Story In Hindi: कलंक – आखिर किसने किया रधिया की बेटी गंगा को मैला

Story In Hindi: अपनी बेटी गंगा की लाश के पास रधिया पत्थर सी बुत बनी बैठी थी. लोग आते, बैठते और चले जाते. कोई दिलासा दे रहा था तो कोई उलाहना दे रहा था कि पहले ही उस के चालचलन पर नजर रखी होती तो यह दिन तो न देखना पड़ता.

लोगों के यहां झाड़ूबरतन करने वाली रधिया चाहती थी कि गंगा पढ़ेलिखे ताकि उसे अपनी मां की तरह नरक सी जिंदगी न जीनी पड़े, इसीलिए पास के सरकारी स्कूल में उस का दाखिला करवाया था, पर एक दिन भी स्कूल न गई गंगा. मजबूरन उसे अपने साथ ही काम पर ले जाती. सारा दिन नशे में चूर रहने वाले शराबी पति गंगू के सहारे कैसे छोड़ देती नन्ही सी जान को?

गंगू सारा दिन नशे में चूर रहता, फिर शाम को रधिया से पैसे छीन कर ठेके पर जाता, वापस आ कर मारपीट करता और नन्ही गंगा के सामने ही रधिया को अपनी वासना का शिकार बनाता.

यही सब देखदेख कर गंगा बड़ी हो रही थी. अब उसे अपनी मां के साथ काम पर जाना अच्छा नहीं लगता था. बस, गलियों में इधरउधर घूमनाफिरना… काजलबिंदी लगा कर मतवाली चाल चलती गंगा को जब लड़के छेड़ते, तो उसे बहुत मजा आता.

रधिया लाख कहती, ‘अब तू बड़ी हो गई है… मेरे साथ काम पर चलेगी तो मुझे भी थोड़ा सहारा हो जाएगा.’

गंगा तुनक कर कहती, ‘मां, मुझे सारी जिंदगी यही सब करना है. थोड़े दिन तो मुझे मजे करने दे.’

‘अरी कलमुंही, मजे के चक्कर में कहीं मुंह काला मत करवा आना. मुझे तो तेरे रंगढंग ठीक नहीं लगते. यह क्या… अभी से बनसंवर कर घूमतीफिरती रहती है?

इस पर गंगा बड़े लाड़ से रधिया के गले में बांहें डाल कर कहती, ‘मां, मेरी सब सहेलियां तो ऐसे ही सजधज कर घूमतीफिरती हैं, फिर मैं ने थोड़ी काजलबिंदी लगा ली, तो कौन सा गुनाह कर दिया? तू चिंता न कर मां, मैं ऐसा कुछ न करूंगी.’

पर सच तो यही था कि गंगा भटक रही थी. एक दिन गली के मोड़ पर अचानक पड़ोस में ही रहने वाले 2 बच्चों के बाप नंदू से टकराई, तो उस के तनबदन में सिहरन सी दौड़ गई. इस के बाद तो वह जानबूझ कर उसी रास्ते से गुजरती और नंदू से टकराने की पूरी कोशिश करती.

नंदू भी उस की नजरों के तीर से खुद को न बचा सका और यह भूल बैठा कि उस की पत्नी और बच्चे भी हैं. अब तो दोनों छिपछिप कर मिलते और उन्होंने सारी सीमाएं तोड़ दी थीं.

पर इश्क और मुश्क कब छिपाए छिपते हैं. एक दिन नंदू की पत्नी जमना के कानों तक यह बात पहुंच ही गई, तो उस ने रधिया की खोली के सामने खड़े हो कर गंगा को खूब खरीखोटी सुनाई, ‘अरी गंगा, बाहर निकल. अरी कलमुंही, तू ने मेरी गृहस्थी क्यों उजाड़ी? इतनी ही आग लगी थी, तो चकला खोल कर बैठ जाती. जरा मेरे बच्चों के बारे में तो सोचा होता. नाम गंगा और काम देखो करमजली के…’

3 दिन के बाद गंगा और नंदू बदनामी के डर से कहीं भाग गए. रोतीपीटती जमना रोज गंगा को कोसती और बद्दुआएं देती रहती. तकरीबन 2 महीने तक तो नंदू और गंगा इधरउधर भटकते रहे, फिर एक दिन मंदिर में दोनों ने फेरे ले लिए और नंदू ने जमना से कह दिया कि अब गंगा भी उस की पत्नी है और अगर उसे पति का साथ चाहिए, तो उसे गंगा को अपनी सौतन के रूप में अपनाना ही होगा.

मरती क्या न करती जमना, उसे गंगा को अपनाना ही पड़ा. पर आखिर तो जमना उस के बच्चों की मां थी और उस के साथ उस ने शादी की थी, इसलिए नंदू पर पहला हक तो उसी का था.

शादी के 3 साल बाद भी गंगा मां नहीं बन सकी, क्योंकि नंदू की पहले ही नसबंदी हो चुकी थी. यह बात पता चलते ही गंगा खूब रोई और खूब झगड़ा भी किया, ‘क्यों रे नंदू, जब तू ने पहले ही नसबंदी करवा रखी थी तो मेरी जिंदगी क्यों बरबाद की?’

नंदू के कुछ कहने से पहले ही जमना बोल पड़ी, ‘आग तो तेरे ही तनबदन में लगी थी. अरी, जिसे खुद ही बरबाद होने का शौक हो उसे कौन बचा सकता है?’

उस दिन के बाद गंगा बौखलाई सी रहती. बारबार नंदू से जमना को छोड़ देने के लिए कहती, ‘नंदू, चल न हम कहीं और चलते हैं. जमना को छोड़ दे. हम दूसरी खोली ले लेंगे.’

इस पर नंदू उसे झिड़क देता, ‘और खोली के पैसे क्या तेरा शराबी बाप देगा? और फिर जमना मेरी पत्नी है. मेरे बच्चों की मां है. मैं उसे नहीं छोड़ सकता.’

इस पर गंगा दांत पीसते हुए कहती, ‘उसे नहीं छोड़ सकता तो मुझे छोड़ दे.’

इस पर गंगू कोई जवाब नहीं देता. आखिर उसे 2-2 औरतों का साथ जो मिल रहा था. यह सुख वह कैसे छोड़ देता. पर गंगा रोज इस बात को ले कर नंदू से झगड़ा करती और मार खाती. जमना के सामने उसे अपना ओहदा बिलकुल अदना सा लगता. आखिर क्या लगती है वह नंदू की… सिर्फ एक रखैल.

जब वह खोली से बाहर निकलती तो लोग ताने मारते और खोली के अंदर जमना की जलती निगाहों का सामना करती. जमना ने बच्चों को भी सिखा रखा था, इसलिए वे भी गंगा की इज्जत नहीं करते थे. बस्ती के सारे मर्द उसे गंदी नजर से देखते थे.

मांबाप ने भी उस से सभी संबंध खत्म कर दिए थे. ऐसे में गंगा का जीना दूभर हो गया और आखिर एक दिन उस ने रेल के आगे छलांग लगा दी और रधिया की बेटी गंगा मैली होने का कलंक लिए दुनिया से चली गई. Story In Hindi

Hindi Story: वक्त का दोहराव – शशांक को आखिर कौन सी बात याद आई

Hindi Story: शशांक दबे पांव छत पर पहुंचा. पूरे महल्ले में निस्तब्धता छाई हुई थी. कहीं आग से झुलसे मकान, टूटी दुकानें, सड़कों पर टूटी लाठियां, ईंटपत्थर और कहींकहीं तो खून के धब्बे भी नजर आ रहे थे. कितना खौफनाक मंजर था. हिंदू-मुसलिम दंगे ने नफरत की ऐसी आग लगाई है कि इंसान सभ्यता की सभी हदों को लांघ कर दरिंदगी पर उतर आता है.

राजनीतिबाज न जाने कब बाज आएंगे अपनी रोटियां सेंकने से. शशांक के अंतर में अपने दादाजी के कहे वो शब्द याद आ रहे थे कि नेता लोग राजनीति खेल जाते हैं और कितने ही लोग अपनी जान से खेल जाते हैं…

भारत-पाकिस्तान का बंटवारा. मानो एक हंसतेखेलते परिवार का दोफाड़ कर दिया गया. कौन अपना, कौन पराया. हिंदू-मुसलमानों के मन में ऐसा जहर घोला कि देखते ही देखते कल तक एक ही थाली में साथसाथ खाते दोस्त एकदूसरे की जान के दुश्मन बन बैठे. अपने पिताजी के मुंह से सुनी थी उस ने उस वक्त की दास्तान. आज वही कहानी फिर से उस की आंखों के सामने पसरने लगी थी…

हवेलीनुमा दोमंजिला घर और बहुत बड़ा चौक, चौक को पार कर के एक बहुत बड़ा दरवाजा, दरवाजा क्या था, पूरा किले का दरवाजा था, बड़ीबड़ी सांकल, सेफ पोल, बड़ेबड़े ताले उस दरवाजे को खोलना व बंद करना हर एक के बस की बात नहीं थी. मास्टर जीवन लाल ही उसे अपने मुलाजिमों के साथ मिल कर खोलते व बंद करते थे.

लेकिन आज यह क्या, वही दरवाजा, ऐसे लगता था कि बस अब गिरा तब गिरा. लगता भी क्यों न, आज एक बहुत बड़ा झुंड उस दरवाजे को धकेल रहा था, पीट रहा था, यह कैसा झुंड था?

मास्टर जीवनलाल जिन का इस पूरे शहर में नाम था, इज्जत थी, रुतबा था, आज वही मास्टरजी अपने पूरे परिवार के साथ इस हवेली में सांस रोके बैठे हैं.

परिवार में पत्नी, 3 बेटे, 3 बेटियां, बहू, सालभर का एक पोता सभी तो हैं, हंसता खेलता परिवार है.

कुछ समय से चल रही हिंदू मुसलमानों की आपस की दूरियां दिख तो रही थीं पर हालात ऐसे हो जाएंगे, किसी ने सोचा भी न था.

मुसलमान और हिंदू एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए थे, आपस में इतनी नफरत होगी, कभी किसी ने सोचा भी न था. यह क्या हो गया भाइयो, जन्मजन्म से एकदूसरे के साथ रहते आए परिवार एकदूसरे से इतनी नफरत क्यों करने लगे.

हालात ऐसे हो गए थे कि जवान लड़कियों को उठा कर ले जाया जा रहा था.  बूढ़ों को मार दिया जा रहा था. मास्टर जीवन लाल अपनी तीनों जवान लड़कियों और बहू को हवेली की ऊपर वाली मंजिल पर पलंग के नीचे छिपाए हुए थे और दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए देख रहे थे. कभी भी दरवाजा टूट सकता था.

मास्टर जीवन लाल का बड़ा बेटा, कटार लिए खड़ा था कि दरवाजा खुलते ही वह अपनी तीनों बहनों व पत्नी को इसलिए मार डालेगा कि कोई उन्हें उठा कर नहीं ले जा पाए. बहनें व पत्नी सामने मौत खड़ी देख ऐसे कांप रही थीं जैसे आंधी में डाल पर लगा पत्ता फड़फड़ा रहा हो.

पर यह क्या, दरवाजे के पीटने और धकेलते रहने के बीच एक आवाज उभरी. वह आवाज थी मास्टर जीवन लाल के किसी विद्यार्थी की. वह कह रहा था कि अरे, क्या कर रहे हो. यह तो मेरे मास्टरजी का घर है. इस घर को छोड़ दो. आगे चलो, और देखते ही देखते बाहर कुछ शांति हो गई.

रात का यह तूफान जब गुजर गया तो मास्टर जीवन लाल ने सोचा कि यहां से अपने पूरे परिवार को सहीसलामत कैसे बाहर निकाला जाए. इस सोच में वे दरवाजा खोल कर बाहर निकले तो बाहर का भयानक दृश्य देख कर रो पड़े. लाशें पड़ी हैं, कोई तड़प रहा है, कोई पानी मांग रहा है. जिस गली में वे और उन का परिवार बड़ी शान से होली, दीवाली, ईद मनाते थे, पड़ोसियों के साथ हंसीमजाक, मौजमस्ती होती थी, वही गली आज खून से नहाई हुई है. सभी आज कितने बेबस व लाचार हैं, किस को पानी पिलाएं, किस को अस्पताल पहुंचाएं. रात आए तूफान से घबराए, आगे आने वाले तूफान से अपने परिवार को बचाने के लिए वे क्या करें. अपनी तीनों जवान बेटियों को आगे आने वाले तूफान से बचाने की गरज से सबकुछ अनदेखा कर के वे आगे बढ़ गए.

मास्टर जीवन लाल जब बाहर का जायजा लेने निकले तो उन्हें पता चला कि हिंदुओं से यह जगह खाली कराई जा रही है. हिंदुओं को किसी तरह लाहौर तक पहुंचाया जा रहा है और वहां से आगे.

मास्टर जीवन लाल ने यह सुना तो वे जल्दी ही अपने परिवार की हिफाजत के लिए वापस मुड़े और घर पहुंच कर उन्होंने बीवी व बच्चों से कहा कि घर खाली करने की तैयारी करो. अब यहां से सबकुछ छोड़छाड़ कर जाना होगा.

इतना सुनते ही पूरा परिवार शोक में डूब गया. ऐसा होना लाजिमी भी है. सालों से यहां रह रहे थे. यहीं पैदा हुए, यहीं बड़े हुए, यहीं पढ़े और फिर उन से कहा जाए कि यहां तुम्हारा कुछ नहीं है, तुम यहां से जाओ, कैसा लगेगा. खैर, मास्टर जीवन लाल ने हिम्मत दिखाते हुए सब को तैयार किया और जरूरी कागजात व कुछ पैसे लिए. फिर उस आलीशान हवेली को हमेशा के लिए आंसुओं से अलविदा किया.

पैर हवेली के बाहर निकले तो इतने भारी थे कि उठ ही नहीं रहे थे. दिल हाहाकार कर रहा था. परंतु फिर भी उन्होंने अपने परिवार को देखा हिम्मत की और चल पड़े.

अब मास्टर जीवन लाल बिना छत, बेसहारा अपने परिवार के साथ खुले आसमान के नीचे खड़े थे. अब उन के पास कुछ न था. हाय समय का फेर देखो, कुछ समय पहले तो खुशियों की लहरें उठ रही थीं और अब यह क्या हो गया. यह कैसा तूफान था. इस तूफानी बवंडर में कैसे फंस गए. कब बाहर निकलेंगे इस तूफान से, पता नहीं.

अब मास्टर जीवन लाल के पास एक ही मकसद था कि अपने परिवार को सहीसलामत हिंदुस्तान पहुंचाया जाए. मास्टर जीवन लाल को पता चला कि ट्रक भर कर लोगों को लाहौर तक पहुंचाया जा रहा है. बहुत कोशिश के बाद मास्टर जीवन लाल की बहू व पत्नी को एक ट्रक में जगह मिल गई. और पीछे रह गईं मास्टरजी की बेटियां व बेटे.

उफ्फ अब क्या करें अब जो रह गए उन्हें किस के सहारे छोड़ें और जो चले गए उन्हें आगे का कुछ पता नहीं. मास्टरजी इस कशमकश में खड़े थे कि फिर लोगों का जनून उभरा. मार डालो, काट डालो की आवाजें. मास्टरजी फिर से परेशान हो गए. अब वे बेटियों को कहां छिपाएं. मास्टरजी की आंखों से आंसू बह निकले.

इतने में मास्टरजी को एक फरिश्ते की आवाज सुनाई दी. सलाम अलैकम, भाईजान. मास्टरजी ने जब उस ओर देखा तो मास्टरजी के सामने चलचित्र की तरह पुरानी घटनाएं याद आ गईं. दो जिस्म एक जान हुआ करते थे. दोनों परिवार एकसाथ सारे तीजत्योहार एकसाथ मनाते थे. फिर अचानक सलीम भाई को विदेश जाना पड़ गया. और अब मिले तो इस हाल में. न हवेली अपनी थी, न ही देश अपना रह गया था. सबकुछ खत्म हो चुका था. मास्टरजी लुटेपिटे खड़े थे.

