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पकड़ौआ ब्याह : भाभी से कैसा परदा

ट्रेन पूरी स्पीड से भागी जा रही थी. ट्रेन के उस एसी कोच में सन्नाटा पसरा था. पराग के सामने वाली सीट पर भी कोई नहीं था. ऊपर की बर्थ पर एक बुजुर्ग बैठे थे, जो बीचबीच में ऊपर की बर्थ से नीचे उतर कर अपना नीचे रखा सूटकेस खोल कर देख लेते थे, फिर ऊपर की बर्थ पर जा कर लेट जाते थे.

पराग ने उस बुजुर्ग को नीचे वाली बर्थ पर आने को कहा, लेकिन उन का कहना था कि उन की बर्थ ऊपर वाली है. वे ऊपर ही रहेंगे. नीचे की बर्थ का पैसेंजर आ गया, तो फिर उठना पड़ेगा.

पराग ने फिर दोबारा नहीं कहा. वह जानता था कि पैसेंजर को आना होता तो अब तक आ गया होता. खैर, वह फिर अपना लैपटौप खोल कर बैठ गया.

तकरीबन 25 साल का पराग दिल्ली मैट्रो रेल में नौकरी करता था. सालभर पहले ही उस की नौकरी लगी थी. लेकिन अब वह दिल्ली मैट्रो रेल की नौकरी छोड़ने वाला था, क्योंकि दिल्ली की ही एक अच्छी कंपनी में उसे आटोमोटिव इंजीनियर की नौकरी मिल गई थी.

थोड़ी देर में ही लैपटौप बंद कर पराग खिड़की से बाहर देखने लगा. अगस्त का महीना था. हलकीहलकी फुहार थी. हरियाली की चादर चारों ओर थी. कुदरत मानो मुसकरा रही थी. छोटेछोटे टीले ऊंचेनीचे छोटे से पहाड़, जगहजगह तालाबों में पानी भरा था.

ऐसा ही खुशनुमा मौसम था, जब पराग की मुलाकात गोमती से हुई थी. गोमती अब 23 साल की होगी. गोमती उस के गांव की लड़की. गांव की मिट्टी सी सौंधीसौंधी खुशबू उस के पूरे शरीर से उठती हुई महसूस होती.

पराग आज भी वह 2 साल पहले की बारिश का दिन नहीं भूलता, जब गांव के पेड़ों पर सावन के ?ाले डल गए थे. गोमती अपने घर के बाहर बगीचे के झूले में झाला झूल रही थी. नीले रंग के सलवारसूट में लंबी लहराती चोटी, उस पर बारिश की फुहारें… सूट भीग कर

उस के शरीर से चिपक गया था, जिस से उस का शरीर किसी अजंता की मूरत सा दिख रहा था.

पराग का दिल पहली बार इतनी जोर से धड़का था. उसे अपने दिल की धड़कन की आवाज सुनाई देने लगी थी. पराग ने बारिश से बचने के लिए कुछ नहीं लिया था. न रेनकोट, न ही छाता. उसे हलकी फुहार में भीगना पसंद था.

भीगे हाथों से ही गोमती ने घर की डोरबैल दबा दी थी. गोमती के पापा गांव के जमींदार थे. नाम था तेजबहादुर. जैसे ही उन्होंने पराग को देखा, खुश हो गए.

‘‘आओ, पराग बेटा.’’

पराग बोला, ‘‘अंकलजी, मैं भीगा हुआ हूं, अंदर नहीं आऊंगा. अम्मां ने मखाने की खीर और आलू की पूरियां भेजी हैं,’’ पराग अपने साथ लाया टिफिन तेजबहादुर को थमा ही रहा था कि गोमती वहां आ गई और तेजबहादुर से टिफिन ले कर अंदर जाने लगी.

‘‘अरी, कपड़े तो बदल ले पहले, खीर कहां भागी जा रही है?’’ बेटी का उतावलापन देख तेजबहादुर हंस दिए. वे जानते थे कि पराग की अम्मां जब भी मखाने की खीर बनाती हैं, उन के घर जरूर पहुंचाती हैं.

पराग फिर वापस घर लौट आया था, लेकिन उस दिन लगा था जैसे दिल वहीं गोमती के पास छोड़ आया है. वह बचपन से गोमती को देखता आ रहा है. कालेज की पढ़ाई के लिए ही वह गांव से बाहर गया था, लेकिन इस नजर से उस ने गोमती को नहीं देखा था.

पराग जब वापस घर आया था, तो अम्मां ने उसे खोयाखोया सा देख कर अनेक सवाल किए थे. खीर खातेखाते भी भीगी गोमती दिख रही थी, तो खीर का चम्मच मुंह के बजाय कपड़ों पर गिर पड़ा था. अम्मां जोर से हंसने लगी थीं. बापू भी हंस दिए थे. बड़े भाई अनुराग ने भांप लिया था कि कुछ तो बात है. छोटा भाई गुमसुम है.

बड़े भाई अनुराग ने एक दिन पराग से पूछ ही लिया था. पराग ने उन्हें अपने दिल की बात बता दी थी.

‘‘अरे वाह, यह तो अच्छी बात है. तू गांव में रहता तो बापू से बात करते, पर तू ठहरा शहरी बाबू, नौकरी करने शहर जाएगा,’’ अनुराग भैया ने कहा.

‘‘भैया, वह तो मैं करूंगा ही. मेरा सपना है, शहर में नौकरी करना,’’ पराग बोला.

‘‘तो फिर एक काम कर कि गांव में तब तक रुक जा, जब तक गोमती के दिल की बात भी न जान ले,’’ अनुराग भैया ने कहा.

यह सुन कर पराग खुश हो गया. कुछ दिन बाद पराग को पता चला कि गोमती की एक बड़ी बहन भी है, जो ज्यादातर घर पर ही रहती है. उस के पैर में थोड़ी सी लंगड़ाहट है और नाम रेवती है. पर पराग को गोमती से मतलब था. उस ने गोमती से मिलने का समय भी मांग लिया था.

दूसरे दिन तालाब के मंदिर के पास शाम ढले गोमती इंतजार करती मिली.

वह आज साड़ी में थी. कमर तक चोटी किसी नागिन सी लग रही थी. हलकी पीली साड़ी में उस का रंग बादामी लग रहा था. छोटी सी बिंदी खूबसूरत लग रही थी. नाक में छोटी सी नथ थी. पराग तो मानो उस मुलाकात में पगला सा गया था, जब वह सिमट कर उस की बांहों में आई थी.

‘‘कुछ बोलोगे भी या यों ही बुत बन कर खड़े रहोगे?’’

‘‘क्या कहूं…’’ पराग की आवाज लरज रही थी, फिर भी वह बोला, ‘‘गोमती, हम गांव में साथ ही रहते हैं. एकदूसरे को पसंद भी करते हैं. क्यों न हम जीवनसाथी भी बन जाएं?’’

‘‘बात तो ठीक है तुम्हारी, पर तुम को शहर में जाना है. हमारे घर वाले कैसे मानेंगे?’’ गोमती बोली.

‘‘तो क्या हुआ… शहर में नौकरी लगेगी, तो हम शहर में रहेंगे. गांव में आतेजाते रहेंगे,’’ पराग ने समझाया. फिर वे काफी देर तक वहां रहे और आगे भी मिलते रहे.

एकदम से ट्रेन रुक गई और पराग अपने खयालों से बाहर निकल आया. देखा कि स्टेशन आ गया है. अब यहां से कुछ ही घंटे में बस से अपने गांव पहुंच जाएगा.

जब बस रुकी, तो गांव रतिहानी आ चुका था. अब बस 10 मिनट का रास्ता था. जगहजगह कीचड़ और गड्ढों से बचता हुआ पराग घर पहुंचा. उस ने घर के बड़े गेट को खोला ही था कि पूरा घर लाइट से जगमगा गया. उसी का इंतजार हो रहा था.

भैया, बापू, अम्मां, सब दौड़े चले आए. भाभी गुड़ और पानी ले आईं. पराग ने गुड़ खा कर पानी पिया, फिर कपड़े बदलने चला गया. देर रात हो गई थी, सब अपनेअपने कमरों में चले गए.

सुबह तेज बारिश थी. पराग देर तक सोता रहा. भैया भी खेतों में नहीं गए थे. भाभी 2-3 बार आवाज दे चुकी थीं.

जब पराग उठा, तो सुबह के 9 बज रहे थे. पराग उठ कर किचन में ही चला गया. अरमान भैया ने पराग को देखा, तुरंत ही चाय का कप पकड़ा दिया.

पराग ने चाय जल्दी खत्म की और नहाधो कर अनुराग भैया के साथ नाश्ता करने बैठ गया. नाश्ते के बाद दोनों भाई कमरे में बंद हो गए. भाभी भी कमरे में चली आईं, तो पराग एकदम चुप हो गया.

‘‘भाभी से कैसा परदा, जानते हैं हम गोमती के बारे में,’’ कह कर भाभी जोर से हंस दीं.

‘‘तू बता, गोमती से तो बात होती होगी?’’ भैया ने पूछा.

‘‘हां भैया, होती है.’’

दोनों भाई बड़ी देर तक बतियाते रहे.

दूसरे दिन गांव के दोस्त मिलने आए, पर पराग बेताब था गोमती से मुलाकात करने के लिए. शाम को मिलना तय था. आज मौसम खुला था. जैसे ही दोस्त गए, पराग अपने कमरे में गया, जल्दी से कपड़े बदले.

पराग बाहर आ कर मोटरसाइकिल स्टार्ट कर ही रहा था कि बापू अचानक सामने से आते दिखे, ‘‘कहां चल दिए शहरी बाबू?’’

‘‘बापू, थोड़ा गांव का चक्कर लगाने जा रहा हूं,’’ पराग बोला.

‘‘बाद में चक्करवक्कर लगा लेना, अभी मौसम खराब है.’’

‘‘बारिश बंद है बापू,’’ पराग प्यार से बोला.

‘‘जवान लड़के को क्यों डांट रहे हो?’’ अम्मां उन दोनों की बातें सुनतेसुनते बाहर आईं.

‘‘जाने दो, थोड़ी देर में आ जाएगा,’’ अम्मां ने बेटे की तरफदारी की.

‘‘बेवकूफ हो तुम, नौकरी लगने बाद पहली बार घर आया है, आराम करे,’’ बापू गुस्सा हुए.

‘‘बापू, बस थोड़ी देर में आता हूं,’’ पराग बोला.

‘‘एक काम कर, जाना ही है तो भाई को साथ ले जा,’’ बापू बोले.

पराग को गुस्सा आ गया, ‘‘बापू, मैं बड़ा हो गया हूं, भैया के साथ जाऊंगा?’’

‘‘बापू सही बोल रहे हैं. मैं भी साथ चलता हूं,’’ भैया अंदर आतेआते बोले.

‘‘भैया, आप भी…’’ पराग गुस्साया.

‘‘चल, आ जा,’’ कहते हुए भैया मोटरसाइकिल पर बैठ गए.

मजबूरन पराग को मोटरसाइकिल स्टार्ट करनी पड़ी. थोड़ी दूर जा कर पराग मोटरसाइकिल रोकते हुए बोला, ‘‘भैया, पता है आप को कि मैं गोमती से मिलने जा रहा हूं.’’

‘‘तो क्या हुआ? मैं थोड़ी दूरी पर रहूंगा. तू मिल लेना,’’ भैया बोले.

‘‘भैया, ऐसे मजा नहीं आएगा,’’ पराग बोला.

‘‘तो क्या करूं?’’ भैया बोले.

‘‘तब तक आप किसी दोस्त के पास हो लो,’’ पराग बोला.

‘‘कहीं कोई बात हो गई तो बापू मेरे पैर तोड़ देंगे,’’ भैया अनुराग ने कहा.

‘‘भैया, क्या मैं बच्चा हूं? क्या ऊंचनीच होगी?’’ पराग बोला.

‘‘अच्छाअच्छा ठीक है, पर ध्यान रखना अपना,’’ कहतेकहते भैया वहां से चले गए.

यह सुन कर पराग हंस दिया, फिर उस ने अपनी मोटरसाइकिल तालाब की तरफ मोड़ दी.

इतने में पराग का मोबाइल फोन बज उठा. मजबूरन उसे रुकना पड़ा. देखा तो गोमती का नाम चमक रहा था.

‘‘कहां अटक गए? मैं इंतजार कर रही हूं,’’ गोमती की आवाज नाराजगी से भरी थी.

‘‘मैं बस पहुंच ही रहा हूं. रास्ते में हूं,’’ पराग बोला.

‘‘मां ने कुछ सामान लाने को कहा था. तुम से मिल कर फिर बाजार जाऊंगी,’’ गोमती बोली.

‘‘छोटा सा बाजार है. पहले हम दोनों मोटर साइकिल से घूमेंगे, फिर तुम को बाजार के नजदीक छोड़ दूंगा.’’

‘‘ठीक है,’’ फिर गोमती बोली, ‘‘घर कब आओगे पापा से बात करने?’’

‘‘भैया को सब पता है. भैया पापा को समझ कर साथ लाएंगे. अच्छा फोन काटो, मिल कर बात करेंगे,’’ इतना कह कर पराग मोबाइल अपनी जेब में रखने लगा कि इतने में उस के सिर पर किसी ने चोट की और उस का चेहरा पूरे कपड़े से ढक दिया गया. हाथ एकदम से पीछे बांध दिए गए.

यह सब इतना अचानक हुआ कि पराग संभल नहीं पाया. वह चिल्लाने लगा. उस के चिल्लाने पर उस का मुंह भी बांध दिया गया.

पराग को एक दिशा में ले जाया जाने लगा. तकरीबन 10 मिनट बाद गाड़ी को रोक दिया गया, फिर दोनों कंधों से पकड़ कर उसे दरवाजे से बाहर धकेल दिया गया.

थोड़ी दूर चलने के बाद पराग की आंखों की पट्टी खोल दी गई. पीछे बंधे हाथ भी खोल दिए गए. जब उस ने अपनेआप को संभाला तो देखा कि सामने 2-3 आदमी खड़े थे. सभी के चेहरे ढके हुए थे और हाथों में बंदूकें थीं.

‘‘पराग बाबू, जल्दी कपड़े बदलो. उतारो यह शर्ट.’’

फिर पराग को शादी के कपड़े पहनाए गए. सिर पर चमकीली पगड़ी रख दी गई.

पराग सम?ा गया कि वह पकड़ौआ गैंग का शिकार बन गया है. गोमती इंतजार करतेकरते चली गई होगी.

‘‘मैं पुलिस में रिपोर्ट करूंगा,’’ पराग ने आवाज को कड़क बनाते हुए कहा.

‘‘वह भी कर लेना, पहले शादी कर लो,’’ एक आदमी बोला.

पराग को पकड़ कर शादी के मंडप में बिठा दिया गया. वहां पहले से लाल जोड़े में सजी दुलहन बैठी थी.

‘‘मैं इस को शादी नहीं मानता. मैं पढ़ालिखा हूं,’’ पराग ने हिम्मत की.

‘‘पढ़ेलिखे हो, इसलिए उठवाए गए हो पराग बाबू,’’ एक आवाज ने चौंका दिया. सामने देखा तो गोपाल काका थे.

‘‘गोपाल काका आप…?’’ पराग के चेहरे पर हैरानी थी.

‘‘हां बेटा, पर यहां गलत कुछ भी नहीं हो रहा है, बस तुम शांत रहो.’’

‘‘यह जुल्म है,’’ पराग गिड़गिड़ाया.

‘‘कोई जुल्म नहीं है. पंडितजी, आप मंत्र पढ़ो,’’ काका बोले.

मुश्किल से आधे घंटे में शादी के मंत्र पढ़ कर पंडित ने फेरे करवा दिए. गोपाल काका वहां काम में हाथ बंटवा रहे थे, इसलिए उन का चेहरा ढका नहीं था, बाकी लोगों के चेहरे ढके थे.

‘‘चलो, खड़े हो जाओ,’’ पंडित के इतना कहते ही पराग दुलहन के साथ खड़ा हो गया.

‘‘चलो, पैर छुओ इन के,’’ गोपाल काका ने कहा.

पराग ने देखा कि सामने एक चेहरा ढका आदमी था. पास ही एक औरत भी अपना चेहरा ढके हुए खड़ी थी. पराग उन के पैरों में झुक गया. उन दोनों ने पराग के सिर पर हाथ रखा. पराग को उस की दुलहन के साथ वापस कार में बिठा दिया गया. कार चल पड़ी.

तकरीबन आधे घंटे बाद कार गांव के अंदर दाखिल होने लगी. कार पराग के घर के सामने जा कर रुक गई.

‘‘चलो, उतरो जल्दी,’’ साथ आए आदमी ने कहा.

बाहर पराग अनुराग भैया और बापू परेशान घूम रहे थे कि कार को रुकते देख तुरंत नजदीक आए. बापू का गुस्सा हद पर था.

‘‘मैं ने बोला था कि अकेले मत जाओ, भैया को ले कर जाओ. ज्यादा होशियार बन रहे थे, अब भुगतो.’’

पराग बोला, ‘‘बापू, मैं इस शादी को नहीं मानता.’’

‘‘अब तो मानना पड़ेगा बेटा,’’ बापू बोले, ‘‘अब कुछ नहीं हो सकता.’’

‘‘पराग की मां, आरती की थाली ले आओ और बहू को अंदर ले जाओ.’’

पराग की मां आरती की थाली ले कर आईं और उन दोनों को अंदर ले गईं.

पराग गुस्से में था. उस ने गले की माला निकाल कर तोड़ दी और बड़े भैया के गले लग कर रोने लगा.

थोड़ी देर के बाद पराग बाहर आंगन में चला गया और वहां बिछी खाट पर सो गया. दुलहन अकेली कमरे में उस का इंतजार करती रही.

‘‘अरे वीरभद्र बाबू, कहां हो भई…’’ जोरजोर से दरवाजा खटखटाने की आवाज आई.

‘‘बापू तो सुबहसुबह खेतों की तरफ निकल गए थे,’’ बड़े भैया अनुराग बोले.

इतने में पराग के बापू भी बाहर से आते दिखे. पराग जाग तो गया था, पर सिर पर चादर ओढ़े सुन रहा था.

‘‘कहां सुबहसुबह शोर मचा हुआ है,’’ सोचते हुए पराग ने चादर के अंदर ही मोबाइल फोन देखा. सुबह के साढ़े 9 बज रहे थे.

‘‘अभी यों ही पड़ा रहता हूं. शोर कम हो जाए, तब उठूंगा. सारी रात टैंशन में था,’’ पराग ने सोचा.

‘‘अरे, जमींदार बाबू, आप…’’ पराग के बापू की आवाज में हैरानी थी.

‘‘अरे भई, लड्डू खाओ. अब हम समधी हैं,’’ तेजबहादुर की ऊंची आवाज गूंजी और यह कहतेकहते लड्डू पराग के बापू के मुंह में ठूंस दिया.

यह सुनते ही पराग के दिल की धड़कन तेज होने लगी. मतलब, तेजबहादुर बापू के समधी तो क्या घूंघट में गोमती है? वह समझ नहीं पाया.

मां खुशी से चिल्ला पड़ीं, ‘‘पराग, ओ पराग.’’

बापू और तेजबहादुर घर के अंदर बैठक में आ गए.

अब पराग ने सोचा कि उसे उठना चाहिए, क्योंकि बैठक से खुशियों भरे ठहाकों की आवाज आ रही थी.

पराग तुरंत उठा और तकरीबन दौड़ता हुआ अपने कमरे से बाहर आया. उस ने सोचा कि पहले फ्रैश हो ले, घर में देर तक बातें चलेंगी.

पराग नहाधो कर निकला ही था, तभी पीछे से किसी ने उसे अपनी बांहों में कस लिया. उस के दिल की धड़कन तेज होने लगी. वह पलटा, गोमती सामने थी. तुरंत ही उस ने अपने गीले होंठ गोमती के प्यासे होंठों पर रख दिए. उसे लगा कि उसे उस की मंजिल मिल गई है.

तभी गोमती ने खुद को छुड़ाया और तुरंत ही बैठक में चली गई. पराग खुश हो गया. उस ने अपनी पसंद की सब से प्यारी शर्ट पहनी. हलकी खुशबू वाला परफ्यूम लगा कर वह भी बैठक में आ गया.

गरमागरम पकौड़ों का दौर चल रहा था. पराग के आते ही बैठक में मानो जान पड़ गई.

‘‘आओ बेटा,’’ तेजबहादुर बोले.

‘‘इन के पैर छुओ बेटा, ये तुम्हारे ससुर हैं,’’ बापू खुश हो कर बोले.

पराग ने ?ाक कर पैर छू लिए. वह सम?ा गया कि गोमती से उस की शादी कर दी गई है. गोमती भी वहीं बैठी थी और तिरछी नजरों से उसे देख कर मुसकराए जा रही थी.

तभी अंदर से हलकी गुलाबी साड़ी में लिपटी घूंघट किए बहू आई. मां ने उसे अंदर वाले कमरे में ही बिठा दिया.

