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Hindi Family Story: आस पूरी हुई – धोती और चप्पल बनी इज्जत का सवाल

Hindi Family Story: रमेश्वर आज अपनी पहली कमाई से सोमरू के लिए नई धोती और कजरी के लिए  चप्पल लाया था. अपनी मां को उस ने कई बार राजा ठाकुर के घर में नईनई लाललाल चप्पलों को ताकते देखा था. वह चाहता था कि उस के पिता भी बड़े लोगों की तरह घुटनों के नीचे तक साफ सफेद धोती पहन कर निकलें, पर कभी ऐसा हो न सका था.

कजरी ने धोती और चप्पल संभाल कर रख दी और बेटे को समझ दिया कि कभी शहर जाएंगे तो पहनेंगे. गांव में बड़े लोगों के सामने सदियों से हम छोटी जाति की औरतें चप्पल पहन कर नहीं निकलीं तो अब क्या निकलेंगी.

कजरी मन ही मन सोच रही थी कि इन्हीं चप्पलों की खातिर राजा ठाकुर के बेटे ने कैसे उस से भद्दा मजाक किया था और घुटनों से नीचे तक धोती पहनने के चलते भरी महफिल में सोमरू को नंगा किया गया था.

कजरी और सोमरू धौरहरा गांव में रहते थे. सोमरू यानी सोनाराम और कजरी उस की पत्नी.

सोमरू कहार था और अपने पिता के जमाने से राजा ठाकुरों यहां पानी भरना, बाहर से सामान लाना, खेतखलिहानों में काम करना जैसी बेगारी करता था.

राजा ठाकुरों की गालीगलौज, मारपीट  जैसे उस के लिए आम बात थी. कजरी भी उस के साथसाथ राजा ठाकुरों के घरों में काम करती थी.

कजरी थी सलीकेदार, खूबसूरत और फैशनेबल भी. काम ऐसा सलीके से करती थी कि राजा ठाकुरों की बहुएं भी उस के सामने पानी भरती थीं.

एक दिन आंगन लीपते समय कजरी घर की नई बहू की चमचमाती नईनई चप्पलें उठा कर रख रही थी कि राजा ठाकुर के बड़े बेटे की नजर उस पर पड़ गई. उस ने कहा, ‘‘कजरी, चप्पल पहनने का शौक हो रहा है क्या…? बोलो तो तुम्हारे लिए भी ला दें, लेकिन सोमरू को मत बताना. हमारीतुम्हारी आपस की बात रहेगी.

‘‘तुम्हारे नाजुक पैर चप्पल बिना अच्छे नहीं लगते. सब के सामने नहीं पहन सकती तो क्या हुआ… मेरा कमरा है न… रात को मेरे कमरे में पहन कर आ जाना. कोई नहीं देखेगा मेरे अलावा.’’

कजरी का मन हुआ कि चप्पल उस के मुंह पर मार दे, पर क्या करती… एक भद्दी सी गाली दे कर चुप रह गई. कजरी आंगन लीप कर हाथ धोने बाहर जा रही थी तभी देखा कि राजा साहब सोमरू को बुला रहे थे.

सोमरू घर के बाहर झाड़ू लगा रहा था. राजा ठाकुर भरी महफिल के सामने गरजे, ‘‘अबे सोमरू, बहुत चरबी चढ़ गई है तुझे. कई दिन से देख रहा हूं तेरी धोती घुटनों से नीची होती जा रही है. राजा बनने का इरादा है क्या?

‘‘जो काम तुम्हारे बापदादा ने नहीं किया, तुम करने की जुर्रत कर रहे हो? लगता है, जोरू कुछ ज्यादा ही घी पिला रही है…’’ और राजा साहब ने सब के सामने उस की धोती खोल कर फेंक दी.

भरी सभा में यह सब देख कर लोग जोरजोर से हंसने लगे. एक गरीब आदमी सब के सामने नंगा हो गया था. सोमरू को तो जैसे काठ मार गया.

सोमरू इधरउधर देख रहा था कि कहीं कजरी उसे देख तो नहीं रही. दरवाजे के पीछे खड़ी कजरी को उस ने खुद देख लिया. वह जमीन में गड़ गया.

कजरी दरवाजे की ओट से सब देख रही थी. शरीर जैसे जम सा गया था. वह जिंदा लाश की तरह खड़ी थी.

कजरी और सोमरू एकदूसरे से नजरें नहीं मिला पा रहे थे. आखिर क्या कहते? कैसे दिलासा देते? दोनों अंदर ही अंदर छटपटा रहे थे.

कजरी ने सोमरू की थाली जरूर लगाई, पर वह रातभर वैसी ही पड़ी रही. दोनों पानी पी कर लेट गए, पर नींद किस की आंखों में थी? उन का दर्द इतना साझा था कि बांटने की जरूरत न थी.

कजरी का दर्द पिघलपिघल कर उस की आंखों से बह रहा था, पर सोमरू… वह तो पत्थर की मानिंद पड़ा था. कजरी के सामने बारबार अपने पति का भरी सभा में बेइज्जत किया जाना कौंध जाता था और सोमरू को कजरी की डबडबाई आंखें नहीं भूल रही थीं.

कजरी और सोमरू की जिंदगी यों ही बीत रही थी. बेटे रमेश्वर को उन्होंने जीतोड़ मेहनतमजदूरी, कर्ज ले कर पढ़ायालिखाया था.

सोमरू चाहता था कि उस के बेटे को कम से कम ऐसी जलालत भरी जिंदगी न जीनी पड़े. जिंदा हो कर भी मुरदों जैसे दिन न काटने पड़ें.

रमेश्वर पढ़लिख कर एक स्कूल में टीचर हो गया था और शहर में ही रहने लगा था. सोमरू चाहता भी नहीं था कि वह गांव लौटे. उन का बुढ़ापा जैसेतैसे कट ही जाएगा, पर बेटा खुशी और इज्जत से तो रहेगा.

सोमरू की एक आस मन में ही दबी थी कि वह और कजरी साथ घूमने जाएं.  कजरी अपनी मनपसंद चप्पल पहन कर उस के साथ शहर की चिकनी सड़क पर चले, जो रमेश्वर उस के लिए लाया था.

सोमरू अपने मन की आस किसी के सामने कह भी नहीं सकता था और कजरी को तो बिलकुल भी नहीं बता सकता था. कहां खाने के लाले पड़े थे और वह घूमने के बारे में सोच रहा है.

जमुनिया ताल के किनारे कजरी एक दिन बरतन धो रही थी. सोमरू भी वहीं बैठा था. उस दिन सोमरू ने अपने मन की बात कजरी को बताई, ‘‘बुढ़ापा आ गया  कजरी, पर मन की एक हुलस आज तक पूरी न कर पाया. चाहता था कि कसबे में चल रहे मेले में दोनों जन घूम आएं.’’

सोमरू एक बार उसे चप्पल पहने देखना चाहता था, जैसे नई ठकुराइन अपने ब्याह में पहन कर आई थीं.

रमेश्वर कितने प्यार से लाया था अपनी पहली कमाई से, पर इस गांव में यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी. जिंदगी बीत गई. अब जाने कितने दिन बचे हैं. एक बार मेला भी देख लें. कितना सुना है उस के बारे में. यह इच्छा पूरी हो जाए, फिर चाहे मौत ही क्यों न आ जाए, शिकायत न होगी.

कजरी को लगा कि सोमरू का दिमाग खिसक गया है. यह कोई उम्र है चप्पल पहन कर घूमने की. सारी जिंदगी नंगे पैर बीत गई. जब उम्र थी तब तो कभी न कहा कि चलो घूम आएं. अब बुढ़ापे में घूमने जाएंगे. उस समय तो कजरी ने कुछ न कहा, पर कहीं न कहीं सोमरू ने उस की दबी इच्छा जगा दी थी.

रात में कजरी सोमरू को खाना खिलाते समय बोली, ‘‘कहते तो तुम ठीक ही हो. जिंदगीभर कमाया और इस पापी पेट के हवाले किया. कुछ पैसा जोड़ कर रखे थे कि बीमारी में काम आएगा, पर लगता है कि अब थोड़ा हम अपने लिए भी जी लें, खानाकमाना तो मरते दम तक चलता ही रहेगा. पेट ने कभी बैठने दिया है इनसान को भला?’’

दोनों ने अगले महीने ही गांव से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर ओरछा के मेले में जाने की योजना बनाई.

पूरे महीने दोनों तैयारी करते रहे. पैसा इकट्ठा किया. कपड़ेलत्ते संभाले. गांव वालों को बताया. बेटों को बताया. नातेरिश्तेदारों को खबर की कि कोई साथ में जाना चाहे तो उन के साथ चले. आखिर कोई संगीसाथी मिल जाएगा तो भला ही होगा. जाने का दिन भी आ गया, पर कोई तैयार न हुआ.

गांव से 4 किलोमीटर पैदल जा कर एक कसबा था, जहां से ओरछा के लिए सीधी ट्रेन जाती थी. दोनों बूढ़ाबूढ़ी भोर में ही गांव से पैदल चल दिए.

स्टेशन तक पहुंचतेपहुंचते सूरज भी सिर पर आ गया था. 11 बजे दोनों ट्रेन में खुशीखुशी बैठ गए. आखिर बरसों की साध पूरी होने जा रही थी.

कजरी घर से ही खाना बना कर लाई थी. दोनों ने खाया और बाहर का नजारा देखतेदेखते जाने कब सफर पूरा हो गया, पता ही न चला.

रात में दोनों एक धर्मशाला के बाहर ही सो गए. अगले दिन सुबह मेले में शामिल हुए. पूरा दिन वहीं गुजारा. कजरी ने एकसाथ इतनी दुकानें कभी न देखी थीं. हर दुकान के सामने खड़ी हो कर वह वहां रखे चमकते सामान को देखती और अपनी गांठ में बंधे रुपयों पर हाथ फेरती. दुकान में घुस कर दाम पूछने की हिम्मत न पड़ती.

एक दुकान में दुकानदार के बहुत बुलाने पर सोमरू और कजरी घुसे. कजरी वहां रखी धानी रंग की चुनरी देख कर पीछे न हट सकी.

सोमरू ने उस के लिए डेढ़ सौ

रुपए की वह चुनरी खरीद ली और दुकान से बाहर आ गए.

अब सोमरू के पास कुछ ही पैसे बचे थे. वह सोच रहा था कि कजरी के पास भी कुछ रुपए होंगे. उस ने पूछा तो कजरी ने हां में सिर हिला दिया.

कजरी ने जातबिरादरी में बांटने के लिए टिकुली, बिंदी, फीता, चिमटी के अलावा और भी बहुत सा सामान खरीदा. आखिर वह इतने बड़े मेले में आई थी. पासपड़ोसी, नातेरिश्तेदार सब को कुछ न कुछ देना था. खाली हाथ वापस कैसे जाती.

कजरी आज जब चप्पल पहन कर चल रही थी, सोमरू को रानी ठाकुराइन के गोरेगोरे महावर सजे पैर याद आ गए. कजरी के पैर आज भी गोरे थे और सुहागन होने के चलते महावर उस के पैरों में हमेशा लगा रहता था.

कजरी लाललाल चप्पल पहन कर जैसे आसमान में उड़ रही थी. आज उसे किसी के सामने चप्पल उतारने की जरूरत न थी. लोग उसे देख रहे थे और वह लोगों को.

सोमरू ने आज घुटनों तक धोती पहनी थी. वह आज इतना खुश था, जितना अपनी शादी में भी न हुआ था.

आज 70 बरस की कजरी उस के साथसाथ पक्की सड़क पर सब के सामने लाललाल चप्पल पहने, धानी रंग की चुनरी ओढ़े ठाट से चल रही थी, मानो किसी बड़े घर की नईनई बहू ससुराल से मायके आई हो.

सोमरू आज अपनेआप को दुनिया का सब से रईस आदमी सम?ा रहा था.

दोनों घर वापस जाने के लिए स्टेशन आ गए. रात स्टेशन पर ही बितानी थी. ट्रेन सवेरे 5 बजे की थी. दोनों ने पास में बंधा हुआ खाना खाया और वहीं स्टेशन पर आराम करने लगे.

सोमरू सुबह टिकट लेने के लिए उठा. कजरी से बोला, ‘‘पैसे निकाल. टिकट ले लिया जाए. ट्रेन के आने का समय भी हो रहा है.’’

दोनों ने अपनेअपने पैसे निकाले और गिनने लगे. टिकट के लिए 40 रुपयों की जरूरत थी और दोनों के पास कुलमिला कर 38 रुपए ही हुए. अब वे क्या करें?

दोनों बारबार कपड़े, ?ोले को ?ाड़ते, सामान ?ाड़?ाड़ कर देखते, कहीं से 2 रुपए निकल जाएं. पर पैसे होते तब न निकलते.

दोनों ऐसे भंवर में थे कि न डूब रहे थे, न निकल रहे थे. धीरेधीरे लोग उन के आसपास इकट्ठा होने लगे थे.

दरअसल, रात को सोमरू ने 2 रुपए का तंबाकू खरीदा था और अब टिकट के लिए पैसे कम पड़ रहे थे.

कजरी की आंखों से आग बरस रही थी. उस ने सोमरू को गुस्से में कहा, ‘‘अब क्या करोगे? टिकट के लिए पैसे कम पड़ गए. अब घर क्या उड़ कर जाएंगे? तुम्हारी तंबाकू की लत ने…’’

बेचारा सोमरू क्या करे. जिस दर्द को वह पूरी जिंदगी ढोता रहा, उस ने आज इतनी दूर आ कर भी उस का पीछा नहीं छोड़ा था. कभी अपने आसपास लगी भीड़ को देखता, तो कभी अपनी बूढ़ी पत्नी को.

सोमरू का मन पछतावे से इस तरह छटपटा रहा था जैसे वह पूरे समाज के सामने चोरी करता पकड़ा गया हो. आज फिर 2 रुपयों ने सब के सामने उसे नंगा कर दिया था. Hindi Family Story

Hindi Story: हिंदी की दुकान-क्या पूरा हुआ सपना

मेरे रिटायरमेंट का दिन ज्योंज्यों नजदीक आ रहा था, एक ही चिंता सताए जा रही थी कि इतने वर्षों तक बेहद सक्रिय जीवन जीने के बाद घर में बैठ कर दिन गुजारना कितना कष्टप्रद होगा, इस का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. इसी उधेड़बुन में कई महीने बीत गए. एक दिन अचानक याद आया कि चंदू चाचा कुछ दिन पहले ही रिटायर हुए हैं. उन से बात कर के देखा जा सकता है, शायद उन के पास कोई योजना हो जो मेरे भावी जीवन की गति निर्धारित कर सके.