सलीम भाई ने मास्टरजी को गले लगा लिया. मास्टरजी का हाल देख कर सलीम भाई भी रो पड़े. सलीम भाई ने मास्टरजी को एक बहुत बड़ी तसल्ली दी, कहा कि भाईजान, आप की बेटियां मेरी बेटियां. अब तुम इन की फिक्र छोड़ो और लाहौर जा कर भाभीजी और बहू को खोजो. मास्टरजी के पास अब कोई चारा भी नहीं था. सलीम भाई का विश्वास ही था, और वे आगे बढ़ गए.

कितना सहा होगा उस वक्त लोगों ने जब अपनी जड़ों से उखड़ कर रिफ्यूजी बन गए होंगे. धर्म क्या यही सिखाता है हमें, तोड़ दो रिश्तों को, मानवीय संवेदनाओं का खून कर दो.

बरसों पुरानी हिंदू, मुसलमान की वह नफरत आज भी बरकरार है तो इन नेताओं की वजह से, धर्म के ठेकेदारों की वजह से, अंधविश्वास की गठरी उठाए लोगों की अंधभक्ति की वजह से.

काश, जल्दी ही हमें समझ में आ जाए कि धर्म तो दिलों को मिलाता है, चोट पर मरहम लगाता है. खून की नदियां नहीं बहाता, बच्चों को रुलाता नहीं, औरतों की इज्जत नहीं उतारता, बसेबसाए घरों को उजाड़ता नहीं. काश, यह बात आने वाली हमारी पीढ़ी जल्दी ही समझ जाए. Hindi Story

Hindi Family Story: व्यापार

Hindi Family Story: सरजू स्टेशन पर कुलीगीरी करता था और सारी कमाई गांजे में उड़ा देता था. उस की पत्नी तारा मजदूरी कर के जैसेतैसे परिवार का पेट पालती थी. एक बार सरजू एक पाड़ी खरीद लाया. जब वह हट्टीकट्टी भैंस हुई तो सरजू ने वह कर दिया, जो तारा ने सपने में भी नहीं सोचा था.

हलकीहलकी बूंदाबांदी हो रही थी. पछुआ हवा के थपेड़ों को अपने नंगे बदन पर झेलते हुए कमर में अधटंगी धोती बांधे सरजू जब अपनी झोंपड़ी के नजदीक आया, तो उस के नथुनों में मांस भुनने की खुशबू आने लगी.

झोंपड़ी के बाहर जरा सी खुली जमीन की पट्टी पर एक तरफ बेटी मालती झोंटा बिखेरे आटा गूंद रही थी. दूसरी तरफ चूल्हे पर रखी देगची में उस की बीवी तारा कलछी से शायद मांस भून रही थी. लक्ष्मण और राधा मां से सटे बैठे लोभी निगाहों से देगची को देख रहे थे.

‘‘आज पैसा मिल गया?’’ सरजू की करारी आवाज से तारा चौंक गई. उस ने एक उचटती नजर उस पर डाली और दोबारा मांस भूनने में लग गई.

सरजू का जी जलभुन गया. वह सोचने लगा, ‘यही तो इस की सब से बुरी आदत है. कभी कुछ पूछो तो बोलेगी नहीं, जैसे बोलने में टका खर्च होता है. पैसा तो मिल ही गया होगा, तभी तो आज मांस बन रहा है.’

फिर इधरउधर देख कर सरजू ने बेटी मालती से पूछा, ‘‘क्यों री, अशोक कहां गया है?’’

मालती सुघड़ सयानी बन कर घर के काम में हाथ बंटा रही थी. वैसे तो रोज काम के नाम पर वह बहाना बनाती थी, पर अब महीनों बाद घर में सालन जो बन रहा था, तो उस के मुंह में पानी आ रहा था. गले में थूक गटक कर उस ने कहा, ‘‘क्या मालूम.’’

‘‘अच्छा, जा तू ही दुकान से पुडि़या लेती आना.’’

आटा अधगुंदा छोड़ कर मालती उठ खड़ी हुई. सरजू ने 20 रुपए का नोट दिया, ‘‘3 पुडि़या लाना, एक बंडल बीड़ी भी.’’

पुडि़या, यानी गांजा. 3 पुडि़यां सरजू की 24 घंटे की खुराक थीं. पहले तो बहुत पीता था, पर इधर महंगाई बढ़ गई थी, इसलिए 3 में ही संतोष करना पड़ता था.

‘‘छोटुआ कह रहा था कि यहीं 5 कोस पर एक गांव है… नाम नहीं याद पड़ रहा है. वहां मवेशी बिकने आते हैं. सोच रहा हूं एक पाड़ी ले आऊं. अशोक सारा दिन खेलता रहता है, तो वह पाड़ी को चराएगा. 2 साल में भैंस बन जाएगी तो दूध का सुभीता हो जाएगा और पैसा भी होगा.’’

तारा चुप रही. घर में सरजू की ही मरजी चलती थी. उस ने जो ठान लिया सो ठान लिया. कुछ कहने से पिटाई ही पल्ले पड़ती थी. वह समझ रही थी कि यह सब उस से रुपया मांगने की चाल है.

तारा सरकारी फार्म में मजदूरी करती थी. साढ़े 16 रुपए रोज के हिसाब से मजदूरी मिलती थी. इस बार 8 हफ्तों की मजदूरी मिली थी. ठंड पड़ने लगी थी. बच्चों के पास कपड़े नहीं थे. सोचा था, एकएक कपड़ा चारों के लिए बनवा देगी. लेकिन सूदखोर महाजन की तरह सरजू पैसा उगाहने आ गया था. वह पाईपाई का हिसाब रखता था. तारा ने कमर से सब रुपए खोल कर उस के आगे फेंक दिए.

सरजू ने बेहयाई से सब नोटों को उठा कर गिना. फिर बोला, ‘‘डेढ़ सौ रुपए कम हैं.’’

तारा खीज उठी. अपनी ही कमाई का हिसाब देना अखर गया. सरजू जानता था कि फार्म के पास वाली चाय की दुकान पर वह दोपहर की छुट्टी में चाय पीती है. बच्चों को भी कभीकभार बिसकुट दिला देती है.

पैसा मिलने पर उस की उधारी चुका कर एक वक्त के खाने के लिए कुछ अच्छी चीज ले आती है. बाकी पूरा महीना तो नमक और रोटी पर ही बीतता है.

‘‘हां, 70 रुपए चाय वाले को दिए, बाकी से मांस, तेल, मसाला और आटा आया है. मांस भी तो 55 रुपए किलो है,’’ तारा बोली.

‘‘क्या जरूरत थी, मांस लाने की… आलूगोभी नहीं ला सकती थी?’’ सरजू ने कहा.

तारा ने कुछ जवाब न दिया. झुक कर चूल्हे की लकड़ी ठीक करते हुए सोचने लगी, ‘अभी ऐसे कह रहा है, खाने बैठेगा तो यह नहीं सोचेगा कि दूसरे को भी खाना है.’

सरजू मन ही मन में हिसाब लगा रहा था, ‘पाड़ी खरीदने में 3-4 सौ तो लग ही जाएंगे. इधर 2-3 दिनों से उस की आमदनी भी कुछ कम हुई है. कहीं से कुछ रुपयों का जुगाड़ करना पड़ेगा.’

सरजू स्टेशन पर कुलीगीरी करता था. वह लाइसैंस वाला कुली नहीं था. लाइसैंस के लिए बहुत दौड़धूप करनी पड़ती थी और फीस भी लगती थी. साथ ही घूस भी देनी पड़ती थी.

उस के जैसे बिना लाइसैंस वाले कई कुली थे. स्टेशन के आउटर सिगनल के पास उन का जमाव रहता.

व्यापारी लोग सामान ले कर आते तो चुंगी से बचने के लिए ट्रेन की जंजीर खींच कर उतर पड़ते थे. उन का सामान जल्दी से उतरवा देने पर अच्छे पैसे बन जाते थे.

हां, पुलिस को जरूर मिला कर रखना पड़ता था. वैसे, हवलदार साहब उस से खुश ही रहते थे. गांजे के वे भी शौकीन थे. सरजू उन्हें भी पिला देता था.

दूसरे दिन शाम ढलने लगी थी. जब एक हाथ में रस्सी थामे आगेआगे सरजू और पीछेपीछे बड़ी बकरी से कुछ ऊंची पाड़ी गली में घुसी. अंधेरे में सरजू का काला रंग पाड़ी के रंग से बिलकुल मिल रहा था. छोटू भी साथ में था.

‘‘अरी, जल्दी से तेल, सिंदूर ले आ… घर में लक्ष्मी आई है,’’ सरजू की आवाज में खुशी झलक रही थी.

10 कोस की थकान भी उसे महसूस नहीं हो रही थी.

तारा ने एक निगाह पाड़ी पर डाली और उठ खड़ी हुई. पाड़ी के माथे पर तेल, सिंदूर लगाया और एक लोटा पानी सामने के दोनों पैरों के पास डाला.

उस का सख्त चेहरा देख कर सरजू को खीज आई. किंतु अभी उस की खुशी गुस्से पर हावी थी.

वह बोला, ‘‘अशोक, जल्दी से यहां एक खूंटा गाड़… इसे बांधना है. अभी देहरी नहीं पहचानती है न.

बच्चे भी खुश थे, पाड़ी की देखरेख में वे इतने मगन थे कि भूखप्यास भूल गए थे.

‘‘भौजी, अब कुछ चायपानी कराओ. देखो, तुम्हारे लिए आज सारा दिन दौड़े हैं,’’ छोटू ने कहा.

तारा को मौका मिल गया. घर में खाने को कुछ नहीं था, सारे पैसे सरजू ले गया था. उस ने सरजू से कहा, ‘‘रुपया दो, तो चायपानी ले आएं, आटा भी लाना है.’’

सरजू ने सुनीअनसुनी करते हुए कहा, ‘‘चल छोटू, हम दोनों स्टेशन पर ही चाय पी लेंगे.’’

उन दोनों को जाते हुए देख कर तारा ने दोबारा टोका, ‘‘आज घर में खर्च नहीं है. सरजू एक पल ठिठका, ‘‘जा कर उधारी आटा ले आओ. मेरा नाम ले देना, कल रुपए दे देंगे.’’

तारा चुपचाप उन दोनों को जाते हुए देखती रही. पाड़ी खरीदने से जो रुपया बचा होगा, उस से गांजा आएगा. चाय के साथ गांजे का दम लगा कर वह दूसरी दुनिया में खो जाएगा. जब घर लौटेगा, उस समय तक भूखे बच्चे पानी पी कर सो जाएंगे.

सरजू जानता है कि चक्की वाला आटा उधार कभी नहीं देता है. तारा को पछतावा हो रहा था कि कल क्यों गुस्से में सारे नोट फेंक दिए. कम से कम एक 20 का नोट बचा लिया होता.

रोज सवेरे बच्चे रात की बासी रोटी खा लेते थे. फिर उधरउधर भटकते हुए सरकारी क्वार्टरों में लगे फल चुरा कर खाते हुए उन का दिन कटता. पानी पीपी कर वे सांझ की बाट जोहते, जब मां चूल्हा जोड़ कर रोटी बनाती.

तारा के साथ की दूसरी मजदूरिनें भी थीं. पर उन की इतनी बुरी हालत नहीं थी. उन के मर्द कमा कर नोट उन के हाथ पर रखते. अपनी कमाई से वे अपने शौक पूरे करती थीं. सब के बदन पर ढंग के कपड़ेलत्ते होते थे. एक वही थी, जो ठंड में एक फटी धोती से तन को ढक कर खेतों में काम करती थी.

बच्चे अभी तक पाड़ी में लगे हुए थे. लक्ष्मण छोटी बालटी में पानी ले कर उस के मुंह से लगा रहा था. 3 साल की राधा भी अपने नन्हें हाथों में घास लिए उसे खिलाने की कोशिश कर रही थी.

अशोक और मालती महल्ले के बच्चों को डांट कर भगा रहे थे, ‘पाड़ी को तंग मत करो, इतनी दूर से आई है.’

तारा ने हांड़ी में से धान निकाला. वह फार्म से थोड़ाथोड़ा धान उठा लाती थी, सभी मजदूरिनें ले जाती थीं. बाबू लोग हर समय चौकसी थोड़े ही करते थे.

3 पाव के लगभग धान था. उसे कूट कर सूखी कड़ाही में भूना. बच्चों ने और उस ने एकएक मुट्ठी फांक कर पानी पिया और सो गए.

रात काफी हो गई थी, जब सरजू ने उसे झंझोड़ कर जगाया और कहा, ‘‘ला, खाने को दे.’’

‘‘कहां से दूं? सब तो ऐसे ही सो रहे हैं,’’ तारा बोली.

गांजे के नशे में लाललाल आंखें किए सरजू ने उसे पीटने को हाथ उठाया और बोला, ‘‘तेरी यही आदत अच्छी नहीं लगती है. कहा था न कि आटा उधार ले आना.’’

‘‘उधार नहीं देता है.’’

‘‘नहीं देता है… अभी बताता हूं कि कैसे देता है.’’

तब तक पाड़ी रंभाई. सरजू के उठे हाथ थम गए. वह बोला, ‘‘अच्छाअच्छा, भूख लगी है न, तुझे भी थोड़े ही कुछ मिला होगा, मैं जानता था. इसीलिए तेरे खाने के लिए लाया हूं.’’

गमछे को खोल कर भूसी चूनी निकाली और बालटी में घोल कर पाड़ी के सामने रखी. जब तक वह पीती रही, प्रेम से वह उस का माथा, पीठ सहलाता रहा. मुसीबत टली देख तारा ने चैन की सांस ली और बच्चों के बीच आ कर लेट गई.

कुछ दिनों तक पाड़ी को चराने, नहलाने और खिलाने के लिए बच्चे आपस में झगड़ते थे, पर धीरेधीरे यह काम भी तारा के जिम्मे आ गया. फार्म से दोपहर की छुट्टी में आती तो भूखप्यास से टूटी देह से कुएं से पानी खींचखींच कर उसे नहलाती. सामने गांजे का सुट्टा खींचते हुए सरजू लाट साहब की तरह बैठा रहता.

पहले कभीकभार ही ऐसा वक्त आ पड़ता था, जब घर में रोटी नहीं बनती थी. किंतु अब तो अकसर ही ऐसा हो जाता था, परिवार भले ही आधा पेट खा कर रहे, पर पाड़ी भूखी नहीं रहनी चाहिए, यह उस घर का कायदा बन गया था, क्योंकि पाड़ी सरजू को बच्चों से भी ज्यादा प्यारी थी.

3 सालों में पाड़ी बढ़ कर खूब हट्टीकट्टी भैंस बन गई थी. उस की कालीचिकनी चमड़ी दूर से ही चमकती थी. अब तक उसे गाभिन हो जाना चाहिए था, पर नहीं हुई थी.

आखिर सरजू एक दिन उसे जानवरों के डाक्टर के पास ले गया. डाक्टर ने बताया, ‘‘इसे खुराक जरूरत से ज्यादा दी गई है, इसी से पेट पर चरबी चढ़ गई है. दाना कम दिया करो.’’

जब तारा को यह बात मालूम हुई, तो उदासी में भी उसे हंसी आ गई और सोचने लगी, ‘भूखे बच्चे दुबले होते जा रहे हैं और भैंस पर चरबी चढ़ गई.’

शायद सरजू भी यही कुछ सोच रहा था. तारा की मुसकान से वह चिढ़ गया. वह उसे घुड़क कर बोला, ‘‘इस में हंसने की क्या बात है? औरतें मोटी नहीं हो जाती हैं?’’