पराग का सिर चकरा उठा. इस का मतलब घूंघट में दुलहन कोई दूसरी है, क्योंकि गोमती तो सामने है.

गोमती की बहन रेवती पराग की पत्नी हुई. पराग अपने बड़े भैया को इशारा करता हुआ अंदर चला गया. बड़े भैया जल्दी से अंदर चले आए.

‘‘बोल, क्या हुआ?’’ भैया ने पूछा.

‘‘भैया, मुझे बचा लो. मैं इस शादी को नहीं मानता. गोमती के पापा से बात कर के मेरी शादी गोमती से करवा दो. प्लीज भैया.’’

‘‘देख पराग, जो हुआ सो हुआ, अब कुछ नहीं हो सकता,’’ भैया बोले.

‘‘भैया, आप तो मेरी फीलिंग को समझ,’’ पराग गिड़गिड़ाया.

‘‘देख, एक काम कर,’’ भैया सोचते  हुए बोले.

‘‘क्या…?’’ पराग थोड़ा उतावलेपन से बोला.

‘‘तू गोमती से मुलाकात कर ले आज ही, अगर वह राजी है, तो मैं तेरी शादी गोमती से करवा देता हूं, वहीं तेरे शहर दिल्ली में… बोल? जरूरत पड़ने पर कानून का सहारा लेंगे.’’

‘‘हां, यह हो सकता है,’’ पराग खुश हो गया. उस ने मोबाइल से मैसेज कर दिया कि आज शाम 6 बजे पीपल के पेड़ के नीचे मिलो.

गोमती का मैसेज तुरंत आ गया, ‘क्यों नहीं.’

शाम को सूरज की सुनहरी किरणें तालाब के पानी में चमक रही थीं. पीपल के चबूतरे पर बैठी गोमती पराग का इंतजार कर रही थी.

पराग के आते ही गोमती उस से लिपट गई. पराग ने भी बेताबी से उसे अपने में समेट लिया. गोमती ने पराग की शर्ट के बटनों से खेलते हुए कहा, ‘‘पराग, अब हम हमेशा साथ रहेंगे. कोई हमें अलग नहीं कर सकता.’’

‘‘हां गोमती…’’ पराग ने गोमती के बिखरे बालों को सहलाते हुए कहा, ‘‘गोमती, हम दोनों शादी कर

लेते हैं.’’

‘‘क्या… शादी?’’ गोमती अचानक चौंक गई.

‘‘इस में चौंकने की क्या बात है?’’ पराग ने सवाल किया.

‘‘शादी की क्या जरूरत है?’’ गोमती बोली, ‘‘समय ने हमें मिला तो दिया, चाहे किसी भी रूप में, तुम मेरे जीजू हुए. हमें यों भी कोई मिलने से नहीं रोक सकता.’’

‘‘अरे…’’ पराग हैरान था.

‘‘सही तो है… हम सबकुछ कर सकते हैं और करेंगे भी. मैं तो खुश हूं. सुहागरात भी मनाएंगे आज ही.’’

‘‘पागल तो नहीं हो गई हो गोमती, दिमाग ठिकाने पर है तुम्हारा? मैं ने तुम से प्यार किया है. अभी तक रेवती का तो घूंघट उठा कर उस का चेहरा भी नहीं देखा है.’’

‘‘तो फिर हम क्या करें पराग? तुम बताओ?’’ गोमती बोली.

‘‘तुम राजी हो तो सारी बातें घर वालों को बता देते हैं. हो सकता है कि तुम्हारे और मेरे पापा मान जाएं,’’ पराग ने समझाया. गोमती चुप रही.

‘‘हम कानून की भी मदद ले सकते हैं,’’ पराग ने दोबारा कोशिश की.

‘‘नहीं पराग, ऐसा नहीं हो पाएगा. पापा नहीं मानेंगे,’’ गोमती बोली, ‘‘इस गांव की प्रथा ही है, कोई अच्छी नौकरी वाला लड़का मिल गया तो ठीक, नहीं तो पकड़ौआ ब्याह कर देते हैं, अपहरण कर के. तुम ऐसे भोले बन रहे हो, जैसे जानते ही नहीं हो,’’ गोमती रूठने वाले अंदाज में बोली.

‘‘पता है, लेकिन गाज मुझ पर ही गिरेगी, यह पता नहीं था,’’ पराग दुखी था, ‘‘हम कानून की मदद ले कर भी इस समस्या का हल कर सकते हैं गोमती,’’ पराग बोला, ‘‘तुम भी प्यार करती हो न मुझ से?’’

‘‘प्यार करती हूं, पर क्या हम बिना शादी किए जिस्मानी रिश्ता नहीं बनाए रख सकते?’’ गोमती बोली.

‘‘नहीं गोमती, मैं तुम से शादी करना चाहता हूं. दिल पर बोझ नहीं होना चाहिए. यह रेवती के साथ नाइंसाफी होगी.’’

‘‘जिसे तुम ने देखा नहीं, उस के साथ कैसी नाइंसाफी?’’ गोमती बोली.

‘‘मैं आखिरी बार पूछ रहा हूं गोमती, क्या चाहती हो तुम?’’ पराग ने पूछा.

‘‘तुम्हारी बनी रहना चाहती हूं,’’ कह कर गोमती पराग के सीने से लिपट गई.

पराग फिर बेबस हो गया. उस ने हाथ आगे नहीं बढ़ाया. गोमती को सीने से लिपटा रहने दिया.

‘‘क्या हुआ पराग? प्यार करो न,’’ गोमती ने कहा, ‘‘हम दोनों सभी सीमाएं तोड़ कर एक हो जाएं,’’ गोमती की सांसें तेज होने लगी थीं.

‘‘मुझे ऐसा प्यार नहीं चाहिए. मैं वापस जा रहा हूं,’’ कहतेकहते पराग मोटरसाइकिल की तरफ बढ़ने लगा, तभी गोमती ने उस का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा.

‘‘गोमती, अब भी मौका है, सोच लो,’’ पराग बोला,

‘‘नहीं पराग, इतनी परेशानियों, लड़ाई झगड़े, कानून, पुलिस के लफड़े में नहीं फंसना मुझे.’’

पराग ने कोई जवाब नहीं दिया और मोटरसाइकिल स्टार्ट कर दी. पराग ने भैया को फोन कर दिया.

‘‘क्या हुआ पराग? क्या जवाब दिया गोमती ने?’’ भैया अनुराग ने पूछा.

‘‘भैया, आप सही बोले थे. मैं अपनी दुलहन रेवती को ले कर दिल्ली जाऊंगा. मांबापू को भी बता देना,’’ पराग की मोटरसाइकिल हवा से बातें करने लगी.

ममता का आंगन: मां के लिए कैसे बदली निशा की सोच

Story in Hindi. विदाई की बेला… हर विवाह समारोह का सब से भावुक कर देने वाला पल. सुंदर से लहंगे में आभूषणों से लदी निशा धीरेधीरे आगे कदम बढ़ा रही थी. आंसुओं से उस का चेहरा भीगा जा रहा था. सहेलियां और भाभियां उलाहना दे रहीं थीं, “अरे इतना रोओगी तो मेकअप धुल जाएगा.” इसी तरह की चुहलबाजी हो रही थी.

मगर वह चाह कर भी अपने आंसू नहीं रोक पा रही थी. खुद को दोराहे पर खड़ा महसूस कर रही थी आज वह. सजीधजी सुंदर सी कार उसे पिया के घर ले जाने के लिए तैयार खड़ी थी. अजय कार में बैठ चुका था. निशा ने कनखियों से देखा तो लगा कि अजय बेसब्री से उस का इंतजार कर रहा था, मानो कह रहा हो, “अब बस भी करो निशा… नए घर में भी लोग तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.”

वह एक कदम आगे बढ़ती तो दो कदम पीछे वाली स्थिति थी. पापाभैया पास में ही खड़े थे. निशा पलट कर पापा के गले लग कर रोने लगी. भाई उसे प्यार से सहला रहा था, मानो पापा से छुड़ाना चाह रहा हो और कह रहा हो,” दीदी, एक नई सुंदर सी दुनिया तुम्हारी प्रतीक्षा में है. उस का स्वागत करो.”

तभी उस ने देखा कि मां किसी अपराधिनी सी दूर खड़ी अपने ढुलकते आंसुओं को छिपाने का असफल प्रयास कर रही थी. दोनों तरफ से स्थिति कमोबेश एक सी ही थी.

मां आगे बढ़ कर उसे गले लगाने का साहस नहीं कर पा रही थी क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं निशा नाराज ना हो जाए. ये अधिकार निशा ने उन्हें आज तक दिया ही नहीं था.

इधर, निशा भी चाहते हुए ममत्व की प्यास को सहलाने में नाकाम साबित हो रही थी. बड़ी ही मुश्किल से मां धीरेधीरे आगे आ कर खड़ी हो गई. मौसी, बुआ सभी से निशा प्रेम से गले मिल रही थी, तभी अचानक मां के दिल में गहरा दर्द का सैलाब उमड़ पड़ा और उसे जोर की रुलाई आ गई.

यह देख कर निशा से रहा नहीं गया. वह मां की तरफ बढ़ी. दोनों मांबेटी इस तरह गले मिलीं जैसे दोनों को एकदूसरे से कोई शिकवाशिकायत ही ना हो. शब्द साथ नहीं दे रहे थे. बस कुछ देर एकदूसरे से लिपट कर दोनों पूर्ण हो गई थी. अब निशा को जाना ही था, क्योंकि कार काफी देर से स्टार्ट हो कर खड़ी थी.

नए घर में पहुंच कर निशा को बहुत प्यारसम्मान मिला. शुरू के कुछ दिनों में उसे किसी भी काम में हाथ नहीं लगाने दिया. उस की छोटी प्यारी सी ननद अपनी मां के हर काम में हाथ बंटाती. धीरेधीरे हाथों की मेहंदी का रंग छूटने के साथसाथ नेहा भी घरपरिवार की जिम्मेदारियों में शामिल हो गई. जबकि मां के घर में वह कोई भी काम नहीं करती थी, मगर ससुराल तो ससुराल ही होता है. शुरुआत में कुछ कठिनाई भी आई. कई बार वह रो पड़ती थी कि अपनी समस्या किसे बताए.. क्योंकि अपनी मां को तो उस ने पूर्ण रूप से तिरस्कृत किया हुआ था

मां ने कई बार प्रयास किया था कि निशा घर के थोड़े बहुत काम सीख ले, परंतु ढाक के वही तीन पात. जब कुछ छोटी थी तो पापा के लाड़प्यार की वजह से और फिर बड़ी होने पर मां से एक अनकही रंजिश होने के नाते. यूं निशा को काम करने में कोई परेशानी नहीं थी, परंतु वह मां से कुछ नहीं सीखना चाहती थी. न जाने क्यों उन्हें अपना दुश्मन समझने लगी थी वह.

विवाह को लगभग 20 दिन बीत चुके थे. निशा की सास उसे एक बड़ा सा डब्बा देते हुए बोली, “बेटा, यह बौक्स तुम्हारी मां ने तुम्हें सरप्राइस के तौर पर दिया है. तुम्हीं इसे खोलना और देखना कि इस में क्या है. अपने सारे जेवर डब्बे में रख देना. लौकर में रखवा देंगे. घर में रखना सुरक्षित नहीं होगा.”

शाम को जब निशा अपने जेवर डब्बे में करीने से संभाल रही थी, तो उस ने वह बौक्स भी खोला. वह देख कर अवाक रह गई. डब्बे में सुंदर से सोने और हीरे के जेवरात थे और साथ में एक पत्र भी.

यह पत्र उस की मां रीता ने लिखा था, “प्यारी निशा, तुम्हारे पापा का मुझ से शादी करने का मकसद सिर्फ इतना था कि उन की अनुपस्थिति में मैं तुम्हारी देखभाल कर सकूं. अब तुम्हारा विवाह हो चुका है. समय के साथ धीरेधीरे समझ जाओगी कि एक पिता के लिए अकेले संतान को पालना कितना मुश्किल होता है. मां तो सिर्फ मां होती है. यह सौतेला शब्द तो हमारे समाज ने ही गढ़ा है. पूर्वाग्रह से ग्रसित यह भावना किसी स्त्री को जाने समझे बगैर ही खलनायिका बना देती है. तुम्हारा विदाई के समय मुझ से लिपटना मुझे उम्रभर की खुशी दे गया.

“मेरा बचपन भी कुछ तुम्हारी ही तरह बीता है. सदा सुखी रहना. “और हां, अपनी मां से मिलने कब आ रही हो?”

वह सोच में पड़ गई. उस की आंखों से आंसू बहने लगे. उसे इन गहनों में से ममत्व की सुगंध आने लगी. वह काफी देर तक उन्हें देखती रही. इन में से कुछ गहने उस की अपनी मां के थे और अधिकतर नई मां के, जिसे उस ने मां तो कभी माना ही नहीं.

दरअसल, निशा के जीवन में दुखद मोड़ तब आया, जब 12 साल की उम्र में उस की मां की मृत्यु हो गई थी. लाड़प्यार से पली एकलौती संतान कुदरत के इस अन्याय को सहने की समझ भी नहीं रखती थी. पिता राजेश भी परेशान. एक तो पत्नी की असमय मृत्यु का गम, दूसरा 12 साल की बिटिया को पालने की जिम्मेदारी. ऐसी कच्ची उम्र में जब बच्चे कई तरह के शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों से गुजरते हैं, एक पिता के लिए बहुत ही मुश्किल हो जाता है, ऐसे में खासकर बिटिया का लालनपालन करना.

कुछ लोगों ने सलाह दी कि वह निशा की मौसी से विवाह कर ले. क्योंकि अपनी बहन की संतान को जितने प्यार से वह पालेगी, ऐसा कोई दूसरी महिला नहीं कर सकती. परंतु निशा की मौसी उस के पिता से उम्र में बहुत छोटी थी, इसलिए राजेश को यह मंजूर नहीं था. खैर, समय की मांग को देखते हुए रीता के साथ निशा के पिता राजेश का पुनर्विवाह सादे समारोह में हो गया.

मां को गए अभी सिर्फ एक ही साल हुआ था. निशा की यादों में मां की हर बात जिंदा थी. इकलौती संतान होने की वजह से मातापिता का संपूर्ण प्यार उसी पर निछावर था.

राजेश ने रीता के साथ विवाह तो किया, परंतु निशा को किसी भी मनोवैज्ञानिक संकट में वह नहीं डालना चाहते थे. रीता भी खुद बहुत समझदार थी. इधर निशा भावनात्मक मानसिक और शारीरिक तौर पर आने वाले बदलावों से गुजर रही थी.

मां उसे भावनात्मक सहारा देने का भरसक प्रयास करती, परंतु निशा हर बार मां को ठुकरा देती है. अकेलीअकेली उदास सी रहती थी वह. नई मां कभी पिता से हंस कर, खिलखिला कर बात करती, तो निशा परेशान हो उठती. उसे लगता कि इस महिला ने आ कर उस की मां की जगह ले ली है.

निशा की मां की साड़ियां राजेश के कहने पर अगर रीता ने पहन लीं, तो निशा आगबबूला हो उठती. यह सब देख कर रीता ने अपनेआप को बहुत संयमित कर लिया था. वह नहीं चाहती थी कि किशोरावस्था में किसी बच्चे के दिमाग पर कोई गलत असर पड़े. समय के साथसाथ निशा का अकेलापन दूर करने के लिए एक छोटा भाई आ चुका था. आश्चर्य कि छोटे भाई से निशा को कोई शिकायत नहीं थी. वह उस के साथ खेलती और अब थोड़ा खुश रहने लगी थी. लेकिन मां के प्रति अपने व्यवहार को वह नहीं बदल पाई थी.

22 साल की उम्र पूरी होने पर घर वालों से विचारविमर्श के बाद निशा का विवाह तय कर दिया गया. निशा ने भी कोई अरुचि नहीं दिखाई. वह तो मानो नई मां से छुटकारा पाना चाहती थी.

आज इन गहनों को संभालते वक्त वह सोचने लगी कि अपनी मां की साड़ी तक वह नई मां को नहीं पहनने देती थी और इस अनचाही मां ने तो उसे खूब लाड़प्यार से पाला. कभी अपने बेटे और उस में कोई फर्क नहीं किया. विवाह के समय अपनी सुंदर कीमती साड़ियां और भारी गहने सब उसी को सौंप दिए, जैसा कोई असली मां करती है.

तभी सासू मां ने उसे आवाज दे कर दरवाजे पर अपनी उपस्थिति का एहसास कराया. निशा का उदासीन चेहरा देख कर वह बोली, “अरे बेटा, क्या बात है…? मैं ने लौकर वाली बात कह कर तुम्हारा दिल तो नहीं दुखाया… दरअसल, घर में इतना कीमती सामान रखना असुरक्षित है इसीलिए मैं ने ऐसा कह दिया.”

“अरे नहीं मम्मी, ऐसी बात नहीं है,” कह कर वह रुक गई. आगे और कहती भी क्या..? कैसे कह देती कि जिस मां ने अपना सर्वस्व उस के लालनपालन में लुटा दिया, उस से वह इतनी नफरत करती थी कि पश्चाताप करने की भी कोई राह ही नहीं सूझ रही है.

खैर, सासू मां समझदार थी. सब जानते हुए भी वे अनजान ही बनी रहीं. इधर निशा के अंदर उधेड़बुन चलती रही. शाम को अजय आ कर बोला,”अगले 2-3 दिन में हम तुम्हारे घर मम्मीपापा से मिलने चल रहे हैं.” दरअसल, अजय की मां ने ही उसे निशा को मां के घर ले जाने की सलाह दी थी. वह धीरे से बोली, “ठीक है.” मगर मन ही मन बड़ी शर्मिंदा हो रही थी कि कैसे सामना करूंगी मां का.

अगले दिन सुबह मौसी का फोन आया. निशा आत्मग्लानि से भरी हुई थी. उस ने मौसी से मां का जिक्र किया. तब मौसी ने ही उसे बताया कि अजय के साथ उस का विवाह उस की मां रीता ने ही तय किया था. दरअसल, अजय की मां रीता की बचपन की सहेली थी. अजय की मां का विवाह तो समय से हो गया, परंतु यह रीता का दुर्भाग्य था कि बहुत ही छोटी उम्र में उस की मां की मृत्यु हो गई. पिता ने दूसरा विवाह नहीं किया. पारिवारिक सदस्यों के साथ मिल कर खुद ही अपनी बेटी को पालने की जिम्मेदारी ली. परिवार के बीच में रीता की परवरिश तो ठीकठाक हो गई, परंतु उस के विवाह में देरी होती रही, क्योंकि दादादादी की मृत्यु हो चुकी थी. ताऊताई अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गए थे. अब रह गए थे रीता और उस के पिता. वह पिता को छोड़ कर कहीं नहीं जाना चाहती थी.

अधिक उम्र हो जाने पर भी लड़की के लिए लड़का मिलना कभीकभी मुश्किल काम साबित हो जाता है. इसीलिए जब राजेश की पहली पत्नी की मृत्यु हुई, तब रीता का विवाह उन के साथ इस शर्त पर हुआ कि उन की बेटी निशा को अपनी बेटी की तरह मान कर पालेगी. और रीता ने यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई. कुछ साल बाद अपना बेटा होने के बावजूद भी उस ने दोनों बच्चों में कभी कोई फर्क नहीं किया. और आज भी यह रीता ही थी, जिस ने निशा का रिश्ता अपनी सहेली के बेटे अजय से करवाया था, ताकि वह स्वयं अपनी बेटी के भविष्य को ले कर आशान्वित रहे. परंतु यह बात परिवार के किसी भी सदस्य ने निशा को नहीं बताई थी, क्योंकि उसे तो नई मां से अत्यधिक बैर था. फिर वह ये बात कैसे बरदाश्त करती…?

यह जान कर निशा अत्यधिक दुखी और शर्मिंदा थी. उस ने साहस कर के मां को फोन मिलाया. उधर से मां की प्यारी सी आवाज आई,” बेटा, रिश्तों को सहेजने की कोई उम्र नहीं होती. जब भी अवसर मिले, इन्हें संवार लो.”

शायद मां इस से आगे कुछ नहीं बोल पाई और इधर निशा मायके जाने की तैयारी में जुट गई, क्योंकि उधर ममता का आंगन बांह पसारे उस के इंतजार में था. Story in Hindi

लेखिका- अमृता पांडेय

एक थप्पड़ की कीमत: रवि ने कौन सी गलती की थी

रोटी बनाती ऋतु को ‘चटाक’ की आवाज के साथ सोहम के रोने का शोर सुनाई दिया. उस ने कमरे में जा कर देखा तो पाया कि रवि ने आज फिर सोहम को एक थप्पड़ जड़ दिया था.

ऋतु सोहम को गोद में ले कर रसोई में आ गई और उसे स्लैब पर बिठा कर चुप कराया, फिर आटे की एक लोई दे दी. नन्हा सोहम पलभर में रोना भूल कर उस लोई से खेलने लगा.

रोटी बेलती ऋतु को सोहम के गाल पर लाल निशान दिख रहे थे. मां का दिल कचोट गया.

