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मेहमान : कर्ज में डूबा मुकेश

बड़ी कड़की के दिन थे. महीने की 20 तारीख आतेआते मुकेश की पगार के रुपए उड़नछू हो गए थे और मुसीबत यह कि पिछले महीने की उधारी भी नहीं निबटी थी. हिसाब साफ होता तो आटा, दाल, चावल, तेल तो उधार मिल ही जाता, सब्जी वगैरह की देखी जाती. बालों में कड़वा तेल ही लगा लिया जाता, चाय काली ही चल जाती, दूध वाला पिछले महीने से ही मुंह फुलाए बैठा है. मुसीबत पर मुसीबत.

मुकेश तो सब बातों से बेखबर लेनदारों के मारे जो सवेरे 8 बजे घर से निकलता तो रात के 11 बजे से पहले आने का नाम ही न लेता. झेलना तो सब शुभा को पड़ता था. कभी टैलीविजन की किस्त, तो कभी लाला के तकाजे.

दूध वाला तो जैसे धरने पर ही बैठ गया था. बड़ी मुश्किल से अगले दिन पर टाला था. वह जातेजाते बड़बड़ा रहा था, ‘‘बड़े रईसजादे बनते हैं. फोकट

का दूध बड़ा अच्छा लगता है. पराया पैसा बाप का पैसा समझते हैं. मुफ्तखोर कहीं के…’’

शुभा आगे न सुन सकी थी. सुबह से ही सोचने लगी थी कि आज दूध वाला जरूर ही आएगा. क्या बहाना बनाया जाएगा? यह सोच कर उस ने बड़ी बेटी सुधा को तैयार किया कि कह देना घर में मेहमान आए हैं, मेहमानों की नजर में तो हमें न गिराइए.’’

यह कह कर सुधा को मुसकराने की हिदायत भी शुभा ने दे दी थी. उस के मोती जैसे दांतों की मुसकान कुछ न कुछ रियायत करवा देगी, शुभा को ऐसा यकीन था. लाला के आने के बारे में उस ने खुद को तसल्ली दी कि उसे तो वह खुद ही टरका देगी.

यह सोचने के साथ ही शुभा ने आईना ले कर अपना चेहरा देखा. बालों की सफेद हो आई लटों को बड़ी होशियारी से काली लटों में दबाया और होंठों पर मुसकान लाने की कोशिश करने लगी. उसे लगा जैसे अभी इस उम्र में भी वह काफी खूबसूरत है और बूढ़े रंडुए लाला के दिल की डोर आसानी से पहली तारीख तक नचा सकती है.

पर दूसरे ही पल शुभा को अपने इस नीच खयाल पर शर्मिंदगी महसूस हुई. देहात के चौधरी, जिन की भैंसें 10-10 लिटर दूध देती हैं, जहां अन्न के भंडार भरे रहते हैं, जिन की बात पर लोग जान देने को तैयार रहते हैं, क्या उन की बेटी को अपनी मुसकान का सौदा कर के रसद का जुगाड़ करना होगा?

शुभा उस घड़ी को कोसने लगी, जब नौकरीपेशा मुकेश के साथ भारी दानदहेज दे कर उस का ब्याह कर बापू ने अपनी समझ में जंग जीत ली थी. शुरू के कुछ सालों तक वह भी खुश रही, पर जब एक के बाद एक 3 बेटियां हो गईं और पगार कम पड़ने लगी, तो उसे बड़ा अटपटा लगा. जिन चीजों को गांव में गैरजरूरी समझा जाता था, यहां उन्हें लेना मजबूरी बन गया.

शुभा एकदम चौंकी. वह कहां बेकार के खयालों में फंस गई थी. जमाना इतना आगे निकल चुका है और वह मुसकरा कर किसी को देख लेने में भी गलती समझती है. अगर किसी की ओर मुसकरा कर देख लेने से तकलीफ दूर होती हो तो इस में क्या हर्ज है? फिर इस के अलावा उस के पास चारा भी क्या है?

मुकेश को तो इन पचड़ों में पड़ना ही नहीं है. वह पड़े भी तो कैसे? सारी तनख्वाह पत्नी को दे कर जो उसी के दिए पैसों से अपना काम चलाए, उस से शुभा शिकवा भी कैसे करे? कोई उपजाऊ नौकरी पर तो वह है नहीं. शुभा के कहने से ही जाने कितनी बार दफ्तर से कर्ज ले चुका है. सब काटछांट के बाद जो पगार बचती है, वह गुजरबसर लायक नहीं रह जाती. अब उसी को कोई रास्ता ढूंढ़ना होगा.

शुभा ने बड़े प्यार से बेटी सुधा को पुचकार कर उस की कंघी कर दी और याद दिलाया कि वह दूधिए के आने पर क्या कहेगी. उस ने यह भी कहा, ‘‘क्या मातमी सूरत बना रखी है. जब देखो, मुंह लटकाए रहती हो? मुसकराते चेहरे का अपना असर होता है. कई बार जो काम सिफारिशें नहीं कर पाती हैं, वह एक मुसकान से हो जाता है.’’

सुधा की समझ में नहीं आ रहा था कि मां क्या कह रही हैं. रोज तो तनिक हंसी पर नाक चढ़ा लेती थीं, आज उसे हंसने की याद दिला रही हैं. वह सोच ही रही थी कि तभी नीचे से दूधिए की आवाज आई, ‘‘है कोई घर में कि सब बाहर गए हैं? जब देखो बाहर… मर्द बाहर जाता है, तो क्या सारा घर उठा कर साथ ले जाता है?’’

दूधिए का भाषण चालू हुआ ही था कि सुधा होंठों पर उंगली रखे अपनी मां को खामोश रहने का इशारा करते हुए आंखों में ही मुसकराती अंदर से आ गई. दूधिए को दरवाजे के अंदर से टका सा जवाब पाने की उम्मीद थी. इस तरह सुधा के आ जाने पर वह कुछ नरम पड़ गया.

दूधिया कुछ कहना चाहता था कि सुधा बोली, ‘‘चाचा, आज मेहमान आए हुए हैं. आप भी चलिए न ऊपर चाय पी लीजिए. खैर यह हुई कि मेहमान सो रहे हैं, नहीं तो हमारी गरदन ही कट जाती शर्म से,’’ उस के चेहरे पर एक शोख मुसकराहट थी.

हालांकि मां ने मुसकराने भर को ही कहा था, दूधिए को ऊपर लाने को नहीं. पर वह हड़बड़ी में कह गई. दूधिया भी मुसकान बिखेरती छरहरी सुधा के साथ ही ऊपर चढ़ आया. जो पड़ोसी झगड़ा सुनने के लिए दरवाजों के बाहर निकल आए थे, वे बड़े निराश हुए.

पंखे की हवा में दूधिया सपनों की दुनिया में तैरने लगा. सुधा और शुभा अपनी कामयाबी पर खुश थीं.

शुभा को आज सुधा पर बहुत दुलार आ रहा था. दूधिए के सामने वाली कुरसी पर बैठ कर वह बोली, ‘‘देख ले बेटी, दूध भी है या चाचा को काली चाय ही पिलाएगी? न हो तो गणेशी की दुकान से दूध ले आ.’’

‘‘नहींनहीं, इस की कोई जरूरत नहीं है. पतीला दे दीजिए, मैं दूध लिए आता हूं,’’ दूधिया, जो कुछ पल पहले तमतमा रहा था, पालतू जानवर की तरह इशारा समझने लगा था.

नीचे जा कर दूधिया एक खालिस दूध ले आया. शुद्ध दूध वाले डब्बे से. ऐसा दूध तो शुभा को उस ने कभी दिया ही नहीं था.

ज्यादा खालिस दूध की चाय पीते समय शुभा स्वाद से चटखारे ले रही थी. तो सुधा अपनी मां की नजर बचा कर दूधिए की तरफ देख कर मुसकरा देती थी.

दूसरी बच्चियां भी पास ही बैठीं चाय का स्वाद ले रही थीं. अचानक शुभा बोली, ‘‘क्या कहें भैया, आप का पिछला रुपया तो दे नहीं पाए, एक लिटर और चढ़ गया. अब की पगार मिलेगी तो जल्दी निबटा देंगे.

‘‘इस बार तंगी में काली चाय पीतेपीते परेशान हो गए हैं,’’ कहतेकहते वह हंस पड़ी, जैसे काली चाय पीना भी खुशी की बात हो.

‘‘यह लो, आप काली चाय पी रही थीं? हमें क्यों नहीं बताया? हम कोई गैर हैं क्या? रुपयों की आप फिक्र न कीजिए, कल से मैं दूध देने खुद ही आ जाया करूंगा,’’ दूधिया का दिल बीन पर नाचने वाले सांप की तरह झूम रहा था.

दूधिया जाने को उठा तो शुभा ने कहा, ‘‘ऐसी भी क्या जल्दी है? हां, याद आया, तुम्हारा दूध बांटने का समय बीत रहा होगा. जा बेटी, चाचा को नीचे तक छोड़ आ,’’ शुभा ने सुधा की ओर देख कर हौले से मुसकरा कर कहा.

सुधा ने जाते समय दूधिए की तरफ मुसकरा कर देखा और कहा, ‘‘चाचा, कल थोड़ा फुरसत से आना.’’

दूधिया साइकिल पर बैठा तो उसे लगा जैसे उस के पैरों में पंख लग चुके हैं. उस ने 2 बार पीछे मुड़ कर देखा, दरवाजे पर खड़ी सुधा हाथ हिला कर उसे विदा कर रही थी. सुधा के चेहरे पर मुसकान थी, दूधिए के चेहरे पर वहां से जाने का दर्द.

बच्चियां चाय पी कर बहुत खुश थीं. 2-3 दिन में ही बिना दूध की चाय ने जीभ का स्वाद ही छीन लिया था. दूधिए के जाने के बाद उन्होंने रूखी रोटियां भी चाय के साथ शामिल कर लीं. इस से अच्छा रोटी निगलने का साधन घर में था ही नहीं और अब तो रोटियों का जुगाड़ भी बंद होने को था.

शाम का अंधेरा गली में फैलने लगा था और सामने के खंभे में लगा बल्ब फ्यूज हो गया था. शुभा इस अंधेरे में खुश ही थी, क्योंकि लाला अकसर रात 9 बजे के आसपास दुकान बंद कर के ही उस का दरवाजा खटखटाता था.

लाला हैरान रहता था कि 9 बजे भी मुकेश कभी घर पर नहीं मिला. अब वह बिला नागा वसूली के लिए आने लगा था. सोचता, कितने दिन भागोगे बच्चू, दुकानदारी इसलिए तो नहीं है कि सौदा लुटाया जाए.

शुभा उस से कई बार कह चुकी थी कि वे लोग कहीं भागे नहीं जा रहे हैं. वह नया सौदा देता जाए, पुराना और नया हिसाब एकदम चुकता कर दिया जाएगा. लेकिन लाला ने एक नहीं सुनी थी. वह दहाड़ा था, ‘‘जब पुराना हिसाब नहीं चुका सकते, तो नया क्या खाक चुकाओगे?’’

शुभा जानती थी कि लाला अपनी तोंद पर धोती की फेंट सही करता हुआ कुछ देर के बाद आने ही वाला है. पर वह 7 बजे ही आ कर दरवाजा खटखटाने लगा. उस ने सोचा था कि मुकेश 9 बजे तक खापी कर टहलने निकल जाता होगा, इसलिए उस के पहले ही पहुंचना ठीक रहेगा. रुपए न दिए तो ऐसी खरीखरी सुनाऊंगा कि कान बंद कर लेगा बच्चू. ऐसे मौकों पर दरवाजा ही बंद रहता था और ऊपर से कोई बच्ची कह देती थी, ‘‘पिताजी घर में नहीं हैं.’’

तब लाला चीख उठता था, ‘‘पिताजी जाएं जहन्नुम में, मेरा पैसा मुझे अभी चाहिए.’’

पर इस के आगे लाला बेबस हो जाता था, क्योंकि ऊपर से झांकने वाली बच्ची तब तक गायब हो चुकी होती. लिहाजा, वह भुनभुनाता हुआ लौट जाता. लेकिन अब वह इन्हें इतने सस्ते में छोड़ने को तैयार नहीं था.

उधर अब की बार कमान सुधा के बजाय उस की मां ने संभाली. मुसकराने की कोशिश करते हुए वह दरवाजे तक गई, फिर लाला को गुस्से में देख कर बोली, ‘‘सेठजी, मेहमान आए हुए हैं. मेहरबानी कर के कुछ कहिएगा नहीं, इज्जत का सवाल है.’’

मीठी मुसकान के साथ मीठी बोली सुन कर सेठ कुछ नरम पड़ गया.

धोती की फेंट से वह मुंह का पसीना पोंछने लगा. अपनी कंजी आंखों से वह शुभा को घूरता हुआ बोला, ‘‘ठीक है, फिर कब आऊं यही बता दो?’’

‘‘चाहे जब आइए, घर आप का है और अभी जाने की इतनी जल्दी भी क्या है. दुकान के काम से दिनभर के थकेमांदे होंगे. एक प्याला चाय पी लीजिए, फिर जाइएगा,’’ शुभा मुसकराई. उस की आंखों में भी बुलावा था. सेठ में इतनी हिम्मत नहीं थी कि ऐसे प्यार भरे बुलावे को ठुकरा सकता.

सेठ पंखे के नीचे बैठ गया. जीना चढ़ने से हांफ गया था. उस की तोंद ऊपरनीचे हो रही थी, जिस को काबू में करने की कोशिश में वह दम साध रहा था कि सुधा ने मुसकरा कर पानी का गिलास सामने रख दिया.

एक घूंट में गिलास का पानी गटक कर सेठ कमरे की सजावट देखने लगा. 5 मिनट में चाय हाजिर थी. इस बार शुभा ने सामने की कुरसी पर बैठतेहुए चाय पीना शुरू किया तो पढ़ने का वास्ता दे कर लड़कियां कमरे से बाहर हो गईं.

चाय के साथसाथ शुभा के गुदाज जिस्म पर नजर गड़ा कर बैठे सेठ को लगा कि वह एक अरसे से ऐसे प्यार भरे माहौल के लिए तरस गया है. दिनरात बैल की तरह खटो, फिर भी बहुएं रोटी के साथ जलीकटी बातें परोसने से बाज नहीं आतीं. एक यह है जो कुछ भी नहीं लगती, लेकिन अपनेपन का झरना बहा रही है.

बातों ही बातों में समय की रफ्तार का उसे तब पता चला, जब एक घंटा बीत गया. न चाहते हुए भी सेठ उठ कर बोला, ‘‘अच्छा शुभाजी… अब चलूंगा. तनख्वाह तक रुपए मिल सकें तो ठीक है, न मिल सकें तो ज्यादा परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है. फिर देखा जाएगा.’’