भैंस जब गाभिन हुई तो सरजू की ममता भरी चिंता देखते ही बनती थी. तारा को याद नहीं पड़ता था कि कभी गर्भ ठहरने पर उस की इतनी संभाल हुई हो.

आखिरकार वह दिन आ ही गया. घर में खुशी का माहौल था. तारा भी खुश नजर आ रही थी. यह दिन भी उस की जिंदगी में आएगा, इस का उसे यकीन नहीं था.

वह सोचने लगी, ‘बच्चे अब जी भर कर दूध पिया करेंगे. अभी एकाध महीना वह दूध नहीं बेचेगी. सरजू की देह भी टूटती जा रही है, गांजा गरम होता है, दूध पीना उस के लिए भी जरूरी है.’

10 दिन इसी तरह की खुशियों, उम्मीदों में गुजर गए. वह भी एक उदास धुंधली सांझ थी, जब सरजू के साथ 4 लोग भैंस के पास आ खड़े हुए…

सरजू ने झटपट उन लोगों के सामने भैंस दुही. दूध देख कर मोलभाव शुरू हुआ और देखते ही देखते भैंस और पाड़ा सरजू ने उन लोगों के हवाले कर दिए.

तारा के रोटी पकाते हाथ थम चुके थे. बच्चों को भी खबर लग चुकी थी. सब उदास मुख से चुपचाप भैंस को जाते देख रहे थे. उस रात रोटी पकी रखी रह गई, किसी से खाई नहीं गई. तारा की आंखों के सामने भैंस के आने का दिन घूम गया. उस दिन कितनी खुशी थी कि सब भूख भूल गए थे और आज कितनी उदासी कि रोटी पकी रखी रह गई.

सरजू को तो भैंस प्राणों से भी प्यारी थी, पर फिर ऐसा क्यों हुआ?

रात गए गांजे के नशे में चूर बहकते हुए कदमों से सरजू घर लौटा. उस वक्त तक तारा दरवाजे पर ही बैठी थी, उस का भी दिल नहीं हो रहा था.

बड़ी हिम्मत बटोर कर तारा ने पूछा, ‘‘क्या बात हो गई जो भैंस को बेच दिया?’’

‘‘तुम्हें इस से मतलब? हमारी चीज थी, हम ने बेच दी, तू कौन होती है पूछने वाली?’’

गांजे के नशे में सरजू अपने को बादशाह से कम नहीं समझता था. वह बड़बड़ाता जा रहा था, ‘‘फिर एक पाड़ी लाएंगे. 300 की पाड़ी आ जाएगी…

4 हजार की भैंस बिकेगी. कितने फायदे का सौदा है. इसे कहते हैं, व्यापार… तू क्या समझेगी?’’

तारा की आंखों में आंसू आ गए.

300 को 4 हजार बनाने में उस का और बच्चों का कितना खून लगा, पिछले 3 सालों में कितनी रातें भूखे, पेट रह कर काटी थीं. बच्चे कितने दुबले हो गए थे और वह खुद? खेतों में काम करतेकरते आंखों के सामने अंधेरा छा जाता था और रुपया? क्या रुपया रहेगा? जब तक हाथ में रुपया रहेगा, सरजू कामधंधा छोड़ कर गांजे और जुए में मस्त रहेगा.

सरजू बोलता जा रहा था, ‘‘अरी, इस व्यापार से तुझे रानी बना दूंगा… रानी. हां, बस जरा हंस कर बोला कर, हर वक्त मनहूस सूरत बना कर घूमती है तो जी जलता है. हां, खुश रहा कर. देख, मेरे पास कितना रुपया है. अब तुझे क्या चाहिए बोल, मैं कल ही खरीद दूंगा.’’

सरजू अपनी आवाज को भरसक मुलायम बना रहा था. मुलायम स्वर किस मतलब के लिए है, इसे समझते हुए उस ने एक गहरी सांस ले कर उदासी के पुराने कवच से अपने को दोबारा ढक लिया. वह सोचने लगी, ‘अब कुछ भी हो, उस पर कुछ असर नहीं होगा.’ Hindi Family Story

Hindi Funny Story: प्रेमी और प्रेमिका ध्यान दें

Hindi Funny Story: इस इश्तिहार के जरीए मैं अ ब स पुत्र, श्री क ख ग, गांव, पंचायत, तहसील, जिला त थ द अपने आसपास के शादी करने के इच्छुक तमाम प्रेमियों को सूचना देते हुए प्राउड फील कर रहा हूं कि मैं इस इश्तिहार से ठीक 15 दिन बाद कुमारी ट ठ ड, पुत्री श्रीमान य र ल, गांव, पंचायत, तहसील, जिला च छ ज के साथ शादी के बंधन में बंधने की हिमाकत करने जा रहा हूं.

याद रहे, 4 महीने पहले हमारी सगाई हो चुकी है, पर यह कोई गंभीर इश्यू नहीं है. सगाई ही हुई है, तबाही तो नहीं.

हालांकि, सगाई के वक्त मैं ने अपनी मंगेतर से मिलने पर यह नहीं पूछा था कि उसे खाना बनाना आता है कि नहीं. खाना बनाना नहीं आता तो कोई बात नहीं, बाहर से मंगवा लिया करेंगे.

यह भी नहीं पूछा था कि शादी के बाद वह मेरे मातापिता को अपने साथ रखेगी कि नहीं. शादी के बाद कौन बहू अपने सासससुर को अपने साथ रख कर खुश होती है?

मैं ने यह भी नहीं पूछा था कि वह घर के काम में मेरा हाथ बंटाएगी या नहीं, क्योंकि मुझे पता है शादी के बाद घर के सारे काम मुझे ही करने हैं.

पर मैं ने उस से यह जरूर पूछा था कि उस का कोई प्रेमी वगैरह है या नहीं? मैं अपनी मंगेतर के सारे नखरे उठा सकता हूं, पर उस के प्रेमी को शादी के बाद बिलकुल भी नहीं उठा सकता. उसे उठाने का मतलब अपनेआप दुनिया से उठा जाना है.

ऐसा नहीं है कि मैं ही अपनी मंगेतर की ओर से एतराज दायर करने का इश्तिहार दे रहा हूं. इस से पहले मेरी मंगेतर ने भी मुझ से शादी करने से पहले एक इश्तिहार दे कर मेरी प्रेमिकाओं के एतराज मांगे थे कि अगर जिस किसी से मैं प्रेम करता होऊं, उसे मेरी मंगेतर को मुझ से शादी करने में एतराज हो तो वह अपना एतराज तय सीमा के भीतर दर्ज करे. बेकार में मेरी तरह वह भी पंगे में नहीं पड़ना चाहती.

पर मैं खुश हूं कि मेरी किसी भी प्रेमिका ने इस बारे कोई एतराज दर्ज नहीं किया और मुझे क्लीन चिट दे दी. वजह, मैं ही सब से प्रेम करता था, कोई मुझ से प्रेम नहीं करती थी.

मैं मानता हूं कि किसी और चीज को ले कर पतिपत्नी में क्लियैरिटी हो या न, पर कम से कम शादी के बारे में दोनों में क्लियैरिटी होनी चाहिए, ताकि बाद में उन्हें एकदूसरे के प्रेमियों से मंदिर में जा कर अपने हाथों से उन का ब्याह करा कर अपने पतिपत्नी होने की जिम्मेदारी से बाप की तरह सिसकतेसिसकते मुक्त न होना पड़े.

मेरे इस हिमाकत भरे कदम पर अगर मेरे सुश्री ट ठ ड से शादी करने पर अगर उस के किसी प्रेमी को एतराज हो तो वह अखबार में इश्तिहार छपने के 10 दिनों के भीतर इश्तिहार में दिए मोबाइल नंबर पर मुझे फोन कर के या मुझ से पर्सनली मिल कर अपना एतराज दर्ज करा सकता है, ताकि मैं शादी के बाद किसी भी तरह की मुसीबत में न पड़ूं.

मैं यकीन दिलाता हूं कि प्रेमी के हर एतराज को सिरमाथे लिया जाएगा. मेरा यकीन कीजिए, मैं अपनी मंगेतर के प्रेमी के फायदे में शादी करने से साफ इनकार कर दूंगा.

अपनी प्रेमिका की शादी हो जाने के बाद भी अपनी प्रेमिका के साथ रहने के लिए तैयार उस के पति को मारने वाले प्रेमियों, मैं इस दुनिया में जीने आया हूं अपनी मंगेतर के प्रेमी के हाथों मरने नहीं. मैं समय से पहले मरना नहीं चाहता. मैं अपने बूढ़े मातापिता के साथ कुंआरा ही रह लूंगा, पर अपनी मंगेतर के प्रेमी के हाथों मरने का पंगा बिलकुल न लूंगा.

अगर 10 दिनों के भीतर किसी ने एतराज दर्ज नहीं किया तो मैं मान लूंगा कि मेरी मंगेतर का कोई प्रेमी नहीं है. फिर भी अगर कोई हो तो उस के बाद प्लीज अपने को कंट्रोल में रखे, क्योंकि मैं उस के बाद सौ फीसदी यह मान कर चलूंगा कि मेरी मंगेतर का केवल मैं ही एकलौता मंगेतर हूं. उस के बाद प्लीज, मुझे मारने की किसी को सुपारी न दें.

इस सिलसिले में मैं अपनी मंगेतर से भी आखिरी बार दोनों हाथ जोड़ कर अर्ज करता हूं कि अगर उस का कहीं और शादी करने का मन हो और किसी वजह से वह वहां शादी नहीं कर पा रही हो तो प्लीज मुझे बेझिझक बताए.

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है. मैं उस के परिवार जनों से बात कर इस बारे में उस की मदद करने को तैयार हूं. बाद में किसी भी तरह का विवाद शादी के हक में मैं कतई नहीं चाहता.

मैं शादी कर के स्वर्ग चाहता हूं, नरक नहीं. कोई बात नहीं, मैं कहीं और ट्राई कर लूंगा. Hindi Funny Story

Hindi Story: नाजुक गुंडे – कौन थे वो नाजुक गुंडे

Hindi Story: मुंबई से कुशीनगर ऐक्सप्रैस ट्रेन चली, तो गयादीन खुश हुआ. उस ने पत्नी को नए मोबाइल फोन से सूचना दी कि गाड़ी चल दी है और वह अच्छी तरह बैठ गया है.

गयादीन को इस घड़ी का तब से बेसब्री से इंतजार था, जब उस ने 2 महीने पहले टिकट रिजर्व कराया था. वह रेल टिकट को कई बार उलटपलट कर देखता था और हिसाब लगाता था कि सफर के कितने दिन बचे हैं.

सफर में सामान ज्यादा, खुद बुलाई मुसीबत होती है. गयादीन इस मुसीबत से बच नहीं पाता है. कितना भी कम करे, पर जब भी गांव जाता है, तो सामान बढ़ ही जाता है. इस स्लीपर बोगी में उस के जैसे सालछह महीने में कभीकभार घर जाने वाले कई मुसाफिर हैं. उन के साथ भी बहुत सामान है.

इस गाड़ी के बारे में कहा जाता है, आदमी कम सामान ज्यादा. पर आदमी कौन से कम होते हैं. हर डब्बे में ठसाठस भरे होते हैं, क्या जनरल बोगी, क्या स्लीपर बोगी.

गयादीन इस बार अपने गांव में तो मुश्किल से एकाध दिन ही ठहरेगा. पत्नी को ले कर ससुराल जाना होगा. एकलौते साले की शादी है. इस वजह से भी सामान ज्यादा हो गया है.

एक बड़ी अटैची, 2 बड़े बैग, एक प्लास्टिक की बड़ी बोरी और खानेपीने के सामान का एक थैला, जिसे उस ने खिड़की के पास लगी खूंटी पर टांग दिया था.

वैसे तो इस ट्रेन में पैंट्री कार होती है और चलती ट्रेन में ही खानेपीने का सामान बिकता है, लेकिन रेलवे की खानपान सेवा पर खर्च कर के खाली पैसे गंवाना है. पछतावे के अलावा कुछ नहीं मिलता. खानेपीने का सामान साथ हो, तो परेशानी नहीं उठानी पड़ती.

इस बार गयादीन मां के लिए 20 लिटर वाली स्टील की टंकी ले जा रहा था, जिस के चलते एक अदद बोरी का बोझ बढ़ गया था. हालांकि बोरी में बहुत सा छोटामोटा सामान भी रख लिया है. एक बैग तो वहां के मौसम को ध्यान में रखते हुए बढ़ा है.

मुंबई जैसा मौसम तो हर कहीं नहीं होता. सफर लंबा है. पहली रात तो सादा कपड़ों में कट जाएगी, पर अगले दिन और रात के लिए तो गरम कपड़ों की जरूरत होगी. कंबल भी बाहर निकालना होगा.

सुबहसुबह जब गाड़ी गोरखपुर पहुंचेगी, तो कुहरे भरी ठंड से हाड़ ही कांप जाएंगे. फिर गांव तक का खुले में बस का सफर. वहां कान भी बांधने पड़ते हैं, फिर भी सर्दी पीछा नहीं छोड़ती. लेकिन उसी पल पत्नी से मिलन और ससुराल में एकलौते साले की शादी में मिलने वाले मानसम्मान का खयाल आते ही गयादीन जोश से भर गया.

सामान ज्यादा होने की वजह से गयादीन को 2 दोस्त ट्रेन में बिठाने आए थे और वे ही बर्थ के नीचे सामान रखवा कर चले गए थे. उस की नीचे की ही बर्थ थी. कोच में सिर्फ रिजर्व टिकट वाले मुसाफिर थे. रेलवे स्टाफ ने कंफर्म टिकट वाले मुसाफिरों को ही कोच में सफर करने की इजाजत दी थी.

गयादीन ने चादर बिछाई. तकिए में हवा भरी और खिड़की की तरफ बैठ कर एक पतली सी पत्रिका निकाली. समय काटने के लिए उस ने रेलवे बुक स्टौल से कम कीमत की पत्रिका खरीद ली थी, जिस के कवर पर छपी लड़की की तसवीर ने उस का ध्यान खींचा था.

गयादीन अधलेटा हो कर पत्रिका के पन्ने पलटने लगा. सामने की बर्थ पर लेटे एक मुसाफिर ने उसे टोकते हुए सलाह दे दी, ‘‘भाई, रात बहुत हो गई है. लाइट बुझा कर सोने दो. आप भी सोओ. लंबा सफर है, दिन में पढ़ लेना.’’

साथी मुसाफिर की बात उसे ठीक लगी. पत्रिका बंद कर के पानी पी कर लाइट बुझाते हुए वह लेट गया.

दिनभर की आपाधापी के बावजूद उस की आंखों में नींद नहीं थी. एक तो घर जाने की खुशी, दूसरे सामान की चिंता.

नासिक रेलवे स्टेशन पर गाड़ी रुकी, तो भीड़ का एक रेला डब्बे में घुस आया. लोग कहते रहे कि रिजर्वेशन वाला डब्बा है, पर किसी ने नहीं सुनी. वे तीर्थ यात्री मालूम पड़ते थे और समूह में थे. उन में औरतें भी थीं.

गयादीन चादर ओढ़ कर बर्थ पर पूरा फैल कर लेट गया, ताकि उस की बर्थ पर कोई बैठ न सके, फिर भी ढीठ किस्म के 1-2 लोग यह कहते हुए थोड़ी देर का सफर है, उस के पैरों की तरफ बैठ ही गए.

गयादीन सफर में झगड़ेझंझट से बचना चाहता था, इसलिए ज्यादा विरोध नहीं किया, पर मन ही मन वह कुढ़ता रहा कि रिजर्वेशन का कोई मतलब नहीं. किसी की परेशानी को लोग समझते नहीं हैं. वह कच्ची नींद में अपने सामान पर नजर रखे रहा. हालांकि सामान को उस ने लोहे की चेन से अच्छी तरह बांध रखा था, लेकिन चोरों का क्या, चेन भी काट लेते हैं.