‘‘आप ने आज फिर सोहम पर हाथ उठाया?’’ सोहम को सुला रही ऋतु ने रवि से पूछा, ‘‘ऐसा क्या किया था सोहम ने?’’

‘‘बहुत जिद्दी हो गया है सोहम. रिमोट ही नहीं दे रहा था. और हां, मैं ने थप्पड़ नहीं मारा था, बस हलकी सी चपत लगाई थी,’’ रवि बोला.

रवि की बात सुन कर ऋतु हैरान रह गई. अगर वह हलकी सी चपत थी, तो सोहम का गाल कैसे लाल हो गया?

‘‘तुम भी न ऋतु, हर छोटीछोटी बात पर लड़ने लग जाती हो. अरे, सोहम मेरा भी बेटा है. मैं भी उस से प्यार करता हूं और एक थप्पड़ या चपत लगने से तुम्हारा बेटा टूट नहीं जाएगा. लड़का है, इतना तो बरदाश्त करना आना ही चाहिए.’’

‘‘कैसी बात कर रहे हो रवि…

5 साल का बच्चा है सोहम. तुम्हारी यह आदत होती जा रही है कि कहीं भी हाथ चला देते हो. उस दिन सिर पर मार दिया था. कभी कहीं गलत जगह चोट लग गई तो जिंदगीभर पछताना पड़ेगा,’’ ऋतु ने समझाया और सोने चली गई.

सोहम ऋतु और रवि का एकलौता बेटा था. वे दोनों उसे बहुत प्यार करते थे, लेकिन रवि की गंदी आदत थी हाथ चला देने की. ऋतु के बारबार टोकने पर भी वह नहीं सुधर रहा था, उलटा ऋतु से बहस करता था. इस बात पर ऋतु चिढ़ जाती और कोशिश करती कि जब रवि घर पर हो, तब वह सोहम को अपने साथ ही रखे.

रविवार के दिन शाम को थप्पड़ लगा दिया क्रिकेट मैच आने वाला था, जबकि सोहम कार्टून फिल्म देख रहा था.

‘‘सोहम, रिमोट दो… मैच आने वाला है,’’ रवि ने कहा.

‘‘पापा, बस 5 मिनट और देखने दो न,’’ सोहम ने जिद की.

‘‘नहीं… जल्दी दो रिमोट, वरना टौस निकल जाएगा,’’ रवि ने चिढ़ते हुए कहा.

सोहम नहीं माना, तो आदत के मुताबिक रवि ने उस के सिर के पीछे एक चपत लगा दी और उस से रिमोट छीन लिया.

सोहम सुबकने लगा, पर जल्दी ही वह अपने खिलौनों से खेलने लगा. आधा घंटा भी नहीं बीता कि सोहम को उलटी आ गई.

‘‘मम्मी, मुझे अच्छा नहीं लग रहा है,’’ अपने बच्चे की बात सुन कर ऋतु डर गई.

‘‘क्या हो गया सोहम?’’ ऋतु ने घबरा कर पूछा.

‘‘मम्मी, सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है,’’ रोते हुए सोहम ने सिर के पीछे की तरफ इशारा किया.

ऋतु ने सोहम के सिर पर तेल की मालिश कर एक पेन किलर दवा दी और गोदी में सिर ले कर दबाने लगी.

ऋतु को कुछ समझ ही नहीं आ रहा था. उसे नहीं पता था कि रवि ने सोहम के सिर के पीछे मारा था. जब दोबारा उलटी हुई, तब ऋतु ने घबरा कर रवि को आवाज दी, ‘‘देखो न, सोहम के सिर में बहुत दर्द हो रहा है. 2 बार उलटी भी कर दी है. कह रहा है कि अच्छा नहीं लग रहा है. चलो न, किसी डाक्टर को दिखा दें…’’

‘‘यह टीवी बहुत देखता है, इसलिए सिर में दर्द हो रहा होगा. इतनी रात को कहां जाएंगे डाक्टर को दिखाने… कल तक ठीक नहीं हुआ तो दिखा देंगे,’’ इतना कह कर रवि मैच देखने लगा.

सोहम का सिर दबातेदबाते ऋतु और सोहम दोनों सो गए. अगले दिन जब ऋतु जागी तो देखा कि सोहम का आधा चेहरा सूजा हुआ था.

रवि और ऋतु तुरंत सोहम को डाक्टर के पास ले गए. सारी बात सुन कर डाक्टर ने पूछा, ‘‘कोई चोट तो नहीं लगी न बच्चे के सिर के पिछले हिस्से में?’’

डाक्टर की बात सुन कर रवि का चेहरा सफेद पड़ गया और बोला, ‘‘कल मैं ने सोहम के सिर के पीछे थप्पड़ मार दिया था, तभी उसे दर्द…’’

डाक्टर को समझते देर न लगी. सोहम की इस हालत का जिम्मेदार रवि खुद था.

जब डाक्टर को पता चला, तो उन्होंने रवि को खूब डांटा. ऋतु का तो रोरो कर बुरा हाल हो गया, ‘‘लाखों बार समझाया था तुम्हें, अब देख लो… अगर मेरे बेटे को कुछ हुआ, तो मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगी.’’

आननफानन में सारे टैस्ट हुए. बात ज्यादा नहीं बिगड़ी थी, लेकिन सोहम की आंखों पर हमेशा के लिए ज्यादा पावर का चश्मा चढ़ गया था.

रवि एक अपराधी की तरह अपने बेटे के सामने खड़ा था. जिस थप्पड़ को मामूली समझ कर वह जबतब जड़ देता था, आज वही थप्पड़ अपनी कीमत वसूल रहा था.

यक्ष प्रश्न : निमी को क्यों बचाना चाहती थी अनुभा

अनुभा ने अस्पताल की पार्किंग में बमुश्किल गाड़ी पार्क की. ‘उफ, इतनी सारी गाडि़यां… न सड़क में जगह, न पार्किंग स्पेस में. गाड़ी रखना भी एक मुसीबत हो गई है. कहीं भी जगह नहीं है. अब तो लोग फुटपाथों पर भी गाडि़यां पार्क करने लगे हैं. सरकारी परिसर हो या निजी आवासीय क्षेत्र, हर जगह एकजैसा हाल. इस के बावजूद लोग गाडि़यां खरीदना बंद नहीं कर रहे हैं,’ यही सब सोचती वह अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ रही थी.

दूसरी मंजिल पर सेमीप्राइवेट वार्ड में अनुभा की सहेली कम सहकर्मी भरती थी. उसे किडनी में पथरी थी. उसी के औपरेशन के लिए भरती थी. कल उस का औपरेशन हुआ था. अनुभा आज उसे देखने जा रही थी.

सहेली से मिलने और उस का हालचाल पूछने के बाद जब अनुभा उस के बिस्तर पर बैठी तो उस ने कमरे में इधरउधर निगाह डाली. सेमीप्राइवेट वार्ड होने के कारण उस में 2 मरीज थे. दूसरी मरीज भी महिला ही थी. उस ने गौर से दूसरी मरीज को देखा, तो उसे वह कुछ जानीपहचानी लगी. उस ने दिमाग पर जोर दे कर सोचा. वह मरीज भी उसे गौर से देख रही थी. उस की बुझी आंखों में एक चमक सी आ गई जैसे कई बरसों बाद वह अपने किसी आत्मीय को देख रही हो.

दोनों की आंखें एकदूसरे के मनोभावों को पढ़ रही थीं और फिर जैसे अचानक  एकसाथ दोनों के मन से दुविधा और संकोच की बेडि़यां टूट गई हों अनुभा चौंकती सी उस की तरफ लपकी, ‘‘निमी…’’

मरीज के सूखे होंठों पर फीकी सी मुसकराहट फैल गई, ‘‘तुम ने मुझे पहचान लिया?’’

निम्मी के स्वर से ऐसा लग रहा था जैसे इस दुनिया में उस का कोई जानपहचान वाला नहीं है. अनुभा अचानक आसमान से आ टपकी थी, वरना वह इस संसार में असहाय और अनाथ जीवन व्यतीत कर रही थी.

‘‘निमी, तुम यहां और इस हालत में?’’ अनुभा ने उस के हाथों को पकड़ कर कहा.

निमी का नाम निमीषा था, परंतु उस के दोस्त और सहेलियां उसे निमी कह कर बुलाते थे.

अनुभा एक पल को चुप रही, फिर बोली,  ‘‘तुम्हें क्या हुआ है? मैं ने तो कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन तुम्हें इस हालत में देखूंगी. तुम्हारी सुंदर काया को क्या हुआ… चेहरे की कांति कहां चली गई?  ऐसा कैसे हुआ?’’

निमी ने पलंग से उठ कर बैठने का प्रयास किया, परंतु उस की सांस फूलने लगी. अनुभा ने उसे सहारा दिया. पलंग को पीछे से उठा दिया, जिस से निमी अधलेटी सी हो गई.

‘‘तुम ने इतने सारे सवाल कर दिए… समझ में नहीं आता कैसे इन के जवाब दूं. एक दिन में सबकुछ बयां नहीं किया जा सकता… मैं ज्यादा नहीं बोल सकती… हांफ जाती हूं… फेफड़े कमजोर हैं न. ’’

‘‘तुम्हें हुआ क्या है?’’ अनुभा ने पूछा.

‘‘एक रोग हो तो बताऊं… अब तुम मिली हो, तो धीरेधीरे सब जान जाओगी. क्या तुम्हारे पास इतना समय है कि रोज आ कर मेरी बातें सुन सको.’’

‘‘हां, मैं रोज आऊंगी और सुनूंगी,’’ अनुभा को निमी की हालत देख कर तरस नहीं, रोना आ रहा था जैसे वह उस की जान हो, जो उसे छोड़ कर जा रही थी. उस ने कस कर निमी का हाथ पकड़ लिया.

निमी के बदन में एक सुरसुरी सी दौड़ गई. उस के अंदर एक सुखद एहसास ने अंगड़ाई ली. वह तो जीने की आस ही छोड़ चुकी थी, परंतु अनुभा को देख कर उसे लगा कि उसे देखनेसमझने वाला कोई है अभी इस दुनिया में. फिर कोई जब चाहने वाला पास हो, तो जीने की लालसा स्वत: बढ़ जाती है.

‘‘तुम्हारे साथ कोई नहीं है?’’ अनुभा ने आंखें झपकाते हुए पूछा, ‘‘कोई देखभाल करने वाला… तुम्हारे घर का कोई?’’

निमी ने एक ठंडी सांस लेते हुए कहा,  ‘‘नहीं, कोई नहीं.’’

‘‘क्यों, घर में कोई नहीं है क्या?’’

‘‘जो मेरे अपने थे उन्हें मैं ने बहुत पहले छोड़ दिया था और जीवन के पथ पर चलते हुए जिन्हें मैं ने अपना बनाया वे बीच रास्ते छोड़ कर चलते बने. अब मैं नितांत अकेली हूं. कोई नहीं है मेरा अपना. आज वर्षों बाद तुम मिली हो, तो ऐसा लग रहा है जैसे मेरा पुराना जीवन फिर से लौट आया हो. मेरे जीवन में भी खुशी के 2 फूल खिल गए हैं, जिन की सुगंध से मैं महक रही हूं. काश, यह सपना न हो… तुम दोबारा आओगी न?’’

‘‘हांहां, निमी, मैं आऊंगी. तुम से मिलने ही नहीं, तुम्हारी देखभाल करने के लिए भी… तुम्हारा अस्पताल का खर्चा कौन उठा रहा है?’’

निमी ने फिर एक गहरी सांस ली, ‘‘है एक चाहने वाला, परंतु उस ने मेरी बीमारियों के कारण मुझ से इतनी दूरी बना ली है कि वह मुझे देखने भी नहीं आता. कभीकभी उस का नौकर आ जाता है और अस्पताल का पिछला बिल भर कर कुछ ऐडवांस दे जाता है ताकि मेरा इलाज चलता रहे. बस मेरे प्यार के बदले में इतनी मेहरबानी वह कर रहा है.’’

उस दिन अनुभा निमी के पास बहुत देर नहीं रुक पाई, क्योंकि वह औफिस से आई थी. शाम को आने का वादा कर के वह औफिस आ गई, परंतु वहां भी उस का मन नहीं लगा. निमी की दुर्दशा देख कर उसे अफसोस के साथसाथ दुख भी हो रहा था. उसे कालेज के दिन याद आने लगे जब वे दोनों साथसाथ पढ़ती थीं…

निमीषा और अनुभा दोनों ही शिक्षित परिवारों से थीं. अनुभा के पिता आईएएस अफसर थे, तो निमी के पिता वरिष्ठ आर्मी औफिसर. दोनों एक ही क्लास में थीं, दोस्त थीं, परंतु दोनों के विचारों में जमीनआसमान का अंतर था. अनुभा पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों व मान्यताओं को मानने वाली लड़की थी, तो निमी को स्थापित मूल्य तोड़ने में मजा आता था. परंपराओं का पालन करना उसे नहीं भाता था. नैतिकता उस के सामने पानी भरती थी, तो मूल्य धूल चाटते नजर आते थे. संभवतया सैनिक जीवन की अति स्वछंदता और खुलेपन के माहौल में जीने के कारण उस के स्वभाव में ऐसा परिवर्तन आया हो.

निमीषा बहुत बड़ी अफसर बनना चाहती थी, परंतु अनुभा को पता नहीं था कि वह क्या बन गई? हां, वह शादी भी नहीं करना चाहती थी. उस का मानना था शादी का बंधन स्त्री के लिए एक लिखित आजीवन कारावास का अनुबंध होता है. तब युवाओं के बीच लिव इन रिलेशनशिप का चलन बढ़ने लगा था. निमी ऐसे संबंधों की हिमायती थी. कालेज के दौरान ही उस ने लड़कों के साथ शारीरिक संबंध बना लिए थे.

इस का पता चलने पर अनुभा ने उसे समझाया था, ‘‘ये सब ठीक नहीं है. दोस्ती तक तो ठीक है, परंतु शारीरिक संबंध बनाना और वह भी शादी के पहले व कई लड़कों के साथ को मैं उचित नहीं समझती.’’

निमी ने उस का उपहास उड़ाते हुए कहा,  ‘‘अनुभा, तुम कौन से युग में जी रही हो? यह मौडर्न जमाना है, स्वछंद जीवन जीने का. यहां व्यक्तिगत पसंद से रिश्ते बनतेबिगड़ते हैं, मांबाप की पसंद से नहीं. इट्स माई लाइफ… मैं जैसे चाहूंगी जीऊंगी.’’

अनुभा के पास तर्क थे, परंतु निमी के ऊपर उन का कोई असर न होता. कालेज के बाद दोनों सहेलियां अलग हो गईं. अनुभा के पिता केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति से वापस लखनऊ चले गए. अनुभा ने वहां से सिविल सर्विसेज की तैयारी की और यूपीएससी की ग्रुप बी सेवा में चुन ली गई. कई साल लखनऊ, इलाहाबाद और बनारस में पोस्टिंग के बाद अब उस का दिल्ली आना हुआ था. इस बीच उस की शादी भी हो गई. पति केंद्र सरकार में ग्रुप ए अफसर थे. दोनों ही दिल्ली में तैनात थे. उस की 10 वर्ष की 1 बेटी थी.

अनुभा को निमी के जीवन के पिछले 15 वर्षों के बारे में कुछ पता नहीं था. उसे उत्सुकता थी, जल्दी से जल्दी उस के बारे में जानने की. आखिर उस के साथ ऐसा क्या हुआ था कि उस ने अपने शरीर का सत्यानाश कर लिया… तमाम रोगों ने उस के शरीर को जकड़ लिया. वह शाम होने का इंतजार कर रही थी. प्रतीक्षा में समय भी लंबा लगने लगता है. वह बारबार घड़ी देखती, परंतु घड़ी की सूइयां जैसे आगे बढ़ ही नहीं रही थीं.

किसी तरह शाम के 5 बजे. अभी भी 1 घंटा बाकी था, परंतु वह अपने सीनियर को अस्पताल जाने की बात कह कर बाहर निकल आई. गाड़ी में बैठने से पहले उस ने अपने पति को फोन कर के बता दिया कि वह अस्पताल जा रही है. घर देर से लौटेगी.

अनुभा को देखते ही निमी के चेहरे पर खुशी फैल गई जैसे उस के अंदर असीम ऊर्जा और शक्ति का संचार होने लगा हो.

अनुभा उस के लिए फल लाई थी. उन्हें सिरहाने के पास रखी मेज पर रख कर वह निमी के पलंग पर बैठ गई. फिर उस का हाथ पकड़ कर पूछा, ‘‘अब कैसा महसूस हो रहा है?’’

निमी के होंठों पर खुशी की मुसकान थी, तो आंखों में एक आत्मीय चमक… चेहरा थोड़ा सा खिल गया था. बोली, ‘‘लगता है अब मैं बच जाऊंगी.’’

रात में अनुभा ने अपने पति हिमांशु को निमी के बारे में सबकुछ बता दिया. सुन कर उन्हें भी दुख हुआ. अगले दिन सुबह औफिस जाते हुए वे दोनों ही निमी से मिलने गए. हिमांशु ने डाक्टर से मिल कर निमी की बीमारियों की जानकारी ली. डाक्टर ने जो कुछ बताया, वह बहुत दर्दनाक था. निमी के फेफड़े ही नहीं, लिवर और किडनियां भी खराब थीं. वह शराब और सिगरेट के अति सेवन से हुआ था. अनुभा को पता नहीं था कि वह इन सब का सेवन करती थी. हिमांशु ने जब उसे बताया, तो वह हैरान रह गई. पता नहीं किस दुष्चक्र में फंस गई थी वह?

खैर, हिमांशु और अनुभा ने यह किया कि रात में निमी के पास अपनी नौकरानी को देखभाल के लिए रख दिया. हिमांशु नियमित रूप से उस के इलाज की जानकारी लेते. उन के कारण ही अब डाक्टर विशेषरूप से निमी का ध्यान रखने लगे थे. वह बेहतर से बेहतर इलाज उसे मुहैया करा रहे थे.

इस सब का परिणाम यह हुआ कि निमी 1 महीने के अंदर ही इतनी ठीक हो गई कि अपने घर जा सकती थी. हालांकि दवा नियमित लेनी थी.

जिस दिन उसे अस्पताल से डिस्चार्ज होना था वह कुछ उदास थी. उस का सौंदर्य पूर्णरूप से तो नहीं, परंतु इतना अवश्य लौट आया था कि वह बीमार नहीं लगती थी.

अनुभा ने पूछा, ‘‘तुम खुश नहीं लग रही हो… क्या बात है? तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि ठीक हो कर घर जा रही हो?’’

निमी ने खाली आंखों से अनुभा को देखा और फिर फीकी आवाज में कहा, ‘‘कौन सा घर? मेरा कोई घर नहीं है.’’

‘‘अपने दोस्त के यहां, जो तुम्हारा इलाज करवा रहा था…’’

एक फीकी उदास हंसी निमी के होंठों पर तैर गई, ‘‘जो व्यक्ति मुझ से मिलने अस्पताल में कभी नहीं आया, जिसे पता है कि मेरे शरीर के महत्त्वपूर्ण अंग बेकार हो चुके हैं. वह मुझे अपने घर रखेगा?’’

‘‘फिर वह तुम्हारा इलाज क्यों करवा रहा था?’’

‘‘बस एक यही एहसान उस ने मेरे ऊपर किया है. मेरे प्यार का कुछ कर्ज उसे अदा करना ही था. वह बहुत पैसे वाला है, परंतु एक बीमार औरत को घर में रखने का फैसला उस के पास नहीं है. उसे रोज अनगिनत सुंदर और कुंआरी लड़कियां मिल सकती हैं, तो वह मेरी परवाह क्यों करेगा. वैसे मैं स्वयं उस के पास नहीं जाना चाहती हूं. मैं किसी भी मर्द के पास नहीं जाना चाहती. मर्दों ने ही मुझे प्यार की इंद्रधनुषी दुनिया में भरमा कर मेरी यह दुर्गति की है… मैं किसी महिला आश्रम में जाना चाहूंगी,’’ उस के स्वर में आत्मविश्वास सा आ गया था.

अनुभा सोच में पड़ गई. उस ने हिमांशु से सलाह ली. फिर निमी से बोली, ‘‘तुम कहीं और नहीं जाओगी, मेरे घर चलोगी.’’

‘‘तुम्हारे घर?’’ निमी का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘हां, और अब इस के बाद कोई सवाल नहीं, चलो.’’

अनुभा और हिमांशु को मोतीबाग में टाइप-5 का फ्लैट मिला था. उस में पर्याप्त कमरे थे. 1 कमरा उन्होंने निमी को दे दिया. निमी अनुभा और हिमांशु की दरियादिली, प्रेम और स्नेह से अभिभूत थी. उस के पास धन्यवाद करने के लिए शब्द नहीं थे.

