⚲

Hindi Story : बदलाव के कदम

Hindi Story : लक्ष्मण अपनी अंधेरी कोठरी का बल्ब जला कर चारपाई पर लेट गया और कुछ सोचने लगा. कल ही तो लक्ष्मण की शादी है. अब तक कोई भी ठोस इंतजाम नहीं हो सका है. तिलक के दिन भी लक्ष्मण को ही अपने घर के सारे इंतजाम करने पड़े थे. बैंक में जमा रुपए निकाल कर वह अपनी शादी का इंतजाम कर रहा था. उस की इच्छा थी कि कोर्ट में ही शादी कर ले. आलतूफालतू खर्च तो बच जाएंगे, लेकिन लड़की के घर वालों की इच्छा की अनदेखी वह नहीं कर सका. लड़की वाले अपनी तरफ से उस की खातिरदारी में अपनी इच्छा से सबकुछ खर्च कर रहे हैं, तो क्या उस का अपना कोई फर्ज नहीं बनता?

लक्ष्मण के बाबूजी लालधारी इस शादी से खुश नहीं थे. उन का स्वभाव शुरू से ही खराब रहा है, ऐसा नहीं
था. हां, शादी के मुद्दे पर मनमुटाव हुआ है.

लालधारी को इस बात का दुख था कि उन का बेटा लक्ष्मण अपनी बिरादरी की इज्जत का खयाल न कर दूसरी जाति की, वह भी अछूत जाति की लड़की से ब्याह कर रहा है.

प्यारव्यार तो ठीक था, लेकिन शादीब्याह की बात से तो पूरी बिरादरी के लोग लालधारी पर थूथू कर रहे थे. इसे सही और गलत के तराजू पर तौल कर लालधारी लक्ष्मण का पक्ष लिए होते, तब लक्ष्मण इतना दुखी नहीं होता. उसे दुख तो इस बात पर हो रहा था कि वे अपने बेटे के बजाय बिरादरी का ही समर्थन कर रहे थे.

लालधारी को ज्यादा दुख इस बात का था कि इस शादी में दहेज की मोटी रकम नहीं मिल रही थी. उन्होंने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था कि जिस बेटे को एमए की डिगरी दिलाने में उन्होंने एड़ीचोटी एक कर दी, उस के ब्याह में उन्हें फूटी कौड़ी भी हाथ नहीं लगेगी. हताश हो कर वे अपने हाथ मलते रह गए थे. बेटा नासमझ तो था नहीं, जो उसे डांटनेफटकारने के बाद लड़की वाले से मोटी रकम की मांग कर बैठते. सच बात तो यह थी कि लक्ष्मण के आदर्शवादी खयालों से वे नाराज हुए बैठे थे.

एक बार लालधारी ने लक्ष्मण से कहा भी था, ‘‘बेटा, गैरजाति में शादी कर तू ने बिरादरी में मेरी नाक तो कटवा ही दी. अब एक पैसा भी दहेज न लेने की जिद कर के क्यों हाथ आ रहे पैसे को तू ठुकरा रहा है? कुछ नहीं, तो जमीनजायदाद ही लिखवा ले…’’

तब लक्ष्मण एकदम गंभीर हो गया था और फिर तैश में आ कर बोल उठा था, ‘‘बाबूजी, बिरादरी से हमें कोई लेनादेना नहीं है. मैं जाति नहीं, इनसान की इनसानियत की कद्र करता हूं. मेरे ऊपर आप का बहुत अहसान और कर्ज है, लेकिन वह अहसान और कर्ज इतना छोटा नहीं है कि उसे पैसे से चुका दूं.

‘‘आप अपने लक्ष्मण से इज्जत जरूर पा सकेंगे. लेकिन बेटे की शादी के एवज में दानदहेज नहीं. मैं पैसे को ठुकरा नहीं रहा हूं, अपने घर में इज्जत के साथ पैसे को ला रहा हूं. क्या अच्छी बहू किसी पैसे से कम होती है?’’

लक्ष्मण की बातों के चलते पूरी बिरादरी वाले यह सोचसोच कर डर रहे थे कि कहीं यह हवा उन के घर के भीतर भी न घुस जाए, उन का बेटा भी बगावत पर न उतर जाए, गैरजाति की लड़की से प्यार न कर बैठे और फिर लाखों रुपए के दानदहेज से अछूते न रह जाएं.

उसी समय लालधारी से मिलने सरपू और अवधेश आए थे. बातचीत के दौरान लालधारी ने उन से कहा था, ‘‘मैं ने भी तय कर लिया है कि जिस तरह लक्ष्मण की शादी में मुझे एक भी पैसा नहीं मिला है, उसी तरह मैं भी उस की शादी में एक भी पैसा खर्च नहीं करूंगा. देखता हूं, बच्चों को कौन उधार देता है और वह कैसे कर लेता है ब्याह… और हां, सरयू और अवधेश, तुम लोग भी एक पैसा मत देना लक्ष्मण को.’’

‘‘मैं क्यों पैसे दूंगा? कल लक्ष्मण 500 रुपए उधार मांगने के लिए मेरे पास आया था, लेकिन मैं ने साफसाफ कह दिया कि अपने बाबूजी से जा कर मांगने में लाज लगती है क्या?

‘‘बस, इतना सुनना था कि उल्लू जैसा मुंह बना कर वह चला गया. अरे भाई, अब तो उस का मुंह भी बंद हो गया है. उस की शादी न रुक गई, तो फिर देखना.’’

लक्ष्मण का लंगोटिया दोस्त सुरेश मन ही मन मना रहा था कि मेरे दोस्त की यह परेशानी दूर हो जाती, ताकि वह अपनी बात पर अटल रहते हुए अपनी मंजिल को पा सके.

सुरेश को यकीन नहीं हो पा रहा था कि इतने विरोधों और परेशानियों के बावजूद लक्ष्मण और किरण की शादी हो सकेगी. लक्ष्मण और किरण का आकर्षण अनजाने में हुआ था. लक्ष्मण ट्यूशन पढ़ाने हर शाम जाया करता था. पढ़ातेपढ़ाते वह खुद प्रेम का पाठ पढ़ने लगा. दोनों के विचार जब आपसी लगाव का कारण बन गए, तब वे एकदूसरे को पसंद करने लगे.

यह जोड़ी किरण की मां को भी बहुत भली लगी. किरण के बाबूजी तो 2 साल पहले ही इस दुनिया से जा चुके थे, इसलिए सारे फैसले मां को ही लेने थे. वे इस से बढि़या लड़का कहां से ढूंढ़तीं? पढ़ालिखा और समझदार लड़का बैठेबैठे मिला है. फिर जातपांत में क्या रखा है? जमाना बदल रहा है, तो विचारों में भी बदलाव लाना ही चाहिए.

किरण की मां को जब यह लगा कि किरण भी लक्ष्मण से सचमुच प्रेम करती है, तब उन्होंने बातबात में ही बात चला दी थी, ‘‘बेटा, मेरी बेटी तुम्हारी बहुत बड़ाई किया करती है. अगर तुम्हें मेरी बेटी पसंद हो, तो मैं उस की शादी तुम से करने के लिए तैयार हूं.’’

‘‘मांजी, मैं खुद ऐसी ही बात आप के सामने कहने वाला था. जल्दी ही किरण से शादी कर के आप को भरोसा दिला दूंगा कि मेरा प्यार झूठा नहीं है.’’

‘‘लेकिन, अगर तुम्हारे बाबूजी इस शादी के खिलाफ हुए, तब तुम क्या करोगे बेटा?’’ अपना शक सामने रखते हुए किरण की मां बोलीं.

‘‘उन के खिलाफ भी कदम बढ़ाने की मेरी पूरी कोशिश रहेगी.’’

‘‘लेकिन, दहेज के रूप में मैं…’’

‘‘दहेज का नाम न लीजिए मांजी. मुझे दहेज से सख्त नफरत है. न जाने कितनी मासूम जानें ली हैं इस दहेज के नाग ने.’’

किरण की मां लक्ष्मण से बहुत खुश हो चुकी थीं. उन्होंने सोचा, ‘एमए पास है ही, 4-5 ट्यूशन कर लेता है. अभी नौकरी नहीं करता है तो क्या? मेहनती लड़का है, कुछ न कुछ तो करेगा ही. इसलिए जल्दी ही उस की नौकरी भी लग जाएगी.’

लक्ष्मण का दोस्त सुरेश भी किरण के घर पर आनेजाने लगा था. किरण से बातचीत भी किया करता था. उसे लगा कि सचमुच, लक्ष्मण के लिए यह खुशी की बात है कि इतनी विचारवान, पढ़ीलिखी और सुशील लड़की के दिल पर उस ने अधिकार प्राप्त कर लिया है.

लक्ष्मण अब तक इसी सोच में था कि आखिर वह बिना दहेज लिए कहां से इतने पैसों का इंतजाम करे कि किरण के घर वालों की इज्जत कर सके और अपने दोस्तों का खयाल भी रख सके.

अचानक उसे उपाय सूझा. उस ने सोचा, आखिर इतने दोस्त कब साथ देंगे? अबू, रवींद्र, श्यामल, देवनाथ और सुरेश. सभी अपने ही तो हैं. क्यों न उन्हीं लोगों से कुछ रुपए उधार ले लूं?

उस ने उदास मन में भी आस का दीप जलाए रखा था. उसे पूरा यकीन था कि उस के दोस्त इस मौके पर उस का साथ जरूर देंगे.

आज सुरेश को लग रहा था कि लक्ष्मण जोकुछ कर रहा है, अपनी नैतिकता के कारण. इसी के आगे लक्ष्मण ने अपने बाप से भी मुंह मोड़ लिया है. उस की जाति के लोग उस पर थूथू कर रहे हैं, तिरछी नजर से देख रहे हैं. फिर भी लक्ष्मण के चेहरे पर खुशी के बादल ही मंडरा रहे हैं. उस के दिल को इस बात पर तसल्ली मिलती है कि दहेज न ले कर और अछूत कही जाने वाली जाति की लड़की से शादी करने का फैसला ले कर वह अपने सामाजिक फर्ज को निभा रहा है. आखिर गलत परंपरा को तोड़ कर नई परंपरा को अपनाने में बुराई ही क्या है?

आखिर इस नई परंपरा को अपनाने में मदद करने के लिए लक्ष्मण को मुंह खोलना ही पड़ा. मुंह खोलने भर की देर थी, उस के दोस्तों ने अपनीअपनी पहुंच के मुताबिक दिल खोल कर लक्ष्मण को मदद दी.

इसी का यह फल था कि लक्ष्मण की शादी धूमधाम से हो रही थी. बेकार खर्च नहीं किए जाने के बावजूद बरात में कोई खास कमी नजर नहीं आ रही थी. झाड़बत्ती के खर्च को बचाने के खयाल से शाम के उजाले में ही बरात दरवाजे पर लगा दी गई थी. बरात में अपने ही परिवार के लोग नजर नहीं आ रहे थे. हां, दोस्तों की भीड़ जरूर बरात की शोभा बढ़ा रही थी.

शादी के समय मंडवे में जब लक्ष्मण के पिताजी की उपस्थिति की जरूरत पड़ी, तब समस्या आ पड़ी. उस के बाबूजी तो गुस्से के चलते वहां पर आए ही नहीं थे.

इसी बीच लक्ष्मण के दोस्त देवनाथ ने मंडवे में सामने आ कर लक्ष्मण से कहा, ‘‘इस में परेशान होने की क्या बात है लक्ष्मण? जिस लड़के का बाप या भाई जिंदा नहीं रहता, क्या उस की शादी रुक जाती है? मैं बन जाता हूं तुम्हारा बड़ा भाई.’’

यह सुन कर लक्ष्मण गदगद हो उठा. लड़की वालों का भी यही हाल था. सभी सोच रहे थे, ‘‘लड़की के पिता न होने के कारण उपस्थित नहीं हैं और लक्ष्मण के बाबूजी जिंदा हो कर भी अनुपस्थित हैं. क्या फर्क रह जाता है ऐसे मौके पर… जिंदगी और मौत में… अपने और बेगाने में?’’

शादी आखिर हो गई. दूसरे दिन किरण ब्याहता बन कर दुलहन के रूप में लक्ष्मण के घर में आई.

लक्ष्मण की मां के अनुरोध और जिद पर उस के बाप ने कोई विरोध तो नहीं किया, लेकिन मन ही मन अनबन बनी रही.

उस घर में किरण जिंदा दुलहन नहीं, बल्कि निर्जीव गुडि़या बन कर रह गई. किसी ने पूछा नहीं. किसी का भी प्यार उसे न मिला. उस घर में सारे लोगों के होते हुए भी उस के लिए सिर्फ लक्ष्मण ही रह गया था.

कुछ दिनों में ही लक्ष्मण को लगा कि यह घर अपना हो कर भी अपना नहीं है, यहां के लोग अपने हो कर भी बेगाने हैं. इस तरह अपने लोगों के बीच कटकट कर रहने से तो बेहतर है, खुले आकाश के नीचे रह कर जीना.

उस ने किसी से कोई शिकायत नहीं की. वह जानता था कि मांगने से दुश्मनी मिल सकती है, प्यार नहीं मिल सकता.

और फिर एक दिन अपने मन से उस ने उसी शहर में किराए पर 2 कमरे का एक मकान ले लिया. उस में वह किरण के साथ रहने लगा.

किराए के मकान में घुसते ही उसे असली घर जैसा सुख मिला. वहां के पड़ोसी लोगों के साथ भी धीरेधीरे मेलजोल बढ़ गया. तब वे आपस में घुलमिल गए.

लेकिन अभी भी उसे किनारा नजदीक नजर नहीं आ रहा था. इतना संतोष तो था ही कि दूर है किनारा तो क्या, जिस मंजिल की तलाश थी, उस के बहुत करीब वे बढ़ते जा रहे थे.

कुछ ही दिनों के बाद उन दोनों के दिन फिर गए. लक्ष्मण को अदालत में सहायक के पद पर नौकरी मिल गई. अब वह सोचने लगा, माली तंगी से छुटकारा पा सकेगा और खुशीखुशी जिंदगी का सफर तय कर सकेगा.

लेखक – सिद्धेश्वर

Family Story : लक्खू का गृहप्रवेश

Family Story : लक्खू मोची अपनी दुकान पर हर रोज सुबह 7 बजे आ कर बैठ जाता था. वह टूटी हुई चप्पलों और फटे हुए जूतों की मरम्मत करता था. उस की दुकान खूब चलती थी. वह चाहे जूते की पौलिश करता या टूटी चप्पलें बनाता, उस की मेहनत साफ झलकती थी. उस के सधे हुए काम से लोग खुश हो जाते थे.

लक्खू मोची की बीवी अंजू बहुत खूबसूरत थी. उस का रंगरूप मोहक था. वह लक्खू की घरगृहस्थी बखूबी संभाल रही थी. वह 10वीं जमात तक पढ़ी थी, जबकि लक्खू मोची ने तो स्कूल का मुंह तक नहीं देखा था. वह सिरे से अनपढ़ था. लेकिन शादी के बाद अंजू ने उसे थोड़ाबहुत पढ़नालिखना सिखा दिया था. अब तो वह अखबार भी पढ़ लेता था.

एक दिन औफिस जाने के लिए एक मैडम घर से निकलीं, तो रास्ते में उन की चप्पल टूट गई. वे लक्खू की दुकान पर पहुंचीं और बोलीं, ‘‘लक्खू, जरा जल्दी से मेरी चप्पल की मरम्मत कर दो, नहीं तो दफ्तर के लिए लेट हो जाऊंगी.’’

लक्खू मोची ने उस मैडम की चप्पल की मरम्मत 5 मिनट में कर दी.

‘‘ये लो 10 रुपए लक्खू,’’ उन मैडम ने चप्पल मरम्मत के पैसे दे दिए.

तभी एक साहब आ कर बोले, ‘‘लक्खू, मेरे जूते पौलिश कर दो.’’

लक्खू ने फटाफट ब्रश चला कर जूते पौलिश कर दिए.

‘‘लक्खू, ये लो 25 रुपए,’’ इतना कह कर वे साहब चमकते चूते पहन कर चल दिए.

शाम हो गई थी. लक्खू अपने घर पहुंच गया था. वह चारपाई पर जा कर लेट गया. वह दिनभर की थकान इसी चारपाई पर मिटाता था.

थोड़ी देर में अंजू चाय बना कर ले आई और बोली, ‘‘ये लीजिए, चाय पी लीजिए.’’