खैर, मनमाड़ और भुसावल स्टेशन आतेआते वे सब उतर गए. उस ने राहत की सांस ली और पूरी तरह सोने की कोशिश करने लगा. उसे नींद भी आ गई. बुरहानपुर स्टेशन पर चाय और केले बेचने वालों की आवाज से उस की नींद टूटी.

सुबह हो चुकी थी. बुरहानपुर स्टेशन का उसे इंतजार भी था. वहां मिलने वाले सस्ते और बड़े केले वह घर के लिए खरीदना चाहता था.

पर यह क्या, फिर भीड़ बढ़ने लगी. अब कंधे पर बैग टांगे या खाली हाथ दैनिक मुसाफिर ट्रेन में चढ़ आए थे. उस का अच्छाखासा तजरबा है, दैनिक मुसाफिर किसी तरह का लिहाज नहीं करते, सोते हुए को जगा देते हैं कि सवेरा हो गया और बैठ जाते हैं. एतराज करने पर भी नहीं मानते.

ट्रेन चली तो सामने वाले मुसाफिर को जगा कर गयादीन शौचालय गया. लौटा तो बीच की बर्थ खोल दी गई थी और नीचे उस की बर्थ पर कई लोग डटे थे. यही हाल सामने वाली बर्थ का था. वह कुछ देर खड़ा रहा तो एक दैनिक मुसाफिर ने उस पर तरस दिखाते हुए थोड़ा खिसक कर खिड़की की तरफ बैठने की जरा सी जगह बना दी, जहां उस का तकिया व चादर सिमटे रखे थे.

गयादीन झिझकते हुए सिकुड़ कर बैठ गया और अपने सामान पर नजर डाली. सामान महफूज था. चादर और तकिया जांघों पर रख कर खिड़की के बाहर देखने लगा. गाड़ी तेज रफ्तार से चल रही थी.

गयादीन गाल पर हाथ धरे उगते हुए सूरज को देख रहा था कि एकाएक किसी के धीमे से छूने का आभास हुआ. पलट कर देखा तो चमकती नीली सलवार और पीली कुरती वाली बहुत करीब थी. उस की कलाइयों में रंगबिरंगी चूडि़यां थीं व एक हाथ में 10-20 रुपए के कुछ नोट थे.

यह देख गयादीन अचकचा गया. उस ने मुंह ऊपर उठा कर देखा. लिपस्टिक से पुते हुए होंठों की फूहड़ मुसकराहट का वह सामना न कर सका और निगाहें नीचे कर लीं. उस ने खाली हाथ बढ़ाते हुए मर्दानी आवाज में रुपए की मांग की, ‘‘निकालो.’’

‘‘खुले पैसे नहीं हैं,’’ गयादीन ने झुंझलाहट से कहा और लापरवाही से खिड़की के बाहर देखने लगा.

‘‘कितना बड़ा नोट है राजा? सौ का, 5 सौ का, हजार का? निकालो तो सब तोड़ दूंगी,’’ भारी सी आवाज में उस ने तंज कसा.

‘‘जाओ, पैसे नहीं हैं.’’

‘‘अभी तो बड़े नोट वाले बन रहे थे और अब कहते हो कि पैसे नहीं हैं. रेल में सफर ऐसे ही कर रहे हो…’’ उस ने बेहयाई से हाथ भी मटकाया. इस बीच उस का एक साथी पास आ कर खड़ा हो गया, जो मर्दाने बदन पर साड़ी लपेटे था.

गयादीन को लगा कि अब इन से पार पाना मुश्किल है. बेमन से कमीज की जेब से 10 रुपए का एक नोट निकाला और बढ़ाया.

‘‘हायहाय, 10 का नोट… क्या आता है 10 रुपए में.’’

गयादीन ने 10 का एक और नोट निकाल कर चुपचाप बढ़ा दिया. वह उन से छुटकारा पाना चाहता था.

सलवारकुरती वाले ने दोनों नोट झट से लपक लिए और आगे बढ़ गए. वह अपने को ठगा सा महसूस करते हुए शर्मिंदा सा उन्हें देखता रह गया.

वे दूसरे मुसाफिरों से तगादा करने में लग गए थे. कोई उन का विरोध नहीं कर रहा था. सब अपने को बचा सा रहे थे.

कुछ दैनिक मुसाफिर उतरे, तो दूसरे आ गए. कुछ बिना रिजर्वेशन वाले और गुटका, तंबाकू, पेपर सोप बेचने वाले चढ़ आए. भीड़ इतनी बढ़ गई थी कि रिजर्व डब्बा जनरल डब्बे की तरह हो गया. इस बीच टिकट चैकर भी आया, पर उसे इन सब से कोई मतलब नहीं.

जब दिन चढ़ आया, तो दैनिक मुसाफिरों की आवाजाही तो जरूर कम हुई, पर बिना रिजर्व मुसाफिर बढ़ते रहे. हां, चैकिंग स्टाफ का दस्ता डब्बे में चढ़ा, तो उन के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. वे उन से जुर्माना वसूल कर रसीद पकड़ा गए.

रात में ठीक से नींद न आ पाने से गयादीन की सोने की इच्छा हो आई, पर वह लेट नहीं सकता था. वह बैठेबैठे ही ऊंघने लगा. सामने वाले मुसाफिर ने उसे जगा दिया, ‘‘अपने डब्बे में फिर गुंडे चढ़ आए हैं.’’

‘‘गुंडे, फिर से,’’ वह चौंका.

‘‘हां, हां, यह अपनेअपने इलाके के गुंडे ही तो हैं… नाजुक गुंडे.’’

अब की बार वे 4 थे. पहले वालों के मुकाबले ज्यादा हट्टेकट्टे और ढीठ. ताली बजाबजा कर बड़ी बेशर्मी से मुसाफिरों से रुपयों की मांग कर रहे थे. किसीकिसी से तो 50 के नोट तक झटक लिए थे. गयादीन के पास भी आए और ताली बजाते हुए मांग की.

गयादीन बोला, ‘‘पीछे वालों को दे चुके हैं.’’

‘‘दे चुके होंगे. लेकिन यह हमारा इलाका है.’’

‘‘इलाका तो गुंडों का होता है,’’ सामने वाले मुसाफिर ने कहा.

गयादीन को लगा कि गुंडा कहने से बुरा मान जाएंगे, पर बुरा नहीं माना. एक भौंहें मटकाते हुए बोला, ‘‘वे एमपी वाले थे. हम यूपी वाले हैं. हमारा रेट भी उन से ज्यादा है.’’

और वह दोनों से 50 का नोट लेकर ही माना. जब वे दूसरे डब्बे में चले गए, तो सामने वाला मुसाफिर बोला, ‘‘इन से पार पाना मुश्किल है. ये नंगई पर उतर आते हैं और छीनाझपटी भी कर सकते हैं. मुसाफिर बेचारा क्या करे.झगड़ाझंझट तो कर नहीं सकता.’’

‘‘इन का कोई इलाज नहीं? रेलवे पुलिस इन्हें नहीं रोकती?’’

‘‘पुलिस चाहे तो क्या नहीं कर सकती, पर आप तो जानते ही हैं. खैर,  रात के सफर में कोई परेशान नहीं करेगा. इन की शराफत है कि ये रात के सफर में मुसाफिरों को परेशान नहीं करते.’’

दोनों ने राहत की सांस ली. Hindi Story

Story In Hindi: बेवफाई – हीरा ने दिया रमइया को धोखा

Story In Hindi: रमइया गरीब घर की लड़की थी. सुदूर बिहार के पश्चिमी चंपारण की एक छोटी सी पिछड़ी बस्ती में पैदा होने के कुछ समय बाद ही उस की मां चल बसीं. बीमार पिता भी दवादारू की कमी में गुजर गए. अनाथ रमइया को दादी ने पालपोस कर बड़ा किया. वे गांव में दाई का काम करती थीं. इस से दादीपोती का गुजारा हो जाया करता था. रमइया जब 7 साल की हुई, तो दादी ने उसे सरकारी स्कूल में पढ़ने भेजा, पर वहां उस का मन नहीं लगा. वह स्कूल से भाग कर घर आ जाया करती थी. दादी ने उसे पढ़ाने की बहुत कोशिश की, पर हठीली पोती को नहीं पढ़ा पाईं. रमइया अब 16 साल की हो गई. चिकने बाल, सांवली रंगत और बड़ीबड़ी पनीली आंखों में एक विद्रोह सा झलकता हुआ.

अब दादी को रातों में नींद नहीं आती थी. रमइया के ब्याह की चिंता हर पल उन के दिलोदिमाग पर हावी रहने लगी. कहां से पैसे आएंगे? कैसे ब्याह होगा? वगैरह. जायदाद के नाम पर सिकहरना नदी के किनारे जमीन के छोटे से टुकड़े पर बनी झोंपड़ी और शादी के वक्त के कुछ चांदी के जेवर और सिक्के… यही थी दादी की जिंदगीभर की जमापूंजी.

रातदिन इसी चिंता में घुल कर बुढि़या की कमर ही झुकने लगी. गांवबिरादरी के ही कुछ लोगों ने बुढि़या पर तरस खा कर पड़ोस के गांव के हीरा के साथ रमइया का ब्याह करवा दिया. हीरा सीधासादा और मेहनती था, जो अपनी मां के साथ दलितों की बस्ती में रहता था. घर में मांबेटे के अलावा एक गाय भी थी, जिस का दूध बेच कर कुछ पैसे आ जाते थे. इस के अलावा फसलों की रोपाईकटाई के समय मांबेटे दूसरे के खेतों में काम किया करते थे.

शादी के बाद 3 जनों का पेट भरना मुश्किल होने लगा, तो हीरा गांव के ही कुछ नौजवानों के साथ परदेश चला गया.

पंजाब जा कर हीरा खेतों पर काम करने लगा. वहां हर दिन कहीं न कहीं काम मिलता, जिस से रोजाना अच्छी कमाई होने लगी.

हीरा जी लगा कर काम करता, जिस से मालिक हीरा से बहुत खुश रहते. हीरा ने 8 महीने में ही काफी पैसे इकट्ठे कर लिए थे. पंजाब आए साथी जब गांव वापस जाने लगे, तो वह भी वापस आ गया. गांव आने से पहले हीरा ने रमइया और मां के लिए घरेलू इस्तेमाल की कुछ चीजें खरीदीं. अपने लिए उस ने एक मोबाइल फोन खरीदा.

घर आ कर हीरा ने बड़े जोश से रमइया को फोन दिखाया और शान से बोला, ‘‘यह देख… इसे मोबाइल फोन कहते हैं. देखने में छोटा है, पर इस के अंदर ऐसे तार लगा दिए हैं कि हजारों मील दूर रह कर एक बटन दबा दो और जितनी भी चाहे बातें कर लो.’’

यह सुन कर रमइया की आंखें चौड़ी हो गईं. उस ने फोन लेने के लिए हीरा की ओर हाथ बढ़ाया.

‘‘अरे, संभाल कर,’’ कह कर हीरा ने रमइया के हाथों में मोबाइल फोन थमाया.

रमइया थोड़ी देर उलटपलट कर फोन को देखती रही, फिर उस ने हीरा से कहा, ‘‘सुनो, हमें साड़ीजेवर कुछ नहीं चाहिए. तुम जाने से पहले हमें यह फोन देते जाना. वहां जा कर अपने लिए दूसरा फोन खरीद लेना. फिर हम दिनरात फोन पर बात करेंगे.’’

हीरा पत्नी रमइया के भोलेपन पर जोर से हंस पड़ा. रमइया के सिर पर एक प्यार भरी चपत लगाते हुए वह बोला, ‘‘पगली, बातें मुफ्त में नहीं होतीं. उस में पैसा भरवाना पड़ता है.’’

इस तरह हंसतेबतियाते कई महीने गुजर गए. गांव के साथियों के साथ हीरा फिर से वापस काम पर पंजाब जाने की तैयारी करने लगा. इस बार रमइया ज्यादा दुखी नहीं थी.

हीरा के जाने के बाद अब सास की डांट खा कर भी रमइया रोती नहीं थी. वह मां बनने वाली थी और यह खबर वह हीरा को सुनाने के लिए बेचैन थी. वह मोबाइल फोन ले कर किसी कोने में पड़ी रहती और हीरा के फोन के आने का इंतजार करती रहती.

हीरा चौथी क्लास तक पढ़ालिखा था, सो उस ने रमइया को मोबाइल फोन की सारी बारीकियां समझा दी थीं. 2 महीने बाद आखिर वह दिन भी आया, जब मोबाइल फोन की घंटी घनघना कर बज उठी. रमइया का दिल बल्लियों उछल पड़ा. थरथराते हाथों से उस ने फोन का बटन दबाया और जीभर कर हीरा से बातें कीं. सास से भी हीरा की बात करवाई गई. जब पैसे खत्म हो गए, तो फोन कट गया. देर तक फोन को गोद में ले कर रमइया बैठी रही.

वक्त गुजरता गया. हीरा फिर से गांव वापस आया. वह इस बार भी अपने साथ कपड़े, सामान और पैसे ले कर आया था. रमइया का पीला चेहरा देख कर हीरा को चिंता हुई. इस बार रमइया में वह चंचलता भी नहीं दिख रही थी. वह बिस्तर पर चुपचाप सी पड़ी रहती.

हीरा ने जब इस बारे में मां से बात की, तो मां ने कहा कि ऐसा होता ही है, चिंता की कोई बात नहीं. रमइया के वहां से जाने के बाद मां ने बेटे हीरा को एकांत में बुला कर कहा, ‘‘बेटा, रमइया को इस की दादी के पास छोड़ आ. काम न धाम, यहां दिनभर पड़ी रहती है… दादी बहुत अनुभवी हैं, उन की देखरेख में रहेगी तो सबकुछ ठीक रहेगा. जब तू दोबारा आएगा, तो इस को वहां से ले आना.’’

‘‘ठीक है मां,’’ कहते हुए हीरा ने सहमति में सिर हिला दिया.

तीसरे ही दिन हीरा रमइया को उस की दादी के पास पहुंचा कर अपने गांव लौट आया. अब हीरा को रमइया के बिना घर सूनासूना सा लगता. वह चुपचाप किसी काम में लगा रहता या फोन से खेलता रहता. एक दिन हीरा ने अपने किसी साथी को फोन लगाया. ‘हैलो’ कहते ही उधर से किसी औरत की आवाज सुन कर हीरा हड़बड़ाया और उस ने जल्दी से फोन काट दिया.

थोड़ी देर बाद उसी नंबर से हीरा के मोबाइल फोन पर 4 बार मिस्ड काल आईं. हीरा की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे… थोड़ी देर बाद उस ने फिर से उसी नंबर पर फोन लगाया. बात हुई… वह नंबर उस के दोस्त का नहीं, बल्कि कोई रौंग नंबर था. जिस औरत ने फोन उठाया था, वह उसी बस्ती से आगे शहर में रहती थी. उस का पति रोजीरोटी के सिलसिले में दिल्ली में रहता था.

उस औरत का नाम प्रीति था. उस की आवाज में मिठास थी और बात करने का तरीका दिलचस्प था. रात के 10 बजे से 2 बजे के बीच हीरा के फोन पर 3 बार मिस्ड काल आईं. अब यह रोज का सिलसिला बन गया. हीरा जबजब अपने, रमइया और प्रीति के बारे में सोचता, तो उसे लगता कि कहीं कुछ गलत हो रहा है. ऐसे में सारा दिन उसे खुद को संभालने में लग जाता, पर फिर जब रात होती, प्रीति की मिस्ड काल आती, तो हीरा का दिल फिर से उस मीठी आवाज की चपेट में आ कर रुई की तरह बिखर जाता.

