चंदू : बाढ़ ने ढाया कहर

‘‘हुजूर, हम को भी अपने साथ ले चलिए. 3 दिनों से कुछ नहीं खाया है. हम को भी बाहर निकालिए… 3 दिनों से बाढ़ के पानी में फंसे हुए हैं… सबकुछ तबाह हो गया है… खानेपीने का सामान था, पर अचानक आई बाढ़ में सबकुछ डूब गया हुजूर… भूख के चलते जान निकल रही है… पैर पकड़ते हैं आप के हुजूर… हम को भी निकाल लीजिए…’’

‘‘ऐसे ही थोड़े ले जाएंगे… 20-20 रुपया हर आदमी का लगेगा… तभी ले जाएंगे. हम लोगों को भी खर्चापानी चाहिए कि नहीं…’’

नाव पर सवार एक नौजवान, जिस के हाथ में स्मार्टफोन और कान में ईयर फोन था, चेहरेमोहरे से तेजतर्रार लग रहा था. उस ने नाव वाले के इस रवैए का विरोध किया और बोला, ‘‘भैया, आप ऐसा नहीं कर सकते हैं. पैसे लेने का नियम नहीं है. बाढ़ आई है. प्रशासन की तरफ से सुविधाएं मुफ्त दी जा रही हैं.

‘‘डीएम साहब ने कहा है कि लोगों को बाढ़ प्रभावित इलाकों से महफूज जगह पहुंचाने के लिए नाव के साथ नाव चालकों की टीम लगाई गई है, फिर आप लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं? लोग यहां मर रहे हैं और आप उन की मजबूरी का फायदा उठाने में लगे हैं.’’

‘‘देखो बाबू, फालतू की बात मत करो… पैसा नहीं है तो बोलो कि नहीं है.अगली ट्रिप में दे देना, ज्यादा नियमकानून मत झड़ो.’’

‘‘हम लोग शिकायत करेंगे. आप ऐसा नहीं कर सकते हैं. अभी मैं ‘हैल्पलाइन’ नंबर पर फोन मिलाता हूं,’’ कहते हुए उस नौजवान ने फोन निकाला और ‘हैल्पलाइन’ का नंबर ढूंढ़ने लगा. कई बार फोन डायल किया, पर फोन लगा ही नहीं.

उस नौजवान ने थकहार कर कहा, ‘‘फोन कनैक्ट ही नहीं हुआ, नहीं तो आज ही आप को पता चल जाता कि 20 रुपए लेना क्या होता है.’’

‘‘बबुआ, कुछ नहीं होने वाला है. तुम्हारे जैसे लौंडों को हम लोग रोजाना देखते हैं. बाढ़ में ‘हैल्पलाइन’ का फोन भी बह गया है. कुछ नहीं होने वाला है. तुम्हारी भलाई इसी में है कि बकबक करना छोड़ दो और वाजिब पैसे दे दो, नहीं है तो उतर जाओ और सड़ते रहो यहीं पर.’’

‘‘भैया, बात पैसे की नहीं है, बेईमानी की है, भ्रष्टाचार की है. आप लोग नाजायज पैसे वसूल रहे हो. यह गलत है. हमारे पास तो पैसे हैं, पर आप लोग मजबूरों से ऐसा बुरा बरताव मत कीजिए. दुख की घड़ी में उन्हें सहारा दीजिए. थोड़ी दया दिखाइए…’’ चंदू की तरफ इशारा करते हुए वह नौजवान बोला, ‘‘देखिए इस बेचारे को, आप से हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ा रहा है, पर आप इतने गिर गए हैं कि आप को पैसे के सिवा कुछ नहीं सू?ा रहा है.’’

नाव वाला गुस्से से तमतमाते हुए बोला, ‘‘देखो लड़के, बहुत भाषण सुन चुके हैं तुम्हारा. तुम जहर उगल रहे हो. तुम अपनी सोचो, दूसरे की ठेकेदारी मत लो नहीं तो यहीं फेंक देंगे. लाश का भी पता नहीं चलेगा.’’

नाव पर सवार एक और आदमी, जो पहले से ही चुप था और किसी तरह महफूज जगह पहुंच जाने की उम्मीद के चलते किसी तरह की लफड़ेबाजी में नहीं फंसना चाहता था, नाव वाले की इस बात को सुन कर और भी डर गया.

चंदू बारबार नाव वाले से गुजारिश कर रहा था, पर नाव वाला भी अड़ियल था. वह उसे ले जाने के लिए तैयार नहीं था. वह प्रति आदमी 20 रुपए बाढ़ के पानी से पार कराने के लिए लेता था.

चंदू के पास पैसे नहीं थे. उस की तरफदारी करने वाले नौजवान की भी हेकड़ी नाव खेने वाले बदमाशों के चलते निकल गई थी. मुसीबत की इस घड़ी में बहुतकुछ गंवा चुके लोगों में से कोई भी इस समय दानपुण्य करने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा था ताकि चंदू भी महफूज जगह पहुंच जाए.

नाव वाले की इनसानियत मर चुकी थी. 20 रुपए की खातिर उस ने एक आदमी को मरने के लिए छोड़ दिया और नाव आगे बढ़ा दी.

अभी भी चंदू का गिड़गिड़ाना बंद नहीं हुआ था, ‘‘हुजूर, हम को भी चढ़ा लीजिए. बाद में हम मजदूरी कर के दे देंगे पैसा… रहम कीजिए हुजूर.’’

नाव वाला नाव की रफ्तार को तेज कर चुका था. अब कराहते और मरियल चंदू की आवाज आनी बंद हो गई थी.

कोसी की प्रलयकारी बाढ़ में चंदू का सबकुछ बरबाद हो गया था. हाल ही में उस ने घर बनाया था. भले ही वह घर फूस का था, पर खूनपसीने से बनाया गया घर जब तबाह हो जाता है, तब उस का दर्द पीड़ित ही समझ सकता है. पुरोहिती और मजदूरी कर के कुछ दानापानी भी जमा किया था ताकि अपने बालबच्चों और पत्नी की गुजरबसर ठीक से कर सके, पर वह भी बह चुका था. खाने के लाले पड़ गए थे.

अचानक आई बाढ़ से जिन को जहां मौका मिला उन्होंने अपने लैवल पर जान बचाने की कोशिश की. कई बह भी गए. कई अपनों से बिछुड़ गए.

चंदू भी अपनी पत्नी और बालबच्चों से बिछुड़ चुका था. वे किस हाल में होंगे… यह सोच कर उस की हालत बुरी हो जाती थी. ऊपर से पेट की आग ने उस को परेशान किया हुआ था. उस ने कई बार अपने परिवार को तलाश करने की कोशिश की, पर पानी के दैत्य रूप को देख कर हिम्मत जवाब दे देती.

ऐसे हालात में उन के घर से कुछ ही दूरी पर आम का विशालकाय पेड़ ही था जो उस को जिंदा रहने के लिए सहारा दे रहा था. जिंदा रहने के लिए चंदू किसी तरह आम के पत्तों और बाढ़ के पानी का सेवन कर रहा था.

पेड़ की डाल पर बैठे और हाथ से डाली को पकड़े हुए कई दिन हो चुके थे. समय अपनी रफ्तार से बढ़ रहा था, पर पानी नहीं घट रहा था.

दोपहर के 4 बज रहे थे. हवाईजहाज चूड़ा और गुड़ के पैकेट गिरा रहा था. चारों ओर फैले इस जलक्षेत्र में इस पेड़ पर भी कोई आदमी है, हवाईजहाज उड़ाने वाले इस बात से अनजान थे. काश, इस पेड़ पर भी पैकेट गिरा दिए जाते.

चंदू ने डाल पर लेटे हुए धीरे से आंख ऊपर कर के हवाईजहाज को देखा कि काश, कहीं से सहारा मिल जाए, पर हवाईजहाज आंख से ओर हाल हो गया.

शाम हो चुकी थी. चंदू की डाल से पकड़ ढीली हो रही थी और धीरेधीरे पकड़ छूट गई. बेजान शरीर पानी में गिर चुका था.

पानी ने चंदू के सारे दुखों को हर लिया था. अब उसे नाव और राहत की जरूरत नहीं थी. वह तो बहुत ही महफूज जगह पहुंच चुका था.

टैलीविजन पर खबर चल रही थी, ‘बाढ़ में फंसे लोगों को महफूज जगह पहुंचा दिया गया है. राहत और बचाव का काम तेजी से चल रहा है.’

अंधविश्वास की बलिवेदी पर : बाबा की गंदी हरकत

‘‘अरे बावली, कहां रह गई तू?’’ रमा की कड़कती हुई आवाज ने रूपल के पैरों की रफ्तार को बढ़ा दिया.

‘‘बस, आ रही हूं मामी,’’ तेज कदमों से चलते हुए रूपल ने मामी से आगे बढ़ हाथ के दोनों थैले जमीन पर रख दरवाजे का ताला खोला.

‘‘जल्दी से रात के खाने की तैयारी कर ले, तेरे मामा औफिस से आते ही होंगे,’’ रमा ने सोफे पर पसरते हुए कहा.

‘‘जी मामी,’’ कह कर रूपल कपड़े बदल कर चौके में जा घुसी. एक तरफ कुकर में आलू उबलने के लिए गैस पर रखे और दूसरी तरफ जल्दी से परात निकाल कर आटा गूंधने लगी.

आटा गूंधते समय रूपल का ध्यान अचानक अपने हाथों पर चला गया. उसे अपने हाथों से घिन हो आई. आज भी गुरु महाराज उस

के हाथों को देर तक थामे सहलाते रहे और वह कुछ न कह सकी. उन्हें देख कर कितनी नफरत होती है, पर मामी को कैसे मना करे. वे तो हर दूसरेतीसरे दिन ही उसे गुरु कमलाप्रसाद की सेवादारी में भेज देती हैं.

पहली बार जब रूपल वहां गई थी तो बड़ा सा आश्रम देख कर उसे बहुत अच्छा लगा था. खुलीखुली जगह, चारों ओर हरियाली ही हरियाली थी.

खिचड़ी बालों की लंबी दाढ़ी, कुछ आगे को निकली तोंद, माथे पर बड़ा सा तिलक लगाए सफेद कपड़े पहने, चांदी से चमकते सिंहासन पर आंखें बंद किए बैठे गुरु महाराज रूपल को पहली नजर में बहुत पहुंचे हुए महात्मा लगे थे जिन के दर्शन से उस की और उस के घर की सारी समस्याओं का जैसे खात्मा हो जाने वाला था.

अपनी बारी आने पर बेखौफ रूपल उन के पास जा पहुंची थी. महाराज उस के सिर पर हाथ रख आशीर्वाद देते हुए देर तक उसे देखते रहे.

मामी की खुशी का ठिकाना नहीं था. उस दिन गुरु महाराज की कृपा उस पर औरों से ज्यादा बरसी थी.

वापसी में महाराज के एक सेवादार ने मामी के कान में कुछ कहा, जिस से उन के चेहरे पर एक चमक आ गई. तब से हर दूसरेतीसरे दिन वे रूपल को महाराज के पास भेज देती हैं.

मामी कहती हैं कि गुरु महाराज की कृपा से उस के घर के हालात सुधर जाएंगे जिस से दोनों छोटी बहनों की पढ़ाईलिखाई आसान हो जाएगी और उन का भविष्य बन जाएगा.

रूपल भी तो यही चाहती है कि मां की मदद कर उन के बोझ को कुछ कम कर सके, तभी तो दोनों छोटी बहनों और उन्हें गांव में छोड़ वह यहां मामामामी के पास रहने आ गई है.

पिछले साल जब मामामामी गांव आए थे तब अपने दुखड़े बताती मां को आंचल से आंखों के गीले कोर पोंछते देख रूपल को बड़ी तकलीफ हुई थी.

14 साल की हो चुकी थी रूपल, पर अभी भी अपने बचपने से बाहर नहीं निकल पाई थी. माली हालत खराब होने से पढ़ाई तो छूट गई थी, पर सखियों के संग मौजमस्ती अभी भी चालू थी.

ठाकुर चाचा के आम के बगीचे से कच्चे आम चुराने हों या फुलवा ताई के दालान से कांटों की परवाह किए बगैर बारबेरी के बेर तोड़ने में उस का कहीं कोई मुकाबला न था.

पर उस दिन किवाड़ के पीछे खड़ी रूपल अपनी मां की तकलीफें जान कर हैरान रह गई थी. 4 साल पहले उस के अध्यापक बाऊजी किसी लाइलाज बीमारी में चल बसे थे.

मां बहुत पढ़ीलिखी न थीं इसलिए स्कूल मैनेजमैंट बाऊजी की जगह पर उन के लिए टीचर की नौकरी का इंतजाम न कर पाया. अलबत्ता, उन्हें चपरासी और बाइयों के सुपरविजन का काम दे कर एक छोटी सी तनख्वाह का जुगाड़ कर दिया था.

इधर बाऊजी के इलाज में काफी जमीन बेचनी पड़ गई थी. घर भी ठाकुर चाचा के पास ही गिरवी पड़ा था. सो, अब नाममात्र की खेतीबारी और मां की छोटी सी नौकरी 4 जनों का खर्चा पूरा करने में नाकाम थी.

रूपल को उस वक्त अपने ऊपर बहुत गुस्सा आया था कि वह मां के दुखों से कैसे अनजान रही, इसीलिए जब मामी ने अपने साथ चलने के लिए पूछा तो उस ने कुछ भी सोचे समझे बिना एकदम से हां कर दी.

तभी से मामामामी के साथ रह रही रूपल ने उन्हें शिकायत का कोई मौका नहीं दिया था. शुरुआत में मामी ने उसे यही कहा था, ‘देख रूपल, हमारे तो कोई औलाद है नहीं, इसलिए तुझे हम ने जिज्जी से मांग लिया है. अब से तुझे यहीं रहना है और हमें ही अपने मांबाप समझना है. हम तुझे खूब पढ़ाएंगे, जितना तू चाहे.’

बस, मामी के इन्हीं शब्दों को रूपल ने गांठ से बांध लिया था. लेकिन उन के साथ रहते हुए वह इतना तो समझ गई थी कि मामी अपने किसी निजी फायदे के तहत ही उसे यहां लाई हैं. फिर भी उन की किसी बात का विरोध करे बगैर वह गूंगी गुडि़या बन मामी की सभी बातों को मानती चली जा रही थी ताकि गांव में मां और बहनें कुछ बेहतर जिंदगी जी सकें.

