’ रमा ने हौले से कहा.

शाम को डाक्टर प्रभाकर अपनी कार में रमा के साथ घूमने निकल पड़े. एक बाग में वे काफी देर तक चहलकदमी करते रहे कि अचानक प्रभाकर बोले, ‘‘रमा, मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

रमा एकदम चौंक उठी, ‘‘डाक्टर साहब, आप… आप क्या कह रहे हैं? कहां आप और कहां मैं… एक मामूली सी नर्स.’’

‘‘मैं किसी नर्स से नहीं, तुम से शादी की बात कर रहा हूं,’’ मुसकरा कर प्रभाकर बोले.

‘‘लेकिन… आप मेरे बारे में कुछ भी नहीं जानते. मैं कौन हूं… किस जात की हूं?’’

‘‘मैं तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानना चाहता. तुम एक सुंदर और सुशील लड़की हो. मेरे लिए इतना ही बहुत है. हां, यह बात और है कि शायद तुम मुझे पसंद न करती हो?’’

‘‘नहीं डाक्टर साहब, आप से जो भी लड़की शादी करेगी, उस की जिंदगी तो खुशहाल हो जाएगी.’’

‘‘तो वह लड़की तुम क्यों नहीं बन जाती?’’ प्रभाकर बोले.

‘‘एक शर्त पर… आप को मेरे बारे में जानना होगा?’’ रमा ने कहा.

‘‘ठीक है आओ, होटल में चलते हैं. तुम जो बताना चाहो, वहां बता देना. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा,’’ प्रभाकर हंस कर बोले, मानो उन्हें मंजिल मिल गई हो.

होटल में रमा ने अपनी जिंदगी की किताब प्रभाकर के सामने खोल कर रख दी.

प्रभाकर चुपचाप सुनते रहे, फिर वे बोले, ‘‘बस, तुम ने बहुत अच्छा किया. लड़कपन में की गई शादी तो एक बेहूदा रिवाज है. तुम ने जो कदम उठाया, मैं उस की कद्र करता हूं.

‘‘आज जमाना बदल चुका है. पता नहीं लोग अब भी क्यों उन्हीं घिसेपिटे, मरे, सड़े सांपों को रीतिरिवाजों का नाम दे कर गले से लिपटाए हैं… तुम ने बहुत अच्छा किया रमा. अपने लिए खुद रास्ता तलाश किया.

अब तो दुनिया की कोई ताकत मुझे तुम से शादी करने से नहीं रोक सकती, क्योंकि अब तो तुम ही मेरी दुनिया हो, मेरी जिंदगी हो.’’

जब वे होटल से बाहर निकल रहे थे, तो दोनों के हाथ एकदूसरे के हाथों में थे. Family Story In Hindi

Hindi Family Story: किराए की कोख – सुनीता ने कैसे दी ममता को खुशी

Hindi Family Story: पूरे महल्ले में सब से खराब माली हालत महेंद्र की ही थी. इस शहर से कोसों दूर एक गांव से 2 साल पहले ही महेंद्र अपनी बीवी सुनीता और 2 बच्चों के साथ इस जगह आ कर बसा था. वह गरीबी दूर करने के लिए गांव से शहर आया था, लेकिन यहां तो उन का खानापीना भी ठीक से नहीं हो पाता था.

महेंद्र एक फैक्टरी में काम करता था और सुनीता घर पर रह कर बच्चों की देखभाल करती थी. बड़ा बेटा 5 साल से ऊपर का हो गया था, लेकिन अभी स्कूल जाना शुरू नहीं हो पाया था.

सुनीता काफी सोचती थी कि बच्चे को किसी अगलबगल के छोटे स्कूल में पढ़ने भेजने लगे, लेकिन चाह कर भी न भेज सकती थी. जिस महल्ले में सुनीता रहती थी, उस महल्ले में सब मजदूर और कामगार लोग ही रहते थे. ठीक बगल के मकान में रहने वाली एक औरत के साथ सुनीता का उठनाबैठना था.

जब उस को सुनीता की मजबूरी पता लगी, तो उस ने सुनीता को खुद भी काम करने की सलाह दे डाली. उस ने एक घर में उस के लिए काम भी ढूंढ़ दिया.

सुनीता ने जब यह बात महेंद्र को बताई, तो वह थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन सुनीता का सोचना ठीक था, इसलिए वह कुछ कह नहीं सका. सुनीता उस औरत द्वारा बताए गए घर में काम करने जाने लगी. वह काफी बड़ा घर था. घर में केवल 2 लोग ममता और रमन पतिपत्नी ही थे, जो किसी बड़ी कंपनी में काम करते थे.

दोनों का स्वभाव सुनीता के प्रति बहुत नरम था. ममता तो आएदिन सुनीता को तनख्वाह के अलावा भी कुछ न कुछ चीजें देती ही रहती थी. रमन और ममता के पास किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, लेकिन घर में एक भी बच्चा नहीं था.

रविवार के दिन ममता और रमन छुट्टी पर थे. काम खत्म कर सुनीता जाने को हुई, तो ममता ने उसे बुला कर अपने पास बिठा लिया. वह सुनीता से उस के परिवार के बारे में पूछती रही. सुनीता को ममता की बातों में बड़ा अपनापन लगा, तो वह अचानक ही उस से पूछ बैठी, ‘‘जीजी, आप के कोई बच्चा नहीं हुआ क्या?’’

ममता ने मुसकरा कर सुनीता की तरफ देखा और धीरे से बोली, ‘‘नहीं, लेकिन तुम यह क्यों पूछ रही हो?’’ सुनीता ने ममता की आवाज को भांप लिया था. वह बोली, ‘‘बस जीजी, ऐसे ही पूछ रही थी. घर में कोई बच्चा न हो, तो अच्छा नहीं लगता न. शायद आप को ऐसा महसूस होता हो.’’

ममता की आंखें उसी पर टिक गई थीं. वह भी शायद इस बात को शिद्दत से महसूस कर रही थी.

ममता बोली, ‘‘तुम सही कहती हो सुनीता. मैं भी इस बात को ले कर चिंता में रहती हूं, लेकिन कर भी क्या सकती हूं? मैं मां नहीं बन सकती, ऐसा डाक्टर कहते हैं…’’

यह कहतेकहते ममता का गला भर्रा गया था. सुनीता भी आगे कुछ कहने की हिम्मत न कर सकी थी. उस के पास शायद इस बात का कोई हल नहीं था.

ममता और रमन शादी से पहले एक ही कंपनी में काम करते थे, जहां दोनों में मुहब्बत हुई और उस के बाद दोनों ने शादी कर ली. कई साल तक दोनों ने बच्चा पैदा नहीं होने दिया, लेकिन बाद में ममता मां बनने के काबिल ही न रही. इस बात को ले कर दोनों परेशान थे.

सुनीता को ममता के घर काम करते हुए काफी दिन हो गए थे. ममता का मन जब भी होता, वह सुनीता को अपने पास बिठा कर बातें कर लेती थी. पर अब सुनीता ममता से बच्चा न होने या होने को ले कर कोई बात नहीं करती थी. दिन ऐसे ही गुजर रहे थे. एक दिन ममता ने सुनीता को आवाज दी और उसे साथ ले कर अपने कमरे में पहुंच गई. उस ने सुनीता को अपने पास ही बिठा लिया.

सुनीता अपनी मालकिन ममता के बराबर में बैठने से हिचकती थी, लेकिन ममता ने उसे हाथ पकड़ कर जबरदस्ती बिठा ही लिया.

ममता ने सुनीता का हाथ अपने हाथ में लिया और बोली, ‘‘सुनीता, तुम से एक काम आ पड़ा है, अगर तुम कर सको तो कहूं?’’

ममता के लिए सुनीता के दिल में बहुत इज्जत थी, भला वह उस के किसी काम के लिए क्यों मना कर देती. वह बोली, ‘‘जीजी, कैसी बात करती हो? आप कहो तो सही, न करूं तो कहना.’’

ममता ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, ‘‘सुनीता, डाक्टर कहता है कि मैं मां तो बन सकती हूं, लेकिन इस के लिए मुझे किसी दूसरी औरत का सहारा लेना पड़ेगा… अगर तुम चाहो, तो इस काम में मेरी मदद कर सकती हो.’’

ममता की बात सुन कर सुनीता का मुंह खुला का खुला रह गया. उस को यकीन न होता था कि ममता उस से इतने बड़े व्यभिचार के बारे में कह सकती है.

सुनीता साफ मना करते हुए बोली, ‘‘जीजी, मैं बेशक गरीब हूं, लेकिन अपने पति के होते किसी मर्द की परछाईं तक को न छुऊंगी. आप इस काम के लिए किसी और को देख लो.’’

ममता हैरत से बोली, ‘‘अरे बावली, तुम से पराया मर्द छूने को कौन कहता है… यह सब वैसा नहीं है, जैसा तुम सोच रही हो. इस में सिर्फ लेडी डाक्टर के अलावा तुम्हें कोई नहीं छुएगा. यह समझो कि तुम सिर्फ अपनी कोख में बच्चे को पालोगी, जबकि सबकुछ मैं और मेरे पति करेंगे.’’

सुनीता की समझ में कुछ न आया था. सोचा कि भला ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी औरत को छुए भी नहीं और वह मां बन जाए.

सुनीता को हैरान देख कर ममता बोल पड़ी, ‘‘क्या सोच रही हो सुनीता? तुम चाहो तो मैं सीधे डाक्टर से भी बात करा सकती हूं. जब तुम पूरी तरह संतुष्ट हो जाओ, तब ही तैयार होना.’’

सुनीता हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘जीजी, मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूं… अगर मैं तैयार हो भी जाऊं, तो मेरे पति इस बात के लिए नहीं मानेंगे.’’

ममता हार नहीं मानना चाहती थी. आखिर उस के मन में न जाने कब से मां बनने की चाहत पल रही थी. वह बोली, ‘‘तुम इस बात की चिंता बिलकुल मत करो. मैं खुद घर आ कर तुम्हारे पति से बात करूंगी और इस काम के लिए तुम्हें इतना पैसा दूंगी कि तुम 2 साल भी काम करोगी, तब भी कमा नहीं पाओगी.’’ सुनीता यह सब तो नहीं चाहती थी, लेकिन ममता से मना करने का मन भी नहीं हो रहा था.

काम से लौटने के बाद सुनीता ने अपने पति से सारी बात कह दी. महेंद्र इस बात को सिरे से खारिज करता हुआ बोला, ‘‘नहीं, कोई जरूरत नहीं है इन लोगों की बातों में आने की. कल से काम पर भी मत जाना ऐसे लोगों के यहां. ये अमीर लोग होते ही ऐसे हैं.

‘‘मैं तो पहले ही तुम्हें मना करने वाला था, लेकिन तुम ने जिद की तो कुछ न कह सका.’’

सुनीता को ऐसा नहीं लगता था कि ममता दूसरे अमीर लोगों की तरह है. वह उस के स्वभाव को पहले भी परख चुकी थी. वह बोली, ‘‘नहीं, मैं यह बात नहीं मान सकती. ऐसी मालकिन मिलना आज के समय में बहुत मुश्किल काम है. आप उन को सब लोगों की लाइन में खड़ा मत करो.’’ महेंद्र कुछ कहता, उस से पहले ही कमरे के दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई, फिर दरवाजा बजाया गया.

सुनीता को ममता के आने का एहसास था. उस ने झट से उठ कर दरवाजा खोला, तो देखा कि सामने ममता खड़ी थी.

सुनीता के हाथपैर फूल गए, खुशी के मारे मुंह से बात न निकली, वह अभी पागलों की तरह ममता को देख ही रही थी कि ममता मुसकराते हुए बोल पड़ी, ‘‘अंदर नहीं बुलाओगी सुनीता?’’ सुनीता तो जैसे नींद से जागी थी.

वह हड़बड़ा कर बोली, ‘‘हांहां जीजी, आओ…’’ यह कहते हुए वह दरवाजे से एक तरफ हटी और महेंद्र से बोली, ‘‘देखोजी, अपने घर आज कौन आया है… ये जीजी हैं, जिन के घर पर मैं काम करने जाती हूं.’’

महेंद्र ने ममता को पहले कभी देखा तो नहीं था, लेकिन अमीर पहनावे और शक्लसूरत को देख कर उसे समझते देर न लगी. उस ने ममता से दुआसलाम की और उठ कर बाहर चल दिया.

ममता ने उसे जाते देखा, तो बोल पड़ी, ‘‘भैया, आप कहां चल दिए? क्या मेरा आना आप को अच्छा नहीं लगा?’’

महेंद्र यह बात सुन कर हड़बड़ा गया. वह बोला, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो इसलिए जा रहा था कि आप दोनों आराम से बात कर सको.’’

ममता हंसते हुए बोली, ‘‘लेकिन भैया, मैं तो आप से ही बात करने आई हूं. आप भी हमारे साथ बैठो न.’’

महेंद्र न चाहते हुए भी बैठ गया. ममता का इतना मीठा लहजा देख वह उस का मुरीद हो गया था. उस के दिमाग में अमीरों को ले कर जो सोच थी, वह जाती रही.

सुनीता सामने खड़ी ममता को वहीं बिछी एक चारपाई पर बैठने का इशारा करते हुए बोली, ‘‘जीजी, मेरे घर में तो आप को बिठाने के लिए ठीक जगह भी नहीं, आप को आज इस चारपाई पर ही बैठना पड़ेगा.’’

ममता मुसकराते हुए बोली, ‘‘सुनीता, प्यार और आदर से बड़ा कोई सम्मान नहीं होता, फिर क्या चारपाई और क्या बैड. आज तो मैं तुम्हारे साथ जमीन पर ही बैठूंगी.’’

इतना कह कर ममता जमीन पर पड़ी एक टाट की बोरी पर ही बैठ गई.

सुनीता ने लाख कहा, लेकिन ममता चारपाई पर न बैठी. हार मान कर सुनीता और महेंद्र भी जमीन पर ही बैठ गए. सुनीता ने नजर तिरछी कर महेंद्र को देखा, फिर इशारों में बोली, ‘‘देख लो, तुम कहते थे कि हर अमीर एकजैसा होता है. अब देख लिया.’’

महेंद्र से आदमी पहचानने में गलती हुई थी. तभी ममता अचानक बोल पड़ी, ‘‘सुनीता, क्या तुम मुझे चाय नहीं पिलाओगी अपने घर की?’’

सुनीता के साथसाथ महेंद्र भी खुश हो गया. एक करोड़पति औरत गरीब के घर आ कर जमीन पर बैठ चाय पिलाने की गुजारिश कर रही थी.

सुनीता तो यह सोच कर चाय न बनाती थी कि ममता उस के घर की चाय पीना नहीं चाहेंगी. जब खुद ममता ने कहा, तो वह खुशी से पागल हो उठी, महेंद्र और सुनीता की इस वक्त ऐसी हालत थी कि ममता इन दोनों से इन की जान भी मांग लेती, तो भी ये लोग मना न करते.

चाय बनी, तो सब लोग चाय पीने लगे. इतने में सुनीता का छोटा बेटा जाग गया. ममता ने उसे देखा तो खुशी से गोद में उठा लिया और उस से बातें करने में मशगूल हो गई.