अब उन में हर रोज बात होने लगी, फिर एक दिन मुलाकात तय की गई. शहर के पार्क में शाम के 4 बजे हीरा को आने को कहा गया. जहां हीरा समय से पहले ही पहुंच गया, वहीं प्रीति 15 मिनट देर से आई. गोरा रंग और छरहरे बदन की प्रीति की अदाओं में गजब का खिंचाव था. कुरती और चूड़ीदार पाजामी में वह बेहद खूबसूरत लग रही थी. वह 5वीं जमात तक पढ़ीलिखी थी.

दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में बदलते चले गए. रमइया एक बेटी की मां बन गई और इधर हीरा के गांव के साथी फिर से काम पर लौटने की तैयारी करने लगे. परदेश जाने से पहले मां ने हीरा से रमइया और बच्ची को देख आने को कहा. हीरा 5-6 दिनों के लिए ससुराल पहुंचा. रमइया का पीला और बीमार चेहरा देख कर हीरा के मन में एक ऊब सी हुई. काली और मरियल सी बच्ची को देख कर उस का मन बैठ सा गया.

हीरा का मन एक दिन में ही ससुराल से भाग जाने को हुआ. खैर, जैसेतैसे उस ने 4 दिन बिताए और 5वें दिन जेल से छूटे कैदी सा घर भाग आया. पंजाब जाने से पहले हीरा प्रीति से मिला, तो उस की सजधज और चेहरे की ताजगी ने उसे रिरियाती बच्ची और रमइया के पीले चेहरे के आतंक से बाहर निकाल लिया.

एक साल गुजर गया. हीरा वहीं रह कर दूसरा रोजगार भी करने लगा. अब वह प्रीति को पैसे भी भेजने लगा था. इधर रमइया की सास से नहीं बनने के चलते वह मायके में ही पड़ी रही. उम्र बढ़ने के साथसाथ रमइया की दादी का शरीर ज्यादा काम करने में नाकाम हो रहा है.

अपना और बेटी का पेट भरने के लिए रमइया ने बस्ती से आगे 2-3 घरों में घरेलू काम करना शुरू कर दिया. बच्ची जनने से टूटा जिस्म और उचित खानपान की कमी में वह दिनोंदिन कमजोर और चिड़चिड़ी होने लगी. इधर तकरीबन एक साल से भी ज्यादा समय बाद हीरा जब वापस घर आया, तो आते ही प्रीति से मिलने चल पड़ा. न तो उस ने रमइया की खबर ली, न ही मां ने उसे रमइया को घर लाने को कहा.

अब प्रीति भी उस से मिलने बस्ती की ओर चली आती. कभी बस्ती के बाहर वाले स्कूल में, कभी खेतों के पीछे, तो कभी कहीं और मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा. पोती की हालत और अपनी बढ़ती उम्र को देखते हुए रमइया की दादी ने हीरा की मां के पास बहू को लिवा लाने के लिए कई संदेश भिजवाए. आखिर में मां के कहने पर हीरा रमइया को लिवाने ससुराल पहुंचा.

ससुराल आ कर रमइया ने देखा कि हीरा या तो घर में नहीं रहता और अगर रहता भी है, तो हमेशा कहीं खोयाखोया सा या फिर अपने मोबाइल फोन के बटनों को दबाता रहता है. पता नहीं, क्या करता रहता है.ऐसे में एक रात रमइया की नींद खुली, तो उसे लगा कि हीरा किसी से बातें कर रहा है. आधी रात बीत चु की थी. इस वक्त हीरा किस से बातें कर रहा है? बातों का सिलसिला लंबा चला. रमइया दीवार से कान लगा कर सुनने की कोशिश करने लगी, पर उस की समझ में ज्यादा कुछ नहीं आ सका.

दूसरे दिन रमइया मौका पा कर हीरा का फोन ले कर बगल वाले रतन काका के पोते, जो छठी जमात में पढ़ता था, के पास गई और उसे सारे मैसेज पढ़ कर सुनाने को कहा.

मैसेज सुन कर रमइया गुस्से से सुलग उठी. वह हीरा के पास पहुंची और उस नंबर के बारे में जानना चाहा. एक पल के लिए हीरा सकपकाया, पर दूसरे ही पल संभल गया. वह बोला, ‘‘अरे पगली, मुझ पर शक करती है. यह तो मेरे साथ काम करने वाले की घरवाली का नंबर है. वह इस दफा घर नहीं आया, इसलिए उस का हालचाल पूछ रही थी.’’

रमइया चुप रही, पर उस के चेहरे पर संतोष के भाव नहीं आए. वह हीरा और उस के मोबाइल फोन पर नजर रखने लगी थी. 2 दिन बाद ही रात को रमइया ने हीरा को प्रीति से फोन पर यह कहते हुए सुन लिया कि कल रविवार है. स्कूल पर आ जाना. 2-3 दिनों के बाद फिर मुझे वापस भी लौटना होगा. दूसरे दिन हीरा 12 बजे के आसपास घर से निकल गया और स्कूल पर प्रीति के आने का इंतजार करने लगा.

थोड़ी ही देर में प्रीति दूर से आती दिखी. कुछ देर तक दोनों खेतों में ही खड़ेखड़े बातें करते रहे, फिर स्कूल के भीतर आ गए. प्रीति थोड़ी बेचैन हो कर बोल उठी, ‘‘ऐसे छिपछिप कर हम आखिर कब तक मिलते रहेंगे हीरा. हमेशा ही डर लगा रहता है. अब मैं तुम्हारे साथ ही रहना चाहती हूं.’’

हीरा प्यार से बोला, ‘‘मैं भी तो यही चाहता हूं. बस, महीनेभर रुक जाओ… दोस्तों के साथ तुम्हें नहीं रख सकता… इस बार जाते ही कोई अलग कमरा लूंगा, फिर आ कर तुम्हें ले जाऊंगा. उस के बाद छिपछिप कर मिलने की कोई जरूरत नहीं होगी.’’

प्रीति ने कहा, ‘‘और तुम जो यहां आ कर 3-3 महीने तक रुकते हो, उस वक्त मैं क्या करूंगी? परदेश में कैसे अकेली रहूंगी और अपना घर कैसे चलाऊंगी?’’ हीरा बोला, ‘‘अरे, 3-3 महीने तो मैं यहां तुम्हारी खातिर पड़ा रहता हूं. जब मेरी प्रीतू मेरे पास होगी, तो मुझे यहां आने की जरूरत ही क्यों पड़ेगी. यहां कभीकभार खर्च के पैसे भेज दिया करूंगा, बाकी जो भी कमाऊंगा, वह सब तुम्हारा.’’

प्रीति ने बड़ी अदा से पूछा, ‘‘अच्छा… तुम कितने पैसे कमा लेते हो कि वहां भी घर चलाओगे, यहां भी भेजोगे?’’

हीरा ने थोड़ा इतरा कर कहा, ‘‘इतना तो कमा ही लेता हूं कि 2 घर आराम से चला लूं,’’ कहते हुए हीरा ने जैकेट उतार कर अपनी दोनों बांहें किसी बौडी बिल्डर के अंदाज में ऊपर उठा कर दिखाईं. प्रीति ने आंखें झुका कर मुंह फेर लिया. हीरा की मजबूत हथेलियों ने प्रीति को कमर से थाम कर अपने करीब कर लिया और उस प्यारे चेहरे से बालों को हटाते हुए आगे झुका. प्रीति ने आंखें बंद कर लीं.

उधर टोकरे में गंड़ासा रख और पल्लू से चेहरे को ढक कर रमइया सीधा स्कूल जा पहुंची. गुस्से से जलती आंखों ने दोनों को एकसाथ ही देख लिया. फुफकारती हुई रमइया ने प्रीति के ऊपर गंड़ासा फेंका, जो सीधा जा कर हीरा को लगा. देखते ही देखते पूरी बस्ती में कुहराम मच गया. जैसेतैसे हीरा को अस्पताल पहुंचाया गया. रमइया को पुलिस पकड़ कर ले गई. प्रीति बड़ी मुश्किल से जान बचा कर वहां से भाग निकली.

गरदन की नस कट जाने से हीरा की मौत हो गई. सुनवाई के बाद अदालत ने रमइया को उम्रकैद की सजा सुनाई. डेढ़ साल की मरियल सी बच्ची को अनाथ बना कर, पेट में एक बच्चे को साथ ले कर रमइया हमेशा के लिए जेल की सलाखों के पीछे कैद कर दी गई. Story In Hindi

Hindi Kahani: राजू बन गया जैंटलमैन – एक कैदी की कहानी

Hindi Kahani: कानों में जानीपहचानी सी आवाज सुन कर मैं चौंक गई. देखा… अरे, यह तो राजू है. यहां दोबारा कैसे आ गया? मैं यह जानने के लिए बेचैन हो गई.

माफ कीजिए, पहले मैं आप को अपने बारे में बता तो दूं. मैं देश की सब से मजबूत दीवारों में से एक हूं. यह किसी कंपनी का इश्तिहार नहीं है. मैं तिहाड़ जेल की दीवार हूं. हिंदी में कहावत है न कि दीवारों के भी कान होते हैं. मैं भी सुनती हूं, देखती हूं, महसूस कर हूं, पर बोल नहीं पाती, क्योंकि मैं गूंगी हूं.

एक बार जो मेरी दहलीज के बाहर कदम रख देता है, वह मेरे पास दोबारा न आने की कसम खाता है. न जाने कितनों ने मेरे सीने पर अपने आंसुओं से अपनी इबारत लिखी है.

कैदियों के आपसी झगड़ों की वजह से अनगिनत बार उन के खून के छींटे मेरे दामन पर भी लगे, फिर दोबारा रंगरोगन कर मुझे नया रूप दे दिया गया.

समय को पीछे घुमाते हुए मैं वह दिन याद करने लगी, जब राजू ने पहली बार मुझे लांघ कर अंदर कदम रखा था. चेहरे पर मासूमियत, आंखों में एक अनजाना डर और होंठों पर राज भरी खामोशी ने मेरा ध्यान उस की ओर खींचा था. मैं उस के बारे में जानने को बेताब हो गई थी.

‘‘नाम बोल…’’ एक अफसर ने डांटते हुए पूछा था.

‘‘जी… राजू,’’ उस ने मासूमियत से जवाब दिया था.

‘‘कौन से केस में आया है?’’

‘‘जी… धारा 420 में.’’

‘‘किस के साथ चार सौ बीसी कर दी तू ने?’’

‘‘जी, मेरे बिजनैस पार्टनर ने मेरे साथ धोखा किया है.’’

‘‘और बंद तुझे करा दिया. वाह रे हरिश्चंद्र की औलाद,’’ अफसर ने ताना मारा था.

अदालत ने उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में यहां मेरे पास भेज दिया था. पुलिस वाले राजू को भद्दी गालियां देते हुए एक बैरक में छोड़ गए थे. बैरक में कदम रखते ही कई जोड़ी नजरें उसे घूरने लगी थीं. अंदर आते ही उस के आंसुओं के सैलाब ने पलकों के बांध को तोड़ दिया था. सिसकियों ने खामोश होंठों को आवाज की शक्ल दे दी थी.

मन में दर्द कम होने के बाद जैसे ही राजू ने अपना सिर ऊपर उठाया, उस ने अपने चारों ओर साथी कैदियों का जमावड़ा देखा था. कई हाथ उस के आंसुओं को पोंछने के लिए आगे बढ़े. कुछ ने उसे हिम्मत दी, ‘शांत हो जा… शुरूशुरू में सब रोते हैं. 2-3 दिन में सब ठीक हो जाएगा.’

‘‘घर की… बच्चों की याद आ रही है,’’ राजू ने सहमते हुए कहा था.

‘‘अब तो हम ही एकदूसरे के रिश्तेदार हैं,’’ एक कैदी ने जवाब दिया था.

‘‘चल, अब खाना खा ले,’’ दूसरे कैदी ने कहा था.

‘‘मुझे भूख नहीं है,’’ राजू ने सिसकते हुए जवाब दिया था.

‘‘भाई मेरे, कितने दिन भूखा रहेगा? चल, सब के साथ बैठ.’’

एक कैदी उस के लिए खाना ले कर आ गया और बाकी सब उसे खाना खिलाने लगे थे.

राजू को उम्मीद थी कि उस के सभी दोस्त व रिश्तेदार उस से मुलाकात करने जरूर आएंगे, लेकिन जल्दी ही उस की यह गलतफहमी दूर हो गई. हर मुलाकात में उसे अपनी पत्नी के पीछे सिर्फ सन्नाटा नजर आता था. हर मुलाकात उस के हौसले को तोड़ रही थी.

राजू की हिरासत के दिन बढ़ने लगे थे. इस के साथ ही उस का खुद पर से भरोसा गिरने लगा था. उस के जिस्म में जिंदगी तो थी, लेकिन यह जिंदगी जैसे रूठ गई थी.

हां, साथी कैदियों के प्यार भरे बरताव ने उसे ऐसे उलट हालात में भी मुसकराना सिखा दिया था.

इंजीनियर होने की वजह से जेल में चल रहे स्कूल में राजू को पढ़ाने का काम मिल गया था. उस के अच्छे बरताव के चलते स्कूल में पढ़ने वाले कैदी उस से बात कर अपना दुख हलका करने लगे थे.

यह देख कर एक अफसर ने राजू को समझाया था, ‘‘इन पर इतना यकीन मत किया करो. ये लोग हमदर्दी पाने के लिए बहुत झूठ बोलते हैं.’’

‘‘सर, ये लोग झूठ इसलिए बोलते हैं, क्योंकि ये सच से भागते हैं…’’ राजू ने उन से कहा, ‘‘सर, किसी का झूठ पकड़ने से पहले उस की नजरों से उस के हालात समझिए, आप को उस की मजबूरी पता चल जाएगी.’’

अपने इन्हीं विचारों की वजह से राजू कैदियों के साथसाथ जेल के अफसरों का भी मन जीतने लगा था.

एक दिन जमानत पाने वाले कैदियों की लिस्ट में अपना नाम देख कर वह फूला न समाया था. परिवार व रिश्तेदारों से मिलने की उम्मीद ने उस के पैरों में जैसे पंख लगा दिए थे.

वहां से जाते समय जेल के बड़े अफसर ने उसे नसीहत दी थी, ‘‘राजू, याद रखना कि बारिश के समय सभी पक्षी शरण तलाशते हैं, मगर बाज बादलों से भी ऊपर उड़ान भर कर बारिश से बचाव करता है. तुम्हें भी समाज में ऐसा ही बाज बनना है. मुश्किलों से घबराना नहीं, क्योंकि कामयाबी का मजा लेने के लिए यह जरूरी है.’’

‘‘सर, मैं आप की इन बातों को हमेशा याद रखूंगा,’’ कह कर राजू खुशीखुशी मुझ दीवार से दूर अपने घर की ओर चल दिया था.

राजू को आज दोबारा देख कर मेरी तरह सभी लोग हैरानी से भर उठे. वह सभी से गर्मजोशी से गले मिल कर अपनी दास्तान सुना रहा था. मैं ने भी अपने कान वहीं लगा दिए.

राजू ने बताया कि बाहर निकल कर दुनिया उस के लिए जैसे अजनबी बन गई थी. पत्नी के उलाहने व बड़े होते बच्चों की आंखों में तैरते कई सवाल उसे परिवार में अजनबी बना रहे थे. वह समझ गया था कि उस की गैरहाजिरी में उस के परिवार ने किन हालात का सामना किया है.

राजू के रिश्तेदार व दोस्त उस से मिलने तो जरूर आए, लेकिन उन की नजरों में दिखते मजाक उस के सीने को छलनी कर रहे थे. उस की इज्जत जमीन पर लहूलुहान पड़ी तड़प रही थी.

राजू के होंठों ने चुप्पी का गहना पहन लिया था. उस की चुनौतियां उसे आगे बढ़ने के लिए कह रही थीं, लेकिन मतलबी दोस्त उस की उम्मीद को खत्म कर रहे थे.