यह सोच कर एक दिन फुरसत निकाल कर उन से मिला और अपनी समस्या उन के सामने रखी, ‘‘चाचा, मेरे रिटायरमेंट का दिन नजदीक आ रहा है. आप के दिमाग में कोई योजना हो तो मेरा मार्गदर्शन करें कि रिटायरमेंट के बाद मैं अपना समय कैसे बिताऊं?’’

मेरी बात सुनते ही चाचा अचानक चहक उठे, ‘‘अरे, तुम ने तो इतने दिन हिंदी की सेवा की है, अब रिटायरमेंट के बाद क्या चिंता करनी है. क्यों नहीं हिंदी की एक दुकान खोल लेते.’’

‘‘हिंदी की दुकान? चाचा, मैं समझा नहीं,’’ मैं ने अचरज से पूछा.

‘‘देखो, आजकल सभी केंद्र सरकार के कार्यालयों, बैंकों और सार्वजनिक उपक्रमों में हिंदी सेल काम कर रहा है,’’ चाचा बोले, ‘‘सरकार की ओर से इन कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग करने और उसे बढ़ावा देने के लिए तरहतरह के प्रयास किए जा रहे हैं. कार्यालयों के आला अफसर भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं. इन दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों को समयसमय पर प्रशिक्षण आदि की जरूरत तो पड़ती ही रहती है और जहां तक हिंदी का सवाल है, यह मामला वैसे ही संवेदनशील है. इसी का लाभ उठाते हुए हिंदी की दुकान खोली जा सकती है. मैं समझता हूं कि यह दुकानदारी अच्छी चलेगी.’’

‘‘तो मुझे इस के लिए क्या करना होगा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘करना क्या होगा,’’ चाचा बोले, ‘‘हिंदी के नाम पर एक संस्था खोल लो, जिस में राजभाषा शब्द का प्रयोग हो. जैसे राजभाषा विकास निगम, राजभाषा उन्नयन परिषद, राजभाषा प्रचारप्रसार संगठन आदि.’’

‘‘संस्था का उद्देश्य क्या होगा?’’

‘‘संस्था का उद्देश्य होगा राजभाषा का प्रचारप्रसार, हिंदी का प्रगामी प्रयोग तथा कार्यालयों में राजभाषा कार्यान्वयन में आने वाली समस्याओं का समाधान. पर वास्तविक उद्देश्य होगा अपनी दुकान को ठीक ढंग से चलाना. इन सब के लिए विभिन्न प्रकार की कार्यशालाओं का आयोजन किया जा सकता है.’’

‘‘चाचा, इन कार्यशालाओं में किनकिन विषय पर चर्चाएं होंगी?’’

‘‘कार्यशालाओं में शामिल किए जाने वाले विषयों में हो सकते हैं :राजभाषा कार्यान्वयन में आने वाली कठिनाइयां और उन का समाधान, वर्तनी का मानकीकरण, अनुवाद के सिद्धांत, व्याकरण एवं भाषा, राजभाषा नीति और उस का संवैधानिक पहलू, संसदीय राजभाषा समिति की प्रश्नावली का भरना आदि.’’

‘‘कार्यशाला कितने दिन की होनी चाहिए?’’ मैं ने अपनी शंका का समाधान किया.

‘‘मेरे खयाल से 2 दिन की करना ठीक रहेगा.’’

‘‘इन कार्यशालाओं में भाग कौन लोग लेंगे?’’

‘‘केंद्र सरकार के कार्यालयों, बैंकों तथा उपक्रमों के हिंदी अधिकारी, हिंदी अनुवादक, हिंदी सहायक तथा हिंदी अनुभाग से जुड़े तमाम कर्मचारी इन कार्यशालाओं में भाग लेने के पात्र होंगे. इन कार्यालयों के मुख्यालयों एवं निगमित कार्यालयों को परिपत्र भेज कर नामांकन आमंत्रित किए जा सकते हैं.’’

‘‘परंतु उन के वरिष्ठ अधिकारी इन कार्यशालाओं में उन्हें नामांकित करेंगे तब न?’’

‘‘क्यों नहीं करेंगे,’’ चाचा बोले, ‘‘इस के लिए इन कार्यशालाओं में तुम्हें कुछ आकर्षण पैदा करना होगा.’’

मैं आश्चर्य में भर कर बोला, ‘‘आकर्षण?’’

‘‘इन कार्यशालाओं को जहांतहां आयोजित न कर के चुनिंदा स्थानों पर आयोजित करना होगा, जो पर्यटन की दृष्टि से भी मशहूर हों. जैसे शिमला, मनाली, नैनीताल, श्रीनगर, ऊटी, जयपुर, हरिद्वार, मसूरी, गोआ, दार्जिलिंग, पुरी, अंडमान निकोबार आदि. इन स्थानों के भ्रमण का लोभ वरिष्ठ अधिकारी भी संवरण नहीं कर पाएंगे और अपने मातहत कर्मचारियों के साथसाथ वे अपना नाम भी नामांकित करेंगे. इस प्रकार सहभागियों की अच्छी संख्या मिल जाएगी.’’

‘‘इस प्रकार के पर्यटन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थानों पर कार्यशालाएं आयोजित करने पर खर्च भी तो आएगा?’’

‘‘खर्च की चिंता तुम्हें थोड़े ही करनी है. अधिकारी स्वयं ही खर्च का अनुमोदन करेंगे/कराएंगे… ऐसे स्थानों पर अच्छे होटलों में आयोजन से माहौल भी अच्छा रहेगा. लोग रुचि ले कर इन कार्यशालाओं में भाग लेंगे. बहुत से सहभागी तो अपने परिवार के साथ आएंगे, क्योंकि कम खर्च में परिवार को लाने का अच्छा मौका उन्हें मिलेगा.’’

‘‘इन कार्यशालाओं के लिए प्रतिव्यक्ति नामांकन के लिए कितना शुल्क निर्धारित किया जाना चाहिए?’’ मैं ने पूछा.

चाचा ने बताया, ‘‘2 दिन की आवासीय कार्यशालाओं का नामांकन शुल्क स्थान के अनुसार 9 से 10 हजार रुपए प्रतिव्यक्ति ठीक रहेगा. जो सहभागी खुद रहने की व्यवस्था कर लेंगे उन्हें गैर आवासीय शुल्क के रूप में 7 से 8 हजार रुपए देने होंगे. जो सहभागी अपने परिवारों के साथ आएंगे उन के लिए 4 से 5 हजार रुपए प्रतिव्यक्ति अदा करने होंगे. इस शुल्क में नाश्ता, चाय, दोपहर का भोजन, शाम की चाय, रात्रि भोजन, स्टेशनरी तथा भ्रमण खर्च शामिल होगा.’’

‘‘लेकिन चाचा, सहभागी अपनेअपने कार्यालयों में इन कार्यशालाओं का औचित्य कैसे साबित करेंगे?’’

‘‘उस के लिए भी समुचित व्यवस्था करनी होगी,’’ चाचा ने समझाया, ‘‘कार्यशाला के अंत में प्रश्नावली का सत्र रखा जाएगा, जिस में प्रथम, द्वितीय, तृतीय के अलावा कम से कम 4-5 सांत्वना पुरस्कार विजेताओं को प्रदान किए जाएंगे. इस में ट्राफी तथा शील्ड भी पुरस्कार विजेताओं को दी जा सकती हैं. जब संबंधित कार्यालय पुरस्कार में मिली इन ट्राफियों को देखेंगे, तो कार्यशाला का औचित्य स्वयं सिद्ध हो जाएगा. विजेता सहभागी अपनेअपने कार्यालयों में कार्यशाला की उपयोगिता एवं उस के औचित्य का गुणगान स्वयं ही करेंगे. इसे और उपयोगी साबित करने के लिए परिपत्र के माध्यम से कार्यशाला में प्रस्तुत किए जाने वाले उपयोगी लेख तथा पोस्टर व प्रचार सामग्री भी मंगाई जा सकती है.’’

‘‘इन कार्यशालाओं के आयोजन की आवृत्ति क्या होगी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘वर्ष में कम से कम 2-3 कार्य-शालाएं आयोजित की जा सकती हैं.’’

‘‘कार्यशाला के अतिरिक्त क्या इस में और भी कोई गतिविधि शामिल की जा सकती है?’’

मेरे इस सवाल पर चाचा बताने लगे, ‘‘दुकान को थोड़ा और लाभप्रद बनाने के लिए हिंदी पुस्तकों की एजेंसी ली जा सकती है. आज प्राय: हर कार्यालय में हिंदी पुस्तकालय है. इन पुस्तकालयों को हिंदी पुस्तकों की आपूर्ति की जा सकती है. कार्यशाला में भाग लेने वाले सहभागियों अथवा परिपत्र के माध्यम से पुस्तकों की आपूर्ति की जा सकती है. आजकल पुस्तकों की कीमतें इतनी ज्यादा रखी जाती हैं कि डिस्काउंट देने के बाद भी अच्छी कमाई हो जाती है.’’

‘‘लेकिन चाचा, इस से हिंदी कार्यान्वयन को कितना लाभ मिलेगा?’’

‘‘हिंदी कार्यान्वयन को मारो गोली,’’ चाचा बोले, ‘‘तुम्हारी दुकान चलनी चाहिए. आज लगभग 60 साल का समय बीत गया हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिले हुए. किस को चिंता है राजभाषा कार्यान्वयन की? जो कुछ भी हिंदी का प्रयोग बढ़ रहा है वह हिंदी सिनेमा व टेलीविजन की देन है.

‘‘उच्चाधिकारी भी इस दिशा में कहां ईमानदार हैं. जब संसदीय राजभाषा समिति का निरीक्षण होना होता है तब निरीक्षण तक जरूर ये निष्ठा दिखाते हैं, पर उस के बाद फिर वही ढाक के तीन पात. यह राजकाज है, ऐसे ही चलता रहेगा पर तुम्हें इस में मगजमारी करने की क्या जरूरत? अगर और भी 100 साल लगते हैं तो लगने दो. तुम्हारा ध्यान तो अपनी दुकानदारी की ओर होना चाहिए.’’

‘‘अच्छा तो चाचा, अब मैं चलता हूं,’’ मैं बोला, ‘‘आप से बहुत कुछ जानकारी मिली. मुझे उम्मीद है कि आप के अनुभवों का लाभ मैं उठा पाऊंगा. इतनी सारी जानकारियों के लिए बहुतबहुत धन्यवाद.’’

चंदू चाचा के घर से मैं निकल पड़ा. रास्ते में तरहतरह के विचार मन को उद्वेलित कर रहे थे. हिंदी की स्थिति पर तरस आ रहा था. सोच रहा था और कितने दिन लगेंगे हिंदी को अपनी प्रतिष्ठा व पद हासिल करने में? कितना भला होगा हिंदी का इस प्रकार की दुकानदारी से?

मजबूरी : रिहान का तबस्सुम के लिए कैसा प्यार

आज भी बहुत तेज बारिश हो रही थी. बारिश में भीगने से बचने के लिए रिहान एक घर के नीचे खड़ा हो गया था.

बारिश रुकने के बाद रिहान अपने घर की ओर चल दिया. घर पहुंच कर उस ने अपने हाथपैर धो कर कपड़े बदले और खाना खाने लगा. खाना खाने के बाद वह छत पर चला गया और अपनी महबूबा को एक मैसेज किया और उस के जवाब का इंतजार करने लगा.

छत पर चल रही ठंडी हवा ने रिहान को अपने आगोश में ले लिया और वह किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गया. वह अपने प्यार के भविष्य के बारे में सोचने लगा.

रिहान तबस्सुम से बहुत प्यार करता था और उसी से शादी करना चाहता था. तबस्सुम के अलावा वह किसी और के बारे में सोचता भी नहीं था. जब कभी घर में उस के रिश्ते की बात होती थी तो वह शादी करने से साफ मना कर देता था.

रिहान के घर वाले तबस्सुम के बारे में नहीं जानते थे. वे सोचते थे कि अभी यह पढ़ाई कर रहा है इसलिए शादी से मना कर रहा है. पढ़ाई पूरी होने के बाद वह मान जाएगा.

तभी अचानक रिहान के मोबाइल फोन पर तबस्सुम का मैसेज आया. उस का दिल खुशी से  झूम उठा. उस ने मैसेज पढ़ा और उस का जवाब दिया. बातें करतेकरते दोनों एकदूसरे में खो गए.

तबस्सुम भी रिहान को बहुत प्यार करती थी और शादी करना चाहती थी. अभी तक उस ने भी अपने घर पर अपने प्यार के बारे में नहीं बताया था. वह रिहान की पढ़ाई खत्म होने का इंतजार कर रही थी.

ऐसा नहीं था कि दोनों में सिर्फ प्यार भरी बातें ही होती थीं, बल्कि दोनों में लड़ाइयां भी होती थीं. कभीकभी तो कईकई दिनों तक बातें बंद हो जाती थीं. लड़ाई के बाद भी वे दोनों एकदूसरे को बहुत याद करते थे और कभी किसी बात पर चिढ़ाने के लिए मैसेज कर देते थे. मसलन, तुम्हारी फेसबुक की प्रोफाइल पिक्चर बहुत बेकार लग रही है. बंदर लग रहे हो तुम. तुम तो बहुत खूबसूरत हो न बंदरिया. और लड़तेलड़ते फिर से बातें शुरू हो जाती थीं.

पिछले 3 सालों से वे दोनों एकदूसरे को प्यार करते थे और अब जा कर शादी करना चाहते थे. रिहान ने सोच लिया था कि इस साल पढ़ाई पूरी होने के बाद कोई अच्छी सी नौकरी कर वह अपने घर वालों को तबस्सुम के बारे में बता देगा. अगर घर वाले मानते हैं तो ठीक, नहीं तो उन की मरजी के खिलाफ शादी कर लेगा. वह किसी भी हाल में तबस्सुम को खोना नहीं चाहता था.