रूपल को यहां आए तकरीबन 6-8 महीने हो चुके थे, लेकिन मामी ने उस का किसी भी स्कूल में दाखिला नहीं कराया था, बल्कि इस बीच मामी उस से पूरे घर का काम कराने लगी थीं.

मामा काम के सिलसिले में अकसर बाहर रहा करते थे. वैसे तो घर के काम करने में रूपल को कोई तकलीफ नहीं थी और रही उस की पढ़ाई की बात तो वह गांव में भी छूटी हुई थी. उसे तो बस मामी के दकियानूसी विचारों से परेशानी होती थी, क्योंकि वे बड़ी ही अंधविश्वासी थीं और उस से उलटेसीधे काम कराया करती थीं.

वे कभी आधा नीबू काट कर उस पर सिंदूर लगा कर उसे तिराहे पर रख आने को कहतीं तो कभी किसी पोटली में कुछ बांध कर आधी रात को उसे किसी के घर के सामने फेंक कर आने को कहतीं. महल्ले में किसी से उन की ज्यादा पटती नहीं थी.

मामी की बातें रूपल को चिंतित कर देती थीं. वह भले ही गांव की रहने वाली थी, पर उस के बाऊजी बड़े प्रगतिशील विचारों के थे. उन की तीनों बेटियां उन की शान थीं.

गांव के माहौल में 3-3 लड़कियां होने के बाद भी उन्हें कभी इस बात की शर्मिंदगी नहीं हुई कि उन के बेटा नहीं है. उन के ही विचारों से भरी रूपल इन अंधविश्वासों पर बिलकुल यकीन नहीं करती थी. पर न चाहते हुए भी उसे मामी के इन ढकोसलों का न सिर्फ हिस्सा बनना पड़ता, बल्कि उन्हें मानने को भी मजबूर होना पड़ता. क्योंकि अगर वह इस में जरा भी आनाकानी करती तो मामी तुरंत उस की मां को फोन लगा कर उस की बहुत चुगली करतीं और उस के लिए उलटासीधा भिड़ाया करतीं.

पर अभी जो रूपल के साथ हो रहा था, वह तो और भी बुरा था. पिछले कुछ वक्त से उस ने महसूस किया था कि आश्रम के काम के बहाने उसे गुरुजी के साथ जानबूझ कर अकेले छोड़ा जाता है.

रूपल छोटी जरूर थी, पर इतनी भी नहीं कि अपने शरीर पर रेंगते उन हाथों की बदनीयती पहचान न सके. वैसे भी उस ने गुरुदेव को अपने खास कमरे में आश्रम की एक दूसरी सेवादारिन के साथ जिन कपड़ों और हालात में देखा था, वे उसे बहुत गलत लगे थे. गुरुदेव के प्रति उस की भक्ति और आस्था उसी वक्त चूर हो चुकी थी.

मगर उस ने यह बात जब मामी को बताई तो उन्होंने इसे नजर का धोखा कह कर बात वहीं खत्म करने को कह दिया था.

तब से रूपल के मन में एक दहशत सी समा गई थी. वह बिना मामी के उस आश्रम में पैर भी नहीं रखना चाहती थी. सपने में भी वह बाबा अपनी आंखों में लाल डोरे लिए अट्टहास लगाता उस की ओर बढ़ता चला आता और नींद में ही डर से कांपते हुए रूपल की चीख निकल जाती. पर मामी का गुस्सा उसे वहां जाने पर मजबूर कर देता.

‘आखिर इस हालत में कब तक मैं बची रह सकती हूं. काश, मैं मां को बता सकती. वे आ कर मुझे यहां से ले जातीं…’ रूपल का दर्द आंखों से बह निकला.

‘‘बहरी हो गई क्या. कुकर सीटी पर सीटी दिए जा रहा?है, तुझे सुनाई नहीं देता?’’ अचानक मामी के चिल्लाने पर रूपल ने गालों पर ढुलक आए आंसू आहिस्ता से पोंछ डाले, ‘‘जी मामी, यहीं हूं,’’ कह कर उस ने गैस पर से कुकर उतारा.

‘‘सुन, आज गुरुजी का बुलावा है. सब काम निबटा कर वहां चली जाना,’’ सुबह मामा के औफिस जाते ही मामी ने रूपल को फरमान सुनाया.

‘‘मामीजी, एक बात कहनी थी आप से…’’ थोड़ा डरते हुए रूपल के मुंह से निकला, ‘‘दरअसल, मैं उन बाबा के पास नहीं जाना चाहती. वह मुझे अकेले में बुला कर यहांवहां छूने की कोशिश करता है. मुझे बहुत घिन आती है.’’

‘‘पागल हुई है लड़की… इतने बड़े महात्मा पर इतना घिनौना इलजाम लगाते हुए तुझे शर्म नहीं आती. उस दिन भी तू उन के बारे में अनापशनाप बके जा रही थी. तू बखूबी जानती भी है कि वे कितने चमत्कारी हैं.’’

‘‘मामीजी, मैं आप से सच कह रही हूं. प्लीज, आप मुझ से कोई भी काम करा लो लेकिन उन के पास मत भेजो,’’ रूपल की आंखों में दहशत साफ दिखाई दे रही थी.

‘‘देख रूपल, अगर तुझे यहां रहना है, तो फिर मेरी बात माननी पड़ेगी, नहीं तो तेरी मां को फोन लगाती हूं और तुझे यहां से ले जाने के लिए कहती हूं.’’

‘‘नहीं मामी, मां पहले ही बहुत परेशान हैं, आप उन्हें फोन मत करना. आप जहां कहेंगी मैं चली जाऊंगी,’’ रूपल ने दुखी हो कर हथियार डाल दिए.

यह सुन कर मामी के होंठों पर एक राजभरी मुसकान बिखर गई.

पता नहीं पर उस दिन रूपल की मामी भी उस के साथ गुरुजी के आश्रम पहुंचीं. कुछ ही देर में बाबा भक्तों को दर्शन देने वाले थे.

‘‘तू यहीं बैठ, मैं अंदर कुछ जरूरी काम से जा रही हूं,’’ मामी बोलीं.

रूपल को सब से अगली लाइन में बिठा कर मामी ने उसे अपना मोबाइल फोन पकड़ाया.

‘‘बाबा, मैं ने अपना काम पूरा किया. आप को एक कन्या भेंट की है. अब तो मेरी गोदी में नन्हा राजकुमार खेलेगा न?’’ मामी ने बाबा के सामने अपना आंचल फैलाते हुए कहा.

‘‘अभी देवी से प्रभु का मिलन बाकी है. जब तक यह काम नहीं हो जाता, तू कोई उम्मीद लगा कर मत बैठना,’’ बाबा के पास खड़े सेवादार ने जवाब दिया.

‘‘लेकिन, मैं ने तो अपना काम पूरा कर दिया…’’

‘‘हम ने तुझे पहले ही कहा था कि प्रभु और देवी के मिलन में कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए. तुझे उसे खुद तैयार करना होगा. इस काम में प्रभु को जबरदस्ती पसंद नहीं.’’

‘‘ठीक है, कल तक यह काम भी हो जाएगा,’’ मामी ने बाबा के पैरों को छूते हुए कहा. उधर तुरंत ही किसी काम से मामा का फोन आने से मामी के पीछे चल पड़ी रूपल ने जैसे ही ये बातें सुनीं, उस के पैरों तले जमीन सरक गई.

मामी को आते देख रूपल थोड़ी सी आड़ में हो गई.

‘‘कहां गई थी?’’ उसे अपने पीछे से आते देख मामी हैरान हो उठीं.

‘‘बाथरूम गई थी…’’ रूपल ने धीरे से इशारों में बताया.

रूपल बुरी तरह डर चुकी थी. अपनी मामी का खौफनाक चेहरा उस के सामने आ चुका था. अब तक उसे यही लगता था कि मामी भले ही तेज हैं, पर वे अच्छी हैं और बाबा की सचाई से बेखबर हैं, जिस दिन उन्हें गुरुजी की असलियत पता चलेगी वे उसे कभी आश्रम नहीं भेजेंगी. पर अब खुद उस की आंखों पर पड़ा परदा उठ गया था. उसे मामी की हर चाल अब समझ आ चुकी थी.

शादी के 10 साल तक बेऔलाद होने का दुख उन्होंने इस तरह दूर करने की कोशिश की. गांव में आ कर उन की गरीबी पर तरस खा कर उसे यहां एक साजिश के तहत लाना और बाबा के आश्रम में जबरदस्ती भेजना. इन बातों का मतलब अब वह समझ चुकी थी.

लेकिन अब रूपल क्या करे. उसे अपनी मां की बहुत याद आ रही थी. वह बस हमेशा की तरह उन के आंचल के पीछे छिप जाना चाहती थी.

‘मैं मां से इस बारे में बात करूं क्या… पर मां तो मामी की बातों पर इतना भरोसा करती हैं कि मेरी बात उन्हें हाठी ही लगेगी. और फिर घर के हालात… अगर मां जान भी जाएं तो क्या उस का गांव जाना ठीक होगा. वहां मां अकेली 4-4 जनों का खानाखर्चा कैसे संभालेंगी?’ बेबसी और पीड़ा से उस की आंखें भर आईं.

‘‘रूपल… 2 लिटर दूध ले आना, आज तेरी पसंद की सेवइयां बना दूंगी. तुझे मेरे हाथ की बहुत अच्छी लगती हैं न,’’ बातों में मामी ने उसे भरपूर प्यार परोसा.

खाना खा कर रात को बिस्तर पर लेटी रूपल की आंखों से नींद कोसों दूर थी. मामी ने आज उसे बहुत लाड़ किया था और मांबहनों के सुखद भविष्य का वास्ता दे कर सच्चे भाव से बाबा की हर बात मान कर उन की भक्ति में डूब जाने को कहा था. पर अब वह बाबा की भक्ति में डूब जाने का मतलब अच्छी तरह समझाती थी.

अगले दिन मामी की योजना के तहत रूपल बाबा के खास कमरे में थी. दूसरी सेवादारिनों ने उसे देवी की तरह कपड़े व गहने वगैरह पहना कर दुलहन की तरह सजा दिया था.

पलपल कांपती रूपल को आज अपनी इज्जत लुट जाने का डर था. लेकिन वह किसी भी तरह से हार नहीं मानना चाहती थी. अभी भी वह अपने बचाव की सारी उम्मीदों पर सोच रही थी कि गुरु कमलाप्रसाद ने कमरे में प्रवेश किया. आमजन का भगवान एक शैतान की तरह अट्टहास लगाता रूपल की तरफ बढ़ चला.

‘‘बाबा, मैं पैर पड़ती हूं आप के, मुझ पर दया करो. मुझे जाने दो,’’ उस ने दौड़ कर बाबा के चरण पकड़ लिए.

‘‘देख लड़की, सुहाग सेज पर मुझे किसी तरह का दखल पसंद नहीं. क्या तुझे समर्पण का भाव नहीं समझाया गया?’’

बाबा की आंखों में वासना का ज्वार अपनी हद पर था. उस के मुंह से निकला शराब का भभका रूपल की सांसों में पिघलते सीसे जैसा समाने लगा.

‘‘बाबा, छोड़ दीजिए मुझे, हाथ जोड़ती हूं आप के आगे…’’ रूपल ने अपने शरीर पर रेंग रहे उन हाथों को हटाने की पूरी कोशिश की.

‘‘वैसे तो मैं किसी से जबरदस्ती नहीं करता, पर तेरे रूप ने मुझे सम्मोहित कर दिया है. पहले ही मैं बहुत इंतजार कर चुका हूं, अब और नहीं… चिल्लाने की सारी कोशिशें बेकार हैं. तेरी आवाज यहां से बाहर नहीं जा सकती,’’ कह कर बाबा ने रूपल के मुंह पर हाथ रख उसे बिस्तर पर पटक दिया और एक वहशी दरिंदे की तरह उस पर टूट पड़ा.

तभी अचानक ‘धाड़’ की आवाज से कमरे का दरवाजा खुला. अगले ही पल पुलिस कमरे के अंदर थी. बाबा की पकड़ तनिक ढीली पड़ते ही घबराई रूपल झटक कर अलग खड़ी हो गई.

पुलिस के पीछे ही ‘रूपल…’ जोर से आवाज लगाती उस की मां ने कमरे में प्रवेश किया और डर से कांप रही रूपल को अपनी छाती से चिपटा लिया.

इस तरह अचानक रंगे हाथों पकड़े जाने से हवस के पुजारी गुरु कमलाप्रसाद के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. फिर भी वह पुलिस वालों को अपने रोब का हवाला दे कर धमकाने लगा.

तभी उस की एक पुरानी सेवादारिन ने आगे बढ़ कर उस के गाल पर एक जोरदार तमाचा रसीद किया. पहले वह भी इसी वहशी की हवस का शिकार हुई थी. वह बाबा के खिलाफ पुलिस की गवाह बनने को तैयार हो गई.

बाबा का मुखौटा लगाए उस ढोंगी का परदाफाश हो चुका था. आखिरकार एक नाबालिग लड़की पर रेप और जबरदस्ती करने के जुर्म में बाबा को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया. उस के सभी चेलेचपाटे कानून के शिकंजे में पहले ही कसे जा चुके थे.

मां की छाती से लगी रूपल को अभी भी अपने सुरक्षित बच जाने का यकीन नहीं हो रहा था, ‘‘मां… मामी ने मुझे जबरदस्ती यहां…’’

‘‘मैं सब जान चुकी हूं मेरी बच्ची…’’ मां ने उस के सिर पर स्नेह से हाथ फेरा. ‘‘तू चिंता मत कर, भाभी को भी सजा मिल कर रहेगी. पुलिस उन्हें पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है.

‘‘मैं अपनी बच्ची की इस बदहाली के लिए उन्हें कभी माफ नहीं करूंगी. तू मेरे ही पास रहेगी मेरी बच्ची. तेरी मां गरीब जरूर है, पर लाचार नहीं. मैं तुझ पर कभी कोई आंच नहीं आने दूंगी.