‘‘मैं तो चाहती थी कि आप खाना खा कर जाते. देख सुधा, आटे के कनस्तर में कुछ है? न हो तो बाजार से दौड़ कर आटा ले आ. चाचा पहली दफा यहां आए हैं, क्या भूखा भेजेगी?’’ शुभा मुसकरा कर अंगड़ाई लेते हुए बोली.

‘‘क्या आटा तक घर में नहीं है? मैं कोई पराया हूं, जो मुझे नहीं बताया. मैं जानता हूं, महीने के आखिरी दिन ऐसे ही कड़की के होते हैं. खैर, आज तो मैं नहीं खाऊंगा. हां, थोड़ी देर में मेरा नौकर सामान दे जाएगा. जब जरूरत हो, बता दिया करना,’’ कहते हुए लाला उठ खड़ा हुआ.

इस बार सुधा बोली, ‘‘हाय मां, चाचाजी जा रहे हैं. कम से कम दरवाजे तक इन्हें छोड़ तो आइए.’’

शुभा लाला को दरवाजे तक छोड़ने गई. उस ने हंस कर लाला से कहा, ‘‘फिर आइएगा कभी, आज तो आप की कोई सेवा न कर सकी.’’

लाला जातेजाते मुड़ कर देखता गया. शुभा दरवाजे पर खड़ी उसे देख रही थी. लाला की धोती कई बार पैरों में फंसने को हुई.

थोड़ी ही देर में लाला का नौकर आटा, दाल, चावल के साथ रिफांइड तेल और सब्जी भी दे गया था.

मुकेश के आने में अभी देर थी. रसोई में पकवानों की खुशबू बच्चियों के पेट की भूख और बढ़ा रही थी. यह सारा महाभोज उन की नजर में नकारा बाप को और भी नकारा कर गया था, मां का वजन उस की निगाहों में कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था.

सब से छोटी बेटी तो हैरानी से पूछ ही बैठी, ‘‘मां, कहां आज रोटी का जुगाड़ भी नहीं था और कहां इतनी सारी अच्छीअच्छी खाने की चीजें तैयार हो गईं. यह सब कैसे हो गया?’’

‘‘बेटी, सब वक्त की मेहरबानी है. जिस घर में मेहमान आते रहते हैं, उस घर में बरकत रहती है. बड़े अच्छे लोग होते हैं, जिन के घर मेहमान आते हैं,’’ शुभा ने मासूम बच्चियों को समझाया.

दूसरी बच्ची बोली, ‘‘मां, चाय और खानेपीने का सामान देने वाले मेहमानों के अलावा नोट देने वाले, कपड़े देने वाले और सुंदरसुंदर खिलौने देने वाले मेहमान क्या हमारे घर कभी नहीं आएंगे?’’

बच्ची को तसल्ली देते हुए शुभा बोली, ‘‘आएंगे बेटी, नोटों वाले मेहमान भी आएंगे. तुम अपने पिता से कहना कि अपने दोस्तों को भी कभीकभी घर लाया करें. क्या पता, उन्हीं के आने से रुपएपैसे भी मिलने लगें.’’

वैसे, बच्ची के मासूम सवाल पर शुभा का गला भर आया था. फिर आंसू छिपाने के लिए वह खिड़की की तरफ चली गई.

मुकेश के आने में अभी देर थी. दरवाजे के पास एक शराबी मदहोशी में लड़खड़ा रहा था. उस की जेब में नोटों की गड्डी झांक रही थी.

शुभा को लगा, अब बच्ची की चाह पूरी होने को है. उस ने झांक कर गली के दोनों छोरों की ओर देखा. अंधेरे में दूरदूर तक किसी आदमी की परछाईं भी नहीं थी. उस के चेहरे पर दिनभर की कामयाबी को याद कर एक मुसकान छा गई. अब वह जीना उतर कर नीचे जाने को तैयार थी.

अपना कौन: मधुलिका आंटी का अपनापन

मम्मीपापा अचानक ही देहरादून छोड़ कर दिल्ली आ बसे. यहां का स्कूल और सहेलियां कशिश को बहुत पसंद आईं. देहरादून पिछली कक्षा की किताबों की तरह पीछे छूट गया. बस, मधुलिका आंटी की याद गाहेबगाहे आ जाती थी.

‘‘देहरादून से सभी लोग आप से मिलने आते हैं. बस, मधुलिका आंटी नहीं आतीं,’’ कशिश ने एक रोज हसरत से कहा.

‘‘मधुलिका आंटी डाक्टर हैं और देवेन अंकल वकील. दोनों ही अपनी प्रैक्टिस छोड़़ कर कैसे आ सकते हैं?’’ मां ने बताया.

मां और भी कुछ कहना चाह रही थीं लेकिन उस से पहले ही पापा ने कशिश को पानी पिलाने को कहा. वह पानी ले कर आई तो सुना कि पापा कह रहे थे, ‘कशिश की यह बात तुम मधु को कभी मत बताना.’

कशिश को समझ में नहीं आया कि इस में न बताने वाली क्या बात थी.

जल्दी ही उम्र का वह दौर शुरू हो गया जिस में किसी को खुद की ही खबर नहीं रहती तो मधु आंटी को कौन याद करता.

मम्मीपापा न जाने कैसे उस के मन की बात समझ लेते थे और उस के कुछ कहने से पहले ही उस की मनपसंद चीज उसे मिल जाती थी. उस की सहेलियां उस की तकदीर से रश्क किया करतीं. कशिश का मेडिकल कालिज में अंतिम वर्ष था. मम्मीपापा दोनों चाहते थे कि वह अच्छे नंबरों से पास हो. वह भी जीजान से पढ़ाई में जुटी हुई थी कि दादी के मरने की खबर मिली. दादादादी अपने सब से छोटे बेटे सुहास और बहू दीपा के साथ चंडीगढ़ में रहते थे. पापा के अन्य भाईबहन भी वहां पहुंच चुके थे. घर में काफी भीड़ थी. दादी के अंतिम संस्कार के बाद दादाजी ने कहा, ‘‘शांति बेटी, तुम्हारी मां के जो जेवर हैं, मैं चाहता हूं कि वह तुम सब आपस में बांट लो. तू सब से बड़ी है इसलिए सब के जाने से पहले तू बराबर का बंटवारा कर दे.’’

रात को जब कशिश दादाजी के लिए दूध ले कर गई तो दरवाजे के बाहर ही अपना नाम सुन कर ठिठक गई. दादाजी शांति बूआ से पूछ रहे थे, ‘‘तुझे कशिश से चिढ़ क्यों है. वह तो बहुत सलीके वाली और प्यारी बच्ची है.’’

‘‘मैं कशिश में कोई कमी नहीं निकाल रही पिताजी. मैं तो बस, यही कह रही हूं कि मां के गहने हमारी पुश्तैनी धरोहर हैं जो सिर्फ  मां के अपने बच्चों को मिलने चाहिए, किसी दूसरे की औलाद को नहीं. मां के जो भी जेवर अभी विभा भाभी को मिलेंगे वह देरसवेर देंगी तो कशिश को ही, यह नहीं होना चाहिए.’’ शांति बूआ समझाने के स्वर में बोलीं.

कशिश इस के आगे कुछ नहीं सुन सकी. ‘दूसरे की औलाद’ शब्द हथौड़े की तरह उस के दिलोदिमाग पर प्रहार कर रहा था. उस ने चुपचाप लौट कर दूध का गिलास नौकर के हाथ दादाजी को भिजवा दिया और सोचने लगी कि वह किसी दूसरे यानी किस की औलाद है.

दूसरी जगह और इतने लोगों के बीच मम्मीपापा से कुछ पूछना तो मुनासिब नहीं था. तभी दीपा चाची उसे ढूंढ़ती हुई आईं और बरामदे में पड़ी कुरसी पर निढाल सी लेटी कशिश को देख कर बोलीं, ‘‘थक गई न. जा, सो जा अब.’’

तभी कशिश के दिमाग में बिजली सी कौंधी. क्यों न दीपा चाची से पूछा जाए. दोनों की उम्र में ज्यादा फर्क न होने के कारण उस की दीपा चाची से बहुत बनती थी और पिछले 3-4 रोज से एकसाथ काम करते हुए दोनों में दोस्ती सी हो गई थी.

‘‘आप से कुछ पूछना है चाची, बताएंगी ?’’ उस ने निवेदन करने के अंदाज में कहा.

‘‘जरूर,’’ दीपा ने प्यार से उस का सिर सहलाया.

‘‘मैं कौन हूं?’’

कशिश के इस प्रश्न से दीपा चौंक पड़ी फिर संभल कर बोली, ‘‘मेरी प्यारी भतीजी, कशिश.’’

‘‘मगर मैं आप की असली भतीजी तो नहीं हूं न, क्योंकि मैं डा. विकास और डा. विभा की नहीं किसी दूसरे की औलाद…’’

‘‘यह तू क्या कह रही है?’’ दीपा ने बात काटी.

‘‘जो भी कह रही हूं  चाची, सही कह रही हूं’’ और कशिश ने शांति बूआ और दादाजी के बीच हुई बातचीत दोहरा दी.

दीपा झल्ला कर बोली, ‘‘तुम्हारी शांति बूआ को भी बगैर बवाल मचाए खाना नहीं पचता…’’

‘‘उन्होंने कोई बवाल नहीं मचाया, चाची, सिर्फ सचाई बताई है पर अगर आप मुझे यह नहीं बताएंगी कि मैं किस की औलाद हूं तो बवाल मच सकता है.’’

‘‘मैं जो बताऊंगी उस पर तू यकीन करेगी?’’

अगर यकीन नहीं करना होता तो आप से पूछती ही क्यों? असलियत जानने के बाद मैं मम्मीपापा से कुछ नहीं पूछूंगी और कम से कम यहां तो कतई नहीं.

‘‘कभी भी और कहीं भी नहीं पूछना बेटे, वरना वे बहुत दुखी होंगे कि शायद उन की परवरिश में ही कोई कमी रह गई. तुम डा. मधुलिका और देंवेंद्र नाथ वर्मा की बेटी हो. विभा भाभी और मधुलिका बचपन की सहेलियां हैं. यह स्पष्ट होने पर कि बचपन में हुई किसी दुर्घटना के चलते विभा भाभी कभी मां नहीं बन सकतीं, मधुलिका ने उन की गोद में तुम्हें डाल दिया था. विभा भाभी और विकास भाई साहब ने तुम्हें शायद ही कभी शिकायत का मौका दिया हो.’’

कशिश ने सहमति में सिर हिलाया.

‘‘मम्मीपापा से मुझे कोई शिकायत नहीं है लेकिन मधु आंटी ने मुझे क्यों और कैसे दे दिया?’’

‘‘दोस्ती की खातिर.’’

‘‘दोस्ती ममता से ज्यादा…’’

तभी अंदर से बहुत उत्तेजित स्वर सुनाई देने लगे. सब से ऊंचा स्वर विकास का था.

‘‘मेरे लिए मेरे जीवन की सब से अमूल्य निधि मेरी बेटी है, जिस के लिए मैं देहरादून से सरकारी नौकरी छोड़ कर चला आया. उस के लिए क्या चंद गहने नहीं छोड़ सकता? मैं कल सवेरे यानी आप के बंटवारे से पहले ही यहां से चला जाऊंगा’’

‘‘लेकिन मां की उठावनी?’’ शांति बूआ ने पूछा.

‘‘उस के लिए आप सब हैं न. मां की अंत समय में सेवा कर ली, मेरे लिए यही बहुत है,’’ विकास ने कड़वे स्वर में कहा, ‘‘जो लोग मेरी बेटी को पराया समझते हों उन के साथ रहना मुझे गवारा नहीं है.’’

दीपा ने कशिश की ओर देखा और उस ने चुपचाप सिर झुका लिया.

‘‘यह अब नहीं रुकेगा. रोक कर शांति तुम बात मत बढ़ाओ,’’ दादाजी का स्वर उभरा. उसी समय विकास कशिश को पुकारता हुआ वहां आया और उसे इस तरह बांहों में भर कर अपने कमरे में ले गया जैसे कोई कशिश को उस से छीन न ले, ‘‘कल हम दिल्ली लौट रहे हैं कशिश, सो अब तुम सो जाओ. सुबह जल्दी उठना होगा,’’ विकास ने कहा.

‘‘जी, पापा,’’ कशिश ने कहा और चुपचाप बिस्तर पर लेट गई. विकास ने बत्ती बुझा दी.

‘‘विकास,’’ कुछ देर के बाद विभा का स्वर उभरा, ‘‘मुझे लगता है इस तरह लौट कर तुम सब की भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हो.’’

‘‘शांति बहनजी ने जिस बेदर्दी से मेरी भावनाओं को कुचला है न उस के मुकाबले में मेरी ठेस तो बहुत मामूली है,’’ विकास ने तल्खी से कहा, ‘‘जो भी मेरी बेटी को नकारेगा उसे मैं कदापि स्वीकार नहीं करूंगा… चाहे वह कोई भी हो… यहां तक कि तुम भी.’’

अगली सुबह उन्हें विदा करने को केवल दादाजी, सुहास और दीपा ही थे और सब शायद अप्रिय स्थिति से बचने के लिए नींद का बहाना कर के उठे ही नहीं.

घर आ कर विभा और विकास अपने काम में व्यस्त हो गए और कशिश पढ़ाईर् में. हालांकि कशिश को लग रहा था कि चंडीगढ़ से लौटने के बाद पापा उसे ले कर कुछ ज्यादा ही पजेसिव हो गए हैं लेकिन वह अपने असली मातापिता से मिलने और यह जानने को बेचैन थी कि उन्होंने उसे अपनी गोद से उठा कर दूसरे की गोद में क्यों डाल दिया? उस ने मम्मी की डायरी में से मधुलिका मौसी का फोन नंबर और पता तो नोट कर लिया था मगर वह खत या फोन के जरिए नहीं, स्वयं मिल कर यह बात पूछना चाहती थी.

परीक्षा सिर पर थी और पढ़ाई में दिल नहीं लग रहा था. कशिश यही सोचती रहती थी कि क्या बहाना बना कर देहरादून जाए. समीरा उस की खास सहेली थी. उस से कशिश की बेचैनी छिप नहीं सकी. उस के पूछने पर कशिश को बताना ही पड़ा.

‘‘समझ में नहीं आ रहा कि देहरादून किस बहाने से जाऊं.’’