महेंद्र और सुनीता यह सब देख कर बावले हुए जा रहे थे. उन्हें ममता में एक अमीर औरत की जगह अपने घर की कोई औरत नजर आ रही थी.

थोड़ी देर बाद ममता ने बच्चे को सुनीता के हाथों में दे दिया और महेंद्र की तरफ देख कर बोली, ‘‘भैया, मैं कुछ बात करने आई थी आप से. वैसे, सुनीता ने आप को सबकुछ बता दिया होगा.

‘‘भैया, मैं आप को यकीन दिलाती हूं कि सुनीता को सिर्फ लेडी डाक्टर के अलावा कोई और नहीं छुएगा. यह इस तरह होगा, जैसे कोयल अपने अंडे कौए के घोंसले में रख देती है और बच्चे अंडों से निकल कर फिर से कोयल के हो जाते हैं, अगर आप…’’

महेंद्र ममता की बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़ा, ‘‘बहनजी, आप जैसा ठीक समझें वैसा करें. जब सुनीता को आप अपना समझती हैं, तो फिर मुझे किसी बात से कोई डर नहीं. इस का बुरा थोड़े ही न सोचेंगी आप.’’

ममता खुशी से उछल पड़ी. सुनीता महेंद्र को मुंह फाड़े देखे जा रही थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि महेंद्र इतनी जल्दी हां कह सकता है. लेकिन महेंद्र तो इस वक्त किसी और ही फिजा में घूम रहा था. कोई करोड़पति औरत उस के घर आ कर झोली फैला कर उस से कुछ मांग रही थी, फिर भला वह कैसे मना कर देता.

ममता हाथ जोड़ कर महेंद्र से बोली, ‘‘भैया, मैं आप का यह एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी,’’ यह कहते हुए ममता ने अपने मिनी बैग से नोटों की एक बड़ी सी गड्डी निकाल कर सुनीता के हाथों में पकड़ा दी और बोली, ‘‘सुनीता, ये पैसे रख लो. अभी और दूंगी. जो इस वक्त मेरे पास थे, वे मैं ले आई.’’

सुनीता ने हाथ में पकड़े नोटों की तरफ देखा और फिर महेंद्र की तरफ देखा. महेंद्र पहले से ही सुनीता के हाथ में रखे नोटों को देख रहा था.

आज से पहले इन दोनों ने कभी इतने रुपए नहीं देखे थे, लेकिन महेंद्र कम से कम ममता से रुपए नहीं लेना चाहता था, वह बोला, ‘‘बहनजी, ये रुपए हम लोग नहीं ले सकते. जब आप हमें इतना मानती हैं, तो ये रुपए किस बात के लिए?’’

ममता ने सधा हुआ जवाब दिया, ‘‘नहीं भैया, ये तो आप को लेने ही पड़ेंगे. भला कोई और यह काम करता, तो वह भी तो रुपए लेता, फिर आप को क्यों न दूं?

‘‘और ये रुपए दे कर मैं कोई एहसान थोड़े ही न कर रही हूं.’’

इस के बाद ममता वहां से चली गई. महेंद्र ने ममता के जाने के बाद रुपए गिने. पूरे एक लाख रुपए थे. महेंद्र और सुनीता दोनों ही आज ममता के अच्छे बरताव से बहुत खुश थे. ऊपर से वे एक लाख रुपए भी दे गईं. ये इतने रुपए थे कि 2 साल तक दोनों काम करते, तो भी इतना पैसा जोड़ न पाते.

दोनों के अंदर आज एक नया जोश था. अब न किसी बात से एतराज था और न किसी बात पर कोई सवाल.

जल्द ही सुनीता को ममता ने डाक्टर के पास ले जा कर सारा काम निबटवा दिया. वह सुनीता के साथ उस के पति महेंद्र को भी ले गई थी, जिस से उस के मन में कोई शक न रहे.

ममता ने अब सुनीता से घर का काम कराना बंद कर दिया था. घर के काम के लिए उस ने एक दूसरी औरत को रख लिया था. सुनीता को खाने के लिए ममता ने मेवा से ले कर हर जरूरी चीज अपने पैसों से ला कर दे दी थी. साथ ही, एक लाख रुपए और भी नकद दे दिए थे.

ममता नियमित रूप से सुनीता को देखने भी आती थी. उस ने महेंद्र और सुनीता से उस के घर चल कर रहने के लिए भी कहा था, लेकिन महेंद्र ने वहां रहने के बजाय अपने घर में ही रहना ठीक समझा.

जिस समय सुनीता अपने पेट में बच्चे को महसूस करने लगी थी, तब से न जाने क्यों उसे वह अपना लगने लगा था. वह उसे सबकुछ जानते हुए भी अपना मान बैठी थी.

जब बच्चा होने को था, तब एक हफ्ता पहले ही सुनीता को अस्पताल में भरती करा दिया गया था. जिस दिन बच्चा हुआ, उस दिन तो ममता सुनीता को छोड़ कर कहीं गई ही न थी. सुनीता को बेटा हुआ था.

ममता ने सुनीता को खुशी से चूम लिया था. उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. लेकिन सुनीता को मन में अजीब सा लग रहा था. उस का मन उस बच्चे को अपना मान रहा था.

अस्पताल से निकलने के बाद ममता ने सुनीता को कुछ दिन अपने पास भी रखा था. उस के बाद उस ने सुनीता को और 50 हजार रुपए भी दिए. सुनीता अपने घर आ गई, लेकिन उस का मन न लगता था. जो बच्चा उस ने अपनी कोख में 9 महीने रखा, आज वह किसी और का हो चुका था. पैसा तो मिला था, लेकिन बच्चा चला गया था.

सुनीता का मन होता था कि बच्चा फिर से उस के पास आ जाए, लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता था. उस की कोख किसी और के बच्चे के लिए किराए पर जो थी. Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: क्षमादान – अदिति और रवि के बीच कैसे पैदा हुई दरार

Hindi Romantic Story: रवि 3 महीने से दीवाली पर बोनस और प्रमोशन की आस लगाए बैठा था. 2 साल की कड़ी मेहनत, कम छुट्टियां और ओवर टाइम से उस ने अपने बौस का दिल जीत लिया था. वह अपने बौस मिस्टर राकेश का फेवरेट एंप्लोई बन चुका था. उस ने सोचा था कि इस बार दीवाली पर एक महीने की लंबी छुट्टी ले कर मम्मीपापा के साथ रहेगा. मम्मी पिछले साल से ही उस की शादी की कोशिश में जुटी थीं.

अपने साथ काम करने वाले मुकेश को कई बार वह अपनी छुट्टियों की प्लानिंग बता चुका था. उस के सारे सहकर्मियों को भरोसा था कि उसे अब की बार दीवाली पर बोनस के साथसाथ प्रमोशन भी मिलेगा. मिस्टर राकेश ने प्रमोशन की लिस्ट में रवि का नाम सब से ऊपर लिखा हुआ था और उसे वे कई बार बता भी चुके थे. हालांकि हैड औफिस से फाइनल लिस्ट आनी बाकी थी.

सप्ताह का पहला दिन था. रवि अपने सहकर्मियों को गुड मौर्निंग कहता हुआ अपने कैबिन में जा रहा था, तभी चपरासी गुड्डू रवि से बोला, ‘‘रवि साहब, आप को बौस ने बुलाया है.’’

‘‘मुझे,’’ रवि के मुंह से अचानक निकला था.

पास के कैबिन में बैठा मुकेश रवि की तरफ ही देख रहा था. उस का सवाल सुन कर वह बताने लगा, ‘‘अरे रवि, तुम्हें पता चला हमारे बौस राकेश साहब की मदर की तबीयत ज्यादा खराब है. इसलिए वे छुट्टी पर चले गए हैं.’’

‘‘अच्छा, कब तक के लिए,’’ रवि के चेहरे पर थोड़ी परेशानी झलक रही थी और सहानुभूति भी. परेशानी खुद की छुट्टी को ले कर थी. वह सोच रहा था कि अगर बौस छुटट्ी पर चले गए हैं तो उस की छुट्टी की कौन मंजूरी देगा और सहानुभूति अपने बौस के लिए थी.

‘‘यार, फिलहाल तो उन्होंने एक हफ्ते की ऐप्लिकेशन दी है, लेकिन कुछ नहीं कह सकते कि वे कब तक लौटेंगे,’’ मुकेश ने बताया.

रवि के चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह अपनी छुट्टियां को ले कर संशय में था. अब जब उस के बौस छुट्टी पर थे, तो उसे पता नहीं ज्यादा दिन की छुट्टी मिल सकेगी या नहीं.

मुकेश ने उस के चेहरे के भावों को भांपते हुए कहा, ‘‘तू फिक्र मत कर, तुझे छुट्टी तो मिल ही जाएगी. 2 साल से लगातार हार्डवर्क जो कर रहा है तू.’’

रवि इस पर मुसकरा दिया. फिर धीमे से बोला, ‘‘फिर यह नया बौस कौन है, जो मुझे बुला रहा है?’’

‘‘कोई नई मैडम राकेश सर की जगह टैंपरेरी अपौइंट हुई हैं. सुना है मुंबई से हैं,’’ मुकेश ने बताया और बोला, ‘‘तू मिल ले जा कर, औफिस का वर्क इंट्रोड्यूस करवाने के लिए बुलवा रही होंगी तुझे.’’

‘‘चल, फिर मैं उन से मिल कर आता हूं,’’ रवि के चेहरे पर अब थोड़ी राहत झलक रही थी.

मुकेश की इस बात से उसे राहत पहुंची थी कि 2 साल से वह हार्डवर्क कर रहा था. कंपनी के पास उस की छुट्टी कैंसिल करने की कोई वजह भी नहीं थी.

ये सब सोचतेसोचते रवि बौस के रूम का दरवाजा खोल कर अंदर चला गया.

‘‘प्लीज, मे आई कम इन मैम,’’ रवि कैबिन के दरवाजे को आधा खोल कर धीरे से बोला.

‘‘कम इन,’’ मैडम किसी फाइल को सिर झुका कर देख रही थीं.

रवि चुपचाप उन की टेबल के सामने जा कर खड़ा हो गया.

मैडम ने अचानक अपना सिर उठाया और शायद ‘सिट डाउन, प्लीज’ कहने ही वाली थीं कि रुक गईं.

रवि भी अपनी जगह बस खड़े का खड़ा ही रह गया. उसे इस बात की बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि वह उसे आज यहां अचानक इस तरह मिलेगी. वह अदिति थी. कालेज की पुरानी दोस्त नहीं, कालेज के दिनों की रवि की एकमात्र दुश्मन. दोनों ने कभी एकदूसरे से कालेज में बात भी नहीं की थी, लेकिन उन का झगड़ा फेसबुक चैटिंग पर पहले हो चुका था.

रवि का कालेज में पहला साल था. वह पढ़ाकू किस्म का लड़का था. उन दिनों वह अदिति की तरफ आकर्षित हो गया था, लेकिन उसे उस से बात करने में न जाने क्यों बहुत ज्यादा झिझक महसूस होती थी. अदिति अच्छी होस्ट होने के साथसाथ कविताएं लिखती और सुनाती भी थी. ऐसी कई बातों ने रवि को प्रभावित कर दिया था. लेकिन रवि चुप रहने वाला लड़का था. वह अदिति से बात करना तो चाहता था, पर कर नहीं पाता था.

2 सैमेस्टर पूरे होने के बाद रवि के कालेज में कुछ दिनों के लिए छुट्टियां हो गई थीं.

तभी एकाएक उसे फेसबुक जैसे माध्यम का साथ मिल गया. उस ने इंटरनैट पर फेसबुक आईडी बना ली और अदिति को फ्रैंड रिक्वैस्ट भेज दी. अदिति ने उसे ऐक्सैप्ट भी कर लिया. अब जैसे रवि को नया आसमान मिल गया था, थोड़ाबहुत जो भी लिख लिया करता था, फेसबुक पर पोस्ट करता, उस के क्लासमेट्स भी अब उसे नोटिस करने लगे थे. फिर वह एकाएक अदिति को अकसर उस की कविताओं की तारीफ लिख कर भेजा करता, उस की तसवीरों पर कमैंट कर दिया करता. बदले में अदिति भी रिप्लाई करती थी.

एक दिन उस ने अदिति की एक तसवीर देखी और उस पर उसे कुछ पंक्तियां लिखने का मन हुआ. उस दिन उस ने कमैंट में अपनी वे पंक्तियां न लिख कर अदिति की उस तसवीर को डाउनलोड कर अपनी टाइमलाइन से उन पंक्तियों के साथ अपलोड कर दिया और अदिति की टाइमलाइन पर वह तसवीर टैग के जरिए भेज दी. यह सब देखते ही अदिति ने रवि को मैसेज किया ‘अपलोड करने से पहले पूछ तो लेते.’

रवि ने रिप्लाई किया, ‘जी, सौरी. आप को बुरा लगा हो तो मैं उस तसवीर को हटा देता हूं.’

रवि फेसबुक का नौसिखिया संचालक था. उसे मालूम नहीं था कि उस फोटो को पूरी तरह से हटाने के लिए उसे डिलीट के औप्शन पर जाना होगा. उस ने सामने दिख रहे ‘रिमूव’ के औप्शन से उस तसवीर को अपने प्रोफाइल से हटा लिया और सोचने लगा कि तसवीर पूरी तरह से हट चुकी है.

थोड़ी देर बाद अदिति का फिर मैसेज आया, ‘फोटो अभी तक हटा क्यों नहीं?’

रवि तो समझ रहा था कि वह हट चुका है, इसलिए रिप्लाई किया, ‘हटा तो दिया है.’

अदिति का इस बार थोड़ा तीखा रिप्लाई आया, ‘अपने मोबाइल अपलोड में देख.’

रवि ‘मोबाइल अपलोड’ नाम की बला को उस समय जानता ही नहीं था. उस ने फिर रिप्लाई किया, ‘कहां?’

‘मोबाइल अपलोड में देख,’ अदिति का रिप्लाई अब सख्त लग रहा था.

‘ओके,’ रवि ने नपातुला जवाब दिया.

उसे हलका सा धक्का लगा था. उसे अदिति के ‘अपने अपलोड में देख’ जैसे शब्दों से ठेस पहुंची थी, क्योंकि अब तक उन दोनों की बातचीत में हर जगह ‘आप देखिए’ जैसे शब्द ही शामिल थे.

रवि ने जैसेतैसे ‘मोबाइल अपलोड’ ढूंढ़ा. अब वह उस तसवीर पर गया, लेकिन वहां भी उसे डिलीट का औप्शन नहीं दिख रहा था.

तब तक अदिति का एक और तीखा रिप्लाई आ चुका था, ‘फोटो अभी तक नहीं हटा.’

फिर एक बार अदिति ने मैसेज किया, ‘मिस्टर, क्या चल रहा है यह सब?’

रवि ने रिप्लाई किया, ‘कुछ टैक्निकल प्रौब्लम आ रही है. साइबर कैफे जा कर जल्दी ही उस मनहूस फोटो को हटाता हूं.’

रवि अब थोड़ा झुंझला सा गया था. उसे अदिति का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा था.

‘मनहूस…’ इस के आगे कुछ अपशब्द थे अदिति के रिप्लाई में.