‘‘मेरी मति मारी गई थी कि मैं भाभी की बातों में आ गई और सुनहरे भविष्य के लालच में तुझे अपने से दूर कर दिया.

‘‘भला हो तुम्हारे उस पड़ोसी का, जिस ने तुम्हारे दिए नंबर पर फोन कर के मुझे इस बात की जानकारी दे दी वरना मैं अपनेआप को कभी माफ न कर पाती,’’ शर्मिंदगी में मां अपनेआप को कोसे जा रही थीं.

‘‘मुझे माफ कर दो दीदी. मैं रमा की असलियत से अनजान था. गलती तो मुझ से भी हुई है. मैं ने सबकुछ उस के भरोसे छोड़ दिया, यह कभी जानने की कोशिश नहीं की कि रूपल किस तरह से कैसे हालात में रह रही है,’’ सामने से आ रहे मामा ने अपनी बहन के पैर पकड़ लिए.

बहन ने कोई जवाब न देते हुए भाई पर एक तीखी नजर डाली और बेटी का हाथ पकड़ कर अपने घर की राह पकड़ी.

रूपल मन ही मन उस पड़ोसी का शुक्रिया अदा कर रही थी जिसे सेवइयों के लिए दूध लाते वक्त उस ने मां का फोन नंबर दिया था और उस ने ही समय रहते मां को मामी की कारगुजारी के बारे में बताया था जिस के चलते ही आज वह अंधविश्वास की बलिवेदी पर भेंट चढ़ने से बच गई थी.

मां का हाथ थामे गांव लौटती रूपल अब खुली हवा में एक बार फिर सुकून की सांसें ले रही थी.

बेईमानी का नतीजा : गड्ढे में नारायण

आधी रात का समय था. घना अंधेरा था. चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था. ऐसे में रामा शास्त्री के घर का दरवाजा धीरे से खुला. वे दबे पैर बाहर आए. उन का बेटा कृष्ण भी पीछेपीछे चला आया. उस के हाथ में कुदाली थी.

रामा शास्त्री ने एक बार अंधेरे में चारों ओर देखा. लालटेन की रोशनी जहां तक जा रही थी, वहां तक उन की नजर भी गई थी. उस के आगे कुछ भी नहीं दिख रहा था.

रामा शास्त्री ने थोड़ी देर रुक कर कुछ सुनने की कोशिश की. कुत्तों के भूंकने की आवाज के सिवा कुछ भी नहीं सुनाई दे रहा था.

रामा शास्त्री ने अपने घर से सटे हुए दूसरे घर का दरवाजा खटखटाया और पुकारा, ‘‘नारायण.’’

नारायण इसी इंतजार में था. आवाज सुनते ही वह फौरन बाहर आ गया.

‘‘सबकुछ तैयार है. चलें क्या?’’ रामा शास्त्री बोले.

‘‘हां चलो,’’ कह कर नारायण ने घर में ताला लगा दिया और उन के पीछे हो लिया. उस के हाथ में टोकरी थी. उस की बीवी और बच्चे मायके गए थे.

रामा शास्त्री लालटेन ले कर आगेआगे चलने लगे और कृष्ण व नारायण उन के पीछे चल पड़े.

रामा शास्त्री और उन का छोटा भाई नारायण पहले एक ही घर में रहते थे. छोटे भाई की 2 बेटियां थीं. रामा शास्त्री का बेटा कृष्ण 25 साल का था. उस की शादी अभी नहीं हुई थी. नारायण की बेटियां अभी छोटी थीं.

घर में जेठानी और देवरानी में पटती नहीं थी. उन दोनों में हमेशा किसी न किसी बात को ले कर झगड़ा होता रहता था. अपने मातापिता के जीतेजी नारायण व रामा शास्त्री बंटवारा नहीं करना चाहते थे.

मातापिता की मौत के बाद दोनों भाइयों और उन की बीवियों के बीच मनमुटाव बढ़ गया. अंदर सुलगती आग अब भड़क उठी थी.

नारायण का मिजाज कुछ नरम था पर रामा शास्त्री चालबाज थे. भाई और भाभी की बातों में आ कर नारायण अपनी बीवी को अकसर पीटता रहता था. उस की नासमझ का फायदा उठा कर रामा शास्त्री ने चोरीछिपे कुछ रुपए भी जमा कर रखे थे.

नारायण के साथ जो नाइंसाफी हो रही थी, उसे देख कर गांव के कुछ लोगों को बुरा लगता था. उन्होंने नारायण को बड़े भाई के खिलाफ भड़का दिया.

नतीजतन एक दिन दोनों के बीच जबरदस्त झगड़ा हुआ और घर व जमीनजायदाद का बंटवारा हो गया. मातापिता की मौत के बाद 3 महीने के अंदर ही वे अलग हो गए.

सब बंटवारा तो ठीक से हो गया, मगर बाग को ले कर फिर झगड़ा शुरू हो गया. रामा शास्त्री बाग को अपने लिए रखना चाहते थे. इस के बदले में वे सारी जायदाद छोड़ने के लिए तैयार थे. लेकिन 6 एकड़ के बाग में नारायण अपना हिस्सा छोड़ने को तैयार नहीं था.

बाग में 3 सौ नारियल के पेड़ और सौ से ज्यादा सुपारी के पेड़ थे. उस से सटी हुई 6 एकड़ खाली जमीन भी थी. बाकी जमीन भी बहुत उपजाऊ थी.

बाग से जितनी आमदनी होती थी, उतनी बाकी जमीन में भी होती थी. लेकिन नारायण की जिद की वजह से बाग का भी 2 हिस्सों में बंटवारा हो गया.

रामा शास्त्री ने अपने हिस्से के बाग में जो खाली जगह थी, वहां रहने के लिए मकान बनवाना शुरू कर दिया.

इसी चक्कर में एक दिन शाम को मजदूरों के जाने के बाद कृष्ण नींव के लिए खोदी गई जगह का मुआयना कर रहा था. वह एक जगह पर कुदाली से मिट्टी हटाने लगा, क्योंकि वहां मिट्टी अंदर से खिसक रही थी.

कृष्ण ने 2 फुट गहराई का गड्ढा खोद डाला. नीचे एक बड़ा चौकोर पत्थर था. उस के नीचे एक लोहे का जंग लगा ढक्कन था, मगर वह उसे खोल नहीं सका. उस ने सोचा कि वहां कोई राज छिपा हुआ होगा. वह मिट्टी से गड्ढा भर कर वापस घर लौट गया. उस ने अपने पिता को सबकुछ बताया.

रामा शास्त्री ने बेटे के साथ आ कर अच्छी तरह से गड्ढे की जांच की. देखते ही देखते उन का चेहरा खिल उठा. उन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वे कुछ पलों तक सुधबुध खो कर बैठ गए.

कुछ देर बाद रामा शास्त्री ने इधरउधर देखा और कहा, ‘‘कृष्ण, मिल गया… मिल गया.’’

4-5 पीढ़ियों पहले रामा शास्त्री का कोई पुरखा किसी राजा का खजांची रह चुका था. वह अपने एक साथी के साथ राजा के खजाने का बहुत सा धन चुरा कर भाग गया था. राजा को इस बात का पता चल गया था.

राजा ने सैनिकों को चारों ओर भेजा, लेकिन वे चोर तलाशने में नाकाम रहे. राजा ने चोरों के घर वालों को तमाम तकलीफें दीं, मगर कुछ भी नतीजा नहीं निकला.

इस के बाद सभी पीढ़ी के लोग मरते समय अपने बेटों को यह बात बता कर जाते. लेकिन किसी को भी वह छिपाया गया खजाना नहीं मिला था.

रामा शास्त्री ने तय किया था कि अगर उन्हें खजाना मिल गया तो वे एक मंदिर बनवाएंगे. उन का सपना अब पूरा होने वाला था.

बापबेटा दोनों लोहे का ढक्कन हटाने की कोशिश कर रहे थे कि उसी समय नारायण भी वहां आ गया. उस का आना रामा शास्त्री व कृष्ण दोनों को अच्छा नहीं लगा.

उन की बेचैनी देख कर नारायण को कुछ शक हुआ और इस काम में वह भी शामिल हो गया.

तीनों ने मिल कर उस ढक्कन को हटा दिया. उस के नीचे भी मिट्टी ही थी. लेकिन वहां कुछ खोखला था. लकड़ी के तख्त पर मिट्टी बिछी हुई थी. उन को यकीन हो गया कि अंदर कोई खजाना है.

इतने में दूर से किसी की बातचीत सुनाई पड़ी, इसलिए उन्होंने गड्ढे पर पत्थर रख दिया. फिर रात को दोबारा आ कर खजाना निकालने की योजना बनाई गई.

आधी रात को कुदाली ले कर तीनों चल पड़े. वे गांव के मंदिर के पास वाली पगडंडी से होते हुए बाग की ओर चल पड़े. वे चारों ओर सावधानी से देखते हुए चल रहे थे.

दूर से किसी की आहट सुन कर वे लालटेन बुझ कर पास के इमली के पेड़ की आड़ में छिप गए.

पड़ोस के गांव गए 2 लोग बातें करते हुए वापस आ रहे थे. नजदीक आतेआते उन की बातें साफ सुनाई दे रही थीं.

एक ने कहा, ‘‘इधर कहीं आग की लपट दिखाई दी थी न?’’

दूसरे ने कहा, ‘‘हां, मैं ने भी देखी थी… आग का भूत होगा.’’

पहला आदमी बोला, ‘‘सचमुच भूत ही होगा. उसे परसों रंगप्पा ने यहीं देखा था. इस इमली के पेड़ में मोहिनी भूत है.

‘‘रंगप्पा अकेला आ रहा था. पेड़ के पास कोई औरत सफेद साड़ी पहने खड़ी थी. उसे देख कर रंगप्पा डर कर घर भाग गया था. उस के बाद वह 3 दिनों तक बीमार पड़ा रहा.’’

तभी इमली के पेड़ से सरसराहट की आवाज सुनाई दी.

‘भूत… भूत…’ चिल्ला कर वे दोनों तेजी से भागे.

कुछ देर बाद रामा शास्त्री, नारायण और कृष्ण पेड़ की आड़ से बाहर निकल कर बाग की ओर चल पड़े. बाग के पास पहुंच कर उन्होंने कुछ देर तक आसपास का जायजा लिया. वहां कोई न था. दूर से सियारों की आवाज आ रही थी. फिर तीनों वहां खड़े हो गए, जहां खजाना गड़ा होने की उम्मीद थी.

कृष्ण कुदाली से मिट्टी खोदने लगा, तो नारायण टोकरी में भर कर मिट्टी एक तरफ डालता रहा. रामा शास्त्री आसपास के इलाके पर नजर रखे हुए थे.

लोहे का ढक्कन हटा कर नीचे की मिट्टी निकाल कर एक ओर फेंक दी गई. उस के नीचे मौजूद लकड़ी के तख्त को भी हटा दिया गया, तख्त के नीचे एक गोलाकार मुंह वाला गहरा गड्ढा नजर आया. उस की गहराई करीब 6 फुट थी. लालटेन की रोशनी में अंदर कुछ कड़ाहियां दिखाई पड़ीं.

नारायण गड्ढे के अंदर झांक कर देख रहा था तभी रामा शास्त्री ने कृष्ण को कुछ इशारा किया. अचानक नारायण के सिर पर एक बड़े पत्थर की मार पड़ी. वह बिना आवाज किए वहीं लुढ़क गया.

दोबारा पत्थर की मार से उस का काम तमाम हो गया. उस की लाश को बापबेटे ने घसीट कर एक ओर फेंक दिया.

रामा शास्त्री लालटेन हाथ में ले कर खड़े हो गए. कृष्ण गड्ढे में कूद पड़ा. गड्ढे में जहरीली गैस की बदबू भरी थी. कृष्ण को सांस लेने में मुश्किल हो रही थी. उस ने लालटेन की रोशनी में अंदर चारों ओर देखा.

दीवार से सटी हुई 6 ढकी हुई कड़ाहियां रखी हुई थीं. कृष्ण ने कुदाली से एक कड़ाही के मुंह पर जोर से मारा, तो उस का ढक्कन खुल गया. उस में चांदी के सिक्के भरे थे. दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वे उस सारे खजाने के मालिक थे.

तभी कृष्ण की नजर वहां एक कोने में पड़ी हुई किसी चीज पर पड़ी. वह जोर से चीख उठा. डर से उस का जिस्म कांपने लगा.

रामा शास्त्री ने परेशान हो कर भीतर झांक कर देखा तो वे भी थरथर कांपने लगे. वहां 2 कंकाल पड़े थे. वे शायद खजांची और उस के साथी के रहे होंगे.

रामा शास्त्री ने किसी तरह खुद को संभाला और बेटे को हौसला बंधाते हुए एकएक कर सभी कड़ाहियां ऊपर देने को कहा.

कड़ाहियां भारी होने की वजह से उन्हें उठाना कृष्ण के लिए मुश्किल हो रहा था. जहरीली गैस की वजह से उसे सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी.

कृष्ण ने बहुत कोशिश कर के एक कड़ाही को कमर तक उठाया ही था कि उस का सिर चकरा गया और आंखों के सामने अंधेरा छा गया. वह कड़ाही लिए हुए नीचे गिर गया.

रामा शास्त्री घबरा कर कृष्ण को पुकारने लगे, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. परेशान हो कर वह भी गड्ढे में कूद पड़े.

जहरीली गैस की वजह से उन से भी वहां सांस लेना मुश्किल हो गया. उन्होंने कृष्ण को उठाने की कोशिश की, लेकिन उठा न सके. वह भी बेदम हो कर नीचे गिर पड़े. बाप और बेटे फिर कभी नहीं उठे. वे मर चुके थे.

बोसीदा छत: क्या अजरा अपनी मां को बचा पाई?

जब जीनत इस घर में दुलहन बन कर आई थी, तब यह घर इतना बोसीदा और जर्जर नहीं था. पुराना तो था, लेकिन ठीकठाक था. उस के ससुर का गांव में बड़ा रुतबा था. वे गांव के जमींदार के लठैत हुआ करते थे, जिन से गांव के लोग खौफ खाते थे. सास नहीं थीं. शौहर तल्हा का रंग सांवला था, लेकिन वह मजबूत कदकाठी का नौजवान था, जो जीनत से बेइंतिहा मुहब्बत करता था.