‘‘तू भी अजब भुलक्कड़ है. कई बार तो बता चुकी हूं कि सालाना परीक्षा खत्म होते ही मेरे बड़े भाई की शादी है और बरात देहरादून जाएगी. मैं तुझे बरात में ले चलती हूं. वहां जा कर तू जहां कहेगी तुझे पहुंचवाने का इंतजाम करवा दूंगी. सो अब सारी चिंता छोड़ कर पढ़ाई कर.’’

समीरा की बात से कशिश को कुछ राहत मिली. और फिर शाम को समीरा उस के मम्मीपापा से मिल कर बरात में चलने की स्वीकृति लेने उस के घर आ गई.

‘‘बरात में जाने के बारे में सोचने के बजाय फिलहाल तो तुम दोनों पढ़ाई में ध्यान लगाओ,’’ पापा ने समीरा की बात सुन कर बड़े प्यार से दोनों का सिर सहलाया.

‘‘अंतिम साल की परीक्षा है. इस के नतीजे पर तुम्हारा पूरा भविष्य निर्भर करता है. कशिश को तो मैं कार्डियोलोजी में महारत हासिल करने के लिए अमेरिका भेज रहा हूं. तुम्हारा क्या इरादा है, समीरा?’’

‘‘अगर मैं भी कार्डियोलोजिस्ट बन गई अंकल, तो मुझ में और कशिश में दोस्ती के  बजाय स्पर्धा हो जाएगी और हमारी दोस्ती खत्म हो ऐसा रिस्क मुझे नहीं लेना है. सो कुछ और सोचना पडे़गा मगर सोचने को फिलहाल आप ने मना कर दिया है,’’ समीरा हंसी.

समीरा को विदा कर के कशिश जब अंदर आई तो उस ने अपने पापा को यह कहते सुना, ‘‘मैं नहीं चाहता विभा कि कशिश देहरादून जाए और मधुदेवेन से मिले. इसलिए समीरा के भाई की शादी से पहले ही कशिश को ले कर कहीं और घूमने चलते हैं.’’

‘‘कैसे जाओगे विकास? इस बार आई.एम.ए. का वार्षिक अधिवेशन तुम्हारी अध्यक्षता में होगा और वह उन्हीं दिनों में है.’’

कशिश लपक कर कमरे में आई और कहने लगी, ‘‘मेरी एक बात मानेंगी, मम्मा? आप प्लीज, मधु मौसी को मेरे देहरादून आने के बारे में कुछ मत बताना क्योंकि मैं शादी की रौनक छोड़ कर उन से मिलने नहीं जाने वाली.’’

पापा के चेहरे पर यह सुन कर राहत के भाव उभरे थे.

‘‘ठीक कहती हो. अपनी सहेलियों को छोड़ कर मां की सहेली के साथ बोर होने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘थैंक यू, पापा,’’ कह कर कशिश बाहर आ कर दरवाजे के पास खड़ी हो गई.

पापा, मम्मी से कह रहे थे कि अच्छा है, कशिश उन दिनों शादी में जा रही है क्योंकि हम दोनों तो अधिवेशन की तैयारी में व्यस्त हो जाएंगे और यह घर पर बोर होती रहने से बच जाएगी. इस तरह समस्या हल होते ही कशिश जीजान से पढ़ाई में जुट गई.

देहरादून स्टेशन पर बरात का स्वागत करने वालों में कई महिलाएं भी थीं. लड़की के पिता सब का एकदूसरे से परिचय करवा रहे थे. एक अत्यंत चुस्तदुरुस्त, सौम्य महिला का परिचय करवाते हुए उन्होंने कहा, ‘‘यह डा. मधुलिका हैं. कहने को तो हमारी फैमिली डाक्टर और पड़ोसिन हैं लेकिन हमारे परिवार की ही एक सदस्य हैं. हमारे से ज्यादा शादी की धूमधाम इन की कोठी में है क्योंकि सभी मेहमान वहीं ठहरे हुए हैं.’’

कशिश को यकीन नहीं हो रहा था कि उस का काम इतनी आसानी से हो जाएगा. उस ने आगे बढ़ कर मधुलिका को अपना परिचय दिया. मधुलिका ने उसे खुशी से गले से लगाया और पूछा कि विभा क्यों नहीं आई?

‘‘आंटी, मम्मीपापा आजकल एक अधिवेशन में भाग ले रहे हैं. मैं भी इस बरात में महज आप से मिलने आई हूं,’’ कशिश ने बिना किसी हिचक के कहा, ‘‘मुझे आप से अकेले में बात करनी है.’’

मधुलिका चौंक पड़ी फिर संभल कर बोली, ‘‘अभी तो एकांत मिलना मुश्किल है. रात को बरात की खातिरदारी से समय निकाल कर तुम्हें अपने घर ले चलूंगी.’’

‘‘उस में तो बहुत देर है, उस से पहले ही घर ले चलिए न,’’ कशिश ने मनुहार की.

‘‘अच्छा, दोपहर को क्लिनिक से लौटते हुए ले जाऊंगी.’’

दोपहर को मधुलिका ने खुद आने के बजाय उसे लाने के लिए अपनी गाड़ी भेज दी. वह अपने क्लिनिक में उस का इंतजार कर रही थी.

‘‘तुम अकेले में मुझ से बात करना चाहती हो, जो फिलहाल घर पर मुमकिन नहीं  है. बताओ क्या बात है?’’ मधुलिका मुसकराई.

‘‘मैं यह जानना चाहती हूं कि आप ने मुझे क्यों नकारा, क्यों मुझे दूसरों को पालने के लिए दे दिया? मां, मुझे मालूम हो चुका है कि मैं आप की बेटी हूं,’’ और कशिश ने चंडीगढ़ वाला किस्सा उन्हें सुना दिया.

‘‘विभा और विकास ने तुम्हें क्या वजह बताई?’’ मधुलिका ने पूछा.

‘‘उन्हें मैं ने बताया ही नहीं कि मुझे सचाई पता चल गई है. वह दोनों मुझे इतना ज्यादा प्यार करते हैं कि  मैं कभी सपने में भी उन से कोई अप्रिय बात पूछ कर उन्हें दुखी नहीं कंरूगी.’’

‘‘यानी कि तुम्हें विभा और विकास से कोई शिकायत नहीं है?’’

‘‘कतई नहीं. लेकिन आप से है. आप ने क्यों मुझे अपने से अलग किया?’’

‘‘कमाल है, बजाय मेरा शुक्रिया अदा करने के कि तुम्हें इतने अच्छे मम्मीपापा दिए, तुम शिकायत कर रही हो?’’

‘‘सवाल अच्छेबुरे का नहीं बल्कि उन्हें दिया क्यों, यह है?’’

‘‘मान गए भई, पली चाहे कहीं भी हो, रहीं वकील की बेटी,’’ मधुलिका ने बात हंसी में टालनी चाही.

‘‘मगर वकील की बेटी को डाक्टर की बेटी कहलवाने की क्या मजबूरी थी?’’

‘‘मजबूरी कुछ नहीं थी बस, दोस्ती थी. विभा मां नहीं बन सकती थी और अनाथालय से किसी अनजान बच्चे को अपनाने में दोनों हिचक रहे थे. बेटे और बेटी के जन्म के बाद मेरा परिवार तो पूरा हो चुका था. सो जब तुम होने वाली थीं तो हम लोगों ने फैसला किया कि चाहे लड़का हो या लड़की यह बच्चा हम विभा और विकास को दे देंगे. ऐसा कर के मैं नहीं सोचती कि मैं ने तुम्हारे साथ कोई अन्याय किया है.’’

‘‘अन्याय तो खैर किया ही है. पहले तो सब ठीक था मगर असलियत जानने के बाद मुझे अपने असली मातापिता का प्यार चाहिए…’’

तभी कुछ खटका हुआ और एक प्रौढ़ पुरुष ने कमरे में प्रवेश किया. मधुलिका चौंक ०पड़ी.

‘‘आप इस समय यहां?’’

‘‘कोर्ट से लौट रहा था तो बाहर तुम्हारी गाड़ी देख कर देखने चला आया कि खैरियत तो है.’’

‘‘ऋचा की बरात में कशिश भी आई है. मुझ से अकेले में बात करना चाह रही थी, सो यहां बुलवा लिया,’’ मधुलिका ने कहा और कशिश की ओर मुड़ी,‘‘यह तुम्हारे देवेन अंकल हैं.’’

‘‘अंकल क्यों, पापा कहिए न?’’ कशिश नमस्ते कर के देवेन की ओर बढ़ी लेकिन देवेन उस की अवहेलना कर के मधुलिका के जांच कक्ष में

जाते हुए कड़े स्वर में बोले, ‘‘इधर आओ, मधु.’’

मधुलिका सहमे स्वर में कशिश को रुकने को कह कर परदे के पीछे चली गई.

‘‘यह सब क्या है, मधु? मैं ने तुम्हें कितना समझाया था कि अपने बेटेबेटी का प्यार और हक बांटने के लिए मुझे तीसरी औलाद नहीं चाहिए, तुम गर्भपात करवाओ. मगर तुम नहीं मानीं और इसे अपनी सहेली के लिए पैदा किया. खैर, उन के दिल्ली जाने के बाद मैं ने चैन की सांस ली थी मगर यह फिर टपक पड़ी मुझे पापा कहने, हमारे सुखी परिवार में सेंध लगाने के लिए. साफ कहे दे रहा हूं मधु, मेरे लिए यह अनचाही औलाद है. न मैं स्वयं इस का अस्तित्व स्वीकार करूंगा न अपने बच्चों…’’

कशिश आगे और नहीं सुन सकी. उस ने फौरन बाहर आ कर एक रिकशा रोका. अब उसे दिल्ली जाने का इंतजार था, जहां उस के मम्मीपापा व्यस्तता के बावजूद उस के बगैर बेहाल होंगे. प्यार जन्म से नहीं होता है. प्यार तो प्यार करने वालों से होता है और जो प्यार उसे अपने दिल्ली वाले मातापिता से मिला, उस का तो कोई मुकाबला ही नहीं.

 

पेड़ : कैसी लड़की थी सुलभा

चीनू की नन्हीनन्ही हथेलियां दूर होती चली गईं और धीरेधीरे एकदम से ओझल हो गईं.

पूरे 30 दिन से उन का घर गुलजार था. बच्चों के होहल्ले से भरा था. साल भर में उन के घर में 2 ही तो खुशी के मौके आते थे. एक गरमी की लंबी छुट्टियों में और दूसरा, दशहरे की छुट्टियों के समय.

उन दिनों नीरेंद्र की उजाड़ जिंदगी में हुलस कर बहार आ जाती थी. उस का जी करता था कि इस आए वक्त को रोक कर अपने घर में कैद कर ले. खूब नाचेगाए और जश्न मनाए, पर ऐसा हो कहां सकता था.

छोटी बहन के साथ 2 बच्चे, छोटे भाई के 2 बच्चे और बड़ी दीदी के दोनों बच्चे, पूरे 6 नटखट ऊधमी सदस्यों के आने से ऐसा लगता जैसे घर छोटा पड़ गया हो. बच्चे उस कमरे से इस कमरे में और इस कमरे से उस कमरे में भागे फिरते, चिल्लाते और चीजें बिखेरते रहते.

बच्चों के मुंह से ‘चाचीजी’, ‘मामीजी’ सुनसुन कर वे अघाते न थे. दिनरात उन की फरमाइशें पूरी करने में लगे रहते. किसी को कंचा चाहिए तो किसी को गुल्लीडंडा. किसी को गुडि़या तो किसी को लट्टू.

4 माह में जितना पैसा वे बैंक से निकाल कर अपने ऊपर खर्च करते थे, उस से भी ज्यादा बच्चों की फरमाइशें पूरी करने में उन दिनों खर्च कर देते. फिर भी लगता कि कुछ खर्च ही नहीं किया है. वे तो नईनई चीजें खरीदने के लिए बच्चों को खुद ही उकसाते रहते.

कभीकभी भाईबहनों को गुस्सा आने लगता तो वे उन्हें झिड़कते, ‘‘क्या करते हो भैया. सुबह से इन मामूली चीजों के पीछे लगभग 100 रुपए फूंक चुके हो. बच्चों की मांग का भी कहीं अंत है?’’

नीरेंद्र हंस देते, ‘‘अरे, रहने दो, यह इन्हीं का तो हिस्सा है. बस, साल में 10 दिन ही तो इन के चाव के होते हैं. देता हूं तो बदले में इन से प्यार भी तो पाता हूं.’’

सिर्फ 30 दिन का ही तो यह मेला होता है. बाद में बच्चों की बातें, उन की गालियां याद आतीं. उन की छोड़ी हुई कुछ चीजें, कुछ खिलौने संभाल कर वे उन निर्जीव वस्तुओं से बातें करते रहते और मन को बहलाते. उन की एक बड़ी अलमारी तो बच्चों के खिलौनों से भरी पड़ी थी.

इस तरह नीरेंद्र अपने अकेलेपन को काटते. हर बार उन का जी करता कि बच्चों को रोक लें, पर रोक नहीं पाते. न बच्चे रुकना चाहते हैं न माताएं उन्हें यहां रहने देना पसंद करती हैं. पहले तो उन के छोटे होने का बहाना था. बड़े हुए तो छात्रावास में डाल दिए गए. इसी से नीरेंद्र उन्हीं बच्चों में से एक को गोद लेना चाहते थे. मगर हर घर में 2 बच्चे देख खुद ही तालू से जबान लग जाती थी.

किसीकिसी साल तो ऐसा भी होता है कि 30 दिनों में भी कटौती हो जाती. कभीकभी बच्चे यहां आने के बजाय कश्मीर, मसूरी घूमने की ठान लेते. फिर तो ऐसा लगने लगता जैसे जीने का बहाना ही खत्म हो जाएगा. पिछले साल यही तो हुआ था. बच्चे रानीखेत घूमने की जिद कर बैठे थे और यहां आना टल गया था. किसी तरह छुट्टियों के 7-8 दिन बचा कर वे यहां आए थे तो उन का मन रो कर रह गया था.

कभीकभी नीरेंद्र को अपनेआप पर ही कोफ्त होने लगती कि क्यों वे अकेले रह गए? आखिर क्या कारण था इस का? पिता की असमय मृत्यु ने उन के घर को अनाथ कर दिया था. घर में वे सब से बड़े थे, इसलिए जिम्मेदारी निभाना उन्हीं का कर्तव्य था. घर में सभी को पढ़ाया- लिखाया. पूरी तरह से हिम्मत बांध कर उन के शादीब्याह किए तब कहीं जा कर अपने लिए विचार किया था.