निमी के पिता आर्मी औफिसर थे. मां भी उच्च शिक्षित थीं. आर्मी में रहने के कारण उन्हें तमाम सुविधाएं प्राप्त थीं. पिता रोज क्लब जाते थे और शराब पी कर लौटते थे. मां भी कभीकभार क्लब जातीं और शराब का सेवन करतीं. उन के घर में शराब की बोतलें रखी ही रहतीं. कभीकभार घर में भी महफिल जम जाती. निमी के पिता के यारदोस्त अपनी बीवियों के साथ आते या कोई रिश्तेदार आ जाता, तो महफिल कुछ ज्यादा ही रंगीन हो जाती.

निमी बचपन से ही ये सब देखती आ रही थी. उस के कच्चे मन में वैसी ही संस्कृति और संस्कार घर कर गए. उसे यही वास्तविक जीवन लगता. 15 साल की उम्र तक पहुंचतेपहुंचते उस ने शराब का स्वाद चोरीछिपे चख लिया था और सिगरेट के सूट्टे भी लगा लिए थे.

ग्रैजुएशन करने के बाद निमी ने मम्मीपापा से कहा, ‘‘मैं यूपीएसी का ऐग्जाम देना चाहती हूं.’’

‘‘तो तैयारी करो.’’

‘‘कोचिंग करनी पड़ेगी. अच्छे कोचिंग इंस्टिट्यूट डीयू के आसपास मुखर्जी नगर में हैं.’’

‘‘क्या दिक्कत है? जौइन कर लो.’’

‘‘परंतु इतनी दूर आनेजाने में बहुत समय बरबाद हो जाएगा. मैं चाहती हूं कि यहीं आसपास बतौर पीजी रह लूं और सीरियसली कंपीटिशन की तैयारी करूं… तभी कुछ हो पाएगा,’’ निमी ने कहा.

मम्मीपापा ने एकदूसरे की आंखों में एक पल के लिए देखा, फिर पापा ने उत्साह से कहा,  ‘‘ओके माई गर्ल. डू व्हाटएवर यू वांट.’’

‘‘किंतु यह अकेले कैसे रहेगी?’’ मम्मी ने शंका व्यक्त की.

‘‘क्या दकियानूसी बातें कर रही हो. शी इज ए बोल्ड गर्ल. आजकल लड़कियां विदेश जा रही हैं पढ़ने के लिए. यह तो दिल्ली शहर में ही रहेगी. जब मरजी हो जा कर मिल आया करना. यह भी आतीजाती रहेगी.’’

‘‘यस मौम,’’ निमी ने दुलार से कहा. जब बापबेटी राजी हों, तो मां की कहां चलती है. उसे परमीशन मिल गई. उस ने 1 साल का कन्सौलिडेटेड कोर्स जौइन कर लिया और मुखर्जी नगर में ही रहने लगी.

जैसाकि निमी का स्वभाव था, वह जल्दी लड़कों में लोकप्रिय हो गई. कोचिंग में पढ़ने वाले कई लड़के उस के दोस्त बन गए. सभी धनाढ्य घरों के थे. उन के पास अनापशनाप पैसे आते थे. आएदिन पार्टियां होतीं. निमी उन पार्टियों की शान समझी जाती थी.

लड़के उस के सामीप्य के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा देते. दिन, महीनों में नहीं बदले, उस के पहले ही निमी कई लड़कों के गले का हार बन गई. उस के बदन के फूल लड़कों के बिस्तर पर महकने लगे.

बहुत जल्दी उस के मम्मीपापा को उस की हरकतों के बारे में पता चल गया. मम्मी ने समझाया, ‘‘बेटा, यह क्या है? इस तरह का जीवन तुम्हें कहां ले जा कर छोड़ेगा, कुछ सोचा है? हम ने तुम्हें कुछ ज्यादा ही छूट दे दी थी. इतनी छूट तो विदेशों में भी मांबाप अपने बच्चों को नहीं देते. चलो, अब तुम पीजी में नहीं रहोगी… जो कुछ करना है हमारी निगाहों के सामने घर पर रह कर करोगी.’’

‘‘मम्मी, मेरी कोचिंग तो पूरी हो जाने दो,’’  निमी ने प्रतिरोध किया.

‘‘जो तुम्हारे आचरण हैं, उन से क्या तुम्हें लगता है कि तुम कोचिंग की पढ़ाई कर पाओगी… कोचिंग पूरी भी कर ली, तो कंपीटिशन की तैयारी कर पाओगी? पढ़ाई करने के लिए किताबें ले कर बैठना पड़ता है, लड़कों के हाथ में हाथ डाल कर पढ़ाई नहीं होती,’’ मां ने कड़ाई से कहा.

‘‘मम्मी, प्लीज. आप पापा को एक बार समझाओ न,’’ निमी ने फिर प्रतिरोध किया.

‘‘नहीं, निमी. तुम्हारे पापा बहुत दुखी और आहत हैं. मैं उन से कुछ नहीं कह सकती. तुम अपने मन की करोगी, तो हम तुम्हें रुपयापैसा देना बंद कर देंगे. फिर तुम्हें जो अच्छा लगे करना.’’

निमी अपने घर आ तो गई, परंतु अंदर से बहुत अशांत थी. घर पर ढेर सारे प्रतिबंध थे. अब हर क्षण मां की उस पर नजर रहती.

शराब, सिगरेट और लड़कों से वह भले ही दूर हो गई थी, परंतु मोबाइल फोन के माध्यम से उस के दोस्तों से उस का संपर्क बना हुआ था.

जब फोन करना संभव न होता, फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप के माध्यम से संपर्क हो जाता. लड़के इतनी आसानी से सुंदर मछली को फिसल कर पानी में जाने देना नहीं चाहते.

लड़कों ने उसे तरहतरह से समझाया. वे सभी उस का खर्चा उठाने के लिए तैयार थे. रहनेखाने से ले कर कपड़ेलत्ते और शौक तक… सब कुछ… बस वह वापस आ जाए. प्रलोभन इतने सुंदर थे कि वह लोभ संवरण न कर सकी. मांबाप के प्यार, संरक्षण और सलाहों के बंधन टूटने लगे.

निमी ने बुद्धि के सारे द्वार बंद कर दिए. विवेक को तिलांजलि दे दी और एक दिन घर से कुछ रुपएपैसे और कपड़े ले कर फरार हो गई. दोस्तों ने उस के खाने व रहने के लिए एक फ्लैट का इंतजाम कर रखा था. काफी दिनों तक वह बाहरी दुनिया से दूर अपने घर में बंद रही.

पता नहीं उस के मांबाप ने उसे ढूंढ़ने का प्रयत्न किया था या नहीं. उस ने अपना फोन नंबर ही नहीं, फोन सैट भी बदल लिया था. मांबाप अगर पुलिस में रिपोर्ट लिखाते तो उस का पता चलना मुश्किल नहीं था. उस के पुराने फोन की काल डिटेल्स से उस के दोस्तों और फिर उस तक पुलिस पहुंच सकती थी, परंतु संभवतया उस के मांबाप ने पुलिस में उस के गुम होने की रिपोर्ट नहीं लिखाई थी.

निमी का जीवन एक दायरे में बंध कर रह गया था. खानापीना और ऐयाशी, जब तक वह नशे में रहती, उसे कुछ महसूस न होता, परंतु जबजब एकांत के साए घेरते उस के दिमाग में तमाम तरह के विचार उमड़ते, मांबाप की याद आती.

न तो समय एकजैसा रहता है, न कोई वस्तु अक्षुण्ण रहती है. निमी ने धीरेधीरे महसूस किया, उस के जो मित्र पहले रोज उस के पास आते थे, अब हफ्ते में 2-3 बार ही आते थे. पूछने पर बताते व्यस्तता बढ़ रही है. दूसरे काम आ गए हैं. मगर सत्य तो यह था उन के जीवन में एकरसता आ गई थी. अनापशनाप पैसा खर्च हो रहा था. मांबाप सवाल उठाने लगे थे. निमी की तरह बेवकूफ तो थे नहीं, उन्हें अपना कैरियर बनाना था. कुछ की कोचिंग समाप्त हो गई, तो वे अपने घर चल गए. जो दिल्ली के थे, वे कभीकभार आते थे, परंतु अब उन के लिए भी निमी का खर्चा उठाना भारी पड़ने लगा था.

निमी वरुण को अपना सर्वश्रेष्ठ हितैषी समझती थी. एक दिन उसी से पूछा, ‘‘वरुण, एक बात बताओ, मैं ने तुम लोगों की दोस्ती के लिए अपना घरपरिवार और मांबाप छोड़ दिए, अब तुम लोग मुझे 1-1 कर छोड़ कर जाने लगे हो. मैं तो कहीं की न रही… मेरा क्या होगा?’’

वरुण कुछ पल सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘निमी, मेरी बात तुम्हें कड़वी लगेगी, परंतु सचाई यही है कि तुम ने हमारी दोस्ती नहीं अपने स्वार्थ और सुख के लिए घर छोड़ा था. यहां कोई किसी के लिए कुछ नहीं करता, सब अपने लिए करते हैं. अपनी स्वार्थ सिद्धि के बाद सब अलग हो जाते हैं, जैसा अब तुम्हारे साथ हो रहा है.

यह कड़वी सचाई तुम्हें बहुत पहले समझ जानी चाहिए थी. हम सभी अभी बेरोजगार हैं, मांबाप के ऊपर निर्भर हैं, कैरियर बनाना है. ऐसे में रातदिन हम  भोगविलास में लिप्त रहेंगे, तो हमारा भविष्य चौपट हो जाएगा.’’

अपनी स्थिति पर उसे रोना आ रहा था, परंतु वह रो नहीं सकती थी. आगे आने वाले दिनों के बारे में सोच कर उस का मन बैठा जा रहा था. वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे?

‘‘मैं क्या करूं, वरुण?’’ वह लगभग रोंआसी हो गई थी, ‘‘नासमझी में मैं ने क्या कर डाला?’’

‘‘बहुत सारी लड़कियां जवानी में ऐसा कर गुजरती हैं और बाद में पछताती हैं.’’

‘‘तुम ने भी मुझे कभी नहीं समझाया, मैं तो तुम्हें सब से अच्छा दोस्त समझती थी.’’

वरुण हंसा, ‘‘कैसी बेवकूफी वाली बातें कर रही हो. तुम कभी एक लड़के के प्रति वफादार नहीं रही. तुम्हारी नशे की आदत और तुम्हारी सैक्स की भूख ने तुम्हारी अक्ल पर परदा डाल दिया था. तुम एक ही समय में कई लड़कों के साथ प्रेमव्यवहार करोगी, तो कौन तुम्हारे साथ निष्ठा से प्रेमसंबंध निभाएगा… सभी लड़के तुम्हारे तन के भूखे थे और तुम उन्हें बहुत आसान शिकार नजर आई. बिना किसी प्रतिरोध के तुम किसी के भी साथ सोने के लिए तैयार हो जाती थी. ऐसे में तुम किसी एक लड़के से सच्चे और अटूट प्रेम की कामना कैसे कर सकती हो?’’

वरुण की बातों में कड़वी सचाई थी. निमी ने कहा, ‘‘मैं ने जोश में आ कर अपना सब कुछ गंवा दिया. दोस्त भी 1-1 कर चले गए. तुम तो मेरा साथ दे सकते हो.’’

वरुण ने हैरान भरी निगाहों से उसे देखा, ‘‘तुम्हारा साथ कैसे दे सकता हूं? मैं तो स्वयं तुम से दूर जाने वाला था. 1 साल मेरा बरबाद हो गया. इस बार प्री ऐग्जाम भी क्वालिफाई नहीं कर पाया. तुम्हारे चक्कर में पढ़ाईलिखाई हो ही नहीं पाई. घर में मम्मीपापा सभी नाराज हैं. ऐयाशी और मौजमस्ती छोड़ कर मैं ईमानदारी से तैयारी करना चाहता हूं. मैं तुम से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता. वरना मेरा जीवन चौपट हो जाएगा.’’

निमी ने उस के दोनों हाथों को पकड़ कर अपने सीने पर रख लिया, ‘‘वरुण, मैं जानती हूं मैं ने गलती की है. मछली की तरह एक से दूसरे हाथ में फिसलती रही, परंतु सच मानो मैं ने तुम्हें सच्चे मन से प्यार किया है. जब कभी मन में अवसाद के बादल उमड़े मैं ने केवल तुम्हें याद किया. मुझे इस तरह छोड़ कर न जाओ.’’

‘‘निमी, तुम समझने का प्रयास करो, मैं ने अगर तुम्हारा साथ नहीं छोड़ा, तो मेरा भविष्य मेरे रास्ते से गायब हो जाएगा. मुझे कुछ बन जाने दो.’’

‘‘मैं तुम से प्यार की भीख नहीं मांगती. प्यार और सैक्स को पूरी तरह से भोग लिया है मैं ने परंतु पेट की भूख के आगे मनुष्य सदा लाचार रहता है. मेरे पास जीविका का कोई साधन नहीं है. जहां इतना सब कुछ किया, मेरे प्यार के बदले इतना सा उपकार और कर दो. रहने के लिए 1 कमरा और पेट की रोटी के लिए दो पैसे का इंतजाम कर दो. मैं वेश्यावृत्ति नहीं अपनाना चाहती,’’ निमी की आवाज दुनियाभर की बेचारगी और दीनता से भर गयी थी.

वरुण अपने दोस्तों की तरह कठोर नहीं था. उस के अंदर सहज मानवीय भाव थे. वह काफी संवेदनशील था और निमी के प्रति दयाभाव भी रखता था, परंतु उस के लिए वह अपना भविष्य दांव पर नहीं लगा सकता था. अत. कुछ सोच कर बोला, ‘‘तुम प्राइवेट नौकरी कर सकती हो?’’

‘‘हां, मेरे पास और चारा भी क्या है?’’

‘‘तो फिर ठीक है, तुम इसी फ्लैट में रहो. इस का किराया मैं दे दिया करूंगा. मैं अपने पिता से बात कर के तुम्हें किसी कंपनी में काम दिलवा दूंगा, जिस से तुम्हारा गुजारा चल सके.’’

‘‘मैं तुम्हारा एहसान कभी नहीं भूलूंगी.’’

वरुण ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘या तुम अपने घर चली जाओ.’’

निमी ने आश्चर्य से उसे देखा. फिर बोली, ‘‘कौन सा मुंह ले कर जाऊं उन के पास? क्या बताऊंगी उन्हें कि मैं ने इतने दिन क्या किया है? नहीं वरुण, मैं उन के पास जा कर उन्हें और परेशान नहीं करना चाहती.’’

वरुण के पिता सरकारी विभाग में अच्छे पद थे. उस ने पिता से कह कर निमी को एक प्राइवेट कंपनी में लगवा दिया. क्व20 हजार महीने पर. निमी का जो लाइफस्टाइल था, उस के हिसाब से उस की यह सैलरी ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर थी, परंतु मुसीबत की घड़ी में मनुष्य को तिनके का सहारा भी बहुत होता है.

निमी ने उन्मुक्त यौन संबंधों से तो छुटकारा पा लिया, परंतु वह शराब और सिगरेट से छुटकारा नहीं पा सकी. एकांत उसे परेशान करता, पुरानी यादें उसे कचोटतीं, मांबाप की याद आती, तो वह पीने बैठ जाती.

वरुण जब भी उस से मिलने आता, वह उस की बांहों में गिर कर रोने लगती. वह समझाता, ‘‘मत पीया करो इतना, बीमार हो जाओगी.’’

‘‘वरुण, एकाकी जीवन मुझे बहुत डराता है,’’ वह उस से चिपक जाती.

‘‘मातापिता के पास वापस चली जाओ. वे तुम्हें माफ कर देंगे,’’

वह कई बार निमी से यह बात कह चुका था, पर हर बार निमी का यही जवाब होता, ‘‘कौन सा मुंह ले कर जाऊं उन के पास? वे मुझे क्या बनाना चाहते थे और मैं क्या बन बैठी… माफ तो कर देंगे, परंतु समाज को क्या जवाब देंगे.’’

‘‘वही, जो अभी दे रहे होंगे.’’

‘‘अभी वे मुझे मरा समझ कर माफ कर देंगे, परंतु उन के पास रह कर मैं उन्हें बहुत दुख दूंगी.’’

‘‘एक बार जा कर तो देखो.’’

‘‘नहीं वरुण, तुम मेरे मांबाप को नहीं जानते. वे मुझे माफ नहीं करेंगे. अगर उन्हें माफ करना होता, तो अब तक मुझे ढूंढ़ लिया होता. यह बहुत मुश्किल नहीं था. उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं की होगी,’’ वरुण के समझाने का उस पर कोई प्रभाव न पड़ता.

यथास्थिति बनी रही. बस वरुण सिविल सर्विसेज की तैयारी में निरंतर जुटा रहा. इस का परिणाम यह रहा कि वह यूपीएससी परीक्षा पास कर गया.

जब वरुण ट्रेनिंग के लिए जाने लगा तो निमी ने कहा, ‘‘अब तुम पूरी तरह से मुझ से दूर चले जाओगे.’’

‘‘वह तो जाना ही था,’’ वरुण ने उसे समझाते हुए कहा. निमी के मन में बहुत कुछ टूट गया. वह जानती थी, वरुण उस का नहीं हो सकता है,

फिर भी उस के दिल में कसक सी उठी. वह खोईखोई आंखों से वरुण को देख रही थी. वरुण ने उस के सिर को सहलाते हुए कहा, ‘‘देखो, निमी, मेरा कहना मानो, अब भटकने से कोई फायदा नहीं. तुम ने अपने जीवन को जितना गिराना था, गिरा लिया. अब सावधानी से उठने की कोशिश करो. तुम्हारी तनख्वाह बढ़ गई है. कुछ बचा कर पैसे जोड़ लो और किसी लड़के से शादी कर के घर बसा लो. मेरी तरफ से जो हो सकेगा मैं मदद करूंगा.’’

निमी ने जवाब नहीं दिया. अगले कुछ दिनों में वरुण मसूरी चला गया. निमी पूरी तरह टूट गई. उस ने अपनी सोच पर ताले लगा लिए. जैसे वह सुधरना ही नहीं चाहती थी.

1 साल की ट्रेनिंग के दौरान वरुण उस से मिलने केवल एक बार आया और रातभर उस के साथ रुका. तब भी उस ने निमी को घर बसाने की सलाह दी. परंतु वह चुप ही रही.

कई साल बीत गए. वरुण की पोस्टिंग हो गई थी. वह एक जिले का कलैक्टर बन गया था. उसे छुट्टी नहीं मिलती थी या दिल्ली आ कर भी वह उस से मिलना नहीं चाहता था, परंतु हर माह वह एक अच्छी राशि निमी के खाते में जमा करा देता था.

निमी ने तय कर लिया था कि वह शादी नहीं करेगी. वरुण उस का नहीं है, फिर भी उस का इंतजार करती थी. इंतजार जितना लंबा हो रहा था, उस के शराब पीने की मात्रा भी उतनी ही बढ़ती जा रही थी. फिर पता चला कि वरुण की शादी किसी चीफ सैक्रेटरी की आईएएस बेटी से हो गई है. निमी के अंदर जो थोड़ी सी आस बची थी, वह पूर्णरूप से टूट गई. उस की शराब की मात्रा इतनी ज्यादा हो गई कि अब वह दफ्तर भी नहीं जा पाती थी.

वरुण से उस का कोई सीधा संपर्क नहीं था. कभीकभी वरुण के पिता का नौकर उस के हालचाल पूछ जाता था. वही वरुण के बारे में बताता था और उस के बारे में वही वरुण को खबर करता होगा.

अत्यधिक शराब के सेवन से उस की तबीयत खराब रहने लगी. वरुण के पिता का नौकर लगभग रोज उस के पास आने लगा था. एक दिन उसी के सामने निमी को खून की उलटी हुई. उसे आननफानन में अस्पताल में भरती करवाया गया.

मैडिकल रिपोर्ट से यह साबित हो गया था कि अत्यधिक शराब के सेवन से उस के सारे अंदरूनी अंग खराब हो गए हैं. वरुण ने अपने नौकर के माध्यम से उसे सेमी प्राइवेट वार्ड में भरती करवा दिया था. इलाज का सारा खर्च वह भेज रहा था, परंतु कभी मिलने नहीं आया.

उस के इलाज में कोई कमी नहीं थी, परंतु उस का दुख उसे खाए जा रहा था जैसे वह किसी बीमारी से नहीं, अपने दुख से ही मरेगी, परंतु इसी बीच संयोग से अस्पताल में अनुभा प्रकट हुई और उस के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन आ गया. अब वह ठीक हो कर घर आ गई थी. घर तो आ गई थी, परंतु किस के  घर? उस का अपना घर, संसार कहां था?

यक्ष प्रश्न अभी भी उस के सामने खड़ा था. अब आगे क्या? 35 वर्ष की अवस्था में अब वह कोई युवती नहीं थी. बीमारी ने उस की सुंदरता को काफी हद तक क्षीण कर दिया था. नौकरी हाथ से जा चुकी थी, वरुण से भी व्यक्तिगत संपर्क टूट चुका था.