लक्खू चारपाई से उठ कर बैठ गया. वह खुश हो कर चाय पीने लगा. अंजू भी उस के पास बैठ कर चाय पीने लगी.

‘‘मकान मालिक को हर महीने किराए की मोटी रकम देनी पड़ती है. क्यों न हम लोग अपना मकान बना लें. इस से किराए का पैसा भी बच जाएगा,’’ अंजू ने लक्खू से कहा.

‘‘हम लोगों के पास इतने रुपए हैं कि अपना मकान बना सकें. मैं रोजाना चप्पलजूते मरम्मत कर तकरीबन 500 रुपए ही कमा पाता हूं. वे सब भी दालरोटी में खर्च हो जाते हैं,’’ कहते हुए लक्खू के चेहरे पर मजबूरी उभर आई थी.

‘‘मैं आप को एक उपाय बताऊं…’’ अंजू ने कहा.

‘‘हांहां, बताओ,’’ लक्खू बोला.

‘‘आप दुकान में नई चप्पलें और नए जूते बेचिए. इस से हमारी आमदनी और बढ़ जाएगी,’’ अंजू ने कहा.

‘‘लेकिन मैं इतनी पूंजी कहां से लाऊंगा?’’ लक्खू ने पूछा.

‘‘आप होलसेल से माल ले आइए. जब बिक्री हो जाए, तो दुकानदार को पैसे दे दीजिएगा,’’ अंजू ने बताया.

‘‘हां, ऐसा हो तो सकता है. आज तो मैं ने मान लिया कि तुम्हारा दिमाग कंप्यूटर की तरह तेज काम करता है,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘दिमाग तो लगाना पड़ता है, नहीं तो हम लोग का घर कैसे बनेगा,’’ अंजू ने मुसकरा कर कहा.

रात के 10 बज रहे थे. लक्खू और अंजू बिस्तर पर लेटे हुए थे. थकान से लक्खू को नींद आ रही थी, लेकिन अंजू के दिल में प्यार की उमंगें उठ रही थीं.

‘‘सो गए क्या?’’ अंजू ने लक्खू से पूछा.

‘‘नहीं, पर जल्दी ही सो जाऊंगा,’’ लक्खू ने अलसाई आवाज में कहा.

‘‘ज्यादा नहीं, आप 15 मिनट तो मेरे साथ जागिए,’’ कह कर अंजू ने लक्खू को चूम लिया.

लक्खू अंजू का इशारा समझ गया और बोला, ‘‘अब तो मुझे जागना ही पड़ेगा,’’ कह कर वह अंजू को अपनी बांहों में भर कर चूमने लगा. उन दोनों पर प्यार का नशा छा गया.

वे एकदूसरे के जिस्म से खेलने लगे. कुछ देर तक प्यार का खेल चलता रहा, फिर थक कर वे दोनों गहरी नींद में सो गए.

अगले दिन लक्खू थोक विक्रेता से जूतेचप्पल ले कर अपनी दुकान में बेचने लगा. जल्दी ही उस की आमदनी बढ़ने लगी.

3 साल में ही लक्खू के पास इतने रुपए हो गए कि उस ने एक नया मकान बना लिया. अंजू और लक्खू का नए मकान का सपना पूरा हुआ था, लेकिन अभी गृहप्रवेश करना बाकी था.

एक सुबह लक्खू अपनी दुकान के लिए जा रहा था कि तभी अंजू ने कहा, ‘‘आप गृहप्रवेश की पूजा के
लिए पंडितजी से बात कीजिए. यह काम जल्द निबट जाए, तो घर का किराया बच जाएगा.’’

‘‘ठीक है, मैं आज ही पंडितजी से बात करता हूं,’’ कह कर लक्खू वहां से चला गया.

पंडितजी कालोनी में पूजा कराते थे. वे लक्खू को रास्ते में ही मिल गए.

‘‘प्रणाम पंडितजी,’’ कह कर लक्खू ने हाथ जोड़े.

‘‘कहो, कोई खास बात है क्या?’’ पंडितजी ने लक्खू से पूछा.

‘‘हां, मुझे गृहप्रवेश की पूजा करानी थी,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘अरे लक्खू मोची, तुम ने भी घर बना लिया… चप्पलजूते मरम्मत कर के इतनी तरक्की कर ली,’’ पंडितजी ने हैरान हो कर लक्खू से कहा.

‘‘हां, मेहनतमशक्कत से एकएक पाई जोड़ कर घर बनाया है,’’ लक्खू ने थोड़ी नाराजगी जताई…

‘‘पंडितजी, आप की क्या दानदक्षिणा होगी, बता दीजिए. मुझे 1-2 दिन में पूजा करा लेनी है,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘अभी एक यजमान के यहां पूजा कराने जा रहा हूं. कल बता दूंगा,’’ पंडितजी अकड़ कर चले गए.
लक्खू रात में जब घर लौटा, तब अंजू ने पूछा, ‘‘क्या पंडितजी से बात हुई थी? वे दक्षिणा क्या लेंगे?’’

‘‘हां, उन से बात हुई थी. वे दक्षिणा क्या लेंगे, कल बताने को बोले हैं,’’ लक्खू ने कहा.

शाम को पंडितजी घर पर बैठे थे. पंडिताइन भी पास ही बैठी थीं. पंडितजी ने पंडिताइन से लक्खू का जिक्र किया, ‘‘लक्खू मोची के घर का गृहप्रवेश है. मुझे पूजा कराने को बोल रहा था. मैं तो धर्मसंकट में पड़ गया हूं. तुम्हीं बताओ, उस के यहां मैं जाऊं या नहीं?’’

पंडिताइन कुछ सोच कर बोलीं, ‘‘लक्खू मोची है. आप ब्राह्मण हो कर उस के घर पूजा कराने जाएंगे. लोग क्या कहेंगे कि पंडितजी मोची के घर भी पूजा कराने जाते हैं.

‘‘उन के यहां के बरतन कितने गंदे होते हैं. मुझे तो देख कर ही घिन आती है. उन्हीं बरतनों में आप को दहीपूरी और मिठाई का भोग लगाना पड़ेगा.’’

‘‘कोई उपाय बताओ कि मुझे करना क्या होगा?’’ पंडितजी ने पूछा.

‘‘आप को यही करना है कि दूसरे यजमानों से जो दक्षिणा लेते हैं, लक्खू मोची से उस का दोगुना मांगिएगा. वह दक्षिणा का रेट सुन कर भाग जाएगा. इस तरह लक्खू मोची से आप का पिंड छूट जाएगा.’’

पंडितजी को यह उपाय भा गया. उन के होंठों पर कुटिल मुसकान खिल गई.

पंडितजी लक्खू की दुकान पर पहुंचे. उस समय लक्खू खाली बैठा था. पंडितजी को देख कर लक्खू ने हाथ जोड़े और बोला, ‘‘प्रणाम पंडितजी… गृहप्रवेश की पूजा के लिए आप को कितनी दक्षिणा देनी होगी?’’

‘‘दक्षिणा के 1,000 रुपए लगेंगे,’’ पंडितजी ने कहा.

‘‘मुझ से दक्षिणा के 1,000 रुपए क्यों, जबकि दूसरों से तो आप 500 रुपए ही लेते हैं?’’ लक्खू ने पूछा.

‘‘देखो लक्खू, तुम मोची हो. मैं ब्राह्मण हूं. तुम्हारे घर जा कर पूजा करानी है. अपना धर्म भी भ्रष्ट करूं और दोगुनी दक्षिणा भी न लूं,’’ पंडितजी ने कहा.

‘‘अच्छा, तो यह बात है. पंडितजी, आप जातीय जंजाल में जी रहे हैं. पूजापाठ कराना तो आप का ढकोसला है. आप की रगरग में छुआछूत की भावना भरी हुई है.

‘‘मुझे ऐसे पंडितजी से गृहप्रवेश नहीं कराना है. मेरी समझ से आप का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘लक्खू मोची, तुम मेरा सामाजिक बहिष्कार करोगे. अधर्मी, पापी. छोटी जाति का आदमी,’’ पंडितजी गुस्से से कांप रहे थे.

लक्खू को भी काफी गुस्सा आ गया. उस ने अपने पैर से जूता निकाल कर पंडितजी को धमकाया, ‘‘जाओ, नहीं तो इसी जूते से चेहरे का हुलिया बिगाड़ दूंगा.’’

लक्खू और पंडितजी लड़नेमरने को तैयार थे. आसपास के लोगों ने बीचबचाव कर के उन दोनों को अलग कर दिया.

लक्खू जब शाम को घर पहुंचा, तब अंजू ने पूछा, ‘‘पंडितजी कल गृहप्रवेश कराने आ रहे हैं न?’’

‘‘नहीं. वे तो कहने लगे कि मोची के घर नहीं जाऊंगा. उन का धर्म भ्रष्ट हो जाएगा. वे हम लोगों को अछूत मानते हैं,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘जाने भी दीजिए. हम लोग नए ढंग से गृहप्रवेश कर लेंगे. ऐसे नालायक पंडित पर निर्भर रहना सरासर बेवकूफी है,’’ अंजू ने कहा.

दूसरे दिन लक्खू और अंजू ने मिल कर नए घर को फूलों की माला से सजा दिया था. अंजू ने पूरी, मटरपनीर की सब्जी और सेंवइयां बनाई थीं.

अंजू ने लक्खू से कहा, ‘‘बगल की बस्ती से गरीब बच्चों को बुला कर ले आइए. उन बच्चों को हम लोग भरपेट भोजन कराएंगे.’’

बस्ती के 8-10 बच्चे पंगत लगा कर बैठ गए थे. पूरी, मटरपनीर की सब्जी व सेंवइयां बच्चों को परोस दी गईं. बच्चों ने छक कर खाया. कुछ बच्चे खापी कर खुशी से नाचनेगाने लगे थे. बच्चों को नाचतेगाते देख कर अंजू और लक्खू बेहद खुश थे.

अंजू और लक्खू का गृहप्रवेश दूसरे से अलग और अनूठा था. अंजू और लक्खू अपने नए घर में खुशीखुशी रहने लगे थे.

इस बात को 2 महीने बीत चुके थे. लक्खू अपनी दुकान पर बैठा था. इतने में पंडितजी अपनी टूटी हुई चप्पल की मरम्मत के लिए लक्खू की दुकान पर आए थे.

‘‘लक्खू, मेरी चप्पल टूट गई है. फटाफट मरम्मत कर दो. मुझे पूजा कराने जाना है,’’ पंडितजी ने कहा.

लक्खू ने पंडितजी को पहचानते हुए कहा, ‘‘आप की चप्पल यहां मरम्मत नहीं होगी. कहीं और जा कर देखिए.’’

‘‘लेकिन, मेरी चप्पल क्यों नहीं मरम्मत होगी?’’ पंडितजी ने पूछा.

लक्खू ने कहा, ‘‘मेरे घर पूजा कराने पर आप का धर्म भ्रष्ट होता है. मेरे हाथ से चप्पल मरम्मत कराने पर क्या आप का धर्म भ्रष्ट नहीं होगा.’’

‘‘बकवास मत करो. जल्दी से मेरी चप्पल मरम्मत कर दो. जो पैसा लेना है, ले लो.’’

‘‘मैं ने कह दिया न कि आप की चप्पल मरम्मत नहीं करूंगा,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘लक्खू मोची, घर आई लक्ष्मी को ठुकराना नहीं चाहिए. ग्राहक से ही तुम्हारी रोजीरोटी चलती है,’’ पंडितजी ने थोड़ी खुशामद की.

‘‘मुझे उपदेश मत दीजिए. अपना रास्ता नापिए,’’ कह कर लक्खू एक ग्राहक के जूते में पौलिश करने लगा.

पंडितजी टूटी चप्पल ही पहन कर घिसटते हुए चल दिए. उन को नंदन साहब के यहां पूजा करानी थी. वहां दक्षिणा की मोटी रकम मिलने वाली थी.

चिलचिलाती धूप थी. सड़क पर कोई सवारी नहीं थी. अमूमन रिकशा वाले टैंपो वाले दिख जाते थे, लेकिन इस आफत में सभी गायब थे.

समय बीता जा रहा था. पंडितजी की चिंता बढ़ती जा रही थी. वे मन ही मन लक्खू को कोस रहे थे, ‘लक्खू मोची, तुम ने मुझ से खूब बदला लिया है.’

आखिरकार पंडितजी टूटी चप्पल से पैर घिसटते हुए नंदन साहब के घर पहुंच गए थे. वहां का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. नंदन साहब कुरसी पर बैठे हुए थे. कोई दूसरे पंडितजी पूजा करा रहे थे.

नंदन साहब का ध्यान पंडितजी पर गया. वे बोले, ‘‘आप बहुत लेट आए हैं.’’

‘‘हां, एक घंटा लेट हो गया. थोड़ी परेशानी में पड़ गया था,’’ पंडितजी ने कहा.

‘‘खैर, कोई बात नहीं. पूजा कराने के लिए बगल के मंदिर से पंडितजी को बुला लिया है. अब तो पूजा भी खत्म होने वाली है. आप की जरूरत नहीं रही. आप जा सकते हैं,’’ नंदन साहब ने बेलौस आवाज में कहा.
ऐसा सुन कर पंडितजी का चेहरा उतर गया. दक्षिणा की मोटी रकम जो हाथ से निकल गई थी.

वे बुदबुदा रहे थे, ‘‘लक्खू मोची, तुझे जिंदगीभर नहीं भूलूंगा. तुम्हारे चलते मेरी इतनी फजीहत हुई है. लेकिन इस के लिए तो मैं खुद भी कम जिम्मेदार नहीं हूं.’’

Family Story : कंफर्म टिकट

Family Story : सुभि को इस बार होली का बेहद बेसब्री से इंतजार था. इस बार उसे कई सालों बाद अपने घर यह त्योहार मनाने जाना था.

सुभि कई महीने पहले से ही होली पर अपने गांव जाने की तैयारी में जुट गई थी. अपने पति राकेश को उस
ने टिकट कराने के लिए बोल दिया था, पर औफिस में ज्यादा काम होने के चलते वह टिकट लेने के लिए जा ही नहीं सका था.

राकेश ने अपने दोस्त रमेश को यह बात बताई. फिर क्या था. रमेश बोला, ‘‘यार, तुम भी कौन सी दुनिया में जी रहे हो…? अब टिकट खरीदने के लिए रेलवे स्टेशन जाना जरूरी नहीं है. यह काम तो यहां बैठेबैठे औनलाइन भी हो सकता है.’’

रमेश ने पलक झपकते ही अपने आईडी पासवर्ड के साथ आईआरसीटीसी की साइट पर पटना जाने की ट्रेन खोजना शुरू कर दिया. पर सूरत से पटना के लिए किसी भी ट्रेन में एक भी सीट खाली नही दिख रही थी. फिर भी कम वेटिंग वाली टिकट राकेश ने अपने और सुभि के लिए बुक करवा दी. उस के कंफर्म होने की उम्मीद ज्यादा थी, ऐसा रमेश ने कहा था.

दिन बीतते जा रहे थे. सुभि अपने गांव जाने की तैयारी में जुटी थी, पर राकेश हर दिन टिकट का वेटिंग चैक करता था, पर वेटिंग संख्या में कोई खास कमी नहीं आई थी और हर बीतते दिन के साथ राकेश की दुविधा बढ़ती जा रही थी. वह सुभि और अपने बच्चे के चेहरे पर छाए जोश को टिकट कंफर्म नहीं होने के चलते खत्म नहीं करना चाहता था. किंतु वह अंदर ही अंदर घुट रहा था. फ्लाइट की टिकट खरीदना उस के बस में नहीं था और रेल के तत्काल के टिकट का भी कोई ठिकाना नहीं था.

जनरल डब्बे का हाल सोच कर ही राकेश के पसीने छूट रहे थे. उसे याद आया, एक बार उस के पिताजी जब बीमार थे, तो वह जनरल डब्बे में ले गया था, तो भीड़ में एक औरत के साथ कितनी बदसुलूकी हुई थी. वह औरत रो रही थी. इस बार वह सुभि और अपने बच्चे के साथ कैसे जाएगा.

राकेश सोचता था कि जिस देश में बुलेट ट्रेन चलाने की योजना बनाई जा रही है, वहां कुछ नई ट्रेन चलाना क्या इतना मुश्किल है? गरीब कम से कम इनसान की तरह बैठ कर तो कहीं आजा सके.

खैर, सफर का दिन आ गया और टिकट को न कंफर्म होना था और न हुई. अब वह परिवार को ले कर स्टेशन पर आ गया. अभी तक उस ने सुभि को टिकट कंफर्म न होने की बात बताई नहीं थी.