राजू इस बात से बहुत दुखी हो गया था. जेल से लौटने के बाद घरपरिवार और यारदोस्त ही तो उस के लिए सहारा बन सकते थे, पर बाहर आ कर उसे लगा कि वह एक खुली जेल में लौट आया है.

दुख की घनघोर बारिश में सुख की छतरी ले कर आई एक सुबह के अखबार में एक इश्तिहार आया. कुछ छात्रों को विज्ञान पढ़ाने के लिए एक ट्यूटर की जरूरत थी.

राजू ने उन बच्चों के मातापिता से बात कर ट्यूशन पढ़ाने का काम शुरू कर दिया. अपनी जानकारी और दोस्ताना बरताव के चलते वह जल्दी ही छात्रों के बीच मशहूर हो गया. उस ने साबित कर दिया कि अगर कोशिश को मेहनत और लगन का साथ मिले, तो वह जरूर कामयाबी दिलाएगी.

छात्रों की बढ़ती गिनती के साथ उस का खुद पर भी भरोसा बढ़ने लगा. यह भरोसा ही उस का सच्चा दोस्त बन गया.

प्यार और भरोसा सुबह और शाम की तरह नहीं होते, जिन्हें एकसाथ देखा न जा सके. धीरेधीरे पत्नी का राजू के लिए प्यार व बच्चों का अपने पिता के लिए भरोसा उसे जिंदगी के रास्ते पर कामयाब बना रहा था.

यह देख कर राजू ने अपनी जिंदगी के उस अंधेरे पल में रोशनी की अहमियत को समझा और एक एनजीओ बनाया.

यह संस्था तिहाड़ जेल में बंद कैदियों को पढ़ालिखा कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए जागरूक करेगी. अपने इसी मकसद को पूरा करने के लिए ही राजू ने मेरी दहलीज के अंदर दोबारा कदम रखा, लेकिन एक अलग इमेज के साथ. मुझे राजू के अंदर चट्टान जैसे हौसले वाला वह बाज नजर आया, जो अपनी हिम्मत से दुख के बादलों के ऊपर उड़ रहा था. Hindi Kahani

Hindi Kahani: तेंदूपत्ता – क्या था शर्मिष्ठा का असली सच

Hindi Kahani: शर्मिष्ठा ने कार को धीमा करते हुए ब्रैक लगाई. झटका लगने से सहयात्री सीट पर बैठी जेनिथ, जो ऊंघ रही थी, की आंखें खुल गईं, उस ने आंखें मिचका कर आसपास देखा. समुद्रतट के साथ लगते गांव का कुदरती नजारा. बड़ेबड़े, ऊंचेऊंचे नारियल और पाम के पेड़, सर्वत्र नयनाभिराम हरियाली.

‘‘आप का गांव आ गया?’’

‘‘लगता तो है.’’ सड़क के किनारे लगे मील के पत्थर को पढ़ते शर्मिष्ठा ने कहा. दोढाई फुट ऊंचे, आधे सफेद आधे पीले रंग से रंगे मील के पत्थर पर अंगरेजी और मलयाली भाषा में गांव का नाम और मील की संख्या लिखी थी.

‘‘यहां भाषा की समस्या होगी?’’ जेनिथ ने पूछा.

‘नहीं, सारे भारत में से केरल सर्वसाक्षर प्रदेश है. यहां अंगरेजी भाषा सब बोल और समझ लेते हैं. मलयाली भाषा के साथसाथ अंगरेजी भाषा में बोलचाल सामान्य है.’’

‘‘तुम यहां पहले कभी आई हो?’’

‘‘नहीं, यह मेरा जन्मस्थान है, ऐसा बताते हैं. मगर मैं ने होश अमेरिका की ईसाई मिशनरी में संभाला था.’’ शर्मिष्ठा ने कहा.

‘‘तुम्हारी मेरी जीवनगाथा बिलकुल एकसमान है.’’

कार से उतर कर दोनों ने इधरउधर देखा. चारों तरफ फैले लंबेचौड़े धान के खेतों में धान की मोटीभारी बालियां लिए ऊंचेऊंचे पौधे लहरा रहे थे.

समुद्र से उठती ठंडी हवा का स्पर्श मनमस्तिष्क को ताजा कर रहा था. धान के खेतों से लगते बड़ेबड़े गुच्छों से लदे केले के पेड़ भी दिख रहे थे.

एक वृद्ध लाठी टेकता उन के समीप से गुजरा.

‘‘बाबा, यहां गांव का रास्ता कौन सा है?’’ थोड़े संकोचभरे स्वर में शर्मिष्ठा ने अंगरेजी में पूछा.

लाठी टेक कर वृद्ध खड़ा हो गया, बोला, ‘‘आप यहां बाहर से आए हो?’’ साफसुथरी अंगरेजी में उस वृद्ध ने पूछा.

‘‘जी हां.’’

‘‘यहां किस से मिलना है?’’

‘‘कौयिम्मा नाम की एक स्त्री से.’’

‘‘वह नाथर है या नादर? इस गांव में 2 कौयिम्मा हैं. एक सवर्ण जाति की है, दूसरी दलित है. पहली, आजकल सरकारी डाकबंगले में मालिन है, खाली समय में तेंदूपत्ते तोड़ कर बीडि़यां बनाती है. दूसरी, मरणासन्न अवस्था में बिस्तर पर पड़ी है.’’

फिर उस वृद्ध ने उन को एक कच्चा वृत्ताकार रास्ता दिखाया जो सरकारी डाकबंगले को जाता था. दोनों ने उस वृद्ध, जिस का नाम जौन मिथाई था और जो धर्मांतरण कर के ईसाई बना था, का धन्यवाद किया.

कार मंथर गति से चलती, डगमगाती, कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ चली.

डाकबंगला अंगरेजों के जमाने का बना था व विशाल प्रागंण से घिरा था. चारदीवारी कहींकहीं से खस्ता थी. मगर एकमंजिली इमारत सदियों बाद भी पुख्ता थी. डाकबंगले का गेट भी पुराने जमाने की लकड़ी का बना था. गेट बंद था.

कार गेट के सामने रुकी. ‘‘यहां सुनसान है. दोपहर ढल रही है. यहां कहीं होटल होता?’’ जेनिथ ने कहा.

शर्मिष्ठा खामोश रही. उस ने कार से बाहर निकल डाकबंगले का गेट खोला और प्रागंण में झांका, सब तरफ सन्नाटा था.

एक सफेद सन के समान बालों वाली स्त्री एक क्यारी में खुरपी लिए गुड़ाई कर रही थी. उस ने सिर उठा कर शर्मिष्ठा की तरफ देखा और सधे स्वर में पूछा, ‘‘आप किस को देख रही हैं?’’

‘‘यहां कौन रहता है?’’

‘‘कोई नहीं. सरकारी डाकबंगला है. कभीकभी कोई सरकारी अफसर यहां दौरे पर आते हैं. तब उन के रहने का इंतजाम होता है,’’ वृद्ध स्त्री ने धीमेधीमे स्वर में कहा.

‘‘आप कौन हो?’’

‘मैं यहां मालिन हूं. कभीकभी खाना भी पकाना पड़ता है.’’

‘‘आप का नाम क्या है?’’

‘‘मैं कौयिम्मा नाथर हूं’’

शर्मिष्ठा खामोश नजरों से क्यारी में सब्जियों की गुड़ाई करती वृद्धा को देखती रही.

उस को अपनी मां की तलाश थी. मगर उस का पूरा नाम उस को मालूम नहीं था. कौयिम्मा नाथर या कौयिम्मा नादर.

‘‘आप को यहां डाकबंगले में  ठहरना है?’’ वृद्धा ने हाथ में पकड़ी खुरपी को एक तरफ रखते हुए कहा.

‘‘यहां कोई होटल या धर्मशाला है?’’

‘‘नहीं, यहां कौन आता है?’’

‘‘खानेपीने का इंतजाम क्या है?’’

‘‘रसोईघर है, मगर खाली बरतन हैं. लकड़ी से जलने वाला चूल्हा है. गांव की हाट से सामान ला कर खाना पका देते हैं.’’

‘‘बिस्तर वगैरा?’’

‘‘उस का इंतजाम अच्छा है.’’

‘‘यहां का मैनेजर कौन है?’’

‘‘कोई नहीं, सरकारी रजिस्टर है. ठहरने वाला खुद ही रजिस्टर में अपना नाम, पता, मकसद सब दर्ज करता है,’’ वृद्धा साफसुथरी अंगरेजी बोल रही थी.

‘‘आप अच्छी अंगरेजी बोलती हैं. कितनी पढ़ीलिखी हैं?’’

‘‘यहां मिडिल क्लास तक का सरकारी स्कूल है. ज्यादा ऊंची कक्षा तक का होता तो ज्यादा पढ़ जाती,’’ वृद्धा ने अपने मात्र मिडिल कक्षा यानी 8वीं कक्षा तक ही पढ़ेलिखे होने पर जैसे अफसोस किया.

शर्मिष्ठा और उस की अमेरिकन साथी जेनिथ को मात्र 8वीं कक्षा तक पढ़ीलिखी स्त्री को इतनी साफसुथरी अंगरेजी बोलने पर आश्चर्य हुआ.

वृद्धा ने एक बड़ा कमरा खोल दिया. साफसुथरा डबलबैड, पुराने जमाने का

2 बड़ेबड़े पंखों वाला खटरखटर करता सीलिंग फैन, आबनूस की मेज, बेत की कुरसियां.

चंद मिनटों बाद 2 कप कौफी और चावल के बने नमकीन कुरमुरे की प्लेट लिए कौयिम्मा नाथर आई.

‘‘आप पैसा दे दो, मैं गांव की हाट से सामान ले आऊं.’’

शर्मिष्ठा ने उस को 500 रुपए का एक नोट थमा दिया. एक थैला उठाए कौयिम्मा नाथर सधे कदमों से हाट की तरफ चली गई.

कौयिम्मा नाथर अच्छी कुक थी. उस ने शाकाहारी और मांसाहारी भोजन पकाया. मीठा हलवा भी बनाया. खाना खा दोनों सो गईं.

शाम को दोनों घूमने निकलीं. कौयिम्मा नाथर साथसाथ चली. बड़े खुले प्रागंण में ऊंचेऊंचे कगूंरों वाला मंदिर था.

‘‘यह प्राचीन मंदिर है. यहां दलितों प्रवेश निषेध है.’’

थोड़ा आगे खपरैलों से बनी हौलनुमा एक बड़ी झोंपड़ी थी. उस के ऊपर बांस से बनी बड़ी बूर्जि थी. उस पर एक सलीब टंगी थी.

‘‘यह चर्च है. जिन दलितों को मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता था, वे सम्मानजनक जीवन जीने के लिए हिंदू धर्म को छोड़ कर ईसाई बन गए. उन सब ने मिल कर यह चर्च बनाया. हर रविवार को ईसाइयों का एक बड़ा समूह यहां मोमबत्ती जलाने आता है,’’ कौयिम्मा नाथर के स्वर में धर्मपरिवर्तन के लिए विवश करने वालों के प्रति रोष झलक रहा था.

मंथर गति से चलती तीनों गांव घूमने लगीं. सारा गांव बेतरतीब बसा था. कहींकहीं पक्के मकान थे, कहींकहीं खपरैलों से बनी छोटीबड़ी झोंपडि़यां.

एक बड़े मकान के प्रागंण में थोड़ीथोड़ी दूरी पर छोटीछोटी झोंपडि़यां बनी थीं.

‘‘प्रागंण की ये झोंपडि़यां क्या नौकरों के लिए हैं?’’

‘‘नहीं, ये बेटी और जंवाई की झोंपड़ी कहलाती हैं.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘अधिकांश इलाके में मातृकुल का प्रचलन है. यहां बेटियों के पति घरजंवाई बन कर रहते आए हैं. अब इस परंपरा में धीरेधीरे परिवर्तन आ रहा है,’’ कौयिम्मा नाथर ने बताया.

‘‘मगर अलगअलग स्थानों पर झोंपडि़यां?’’

‘‘यहां बेटियां बहुतायत में होती हैं. आधा दर्जन या दर्जनभर बेटियां सामान्य बात है. शादी की रस्म साधारण सी है. जो पुरुष या लड़का, बेटी को पसंद आ जाता है उस से एक धोती लड़की को दिला दी जाती है. बस, वह उस की पत्नी बन जाती है.’’

‘‘और अगर संबंधविच्छेद करना हो तो?’’

‘‘वो भी एकदम सीधे ढंग से हो जाता है. पति का बिस्तर और चटाई लपेट कर झोंपड़ी के बाहर रख दी जाती है. पति संबंधविच्छेद हुआ समझा जाता है. वह चुपचाप अपना रास्ता पकड़ता है.’’

कौयिम्मा नाथर ने विद्रूपताभरे स्वर में कहा, ‘‘मानो, पति नहीं कोई खिलौना हो जिस को दिल भरते फेंक दिया जाता है.’’ वृद्धा ने आगे कहा, ‘‘मगर इस खिलौने की भी अपनी सामाजिक हैसियत है.’’

‘‘अच्छा, वह क्या?’’ जेनिथ, जो अब तक खामोश थी, ने पूछा.

‘‘मातृकुल परंपरा में भी पिता नाम के व्यक्ति का अपना स्थान है. समाज में अपना और संतान का सम्मान पाने के लिए किसी भद्र पुरुष की पत्नी होना या कहलाना जरूरी है.’’

शर्मिष्ठा और जेनिथ को कौयिम्मा नाथर का मंतव्य समझ आ रहा था.

‘‘आप का मतलब है कि स्त्री के गर्भ में पनप रहा बच्चा चाहे किसी असम्मानित व्यक्ति का हो मगर बच्चे को समाज में सम्मान पाने के लिए उस की माता का किसी सम्मानित पुरुष की पत्नी कहलाना जरूरी है,’’ जेनिथ ने कहा.

कौयिम्मा नाथर खामोश रही. शाम का धुंधलका गहरे अंधकार में बदल रहा था. तीनों डाकबंगले में लौट आईं.

अगली सुबह कौयिम्मा नाथर उन को नाश्ता करवाने के बाद तेंदूपत्ते की पत्तियां गोल करती, उन में तंबाकू भरती बीडि़यां बनाने बैठ गई. दोनों अपनेअपने कंधे पर कैमरा लटकाए गांव की तरफ निकलीं.

एक भारतीय लड़की और एक अंगरेज लड़की को गांव घूमते देखना ग्रामीणों के लिए सामान्य ही था. ऐसे पर्यटक वहां आतेजाते रहते थे.

चर्च का मुख्य पादरी अप्पा साहब बातूनी था. साथ ही, उस को गांव के सवर्ण या उच्च जाति वालों से खुंदक थी. सवर्ण जाति वालों के अनाचार और अपमान से त्रस्त हो कर उस ने धर्मपरिवर्तन कर ईसाईर् धर्म अपनाया था.

उस ने बताया कि कौयिम्मा नाथर एक सवर्ण जाति के परिवार से है जो गरीब परिवार था. गांव में सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन थी. जिस को आजादी से पहले तत्कालीन राजा के अधिकारी और कानूनगो ने जबरन गांव के अनेक परिवारों के नाम चढ़ा दी थी.

विवश हो उन परिवारों को खेती कर या मजदूरों से काम करवा कर राजा को लगान देना पड़ता था. एक बार लगान की वसूली के दौरान कानूनगो रास शंकरन की नजर नईनई जवान हुई कौयिम्मा नाथर पर पड़ी. उस ने उस को काबू कर लिया था.

जब उस को गर्भ ठहर गया तब कानूनगो ने कौयिम्मा को अपने एक कारिंदे कुरू कुनाल नाथर से धोती दिला दी थी. इस प्रकार कुरू नाथर कौयिम्मा का पति बन कर उस की झोंपड़ी में सोने लगा था.