एक दिन रिहान की अम्मी बोलीं, ‘‘तेरे मौसा का फोन आया था. उन्होंने तु झे बुलाया है.’’

‘‘मु झे क्यों बुलाया है? मुझ से क्या काम पड़ गया उन्हें?’’ रिहान ने पूछा.

‘‘अरे, मु झे क्या पता कि क्यों बुलाया है. वह तो हमें वहीं जा कर पता चलेगा,’’ उस की अम्मी ने कहा.

कुछ देर बाद वे दोनों मोटरसाइकिल से मौसा के घर की तरफ चल दिए. रिहान के मौसा पास के शहर में ही रहते थे. एक घंटे में वे दोनों वहां पहुंच गए. वहां पहुंच कर रिहान ने देखा कि घर में बहुत लोग जमा थे. उन में उस के पापा, उस की शादीशुदा बहन और बहनोई भी थे.

यह सब देख कर रिहान ने अपनी अम्मी से पूछा, ‘‘इतने सारे रिश्तेदार क्यों जमा हैं यहां? और पापा यहां क्या कर रहे हैं? वे तो सुबह दुकान पर गए थे?’’

अम्मी बोलीं, ‘‘तू अंदर तो चल. सब पता चल जाएगा.’’

रिहान और उस की अम्मी अंदर गए. वहां सब को सलाम किया और बैठ कर बातें करने लगे.

तभी रिहान के मौसा चिंतित होते हुए बोले, ‘‘आसिफ की हालत बहुत खराब है. वह मरने से पहले अपनी बेटी की शादी करना चाहता है.’’

आसिफ रिहान के मामा का नाम था. कुछ दिन पहले हुईर् तेज बारिश में उन का घर गिर गया था. घर के नीचे दब कर मामा के 2 बच्चों और मामी की मौत हो गई थी. मामा भी घर के नीचे दब गए थे, लेकिन किसी तरह उन्हें निकाल कर अस्पताल में भरती करा दिया गया था. वहां डाक्टर ने कहा था कि वे सिर्फ कुछ ही दिनों के मेहमान हैं. उन का बचना नामुमकिन है.

‘‘फिर क्या किया जाए?’’ रिहान की अम्मी बोलीं.

‘‘आसिफ मरने से पहले अपनी बेटी की शादी रिहान के साथ करा देना चाहता है. यह आसिफ की आखिरी ख्वाहिश है और हमें इसे पूरा करना चाहिए,’’ मौसा की यह बात सुन कर रिहान एकदम चौंक गया. उस के दिल में इतना तेज दर्द हुआ मानो किसी ने उस के दिल पर हजारों तीर एकसाथ छोड़ दिए हों. उस का दिमाग सुन्न हो गया.

‘‘ठीक है, हम आसिफ के सामने इन दोनों की शादी करवा देते हैं,’’ रिहान की अम्मी ने कहा.

रिहान मना करना चाहता था, लेकिन वह मजबूर था.

उसी दिन शादी की तैयारी होने लगी और आसिफ को भी अस्पताल से मौसा के घर ले आया गया. शाम को दोनों का निकाह करवा दिया गया.

शादी के बाद रिहान अपनी बीवी और मांबाप के साथ घर आ गया. पूरे रास्ते वह चुप रहा. उस का दिमाग काम नहीं कर रहा था. वह सम झ नहीं पा रहा था कि उस के साथ हुआ क्या है.

घर पहुंच कर रिहान कपड़े बदल कर छत पर चला गया. उस ने तबस्सुम को एक मैसेज किया. थोड़ी देर बाद तबस्सुम का फोन आया.

रिहान के फोन उठाते ही तबस्सुम गुस्से में बोली, ‘‘कहां थे आज पूरा दिन? एक मैसेज भी नहीं किया तुम ने.’’

तबस्सुम नाराज थी और वह रिहान को डांटने लगी. रिहान चुपचाप सुनता रहा. जब काफी देर तक वह कुछ नहीं बोला तो तबस्सुम बोली, ‘‘अब कुछ बोलोगे भी या चुप ही बैठे रहोगे?’’

‘‘मेरी शादी हो गई है आज,’’ रिहान धीमी आवाज में बोला.

तबस्सुम बोली, ‘‘मैं सुबह से नाराज हू्र्रं और तुम मु झे चिढ़ा रहे हो.’’

‘‘नहीं यार, सच में आज मेरी शादी हो गई है. उसी में बिजी था इसलिए मैं बात नहीं कर पाया तुम से.’’

‘‘क्या सच में तुम्हारी शादी हो गई है?’’ तबस्सुम ने रोंआसी आवाज में पूछा.

‘‘हां, सच में मेरी शादी हो गई है,’’ रिहान ने दबी जबान में कहा. उस की आवाज में उस के टूटे हुए दिल और उस की बेबसी साफ  झलक रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे वह जीना ही नहीं चाहता था.

‘‘तुम ने मु झे धोखा दिया है रिहान,’’ तबस्सुम ने रोते हुए कहा.

‘‘मैं कुछ नहीं कर सकता था, मेरी मजबूरी थी,’’ यह कह कर रिहान भी रोने लगा.

‘‘तुम धोखेबाज हो. तुम  झूठे हो. आज के बाद मु झे कभी फोन मत करना,’’ कह कर तबस्सुम ने फोन काट दिया.

फोन रख कर रिहान रोने लगा. वहां तबस्सुम भी रो रही थी.

Hindi Story: महावर की लीला

Hindi Story, लेखक- नीरजा द्विवेदी

पुराने समय से भारतीय ललनाओं के सौंदर्य उपादानों में जो सोलह शृंगार प्रचलित हैं उन में महावर का खास महत्त्व है. कहावत है कि महावर लगे कोमल चरणों से सुंदरियां जब अशोक के वृक्ष पर चरणप्रहार करती थीं तब उस पर कलियां खिलने से वसंत का आगमन होता था. सौंदर्य उपादानों में महत्त्वपूर्ण ‘महावर’ नई पीढ़ी के लिए सिंधु घाटी की सभ्यता के समान अजायबघर की वस्तु बन गई है.

सादा जीवन और उच्च विचार भारतीय संस्कृति की परंपरा समझी जाती थी परंतु आधुनिकता की अंधी दौड़ एवं पाश्चात्य संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम में वह परिभाषा कब बदल गई, मैं नहीं जानती.

आज ब्यूटीपार्लर में किया गया सौंदर्योपचार, नुची हुई तराशी भौंहें, वस्त्रों से मेल खाती अधरों की लिपिस्टिक व नेलपालिश, कटे लहराते बाल, जीन्सटौप या अन्य आधुनिक वस्त्राभूषण, नाभिकटिदर्शना साड़ी एवं पीठप्रदर्शना या सर्वांग प्रदर्शना ब्लाउज, वस्त्रों से मेल खाते पर्स एवं ऊंची एड़ी की चप्पलें, फर्राटे से अंगरेजी में वार्त्तालाप या बन कर बोलते हुए मातृभाषा हिंदी का टांगतोड़ प्रदर्शन अब सुशिक्षित, संभ्रांत स्त्री की परिभाषा बन गया है.

भारतीय वेशभूषा बिंदी, चूड़ी, लंबी चोटी, जूड़ा, महावर, बिछुआ एवं सलीके से साड़ी पहनना आदि, जिन्हें कभी संभ्रांत घर की गृहिणी की गरिमा माना जाता था, अब अपनी ऊंचाई से गिर कर अशिक्षा एवं निम्न वर्ग तथा निम्न स्तर का पर्याय समझे जाने लगे हैं. ऐसी भारतीय वेशभूषा में सज्जित युवतियां ‘बहिनजी’ कहला कर उपहास की पात्र बन जाती हैं. उस पर हिंदी में बातचीत करना, यह तो आधुनिक समाज में ठेठ देहातीपन की निशानी है.

मुझे इस बदलाव का प्रत्यक्ष अनुभव तब हुआ जब नवंबर में दिल्ली में ‘एस्कोर्ट्स हार्ट सेंटर’ में एंजियोग्राफी के लिए भरती होना पड़ा. उस के पहले ही मैं दीवाली मनाने अपनी सास के पास गांव मानीकोठी गई थी. गांव की परंपरा के अनुसार त्योहार पर जब सब सुहागिनें महावर लगवा रही थीं तो मुझे भी बुलाया गया. मन ही मन मैं आशंकित थी कि अस्पताल जाने के पहले महावर लगवाऊं या नहीं.

अपनी सास की इच्छा का आदर करने के लिए मैं ने महावर लगवा लिया. एंजियोग्राफी से पहले अस्पताल का ही पायजामा एवं गाउन पहनना पड़ा. मैं ने बाल खोल कर केवल चोटी बना ली एवं मेकअप करने की आवश्यकता नहीं समझी. जब मैं मेज पर लेटी थी तो वहां का डाक्टर मेरे पैरों में लगे महावर को देख कर चौंक पड़ा. पैरों के समीप पहुंच कर उस ने रंग को छू कर देखा. उंगलियों से कुरेद कर बोला, ‘‘यह क्या लगा है?’’

‘‘महावर है,’’ मैं ने कहा.

‘‘क्यों लगाया है?’’ उस ने प्रश्न किया.

‘‘मेरी सास गांव में रहती हैं. दीवाली पर उन के आग्रह पर मैं ने लगवाया था.’’

पैरों में लगा महावर, सर में चोटी, मेकअपविहीन चेहरा और हिंदी में मेरा बातचीत करना…अब क्या कहूं, उक्त डाक्टर को मैं नितांत अशिक्षित गंवार महिला प्रतीत हुई. क्षणभर में ही उस का मेरे प्रति व्यवहार बदल गया.

‘‘माई, कहां से आई हो?’’

मैं ने चौंक कर इधरउधर देखा… यह संबोधन मेरे लिए ही था.

‘‘माई, सीधी लेटी रहो. तुम कहां से आई हो?’’ मेरे पैरों को उंगली से कुरेदते हुए उस ने दोबारा प्रश्न किया.

अनमने स्वर से मैं ने उत्तर दिया, ‘‘लखनऊ से.’’

‘‘माई, लखनऊ तो गांव नहीं है,’’ वह पुन: बोला.

‘‘जी हां, लखनऊ गांव नहीं है, पर मेरी सास गांव में रहती हैं,’’ मैं ने डाक्टर को बताया.

कहना न होगा कि पैरों में महावर लगाना, बाल कटे न रखना, मेकअप न करना और मातृभाषा के प्रति प्रेम के कारण हिंदी में वार्त्तालाप करना उस दिन उस अंगरेजीपसंद डाक्टर के सामने मुझे अशिक्षित एवं ठेठ गंवार महिला की श्रेणी में पेश कर गया, जिस का दुष्परिणाम यह हुआ कि डाक्टर ने मुझे इतना जाहिल, गंवार मान लिया कि मुझे मेरी रिपोर्ट बताने के योग्य भी नहीं समझा.

कुछ साल पहले भी मुझे एक बार एस्कोर्ट्स में ही एंजियोग्राफी करानी पड़ी थी पर तब के वातावरण एवं व्यवहार में आज से धरतीआकाश का अंतर था.

अगले दिन जब मैं अपनी रिपोर्ट लेने गई तो कायदे से साड़ी पहने और लिपिस्टिक आदि से सजी हुई थी. डाक्टर साहब व्यस्त थे, अत: मैं पास की मेज पर रखा अंगरेजी का अखबार पढ़ने लगी. जब डाक्टर ने मुझे बुलाने के लिए मेरी ओर दृष्टि उठाई तो मेरे हाथ में अखबार देख कर उन का चौंकना मेरी नजरों से छिपा नहीं रहा. उन्होंने ध्यान से मेरी ओर देखा और बोले, ‘‘यस, प्लीज.’’

‘‘मेरी एंजियोग्राफी कल हुई थी, मेरी रिपोर्ट अभी तक नहीं मिली है,’’ मैं ने भी अंगरेजी में उन से प्रश्न किया.

आश्वस्त होने के लिए मेरे पेपर्स को डाक्टर ने एक बार फिर ध्यान से देखा और प्रश्न किया, ‘‘क्या नाम है आप का?’’

‘‘नीरजा द्विवेदी,’’ उत्तर देने पर उन्होंने पुन: प्रश्न किया, ‘‘आप कहां से आई हैं?’’

डाक्टर ने इस बार ‘माई’ का संबोधन इस्तेमाल न करते हुए मुझे ‘मैडम’ कहते हुए न सिर्फ रिपोर्ट मुझे सौंप दी बल्कि निकटता बढ़ाते हुए रिपोर्ट की बारीकियां बड़े मनोयोग से समझाईं.

अब मैं इसी ऊहापोह में हूं कि ‘महावर’ से ‘माई’ कहलाने में भलाई है या लिपिस्टिक और नेलपालिश से ‘मैडम’ कहलाने में.

Hindi Story: दुआ मांगो सब ठीक हो जाएगा-सुगमा की कशमकश

Hindi Story: वह पेट से थी. कोख में किस का बच्चा पलबढ़ रहा था, ससुराल वाले समझ नहीं पा रहे थे. सब अंदर ही अंदर परेशान हो रहे थे.

पिछले 2 साल से उन का बड़ा बेटा जुबैर अपने बूढ़े मांबाप को 2 कुंआरे भाइयों के हवाले कर अपनी बीवी सुगरा को छोड़ कर खाड़ी देश कमाने गया था. शर्त के मुताबिक उसे लगातार 2 साल नौकरी करनी थी, इसलिए घर आने का सवाल ही नहीं उठता.

इसी बीच जुबैर की बीवी सुगरा कभी मायके तो कभी ससुराल में रह कर समय काट रही थी. 2 साल बाद उस के शौहर का भारत आनाजाना होता रहेगा, यही बात सोच कर वह खुश थी.

सुगरा जब भी मायके आती तो हर जुमेरात शहर के मजार जाती. उस मजार का नाम दूरदूर तक था. कई बार तो वह वहां अकेली आतीजाती थी.

एक शहर से दूसरे शहर में ब्याही गई सुगरा ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. उस ने शहर के एक मदरसे में तालीम पाई थी. सिलाईकढ़ाई और पढ़ाई सीखतेसीखते मदरसे के हाफिज से उस की जानपहचान हो गई थी. वह हाफिज से हंसतीबोलती, पर प्यार मुहब्बत से अनजान थी.