अब राकेश स्टेशन आ गया. ट्रेन आने में कुछ मिनट बाकी थे. वह प्लेटफार्म पर चहलकदमी कर रहा था. इतने में एक आदमी एक ब्रीफकेस ले कर तेज कदमों से भाग कर जा रहा था. उस के हावभाव से लग रहा था कि वह उस ब्रीफकेस को चुरा कर भाग रहा है.

राकेश ने उस आदमी को पकड़ लिया और उसे पकड़ कर उसी दिशा की तरफ जाने लगा, जिधर से वह भागता हुआ आ रहा था.

इतने में 50 साल के एक अमीर आदमी ने राकेश को हाथ दे कर रुकने का इशारा किया. वह रईस आदमी बदहवास सा दिख रहा था. ब्रीफकेस देख कर उस की जान में जान आई.

इतने में एक कांस्टेबल उस चोर को पकड़ कर ले गया, जिसे शायद इस वारदात की सूचना उस अमीर आदमी के असिस्टैंट ने दी थी.

उस सेठ ने राकेश को बहुत धन्यवाद दिया और कहा, ‘‘बेटा, तुम ने मु झे बहुत बड़े नुकसान से बचा लिया. बोलो, मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?’’

राकेश बोला, ‘‘बाबूजी, मु झे कुछ नहीं चाहिए.’’

सेठ ने राकेश से कहा, ‘‘तुम शायद मु झे नहीं जानते हो. आओ मेरे साथ.’’

सेठजी राकेश को अपने साथ एसी के वेटिंगरूम में ले गए और बोले, ‘‘मैं सूरत का मशहूर हीरा व्यापारी हूं. मैं पटना जा रहा हूं. प्लेन में स्कैन करने पर हीरों का पता चल जाता, जिस से उन की हिफाजत करना मुश्किल था, इसलिए मैं ट्रेन से पटना जा रहा हूं. वहां के एक बहुत बड़े आदमी को एक हीरे के हार की डिलीवरी देनी है.

‘‘मेरी आंखें एक जौहरी की आंखें हैं, जो कभी धोखा नहीं खा सकतीं. तुम बहुत ईमानदार भी हो और साथ ही परेशान भी हो, इसीलिए तुम्हें मैं ने अपना इतना बड़ा राज बताया. अब जल्दी से अपनी परेशानी बताओ?’’

राकेश सेठजी की बातों से भावुक हो गया और बोला, ‘‘सेठजी, मु झे अपने बीवीबच्चे को पटना ले जाना है.

टिकट कंफर्म नहीं हुआ है, इसीलिए परेशान हूं.’’

सेठ ने कहा, ‘‘भाई, तुम को मैं अपने साथ ऐसी फर्स्ट क्लास में ले कर चलूंगा. तुम चिंता मत करो.’’

सेठजी ने तुरंत ही अपने असिस्टैंट से कहा, ‘‘सुनो, तुम अपनी टिकट मु झे दो और तुम फ्लाइट ले कर सूरत से पटना आ जाना. मेरे साथ राकेश और उस का परिवार जाएगा. और हां, इन का टिकट जनरल क्लास का है, तो टीटी से बात कर के जो भी जुर्माना भरना हो वह सब देख लेना.’’

राकेश को तो मानो अपने कान पर यकीन ही नहीं हुआ. सेठजी की भी गरीबों के प्रति सोच बदल गई. वे सोचने लगे कि जैसे हीरा कोयले की खदान से निकलता है, वैसे ही कभीकभी जनरल डब्बे में सफर करने वाला इनसान इतना बहादुर, होशियार और ईमानदार भी हो सकता है…

इतने में ट्रेन के आने की अनाउंसमैंट हो गई. राकेश सुभि और मुन्ना को ले कर सेठजी के पास आ गया. सेठजी ने उन्हें अपने साथ एसी फर्स्ट क्लास में पटना तक का सफर करा दिया.

News Story : नामर्द

News Story : 22 साल का राजेश दिल्ली की एक पौश कालोनी साउथ ऐक्सटैंशन में अपने नाना के साथ रहता था. 5 साल पहले राजेश के पापा की एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी. राजेश की मम्मी देवयानी एकलौती बेटी थीं, तो वे अपने पति की मौत के बाद बेटे राजेश संग अपने मायके आ गई थीं.

देवयानी के पापा सुरेंद्रनाथ काफी अमीर आदमी थी. तकरीबन 100 करोड़ की प्रोपर्टी उन के नाम थी. चूंकि देवयानी और राजेश ही उन के आखिरी सहारे थे, तो उन्होंने अपनी जायदाद नाती के नाम कर दी थी. पर अभी राजेश खुद से पैसे नहीं इस्तेमाल कर सकता था.

राजेश को अपने ननिहाल में सारे सुख हासिल थे, पर उसे पौकेट मनी के नाम पर ज्यादा पैसे नहीं मिलते थे. नाना का सोचना था कि राजेश पहले अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, फिर उन का कारोबार संभाल ले.

राजेश दिल्ली की एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी से एमबीए कर रहा था. वहां उस के बारे में सब जानते थे कि वह कितना बड़ा आसामी है. यही वजह थी कि यूनिवर्सिटी की बहुत सी लड़कियां उस पर फिदा थीं, पर उसे तो सारिका से सच्चा इश्क था.

सारिका बहुत खूबसूरत लड़की थी. लंबा कद, भरा बदन, भूरी आंखें, बड़े उभार उसे दिलकश बनाते थे. वह ईस्ट दिल्ली की एक साधारण सी कालोनी में रहती थी.

राजेश भी कम हैंडसम नहीं था. वह पढ़ाई में तेज था और अपने नाना की जायदाद संभालने के काबिल भी था, पर जब उसे मनमुताबिक पैसे नहीं मिलते थे, तब वह कुढ़ जाता था.

एक दिन तो हद ही हो गई थी. सुबह का समय था. राजेश कालेज जाने के लिए तैयार हो रहा था. उस ने अपने नाना से पैसे मांगे, तो उस की मम्मी ने टोक दिया, ‘‘तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो. कुछ दिन पहले ही तो तुम्हें पौकेट मनी मिली है. अभी और पैसों की उम्मीद मत रखो.’’

‘‘पर मम्मी, ये सारे पैसे मेरे ही तो हैं. अगर मैं ही इन का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा हूं, तो फिर क्या फायदा…’’ राजेश ने नाराज हो कर कहा.

‘‘पर, वे पैसे तुम ने कमाए नहीं हैं. नाना ने तुम्हारा भविष्य संवारने के लिए अपनी जायदाद तुम्हारे नाम की है, पर इस का यह मतलब नहीं है कि तुम अनापशनाप खर्च करो. अब जल्दी से तैयार हो जाओ, कालेज भी जाना है,’’ मम्मी ने अपना फैसला सुना दिया.

‘‘देवयानी, बेटे से इतना रूखा हो कर बात मत किया करो. गरम खून है. अभी अपना अच्छाबुरा सम झने की सम झ नहीं है,’’ राजेश के कालेज जाने के बाद सुरेंद्रनाथ ने अपनी बेटी को समझाया.

‘‘पापा, आप नहीं जानते हैं. जब से राजेश को पता चला है कि आप ने अपनी सारी जायदाद उस के नाम कर दी है, तब से वह हवा में उड़ने लगा है,’’ देवयानी ने अपनी चिंता जाहिर की.

‘‘चिंता मत करो. राजेश लायक बच्चा है. देरसवेर वह सम झ जाएगा,’’ सुरेंद्रनाथ ने देवयानी को दिलासा देते हुए कहा.

उधर राजेश कालेज तो चला गया था, पर अपनी मम्मी की बातें उस के दिल में अभी भी चुभ रही थीं. लिहाजा, वह कैंटीन में सारिका के साथ कौफी पी रहा था.

‘‘यार, कभीकभी तो मु झे अपनी मम्मी पर इतना ज्यादा गुस्सा आता है कि दर्द से मेरा सिर फटने लगता है. नाना को कोई दिक्कत नहीं है, पर मेरी मम्मी हमेशा मु झे पौकेट मनी के लिए टोक देती हैं. इतनी जायदाद है, पर मु झे देने के नाम पर एक फूटी कौड़ी नहीं निकालतीं. पता नहीं, किस जन्म का बदला ले रही हैं,’’ राजेश ने सारिका से अपना दर्द शेयर किया.

‘‘चिंता मत करो. सब ठीक हो जाएगा,’’ सारिका ने राजेश का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.

‘‘अरे, कुछ नहीं बदलेगा. जी में तो आता है कि ऐसा कुछ कर दूं कि कल ही सारी जायदाद मुझे मिल जाए,’’ राजेश ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा.

सारिका बड़ी चालाक थी. उसे पता था कि राजेश अभी अपने आपे में नहीं है. वह तितली की तरह उस के आसपास मंडराती भी इसलिए थी कि राजेश कभी भी अरबपति बन सकता था.

सारिका ने राजेश का हाथ चूमते हुए कहा, ‘‘चलो, आज कालेज से जल्दी निकलते हैं. हम आज होटल में पूरा दिन बिताते हैं. वहां मैं तुम्हारी मसाज कर दूंगी और फिर हम ठंडे दिमाग से इस समस्या का हल निकाल लेंगे.’’

राजेश बोला, ‘‘ठीक है, हम 2 घंटे के बाद अपने पसंदीदा होटल में चलेंगे.’’

ठीक 2 घंटे के बाद राजेश और सारिका एक होटल के कमरे में थे. सारिका आज कहर ढा रही थी. छोटे कपड़ों में उस के उभार राजेश की हवस बढ़ा देते थे.

सारिका और राजेश दोनों बिस्तर पर थे. सारिका उस की हलके हाथों से मसाज कर रही थी. राजेश जोश में आने लगा था. उस ने सारिका को खींच लिया और उसे कपड़ों से आजाद कर दिया. अब मसाज के बजाय सैक्स का खेल शुरू हो गया.

सारिका जानती थी कि लोहा गरम है. उस ने राजेश का भरपूर साथ दिया और उसे तन और मन से शांत कर दिया.

अब वे दोनों बिस्तर पर लेटे हुए थे. सारिका बोली, ‘‘वैसे, तुम्हारे घर वाले इतने कठोर कैसे हो सकते हैं. तुम अपने नाना की जायदाद के एकलौते वारिस हो, फिर भी वे तुम्हें एकएक पैसे के लिए तरसाते हैं.’’

‘‘यार, मु झे गुस्सा तो बहुत आता है, पर मैं कर भी क्या सकता हूं. नाना ने सारी जायदाद मेरे नाम कर रखी है, फिर भी मेरे परिवार वालों की सख्ती की वजह से मु झे इतनी भी पौकेट मनी नहीं मिलती है कि मैं इस भरी जवानी में ऐश कर सकूं. जब 50 साल का हो जाऊंगा, तब क्या ऐसे पैसे का अचार डालूंगा?’’ राजेश ने सारिका के बालों में हाथ फेरते हुए कहा.

सारिका को लगा कि उस का तीर निशाने पर लगा है. वह राजेश के सीने पर अपना सिर रखते हुए बोली, ‘‘मेरे पास एक आइडिया है. पर तुम्हें अपना हक पाने के लिए थोड़ी मर्दानगी दिखानी होगी. एक बार हमारे रास्ते का कांटा निकल जाए, फिर हम दोनों की जिंदगी में बहार ही बहार होगी.’’

‘‘अच्छा, जरा हमें भी बताओ अपना आइडिया. हम भी तो देखें कि इस खूबसूरत जिस्म वाली लड़की के पास एक तेज दिमाग भी है,’’ राजेश ने सारिका की गरदन पर एक चुम्मा लेते हुए कहा.

‘‘तुम्हें अपने नाना को इस बुढ़ापे की जिंदगी से छुटकारा दिलाना होगा.’’

‘‘मतलब…?’’ राजेश ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘मतलब यह कि उन्हें इस लोक से परलोक भेजना होगा. जैसे ही बूढ़ा इस तन से जुदा होगा, वैसे ही सारी जायदाद पर तुम्हारा कब्जा हो जाएगा,’’ सारिका ने अपने खुराफाती दिमाग से एक आइडिया फेंका.

यह सुन कर राजेश हैरान रह गया और बोला, ‘‘नशे में हो क्या… मतलब, मैं अपने नाना का खून कर दूं… किसी की जान लेना इतना आसान है क्या… अगर पकड़ा गया, तो सारी जिंदगी जेल में बितानी पड़ेगी. फिर तो हो ली ऐश,’’ राजेश ने बिदकते हुए कहा.

‘‘अगर तुम मेरे कहे मुताबिक चलोगे, तो सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी. बस, तुम उस अमीरजादे नाती वाली गलती मत करना, जिस ने जोश में होश खो दिया और अब कानून के शिकंजे में बुरी तरह फंस चुका है,’’ सारिका ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा.

‘‘कौन सा नाती? तुम किस कांड की बात कर रही हो?’’ राकेश ने फटी आंखों से पूछा.

‘‘यार, तुम भी न… दीनदुनिया की कोई खबर रखते भी हो या नहीं… या फिर मोबाइल फोन में केवल रील्स देखते रहते हो…’’

‘‘पहेलियां मत बुझाओ. बताओ कि मामला क्या है,’’ राजेश ने कहा.

‘‘मामला आंध्र प्रदेश के हैदराबाद का है. वहां 29 साल के एक नौजवान ने अपने 86 साल के बिजनैसमैन नाना की 6 फरवरी, 2025 को हत्या कर दी.’’

‘‘ओह, तो तुम चाहती हो कि मैं भी अपने नाना को टपका दूं?’’ राजेश ने सवाल किया.

‘‘यार, तुम मुझे बीच में मत टोको. पहले पूरी खबर तो सुनो,’’ सारिका ने झुंझलाते हुए कहा.

‘‘अच्छा, सुनाओ अपनी खबर,’’ राजेश ने मुंह पर उंगली रखते हुए कहा.

‘‘उस लड़के के बिजनेसमैन नाना वेलामती चंद्रशेखर 500 करोड़ की जायदाद के मालिक थे. नाती का नाम कीर्ति तेजा था और उस ने अपने नाना पर चाकू से 73 से ज्यादा वार किए.

‘‘पर बाद में पुलिस ने आरोपी कीर्ति तेजा को गिरफ्तार कर लिया और बताया कि हत्या की वजह प्रोपर्टी का झगड़ा है.

‘‘पुलिस के मुताबिक, चाकू से वार करते हुए कीर्ति तेजा कहता रहा, ‘आप ने जायदाद का सही बंटवारा नहीं किया. कोई मु झे इज्जत नहीं दे रहा. मु झे मेरा पैसा दो.’

‘‘इतना ही नहीं, पुलिस ने बताया कि नाना वेलामती चंद्रशेखर सोमजीगुड़ा में अपनी बेटी सरोजिनी देवी के साथ रहते थे. सरोजिनी देवी कीर्ति तेजा की मां हैं. 6 फरवरी की शाम को कीर्ति तेजा अपने नाना से मिलने उन के घर पहुंचा था.

‘‘जब सरोजिनी देवी रसोईघर में कौफी लेने गईं, तो कीर्ति तेजा और वेलामती चंद्रशेखर के बीच प्रोपर्टी के बंटवारे को ले कर तीखी बहस शुरू हो गई. गुस्से में कीर्ति तेजा ने चाकू निकाला और अपने नाना पर ताबड़तोड़ वार कर दिए.

‘‘चीखपुकार सुन कर कीर्ति तेजा की मां सरोजिनी देवी ने बीचबचाव करने की कोशिश की, तो कीर्ति तेजा ने उन पर भी 5-6 बार हमला कर दिया, जिस से वे गंभीर रूप से घायल हो गईं.

‘‘सरोजिनी देवी ने 11 बजे अपने भाइयों को फोन कर के बुलाया. जब 12 बजे तक उन के भाई पहुंचे, तब
तक वेलामती चंद्रशेखर की मौत हो चुकी थी.’’

‘‘इस के बाद पुलिस ने कीर्ति तेजा के साथ क्या किया?’’ राजेश ने पूछा.

‘‘पुलिस ने 7 फरवरी को मामला दर्ज कर जांच शुरू की. 8 फरवरी को आरोपी कीर्ति तेजा को गिरफ्तार किया गया. पीडि़त के घर के पास ही पंजगुट्टा फ्लाईओवर के पास से आरोपी की गिरफ्तारी हुई.’’