अब रवि ने सब से पहले साइबर कैफे में एक व्यक्ति से पूछ कर उस फोटो को डिलीट किया. फिर अदिति को मैसेज किया, ‘आप का वह फोटो डिलीट हो चुका है. एक बात कहूंगा कि वह मेरी गलती थी, पर आप को यों ‘तू तड़ाक’ से तो पेश नहीं आना चाहिए.’

अब बात गरमा गई थी. धीरेधीरे रिप्लाई में भयंकर झगड़ा हो गया और फिर रवि जिस एकमात्र लड़की को अपनी क्लास में पसंद करता था, उस की फेसबुक फ्रैंड लिस्ट से बाहर हो चुका था.

आखिर में रवि ने थोड़ा सोचा और एक लंबा सौरी मैसेज भेज दिया लेकिन तब तक वह अदिति की फ्रैंड लिस्ट से बाहर हो चुका था.

छुट्टियों के बाद जब कालेज खुला, तो कालेज में बातें चल रही थीं कि रवि ने अदिति को प्रपोज किया था. रवि ने चुपचाप सब सुन लिया लेकिन इस बारे में कोई रिप्लाई नहीं किया.

वह जैसे अपनी ही नजरों में गिरता जा रहा था. अदिति ने ही शायद कालेज में यह बात फैलाई थी. फेसबुक से हुई एक गलती ने उसे संजीदा छात्रों की फेहरिस्त से बाहर कर दिया था और हर ओर कुछ महीने तक उस की हंसी उड़ाई गई थी.

एक दिन क्लास में उस के पीछे की सीट पर बैठ कर अदिति ने उस के दोस्तों के साथ मिल कर अप्रत्यक्ष रूप से रवि पर कई कटाक्ष कर दिए थे. वह उस की हंसी उड़ा रही थी, पर रवि कुछ नहीं बोला. वह अब तक खुद की ही गलती मान रहा था, लेकिन उस दिन से उस

ने अदिति से नफरत करना शुरू कर दिया था. अब अदिति को भी उस ने अपनी फ्रैंडलिस्ट से हटा दिया था और एकएक कर अदिति के दोस्त भी ब्लौक होते चले गए.

फिर न उस की अदिति से सामने कभी बात हुई और न ही फेसबुक पर, आज इतने साल बाद फिर वह उस के सामने थी और अब उस की बौस थी.

दोनों लगभग 10 मिनट तक स्तब्ध हो कर एकदूसरे को देख रहे थे. अदिति ने अपना चश्मा ठीक करते हुए कहा, ‘‘सिट डाउन, प्लीज.’’

रवि चुपचाप बैठ गया. 5 मिनट तक कैबिन में खामोशी छाई रही. अदिति अभी फिर से अपनी फाइल में उलझ गई थी या शायद नाटक कर रही थी.

फिर नजरें उठा कर बोली, ‘‘रवि, मुझे कल तक इस औफिस की सभी जरूरी फाइलें दे दो.’’

‘‘जी मैम,’’ रवि ने धीमे से कहा. उस की नजरें झुकी हुई थीं.

‘‘ओके, आप जा सकते हैं,’’ अदिति ने कहा, इस बार उस की नजरें भी झुकी हुई थीं.

रवि कैबिन से बाहर आ गया था लेकिन अपने अतीत से नहीं.

उस रात उसे नींद नहीं आ रही थी. गुजरे हुए कल में जो हुआ था उसे तो वह नजरअंदाज कर चुका था, लेकिन अब उस से उस की वर्तमान जिंदगी प्रभावित होती दिख रही थी.

रवि को फिक्र सता रही थी कि उस की छुट्टियां अदिति अस्वीकृत न कर दे. वह लंबे समय से छुट्टियों का इंतजार कर रहा था और अब अदिति के रहते उसे छुट्टी मिलना मुश्किल लगने लगा था. उसे लग रहा था कि अदिति उस से पुरानी दुश्मनी जरूर निकालेगी.

अगले दिन वह परेशान सा औफिस पहुंचा. चपरासी ने पिछले दिन की तरह ही उसे आज फिर बताया कि बौस यानी अदिति ने उसे कैबिन में बुलाया है.

रवि वे जरूरी फाइलें ले कर कैबिन में पहुंचा, जो उसे पिछले दिन अदिति ने छांटने को कही थीं.

‘‘मे आई कम इन मैम,’’ रवि ने औपचारिकता निभाई.

‘‘यसयस,’’ अदिति ने उस की तरफ आज पहली बार मुसकरा कर देखा था. ‘‘वे फाइल्स?’’

‘‘जी मैम, ये रहीं,’’ रवि ने फाइलों का एक ढेर अदिति की टेबल पर रख दिया.

‘‘आप को एक महीने की छुट्टी चाहिए?’’ अदिति तीखी मुसकराहट के साथ कह रही थी.

‘‘जी मैम,’’ रवि सिर नीचे किए हुए था.

‘‘इस वक्त औफिस में राकेशजी नहीं हैं, तो आप को इतनी लंबी छुट्टी

मिलना तो मुश्किल है,’’ अदिति रवि की तरफ अब गंभीरता से देखते हुए कह रही थी.

‘‘ओके, मैम. आप जैसा कहें,’’ रवि ने हलका सा सिर उठा कर कहा.

‘‘रविजी, आप हमारी कंपनी के बैस्ट एंप्लोई हैं,’’ अदिति इतना कहते हुए रुकी और फिर एक कागज हाथ में उठा कर बोली, ‘‘और आप की छुट्टी मैं भी आप से नहीं छीन सकती.’’

अदिति मुसकरा रही थी. अब रवि ने वह कागज अदिति मैम के हाथ से ले लिया और उसे पढ़ कर अब वह भी मुसकरा उठा, ‘‘थैंक्यू मैम,’’ रवि ने खुश होते हुए कहा. रवि की आंखों में कृतज्ञता झलक रही थी.

‘‘इट्स ओके रवि,’’ अदिति अब गंभीर मुद्रा में कह रही थी

कैबिन में कुछ लमहों तक खामोशी छा गई थी. अदिति ने उस खामोशी को तोड़ा, ‘‘रवि, ये ‘इट्स ओके’ तुम्हारे उस 10 साल पहले के सौरी के लिए है, जो तुम ने फेसबुक पर मैसेज किया था.’’

रवि चुपचाप खड़ा हो गया था. फिर कुछ देर बाद बोला, ‘‘दरअसल, वह मेरी नासमझी थी. मैं ने फेसबुक माध्यम को समझने में ही गलती कर दी थी. मुझे नहीं मालूम था कि किसी की तसवीर बिना पूछे अपलोड कर देना गलत है.’’

‘‘आई एम आलसो सौरी,’’ अदिति कह रही थी.

‘‘किसलिए मैम,’’ रवि जैसे अब सारी नफरत भुला चुका था.

‘‘गलती मेरी भी थी. मैं जरूरत से ज्यादा ही तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार कर रही थी. मुझे वह प्रपोज वाली बात भी नहीं उड़ानी चाहिए थी,’’ अदिति की आंखों में भी जैसे कुछ पिघल रहा था, ‘‘मैं ने तुम्हें गलत समझा था.’’

‘‘इट्स ओके मैम,’’ रवि इतना कह कर चुप हो गया था.

अदिति ने फिर चुप्पी तोड़ी, ‘‘मैं चाहती तो तुम से बदला लेती. तुम्हारी छुट्टियां कैंसिल कर देती. एक बार मैं ने सोचा भी, पर…’’

कुछ देर चुप रहने के बाद अदिति जैसे कोई सटीक बात ढूंढ़ कर बोली, ‘‘कल को हो सकता है तुम मेरी जगह हो और मैं तुम्हारी जगह. इस तरह नफरत से जिंदगी नहीं जी जाती.’’

कुछ देर तक फिर खामोशी छाई रही और अदिति ने फिर कहा, ‘‘उम्मीद है, तुम ने मुझे माफ कर दिया होगा.’’

‘‘औफकोर्स मैम,’’ रवि ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘तो कल से तुम छुट्टी पर हो,’’ अदिति ने मुसकराते हुए रवि से पूछा.

‘‘जी मैम,’’ रवि ने भी हंस कर जवाब दिया.

‘‘ओके, ऐंजौय यौर्स हौलीडेज. तुम जा सकते हो,’’ अदिति इतना कह कर आंख बंद कर अपनी कुरसी पर पीठ टेक कर बैठ गई जैसे कोई भारी बोझ कंधे से उतार दिया हो.

रवि जब बाहर जाने के लिए कैबिन का दरवाजा खोल रहा था, तब मुसकराते हुए अदिति ने उसे रोक कर कहा, ‘‘रवि, हैप्पी दीवाली.’’

रवि भी मुसकरा दिया और बोला, ‘‘आप को भी, अदिति मैम.’’

इतना कहते हुए रवि मुसकराता हुआ बाहर आ गया. उन दोनों के बीच खड़ी कई साल पुरानी दीवारें अचानक ढह गई थीं. जिंदगी खुशियां बांट कर, उन का कारण बन कर चलती है, नफरतें पाल कर नहीं.

दीवाली के इस अवसर पर क्षमादान के दीपकों की जलती हुई लौ में रवि और अदिति के दिलों में नफरतों से भरे कुछ अंधेरे कोने रोशन हो चुके थे. Hindi Romantic Story

Romantic Story In Hindi: सौदा इश्क का – क्या दीपक और बाती अलग हुए?

Romantic Story In Hindi: रात के 11 बज चुके थे और बाती अपने बैडरूम में चहलकदमी कर रही थी. बैड पर उस का 2 साल का बेटा ऊष्मित सो रहा था. इस तरह से चहलकदमी करते हुए दीपक का इंतजार करना पिछले 6 महीनों से बाती की आदत बन चुका था. उसे पता था कि आजकल दीपक के आने का यही समय है… बाती सोच ही रही थी कि सन्नाटे को चीरती हुई डोरबैल बजी.

“आखिर यह कब तक चलेगा दीपक?” बाती ने कहा, “आज ऊष्मित को अचानक हलका बुखार आ गया था. सोचा कि तुम्हारे साथ जा कर डाक्टर को दिखा दूंगी. इसी वजह से शाम को तकरीबन साढ़े 6 बजे तुम्हें फोन लगाया था, मगर तुम्हारा फोन स्विच औफ आ रहा था.

“तब मैं ने तुम्हारे औफिस फोन लगाया तो पता चला कि तुम तो औफिस से 6 बजे ही निकल गए हो और पिछले दिनों कभी भी 6 बजे से ज्यादा नहीं रुके हो.”

“चलो अच्छा ही हुआ जो तुम्हें पता चल गया. वैसे मैं खुद ही बताने वाला था. अब हम साथ में नहीं रह सकते,” दीपक का जवाब भी नपातुला था.

“साथ में नहीं रह सकते? क्या मतलब है तुम्हारा? क्या कोई दूसरा अफेयर है तुम्हारा?” बाती की आवाज अभी भी संयमित ही थी. शायद दीपक के औफिस से सूचना मिलने के बाद वह समझ गई थी कि ऐसा ही कुछ होने वाला है.

“हां, मेरा ज्योति के साथ कालेज के दिनों से ही अफेयर है. उस की और मेरी सरकारी नौकरी भी एक ही साथ लगी थी. पर दोनों के महकमे अलगअलग थे. उस की पोस्टिंग 400 किलोमीटर दूर शहर में हो गई थी.अभी 8 महीने पहले ही उस का ट्रांसफर यहां हुआ है. कलक्टर औफिस में मीटिंग के दौरान ही उस से मुलाकात हुई थी.

“ज्योति ने अभी तक मेरे इंतजार में शादी नहीं की है. मैं उसे आज भी उतना ही चाहता हूं, जितना 5 साल पहले चाहता था,” दीपक सिर झुकाए बोल रहा था.

“मुझे इसी बात का डर था…” बाती की  आंखों में आंसू थे, मगर आवाज अभी भी कंट्रोल में थी, ”आज कम से कम तुम्हारे साथ नहीं सो सकती. प्लीज, तुम दूसरे बैडरूम में सो जाओ.”

“सौरी बाती, तुम में कोई कमी नहीं है. तुम बहुत ही अच्छी पत्नी और बेहतरीन मां हो. मगर मैं अपने पुराने प्यार को भुला नहीं सकता, वह भी तब जबकि वह मेरे लिए इंतजार कर रही हो.

“अगर मैं उस के साथ न रहूं तो यह मेरी खुदगर्जी होगी. मुझे माफ कर दो बाती,” दीपक पछतावे से भरी आवाज में बोला.

“यह तो मैं भी जानती हूं दीपक कि मुझे उस गुनाह की सजा मिली रही है जो मैं ने किया ही नहीं. लेकिन मैं खुद 21वीं सदी की एक पढ़ीलिखी औरत हूं और इस बात की भी हिमायती हूं कि हर इनसान को उस की पसंद की जिंदगी जीने का हक है. मैं तुम्हारी इस करतूत पर चीखूंगीचिल्लाऊंगी नहीं, पर मैं अपने हकों को छोड़ूंगी भी नहीं.

“मैं अकेली होती तब भी कोई बात नहीं थी, मगर अब मुझ पर ऊष्मित की जवाबदारी भी है,” बाती मजबूती के साथ यकीन भरी आवाज में बोली, “अब मुझे अकेला छोड़ दो और तुम दूसरे बैडरूम में सो जाओ,” यह कहतेकहते बाती की आंखों में आंसू आ गए.

दीपक अपराधियों की तरह सिर झुकाए दूसरे कमरे में चला गया.

“आज मैं तुम्हारा लंच बनाने की हालत में नहीं हूं. शाम को लौटते समय अपने साथ ज्योति को भी लेते आना. मैं इस बारे में तुरंत फैसला करना चाहती हूं,” अगली सुबह बाती ने औफिस जाते हुए दीपक से कहा.

“मेरी भी यही इच्छा है कि तुम दोनों आपस में रजामंदी से कोई फैसला कर लो,” दीपक भी धीमी आवाज में बोला. शायद उसे अपने अपराध  का एहसास हो रहा था.

शाम को दीपक अपने साथ ज्योति को भी ले कर आ गया. ज्योति लंबे व पतले शरीर वाली सांवली मगर आकर्षक नैननक्श की लड़की थी. उस की उम्र तकरीबन दीपक के ही बराबर थी.

“नमस्ते बातीजी, मेरा नाम ज्योति है. इस से ज्यादा मैं अपना परिचय आप के सामने दे नहीं सकती,” ज्योति अपने चेहरे पर एक जबरन ओढ़ी हुई फीकी सी मुसकान के साथ बोली. वैसे, यह सब कहते हुए ज्योति की आवाज कंपकपा रही थी, जो इस बात का सुबूत था कि उसे भी अपने अपराधी होने का एहसास है.

“शायद मैं तो खुद अपना परिचय खो चुकी हूं. पता नहीं मैं अपने आप को बाती दीपक कुमार कहूं या सिर्फ बाती  कहूं,” बाती रूखी आवाज में बोली.

“देखिए बातीजी, जोकुछ हुआ, उस के लिए हम सब सिर्फ समय को ही दोष दे सकते हैं. वैसे मैं अपनी तरफ से चाहती हूं कि हम दोनों एक ही घर में रहे. मैं हम तीनों की जिंदगी को कंट्रोल करने वाली सभी चाबियां आप को सौंपने को तैयार हूं.