एक दिन खेतों में पानी को ले कर मारपीट हुई, जिस में जीनत के ससुर मार दिए गए. तब से समय ने जो पलटा खाया, तो फिर आज तक मनमुताबिक होने का नाम नही लिया.

फिर समय के साथसाथ घर की छत भी टपकने लगी. अपने जीतेजी तल्हा से 10,000 रुपयए का इंतजाम न हो सका कि वह अपने जर्जर मकान के खस्ताहाल और बोसीदा छत की मरम्मत करा सके.

चौदह साल की अजरा ने तुनकते हुए अपनी अम्मी जीनत से कहा, “अम्मी, आलू की सब्जी और बैगन का भरता खातेखाते अब जी भर गया है. कभी गोश्तअंडे भी पकाया करें.”

इस पर जीनत बोली, “अरे नाशुक्री, अभी पिछले ही हफ्ते लगातार 3 दिनों तक कुरबानी का गोश्त खाती रही और इतनी जल्दी फिर तुम्हारी जबान चटपटाने लगी.”

अजरा ने फिर तुनकते हुए कहा, “मालूम है अम्मी… बकरीद को छोड़ कर साल में एक बार भी खस्सी का गोश्त खाने को नहीं मिलता है. काश, हर महीने बकरीद होती, तो कितना अच्छा होता.”

उस की अम्मी ने कहा, “जो भी चोखाभात मिल रहा है, उस का शुक्र अदा करो. बहुत सारे लोग भूखे पेट सोते हैं. और जो यह छत तुम्हारे सिर के ऊपर मौजूद है, इस का भी शुक्र अदा करो. इस बोसीदा छत की कीमत उन लोगों से पूछो जिन के सिरों पर छप्पर भी नहीं है. इस सेहत और तंदुरुस्ती का भी शुक्र अदा करो… जो लोग बीमारी की जद में हैं, उन से सेहत और तंदुरुस्ती की कीमत पूछो…”

अगले दिन जोरों से बारिश हो रही थी. अजरा ने अम्मी को भीगते हुए आते देखा तो दौड़ कर एक फटी हुई चादर ले आई और उन के गीले जिस्म को पोंछने लगी. जीनत पूरी तरह पानी से भीग चुकी थी. उस के कपड़े जिस्म से चिपक कर उस की बूढ़ी हड्डियों को दिखा रहे थे.

जीनत ने उस फटी चादर को सूंघा फिर अलगनी पर फेंक दिया. फिर भीगे हुए दुपट्टे से पानी निचोड़ा, उसे झटका और फिर अलगनी पर सूखने के लिए फैला दिया.

अजरा कनखियों से देख रही थी कि उस की अम्मी छत के एक कोने को बड़े गौर से देख रही हैं.

जीनत ने खुश होते हुए कहा, “देखो अजरा… इस बार उस कोने से पानी नहीं टपक रहा है. कई दिनों की बारिश के बाद भी वह हिस्सा पहले की तरह ही सूखा हुआ है.”

अजरा ने दूसरे कोने की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “लेकिन अम्मी, उस कोने से तो पानी चू रहा है.”

जीनत उस की बात का जवाब दिए बिना ही कमरे से निकल गई और थोड़ी देर बाद मिट्टी का एक बड़ा सा घड़ा ले कर लौटी और उसे टपक रहे पानी के नीचे रख दिया. फिर पानी बूंदबूंद कर के उस में गिरने लगा और अगलबगल की जमीन गीली होने से बच गई.

सैकड़ों साल पुराना यह मकान आहिस्ताआहिस्ता जर्जर होता जा रहा था. ईंट के चूरे, चूना वगैरह से बनी उस की छत अब अपनी उम्र पूरी कर चुकी थी.

जीनत ने 3 साल पहले छत को बड़े नुकसान से बचाने के लिए उस पर सीमेंटबालू से पलास्तर करा दिया था. मगर फिर भी बारिश का पानी किसी न किसी तरह रिसता हुआ फर्श पर टपकता ही रहता था. अलबत्ता इस बार कमरे का सिर्फ एक कोना टपक रहा था, बाकी हिस्से सहीसलामत थे.

रात में सोते समय जीनत का सारा ध्यान बस 2 बातों पर जाता था कि अजरा की शादी कैसे होगी और इस बोसीदा छत की मरम्मत कैसे होगी. अजरा की शादी से पहले छत की मरम्मत तो हर हाल में हो जानी चाहिए. शादी में लोगबाग आएंगे तो उन का ध्यान छत की तरफ जा सकता है.

रात में अजरा तो घोड़े बेच कर सो जाती, लेकिन जीनत का सारा ध्यान इसी उधेड़बुन में उलझा रहता. पानी चूने वाले जगहों पर पड़े बड़ेबड़े बोसीदा निशान जीनत को चिढ़ाते रहते. आंधीतूफान और बरसात के दिनों में तो उस का हाथ कलेजे पर ही रहता. हालांकि दीवारें तो काफी मोटी थीं, लेकिन छत खस्ताहाल हो चुकी थी.

कभीकभी शौहर तल्हा भी जीनत के खयालों में टहलता हुए आ जाता. मजदूरी कर के लौटते वक्त उस के बदन से उठ रही पसीने की खुशबू की याद से जीनत सिहर उठती. वह यादों में खो कर अजरा के माथे पर हाथ फेरने लगती.

‘अब्बू, जलेबी लाए हैं?’ सवाल करते हुए अजरा अपने अब्बू से लिपट जाती. फिर तल्हा अपने थैले से जलेबी का दोना निकाल कर अजरा को थमा देता और वह खुश हो जाती.

5 साल पहले अजरा के अब्बा तल्हा खेत में कुदाल चलाते हुए गश खा कर ऐसे गिरे कि फिर उठ नहीं सके. तब से जीनत मेहनतमजदूरी कर के अपनी एकलौती बेटी की परवरिश कर रही है और उसे पढ़ालिखा रही है. जीनत की ख्वाहिश है कि अजरा पढ़लिख कर अपने परिवार का नाम रोशन करे.

जीनत हर साल बरसात से पहले छत की मरम्मत कराने की सोचती है, लेकिन कोई न कोई ऐसा खर्च निकल आता है कि छत की मरम्मत का सपना अधूरा रह जाता है. जैसे इसी साल अजरा के फार्म भरने और इम्तिहान देने में 2,000 रुपए खर्च हो गए और छत की मरम्मत का काम आगे सरकाना पड़ा.

बरसात के बाद रमजान का महीना आ गया. अगलबगल के घरों से इफ्तार का सामान मांबेटी की जरूरतों से ज्यादा आने लगा. सेहरी व इफ्तार में लजीज पकवान खा कर अजरा बहुत खुश रहा करती.

अजरा ने कहा, “अम्मी, अगर सालभर रमजान का महीना रहता तो कितना मजा आता…”

अजरा की बात सुन कर जीनत मुसकरा कर रह गई.

इसी बीच अजरा की सहेलियों ने बताया कि हालफिलहाल ‘मस्तानी सूट’ का खूब चलन है. इस ईद पर हम सब वही सिलवाएंगे. फिर क्या था… अजरा ने भी अपनी अम्मी से ‘मस्तानी सूट’ की फरमाइश शुरू कर दी.

जीनत अपनी बेटी अजरा का दिल कभी नहीं तोड़ना चाहती है. अलबत्ता उस की ख्वाहिशों पर लगाम लगाने की भरपूर कोशिश करती है.

जीनत ने अजरा को समझाते हुए कहा, “बेटी, यह ‘मस्तानी सूट’ हम गरीबों के लिए नहीं है. उस की कीमत 1,000 रुपए है. अगर उस में 1,000 रुपए और जोड़ लें तो इस बोसीदा छत की मरम्मत हो जाएगी.”

बहरहाल, रमजान का आधा महीना गुजर गया. इस बीच मजदूरी करकर के जीनत के पास कुछ पैसे जमा हो गए थे. उस ने ईद के बाद इस बोसीदा छत से नजात पाने का इरादा कर लिया था.

जीनत ने अजरा से कहा, “मैं तो सोच रही थी कि ईद के बाद छत की मरम्मत करा ली जाए. अब तुम्हारा ‘मस्तानी सूट’ बीच में आ गया. ईद का खर्च अलग है. अगर कहीं से जकात की मोटी रकम मिल जाए तो सब काम आसानी से हो जाएं…”

गरीबों के अरमान रेत के महलों की तरह सजते हैं और फिर भरभरा कर गिर जाते हैं. जब मेहनतमजदूरी से भी अरमान पूरे नहीं होते तो इमदाद और सहारे की उम्मीद होने लगती है. अमीरों की दौलत से निकाली हुई मामूली रकम जकात के रूप में उन के बहुत काम आती है.

ईद से ठीक 4 दिन पहले स्कूल में अजरा को खबर मिली कि उस की अम्मी खेत में बेहोश हो कर गिर पड़ी हैं. वह बदहवास हो कर मां को देखने दौड़ पड़ी.

लोगों ने जीनत को चारों तरफ से घेर रखा था. लोगों की भीड़ देख कर अजरा और बदहवास हो गई. तबतक गांव के नन्हे कंपाउंडर भी वहां पहुंच चुके थे. उन्होंने नब्ज देखते हुए नाउम्मीदी में सिर हिला दिया.

लोग कहने लगे, ‘बेचारी रोजे की हालत में मरी है, सीधे जन्नत में जाएगी…’

किसी ने अजरा के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “बेचारी के सिर से मां का साया भी उठ गया. आखिर बाप वाला हाल मां का भी हो गया.”

लेकिन अजरा को यकीन नहीं हो रहा था कि उस की अम्मी मर चुकी हैं. वह पागलों की तरह दौड़ते हुए गांव में गई और केदार काका का ठेला खींचते हुए खेत तक ले आई.

अजरा ने रोते हुए लोगों से कहा, “मेहरबानी कर के मेरी अम्मी को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाने में मेरी मदद करें.”

लोगों ने उस की दीवानगी देखी तो जीनत को ठेले पर लादा और अस्पताल के लिए दौड़ पड़े.

अस्पताल पहुंचने में एक घंटा लगा. आधे घंटे तक मुआयना करने के बाद आखिरकार डाक्टरों ने जीनत को मुरदा करार कर दे दिया.

यह सुनते ही अजरा वहीं गिर पड़ी. लोगों ने सोचा कि लड़की रोजे से है. मां की मौत का सदमा और भागदौड़ बरदाश्त नहीं कर सकी है.

डाक्टरों ने उस की नब्ज देखी और हैरत से एकदूसरे का मुंह देखने लगे.

धीरेधीरे गांव के लोग सरकने लगे. अब मांबेटी दोनों की लावारिस लाश का पंचनामा बन रहा था.

कोरा कागज: माता-पिता की सख्ती से घर से भागे राहुल के साथ क्या हुआ?

राहुल औफिस से घर आया तो पत्नी माला की कमेंट्री शुरू हो गई, ‘‘पता है, हमारे पड़ोसी शर्माजी का टिंकू घर से भाग गया.’’

‘‘भाग गया? कहां?’’ राहुल चौंक कर बोला.

‘‘पता नहीं, स्कूल की तो आजकल छुट्टी है. सुबह दोस्त के घर जाने की बात कह कर गया था. तब से घर नहीं आया.’’

‘‘अरे, कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई. पुलिस में रिपोर्ट की या नहीं?’’ राहुल डर से कांप उठा.

‘‘हां, पुलिस में रिपोर्ट तो कर दी पर 13-14 साल का नादान बच्चा न जाने कहां घूम रहा होगा. कहीं गलत हाथों में न पड़ जाए. नाराज हो कर गया है. कल रात उस को बहुत डांट पड़ी थी, पढ़ाई के कारण. उस की मां तो बहुत रो रही हैं. आप चाय पी लो. मैं जाती हूं, उन के पास बैठती हूं. पड़ोस की बात है, चाय पी कर आप भी आ जाना,’’ कह कर माला चली गई.

राहुल जड़वत अपनी जगह पर बैठा का बैठा ही रह गया. उस के बचपन की एक घटना भी कुछ ऐसी ही थी, जरा आप भी पढ़ लीजिए :

वर्षों पहले उस दिन बस से उतर कर राहुल नीचे खड़ा हो गया था. ‘अब कहां जाऊं?’ वह सोचने लगा, ‘पिता की डांट से दुखी हो कर मैं ने घर तो छोड़ दिया. आगरा से दिल्ली भी पहुंच गया, लेकिन अब कहां जाऊं? घर तो किसी हालत में नहीं जाऊंगा.’ उस ने अपना इरादा पक्का किया, ‘पता नहीं क्या समझते हैं मांबाप खुद को. हर समय डांट, हर समय टोकाटाकी, यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, टीवी मत देखो, दोस्तों से फोन पर बात मत करो, हर समय बस पढ़ो.’

उस की जेब में 500 रुपए थे. उन्हें ही ले कर वह घर से चल दिया था. 13 साल के राहुल के लिए 500 रुपए बहुत थे.

दुनिया घर से बाहर कितनी भयानक और जिंदगी कितनी त्रासदीपूर्ण होती है इस का उसे अंदाजा भी नहीं था. नीली जींस और गुलाबी रंग का स्वैटर पहने स्वस्थ, सुंदर बच्चा अपने पहनावे और चालढाल से ही संपन्न घर का लग रहा था.

बस अड्डे पर बहुत भीड़ थी. राहुल एक तरफ खड़ा हो गया. बसों की रेलमपेल, टिकट खिड़की की लाइन, यात्रियों का रेला, चढ़नाउतरना. टैक्सी व आटो वालों का यात्रियों के पीछे पड़ना. यह सब वह खड़ेखड़े देख रहा था.

उस के मन में तूफान सा भरा था. घर तो जाना ही नहीं है. जब वह शाम तक घर नहीं पहुंचेगा तब सब उसे ढूंढ़ेंगे. मां रोएंगी. पिता चिंता करेंगे. बहन उस के दोस्तों के घर फोन मिलाएगी. खूब परेशान होंगे सब. अब हों परेशान. जब पापा हर समय डांटते रहते हैं, मां हर छोटीछोटी बात पर पापा से उस की शिकायत करती रहती हैं तब वह रोता है तो किसी को नहीं दिखता है.