‘‘कीर्ति तेजा क्या जाहिल लड़का था, जो यह कांड कर दिया? कैसी परवरिश पाई थी उस ने?’’
राजेश ने गंभीर लहजे में पूछा.

‘‘कीर्ति तेजा हाल ही में अमेरिका से मास्टर डिगरी पूरी कर हैदराबाद लौटा था. उस ने पुलिस को बताया कि नाना बचपन से ही उस के प्रति भेदभाव वाला बरताव करते थे और अपनी जायदाद के बंटवारे में उसे हिस्सा नहीं दे रहे थे.’’

‘‘वैसे, वेलामती चंद्रशेखर का क्या इतिहास है?’’ राजेश ने पूछा.

‘‘वेलामती चंद्रशेखर वेलजन ग्रुप औफ इंडस्ट्रीज के मालिक थे. इस की स्थापना साल 1965 में की गई थी. यह कंपनी शिप प्रोडक्शन और उस से जुड़े सभी काम करती है.

‘‘वेलामती चंद्रशेखर की गिनती हैदराबाद के प्रमुख दानदाताओं में होती थी. उन्होंने एलुरु सरकारी अस्पताल में कैंसर और कार्डियोलौजी केंद्र बनवाने के लिए 40 करोड़ रुपए दान किए थे.

‘‘इस के अलावा उन्होंने एलुरु में सर सीआर रेड्डी कालेज को 2 करोड़ रुपए दिए थे. साथ ही, उन्होंने तिरुमला तिरुपति देवस्थानम को 40 करोड़ रुपए दान किए थे.’’

‘‘तो तुम चाहती हो कि मैं भी अपने नाना का खून कर के पुलिस के हत्थे चढ़ जाऊं?’’ राजेश ने बिस्तर से उठते हुए सवाल किया.

‘‘हां, पर ऐसा तरीका अपनाना कि पुलिस को भनक तक न लगे. ऐसा लगे कि तुम्हारे नाना की मौत कुदरती हुई है,’’ सारिका बोली.

‘‘और ऐसा कैसे हो सकता है?’’ राजेश ने सवाल किया.

‘‘तुम अपने नाना को नींद की दवा दे देना और जब वे सो जाएं तो तकिए से उन का दम घोंट देना,’’ सारिका ने अपनी चाल समझाई.

‘‘हम्म, तो यह प्लान है मैडमजी का. इस सब में तुम्हारा क्या फायदा है?’’ राजेश ने पूछा.

‘‘जान, जब तुम्हें पूरी जायदाद मिल जाएगी, तो हम दोनों शादी कर लेंगे और अपने सारे सपने पूरे कर लेंगे,’’ सारिका ने राजेश के गले में अपनी बांहें डालते हुए कहा.

‘‘और अगर मेरा यह प्लान पूरा नहीं हो पाया, तो क्या तब भी तुम मुझ से शादी करोगी?’’ राजेश
ने पूछा.

यह सुन कर सारिका तुनक गई और बोली, ‘‘बिना पैसे के जिंदगी झंड हो जाती है. मु झे तो तुम जैसे अमीरजादे की रानी बन कर रहना है.’’

राजेश ने सारिका की बांहों को झटकते हुए कहा, ‘‘सौरी डार्लिंग, पर मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है. यह सच है कि मु झे अपने नाना की प्रोपर्टी चाहिए, पर उस के लिए मैं किसी के खून से अपने हाथ रंग लूं, इतना घटिया भी नहीं. मैं अपने परिवार से बहुत प्यार करता हूं.’’

यह सुन कर सारिका अपने असली रंग में आ गई और गुस्सा होते हुए बोली, ‘‘मु झे पता था कि तुम डरपोक हो. डरपोक ही नहीं, नामर्द भी हो. जो लड़का अपनी प्रोपर्टी हासिल करने के लिए मर्दानगी नहीं दिखा सकता, वह क्या मेरे नखरे उठाएगा.’’

‘‘ओह, तो यह है तुम्हारा असली रूप… कालेज में सब मु झे कहते थे कि सारिका से दूर रहो, यह पैसे के लिए तुम्हारा बिस्तर गरम करती है, पर आज तो तुम ने साबित भी कर दिया.

‘‘मैं नामर्द ही सही, पर हत्यारा नहीं हूं. निकल जाओ यहां से. कहीं गुस्से में मैं तुम्हारा ही खून न कर दूं,’’ राजेश गुस्से में तमतमाया.

‘‘नामर्द कहीं का…’’ सारिका ने इतना कहा और पैर पटकते हुए कमरे से बाहर जाने लगी.

‘‘और हां, अपने कपड़े लेती जाना. बिना कपड़ों के बाहर जाओगी, तो तुम्हारी प्राइवेट प्रोपर्टी लोगों को दिख जाएगी,’’ राजेश ने कहा और अपने कपड़े पहनने लगा.

Romantic Story : पहली मुलाकात

Romantic Story : रेशमा की जिंदगी एक ढर्रे पर चल रही थी. 30 साल की उम्र तक आतेआते उस ने बहुतकुछ हासिल कर लिया था. एक अच्छी नौकरी, शहर के पौश इलाके में खुद का घर और ढेर सारे दोस्त, लेकिन कहीं न कहीं उस के दिल में एक खालीपन सा था, जिसे वह महसूस तो करती थी, पर उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल था.

एक दिन औफिस से लौटते समय रेशमा को एक किताब की दुकान दिखाई दी. यह एक पुरानी, लेकिन बहुत ही शानदार जगह थी. हमेशा की तरह वह अपनेआप को किताबों के खिंचाव से बचा नहीं पाई और दुकान के भीतर चली गई.

किताबों को देखते हुए रेशमा की नजर एक आदमी पर पड़ी, जो एक किताब में डूबा हुआ था. उस की आंखों में एक अलग ही चमक थी, जैसे वह किताब उस की जिंदगी का सब से खास हिस्सा हो.

रेशमा ने भी एक किताब उठाई और पढ़ने लगी, लेकिन उस का ध्यान उस आदमी की तरफ ही था.

अचानक उस आदमी ने अपनी नजरें उठाईं और रेशमा की नजरों से टकराईं. एक पल के लिए जैसे समय थम सा गया. दोनों के बीच एक अनकहा संवाद हुआ, जिसे किसी ने नहीं सुना, लेकिन दोनों ने महसूस किया.

वह आदमी मुसकराया और रेशमा की तरफ बढ़ा, फिर बोला, ‘‘आप भी किताबों की दीवानी लगती हैं…’’

रेशमा हलका सा हंसी और कहा, ‘‘जी, किताबों में एक अलग ही दुनिया होती है.’’

‘‘मैं अंशु हूं,’’ उस आदमी ने अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा.

‘‘रेशमा,’’ उस ने भी हाथ मिलाते हुए अपना परिचय दिया.

इस के बाद उन दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया. किताबों से ले कर जिंदगी के तजरबों तक, दोनों ने कई मुद्दों पर बात की.

अंशु की बातें रेशमा के दिल को छू गईं. उस में एक खास तरह की सादगी और गहराई थी, जो उसे बहुत अच्छी लगी.

कुछ ही मुलाकातों के बाद रेशमा और अंशु की दोस्ती गहरी होती गई. दोनों के बीच एक अनकहा खिंचाव था, जो उन्हें एकदूसरे के करीब ला रहा था.

एक दिन अंशु ने रेशमा को अपने घर डिनर के लिए न्योता दिया.

रेशमा थोड़ा हिचकिचाई, लेकिन उस ने ‘हां’ कर दी. वह जानती थी कि उस के दिल में कुछ खास हो रहा है और वह इस भावना को और नजरअंदाज नहीं कर सकती थी.

शाम को जब रेशमा अंशु के घर पहुंची, तो उस ने देखा कि अंशु ने घर को बहुत ही खूबसूरती से सजाया था. हलकी रोशनी, मोमबत्तियों की चमक और धीमे म्यूजिक ने माहौल को और भी रोमांटिक बना दिया था.

डिनर के बाद वे दोनों बालकनी में बैठे थे. ठंडी हवा चल रही थी और शहर की रोशनी दूर तक फैली हुई थी.

अंशु ने रेशमा का हाथ थाम लिया और कहा, ‘‘रेशमा, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’

रेशमा ने अंशु की आंखों में देखा. उस के दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं, लेकिन उस ने खुद को संभाला.

‘‘मैं नहीं जानता कि यह सब कैसे हुआ, लेकिन जब से मैं तुम से मिला हूं, तब से मेरी जिंदगी में एक नया रंग आ गया है. तुम्हारे बिना अब कुछ अधूरा सा लगता है.’’

रेश्मा ने हलकी मुसकान के साथ कहा, ‘‘अंशु, मैं भी ऐसा ही महसूस करती हूं, लेकिन यह सब बहुत जल्दी हो रहा है, मुझे थोड़ा समय चाहिए.’’

अंशु ने रेशमा के हाथ को और कस कर पकड़ा और बोला, ‘‘मैं तुम्हारा हर फैसला स्वीकार करूंगा. बस, तुम्हारे साथ रहने का मन करता है.’’

उस पल में उन दोनों के बीच की दूरी खत्म हो गई. अंशु ने रेशमा को अपने करीब खींचा और उस का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया. उन की नजरें एकदूसरे में खो गईं, फिर धीरे से अंशु ने रेशमा के होंठों को अपने होंठों से छू लिया.

वह पल उन दोनों के लिए अनमोल था. रेशमा ने भी अपनी भावनाओं को खुल कर जाहिर किया और दोनों के बीच का वह पहला चुम्मा एक नए रिश्ते की शुरुआत बन गया.

वह रात रेशमा और अंशु के लिए किसी जादुई पल से कम नहीं थी. बालकनी में खड़े हुए, ठंडी हवा और शहर की चमचमाती रोशनी के बीच, दोनों एकदूसरे की बांहों में खो गए थे.

अंशु ने धीरे से रेशमा को और करीब खींचा. उन की सांसें एकदूसरे से टकरा रही थीं और उस पल में रेशमा ने खुद को पूरी तरह अंशु के हवाले कर दिया.

अंशु ने रेशमा की कमर के चारों ओर अपनी बांहें कस दीं और उन के होंठों ने एक बार फिर एकदूसरे को तलाश लिया. इस बार उन के चुम्मे में एक गहराई और एक अनकही चाहत थी.

यह पल रेशमा के लिए एक नया अनुभव था, जो उस के दिल की धड़कनों को तेज कर रहा था. वह किसी सपने की तरह था, जहां सबकुछ इतना सही और खूबसूरत लग रहा था.

अंशु धीरेधीरे रेशमा को कमरे के अंदर ले गया, जहां धीमी रोशनी और म्यूजिक ने माहौल को और भी खास बना दिया था.

रेशमा के दिल में उठ रही भावनाओं को वह शब्दों में बयां नहीं कर पा रही थी, लेकिन उस की आंखें, उस की सांसें और उस की हर छुअन अंशु के लिए काफी थी.

अंशु ने धीरे से रेशमा के बालों को पीछे किया और उस की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे बिना मेरी दुनिया अधूरी है रेशमा. तुम्हारा साथ पा कर मु झे लगता है कि मेरी जिंदगी में सच्चा प्यार आ गया है.’’

रेशमा की आंखों में नमी आ गई. उस ने अंशु के चेहरे को अपने हाथों में थामा और कहा, ‘‘अंशु, तुम ने मेरे दिल के हर कोने को छू लिया है. मैं तुम्हें अपने हर हिस्से में महसूस करती हूं. तुम से मिल कर मु झे सम झ आया कि प्यार क्या होता है.’’

रेशमा ने अंशु के चेहरे को धीरे से चूमा और उस की बांहों में सिमट गई. अंशु ने उसे कस कर अपने सीने से लगा लिया. उन के बीच कोई भी शब्द नहीं था, लेकिन उन की हर छुअन, हर चुम्मा, उन की भावनाओं को गहराई से बयां कर रही थी. उन की धड़कनें एक लय में चल रही थीं, जैसे उन के दिल एक हो गए हों.
धीरेधीरे अंशु ने रेशमा को अपने करीब खींचा और उस के गालों पर अपनी उंगलियों की नरमी महसूस कराते हुए उसे अपने और भी करीब ले आया.

अंशु ने धीरेधीरे अपने होंठों से रेशमा के होंठों को छुआ. वह एक गहरा और प्यारभरा चुम्मा था, जिस में कोई जल्दबाजी नहीं थी, सिर्फ प्यार और एकदूसरे के साथ होने का एहसास था.

उन दोनों के बीच का रोमांच और भी बढ़ता गया. रेशमा ने अंशु की पीठ पर अपनी उंगलियों का दबाव बढ़ा दिया, जबकि अंशु ने उस की नाजुक कलाई को अपने हाथों में थाम लिया. उन के बीच का यह पल उन के रिश्ते को एक नई ऊंचाई पर ले जा रहा था.

धीरेधीरे उन्होंने खुद को बैडरूम की तरफ बढ़ाया. बैडरूम की नरम रोशनी में अंशु ने रेशमा को बैड पर बिठाया और उस के चेहरे पर प्यारभरी निगाह डाली. रेशमा ने भी उसे अपने करीब खींच लिया. उस पल में वे दोनों एकदूसरे के साथ पूरी तरह खो गए थे.

अंशु ने रेशमा की उंगलियों को अपने हाथों में लिया और उस के हाथों पर कोमल चुम्मा लिया. रेशमा के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई. उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं और अंशु ने उस के कंधों से होते हुए धीरेधीरे उस के होंठों को फिर से छू लिया.

रात धीरेधीरे गुजरती रही और रेशमा और अंशु के बीच की नजदीकियां बढ़ती गईं. वे दोनों एकदूसरे के प्यार में पूरी तरह डूब चुके थे.

सुबह की पहली किरणों के साथ रेशमा ने अपनेआप को अंशु की बांहों में पाया. उस की आंखों में एक चमक थी, जैसे उस ने अपनी जिंदगी का सब से बड़ा खजाना पा लिया हो. अंशु भी उसे देख कर मुसकराया और उस के माथे पर एक प्यारा सा चुम्मा दिया.

‘‘रेशमा…’’ अंशु ने धीरे से कहा, ‘‘हमारा रिश्ता इस दुनिया की सब से खूबसूरत चीज है और मैं इसे हमेशा संजो कर रखना चाहता हूं’’

रेशमा ने हलके से मुसकराते हुए कहा, ‘‘अंशु, तुम्हारे साथ बिताया हर पल मेरे लिए अनमोल है. मैं भी तुम्हें अपने दिल के सब से करीब रखना चाहती हूं.’’

इस के बाद रेशमा और अंशु ने एकदूसरे को कस कर गले लगाया. वह सुबह उन के प्यार की एक नई शुरुआत थी, जिस में कोई वादा नहीं था, लेकिन हर पल में एकदूसरे के साथ होने की खुशी थी.

लेखक – सागर यादव ‘जख्मी’

Hindi Story : प्यासा बदन

Hindi Story : काली घटा छाई हुई थी. बारिश ने अपना कहर ढा रखा था. रिहाना अपने दोनों बच्चों को चादर से ढक चुकी थी, क्योंकि ठंडे मौसम की वजह से वे जल्दी सो गए थे.

रिहाना हाल में बैठी टैलीविजन पर एक हिंदी फिल्म देख रही थी, जिस में एक रोमांटिक सीन ने उस के तनबदन में आग लगा दी थी.

यह मौसम तो शौहर की बांहों में लेट कर फिल्म का मजा लेने का था, पर रिहाना का शौहर फरमान तो सऊदी अरब में था. वह वहां किसी नामी कंपनी में इंजीनियर था.

पहले तो फरमान हर 11 महीने में भारत वापस आ जाता था और एक महीना रिहाना के साथ गुजार कर लौट जाता था. पर जैसेजैसे वक्त बीतता गया, उस ने भी आने में कईकई साल लगा दिए थे.

शादी के 4 साल में ही रिहाना 2 बच्चों की मां बन चुकी थी, पर उस का बदन आज भी मर्द की प्यास से अधूरा था.

रिहाना ने अपने शौहर फरमान से कई बार कहा भी था कि अब तो काफी पैसा कमा लिया है, यहीं कोई कामधंधा शुरू कर लो… या जल्दीजल्दी घर आ जाया करो, पर फरमान हर बार यही कह कर टाल जाता था कि कुछ समय के बाद वह भारत में ही शिफ्ट हो जाएगा और अपने बीवीबच्चों के पास ही रहेगा, पर ऐसा हो न सका.