नीरेंद्र सीधीसादी लड़की चाहते थे. मां ने उन के लिए सुलभा को पसंद किया था. सुलभा में कोई दोष न था. नीरेंद्र खुश थे कि उम्र उन के विवाह में बाधक नहीं बनी. इस से पहले जब वे भाईबहनों का घर बसा रहे थे तब सदा उन्हें एक ही ताना मिला था, ‘‘क्यों नीरेंद्र, ब्याह करोगे भी या नहीं? बूढ़े हो जाओगे, तब कोई लड़की भी न देगा. बाल पक रहे हैं, आंखों पर चश्मा चढ़ गया है और क्या कसर बाकी है?’’

सुन कर नीरेंद्र हंस देते थे, ‘‘चश्मा और पके बाल तो परिपक्वता और बुद्धिमत्ता की निशानी हैं. मेरी जिम्मेदारी को जो लड़की समझेगी वही मेरी पत्नी बनेगी.’’

सुलभा उन्हें ऐसी ही लड़की लगी थी. सगाई के बाद तो वे दिनरात सुलभा के सपने भी देखने लगे थे. उन्हें ऐसा लगता जैसे सुलभा उन की जिंदगी में एक बहार बन कर आएगी.

विवाह की तिथि को अभी काफी दिन थे. एक दिन इसी बीच वे सुलभा के साथ रात को फिल्म देख कर लौट रहे थे. अचानक कुछ बदमाशों ने सुलभा के साथ छेड़छाड़ की थी. नीरेंद्र को बुढ़ऊ कह कर ताना मार दिया था.

सुन कर नीरेंद्र को सहन न हुआ था और वे बदमाशों से उलझ पड़े थे, पर उन से वे कितना निबट सकते थे. अपनेआप से वे पहली बार हारे थे. गुस्सा आया था उन्हें अपनी कमजोरी पर. वे स्वयं को अत्यंत अपमानित महसूस कर रहे थे. हतप्रभ रह गए थे अपने लिए बुढ़ऊ शब्द सुन कर. उस शाम किसी तरह वे और सुलभा बच कर लौट तो आए थे मगर सुलभा ने दूसरे ही दिन सगाई की अंगूठी वापस भेज दी थी. शायद उसे भी यकीन हो गया था कि वे बूढ़े हो गए हैं.

‘अच्छा ही किया सुलभा ने.’ एक बार नीरेंद्र ने सोचा था. परंतु मन में अपनी हीनता और कमजोरी का एक दाग सा रह गया. विवाह से मन उचट गया, कोई इस विषय पर बात चलाए भी तो उस से उलझ बैठते. मां जब तक रहीं नीरेंद्र को शादी के लिए मनाती रहीं, समझाती रहीं.

मां की मृत्यु के बाद वह जिद और मनुहार भी खत्म हो गई. कुछ यह भी जिद थी कि अब इसी तरह जीना है. पहले भाईबहनों पर भरोसा था, पर वे अपनी- अपनी जिंदगी में लग गए तो उन्होंने उन्हें छेड़ना भी उचित न समझा.

हां, भाईबहनों के बच्चों ने अवश्य ही नीरेंद्र के अंदर एक बार गृहस्थी का लालच जगा दिया था. अंदर ही अंदर वे आकांक्षा से भर उठे कि उन्हें भी कोई पिता कहता. वे भी किसी के भविष्य को ले कर चिंता करते. वे भी कोई सपना पालते कि उन का बेटा बड़ा हो कर डाक्टर बनेगा या कोई उन का भी दुखसुख सुनता. सोतेजागते वे यही सोचा करते.

तब कभीकभी मन में मनाते कि कोई उन्हें क्यों नहीं कहता कि ब्याह कर लो. अकेले ही वे रसोईचूल्हे से उलझे हुए हैं कोई पसीजता क्यों नहीं, कोई अजूबा तो नहीं इस उम्र में ब्याह करना. बहुत से लोग कर रहे हैं.

नीरेंद्र अपनी जिंदगी की तुलना भाई की जिंदगी से करते. सोचते कि उन की और धीरेंद्र की सुबह में कितना अंतर है. वे 4 बजे का अलार्म लगा कर सोते. सोचते हुए देर रात गए उन्हें नींद आती. परंतु सुबह तड़के घड़ी की तेज घनघनाहट के साथ ही उन की नींद टूट जाती जबकि वे जागना नहीं चाहते. लेकिन जानते हैं कि सुबह के नाश्ते की तैयारी, कमरों की सफाई, कपड़ों की धुलाई आदि सब उन्हीं को ही करनी है.

मगर धीरेंद्र की सुबह भले ही झल्लाहट से शुरू हो लेकिन उत्सुकता से भरी जरूर होती है. 4 बजे का अलार्म बज जाए तो भी उसे कोई परवाह नहीं. नींद ही नहीं टूटती है. न जाने उसे कैसी गहरी नींद आती है.

घड़ी का कांटा जब 4 से 5 तक पहुंचता है तब उस की पत्नी चिल्लाती है, ‘‘उठो, दफ्तर जाने में देर हो जाएगी.’’

‘‘हूं,’’ धीरेंद्र उसी खर्राटे के साथ कहेगा, ‘‘क्या 5 बज गए?’’

‘‘तैयार होतेहोते 10 बज जाएंगे. फिर मुझे न कहना कि देर हो गई.’’

शायद फिर बच्चों को इशारा किया जाता होगा. पप्पू धीरेंद्र के बिछौने पर टूट पड़ता, ‘‘उठिए पिताजी, वरना पानी डाल दूंगा.’’

फिर वह बच्चों के अगलबगल बैठ कर कहता, ‘‘अरे, नहीं बाबा, मां से कहो कि चाय ले आए.’’

स्नानघर में जा कर भी धीरेंद्र बीवी से उलझता रहता, ‘‘मेरे कुरते में 2 बटन नहीं हैं और जूते के फीते बदले या नहीं? जाने मोजों की धुलाई हुई है या नहीं?’’

पत्नी तमक कर कहती, ‘‘केवल तुम्हें ही तो नौकरी पर नहीं जाना है, मुझे भी दफ्तर के लिए निकलना है.’’

‘‘ओह, तो क्या तुम्हारे ब्लाउज के बटन मुझे टांकने होंगे,’’ धीरेंद्र चुहल करता तो पत्नी उसे धप से उलटा हाथ लगाती.

इसे कोई कुछ भी कहे, पर नीरेंद्र का लोभी मन गृहस्थी के ऐसे छोटेमोटे सुखों की कान लगा कर आहट लेता रहता.

नीरेंद्र बेसन के खुशबूदार हलवे के बहुत शौकीन हैं. जी करता है नाश्ते में कोई सुबहसुबह हलवा परोस दे और वे जी भर कर खाएं. अम्मां थीं तो उन का यह पसंदीदा व्यंजन हफ्ते में 3-4 बार अवश्य मिला करता था. पर उन की मृत्यु के बाद सारे स्वाद समाप्त हो गए.

धीरेंद्र की पत्नी बेसन का हलवा देखते ही मुंह बनाती थी. खुद नीरेंद्र अम्मां की भांति कभी हलवा बना नहीं सके. अब तो बस हलवे की खुशबू मन में ही दबी रहती है.

धीरेंद्र को बेसन के पकौड़ों के एवज में कई बार बीवी के हाथ बिक जाना पड़ता है. बीवी का मन न हो तो कोई न कोई बात पक्की करवा कर ही वह पकौड़े बनाती है. नीरेंद्र भी अपने पसंद के हलवे पर नीलाम हो जाना चाहते हैं, पर वह नीलामी का चाव मन में ही दबा रह गया. अब तो रोज सुबह थोड़ा सा चिवड़ा फांक कर दफ्तर की ओर चल देते हैं.

दफ्तर में नए और पुराने सहयोगियों का रेला नीरेंद्र को देखदेख कर दबी मुसकराहट से अभिवादन करता. कम से कम इतनी तसल्ली तो जरूर रहती कि हर कोई उन से काम निकलवाने के कारण मीठीमीठी बातें तो जरूर करता है. उस के साहब, अपनीअपनी फाइल तैयार करवाने के चक्कर में उसे मसका लगाते रहते. किसी को पार्टी में जाना हो, पत्नी को ले कर बाजार जाना हो, बच्चे को अस्पताल पहुंचाना हो, तुरंत उन्हें पकड़ते. ‘‘नीरेंद्र, थोड़ा सा यह काम कर दो.’’

इतना ही नहीं दफ्तर के क्लर्क, चपरासी, माली, जमादार आदि अपने तरीके से इस अकेले व्यक्ति से नजराना वसूलते रहते. अगर देने में थोड़ी सी आनाकानी की तो वे लोग कह देते, ‘‘किस के लिए बचा रहे हो, बाबू साहब. आप की बीवी होती तो कहते, साड़ी की फरमाइश पूरी करनी है. बेटा होता तो कहते कि उस की पढ़ाई का खर्च है. अगर बेटी होती तो हम कभी धेला भी न मांगते…मगर कुंआरे व्यक्ति को भला कैसी चिंता?’’

पर धीरेंद्र को न तो दफ्तर में रुकने की जरूरत पड़ती और न ही अपने मातहतों के हाथ में चार पैसे धरने की नौबत आती. घर जल्दी लौटने के बहाने भी उसे नहीं बनाने पड़ते. खुद ही लोग समझ जाते हैं कि घर में देरी की तो जनाब की खैर नहीं.

पर नीरेंद्र किस के लिए जल्दी घर लौटें. बालकनी में टहलते ठीक नहीं लगता. अपनीअपनी छतों पर टहलते जोड़ों का आपस में हंसीमजाक सुनना अब उन से सहन नहीं होता. बारबार  लगता है जैसे हर बात उन्हें ही सुनाई जा रही है. खनकती, ठुनकती हंसी वे पचा नहीं पाते. घर के अंदर भाग कर आएं तो मच्छरों की भूखी फौज उन की दुबली देह पर टूट पड़ती है. तब एक ही उपाय नजर आता है कि मच्छरदानी गिरा कर अंदर घुस जाएं और घड़ी के भागते कांटों को देखते हुए समय निकालते रहें.

इसीलिए नीरेंद्र कभीकभी वैवाहिक विज्ञापनों में स्वयं ही अपने लिए उपयुक्त पात्र तलाशने लगते हैं. पर ऐसा कभी न हो सका. कई बार समझौतों के सहारे लगा कि बात बनेगी परंतु विवाह के लिए समझौता करना उन्हें उचित नहीं लगा. अकेलेपन के कारण झिझकते हुए उन्होंने छोटे भाई की लड़की नीलू को अपने पास रख लेने का प्रस्ताव किया तो वह बचने लगा था, ‘‘पता नहीं, बच्ची की मां राजी होगी या नहीं?’’

पर नीरेंद्र बजाय बच्ची की मां से पूछने के छोटी बहन के सामने ही गिड़गिड़ा उठे थे, ‘‘कामिनी, मैं चाहता हूं, क्यों न आशू यहीं मेरे साथ रहे. उस का जिम्मा मैं उठाऊंगा.’’

‘‘आशू?’’ बहन की आंखें झुक गईं, ‘‘बाप रे, इस की दादी तो मुझे काट कर रख देंगी.’’

जवाब सुन कर नीरेंद्र चकित रह गए थे, ‘अरे यह क्या? अपनी लगभग सारी कमाई इन के बच्चों पर उड़ाता हूं. कितने दुलार से यहां उन्हें रखता हूं. हर वर्ष राखी पर मुंहमांगी चीज बहन के हाथ में रखता हूं. इतना ही नहीं, किसी भी बच्चे को कुछ भी चाहिए तो साधिकार माएं चालाकी से उन की फरमाइश लिख भेजती हैं, लेकिन क्या कोई भी अपने एक बच्चे को मेरे पास नहीं छोड़ सकती. कल को वह बच्चा मेरी पूरी संपत्ति का वारिस होगा, लेकिन सब ने मेरी मांग ठुकरा दी.’

‘‘अच्छा, आशू से ही पूछती हूं,’’ बहन ने आशू को आवाज दी थी.

नीरेंद्र उस की बातों से बेजार छत ताकने लगे थे, लेकिन आशू को सिर्फ उन की चीजें ही अच्छी लगती थीं.

कुंआरे रह कर नीरेंद्र लोगों के लिए सिर्फ एक पेड़ बन कर रह गए थे, जिसे जिस का जी चाहे, नोचे, फलफूल, लकड़ी आदि प्रत्येक रूप में उस का उपयोग करे. अपने लिए भी वे एक पेड़ की भांति थे. जैसे बसंत के मौसम में पेड़ों के नए फूलपत्ते आते हैं उसी प्रकार वे भी किसी पेड़ की तरह हरेभरे हो जाते. क्या उन्हें वर्ष भर मुसकराने का हक नहीं है? स्वयं के नोचे जाने के विरोध का भी कोई अधिकार नहीं है?

सलमान ने सोचा न था

सलमान की शादी को 10 साल हो गए थे. वह अपने परिवार के साथ मुंबई में जिंदगी गुजार रहा था. उस के इस परिवार में बीवी रेशमा और 4 बच्चे बड़ी बेटी आयशा 9 साल की, दूसरी बेटी

7 साल की, बेटा अयान 2 साल का और सब से छोटी बेटी, जो महज सालभर की थी. इस परिवार के साथ सलमान की सास भी पिछले 3 साल से रह रही थीं. जिंदगी अच्छी गुजर रही थी. काम भी अच्छा चल रहा था. घर में किसी चीज की कोई कमी न थी.

लौकडाउन के दौरान सलमान की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया, जिस से उस की जिंदगी पत?ाड़ पेड़ के समान बिखर कर रह गई.

कारोबार खत्म हो चुका था. बीवी रेशमा ने अचानक नईनई मांगें शुरू कर दीं. पहला लौकडाउन खुल चुका था. कारोबार सही नहीं चल पा रहा था. उधर रेशमा जिम जाने लगी. जिम जाने में सलमान को कोई एतराज नहीं था, लेकिन वह जिम से 5-6 घंटे में वापस आती. न टाइम पर खाना, न बच्चों की कोई परवाह.

घर में ?ागड़ा बढ़ने लगा. सलमान ने अपनी सास से भी कहा, ‘‘रेशमा को सम?ाओ. बच्चों को टाइम पर न खाना मिल रहा है और न ही उन की औनलाइन ठीक से पढ़ाई हो पा रही है. मेरा भी काम अभीअभी शुरू हुआ है. मैं भी बच्चों को टाइम नहीं दे पा रहा हूं.’’

इस पर सलमान की सास बोलीं, ‘‘तुम मेरी बेटी के फिट होने से जल रहे हो. उसे अभी अपनी फिटनैस का खयाल रखना है. अभी उस की उम्र ही क्या है.’’

मांबेटी ने सलमान की एक न सुनी. सलमान चुप हो कर रह गया.