हिमांशु केंद्र सरकार में उच्च अधिकारी थे. उन्होंने अपने प्रयासों से निमी को एक संस्था से जोड़ दिया. यह संस्था अनाथ बच्चों की देखभाल और उन्हें शिक्षा प्रदान करती थी. कुछ दिन तक निमी अनुभा के घर पर रही. फिर उस की संस्था ने उसे एक घर लीज पर दिलवा दिया. साफसफाई के बाद जिस दिन निमी ने अपने घर में प्रवेश किया, तब अनुभा और उस के पति के कुछ दोस्त मौजूद थे. छोटी सी पार्टी रखी गई थी.

शाम को पार्टी के बाद जब अनुभा निमी को छोड़ कर जाने लगी, तो निमी ने कहा, ‘‘मैं फिर अकेली हो जाऊंगी.’’

‘‘नहीं, तुम अकेली नहीं हो. हम सब तुम्हारे साथ हैं. पहले जो लोग तुम से जुड़े थे, वे स्वार्थवश जुड़े थे. इसीलिए तुम पतन की राह पर चल पड़ी थी. अब तुम्हारे सामने एक लक्ष्य है, बच्चों का भविष्य सुधारने का. इस लक्ष्य को ध्यान में रखोगी और अपनी पिछली जिंदगी के बारे में विचार करोगी, तो तुम एकाकी जीवन जीते हुए भी कभी गलत रास्ते पर नहीं चलोगी.’’

निमी ने शरमा कर सिर झुका लिया. अनुभा ने उस का चेहरा ऊपर उठाया. उस की आंखों में आंसू थे. कई वर्षों बाद उस की आंखों में खुशी के आंसू आए थे.

पति की संतान : क्या थी सरिता की परेशानी

हरीतिमा के आने से सरिता की परेशानी बहुत कम हो गई थी, क्योंकि वह घर का सारा काम संभाल लेती थी.

पहले सरिता घर के बहुत से काम निबटा लेती थी. लेकिन जब से पति बीमार हुए थे और बिस्तर पकड़ चुके थे तब से पार्ट टाइम कामवाली बाई से उस का काम नहीं चलता था. उसे परमानैंट नौकरानी की जरूरत थी जो पूरा घर संभाल सके.

सरिता को पति का मैडिकल स्टोर सुबह से रात तक चलाना होता था. दुकान में 3 नौकर थे. सरिता बीच में थोड़ी देर के लिए खाना खाने और फ्रैश होने घर आती थी. सुबह 9 बजे से रात 10 बजे तक उसे मैडिकल स्टोर पर बैठना पड़ता था. काम सारा नौकर ही करते थे लेकिन हिसाब उसे ही देखना पड़ता था.

काफी समय तक सरिता को बहुत समस्या हुई. घर में एक बेटा, एक बेटी थे जो 8वीं और 9वीं क्लास में पढ़ते थे. उन के लिए चाय, नाश्ता, सुबह का टिफिन तैयार कर के स्कूल भेजना और शाम की चाय के बाद भोजन तैयार करना और खिलाना सब हरीतिमा की जिम्मेदारी थी.

बीमार पति को समय पर दवाएं और डाक्टर के बताए मुताबिक भोजन देना… यह सब हरीतिमा के बिना मुमकिन नहीं था.

सरिता जब बहुत परेशान हो गई तब उस ने एजेंसी में जा कर कई बार परमानैंट नौकरानी का इंतजाम करने के लिए कहा.

एक दिन एजेंसी के मालिक ने कहा, ‘‘अभी तो कोई लड़की नहीं है. जल्द ही असम और बिहार से लड़कियां आने वाली हैं. मैं आप को बता दूंगा.’’

सरिता ने एजेंसी वाले से कहा, ‘‘आप ज्यादा कमीशन ले लेना. लड़की को अच्छी तनख्वाह के साथ रहनेखाने की सारी सुविधाएं भी दूंगी लेकिन मुझे उस की सख्त जरूरत है.’’

और जल्द ही एजेंसी वाले का फोन आ गया. एजेंसी से 13 साल की हरीतिमा को लाने के बाद सरिता की सारी मुसीबतों का हल हो गया.

हरीतिमा सुबह से रात तक चकरघिन्नी बनी रहती. पूरे घर का काम करती. घर के हर सदस्य का ध्यान रखती.

हर समय पूरा घर साफसुथरा रहता. हरीतिमा हमेशा काम करती नजर आती. न कोई नखरा, न कोई शिकायत और न कोई छुट्टी.

13 साल की खूबसूरत, गोरी, नाजुक, मेहनती हरीतिमा बिहार के एक छोटे से गांव की थी. घर की माली हालत खराब थी. मां बीमार थीं. घर में 2 छोटे भाई थे. उस के पिता बचपन में ही गुजर गए थे.

शुक्रवार को जब मैडिकल स्टोर बंद रहता तब सरिता उस से बात करती. उस से पूछती, ‘‘किसी चीज की कोई जरूरत हो तो बेझिझक कहना. खाने में जो पसंद हो, बना कर खा लिया करो.’’

हरीतिमा को पढ़ने का शौक था. सरिता उस के लिए किताबें भी ला देती.

पति रतनलाल के एक के बाद एक 2-3 बड़े आपरेशन हुए थे. उन्हें आराम की सख्त जरूरत थी.

सरिता पति के कमरे में कम ही जाती थी. कमरे से आती दवाओं और गंदगी की बदबू से उसे उबकाई आती थी. पति की ऐसी बुरी दशा देखने का भी उस का मन नहीं करता था.

पति बिस्तर पर लेटे रहते. काफी समय तक तो उन के मलमूत्र का मार्ग बंद कर प्लास्टिक की थैलियां लटका दी गई थीं. उन्हें साफ करने का काम पहले तो एक नर्स करती थी, बाद में रतनलाल खुद करने लगे थे. लेकिन अब हरीतिमा ने इस जिम्मेदारी को संभाल लिया था.

सरिता को लगता था कि उस के पति की जिंदगी एक तरह से खत्म ही हो चुकी है. उन्हें बाकी जिंदगी बिस्तर पर ही गुजारनी है. ठीक हो भी गए तो पहले जैसे नहीं रहेंगे.

सरिता ने अपना कमरा अलग तैयार कर लिया था. अपनी जरूरतों के हिसाब से सबकुछ अपने कमरे में रख लिया था. बच्चे बड़े हो रहे थे. वह गलती से ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहती थी कि बच्चों की जिंदगी पर उस का बुरा असर पड़े.

सरिता की उम्र 40 साल थी और पति की उम्र 45 साल के आसपास. पिछले एक साल से वह पति की दुकान और घर सब देख रही थी.

आज रतनलाल को प्लास्टिक की थैली निकलवाने जाना था, लेकिन यह बहुत आसान काम नहीं था.

सरिता को साथ जाना था लेकिन उस ने कह दिया, ‘‘मैं जा कर क्या करूंगी? मुझ से यह सब देखा नहीं जाता. तुम हरीतिमा को साथ ले जाओ. फिर मुझे दुकान भी देखनी है. काम करूंगी तो पैसा आएगा. आप के इलाज में लाखों रुपए खर्च हो चुके हैं.’’ तय हुआ कि हरीतिमा ही साथ जाएगी.

रतनलाल अस्पताल से 3 दिन बाद घर वापस आए. उन्हें परहेज के साथ दवाएं समय पर लेनी थीं.

हरीतिमा बोर न हो, इस वजह से सरिता शुक्रवार को उसे बच्चों के साथ बाहर घुमाने ले जाती. बच्चे जो खाते, हरीतिमा को भी खिलाया जाता. चाट, पकौड़े, गोलगप्पे. बच्चे पार्क में खेलते तो हरीतिमा भी साथ में खेलती. बच्चों के लिए कपड़े खरीदने जाते तो हरीतिमा के लिए भी खरीदे जाते.

चाट खाते समय एक लड़के ने हरीतिमा से बात की. सरिता को अच्छा नहीं लगा. लौटते समय सरिता ने उस से पूछा, ‘‘तुम इसे कैसे जानती हो?’’

‘‘मेरे मुल्क का है मैडम.’’

‘‘मुल्क के नहीं राज्य के. मुल्क तो हम सब का एक ही है,’’ सरिता ने हंसते हुए कहा, फिर उसे समझाया, ‘‘देखो हरीतिमा, तुम मेरी बेटी जैसी हो. इस उम्र में लड़कों से दोस्ती ठीक नहीं है. अभी तुम्हारी उम्र महज 15 साल है.’’

अब हरीतिमा को अकसर ऐसी हिदायतें मिलने लगी थीं.

रतनलाल लाठी के सहारे घर में ही टहलने लगे थे. एक बार वे लड़खड़ा कर गिर गए. तब से सरिता ने हरीतिमा को हिदायत दी, ‘‘तुम अंकल को थोड़ा बाहर तक घुमा दिया करो. कहीं और कोई परेशानी न हो जाए.’’

तब से हरीतिमा घर से थोड़ी दूर बने पार्क में उन के साथ जाने लगी. वह पहले जैसी शांत और सहमी हुई नहीं थी. अब वह हंसने, बोलने लगी थी. खुश रहने लगी थी.

लेकिन हरीतिमा के खिलते शरीर और उस में आए बदलावों को देख कर सरिता जरूर चिंता में रहने लगी थी. उसे उस लड़के का चेहरा याद आया तो क्या बाहर जा कर इतनी उम्र में वह सब करने लगी थी हरीतिमा, जो उस की उम्र की लिहाज से गलत था? कहीं पेट में कुछ ठहर गया तो? सरिता ने एजेंसी वाले को सारी बात फोन पर बताई.

एजेंसी वाले ने कहा, ‘‘मैडम, यह उस का निजी मामला है. हम और आप इस में क्या कर सकते हैं? वह अपनी नौकरी से बेईमानी नहीं करती. आप के घर की देखभाल ईमानदारी से कर रही है. और आप को क्या चाहिए?’’

सरिता को लगा कि एजेंसी वाला ठीक ही कह रहा है. फिर हरीतिमा उस की जरूरत बन गई थी. जरूरी नहीं कि दूसरी लड़की इतनी ईमानदार हो, मेहनती हो.

सरिता इस बात को भूलने की कोशिश कर ही रही थी. 2-4 दिन ही गुजरे थे कि सरिता ने हरीतिमा को उलटी करते हुए देख लिया.

सरिता घबरा गई. उस ने प्यार से हरीतिमा के सिर पर हाथ फिराते हुए कहा, ‘‘तुम ने आखिर बेवकूफी कर ही दी. जब यह सब कर रही थी तो सावधानी क्यों नहीं बरती? कितना समय हो गया? अभी जा कर अपने चाहने वाले के साथ मिल कर डाक्टर से अबौर्शन करा लो. बाद में मुसीबत में पड़ जाओगी और तुम्हारे आशिक को बलात्कार के जुर्म में जेल हो जाएगी. इतना तो समझती होगी कि 18 साल से कम उम्र की लड़की से संबंध बनाना बलात्कार कहलाता है?’’

हरीतिमा ने कुछ नहीं कहा.

‘‘चुप रहने से काम नहीं चलेगा…’’ सरिता ने गुस्से में कहा, ‘‘मैं इस हालत में तुम्हें काम पर नहीं रख सकती. अभी इसी वक्त निकल जाओ मेरे घर से.’’

हरीतिमा रोने लगी. उस ने सरिता के पैर पकड़ते हुए कहा, ‘‘मैडम, गलती हो गई. मुझे माफ कर दीजिए. आप ही कोई रास्ता निकालिए. मैं इस घर को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’

सरिता को गुस्सा तो था लेकिन हरीतिमा की जरूरत भी थी. उस ने अपने परिचित डाक्टर को दिखाया. एक महीने का पेट था. 5,000 रुपए ले कर डाक्टर ने आसानी से पेट गिरा दिया.

सरिता ने फिर डांटा, समझाया और दोबारा ऐसी गलती न करने को कहा.

रात में उसे अपने पास बिठा कर प्यार से पूछा, ‘‘कौन है वह, जिस के साथ तुम्हारे संबंध बने? चाटपकौड़े की दुकान में मिला वह लड़का?’’

हरीतिमा चुप रही. सरिता समझ गई कि वह बताना नहीं चाहती.

रतनलाल की ठीक होती तबीयत अचानक बिगड़ने लगी. उन्हें फिर अस्पताल ले जाया गया. डाक्टरों ने हालत गंभीर बताई. जिस कैंसर से वे उबर चुके थे, वही कैंसर उन्हें पूरी तरह अंदर ही अंदर खोखला कर चुका था.

अस्पताल में ही रतनलाल की मौत हो गई. उस दिन सरिता फूटफूट कर रोई और हरीतिमा अकेले में अपनी रुलाई रोकने की कोशिश करती रही.

पति के अंतिम संस्कार की सारी रस्में निबट चुकी थीं. सरिता की जिंदगी अपने ढर्रे पर आ चुकी थी. बच्चे अपनी पढ़ाई में लग चुके थे. दुख की परतें अब छंटने लगी थीं.

तभी फिर सरिता को हरीतिमा में वे सारे लक्षण दिखे जो एक गर्भवती औरत में दिखाई देते हैं. इस बार हरीतिमा अपने पेट को छिपाने की कोशिश करती नजर आ रही थी.

सरिता ने उसे गुस्से में थप्पड़ जड़ कर कहा, ‘‘फिर वही पाप…’’ इस बार हरीतिमा ने जवाब दिया, ‘‘पाप नहीं, मेरे प्यार की निशानी है.’’

हरीतिमा का जवाब सुन कर सरिता सन्न रह गई, ‘‘प्यार समझती भी हो? यह प्यार नहीं हवस है, बलात्कार है. चलो, अभी डाक्टर के पास,’’ सरिता ने गुस्से में कहा.

‘‘मैं नहीं गिराऊंगी.’’

‘‘यह कानूनन अपराध है. जेल जाएगा तुम्हारा आशिक.’’

‘‘कुछ भी हो, मैं इस बच्चे को जन्म दूंगी.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग खराब है क्या? समझती क्यों नहीं हो?’’

‘‘हां, मेरा दिमाग खराब है. प्यार ने मेरा दिमाग खराब कर दिया है.’’

‘‘बुलाओ इस बच्चे के बाप को.’’

‘‘वे अब इस दुनिया में नहीं हैं.’’

‘‘क्या… कौन है वह?’’

‘‘मैं उन्हें बदनाम नहीं करना चाहती.’’

‘‘चली जाओ यहां से.’’

हरीतिमा चली गई. सरिता ने एजेंसी वाले को फोन कर दिया.

एजेंसी वाले ने कहा, ‘‘आप निश्चिंत रहिए. मैं सब संभाल लूंगा.’’

सरिता निश्चिंत हो गई. कुछ दिन बीत गए. एक दिन वह घर की साफसफाई करने लगी. पति के कमरे का नंबर आया तो सरिता ने पति के सारे कपड़े, पलंग, बिस्तर सबकुछ दान कर दिया. वह एक अरसे बाद पति के कमरे में गई थी.

कमरा पूरी तरह खाली था. बस, एक पैन और डायरी रखी थी. सरिता ने डायरी के पन्ने पलटे. कुछ जगह हिसाब लिखा हुआ था. कुछ कागजों पर दवा लेने की नियमावली. एक पन्ने पर हरी स्याही से लिखा था हरीतिमा. यह नाम पढ़ कर वह चौंक गई. उस ने अपने कमरे में जा कर हरीतिमा के बाद पढ़ना शुरू किया…

‘सरिता, माना कि 15 साल की लड़की से प्यार करना गलत है. उस से संबंध बनाना अपराध है. लेकिन इस अपराध की हिस्सेदार तुम भी हो. मैं बीमार क्या हुआ, तुम ने मुझे मरा ही समझ लिया. अपना कमरा बदल लिया. मेरे कमरे में आना, मुझ से मिलना तक बंद कर दिया.

‘‘मेरे दिल पर क्या गुजरती होगी, तुम ने सोचा कभी? लेकिन तुम तो जिम्मेदारियां निभाने में लगी थीं. मैं तो जैसे अछूत हो चुका था तुम्हारे लिए.

‘सच कहूं तो मैं तुम्हारी बेरुखी देख कर ठीक होना ही नहीं चाहता था. लेकिन मैं ठीक हुआ हरीतिमा की देखभाल से. उस के प्यार से.

‘हां, मैं ने हरीतिमा से तुम्हारी शिकायतें कीं. उस से प्यार के वादे किए. उस के पैर पड़ा कि मेरी जिंदगी में तुम्हीं बहार ला सकती हो. मुझे तुम्हारी जरूरत है हरीतिमा. मैं तुम से प्यार करता हूं.

‘कम उम्र की नाजुक कोमल भावों से भरी लड़की मेरे प्यार में बह गई. उस ने मेरी जिस्मानी और दिमागी जरूरतें पूरी कीं.

‘हां, वह मेरे ही बच्चे की मां बनने वाली है. मैं उस के बच्चे को अपना नाम दूंगा. दुनिया इसे पाप कहे या अपराध, लेकिन वह मेरा प्यार है. मेरी पतझड़ भरी जिंदगी में वह हरियाली बन कर आई थी.

‘इस घर पर जितना तुम्हारा हक है, उतना ही हरीतिमा का भी है. लेकिन अब मुझे लगने लगा है कि मैं बचूंगा नहीं. अचानक से सारे शरीर में पहले की तरह भयंकर दर्द उठने लगा है.

‘मैं तुम से किसी बात के लिए माफी नहीं मांगूंगा. चिंता है तो बस हरीतिमा की. अपने होने वाले बच्चे की. उसे तुम्हारी दौलत नहीं चाहिए. तुम्हारा बंगला, तुम्हारा बैंक बैलैंस नहीं चाहिए. उसे बस सहारा चाहिए, प्यार चाहिए.’

डायरी खत्म हो चुकी थी. सरिता अवाक थी. उसे अपने पति पर गुस्सा आ रहा था और खुद पर शर्मिंदगी भी. किस तरह झटक दिया था उस ने अपने पति को. बीमारी, लाचारी की हालत में. हां, वही जिम्मेदार है अपने पति की बेवफाई के लिए. इसे बेवफाई कहें या अकेले टूटे हुए इनसान की जरूरत.

सरिता को उसी एजेंसी से दूसरी लड़की मिल चुकी थी. उस ने पूछा, ‘‘तुम हरीतिमा को जानती हो?’’

‘‘नहीं मैडम, एजेंसी वाले जानते होंगे.’’

सरिता ने एजेंसी में फोन लगा कर बात की.

एजेंसी वाले ने कहा, ‘क्या बताएं मैडम, किस के प्यार में थी? बच्चा गिराने को भी तैयार नहीं थी. न ही मरते दम तक बच्चे के बाप का नाम बताया.’

‘‘मरते दम तक… मतलब?’’ सरिता ने पूछा.

‘हरीतिमा बच्चे को जन्म देते समय ही मर गई थी.’

‘‘क्या…’’ सरिता चौंक गई ‘‘और बच्चा…’’

‘‘वह अनाथाश्रम में है.’’

सरिता सोचने लगी, ‘एक मैं हूं जिस ने पति के बंगले, कारोबार, बैंक बैलैंस को अपना कर पति को छोड़ दिया बंद कमरे में. बीमार, लाचार पति. बच्चों तक को दूर कर दिया. और एक गरीब हरीतिमा, जिस ने न केवल बीमारी की हालत में पति की देखभाल की, अपना सबकुछ सौंप दिया. यह जानते हुए भी कि उसे कुछ नहीं मिलेगा सिवा बदनामी के.

‘उस ने अपने प्यार की निशानी को जन्म दिया. वह चाहती तो क्या नहीं कर सकती थी? इस धनदौलत पर उस का भी हक बनता था. वह ले सकती थी लेकिन उस ने सबकुछ छोड़ दिया अपने प्यार की खातिर. उस ने एक बीमार मरते आदमी से प्यार किया और उसे निभाया भी और एक मैं हूं…

‘चाहे कुछ भी हो जाए, मैं हरीतिमा के प्यार की निशानी, अपने पति के बच्चे को इस घर में ला कर रहूंगी. मैं पत्नी का धर्म तो नहीं निभा सकी, पर उन की संतान के प्रति मां होने की जिम्मेदारी तो निभा ही सकती हूं.’

सारी कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद सरिता बच्चे को घर ले आई.

पति की संतान : क्या पति को ठीक कर पाई सरिता

पहले सरिता घर के बहुत से काम निबटा लेती थी. लेकिन जब से पति बीमार हुए थे और बिस्तर पकड़ चुके थे तब से पार्ट टाइम कामवाली बाई से उस का काम नहीं चलता था. उसे परमानैंट नौकरानी की जरूरत थी जो पूरा घर संभाल सके.

सरिता को पति का मैडिकल स्टोर सुबह से रात तक चलाना होता था. दुकान में 3 नौकर थे. सरिता बीच में थोड़ी देर के लिए खाना खाने और फ्रैश होने घर आती थी. सुबह 9 बजे से रात 10 बजे तक उसे मैडिकल स्टोर पर बैठना पड़ता था. काम सारा नौकर ही करते थे लेकिन हिसाब उसे ही देखना पड़ता था.