अब रिहाना की उम्र 30 साल के पार हो चुकी थी, पर आज भी वह 20 साल के करीब ही लगती थी. गोरा बदन, बड़ीबड़ी आंखें, सुर्ख गाल और गुलाबी होंठ के साथ ऊंचे उठे उभार उस की खूबसूरती में चार चांद लगा देते थे.

रिहाना जब भी बाजार जाती थी, तो मनचलों की सांसें थम जाती थीं. महल्ले के कई नौजवान उस के पीछे पड़े थे, पर वह किसी को घास नहीं डालती थी. हां, आसपड़ोस के बच्चों को वह बहुत प्यार करती थी.

यही वजह थी कि रिहाना के घर अकसर काफी बच्चे टैलीविजन देखने आ जाते थे, क्योंकि आसपड़ोस में किसी के यहां टैलीविजन नहीं था.

रिहाना उन बच्चों से अकसर घर के साथसाथ बाहर का भी कुछ काम करा लेती थी, जैसे कुछ सामान लाना, रिहाना के छोटे बच्चों को खिलाना. इस से उसे काफी आराम भी मिल जाता था.

बच्चे रिहाना को ‘चाची’ कह कर पुकारते थे और उस के घर हमेशा बच्चों का तांता लगा रहता था.

रिहाना के पड़ोस से असलम अकसर उस के घर टैलीविजन देखने आता था. उस की उम्र 15 साल के आसपास थी. अच्छी कदकाठी के साथसाथ वह देखने में भी हैंडसम था.

तेज आंधी चलने की वजह से बिजली जा चुकी थी. सब बच्चे अपनेअपने घर चले गए थे, पर असलम रिहाना के बच्चों को गोद में ले कर खिला रहा था.

रिहाना रसोईघर में थी कि अचानक तेज हवा के साथ बारिश भी शुरू हो गई.

असलम ने रिहाना के एक बच्चे को गोद में ले रखा था, जिस की उम्र महज 3 साल थी और वह रिहाना को आज कुछ ज्यादा ही परेशान कर रहा था.

कुछ देर तक असलम के साथ खेलतेखेलते दोनों बच्चे सो गए, तो असलम रिहाना से बोला, ‘‘लगता है, आज बारिश नहीं रुकेगी. दोनों बच्चे भी सो गए हैं. मु झे भूख भी लग रही है. मैं अपने घर चला जाता हूं.’’

रिहाना ने कहा, ‘‘तू अभी यहीं रुका रह. बारिश रुकेगी तो चले जाना और खाना यहीं खा ले.’’

असलम ने कहा, ‘‘ठीक है चाची.’’

तभी लाइट आ गई और असलम हाल में जा कर टैलीविजन देखने लगा. अभी भी बारिश नहीं रुकी थी और असलम को तो टैलीविजन देखने का बहुत शौक था. वह कईकई घंटे रिहाना के घर में गुजार देता था.

तभी रिहाना के फोन की घंटी बजी.

उधर से फरमान की आवाज आई, ‘कैसी हो जानू?’

‘‘तड़प रही हूं तुम्हारी याद में… कब आओगे तुम इस प्यासे जिस्म की प्यास बु झाने… अब मुझ से बरदाश्त नहीं होता,’’ रिहाना बोली.

फरमान ने कहा, ‘जानू, मैं जल्दी ही तुम्हारे पास जाऊंगा, फिर कहीं नहीं आऊंगा तुम्हें छोड़ कर.’

रिहाना बोली, ‘‘आऊंगाआऊंगा यही कहतेकहते 3 साल तो हो गए, पर तुम अभी तक नहीं आए.’’

फरमान ने कहा, ‘अब की बार मैं आऊंगा, तो तुम्हारे जिस्म के एकएक अंग को चूमते हुए तुम्हारी सारी प्यास बुझा दूंगा.’

रिहाना ने कहा, ‘क्यों वहां बैठ कर ऐसी बातें कर रहे हो…? क्यों मेरे बदन में शोले भड़का रहे हो…? अभी फोन रखो. तुम तो बातों से ही मेरे प्यासे बदन की प्यास बु झाने का ख्वाब देख रहे हो.’

फरमान ने कहा, ‘ठीक है, तुम सो जाओ. अब मेरा भी दिल तुम से बातें कर के मचल रहा है,’ और उस ने फोन रख दिया.

रिहाना हाल में आ कर सोफे पर बैठ कर बड़े ध्यान टैलीविजन देखने लगी. आज असलम और वह अकेले टैलीविजन देख रहे थे. फिल्म में एक सैक्सी सीन चल रहा था, जिसे देख कर रिहाना के तनबदन में सैक्स की भावना उथलपुथल मचा रही थी.

तभी रिहाना ने असलम से कहा, ‘‘तुम्हें ठंड लग रही होगी. तुम यहां सोफे पर मेरे पास आ कर बैठ जाओ और यह चादर ओढ़ लो.’’

असलम रिहाना के करीब जा कर एक ही चादर में बैठ गया. फिल्म के रोमांटिक सीन ने रिहाना को बेकाबू कर रखा था, तो उस ने अपने बदन को असलम के बदन से सटा दिया और उस का एक हाथ अपने हाथ में पकड़ कर अपने उभारों पर रख दिया.

असलम पहले तो काफी हिचकिचाया, चूंकि वह भी अपनी जवानी की दहलीज पर था, इसलिए उस का बदन भी हरकत करने लगा. उसे शर्म के साथसाथ मजा भी आ रहा था. यही वजह थी कि रिहाना की पहल से उस के अंदर भी हिम्मत आ गई और वह अपना हाथ रिहाना के उभारों पर फेरने लगा.

रिहाना ने फौरन अपनी कमीज उतार दी और असलम के हाथ को अपनी ब्रा के अंदर डाल दिया.

असलम ने हिम्मत कर के रिहाना की ब्रा का हुक खोल दिया. असलम की इस हरकत से रिहाना और मस्त हो उठी. उस ने देखते ही देखते असलम के बदन से उस के कपड़ों को आजाद कर दिया.

असलम अब जोश में आ चुका था. उस ने भी रिहाना के नीचे के हिस्से के कपड़े उतार दिए. अब वे दोनों चादर के अंदर एकदूसरे के बदन को सहलाने लगे.

रिहाना सोफे पर लेट गई, तो असलम ने अपने होंठ उस के होंठों पर रख दिए और चूमने लगा.

रिहाना भी असलम के बदन पर चुम्मों की बौछार करने लगी. वह पूरी तरह मस्त हो उठी थी और असलम को अपने ऊपर खींचने लगी.

कुछ ही देर में रिहाना असलम से बोली, ‘‘अब तुम मु झे वह खुशी भी दे दो, जिस के लिए मैं कई सालों से तड़प रही हूं.’’

असलम रिहाना के बदन पर आ गया और उस पर छाने लगा. बेशक, वह जोश में था, पर उस ने अपना होश नहीं खोया. अब उस ने रिहाना के बेकाबू जिस्म पर कब्जा करना शुरू कर दिया.

रिहाना बोली, ‘‘मैं तो तुम्हें बच्चा सम झ रही थी, पर तुम तो बड़ों के भी बाप निकले.’’

रिहाना असलम से चिपट गई. वह आज भरपूर प्यार पाना चाहती थी. असलम ने उसे निराश नहीं किया. थोड़ी ही देर में रिहाना असलम के सामने ढेर हो गई. उस का बदन अब ढीला पड़ चुका था, पर असलम उसे फिर से जोश में लाना चाहता था.

काफी देर तक असलम रिहाना के बदन को सहलाता रहा. रिहाना फिर से जोश में आ गई.

‘‘अरे बाप रे, जिसे मैं बच्चा सम झ रही थी, उस ने तो मेरे छक्के छुड़ा दिए. कहां से आई तुम्हारे अंदर इतनी ताकत…?’’ हैरानगी से भरी रिहाना ने असलम से पूछा.

असलम ने कहा, ‘‘आप भी बस यों ही घबरा रही हो. मैं कुछ अलग कर रहा हूं क्या…’’

रिहाना बोली, ‘‘तुम ने तो मेरे बदन का जोड़जोड़ ढीला कर दिया है.’’

असलम ने आज पहली बार किसी औरत के साथ सैक्स किया था, जिस का उसे एक नया मजा मिल रहा था.

आज रिहाना के प्यासे बदन की प्यास असलम ने इस शिद्दत से मिटाई कि वह असलम की दीवानी हो गई और बोली, ‘‘तुम्हें किसी भी चीज की जरूरत हो, तो मुझे बता देना.’’

अब रिहाना असलम का खास खयाल रखती थी और उस का जब भी मन करता, असलम से अपने प्यासे बदन की प्यास बुझाती थी.

रिहाना तो अब यही सोचती थी कि उस का शौहर फरमान अब सऊदी अरब में ही रहे, ताकि वह असलम से मनमाना प्यार हासिल करती रहे.

Hindi Story : सौतन बनी सहेली

Hindi Story : ‘‘चंदा, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं और अगर तुम ने मुझ से शादी नहीं की तो मैं जी नहीं सकूंगा,’’ मनोज ने चंदा से कहा.

‘‘पर, मेरे मांबाबूजी तो कभी इस शादी के लिए राजी नहीं होंगे, क्योंकि उन का कहना है कि तू नशा करता है और पूरे गांव में आवारागर्दी करता है,’’ चंदा बोली.

‘‘मैं नशा करता हूं तो तेरी याद में दुखी हो कर करता हूं. अगर आवारागर्दी करता हूं, तो तेरी याद में पागल बन कर… तू मुझे नहीं मिली तो मैं तो दुनिया ही छोड़ जाऊंगा,’’ मनोज ने आंखों में आंसू लाने का नाटक करते हुए कहा.

कुछ इसी तरह की मीठीमीठी बातें कर के मनोज ने चंदा को अपनी बातों में फंसा लिया था और उसे इस बात का भरोसा दिलाया दिया कि दोनों भाग कर शादी कर लेंगे और जब मांबाबूजी का गुस्सा शांत हो जाएगा, तो वापस आ कर माफी मांग लेंगे.

चंदा भी मनोज की बातों में आ गई और एक रात उन दोनों ने गांव से भाग जाने का फैसला किया.

यह कौन सा शहर था, चंदा को नहीं मालूम था. वह तो बस मनोज पर यकीन कर के ही उस के साथ चली आई थी.

चंदा को ले कर मनोज एक बड़े से मकान में पहुंचा. उस कमरे में जरूरत की सारी चीजें पहले से ही मौजूद थीं.

मनोज ने चंदा को बताया कि उन दोनों को आज ही मंदिर में शादी करनी होगी और इस के लिए उसे बाजार जा कर जरूरी सामान लाना होगा.

मनोज के बाहर जाने के बाद चंदा वहीं पड़े एक बिस्तर पर लेट गई और उस की आंख लग गई.

जब थोड़ी देर बाद चंदा की आंख खुली, तो कमरे में मनोज कहीं नहीं दिखाई दिया. कोने में एक आदमी बैठा हुआ था, जो उसे खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था.

एक अजनबी को इस तरह से घूरता हुआ देख कर चंदा घबरा उठी.

‘‘कौन हो तुम? मनोज कहां है?’’ कहते हुए चंदा हकला रही थी.

‘‘मेरा नाम राज है… उस ने कुछ बताया नहीं तुझे क्या?’’ चालबाजी से मुसकराते हुए राज ने पूछा.

‘‘मुझे मेरे पति के पास जाना है,’’ चंदा की घबराहट अब बढ़ने लगी थी.

‘‘अब उसे भूल जा… वह तो तुझे मेरे हाथों बेच गया है… और बदले में 2 लाख रुपए ले कर गया है,’’ राज ने कहा.

राज की बातें सुन कर चंदा चीखने लगी, ‘‘मेरा मनोज कहां है… मुझे वहीं पहुंचा दो.’’

राज इलाके का एक रसूख वाला आदमी था. चंदा का चीखना और रोना सुन कर उस को गुस्सा आ रहा था. वह उठा और चंदा को मारने की गरज से उस ने हाथ उठाया ही था कि तभी कमरे में एक बूढ़ी औरत आई, वे राज की मां थीं, ‘‘अरे राज, तू इसे छोड़ दे… मैं समझाती हूं इसे.

‘‘देख लड़की… अब मेरा बेटा राज ही तेरा पति है और जिसे तू अपना पति कह रही है न, वह आदमी ही तुझे यहां आ कर बेच गया है.’’

बूढ़ी की बात सुन कर चंदा को भरोसा नहीं हो रहा था. वह सहम रही थी.

‘‘अब डरने से काम नहीं चलेगा लड़की… जैसा मैं कहती हूं वैसा करती चल, रानी बन कर राज करेगी यहां पर.’’

थोड़ा रुक कर फिर उस बूढ़ी मां ने बोलना शुरू किया, ‘‘देख, सचाई यह है कि मेरी बहू बच्चा पैदा नहीं कर पा रही है. वह दुष्ट हमारे घर को जायदाद का वारिस नहीं दे पाई है… इसलिए हमें एक ऐसी लड़की की जरूरत थी, जो हमारे ठाकुर खानदान को वारिस दे सके… अब तू आसानी से मान गई तो ठीक… नहीं तो हम मजबूर हो जाएंगे… समझी…

‘‘इस इलाके में औरतों की तादाद मर्दों के मुकाबले वैसे भी बहुत कम है, इसलिए यहां तो केवल मेरा बेटा ही तेरे साथ संबंध बनाएगा और वे सारे सुख देगा, जो ये अपनी असली पत्नी को देता है. तू ने अगर भागने की कोशिश की, तो बाहर कितने लोग तेरा बलात्कार करेंगे… तू गिन भी नहीं पाएगी.’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता… तुम लोग झूठ बोल रहे हो. मुझे मनोज के पास जाना है,’’ चंदा चीख रही थी.

‘‘हां… हां… चली जाना अपने मनोज के पास. एक बात कान खोल कर सुन ले… हमें भी तुम्हारी जरूरत नहीं है… हमें एक लड़का दे दे और फिर चली जाना यहां से,’’ राज गुस्से में बोल रहा था.

उस की बातें सुन कर चंदा कमरे में इधरउधर भागने लगी.

‘‘यह ऐसे नहीं मानेगी राज… ऐसा कर इसे रस्सियों में बांध कर डाल दे… कुछ दिनों में ही इस का दिमाग सही हो जाएगा,’’ बूढ़ी ने कहा.

राज ने एक रस्सी मंगवा कर चंदा को बिस्तर के पाए से बांध कर दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और चंदा को 2 दिन का समय सोचविचार करने के लिए दिया.

चंदा कमरे में बंधी हुई सिसकती रही, उसे क्या पता था कि किसी से प्यार करने की इतनी बड़ी सजा मिलेगी, आज उसे पछतावा हो रहा था.

पूरे 24 घंटे हो चुके थे. चंदा ने कुछ भी नहीं खाया था. अचानक कमरे का दरवाजा खुला, चंदा किसी के आने की बात सोच कर अंदर तक दहल गई थी… उस ने अपनेआप को और भी समेट लिया था.

‘‘सुनो… कुछ खा लो… ऐसे कब तक पड़ी रहोगी,’’ यह एक औरत की आवाज थी. आवाज सुन कर चंदा ने आंखें ऊपर की, तो देखा कि एक खूबसूरत औरत सिर पर पल्ला डाले, हाथों में खाने की थाली लिए उस के सामने खड़ी है. चंदा समझ गई कि ये राज की पत्नी है.

‘‘मेरा नाम मंजुला है और तुम्हें मुझ से डरने की जरूरत नहीं है. हालांकि मेरे आदमी को अपने बस में कर के तुम मेरी सौत बन सकती हो, लेकिन फिर भी मैं तुम्हें खाना खिलाने आई हूं.’’

राज की पत्नी ने चंदा के बंधनों को खोला और चंदा के हाथमुंह को साफ किया.

‘‘ये कुछ कपड़े लाई हूं… चाहो तो नहा कर इन्हें पहन सकती हो और फिर खाना खा लो.’’

‘‘आप मुझे इतना बता दीजिए कि अगर मेरी जगह आप होतीं तो क्या आप खानापीना खा सकती थीं? अगर आप ने किसी से प्यार किया होता और वे आप को धोखा दे दे तो आप को कैसा लगता?’’

‘‘देखो, मैं यहां बरसों से हूं और मैं यहीं कहूंगी कि जो तुम से कहा जा रहा है उसे मान लो, क्योंकि तुम्हारे रोने का कोई भी असर इन पर नहीं होने जा रहा है,’’ मंजुला ने चंदा को समझाते हुए कहा.