“यहां तक कि मेरी और दीपक की जो तनख्वाह आती है उस पर भी सौ फीसदी आप का ही हक रहेगा. आप जैसा चाहेंगी मैं वैसा तालमेल बैठाने को तैयार हूं,” ज्योति की आवाज में मानो पछतावा झलक रहा था.

“एक औरत का सब से बड़ा हक उस का अपना पति ही होता है. मुझे यकीनी तौर पर मालूम है कि तुम मुझे मेरा यह हक देने वाली नहीं हो. रही बात साथ रहने की तो अब मैं अकेली नहीं हूं, मेरी एक जवाबदारी और भी है 2 साल के ऊष्मित के रूप में.

“अगर ऊष्मित बचपन से ही झूठ और नाइंसाफी को अपनी आंखों के सामने फलतेफूलते देखेगा तो उस के बाल मन पर गलत असर पड़ेगा. मेरा सपना है कि मैं उसे एक अच्छा नागरिक बनाऊं. ऐसे माहौल में मैं उसे संस्कारवान बनने की सीख कैसे दे पाऊंगी? बड़ा हो कर क्या वह अपने पिता को माफ कर पाएगा?

“भविष्य में तुम्हारे भी बच्चे होंगे ही. तब हकों की लड़ाई होगी. उस समय मैं खुद शायद कोई एकतरफा फैसला लूं, इसलिए अलग होना ही बेहतर होगा,” बाती ने भविष्य के सवालों के साथ जवाब दिया.

“तब तुम ही बताओ कि इस समस्या का हल कैसे होगा?” दीपक ने पूछा.

“आज जबकि ऊष्मित छोटा है और मेरी माली जरूरतें कम हैं, पर जैसेजैसे ऊष्मित बड़ा होता जाएगा, वैसेवैसे मेरी जरूरतें बढ़ती जाएंगी. मैं चाहती हूं कि इन्हीं सब बातों को ध्यान में रख कर ही कोई फैसला लिया जाए,” बाती ने अपना पक्ष रखते हुए कहा.

“मैं भी बातीजी की बातों से सहमत हूं. आमतौर पर अदालतों में जो रकम तय की जाती है, वह बहुत कम होती है,” ज्योति बोली.

“ऐसा तो तभी मुमकिम है जब बाती को कोई नौकरी दिलवा दी जाए, जिस से हर साल तनख्वाह में कुछ न कुछ इजाफा होता रहे,” दीपक बोला.

“आज की कंडीशन में ऊष्मित को अकेले छोड़ कर नौकरी करना मेरे लिए मुमकिन नहीं है. वैसे भी प्राइवेट नौकरी में जाने का समय तो तय होता है, मगर लौटने में कई बार घंटों की देरी हो जाती है. शादी से पहले मैं जिस कंपनी में काम करती थी, उस में कई बार मुझे 12-12 घंटे काम करना होता था,” बाती बोली.

“बातीजी ठीक कह रही हैं. प्राइवेट नौकरी में टैंशन भी बहुत ज्यादा रहती है,” ज्योति बाती की बातों से सहमत होते हुए बोली.

“लेकिन ज्योति, मैं और तुम सरकारी नौकरी में हैं और यह भी जानते हैं कि सरकारी नौकरी मिलना आज की तारीख में एक मुश्किल काम है,” दीपक की आवाज में मजबूरी झलक रही थी.

“मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं. मैं बातीजी के लिए एक निश्चित उपाय चाहती हूं,” ज्योति बोली.

“मतलब? तुम क्या कहना चाहती हो ज्योति?” दीपक ने पूछा.

“दीपक, सही कहूं तो मैं तुम्हें पाने की आस खो चुकी थी. तुम मुझे दोबारा मिले हो. मैं बातीजी की भी शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मेरी भावनाओं का मान रखते हुए तुम्हें मुझे सौंपने का हिम्मत से भरा फैसला लिया.

“अब मेरी बारी है कि मैं उन्हें एक बेहतरीन जिंदगी जीने के लिए रिटर्न गिफ्ट दूं, चाहे इस के लिए मुझे किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े…” ज्योति की आवाज में एक मजबूती थी, “पर इस के लिए दीपक तुम्हें एक बार मरना पड़ेगा.”

“मरना पड़ेगा मतलब?” दीपक ने हैरानी से पूछा.

“यहां पर बैठेबैठे और बातीजी से बात करतेकरते मेरे दिमाग में एक योजना आई है. इस से सभी की समस्याएं सुलझ जाएंगी और किसी तरह की कोई दिक्कत भी नहीं आएगी, क्योंकि यह एक हादसा होगा और इस की गवाह एक सरकारी अफसर मतलब मैं खुद होंगी.”

“हादसा? कैसा हादसा? और अगर मैं मर ही जाऊंगा तो तुम्हारे साथ रहेगा कौन?” दीपक का हैरान होना इस बार दोगुना था. वह किसी बेवकूफ की तरह ज्योति की तरफ देखने लगा.

“देखो दीपक, चाहे हम दोनों मानें या न मानें, मगर सामाजिक नजरिए से हमारा रिश्ता गलत है और समाज में इसे आसानी से मंजूरी नहीं मिलेगी. हमें साथ रहने के लिए या तो अपना धर्म बदलना होगा या अपनी पहचान ही बदलनी होगी.

“अगर हम कानूनी झमेलों में पड़ेंगे तो कई साल निकल जाएंगे और तीनों के हाथ में कुछ नहीं आएगा,” ज्योति बोली.

“तो फिर तुम ने क्या सोचा है?” दीपक ने पूछा.

“मैं आज जिस ओहदे पर हूं, उस में मेरे एक इशारे पर मैं किसी भी आदमी को एक नई पहचान दिलवा सकती हूं. मतलब मैं किसी भी आदमी के आधारकार्ड में बदलाव करवा सकती हूं, जिस के आधार पर वह अपनी एक नई पहचान बनवा सकता है,” ज्योति ने अपनी योजना के कुछ अंशों का खुलासा किया.

“मैं अभी भी नहीं समझा,” दीपक एकटक ज्योति को देखते हुए बोला.

“बातीजी की पैसों को ले कर ही समस्या है न? हम उसी का हल कर रहे हैं. मेरी योजना यह है कि तुम और बातीजी अगले रविवार को शहर से दूर जो नहर है उस पर पिकनिक मनाने जाओ. रुकने के लिए उस जगह को चुनो जहां पर पानी का बहाव तेज हो और तुम दोनों के अलावा वहां कोई न हो.

“उसी जगह पर मस्ती करते हुए दीपक का पैर फिसल जाएगा. बहाव तेज होने के चलते दीपक दूर बह जाएगा. इस बात का खास ध्यान रखा जाए कि बातीजी दीपक की मस्ती करने वाली घटना का वीडियो बना लेंगी,” ज्योति ने योजना को समझाया.

“बहते हुए मैं जाऊंगा कहां? मुझे तो तैरना भी नहीं आता,” दीपक परेशान होते हुए बोला.

“इस के बाद इस ड्रामे का दूसरा पार्ट स्टार्ट होगा. यहां आने से पहले मैं जिस जगह पोस्टेड थी वह यहां से 400 किलोमीटर दूर है. वहां का सरकारी बंगला भी मैं ने अभी तक खाली नहीं किया है. तुम तैरना नहीं जानते हो यह बात हमारे लिए प्लस पौइंट होगी.

“15-20 फुट बहने के बाद मेरे बुलाए हुए आदमी तुम्हें बचा लेंगे और तुम्हें अपनी ही गाड़ी से उस सरकारी बंगले पर छोड़ देंगे,” ज्योति ने अपनी योजना का और खुलासा किया.

“मगर वहां पर मुझे बचाने की टीम पहुंचेगी किस के कहने पर?” दीपक ने पूछा.

“वह टीम लोकल नहीं होगी और उसी जगह से आएगी जहां पर मैं पहले पोस्टेड थी. बचाने वाली टीम और गाड़ी का इंतजाम मैं कर दूंगी. मैं खुद भी उस जगह से कुछ दूर मौजूद रहूंगी,” ज्योति योजना पर से परदा हटाते हुए बोली.

“मगर तुम्हारे वहां आने की वजह क्या होगी?” दीपक एक बार फिर हैरान था.

“अरे भई, मैं भी इनसान हूं और अपनी छुट्टी के दिन आउटिंग के लिए तो जा ही सकती हूं न? बस, उस दिन भी अपना मूड चेंज करने के लिए आउटिंग पर आ जाऊंगी और तुम्हारे पानी में बहने के बाद जब बातीजी मदद के लिए चिल्लाएंगी, तब सब से पहले मैं ही वहां पर पहुंचूंगी.

“इस तरह से मैं एक चश्मदीद गवाह का काम भी करूंगी. सरकारी अफसर की गवाही पर कोई भी सवाल नहीं उठाएगा,” ज्योति बोली.

“हांहां, अब मैं तुम्हारी योजना को समझ गया. उधर तुम्हारी गाड़ी और तुम्हारे लोग मुझे ले कर तुम्हारे उस बंगले पर जाएंगे और इधर तुम मुझे मृत घोषित करवा कर मेरी जगह बाती को मेरी जगह नौकरी और मेरे बीमे के पैसे दिलवा दोगी,” दीपक योजना समझते हुए बोला.

“एकदम सही. वहां पर तुम्हारा रहनेखाने का सारा इंतजाम होगा. यहां पर ज्यादा से ज्यादा 6 महीनों में मैं यह काम खत्म कर दूंगी. उस के बाद वापस उसी जगह पर अपना ट्रांसफर करवा लूंगी,” ‘ज्योति बोली.

“लेकिन वहां पहुंचने के बाद भी मैं रहूंगा तो दीपक ही न? मेरी पहचान अभी तक बदली नहीं है,” दीपक कुछ बेचैन होते हुए बोला.

“अभी मेरी योजना पूरी नहीं हुई है. वहां पहुंचने के बाद तुम्हें घर पर नहीं बैठना है, बल्कि तुम्हें अपना नाम बदलवाने के सिलसिले में एक शपथपत्र बनवा कर कलक्टर औफिस में देना है. इस तरह के शपथपत्र बनवाना कोई मुश्किल काम नहीं है. तुम्हें अपना नाम बदल कर लौ कुमार रखना होगा.

“चूंकि नहर के तेज बहाव में बहने के बाद तुम्हारी लाश नहीं मिली होगी, इसलिए श्मशान घाट पर तुम्हारे नाम की कोई ऐंट्री नहीं होगी. मतलब तुम्हारा आधारकार्ड अलाइव रहेगा और हम उस में बदले हुए नाम का अपडेट आसानी से करवा पाएंगे,” ज्योति ने योजना का खुलासा किया.

“क्या सिर्फ कलक्टर के औफिस में शपथपत्र देने भर से नाम बदल जाता है?” दीपक ने पूछा.

“नहीं, इस की एक प्रक्रिया होती है. सब से पहले इस बारे में किसी नामी अखबार में जाहिर सूचना के जरीए नाम बदलवाने के लिए इश्तिहार छपवाना होता है, जिस में वजह देनी होती है. हम तुम्हारा नया नाम लौ कुमार रखेंगे.

“उस के बाद कलक्टर के औफिस में सभी कागजात के साथ अर्जी देनी होती है. कलक्टर की सिफारिश पर राज्य शासन इसे गजट में छापता है. एक बार गजट में नाम आने के बाद उसी नाम से बाकी कागजात में नाम आसानी से बदलवाया जा सकता है,” ज्योति ने पूरा ब्योरा दिया.

“मगर लौ कुमार नाम कुछ अटपटा नहीं होगा?” दीपक ने पूछा.

“नहीं, यह नाम बहुत सोचसमझ कर रखा गया है. अगर कभी तुम्हारा कोई पुराना जानकार मिल जाता है तो यह सफाई देने में आसानी होगी कि छात्र जीवन में दोस्तों को लौ कुमार बोलने में परेशानी होती थी, इसलिए उन्होंने लौ कुमार का पर्यायवाची दीपक कुमार तुम्हारा नाम रख दिया और वे तुम्हें इसी नाम से बुलाते हैं.

“वैसे बेहतर तो यही होगा कि तुम अपने किसी पुराने जानपहचान वाले से मिलो ही नहीं,” ज्योति की आवाज में चेतावनी और समझाइश दोनों ही थीं.

“यकीनन यह योजना तो काफी अच्छी और आकर्षक है. तुम्हारे कारण से सुरक्षित भी. इस योजना से हम सभी की समस्याएं भी हल हो रही हैं. तुम्हें तो कोई परेशानी नहीं है न बाती?”दीपक ने पूछा.

“मैं एतराज कर के करूंगी भी क्या? मेरे सामने अब सिर्फ ऊष्मित का भविष्य है. मैं यहां साफ कर देना चाहती हूं कि मुझे किसी कानूनी झमेले में मत फंसाना,” बाती की आवाज में रूखापन साफ झलक रहा था.

“वैसे तो मैं और दीपक मिल कर भी यह योजना बना सकते थे, मगर आप की जानकारी में भी सारी बातें रहें इसी वजह से यह योजना आप के सामने बनाई जा रही है, ताकि भविष्य में कोई शक न रहे,” ज्योति ने अपना रुख साफ करते हुए कहा.

“वैसे भी बाती, तुम्हें जोकुछ मिल रहा है वह तुम्हारी उम्मीदों से कहीं ज्यादा है,” दीपक ज्योति की बातों से सहमत होते हुए बोला.

15 दिनों के बाद अखबारों में इस हादसे का पूरा ब्योरा छपा, साथ ही छपी ज्योति की आंखों देखी गवाही.

तकरीबन 4 महीने के बाद ज्योति की मदद से बाती को दीपक की जगह नौकरी मिल गई और बीमे का पैसा भी. लौ कुमार और ज्योति भी अपनी नई जिंदगी में बिजी हो गए. ज्योति ने लौ कुमार को भी सरकारी मदद से लोन दिलवा कर एक फैक्टरी डलवा दी. Romantic Story In Hindi

Family Story In Hindi: यह सलीब – इच्छाओं और महत्त्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबे व्यक्ति की कहानी

Family Story In Hindi: मैं और बूआ अभी चर्चा कर ही रही थीं कि आज किसी के पास इतना समय कहां है जो एकदूसरे से सुखदुख की बात कर सके. तभी कहीं से यह आवाज कानों में पड़ी-

मैं किसे कहूं मेरे साथ चल,

यहां सब के सर पे सलीब है

कोई दोस्त है न रकीब है

तेरा शहर कितना अजीब है.

यहां किस का चेहरा पढ़ा करूं

यहां कौन इतने करीब है…

‘‘सच ही तो कह रहा है गाने वाला. आज किस के पास इतना समय है, जो किसी का चेहरा पढ़ा जा सके. अपने आप को ही पूरी तरह आज कोई नहीं जानता, अपना ही अंतर्मन क्या है क्या नहीं? हर इनसान हर पल मानो एक सूली पर लटका नजर आता है.’’

मैं ने कहा तो बूआ मेरी तरफ देख कर तनिक मुसकरा दीं.

