Social Story: सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने वर्कर्स की एक मांग की सुनवाई करते हुए कहा कि यूनियनों ने देश के कारखानों को बंद कराने का बड़ा काम किया है. उन्होंने कहा कि बचपन में उन्होंने सैकड़ों छोटीबड़ी फैक्टरियों को चलते देखा जो अब यूनियनों की वजह से बंद हो गई हैं.
यह सही ही लगता है क्योंकि 1950 के बाद अचानक देश के थोड़े से कारखानों में भी धड़ाधड़ हड़तालें होने लगी थीं. हर छोटीबड़ी फैक्टरी के सामने 1 नहीं 10-10 अलगअलग यूनियनों के ?ांडे लग जाते थे और यूनियनों को कंट्रोल करने के तरहतरह के कानूनों के बावजूद यूनियनबाजी में मोटा मुनाफा होने लगा था. जो भी जरा सा सम?ादार वर्कर होता वह अपनी यूनियन खोल लेता था.
इस की वजह शायद यह रही कि जब से देश में हिंदू राजाओं का राज खत्म हुआ, काम न करने के आदी ब्राह्मणों को रोजीरोटी के लाले पड़ने लगे. वे गांवों में हाथ का काम भी नहीं कर पाते थे. बिहार में जहां उन्होंने खेती करनी शुरू की उन्हें निचले पायदान का भूमिहार ब्राह्मण कहा जाने लगा.
जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने पैर जमाए तो उन्होंने बढ़चढ़ कर उस की सेना में नौकरी शुरू कर दी और अपने ही देश के लोगों के खिलाफ लड़ाइयां शुरू कर दीं. 1957 का विद्रोह ब्राह्मण सैनिकों ने शुरू किया क्योंकि गांवों में उन्हें गोरों की सेना में काम करने और चरबी वाले कारतूसों का इस्तेमाल करने पर जाति से बाहर किया जाने लगा.
बाद में जब कारखाने लगने लगे तो वे बड़ी तादाद में गांवों से शहर आए और चूंकि वे थोड़े सम?ादार थे, उन्होंने मशीनें चलाना जल्दी सीख लिया. वे बातचीत में भी अच्छे थे, व्यवहार में भी और इसलिए अंगरेज और देशी सेठों ने उन्हें नौकरियां भी दीं.
पर उन का मन हाथ के काम में क्या लगना था, इसलिए उन्होंने यूनियनों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया. दुनियाभर में मार्क्सवादी स्लोगन चल ही रहे थे, वर्कर्स औफ द वर्ल्ड यूनाइट के नारे लगा रहे थे. इन को सम?ाने में इन ऊंची जातियों के वर्कर्स को देर नहीं लगी और देश के कारखाने यूनियनबाजी, हड़तालों, काम रोको, नियम के हिसाब से काम के शिकार हो गए.
आज यूनियनें कमजोर हो गई हैं क्योंकि अब कारखानों में पिछड़ी व निचली जातियों के लोग हैं जो काम करने को जिंदगी का असल मानते हैं. उन के लिए कैसा भी काम, कितना भी काम अच्छा ही है. आज अगर कम्यूनिस्ट पार्टियां आखिरी सांसें ले रही हैं तो इसलिए कि अब वर्कर्स तो ओबीसी व एससी जातियों के हैं जिन के लिए काम बेइज्जती नहीं है. वे कमाई भी अच्छी करते हैं और पढ़लिख कर आगे बढ़ रहे हैं. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सही कहा है पर अब लेबर कोर्ट काम को जाति के चश्मे से नहीं देखती. तभी तो देश तरक्की कर पा रहा है.
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सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला कि पीरियड के दिनों में स्कूली बच्चों को स्कूल में मुफ्त सैनिटरी पैड पाना उन का मौलिक हक है और स्कूलों को पैड बदलने की जगह और मुफ्त पैड देने ही पड़ेंगे, एक अच्छा फैसला है. लाखों लड़कियां माहवारी के दिनों में स्कूल ही नहीं आतीं क्योंकि स्कूलों के शौचालय गंदे होते हैं और वहां पैड बदलना मुश्किल होता है. बहुत सी लड़कियों के पास सैनिटरी पैड खरीदने के पैसे नहीं होते और वे फटेपुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं पर उन्हें बैग में लाना मुश्किल होता है और इसलिए वे 4-5 दिन स्कूल ही नहीं आतीं.
गांवदेहात की ही नहीं कसबों और शहरों की लड़कियों को भी पैड बदलने में मुश्किल होती है जबकि थोड़ी सी बदन में कमजोरी के बावजूद वे पढ़ने या काम करने लायक रहती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इस का इंतजाम करने का जिम्मा स्कूलों पर डाल कर अच्छा काम किया है, यह तो सरकारों और पंचायतों को कब का कर लेना चाहिए था. सैनिटरी पैड मुफ्त राशन की तरह जरूरी है और चाहे जो भी खर्च हो, यह इंतजाम होना चाहिए.
जैसेजैसे लड़कियां स्कूलों में आगे बढ़ रही हैं, पढ़ने में लड़कों को पछाड़ रही हैं, देश को उन्हीं से उम्मीद है. लड़कों ने तो अपनी जिंदगी फालतू की रीलबाजी, गली के नुक्कड़ पर खड़े हो कर कमैंट पास करने में, धर्म के नाम पर कांवड़ ढोने और नशे में जिंदगी बरबाद करनी शुरू कर दी है. घरों में अब लड़कियों का जन्म खुशी लाने लगा है क्योंकि पेरैंट्स को लगता है कि उन का घर चलाने वाली अब कोई पैदा हो गई है जबकि लड़के एक आफत बनने लगे हैं जिन्हें पालना मुश्किल होता जा रहा है.
आज जरूरत है कि देश ही नहीं घर भी लड़कियों के आड़े आने वाली हर दिक्कतको दूर करे. सदियोें से धर्मों ने ऐसी बिसात बिछाई है कि लड़कियों को या तो सैक्स सुख के लिए रिजर्व कर दिया गया या फिर घरेलू काम के लिए ताकि लड़के और मर्द मौजमस्ती कर सकें. तरहतरह के रीतिरिवाज, त्योहार, परंपराएं, तीर्थयात्राएं लड़कियों और औरतों को फालतू में थकाने के लिए बनाई गई हैं और जो भी इन में भाग नहीं लेतीं, समाज का नाम ले कर घर के आदमी जबरन उन से ये सब करवाते हैं.
माहवारी के दिनों में जहां भी कहीं काम से छुटकारा मिलता था, वहां लड़कियों को किसी गंदे कमरे में बंद कर दिया जाता था यह जताने के लिए वे पैदा ही गंद में हुई हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से स्कूलों को सैनिटरी पैड खरीदने की ग्रांट मिलेगी और इस में बड़े घपले होंगे जिस से स्कूलों के अफसरों को मोटा फायदा होगा. यही लड़कियों के लिए नया मौका देगा कि वे अपना दमखम दिखाएं और कोर्ट के आदेश पर बनी कमेटियों को शिकायतें कर सकें. स्कूली पढ़ाई लड़कियों को जहालत से निकालने के लिए जरूरी है. सैनिटरी पैड इतना ही जरूरी है जितनी बेटियां.