पर फिर भी चंदा को मंजुला की बातें समझ नहीं आ रही थीं. उसे तो लग रहा था कि एक बार अगर वह यहां से भागने में कामयाब हो गई, तो सीधा अपने गांव जा कर मांबाबूजी से माफी मांग लेगी.

पर शायद यह सब इतना आसान नहीं होने वाला था, कुछ दिन बीतने के बाद राज की मां फिर से उस कमरे में आईं. उन के साथ में राज भी था.

‘‘सुन लड़की, जा कर नहाधो ले और साजसिंगार भी कर ले. वैसे तू सिंगार नहीं भी करेगी तो भी कोई असर नहीं पड़ने वाला है… और बेटे राज, तू आखिर किस दिन का इंतजार कर रहा है… अब समय आ गया है तुझे अपनी मर्दानगी साबित करनी होगी… दिखा दे दुनिया को, मेरा बेटा राज भी एक बेटा पैदा करने की ताकत रखता है.’’

राज को मानो इसी बात का इंतजार था. चंदा के लाख हाथपैर पटकने के बाद भी राज ने दरवाजा बंद किया और एकएक कर के चंदा के सारे कपड़े उतार फेंके और उस के अनछुए बदन को अपने बदन से रगड़ने लगा और उस का बलात्कार किया.

1-2 बार नहीं, बल्कि पूरे महीने तक, बिना नागा किए हुए राज चंदा के साथ बलात्कार करता रहा.

चंदा रोती रही और बलात्कार का शिकार होती रही, पर उस का रोना सुनने वाला वहां कोई नहीं था.

एक दिन राज की मां चंदा के कमरे में आईं. उन के साथ एक डाक्टर भी थी.

‘‘इसे चैक कर के बताओ कि यह पेट से हुई भी है कि नहीं.’’

डाक्टर अपने काम में लग गई और चंदा के कुछ सैंपल ले कर उन की जांच की. कुछ देर बाद डाक्टर ने चंदा के पेट से होने की सूचना दी.

राज को यह बात पता चली, तो वह खुशी से फूला न समाया. आज उसे अपनी मर्दानगी पर बड़ा घमंड हो रहा था और उस ने मान लिया था कि औरत बदलने से वह बेटे का बाप बन जाएगा.

चंदा पेट से क्या हुई, उस के कमरे में सूखे मेवे, फल का अंबार लगा दिया गया. किसी चीज की कोई कमी नहीं रहने दी गई चंदा के आसपास.

राज और उस की मां रोज आते और चंदा के पेट पर नजर डालते और इशारोंइशारों में ही खुश होते.

एक दिन सुबह से ही चंदा की खूब आवभगत हो रही थी, क्योंकि राज उसे अपने साथ ले कर पास के अस्पताल में ले जा रहा था.

राज वहां जा कर चंदा के पेट में पल रहे भ्रूण के लिंग की जांच कराता और अगर चंदा के पेट में लड़की पल रही होती तो उस का पेट गिरा देता.

अपनी कार में चंदा को ले कर बहुत खुशी के साथ वह अस्पताल पहुंचा था, पर उस की खुशी तब काफूर हो गई जब उसे पता चला कि चंदा के पेट में लड़की पल रही है.

‘‘मेरे तो सारे पैसे बरबाद हो गए, मां, इस औरत के पेट में लड़की पल रही है… लगता है, मेरी किस्मत में ही एक बेटे का सुख नहीं है,’’ रोने लगा था राज.

‘‘अरे, तू चिंता क्यों करता है… इस बार पेट में लड़की आ गई तो क्या… तू फिर से कोशिश कर, थोड़ा और बादाम खिला… और मुझे पोते का मुंह दिखवा दे… अभी भी रास्ता बंद नहीं हुआ है. इसे अस्पताल ले जा और बच्चा गिरवा दे.’’

राज की बीवी मंजुला ने मांबेटे में होने वाली बातें चुपके से सुन ली थीं. उस के कदम चंदा के कमरे की तरफ बढ़ चले.

चंदा कमरे में अपने सिर को पैरों में डाल कर बैठी थी. उस की सूनी आंखों में जीवन खत्म होता हुआ सा दिख रहा था.

मंजुला चंदा के करीब जा कर उसे पुचकारने लगी.

‘‘मुझे इस दर्द में देख कर तुम्हें तो बहुत ही अच्छा लग रहा होगा न, तुम तो ठहरी ठकुराइन, भला तुम मेरे दर्द को क्या समझोगी, आखिरकार तुम कैसी औरत हो?’’ चंदा का दुख अंदर से उमड़ पड़ा रहा था.

‘‘नहीं, मुझे तुम गलत मत समझो… जब भी मैं पेट से होती हूं, ये लोग मैडिकल जांच करा कर पेट में लड़का या लड़की होने का पता लगा लेते हैं. अगर लड़की होती है, तो मेरा बच्चा गिरवा देते हैं. मेरी सास और मेरे पति ने मिल कर मेरा 2 बार बच्चा गिरवाया है. बेटा न पैदा कर पाने के लिए मुझ पर कितना जुल्म ढाया है, इन लोगों ने वह मैं जानती हूं… मैं तो खुद ही अभागी हूं,’’ मंजुला की आंखों में भी नमी थी.

‘‘तो फिर तुम ने आवाज क्यों नहीं उठाई… या फिर तुम ने भागने की कोशिश क्यों नहीं की?’’ चंदा ने पूछा.

‘‘यहां से तो भागना मुमकिन नहीं है, क्योंकि आसपास के इलाके में राज के आदमी फैले हुए हैं, जो उस के इशारे पर कुछ भी कर सकते हैं.

‘‘मैं ने आवाज उठाई, तो मुझ पर कई तरह के जुल्म किए गए… और जब ये लोग मुझे शहर के एक अस्पताल में मेरा पेट गिरवाने ले गए, तब मैं बहाने से वहां के टौयलेट में गई… और मैं भागने की जगह तलाशने लगी… वहां खिड़की में लगे शीशे को सावधानी से हटा कर बाहर का रास्ता मिल सकता था और मैं ने वही किया, पर जैसे ही मैं पास ही बने एक पुलिस चौकी में पहुंचने वाली थी कि मेरे पति राज ने मुझे पकड़ लिया और मारते हुए घर ले आए… तब से ले कर आज तक मैं यहीं कैद हो कर रह गई हूं,’’

सिसकियों में टूट गई थी मंजुला.

चंदा ने उसे पानी पीने को दिया. मंजुला कुछ देर चुप रहने के बाद बोली, ‘‘ये लोग तुम्हें भी अस्पताल ले जा कर तुम्हारा बच्चा गिरवाने की कोशिश करेंगे… मुमकिन है कि यह वही अस्पताल हो, जहां मुझे ले जाया गया था. तुम टौयलेट में जा कर खिड़की के शीशे देखना. अगर तुम्हें लगे कि इन्हें हटा कर भागने में मदद मिल सकती है, तो तुम वहां से भाग जाना… पर मेरी तरह टौयलेट जाने का बहाना मत बनाना नहीं, तो इन्हें शक हो सकता है.

‘‘बेहतर होगा कि तुम किसी और बहाने से ऐसी जगह पहुंचो, जहां से बाहर भाग सको. बस तुम्हारी रिहाई का यही रास्ता है,’’ मंजुला ने चंदा को बताया.

मंजुला गलत नहीं थी. कुछ देर बाद ही राज चंदा को ले कर अस्पताल जाने के लिए रवाना हो गया.

अस्पताल में चंदा का बच्चा गिरवाया जाना था, पर चंदा सावधान थी. उस ने नर्स से उलटी आने की बात कही. नर्स ने उसे बाथरूम दिखा दिया. यह वही अस्पताल था, जहां मंजुला को पहले लाया गया था.

अंदर जा कर चंदा ने देखा कि खिड़की के शीशे को हटा कर भागा जा सकता है, पर ऐसा करने में बेहद सावधानी की जरूरत थी. कांच के टूटने की आवाज सुन कर बाहर बैठे राज को किसी भी तरह का शक हो सकता था, पर अपने ऊपर तरहतरह के जुल्मों की शिकार चंदा कोई भी रिस्क उठाने को तैयार थी.

उस ने शीशे हटा कर खिड़की में इतनी जगह बना ली थी, जिस में से वह बाहर निकल सकती थी. आखिरकार उस की कोशिश कामयाब हुई और खिड़की से बाहर आ कर उस को एक नई ताजगी का अहसास हुआ.

बाहर निकल कर चंदा सीधे पुलिस चौकी पहुंची और राज और उस की मां के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई.

पुलिस राज के घर पहुंची और राज और उस की मां को गिरफ्तार कर लिया.

‘‘पर इंस्पैक्टर साहेब… इस बात का क्या सुबूत है कि मैं ने इस लड़की पर जुल्म किए हैं. इस के पेट में पल रहा मेरा बच्चा ही है,’’ राज तेज आवाज में बोल रहा था.

‘‘मैं देती हूं सुबूत आप को इंस्पैक्टर साहब,’’ मंजुला सामने से आती दिखाई दी. उसे इस रूप में इस तरह से बात करते हुए देख कर राज का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘हां… मैं हूं गवाह… चंदा पर हुए हर जुल्म और सितम का… और न केवल चंदा पर, बल्कि मुझ पर भी इन लोगों ने एक लड़के की चाहत में अनगिनत जुल्म किए हैं… गिरफ्तार कर लीजिए इन को.’’

पुलिस ने राज और उस की मां को गुनाह साबित होने के बाद जेल भेज दिया.

उस के बाद पुलिस ने मनोज की खोज शुरू की और जल्द ही पुलिस ने पाया कि मनोज लड़कियों को अपने प्यार के जाल में फंसा कर भगा कर कहीं और ले जाता और बाद में उन्हें बेचने का काम बड़े पेशेवर ढंग से करता था.

पुलिस ने मनोज को पकड़ कर जेल भेज दिया.

प्यार में एक बार धोखा खाने के बाद चंदा ने फिर कभी किसी दूसरे मर्द पर भरोसा नहीं किया…

हां… मंजुला ने उस की सौतन से उस की सहेली बन कर उस का यकीन जिंदगीभर के लिए हासिल कर लिया था.

Hindi Story : शगुन का नारियल

Hindi Story : ‘‘दिमाग फिर गया है इस लड़की का. अंधी हो रही है उम्र के जोश में. बापदादा की मर्यादा भूल गई. इश्क का भूत न उतार दिया सिर से तो मैं भी बाप नहीं इस का,’’ कहते हुए पंडित जुगलकिशोर के मुंह से थूक उछल रहा था. होंठ गुस्से के मारे सूखे पत्ते से कांप रहे थे.

‘‘उम्र का उफान है. हर दौर में आता है. समय के साथसाथ धीमा पड़ जाएगा. शोर करोगे तो गांव जानेगा. अपनी जांघ उघाड़ने में कोई समझदारी नहीं. मैं समझाऊंगी महिमा को,’’ पंडिताइन बोली.

‘‘तू ने समझाया होता, तो आज यों नाक कटने का दिन न देखना पड़ता. पतंग सी ढीली छोड़ दी लड़की.

अरे, प्यार करना ही था, तो कम से कम जातबिरादरी तो देखी होती. चल पड़ी उस के पीछे जिस की परछाईं भी पड़ जाए तो नहाना पड़े. उस घर में देने से तो अच्छा है कि लड़की को शगुन के नारियल के साथ जमीन में गाड़ दूं,’’ पंडित जुगलकिशोर ने इतना कह कर जमीन पर थूक दिया.

बाप के गुस्से से घबराई महिमा सहमी कबूतरी सी गुदड़ों में दुबकी बैठी थी. आज अपना ही घर उसे लोहे के जाल सा महसूस हो रहा था, जिस में से सिर्फ सांस लेने के लिए हवा आ सकती है.

शगुन के नारियल के साथ जमीन में गाड़ देने की बात सुनते ही महिमा को ‘औनर किलिंग’ के नाम पर कई खबरें याद आने लगीं. उस ने घबरा कर अपनी आंखें बंद कर लीं.

21 साल की उम्र. 5 फुट 7 इंच का निकलता कद. धूप में संवलाया रंग और तेज धार कटार सी मूंछ. पहली बार महिमा ने किशोर को तब देखा था, जब गांव के स्कूल से 12वीं जमात पास कर वह अपना टीसी लेने आया था.

महिमा भी वहां खड़ी अपनी 10वीं जमात की मार्कशीट ले रही थी. आंखें मिलीं और दोनों मुसकरा दिए थे. किशोर झेंप गया, महिमा शरमा गई. तब वह कहां जातपांत के फर्क को समझती थी.

धीरेधीरे बातचीत मुलाकातों में बदलने लगी और आंखों के इशारे शब्दों में ढलने लगे. महक की तरह इश्क भी फिजाओं में घुलने लगा और जबानजबान चर्चा होने लगी.

इस से पहले कि चिनगारी शोला बन कर घर जलाती, किशोर आगे की पढ़ाई के लिए शहर चला गया, इसलिए उन की मुलाकातें कम हो गईं.

इधर महिमा ने 12वीं जमात पास करने के बाद कालेज जाने की जिद की. उधर, किशोर की कालेज की पढ़ाई पूरी होने वाली थी. महिमा होस्टल में रह कर कालेज की पढ़ाई करने लगी और किशोर ग्रेजुएट होने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया.

सही खादपानी मिलते ही दम तोड़ती प्यार की दूब फिर से हरी हो गई. मुलाकातें परवान चढ़ने लगीं. एक दिन गांव के किसी भले आदमी ने दोनों को साथसाथ देख लिया. बस, फिर क्या था तिल का ताड़ बनते कहां देर लगती है.

नमकमिर्च लगी खिचड़ी पंडित जुगलकिशोर के घर तक पहुंचने की ही देर थी कि पंडितजी राशनपानी ले कर किशोर के बाप मदना के दरवाजे पर जा धमके.

‘‘सरकार ने ऊपर चढ़ने की सीढ़ी क्या दे दी, अपनी औकात ही भूल बैठे. आसमान में बसोगे क्या? अरे, चार अक्षर पढ़ने से जाति नहीं बदल जाती. नींव के पत्थर कंगूरे में नहीं लगा करते,’’ और भी न जाने क्याक्या वे मदना को सुनाते, अगर बड़ा बेटा महेश उन्हें जबरदस्ती घसीट कर न ले जाता.

‘‘कमाल करते हो बापू. अरे, यह समय उबलने का नहीं है. जरा सोचो, अगर जातिसूचक गालियां निकालने के केस में अंदर करवा दिया, तो बिना गवाह ही जेल जाओगे. जमानत भी नहीं मिलेगी,’’ महेश ने अपने पिता को समझाया.

पंडित जुगलकिशोर को भी अपनी जल्दबाजी पर पछतावा तो हुआ, लेकिन गुस्सा अभी भी जस का तस बना हुआ था.

‘‘पंचायत बुला कर गांव बदर न करवा दिया तो नाम नहीं,’’ पंडितजी ने बेटे की आड़ में मदना को सुनाया.

पंडित जुगलकिशोर का गांव में बड़ा रुतबा था. मंदिर के पुजारी जो ठहरे. हालांकि अब पुरोहिताई में वह पहले वाली सी बात नहीं रही थी. बस, किसी तरह से दालरोटी चल जाती है, लेकिन कहते हैं न कि शेर भूखा मर जाएगा, लेकिन घास नहीं खाएगा. वही तेवर पंडितजी के भी हैं. चाहे आटे का कनस्तर रोज पैंदा दिखाता हो, लेकिन मजाल है, जो चंदन के टीके में कभी कोई कमी रह जाए.

वह तो पंडिताइन के मायके वाले जरा ठीकठाक कमानेखाने और दानदहेज में भरोसा करने वाले हैं, इसलिए समाज में पंडित जुगलकिशोर की पंडिताई की साख बची हुई है, वरना कभी की पोल चौड़े आ जाती. महिमा की पढ़ाईलिखाई का खर्चा भी उस के मामा यानी पंडिताइन के भाई सालग्राम ही उठा रहे हैं.

कुम्हार का कुम्हारी पर जोर न चले, तो गधे के कान उमेठता है. पंडित जुगलकिशोर ने भी महेश को भेज कर महिमा को शहर से बुलवा कर घर में नजरबंद कर दिया. पति का बिगड़ा मिजाज देख कर पंडिताइन ने अपने भाई को तुरंत आने को कह दिया.