जब कौयिम्मा नाथर को बेटी के रूप में एक संतान हो गई तब उस ने एक दोपहर कुरू कुनाल नाथर का बिस्तर और चटाई दरवाजे के बाहर रख दी. शाम को जब कुरू कुनाल नाथर लौटा तब उस को दरवाजा बंद मिला. तब वह चुपचाप अपना बिस्तर उठा किसी अन्य स्त्री को धोती देने चला गया.

बेटी का भविष्य भी मेरे ही समान न हो, इस आशय से कौयिम्मा नाथर ने एक रोज अपनी बेटी को ईसाई मिशनरी के अनाथालय में दे दिया था. वहां से वह बेटी केंद्रीय मिशनरी के अनाथालय में चली गई थी.

इतना वृतांत बताने के बाद पादरी खामोश हो गए. आगे की कहानी शर्मिष्ठा को मालूम थी. ईसाई मिशनरी के केंद्रीय अनाथालय से उस को अमेरिका में रहने वाले निसंतान दंपती ने गोद ले लिया था.

अब शर्मिष्ठा मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत थी. जब उस को पता चला था कि वह घोष दंपती की गोद ली संतान है तो वह अपने वास्तविक मातापिता का पता लगाने के लिए भारत चली आई.

माता का पता चल गया था. पिता दो थे. एक जिस ने माता को गर्भवती किया था. दूसरा, जिस ने माता को समाज में सम्मान बनाए रखने के लिए धोती दी थी.

अजीब विडंबनात्मक स्थिति थी. सारे गांव को मालूम था. कौयिम्मा नाथर का असल पति कौन था. धोती देने वाला कौन था. तब भी थोथा सम्मान थोथी मानप्रतिष्ठा.

रिटायर्ड कानूनगो बीमार पड़ा था. उस के बड़े हवेलीनुमा मकान में पुरुषों की संख्या की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या काफी ज्यादा थी. अपने सेवाकाल में पद के रोब में कानूनगो ने पता नहीं कितनी स्त्रियों को अपना शिकार बनाया था. बाद में बच्चे की वैध संतान कहलाने के लिए उस स्त्री को किसी जरूरतमंद से धोती दिला दी थी.

बाद में वही संतान अगर लड़की हुई, तो उस को बड़ी होने पर कोई प्रभावशाली भोगता और बाद में उस को धोती दिला दी जाती.

यह बहाना बना कर कि वे दोनों पुराने जमाने की हवेलियों पर पुस्तक लिख रही हैं, शर्मिष्ठा और जेनिथ हवेली और उस के कामुक मालिक को देख कर वापस लौट गईं.

धोती देने वाला पिता मंदिर के प्रागंण में बने एक कमरे में आश्रय लिए पड़ा था. उस को मंदिर से रोजाना भात और तरकारी मिल जाती थी. उस की इस स्थिति को देख कर शर्मिष्ठा दुखी हुई. मगर वह क्या कर सकती थी. दोनों चुपचाप डाकबंगले में लौट आईं.

दोनों पिताओं में किसी को भी शर्मिष्ठा अपना पिता नहीं कह सकती थी. मगर क्या माता उस को स्वीकार कर अपनी बेटी कहेगी? यह देखना था.

‘‘मुझे अपनी मां को पाना है, वे इसी गांव की निवासी हैं, क्या आप मदद कर सकती हैं?’’ अगली सुबह नाश्ता करते शर्मिष्ठा ने वृद्धा से सीधा सवाल किया.

‘‘उस का नाम क्या है?’’

‘‘कौयिम्मा.’’

‘‘नाथर या नादर?’’

‘‘मालूम नहीं. बस, इतना मालूम है कि कौयिम्मा है. उस ने मुझे यहां कि ईसाई मिशनरी के अनाथालय में डाल दिया था.’’

‘‘अब आप कहां रहती हो?’’

‘‘मैं अमेरिका में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में हूं. मुझे गोद लेने वाले मातापिता अमीर और प्रतिष्ठित हैं.’’

‘‘मां को ढूंढ़ कर क्या करोगी?’’

‘‘मां, मां होती है.’’

बेटी के इन शब्दों को सुन कर मां की आंखें भर आईं, वह मुंह फेर कर बाहर चली आई. रसोई में काम करते कौयिम्मा सोच रही थी, क्या करे, क्या उस को बताए कि वह उस की मां थी. मगर ऐसे में उस का भविष्य नहीं बिगड़ जाएगा.

अनाथालय ने ब्लैकहोल के समान शर्मिष्ठा के बैकग्राउंड, उस के अतीत को चूस कर उस को सिर्फ एक अनाथ की संज्ञा दे दी थी. जिस का न कोई धर्म था न कोई जाति या वर्ग. वहां वह सिर्फ एक अनाथ थी.

अब वह एक सम्मानित परिवार की बेटी थी. वैल स्टैंड थी. कौयिम्मा नाथर द्वारा यह स्वीकार करने पर कि वह उस कि मां थी, उस पर एक अवैध संतान होने का धब्बा लग सकता था.

एक निश्चय कर कौयिम्मा नाथर रसोई से बाहर आई. ‘‘मेम साहब,

आप को शायद गलतफहमी हो गई है. इस गांव में 2 कौयिम्मा हैं. एक मैं कौयिम्मा नाथर, दूसरी कौयिम्मा नादर. दोनों ही अविवाहित हैं. आप ने गांव कौन सा बताया है?’’

‘‘अप्पा नाडू.’’

‘‘यहां 3 गांवों के नाम अप्पा नाडू हैं. 2 यहां से अगली तहसील में पड़ते हैं. वहां पता करें.’’

शर्मिष्ठा खामोश थी. जेनिथ भी खामोश थी. मां बेटी को अपनी बेटी स्वीकार नहीं कर रही थी. कारण? कहीं उस का भविष्य न बिगड़ जाए. पिता को पिता कैसे कहे? कौन से पिता को पिता कहे.

कार में बैठने से पहले एक नोटों का बंडल बिना गिने बख्शिश के तौर पर शर्मिष्ठा ने अपनी जननी को थमाया और उस को प्रणाम कर कार में बैठ गई. कार वापस मुड़ गई.

‘‘कोई मां इतनी त्यागमयी भी होती है?’’ जेनिथ ने कहा.

‘‘मां मां होती है,’’ अश्रुपूरित नेत्रों से शर्मिष्ठा ने कहा. कार गति पकड़ती जा रही थी. Hindi Kahani

News Story: खौफनाक दांत

News Story: यह छोटा सा होटल शहर से दूर था. आज विजय और अनामिका दोपहर से ही यहीं पर थे. लंच से ले कर डिनर तक. इस बीच उन दोनों ने भरपूर प्यार भी किया था. फिलहाल वे दोनों बिस्तर पर लेटे हुए थे. डिनर हो चुका था और थोड़ी देर बाद वे अपनेअपने घर जाने वाले थे.

रात के 9 बजे वे दोनों होटल से बाहर निकले. विजय बोला, ‘‘मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं. यह सड़क थोड़ी सुनसान लगती है.’’

‘‘अरे, तुम क्यों तकलीफ करते हो. मैं अकेले ही चली जाऊंगी. मैं ने रैपिडो बाइक बुला ली है. बाइक वाले ने कहा था कि वह इस बड़ी सड़क से दूसरी तरफ खड़ा मिलेगा. 2 मिनट का ही तो रास्ता है. तुम निकलो. सुबह लाइब्रेरी में मिलते हैं, ठीक 8 बजे,’’ अनामिका ने विजय के होंठों को चूमते हुए कहा.

विजय ने अनामिका को ‘बाय’ कहा और बाइक स्टार्ट करने लगा.

अनामिका सड़क के दूसरी तरफ चलने लगी. अभी वह कुछ ही दूर गई थी कि अचानक रात के अंधेरे से कुछ आवारा कुत्ते निकल आए. वे भौंक नहीं रहे थे, बल्कि अनामिका को देख कर गुर्रा रहे थे.

अनामिका संभलती, उस से पहले ही एक कुत्ते ने उस पर हमला कर दिया. पीछे हटने की हड़बड़ाहट में अनामिका गिर गई और उस के बाद कई कुत्ते उस पर झपट पड़े.

अनामिका ने होश नहीं खोया, बल्कि एक हाथ में कस कर बैग पकड़ कर उस ने कुत्तों को मारना शुरू किया और दूसरे हाथ से मोबाइल पर विजय का नंबर डायल कर दिया.

विजय ने फोन उठाया तो उसे अनामिका की दबी सी आवाज आई, ‘‘जल्दी आओ, मुझ पर कुछ कुत्ते झपट पड़े हैं.’’

विजय को लगा कि अनामिका कुछ बदमाशों को ‘कुत्ता’ कह रही है और उस की इज्जत पर आंच आई है. उस ने जल्दी से अपनी बाइक मोड़ी और तेज रफ्तार से अनामिका की तरफ बढ़ गया.

इस बीच रैपीडो बाइक वाला लड़का भी वहां आ गया था. उस ने शोर मचा कर कुत्तों को भगाना चाहा, पर वे कुत्ते उस पर भी झपटने लगे, लेकिन काट नहीं पाए.

इस बीच अनामिका को थोड़ा समय मिल गया और वह किसी तरह उठ कर वहां से जाने लगी. उसे कुत्तों ने काट खाया था. वह दर्द से तड़प रही थी.

तभी विजय वहां आ गया और उस ने झट से अनामिका को अपनी बाइक पर बिठाया और पास के प्राइवेट अस्पताल की तरफ चल दिया. तब तक रैपीडो बाइक वाला भी वहां से निकल गया था.

अस्पताल में डाक्टर ने अनामिका के जख्म देख कर कहा, ‘‘आवारा कुत्तों के खौफनाक दांतों का कहर बढ़ने लगा है. अब तो इस तरह के केस बढ़ने लगे हैं. आप चिंता मत करें. हम रेबीज का टीका लगा देंगे और आप के घाव अच्छे से साफ कर देंगे.’’

‘‘डाक्टर साहब, मैं तो कहता हूं कि आवारा कुत्तों के साथसाथ उन कुत्तों पर भी बैन लगना चाहिए, जिन्हें लोग अपने घरों में पालते हैं. मैं ने कुछ वीडियो देखे हैं, जिन में आवारा कुत्ते ही नहीं, बल्कि पालतू कुत्ते भी अचानक से किसी पर भी हमला कर देते हैं. कुत्तों की कुछ नस्लें तो इतनी ज्यादा खतरनाक हैं कि अगर वे बिदक जाएं, तो अपने मालिक को भी काटने से गुरेज नहीं करती हैं,’’ विजय बोला.

‘‘बात सिर्फ कुत्तों के काटने की नहीं है, बल्कि उन से होने वाले लाइलाज रोग रेबीज की भी है. जिसे होता है वह तो अपनी जान से जाता ही है, दूसरों में भी दहशत हो जाती है,’’

डाक्टर के पास खड़ी एक नर्स ने कहा.

‘‘पर डाक्टर साहब, यह रेबीज बला क्या है?’’ विजय ने सवाल किया.

डाक्टर ने बताया, ‘‘आसान भाषा में समझें तो रेबीज एक खतरनाक वायरस है जो कुत्ते, लोमड़ी, बंदर या बिल्ली जैसे जानवरों के काटने से फैल सकता है. अगर किसी इनसान के घाव पर संक्रमित जानवर की लार लग जाए, तो वह रेबीज से संक्रमित हो सकता है. इस का एक ही इलाज है कि तुरंत रेबीज से बचाव का टीका लगवाएं.

‘‘आप को बता दूं कि उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में रेबीज संक्रमण फैलने से एक मासूम की मौत हो गई थी. कुत्ते द्वारा उस का घाव चाटने के कुछ दिनों बाद 2 साल के अदनान की जान चली गई थी. इस घटना के बाद पूरे गांव में दहशत फैल गई थी. यह एक मामला नहीं है, बल्कि हर जगह से ऐसी खबरें आती रहती हैं.’’

‘‘रेबीज से पीडि़त कुत्ते की पहचान क्या होती है?’’ विजय ने दूसरा सवाल किया.

‘‘रेबीज से पीडि़त कुत्ते की पहचान कुछ साफसाफ लक्षणों से होती है, जैसे बिना उकसाए बारबार काटना, आवाज बदलना या भौंकने में दिक्कत, मुंह से झाग निकलना, अजीब चाल, गिरनालड़खड़ाना, इलाके को न पहचान पाना, जबड़ा ढीला होना, आंखों में खालीपन और अजीबोगरीब बरताव.

‘‘अगर कोई कुत्ता रेबीज से संक्रमित होता है, तो वह सिर्फ इनसानों को नहीं, बल्कि किसी भी चीज को काट सकता है. ऐसे कुत्तों का जीवनकाल बहुत छोटा होता है,’’ डाक्टर ने बताया.

‘‘मैं ने भी एक खबर पढ़ी थी कि किस तरह आवारा कुत्तों का खौफ दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी बढ़ गया है.

‘‘उस खबर के मुताबिक, गलीमहल्ले में आवारा कुत्तों के बढ़ते आतंक को ले कर केंद्रीय मंत्री रह चुके और लोक अभियान के अध्यक्ष विजय गोयल ने 15 मार्च, 2023 को जंतरमंतर पर धरना भी दिया था. उन्होंने तब कहा था कि कुत्तों के डर से लोग पार्कों और गलियों में नहीं जा सकते हैं. उन्होंने बताया कि 28 फरवरी, 2023 को उन्होंने इसे ले कर उपराज्यपाल को चिट्ठी भी लिखी थी,’’ विजय बोला.

‘‘पर डाक्टर साहब, आवारा कुत्तों के आक्रामक होने की वजहें क्या होती हैं?’’ इस बार अनामिका ने डाक्टर से सवाल किया.

‘‘आवारा कुत्तों के आक्रामक बरताव की कई वजहें हैं. अगर ऐसे कुत्तों को लगता है कि कोई शख्स उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है, तो वे उस पर हमला कर सकते हैं. आवारा कुत्तों के निशाने पर बच्चे और बुजुर्ग ही होते हैं. जैसे ही उन्हें मौका मिलता है, वे उन पर हमला कर देते हैं. इस के अलावा कुत्तों के इलाकों में कोई जाता है, तो भी उन्हें अटपटा लगता है और वे लोगों पर हमला कर देते हैं.

‘‘अगर आप को आवारा कुत्ते देखते ही भौंकने लगें, तो आप सतर्क हो जाएं. इस के अलावा अगर कोई आवारा कुत्ता परेशान सा घूम रहा हो, तो भी सतर्क हो जाएं. अगर बच्चे बाहर खेलने जाएं, तो वहां किसी बड़े को भी जरूर होना चाहिए,’’ डाक्टर ने बताया.

‘‘यही वजह है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया. आवारा कुत्ते रेबीज की बढ़ती घटनाओं की बड़ी वजहों में से एक हैं और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता जताई है.

‘‘रेबीज और आवारा कुत्तों की समस्या दुनियाभर में है. इस को ले कर सब से अहम सवाल यह उठता है कि भारत और दुनियाभर में आवारा कुत्तों पर काबू पाने के लिए किस तरह की नीति का पालन किया जाता है?

‘‘वर्ल्ड हैल्थ और्गेनाइजेशन का कहना है कि भारत में रेबीज के असली आंकड़ों की जानकारी नहीं है, लेकिन मुहैया जानकारी के मुताबिक, हर साल इस से 18 हजार से 20 हजार मौतें होती हैं.

‘‘सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में साल 2024 में रेबीज से 54 मौतें दर्ज की गईं, जो साल 2023 में दर्ज 50 मौतों से ज्यादा थीं,’’ विजय ने बताया.

यह सुन कर नर्स बोली, ‘‘जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा था कि इस समस्या की सब से बड़ी वजह जिम्मेदार महकमों की लापरवाही है. लोकल अथौरिटी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी.’’