जिंदगी यों ही गुजर रही थी. फिर अचानक एक दिन सलमान की जिंदगी में नया भूचाल आ गया. रेशमा ने सलमान के सामने सारी प्रोपर्टी अपने नाम करने की शर्त रख दी. सलमान ने ऐसा करने से मना कर दिया, तो रेशमा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने सलमान से बात करना छोड़ दिया. उसे वह अब अपने पास फटकने भी नहीं देती.

इस के चलते सलमान परेशान रहने लगा. उस ने अपनी सास से कहा, ‘‘रेशमा को सम?ाओ. छोटेछोटे बच्चे हैं. इन की जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा.’’

इस पर सलमान की सास बोलीं, ‘‘तुम उस के नाम प्रोपर्टी कर दो. रेशमा के अब्बा ने मेरे नाम कुछ नहीं किया, तो आज मैं तुम्हारे पास पड़ी हूं.’’

सलमान ने कहा, ‘‘वे तुम्हें बुलाते हैं, तुम क्यों नहीं जातीं?’’

उस पर सास बोलीं, ‘‘अब उन के बस की बात ही क्या है. सब तो उन्होंने बेच दिया.’’

इस पर सलमान बोला, ‘‘मैं तो कमा रहा हूं. मैं ने तो अब तक कुछ बेचा नहीं, उलटे खरीदा ही है. मेरे अब्बा भी अभी जिंदा हैं. मैं उन की प्रोपर्टी इस के नाम कैसे कर सकता हूं. जो मेरे नाम है, मैं उस की वसीयत रेशमा के नाम कर देता हूं.’’

सास बोलीं, ‘‘ठीक है.’’

कुछ ही घंटों में उन्होंने एक वकील को घर पर बुला लिया. वकील से बात करने के बाद सलमान की बीवी रेशमा और सास बोलीं कि वसीयत नहीं, गिफ्ट डीड बनाओ.

इस पर सलमान बोला, ‘‘गिफ्ट डीड बनने से तो मेरा कोई हक नहीं रहेगा.

यह गलत है. मैं केवल वसीयत कर सकता हूं.’’

इस पर मांबेटी दोनों भड़क गईं और सलमान को बुराभला कहने लगीं.

सलमान ने उन दोनों को बच्चों का वास्ता दिया. इस पर सलमान की सास बोलीं, ‘‘ये बच्चे घर से लाई थी क्या…? तेरे बच्चे हैं, तू संभाल.’’

सलमान उन की यह बात सुन कर हक्काबक्का रह गया. वक्त इसी तरह गुजर रहा था कि मांबेटी ने घर से पैसे और जेवर उठा लिए और चंपत हो गईं.

दांव पर जिंदगी : आरती को बहू भात खाना क्यों पड़ा भारी

आरती को बहू भात खाने जाना बहुत महंगा पड़ा. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी.

‘‘लाल, तुम्हारी पत्नी तो बड़ी मस्त है. बहुत मजा आया, पूरा वसूल हो गया,’’ उस आदमी के मुंह से निकलने वाले ये वे शब्द थे, जो बेहोश होने के पहले आरती के कानों में समाए थे.

आवाज सुनीसुनी सी लगी थी. उस के पहले के वे 3 आदमी कौन थे, आरती जान नहीं पाई थी. सब ने अपने चेहरों को ढक रखा था. कोई कुछ बोल भी नहीं रहा था,

जैसे सबकुछ योजना बना कर हो रहा था. एक के बाद एक चढ़े, कूदे और उतर गए. जैसे बेटिकट लफंगे बसों में चढ़तेउतरते हैं.

न आरती चीख पा रही थी और न हिलडुल पा रही थी. पहले ही मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया था. दम घुट रहा था. जो आता जोश से भरा हुआ होता और उस की जान हलक में आ जाती थी.

फिर वहां क्याकुछ हुआ, आरती को कुछ भी पता नहीं. होश आया, तो घर के बिस्तर में पड़ी थी और घर वाले उसे घेरे खड़े थे.

आरती की आंखें लाल को ढूंढ़ रही थीं. वह एक ओर कोने में दुबका सा खड़ा था… चुपचाप. उसे देख कर आरती का मन नफरत से भर उठा. दिल में एक हूक सी उठी, एक सैलाब सा उमड़ा, उस दर्द का, जो वह अभीअभी भोग कर आई थी.

‘‘थाने चलो,’’ अगले दिन सुबह उठते ही आरती ने लाल से कहा.

‘‘होश में आओ, पागल मत बनो, लोग जानेंगेसुनेंगे तो क्या कहेंगे? बाकी की जिंदगी बदनामी ओढ़ कर जीना पड़ेगा. मुंह बंद रखो और रात की घटना को एक डरावना सपना समझ कर भूल जाओ,’’ लाल ने धीरे से कहा.

‘‘यह मेरी जिंदगी का सवाल है. मैं गायबकरी नहीं हूं, तुम थाने चलो,’’ आरती ने जोर दिया और घर से बाहर निकल आई.

आरती ने अपना लिखित बयान थाने में दर्ज करा दिया.

‘‘आप ने लिखा है कि आखिरी वाले आदमी की आवाज सुनीसुनी सी लगी थी?’’ थानेदार रंजन चौधरी ने आरती से पूछा.

‘‘जी हां सर, कुछ दिन पहले एक शाम को ‘लाल’ कह कर घर के बाहर से किसी आदमी ने आवाज दी थी, तब मैं आंगन में थी. यह वही आवाज थी.’’

‘‘घटना के पहले की कुछ बातें बता सकती हैं आप?’’

‘‘सर, घर से हम दोनों 9 बजे चल दिए थे. नर्रा गांव के बाद ही जंगल शुरू हो जाता है. सिंगारी मोड़ पर हमें मुड़ना था. लाल ने हौर्न बजाया, तो मैं ने

पूछा था, ‘रात को हौर्न बजाने का क्या मतलब?’

‘‘लाल ने कहा था, ‘गलती से बज गया था.’’’

आरती का बयान दर्ज कर लिया गया. थानेदार रंजन चौधरी ने लाल पर एक नजर डाली, लेकिन कुछ कहा नहीं. लाल उन की चुभती नजरों का सामना न कर सका. उस का गला सूखने लगा था.

बाद में एक महिला कांस्टेबल की निगरानी में मैडिकल टैस्ट के लिए आरती को सदर अस्पताल भेज दिया गया. शाम को मैडिकल रिपोर्ट मिल गई थी. सामूहिक बलात्कार की तसदीक हो चुकी थी.

अगले दिन पुलिस ने लाल को उस के घर से उठा लिया. घर वालों ने इस का कड़ा विरोध किया. लाल के बड़े भाई ने मंत्री से शिकायत करने की धमकी तक दे डाली, ‘‘गुनाहगारों को पकड़ने की जगह मेरे भाई को ले जा रहे हैं. यह आप अच्छा नहीं कर रहे हैं. आप को मंत्रीजी के सामने इस का जवाब देना पड़ेगा.’’

‘‘आप को जहां शिकायत करनी है, कीजिए, पर इतना जान लीजिए कि इस कांड की गुत्थी आप के भाई से जुड़ी हुई है,’’ थानेदार रंजन चौधरी ने कहा.

आरती बलात्कार कांड में उस वक्त एक नया मोड़ आ गया, जब लाल की गिरफ्तारी के कुछ घंटे बाद उस की निशानदेही पर गुप्त छापामारी कर पुलिस ने उन चारों बलात्कारियों को एकसाथ धर दबोचा.

उस के पहले थाने ले जा कर पुलिस ने लाल का अच्छे ढंग से स्वागत किया था. पहले पानी और फिर चाय पिलाई गई, फिर पूछा गया, ‘‘तुम्हारा कहना है कि उस बलात्कारी को तुम नहीं जानते हो, जो तुम्हारा नाम जानता है?’’

‘‘मैं सच कहता हूं सर, मैं उसे नहीं जानता.’’

‘‘तुम सब जानते हो…’’ बाकी शब्दों को लाल के गाल पर पड़े थानेदार रंजन चौधरी के जोरदार चांटे ने पूरा कर दिया था. फिर तो वह तोते की तरह बोलना चालू हो गया था.

इस के बाद कुछ घंटे चली धर पकड़ के बाद उन चारों के बयान ने पूरे इलाके में एक सनसनी सी फैला दी थी. गलीमहल्लों में जिसे देखो वही लाल और आरती के संबंधों की बाल की खाल उतारने में लगा हुआ था.

आरती के भीतर भी एक तूफान उठा हुआ था, जो उस के दिलोदिमाग को मथ रहा था. एक दागदार जिंदगी की चादर को ओढ़े वह किस तरह जी पाएगी? लोगों की चुभती नजरों का सामना वह कैसे करेगी? यही सब सोचसोच कर उस का दिमाग फटा जा रहा था.

अब तो राजेश भी आरती से दूर जा चुका था. 10 साल पहले उस की बेरंग जिंदगी में एक बदलाव आया था. वह पैंशन डिपार्टमैंट में राजेश की असिस्टैंट थी. काम करतेकरते दोनों कब इतने करीब आ गए कि एकदूसरे को देखे बिना रहना मुश्किल हो गया.

यह सिलसिला 10 साल तक बड़े आराम से चला कि अचानक एक दिन आरती ने राजेश से कहा, ‘‘अब हम  एक ही औफिस में एकसाथ रह कर काम नहीं कर सकते. लाल को हमारे रिश्ते की भनक लग चुकी है.’’

आरती डर गई थी. अपने लिए नहीं, बल्कि राजेश के लिए. वह राजेश से बेइंतिहा प्यार जो करने लगी थी.

लोग भी कहते हैं कि जुआरी और शराबियों से जितना दूर रहो, उतना ही बेहतर है, फिर आरती का पति लाल तो एक अव्वल दर्जे का जुआरी था और शराबी भी.

कुलमिला कर आरती एक बेस्वाद जिंदगी जी रही थी, जिस में न प्यार का गुलकंद था और न उमंग की कोई तरंग. इस उबाऊ जिंदगी से राजेश ने अपनी बांहों में भर कर उसे उबार लिया था.

पति के दबाव में आ कर आरती ने राजेश से एक दिन दूरी बना ली, पर राजेश हर हाल में आरती के साथ जुड़ा रहना चाहता था, ‘‘आरती, मैं तुम्हें आसमान के चांदतारे तो ला कर नहीं दे सकता, पर अपनी पलकों पर जरूर बिठा कर रखूंगा. मैं तुम्हें कभी धोखा नहीं दूंगा, यह मैं वादा करता हूं.

‘‘तुम मु?ो छोड़ने की बात मत करो, मैं तुम्हारे बगैर जी नहीं पाऊंगा,’’ राजेश रोने लगा था.

‘‘राजेश, मैं तुम्हारी जुदाई बरदाश्त कर लूंगी. हर हाल में जी लूंगी, लेकिन तुम्हें कुछ हो जाए, यह मैं सहन नहीं कर सकूंगी. लाल गुस्से में पागल हो चुका है, मैं उस पर भरोसा नहीं कर सकती. हमारा प्यार जिंदा रहे, इस के लिए तुम्हें जिंदा रहना होगा.’’

‘‘तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है,’’ आंसू पोंछते हुए राजेश चला गया था.

एक हफ्ते बाद ही राजेश ने अपना तबादला दूसरे एरिया में करवा लिया था. फिर दोनों कभी नहीं मिले.

अखबार से ही राजेश को आरती के साथ हुए बलात्कार की जानकारी हुई. वह गुस्से से सुलग उठा और कभी फोन न करने की अपनी कसम तोड़ डाली, ‘‘आखिर उस जल्लाद ने अपना असली रूप दिखा ही दिया न. मैं कहता रहा, वह तुम्हें धोखा देगा. अब क्या कहूं…’’

‘तुम कैसे हो?’ फोन रिसीव करते ही आरती की आंखों से आंसू झरने लगे थे.

‘‘यह सब जान कर कैसे कहूं कि मैं ठीक हूं.’’

राजेश का फोन आना आरती के घायल तनमन पर चंदन के लेप जैसा था. एक पल के लिए वह अपने जख्मों को भूल गई थी.

आरती बिस्तर पर लेटे हुए कभी ऊपर छत को, तो कभी उस छिपकली को देख रही थी, जिस ने अभीअभी एक कीड़े को निगला था. वह खुद को समझने और समझाने में लग गई थी.

आज ही सभी अखबारों में आरती बलात्कार कांड को ले कर खबरें छपी थीं. पर उन चारों आरोपियों के बयान खटिया के 4 पायों की तरह थे. देह से वे चारों अलग थे, लेकिन बयान उन चारों के अलग नहीं थे. सब ने एकसुर में कहा था, ‘हम ने कोई बलात्कार नहीं किया है. हम ने इस के लिए पैसे दिए थे.’

बयान की शुरुआत पहले आरोपी घनश्याम साहू से हुई थी, ‘‘हमेशा की तरह उस दिन भी हम पांचों जुआ खेल रहे थे. लाल सारा पैसा हार चुका था. वह उठ कर जाने लगा. थोड़ी दूर जा कर रुक गया. फिर पीछे मुड़ा और सामने आ कर बोला, ‘मैं एक दांव और खेलूंगा, एक लाख का. बोलो, खेलते हो?’

‘‘लेकिन, मैं ने साफ मना कर दिया कि उधार का हम नहीं खेलेंगे. यह सुन कर लाल एकदम से बोल उठा,

‘10 लाख हैं मेरे पास.’

‘‘यह सुन कर फूचा बोला, ‘अभी तुम्हारी जेब में 10 टका नहीं था, यह

10 लाख कहां से आ गया?’

‘‘यह सुन कर लाल ने कहा, ‘मेरी पत्नी कितने लाख की है, मालूम है न तुम लोगों को…’

‘‘मैं ने उस का मजाक उड़ाते हुए कहा, ‘हांहां, मालूम है, पर उस से क्या? जुआ खेलने के लिए तो तुम्हें वह 100 का नोट भी नहीं देती.’

‘‘तभी लाल ऊंची आवाज में बोला, ‘एक लाख के रूप में मैं उसी पत्नी को आज दांव पर लगाता हूं.’

‘‘मैं ने हैरान हो कर कहा, ‘होश में तो है? पत्नी को दांव पर लगाएगा? महाभारत याद है न?’

‘‘पर जुए का नशा लाल पर भूत की तरह चढ़ गया था. वह नहीं माना. मैं सोच में पड़ गया था. मैं लाल की पत्नी और उस के स्वभाव को जानता था. जान लेगी तो सब की जान ले लेगी. कोई भी उस के सामने जाने से डरता था, मजाक करना तो दूर की बात.