काफी समय तक सरिता को बहुत समस्या हुई. घर में एक बेटा, एक बेटी थे जो 8वीं और 9वीं क्लास में पढ़ते थे. उन के लिए चाय, नाश्ता, सुबह का टिफिन तैयार कर के स्कूल भेजना और शाम की चाय के बाद भोजन तैयार करना और खिलाना सब हरीतिमा की जिम्मेदारी थी.

बीमार पति को समय पर दवाएं और डाक्टर के बताए मुताबिक भोजन देना… यह सब हरीतिमा के बिना मुमकिन नहीं था.

सरिता जब बहुत परेशान हो गई तब उस ने एजेंसी में जा कर कई बार परमानैंट नौकरानी का इंतजाम करने के लिए कहा.

एक दिन एजेंसी के मालिक ने कहा, ‘‘अभी तो कोई लड़की नहीं है. जल्द ही असम और बिहार से लड़कियां आने वाली हैं. मैं आप को बता दूंगा.’’

सरिता ने एजेंसी वाले से कहा, ‘‘आप ज्यादा कमीशन ले लेना. लड़की को अच्छी तनख्वाह के साथ रहनेखाने की सारी सुविधाएं भी दूंगी लेकिन मुझे उस की सख्त जरूरत है.’’

और जल्द ही एजेंसी वाले का फोन आ गया. एजेंसी से 13 साल की हरीतिमा को लाने के बाद सरिता की सारी मुसीबतों का हल हो गया.

हरीतिमा सुबह से रात तक चकरघिन्नी बनी रहती. पूरे घर का काम करती. घर के हर सदस्य का ध्यान रखती.

हर समय पूरा घर साफसुथरा रहता. हरीतिमा हमेशा काम करती नजर आती. न कोई नखरा, न कोई शिकायत और न कोई छुट्टी.

13 साल की खूबसूरत, गोरी, नाजुक, मेहनती हरीतिमा बिहार के एक छोटे से गांव की थी. घर की माली हालत खराब थी. मां बीमार थीं. घर में 2 छोटे भाई थे. उस के पिता बचपन में ही गुजर गए थे.

शुक्रवार को जब मैडिकल स्टोर बंद रहता तब सरिता उस से बात करती. उस से पूछती, ‘‘किसी चीज की कोई जरूरत हो तो बे?ि?ाक कहना. खाने में जो पसंद हो, बना कर खा लिया करो.’’

हरीतिमा को पढ़ने का शौक था. सरिता उस के लिए किताबें भी ला देती.

पति रतनलाल के एक के बाद एक 2-3 बड़े आपरेशन हुए थे. उन्हें आराम की सख्त जरूरत थी.

सरिता पति के कमरे में कम ही जाती थी. कमरे से आती दवाओं और गंदगी की बदबू से उसे उबकाई आती थी. पति की ऐसी बुरी दशा देखने का भी उस का मन नहीं करता था.

पति बिस्तर पर लेटे रहते. काफी समय तक तो उन के मलमूत्र का मार्ग बंद कर प्लास्टिक की थैलियां लटका दी गई थीं. उन्हें साफ करने का काम पहले तो एक नर्स करती थी, बाद में रतनलाल खुद करने लगे थे. लेकिन अब हरीतिमा ने इस जिम्मेदारी को संभाल लिया था.

सरिता को लगता था कि उस के पति की जिंदगी एक तरह से खत्म ही हो चुकी है. उन्हें बाकी जिंदगी बिस्तर पर ही गुजारनी है. ठीक हो भी गए तो पहले जैसे नहीं रहेंगे.

सरिता ने अपना कमरा अलग तैयार कर लिया था. अपनी जरूरतों के हिसाब से सबकुछ अपने कमरे में रख लिया था. बच्चे बड़े हो रहे थे. वह गलती से ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहती थी कि बच्चों की जिंदगी पर उस का बुरा असर पड़े.

सरिता की उम्र 40 साल थी और पति की उम्र 45 साल के आसपास. पिछले एक साल से वह पति की दुकान और घर सब देख रही थी.

आज रतनलाल को प्लास्टिक की थैली निकलवाने जाना था, लेकिन यह बहुत आसान काम नहीं था.

सरिता को साथ जाना था लेकिन उस ने कह दिया, ‘‘मैं जा कर क्या करूंगी? मु?ा से यह सब देखा नहीं जाता. तुम हरीतिमा को साथ ले जाओ. फिर मु?ो दुकान भी देखनी है. काम करूंगी तो पैसा आएगा. आप के इलाज में लाखों रुपए खर्च हो चुके हैं.’’ तय हुआ कि हरीतिमा ही साथ जाएगी.

रतनलाल अस्पताल से 3 दिन बाद घर वापस आए. उन्हें परहेज के साथ दवाएं समय पर लेनी थीं.

हरीतिमा बोर न हो, इस वजह से सरिता शुक्रवार को उसे बच्चों के साथ बाहर घुमाने ले जाती. बच्चे जो खाते, हरीतिमा को भी खिलाया जाता. चाट, पकौड़े, गोलगप्पे. बच्चे पार्क में खेलते तो हरीतिमा भी साथ में खेलती. बच्चों के लिए कपड़े खरीदने जाते तो हरीतिमा के लिए भी खरीदे जाते.

चाट खाते समय एक लड़के ने हरीतिमा से बात की. सरिता को अच्छा नहीं लगा. लौटते समय सरिता ने उस से पूछा, ‘‘तुम इसे कैसे जानती हो?’’

‘‘मेरे मुल्क का है मैडम.’’

‘‘मुल्क के नहीं राज्य के. मुल्क तो हम सब का एक ही है,’’ सरिता ने हंसते हुए कहा, फिर उसे सम?ाया, ‘‘देखो हरीतिमा, तुम मेरी बेटी जैसी हो. इस उम्र में लड़कों से दोस्ती ठीक नहीं है. अभी तुम्हारी उम्र महज 15 साल है.’’

अब हरीतिमा को अकसर ऐसी हिदायतें मिलने लगी थीं.

रतनलाल लाठी के सहारे घर में ही टहलने लगे थे. एक बार वे लड़खड़ा

कर गिर गए. तब से सरिता ने हरीतिमा को हिदायत दी, ‘‘तुम अंकल को थोड़ा बाहर तक घुमा दिया करो. कहीं और कोई परेशानी न हो जाए.’’

तब से हरीतिमा घर से थोड़ी दूर बने पार्क में उन के साथ जाने लगी. वह पहले जैसी शांत और सहमी हुई नहीं थी. अब वह हंसने, बोलने लगी थी. खुश रहने लगी थी.

लेकिन हरीतिमा के खिलते शरीर और उस में आए बदलावों को देख कर सरिता जरूर चिंता में रहने लगी थी. उसे उस लड़के का चेहरा याद आया तो क्या बाहर जा कर इतनी उम्र में वह सब करने लगी थी हरीतिमा, जो उस की उम्र की लिहाज से गलत था? कहीं पेट में कुछ ठहर गया तो? सरिता ने एजेंसी वाले को सारी बात फोन पर बताई.

एजेंसी वाले ने कहा, ‘‘मैडम, यह उस का निजी मामला है. हम और आप इस में क्या कर सकते हैं? वह अपनी नौकरी से बेईमानी नहीं करती. आप के घर की देखभाल ईमानदारी से कर रही है. और आप को क्या चाहिए?’’

सरिता को लगा कि एजेंसी वाला ठीक ही कह रहा है. फिर हरीतिमा उस की जरूरत बन गई थी. जरूरी नहीं कि दूसरी लड़की इतनी ईमानदार हो, मेहनती हो.

सरिता इस बात को भूलने की कोशिश कर ही रही थी. 2-4 दिन ही गुजरे थे कि सरिता ने हरीतिमा को उलटी करते हुए देख लिया.

सरिता घबरा गई. उस ने प्यार से हरीतिमा के सिर पर हाथ फिराते हुए कहा, ‘‘तुम ने आखिर बेवकूफी कर ही दी. जब यह सब कर रही थी तो सावधानी क्यों नहीं बरती? कितना समय हो गया? अभी जा कर अपने चाहने वाले के साथ मिल कर डाक्टर से अबौर्शन करा लो. बाद में मुसीबत में पड़ जाओगी और तुम्हारे आशिक को बलात्कार के जुर्म में जेल हो जाएगी. इतना तो सम?ाती होगी कि 18 साल से कम उम्र की लड़की से संबंध बनाना बलात्कार कहलाता है?’’

हरीतिमा ने कुछ नहीं कहा.

‘‘चुप रहने से काम नहीं चलेगा…’’ सरिता ने गुस्से में कहा, ‘‘मैं इस हालत में तुम्हें काम पर नहीं रख सकती. अभी इसी वक्त निकल जाओ मेरे घर से.’’

हरीतिमा रोने लगी. उस ने सरिता के पैर पकड़ते हुए कहा, ‘‘मैडम, गलती हो गई. मु?ो माफ कर दीजिए. आप ही कोई रास्ता निकालिए. मैं इस घर को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’

सरिता को गुस्सा तो था लेकिन हरीतिमा की जरूरत भी थी. उस ने अपने परिचित डाक्टर को दिखाया. एक महीने का पेट था. 5,000 रुपए ले कर डाक्टर ने आसानी से पेट गिरा दिया.

सरिता ने फिर डांटा, सम?ाया और दोबारा ऐसी गलती न करने को कहा.

रात में उसे अपने पास बिठा कर प्यार से पूछा, ‘‘कौन है वह, जिस के साथ तुम्हारे संबंध बने? चाटपकौड़े की दुकान में मिला वह लड़का?’’

हरीतिमा चुप रही. सरिता समझ गई कि वह बताना नहीं चाहती.

रतनलाल की ठीक होती तबीयत अचानक बिगड़ने लगी. उन्हें फिर अस्पताल ले जाया गया. डाक्टरों ने हालत गंभीर बताई. जिस कैंसर से वे उबर चुके थे, वही कैंसर उन्हें पूरी तरह अंदर ही अंदर खोखला कर चुका था.

अस्पताल में ही रतनलाल की मौत हो गई. उस दिन सरिता फूटफूट कर रोई और हरीतिमा अकेले में अपनी रुलाई रोकने की कोशिश करती रही.

पति के अंतिम संस्कार की सारी रस्में निबट चुकी थीं. सरिता की जिंदगी अपने ढर्रे पर आ चुकी थी. बच्चे अपनी पढ़ाई में लग चुके थे. दुख की परतें अब छंटने लगी थीं.

तभी फिर सरिता को हरीतिमा में वे सारे लक्षण दिखे जो एक गर्भवती औरत में दिखाई देते हैं. इस बार हरीतिमा अपने पेट को छिपाने की कोशिश करती नजर आ रही थी.

सरिता ने उसे गुस्से में थप्पड़ जड़ कर कहा, ‘‘फिर वही पाप…’’ इस बार हरीतिमा ने जवाब दिया, ‘‘पाप नहीं, मेरे प्यार की निशानी है.’’

हरीतिमा का जवाब सुन कर सरिता सन्न रह गई, ‘‘प्यार समझाती भी हो? यह प्यार नहीं हवस है, बलात्कार है. चलो, अभी डाक्टर के पास,’’ सरिता ने गुस्से में कहा.

‘‘मैं नहीं गिराऊंगी.’’

‘‘यह कानूनन अपराध है. जेल जाएगा तुम्हारा आशिक.’’

‘‘कुछ भी हो, मैं इस बच्चे को जन्म दूंगी.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग खराब है क्या? समझाती क्यों नहीं हो?’’

‘‘हां, मेरा दिमाग खराब है. प्यार ने मेरा दिमाग खराब कर दिया है.’’

‘‘बुलाओ इस बच्चे के बाप को.’’

‘‘वे अब इस दुनिया में नहीं हैं.’’

‘‘क्या… कौन है वह?’’

‘‘मैं उन्हें बदनाम नहीं करना चाहती.’’

‘‘चली जाओ यहां से.’’

हरीतिमा चली गई. सरिता ने एजेंसी वाले को फोन कर दिया.

एजेंसी वाले ने कहा, ‘‘आप निश्चिंत रहिए. मैं सब संभाल लूंगा.’’

सरिता निश्चिंत हो गई. कुछ दिन बीत गए. एक दिन वह घर की साफसफाई करने लगी. पति के कमरे का नंबर आया तो सरिता ने पति के सारे कपड़े, पलंग, बिस्तर सबकुछ दान कर दिया. वह एक अरसे बाद पति के कमरे में गई थी.

कमरा पूरी तरह खाली था. बस, एक पैन और डायरी रखी थी. सरिता ने डायरी के पन्ने पलटे. कुछ जगह हिसाब लिखा हुआ था. कुछ कागजों पर दवा लेने की नियमावली. एक पन्ने पर हरी स्याही से लिखा था हरीतिमा. यह नाम पढ़ कर वह चौंक गई. उस ने अपने कमरे में जा कर हरीतिमा के बाद पढ़ना शुरू किया…

‘सरिता, माना कि 15 साल की लड़की से प्यार करना गलत है. उस से संबंध बनाना अपराध है. लेकिन इस अपराध की हिस्सेदार तुम भी हो. मैं बीमार क्या हुआ, तुम ने मु?ो मरा ही सम?ा लिया. अपना कमरा बदल लिया. मेरे कमरे में आना, मु?ा से मिलना तक बंद कर दिया.

‘‘मेरे दिल पर क्या गुजरती होगी, तुम ने सोचा कभी? लेकिन तुम तो जिम्मेदारियां निभाने में लगी थीं. मैं तो जैसे अछूत हो चुका था तुम्हारे लिए.

‘सच कहूं तो मैं तुम्हारी बेरुखी देख कर ठीक होना ही नहीं चाहता था. लेकिन मैं ठीक हुआ हरीतिमा की देखभाल से. उस के प्यार से.

‘हां, मैं ने हरीतिमा से तुम्हारी शिकायतें कीं. उस से प्यार के वादे किए. उस के पैर पड़ा कि मेरी जिंदगी में तुम्हीं बहार ला सकती हो. मुझे तुम्हारी जरूरत है हरीतिमा. मैं तुम से प्यार करता हूं.

‘कम उम्र की नाजुक कोमल भावों से भरी लड़की मेरे प्यार में बह गई. उस ने मेरी जिस्मानी और दिमागी जरूरतें पूरी कीं.

‘हां, वह मेरे ही बच्चे की मां बनने वाली है. मैं उस के बच्चे को अपना नाम दूंगा. दुनिया इसे पाप कहे या अपराध, लेकिन वह मेरा प्यार है. मेरी पतझड़ भरी जिंदगी में वह हरियाली बन कर आई थी.

‘इस घर पर जितना तुम्हारा हक है, उतना ही हरीतिमा का भी है. लेकिन अब मुझे लगने लगा है कि मैं बचूंगा नहीं. अचानक से सारे शरीर में पहले की तरह भयंकर दर्द उठने लगा है.

‘मैं तुम से किसी बात के लिए माफी नहीं मांगूंगा. चिंता है तो बस हरीतिमा की. अपने होने वाले बच्चे की. उसे तुम्हारी दौलत नहीं चाहिए. तुम्हारा बंगला, तुम्हारा बैंक बैलैंस नहीं चाहिए. उसे बस सहारा चाहिए, प्यार चाहिए.’

डायरी खत्म हो चुकी थी. सरिता अवाक थी. उसे अपने पति पर गुस्सा आ रहा था और खुद पर शर्मिंदगी भी. किस तरह ?ाटक दिया था उस ने अपने पति को. बीमारी, लाचारी की हालत में. हां, वही जिम्मेदार है अपने पति की बेवफाई के लिए. इसे बेवफाई कहें या अकेले टूटे हुए इनसान की जरूरत.

सरिता को उसी एजेंसी से दूसरी लड़की मिल चुकी थी. उस ने पूछा, ‘‘तुम हरीतिमा को जानती हो?’’

‘‘नहीं मैडम, एजेंसी वाले जानते होंगे.’’

सरिता ने एजेंसी में फोन लगा कर बात की.

एजेंसी वाले ने कहा, ‘क्या बताएं मैडम, किस के प्यार में थी? बच्चा गिराने को भी तैयार नहीं थी. न ही मरते दम तक बच्चे के बाप का नाम बताया.’

‘‘मरते दम तक… मतलब?’’ सरिता ने पूछा.

‘हरीतिमा बच्चे को जन्म देते समय ही मर गई थी.’

‘‘क्या…’’ सरिता चौंक गई ‘‘और बच्चा…’’

‘‘वह अनाथाश्रम में है.’’

सरिता सोचने लगी, ‘एक मैं हूं जिस ने पति के बंगले, कारोबार, बैंक बैलैंस को अपना कर पति को छोड़ दिया बंद कमरे में. बीमार, लाचार पति. बच्चों तक को दूर कर दिया. और एक गरीब हरीतिमा, जिस ने न केवल बीमारी की हालत में पति की देखभाल की, अपना सबकुछ सौंप दिया. यह जानते हुए

भी कि उसे कुछ नहीं मिलेगा सिवा बदनामी के.

‘उस ने अपने प्यार की निशानी को जन्म दिया. वह चाहती तो क्या नहीं कर सकती थी? इस धनदौलत पर उस का भी हक बनता था. वह ले सकती थी लेकिन उस ने सबकुछ छोड़ दिया अपने प्यार की खातिर. उस ने एक बीमार मरते आदमी से प्यार किया और उसे निभाया भी और एक मैं हूं…

‘चाहे कुछ भी हो जाए, मैं हरीतिमा के प्यार की निशानी, अपने पति के बच्चे को इस घर में ला कर रहूंगी. मैं पत्नी का धर्म तो नहीं निभा सकी, पर उन की संतान के प्रति मां होने की जिम्मेदारी तो निभा ही सकती हूं.’ सारी कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद सरिता बच्चे को घर ले आई.

घर का चिराग : क्यों रूठा गया था साकेत

मां की गोद में एक बेजान देह रखी थी, जिस के माथे को वे हौलेहौले सहला रही थीं, ‘‘मेरा बेटा… मेरा राजा बेटा… आंखें खोलो बेटा…’’

उस बेजान देह में मां के छूने का भी कोई असर नहीं पड़ रहा था. मां ने लोरी गानी शुरू कर दी थी, ‘‘उठ जा राजदुलारे… मेरा प्यारा बेटा… उठ जा बेटा…’’

देह खामोश थी. सारा माहौल गमगीन था. मां और बापू के घर का चिराग बु?ा गया था.

चारों ओर जमा भीड़ भारी मन से यह सब देख रही थी. किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह उस देह को अंतिम संस्कार के लिए मां की गोद से उठा सके. एक कोने में बूढ़ा पिता बेसुध पड़ा था. अंतिम संस्कार की सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. इस परिवार में ऐसा कोई था भी नहीं, जिस के आने की राह देखी जा सके. एक बूढ़ी मां और एक बुजुर्ग पिता, बस इतना ही तो परिवार था.

साकेत अपने मांबाप की एकलौती औलाद था. मांबाप मजदूरी करते थे. साकेत की लाश आज ही शहर के बाहर एक पेड़ से लटकी मिली थी. पुलिस को शक था कि साकेत ने खुदकुशी की है, पर जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई, तो साफ हो गया कि उस की हत्या कर के उस की लाश को पेड़ से लटका दिया गया था.

30 साल का साकेत एक प्राइवेट कंपनी में चीफ इंजीनियर था. वैसे तो उसे नौकरी करते हुए ज्यादा समय नहीं हुआ था, पर उस की मेहनत और लगन के चलते उस की तरक्की जल्दी हो गई थी. मांबाप के दिन फिर गए थे.

साकेत अपने मांबाप का बहुत ध्यान रखता था. दूर शहर में होने के बावजूद वह महीने में एक बार अपने गांव जरूर आता था. घर आ कर वहां के सारे इंतजाम करता था. महीनेभर का राशन ला कर रख देता था. उस ने मांबाप को मजदूरी करने से रोक दिया था. वह ढेर सारे रुपए उन्हें दे जाता था, ताकि उन्हें किसी तरह की परेशानी न हो.

पिताजी बीमार रहने लगे थे. वह उन का इलाज एक बड़े अस्पताल में करा रहा था. मां भी कुछ ज्यादा ही बूढ़ी नजर आने लगी थीं. जिंदगीभर उन्होंने मेहनत जो की थी.

एक दिन की बात है, साकेत अपनी मां की गोद में सिर रख कर बोला था, ‘‘मां, आप बाबूजी को सम?ाओ न… मेरे साथ चलें… वहीं रहना. यहां अकेले रहने से क्या मतलब है.’’

‘‘तेरे बाबूजी भला मानते कहां हैं मेरी. उन्हें तो बस अपना यही गांव अच्छा लगता है. तू ही बोलना उन से,’’ मां ने साकेत का सिर सहलाया था. साकेत की बोलने की हिम्मत नहीं हुई थी. वैसे तो वह जब भी गांव आता था, हर बार अपने मांबाप के लिए नए कपड़े लाना नहीं भूलता था. इस बार भी वह नए कपड़े ले कर आया था.

‘‘बाबूजी, आप पुराने कपड़े क्यों पहनते हैं? आप इन्हें उतारिए और ये पहनें. देखो, कितने अच्छे लग रहे हैं.’’