पापा के घर आते ही जैसे घर में कर्फ्यू लग जाता है. न कोई जोर से बोलेगा, न जोर से हंसेगा, न फोन पर बात करेगा, न टीवी देखेगा. उन्हें तो बस बच्चे पढ़ते हुए नजर आने चाहिए. हर समय पढ़ने के नाम से तो उसे नफरत सी हो गई.

छोटीछोटी बातों पर दोनों झगड़ते भी रहते हैं. छोटेमोटे झगड़े से तो इतना फर्क नहीं पड़ता पर जब पापा के दहाड़ने की और मां के रोने की आवाज सुनाई पड़ती है तो वह दीदी के पहलू में छिप जाता है. बदन में कंपकंपी होने लगती है. अब कहीं उस का भी नंबर न आ जाए पिटने का, वैसे भी उस के रिपोर्ट कार्ड से पापा हमेशा ही खफा रहते हैं.

अगले कुछ दिनों तक घर का वातावरण दमघोंटू हो जाता है. मां की आंखें हर वक्त आंसुओं से भरी रहती हैं और पापा तनेतने से रहते हैं. उसे संभल कर रहना पड़ता है. दीदी बड़ी हैं, ऊपर से पढ़ने में अच्छी, इसलिए उन को डांट कम पड़ती है.

वह घर के वातावरण के ठीक होने का इंतजार करता है. घर के वातावरण का ठीक होना पापा के मूड पर निर्भर करता है. बड़ी मुश्किल से पापा का मूड ठीक होता है. जब तक सब चैन की सांस लेते हैं तब तक किसी न किसी बात पर उन का मूड फिर खराब हो जाता है. तंग आ गया है वह घर के दमघोंटू वातावरण से.

इस बार तिमाही परीक्षा के रिजल्ट पर मैडम ने पापा को बुलाया. स्कूल से आ कर पापा ने उसे खूब डांटा, मारा. उस का हृदय दुखी हो गया. पापा के शब्द अभी तक उस के कानों में गूंज रहे थे, ‘तेरे जैसी औलाद से तो बेऔलाद होना अच्छा है.’

उस का हृदय तारतार हो गया था. उसे कोई पसंद नहीं करता. उस की समस्या, उस के नजरिए से कोई देखना नहीं चाहता, समझना ही नहीं चाहता. दीदी कहती हैं कि पढ़ाई अच्छी कर ले, सब ठीक हो जाएगा लेकिन उस का मन पढ़ाई में लगता ही नहीं. पढ़ाई उसे पहाड़ जैसी लगती है. उस ने दीदी से कहा भी था कि मैथ्स, साइंस में उस का मन बिलकुल नहीं लगता, उसे समझ ही नहीं आते दोनों विषय, पर पापा कहते हैं साइंस ही पढ़ो. वैसे भी विषय तो वह 10वीं के बाद ही बदल सकता है. राहुल इसी सोच में डूबा था कि एक टैक्सी वाले ने उसे जोर से डांट दिया.

‘अबे ओ लड़के, मरना है क्या? बीचोंबीच खड़ा है, बेवकूफ की औलाद. एक तरफ हट कर खड़ा हो.’

राहुल अचकचा कर एक तरफ खड़ा हो गया. ऐसे गाली दे कर तो कभी किसी ने उस से बात नहीं की थी.

उस की आंखें अनायास ही छलछला आईं पर उस ने खुद को रोक लिया. उसे इस तरह सोचतेसोचते काफी लंबा समय बीत गया था. शाम ढलने को थी. भूख लग आई थी और ठंड भी बढ़ रही थी. उस के बदन पर सिर्फ एक स्वैटर था. उस ने गले का मफलर और कस कर लपेटा और सामने खड़े ठेलीवाले वाले की तरफ बढ़ गया. सोचा पहले कुछ खा ले फिर आगे की सोचेगा. ठेली पर जा कर उस ने कुछ खानेपीने का सामान लिया और एक तरफ बैठ कर खाने लगा.

तभी एक बदमाश किस्म का लड़का उस के चारों तरफ चक्कर काटने लगा. वह बारबार उस की बगल में आ कर खड़ा हो जाता. आखिर राहुल से न रहा गया. वह बोला, ‘क्या बात है, आप इस तरह मेरे चारों तरफ क्यों घूम रहे हैं?’

‘साला, अकड़ किसे दिखा रहा है? तेरे बाप की सड़क है क्या?’ लड़का अपने पीले दांतों को पीसते हुए बोला.

राहुल उस के बोलने के अंदाज से डर गया.

‘मैं तो सिर्फ पूछ रहा था,’ कह कर वह वहां से हट कर थोड़ा अलग जा कर खड़ा हो गया. लड़का थोड़ी देर बाद फिर उस के पास आ कर खड़ा हो गया.

‘कहां से आया है बे? अकेला है क्या?’ वह आंखें नचाता हुआ राहुल से पूछने लगा. राहुल ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘अबे बोलता क्यों नहीं, कहां से आया है? अकेला है क्या?’

‘आगरा से,’ किसी तरह राहुल बोला.

‘अकेला है क्या?’

राहुल फिर चुप हो गया.

‘अबे लगाऊं एक, साला, बोलता क्यों नहीं?’

‘हां,’ राहुल ने धीरे से कहा.

‘अच्छा, घर से भाग कर आया है,’ उस लड़के के हौसले थोड़े और बुलंद हो गए. तभी वहां उसी की तरह के उस से कुछ बड़े 3 लड़के और आ गए.

‘राजेश, यह कौन है?’ उन लड़कों में से एक बोला.

‘घर से भाग कर आया है. अच्छे घर का लगता है. अपने मतलब का लगता है. उस्ताद खुश हो जाएगा,’ उस ने पूछने वाले के कान में फुसफुसाया.

‘क्यों भागा बे घर से, बाप की डांट खा कर?’ दूसरे लड़के ने राहुल से पूछा.

‘हां,’ राहुल उन चारों को देख कर डर के मारे कांप रहा था.

‘मांबाप साले ऐसे ही होते हैं. बिना बात डांटते रहते हैं. मैं भी घर से भाग गया था, मां के सिर पर थाली मार कर,’ वह उस के गाल सहला कर, उस को पुचकारता हुआ बोला, ‘ठीक किया तू ने, चल, हमारे साथ चल.’

‘मैं तुम लोगों के साथ नहीं जाऊंगा,’ राहुल सहमते हुए बोला.

‘अबे चल न, यहां कहां रहेगा? थोड़ी देर में रात हो जाएगी, तब कहां जाएगा?’ वे उसे जबरदस्ती अपने साथ ले जाना चाह रहे थे.

‘नहीं, मुझे अकेला छोड़ दो. मैं तुम लोगों के साथ नहीं जाऊंगा,’ डर के मारे राहुल की आंखों से आंसू बहने लगे. वह उन से अनुनय करने लगा, ‘प्लीज, मुझे छोड़ दो.’

‘अरे, ऐसे कैसे छोड़ दें. चलता है हमारे साथ या नहीं? सीधेसीधे चल वरना जबरदस्ती ले जाएंगे.’

इस सारे नजारे को थोड़ी दूर पर बैठे एक सज्जन देख रहे थे. उन्हें लग रहा था शायद बच्चा अपनों से बिछड़ गया है.

उन लड़कों की जबरदस्ती से राहुल घबरा गया और रोने लगा. अंधेरा गहराने लगा था. डर के मारे राहुल को घर की याद भी आने लगी थी. घर वालों को मालूम भी नहीं होगा कि वह इस समय कहां है. वे तो उसे आगरा में ढूंढ़ रहे होंगे.

आखिर एक लड़के ने उस का हाथ पकड़ा और जबरदस्ती अपने साथ घसीटने लगा. राहुल उस से हाथ छुड़ाने की कोशिश कर रहा था. दूर बैठे उन सज्जन से अब न रहा गया. उन का नाम सोमेश्वर प्रसाद था, एकाएक वे अपनी जगह से उठ कर उन लड़कों की तरफ बढ़ गए और साधिकार राहुल का हाथ पकड़ कर बोले, ‘अरे, बंटी, तू कहां चला गया था? मैं तुझे कितनी देर से ढूंढ़ रहा हूं. ऐसे कोई जाता है क्या? चल, घर चल जल्दी. बस निकल जाएगी.’

फिर उन लड़कों की तरफ मुखातिब हो कर बोले, ‘क्या कर रहे हो तुम लोग मेरे बेटे के साथ? करूं अभी पुलिस में रिपोर्ट. अकेला बच्चा देखा नहीं कि उस के पीछे पड़ गए.’

सोमेश्वर प्रसाद को एकाएक देख कर लड़के घबरा कर भाग गए. राहुल सोमेश्वर प्रसाद को देख कर चौंक गया. लेकिन परिस्थितियां ऐसी थीं कि उस ने उन के साथ जाने में ही भलाई समझी. उम्रदराज शरीफ लग रहे सज्जन पर उसे भरोसा हो गया.

थोड़ी देर बाद राहुल सोमेश्वर प्रसाद के साथ जयपुर की बस में बैठ कर चल दिया.

सोमेश्वर प्रसाद का स्टील के बरतनों का व्यापार था और वे व्यापार के सिलसिले में ही दिल्ली आए थे. सोमेश्वर प्रसाद ने उस के बारे में जो कुछ पूछा, उस ने सभी बातों का जवाब चुप्पी से ही दिया. हार कर सोमेश्वरजी चुप हो गए और उन्होंने उसे अपने घर ले जाने का निर्णय ले लिया.

घर पहुंचे तो उन की पत्नी उन के साथ एक लड़के को देख कर चौंक गईं. उन्हें अंदर ले जा कर बोलीं, ‘कौन है यह? कहां से ले कर आए हो इसे?’

‘यह लड़का घर से भागा हुआ लगता है. कुछ बदमाश इसे अपने साथ ले जा रहे थे. अच्छे घर का बच्चा लग रहा है. इसलिए इसे अपने साथ ले आया. अभी घबराहट और डर के मारे कुछ बता नहीं रहा है. 2-4 दिन बाद जब इस की घबराहट कुछ कम होगी, तब बातोंबातों में प्यार से सबकुछ पूछ कर इस के घर खबर कर देंगे,’ सोमेश्वर प्रसाद पत्नी से बोले, ‘अभी तो इसे खानावाना खिलाओ, भूखा है और थका भी. कल बात करेंगे.’

सोमेश्वरजी के घर में सब ने उसे प्यार से लिया. धीरेधीरे उस की घबराहट दूर होने लगी. वह उन के परिवार में घुलनेमिलने लगा. रहतेरहते उसे 15 दिन हो गए. राहुल को अब घर की याद सताने लगी. वह अनमना सा रहने लगा. मम्मीपापा की, स्कूल की, संगीसाथियों की याद सताने लगी. महसूस होने लगा कि जिंदगी घर से बाहर इतनी सरल नहीं, ये लोग भी उसे कब तक रखेंगे. किस हैसियत से यहां पर रहेगा? क्या नौकर की हैसियत से? 13-14 साल का लड़का इतना छोटा भी नहीं था कि अपनी स्थिति को नहीं समझता.

और एक दिन उस ने सोमेश्वर प्रसाद को अपने बारे में सबकुछ बता दिया. उस से फोन नंबर ले कर सोमेश्वरजी ने उस के घर फोन किया, जहां बेसब्री से सब उस को ढूंढ़ रहे थे. एकाएक मिली इस खबर पर घर वालों को विश्वास ही नहीं हुआ. जब सोमेश्वरजी ने फोन पर उन की बात राहुल से कराई तो वह फूटफूट कर रो पड़ा.

‘मुझे माफ कर दो पापा, मैं आज से ऐसा कभी नहीं करूंगा, मन लगा कर पढ़ूंगा. मुझे आ कर ले जाओ,’ कहतेकहते उस की हिचकियां बंध गईं. उस की आवाज सुन कर पापा का कंठ भी अवरुद्ध हो गया.

राहुल के घर से भागने के मामले में वे कहीं न कहीं खुद को जिम्मेदार समझ रहे थे. उन की अत्यधिक सख्ती ने उन के बेटे को अपने ही घर में पराया कर दिया था. उसे अपना ही घर बेगाना लगने लगा.

हर बच्चे का स्वभाव अलग होता है. राहुल की बहन उसी माहौल में रह रही थी. लेकिन वह उस घुटन भरे माहौल में नहीं रह पा रहा था. फिर यों भी लड़कों का स्वभाव अधिक आक्रामक होता है.

जब बेटे को खोने का एहसास हुआ तो अपनी गलतियां महसूस होने लगीं. सभी बच्चों का दिमागी स्तर और सोचनेसमझने का तरीका अलग होता है. अपने बच्चों के स्वभाव को समझना चाहिए. किस के लिए कैसे व्यवहार की जरूरत है, यह मातापिता से अधिक कोई नहीं समझ सकता. किशोरावस्था में बच्चे मातापिता को नहीं समझ सकते, इसलिए मातापिता को ही बच्चों को समझने की कोशिश करनी चाहिए.

खैर, उन के बेटे के साथ कोई अनहोनी होने से बच गई. अब वे बच्चों पर ध्यान देंगे. अब थोड़े समय उन के बच्चों को उन के प्यार, मार्गदर्शन व सहयोग की जरूरत है. हिटलर पिता की जगह एक दोस्त पिता कहलाने की जरूरत है, जिन से वे अपनी परेशानियां शेयर कर सकें.

मन ही मन ऐसे कई प्रण कर के राहुल के मम्मीपापा राहुल को लेने पहुंच गए. राहुल मम्मीपापा से मिल कर फूटफूट कर रोया. उसे भी महसूस हो गया कि वास्तविक जिंदगी कोई फिल्मी कहानी नहीं है. अपने मातापिता से ज्यादा अपना और बड़ा हितैषी इस संसार में कोई नहीं. उन्हें ही अपना समझना चाहिए तो सारा संसार अपना लगता है और उन्हें बेगाना समझ कर सारा संसार पराया हो जाता है.

ये 15 दिन राहुल और राहुल के मातापिता के लिए एक पाठशाला की तरह साबित हुए. दोनों ने ही जिंदगी को एक नए नजरिए से देखना सीखा.

राहुल अभी सोच में ही डूबा था कि तभी दुखी सी सूरत लिए माला बदहवास सी आई. वह अतीत से वर्तमान में लौट आया.