‘‘हम चारों अभी कुछ सोच ही रहे थे कि तभी सोमा मोदी बोल उठा, ‘अगर लाल इतना बोल रहा है तो मान जाओ. हमारा क्या जाएगा, हारेंगे तो उस का पैसा उसे लौटा देंगे… और अगर जीत गए तो…’ बोलतेबोलते वह रुक गया था.

‘‘फिर उसी जगह हम पांचों बैठ गए थे. ताश की नई बाजी बिछ गई. खेल शुरू हो गया. हम देह की नसों में तनाव महसूस करने लगे थे. लाल का और भी बुरा हाल था.’’

‘‘फिर क्या हुआ था?’’ थानेदार रंजन चौधरी ने पूछा.

‘‘पहले की 2 बाजी में हारजीत का फैसला न हो सका,’’ घनश्याम ने कहना जारी रखा, ‘‘फिर हम तीसरी बाजी खेलने बैठे. लाल ने 3 बार खेल को बीच में रोका. हर बार उस की सोच बदलीबदली सी लगी. हम उस की ओर देखते, तो वह जाहिल की माफिक हंस देता.

‘‘यही आखिरी बाजी होगी, इस के बाद हम नहीं खेलेंगे. जब मैं ने ऐसा कहा, तो लाल ने मुझे घूर कर देखा.

‘‘खेल शुरू हुआ… 5 मिनट…

10 मिनट.. और 15 मिनट… अब की जीत का इक्का मेरे हाथ में था. खेल खत्म हो चुका था. लाल बाजी और दांव पर लगाई पत्नी को हार चुका था.

‘‘लाल ने कुछ नहीं कहा. मैं ने आहिस्ता से नजरें उठा कर लाल को देखा. वह शांत नहीं दिख रहा था.

‘‘तभी मैं ने कहा, ‘लाल, जुए में हम ने तुम्हारी पत्नी जीत तो ली है, पर फायदा क्या? यह बात जो भी उसे कहने जाएगा, उसे चप्पल खानी पड़ेगी और हम नहीं चाहते हैं कि जीत कर किसी की चप्पल खाएं.’

‘‘इस पर लाल ने कहा, ‘तो तुम्हें जीत का फायदा चाहिए?’

‘‘यह सुन कर हम चारों साथियों ने लार टपकाते हुए हामी भरी. लाल ने कहा, ‘ठीक है, तुम चारों मेरे बैंक अकाउंट में अभी एक लाख रुपए भेजो.’

‘‘मैं ने कहा, ‘हम चारों तुम्हें एक लाख रुपए क्यों दें?’

‘‘यह सुन कर लाल ने कहा, ‘तब फिर मेरी पत्नी से जा कर कहो कि हम ने तुम्हें जुए में जीता है.’

‘‘हम चारों एकदूसरे का मुंह देखने लगे. आखिर में हम ने लाल की बात मान ली और उस के खाते में एक लाख रुपए भेज दिए.

‘‘लाल ने कहा,

‘4 दिन बाद इस पैसे

का मजा लेने के लिए तैयार रहना.’’’

‘‘तुम ने अपनी ही पत्नी के साथ ऐसा खेल क्यों खेला..?’’ थानेदार रंजन चौधरी ने लाल से पूछा.

‘‘वह मेरी नाम की ही पत्नी है. उस की जिंदगी के साथ मेरा कोई मेल नहीं है. वह हमारे घर में रहती जरूर है, लेकिन मैं उस के दिल में नहीं रहता.

‘‘मेरी पत्नी हो कर भी वह मेरे साथ एक बंटी हुई जिंदगी जी रही है. उस की आंखों में तो राजेश बसा हुआ है. उस के साथ जोकुछ भी हुआ, उस पर मुझे जरा भी अफसोस नहीं है. वह इसी लायक है.’’

‘बंटी हुई जिंदगी जी रहा हूं, इसीलिए ऐसा किया,’ कुछ अखबारों में लाल के इसी बयान को हैडलाइन बनाया था.

दूसरे दिन चारों बलात्कारियों के साथ लाल को भी टेनुघाट जेल भेज दिया गया. बलात्कारियों के बयान और पुलिस चार्जशीट को अदालत ने गंभीर अपराध माना और इसी को आधार बनाया. हफ्तेभर में कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला भी सामने आ गया.

अपने फैसलों की वजह से चर्चित जज मोहन मलिक के सामने बचाव पक्ष के धाकड़ वकील सतीश मेहता की एक भी दलील काम नहीं आई. जज साहब ने उन की एक नहीं सुनी और चारों आरोपियों को 20-20 साल की और मुख्य आरोपी मानते हुए लाल को आजीवन कारावास की सजा सुना दी.

2 बेटों की मां आरती को अब अपनी जिंदगी का फैसला करना था, जो आसान नहीं था. उसे अपनों के द्वारा छला गया था और शरीर को जलील किया गया था.

घर के बाहर काफी भीड़ जमा हो गई थी. तभी आरती का बड़ा बेटा रूपेश बाहर आ कर बोला, ‘‘लाल हमारा बाप है, पर अब वह हमारे लिए मर चुका है. उस ने हमारी मां और हमें भी समाज में जलील किया है.’’

40वां बसंत पार कर चुकी आरती का बदन आज भी लोगों को लुभा रहा था और यह उसे भी बखूबी पता था, पर उसे यह पता नहीं था कि जिंदगी एक दिन उसे ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर देगी, जहां टैलीविजन चैनल वालों के सामने उसे अपनी बात रखने की नौबत आ पड़ेगी.

आरती ने एक नजर बाहर खड़ी भीड़ को देखा और इतना भर कहा, ‘‘घर और इज्जत जब दांव पर लग जाए, तब उस बंधन को तोड़ कर बाहर निकल जाना ही बेहतर है. औरतें ताश का पत्ता नहीं होती हैं, उन का भी अपना वजूद होता है,’’ बोलतेबोलते आरती की आवाज गंभीर होती चली गई. इसी के साथ वह कमरे की ओर मुड़ गई.

‘‘इस तरह का हिम्मत से भरा फैसला हर औरत नहीं ले सकती,’’ बाहर खड़ी भीड़ में से किसी ने कहा.

जिंदगी की उजली भोर- भाग 3

‘‘जब मुझे पता लगा, मैं गांव गया. बूआ भी आईं, काफी बहस हुई. पापा ने अपना पक्ष रखा, बीवी की बीमारी, उन के कहीं न आनेजाने की वजह से वे भी बहुत अकेले हो गए थे. जिंदगी बेरंग और वीरान लगती थी. एक तरह से अम्मी का साथ न के बराबर था. ऐसे में रोशनी से हुई उन की मुलाकात.

‘‘जरूरत और हालात ने दोनों को करीब कर दिया. उस का भी कोई न था, परेशान थी. वह प्रोग्राम में गाने गा कर जिंदगी बसर कर रही थी. दोनों की उम्र में फर्क होने के बाद भी आपस में अच्छा तालमेल हो गया तो शादी ही बेहतर थी.

‘‘पापा अपनी जगह सही थे. यह भी ठीक था कि बीमारी से अम्मी चिड़चिड़ी और रूखी हो गई थीं. वे किसी से मिलना नहीं चाहती थीं. पर अम्मी का गम भी ठीक था. जो हो गया उसे तो निभाना था. बूआ का बेटा बाहर पढ़ने गया था. बूआ अकसर अम्मी के पास रहतीं. पापा दोनों घरों का बराबरी से खयाल रखते. लेकिन अम्मी अंदर ही अंदर घुल रही थीं. जल्दी ही वे सारे दुखों से छुटकारा पा गईं. मैं एक हफ्ता रुक कर वापस आ गया.

‘‘पापा रोशनी को घर ले आए. बूआ और गांव के मिलने वाले पापा से नाराज से थे. मगर रोशनी ने पापा व घर को अच्छे से संभाल लिया. वह मेरा भी बहुत खयाल रखती. रोशनी बहुत कम बोलती. एक अनकही उदासी उस की आंखों में तैरती रहती. मुझ से उम्र में वह 5-6 साल ही बड़ी होगी पर उस में शोखी व चंचलता जरा भी न थी. इसी तरह 1 साल गुजर गया.

‘‘एमबीए के बाद मुझे अहमदाबाद में अच्छी नौकरी मिल गई. अकसर गांव चला जाता. एक बार मैं ने रोशनी में बड़ा फर्क देखा, वह खूब हंसती, मुसकराती, गुनगुनाती, जैसे घर में रौनक उतर आई. पापा भी खूब खुश दिखते. फिर मैं 3-4 माह गांव न जा सका. फिर तुम से शादी तय हो गई. मैं शादी के लिए गांव गया. पर बहुत सन्नाटा था. बस, पापा और बाबू ही घर पर थे. पापा बेहद मायूस टूटेबिखरे से थे. घर में रोशनी नहीं थी. दिनभर पापा चुपचुप रहे. रात जब मेरे पास बैठे तो उदासी से बोले, ‘रोशनी चली गई. मैं ने ही उसे जाने दिया. वह और उस का सहपाठी अजहर बहुत पहले से एकदूसरे को चाहते थे. पर अजहर के मांबाप उस से शादी करने के लिए नहीं माने. वह नाराज हो कर बाहर चला गया. आखिर मांबाप इकलौते बेटे की जुदाई सहतेसहते थक गए. उसे वापस बुलाया और रोशनी से शादी पर राजी हो गए. अजहर आ कर मुझ से मिला, सारी बात बताई. मैं रोशनी की खुशी चाहता था. सारी जिंदगी उसे बांध कर रखने का कोई फायदा न था.

‘‘‘मुझे पता था कि उस ने अकेलेपन और एक सहारा  पाने की मजबूरी में मुझ से शादी की थी. मुझ से शादी के बाद भी वह बुझीबुझी ही रहती थी. बस, जब अजहर ने उसे आने के बारे में बताया तब ही उस के चेहरे पर हंसी खिल उठी. फिर मेरी व उस की उम्र में फर्क भी मुझे ये फैसला करने पर मजबूर कर रहा था. मैं ने उसे अजहर के साथ जाने दिया. बस, एक दुख है, उस की कोख में मेरा अंश पल रहा था. मैं ने उस से वादा किया, बच्चा होने के बाद मैं तलाक दे दूंगा. फिर वह अजहर से शादी कर ले. उसे यह यकीन दिलाया कि बच्चे की पूरी जिम्मेदारी मैं उठाऊंगा. अब बेटा, यह जिम्मेदारी मैं तुम्हें सौंपता हूं कि रोशनी की शादी के पहले तुम उस से बच्चा ले लेना और उस की परवरिश तुम ही करना.  यह मेरी ख्वाहिश और इल्तजा है.’

‘‘रूना, मैं ने उन्हें वचन दिया था कि यह जिम्मेदारी मैं जरूर पूरी करूंगा. अभी तक अजहर ने रोशनी को अलग फ्लैट में बड़ौदा में रखा है. वहीं उस ने बच्ची को जन्म दिया. पापा ने तलाक दे दिया. बस, वह बच्ची के जरा बड़े होने का इंतजार कर रही है ताकि वह बच्ची को हमें सौंप कर अजहर से शादी कर के नई जिंदगी शुरू कर सके. मैं बच्ची के सिलसिले में ही रोशनी से मिलने जाता था. उस की जरूरत का सामान दिला देता था. अजहर ने अपने घर में रोशनी की शादी और बच्ची के बारे में नहीं बताया है. जब हम इस बच्ची को ले आएंगे तो वे दोनों नवसारी जा कर शादी के बंधन में बंध जाएंगे.’’

यह सब सुन कर वह खुशी से भर उठी और इतना समझदार और जिम्मेदार पति पा कर उसे बहुत गर्व हुआ. उसे याद आया, सीमा ने उसे बताया था कि बड़ौदा मौल में समीर एक खूबसूरत औरत के साथ था. तो वह औरत रोशनी थी. अच्छा हुआ, उस ने इस बात को ले कर कोई बवाल नहीं मचाया.

समीर ने रूना का हाथ थाम कर प्यार से कहा, ‘‘रूना, मेरी इच्छा है कि हम रोशनी की बच्ची को अपने पास ला कर अपनी बेटी बना कर रखेंगे, इस में तुम्हारी इजाजत की जरूरत है.’’ समीर ने बड़ी उम्मीदभरी नजरों से रूना को देखा, रूना ने मुसकरा कर कहा, ‘‘मां खोने का दुख मैं उठा चुकी हूं. मैं बच्ची को ला कर बहुत प्यार दूंगी, अपनी बेटी बना कर रखूंगी. मैं बहुत खुशनसीब हूं कि मुझे आप जैसा शौहर मिला. आप एक बेमिसाल बेटे, एक चाहने वाले शौहर और एक जिम्मेदार भाई हैं. हम कल ही जा कर बच्ची को ले आएंगे. मैं उस का नाम ‘सवेरा’ रखूंगी क्योंकि वह हमारी जिंदगी में एक उजली भोर की तरह आई है.’’

समीर ने खुश हो कर रूना का माथा चूम लिया. उसे सुकून महसूस हुआ कि उस ने पापा से किया वादा पूरा किया. समीर और रूना के चेहरे आने वाली खुशी के खयाल से दमक रहे थे.

जिंदगी की उजली भोर- भाग 1

समीर को बाहर गए 4 दिन हो गए थे. वैसे यह कोई नई बात न थी. वह अकसर टूर पर बाहर जाता था. रूना तनहा रहने की आदी थी. फ्लैट्स के रिहायशी जीवन में सब से बड़ा फायदा यही है कि अकेले रहते हुए भी अकेलेपन का एहसास नहीं होता.

कल शाम रूना की प्यारी सहेली सीमा आई थी. वह एक कंपनी में जौब करती है. उस से देर तक बातें होती रहीं. समीर का जिक्र आने पर रूना ने कहा कि वह मुंबई गया है, कल आ जाएगा.

‘मुंबई’ शब्द सुनते ही सीमा कुछ उलझन में नजर आने लगी और एकदम चुप हो गई. रूना के बहुत पूछने पर वह बोली, ‘‘रूना, तुम मेरी छोटी बहन की तरह हो. मैं तुम से कुछ छिपाऊंगी नहीं. कल मैं बड़ौदा गई थी. मैं एक शौपिंग मौल में थी. ग्राउंडफ्लोर पर समीर के साथ एक खूबसूरत औरत को देख कर चौंक पड़ी. दोनों हंसतेमुसकराते शौपिंग कर रहे थे. क्योंकि तुम ने बताया कि वह मुंबई गया है, इसलिए हैरान रह गई.’’