‘‘अरे बेटा, अब इस उम्र में मैं ऐसे कपड़े पहन कर क्या करूंगा.’’

‘‘नहीं, आप को पहनने ही पड़ेंगे,’’ साकेत ने जिद की. पिताजी को उस की जिद के आगे ?ाकना पड़ा.

नए कपड़ों में बाबूजी बहुत अच्छे लग रहे थे. मां ने जब नई साड़ी पहनी, तो उन की आंखों में आंसू आ गए थे.

‘‘अरे मां, रो क्यों रही हो…? इतनी अच्छी लग रही हो… बिलकुल साकेत की मां ही लग रही हो… चीफ इंजीनियर साकेत,’’ साकेत ने मां की आंखों से आंसू पोंछ दिए थे.

‘‘बेटा, तू जब छोटा था, तो नए कपड़ों के लिए रूठ जाया करता था और हम दिला भी नहीं पाते थे. बस, यही सोच कर आंखें भर आईं.’’

‘‘तो क्या हुआ, मुझे तो आप ने कभी शर्ट कभी पैंट, ऐसे करकर के नए कपड़े तो पहनाए ही हैं, पर आप को तो मैं ने कभी नए कपड़े पहनते नहीं देखा,’’ आंसू की एक बूंद उस की आंखों से भी बह निकली थी.

एक बार रक्षाबंधन पर साकेत अड़ गया था, ‘‘मां देखो, सब बच्चों ने नए कपड़े पहने हैं, मुझे भी चाहिए.’’

मां ने समझाने की बहुत कोशिश की थी, पर वह माना नहीं था. मां सेठ के पास गई थीं और कुछ सामान गिरवी रख कर उस के लिए नया कपड़ा ले कर आई थीं. नए कपड़े पहन कर ही वह मुंहबोली बहन के घर राखी बंधवाने गया था.

‘‘तुझे याद है बेटा, तू दीवाली पर फुलझड़ी और मिठाई के लिए कितना रोया था,’’ मां उस घटना की कल्पना से ही सुबक पड़ी थीं. इस बार पिताजी के गालों पर भी आंसुओं की लड़ी दिखाई देने लगी थी.

‘‘हां मां, सच कहूं तो मुझे आज भी दीवाली केवल इसी वजह से अच्छी नहीं लगती. मां, आप कितनी परेशान हुई थीं उस दिन. धिक्कार है मुझे खुद पर मां.’’

मां ने साकेत को छाती से लगा लिया, ‘‘तब तू छोटा था बेटा. नासमझ.’’ साकेत के सामने वह दीवाली की रात कौंध गई थी. पटेल साहब का घर छोटेछोटे बल्बों से रोशन था. उन का बेटा गौरव नए कपड़े पहन कर एक हाथ में मिठाई और एक हाथ में पटाखे ले कर आया था.

‘‘चलो यार, पटाखे फोड़ते हैं,’’ गौरव ने कहा, तो साकेत उस के साथ चला गया था. साकेत गौरव को मिठाई खाते देख रहा था.

‘‘मिठाई बड़ी मीठी लगती है क्या?’’ साकेत ने कभी मिठाई नहीं चखी थी. एक बार गांव में एक तेरहवीं हुई तो उसे बेसन की बर्फी खाने को मिली थी. वह उसे मिठाई समझाता था, पर गौरव तो सफेद रस में डूबी मिठाई खा रहा था. ऐसी मिठाई उस ने खाने की तो छोड़ो देखी तक नहीं थी.

‘‘हां, बहुत मीठी लगती है. पर, मैं तुझे दे नहीं सकता, क्योंकि जूठी हो गई है न,’’ गौरव बोला था.

साकेत ललचाई निगाहों से गौरव को तब तक देखता रहा था, जब तक उस की मिठाई खत्म नहीं हो गई. मिठाई खत्म होने के बाद गौरव ने फुल?ाड़ी जलाई. फुल?ाड़ी ने रंगबिरंगी चिनगारियां छोड़नी शुरू कर दी थीं.

‘‘एक फुलझाड़ी मुझे भी दो न. मैं भी जलाऊंगा,’’ साकेत गिड़गिड़ाया था.

‘‘अपनी मां से बोलो,’’ गौरव बोला था. गौरव भी बच्चा ही था न और बड़े घर का होने के चलते उसे साकेत की लालसा की कद्र नहीं थी.

साकेत रूठ गया और घर आ कर वह मां के सामने यह बोलते हुए अड़ गया था, ‘‘मुझे वह वाली मिठाई ही चाहिए…’’

मां को तेज बुखार था. पिताजी ने साकेत को समझने की काफी कोशिश की थी, पर वह नहीं माना था. पिताजी उसे उंगली पकड़ कर मिठाई की दुकान पर ले गए थे, पर उस दुकान पर वह मिठाई नहीं थी. उस दिन वह बीमार मां की छाती से चिपक कर बहुत देर तक रोता रहा था.

‘‘आप ने मुझे मिठाई भी नहीं दिलाई और फुलझड़ी भी नहीं दिलाई. मैं आप से कभी बात नहीं करूंगा,’’ सुबक उठा था साकेत. साथ ही, दीवाली की रात में उस के मांबाप भी रोते रहे थे, रातभर अपनी बेबसी पर.

स्कूल जाने के लिए भी साकेत ऐसे ही अड़ा था. मांबाप को उस की जिद के आगे झाकना पड़ा था. पिताजी तो वैसे भी बहुत मेहनत करते ही थे, मां ने भी मजदूरी करनी शुरू कर दी थी. जैसेजैसे उस की पढ़ाई आगे बढ़ती गई, उस का खर्चा भी बढ़ता गया, वैसेवैसे ही मां और पिताजी की मेहनत भी बढ़ती चली गई. पेट काट कर पढ़ाया था उसे.

यादों का बवंडर खत्म ही नहीं हो रहा था. मां ने साकेत के आंसू पोंछे, ‘‘चलो, भूल जाओ. ये कपड़े देखो, मैं कैसी लग रही हूं?’’ मां बात को बदलना चाह रही थीं.

मां ने हलुआपूरी बनाई थी. उन के लिए खुशी में यही सब से बेहतर पकवान थे.

‘‘मां, याद है जब मैं इंजीनियरिंग का इम्तिहान दे कर आया था तो आप ने मेरी पुरानी पैंट में पैबंद लगाते हुए कहा था, ‘बेटा, हमेशा बड़े सपने देखो, वे जरूर पूरे होते हैं.’’’

‘‘हां, तू इतनी ऊंची पढ़ाई कर रहा था, तब भी हम तुझे एक जोड़ी कपड़े तक नहीं सिलवा पा रहे थे.’’

‘‘पुराने कपड़े पहनना तो मेरी आदत हो गई थी मां, पर मैं यह बोल रहा हूं कि मैं ने हमेशा ऊंचे सपने देखे और इसी वजह से ही तो आज चीफ इंजीनियर बन पाया हूं.’’ मां चुप थीं, तब पिताजी ने कहा था, ‘‘तुम हमेशा सचाई पर डटे रहना, तभी हमारी मेहनत कामयाब होगी.’’

‘‘पिताजी, आप लोगों ने मेरी वजह से बहुत परेशानियां झोली हैं, पर अब आप को इतना खुश रखूंगा कि आप अपने सारे दुख भूल जाएंगे,’’ साकेत भावुक हो गया था.

लौटते समय साकेत ने मां को बोल दिया था, ‘‘मां अगली बार जब आऊंगा, तो आप लोगों को साथ ले कर ही जाऊंगा. आप पिताजी को तैयार कर लेना. मैं किसी की बात नहीं मानूंगा.’’

पर साकेत इस हालत में ही वापस आया था बेजान बन कर. उस की देह को रखे बहुत देर हो चुकी थी. लोगों में अब बेसब्री नजर आने लगी थी. कुछ औरतों ने मां को जबरदस्ती अलग किया था.

‘‘मत छीनो मेरे बेटे को मुझसे. वह अभी सो रहा है. जाग जाएगा.’’

सैकड़ों आंखें नम थीं. वहां जुटे समूह को अब अंतिम क्रिया करनी ही थी, इस वजह से साकेत के शरीर को अर्थी पर रख दिया था.

साकेत की मौत खुदकुशी नहीं, बल्कि हत्या थी. साकेत उन लोगों की हैवानियत का शिकार बना था, जिन के बेईमानी वाले कामों को चीफ इंजीनियर होने के नाते वह मान नहीं रहा था.

वह कोई बड़ा ठेकेदार था, सत्ता से जुड़ा. साकेत ने उस के बनाए पुल के भुगतान के कागजों को फेंक दिया था और बोला था, ‘‘इस पुल से लाखों लोग आनाजाना करेंगे और तुम थोड़े से लालच में इसे कमजोर बना रहे हो. मैं तुम्हारा भुगतान नहीं कर सकता.’’

साकेत के इनकार से उस ठेकेदार का खून खौल गया था, ‘‘आप जानते नहीं हैं कि मेरी कितनी पकड़ है,’’ उस ने अपने  कुरतेपाजामे की सिलवटों को दूर करते हुए कमर में खुंसी पिस्तौल की ?ालक साकेत को दिखाते हुए कहा था.

साकेत डरा नहीं और बोला, ‘‘आप जो चाहें कर लें, पर मैं इस पुल को पास नहीं कर सकता.’’

इस के बाद साकेत के पास किसी नेता का भी फोन आया था, ‘क्यों अपनी जान गंवाना चाहते हो…’ पर वह कुछ नहीं बोला था.

बिल का भुगतान तो नहीं हुआ, पर एक दिन साकेत की लाश पेड़ से लटकती जरूर मिली.

मांबाप अपनी एकलौती औलाद के यों गुजर जाने से दुखी थे. साकेत के गुजरने के बहुत दिनों बाद तक माहौल गमगीन बना रहा था. उस के पिताजी बीमारी के शिकार हो चुके थे. मां ने अब साकेत के हत्यारों को पकड़वाने के लिए कमर कस ली थी. वे जानती थीं कि यह सब इतना आसान नहीं है, पर वे हिम्मत नहीं हारना चाह रही थीं.

एक बैनर को अपने शरीर से लपेटे मां शहर दर शहर घूम रही थीं. उस बैनर पर लिखा था, ‘इंजीनियर साकेत के हत्यारों को पकड़वाने में मदद करें’.

लोग उस बैनर को पढ़ते, बुजुर्ग मां की हालत पर दुख भी जताते, पर मदद करने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था. समाज पंगु जान पड़ रहा था. सभी के चेहरे पर एक खौफ दिखाई देता था.

वह बूढ़ी औरत समाज के इस खोखलेपन से नाराज नहीं थी. वह जानती थी कि कोई भी अपने साकेत को नहीं खोना चाहता और इसी खौफ से लोग मदद करने के लिए आगे नहीं आ रहे थे.

बूढ़ी मां इस सब की परवाह किए बगैर दौड़ रही थीं अनजान रास्ते पर बगैर किसी सहारे के. वे प्रदेश की राजधानी जा पहुंची थीं और विधानसभा के सामने खड़े हो कर अपने बेटे के हत्यारों को पकड़ने की अपील कर रही थीं.

चारों ओर से भारी भीड़ ने उन्हें घेर लिया था. वे रो रही थीं और अपील कर रही थीं कि कोई तो आगे आए उन्हें इंसाफ दिलाने के लिए. भीड़ तो केवल तमाशा देख रही थी.

सिक्योरिटी वालों ने मां को गिरफ्तार कर लिया, पर उन का चिल्लाना जारी था. धीरेधीरे वे निढाल हो गईं और मर गईं अपने बेटे को इंसाफ दिलाए बगैर.

वापस: क्यों प्रभाकर के बच्चे की मां बनना चाहती थी प्रभा

“मिस्टर प्रभाकर की स्थिति बहुत नाजुक है. हम ने बहुत कोशिश की उन्हें ठीक करने की. पर किसी प्रकार के अंधेरे में आप को रखना उचित नहीं होगा. अब वे शायद 1-2 दिनों से ज्यादा जिंदा न रह सकें,” डाक्टर ने प्रभा से कहा.

प्रभा सन्न रह गई. प्रभा और प्रभाकर की जोड़ी क्या सिर्फ 1 वर्ष के लिए थी? बीते लमहे उस के मस्तिष्क में

कौंधने लगे. पर अभी उन लमहों को याद करने का समय नहीं था. प्रभाकर को बचाने में डाक्टर अपनी असमर्थता जता चुके थे. पर प्रभा अपने पति प्रभाकर को किसी भी हाल में वापस पाना चाहती थी,“मैं प्रभाकर के बच्चे की मां बनना चाहती हूं, डाक्टर. क्या आप मेरी मदद करेंगे?” प्रभा ने अनुरोध भरे स्वर में कहा.

“देखिए, मैं आप की भावना को समझ सकता हूं. पर यह संभव नहीं है,” डाक्टर ने असमर्थता जताई.

“क्यों संभव नहीं है? वह मेरा पति है. मैं उस के बच्चे की मां बनना चाहती हूं. अब क्या मैं आप को बताऊं कि आज के उन्नत तकनीक के जमाने में यह संभव है कि आप प्रभाकर के स्पर्म को इकट्ठा कर सुरक्षित रख दें. बाद में ऐसिस्टैड रीप्रोडक्टिव तकनीक से मैं मां बन जाऊंगी,” प्रभा ने मायूस होते हुए कहा.

“यह मुझे पता है प्रभाजी. पर प्रभाकर अभी अचेत हैं. बगैर उन की मरजी के उन का स्पर्म हम नहीं ले सकते. यह कानूनी मामला है,” डाक्टर ने असमर्थता जताई.

“कोई तो उपाय होगा डाक्टर?” प्रभा तड़प कर बोली.

“एक ही उपाय है, कोर्ट और्डर,” डाक्टर ने कहा,”पर इस के लिए समय चाहिए और शायद प्रभाकर 1-2 दिनों से अधिक जीवित नहीं रह सकें.

“मैं कोर्ट और्डर ले कर आऊंगी,”कहते हुए प्रभा उठ खड़ी हुई. उस ने आईसीयू में जा कर एक बार प्रभाकर को देखा. वह अचेत पड़ा था. तरहतरह के उपकरण उस के शरीर में लगे हुए थे.

“तुम मेरे पास वापस आओगे प्रभाकर,” उस ने प्रभाकर के सिर को सहलाते हुए कहा,“पति के रूप में नहीं तो संतान के रूप में,” और आंसू पोंछती वह बाहर निकल गई.

उस ने अपना मोबाइल निकाला. नेहा उस की परिचित थी और ऐडवोकेट थी. उस ने उसे कौल किया तो उधर से आवाज आई,“हैलो प्रभा, कैसी हो?” वह जानती थी कि प्रभा अभी किस मानसिक संताप से गुजर रही है.

“कैसी हो सकती हूं, नेहा. एक अर्जेंट काम है तुम से,” प्रभा ने उदास स्वर में कहा.

“बोलो न,” नेहा ने आत्मीयता से कहा.

“आज ही कोर्ट और्डर ले लो, प्रभाकर के स्पर्म को कलैक्ट कर प्रिजर्व करने का. मैं प्रभाकर के बच्चे का मां बनना चाहती हूं,” प्रभा ने कहा.

“आज ही? मगर यह मुश्किल है. कोर्ट के मामले तो तुम जानती ही हो,” नेहा ने असमर्थता जताते हुए कहा.

“जानती हूं. पर तुम जान लो कि डाक्टर ने कहा है कि प्रभाकर 1-2 दिनों से ज्यादा जीवित नहीं रह सकता और उस के जाने के पहले मैं उस का स्पर्म प्रिजर्व करवाना चाहती हूं ताकि मैं ऐसिस्टैड रीप्रोडक्टिव तकनीक से प्रभाकर के बच्चे की मां बन सकूं. कोर्ट में कैसे और क्या करना है यह तुम मुझ से बेहतर जान सकती हो. प्लीज नेहा, पूरा जोर लगा दो. जरूर कोई रास्ता होगा,” प्रभा ने कहा.

“ठीक है. मैं सारे काम छोड़ इस काम में लगती हूं. मैं राजेंद्र अंकल को तुम्हारे दस्तखत लेने भेजूंगी. तुरंत दस्तखत कर पेपर भेज देना,” नेहा प्रभा के पड़ोस में ही रहती थी और उस के ससुर राजेंद्रजी से परिचित थी.

“ठीक है,” प्रभा ने फोन बंद कर दिया.

सबकुछ समाप्त हो चुका था. प्रभा हौस्पिटल के वेटिंग लाउंज में बैठ गई. चारों ओर मरीजों के परिचित व रिश्तेदार बैठे थे. कुछ के मरीज सामान्य रूप से बीमार थे तो कुछ के गंभीर. कोविड के दूसरे लहर की अफरातफरी समाप्त हो चुकी थी. हौस्पिटल के कर्मचारी अपने काम में व्यस्त थे. कोई कैश काउंटर में काम कर रहा था तो कोई कैशलैस काउंटर पर. इतने लोगों के होते हुए भी चारों ओर अजीब किस्म का सन्नाटा था. ऐसा प्रतीत होता था मानों जीवन पर आशंका का ग्रहण लगा हुआ है.

प्रभा ने पर्स से पानी की बोतल निकाल एक घूंट लिया और आंखें बंद कर बैठ गई. प्रभाकर के साथ बिताए 1-1 पल उस की आंखों के सामने आते चले गए…

पतिपत्नी के रूप में वे 1-2 माह ही सही तरीके से रह पाए थे. शादी के 1-2 सप्ताह के बाद से ही कोरोना कहर बरपाने लगा था. शादी के 1 माह बाद पिछले वर्ष वह कुछ काम से बैंगलुरू गया था. उस समय समाचारपत्रों में काफी सुर्खियां थीं उस अपार्टमैंट की जिस में वह ठहरा हुआ था. देश में कोरोना के कुछ मामले आने लगे थे. कोई कोविड पैशंट मिला था उस सोसाइटी में. सोसाइटी को सील कर दिया गया था. किसी प्रकार वह वापस आ पाया था.

कोरोना से वह बैंगलुरू में ही संक्रमित हो गया था या फिर रास्ते में या फिर दिल्ली वापस आने के बाद, कहा नहीं जा सकता था पर बुरी तरह संक्रमित हो गया था. गले में खराश और बुखार से काफी परेशान था वह. उस ने खुद को एक कमरे में आइसोलेट कर रखा था. प्रभा चाहती तो थी उस के पास जाने को पर प्रभाकर ने सख्त हिदायत दे रखी थी,“अभी तुम ठीक हो तो मेरी देखभाल कर रही हो, मुझे खानापानी दे रही हो। तुम भी संक्रमित हो जाओगी तो फिर कौन तुम्हारी देखभाल करेगा? लौकडाउन के कारण कोई दोस्तरिश्तेदार भी नहीं आ पाएगा. हौस्पिटल भरे हुए हैं और फिर इस का कोई इलाज भी नहीं है.”

दोनों एक ही औफिस में काम करते थे और इस दौरान उन की मुलाकात हुई थी. दोनों के नाम मिलतेजुलते थे इसलिए कई बार गलतफहमी भी होती थी. एक बार प्रभाकर की चिट्ठी उस के पास आ गई थी. वह चिट्ठी प्रभाकर को देने गई थी. उस चिट्ठी ने दोनों के बीच सेतु का काम किया था. दोनों के नाम मिलतेजुलते ही नहीं थे, सोचविचार में भी तालमेल था. पहले दोनों अच्छे दोस्त बने, फिर प्रेमी और फिर दंपती. मगर जिंदगी को शायद कुछ और ही गंवारा था. संयोग से वह कोरोनाग्रस्त होने से बच गई और प्रभाकर भी धीरेधीरे ठीक हो गया. कोविड से ठीक होने के बाद लगा था कि जिंदगी पटरी पर वापस आ रही है. पर कोविड के पोस्ट कंप्लीकैशंस के कारण प्रभाकर की स्थिति बिगड़ने लगी. निमोनिया और मल्टी और्गन फेलियर के कारण प्रभाकर का बचना मुश्किल हो गया.

एकाएक प्रभा की तंद्रा भंग हुई. उस का मोबाइल बज रहा था. उस ने स्क्रीन पर देखा ‘न्यू पापा कौलिंग’ मैसेज स्क्रीन पर फ्लैश हो रहा था. उस ने प्रभाकर के पिताजी का नंबर न्यू पापा के नाम से सेव कर रखा था. प्रभाकर के पापा राजेंद्रजी काफी सहयोगात्मक व्यवहार वाले थे. पहले उस ने उन का नाम ‘फादर इन ला’ के नाम से सेव कर रखा था. पर उन के स्नेह को देखते हुए उस ने उन्हें ‘न्यू पापा’ का पद दे दिया था.

“हैलो पापा,” उस ने कौल रिसीव कर क्षीण स्वर में कहा.

“कहां हो बेटा? ऐडवोकेट नेहा ने एक डौक्यूमैंट भेजा है तुम्हारे दस्तखत के लिए,” राजेंद्रजी ने कहा.