मदरसे में पढ़तेपढ़ते सुगरा के अम्मीअब्बू ने रिश्तेदारी में अच्छा रिश्ता पा कर उस की शादी करने की सोची.

‘सुनोजी, रिश्तेदारी में शादी करने से आपस में बुराई होती है. हालांकि वह हमारी खाला का बेटा है. रोजगार की तलाश में है. जल्द लग नौकरी जाएगी,  पर…’ सुगरा की मां ने कहा था.

‘पर क्या?’ सुगरा के अब्बू ने पूछा था.

‘कल को कोई मनमुटाव हो गया या लड़के को लड़की पसंद न आई तो…’ सुगरा की अम्मी बोली थीं.

‘सुना है कि लड़का खाड़ी देश में कमाने जा रहा है. नौकरी वाले लड़के मिलते ही कहां हैं,’ सुगरा के अब्बू ने कहा था.

दोनों परिवारों में बातचीत हुई और उन का निकाह हो गया. पर मदरसे के हाफिज को सुगरा अब भी नहीं भुला पाई थी.

आज मुर्शिद मियां का परिवार जश्न मना रहा था. एक तो उन के बेटे जुबैर की नौकरी खाड़ी देश में लग गई थी, दूसरी उन के घर खूबसूरत सी बहू आ गई.

‘सुगरा, तुम जन्नत की परी जैसी हो. तुम्हारे आने से हमारा घर नूर से जगमगा गया,’ कह कर जुबैर ने सुगरा को अपने सीने से लगा लिया था.

उन दोनों के बीच मुहब्बत की खुशियों ने डेरा जमा लिया था. पूरा परिवार खुश था.

एक महीने का समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला. जुबैर खाड़ी देश जाने की तैयारी करने लगा. सुगरा को उदासी ने घेर लिया था. उस के दिल से आह निकलती कि काश, जुबैर उसे छोड़ कर न जाता.

‘सिर्फ 2 साल की ही तो बात है,’ कह कर जुबैर सुगरा को आंसू और प्यार के बीच झलता छोड़ कर नौकरी करने खाड़ी देश चला गया था.

सुगरा की मायूसी देख उस की सास ने अपने शौहर से कहा था, ‘इन दिनों सुगरा घर से बाहर नहीं निकलती है. बाबा के मजार पर हाजिरी देने के लिए उसे देवर रमजान के साथ भेज दिया करें, ताकि उस का मन बहला रहे.’

वे हंसे और बोले, ‘जुबैर के गम में परेशान हो रही होगी. भेज दिया करो. जमाना बदल रहा है. आजकल के बच्चे घर में कैद हो कर नहीं रहना चाहते,’ अपनी बात रखते हुए सुगरा के ससुर मुर्शिद मियां ने इजाजत दे दी थी.

सुगरा मजार आने लगी थी. उस की खुशी के लिए देवर रमजान उस से हंसताबोलता, मजाक करता था, ताकि वह जुबैर की याद भुला सके.

जुबैर को गए 2 महीने हो गए थे लेकिन सासससुर की खुली छूट के बाद भी सुगरा की जिंदगी में कोई खास बदलाव नहीं आया था.

इसी बीच सुगरा के अब्बू आए और उसे कुछ दिनों के लिए घर ले गए. सुगरा ने अम्मी से आगे पढ़ने की बात कही, ताकि उस का मन लगा रहे और वह तालीम भी हासिल कर सके.

मायके में सुगरा के मामा के लड़के को तालीम देने के लिए बुलाया गया. अब सुगरा घर पर ही पढ़ने लगी थी.

एक दिन मजार पर हाफिज ने सुगरा की खूबसूरती की तारीफ क्या कर दी, उस के दिल में हाफिज के लिए मुहब्बत पैदा हो गई.

शादीशुदा सुगरा जवानी का सुख भोग चुकी थी. वह खुद पर काबू नहीं रख पाई और हाफिज की तरफ झाकने लगी.

‘कल मजार पर मिलते हैं…’ आजमाने के तौर पर हाफिज ने कहा था, ‘शाम 7 बजे.’

यह सुन कर सुगरा शरमा गई.

‘ठीक है,’ सुगरा ने कहा था.

ठीक 7 बजे सुगरा मजार पर पहुंच गई. दुआ मांगने के बाद वह हाफिज के साथ गलियारे में बैठ कर बातें करने लगी.

हाफिज ने सुगरा को बताया कि मजार पर दुआ मांगने से दिल को सुकून मिलता है, मनचाही मुराद मिलती है.

अब वे दोनों रोजाना शाम को मजार पर मिलने लगे थे. उन के बीच के फासले कम होने लगे थे.

तकरीबन 4 महीने का समय बीत गया. एक दिन ससुराल से देवर आया और सुगरा की मां को अपनी अम्मी की तबीयत खराब होने की बात कह कर सुगरा को अपने साथ ले गया.

ससुराल में सुगरा जुबैर की याद में डूबी रहने के बजाय हाफिज की दीवानी हो गई थी. वह उस से मिलने को बेकरार रहने लगी थी.

धीरेधीरे सुगरा की सास ठीक हो गईं. सुगरा अब शहर के मजार पर जा कर हाफिज से मिलने की दुआ मांगती थी.

समय की चाल फिर बदली.

‘मैं कालेज में एक पीरियड में हाजिरी लगा कर आता हूं, तब तक तुम मजार पर रुकना,’ कह कर सुगरा को छोड़ उस का देवर कालेज चला गया.

इसी बीच सुगरा ने फोन पर हाफिज को मजार पर बुलाया. उन की मुलाकात दोबारा शुरू हो गई.

देवर के जाने के बाद मजार के नीचे पहाड़ी पर सुगरा अपनी जवानी की प्यास बुझाती और लौट कर मजार से दूर जा कर बैठ जाती. ससुराल में रह कर हाफिज से अपनी जवानी लुटाती सुगरा की इस हरकत से कोई वाकिफ नहीं था.

शहर की मसजिद में हाफिज को बच्चों को तालीम देने की नौकरी मिल जाने से अब सुगरा और उस के बीच की दूरियां मिट गईं. सुगरा को भी सासससुर से सिलाई सैंटर जा कर सिलाई सीखने की इजाजत मिलने की खुशी थी.

जुबैर को खाड़ी देश गए सालभर से ऊपर हो गया था.

‘तकरीबन 4-5 महीने की बात है,’ उस की अम्मी ने सुगरा से कहा था.

‘हां अम्मी, तब तक वे आ जाएंगे,’ सुगरा बोली थी.

पर सुगरा को अब जुबैर की नहीं हाफिज की जरूरत थी. सुगरा और हाफिज के बीच अब कोई दीवार नहीं थी. हाफिज की मसजिद वाली कोठी में वे बेफिक्री से मिलते थे.

सुगरा भी दिल खोल कर हाफिज के साथ रंगरलियां मनाने लगी थी और नतीजा…

सुगरा की तबीयत अचानक खराब होने पर उस की सास उसे अस्पताल ले कर गईं.

डाक्टर ने बताया, ‘आप की बहू मां बनने वाली है.’

घर लौट कर सास मायूसी के साए में डूब गईं. सोचा कि जब जुबैर डेढ़ साल से सुगरा से नहीं मिला तो फिर बहू के पैर भारी कैसे हो गए?

सुगरा ने जुबैर को फोन पर पूरी बात बताई.

जुबैर ने कहा, ‘दुआ मांगो सब ठीक हो जाएगा.’

जुबैर समझ गया था कि मामला क्या है, पर वह यह भी जानता था कि हल्ला मचाने पर वही बदनाम होगा. उसे अभी कई साल खाड़ी देश में काम करना था. एक बच्चा उस के नाम से रहेगा तो उसे ही अब्बा कहेगा न.

Hindi Kahani: औलाद की खातिर- कजरी को किसने दिया यह सुख

Hindi Kahani: पहली मुलाकात में ही प्रदेश के जेल मंत्री जयप्रकाश यादव बाबा सुखानंद के पांचसितारा होटल जैसे आलीशान आश्रम में जब कजरी से मिले, तो उन की लार टपकने लगी.

मंत्रीजी बाबा सुखानंद से बोल पड़े, ‘‘वाह बाबाजी, वाह, आज आप ने मेरे लिए क्या बुलबुल परोसी है. बिलकुल संगमरमर जैसी चमक रही है. यह तो रस भरी मदमस्त जवानी की मालकिन है.’’

बाबाजी ठहाका लगा कर बोले, ‘‘मंत्रीजी, आप तो जानते ही हैं कि हमारे आश्रम के बगल में एक पुराना मंदिर है. यहां हर साल मेला लगता है. इस मेले के बंदोबस्त के लिए शहर के तमाम आला अफसर मेरी इस कुटिया में पहले आ कर मु  झ से बातचीत कर के काम को आगे बढ़ाते हैं. तमाम फोर्स लगाने के बाद ही मेला शुरू होता है.

‘‘मेरे ऊपर पिछले चुनाव में हमला हो चुका है, लेकिन मैं उस हमले में बालबाल बच गया था. इस बार विपक्षी पार्टी के लोग अगर मेरे ऊपर हमला करते हैं, तो मेरे गुरगे उन को वहीं ढेर कर देंगे, क्योंकि इस बार हम ने भी पूरी तैयारी कर ली है. आप ठहरे जेल मंत्री, तो जेलर आप की मुट्ठी में है…

‘‘अब आप जाइए, कजरी आप का इंतजार कर रही है… रात के 11 भी बज चुके हैं.’’

‘‘ठीक है स्वामीजी, मुझे भी सुबह जल्दी जाना है,’’ कहते हुए मंत्रीजी वहां से कजरी के कमरे में चले गए.

कजरी को बांहों में भरते हुए जेल मंत्री बोले, ‘‘तुम तो बहुत लाजवाब चीज हो. मैं अकसर इस आश्रम में आ कर इस कमरे में शराब और शबाब का मजा लेता रहा हूं, लेकिन अब तक तुम जैसी कोई नहीं मिली…’’

कजरी भी मटकते हुए बोली, ‘‘क्या करूं मंत्रीजी, मेरा पति ही नकारा है. दिनभर सेठ के यहां काम करतेकरते थक जाता है और रातभर मैं जल बिन मछली की तरह करवटें बदल कर प्यासी ही तड़पती रहती हूं.

‘‘शादी के 4 साल बाद भी मुझे कोई बच्चा नहीं हुआ. लेकिन हां, मेरा पति कभीकभार ही हलकीफुलकी मर्दानगी दिखा पाता है.’’

‘‘कोई बात नहीं कजरी… तुम्हारे पास मोबाइल फोन है न? नहीं है, तो मैं दुकान से मंगवा देता हूं,’’ मंत्रीजी ने कहा.

‘‘हां, है न मेरे पास मोबाइल फोन. आजकल मोबाइल का जमाना है. जब बाबाजी को जरूरत पड़ती है, तो वे मु  झे मोबाइल से फोन कर के बुला लेते हैं,’’ कजरी ने कहा.

‘‘बाबा को मैं भी सवेरे फोन पर बोल देती हूं कि आज पति की नाइट ड्यूटी है. जरूरत पड़े तो याद कीजिएगा.

‘‘शाम को घूमने के बहाने मैं अपनी सहेली रमिया के साथ यहां आ जाती हूं. इस आश्रम में शाम को बहुत लोग आते हैं.’’

‘‘यह रमिया कौन है?’’ मंत्रीजी ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘वह इस समय दूसरे कमरे में बाबाजी के साथ मौजमस्ती कर रही होगी. वह यहां पर साफसफाई का काम करती है,’’ कजरी अपने कपड़े उतारते हुए बोली.

कजरी की पीठ पर हाथ फेरते हुए मंत्रीजी बोले, ‘‘कजरी, तुम कहां की रहने वाली हो?’’

‘‘मेरा घर तो जौनपुर में है. यहां इलाहाबाद में मेरा पति एक सेठ के यहां काम करता है. शादी होने के एक साल बाद ही मेरा पति मुझे यहां ले आया था. घर पर बूढ़े सासससुर, जेठजेठानी और उन के 3 बच्चे हैं.

‘‘रमिया से गहरी दोस्ती होने पर उस ने मुझे यहां पर लाना शुरू किया. मंदिर में मन्नत मांगने के बहाने रात में हम दोनों साथ आ जाती हैं और काम निबटा कर साथ ही घर चली जाती हैं.’’

मंत्रीजी बोले, ‘‘ठीक है, जल्दी करो. मुझे देर हो रही है. सुबह दौरे पर भी जाना है. तुझे देख कर तो मेरा मन उतावला हो रहा है,’’ यह कह कर वे कजरी की कमर में हाथ डालते हुए उस को पलंग की तरफ ले जाने लगे.

कुछ देर बाद तूफान थम चुका था. कजरी और रमिया दोनों घर आ गईं. रमिया भी बाबा सुखानंद को दूसरे कमरे में जा कर भरपूर सुख दे कर लौटी थी.

रास्ते में दोनों ने मैडिकल स्टोर से दर्द दूर करने की दवा खरीदी और अपनीअपनी दवा खाने के बाद सोईं, तो फिर सुबह ही उन की आंख खुली.

सुबह कजरी का चेहरा खिलाखिला सा लग रहा था. अब मौका मिलते ही किसी अफसर या मंत्री से कोई खास काम करवाना रहता, तो बाबा सुखानंद कजरी को उस के आगे परोस देते. इस के लिए बाबा मनोवैज्ञानिक तरीका ही अपनाते थे.

कुछ दिन बाद कजरी के पैर भारी हो गए, तो वह बहुत खुश हुई.

सुबहसुबह उलटी करते देख कजरी का पति मनोज बोला, ‘‘क्या बात है? उलटी क्यों कर रही हो?’’

कजरी बोली, ‘‘यह तो खुशी की बात है. तुम बाप बनने वाले हो.’’ यह सुन कर मनोज बहुत खुश हुआ.