‘‘सलीब सिर पर उठाने को कहा किस ने? उतार कर एक तरफ रख क्यों नहीं देते और रहा सवाल चेहरा पढ़ने का तो वह भी ज्यादा मुश्किल नहीं है. बस, व्यक्ति में एक ईमानदारी होनी चाहिए.’’

‘‘ईमानदार कौन होना चाहिए? सुनाने वाला या सुनने वाला?’’

‘‘सुनने वाला, सुनाने वाले की पीड़ा को तमाशा न बना दे, उस का दर्द समझे, उस का समाधान करे.’’

अकसर बूआ की बातों से मैं निरुत्तर हो जाती हूं. बड़ी संतुष्ट प्रवृत्ति की हैं मेरी बूआ. जो उन के पास है उस का उन्हें जरा भी अभिमान नहीं और जो नहीं उस का अफसोस भी नहीं है.

‘‘किसी दूसरे की थाली में छप्पन भोग देख कर अपनी थाली की सूखी दालरोटी पर अफसोस मत करो. अगर तुम्हारी थाली में यह भी न होता तो तुम क्या कर लेतीं? अपनी झोंपड़ी का सुख ही परम सुख होता है. पराया महल मात्र मृगतृष्णा है. सुख कहीं बाहर नहीं है…सुख यहीं है तुम्हारे ही भीतर.’’

मुझे कभीकभी यह सब असंभव सा लगता है. ऐसा कैसे हो सकता है कि अपनी किसी सखी या रिश्तेदार महिला के गले में हीरे का हार देख कर उसे अपने गले में देखने की इच्छा न जागे.

एक दिन मेरी भाभी ने ऐसे ही कह दिया कि हीरा आजकल का लेटैस्ट फैशन है तो झट से अपने कुछ टूटेफूटे गहने बेच मैं हीरे के टौप्स खरीद लाई थी और जब तक पहन कर भाभी को दिखा नहीं दिए, हीनभावना से उबर ही नहीं पाई थी. बूआ को सारा किस्सा सुनाया तो पुन: मैं अनुत्तरित रह गई थी.

‘‘आज टूटेफूटे कुछ गहने थे इसलिए बेच कर टौप्स ले लिए…कल अगर कोई हीरों का सैट दिखा कर तुम्हारे स्वाभिमान को चोट पहुंचाएगा तो क्या बेचोगी, शुभा?’’

अवाक् रह गई थी मैं. टौप्स बूआ के हाथ में थे. स्नेहमयी मुसकान थी उन के होंठों पर.

‘‘ऐसा नहीं कह रही मैं कि तुम ने ये टौप्स क्यों लिए? यही तो उम्र है पहननेओढ़ने की. अपनी खुशी के लिए गहने बनाना अच्छी बात है. तुम ने तो टौप्स इसलिए बनाए कि तुम्हारी भाभी ने ऐसा कहा…अपने स्वाभिमान को किसी के पैरों की जूती मत बनाओ, शुभा. हम पर हमारी ही मरजी चलनी चाहिए न कि किसी भी ऐरेगैरे की.

‘‘तुम्हारा अहं इतना हलका क्यों हो गया? हीरे से ही औरत संपूर्ण होती है… यह तुम्हारी भाभी ने यदि कह दिया तो कह दिया. उस ने तुम से यह तो नहीं कहा था कि तुम्हारे पास हीरे नहीं हैं. क्या उस ने तुम्हारी तरफ उंगली कर के कहा था… जरा सोचो?’’

तनिक मुसकरा पड़ी थीं बूआ. मेरा माथा चूम लिया था और मेरे गाल थपक हाथ के टौप्स मेरे कानों में पहना दिए थे.

‘‘बहुत सुंदर लग रहे हैं ये टौप्स तुम्हारे कानों में. मगर भविष्य में ध्यान रहे कि किसी के कहे शब्दों पर पागल होने की जरूरत नहीं है. औरत की संपूर्णता तो उस के चरित्र से, उस के ममतामयी आचरण से होती है.’’

उसी पल मेरे मन से उन हीरों का मोह जाता रहा था. वह भाव कहीं नहीं रहा था कि मेरे पास भी हीरे हैं. अकसर वे नेमतें जिन पर एक आम इनसान इतरा उठता है, बूआ को खुशी का विषय नहीं लगतीं. अकसर बूआ कह देती हैं, ‘‘खुशी कहीं बाहर नहीं होती, खुशी तो यहीं होती है… अपने ही भीतर.

‘‘यही तो सलीब है…और सलीब किसे कहते हैं…अपने दुखों का कारण कभीकभी हम खुद ही होते हैं.’’

सलीब के बारे में खुल कर बूआ से पूछा तो वे समझाने लगीं, ‘‘क्यों अपनी सोच पर हर पल हम सारा संसार लादे रहते हैं…जरा सोचो. अपनी खुशी की खातिर तो हम कुछ भी संजो लें, खरीद लें क्योंकि वे हमारी जरूरतें हैं लेकिन किसी दूसरे को प्रभावित करने के लिए हम अपना सारा बजट ही गड़बड़ कर लें, यह कहां की समझदारी है. एक बहुत बड़ी खुशी पाने के लिए छोटीछोटी सारी खुशियां सूली पर चढ़ा देना क्या उचित लगता है तुम्हें?

‘‘हमें अपनी चादर के अनुसार ही पैर पसारने हैं तो फिर क्यों हमारी खुशी औरों के शब्दों की मुहताज बने.’’

बूआ का चेहरा हर पल दमकता क्यों रहता है? मैं अब समझ पाई थी. बात करने को तो हमारा परिवार कभीकभी बूआ की आलोचना भी करता है. उन का सादगी भरा जीवन आलोचना का विषय होता है. क्यों बूआ ज्यादा तामझाम नहीं करतीं? क्यों फूफाजी और बूआ छोटे से घर में रहते हैं. क्यों गाड़ी नहीं खरीद लेते?

सब से बड़ी बात जो अभीअभी मेरी समझ में आई है, वह यह कि बूआ किसी की मदद करने में या किसी को उपहार देने में कभी कंजूसी नहीं करतीं. पर अपने लिए किसी से सहायता तो नहीं मांगतीं, गाड़ी की जरूरत पड़े तो किराए की गाड़ी उन के दरवाजे पर खड़ी मिलती है, जरूरत पर उन के पास कोई कमी नहीं होती. तो फिर क्यों वे औरों को खुश करने के लिए अपनी सोच बदलें. बूआ के दोनों बच्चे बाहर रहते हैं. साल में कुछ दिनों के लिए वे बूआ के पास आते हैं और कुछ दिन बूआ और फूफाजी उन के पास चले जाते हैं. अपने जीवन को बड़े हलकेफुलके तरीके से जीती हैं बूआ.

एक बार ऐसा हुआ कि बच्चों की छुट्टियां थीं जिस वजह से मैं व्यस्त रही थी. लगभग 10 दिन के बाद फोन किया तो बूआ कुछ उदास सी लगी थीं. उसी शाम मैं उन के घर गई तो पता चला था कि फूफाजी पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. पड़ोसी से नर्सिंगहोम का पता लिया और उसी पड़ोसी से पता चला कि उस को भी कुछ दिनों के बाद ही इस घटना का पता चला था.

‘‘बहुत बहादुर हैं न बूआजी. हमें भी नहीं बुलाया. कम से कम मैं ही आ जाती.’’

रोना आ गया था मुझे. क्या मैं इतनी पराई थी. बचपन से जिस बूआ की गोद में खेली हूं, क्या मुसीबत में मैं उन के काम नहीं आती. क्या मुझ पर इतना सा भी अधिकार नहीं समझतीं बूआ. नाराजगी व्यक्त की थी मैं ने.

‘‘तुम क्या करतीं यहां…गाड़ी बुला ली थी. बाकी सब काम डाक्टर लोगों का था. दवा यहीं पर मिल जाती है. बाहर छोटी सी कैंटीन है, वहां से चाय, कौफी मिल जाती थी. अधिकार समझती हूं तभी तो चाहती हूं तुम अपने बच्चों पर पूरापूरा ध्यान दो. अभी उन के इम्तिहान भी आ गए हैं न.’’

बूआ के इस उत्तर से मेरा रोना बढ़ गया था, ‘‘अपने किस काम के जो वक्त पर काम भी न आएं.’’

फूफाजी मेरी दलीलों पर हंसने लगे थे.

‘‘अरी पगली, काम ही तो नहीं पड़ा न…जिस दिन काम पड़ा तुम ही तो काम आओगी न. तुम्हारा ही तो सहारा है हमें, शुभा. हमारे दोनों बच्चे तो बहुत दूर हैं न बिटिया…हम जानते थे पता चलते ही अपना सारा घर ताक पर रख भागी चली आओगी, इसीलिए तुम्हें नहीं बताया. हलका सा दिल का दौरा ही तो पड़ा था.’’

बूआफूफाजी यों मुसकरा रहे थे मानो कुछ भी नहीं हुआ. मेरा माथा जरा सा तप जाए तो जो बूआ मेरी पीड़ा पर पगला सी जाती हैं वे अपनी पीड़ा पर इतनी चुप हो गईं कि मुझे पता ही न चला. सदा दे कर जिस बूआ को खुशी होती है वही बूआ लेने में पूरापूरा परहेज कर गई थीं. किसी से ज्यादा उम्मीद करना भी दुखी होने का सब से बड़ा कारण है, यह भी बूआ का ही कहना है. किसी आस में जिया जाए, यह भी तो एक सलीब है न जिस पर हम खुद को टांग लेते हैं.

मेरी भाभी भी इसी शहर में हैं, लेकिन उन की आदत में बूआ से मिलना शुमार नहीं होता. उन की अपनी ही दुनिया है जिस में मैं और बूआ कम ही ढल पाते हैं.

‘‘भैया की और हमारी आय लगभग बराबर ही है, उसी आय में भाभी इतनी शानोशौकत कैसे कर लेती हैं जबकि मेरे घर में वह सब नहीं हो पाता. इतना बड़ा घर बना लिया भैया ने और हमारे पास मात्र जमीन का एक टुकड़ा है जिस पर शायद रिटायरमैंट के बाद ही घर बन पाएगा. लगता है हमें ही घर चलाना नहीं आता.’’

एक दिन बूआ से मन की बात कही तो बड़ी गहरी नजर से उन्होंने मुझे देखा था.

‘‘कितना कर्ज है तुम्हारे पति के सिर पर?’’

‘‘एक पैसा भी नहीं. ये कहते हैं कि मुझे सिर पर कर्ज रख कर जीना नहीं आता. रात सोते हैं तो सोने से पहले भी यही सोचते हैं कि किसी का पैसा देना तो नहीं. किसी का 1 रुपया भी देना हो तो इन्हें नींद नहीं आती.’’

‘‘और अपने भाई का हाल भी देख लो. सिर पर 50 लाख का कर्ज है. पत्नी की पूरी सैलरी कर्ज चुकाने में चली जाती है और भाई की दालरोटी और इतने बड़े घर की साजसंभाल में. बच्चों की फीस तक निकालना आजकल उन्हें भारी पड़ रहा है. घर में 3-3 ए.सी. हैं. इन गरमियों में बिजली का बिल 15 हजार रुपए आया था. रात भर तुम्हारा भाई सो नहीं पाता इसी सोच में कि अगर कोई आपातस्थिति आ जाए तो 2 हजार रुपए भी नहीं हाथ में…क्या इसी को तुम शानोशौकत कहती हो जिस में पति की हरेक सांस पर इतना बोझ रहता है और पत्नी समझती ही नहीं.

हीरों के गहने पहने बिना जिस की नाक नहीं बचती, क्या उस औरत को यह समझ में आता है कि उस का पति निरंतर अवसाद में जी रहा है. कल क्या हो जाए, इस का जरा सा भी अंदाजा है तुम्हारी भाभी को?’’

मैं मानो आसमान से नीचे आ गिरी. यह क्या सुना दिया बूआ ने. भैया भी मेरी तरह बूआ के लाड़ले हैं और अवश्य अपना मन कभीकभी खोलते होंगे बूआ के साथ, बूआ ने कभी भैया के घर की बात मुझे नहीं सुनाई थी.

‘‘शुभा, तुम आजाद हवा में सांस लेती हो. किसी का कर्ज नहीं देना तुम्हें. समझ लो तुम संसार की सब से अमीर औरत हो. तुम्हारी जरूरतें इतनी जानलेवा नहीं हैं कि तुम्हारे पति की जान पर बन जाए. ऐसे हीरे औरत के किस काम के कि पति की एकएक सांस शूल बन जाए. तुम्हीं बताओ, क्या तुम भी ऐसा ही जीवन चाहती हो?’’

‘न…’ अस्फुट शब्द कहीं गले में ही खो गए. मैं तो ऐसा जीवन कभी सोच भी नहीं सकती. शायद इसीलिए तब बूआ ने टौप्स लेने पर नाराजगी का इजहार किया था. वे नहीं चाहती थीं कि मैं भी भाभी के पदचिह्नों पर चलूं.

हम हर पल सलीब को सिर पर उठाएउठाए ही क्यों चलते हैं? सलीब उठाते ही क्यों हैं? इसे उतार कर फेंक क्यों नहीं देते?

हमारी अनुचित इच्छाएं, बढ़ती जरूरतें क्या एक सलीब नहीं हैं जिन पर अनजाने ही हमारी जान सूली पर चढ़ जाती है. आखिर क्यों ढोते हैं हम अपने सिर पर ‘यह सलीब’ Family Story In Hindi

Short Story In Hindi: रहने के लिए एक मकान

Short Story In Hindi: मैं अपने गांव लौटने लगा तो मेरे आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे. मेरे दोहेते अपने घर के बालकनी से प्रेम से हाथ हिला रहे थे,”बाय ग्रैंड पा, सी यू नाना…”

धीरेधीरे मैं बस स्टैंड की ओर चल दिया.

मैं मन ही मन सोचने लगा,’बस मिले तो 5 घंटे में मैं अपने गांव पहुंच जाऊंगा. जातेजाते बहुत अंधेरा हो जाएगा, फिर बस स्टैंड पर उतर कर वहां एक होटल है. उस में कुछ खापी कर औटो से अपने घर चला जाऊंगा.’

2 साल पहले मेरी पत्नी बीमार हो कर गुजर गई. तब से मैं अकेला ही हूं. मेरे गांव का मकान पुस्तैनी है. उस की छत टिन की है. पहले घासपूस की छत थी.

जब एक बार बारिश में बहुत परेशानी हुई तब टिन डलवा दिया था. मेरा एक भाई था वह भी कुछ साल पहले ही चल बसा था. अब इस घर में आखिरी पीढ़ी का रहने वाला सिर्फ मैं ही हूं.

मेरी इकलौती बेटी बड़े शहर में है अत: वह यहां नहीं आएगी. जब बारिश होती है तो छत से यहांवहां पानी टपकता है. एक बार इतनी बारिश हुई कि दूर स्थित एक बांध टूट गया और कमर भर पानी मकान के अंदर तक जा घुसा था. कई बार सोचा घर की मरम्मत करा दूं पर इस के लिए भी एकाध लाख रूपए तो चाहिए ही.

मैं सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त हुआ हूं अत: मुझे पैंशन मिलती है. उम्र के साथ दवा भी खाने होते हैं मगर फिर भी इस खर्च के बाद थोड़ाबहुत बच जरूर जाता है.

2 महीने में एक बार मैं शुक्रवार को दोहेतो को देखने की उत्सुकता में बेटी के घर जा कर 2-3 दिन ठहर कर खुशीखुशी दिन बिता कर मैं वापस आ जाता हूं. इस से ज्यादा ठहरना मुझे ठीक नहीं लगता.

मेरे दामाद अपना प्रेम या विरोध कुछ भी नहीं दिखाते. मैं घर में प्रवेश करता तो एक मुसकान छोड़ अपने कमरे में चले जाते.

दामाद शादी के समय बिल्डिंग बनाने वाली बड़ी कंपनी में सीनियर सुपरवाइजर थे. जो मकान बने वे बिक न सके. बैंक से उधार लिए रुपए को न चुकाने के कारण कंपनी बंद हो गई थी. तब से वह रियल ऐस्टेट का ब्रोकर बन गया.

“कुदरत की मरजी से किसी तरह सब ठीकठाक चल रहा है पापा,” ऐसा मेरी बेटी कहती.

पति की नौकरी जब चली गई थी तब मेरी बेटी दोपहर के समय टीवी सीरियल न देख कर सिलाई मशीन से अड़ोसपड़ोस के बच्चों व महिलाओं के कपड़े सिल कर कुछ पैसे बना लेती.

“पापा, आप ने कहा था ना कि बीए कर लिया है तो अब बेकार मत बैठो, कुछ सीखना चाहिए. तब मैं सिलाई सीखी. वह अब मेरे काम आ रही है पापा,” भावविभोर हो कर वह कहती.

पिछली बार जब मैं गया था तो दोहेतो ने जिद्द की, “नानाजी, आप हमारे साथ ही रहो. क्यों जाते हो यहां से?”

बच्चे जब यह कह रहे थे तब मैं ने अपने दामाद के चेहरे को निहारा. उस में कोई बदलाव नहीं.

मेरी बेटी रेनू ही आंखों में आंसू ला कर कहती,”पापा… बच्चों का कहना सही है. अम्मां के जाने के बाद आप अकेले रहते हैं जो ठीक नहीं. आप बीमार भी रहते हो.”

वह कहती,”पापा, हमारे मन में आप के लिए जगह है पर घर में जगह की कमी है. आप को एक कमरा देना हो तो 3 रूम का घर चाहिए. रियल ऐस्टेट के बिजनैस में अभी मंदी है. तकलीफ का जीवन है. इस घर में बहुत दिनों से रहते आए हैं अत: इस का किराया भी कम है. अभी इस को खाली करें तो दोगुना किराया देने के लिए लोग तैयार हैं. क्या करें? इस के अलावा मेरा सिरदर्द जबतब आ कर परेशान करता है.”

मैं बेटी को समझाता,”बेटा रो मत. यह सब कुछ मुझे पता है. अब गांव में भी क्या है? मुझे तुम्हारे साथ ही रहना है ऐसा भी नहीं. पड़ोस में एक कमरे का घर मिल जाए तो भी मैं रह लूंगा. मैं अभी ₹21 हजार पैंशन पाता हूं. ₹6-7 हजार भी किराया दे कर रह लूंगा. अकेला तो हूं. तुम्हारे पड़ोस में रहूं तो मुझे बहुत हिम्मत रहेगी,” यह कह कर मैं ने बेटी का चेहरा देखा.

“अरे, जाओ पापा… अब सिंगलरूम कौन बनाता है? सब 2-3 कमरों का बनाते हैं. मिलें तो भी किराया ₹10 हजार. यह सब हो नहीं सकता पापा,” कह कर बेटी माथे को सहलाने लग जाती.

अगली बार जब मैं बेटी के घर गया, तब एक दिन सुबह सैर के लिए निकला. अगली 2 गलियों को पार कर चलते समय एक नई कई मंजिल मकान को मैं ने देखा जो कुछ ही दिनों में पूरा होने की शक्ल में था.

उस में एक बैनर लगा था,’सिंगल बैडरूम का फ्लैट किराए पर उपलब्ध है.’

मुझे प्रसन्नता हुई और उत्सुकता भी. वहां एक बैंच पर सिक्योरिटी गार्ड बैठा था. मैं ने उस से जा कर पूछताछ की.

“दादाजी, उसे सिंगल बैडरूम बोलते हैं. मतलब एक ही हौल में सब कुछ होता है. 1-2 से ज्यादा नहीं रह सकते. आप कितने लोग हैं?” वह बोला.

“मैं बस अकेला ही हूं. मेरी बेटी पड़ोस में ही रहती है. इसीलिए यहां लेना चाहता हूं.”

“अच्छा फिर तो ठीक है. घर को देखिएगा…” कह कर अंदर जा कर चाबी के गुच्छों के साथ बाहर आया.

दूसरे माले में 4 फ्लैट थे.

“इन चारों के एक ही मालिक हैं. 3 फ्लैटों के पहले ही ऐडवांस दे चुके हैं.”

उस ने दरवाजे को खोला. लगभग 250 फुट चौड़ा और लंबा एक हौल था. उस में एक तरफ खाना बनाने के लिए प्लेटफौर्म आधी दीवार खींची थी. दूसरी तरफ छोटा सा बाथरूम बड़ा अच्छा व कंपैक्ट था.

“किराया कितना है?” मैं ने पूछा.

“मुझे तो कहना नहीं चाहिए फिर भी ₹ 7 हजार होगा क्योंकि इसी रेट में दूसरे फ्लैट भी दिए हैं. ऐडवांस ₹50 हजार है. रखरखाव के लिए ₹500-600 से ज्यादा नहीं होगा. मतलब सबकुछ मिला कर ₹7-8 हजार के अंदर हो जाएगा दादाजी,” वह बोला.

“ठीक है भैया, इसे मुझे दिला दो. मालिक से कब बात करें?”

“अभी बात कर लो. एक फोन लगा कर बुलाता हूं. आप बैठिए,” वह बोला.”

वहां एक प्लास्टिक की कुरसी थी. मैं उस पर बैठ कर इंतजार करने लगा.

सिक्योरिटी गार्ड ने बताया,“वे खाना खा रही हैं. 10-15 मिनट में पहुंच जाएंगी. तब तक आप यह अखबार पढ़िए.”

मालिक से बात कर किराया थोड़ा कम करने के बारे में पूछ लूंगा. फिर एक औटो पकड़ कर घर जा कर लड़की को भी ला कर दिखा कर तय कर लेंगे. बेटी इस मकान को देख कर आश्चर्य करेगी.

ऐडवांस के बारे में कोई बड़ी समस्या नहीं है. मैं पास के एक बैंक में हर महीने जो पैसे जमा कराता हूं उस में ₹30 हजार के करीब तो होंगे ही.बाकी रुपयों के लिए पैंशन वाले बैंक से उधार ले लूंगा. फिर एक दिन शिफ्ट हो जाऊंगा.

यहां आने के बाद एक आदमी का खाना और चाय का क्या खर्चा होगा?

‘आप खाना बनाओगे क्या पापा,’ ऐसा डांट कर बेटी प्यार से खाना तो भिजवा ही देगी.

खाना बनाने का काम भी बच जाएगा. पास में लाइब्रैरी तो होगा ही. वहां जा कर दिन कट जाएगा.

सामने की तरफ थोड़ी दूर पर एक छोटा सा टी स्टौल था. मैं ने सोचा 1 कप चाय पी कर हो आते हैं. तब तक मकानमालकिन भी आ ही जाएगी.

वहां कौफी की खुशबू आ रही थी | मैं ने सोचा कि कौफी पी लूं. यहां रहने आ जाऊंगा तो नाश्ते और चाय की कोई फिकर नहीं रहेगी.

पैसे दे कर वापस आया तो सिक्योरिटी गार्ड बोला,“घर के औनर आ गए हैं. वे ऊपर गए हैं. आप वहीं चले जाइए.”

मैं धीरेधीरे सीढ़ियां चढ़ने लगा. ऊपर पहुंच कर औनर को नमस्कार बोला.

पीठ दिखा कर खड़ी वह महिला धीरे से मुड़ी तो वह मेरी बेटी रेणू थी. Short Story In Hindi

Romantic Story In Hindi: सजा – क्या सुमित के साथ अंकिता ने खत्म किया अपना रिश्ता

Romantic Story In Hindi: वेटर को कौफी लाने का और्डर देने के बाद सुमित ने अंकिता से अचानक पूछा, ‘‘मेरे साथ 3-4 दिन के लिए मनाली घूमने चलोगी?’’ ‘‘तुम पहले कभी मनाली गए हो?’’

‘‘नहीं.’’ ‘‘तो उस खूबसूरत जगह पहली बार अपनी पत्नी के साथ जाना.’’

‘‘तब तो तुम ही मेरी पत्नी बनने को राजी हो जाओ, क्योंकि मैं वहां तुम्हारे साथ ही जाना चाहता हूं.’’ ‘‘यार, एकदम से जज्बाती हो कर शादी करने का फैसला किसी को नहीं करना चाहिए.’’

सुमित उस का हाथ पकड़ कर उत्साहित लहजे में बोला, ‘‘देखो, तुम्हारा साथ मुझे इतनी खुशी देता है कि वक्त के गुजरने का पता ही नहीं चलता. यह गारंटी मेरी रही कि हम शादी कर के बहुत खुश रहेेंगे.’’ उस के उत्साह से प्रभावित हुए बिना अंकिता संजीदा लहजे में बोली, ‘‘शादी के लिए ‘हां’ या ‘न’ करने से पहले मैं तुम्हें आज अपनी पर्सनल लाइफ के बारे में कुछ बातें बताना चाहती हूं, सुमित.’’

सुमित आत्मविश्वास से भरी आवाज में बोला, ‘‘तुम जो बताओगी, उस से मेरे फैसले पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है.’’ ‘‘फिर भी तुम मेरी बात सुनो. जब मैं 15 साल की थी, तब मेरे मम्मीपापा के बीच तलाक हो गया था. दोनों के स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर होने के कारण उन के बीच रातदिन झगड़े होते थे.

‘‘तलाक के 2 साल बाद पापा ने दूसरी शादी कर ली. ढेर सारी दौलत कमाने की इच्छुक मेरी मां ने अपना ब्यूटी पार्लर खोल लिया. आज वे इतनी अमीर हो गई हैं कि समाज की परवा किए बिना हर 2-3 साल बाद अपना प्रेमी बदल लेती हैं. हमारे जानकार लोग उन दोनों को इज्जत की नजरों से नहीं देखते हैं.’’ अंकिता उस की प्रतिक्रिया जानने के लिए रुकी हुई है, यह देख कर सुमित ने गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘मैं मानता हूं कि हर इंसान को अपने हिसाब से अपनी जिंदगी के फैसले करने का अधिकार होना ही चाहिए. तलाक लेने के बजाय रातदिन लड़ कर अपनीअपनी जिंदगी बरबाद करने का भी तो उन दोनों के लिए कोई औचित्य नहीं था. खुश रहने के लिए उन्होंने जो रास्ता चुना, वह सब को स्वीकार करना चाहिए.’’

‘‘क्या तुम सचमुच ऐसी सोच रखते हो या मुझे खुश करने के लिए ऐसा बोल रहे हो?’’ ‘‘झूठ बोलना मेरी आदत नहीं है, अंकिता.’’

‘‘गुड, तो फिर शादी की बात आगे बढ़ाते हुए कौफी पीने के बाद मैं तुम्हें अपनी मम्मी से मिलाने ले चलती हूं.’’ ‘‘मैं उन्हें इंटरव्यू देने के लिए बिलकुल तैयार हूं,’’ सुमित बोला तो उस की आंखों में उभरे प्रसन्नता के भाव पढ़ कर अंकिता खुद को मुसकराने से नहीं रोक पाई.

आधे घंटे बाद अंकिता सुमित को ले कर अपनी मां सीमा के ब्यूटी पार्लर में पहुंच गई.

आकर्षक व्यक्तित्व वाली सीमा सुमित से गले लग कर मिली और पूछा, ‘‘क्या तुम इस बात से हैरान नजर आ रहे हो कि हम मांबेटी की शक्लें आपस में बहुत मिलती हैं?’’ ‘‘आप ने मेरी हैरानी का बिलकुल ठीक कारण ढूंढ़ा है,’’ सुमित ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘हम दोनों की अक्ल भी एक ही ढंग से काम करती है.’’ ‘‘वह कैसे?’’

‘‘हम दोनों ही ‘जीओ और जीने दो’ के सिद्धांत में विश्वास रखती हैं. उन लोगों से संबंध रखना हमें बिलकुल पसंद नहीं जो हमारी जिंदगी में टैंशन पैदा करने की फिराक में रहते हों.’’ ‘‘मम्मी, अब सुमित से भी इस के बारे में कुछ पूछ लो, क्योंकि यह मुझ से शादी करना चाहता है,’’ अंकिता ने अपनी बातूनी मां को टोकना उचित समझा था.

‘‘रियली, दिस इज गुड न्यूज,’’ सीमा ने एक बार फिर सुमित को गले से लगा कर खुश रहने का आशीर्वाद दिया और फिर अपनी बेटी से पूछा, ‘‘क्या तुम ने सुमित को अपने पापा से मिलवाया है?’’ ‘‘अभी नहीं.’’

सीमा मुड़ कर फौरन सुमित को समझाने लगी, ‘‘जब तुम इस के पापा से मिलो, तो उन के बेढंगे सवालों का बुरा मत मानना. उन्हें करीबी लोगों की जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप करने की गंदी आदत है, क्योंकि वे समझते हैं कि उन से ज्यादा समझदार कोई और हो ही नहीं सकता.’’ ‘‘मौम, सुमित यहां आप की शिकायतें सुनने नहीं आया है. आप उस के बारे में कोई सवाल क्यों नहीं पूछ रही हैं?’’ अंकिता ने एक बार फिर अपनी मां को विषय परिवर्तन करने की सलाह दी.

‘‘ओकेओके माई डियर सुमित, मुझे तो तुम से एक ही सवाल पूछना है. क्या तुम अंकिता के लिए अच्छे और विश्वसनीय जीवनसाथी साबित होंगे?’’ ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि शादी के बाद हम बहुत खुश रहेंगे,’’ सुमित ने बेझिझक जवाब दिया.

‘‘मैं नहीं चाहती कि अंकिता मेरी तरह जीवनसाथी का चुनाव करने में गलती करे. मेरी सलाह तो यही है कि तुम दोनों शादी करने का फैसला जल्दबाजी में मत करना. एकदूसरे को अच्छी तरह से समझने के बाद अगर तुम दोनों शादी करने का फैसला करते हो, तो सुखी विवाहित जीवन के लिए मेरा आशीर्वाद तुम दोनों को जरूर मिलेगा.’’

‘‘थैंक यू, आंटी. मैं तो बस, अंकिता की ‘हां’ का इंतजार कर रहा हूं.’’ ‘‘गुड, प्लीज डोंट माइंड, पर इस वक्त मैं जरा जल्दी में हूं. मैं ने एक खास क्लाइंट को उस का ब्राइडल मेकअप करने के लिए अपौइंटमैंट दे रखा है. तुम दोनों से फुरसत से मिलने का कार्यक्रम मैं जल्दी बनाती हूं,’’ सीमा ने बारीबारी दोनों को प्यार से गले लगाया और फिर तेज चाल से चलती हुई पार्लर के अंदरूनी हिस्से में चली गई.

बाहर आ कर सुमित सीमा से हुई मुलाकात के बारे में चर्चा करना चाहता था, पर अंकिता ने उसे रोकते हुए कहा, ‘‘मैं लगे हाथ अपने पापा को भी तुम्हारे बारे में बताने जा रही हूं. मेरे फोन का स्पीकर औन है. हमारे बीच कैसे संबंध हैं, यह समझने के लिए तुम हमारी बातें ध्यान से सुनो, प्लीज.’’ अंकिता ने अपने पापा को सुमित का परिचय देने के बाद जब उस के साथ शादी करने की इच्छा के बारे में बताया, तो उन्होंने गंभीर लहजे में कहा, ‘‘तुम सुमित को कल शाम घर ले आओ.’’

‘‘जरा सोचसमझ कर हमें घर आने का न्योता दो, पापा. आप मेरी जिंदगी में दिलचस्पी ले रहे हैं, यह देख कर आप की दूसरी वाइफ नाराज तो नहीं होंगी न?’’ अंकिता के व्यंग्य से तिलमिलाए उस के पापा ने भी तीखे लहजे में कहा, ‘‘तुम बिलकुल अपनी मां जैसी बददिमाग हो गई हो और उसी के जैसे वाहियात लहजे में बातें भी करती हो. पिता होने के नाते मैं तुम से दूर नहीं हो सकता, वरना तुम्हारा बात करने का ढंग मुझे बिलकुल पसंद नहीं है.’’

‘‘आप दूर जाने की बात मत करिए, क्योंकि आप की सैकंड वाइफ ने आप को मुझ से पहले ही बहुत दूर कर दिया है.’’ ‘‘देखो, यह चेतावनी मैं तुम्हें अभी दे रहा हूं कि कल शाम तुम उस के साथ तमीज से पेश…’’

‘‘मैं कल आप के घर नहीं आ रही हूं. सुमित को किसी और दिन आप के औफिस ले आऊंगी.’’ ‘‘तुम बहुत ज्यादा जिद्दी और बददिमाग होती जा रही हो.’’

‘‘थैंक यू एेंड बाय पापा,’’ चिढ़े अंदाज में ऐसा कह कर अंकिता ने फोन काट दिया था.

अपने मूड को ठीक करने के लिए अंकिता ने पहले कुछ गहरी सांसें लीं और फिर सुमित से पूछा, ‘‘अब बताओ कि तुम्हें मेरे मातापिता कैसे लगे? क्या राय बनाई है तुम ने उन दोनों के बारे में?’’ ‘‘अंकिता, मुझे उन दोनों के बारे में कोई भी राय बनाने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है. तुम्हें उन से जुड़ कर रहना ही है और मैं उन के साथ हमेशा इज्जत से पेश आता रहूंगा,’’ सुमित ने उसे अपनी राय बता दी.

उस का जवाब सुन अंकिता खुश हो कर बोली, ‘‘तुम तो शायद दुनिया के सब से ज्यादा समझदार इंसान निकलोगे. मुझे विश्वास होने लगा है कि हम शादी कर के खुश रह सकेंगे, पर…’’ ‘‘पर क्या?’’

‘‘पर फिर भी मैं चाहूंगी कि तुम अपना फाइनल जवाब मुझे कल दो.’’ ‘‘ओके, कल कब और कहां मिलोगी?’’

‘‘करने को बहुत सी बातें होंगी, इसलिए नेहरू पार्क में मिलते हैं.’’ ‘‘ओके.’’

अगले दिन रविवार को दोनों नेहरू पार्क में मिले. सुमित की आंखों में तनाव के भाव पढ़ कर अंकिता ने मजाकिया लहजे में कहा, ‘‘यार, इतनी ज्यादा टैंशन लेने की जरूरत नहीं है. तुम मुझ से शादी नहीं कर सकते हो, अपना यह फैसला बताने से तुम घबराओ मत.’’ उस के मजाक को नजरअंदाज करते हुए सुमित गंभीर लहजे में बोला, ‘‘कल रात को किसी लड़की ने मुझे फोन कर राजीव के बारे में बताया है.’’

‘‘यह तो उस ने अच्छा काम किया, नहीं तो आज मैं खुद ही तुम्हें उस के बारे में बताने वाली थी,’’ अंकिता ने बिना विचलित हुए जवाब दिया. ‘‘क्या तुम उस के बहुत ज्यादा करीब थी?’’

‘‘हां.’’ ‘‘तुम दोनों एकदूसरे से दूर क्यों हो गए?’’

‘‘उस का दिल मुझ से भर गया… उस के जीवन में दूसरी लड़की आ गई थी.’’ ‘‘क्या तुम उस के साथ शिमला घूमने गई थी?’’

‘‘हां.’’ ‘‘क्या तुम वहां उस के साथ एक ही कमरे में रुकी थी?’’

उस की आंखों में देखते हुए अंकिता ने दृढ़ लहजे में जवाब दिया, ‘‘रुके तो हम अलगअलग कमरों में थे, पर मैं ने 2 रातें उस के कमरे में ही गुजारी थीं.’’ उस का जवाब सुन कर सुमित को एकदम झटका लगा. अपने आंतरिक तनाव से परेशान हो वह दोनों हाथों से अपनी कनपटियां मसलने लगा.

‘‘मैं तुम से इस वक्त झूठ नहीं बोलूंगी सुमित, क्योंकि तुम से… अपने भावी जीवनसाथी से अपने अतीत को छिपा कर रखना बहुत गलत होगा.’’ ‘‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या कहूं. मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं. तुम से शादी करना चाहता हूं, पर…पर…’’

‘‘मैं अच्छी तरह से समझ सकती हूं कि तुम्हारे मन में इस वक्त क्या चल रहा है, सुमित. अच्छा यही रहेगा कि इस मामले में तुम पहले मेरी बात ध्यान से सुनो. मैं खुद नहीं चाहती हूं कि तुम जल्दबाजी में मुझ से शादी करने का फैसला करो.’’ बहुत दुखी और परेशान नजर आ रहे सुमित ने अपना सारा ध्यान अंकिता पर केंद्रित कर दिया.

अंकिता ने उस की आंखों में देखते हुए गंभीर लहजे में बोलना शुरू किया, ‘‘राजीव मुझ से बहुत प्रेम करने का दम भरता था और मैं उस के ऊपर आंख मूंद कर विश्वास करती थी. इसीलिए जब उस ने जोर डाला तो मैं न उस के साथ शिमला जाने से इनकार कर सकी और न ही कमरे में रात गुजारने से. ‘‘मैं ने फैसला कर रखा है कि उस धोखेबाज इंसान को न पहचान पाने की अपनी गलती के लिए घुटघुट कर जीने की सजा खुद को बिलकुल नहीं दूंगी. अब तुम ही बताओ कि मुझे क्या करना चाहिए?

‘‘क्या मैं आजीवन अपराधबोध का शिकार बन कर जीऊं? तुम्हारे प्रेम का जवाब प्रेम से न दूं? तुम से शादी हो जाए, तो हमेशा डरतीकांपती रहूं कि कहीं से राजीव और मेरे अतीत के नजदीकी रिश्तों के बारे में तुम्हें पता न लग जाए? ‘‘मैं चाहती हूं कि तुम भावुक हो कर शादी के लिए ‘हां’ मत कहो. तुम्हें राजीव के बारे में पता है… मेरे मातापिता के तलाक, उन की जीवनशैली और उन के मेरे तनाव भरे रिश्तों की जानकारी अब तुम्हें है.

इन सब बातों को जान कर तुम्हारे मन में मेरी इज्जत कम हो गई हो या मेरी छवि बिगड़ गई हो, तो मेरे साथ सात फेरे लेने का फैसला बदल दो.’’ अंकिता की सारी बातें सुन कर सुमित जब खामोश बैठा रहा, तो अंकिता उठ कर खड़ी हो गई और बुझे स्वर में बोली, ‘‘तुम अपना फाइनल फैसला मुझे बाद में फोन कर के बता देना. अभी मैं चलती हूं.’’

पार्क के गेट की तरफ बढ़ रही अंकिता को जब सुमित ने पीछे से आवाज दे कर नहीं रोका, तो उस के तनमन में अजीब सी उदासी और मायूसी भरती चली गई थी. आंखों से बह रही अविरल अश्रुधारा को रोकने की नाकामयाब कोशिश करते हुए जब वह आटोरिकशा में बैठने जा रही थी, तभी सुमित ने पीछे से आ कर उस का हाथ पकड़ लिया. उस की फूली सांसें बता रही थीं कि वह दौड़ते हुए वहां

पहुंचा था. ‘‘तुम्हें मैं इतनी आसानी से जिंदगी से दूर नहीं होने दूंगा, मैडम,’’ सुमित ने उस का हाथ थाम कर भावुक लहजे में अपने दिल की बात कही.

‘‘मेरे अतीत के कारण तुम हमारी शादी होने के बाद दुखी रहो, यह मेरे लिए असहनीय बात होगी. सुमित, अच्छा यही रहेगा कि हम दोस्त…’’ उस के मुंह पर हाथ रख कर सुमित ने उसे आगे बोलने से रोका और कहा, ‘‘जब तुम चलतेचलते मेरी नजरों से ओझल हो गई, तो मेरा मन एकाएक गहरी उदासी से भर गया था…वह मेरे लिए एक महत्त्वपूर्ण फैसला करने की घड़ी थी…और मैं ने फैसला कर लिया है.

‘‘मेरा फैसला है कि मुझे अपनी बाकी की जिंदगी तुम्हारे ही साथ गुजारनी है.’’ ‘‘सुमित, भावुक हो कर जल्दबाजी में…’’

उस के कहे पर ध्यान दिए बिना बहुत खुश नजर आ रहा सुमित बोले जा रहा था, ‘‘मेरा यह अहम फैसला दिल से आया है, स्वीटहार्ट. अतीत में किसी और के साथ बने सैक्स संबंध को हमारे आज के प्यार से ज्यादा महत्त्व देने की मूढ़ता मैं नहीं दिखाऊंगा. विल यू मैरी मी?’’ ‘‘पर…’’

‘‘अब ज्यादा भाव मत खाओ और फटाफट ‘हां’ कर दो, माई लव,’’ सुमित ने अपनी बांहें फैला दीं. ‘‘हां, माई लव,’’ खुशी से कांप रही आवाज में अपनी रजामंदी प्रकट करने के बाद अंकिता सुमित की बांहों के मजबूत घेरे में कैद हो गई. Romantic Story In Hindi

Family Story In Hindi: जीवन संध्या में – क्या साथ हो पाए प्रभाकर और पद्मा?

Family Story In Hindi: तनहाई में वे सिर झुकाए आरामकुरसी पर आंखें मूंदे लेटे हुए हैं. स्वास्थ्य कमजोर है आजकल. अपनी विशाल कोठी को किराए पर दे रखा है उन्होंने. अकेली जान के लिए 2 कमरे ही पर्याप्त हैं. बाकी में बच्चों का स्कूल चलता है.

बच्चों के शोरगुल और अध्यापिकाओं की चखचख से अहाते में दिनभर चहलपहल रहती है. परंतु शाम के अंधेरे के साथ ही कोठी में एक गहरा सन्नाटा पसर जाता है. आम, जामुन, लीची, बेल और अमरूद के पेड़ बुत के समान चुपचाप खड़े रहते हैं.

नौकर छुट्टियों में गांव गया तो फिर वापस नहीं आया. दूसरा नौकर ढूंढ़े कौन? मलेरिया बुखार ने तो उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है. एक गिलास पानी के लिए तरस गए हैं. वे इतनी विशाल कोठी के मालिक हैं, मगर तनहा जिंदगी बिताने के लिए मजबूर हैं.

जिह्वा की मांग है कि कोई चटपटा व्यंजन खाएं, मगर बनाए कौन? अपने हाथों से कभी कुछ खास बनाया नहीं. नौकर था तो जो कच्चापक्का बना कर सामने रख देता, वे उसे किसी तरह गले के नीचे उतार लेते थे. बाजार जाने की ताकत नहीं थी.

स्कूल में गरमी की छुट्टियां चल रही हैं. रात में चौकीदार पहरा दे जाता है. पासपड़ोसी इस इलाके में सभी कोठी वाले ही हैं. किस के घर क्या हो रहा है, किसी को कोई मतलब नहीं.

आज अगर वे इसी तरह अपार धनसंपदा रहते हुए भी भूखेप्यासे मर जाएं तो किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा. उन का मन भर आया. डाक्टर बेटा सात समुंदर पार अपना कैरियर बनाने गया है. उसे बूढ़े बाप की कोई परवा नहीं. पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने कितनी तकलीफ और यत्न से बच्चों को पाला है, वही जानते हैं. कभी भूल कर भी दूसरी शादी का नाम नहीं लिया. सौतेली मां के किस्से सुन चुके हैं. बेटी सालछह महीने में एकदो दिन के लिए आ जाती है.

‘बाबूजी, आप मेरे साथ चल कर रहिए,’ बेटी पूजा बड़े आग्रह से कहती.

‘क्यों, मुझे यहां क्या कमी है,’ वे फीकी हंसी हंसते .

‘कमी तो कुछ नहीं, बाबूजी. आप बेटी के पास नहीं रहना चाहते तो भैया के पास अमेरिका ही चले जाइए,’ बेटी की बातों पर वे आकाश की ओर देखने लगते.

‘अपनी धरती, पुश्तैनी मकान, कारोबार, यहां तेरी अम्मा की यादें बसी हुई हैं. इन्हें छोड़ कर सात समुंदर पार कैसे चला जाऊं? यहीं मेरा बचपन और जवानी गुजरी है. देखना, एक दिन तेरा डाक्टर भाई परिचय भी वापस अपनी धरती पर अवश्य आएगा.’

वे भविष्य के रंगीन सपने देखने लगते.

फाटक खुलने की आवाज पर वे चौंक उठे. दिवास्वप्न की कडि़यां बिखर गईं. ‘कौन हो सकता है इस समय?’

चौकीदार था. साथ में पद्मा थी.

‘‘अरे पद्मा, आओ,’’ प्रभाकरजी का चेहरा खिल उठा. पद्मा उन के दिवंगत मित्र की विधवा थी. बहुत ही कर्मठ और विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य न खोने वाली महिला.

‘‘तुम्हारी तबीयत अब कैसी है?’’ बोलते हुए वह कुरसी खींच कर बैठ गई.

‘‘तुम्हें कैसे पता कि मैं बीमार हूं?’’ वे आश्चर्य से बोले.

‘‘चौकीदार से. बस, भागी चली आ रही हूं. इसी से पता चला कि रामू भी घर चला गया है. मुझे  क्या गैर समझ रखा है? खबर क्यों नहीं दी?’’ पद्मा उलाहने देने लगी.

वे खामोशी से सुनते रहे. ये उलाहने उन के कानों में मधुर रस घोल रहे थे, तप्त हृदय को शीतलता प्रदान कर रहे थे. कोई तो है उन की चिंता करने वाला.

‘‘बोलो, क्या खाओगे?’’

‘‘पकौडि़यां, करारी चटपटी,’’ वे बच्चे की तरह मचल उठे.

‘‘क्या? तीखी पकौडि़यां? सचमुच सठिया गए हो तुम. भला बीमार व्यक्ति भी कहीं तलीभुनी चीजें खाता है?’’ पद्मा की पैनी बातों की तीखी धार उन के हृदय को चुभन के बदले सुकून प्रदान कर रही थी.

‘‘अच्छा, सुबह आऊंगी,’’ उन्हें फुलके और परवल का झोल खिला कर पद्मा अपने घर चली गई.

प्रभाकरजी का मन भटकने लगा. पूरी जवानी उन्होंने बिना किसी स्त्री के काट दी. कभी भी सांसारिक विषयवासनाओं को अपने पास फटकने नहीं दिया. कर्तव्य की वेदी पर अपनी नैसर्गिक कामनाओं की आहुति चढ़ा दी. वही वैरागी मन आज साथी की चाहना कर रहा है.

यह कैसी विडंबना है? जब बेटा 3 साल और बेटी 3 महीने की थी, उसी समय पत्नी 2 दिनों की मामूली बीमारी में चल बसी. उन्होंने रोते हुए दुधमुंहे बच्चों को गले से लगा लिया था. अपने जीवन का बहुमूल्य समय अपने बच्चों की परवरिश पर न्योछावर कर दिया. बेटे को उच्च शिक्षा दिलाई, शादी की, विदेश भेजा. बेटी को पिता की छाया के साथसाथ एक मां की तरह स्नेह व सुरक्षा प्रदान की. आज वह पति के घर में सुखी दांपत्य जीवन व्यतीत कर रही है.

पद्मा भी भरी जवानी में विधवा हो गई थी. दोनों मासूम बेटों को अपने संघर्ष के बल पर योग्य बनाया. दोनों बड़े शहरों में नौकरी करते हैं. पद्मा बारीबारी से बेटों के पास जाती रहती है. मगर हर घर की कहानी कुछ एक जैसी ही है. योग्य होने पर कमाऊ बेटों पर मांबाप से ज्यादा अधिकार उन की पत्नी का हो जाता है. मांबाप एक फालतू के बोझ समझे जाने लगते हैं.

पद्मा में एक कमी थी. वह अपने बेटों पर अपना पहला अधिकार समझती थी. बहुओं की दाब सहने के लिए वह तैयार नहीं थी, परिणामस्वरूप लड़झगड़ कर वापस घर चली आई. मन खिन्न रहने लगा. अकेलापन काटने को दौड़ता, अपने मन की बात किस से कहे.

प्रभाकर और पद्मा जब इकट्ठे होते तो अपनेअपने हृदय की गांठें खोलते, दोनों का दुख एकसमान था. दोनों अकेलेपन से त्रस्त थे और मन की बात कहने के लिए उन्हें किसी साथी की तलाश थी शायद.

प्रभाकरजी स्वस्थ हो गए. पद्मा ने उन की जीजान से सेवा की. उस के हाथों का स्वादिष्ठ, लजीज व पौष्टिक भोजन खा कर उन का शरीर भरने लगा.

आजकल पद्मा दिनभर उन के पास ही रहती है. उन की छोटीबड़ी जरूरतों को दौड़भाग कर पूरा करने में अपनी संतानों की उपेक्षा का दंश भूली हुई है. कभीकभी रात में भी यहीं रुक जाती है.

हंसीठहाके, गप में वे एकदूसरे के कब इतने करीब आ गए, पता ही नहीं चला. लौन में बैठ कर युवकों की तरह आपस में चुहल करते. मन में कोई बुरी भावना नहीं थी, परंतु जमाने का मुंह वे कैसे बंद करते? लोग उन की अंतरंगता को कई अर्थ देने लगे. यहांवहां कई तरह की बातें उन के बारे में होने लगीं. इस सब से आखिर वे कब तक अनजान रहते. उड़तीउड़ती कुछ बातें उन तक भी पहुंचने लगीं.

2 दिनों तक पद्मा नहीं आई. प्रभाकरजी का हृदय बेचैन रहने लगा. पद्मा के सुघड़ हाथों ने उन की अस्तव्यस्त गृहस्थी को नवजीवन दिया था. भला जीवनदाता को भी कोई भूलता है. दिनभर इंतजार कर शाम को पद्मा के यहां जा पहुंचे. कल्लू हलवाई के यहां से गाजर का हलवा बंधवा लिया. गाजर का हलवा पद्मा को बहुत पसंद है.

गलियों में अंधेरा अपना साया फैलाने लगा था. न रोशनी, न बत्ती, दरवाजा अंदर से बंद था. ठकठकाने पर पद्मा ने ही दरवाजा खोला.

‘‘आइए,’’ जैसे वह उन का ही इंतजार कर रही थी. पद्मा की सूजी हुई आंखें देख कर प्रभाकर ठगे से रह गए.

‘‘क्या बात है? खैरियत तो है?’’ कोई जवाब न पा कर प्रभाकर अधीर हो उठे. अपनी जगह से उठ पद्मा का आंसुओं से लबरेज चेहरा उठाया. तकिए के नीचे से पद्मा ने एक अंतर्देशीय पत्र निकाल कर प्रभाकर के हाथों में पकड़ा दिया.

कोट की ऊपरी जेब से ऐनक निकाल कर वे पत्र पढ़ने लगे. पत्र पढ़तेपढ़ते वे गंभीर हो उठे, ‘‘ओह, इस विषय पर तो हम ने सोचा ही नहीं था. यह तो हम दोनों पर लांछन है. यह चरित्रहनन का एक घिनौना आरोप है, अपनी ही संतानों द्वारा,’’ उन का चेहरा तमतमा उठा. उठ कर बाहर की ओर चल पड़े.

‘‘तुम तो चले जा रहे हो, मेरे लिए कुछ सोचा है? मुझे उन्हें अपनी संतान कहते हुए भी शर्म आ रही है.’’

पद्मा हिलकहिलक कर रोने लगी. प्रभाकर के बढ़ते कदम रुक गए. वापस कुरसी पर जा बैठे. कोई रास्ता सूझ नहीं रहा था.

‘‘क्या किया जाए? जब तुम्हारे बेटों को हमारे मिलनेजुलने में आपत्ति है, इस का वे गलत अर्थ लगाते हैं तो हमारा एकदूसरे से दूर रहना ही बेहतर है. अब बुढ़ापे में मिट्टी पलीद करानी है क्या?’’ उन्हें अपनी ही आवाज काफी दूर से आती महसूस हुई.

पिछले एक सप्ताह से वे पद्मा से नहीं मिल रहे हैं. तबीयत फिर खराब होने लगी है. डाक्टर ने पूर्णआराम की सलाह दी है. शरीर को तो आराम उन्होंने दे दिया है पर भटकते मन को कैसे विश्राम मिले?

पद्मा के दोनों बेटों की वैसे तो आपस में बिलकुल नहीं पटती है, मगर अपनी मां के गैर मर्द से मेलजोल पर वे एकमत हो आपत्ति प्रकट करने लगे थे.

पता नहीं उन के किस शुभचिंतक ने प्रभाकरजी व पद्मा के घनिष्ठ संबंध की खबर उन तक पहुंचा दी थी.

प्रभाकरजी का रोमरोम पद्मा को पुकार रहा था. जवानी उन्होंने दायित्व निर्वाह की दौड़भाग में गुजार दी थी. परंतु बुढ़ापे का अकेलापन उन्हें काटने दौड़ता था. यह बिना किसी सहारे के कैसे कटेगा, यह सोचसोच कर वे विक्षिप्त से हो जाते. कोई तो हमसफर हो जो उन के दुखसुख में उन का साथ दे, जिस से वे मन की बातें कर सकें, जिस पर पूरी तरह निर्भर हो सकें. तभी डाकिए ने आवाज लगाई :

‘‘चिट्ठी.’’

डाकिए के हाथ में विदेशी लिफाफा देख कर वे पुलकित हो उठे. जैसे चिट्ठी के स्थान पर स्वयं उन का बेटा परिचय खड़ा हो. सच, चिट्ठी से आधी मुलाकात हो जाती है. परिचय ने लिखा है, वह अगले 5 वर्षों तक स्वदेश नहीं आ सकता क्योंकि उस ने जिस नई कंपनी में जौइन किया है, उस के समझौते में एक शर्त यह भी है.

प्रभाकरजी की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. उन की खुशी काफूर हो गई. वे 5 वर्ष कैसे काटेंगे, सिर्फ यादों के सहारे? क्या पता वह 5 वर्षों के बाद भी भारत आएगा या नहीं? स्वास्थ्य गिरता जा रहा है. कल किस ने देखा है. वादों और सपनों के द्वारा किसी काठ की मूरत को बहलाया जा सकता है, हाड़मांस से बने प्राणी को नहीं. उस की प्रतिदिन की जरूरतें हैं. मन और शरीर की ख्वाहिशें हैं. आज तक उन्होंने हमेशा अपनी भावनाओं पर विजय पाई है, मगर अब लगता है कि थके हुए तनमन की आकांक्षाओं को यों कुचलना आसान नहीं होगा.

बेटी ने खबर भिजवाई है. उस के पति 6 महीने के प्रशिक्षण के लिए दिल्ली जा रहे हैं. वह भी साथ जा रही है. वहां से लौट कर वह पिता से मिलने आएगी.

वाह री दुनिया, बेटा और बेटी सभी अपनीअपनी बुलंदियों के शिखर चूमने की होड़ में हैं. बीमार और अकेले पिता के लिए किसी के पास समय नहीं है. एक हमदर्द पद्मा थी, उसे भी उस के बेटों ने अपने कलुषित विचारों की लक्ष्मणरेखा में कैद कर लिया. यह दुनिया ही मतलबी है. यहां संबंध सिर्फ स्वार्थ की बुनियाद पर विकसित होते हैं. उन का मन खिन्न हो उठा.

‘‘प्रभाकर, कहां हो भाई?’’ अपने बालसखा गिरिधर की आवाज पहचानने में उन्हें भला क्या देर लगती.

‘‘आओआओ, कैसे आना हुआ?’’

‘‘बिटिया की शादी के सिलसिले में आया था. सोचा तुम से भी मिलता चलूं,’’ गिरिधरजी का जोरदार ठहाका गूंज उठा.

हंसना तो प्रभाकरजी भी चाह रहे थे, परंतु हंसने के उपक्रम में सिर्फ होंठ चौड़े हो कर रह गए. गिरिधर की अनुभवी नजरों ने भांप लिया, ‘दाल में जरूर कुछ काला है.’

शुरू में तो प्रभाकर टालते रहे, पर धीरेधीरे मन की परतें खुलने लगीं. गिरिधर ने समझाया, ‘‘देखो मित्र, यह समस्या सिर्फ तुम्हारी और पद्मा की नहीं है बल्कि अनेक उस तरह के विधुर  और विधवाओं की है जिन्होंने अपनी जवानी तो अपने कर्तव्यपालन के हवाले कर दी, मगर उम्र के इस मोड़ पर जहां न वे युवा रहते हैं और न वृद्ध, वे नितांत अकेले पड़ जाते हैं. जब तक उन के शरीर में ताकत रहती है, भुजाओं में सारी बाधाओं से लड़ने की हिम्मत, वे अपनी शारीरिक व मानसिक मांगों को जिंदगी की भागदौड़ की भेंट चढ़ा देते हैं.

‘‘बच्चे अपने पैरों पर खड़े होते ही अपना आशियाना बसा लेते हैं. मातापिता की सलाह उन्हें अनावश्यक लगने लगती है. जिंदगी के निजी मामले में हस्तक्षेप वे कतई बरदाश्त नहीं कर पाते. इस के लिए मात्र हम नई पीढ़ी को दोषी नहीं ठहरा सकते. हर कोई अपने ढंग से जीवन बिताने के लिए स्वतंत्र होता है. सीढ़ी दर सीढ़ी आगे बढ़ना ही तो दुनियादारी है.’’

‘‘बात तो तुम्हारी ठीक है, परंतु पद्मा और मैं दोनों बिलकुल अकेले हैं. अगर एकसाथ मिल कर हंसबोल लेते हैं तो दूसरों को आपत्ति क्यों होती है?’’ प्रभाकरजी ने दुखी स्वर में कहा.

‘‘सुनो, मैं सीधीसरल भाषा में तुम्हें एक सलाह देता हूं. तुम पद्मा से शादी क्यों नहीं कर लेते?’’ उन की आंखों में सीधे झांकते हुए गिरधर ने सामयिक सुझाव दे डाला.

‘‘क्या? शादी? मैं और पद्मा से? तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है? लोग क्या कहेंगे? हमारी संतानों पर इस का क्या असर पड़ेगा? जीवन की इस सांध्यवेला में मैं विवाह करूं? नहींनहीं, यह संभव नहीं,’’ प्रभाकरजी घबरा उठे.

‘‘अब लगे न दुहाई देने दुनिया और संतानों की. यही बात लोगों और पद्मा के बेटों ने कही तो तुम्हें बुरा लगा. विवाह करना कोई पाप नहीं. जहां तक जीवन की सांध्यवेला का प्रश्न है तो ढलती उम्र वालों को आनंदमय जीवन व्यतीत करना वर्जित थोड़े ही है. मनुष्य जन्म से ले कर मृत्यु तक किसी न किसी सहारे की तलाश में ही तो रहता है. पद्मा और तुम अपने पवित्र रिश्ते पर विवाह की सामाजिक मुहर लगा लो. देखना, कानाफूसियां अपनेआप बंद हो जाएंगी. रही बात संतानों की, तो वे भी ठंडे दिमाग से सोचेंगे तो तुम्हारे निर्णय को बिलकुल उचित ठहराएंगे. कभीकभी इंसान को निजी सुख के लिए भी कुछ करना पड़ता है. कुढ़ते रह कर तो जीवन के कुछ वर्ष कम ही किए जा सकते हैं. स्वाभाविक जीवनयापन के लिए यह महत्त्वपूर्ण निर्णय ले कर तुम और पद्मा समाज में एक अनुपम और प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करो.’’

‘‘क्या पद्मा मान जाएगी?’’

‘‘बिलकुल. पर तुम पुरुष हो, पहल तो तुम्हें ही करनी होगी. स्त्री चाहे जिस उम्र की हो, उस में नारीसुलभ लज्जा तो रहती ही है.’’

गिरिधर के जाने के बाद प्रभाकर एक नए आत्मविश्वास के साथ पद्मा के घर की ओर चल पड़े, अपने एकाकी जीवन को यथार्थ के नूतन धरातल पर प्रतिष्ठित करने के लिए. जीवन की सांध्यवेला में ही सही, थोड़ी देर के लिए ही पद्मा जैसी सहचरी का संगसाथ और माधुर्य तो मिलेगा. जीवनसाथी मनोनुकूल हो तो इंसान सारी दुनिया से टक्कर ले सकता है. इस छोटी सी बात में छिपे गूढ़ अर्थ को मन ही मन गुनगुनाते वे पद्मा का बंद दरवाजा एक बार फिर खटखटा रहे थे. Family Story In Hindi

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