‘‘सुनो, जल्दी चलो जरा. बड़ी अनहोनी घट गई, टिंकू की लाश हाईवे पर सड़क किनारे झाडि़यों में पड़ी मिली है, पता नहीं क्या हुआ उस के साथ.’’

‘‘क्या?’’ सुन कर राहुल बुरी तरह से सिहर गया, ‘‘अरे, यह क्या हो गया?’’

‘‘बहुत बुरा हुआ. मातापिता तो बुरी तरह बिलख रहे हैं. संभाले नहीं संभल रहे. इकलौता बेटा था. कैसे संभलेंगे इतने भयंकर दुख से,’’ बोलतेबोलते माला का गला भर आया.

‘‘चलो,’’ राहुल माला के साथ तुरंत चल दिया. चलते समय राहुल सोच रहा था कि टिंकू उस के जैसा भाग्यशाली नहीं निकला. उसे कोई सोमेश्वर प्रसाद नहीं मिला. हजारों टिंकुओं में से शायद ही किसी एक को कोई सोमेश्वर प्रसाद जैसा सज्जन व्यक्ति मिलता है.

बच्चे सोचते हैं कि शायद घर से बाहर जिंदगी फिल्मी स्टाइल की होगी. घर से भाग कर वे जानेअनजाने मातापिता को दुख पहुंचाना चाहते हैं. उन पर अपना आक्रोश जाहिर करना चाहते हैं. पर मातापिता की छत्रछाया से बाहर जिंदगी 3 घंटे की फिल्म नहीं होती, बल्कि बहुत भयानक होती है. बच्चों को इस बात का अनुभव नहीं होता. उन्हें समझने और संभालने के लिए मातापिता को कुछ साल बहुत सहनशक्ति से काम लेना चाहिए. बच्चों का हृदय कोरे कागज जैसा होता है, जिस पर जिस तरह की इबारत लिख गई, जिंदगी की धारा उधर ही मुड़ गई, वही उन का जीवन व भविष्य बन जाता है.

उस दिन अगर उसे सोमेश्वर प्रसाद नहीं मिलते तो पता नहीं उस का भी क्या हश्र होता. सोचते सोचते राहुल माला के साथ तेजी से कदम बढ़ाने लगा.

बदनाम गली : राजू क्यों गया था वेश्या के पास

‘‘हर माल 10 रुपए… हर माल की कीमत 10 रुपए… ले लो… ले लो… बिंदी, काजल, पाउडर, नेल पौलिश, लिपस्टिक…’ जोर से आवाज लगाते हुए राजू अपने ठेले को धकेल कर एक गली में घुमा दिया और आगे बढ़ने लगा. वह एक बदनाम गली थी.

कई लड़कियां व औरतें खिड़की, दरवाजों और बालकनी में सजसंवर कर खड़ी थीं. कुछ लड़कियां खिलखिलाते हुए राजू के पास आईं और ठेले में रखे सामान को उलटपुलट कर देखने लगीं.

‘वह वाली बिंदी निकालो… यह कौन से रंग की लिपस्टिक है… बड़ी डब्बी वाला पाउडर नहीं है क्या…’ एकसाथ कई सवाल होने लगे.

राजू जल्दीजल्दी उन सब की फरमाइशों के मुताबिक सामान दिखाने लगा.

जब राजू कोई सामान निकाल कर उन्हें देता तो वे सब उसे आंख मार देतीं और कहतीं, ‘पैसा भी चाहिए क्या?’

‘‘बिना पैसे के कोई सामान नहीं मिलता,’’ राजू जवाब देता.

‘‘तू पैसा ही ले लेना. और कुछ चाहिए तो वह भी तुझे दे दूंगी,’’ तभी किसी लड़की ने ऐसा कहा तो बाकी सब लड़कियां भी खिलखिला कर हंस पड़ीं.

राजू ने उन लड़कियों के ग्रुप के पीछे थोड़ी दूरी पर एक दरवाजे पर खड़ी एक लड़की को देखा.

घनी काली जुल्फें, दमकता हुआ गोरा रंग, पतली आकर्षक देह. राजू को लगा कि उस ने कहीं इस लड़की को देखा है.

राजू सामान बेचता रहा, पर लगातार उस लड़की के बारे में सोचता रहा. वह बारबार उसे अच्छी तरह देखने की कोशिश करता रहा, लेकिन सामान खरीदने वाली लड़कियों के सामने रहने की वजह से अच्छी तरह देख नहीं पा रहा था.

तभी राजू ने देखा कि एक बड़ीबड़ी मूंछों वाला अधेड़ आदमी आया और उस लड़की को ले कर मकान के अंदर चला गया. शायद वह आदमी ग्राहक था.

थोड़ी देर बाद राजू सामान बेच कर आगे बढ़ गया, लेकिन वह लड़की उस के ध्यान से हट ही नहीं रही थी.

धीरेधीरे शाम होने को आई. जब वह घर के करीब एक दुकान के पास से गुजरा तो उस ने देखा कि दुकान पर रामू चाचा के बजाय उन की 10 साला बेटी काजल बैठी थी और ग्राहकों को सामान दे रही थी. यह देख उसे कुछ याद आया.

आधी रात हो गई थी. राजू अब फिर उस बदनाम गली में था. उस की आंखें उसी लड़की को ढूंढ़ रही थीं. वहां कई लड़कियां सजसंवर कर ग्राहकों के आने का इंतजार कर रही थीं. राजू को देख कर वे उस से नैनमटक्का करने लगीं.

‘‘क्या रे, तू फिर आ गया… रात को भी सामान बेचेगा क्या?’’ एक लड़की मुसकरा कर बोली.

‘‘नहीं, अब मैं ग्राहक बन कर आया हूं,’’ राजू ने कहा.

‘‘अच्छा तो यह बात है. फिर बता, तुझे कौन सी वाली पसंद है?’’ एक लड़की ने पूछा.

राजू ने जवाब दिया, ‘‘मुझे तो सब पसंद हैं, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या…? चल मेरे साथ. मुझे सब रंगीली बुलाते हैं,’’ एक लड़की ने आगे आ कर राजू का हाथ पकड़ लिया.

‘‘आज रहने दे रंगीली. मु झे तो वह पसंद है…’’ राजू ने अपना हाथ छुड़ाते हुए दिन में जिस लड़की को देखा था, उस के बारे में पूछा.

‘‘बहुत पूछ रहा है उसे. नई है न…’’ रंगीली बोली, ‘‘एक आशिक उसे ले कर कमरे में गया है. वह उस का रोज का ग्राहक है. खूब पसंद करता है उसे. तु झे चाहिए तो थोड़ी देर ठहर. वह उसे निबटा कर आ जाएगी यहीं.’’

राजू बेचैनी से उस लड़की के बाहर आने का इंतजार करने लगा.

तकरीबन आधा घंटे बाद एक ग्राहक कमरे से बाहर निकल कर एक तरफ चला गया.

कुछ देर बाद उस कमरे से एक लड़की बाहर आई और दरवाजे पर खड़ी हो गई.

राजू ने उसे देखा तो पहचान गया. वह वही लड़की थी, जिस की तलाश में वह आया था.

‘‘जा मस्ती कर. तेरी महबूबा आ गई,’’ रंगीली ने कहा.

राजू उस लड़की के पास जा कर बोला, ‘‘जब से तुम्हें देखा है, तब से मैं तुम्हारा दीवाना हो गया हूं इसीलिए अभी आया हूं.’’

‘‘तो चलो,’’ वह लड़की राजू का हाथ पकड़ कर कमरे में ले जाने लगी.

‘पुलिस… पुलिस… भागो… भागो…’ तभी जोरदार शोर हुआ और चारों तरफ भगदड़ मच गई. सभी लड़कियां, ग्राहक और दलाल इधरउधर भाग कर छिपने की कोशिश करने लगे.

थोड़ी देर में ही पुलिस ने कोठेवाली, दलाल और कई ग्राहकों को गिरफ्तार कर लिया और थाने ले गई. कई लड़कियों को पुलिस ने आजाद करा कर नारी निकेतन भेज दिया.

राजू को भी पुलिस ने उस लड़की के साथ गिरफ्तार कर लिया था, पर उस लड़की को नारी निकेतन नहीं भेजा गया. वह डर से थरथर कांप रही थी.

‘‘डरो नहीं खुशबू, अब तुम आजाद हो,’’ थाने पहुंच कर राजू ने उस लड़की से कहा.

‘‘तुम मेरा नाम कैसे जानते हो?’’ उस लड़की ने चौंक कर पूछा.

‘‘खुशबू, मेरी बेटी. कहांथी तू अब तक,’’ राजू के कुछ कहने से पहले वहां एक अधेड़ औरत आई और उस लड़की को अपने गले से लगा कर फफकफफक कर रोने लगी.

‘‘मां, मुझे बचा लो. मैं उस नरक में अब नहीं जाऊंगी,’’ खुशबू भी उस औरत से लिपट कर रोने लगी और अपनी आपबीती सुनाने लगी कि कैसे 6 महीने पहले कुछ गुंडों ने उस की दुकान के आगे से रात 9 बजे उठा लिया था और कुछ दिन उस की इज्जत से खेलने के बाद चकलाघर में बेच दिया था.

‘‘अब आप के साथ कुछ गलत नहीं होगा. सारे बदमाशों को गिरफ्तार कर मैं ने जेल भेज दिया है…’’ तभी थानेदार ने कहा, ‘‘बस आप लोगों को कोर्ट आना होगा मुकदमे की कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए.’’

‘‘मैं कोर्ट जाऊंगी. उन सभी बदमाशों को सजा दिलवा कर रहूंगी जिन्होंने मेरी बेटी की जिंदगी खराब की है…’’ वह औरत आंसू पोंछते हुए बोली.

‘‘अब मेरी बेटी से कौन ब्याह करेगा?’’ खुशबू की मां ने कहा.

‘‘अब आप लोग घर जा सकते हैं. जाने से पहले इन कागजात पर दस्तखत कर दें,’’ थानेदार ने कहा तो खुशबू, उस की मां और राजू ने दस्तखत कर दिए.

‘‘पर, आप लोगों को मेरे बारे में कैसे पता चला?’’ थाने से बाहर निकल कर खुशबू ने पूछा.

‘‘यह सब राजू के चलते मुमकिन हुआ. इसी ने मुझे बताया कि तुम्हें एक कोठे पर देखा है…

‘‘फिर मैं राजू के साथ पुलिस स्टेशन गई. जहां तुझे छुड़ाने की योजना बनी,’’  खुशबू की मां बोली.

‘‘राजू मुझे कैसे जानता है?’’ खुशबू ने हैरानी से पूछा.

‘‘तुम्हारी मां की परचून की दुकान पर मैं अकसर सौदा लेने जाता था वहीं तुम्हें देखा था. तब से ही मैं तुम्हें पहचानता था. जब तुम गायब हो गईं तो तुम्हारी मां दुकान पर हमेशा रोती रहती थीं. कहती थीं कि तुम्हारे बाबा जिंदा होते तो तुम्हें ढूंढ़ लाते. लेकिन वह अकेली कहां ढूंढ़ती फिरेंगी.

‘‘आज जब मैं अपना ठेला ले कर सामान बेचने गया तो कोठे पर तुम्हें देख कर तुम्हारी मां को सब बता दिया,’’ राजू बोल पड़ा.

‘‘आप का यह एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी,’’ खुशबू ने रुंधे गले से शुक्रिया अदा करते हुए कहा.

तभी राजू  झिझकते हुए खुशबू की मां से बोला, ‘‘आप एक एहसान मुझ पर भी कर दीजिए.’’

‘‘कहो बेटा, मैं क्या कर सकती हूं तुम्हारे लिए?’’ खुशबू की मां ने पूछा.

‘‘मुझे खुशबू का हाथ दे दीजिए,’’ राजू अटकअटक कर बोला.

राजू की मांग सुन कर दोनों मांबेटी की आंखों में आंसू आ गए. खुशबू ने आगे बढ़ कर राजू के पैर छू लिए.

‘‘तेरे जैसा बेटा पा कर मैं धन्य हो गई. पर यह तो बता कि तुझे जातपांत का वहम तो नहीं.’’

‘‘नहीं जी, हम गरीबों की क्या जाति. हमें तो दूसरों के लिए हड्डी तोड़नी ही है. फिर यह जाति का दंभ क्यों पालें. खुशबू जो भी हो, मुझे पसंद है,’’ राजू तमक कर बोला.

नई सुबह के इंतजार में उन तीनों के कदम घर की ओर तेजी से बढ़ने लगे.

अच्छा अफसर: ढलती उम्र में क्यों बदल गए नारायणदास

‘‘सर, पिताजी को शहर जा कर हार्ट स्पैशलिस्ट को दिखाना है,’’ एक मुलाजिम ने अपने बड़े अफसर नारायणदास को अर्जी दे कर कहा.

‘‘ठीक है जाओ,’’ अर्जी पर मंजूरी देते हुए नारायणदास ने कहा.

‘‘थैंक्स सर,’’ उस मुलाजिम ने दिल से शुक्रिया अदा करते हुए कहा.

‘‘सर, मेरी यह भविष्य निधि से पैसा निकालने की अर्जी है. बेटी का पहला बच्चा हुआ है,’’ चपरासी रामावतार ने नारायणदास से कहा.

‘‘कितने पैसे चाहिए?’’ नारायणदास ने रामावतार के भविष्य निधि अकाउंट में बैलेंस देखते हुए पूछा.

‘‘10,000 रुपए.’’

‘‘ठीक है, मैं पैसे वापस भरने की शर्त पर मंजूर करता हूं. मैं कैशियर से कह देता हूं, तुम्हें अगले हफ्ते पैसे मिल जाएंगे. हां, बेटी का प्रसूति प्रमाणपत्र दफ्तर में जमा करा देना,’’ नारायणदास ने अर्जी पर दस्तखत करते हुए कहा.

जिला कक्षा के अफसर नारायणदास के पास कोई भी मुलाजिम अपना काम ले कर आता तो वे कर देते या फिर भरोसा देते कि वे कोशिश करेंगे. सारे मुलाजिम उन के काम और बरताव से बहुत ही खुश थे और उन्हें गर्व होता था कि उन के ऐसे अफसर हैं. इस वजह से वे उन्हें दिल से मान देते थे.