“पापा मैं मैन ऐंट्री पर वेटिंग लाउंज में कोने…” बोलतेबोलते रुक गई प्रभा. उस ने देखा प्रभाकर के पिताजी उस के सामने आ गए थे।

“इस पेपर पर दस्तखत कर दो. नेहा ने मांगा है,” राजेंद्रजी ने उसे पेपर देते हुए कहा. उन के चेहरे पर उदासी पसरी हुई थी. उन्होंने डौक्यूमैंट पढ़ लिया था और प्रभा की स्थिति को समझ सकते थे.

प्रभा ने दस्तखत कर पेपर उन्हें वापस कर दिया,”पापा, चाय पीना चाहेंगे?” उस ने पूछा. वह जानती थी कि घर में किसी को खानेपीने की कोई रूचि फिलहाल नहीं है.

“इच्छा तो नहीं हो रही. जीवन ने तो जहर पिला रखा है. नेहा ने तुरंत पेपर मांगा है. चलता हूं,” और वे चलते बने.

शाम तक नेहा कोर्ट और्डर ले कर आ गई. कोर्ट ने विशेष परिस्थिति को देखते हुए मामले पर विचार किया और अंतरिम राहत दे दी. कोर्ट ने स्पष्ट आदेश हौस्पिटल के डाइरैक्टर को दिया था. प्रभा कोर्ट और्डर ले कर सीधे डाइरैक्टर के पास गई. डाइरैक्टर को उस ने कोर्ट और्डर दिखाया. उस में साफसाफ यह उल्लेख था कि चूंकि मरीज अचेत है और उस की सहमति पाना असंभव है, विशेष परिस्थिति को देखते हुए न्यायालय अस्पताल प्रशासन को आदेश देता है कि आईवीएफ/एआरटी प्रोसीजर से मरीज के स्पर्म को सुरक्षित रखे.

हौस्पिटल ने सही प्रोसीजर अपना कर स्पर्म सुरक्षित रख लिया. प्रभा के मन में संतोष हो गया. प्रभाकर को बचाना तो संभव नहीं है पर वह उस के बच्चे की मां जरूर बनेगी और वह उस के पास दूसरे रूप में वापस आएगा.

तुम कैसी हो: क्यों आशा को अपने पति से शिकायत थी?

मेरे खयाल से मैं ने आशा से नहीं पूछा, ‘तुम कैसी हो.’ कभी नहीं. एक हफ्ते पहले ही शादी की सिल्वर जुबली मनाई है हम ने. इन सालों में मु झे कभी लगा ही नहीं या आप इसे यों कह सकते हैं कि मैं ने कभी इस सवाल को उतनी अहमियत नहीं दी. कमाल है. अब यह भी कोई पूछने जैसी बात है, वह भी पत्नी से कि तुम कैसी हो. बड़ा ही फुजूल सा प्रश्न लगता है मु झे यह. हंसी आती है. अब यह चोंचलेबाजी नहीं, तो और क्या है? मेरी इस सोच को आप मेरी मर्दानगी से कतई न जोड़ें. न ही इस में पुरुषत्व तलाशें. सच पूछिए तो मु झे कभी इस की जरूरत ही नहीं पड़ी.

मेरा नेचर ही कुछ ऐसा है. मैं औपचारिकताओं में विश्वास नहीं रखता. पत्नी से फौर्मेलिटी, नो वे. मु झे तो यह ‘हाऊ आर यू’ पूछने वालों से भी चिढ़ है. रोज मिलते हैं. दिन में दस बार टकराएंगे, लेकिन ‘हाय… हाऊ आर यू’ बोले बगैर खाना नहीं हजम होता. अरे, अजनबी थोड़े ही हैं. मैं और आशा तो पिछले 24 सालों से साथ में हैं. एक छत के नीचे रहने वाले भला अजनबी कैसे हो सकते हैं? मेरा सबकुछ तो आशा का ही है. गाड़ी, बंगला, रुपयापैसा, जेवर मेरी फिक्सड डिपौजिट, शेयर्स,  म्यूचुअल फंड, बैंक अकाउंट्स सब में तो आशा ही नौमिनी है. कोई कमी नहीं है. मु झे यकीन है आशा भी मु झ से यह अपेक्षा न रखती होगी कि मैं इस तरह का कोई फालतू सवाल उस से पूछूं.

आशा तो वैसे भी हर वक्त खिलीखिली रहती है, चहकती, फुदकती रहती है. 50वां सावन छू लिया है उस ने. लेकिन आज भी वही फुरती है. वही पुराना जोश है शादी के शुरुआती दिनों वाला. निठल्ली तो वह बैठ ही नहीं सकती. काम न हो तो ढूंढ़ कर निकाल लेती है. बिजी रखती है खुद को. अब तो बच्चे बड़े हो गए हैं वरना एक समय था जब वह दिनभर चकरघिन्नी बनी रहती थी. सांस लेने की फुरसत नहीं मिलती थी उसे. गजब का टाइम मैनेजमैंट है उस का.

मजाल है कभी मेरी बैड टी लेट हुई हो, बच्चों का टिफिन न बन पाया हो या कभी बच्चों की स्कूल बस छूटी हो. गरमी हो, बरसात हो या जाड़ा, वह बिना नागा किए बच्चों को बसस्टौप तक छोड़ने जाती थी. बाथरूम में मेरे अंडरवियर, बनियान टांगना, रोज टौवेल ढूंढ़ कर मेरे कंधे पर डालना और यहां तक कि बाथरूम की लाइट का स्विच भी वह ही औन करती है.

औफिस के लिए निकलने से पहले टाई, रूमाल, पर्स, मोबाइल, लैपटौप आज भी टेबल पर मु झे करीने से सजा मिलता है. उसे चिंता रहती है कहीं मैं कुछ भूल न जाऊं. औफिस के लिए लेट न हो जाऊं. आलस तो आशा के सिलेबस में है ही नहीं. परफैक्ट वाइफ की परिभाषा में एकदम फिट. कई बार मजाक में वह कह भी देती है, ‘मेरे 2 नहीं, 3 बच्चे हैं.’

आशा की सेहत? ‘टच वुड’. वह  कभी बीमार नहीं पड़ी इन सालों में. सिरदर्द, कमरदर्द, आसपास भी नहीं फटके उस के. एक पैसा मैं ने उस के मैडिकल पर अभी तक खर्च नहीं किया. कभी तबीयत नासाज हुई भी तो घरेलू नुस्खों से ठीक हो जाती है.

दीवाली की शौपिंग के लिए निकले थे हम. आशा सामान से भरा थैला मु झे कार में रखने के लिए दे रही थी. दुकान की एक सीढ़ी वह उतर चुकी थी. दूसरी सीढ़ी पर उस ने जैसे ही पांव रखा, फिसल गई. जमीन पर कुहनी के बल गिर गई. चिल्ला उठा था मैं. ‘देख कर नहीं चल सकती. हरदम जल्दी में रहती हो.’ भीड़ जुट गई, जैसे तमाशा हो रहा हो.

‘आप डांटने में लगे हैं, पहले उसे उठाइए तो,’ भीड़ में से एक महिला आशा की ओर लपकती हुई बोली.

मैं गुस्से में था. मैं ने आशा को अपना हाथ दिया ताकि वह उठ सके. आशा गफलत में थी. मैं फिर खी झ उठा, ‘आशा, सड़क पर यों तमाशा मत बनाओ. स्टैंडअप. कम औन. उठो.’ पर वह उठ न सकी. मैं खड़ा रहा. इस बीच, उस महिला ने आशा का बायां हाथ अपने कंधे पर रखा. दूसरे हाथ को आशा के कमर में डालती हुई बोली, ‘बस, बस थोड़ा उठने के लिए जोर लगाइए,’ वह खड़ी हो गई.

आशा के सीधे हाथ में कोई हलचल न थी. मैं ने उस के हाथ को पकड़ने की कोशिश की. वह दर्द के मारे चीख उठी. इतनी देर में पूरा हाथ सूज गया था उस का.

‘आप इन्हें तुरंत अस्पताल ले जाएं. लगता है चोट गहरी है,’ महिला ने आशा को कस कर पकड़ लिया. मैं पार्किंग में कार लेने चला गया. पार्किंग तक जातेजाते न जाने मैं ने कितनी बार कोसा होगा आशा को. दीवाली का त्योहार सिर पर है. मैडम को अभी ही गिरना था.

महिला ने कार में आशा को बिठाने में मदद की, ‘टेक केअर,’ उस ने कहा. मैं ने कार का दरवाजा धड़ाम से बंद किया. उसे थैंक्स भी नहीं कहा मैं ने. आशा पर मेरा खिसियाना जारी था, ‘और पहनो ऊंची हील की चप्पल. क्या जरूरत है इस सब स्वांग की. जानती हो इस उम्र में हड्डी टूटी तो जुड़ना कितना मुश्किल होता है?’’ मेरी बात सही निकली. राइट हैंड में कुहनी के पास फ्रैक्चर था. प्लास्टर चढ़ा दिया गया था. 20 दिन की फुरसत.

घर में सन्नाटा हो गया. आशा का हाथ क्या टूटा, सबकुछ थम गया, लगा, जैसे घर वैंटिलेटर पर हो. सारे काम रुक गए. यों तो कामवाली बाई लगा रखी थी, पर कुछ ही घंटों में मु झे पता चल गया कि बाई के हिस्से में कितने कम काम आते हैं. असली ‘कामवाली’ तो आशा ही है. मैं अब तक बेखबर था इस से. मेरे घर की धुरी तो आशा है. उसी के चारों ओर तो मेरे परिवार की खुशियां घूमती हैं.

शाम की दवा का टाइम हो गया. आशा ने खुद से उठने की कोशिश की. उठ न सकी. मैं ने ही दवाइयां निकाल कर उस की बाईं हथेली पर रखीं. पानी का गिलास मैं ने उस के मुंह से लगा दिया. मेरा हाथ उस के माथे पर था. मेरे स्पर्श से उस की निस्तेज आंखों में हलचल हुई. बरबस ही मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘तुम कैसी हो, आशा?’’

यह क्या, वह रोने लगी. जारजार फफक पड़ी. उस की हिचकियां रुकने का नाम नहीं ले रही थीं. उस के आंसू मेरे हाथ पर टपटप गिर रहे थे. आंसुओं की गरमाहट मेरी रगों से हो कर दिल की ओर बढ़ने लगी. उस के अश्कों की ऊष्मा ने मेरे दिल पर बरसों से जमी बर्फ को पिघला दिया. अकसर हम अपनी ही सोच, अपने विचारों और धारणाओं से अभिशप्त हो जाते हैं. यह सवाल मेरे लिए छोटा था, पर आशा न जाने कब से इस की प्रतीक्षा में थी. बहुत देर कर दी थी मैं ने.

कौन जाने: निशा को कैसे पता चली जिंदगी की कीमत

कितनी चिंता रहती थी वीना को अपने घर की, बच्चों की. लेकिन न वह, न कोई और जानता था कि जिस कल की वह चिंता कर रही है वह कल उस के सामने आएगा ही नहीं. घर में मरघट सी चुप्पी थी. सबकुछ समाप्त हो चुका था. अभी कुछ पल पहले जो थी, अब वो नहीं थी. कुछ भी तो नहीं हुआ था, उसे. बस, जरा सा दिल घबराया और कहानी खत्म.

‘‘क्या हो गया बीना को?’’

‘‘अरे, अभी तो भलीचंगी थी?’’

सब के होंठों पर यही वाक्य थे.

जाने वाली मेरी प्यारी सखी थी और एक बहुत अच्छी इनसान भी. न कोई तकलीफ, न कोई बीमारी. कल शाम ही तो हम बाजार से लंबीचौड़ी खरीदारी कर के लौटे थे.

बीना के बच्चे मुझे देख दहाड़े मार कर रोने लगे. बस, गले से लगे बच्चों को मैं मात्र थपक ही रही थी, शब्द कहां थे मेरे पास. जो उन्होंने खो दिया था उस की भरपाई मेरे शब्द भला कैसे कर सकते थे?

इनसान कितना खोखला, कितना गरीब है कि जरूरत पड़ने पर शब्द भी हाथ छुड़ा लेते हैं. ऐसा नहीं कि सांत्वना देने वाले के पास सदा ही शब्दों का अभाव होता है, मगर यह भी सच है कि जहां रिश्ता ज्यादा गहरा हो वहां शब्द मौन ही रहते हैं, क्योंकि पीड़ा और व्यथा नापीतोली जो नहीं होती.

‘‘हाय री बीना, तू क्यों चली गई? तेरी जगह मुझे मौत आ जाती. मुझ बुढि़या की जरूरत नहीं थी यहां…मेरे बेटे का घर उजाड़ कर कहां चली गई री बीना…अरे, बेचारा न आगे का रहा न पीछे का. इस उम्र में इसे अब कौन लड़की देगा?’’

दोनों बच्चे अभीअभी आईं अपनी दादी का यह विलाप सुन कर स्तब्ध रह गए. कभी मेरा मुंह देखते और कभी अपने पिता का. छोटा भाई और उस की पत्नी भी साथ थे. वो भी क्या कहते. बच्चे चाचाचाची से मिल कर बिलखने लगे. शव को नहलाने का समय आ गया. सभी कमरे से बाहर चले गए. कपड़ा हटाया तो मेरी संपूर्ण चेतना हिल गई. बीना उन्हीं कपड़ों में थीं जो कल बाजार जाते हुए पहने थी.

‘अरे, इस नई साड़ी की बारी ही नहीं आ रही…आज चाहे बारिश आए या आंधी, अब तुम यह मत कह देना कि इतनी सुंदर साड़ी मत पहनो कहीं रिकशे में न फंस जाए…गाड़ी हमारे पास है नहीं और इन के साथ जाने का कहीं कोई प्रोग्राम नहीं बनता.

‘मेरे तो प्राण इस साड़ी में ही अटके हैं. आज मुझे यही पहननी है.’

हंस दी थी मैं. सिल्क की गुलाबी साड़ी पहन कर इतनी लंबीचौड़ी खरीदारी में उस के खराब होने के पूरेपूरे आसार थे.

‘भई, मरजी है तुम्हारी.’

‘नहीं पहनूं क्या?’ अगले पल बीना खुद ही बोली थी, ‘वैसे तो मुझे इसे नहीं पहनना चाहिए…चौड़े बाजार में तो कीचड़ भी बहुत होता है, कहीं कोई दाग लग गया तो…’

‘कोई सिंथेटिक साड़ी पहन लो न बाबा, क्यों इतनी सुंदर साड़ी का सत्यानास करने पर तुली हो…अगले हफ्ते मेरे घर किटी पार्टी है और उस में तुम मेहमान बन कर आने वाली हो, तब इसे पहन लेना.’

‘तब तो तुम्हारी रसोई मुझे संभालनी होगी, घीतेल का दाग लग गया तो.’

किस्सा यह कि गुलाबी साड़ी न पहन कर बीना ने वही साड़ी पहन ली थी जो अभी उस के शव पर थी. सच में गुलाबी साड़ी वह नहीं पहन पाई. दाहसंस्कार हो गया और धीरेधीरे चौथा और फिर तेरहवीं भी. मैं हर रोज वहां जाती रही. बीना द्वारा संजोया घर उस के बिना सूना और उदास था. ऐसा लगता जैसे कोई चुपचाप उठ कर चला गया है और उम्मीद सी लगती कि अभी रसोई से निकल कर बीना चली आएगी, बच्चों को चायनाश्ता पूछेगी, पढ़ने को कहेगी, टीवी बंद करने को कहेगी.

क्याक्या चिंता रहती थी बीना को, पल भर को भी अपना घर छोड़ना उसे कठिन लगता था. कहती कि मेरे बिना सब अस्तव्यस्त हो जाता है, और अब देखो, कितना समय हो गया, वहीं है वह घर और चल रहा है उस के बिना भी.

एक शाम बीना के पति हमारे घर चले आए. परेशान थे. कुछ रुपयों की जरूरत आ पड़ी थी उन्हें. बीना के मरने पर और उस के बाद आयागया इतना रहा कि पूरी तनख्वाह और कुछ उन के पास जो होगा सब समाप्त हो चुका था. अभी नई तनख्वाह आने में समय था.

मेरे पति ने मेरी तरफ देखा, सहसा मुझे याद आया कि अभी कुछ दिन पहले ही बीना ने मुझे बताया था कि उस के पास 20 हजार रुपए जमा हो चुके हैं जिन्हें वह बैंक में फिक्स डिपाजिट करना चाहती है. रो पड़ी मैं बीना की कही हुई बातों को याद कर, ‘मुझे किसी के आगे हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता. कम है तो कम खा लो न, सब्जी के पैसे नहीं हैं तो नमक से सूखी रोटी खा कर ऊपर से पानी पी लो. कितने लोग हैं जो रात में बिना रोटी खाए ही सो जाते हैं. कम से कम हमारी हालत उन से तो अच्छी है न.’

जमीन से जुड़ी थी बीना. मेरे लिए उस के पति की आंखों की पीड़ा असहनीय हो रही थी. घर कैसे चलता है उन्होंने कभी मुड़ कर भी नहीं देखा था.

‘‘क्या सोच रही हो निशा?’’ मेरे पति ने कंधे पर हथेली रख मुझे झकझोरा. आंखें पोंछ ली मैं ने.

‘‘रुपए हैं आप के घर में भाई साहब, पूरे 20 हजार रुपए बीना ने जमा कर रखे थे. वह कभी किसी से कुछ मांगना नहीं चाहती थी न. शायद इसीलिए सब पहले से जमा कर रखा था उस ने. आप उस की अलमारी में देखिए, वहीं होंगे 20 हजार रुपए.’’

बीना के पति चीखचीख कर रोने लगे थे. पूरे 25 साल साथ रह कर भी वह अपनी पत्नी को उतना नहीं जान पाए थे जितना मैं पराई हो कर जानती थी. मेरे पति ने उन्हें किसी तरह संभाला, किसी तरह पानी पिला कर गले का आवेग शांत किया.

‘‘अभी कुछ दिन पहले ही सारा सामान मुझे और बेटे को दिखा रही थी. मैं ने पूछा था कि तुम कहीं जा रही हो क्या जो हम दोनों को सब समझा रही हो तो कहने लगी कि क्या पता मर ही जाऊं. कोई यह तो न कहे कि मरने वाली कंगली ही मर गई.

‘‘तब मुझे क्या पता था कि उस के कहे शब्द सच ही हो जाएंगे. उस के मरने के बाद भी मुझे कहीं नहीं जाना पड़ा. अपने दाहसंस्कार और कफन तक का सामान भी संजो रखा था उस ने.’’

बीना के पति तो चले गए और मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सी सोचती रही. जीवन कितना छोटा और क्षणिक है. अभी मैं हूं  पर क्षण भर बाद भी रहूंगी या नहीं, कौन जाने. आज मेरी जबान चल रही है, आज मैं अच्छाबुरा, कड़वामीठा अपनी जीभ से टपका रही हूं, कौन जाने क्षण भर बाद मैं रहूं न रहूं. कौन जाने मेरे कौन से शब्द आखिरी शब्द हो जाने वाले हैं. मेरे द्वारा किया गया कौन सा कर्म आखिरी कर्म बन जाने वाला है, कौन जाने.

मौत एक शाश्वत सचाई है और इसे गाली जैसा न मान अगर कड़वे सत्य सा मान लूं तो हो सकता है मैं कोई भी अन्याय, कोई भी पाप करने से बच जाऊं. यही सच हर प्राणी पर लागू होता है. मैं आज हूं, कल रहूं न रहूं कौन जाने.

मेरे जीवन में भी ऐसी कुछ घटनाएं घटी हैं जिन्हें मैं कभी भूल नहीं पाती हूं. मेरे साथ चाहेअनचाहे जुड़े कुछ रिश्ते जो सदा कांटे से चुभते रहे हैं. कुछ ऐसे नाते जिन्होंने सदा अपमान ही किया है.

उन के शब्द मन में आक्रोश से उबलते रहते हैं, जिन से मिल कर सदा तनाव से भरती रही हूं. एकाएक सोचने लगी हूं कि मेरा जीवन इतना भी सस्ता नहीं है, जिसे तनाव और घृणा की भेंट चढ़ा दूं. कुदरत ने अच्छा पति, अच्छी संतान दी है जिस के लिए मैं उस की आभारी हूं.

इतना सब है तो थोड़ी सी कड़वाहट को झटक देना क्यों न श्रेयस्कर मान लूं.  क्यों न हाथ झाड़ दूं तनाव से. क्यों न स्वयं को आक्रोश और तनाव से मुक्त कर लूं. जो मिला है उसी का सुख क्यों न मनाऊं, क्यों व्यर्थ पीड़ा में अपने सुखचैन का नाश करूं.

प्रकृति ने इतनी नेमतें प्रदान की हैं  तो क्यों न जरा सी कड़वाहट भी सिरआंखों पर ले लूं, क्यों न क्षमा कर दूं उन्हें, जिन्होंने मुझ से कभी प्यार ही नहीं किया. और मैं ने उन्हें तत्काल क्षमा कर दिया, बिना एक भी क्षण गंवाए, क्योंकि जीवन क्षणिक है न. मैं अभी हूं, क्षण भर बाद रहूं न रहूं, ‘कौन जाने.’

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