कजरी बोली, ‘‘यह बाबा सुखानंद के आशीर्वाद का नतीजा है.’’ Hindi Kahani:

Hindi story : डर – क्यों मंजू के मन में नफरत जाग गई

Hindi Story : मंजू और श्याम की शादी को 4 साल हो गए थे. जैसा नाम, वैसा रूप. लंबीचौड़ी कदकाठी, पक्के रंग का श्याम पुलिस महकमे की रोबदार नौकरी के चलते मंजू के मातापिता व परिवार को एक नजर में पसंद आ गया. इस तरह वह सुंदर, सुशील व शालीन मंजू का पति बन गया. आम भारतीय पत्नियों की तरह मंजू भी दिल की गहराई से श्याम से प्यार करती थी.

शादी के शुरुआती दिन कपूर की तरह उड़ गए. तकरीबन 2 साल गुजर गए, लेकिन मंजू की गोद हरी न हुई. अब तो घरपरिवार के लोग इशारोंइशारों में पूछने भी लगे. मंजू खुद भी चिंतित रहने लगी, पर श्याम बेफिक्र था.

मंजू ने जब कभी बात छेड़ी भी तो श्याम हंसी में टाल गया. एक दिन तो हद हो गई. उस ने बड़ी बेरहमी से कहा, ‘‘कहां बच्चे के झमेले में डालना चाहती हो? जिंदगी में ऐश करने दो.’’

मंजू को बुरा तो बहुत लगा, पर श्याम के कड़े तेवर देख वह डर गई और चुप हो गई.

शुरू से ही मंजू ने देखा कि श्याम के दफ्तर आनेजाने का कोई तय समय नहीं था. कभीकभी तो वह दूसरे दिन ही घर आता था. खैर, पुलिस की नौकरी में तो यह सब लगा रहता है. पर इधर कुछ अजीब बात हुई. एक दिन श्याम के बैग से ढेर सारी चौकलेट गिरीं. यह देख मंजू हैरान रह गई.

जब मंजू ने श्याम से पूछा तो पहले तो वह गुस्सा हो गया, फिर थोड़ा शांत होते ही बात बदल दी, ‘‘तुम्हारे लिए ही तो लाया हूं.’’

‘लेकिन मुझे तो चौकलेट पसंद ही नहीं हैं और फिर इतनी सारी…’ मन ही मन मंजू ने सोचा. कहीं श्याम गुस्सा न हो जाए, इस डर से वह कुछ नहीं बोली.

डोरबैल बजने से मंजू की नींद टूटी. रात के ढाई बज रहे थे. नशे में धुत्त श्याम घर आया था. आते ही वह बिस्तर पर लुढ़क गया. शराब की बदबू पूरे घर में फैल गई. मंजू की नींद उचट गई. श्याम के मोबाइल फोन पर लगातार मैसेज आ रहे थे.

‘चलो, मैसेज की टोन औफ कर दूं,’ यह सोचते हुए मंजू ने हाथ में मोबाइल फोन लिया ही था कि उस की नजर एक मैसेज पर पड़ी. कोई तसवीर लग रही थी. उस ने मैसेज खोल लिया. किसी गरीब जवान होती लड़की की तसवीर थी. तसवीर के नीचे ‘40,000’ लिखा था.

मंजू का सिर भन्ना गया. वह खुद को रोक नहीं पाई, उस ने सारे मैसेज पढ़ डाले. जिस पति और उस की नौकरी को ले कर वह इतनी समर्पित थी, वह इतना गिरा हुआ निकला. वह अनाथालय की बच्चियों की दलाली करता था.

मंजू खुद को लुटा सा महसूस कर रही थी. उस का पति बड़ेबड़े नेताओं और अनाथालय संचालकों के साथ मिल कर गांवदेहात की गरीब बच्चियों को टौफीचौकलेट दे कर या फिर डराधमका कर शहर के अनाथालय में भरती कराता था और सैक्स रैकेट चलाता था.

प्रेम में अंधी मंजू पति के ऐब को नजरअंदाज करती रही. काश, उसी दिन चौकलेट वाली बात की तह में जाती, शराब पीने पर सवाल उठाती, उस के देरसवेर घर आने पर पूछताछ करती. नहीं, अब नहीं. अब वह अपनी गलती सुधारेगी.

रोजमर्रा की तरह जब श्याम नाश्ता कर के दफ्तर के लिए तैयार होने लगा, तो मंजू ने बात छेड़ी. पहले तो श्याम हैरान रह गया, फिर दरिंदे की तरह मंजू पर उबल पड़ा, ‘‘तुम ने मेरे मैसेज को पढ़ा क्यों? अब तुम सब जान चुकी हो तो अपना मुंह बंद रखना. जैसा चल रहा है चलने दो, वरना तेरी छोटी बहन के साथ भी कुछ गंदा हो सकता है.’’

मंजू को पीटने के बाद धमकी दे कर श्याम घर से निकल गया.

डर, दर्द और बेइज्जती से मंजू बुरी तरह कांप रही थी. सिर से खून बह रहा था. चेहरा बुरी तरह सूजा हुआ था.

श्याम का भयावह चेहरा अभी भी मंजू के दिलोदिमाग पर छाया हुआ था. बारबार उसे अपनी छोटी बहन अंजू का खयाल आ रहा था जो दूसरे शहर के होस्टल में रह कर पढ़ाई कर रही थी.

गरमी और उमस से भरी वह रात भारी थी. बिजली भी कब से गायब थी. इनवर्टर की बैटरी भी जवाब देने लगी थी. इन बाहरी समस्याओं से ज्यादा मंजू अपने भीतर की उथलपुथल से बेचैन थी. क्या करे? औरतों की पहली प्राथमिकता घर की शांति होती है. घर की सुखशांति के लिए चुप रहना ही बेहतर होगा. जैसा चल रहा है, चलने दो… नहीं, दिल इस बात के लिए राजी नहीं था. जिंदगी में ऐसा बुरा दिन आएगा, सोचा न था. कहां तो औलाद की तड़प थी और अब पति से ही नफरत हो रही थी. अभी तक जालिम घर भी नहीं आया, फोन तक नहीं किया. जरूरत भी क्या है?

‘केयरिंग हसबैंड’ का मुलम्मा उतर चुका था. उस की कलई खुल चुकी थी. नहीं आए, वही अच्छा. कहीं फिर पीटा तो? एक बार फिर डर व दर्द से वह बिलबिला उठी. तभी बिजली आ गई. पंखाकूलर चलने लगे तो मंजू को थोड़ी राहत मिली. वह निढाल सी पड़ी सो गई.

सुबह जब नींद खुली तो मंजू का मन एकदम शांत था. एक बार फिर पिछले 24 घंटे के घटनाक्रम पर ध्यान गया. लगा कि अब तक वह जिस श्याम को जानती थी, जिस के प्यार को खो देने से डरती थी, वह तो कभी जिंदगी में था ही नहीं. वह एक शातिर अपराधी निकला, जो उसे और सारे समाज को वरदी की आड़ में धोखा दे रहा था.

एक नई हिम्मत के साथ मंजू ने अपना मोबाइल फोन उठाया. सामने ही श्याम का मैसेज था, ‘घर आने में मुझे 2-3 दिन लग जाएंगे.’

मंजू का मन नफरत से भर गया. वह मोबाइल फोन पर गूगल सर्च करने लगी. थोड़ी ही देर के बाद मंजू फोन पर कह रही थी, ‘‘हैलो, महिला आयोग…’’

Hindi Story: समाधान

Hindi Story: ‘‘मैं ने पहचाना नहीं आप को,’’ असीम के मुंह से निकला.

‘‘अजी जनाब, पहचानोगे भी कैसे…खैर मेरा नाम रूपेश है, रूपेश मनकड़. मैं इंडियन बैंक में प्रबंधक हूं,’’ आगुंतक ने अपना परिचय देते हुए कहा.

‘‘आप से मिल कर बड़ी खुशी हुई. कहिए, आप की क्या सेवा करूं?’’ दरवाजे पर खड़ेखड़े ही असीम बोला.

‘‘यदि आप अंदर आने की अनुमति दें तो विस्तार से सभी बातें हो जाएंगी.’’

‘‘हांहां आइए, क्यों नहीं,’’ झेंपते हुए असीम बोला, ‘‘इस अशिष्टता के लिए माफ करें.’’

ड्राइंगरूम में आ कर वे दोनों सोफे पर आमनेसामने बैठ गए.

‘‘कहिए, क्या लेंगे, चाय या फिर कोई ठंडा पेय?’’

‘‘नहींनहीं, कुछ नहीं, बस आप का थोड़ा सा समय लूंगा.’’

‘‘कहिए.’’

‘‘कुछ दिन पहले आप के बड़े भाई साहब मिले थे. हम दोनों ही ‘सिकंदराबाद क्लब’ के सदस्य थे और कभीकभी साथसाथ गोल्फ भी खेल लेते…’’

‘‘अच्छा…यह तो बहुत ही अच्छी बात है कि आप से उन की मुलाकात हो जाती है वरना वह तो इतने व्यस्त रहते हैं कि हम से मिले महीनों हो जाते हैं,’’ असीम ने शिकायती लहजे में कहा.

‘‘डाक्टरों की जीवनशैली तो होती ही ऐसी है, पर सच मानिए उन्हें आप की बहुत चिंता रहती है. बातोंबातों में उन्होंने बताया कि 3 साल पहले आप की पत्नी का आकस्मिक निधन हो गया था. आप का 4 साल का एक बेटा भी है…’’

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‘‘जी हां, वह दिन मुझे आज भी याद है. मेरी पत्नी आभा का जन्मदिन था. टैंक चौराहे के पास सड़क पार करते समय पुलिस की जीप उसे टक्कर मारती निकल गई थी. मेरा पुत्र अनुनय उस की गोद में था. उसे भी हलकी सी खरोंचें आई थीं, पर आभा तो ऐसी गिरी कि फिर उठी ही नहीं…’’

‘‘मुझे बहुत दुख है, आप की पत्नी के असमय निधन का, पर मैं यहां किसी और ही कारण से आया हूं.’’

‘‘हांहां, कहिए न,’’ असीम अतीत को बिसारते बोला.

‘‘जी, बात यह है कि मेरी ममेरी बहन मीता ऐसी ही हालत में विवाह के ठीक 2 माह बाद अपना पति खो बैठी थी. मैं ने सोचा यदि आप दोनों एकदूसरे का हाथ थाम लें तो जीवन में पहले जैसी खुशियां पुन: लौट सकती हैं,’’ कह कर रूपेश तो चुप हो गया, मगर असीम को किंकर्तव्यविमूढ़ कर गया.

‘‘देखिए रूपेश बाबू, मैं ने तो दूसरे विवाह के संबंध में कभी कुछ सोचा ही नहीं. पहले भी कई प्रस्ताव आए पर मैं ने अस्वीकार कर दिए. मैं नहीं चाहता कि मेरे पुत्र पर सौतेली मां का साया पड़े,’’ कहते हुए असीम ने अपना मंतव्य स्पष्ट किया.

‘‘मैं अपनी बहन की तारीफ केवल इसलिए नहीं कर रहा हूं कि मैं उस का भाई हूं बल्कि इसलिए कि उस का स्वभाव इतना मोहक है कि वह परायों को भी अपना बना ले. फिर भी मैं आप पर कोई जोर नहीं डालना चाहता. आप दोनों एकदूसरे से मिल लीजिए, जानसमझ लीजिए. यदि आप दोनों को लगे कि आप एकदूसरे का दुखसुख बांट सकते हैं, तभी हम बात आगे बढ़ाएंगे,’’ कहते हुए रूपेश ने अपनी जेब से एक कागज निकाल कर असीम को थमा दिया, जिस में मीता का जीवनपरिचय था. मीता नव विज्ञान विद्यालय में भौतिकी की व्याख्याता थी.

फिर रूपेश एक प्याला चाय पी कर असीम से विदा लेते हुए बोला, ‘‘आप जब चाहें मुझ से फोन पर संपर्क कर सकते हैं,’’ कह कर वह चला गया.

इस मामले में ज्यादा सोचविचार के लिए असीम के पास समय नहीं था. उसे तैयार हो कर कार्यालय पहुंचना था, इस जल्दी में वह रूपेश और उस की बहन मीता की बात पूरी तरह भूल गया.

कार्यालय पहुंचते ही ‘नीलिमा’ उस के सामने पड़ गई. हालांकि वह उस से बच कर निकल जाना चाहता था.

‘‘कहिए महाशय, कहां रहते हैं आजकल? आज सुबह पूरे आधे घंटे तक बस स्टाप पर लाइन में खड़ी आप का इंतजार करती रही,’’ नीलिमा ने शिकायती लहजे में कहा.

‘‘यानी मुझ में और बस में कोई अंतर ही नहीं है…’’ कहते हुए असीम मुसकराया.

‘‘है, बहुत बड़ा अंतर है. बस तो फिर भी ठीक समय पर आ गई थी पर श्रीमान असीम नहीं पधारे थे.’’

‘‘बहुत नाराज हो? चलो, आज सारी नाराजगी दूर कर दूंगा. आज अच्छी सी एक फिल्म देखेंगे और रात का खाना भी अच्छे से एक रेस्तरां में…’’ असीम बोला.

‘‘नहीं, आज नहीं. इंदौर से मेरे मांपिताजी आए हुए हैं. 3 दिन तक यहीं रुकेंगे. उन के जाने के बाद ही मैं तुम्हारे साथ कहीं जा पाऊंगी.’’

‘‘अरे वाह, तुम तो अपने पति और सासससुर तक की परवा नहीं करतीं फिर मांपिताजी…’’ असीम ने व्यंग्य में कहा.

‘‘मांपिताजी की परवा करनी पड़ती है. तुम तो जानते ही हो कि देर से जाने पर सवालों की झड़ी लगा देंगे. परिवार के सम्मान और समाज की दुहाई देंगे. फिर 3 दिन की ही तो बात है, क्यों खिटपिट मोल लेना. पति और सासससुर भी कहतेसुनते रहते हैं, पर सदा साथ ही रहना है, लिहाजा, मैं चिंता नहीं करती,’’ कहती हुई नीलिमा हंसी.

‘‘पता नहीं, तुम्हारे तर्क तो बहुत ही विचित्र होते हैं. पर नीलू आज शाम की चाय साथ पिएंगे, तुम से जरूरी बात करनी है,’’ असीम बोला.

‘‘नहीं, तुम्हारे साथ चाय पी तो मेरी बस निकल जाएगी. दोपहर का भोजन साथ लेंगे. आज तुम्हारे लिए विशेष पकवान लाई हूं.’’