पर इन्हीं नारायणदास को किसी ने एक साल पहले देखा होता तो किसी को भी यकीन नहीं होता कि कोई इनसान इस उम्र में भी इतना बदल सकता है.

नारायणदास के इस बदलाव की वजह सिर्फ 2 ही लोग जानते हैं. एक खुद नारायणदास और दूसरे उन के रिटायर्ड दोस्त मोहन राणा.

तकरीबन एक साल पहले की बात है. रिटायर्ड अफसर मोहन राणा अपने बेटे की शादी का कार्ड देने नारायणदास के औफिस आए थे.

मोहन राणा नारायणदास के कालेज के समय के दोस्त थे और उन के ही गांव से थे. हालांकि वे उम्र में नारायणदास से 2 साल बड़े थे, पर उन की दोस्ती अब तक बरकरार रही.

‘‘सर, 3 दिन की छुट्टी चाहिए. मां बीमार हैं,’’ तकरीबन गिड़गिड़ाने की आवाज में नारायणदास के मुलाजिम ने अर्जी देते हुए कहा था.

‘‘अभी पिछले महीने ही तो गए थे. वैसे, यह बहाना कब तक चलेगा?’’ फाइल में ही नजरें गड़ाते हुए नारायणदास ने पूछा था.

‘‘सर, यह बहाना नहीं हकीकत है. मैं ने मां की बीमारी का मैडिकल सर्टिफिकेट भी दिखाया था. उन्हें पिछले 2 साल से हार्ट की बीमारी है. मैं उन का एकलौता बेटा हूं, इसलिए सारी जवाबदारी मेरी ही बनती है,’’ उस मुलाजिम ने बेबसी से कहा था.

‘‘तो यहां के काम का कौन ध्यान रखेगा? पता है न कि क्वार्टर ऐंडिंग है. और कितनी सारी रिपोर्ट बिना देरी किए हैडक्वार्टर भेजनी होती हैं. इस तरह बारबार छुट्टी लोगे तो तुम्हारी सालाना गुप्त रिपोर्ट में नोटिंग होगी. और तुम्हारी प्रमोशन बाकी ही है,’’ नारायणदास ने उसे सालाना गुप्त रिपोर्ट बिगड़ने की धमकी दी.

वह मुलाजिम मन मसोस कर रह गया. मां की बीमारी के दर्द की बेचैनी उस के चेहरे पर पढ़ी जा सकती थी.

मोहन राणा अपने दोस्त नारायणदास को जानते थे कि उन का अपने नीचे काम करने वाले मुलाजिमों के साथ रिश्ता गुलाम और राजा जैसा था. इस बात को नारायणदास दोस्तों और रिश्तेदारों में गर्व से कहते भी थे.

औफिस का समय पूरा हो चुका था. नारायणदास अपने दोस्त मोहन राणा को इज्जत के साथ सरकारी गाड़ी में सरकारी बंगले में ले कर आए.

‘‘राणा, रिटायरमैंट जिंदगी कैसी चल रही है? बड़े ठसके और आराम से चल रही होगी?’’ नारायणदास ने जैसे जलन के भाव से पूछा.

‘‘सच बताऊं नारायण, बहुत ही बुरी तरह से कट रही है. हम रिटायरमैंट का बेसब्री से इंतजार करते हैं. जैसे हम सोचते हैं कि रिटायरमैंट के बाद कोई जवाबदारी नहीं, कोई भागमभाग नहीं. बस सब से मिलो, पुरानी बातें याद करो और मस्ती से जिंदगी का मजा लो. पर मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं है,’’ मोहन राणा ने बेहद हताशा, दुख और अफसोसजनक शब्दों से कहा.

‘‘क्या मतलब राणा?’’ नारायणदास ने हैरानी से पूछा. वे तो यही सोच रहे थे कि पैंशन के साथ आराम, कोई जवाबदारी नहीं. जिंदगी में कोई किचकिच नहीं. मैं खुद भी अपनी रिटायरमैंट का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं.’’

‘‘मेरे ही काम मुझ पर भारी पड़ गए. अपने हकों का हद से ज्यादा भोगना और अपनेआप को बहुत बड़ा समझना ही, आज मुझे बहुत छोटा कर रहा है,’’ मोहन राणा ने कचौड़ी का टुकड़ा हाथ में लेते हुए कहा.

‘‘मैं समझा नहीं…’’ नारायणदास ने उन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.

‘‘नारायण, मैं भी तुम्हारी तरह कड़क और अपने हकों को पूरा भोगने वाला अफसर था. अपने नीचे काम करने वाले किसी भी मुलाजिम की छोटी सी गलती निकालने के लिए बेसब्र रहता था. गलतियां निकाल कर और बाद में सब के सामने उसे बेइज्जत करना मेरा एक तरह से शौक या यों कहो कि जुनून हो गया था.

‘‘वे हमारे नीचे काम करने वाले मुलाजिम थे. उन की छुट्टियां, उन की सालाना गुप्त रिपोर्ट, जिस की वजह से उन की प्रमोशन होती है, हमारे हाथ में था. मतलब कि हमारा एक गलत शब्द भी उन के भविष्य के लिए काला धब्बा बन सकता है. ये सब बातें वे लोग समझते हैं, इसलिए हमारे घटिया बरताव को कड़वा घूंट पी कर चुपचाप सहन कर जाते हैं.

‘‘उन की छुट्टियां, जो सरकार ने दी हुई थीं, जो उन का हक था, उन्हें मैं किसी न किसी वजह से रद्द कर देता था.

‘‘उन की ही पगार से काटी गई भविष्य निधि की रकम उन्हीं को देने से मना कर देता था, जैसे कि वह मेरा पैसा हो और मैं दान देने से मना कर रहा हूं.’’

नारायणदास मन ही मन सोच रहे थे कि वे भी तो पूरी जिंदगी यही करते रहे हैं.

मोहन राणा ने आगे कहा, ‘‘इस वजह से मेरे किसी भी मुलाजिम के साथ अच्छे संबंध नहीं रहे. पर हैरानी तो यह कि मुझे इस बात का गर्व होता था.

‘‘इतना ही नहीं, पूरे दिन औफिस की साहबी घर जा कर भी नहीं मिटती थी. वहां भी मैं जिला अफसर ही था. घर पर सरकारी चपरासी और दूसरे नौकरों के साथसाथ मेरी साहबी अपने घर वालों पर भी निकलती थी.

‘‘बच्चे रविवार की छुट्टी से डरते थे, क्योंकि मैं उस दिन पूरा समय घर पर ही रहता था. मेरी टोकाटोकी और रोब के चलते वे ऐक्स्ट्रा क्लास या ट्यूशन के नाम से घर के बाहर रहना पसंद करते थे. पत्नी के बनाए खाने में मीनमेख निकालना तो जैसे मेरा रोज का नियम हो गया था.

‘‘मैं अपने बड़े पद के घमंड के चलते दोस्तों व रिश्तेदारों के यहां जाना जैसे अपनी बेइज्जती समझता था, जबकि बड़ा अफसर होने के चलते वे मुझे गर्व से बुलाते थे और अपने पहचान वालों से मिलवाते थे.

‘‘वह तो ठीक है राणा, पर इन सब बातों का हमारी रिटायरमैंट से क्या लेनादेना?’’ नारायणदास को समझ में नहीं आया कि उन का दोस्त क्यों अपनी पर्सनल बातें उन्हें बता रहा है.

‘‘क्योंकि, इन्हीं बातों के चलते मेरी जिंदगी नरक जैसी हो गई है.’’

‘‘मतलब…?’’ नारायणदास चौंके.

‘‘रिटायरमैंट के कुछ समय बाद मैं अपनी पैंशन के सिलसिले में अपने पुराने औफिस गया था, जहां मेरा कभी एकछत्र राज चलता था. जहां मेरी इजाजत के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता था. वहां गेट पर खड़े चौकीदार न सिर्फ सावधान हो जाते थे, बल्कि जोर से मुझे सैल्यूट भी मारते थे.

‘‘पर, उस दिन उस चौकीदार ने सलामी तो क्या दी, बल्कि वह अपनी कुरसी से उठा तक नहीं. औफिस के अंदर चपरासी और दूसरे मुलाजिमों ने मुझे देख कर भी अनदेखा कर दिया. यह देख कर मैं खुद को बेइज्जत और दुखी महसूस कर रहा था.

‘‘मैं अपना काम पूरा कर के निकल ही रहा था कि गैलरी की खिड़की से किसी की धीरे से आवाज आ रही थी. अपना नाम सुन कर मैं ठिठक गया.

‘‘कोई बोल रहा था, ‘राणा आया है. बहुत परेशान किया था इस ने पूरे 3 साल तक…’

‘‘यह शायद कार्तिक की आवाज थी, जो अकाउंट क्लर्क था. उस के बेटे को पढ़ने के लिए बाहर जाना था, पर मैं ने अड़ंगा लगा दिया था.

‘‘इतने में कोई और बोला, ‘यह तो कुछ भी नहीं है मेरी तकलीफ के सामने. मेरे पिताजी अंतिम समय में थे. इस राणा से खूब गुजारिश की, पर इस ने ‘मंत्रीजी आ रहे हैं’ के नाम पर छुट्टी नहीं दी, तो नहीं ही दी. मैं पिता के अंतिम दर्शन पर ही पहुंच सका था…’

‘‘फिर किसी तीसरे ने कहा, ‘मेरी खुद की भविष्य निधि के पैसे से घर की जरूरी मरम्मत करनी थी, क्योंकि बारिश सिर पर खड़ी थी, पर इस राणा के बच्चे ने आधी रकम ही मंजूर की और मुझे पहली बार किसी से पैसे उधार लेने पड़े थे…’

‘‘फिर किसी की इस बात ने मुझे चौंका दिया, ‘और एक तरफ हमारे नए साहब हैं, जो हमारी समस्या सुन कर उसे हल करते हैं… और नहीं तो कम से कम कोशिश तो करते हैं कि हमारी समस्या को हल कर सकें. मैं ने तो सर को कह दिया कि कभी रविवार या छुट्टी के दिन भी जरूरत पड़े तो हमें बुला लिया करें…’

‘‘उन तकरीबन सभी के पास मेरे दिए कुछ जख्म थे और नए अफसर के लिए अपनापन था. मैं ज्यादा न सुन सका, क्योंकि मैं इतने में ही समझ गया था कि मैं ने अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल किया था.’’

‘‘यही हालत मेरे घर, दोस्तों और समाज में हो गई है. अब मेरा बेटा खुद कमाने लगा है. वह मुझे खुल कर जवाब देता है. अब कोई रिश्तेदार मुझे अपने यहां नहीं बुलाता है. मैं ने हर जगह अपनी इज्जत खो दी है,’’ नारायणदास ने कहा.

‘‘नारायण, मैं तुम्हें यह सब इसलिए कह रहा हूं कि मैं ने आज तुम्हारे औफिस में वही सब देखा, जो मैं करता था. मैं उस वक्त वापस जा कर खुद को अच्छा अफसर साबित नहीं कर सकता, पर तुम्हारे पास अभी भी 2 साल से ज्यादा का समय है,’’ कहते हुए मोहन राणा चाय पीने लगे.

नारायणदास ने अपने दोस्त मोहन राणा के जाने के बाद बहुत सोचा और पाया कि उन की कहानी भी उन के दोस्त मोहन राणा से अलग नहीं है. वे अपनी रिटायर्ड जिंदगी बरबाद नहीं करना चाहते थे. अगले दिन ही वे मीठा बोलने वाले और अच्छा अफसर बनने में लग गए थे.

फरिश्ता: क्या जीशान ने मोना को धोखा दिया ?

“आप को पता है, जीशान सर ने शादी कर ली है…”

“क्या? कैसे? कब? लेकिन वे ऐसा कैसे कर सकते हैं?”

जिस ने भी सुना वह इन्हीं सारे सवालों की गोलियां दनादन दागने लगा. किसी की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था. हर कोई, हर किसी से यह सवाल पूछता, मगर जवाब में हर कोई हैरानी जाहिर करता…

लेकिन मोना, वह ‘काटो तो खून नहीं’ वाली हालत में थी. हर एक की तरफ यों आंखें गड़ाए देख रही थी मानो वह आंखोें के रास्ते उस के दिल और दिमाग में उतर जाना चाह रही हो. उसे सच का पता लगाना था कि आखिर जीशान ने क्या वाकई शादी कर ली है? लेकिन नहीं, वे ऐसा कर ही नहीं सकते. वे ऐसा कर कैसे सकते हैं?

मोना के सामने सब से बड़ा सवाल था कि वह ‘किस से’ सवाल करे और ऐसा वहां कौन था जो मोना के सवालों भरी आंखों में देख सकने की हिम्मत रखता हो.

बात तब की है जब मोना हमारे दफ्तर में पहली बार नौकरी के लिए आई थी. सुडौल और कसा हुआ बदन, बड़ीबड़ी आंखें, गोल लुभावना चेहरा और रंग एकदम साफ, बल्कि यों लगता था जैसे वह गुलाबी रंग का गुलाब है जिसे छू लिया जाए तो वह सकुचा कर खून जैसा लाल हो जाए.

उम्र में छोटी होने के चलते मोना मुझे ‘दीदी’ कह कर पुकारती थी, जो मुझे पसंद भी था. नहीं तो हर कोई ‘मैडममैडम’ कह कर ही बुलाता था. ‘दीदी’ का संबोधन मुझे बहुत अच्छा लगता है, सो मैं ने भी खुशीखुशी उस अनजान सी लड़की को अपनी ‘छोटी बहन’ समझ लिया था.

धीरेधीरे मोना मेरे काफी करीब आ गई. अपने घरपरिवार के बारे में छोटीछोटी बातें भी बेहिचक मुझ से कहने लगी.

एक दिन अपनी जिंदगी की सब से बड़ी घटना बताते हुए मोना कहने लगी, “उन दिनों मैं 15 साल की थी. मैं जिस स्कूल में पढ़ती थी, उसी स्कूल में रमेश भी था. बहुत ज्यादा हैंडसम. पैसे वाला, मांबाप का एकलौता और अमीर बाप की बिगड़ी औलाद, पर मुझे वह अच्छा लगता था.