यह सुन कर रूना एकदम परेशान हो गई क्योंकि समीर ने उस से मुंबई जाने की ही बात कही थी और रोज ही मोबाइल पर बात होती थी. अगर उस का प्रोग्राम बदला था तो वह उसे फोन पर बता सकता था.

सीमा ने उस का उदास चेहरा देख कर उसे तसल्ली दी, ‘‘रूना, परेशान न हो, शायद कोई वजह होगी. अभी समीर से कुछ न कहना. कहीं बात बिगड़ न जाए. रिश्ते शीशे की तरह नाजुक होते हैं, जरा सी चोट से दरक जाते हैं. कुछ इंतजार करो.’’

रूना का दिल जैसे डूब रहा था, समीर ने झूठ क्यों बोला? वह तो उस से बहुत प्यार करता था, उस का बहुत खयाल रखता था. आज सीमा की बात सुन के वह अतीत में खो गई…

मातापिता की मौत उस के बचपन में ही हो गई थी. चाचाचाची ने उसे पाला. उन के बच्चों के साथ वह बड़ी हुई. यों तो चाची का व्यवहार बुरा न था पर उन्हें एक अनचाहे बोझ का एहसास जरूर था. समीर ने उसे किसी शादी में देखा था. कुछ दिनों के बाद उस के चाचा के किसी दोस्त के जरिए उस के लिए रिश्ता आया. ज्यादा छानबीन करने की न किसी को फुरसत थी न जरूरत समझी. सब से बड़ी बात यह थी कि समीर सीधीसादी बिना किसी दहेज के शादी करना चाहता था.

चाची ने शादी 1 महीने के अंदर ही कर दी. चाचा ने अपनी बिसात के मुताबिक थोड़ा जेवर भी दिया. बरात में 10-15 लोग थे. समीर के पापा, एक रिश्ते की बूआ, उन का बेटाबहू और कुछ दोस्त.

वह ब्याह कर समीर के गांव गई. वहां एक छोटा सा कार्यक्रम हुआ. उस में रिश्तेदार व गांव के कुछ लोग शामिल हुए. बूआ वगैरह दूसरे दिन चली गईं. घर में पापा और एक पुराना नौकर बाबू था. घर में अजब सा सन्नाटा, जैसे सब लोग रुकेरुके हों, ऊपरी दिल से मिल रहे हों. वैसे, बूआ ने बहुत खयाल रखा, तोहफे में कंगन दिए पर अनकहा संकोच था. ऐसा लगता था जैसे कोई अनचाही घटना घट गई हो. पापा शानदार पर्सनैलिटी वाले, स्मार्ट मगर कम बोलने वाले थे. उस से वे बहुत स्नेह से मिले. उसे लगा शायद गांव और घर का माहौल ही कुछ ऐसा है कि सभी अपनेअपने दायरों में बंद हैं, कोई किसी से खुलता नहीं. एक हफ्ता वहां रह कर वे दोनों अहमदाबाद आ गए. यहां आते ही उस की सारी शिकायतें दूर हो गईं. समीर खूब हंसताबोलता, छुट्टी के दिन घुमाने ले जाता. अकसर शाम का खाना वे बाहर ही खा लेते. वह उस की छोटीछोटी बातों का खयाल रखता. एक ही दुख था कि उस का मायका नाममात्र था, ससुराल भी ऐसी ही मिली जहां सिवा पापा के कोई न था. शादी को 1 साल से ज्यादा हो गया था पर वह  3 बार ही गांव जा सकी. 2 बार पापा अहमदाबाद आ कर रह कर गए.

एक दिन पापा की तबीयत खराब होने का फोन आया. दोनों आननफानन गांव पहुंचे. पापा बहुत कमजोर हो गए थे. गांव का डाक्टर उन का इलाज कर रहा था. उन्हें दिल की बीमारी थी. समीर ने तय किया कि दूसरे दिन उन्हें अहमदाबाद ले जाएंगे. अहमदाबाद के डाक्टर से टाइम भी ले लिया. दिनभर दोनों पापा के साथ रहे, हलकीफुलकी बातें करते रहे. उन की तबीयत काफी अच्छी रही. रूना ने मजेदार परहेजी खाना बनाया. रात को समीर सोने चला गया. रूना पापा के पास बैठी उन से बातें कर रही थी कि एकाएक उन्हें घबराहट होने लगी. सीने में दर्द भी होने लगा. उस का हाथ थाम कर उन्होंने कातर स्वर में कहा, ‘बेटी, जो हमारे सामने होता है वही सच नहीं होता और जो छिपा है उस की भी वजह होती है. मैं तुम से…’ फिर उन की आवाज लड़खड़ाने लगी. उस ने जोर से समीर को आवाज दी, वह दौड़ा आया, दवा दी, उन का सीना सहलाने लगा. फिर उस ने डाक्टर को फोन कर दिया. पापा थोड़ा संभले, धीरेधीरे समीर से कहने लगे, ‘बेटा, सारी जिम्मेदारियां अच्छे से निभाना और तुम मुझे…मुझे…’

बस, उस के बाद वे हमेशा के लिए चुप हो गए. डाक्टर ने आ कर मौत की पुष्टि कर दी. समीर ने बड़े धैर्य से यह गम सहा और सुबह उन के आखिरी सफर की तैयारी शुरू कर दी. बूआ, बेटाबहू के साथ आ गईं. कुछ रिश्तेदार भी आ गए. गांव के लोग भी थे. शाम को पापा को दफना दिया गया. 2 दिन बाद बूआ और रिश्तेदार चले गए. गांव के लोग मौकेमौके से आ जाते. 10 दिन बाद वे दोनों लौट आए.

वक्त गुजरने लगा. अब समीर पहले से ज्यादा उस का खयाल रखता. कभी चाचाचाची का जिक्र होता तो वह उदास हो जाती. ज्यादा न पढ़ सकने का दुख उसे हमेशा सताता रहता. लेकिन समीर उसे हमेशा समझाता व दिलासा देता. जब कभी वह उस के मांपापा के बारे में जानना चाहती, वह बात बदल देता. बस यह पता चला कि समीर अपने मांबाप की इकलौती औलाद है. 3 साल पहले मां बीमारी से चल बसीं. पढ़ाई अहमदाबाद में और उसे यहीं नौकरी मिल गई. शादी के बाद फ्लैट ले कर यहीं सैट हो गया.

रूना को ज्यादा कुरेदने की आदत न थी. जिंदगी खुशीखुशी बीत रही थी. कभीकभी उसे बच्चे की किलकारी की कमी खलती. वह अकसर सोचती, काश उस के जल्द बच्चा हो जाए तो उस का अकेलापन दूर हो जाएगा. उस की प्यार की तरसी हुई जिंदगी में बच्चा एक खुशी ले कर आएगा. उम्मीद की डोर थामे अपनेआप में मगन, वह इस खुशी का इंतजार कर रही थी.

सुख की गारंटी : एक हकीकत

एक दिन काफी लंबे समय बाद अनु ने महक को फोन किया और बोली, “महक, जब तुम दिल्ली आना तो मुझ से मिलने जरूर आना.”

“हां, मिलते हैं, कितना लंबा समय गुजर गया है. मुलाकात ही नहीं हुई है हमारी.”

कुछ ही दिनों बाद मैं अकेली ही दिल्ली जा रही थी. अनु से बात करने के बाद पुरानी यादें, पुराने दिन याद आने लगे. मैं ने तय किया कि कुछ समय पुराने मित्रों से मिल कर उन पलों को फिर से जिया जाए. दोस्तों के साथ बिताए पल, यादें जीवन की नीरसता को कुछ कम करते हैं.

शादी के बाद जीवन बहुत बदल गया व बचपन के दिन, यादें व बहुत कुछ पीछे छूट गया था. मन पर जमी हुई समय की धूल साफ होने लगी…

कितने सुहाने दिन थे. न किसी बात की चिंता न फिक्र. दोस्तों के साथ हंसीठिठोली और भविष्य के सतरंगी सपने लिए, बचपन की मासूम पलों को पीछे छोड़ कर हम भी समय की घुड़दौड़ में शामिल हो गए थे. अनु और मैं ने अपने जीवन के सुखदुख एकसाथ साझा किए थे. उस से मिलने के लिए दिल बेकरार  था.

मैं दिल्ली पहुंचने का इंतजार कर रही थी. दिल्ली पहुंचते ही  मैं ने सब से पहले अनु को फोन किया. वह स्कूल में पढ़ाती है. नौकरी में समय निकालना भी मुश्किल भरा काम है.

“अनु मै आ गई हूं… बताओ कब मिलोगी तुम? तुम घर ही आ जाओ, आराम से बैठैंगे. सब से मिलना भी हो जाएगा…”

“नहीं यार, घर पर नही मिलेंगे, न तुम्हारे घर न ही मेरे घर. शाम को 3 बजे मिलते हैं. मैं स्कूल समाप्त होने के बाद सीधे वहीं आती हूं, कौफी हाउस, अपने वही पुराने रैस्टोरेंट में…”

“ठीक है शाम को मिलते हैं.“

आज दिल में न जाने क्यों अजीब सी बैचेनी हो रही थी. इतने वर्षों में हम मशीनी जीवन जीते संवादहीन हो गए थे. अपने लिए जीना भूल गए थे.   जीवन एक परिधि में सिमट गया था. एक भूलभूलैया जहां खुद को भूलने की कवायत शुरू हो गई थी. जीवन सिर्फ ससुराल, पति व बच्चों में सिमट कर रह गया था. सब को खुश रखने की कवायत में मैं खुद को भूल बैठी थी. लेकिन यह परम सत्य है कि सब को खुश रखना नामुमकिन सा होता है.

दुनिया गोल है, कहते हैं न एक न एक दिन चक्र पूरा हो ही जाता है. इसी चक्र में आज बिछडे साथी मिल रहे थे. घर से बाहर औपचारिकताओं से परे. अपने लिए हम अपनी आजादी को तलाशने का प्रयत्न करते हैं. अपने लिए पलों को एक सुख की अनुभूति होती है.

मैं समझ गई कि आज हमारे बीच कहने सुनने के लिए बहुत कुछ होगा. सालों से मौन की यह दीवार अब ढहने वाली है.

नियत समय पर मैं वहां पहुंच गई. शीघ्र ही अनु भी आ गई. वही प्यारी सी मुसकान, चेहरे पर गंभीरता के भाव, पर हां शरीर थोडा सा भर गया था, लेकिन आवाज में वही खनक थी. आंखे पहले की तरह प्रश्नों को तलाशती हुई नजर आईं, जैसे पहले सपनों को तलाशती थीं.

समय ने अपने अनुभव की लकीरें चेहरे पर खींच दी थीं. वह देखते ही गले मिली तो मौन की जमी हुई बर्फ स्वत: ही पिघलने लगी…

“कैसी हो अनु, कितने वर्षों बाद तुम्हें  देखा है. यार तुम तो बिलकुल भी नहीं बदलीं…”

“कहां यार, मोटी हो गई हूं… तुम बताओ कैसी हो? तुम्हारी जिंदगी तो मजे में गुजर रही है, तुम जीवन में कितनी सफल हो गई हो… चलो आराम से बैठते हैं…”

आज वर्षो बाद भी हमें संवादहीनता का एहसास नहीं हुआ… बात जैसे वहीं से शुरू हो गई, जहां खत्म हुई थी. अब हम रैस्टोरेंट में अपने लिए कोना तलाश रहे थे, जहां हमारे संवादों में किसी की दखलंदाजी न हो. इंसानी फितरत होती है कि वह भीड़ में भी अपना कोना तलाश लेता है. कोना जहां आप सब से दुबक कर बैठे हों, जैसेकि आसपास बैठी 4 निगाहें भी उस अदृश्य दीवार को भेद न सकें. वैसे यह सब मन का भ्रमजाल ही है.

अाखिरकार हमें कोना मिल ही गया. रैस्टोरेंट के उपरी भाग में कोने की खाली मेज जैसे हमारा ही इंतजार कर रही थी. यह कोना दिल को सुकून दे रहा था. चायनाश्ते का और्डर देने के बाद अनु सीधे मुद्दे पर आ गई. बोली,”और सुनाओ कैसी हो, जीवन में बहुत कुछ हासिल कर लिया है. आज इतना बड़ा मुकाम, पति, बच्चे सब मनमाफिक मिल गए तुम्हें. मुझे बहुत खुशी है…”

यह सुनते ही महक की आंखो में दर्द की लहर चुपके से आ कर गुजर गई व पलकों के कोर कुछ नम से हो गए. पर मुसकान का बनावटीपन कायम रखने की चेष्टा में चेहरे के मिश्रित हावभाव कुछ अनकही कहानी बयां कर रही थी.

“बस अनु सब ठीक है. अपने अकेलेपन से लड़ते हुए सफर को तय कर रही हूं, जीवन  में बहुत उतारचढाव देखें हैं. तुम तो खुश हो न? नौकरी करती हो, अच्छा कमा रही हो, अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जी रही हो… सबकुछ अपनी पंसद का मिला है और क्या सुख चाहिए? मैं तो बस यों ही समय काटने के लिए लिखनेपढ़ने लगी,” मैं ने बात को घुमा कर उस का हाल जानने की कोशिश करनी चाही.

“मै भी बढ़िया हूं. जीवन कट रहा है. मैं पहले भी अकेली थी, आज भी अकेली हूं.  हम साथ जरूर हैं पर कितनी अलग राहें हैं जैसे नदी के 2 किनारे…

“यथार्थ की पथरीली जमीन बहुत कठोर है. पर जीना पडता है… इसलिए मैं ने खुद को काम में डूबो दिया है…”

“क्या हुआ, ऐसे क्यों बोल रही हो? तुम दोनों के बीच कुछ हुआ है क्या?”

“नहीं यार, पूरा जीवन बीत जाए तो भी हम एकदूसरे को समझ नहीं  सकेंगे. कितने वैचारिक मतभेद हैं, शादी का चार्म, प्रेम पता नही कहां 1 साल ही खत्म हो गया. अब पछतावा होता है. सच है, इंसान प्यार में अंधा हो जाता है.”

“हां, सही कहा. सब एक ही नाव पर सवार होते हैं पर परिवार के लिए जीना पड़ता है.”

“हां, तुम्हारी बात सही है, पर यह समझौते अंतहीन होते हैं, जिन्हें निभाने में जिंदगी का ही अंत हो जाता है.  तुम्हें तो शायद कुदरत से यह सब मिला है पर मैं ने तो अपने पैरों पर खुद कुल्हाडी मारी है. प्रेमविवाह जो किया है.

“सब ने मना किया था कि यह शादी मत करो, पर अाज समझ में आया कि मेरा फैसला गलत था. यार,  विनय का व्यवहार समझ से परे है. रिश्ता टूटने की कगार पर है. उस के पास मेरे लिए समय ही नहीं है या फिर वह देना नहीं चाहता… याद नहीं कब दोपल सुकून से बैठै हों. हर बात में अलगाव वाली स्थिति होती है.”

“अनु सब को मनचाहा जीवनसाथी नहीं मिलता.  जिंदगी उतनी आसान नहीं होती, जितना हम सोचते हैं. सुख अपरिभाषित है. रिश्ते निभाना इतना भी अासान नहीं है. हर रिश्ता आप से समय व त्याग मांगता है. पति के लिए जैसे पत्नी उन की संपत्ति होती है जिस पर जितनी चाहे मरजी चला लो. हम पहले मातापिता की मरजी से जीते थे, अब पति की मरजी से जीते हैं. शादी समझौते का दूसरा नाम ही है, हां कभीकभी मुझे भी गुस्सा आता है तो मां से शिकायत कर देती हूं पर अब मैं ने स्थिति को स्वीकार करना सीख लिया है. अब दुख नहीं होता. तुम भी हौंसला रखो, सब ठीक हो जाएगा.”

“नहीं महक, अब उम्मीद बाकी नहीं है. शादी करो तो मुश्किल, न करो तो भी मुश्किल. सब को शादी ही अंतिम पडाव क्यों लगता है? मैं ने भी समझौता कर लिया है कि रोनेधोने से समस्या हल नहीं होगी.

“अनु, तुम्हारे पास तो कला का हुनर है उसे और निखारो. अपने शौक पूरे करो. एक ही बिंदू पर खड़ी रहोगी तो घुटन होने लगेगी.

“एक बात बताओ कि एक आदमी किसी के सुख का पैमाना कैसे हो सकता है? अरैंज्ड मैरिज में पगपग पर असहमति होती है, यहां हर रिश्ता आग की दहलीज पर खड़ा होता है, हरकोई आप से संतुष्ट नहीं होता.”

“महक बात तो तुम्हारी सही है, पर विवाह में कोई एक व्यक्ति, किसी दूसरे के जीने का मापदंड कैसे तय कर सकता है? समय बदल गया है, कानून में भी दंड का प्रावधान है. हमें अपने अधिकारों के लिए सजग रहना चाहिए. कब तक अपनी इच्छाओं का गला घोटें… यहां तो भावनाओं का भी रेप हो जाता है, जहां बिना अपनी मरजी के आप वेदना से गुजरते रहो और कोई इस की परवाह भी न करे.”

“अनु, जब विवाह किया है तो निभाना भी पङेगा. क्या हमें मातापिता, बच्चे, पङोसी हमेशा मनचाहे ही मिलते हैं?  क्या सब जगह आप तालमेल नहीं  बैठाते? तो फिर पतिपत्नी के रिश्ते में वैचारिक मदभेद होना लाजिमी है.  हाथ की सारी उंगलिया भी एकसमान नहीं होतीं, तो 2 लिंग कैसे समान हो सकते हैं?

“इन मैरिज रेप इज इनविजिवल, सो रिलैक्स ऐंड ऐंजौय. मुंह सूजा कर रहने में कोई मजा नहीं है. दोनों पक्षों को थोड़ाथोङा झुकना पडता है. किसी ने कहा है न कि यह आग का दरिया है और डूब कर जाना है, तो विवाह में धूप व छांव के मोड़ मिलते रहते हैं.“

“हां, महक तुम शायद सही हो. कितना सहज सोचती हो. अब मुझे भी लगता है कि हमें फिर से एकदूसरे को मौका देना चाहिए. धूपछांव तो आतीजाती रहती हैं…”

“अनु देख यार, जब हम किसी को उस की कमी के साथ स्वीकार करते हैं तो पीडा का एहसास नहीं होता. सकारात्मक सोच कर अब आगे बढ़, परिवार को पूर्ण करो, यही जीवन है…”

विषय किसी उत्कर्षनिष्कर्ष तक पहुंचती कि तभी वेटर आ गया और दोनों चुप हो गईं.

“मैडम, आप को कुछ और चाहिए?” कहने के साथ ही मेज पर रखे खाली कपप्लेटें समेटने लगा. उन के हावभाव से लग रहा था कि खाली बैठे ग्राहक जल्दी से अपनी जगह छोङे.

“हम ने बातोंबातों में पहले ही चाय के कप पी कर खाली कर दिए.”

“हां, 2 कप कौफी के साथ बिल ले कर आना,”अनु के कहा.

“अनु, समय का भान नहीं हुआ कि 2 घंटे कैसे बीत गए. सच में गरमगरम कौफी की जरूरत महसूस हो रही है.”

मन में यही भाव था कि काश वक्त हमारे लिए ठहर जाए. पर ऐसा होता नहीं है. वर्षो बाद मिलीं सहेलियों के लिए बातों का बाजार खत्म करना भी मुश्किल भरा काम है. गरमगरम कौफी हलक में उतरने के बाद मस्तिष्क को राहत महसूस हो रही थी. मन की भड़ास विषय की गरमी, कौफी की गरम चुसकियों के साथ विलिन होने लगी. बातों का रूख बदल गया.

आज दोनों शांत मन से अदृश्य उदासी व पीड़ा के बंधन को मुक्त कर के चुपचाप यहीं छोड रही थीं.

मन में कडवाहट का बीज  जैसे मरने लगा. महक घर जाते हुए सोच रही थी कि प्रेमविवाह में भी मतभेद हो सकते हैं तो अरैंज्ड मैरिज में पगपग पर इम्तिहान है. एकदूसरे को समझने में जीवन गुजर जाता है. हर दिन नया होता है. जब आशा नहीं रखेंगे तो  वेदना नामक शराब से स्वत: मुक्ति मिल जाएगी.

अनु से बात करके मैं यह सोचने पर मजबूर हो गई थी कि हर शादीशुदा कपल परेशानी से गुजरता है. शादी के कुछ दिनों बाद जब प्यार का खुमार उतर जाता है तो धरातल की उबड़खाबड़ जमीन उन्हें चैन की नींद सोने नहीं देती है. फिर वहीं से शुरू हो जाता है आरोप प्रत्यारोपों का दौर. क्यों हम अपने हर सुखदुख की गारंटी अपने साथी को समझते हैं? हर पल मजाक उड़ाना व उन में खोट निकालना प्यार की परिभाषा को बदल देता है. जरा सा नजरिया बदलने की देर है .

सामाजिक बंधन को क्यों न हंस कर जिया जाए. पलों को गुनगुनाया जाए? एक पुरुष या एक स्त्री किसी के सुख की गांरटी का कारण कैसे बन सकते हैं? हां, सुख तलाश सकते हैं और बंधन निभाने में ही समझदारी है.

आज मैं ने भी अपने मन में जीवनसाथी के प्रति पल रही कसक को वहीं छोड़ दिया, तो मन का मौसम सुहाना लगने लगा. घर वापसी सुखद थी. शादी का बंधन मजबूरी नहीं प्यार का बंधन बन सकता है, बस सोच बदलने की देर है.

कुछ दिनों बाद अनु का फोन आया, “शुक्रिया महक, तुम्हारे कारण मेरा जीवन अब महकने लगा है. हम दोनों ने नई शुरुआत कर दी है. आपसी तालमेल निभाना सीख लिया है. अब मेरे आंगन में बेला के फूल महक रहे हैं. सुख की गांरटी एकदूसरे के पास है.” दोनों खिलखिला कर हंसने लगीं.

जिंदगी की उजली भोर- भाग 2

सीमा ने जो कल बताया कि समीर किसी खूबसूरत औरत के साथ खुशीखुशी शौपिंग कर रहा था, मुंबई के बजाय बड़ौदा में था, उस का सारा सुखचैन एक डर में बदल गया कि कहीं समीर उस खूबसूरत औरत के चक्कर में तो नहीं पड़ गया है. उसे यकीन न था कि समीर जैसा चाहने वाला शौहर ऐसा कर सकता है. सीमा ने उसे समझाया था, अभी कुछ न कहे जब तक परदा रहता है, मर्द घबराता है. बात खुलते ही वह शेर बन जाता है.

समीर दूसरे दिन लौट आया. वही प्यार, वही अपनापन. रूना का उतरा हुआ चेहरा देख कर वह परेशान हो गया. रूना ने सिरदर्द का बहाना बना कर टाला. रूना बारीकी से समीर की हरकतें देखती पर कहीं कोई बदलाव नहीं. उसे लगता कि समीर की चाहत उजली चांदनी की तरह पाक है, पर ये अंदेशे? बहरहाल, यों ही 1 माह गुजर गया.

एक दिन रात में पता नहीं किस वजह से रूना की आंख खुल गई. समीर बिस्तर पर न था. बालकनी में आहट महसूस हुई. वह चुपचाप परदे के पीछे खड़ी हो गई. वह मोबाइल पर बातें कर रहा था, इधर रूना के कानों में जैसे पिघला सीसा उतर रहा था, ‘आप परेशान न हों, मैं हर हाल में आप के साथ हूं. आप कतई परेशान न हों, यह मेरी जिम्मेदारी है. आप बेहिचक आगे बढ़ें, एक खूबसूरत भविष्य आप की राह देख रहा है. मैं हर अड़चन दूर करूंगा.’

इस से आगे रूना से सुना नहीं गया. वह लौटी और बिस्तर पर औंधेमुंह जा पड़ी. तकिए में मुंह छिपा कर वह बेआवाज घंटों रोती रही. आखिरी वाक्य ने तो उस का विश्वास ही हिला दिया. समीर ने कहा था, ‘परसों मैं होटल पैरामाउंट में आप से मिलता हूं. वहीं हम आगे की सारी बातें तय कर लेंगे.’

यह जिंदगी का कैसा मोड़ था? हर तरफ अंधेरा और बरबादी. अब क्या होगा? वह लौट कर चाचा के पास भी नहीं जा सकती. न ही इतनी पढ़ीलिखी थी कि वह नौकरी कर लेती और न ही इतनी बहादुर कि अकेले जिंदगी गुजार लेती. उस का हर रास्ता एक अंधी गली की तरह बंद था.

सुबह वह तेज बुखार से तय रही थी. समीर ने परेशान हो कर छुट्टी के लिए औफिस फोन किया.  उसे डाक्टर के पास ले गया. दिनभर उस की खिदमत करता रहा. बुखार कम होने पर समीर ने खिचड़ी बना कर उसे खिलाई. उस की चाहत व फिक्र देख कर रूना खुश हो गई पर रात की बात याद आते ही उस का दिल डूबने लगता.

दूसरे दिन तबीयत ठीक थी. समीर औफिस चला गया. शाम होने से पहले उस ने एक फैसला कर लिया, घुटघुट कर मरने से बेहतर है सच सामने आ जाए, इस पार या उस पार. अगर दुख  को उस की आखिरी हद तक जा कर झेला जाए तो तकलीफ का एहसास कम हो जाता है. डर के साए में जीने से मौत बेहतर है.

उस दिन समीर औफिस से जल्दी आ गया. चाय वगैरह पी कर, फ्रैश हुआ. वह बाहर जाने को निकलने लगा तो रूना तन कर उस के सामने खड़ी हो गई. उस की आंखों में निश्चय की ऐसी चमक थी कि समीर की निगाहें झुक गईं, ‘‘समीर, मैं आप के साथ चलूंगी उन से मिलने,’’ उस के शब्द चट्टान की मजबूती लिए हुए थे, ‘‘मैं कोई बहाना नहीं सुनूंगी,’’ उस ने आगे कहा.

समीर को अंदाजा हो गया, आंधी अब नहीं रोकी जा सकती. शायद, उस के बाद सुकून हो जाए. समीर ने निर्णयात्मक लहजे में कहा, ‘‘चलो.’’

रास्ता खामोशी से कटा. दोनों अपनीअपनी सोचों में गुम थे. होटल पहुंच कर कैबिन में दाखिल हुए. सामने एक खूबसूरत औरत, एक बच्ची को गोद में लिए बैठी थी. रूना के दिल की धड़कनें इतनी बढ़ गईं कि  उसे लगा, दिल सीना फाड़ कर बाहर आ जाएगा, गला बुरी तरह सूख रहा था. रूना को साथ देख कर उस के चेहरे पर घबराहट झलक उठी. समीर ने स्थिर स्वर में कहा, ‘‘रोशनी, इन से मिलो. ये हैं रूना, मेरी बीवी. और रूना, ये हैं रोशनी, मेरी मां.’’

रूना को सारी दुनिया घूमती हुई लगी. रोशनी ने आगे बढ़ कर उस के सिर पर हाथ रखा. रूना शर्म और पछतावे से गली जा रही थी. कौफी आतेआते उस ने अपनेआप को संभाल लिया. बच्ची बड़े मजे से समीर की गोद में बैठी थी. समीर ने अदब से पूछा, ‘‘आप कब जाना

चाहती हैं?’’

‘‘परसों सुबह.’’

‘‘कल शाम मैं और रूना आ कर बच्ची को अपने साथ ले जाएंगे,’’ समीर ने कहा.

वापसी का सफर दोनों ने खामोशी से तय किया. रूना संतुष्ट थी कि उस ने समीर पर कोई गलत इल्जाम नहीं लगाया था. अगर उस ने इस बात का बतंगड़ बनाया होता तो वह अपनी ही नजरों में गिर जाती.

घर पहुंच कर समीर ने उस का हाथ थामा और धीरेधीरे कहना शुरू किया, ‘‘रूना, मैं

बेहद खुश हूं कि तुम ने मुझे गलत नहीं समझा. मैं खुद बड़ी उलझन में था. अपने बड़ों के ऐब खोलना बड़ी हिम्मत का काम है. मैं चाह कर भी तुम्हें बता नहीं सका. करीब 4 साल पहले, पापा ने रोशनी को किसी प्रोग्राम में गाते सुना था. धीरेधीरे उन के रिश्ते गहराने लगे. उस वक्त मैं अहमदाबाद में एमबीए कर रहा था.

‘‘मेरी अम्मी हार्टपेशैंट थीं. अकसर ही बीमार रहतीं. पापा खुद को अकेला महसूस करते. घर का सारा काम हमारा पुराना नौकर बाबू ही करता. ऐसे में पापा की रोशनी से मुलाकात, फिर गहरे रिश्ते बने. रोशनी अकेली थी. रिश्तों और प्यार को तरसी हुई लड़की थी. बात शादी पर जा कर खत्म हुई. अम्मी एकदम से टूट गईं. वैसे पापा ने रोशनी को अलग घर में रखा था. लेकिन दुख को दूरी और दरवाजे कहां रोक पाते हैं.

हिकमत- क्या गरीब परिवार की माया ने दिया शादी के लिए दहेज?

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