‘‘ठीक है, आशा करता हूं उस समय कोई मीटिंग न चल रही हो.’’

‘‘देर हो भी गई तो मैं इंतजार करूंगी,’’ कहती हुई नीलिमा अपने केबिन की ओर बढ़ गई.

कार्यालय की व्यस्तता में असीम भोजन की बात भूल ही गया था पर भोजनावकाश में दूसरों को जाते देख उसे नीलिमा की याद आई तो वह लपक कर कैंटीन में जा पहुंचा.

‘‘यह देखो, गुलाबजामुन और मलाईकोफ्ता…’’ नीलिमा अपना टिफिन खोलते हुए बोली.’’

‘‘मेरे मुंह में तो देख कर ही पानी आ रहा है. मैं तो आज केवल डबलरोटी और अचार लाया हूं. समय ही नहीं मिला,’’ असीम कोफ्ते के साथ रोटी खाते हुए बोला.

‘‘ऐसा क्या करते रहते हो जो अपने लिए कुछ बना कर भी नहीं ला सकते? सच कहूं, तुम्हें कैंटिन के भोजन की आदत पड़ गई है.’’

‘‘तुम जो ले आती हो रोजाना कुछ न कुछ…पर सुनो, आज बहुत ही अजीब बात हुई. एक अजनबी आ टपका. रूपेश नाम था उस का, उम्र में मुझ से 1-2 साल का अंतर होगा. कहने लगा, मेरे भाई डाक्टर उत्तम से उस का अच्छा परिचय है,’’ असीम ने बताया.

‘‘अरे, तो कह देते तुम्हें कार्यालय जाने को देर हो रही है.’’

‘‘बात इतनी ही नहीं थी नीलू, वह अपनी ममेरी बहन का विवाह प्रस्ताव लाया था. विवाह के कुछ माह बाद ही बेचारी के पति का निधन हो गया था.’’

‘‘तुम ने कहा नहीं कि दोबारा से ऐसा साहस न करें.’’

‘‘नहीं, मैं ने ऐसा कुछ नहीं कहा बल्कि मैं ने तो कह दिया कि विवाह प्रस्ताव पर विचार करूंगा.’’

‘‘देखो असीम, फिर से वही प्रकरण दोहराने से क्या फायदा है. मैं ने कहा था न कि तुम ने दूसरे विवाह की बात भी की तो मैं आत्महत्या कर लूंगी,’’ कहती हुई नीलिमा तैश में आ गई.

‘‘हां, याद है. पिछली बार तुम ने नींद की गोलियां भी खा ली थीं. मैं ने भी तुम से कहा था कि ऐसी हरकतें मुझे पसंद नहीं हैं. तुम्हारा पति है, बच्चे हैं भरापूरा परिवार है. हम मित्र हैं, इस का मतलब यह तो नहीं कि तुम इतनी स्वार्थी हो जाओ कि मेरा जीना ही मुश्किल कर दो…’’ कहते हुए असीम का स्वर इतना ऊंचा हो गया कि कैंटीन में मौजूद लोग उन्हीं को देखने लगे.

‘‘मैं सब के सामने तमाशा करना नहीं चाहती, पर तुम मेरे हो और मेरे ही रहोगे. यदि तुम ने किसी और से विवाह करने का साहस किया तो मुझ से बुरा कोई न होगा,’’ कहती हुई नीलिमा अपना टिफिन बंद कर के चली गई और असीम हक्काबक्का सा शून्य में ताकता बैठा रह गया.

‘‘क्या हुआ मित्र? आज तो नीलिमाजी बहुत गुस्से में थीं?’’ तभी कुछ दूर बैठा भोजन कर रहा उस का मित्र सोमेंद्र उस के सामने आ बैठा.

‘‘वही पुराना राग सोमेंद्र, मैं उस से अपना परिवार छोड़ कर विवाह करने को कहता हूं तो परिवार और समाज की दुहाई देने लगती है, पर मेरे विवाह की बात सुन कर बिफरी हुई शेरनी की तरह भड़क उठती है,’’ असीम दुखी स्वर में बोला.

‘‘बहुत ही विचित्र स्त्री है मित्र, पर तुम भी कम विचित्र नहीं हो,’’ सोमेंद्र गंभीर स्वर में बोला.

‘‘वह कैसे?’’ कहता हुआ असीम वहां से उठ कर अपने कक्ष की ओर जाने लगा.

‘‘उस के कारण तुम्हारी कितनी बदनामी हो रही है, क्या तुम नहीं जानते? अपने हर विवाह प्रस्ताव पर उस से चर्चा करना क्या जरूरी है? ऐसी दोस्ती जो जंजाल बन जाए, शत्रुता से भी ज्यादा घातक होती है…’’ सोमेंद्र ने समझाया.

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‘‘शायद तुम ठीक कह रहे हो, तुम ने तो मुझे कई बार समझाया भी पर मैं ही अपनी कमजोरी पर नियंत्रण नहीं कर पाया,’’ कहता हुआ असीम मन ही मन कुछ निर्णय ले अपने कार्य में व्यस्त हो गया.

उस के बाद घटनाचक्र इतनी तेजी से घूमा कि स्वयं असीम भी हक्काबक्का रह गया.

रूपेश ने न केवल उसे मीता से मिलवाया बल्कि उसे समझाबुझा कर विवाह के लिए तैयार भी कर लिया.

विवाह समारोह के दिन शहनाई के स्वरों के बीच जब असीम मित्रों व संबंधियों की बधाइयां स्वीकार कर रहा था, उसे रूपेश और नीलिमा आते दिखाई दिए. एक क्षण को तो वह सिहर उठा कि न जाने नीलिमा क्या तमाशा खड़ा कर दे.

‘‘असीम बाबू, इन से मिलिए यह है मेरी पत्नी नीलिमा. आप के ही कार्यालय में कार्य करती है. आप तो इन से अच्छी तरह परिचित होंगे ही, अलबत्ता मैं रूपेश नहीं सर्वेश हूं. मैं ने आप से थोड़ा झूठ बोला अवश्य था, पर अपने परिवार की सुखशांति बचाने के लिए. आशा है आप माफ कर देंगे,’’ रूपेश बोला.

‘‘कैसी बातें कर रहे हैं आप, माफी तो मुझे मांगनी चाहिए. आप की सुखी गृहस्थी में मेरे कारण ही तो भूचाल आया था,’’ असीम धीरे से बोला.

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‘‘आप व्यर्थ ही स्वयं को दोषी ठहरा रहे हैं, असीम बाबू. हमारे पारिवारिक जीवन में तो ऐसे अनगिनत भूचाल आते रहे हैं, पर अपनी संतान के भविष्य के लिए मैं ने हर भूचाल का डट कर सामना किया है. इस में आप का कोई दोष नहीं है. अपना ही सिक्का जब खोटा हो तो परखने वाले का क्या दोष?’’ कहते हुए सर्वेश ने बधाई दे कर अपना चेहरा घुमा लिया. असीम भी नहीं देख पाया था कि उस की आंखें डबडबा आई थीं. वह नीलिमा पर हकारत भरी नजर डाल कर अन्य मेहमानों के स्वागत में व्यस्त हो गया. Hindi Story

लेखक- शकुंतला शर्मा

Hindi Story: नारी की बारी

चौथी अटैची का नंबर आतेआते लीना का पारा उतर कर थोड़ा  नीचे आ गया था, सो उसे खोल कर उस में रखे अपने कपड़ों को निकाल कर उन्हें बेड पर फेंका और अलमारी खोल कर उस में रखे कपड़ों को अटैची में भरना शुरू कर दिया.

‘‘कहीं जा रही हो क्या?’’ होंठों पर शहद घोल कर मैं ने पूछा, ‘‘देखो, कल रात की बात को भूल जाओ. ज्यादा गुस्सा सेहत के लिए ठीक नहीं होता.’’

लीना ने गरदन को कुछ इस अंदाज में झटका जैसे मदारी के कहने पर बंदरिया मायके जाने को मना करती है.

‘‘अच्छा, यह बताओ, इस घर को छोड़ कर तुम कहां जाओगी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं नहीं…तुम जा रहे हो,’’ लीना जल कर बोली.

‘‘मैं जा रहा हूं, पर कहां?’’ मेरा मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘यह तुम जानो…मगर घर छोड़ कर अब तुम्हें जाना ही पड़ेगा.’’

‘‘यह क्या कह रही हो? मैं भला अपना घर छोड़ कर क्यों जाऊं?’’

‘‘क्योंकि अब एक छत के नीचे हम दोनों एकसाथ नहीं रह सकते,’’ लीना ने फैसला सुनाया.

बात मामूली सी थी. कल रात खाना खाते हुए मैं ने लीना को सब्जी में थोड़ा सा नमक डालने को कहा था. लीना टेलीविजन पर अपना पसंदीदा धारा- वाहिक देख रही थी. वह उस में इतना खोई हुई थी कि मुझे नमक के लिए कई बार कहना पड़ा. अपने मनोरंजन में विघ्न लीना को गवारा न हुआ. वह एक झटके में टेलीविजन के सामने से उठी, किचन में गई और नमकदानी ला कर उस का सारा नमक मेरी सब्जी व दाल की कटोरियों में उलट कर नमकदानी मेज पर पटक दी.

‘और भी जो कुछ मंगवाना है उस की सूची बोलते जाओ,’ लीना अपने कूल्हों पर हाथ रख तन कर खड़ी हो गई.

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‘अब यह दालसब्जी मेरे सिर पर डाल दो,’ मुझे भी गुस्सा आ गया था, ‘टेलीविजन पर आने वाले किसी भी धारावाहिक का एक भी दृश्य मिस होते ही तुम्हारा पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है.’

‘तुम्हें भी तो मुझे डिस्टर्ब करने में मजा आता है. जरा सा उठ कर रसोई से नमक उठा लाते तो क्या हाथपांव में मोच आ जाती या घिस कर छोटे हो जाते?’ लीना की आवाज ऊंची हो गई.

‘टीवी ही तो देख रही थीं न, कौन सा कशीदा काढ़ रही थीं,’ मैं भी उबल पड़ा, ‘दिन ढला नहीं और तुम्हारा टीवी चला नहीं.’

‘तुम को तो बस, मेरे टेली-विजन देखने से चिढ़ है. रातदिन टीवी का ताना देते रहते हो. जरा देर के लिए टीवी खोला नहीं कि तुम्हारे पेट  में मरोड़ होने लगती है,’ कह कर लीना एक झटके से मुड़ी और टीवी का स्विच आफ कर बेडरूम में घुस कर धड़ाम से दरवाजा बंद कर लिया.

अब शेरनी की मांद में जाने की हिम्मत भला मुझ में कहां. बेडरूम में सोने के बजाय ड्राइंगरूम के एक सोफे पर रात गुजारने में ही मैं ने अपनी भलाई समझी.

जब जरा आंख लगी तो बेडरूम में अटैचियों की उठापटक से आंख खुल गई. मैं उठा और लीना के पास जा पहुंचा.

‘‘बताओबताओ, भला मैं अपना घर छोड़ कर क्यों जाऊं?’’ मैं ने अपना सवाल दोहराया.

‘‘क्योंकि अब मैं और तुम एक टीवी के सामने…मेरा मतलब…एक छत के नीचे नहीं रह सकते,’’ लीना ने अटैची बंद करते हुए कहा, ‘‘यह अपनी अटैची उठाओ और यहां से चलते बनो.’’

‘‘भला आज तक किसी पति ने घर छोड़ा है जो मैं छोड़ कर जाऊं. घर से पत्नी ही जाती है…चाहे अपने मायके जाए या भाई के घर,’’ मैं ने लीना के लहजे की नकल उतारी.

‘‘वह जमाने लद गए जब पत्नियां घर छोड़ कर जाती थीं. आज के टीवी धारावाहिकों ने औरतों की आंखें खोल दी हैं. हमें पता चल गया है कि हमारे क्या अधिकार हैं. पति की तरह हम पत्नियों को भी अपनी मरजी से जिंदगी जीने का हक है. पति को घर से  बेदखल करने का हमें पूरा-पूरा हक है.’’

लीना के इस टीवी ज्ञान को देख कर कुछ सोच पाता कि उस की आवाज ‘कपड़े इस अटैची में रख दिए हैं,’ फिर से कानों में गूंजने लगी, ‘‘अपना टूथब्रश और शेविंग का सामान बाथरूम से उठा लो और फौरन यह घर खाली कर के चलते बनो वरना 10 मिनट बाद पुलिस आ कर तुम को घर से निकाल देगी.’’

‘‘अरे वाह, यह क्या जबरदस्ती है. मेरे ही घर से मुझे तुम कैसे निकाल सकती हो?’’ मैं ने तर्क रखा.

‘‘पति जब पत्नी को पहने हुए कपड़ों में घर से निकाल सकता है तो पत्नी उसे क्यों नहीं निकाल सकती? मैं तो तुम्हें कपड़ों से भरी अटैची दे रही हूं.’’

तभी बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई. साथ ही किसी ने बाहर का दरवाजा खटखटाया.

‘‘लो, पहुंच गई पुलिस,’’ लीना चहक उठी और आगे बढ़ कर दरवाजा खोला.

दरवाजे से लीना के भैया बलदेव और ताऊजी कमरे में दाखिल हुए. उन के पीछे मेरी माताजी भी थीं. सभी के चेहरों पर घबराहट छाई हुई थी.

‘‘तुम्हारे पड़ोसी गोपालजी ने मुझे फोन कर के बताया है कि कल रात से तुम दोनों के बीच कुछ खटपट चल रही है,’’ लीना के भैया बोले.

‘‘मुझ से रहा न गया. मैं मनोज की माताजी को भी साथ ले कर आया हूं,’’ ताऊजी ने उखड़े स्वर में कहा.

‘‘मनोज बेटे, क्या बात हुई? यह घर का सारा सामान कैसे बिखरा पड़ा है?’’ माताजी ने मेरी बांह हिलाई.

‘‘मम्मीजी, इन से क्या पूछती हैं, मैं बतलाती हूं. यह सदा के लिए घर छोड़ कर जा रहे हैं.’’