विजय ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘11 अगस्त, 2025 को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की 2 जजों वाली खंडपीठ ने आवारा कुत्तों से जुड़े मसले पर फैसला सुनाते हुए सख्त निर्देश दिया था कि पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 (एबीसी नियम) के तहत एक बार पकड़े जाने और नसबंदी किए जाने के बाद आवारा कुत्तों को उन के इलाकों में वापस नहीं छोड़ा जाना चाहिए.

‘‘इस के बाद देशभर में डौग लवर्स ने एक मुहिम चलाई कि यह आवारा कुत्तों के साथ नाइंसाफी है. हर कुत्ते को शहर में या कहीं भी इनसान के साथ रहने का हक है.

‘‘इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले आदेश में बदलाव करते हुए नया निर्देश दिया कि दिल्ली में सभी आवारा कुत्तों को पकड़ कर नसबंदी और टीकाकरण किया जाएगा. उन्हें जहां से उठाया गया है, वहीं छोड़ दिया जाएगा.

‘‘रेबीज से संक्रमित और आक्रामक कुत्तों को सड़क पर नहीं छोड़ा जाएगा. इस के अलावा नगरनिगम को कुत्तों के लिए अलग फीडिंग पौइंट बनाने होंगे और सड़क या सार्वजनिक जगहों पर खाना खिलाना मना रहेगा. यह आदेश पूरे देश में लागू होगा.

‘‘आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का कहना है कि यह फैसला जनता को राहत देने वाला है और सरकार ईमानदारी से इस समस्या का समाधान करेगी.

‘‘दूसरी ओर दिल्ली के मेयर इकबाल सिंह ने बताया है कि दिल्ली नगरनिगम के पास कोई शैल्टर होम नहीं हैं. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली नगरनिगम के पास 10 नसबंदी केंद्र हैं, जिन्हें बढ़ाया जा सकता है और कुछ शैल्टर होम बनाए जाएंगे.’’

‘‘यह तो सरकारी काम हुआ न. पर क्या इस से आवारा कुत्तों की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा? क्या दिल्ली जैसे बड़े शहर आवारा पशुओं के रहने लायक बचे हैं? कुत्तों के साथसाथ गाय और सांड़ भी खुलेआम सड़कों पर घूमते दिखते हैं. कई बार तो उन्हें बचाने के चक्कर में सड़क पर हादसे भी हो जाते हैं.

2 सांड़ों की लड़ाई में कोई बेकुसूर इनसान भी घायल हो जाता है,’’ अनामिका ने अपनी बात रखी.

इस पर विजय ने कहा, ‘‘तुम सही कहती हो. दिल्ली जैसे शहर जहां हर जगह कंक्रीट की सड़कें बन गई हैं, वहां आवारा कुत्तों का रहना ही सब से बड़ी समस्या बन गया है. वे सड़कों पर ही गंदगी करते हैं, जिस से लोगों का चलना तक दूभर हो जाता है. रात को उन के भौंकने से नींद में खलल पड़ता है. पार्कों में भी आवारा कुत्ते घूमते रहते हैं.

‘‘यही समस्या कुत्ते पालने वालों के साथ भी है. पहले घर ज्यादा मंजिला नहीं होते थे, तो उन्हें संभालना इतना मुश्किल नहीं था, पर अब बहुमंजिला इमारतों का जमाना है. अपार्टमैंट्स कल्चर में हमें अपनी सुविधा के साथसाथ दूसरों की सहूलियत भी देखनी पड़ती है.

‘‘पर लोग समझते ही नहीं हैं. वे अपने कुत्तों को टहलाने के बहाने कहीं भी गंदगी करा देते हैं और साफ भी नहीं करते हैं. इस बात पर आएदिन उन का दूसरों के साथ झगड़ा होता है.

‘‘कई बार तो लोग लिफ्ट से अपने पालतू कुत्ते को ले जाते हैं. क्या लिफ्ट पालतू कुत्तों के लिए बनी है? बिलकुल नहीं, पर वे इसे अपना हक समझते हैं और जब कुत्ता किसी को काट ले, तो वे पीडि़त पर ही दोष लगाते हैं कि तुम बाद में लिफ्ट में आ जाते.’’

डाक्टर ने अनामिका को रेबीज का टीका लगा दिया था और जख्मों पर मरहमपट्टी भी कर दी थी. उन्होंने कहा, ‘‘एक बात और यह कि दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में तकरीबन 10 लाख आवारा कुत्ते हैं, इसलिए सभी के लिए तय फीडिंग स्पौट बनाना बहुत मुश्किल काम है.

‘‘इन हालात में जरूरी है कि नगरनिगम, एनजीओ और ऐक्टिविस्ट मिल कर ऐसे समाधान खोजें, जो आवारा जानवरों के फायदे में हों और साथ ही प्रशासन के लिए भी अपना काम करना आसान हो जाए.

‘‘केवल आपसी सहयोग और समझदारी से ही यह समस्या हल हो सकेगी. वैसे भी कुत्ते हमारे दुश्मन
नहीं है, बल्कि ये बहुत प्यारे होते हैं और सदियों से इनसान के साथ रहते आए हैं.’’ News Story

Hindi Story: खन्नाजी की शहादत

Hindi Story: खन्नाजी खुद में जीने वाले आदमी थे. दुनिया से उन का कोई ज्यादा वास्ता न था. न उन्हें दुनिया से ज्यादा मतलब था और न ही दुनिया को उन से. सब उन्हें ‘खन्नाजी’ के नाम से ही जानते थे. उन का असली नाम क्या था, महल्ले के ‘काने कौए’ को भी नहीं पता था.

असल में उन का असली नाम जानने की कभी किसी को जरूरत ही नहीं पड़ी. न खन्नाजी कभी किसी को अपने घर बुलाते थे, न कोई खन्नाजी को.

खन्नाजी की खासीयत यह थी कि वे सरकारी सेवा में थे, वह भी केंद्र सरकार की. हां जी, वे रेलवे के डाक महकमे में थे. इस महकमे को बोलचाल की भाषा में ‘आरएमएस’ के नाम से जाना जाता है.

खन्नाजी की एक और खासीयत यह थी कि वे जरूरत से ज्यादा अंधविश्वासी और टोनेटोटकों में यकीन करने वाले थे.

खन्नाजी जब इस शहर में आए थे, तब वे शादीशुदा और बालबच्चेदार थे. मतलब उन की एक सगी पत्नी और एक बेटी थी. उन की पत्नी का नाम जानना जरूरी नहीं है, क्योंकि वे बहुत जल्दी हम से विदा लेने वाली हैं. हां, बेटी का नाम उर्मिला है और उस का नाम जानना जरूरी है, क्योंकि वह आखिर तक हमारे साथ रहने वाली है.

हां जी, जैसे बताया जा चुका है, खन्नाजी की पत्नी एक दिन बाकायदा चली गईं यानी अपने प्रेमी के साथ फुर्र हो गईं. आप सोच रहे होंगे कि खन्नाजी इस से खासे परेशान हुए होंगे, तो जनाब आप को बता दूं कि इस से खन्नाजी की सेहत पर रत्तीभर फर्क नहीं पड़ा. उन्होंने अपनी पत्नी को ढूंढ़ने तक की भी जहमत न उठाई.

खन्नाजी सुबह उठ कर उर्मिला को स्कूल छोड़ कर खुद औफिस चले गए. वैसे, उन की पत्नी जेवर और रुपयापैसा ले कर भागी थीं, तो भी उन्होंने इस की रिपोर्ट थाने में दर्ज नहीं कराई, मानो सबकुछ आपसी रजामंदी से हुआ हो.

महल्ले वालों को तो कई दिनों के बाद खन्नाजी की पत्नी के भागने का पता चला. महल्ले वालों से संबंध न रखने का यह भी खास फायदा है कि मतलब न रखो तो उन्हें ऐसी खास बातों का पता ही नहीं चलता, जिन पर चटकारे लिए जा सकें. सामने अफसोस और पीछे हंसा जा सके.

खन्नाजी का कोई सगा रिश्तेदार भी हमदर्दी जताने नहीं आया. किसी को कोई जानकारी भी नहीं थी कि खन्नाजी का कोई रिश्तेदार है भी कि नहीं.

किसी को यह उम्मीद भी नहीं थी कि खन्नाजी जैसे आदमी का कोई रिश्तेदार होता भी होगा.

खैर, खन्नाजी को किसी की हमदर्दी की जरूरत थी भी नहीं. इस बात को आप अब तक समझ ही गए होंगे. खन्नाजी को इज्जत और बेइज्जती की कोई फिक्र नहीं थी. वे इन दोनों बातों से बहुत पहले ही बहुत ऊपर उठ चुके थे. कोई उन के बारे में क्या कहता है, उन की बला से.

खन्नाजी अपने सुखदुख के खुद साथी थे, इसलिए आप उन को हरदम बड़बड़ाते हुए और बेवजह मुसकराते हुए देख सकते थे. यह उन का पागलपन नहीं, बल्कि अपने दुखसुख बांटने के अजबगजब तरीके थे.

सचमुच ऐसे लोग धरती पर बहुत कम हैं, जो अपने दुखों को किसी के संग बांट कर बेवजह किसी को पीड़ा नहीं देते. नहीं तो आज की तारीख में किसी से बात करो, कुछ ही देर में वह अपना दुखड़ा रोने लगता है.

वैसे, आप यह कतई मत सोचिए कि खन्नाजी की पत्नी भाग गईं, तो दूसरी आईं नहीं. सरकारी नौकरी के यही तो फायदे हैं. आमदनी का पक्का जरीया.

खन्नाजी को अच्छीखासी मासिक तनख्वाह मिलती थी, फिर उन्हें बीवियों का अकाल कैसे सता सकता था? कुछ ही दिनों में खन्नाजी फिर शादीशुदा हो गए. दूसरी बीवी आईं बाद में, भाग पहले गईं. मतलब जितनी जल्दी आई थीं, उतनी ही जल्दी वे चली भी गईं, मानो कोई मेहमानदारी निभाने आई हों.

लेकिन कमाल देखिए, खन्नाजी के चेहरे पर इस बार भी जरा सी शिकन नहीं. उन्हें अपनी सरकारी नौकरी पर पूरा भरोसा था कि जब तक उन के पास यह ‘पारस पत्थर’ है तब तक पत्नियां आती रहेंगी. एक ढूंढ़ेंगे, चार मिलेंगीं.

तीसरी पत्नी हाजिर. लेकिन जैसे खन्नाजी की सरकारी नौकरी पक्की थी वैसे ही यह घरवाली भी पक्की निकली. चट्टान की तरह अचल. खन्नाजी हैरान. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि उन्हें इतनी टिकाऊ पत्नी भी मिल सकती है.

लेकिन टिकाऊ पत्नी के साइड इफैक्ट भी टिकाऊ थे. खन्नाजी की पूरी तनख्वाह उन की तीसरी पत्नी राजबाला के हाथों में पहली तारीख को ही आ जाती थी.

राजबाला ने घर को अच्छे से संभाल लिया. घर क्या संभाल लिया, पूरा राजपाट ही अपने हाथ में ले लिया. खन्नाजी अब 2 जगह नौकरी बजाने लगे, एक औफिस में और दूसरी घर पर. घर के हिसाबकिताब से उन्हें कोई लेनादेना नहीं था. हां, कभी पैसे दे कर उन से कोई सामान मंगवाया जाता, तो उस का पाईपाई का हिसाब उन्हें राजबाला को देना होता था. उन की पासबुक, चैकबुक और एटीएम कार्ड पर राजबाला का कब्जा था.

खन्नाजी कीपैड वाला मोबाइल इस्तेमाल करते थे और राजबाला स्मार्ट फोन. औनलाइन शौपिंग में भी राजबाला माहिर हो गई थीं.

धीरेधीरे राजबाला खन्नाजी के कान उमेठना भी सीख गईं. कभीकभी वे उन की पिटाई भी कर देती थीं, तो वे उसे ‘पत्नी का प्रसाद’ समझ कर खा लिया करते थे.

राजबाला हमेशा सोचती थीं कि खन्नाजी की पहली वाली दोनों पत्नियां कितनी बेवकूफ थीं, जो इतने आज्ञाकारी पति को छोड़ कर चली गईं. आखिर सोने का अंडा देने वाली मुरगी को भी कोई छोड़ कर जाता है क्या?

आखिरकार राजबाला को संतान सुख हुआ और उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया. उस का नाम रखा गया दिवाकर. वैसे वे उर्मिला को भी बेटी की तरह ही प्यार करती थीं. मांबेटी में बहुत अच्छे से पटती थी, क्योंकि दोनों ही खन्नाजी को बेवकूफ समझती थीं.

खन्नाजी को इन बातों से कोई मतलब नहीं था, कोई उन को क्या समझाता था. उन की जिंदगी उन के हिसाब से बढि़या चल रही थी. बच्चे बड़े होने लगे तो खन्नाजी बुढ़ाने लगे.

बुढ़ाने का मतलब केवल इतना सा है कि उन के कुछ बालों पर सफेदी आ गई, लेकिन उन की कदकाठी को देख कर यही लगता था ‘अभी तो मैं जवान हूं’.

खन्नाजी ने अपनी सारी जिंदगी किराए के मकान में निकाल दी थी, क्योंकि उन की पत्नियों को उन से ज्यादा लगाव उन की तनख्वाह से रहा था, इसलिए वे कभी मकान खरीदने या बनाने का सपना नहीं देख पाए थे.

तभी कोरोना की दूसरी लहर आ गई. वैसे तो खन्नाजी हमेशा मास्क लगा कर रखते थे, पर नाक के नीचे. फिर कोरोनाजी खन्नाजी को कहां छोड़ने वाले थे. उस ने एक दिन खन्नाजी को धरदबोचा और अजगर की तरह बढि़या से लपेट लिया.

खन्नाजी ने ‘खोंखों’ करना शुरू किया, तो राजबाला ने उन्हें अलग कमरे में डाल दिया. खन्नाजी के रिटायरमैंट में अभी 4 साल बाकी थे.

राजबाला के दिमाग में एक बढि़या विचार आया. उन्होंने फर्रुखाबाद से अपने भाई को बुला कर उस से सलाहमशवरा किया. सलाहमशवरा अव्वल दर्जे का था जैसे साहित्य में अव्वल दर्जे की ‘क्लासिकल रचनाएं’ होती हैं.

तो भाई, सलाहमशवरे का असर यह हुआ कि खन्नाजी को अस्पताल तब ले जाया गया, जब उन में कुछ ही सांसें ही बची थीं. अस्पताल वालों ने उन की बचीखुची सांसें ले कर उन की डैड बौडी को बढि़या से पैक कर के वापस कर दिया.

जब राजबाला और उन का भाई खन्नाजी की डैड बौडी को वापस ला रहे थे, तो वे अंदर से मुसकरा और बाहर से बेतरतीब रो रहे थे.

आप सोच रहे होंगे बेचारे खन्नाजी दुनिया से यों ही चले गए. नहीं भाई नहीं, कोरोना में खन्नाजी की शहादत बहुत काम आई.

श्रीमती खन्नाजी यानी राजबाला की पैंशन बन गई और रेलवे ने दिवाकर को बालिग होने पर कोटे से खन्नाजी की जगह नौकरी देने का वचन दिया. बहनभाई का सलाहमशवरा सौ फीसदी कामयाब रहा.

इस का मतलब यह नहीं कि राजबाला ने खन्नाजी के गुजर जाने पर उन की शहादत पर कुछ किया ही न हो. उन की तेरहवीं धूमधाम से मनाई गई. सब को बढि़या पकवान खिलाए गए. हम भी मेवे वाली खीर और रसगुल्ले डकोस कर आए. खन्नाजी की शहादत सच में शानदार रही. Hindi Story

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