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“धीरेधीरे पता नहीं चला कि कब वह मेरे दिलोदिमाग पर छा गया. अगर वह एक दिन भी स्कूल नहीं आता तो मैं बेचैन होने लगती और दूसरे दिन पागलों की तरह समय से पहले स्कूल पहुंच कर उस का इंतजार करने लगती.

“मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा था मुझे नहीं मालूम. दिनरात उसी के खयालों में रहने लगी. हर एक धड़कन जैसे उसी का नाम ले कर धड़कती. हर आतीजाती सांस मानो उसी की तलबगार थी.

“रफ्तारफ्ता मेरी इस हालत की खबर पूरे स्कूल में फैल गई. अब रमेश भी मुझे चाहने लगा था. हमारी चाहत इतनी बढ़ी कि हम दोनों ने घर से भागने का फैसला कर लिया.

“किशोर उम्र का प्यार कितना हिम्मती और ताकतवर होता है, इस का अंदाजा कोई नहीं लगा सकता, खुद मुझे भी नहीं था. कुछ ही दिनों के किसी लड़के के प्यार की खातिर मैं ने अपने मांबाप तक के प्यार को भी ठुकरा दिया था.

“घर से तो निकल गए मगर जाते कहां? यों तो लगता था कि दुनिया बहुत बड़ी है, लेकिन घर से बाहर निकलो तो दुनिया बहुत छोटी मालूम पड़ती है. किधर जाएं? कहां ठहरें?

“इसी भटकाव में कुछ महीने गुजर गए. फिर हमारे पैसे खत्म हो गए. घर से लाए गए गहने भी बिक गए. खाने तक के लाले पड़ गए, मगर हमारा भटकना खत्म नहीं हुआ. कभी मेरे मातापिता और भाई का डर, कभी रमेश के मातापिता का डर… इन सब बातों के अलावा पुलिस का खौफ हमें कहीं भी चैन से रहने नहीं दे रहा था.

“बात यहीं तक रहती तो जिंदगी की दास्तान कुछ और होती, पर ऐसा नहीं हुआ. जिंदगी के इस भटकाव ने रमेश को कमजोर कर दिया. वह अपने पुराने रूप में आ गया. नशे की हालत में अपनी बेतरतीब जिंदगी की वजह मुझे बताने लगा. मेरे पैरों तले की जमीन सरक गई. मैं ने उसे प्यार से समझाने की कोशिश की, पर वह मानने को तैयार नहीं था. उसे अपने पिता की दौलत याद आने लगी.

“एक दिन की बात है. वह मेरी बरबादी और तबाही का दिन था. रमेश घर लौटा तो वह अकेला नहीं था, साथ में थे उस के पिता. मैं कुछ समझ पाती इस से पहले रमेश के पिता ने कहा, ‘मैं अपने बेटे को ले जा रहा हूं.’

‘‘मैं तड़प उठी और कहा, ‘यह क्या कह रहे हैं आप?’

“वे बोले, ‘जो तुम ने सुना वही कह रहा हूं.’

“मैं ने रमेश की तरफ देख कर कहा, ‘ये आप के साथ नहीं जाएंगे.’

“पर रमेश ने दो टूक कह दिया, ‘तुम अपना देख लो, मैं अपने डैडी के साथ जा रहा हूं.’

“मैं कुछ समझ ही नहीं पाई कि यह सब क्या हो रहा है. मैं ने रमेश को झकझोरते हुआ कहा, ‘तुम मुझे छोड़ कर जा रहे हो? ऐसे कैसे जा सकते हो मुझे और मेरे पेट में पल रहे इस बच्चे को छोड़ कर?’

“रमेश कुछ कहता, इस से पहले उस के पिता ने कहा, ‘समाज की नजरों में शादी ही नहीं हुई तो बच्चा कैसा? और फिर तुम जैसी लड़कियों के लिए मैं अपने बेटे की जिंदगी बरबाद नहीं कर सकता.’

“मैं अवाक रह गई. रमेश के पिता की बातें मेरे कानों में गरम लावे की तरह बह रही थीं. मेरे होश उड़ गए थे.

“मैं कुछ कहती, इस से पहले रमेश दरवाजे के बाहर निकल चुका था. मेरी दुनिया लुट रही थी और मैं खड़ेखड़े देख रही थी. फिर पता नहीं कैसे मैं एकाएक दहाड़ें मारते हुए रमेश के पैरों पर गिर पड़ी और गिड़गिड़ाने लगी, ‘मुझे किस के सहारे छोड़ कर जा रहे हो? मत जाओ, मत जाओ न…’

“लेकिन उस ने मेरे हाथों को इतनी जोर का झटका दिया कि मैं कुछ दूरी पर जा कर गिर पड़ी.

“मुझे होश आया तो मैं अस्पताल के बिस्तर पर थी और साथ में थीं मेरी मां, जो मेरा सिर सहला रही थीं. मैं उन की गोद में मुंह छिपा कर जोरजोर से रोने लगी.

“फिर मुझे अहसास हुआ कि 2 और हाथ मेरी पीठ को सहला रहे थे. मैं कितनी बड़ी बेवकूफ थी, मैं ने समझा कि रमेश लौट आया है. झट से पलट कर देखा तो वे 2 प्यारभरे हाथ मेरे पापा के थे.

“तब से अब तक मैं मम्मीपापा के साथ ही रहती हूं और साथ में है मेरा बेटा. जिस समय मेरा बेटा पैदा हुआ, मेरी उम्र 16 साल थी. आज मैं 21 साल की हो चुकी हूं. मातापिता के प्यार के साए में पता ही नहीं चला कि 5 साल कैसे गुजर गए.

“सच में सारी दुनिया दुश्मन हो जाए, पर मातापिता का प्यार कभी कम नहीं होता है. इन के प्यार को ठुकराने और विश्वास को तोड़ने की बेवकूफी कभी नहीं करनी चाहिए…”

5 साल पहले ही मोना मेरे दफ्तर में आई थी. आज की घटना एक बार फिर दहला गई. जीशान हमारे औफिस में हैड थे. औफिस के सारे अहम कामों का दारोमदार जीशान पर ही था. वे बरताव के भी अच्छे थे. यही वजह थी कि जीशान औफिस में सब के चहेते थे. वे मुझ से कुछ ही साल बड़े थे, इसलिए मैं उन्हें ‘भाई’ कह कर बुलाया करती थी.

जीशान जरा आशिकमिजाज भी थे. भंवरा फूल से दूर कैसे रह सकता है? जीशान को मोना भाने लगी. फिर वही हुआ जो अकसर होता है. मोना भी जीशान के करीब जाने लगी. दोनों के दिलों में मुहब्बत की लहर सी आ गई. उस लहर में दोनों गोते लगाने लगे.

पिछले चंद सालों में ही उन का प्यार परवान चढ़ गया. सारे औफिस में उन की चर्चा होने लगीं, मगर इन चर्चाओं से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ सकता था, क्योंकि दोनों दिलोजान से एकदूसरे को चाहते थे.

प्यार में धोखा खाई हुई एक बच्ची को दोबारा सच्चा प्यार मिल रहा था. दोनों एकदूसरे से बेपनाह मुहब्बत करने लगे. मगर एकाएक सुनने में आया कि जीशान ने शादी कर ली. मैं क्या मोना को हिम्मत देती, खुद ही इस खबर से परेशान थी.

किसी तरह हम ने दिन गुजारा. ड्यूटी खत्म कर जीशान के घर सचाई जानने के लिए निकलने ही वाली थी कि एकाएक शोर उठा कि ‘जीशान आ गए, जीशान आ गए’.

मैं ने पलट कर देखा जीशान मेरे सामने थे. मैं ने सवालों की झड़ी लगा दी. ढेरों सवालों के बीच एक ही तो सवाल था, क्या आप ने शादी की?

जीशान मेरे साथ वाली कुरसी पर बैठते हुए बोले, “हां.”

“आप किसी और से शादी कैसे कर सकते हो…”

“मजबूरी थी, करनी पड़ी.”

‘”ऐसी क्या मजबूरी थी कि एकाएक एक ही दिन में आप को शादी करनी पड़ी, वह भी किसी और से? ऐसा कभी होता है कि प्यार किसी से करो और शादी किसी और से? आखिर आप समझते क्या हैं अपनेआप को कि मर्द जो चाहे वह कर सकता है. कोई शादी कर के धोखा देगा और कोई प्यार कर के?

“लड़की क्या पत्थर की बेजान बुत है जिस के साथ जैसा चाहे सुलूक कर लें. कितना प्यार करती है मोना आप से और आप भी तो प्यार करते थे न मोना से. वह प्यार था कि दिखावा था? बोलिए. लानत है ऐसे धोखेबाजों पर…”

गुस्से में न जाने और क्याक्या बोलती चली गई मैं. जीशान सिर झुकाए चुपचाप बैठे थे. आंसुओं की धार से उन की शर्ट भीगती जा रही थी, लेकिन मेरा बड़बड़ाना बंद नहीं हुआ.

मोना, जो मेरी बगल वाली सीट पर बैठी थी, उस ने मेरे कंधे को जोर से दबाते हुए इशारा किया कि मैं अब और ज्यादा न बोलूं.

मैं चुप हो गई. सारा स्टाफरूम सन्नाटे में था. ऐसा सन्नाटा मानो हम सब को निगल रहा हो. अब और बरदाश्त के बाहर था चुप रहना.

चुप्पी तोड़ते हुए मैं ने ही कहा, “बोलिए जीशान भाई, कुछ तो बोलिए. आप की यह खामोशी हमारी जान ले लेगी.”

जीशान धीरेधीरे कहने लगे. उन्हें एकएक लफ्ज कहने में मानो बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही थी, “कल हम एक शादी में गए थे. सबकुछ ठीक चल रहा था कि ऐन निकाह से पहले दूल्हे के पास एक लड़की आई. कुछ डरीसहमी सी. कहने लगी कि दुलहन आप से कुछ कहना चाहती है.

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“शोरशराबा एकाएक थम गया. सैकड़ों की भीड़ में भी ऐसी खामोशी कि सूई भी गिरे तो आवाज सब को सुनाई दे.

“दूल्हे के अब्बा ने कहा, ‘ऐसी क्या बात है कि निकाह से पहले दुलहन कुछ कहना चाहती है?’

“दुलहन के अब्बा दौड़ते हुए अंदर गए. खलबली मच गई. हर एक की जबान पर एक ही बात अटक गई कि क्या बात हो सकती है.

“ऊहापोह की हालत में वहां हाजिर कुछ समझदार लोगों ने कहा कि चल कर सुन लेना चाहिए कि क्या कहना चाहती है लड़की.

“लड़की के कमरे तक जा कर समझदारों की टोली रुक गई. लड़के को अंदर भेजा गया.

“दुलहन घूंघट को जरा सरका कर सिर नीचे किए कहने लगी, ‘निकाह से पहले मैं एक सचाई आप को बताना चाह रही हूं. मैं आप को धोखे में रख कर शादी नहीं कर सकती. मैं कभी मां नहीं बन सकती. टीनएज में ही किसी बीमारी की वजह से मेरा यूट्रेस निकाल दिया गया है. बस, यही कहना था.’

“लड़के के पिता ने दहाड़ लगाई, ‘इतना बड़ा धोखा. एक बंजर लड़की से मेरे बेटे का रिश्ता होने जा रहा था…’

“दुलहन के पिता और कुछ सुन पाते, इस से पहले ही गश खा कर गिर पड़े.
मैं ने कहा, ‘मां ही तो नहीं बन सकती. बीवी, बहू जैसे सारे रिश्ते तो निभा सकती है. मुहब्बत कर सकती है. सब से बड़ी बात कि इस ने धोखा नहीं दिया, निकाह से पहले ही सचाई बता दी. यह इस का ईमान है.’

“यह सुन कर दूल्हे के अब्बा चिल्लाए, ‘इस के ईमान का क्या हम अचार डालें…’

“मैं ने कहा, ‘इस तरह अधूरी शादी से बैरंग लौटेंगे तो आप लोगों की भी फजीहत होगी.’

“इतना सुन कर लड़के की मां चीखीं, ‘सैकड़ों लड़कियां मिल जाएंगी मेरे बेटे के लिए.’

“मैं भी अड़ा रहा, ‘क्या गारंटी है कि जो आप की बहू बनेगी, वह मां बनेगी ही?’

“इस के बाद लड़के की मां ने हद करते हुए कहा, ‘अरे, मां नहीं बनी तो हम उसे भी छोड़ देंगे. दुनिया में लड़कियों का अकाल है क्या?’

“मैं ने उन्हें प्यार से समझना चाहा, ‘दुनिया में बहुत सी औरतें मां नहीं बन पाती हैं. इस का मतलब क्या यह है कि उन्हें जीने का हक नहीं?’

“इस पर दूल्हे के पिता ने सवाल दागा, ‘तुम कौन हो जी? क्या तुम कर सकते हो ऐसी बंजर लड़की से शादी? बोलो, जवाब दो?’

“मैं कुछ कह पाता इस से पहले मेरे अब्बा ने साम ने आ कर ऊंची आवाज में कहा, ‘हां, मेरा बेटा करेगा इस ईमानदार लड़की से निकाह.'”

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इतना कह कर जीशान ने अपना झुका हुआ सिर उठा कर मेरी नजरों में नजरें डाल कर कहा, “बस इतना ही हुआ. न मुझे वहां सचाई बताने का मौका मिला और न ही अब खुद को बेगुनाह साबित करना चाहता हूं. मैं मोना का कुसूरवार हूं. आप सब मुझे जो सजा देना चाहें, मैं सिर झुकाता हूं.”

बाकियों का तो मुझे नहीं मालूम लेकिन मैं एकटक जीशान को देखती रही, देखती रही. मेरा दिल समंदर की तरह उछाल मारने लगा. दिल में आया कि जीशान जैसे फरिश्ते को अपने गले से लगा लूं…

इसी बीच मोना खड़ी हो गई और अपनी आदत के मुताबिक जोरजोर से ताली बजा कर कहने लगी, “अरे, सारे मुंह लटकाए क्यों बैठे हैं… हमारे जीशान सर की शादी हुई है भई, पार्टी तो बनती है. इन की पार्टी मेरी तरफ से. मैं तो शादी का लड्डू खा चुकी हूं, दूसरों को भी तो मौका मिलना चाहिए.”

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