‘‘लड़के, तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया. घर में थोड़ाबहुत लड़ाईझगड़ा हुआ तो क्या तुम घर छोड़ कर भाग जाओगे?’’ मां ने मुझे लताड़ा.

‘‘मां, मैं घर छोड़ कर नहीं भाग रहा बल्कि लीना मुझे घर से निकाल रही है.’’

‘‘लीना तुम्हें घर से निकाल रही है?’’ तीनों ने सम्मिलित स्वर में पूछा.

‘‘लड़की, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?’’ ताऊजी गुर्राए.

‘‘मेरा दिमाग ठीक है,’’ लीना ने ढिठाई से कहा, ‘‘आप जैसे बूढ़ों ने ही हम लड़कियों की ब्रेन वाश्ंिग कर रखी थी कि ससुराल में लड़की की डोली जाती है और वहां से उस की अरथी निकलती है. आज इस का जादू टूट चुका है.’’

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‘‘क्या अनापशनाप बके जा रही है,’’ भैया बलदेव का स्वर क्रोध से कांप रहा था, ‘‘न लाज न शरम जो मुंह में आता है बोले जा रही है. बस, अब यह ड्रामा खत्म करो.’’

‘‘भैया, अब तो ऐसे ड्रामे हर उस पति के घर में होंगे जो बीवी को पैर की जूती समझते हैं. हम नारियों की बुद्धि तो आप जैसे अपनों ने भ्रष्ट कर रखी थी,’’ लीना भैया पर बरसी, ‘‘भला हो इन टेलीविजन धारावाहिकों के निर्माताओं का, जिन्होंने अपने धारावाहिकों से हम नारियों की आंखें खोल दी हैं. हम औरतों को भी अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने का हक है.’’

‘‘ओ निर्लज्ज, कुछ शरम कर,’’ ताऊजी चिलाए, ‘‘क्यों खानदान की नाक कटवाने पर तुली है.’’

‘‘ताऊजी, आप को तो अपनी

इस बेटी पर गुमान होना चाहिए जो इतना बोल्ड कदम उठा कर पति के घर में तिलतिल कर मरती लड़कियों को एक राह दिखा रही है. पति को उसी के घर से किक आउट करने का मेरा यह कारनामा दुनिया के सामने जब आएगा तो सैकड़ोंहजारों मजलूम बहुआें की जिंदगी की धारा ही बदल जाएगी,’’ लीना ने गरदन अकड़ाई.

‘‘बसबस, अब एक भी शब्द और मुंह से निकाला तो…’’ ताऊजी गुस्से से कांपने लगे थे. मां बोलीं, ‘‘भाई साहब, आप हमारे घर के मामले में न बोलें. अपनी बेटी को मैं समझाती हूं,’’ फिर मां ममता भरे स्वर में लीना से बोलीं, ‘‘मेरी अच्छी बेटी, अगर मनोज से कुछ भूल हो गई है तो उस की तरफ से मैं तुम से माफी मांगती हूं… गुस्सा थूक दे मेरी समझदार बेटी… हमारे घर को बरबाद मत कर.’’

माताजी ने लीना के सिर पर प्यार से हाथ फेरना चाहा तो लीना बिदक कर दूर हट गई.

‘‘बसबस, रहने दीजिए. मुझे अच्छी तरह से पता चल गया है कि सासूजी लोग कितनी मीठी छुरी होती हैं. बहू लाख सोने की बन जाए पर सास को तो उस में खोट ही खोट नजर आता है,’’ लीना ने कड़वे स्वर में कहा, ‘‘आप की बहू आप के बेटे को घर से निकाल रही है तो कैसे आप के शब्दों से शहद टपक रहा है. अगर यही काम आप का बेटा करता तो आप उस की पीठ ठोंकतीं.’’

‘‘बसबस, बहुत हो चुका,’’ मां के इस अपमान से मेरा खून खौल उठा, ‘‘मैं घर छोड़ कर जा रहा हूं…और मैं अपना यह टेलीविजन भी अपने साथ ले कर जा रहा हूं,’’ मैं ने टेलीविजन से केबल का तार अलग करते हुए कहा, ‘‘न तो यह टेलीविजन तुम्हें दहेज में मिला है न स्त्री धन के तौर पर दिया गया है.’’

‘‘अरेअरे, यह क्या गजब ढा रहे हैं आप,’’ लीना ने जल्दी से टेलीविजन के ऊपर हाथ टिका दिया, ‘‘भला मैं इतनी जल्दी टीवी वाले प्रेमी का इंतजाम कैसे कर सकती हूं, मेरा मतलब नए टीवी का इंतजाम कैसे कर सकती हूं.’’

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‘‘तो?’’ मैं ने लीना के चेहरे पर आंखें गड़ा दीं.

‘‘जब तक टीवी का प्रबंध नहीं हो जाता, आप इस घर में मेरे साथ रह सकते हैं,’’ लीना ने प्यार भरी नजरों से मुझे देखा.

लेखक-लाज ठाकुर

Hindi Story: बबली की व्यथा… बब्बन की प्रेमकथा

अपने त्रिलोकीनाथ मामाजी परेशान हैं. उन से भी ज्यादा परेशान मामी त्रिदेवी हैं, जो अपनेआप को श्रीदेवी से कभी कम नहीं समझतीं. हां, तो मामामामी दोनों इसलिए परेशान हैं कि उन के भांजे की धर्मपत्नी बबली परेशान है और इस समय रात के 10 बजे उन के घर बिना भांजे को साथ लिए आ पहुंची है.

मामी की परेशानी बढ़ती जा रही है क्योंकि ‘बबली रात को यहीं रुकेगी’ का डर उन के बदन में कंपकंपी पैदा कर रहा है. वैसे मामामामी दोनों बबली और बब्बन से दो हाथ दूर रहने में ही अपनी सलामती समझते हैं पर आफत कभी फोन कर के तो आती नहीं.

मामी को आज तसल्ली इस बात की है कि हमेशा मामाजी के गले लग कर हंसने वाली बबली मामी के गले लग कर रो रही है.

रोती हुईर् बबली की तरफ देख कर मामाजी दहाड़े, ‘‘तो बब्बन की यह हिम्मत? अपनी सोने जैसी बीवी को छोड़ कर कोयले जैसी काम वाली का हाथ पकड़ता है?’’

‘‘हां मामाजी, सिर्फ हाथ ही नहीं पकड़ता बल्कि चोटी भी पकड़ता है और उसे पे्रमा कह कर बुलाता है. और भी बहुत कुछ कहता है…’’ कहतेकहते बबली रुक गई.

‘‘क्या कहता है वह भूतनीका?’’ मामी ने बब्बन के बहाने अपनी ननद को भी लपेटा. ननदभाभी के बीच होगी कोई पुरानी रंजिश.

‘‘देवी,’’ मामाजी बोले, ‘‘दीदी का इस में क्या दोष? बब्बन के घर तो होलीदीवाली के सिवा आती भी नहीं और हमारे घर आए तो 2-3 साल हो ही गए.’’

वह बहन के बारे में और कुछ कह डालें इस से पहले मामी फिर बोल उठीं, ‘‘अरे वाह, वह कितनी चटोरी हैं ये तो मैं ही जानती हूं. सारी कढ़ी चट कर जाती थीं और नाम मेरा आता था.’’

बबली उन दोनों के बीच कूदते हुए बोली, ‘‘वैसे माताजी तो अच्छी हैं पर मेरे से उन की सेवा नहीं होती है. उन की मरजी का खाना मैं पका नहीं सकती और बेचारी भूखी रह जाती हैं इसलिए जेठानी के घर रहती हैं. गलती मेरी ही है. काश, मैं उन के लिए बढि़या खाना पकाती कुछ नहीं तो कढ़ी ही अच्छी बना लेती तो वह मेरे यहां रहतीं और बब्बन की हिम्मत न पड़ती कि वह काम वाली की राहों में फूल बिछाएं और प्यार में पागल हो जाएं.’’

कल की ही बात है मामाजी, सुनिए, वे बाजार से फूल

खरीद कर लाए थे. सुबह दरवाजे

पर डालते हुए कहने लगे कि प्रेमा के आने का समय हो गया है उस की राहों में फूल बिछा रहा हूं. उस के बिना मेरे दिल को सुकून कहां? दुनिया चाहे इधर की उधर हो जाए…मैं उस का साथ नहीं छोडूंगा. मेरी सुबह, दोपहर और शाम उसी के साथ गुजरेगी. उस जानेमन के बगैर अब चैन कहां रे…’’

‘‘लेकिन बबली, बब्बन की सुबह, दोपहर और शाम उस कलूटी प्रेमवल्ली के साथ गुजरेगी यह बब्बन ने कह दिया लेकिन रात के लिए तो कुछ नहीं कहा,’’ मामी ने ऐसी शक्ल बनाते हुए कहा जैसे बहुत बड़ी ‘रिसर्च’ की हो.

‘‘देवी, तुम्हारा भी जवाब नहीं. मेरे साथ रह कर सोचनेसमझने की शक्ति तुम में भी आ गई, यह बहुत अच्छा हुआ,’’

‘‘अजी, सोचनेसमझने की शक्ति  यदि पहले आ गई होती तो आप से शादी कभी न करती,’’ मामी ने कहा और मामाजी चुप हो गए.

बबली ने बात का सिरा फिर पकड़ लिया और बोली, ‘‘रात अब तक तो मेरे साथ ही गुजर रही है पर कल का क्या पता,’’ कहते हुए बबली ने मामाजी के कंधे का सहारा लिया तो मामी ने फिर उसे अपनी तरफ खींचा.

समस्या वाकई गंभीर थी. आपस में लड़ाईझगड़ा करने का समय नहीं था. बबली और बब्बन की ओछी हरकतों से हमेशा मुसीबत  में फंसने वाले मामामामी आज बबली का साथ दे रहे

थे. कहीं बब्बन

ने बबली को तलाक दे दिया और प्रेमवल्ली के साथ घर

बसा लिया तो रिश्तेदारों में मामामामी की नाक कट जाने का डर था. सभी रिश्तेदार उन्हीं से जवाबतलब करेंगे कि इतना सबकुछ हुआ तो शहर में होते हुए भी आप क्या कर रहे थे?

हुआ यह था कि घर के कामों से जी चुराने वाली बबली ने घर की साफसफाई के साथ खाना बनाने, कपड़े धोने और बाजार से सब्जी आदि लाने के काम के लिए एक काम वाली का सहारा लिया था. उस का पति बब्बन काल सेंटर की नौकरी पर लग गया था. पैसे अच्छे मिल रहे थे. दिन भर वह घर पर ही रहता था. रात को ड्यूटी पर जाता था. बबली या तो किटी पार्टियों में या फिर महल्ले के भजनकीर्तनों में चली जाती थी. घर पर रहती तो टेलीविजन पर आने वाले धारावाहिकों में खोई रहती थी. बब्बन के लिए उस के पास समय ही कहां बचता था. अब दिन भर घर में रह कर बब्बन सोएगा भी कितना? वह चाहता था कि बबली उस के पास बैठे. दो मीठी बातें करे, बढि़या खाना खिलाए, चाय के साथ कभी पकौड़े तो कभी समोसे खिलाए, बाजार घूमने जाए…पर बबली इस में से कुछ भी करती नहीं थी और बब्बन को मन मार कर दिन गुजारना पड़ता था.

एक दिन बबली को लगा कि बब्बन अब पहले से खुश रहने लगा है. वह जब  भी रेडियो पर रोमांटिक गाने आते उन्हें आवाज तेज कर सुनने लगा है. बाजार खरीदारी भी करने जाने लगा है. उस की खुशी का कारण बबली को जल्दी ही पता चल गया. एक दिन बबली ने देखा कि वह बाजार से खरीदारी कर के आ रहा था और उस के स्कूटर के पीछे प्रेमवल्ली हाथ में सब्जी का थैला पकड़े बैठी हुई थी जो अब स्कूटर के रुकते नीचे उतर रही थी. यह दृश्य देखते ही बबली के तनमन में आग लग गई.

‘‘प्रेमवल्ली को स्कूटर पर बैठा कर बाजार क्यों गए?’’ घर में घुसते ही बबली ने सवाल किया.

‘‘पता है, प्रेमवल्ली सब्जीभाजी के बहाने बीच में से कितने पैसे मार लेती है? इसलिए उस को साथ ले कर खुद ही सब्जी लेने चला गया,’’ बब्बन के पास जवाब ‘रेडी’ था.

अब प्रेमवल्ली को घर जाने में देर हो जाती थी तो बब्बन स्कूटर पर बैठा कर उसे छोड़ने भी जाने लगा. बबली के पूछने पर कहता, ‘‘जमाना कितना खराब है. जवान लड़की को इस तरह रात में अकेले कैसे जाने दूं. आखिर हमारी भी तो कुछ जिम्मेदारी बनती है.’’

बबली ने एक दिन बहाने से प्रेमवल्ली को हटा कर दूसरी बूढ़ी काम वाली रख ली लेकिन 2 दिन काम कर के वह चली गई, क्योंकि प्रेमवल्ली ने उस से झगड़ा किया कि मेरा घर तू ने कैसे ले लिया. उस के बाद कोई काम वाली काम करने के लिए राजी नहीं हुई और हार कर बबली को दोबारा प्रेमवल्ली को ही तनख्वाह बढ़ा कर काम पर रखना पड़ा.

अब बब्बन को किसी बहाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. वह रसोई में खड़ा रह कर प्रेमवल्ली से कौफी बनवाता था और वहीं खड़ाखड़ा उस के साथ हंसीठठोली करता हुआ पीता था. खाना भी वहीं खड़ा हो कर अपनी पसंद का बनवाता था और बबली के सामने बैठ कर खाता हुआ उस की तारीफ के पुल बांधता था.

यह सब देखते हुए बबली का घर से निकलना कम हो गया. उधर टेलीविजन पर सीरियल चल रहा होता था पर बबली की आंख और कान घर में चल रहे धारावाहिक की ओर ही होते थे. धीरेधीरे बबली का ध्यान धारावाहिकों से इतना हट गया कि वह सास को बहू और बहू को सास समझ बैठी.