50 साल का सालग्राम कसबे में क्लर्की करता था. सरकारी नौकरी में रहने के चलते राजकाज के तौरतरीके और सरकार की पहुंच समझता था. वह जानता था कि भले ही सरकारी काम सरकसरक कर होते हैं, लेकिन यह सरकार अगर गौर करने लगे तो फिर ऐक्शन लेने में मिनट लगाती है.

गांव से पहले घर में पंचायत बैठी. मामा को देख महिमा के जी को शांति मिली. प्यार मिले न मिले, किस्मत की बात… जान की सलामती तो रहेगी.

एक तरफ पंडित जुगलकिशोर थे, तो वहीं दूसरी तरफ पूरा परिवार, लेकिन अकेले पंडितजी सब पर भारी पड़ रहे थे. रहरह कर दबी हुई स्प्रिंग से उछल रहे थे.

‘‘चौराहे पर बैठा समझ लिया क्या ससुरों ने? अरे, शासन की सीढि़यां चढ़ लीं तो क्या गढ़ जीत लिया? चले हैं हम से रिश्ता जोड़ने… दो निवाले दोनों बखत मिलने क्या लगे तो औकात भूल गए…’’ पंडितजी ने अपने साले को सुनाया.

‘‘समय को समझने की कोशिश करो जीजाजी. अब रजवाड़ों का समय नहीं है. यह लोकतंत्र है. यहां भेड़बकरी एक घाट पर पानी पीते हैं,’’ सालग्राम ने पंडित जुगलकिशोर को समझाया.

‘‘मामा सही कह रहे हैं बापू. जातपांत आजकल पिछड़ी सोच वाली बात हो गई. आप कभी गांव से बाहर गए नहीं न इसलिए आप को अटपटा लग रहा है. शहरों में आजकल दो ही जात होती हैं, अमीर और गरीब,’’ मामा की शह पा कर महेश के मुंह से भी बोल फूटे.

पंडितजी ने उसे खा जाने वाली नजरों से घूरा. महेश सिर नीचा कर के खड़ा हो गया.

‘‘इस बच्चे को क्या आंखें दिखाते हो. सब सही ही तो कह रहे हैं. आप तो रामायण पढ़े हो न… भगवान राम ने केवट और शबरी को कैसा मान दिया था, याद नहीं…?’’ पंडिताइन बातचीत के बीच में कूदीं.

‘‘हां, रामायण पढ़ी है. माना कि समाज में सब का अपना महत्व है, लेकिन पैर की जूती को सिर पर पगड़ी की जगह नहीं पहना जाता,’’ पंडितजी ने पत्नी को घुड़क दिया.

‘‘चलो छोड़ो इस बहस को. बाहर चल कर चाय पी कर आते हैं,’’ सालग्राम ने एक बार के लिए घर की पंचायत बरखास्त कर दी. महिमा की उम्मीदों की कडि़यां जुड़तीजुड़ती बिखर गईं.

‘‘जीजाजी, मैं मानता हूं कि जो संस्कार हमें घुट्टी में पिलाए गए हैं, उन के खिलाफ जाना आसान नहीं है, लेकिन मैं तो सरकारी नौकर हूं और मेरे अफसर यही लोग हैं. हमें तो इन के बुलावे पर जाना भी पड़ता है और इन का परोसा खाना भी पड़ता है. इन्हें भी अपने यहां न्योतना पड़ता है और इन के जूठे कपगिलास भी उठवाने पड़ते हैं.

‘‘अब इस बात को ले कर आप मुझे जात बाहर करो तो बेशक करो,’’ सालग्राम के हरेक शब्द के साथ पंडित जुगलकिशोर की आंखें हैरानी से फैलती जा रही थीं.

‘‘आप छोरी की पढ़ाईलिखाई मत छुड़वाओ. उसे पढ़ने दो. हो सकता है कि वह खुद ही आप के कहे मुताबिक चलने लगे या फिर समय का इंतजार करो. ज्यादा जोरजबरदस्ती से तो गाय भी खूंटा तोड़ कर भाग जाती है,’’ सालग्राम ने कहा.

वे दोनों गांव के बीचोंबीच बनी चाय की थड़ी पर आ कर बैठ गए. लड़का 2 कप चाय रख गया. तभी शोर ने उन का ध्यान खींचा. देखा तो पुलिस की गाड़ी सरपंचजी के घर के सामने आ कर रुकी थी.

2 सिपाही उतर कर हवेली में गए और वापसी में सरपंचजी हाथ जोड़े उन के साथ आते दिखे.

‘‘देखें, क्या मामला है…’’ सालग्राम ने कहा और दोनों जीजासाला तमाशबीन भीड़ का हिस्सा बन गए.

सालग्राम ने पुलिस अफसर की वरदी पर लगी नाम की पट्टी को देखा और जीजा को कुहनी से ठेला मार कर उन का ध्यान उधर दिलाया. नाम पढ़ कर पंडितजी सोच में पड़ गए.

‘‘इन का यह रुतबा है. सरपंच भी हाथ जोड़े खड़ा है,’’ सालग्राम ने कहा, तो पंडित जुगलकिशोर समझने की कोशिश कर रहे थे.

तभी हवेली के भीतर से चायपानी आया और सरपंचजी मनुहार करकर के अफसर को खिलानेपिलाने लगे.

‘रामराम… धर्म भ्रष्ट हो गया…’ पंडितजी कहना चाह कर भी नहीं कह सके. वे साले के साथ चुपचाप वापस लौट आए.

रात को घर की पंचायत में फैसला हुआ कि महिमा की पढ़ाई जारी रखी जाएगी. उसे ऊंचनीच समझ कर मामा के साथ वापस शहर भेज दिया गया.

जब पंडित जुगलकिशोर के घर से इस चर्चा पर विराम लग गया, तो फिर किसी और की हिम्मत भी नहीं हुई बात का बतंगड़ बनाने की.

साल बीततेबीतते महिमा ग्रेजुएट हो गई और अब शहर में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गई.

महेश ने भी शहर के कालेज में भरती ले ली थी. इस बीच न तो महिमा की जबान पर कभी किशोर का नाम आया और न ही बेटे ने कोई चोट देती खबर दी तो पंडितजी ने राहत की सांस ली. उन्हें लगा मानो यह दूध का उफान था, जो अब रूक गया है. लड़की अपना भलाबुरा समझ गई है.

‘‘जीजाजी, सुना आप ने… प्रशासनिक सेवाओं का नतीजा आ गया है. आप के गांव के किशोर का चयन हुआ है,’’ सालग्राम ने घर में घुसते ही कहा.

यह सुनते ही पंडिताइन खिल गईं. पंडितजी के माथे पर बल पड़ गए.

‘‘हुआ होगा.. हमें क्या? बहुत से लोगों के हुए हैं,’’ पंडित जुगलकिशोर ने लापरवाही से कहा.

‘‘बावली बातें मत करो जीजाजी. समय को समझो. जून सुधर जाएगी कुनबे की. अरे, छोरी तो राज करेगी ही, आगे की पीढि़यां भी तर जाएंगी. बच्चों के साथ तो बाप का नाम ही जुड़ेगा न,’’ सालग्राम ने जीजा को समझाया.

‘‘मामा सही कह रहे हैं बापू. जिस की लाठी हो भैंस उस की ही हुआ करे. राज में भागीदारी न हो तो जात का लट्ठ बगल में दबाए घूमते रहना. कोई घास न डालने का,’’ महेश भी मामा के समर्थन में उतर आया था.

‘‘अरे, ये तो छोराछोरी के भले संस्कार हैं जो इज्जत ढकी हुई है, वरना शहर में कोर्टकचहरी कर लेते तो क्या कर लेता कोई? कानून भी उन्हीं का साथ देता,’’ पंडिताइन कहां पीछे रहने वाली थीं.

‘‘लगता है, पूरा कुनबा ही ज्ञानी हो गया, एक मैं ही बोड़म बचा,’’ पंडितजी से कुछ बोलते नहीं बना, तो उन्होंने सब को झिड़क दिया, लेकिन इस झिड़क में उन की झोंप और कुछकुछ सहमति भी झलक रही थी.

मामला पक्ष में जाते देख पंडिताइन झट भीतर से नारियल निकाल कर लाईं और जबरदस्ती पति के हाथ में थमा दिया.

‘‘छोरा गांव आया हुआ है, आज ही रोक लो, वरना गुड़ की खुली भेली पर मक्खियां आते कितनी देर लगती है,’’ पंडिताइन ने सफेद कुरताधोती भी ला कर पलंग पर रख दिए.

पंडितजी कभी अपने कपड़ों को तो कभी सामने रखे मोली बंधे शगुन के नारियल को देख रहे थे. उन्होंने कुरता पहन कर धोती की लांग संवारी और नारियल को लाल गमछे में लपेट कर मदना के घर चल दिए बधाई देने.

Social Story : गांव की गोरियां

Social Story : सोशल मीडिया भी गजब ही है भैया. यहां कबाड़ भरा है तो जुगाड़ भी भरा है. अब टिक टौक और लाइक को ही ले लो. एक अलग ही दुनिया. कुछ सैकंड का धमाल, दुनिया में कर दो कमाल. अब तो बड़ेबड़े नामचीन भी इस के असर से अछूते नहीं हैं. शहर की गोरीचिट्टी छोरियां इंगलिश में गिटपिट बोलें, लड़कों के मजे लें और अपने हुस्न के जलवे बिखेर कर खूब लाइक बटोरें.

पर गांवदेहात की लड़कियों को भी कम मत सम?ाना. टिक टौक और लाइक पर छाई हुई हैं ये कसे बदन की तितलियां. कभी गौर किया है इन बिजली सी चमकती ठेठ गोरियों पर. सपना चौधरी के ‘तेरी आंख्यां का यू काजल…’ गीत पर ठुमके लगा कर सपना चौधरी को ही पानी भरवा दें. सब से बड़ी बात तो यह कि ऐसी लड़कियां ज्यादा अमीर घरों की नहीं होती हैं. उन के कच्चेपक्के घरों, बिना ओट की छतों से अंदाजा लगा सकते हैं कि वे किसी अगड़े समाज से नहीं आती हैं, पर उन में अपना हुनर दिखाने की ललक होती है.

हां, एक बात जरूर है कि कैमरे के सामने आने से पहले वे अपना होमवर्क बड़े अच्छे ढंग से करती हैं. कैसे अपनी फिगर का इस्तेमाल करना है, कैसे कपड़े पहनने हैं कि बदन उतना ही दिखे कि आह निकल जाए. वे मेकअप पर भी खूब ध्यान देती हैं और जो भी पेश करती हैं, उस में उन की मेहनत दिखाई देती है.

इस सब में फिल्मी गानों, संवादों और चुटकुलों का भी बड़ा अहम रोल होता है. देशी बोली के तड़कतेभड़कते गाने और लड़कियों का कूल्हे मटकाना जबरदस्त जुगलबंदी बन जाता है. इस में बहुत सी लड़कियां अपने डांस को और मस्त बनाने के लिए कपड़े भी इतने बदनदिखाऊ पहन लेती हैं कि मनचलों की आहें निकल जाती हैं. फिर कुछ लड़कियां तो एडल्ट चुटकुले भी अपने दिलकश अंदाज में सुना देती हैं.इस से उन के चाहने वालों की लिस्ट लंबी हो जाती है.

सपना चौधरी के गाने पहले सस्ते वीडियो कैसेट पर बजते थे, फिर जब उन की देखादेखी बहुत सी लड़कियों ने ऐसे छोटेछोटे वीडियो बना कर टिक टौक वगैरह पर डालने शुरू कर दिए तो उन के भी फैन बनते चले गए.

हरियाणा की सोनाली फोगाट तो इतनी मशहूर हो गईं कि उन को हरियाणा विधानसभा की टिकट तक मिल गई. उन के वीडियो भी कम दिलचस्प नहीं हैं. पूजा जैन से ढिंचक पूजा बन चुकी यह लड़की अब इंटरनैट की सनसनी है.

Family Story : रामलाल की घर वापसी

Family Story : तकरीबन 7-8 घंटे के सफर के बाद बस ने गांव के बाहर ही उतार दिया था. रामलाल ने कमला को भी अपने साथ बस से उतार लिया था.

‘‘देखो कमला, तुम्हारा पति जब तुम्हारे साथ इतनी मारपीट करता है, तो तुम उस के साथ क्यों रहना चाहती हो?’’

कमला थोड़ी देर तक खामोश बनी रही. उस ने कातर भाव से रामलाल की ओर देखा.

‘‘पर…’’

‘‘परवर कुछ नहीं, तुम मेरे साथ चलो.’’

‘‘तुम्हारे घर के लोग मेरे बारे में पूछेंगे, तो क्या कहोगे?’’

‘‘कह दूंगा कि तुम मेरी घरवाली हो, जल्दबाजी में ब्याह करना पड़ा.’’

कमला कुछ नहीं बोली. दोनों के कदम गांव की ओर बढ़ गए.

रामलाल के सामने पिछले एक महीने में घटी एकएक बात किसी फिल्म की तरह सामने आ रही थी.

रामलाल शहर में मजदूरी करता था. ब्याह नहीं हुआ था, इसलिए जो मजदूरी मिलती उस में उस का खर्च आराम से चल जाता. थोड़ेबहुत पैसे जोड़ कर वह गांव में अपनी मां को भी भेज देता. गांव में एक बहन और मां ही रहते हैं. एक बीघा जमीन है, पर उस से सभी की गुजरबसर होना मुमकिन नहीं था. गांव में मजदूरी मिलना मुश्किल था, इसलिए उसे शहर आना पड़ा.

‘शहर गांव से तो बहुत दूर था, ऊपर उसे कौन रोजरोज गांव आना है…’ सोच कर रामलाल यहीं काम करने भी लगा था. एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया था. एक स्टोव और कुछ बरतन. शाम को जब काम से लौटता तो 2 रोटी बना लेता और खा कर सो जाता. दिनभर का थका होता, इसलिए नींद भी अच्छी आती.

रामलाल ईमानदारी से काम करता था, इस वजह से सेठ भी उस से खुश रहता था. वह अपनी मजदूरी से थोड़े पैसे सेठ के पास ही जमा कर देता.

सालभर हो गया था रामलाल को शहर में रहते हुए. इस एक साल में वह अपने गांव भी नहीं जा पाया था. उस दिन उस ने देर तक काम किया था. वह अपने कमरे पर देर से पहुंचा था. जल्दबाजी में उसे ध्यान ही नहीं रहा कि वह सेठ से कुछ पैसे ले ले. उस ने अपनी जेब टटोली 10 का सिक्का उस के हाथ में आ गया.

‘चलो आज का खर्चा तो चल जाएगा, कल सेठ से पैसे मिल ही जाएंगे.’ रामलाल ने गहरी सांस ली. 2 रोटी बनाई और खा कर सो गया.

सुबह जब रामलाल नहा कर काम पर जाने के लिए निकला, तो पता चला कि पुलिस वाले किसी को घर से निकलने ही नहीं दे रहे हैं. सरकार ने लौकडाउन लगा दिया है. बहुत देर तक तो वह इस का मतलब ही नहीं सम झ पाया. केवल यही सम झ में आया कि वह आज काम पर नहीं जा पाएगा. वह उदास कदमों से अपने कमरे पर लौट आया. मकान मालिक उस के कमरे के सामने ही मिल गया था.

‘देखो रामलाल, महीनेभर का लौकडाउन है. कोई वायरस फैल रहा है. तुम एक काम करो कि जल्दी से जल्दी कमरा खाली कर दो.’

रामलाल वैसे ही लौकडाउन का मतलब नहीं सम झ पाया था, उस पर वायरस की बात तो उसे बिलकुल भी सम झ में नहीं आई.

‘कमरा खाली कर दो… मु झ से कोई गलती हो गई क्या?’

‘नहीं, पर तुम काम पर जा नहीं पाओगे, तो कमरे का किराया कैसे दोगे?’

‘क्या महीनेभर काम बंद रहेगा?’

‘हां, घर से निकलोगे तो पुलिस वाले डंडा मारेंगे.’

रामलाल के सामने अंधेरा छाने लगा. उस के पास तो केवल 10 का सिक्का ही है. वह कुछ नहीं बोला, उदास कदमों से अपने कमरे में आ कर जमीन पर बिछी दरी पर लेट गया.

जब रामलाल की नींद खुली तब तक शाम का अंधेरा फैलने लगा था. उस ने बाहर निकल कर देखा. बाहर सुनसान था. उसे पैसों की चिंता सता रही थी अगर वह कल ही सेठ से पैसे ले लेता तो कम से कम खाने का जुगाड़ तो हो जाता.