उस दिन तो हद हो गई. बब्बन के पीछे स्कूटर पर बैठी प्रेमवल्ली नीचे उतर रही थी कि ऊंची एड़ी की सैंडिल की वजह से संतुलन खो बैठी और गिरने ही वाली थी कि बब्बन ने उसे कंधे से पकड़ कर संभाल लिया. बबली पहले से ही आगबबूला थी. जब प्रेमवल्ली मटकती हुई घर में घुसी तो बबली चिल्लाई…

‘‘मेरी सैंडिल पहनने की तेरी हिम्मत कैसे हो गई?’’

‘‘अय्यो अम्मां, यह आप का सैंडिल नई है, ये तो बब्बनजी ने मुझ को खरीद के दिया. जा के कमरे में देख लें मैडम, आप का सैंडल वहीं पड़ा होगा.’’

‘‘रहने दे…रहने दे. ज्यादा बकवास मत कर. जा कर अपना काम कर,’’ बबली ने बात छोटी करनी चाही पर बब्बन तो अपने पूरे मूड में था. कहने लगा, ‘‘बबली, आज तो प्रेमा ने कमाल किया. 700 वाली सैंडिल सेल में इस ने 500 रुपए में खरीदी है.’’

‘‘क्या कहा? प्रेमा…अब काम वाली को ‘प्रेमा’ कहा जाने लगा. उसे सब्जी की खरीदारी के बहाने बाजार की सैर करानी शुरू कर दी आज 500 रुपए की मेरे जैसी सैंडिल ले कर दी और वह भी आप को साहब की जगह बब्बनजी कह रही है. यह सब क्या है?’’ बबली दहाड़ी. बब्बन ने बबली को कोई जवाब नहीं दिया और बाथरूम से हाथमुंह धो कर जो निकला तो सीधा रसोई में कौफी पीने चला गया. बबली आने वाले संकट को भांप कर कांप उठी.

उस दिन छुट्टी होने की वजह से बब्बन रात में घर पर ही था. बेडरूम में उस के साथ प्यार से पेश आती बबली उस के बालों को सहलाती हुई कहने लगी, ‘‘हम पहलेपहल प्रयाग में संगम पर मिले थे. कितनी भीड़ थी. कुंभ का मेला था पर दो दिलों का मिलन तो गंगायमुना की तरह हो कर ही रहा. क्यों न हम अपने पहले प्यार को याद करने प्रयाग चले जाएं.’’

‘‘प्रेमा से पूछना पड़ेगा. उस की अम्मां शायद मना कर दे,’’ बब्बन को इस समय भी प्रेमा याद आई.

‘‘यह कैसा मजाक मेरे साथ कर रहे हो?’’ बबली अपने गुस्से पर काबू रखते हुए बोली.

‘‘यह मजाक नहीं है बबलीजी. आप की कसम, मैं सचमुच ही प्रेमा से प्रेम करने लगा हूं. उस की बलखाती लंबी नागिन सी चोटी जब हाथ में लेता हूं तो लगता है इस से बढ़ कर कोई और सहारा क्या होगा? और उस के बालों में अटका फूलों का गजरा तो मुझे इस दुनिया से उठा कर उस दुनिया की सैर कराता है. मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि मैं अब तक उस के बगैर जिंदा कैसे रहा. आप के साथ जो प्यार हुआ था वह प्यार नहीं था बबलीजी, एक धोखा था, बेकार में हम उसे प्यार समझ बैठे. भूल जाइए वह सब और सो जाइए,’’ कहते हुए बब्बन सो गया.

आखिर में यह सोच कर कि गृहस्थी में लगी हुई आग को बुझाने का काम केवल मामाजी ही कर सकते हैं क्योंकि उन के पास हर समस्या का हल होता है,  सोच कर बबली उन की शरण में आ पहुंची थी. रात का समय था, बब्बन नाइट शिफ्ट में चला गया था. आधी रात तो बबली ने बब्बन की प्रेम कहानी सुनाने में ही निकाल दी. प्रेमवल्ली के साथ बब्बन के प्रेमप्रसंग को वह कभी आंखों में आंसू भर कर तो कभी गुस्से की लाली भर कर सुनाती रही. नींद के झोंके आ रहे थे फिर भी मामी जागने की जीतोड़ कोशिश करती रहीं क्योंकि मामाजी का भरोसा नहीं था वह कब बबली के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे अपनी गोदी में सुला दें. जब कहीं मामाजी ही सोने चले गए तब मामी बबली के साथ ड्राइंग रूम में ही सो गईं.

सुबह जब बब्बन घर लौटा और लटकते हुए ताले ने उस का स्वागत किया तो सोचने में ज्यादा समय खर्च किए बगैर वह सीधा मामाजी के यहां चला आया. उस का यहां ठंडा स्वागत हुआ. सुबह का समय था पर किसी ने चाय तक नहीं पूछी. बबली तो अभी तक सो रही थी. बब्बन ढीठ था सीधा रसोई में गया और 3 कप चाय बना लाया. मामामामी को चाय का एकएक कप पकड़ा कर वह खुद भी पीने बैठ गया, साथ में अखबार भी पढ़ने लगा.

‘‘क्यों आया बब्बन?’’ मामाजी ने चुप्पी तोड़ी.

‘‘बबली आ सकती है तो क्या मैं नहीं आ सकता?’’ बब्बन ने अखबार पलटते हुए जवाब दिया.

‘‘तो तू जानता है कि बबली यहां आई है,’’ मामी आड़ातिरछा मुंह बनाते हुए बोलीं.

‘‘आप से ज्यादा मैं बबली को जानता हूं,’’ बब्बन ने अखबार मामाजी को पकड़ाया.

इतने में बबली भी आ धमकी और मामाजी की कुरसी के डंडे पर बैठने लगी थी पर मामी ने पकड़ कर उसे दूसरी कुरसी पर बिठाया. थोड़ी देर खामोशी छाई रही.

‘‘बब्बन, तू अपनेआप को समझता क्या है?’’ मामाजी ने बब्बन की तरफ मोरचा खोला.

‘‘बब्बन ही समझता हूं मामाजी, कोई और नहीं,’’ बब्बन बबली की तरफ देख कर बोला.

‘‘उस कामवल्ली…क्या नाम…प्रेम- वल्ली को इतना मुंह क्यों लगाया है?’’ मामाजी सीधे मुद्दे पर आ गए.

‘‘क्या प्यार करना गुनाह है और आप को पता भी है कि वह मेरी कितनी देखभाल करती है, उस के हाथ का बना इडलीसांबर, करारा डोसा और आलू के परांठे मामाजी खा कर तो देखिए, आप भी उस से प्यार करने लगेंगे,’’ बब्बन ने कहा और उधर मामाजी के मुंह में पानी  आ गया.

‘‘बस कर भूतनीके…’’ मामी ने कहा तो इस बार मामाजी को अपनी बहन की याद नहीं आई. वह मन ही मन प्रेमवल्ली का रेखाचित्र बना रहे थे और उस में इडली का सफेद, सांबर का मटमैला और डोसे का सुनहरा रंग भर रहे थे. आलू के परांठे का बैकग्राउंड उन्हें मनोहारी लग रहा था.

मामाजी की मौन साधना को देख कर मामी आगे बढ़ीं…

‘‘बब्बन, तेरी अक्ल को क्या काठ मार गया? घर में सुंदर, शरीफ, खानदानी बीवी के होते हुए तेरी नजर काम वाली पर कैसे टिक गई नमूने? बेचारी बबली अच्छा हुआ कि यहां चली आई, नहीं तो तेरी इन हरकतों से वह आत्महत्या भी कर सकती थी.’’

‘‘आत्महत्या तो एक बार मामाजी भी करने चले थे…की तो नहीं,’’ बब्बन ने मामाजी पर कटाक्ष किया.

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‘‘बब्बन, तू अपनी हद से गुजर रहा है. मैं आत्महत्या करूं या न करूं, इस से तुझे क्या? तू अपने घर की सोच. घर फूंक कर तमाशा मत देख. माना कि प्रेमवल्ली अच्छा खाना बनाती है, घर साफसुथरा रखती है, बरतनचौका सबकुछ करती है पर उस की बराबरी पत्नी से तो नहीं हो सकती, फिर बबली तुझे कितना प्यार करती है,’’ मामाजी ने समझाने के अंदाज में बब्बन से कहा.

‘‘पत्नी के सिर्फ मन ही मन प्यार करने से या मैं तुम से प्यार करती हूं, कह देने से पेट तो नहीं भरता मामाजी, सुखी गृहस्थी के लिए और भी बहुत कुछ चाहिए होता है. घर का वातावरण आनंददायक होना चाहिए. घर व्यवस्थित होना चाहिए. पति काम पर से घर लौटे तो टीवी बंद कर के पति को चायनाश्ता पूछना चाहिए. कुछ अपनी बातें बतानी चाहिए, कुछ उस की पूछनी चाहिए. अगर अपने हाथ का बना कोई व्यंजन पति को पत्नी प्रेम से खिलाती है तो उसे भी लगता है कि घर में उस का चाहने वाला कोई है.

 

आप ने एक बार कहा था कि किसी के दिल तक पहुंचने का रास्ता पेट से हो कर गुजरता है. बस, प्रेमा उस रास्ते से मेरे दिल तक पहुंच चुकी है. अब बबली के लिए कोई गुंजाइश नहीं है,’’ बब्बन बोला और बबली ने माथा पीट लिया.

‘‘बबली, तू यहां आ कर बैठ. कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा,’’ मामाजी ने बबली को अपनी कुरसी के डंडे पर बिठाया. मामी तिलमिला कर रह गईं.

‘‘देख बब्बन, अगर बबली बढि़या खाना बना कर खिलाए, तेरे साथ गुटरगूं करे और घर में व्यवस्था पूरी तरह बनाए रखे तो क्या तू उस प्रेमवल्ली को दिल से बाहर निकाल सकता है?’’ मामाजी ने पूछा.

‘‘छोडि़ए मामाजी, इस के लिए थोड़े ही बबली राजी होगी?’’ बब्बन तिरछी नजरों से बबली की तरफ देख रहा था.

‘‘मैं तो सबकुछ करने के लिए तैयार हूं मामाजी, यह तो आप की इज्जत का सवाल है. कल को हमारी गृहस्थी धूलमिट्टी में मिल जाती है तो रिश्तेदारी में नाक तो आप ही की कटेगी. मैं ऐसा नहीं होने दूंगी. अच्छा खाना बनाना मुश्किल काम थोड़े ही है, जरा सा ध्यान देना पड़ेगा. मामाजी, आप की इज्जत की खातिर मैं वह सारे व्यंजन बना कर इन को खिलाऊंगी जो प्रेमवल्ली बनाती है. मामाजी सिर्फ…’’ बबली ने गिरने के बाद भी अपनी टांग ऊपर रखी.

‘‘तो काम वाली की कल से छुट्टी?’’ मामाजी ने बब्बन से पूछा.

‘‘उस बेचारी के पेट पर लात क्यों मारनी मामाजी, वह सफाई, बरतन करती रहे.’’ बब्बन ने इस आखिरी दृश्य में सच से परदा उठाते हुए कहा, ‘‘मैं सिर्फ बबली को डराने के लिए ही उस से प्यार करने का दिखावा कर रहा था ताकि वह अपनी जिम्मेदारी समझे.’’

बब्बन ने बबली की तरफ देख कर कहना शुरू किया, ‘‘मामाजी, प्रेमा को मैं सिर्फ महल्ले के नुक्कड़ तक ही स्कूटर पर बैठा कर ले जाता था और वहीं से वापस ले आता था. हां, 500 रुपए की सैंडिल जरूर खरीद कर दी जिस के 250 रुपए वह अपनी तनख्वाह से कटवाने को राजी हुई है, मैं ने न तो कभी उस की चोटी पकड़ी, न तो उस का गजरा सहलाया.

इस तरह बबली के ऊपर आए हुए संकट के बादल छंट गए. ऐसे में मामी और बब्बन ने पिकनिक पर जाने का कार्यक्रम बनाया. मामाजी के बच्चे अब तक कहीं दुबक कर बैठे तमाशा देख रहे थे, वे भी पिकनिक का नाम सुनते ही प्रकट हो गए. पर मामाजी को दाल में कुछ काला नजर आ रहा था. उन के मन में यह आशंका जोर पकड़ती गई कि इस नाटक का कलाकार भले ही बब्बन हो लेकिन लेखक कोई और ही है.

‘‘अभी आ रहा हूं,’’ कह कर मामाजी श्रीमती खोटे के घर आ धमके.

‘‘भाभीजी, सचसच बताइए क्या बब्बन कभी यहां आया था?’’ मामाजी श्रीमती खोटे को घूरते हुए बोले.

‘‘हां, पिछले माह जब आप सपरिवार पर्यटन पर गए हुए थे तब आप के घर पर ताला देख कर वह यहां आया था. बस 5-10 मिनट बैठा था…’’ श्रीमती खोटे मामाजी को बताने लगीं.

‘‘बसबस, मैं समझ गया. ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है कि वह कितनी देर बैठा था,’’ बड़बड़ाते हुए मामाजी चले गए. काफी गुस्से में लग रहे थे.

थोड़ी ही देर में मामाजी के घर का दरवाजा खुला और गरजदार आवाज गूंज उठी, ‘‘निकल जा मेरे घर से…नासपीटे.’’

 

‘‘पर मामाजी, आप के दरवाजे पर ताला देख कर मैं मिसेज खोटे के यहां पूछने गया था…’’

‘‘मैं कुछ सुनना नहीं चाहता. मेरे होते हुए मेरे पड़ोसियों से सलाह लेता है तू?’’ मामाजी बरस रहे थे.

‘‘आप भी तो वहीं से सलाह ले कर मुझे देते. इसलिए मैं सीधे चला गया,’’ बब्बन मिनमिनाया.

‘‘उलटा जवाब देता है, भूतनीके…’’ कह कर मामाजी रुक गए. शायद बहन की याद आ गई.

‘‘अजी, पहले पिकनिक हो आते हैं, बब्बन को तो बाद में भी घर से निकाल सकते हैं,’’ मामी बाहर निकलते हुए बोलीं.

‘‘ठीक है, पिकनिक के बाद तू सीधा अपने घर चला जाएगा,’’ मामाजी का आदेश था.

‘‘बबली भी तेरे साथ ही जाएगी, यहां नहीं आएगी समझे,’’ मामी को डर था शायद बबली वापस आ जाए.

 

डा. अरुणा कपूर

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