अगर वह सेठ के पास चला जाए तो सेठ उसे पैसे जरूर दे सकते हैं. उस ने कमरे से फिर बाहर की ओर झांका. बहुत सारे पुलिस वाले खड़े थे. उस की हिम्मत बाहर निकलने की नहीं हुई. वह फिर से दरी पर लेट गया. उस की नींद जब खुली, उस समय रात के 2 बज रहे थे. भूख के चलते उस के पेट में दर्द सा हो रहा था.

वह उठा और स्टोव जला लिया, पर आटा रखने वाले डब्बे को खोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी. वह जानता था कि उस में थोड़ा सा ही आटा बचा है. अगर अभी रोटी बना ली तो कल के लिए कुछ नहीं बचेगा. उस ने निराशा के साथ डब्बा खोला और सारे आटे को थाली में डाल लिया. 2 छोटीछोटी रोटियां ही बन पाईं. एक रोटी खा ली और दूसरी रोटी को डब्बे में रख दिया.

सुबह हो गई थी. रामलाल ने बाहर झांक कर देखा. पुलिस कहीं दिखाई नहीं दी. वह कमरे से बाहर निकल आया. उस के कदम सेठ के घर की ओर बढ़ लिए.

सेठ का घर बहुत दूर था. छिपतेछिपाते वह उन के घर के सामने पहुंच गया था. दिन पूरा निकल आया था. यह सोच कर कि सेठ जाग गए होंगे, उस के हाथ बाहर लगी घंटी पर पहुंच गए थे. उन के नौकर ने दरवाजा खोला था.

‘जी मैं रामलाल हूं, सेठजी के यहां ठेके पर काम करता हूं.’

‘हां तो…’

‘मुझे कुछ पैसे चाहिए.’

‘हां तो ठेके पर जाना वहीं मिलेंगे. सेठजी घर पर नौकरों से नहीं मिलते.’

‘पर, वह लौकडाउन लग गया है, न तो काम तो महीनेभर बंद रहेगा.’

‘तभी आना…’

‘तुम एक बार उन से बोलो तो सही, वे मु झे बहुत चाहते हैं.’

‘अच्छा रुको, मैं पूछता हूं,’ नौकर को शायद दया आ गई थी उस पर.

नौकर के साथ सेठ भी बाहर आ गए थे. उन के चेहरे पर झुं झलाहट के भाव साफ झलक रहे थे, जिन्हें रामलाल नहीं पढ़ पाया.

सेठजी को देखते ही उस ने झुक कर पैर पड़ने चाहे थे, पर सेठ ने उसे दूर से ही झटक दिया.

‘अब तुम्हारी इतनी हिम्मत हो गई कि घर चले आए…’

‘सेठजी कल आप से पैसे ले नहीं पाया था. मेरे पास बिलकुल भी पैसे नहीं हैं, ऊपर से लौकडाउन हो गया है. इसलिए आना पड़ा,’ रामलाल ने सकपकाते हुए कहा.

‘चल यहां से… बड़ा पैसे लेने आया है. मैं घर पर लेनदेन नहीं करता.’

सेठ ने उसे गुस्साई निगाहों से घूरा तो रामलाल घबरा गया. उस ने सेठजी के पैर पकड़ लिए, ‘मेरे पास बिलकुल भी पैसे नहीं हैं. थोड़े से पैसे मिल जाते हुजूर.’

सेठ उसे ठोकर मारते हुए अंदर चले गए. हक्काबक्का रामलाल थोड़ी देर तक वहीं खड़ा रहा. उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. तभी पुलिस की गाडि़यों के आने की आवाज गूंजने लगी. वह डर गया और भागने लगा. छिपतेछिपाते वह अपने कमरे के नजदीक तक तो पहुंच गया, पर यहीं गली में उसे पुलिस वालों ने पकड़ लिया. वह कुछ बोल पाता, इस के पहले ही उस के ऊपर डंडे बरसाए जाने लगे थे.

रामलाल दर्द से कराह उठा. पुलिस वालों ने गंदीगंदी गालियां देनी शुरू कर दी थीं. तभी एक मोटरसाइकिल पर सवार कुछ नौजवान आ कर रुक गए. उन्होंने पुलिस वालों से कुछ बात की. पुलिस ने उन्हें जाने दिया. रामलाल भी इसी का फायदा उठा कर वहां से खिसक लिया. वह हांफते हुए अपने कमरे
की दरी पर लेट गया. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे, जिन्हें पोंछने वाला कोई नहीं था. उसे अपनी मां की याद सताने लगी.

मां की याद आते ही उस के आंसुओं की रफ्तार बढ़ गई थी. रोतेरोते वह सो गया था. दोपहर का समय ही रहता होगा, जब उस की आंख खुली. उस का सारा बदन दुख रहा था. पुलिस वालों ने उसे बेदर्दी से मारा था. वह कराहता हुआ उठा. बहुत जोर की भूख लगी थी. वह जानता था कि डब्बे में अभी एक रोटी रखी हुई है.

सूखी और कड़ी रोटी खाने में समय लगा. वह अब क्या करे? उस के सामने अनेक सवाल थे. मकान मालिक ने दरवाजा भी नहीं खटखटाया था, सीधे अंदर घुस आया था, ‘तुम कमरा कब खाली कर रहे हो?
वह सकपका गया.

‘मैं इस समय कहां जाऊंगा, आप कुछ दिन रुक जाओ, माहौल शांत हो जाने दो, ताकि मैं दूसरा कमरा ढूंढ़ सकूं.’

रामलाल हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया था.

‘नहीं, माहौल तो मालूम नहीं कब ठीक होगा. तुम तो कमरा कल तक खाली कर दो… नहीं तो मु झे जबरदस्ती करनी पड़ेगी,’ कहता हुआ वह चला गया.

रामलाल को सम झ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. वह चुपचाप बैठा रहा. अभी तो उसे शाम के खाने की भी फिक्र थी.

सूरज ढलने को था. रामलाल अभी भी वैसे ही बैठा था, खामोश. और वह करता भी क्या? उस ने कमरे का दरवाजा जरा सा खोल कर देखा. बाहर पुलिस नहीं थी. वह बाहर निकल आया. थोड़ी दूर पर उसे कुछ भीड़ दिखाई दी.

वह लड़खड़ाते हुए वहां पहुंच गया. कुछ लोग खाने का पैकेट बांट रहे थे. वह भी लाइन में लग गया. हर पैकेट को देते हुए वो फोटो खींच रहे थे, इसलिए समय लग रहा था. उस का नंबर आया. एक आदमी ने उस के हाथ में खाने का पैकेट रखा, साथ में और लोग भी उस के चारों ओर खड़े हो गए. कैमरे का फ्लैश चमकने लगा. फोटो खिंचवा कर वे लोग जा चुके थे.

रामलाल भी अपने कमरे की ओर लौट पड़ा, ‘चलो, आज के खाने का इंतजाम तो हो गया. इसी में से कुछ बचा लेंगे तो सुबह खा लेंगे.’

उसे बहुत जोरों से भूख लगी थी, इसलिए कमरे में आते ही उस ने पैकेट खोल लिया था. पैकेट में केवल 2 मोटी सी पूरी थी और जरा सी सब्जी. सब्जी बदबू मार रही थी, शायद वह खराब हो गई थी.

हक्काबक्का रामलाल पूरी को कुछ देर तक यों ही देखता रहा, फिर उस ने मोटी पूरी को चबाना शुरू कर दिया. दरी पर लेट कर वह भविष्य के बारे में सोचने लगा. वह अब क्या करे. कमरा भी खाली करना है.

अपने गांव भी नहीं लौट सकता, क्योंकि ट्रेनें और बसें बंद हो चुकी हैं, पैसे भी नहीं हैं. रामलाल समझ नहीं पा रहा था कि वह करे तो क्या करे.

रामलाल ने सुबह ही पता लगा लिया था कि सरकार की ओर से खाने का इंतजाम किया गया है, इसलिए वह ढ़ूंढ़ते हुए यहां आ गया था. उस के जैसे यहां बहुत सारे लोग लाइन में लगे थे. वे लोग भी मजदूरी करने दूसरी जगह से आए थे. यहीं उस की मुलाकात मदन से हुई थी, जो उस के पास वाले जिले का था. उस से ही उसे पता चला कि बहुत सारे मजदूर शाम को पैदल ही अपने अपनेअपने गांव लौट रहे हैं. मदन भी उन के साथ जा रहा है.

रामलाल को लगा कि यही अच्छा मौका है. उसे भी इन के साथ गांव चले जाना चाहिए. पर क्या इतनी दूर पैदल चल पाएगा? पर, अब उस के पास कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं. अगर मकान मालिक ने जबरन उसे कमरे से निकाल दिया तो वह क्या करेगा. गहरी सांस ले कर उस ने सभी के साथ गांव लौटने का मन बना लिया.

शाम को वह अपना सामान बोरे में भर कर तय जगह पर पहुंच गया, जहां मदन उस का इंतजार कर रहा था. सैकड़ों की तादाद में उस के जैसे लोग थे, जो अपनाअपना सामान सिर पर रख कर पैदल चल रहे थे. इन में बच्चे भी थे और औरतें भी.

रात का अंधकार फैलता जा रहा था, पर चलने वालों के कदम नहीं रुक रहे थे. कुछ अखबार वाले और कैमरा वाले सैकड़ों की इस भीड़ का फोटो खींच रहे थे. इसी वजह से पुलिस वालों ने उन्हें घेर लिया था. वे गालियां बक रहे थे और लौट जाने को कह रहे थे. भीड़ उन की बात सुन नहीं रही थी. पुलिस ने जबरन उन्हें रोक लिया था.

‘आप सभी की जांच की जाएगी और रुकने का इंतजाम किया जाएगा, कोई आगे नहीं बढ़ेगा,’ लाउडस्पीकर से बोला जा रहा था.

सारे लोग रुक गए थे. एकएक कर सभी की जांच की गई. फिर सभी को इकट्ठा कर आग बु झाने वाली मशीन से दवा छिड़क दी गई. दवा की बूंदें पड़ते ही रामलाल की आंखों में जलन होने लगी थी. मदन भी आंख बंद किए

कराह रहा था. और भी लोगों को परेशानी हो रही थी, पर कोई सुनने को तैयार ही नहीं था.

दवा छिड़कने वाले कर्मचारी उलटासीधा बोल रहे थे. सारे लोगों को एक स्कूल में रोक दिया गया था. सैकड़ों लोग और कमरे कम. बिछाने के लिए केवल दरी थी. पानी के लिए हैंडपंप था. औरतों के लिए ज्यादा परेशानी थी. 2 रोटी और अचार खाने को दे दिया गया था.

‘हरामखोरों ने परेशान कर दिया,’ बड़बड़ाता हुआ एक कर्मचारी जैसे ही निकला, एक औरत ने उसे रोक लिया, ‘क्या बोला… हरामखोर… अरे, हम तो अच्छेभले जा रहे थे, हमें जबरन रोक लिया और अब गाली दे रहे हैं.’

उस औरत की आवाज सुन कर और भी लोग इकट्ठा हो गए थे.

‘भूखों को जमाई जैसी सुविधाएं चाहिए…’ वह फिर बड़बड़या.

‘रोकने का इंतजाम नहीं था तो क्यों रोका… 2 सूखी रोटी दे कर अहसान जता रहे हैं,’ किसी ने जोर से बोला था, ताकि सभी सुन लें. पर, साहब को यह पसंद नहीं आया. उन्होंने हाथ में डंडा उठा लिया था, ‘कौन बोला… जरा सामने तो आओ… यहां मेरी बेटी की बरात लग रही है क्या… जो तुम्हें छप्पन व्यंजन बनवा कर खिलवाएं.’

सारे सकपका गए. वे सम झ चुके थे कि उन्हें कुछ दिन ऐसे ही काटने पड़ेंगे. छोटे से कमरे में बहुत सारे लोग जैसेतैसे रात को सो लेते और दिन में बाहर बैठे रहते. बाथरूम तक का इंतजाम नहीं था. औरतें बहुत परेशान हो रहीं थीं.

कोई नेताजी आए थे उन से मिलने. वहां के कर्मचारियों ने पहले ही बता दिया था कि कोई नेताजी से शिकायत नहीं करेगा, इसलिए बाकी सारे लोग तो खामोश रहे, पर एक बूढ़ी औरत खामोश नहीं रह पाई.

जैसे ही नेताजी ने मुसकराते हुए पूछा, ‘कैसे हो आप लोग… हम ने आप के लिए बहुत सारा इंतजाम किया है उम्मीद है कि आप अच्छे से होंगे.’

बुजुर्ग औरत यह सुन कर भड़क गई, ‘दो सूखी रोटी और सड़ी दाल दे कर अहसान जता रहे हो.’

किसी को उम्मीद नहीं थी. सभी लोग सकपका गए. एक कर्मचारी उस औरत की ओर दौड़ा, पर वह खामोश नहीं हुई, ‘हुजूर, यहां कोई इंतजाम नहीं है. हम लोग एक कमरे में भेड़बकरियों की तरह रह रहे हैं.’

नेताजी कुछ नहीं बोले. वे लौट चुके थे. उन के जाने के बाद सारे लोगों पर कहर टूट पड़ा था.

फिर सरकार ने बस भिजवाई थी, ताकि सभी लोग अपनेअपने गांव लौट सकें. मदन और रामलाल एक ही बस में बैठ रहे थे, तभी किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई दी थी.

रामलाल उधर पहुंच गया था. एक आदमी एक औरत के बाल पकड़ कर पीठ पर मुक्के मार रहा था. वह औरत दर्द से बिलबिला रही थी.

‘इसे क्यों मार रहे हो भाई?’ रामलाल से सहन नहीं हो रहा था.

‘तू बीच में मत पड़. यह मेरी घरवाली है. सम झ गया तू,’ उस ने अकड़ कर कहा.

‘घरवाली है तो ऐसे मारोगे.’

‘तुझे क्या, जा अपना काम कर.’

रामलाल का खून खौलने लगा था, ‘पर बता तो सही, इस ने किया क्या है?’

‘यह औरत मनहूस है. इस के चलते ही मैं परेशान हो रहा हूं,’ कहते हुए उस ने जोर से औरत के बाल खींचे. वह दर्द से रो पड़ी. रामलाल सहन नहीं कर सका. उस ने औरत का हाथ पकड़ा और अपनी बस में ले आया.

‘तुम मेरे साथ बैठो. देखता हूं, कौन माई का लाल है, जो तुम्हें हाथ लगाएगा?’

औरत बहुत देर तक सुबकती रही थी. उस ने अपना नाम कमला बताया था. उस ने तो केवल यह सोचा था कि उस के आदमी का गुस्सा जब शांत हो जाएगा, तो वह ही उसे ले जाएगा. पर, वह उसे लेने नहीं आया.

‘अच्छा ही हुआ. उस ने इस की जिंदगी खराब कर रखी थी, पर अब यह जाएगी कहां?’ सवाल तो रामलाल के मन में था, पर जवाब उस के पास नहीं था. बस से उतर कर उस ने उसे साथ ले जाने का फैसला कर लिया था.

रामलाल के साथ कमला भी सोचती हुई कदम बढ़ा रही थी. उसे नहीं मालूम था कि उस का भविष्य क्या है, पर रामलाल उसे अच्छा लगा था. वह जिन यातनाओं से हो कर गुजरी है, शायद उसे उन से छुटकारा मिल जाए.

मां बाहर आंगन में बैठी ही मिल गई थीं.

रामलाल उन से लिपट पड़ा, ‘‘मां…’’ उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. रो तो मां भी रही थी, जब से लौकडाउन लगा था, तब से ही मां उस के लिए बेचैन थीं. उन्होंने उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया था. दोनों रो रहे थे, कमला चुपचाप मां बेटे को रोता हुआ देख रही थी.

अपने आंसू पोछ कर उस ने कमला की ओर इशारा किया. ‘‘मां, आप की बहू…’’

यह सुन कर चौंक गईं मां, ‘‘बहू… तू ने बगैर मु झ से पूछे ब्याह रचा लिया…?’’

‘‘मां, मजबूरी थी, लौकडाउन के चलते… गांव आना था इसे कहां छोड़ता… बेसहारा है न मां.’’

मां ने नजर भर कर कमला को देखा.

‘‘चल, अच्छा किया.’’ कह कर मां ने कमला का माथा चूम लिया.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें