Hindi Story: यह कैसा प्यार – प्यार में नाकामी का परिणाम

Hindi Story: ‘‘अब आप का बेटा खतरे से बाहर है,’’ डाक्टर ने कहा, ‘‘4-5 घंटे और आब्जर्वेशन में रखने के बाद उसे वार्ड में शिफ्ट कर देंगे. हां, ये कुछ दवाइयां हैं… एक्स्ट्रा आ गई हैं…इन्हें आप वापस कर सकते हैं.’’

24 घंटे के बाद डाक्टर की यह बात सुन कर मन को राहत सी मिली, वरना आई.सी.यू. के सामने चहलकदमी करते हुए किसी अनहोनी की आशंका से मैं और पत्नी दोनों ही परेशान थे. मैं ने दवाइयां उठाईं और अस्पताल के ही मेडिकल स्टोर में उन्हें वापस करने के लिए चल पड़ा.

दवाइयां वापस कर मैं जैसे ही मेडिकल स्टोर से बाहर निकला, एक अपरिचित सज्जन अपने एक साथी के साथ मिल गए और मुझे देखते ही बोले, ‘‘अब आप के बेटे की तबीयत कैसी है?’’

‘‘अब ठीक है, खतरे से बाहर है,’’ मैं ने कहा.

‘‘चलिए, यह तो बहुत अच्छी खबर है, वरना कल आप लोगों की परेशानी देखते नहीं बन रही थी. जवान बेटे की ऐसी दशा तो किसी दुश्मन की भी न हो.’’

यह सुन कर उन के दोस्त बोले, ‘‘क्या हुआ था बेटे को?’’

मैं ने इस विषय को टालने के लिए उस अपरिचित से ही प्रश्न कर दिया, ‘‘आप का यहां कौन भरती है?’’

‘‘बेटी है, आज सुबह ही उसे बेटा पैदा हुआ है.’’

‘‘बधाई हो,’’ कह कर मैं चल पड़ा.

अभी मैं कुछ ही कदम आगे चला था कि देखा मेडिकल स्टोर वाले ने मुझे 400 रुपए अधिक दे दिए हैं. उस ने शायद जल्दी में 500 के नोट को 100 का नोट समझ लिया था.

मैं उस के रुपए वापस लौटाने के लिए मुड़ा और पुन: मेडिकल स्टोर पर आ गया. वहां वे दोनों मेरी मौजूदगी से अनजान मेरे बेटे के बारे में बातें कर रहे थे.

‘‘क्या हुआ था उन के बेटे को?’’

‘‘अरे, नींद की गोलियां खा ली थीं. कुछ प्यारव्यार का चक्कर था. कल बिलकुल मरणासन्न हालत में उसे अस्पताल लाया गया था.’’

‘‘भैया, इस में तो मांबाप की गलती रहती है. नए जमाने के बच्चे हैं…जहां कहें शादी कर दो, अब मैं ने तो अपने सभी बच्चों की उन की इच्छा के अनुसार शादियां कर दीं. जिद करता तो इन्हीं की तरह भुगतता.’’

शायद उन की चर्चा कुछ और देर तक चलती पर उन दोनों में से किसी एक को मेरी मौजूदगी का एहसास हो गया और वे चुप हो गए. मैं ने भी ज्यादा मिले पैसे मेडिकल स्टोर वाले को लौटाए और वहां से चल पड़ा पर मन अजीब सा कसैला हो गया. संतान के पीछे मांबाप को जो न सुनना पडे़ कम है. ये लोग मांबाप की गलती बता रहे हैं, हमें रूढि़वादी बता रहे हैं, पर इन्हें क्या पता कि मैं ने खुद अंतर्जातीय विवाह किया था.

मेरी पत्नी बंगाली है और मैं हिंदू कायस्थ. समाज और नातेरिश्तेदारों ने घोर विरोध किया तो रजिस्ट्रार आफिस में शादी कर के कुछ दिन घर वालों से अलग रहना पड़ा, फिर सबकुछ सामान्य हो गया. बच्चों से भी मैं ने हमेशा यही कहा कि तुम जहां कहोगे वहां मैं तुम्हारी शादी कर दूंगा, फिर भी मुझे रूढि़वादी पिता की संज्ञा दी जा रही है.

मेरा बेटा प्यार में असफल हो कर नींद की गोलियां खा कर आत्म- हत्या करने जा रहा था. आज के बच्चे यह कदम उठाते हुए न तो आगा- पीछा सोचते हैं और न मातापिता का ही उन्हें खयाल रहता है. हर काम में जल्दबाजी, प्यार करने में जल्दबाजी, प्यार में असफल होने पर जान देने की जल्दबाजी.

हमारे कुलदीपक ने 3 बार प्यार किया और हर बार इतनी गंभीरता से कि असफल होने पर तीनों ही बार जान देने की कोशिश की. पहला प्यार इसे तब हुआ था जब यह 11वीं में पढ़ता था. हुआ यों कि इस के गणित के अध्यापक की पत्नी की मृत्यु हो गई. तब उस अध्यापक ने प्रिंसिपल से अनुरोध कर के अपनी बेटी का सुरक्षा की दृष्टि से उसी कालिज में एडमिशन करवा लिया जिस में वह पढ़ाते थे, ताकि बेटी आंखों के सामने बनी रहे.

वह कालिज लड़कों का था. अकेली लड़की होने के नाते वह कालिज में पढ़ने वाले सभी लड़कों का केंद्रबिंदु थी, पर मेरा बेटा उस में कुछ अधिक ही दिलचस्पी लेने लगा.

वह लड़की मेरे बेटे पर आकर्षित थी कि नहीं यह तो वही जाने, पर मेरा बेटा अपने दिल का हाल लिखलिख कर उसे देने लगा और उसी में एक दिन वह पकड़ा भी गया. बात लड़की के पिता तक पहुंची…फिर प्रिंसिपल तक. मुझे बुलाया गया. सोचिए, कैसी शर्मनाक स्थिति रही होगी.

प्रिंसिपल ने चेतावनी देते हुए मुझ से कहा, ‘आप का बेटा पढ़ाई में अच्छा है और मैं नहीं चाहता कि एक होनहार छात्र का भविष्य बरबाद हो, अत: इसे समझा दीजिए कि भविष्य में ऐसी गलती न करे.’

घर आ कर मैं ने बेटे को डांटते हुए कहा, ‘मैं ने तुम्हें कालिज में पढ़ने  के लिए भेजा था कि प्यार करने के लिए? आज तुम ने अपनी हरकतों से मेरा सिर नीचा कर दिया.’

‘प्यार करने से किसी का सिर नीचा नहीं होता,’ बेटे का जवाब था, ‘मैं उस के साथ हर हाल में खुश रह लूंगा और जरूरत पड़ी तो उस के लिए समाज, आप लोगों को, यहां तक कि अपने जीवन का भी त्याग कर सकता हूं.’

मैं ने कहा, ‘बेटा, माना कि तुम उस के लिए सबकुछ कर सकते हो, पर क्या लड़की भी तुम से प्यार करती है?’

‘हां, करती है,’ बेटे का जवाब था.

मैं ने कहा, ‘ठीक है. चलो, उस के घर चलते हैं. अगर वह भी तुम से प्यार करती होगी तो मैं उस के पिता को मना कर तुम दोनों की मंगनी कर दूंगा, पर शर्त यह रहेगी कि तुम दोनों अपनी पढ़ाई पूरी करोगे तभी शादी होगी.’

बेटे की इच्छा रखने के लिए मैं लड़की के घर गया और उस के पिता को समझाने की कोशिश की तो वह बडे़ असहाय से दिखे, पर मान गए कि  अगर बच्चों की यही इच्छा है तो आप जैसा कहते हैं कर लेंगे.

लेकिन जब उन की बेटी को बुला कर यही बात पूछी गई तो वह क्रोध में तमतमा उठी, ‘किस ने कहा कि मैं इस से प्यार करती हूं… अपनी कल्पना से कैसे इस ने यह सोच लिया. आप लोग कृपा कर के मेरे घर से चले जाइए, वैसे ही व्यर्थ में मेरी काफी बदनामी हो चुकी है.’

मैं अपमानित हो कर बेटे को साथ ले कर वहां से चला आया और घर आते ही गुस्से में मैं ने उसे कस कर एक थप्पड़ मारा और बोला, ‘ऐसी औलाद से तो बेऔलाद होना ही भला है.’

रात के करीब 12 बजे होंगे, जब बेटे ने जा कर अपनी मां को जगाया और बोला, ‘मां, मैं मरना नहीं चाहता हूं. मुझे बचा लो.’

उस की मां ने नींद से जग कर देखा तो बेटे ने अपने हाथ की नस काटी हुई थी और उस से तेजी से खून बह रहा था. पत्नी ने रोतेरोते मुझे जगाया. हम लोग तुरंत उसे ले कर नर्सिंग होम गए. वहां पता चला कि हाथ की नस कटी नहीं थी. खैर, मरहम पट्टी कर के उसे घर भेज दिया गया.

पत्नी का सारा गुस्सा मुझ पर फूट पड़ा, ‘जवान बेटे को ऐसे मारते हैं क्या? आज उसे सही में कुछ हो जाता तो हम लोग क्या करते?’

खैर, अब हम दोनों बेटे के साथ साए की तरह बने रहते. मनोचिकित्सक को भी दिखाया. किसी तरह उस ने परीक्षा दी और 12वीं में 62 प्रतिशत अंक प्राप्त किए. अब समय आया इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की कोचिंग का. प्यार का भूत सिर पर से उतर चुका था. बेटा सामान्य हो गया था. पढ़ाई में मन लगा रहा था. हम लोग भी खुश थे कि इंजीनियरिंग में प्रवेश परीक्षाओं के पेपर ठीकठाक हो गए थे. तभी मेरे सुपुत्र दूसरा प्यार कर बैठे. हुआ यों कि पड़ोस में एक पुलिस के सब- इंस्पेक्टर ट्रांसफर हो कर किराएदार के रूप में रहने को आ गए. उन की 10वीं में पढ़ने वाली बेटी से कब मेरे बेटे के नयन मिल गए हमें पता नहीं चला.

कुल 3 हफ्ते के प्यार में बात यहां तक बढ़ गई कि एक दिन दोनों ने घर से भागने का प्लान बना लिया, क्योंकि लड़की को देखने के लिए दूसरे दिन कुछ लोग आने वाले थे, पर उन का भागने का प्लान असफल रहा और वे पकड़े गए. लड़की के पिता ने बेटी की तो लानत- मलामत की ही दोचार पुलिसिया हाथ मेरे कुलदीपक को भी जड़ दिए और पकड़ कर मेरे पास ले आए.

‘समझा लीजिए अपने बेटे को. अगर अब यह मेरे घर के आसपास भी दिखा तो समझ लीजिए…बिना जुर्म के ही इसे ऐसा अंदर करूंगा कि इस की जिंदगी चौपट हो कर रह जाएगी.’

मैं कुछ बोला तो नहीं पर उसे बड़ी हिकारत की दृष्टि से देखा. वह भी चुपचाप नजरें झुकाए अपने कमरे में चला गया.

रात को बेटी और दामाद अचानक आ गए. उन लोगों ने हमें सरप्राइज देने के लिए कोई सूचना न दी थी. थोड़ी देर तक इधरउधर की बातों के बाद मेरी बेटी बोली, ‘पापा, राहुल कहां है…सो गया क्या?’

राहुल की मां बोली, ‘शायद, अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा होगा. जा कर बुला लाती हूं.’

‘रहने दो मां, मैं ही जा रही हूं उसे बुलाने,’ बेटी ने कहा.

ऊपर जा कर जब उस ने उस के कमरे का दरवाजा धकेला तो वह खुल गया और राहुल अचकचा कर बोला, ‘दीदी, तुम कैसे अंदर आ गईं, सिटकनी तो बंद थी.’

बेटी ने बिना कुछ बोले राहुल के गाल पर कस कर चांटा मारा और राहुल को स्टूल से नीचे उतार कर रोने लगी. दरअसल, राहुल कमरा बंद कर पंखे से लटक कर अपनी जान देने जा रहा था.

‘मुझे मर जाने दो, दीदी. मेरी वजह से पापा को बारबार शर्मिंदगी उठानी पड़ती है.’

‘तुम्हारे मरने से क्या उन का सिर गर्व से ऊंचा उठ जाएगा. अरे, अपना व्यवहार बदलो और जीवन में कुछ बन कर दिखाओ ताकि उन का सिर वास्तव में गर्व से ऊंचा हो सके.’

प्रवेश परीक्षाएं अच्छी हुई थीं.

इंजीनियरिंग कालिज में राहुल को प्रवेश मिल गया क्योंकि अच्छे नंबरों से उस ने परीक्षाएं पास की थीं. मित्रमंडली का समूह, जिन में लड़केलड़कियां सभी थे, अच्छा था. हम लोग निश्ंिचत हो चले थे. वह खुद भी जबतब अपने प्रेमप्रसंगों की खिल्ली उड़ाता था.

इंजीनियरिंग का तीसरा वर्ष शुरू होते ही उस मित्रमंडली में से एक लड़की से राहुल की अधिक मित्रता हो गई. वे दोनों अब अकसर ग्रुप के बाहर अकेले भी देखे जाते. मैं एकआध बार इन की पढ़ाई को ले कर सशंकित भी हुआ, पर लड़की बहुत प्यारी थी. वह हमेशा पढ़ाई और कैरियर की ही बात करती, साथ ही साथ मेरे बेटे को भी प्रोत्साहित करती और जबतब वे दोनों विदेश साथ जाने की बात करते थे.

विदेश जाने के लिए दोनों ने साथ मेहनत की, साथ परीक्षा दी, पर लड़की क्वालीफाई कर गई और राहुल नहीं कर सका. लड़की को 3 साल की पढ़ाई के लिए विदेश जाने की खबर से राहुल बहुत टूट गया. हालांकि लड़की ने उसे बहुत समझाया कि कोई बात नहीं, अगली बार क्वालीफाई कर लेना.

धीरेधीरे लड़की के विदेश जाने का समय नजदीक आने लगा और राहुल को उसे खोने का भय सताने लगा. वह बारबार उस से विवाह की जिद करने लगा. लड़की ने कहा, ‘देखो, राहुल, हम लोगों में बात हुई थी कि शादी हम पढ़ाई के बाद करेंगे, तो इस प्रकार हड़बड़ा कर शादी करने से क्या फायदा? 3 साल बीतते समय थोड़ी न लगेगा.’

राहुल जब उसे न समझा सका तो हम लोगों से कहने लगा कि विधि के पापा से बोलिए न. शादी नहीं तो उस के जाने के पहले मंगनी ही कर दें.

बच्चों के पीछे तो मातापिता को सबकुछ करना पड़ता है. मैं विधि के घर गया और उस के मातापिता से बात की तो वे बोले, ‘हम लोग तो खुद यही चाहते हैं.’

यह सुन कर विधि बोली, ‘पर मैं तो नहीं चाहती हूं…क्यों आप लोग मंगेतर या पत्नी का ठप्पा लगा कर मुझे भेजना चाहते हैं या आप लोगों को और राहुल को मुझ पर विश्वास नहीं है? और अगर ऐसा है तो मैं कहती हूं कि यह संबंध अभी ही खत्म हो जाने चाहिए, क्योंकि वास्तव में 3 साल की अवधि बहुत होती है. उस के बाद घटनाक्रम किस प्रकार बदले कोई कह नहीं सकता. क्या पता मेरी विदेश में नौकरी ही लग जाए और मैं वापस आ ही न सकूं. इसलिए मैं सब बंधनों से मुक्त रहना चाहती हूं.’

मैं और पत्नी अपना सा मुंह ले कर लौट आए. भारी मन से सारी बातें राहुल को बताईं…साथ में यह भी कहा कि वह ठीक कहती है. तुम लोगों का प्यार सच्चा होगा तो तुम लोग जरूर मिलोगे.

‘मैं सब समझ रहा हूं,’ राहुल बोला, ‘जब से उस के विदेश जाने की खबर आई है वह मुझे अपने से कमतर समझने लगी है. जाने दो, मैं कोई उस के पीछे मरा जाता हूं. बहुत लड़कियां मिलेंगी मुझे.’

परसों रात को विधि का प्लेन गया और परसों ही रात को राहुल ने नींद की गोलियां खा लीं. मैं और राहुल की मां एक शादी में गए हुए थे. कल शाम को लौट कर आए तो बेटे की यह हालत देखी. तुरंत अस्पताल ले कर आए. तभी कानों में शब्द सुनाई पड़े, ‘‘पापा, चाय पी लीजिए.’’

सामने देखा तो बेटी चाय का कप लिए खड़ी थी. मैं ने उस के हाथों से कप ले लिया.

बेटी बोली, ‘‘पापा, क्या सोच रहे हैं. राहुल अब ठीक है. इतना सोचेंगे तो खुद बीमार पड़ जाएंगे.’’

मैं ने चाय की चुस्की ली तो विचारों ने फिर पलटा खाया. यह कोई सिर्फ मेरे बेटे की ही बात नहीं है. आज की युवा पीढ़ी हो ही ऐसी गई है. हर कुछ जल्दी पाने की ललक और न पाने पर हताशा. समाचारपत्र उठा कर देखो तो ऐसी ही खबरों से पटा रहता है. प्यार शब्द भी इन लोगों के लिए एक मजाक बन कर रह गया है. अभी हमारे एक हिंदू परिचित हैं. उन की बेटी ने मुसलमान से शादी कर ली. दोनों ही पक्षों में काफी विरोध हुआ. अंतर्जातीय विवाह तो फिर भी पचने लगे हैं पर अंतर्धर्मीय नहीं. मैं ने अपने परिचित को समझाया.

‘जब बच्चों ने विवाह कर ही लिया है तब आप क्यों फालतू में सोचसोच कर हलकान हो रहे हैं. खुशीखुशी आशीर्वाद दे दीजिए.’

एक साल में उन के यहां बेटा भी पैदा हो गया. पर नाम को ले कर दोनों पतिपत्नी में जो तकरार शुरू हुई तो तलाक पर आ कर खत्म हुई. बात सिर्फ इतनी थी कि पिता बेटे का नाम अमन रखना चाहता था और मां शांतनु. दोनों के मातापिता ने समझाया…दोनों शब्दों का अर्थ एक होता है, चाहे जो नाम रखो, पर वे लोग न समझ पाए और आजकल बच्चा किस के पास रहे इस को ले कर दोनों के बीच मुकदमा चल रहा है.

‘‘नानू, नानू, यह आयुषी है,’’ मेरा 6 वर्षीय नाती एक प्यारी सी गोलमटोल लड़की से मेरा परिचय कराते हुए कहता है.

मैं अपने विचारों की दुनिया से बाहर आ कर थोड़ा सहज हो कर पूछता हूं, ‘‘आप की फ्रेंड है?’’

‘‘नो नानू, गर्लफे्रंड,’’ मेरा नाती कहता है.

मैं कहना चाहता हूं कि गर्लफ्रेंड के माने जानते हो? पर देखता हूं कि गर्लफ्रेंड कह कर परिचय देने पर उस बच्ची के गाल आरक्त हो उठे हैं और मैं खुद ही इस भूलभुलैया में फंस कर चुप रह जाता हूं.

Funny Story: अर्थशास्त्री की पहली ससुराली होली

Funny Story: तिवारीजी को होली के एक हफ्ते पहले से ही ससुराल आने का लगातार फोन आ रहा था. बारबार फोन आए भी क्यों न, आखिर टौकटाइम और डाटा फ्री जो है.

तिवारीजी के लिए खुशकिस्मती की बात यह थी कि शादी के बाद उन्हें पहली बार गांवमहल्ले की सालियों और सलहजों के साथ ससुराली होली खेलने का मौका मिल रहा था.

पेशे से शिक्षक तिवारीजी उच्च विद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक थे. शिक्षक और विषय विशेषज्ञ होने के चलते उन का सारा हिसाबकिताब भारतीय अर्थव्यवस्था की तरह संतुलित होता था. ससुराल जाने में आर्थिक समस्या लोकतांत्रिक मुद्दों की तरह आड़े आ रही थी.

महंगाई और जीएसटी की मार से जब पूरा देश जूझ रहा है, तो भला हमारे तिवारीजी कैसे महफूज रहते. कैशलैस तिवारीजी काफी होपलैस नजर आ रहे थे, क्योंकि फरवरी महीने की तनख्वाह इनकम टैक्स में जा चुकी थी और ऊपर से दुकानदार, धोबी, दूध वाले का बकाया उधार अलग.

तिवारीजी गजब धर्मसंकट में फंसे हुए थे. बड़ी, छोटी, मं?ाली हर साइज की सालियां बारबार फोन कर के न्योता दे रही थीं, साथ ही देशी घी की मिठाई और रंग, गुलाल, पिचकारी लेते आने का इमोशनल दबाव भी बनाया जा रहा था.

भारतीय बैंकिंग सिस्टम में लंदन बसने वाले को अरबों रुपए का सरकारी लोन मिल जाता है, पर ससुराल जाने वाले को 1,000 रुपए का कर्ज मिलना भी काफी मुश्किल है.

काफी मशक्कत के बाद ‘ससुराल से लौटते ही उधार चुका देने’ की शर्त पर एक दोस्त ने उन्हें 1,000 रुपए का उधार दे कर दोस्ती और इनसानियत की दोहरी जिम्मेदारी निभाई.

तिवारीजी मन ही मन सोच रहे थे, ‘सासससुर के पैर लगाई में आशीर्वाद के साथ शगुन के रूप में कुछ न कुछ नकद नारायण तो मिलेगा ही, उसी से उधार चुका दूंगा… कम से कम ससुराल जाने और आने में हुए खर्च में लगी पूंजी तो वसूल हो ही जाएगी’.

उस 1,000 रुपए में से संदेश मिठाई खरीदने के नाम पर तिवारीजी ने 500 रुपए अलग निकाल लिए. 300 रुपए किराया और बाकी बचे 200 रुपए में होली मना कर ससुराल जाने और वापसी की रूपरेखा तैयार कर ली.

‘खाली हाथ बिना संदेश मिठाई के भी कोई ससुराल जाता है भला, वह भी पहली बार, उस पर होली का मौका,’ यह सोच कर तिवारीजी मिठाई की दुकान पर पहुंच गए और मिठाई वाले से मिठाई का मोलभाव करने लगे.

‘‘रसगुल्ला 700, पेड़ा 750, चमचम 650, बरफी 700, काजू कतली 1,200, मुरब्बा 350, रसकदम 850 रुपए प्रति किलो…’’ दुकानदार भी सीडी की तरह बजते हुए अपनी मिठाइयों की कीमत बताने लगा.

तिवारीजी थोड़ा सकुचाते हुए बोले, ‘‘भैया, आप की दुकान में सब से सस्ती मिठाई कौन सी है?’’
हलवाई बोला, ‘‘जलेबी ले लो सरजी… डेढ़ सौ रुपए किलो लगेगी.’’

तिवारीजी उधेड़बुन में पड़ गए कि ‘महज 500 रुपए में क्या लूं? जलेबी तो ससुराल ले जा नहीं सकता… अगर रसगुल्ला भी लेता हूं, तो 3 पाव ही होंगे… काजू कतली आधा किलो भी नहीं आ पाएगी… देशी घी की दूसरी मिठाइयां भी ढाई सौ ग्राम से ज्यादा नहीं आ पाएंगी…’

‘‘क्या पैक कर दूं सर?’’ तिवारीजी मन में गुणाभाग कर ही रहे थे कि हलवाई के सवाल ने उन का सारा कैलकुलेशन बिगाड़ दिया.

‘‘नहीं कुछ… बस यों ही दाम का आइडिया ले रहा था…’’ बोलते हुए तिवारीजी दुकान से बाहर निकल आए.

तिवारीजी ने चारों तरफ नजर दौड़ाई. उन्हें कुछ सम?ा नहीं आ रहा था कि तभी एक फल का ठेला दिखाई दिया. फिर वहां पहुंच कर वे सभी फलों के दाम जानने लगे. अनार 200, नारंगी 80, सेब 240 रुपए किलो थे. ड्राई फ्रूट की कीमत पूछने की तिवारीजी में न ऊर्जा थी और न ही खरीदने की औकात.

काफी मोलभाव के बाद 2 किलो सेब तुलवाए और दुकानदार को 500 रुपए का नोट थमा दिया. दुकानदार ने तय कीमत काट कर 20 रुपए का नोट तिवारीजी को लौटा दिया.

तिवारीजी मन ही मन संतुष्ट थे, ‘चलो, संदेश मिठाई के बदले 2 किलो सेब से थैला भराभरा सा लगेगा… रही बात साली की, तो सेहत के नुकसान का हवाला देते हुए मिठाई और चर्म रोग, प्रदूषण, स्वच्छ भारत का हवाला देते हुए रंग पिचकारी नहीं लेने की बात कह दूंगा.

‘सेब भी अपने बजट में आ गए… और तो और, बीवीसाली के गुलाबी गालों को लालहरा करने के लिए गुलाल के 60 रुपए भी बच गए… अब होगी जानदारशानदार डिजिटल होली.’

ऐसा लग रहा था कि तिवारीजी का अर्थशास्त्र पढ़ना व पढ़ाना आज कामयाब हो गया. वे खुश मन से बसस्टैंड पहुंच कर ससुराल जाने वाली बस में सवार हो गए.

ससुराल में कदम रखते ही तिवारीजी को पता चला कि उन के ससुरजी सुबह ही सासू मां के साथ अपनी ससुराल होली मनाने निकल गए हैं. तिवारीजी को मानो 440 वोल्ट का झटका लग गया. शेयर बाजार की तरह उन का मनोबल और अर्थबल धड़ाम से नीचे गिर गया.

शगुन के रूप में पैसा वापसी का एकमात्र साधन सासससुर के वहां न होने से तिवारीजी के चेहरे का रंग लालपीला पड़ने लगा. दोस्त की उधार वापसी का उन का सारा गणित फेल जो हो चुका था.

तिवारीजी अगला कैलकुलेशन करने के लिए कुछ नया सोचते, इस से पहले एक साली ने उन के हाथ से गिफ्ट झपट लिया और दूसरी साली ने उन के ऊपर रंग का गुब्बारा मार कर ‘हैप्पी होली’ बोल कर उन का ध्यान भंग कर डाला.

Hindi Story: मरियम बनी मरजीना

Hindi Story: आज मरियम ने नहाते समय अपने बालों को अच्छी तरह धोया और बालों को खुला छोड़ने के बाद उस ने आसमानी रंग का सूट पहना. वह आईने में अपना चेहरा निहारने लगी.

सामने से आती हुई रोशनी जब मरियम के चेहरे पर पड़ी, तो उस के चेहरे की चमक और बढ़ गई. अपनी सूरत पर खुद ही फिदा हो गई थी मरियम.

भले ही मरियम की उम्र 30 साल की हो गई थी, मगर वह अब भी दिखने में एकदम जवान, सैक्सी और खूबसूरत थी.

मरियम का लंबा कद, गोरा रंग और तीखी नाक उसे एक अफगानी औरत का सा लुक देते थे. उस की छाती सुडौल और कसावट लिए हुए थी और पतली कमर वाली मरियम जब चलती थी, तो कसबे के लोग उस के उभरे हुए अंगों को आगेपीछे से ताड़ते नजर आते थे.

पर इतना होने के बाद भी मरियम की खूबसूरती भोगने वाला कोई नहीं था. वह रात को तनहा बिस्तर पर लेटती, तो अकेलेपन के चलते उसे देर तक नींद नहीं आती थी. उस का मन चाहता था कि कोई मर्द उसे अपनी बांहों में जकड़ ले और बेतहाशा चूमे, पर उसे करवटों से ही संतोष करना पड़ता था.

मरियम की जिंदगी में यह सुख आया जरूर था, पर ठहर न सका था. दरअसल, मरियम महज 20 साल की थी, तभी उसे पास के ही एक गांव के 30 साल के रईस नाम के लड़के के साथ ब्याह दिया गया था.

रईस सिर्फ नाम से ही रईस था, पैसों के नाम पर उस के पास ज्यादा कुछ न था. वह पास के शहर में मजदूरी करने जाता था, पर कभी भी उस का मन शहर में नहीं लगा. वह कभी दूसरे दिन तो कभी तीसरे दिन गांव वापस आ जाता था.

पहलेपहल तो मरियम ने रईस को दबी जबान में सम?ाने वाले लहजे में कहा कि माना कि उन दोनों का निकाह हुआ है और उसे मरियम से मुहब्बत है, पर शहर से इतनी जल्दी आना ठीक नहीं, क्योंकि आनेजाने में खर्चा होता है, उसे छुट्टी लेनी पड़ती है और फिर शहर के काम और मजदूरी का भी नुकसान होता है. इस के अलावा अम्मीअब्बू भी क्या कहते होंगे कि निकाह के बाद तो रईस एकदम जोरू का गुलाम ही हो गया है.

पर रईस पर मरियम की बातों का कोई असर नहीं होता था. वह मरियम को दोपहर में ही पकड़ लेता था और उस के नाजुक अंगों से तब तक खेलता था, जब तक उस का मन भर नहीं जाता था.

जिस्म की भूख पूरी हो जाने के बाद रईस हाथमुंह धो कर गांव घूमने निकल जाता था और फिर देर रात को ही वापस आता था. अम्मीअब्बू की डांट का तो उस पर कोई असर होता ही नहीं था.

बेचारी भोलीभाली मरियम तो सम?ाती थी कि रईस उस की मुहब्बत के चलते गांव में आता है, पर उसे तो आसपड़ोस की औरतों ने बताया था कि रईस का एक दूसरी औरत से चक्कर चल रहा है, इसलिए मरियम थोड़ा सचेत रहे. मरियम को भला रईस के खिलाफ कही गई बातों पर कब यकीन होने वाला था?

पर, उस दिन जब मरियम रईस की कमीज साफ करने से पहले जेबें टटोल रही थी, तब उसे कागजनुमा टुकड़ा मिला, जो असल में एक औरत की तसवीर थी. अब तो मरियम परेशान हो गई थी.

बड़ी बेशर्मी से रईस ने पूछताछ में कबूल भी कर लिया था कि गांव की एक औरत से उस का नाजायज रिश्ता है और ऐसा कहते हुए रईस के चेहरे पर मर्दाना ऐंठन थी.

रईस ने मरियम से यह भी कहा कि उस का यह रिश्ता कई सालों से है और वह उस औरत को किसी भी हाल में छोड़ नहीं पाएगा.

उस दिन तो मरियम ने यह बात बरदाश्त कर ली थी, पर समय बीतने के साथ रईस अपने नाजायज रिश्ते में कुछ ज्यादा ही बिजी रहने लगा और शहर की मजदूरी भी छोड़ दी. तब मरियम ने अम्मीअब्बू और रईस के सामने एतराज जताया.

रईस अपनी जोरू के इस तरह के विरोध के लिए तैयार नहीं था. उस ने गुस्से में मरियम को खूब मारा और बाद में ‘तलाक, तलाक, तलाक’ बोल कर उसे घर से निकाल दिया.

बेचारी मरियम उस समय पेट से हो चुकी थी. उस ने रईस और उस के अम्मीअब्बू से गुहार भी लगाई, पर कोई फायदा नहीं हुआ.

अब मरियम के पास मायके वापस आने के अलावा कोई चारा नहीं था. मरियम के मायके में सिर्फ उस की अम्मी ही थीं. अब्बू की मौत तो पहले ही हो चुकी थी.

एक औरत के लिए उस के मायके के दरवाजे हमेशा ही खुले रहते हैं. मरियम के साथ भी ऐसा ही हुआ. वह अब अपने मायके में ही रहने लगी थी और समय आने पर उस ने एक बेटे को जन्म दिया.

घर का खर्चा बढ़ गया था. मरियम की मां सिलाई का काम कर के घर का खर्चा चलाती थीं. मरियम भी उन का हाथ बंटाने लगी. अम्मी ने उसे सिलाई और रेशमी कपड़े पर महीन कढ़ाई के खूब गुर सिखाए. मरियम भी कढ़ाई के काम में खूब मन लगाती थी. रंगीन फूलबूटे तो ऐसा काढ़ती कि देखते ही बनते थे.

कामधाम थोड़ा ठीक चलने लगा तो अचानक ही मरियम की अम्मी का इंतकाल हो गया. बेचारी मरियम और उस का 5 साल का बेटा आदिल अब इस घर में अकेले रह गए थे.

‘‘न जाने कितने इम्तिहान बाकी हैं मेरे,’’ मरियम मन ही मन बुदबुदाती और आंसू ढुलकाती.

वह छोटा बच्चा ही मरियम की जिंदगी की एकमात्र उम्मीद था, जिस के सहारे वह समय काट देती, पर यह सब इतना आसान नहीं होने वाला था.

धीरेधीरे मरियम की दूसरी शादी के लिए उस पर आसपास के लोगों और उम्रदराज मर्दों का दबाव बनने लगा, पर मरियम ने शादी की हर बात को सिरे से खारिज कर दिया था.

‘‘जब एक बार मेरे मर्द ने मुझ से बेवफाई की है, तो दूसरी बार ऐसा नहीं होगा, इस का क्या भरोसा है?’’ मरियम की आवाज में दर्द झलकता था.

घर का खर्च चलाने के लिए मरियम ने सिलाईकढ़ाई का काम शुरू कर दिया था. वह बाजार से थोक रेट वाली दुकान से कपड़ा खरीद कर लाती और उन पर रंगबिरंगे व सुनहरे धागों से कढ़ाई करती और ऐसा कर के उस ने कई मेजपोश, आईने के कवर और चुनरी तैयार कर ली थीं.

ये सारे सामान अगर बिक जाते, तो मरियम को कुछ पैसे जरूर मिल जाते और आमदनी का एक सिलसिला भी चल निकलता.

इस काम के लिए मरियम कसबे के एक दुकानदार रफीक के पास पहुंची.

रफीक के साथ उस गांव काएक पंडित भी बैठा था, जिसे कसबे के लोग ‘बड़े पंडितजी’ कहते थे.

बड़े पंडितजी थे बड़े एक नंबर के औरतखोर. कसबे की गरीब और जरूरतमंद औरतों को घूरना और नाजायज रिश्ते बनाना उन का पसंदीदा काम था.

रफीक से बड़े पंडितजी की अच्छी बनती थी. उस ने मरियम को बैठाया और उस के आने का सबब पूछने लगा. उस की नजरें बातोंबातों में ही मरियम के जिस्म को टटोलने लगी थीं.

मरियम के उभरे सीने को देख कर रफीक के मुंह में पानी आ गया था और वह मन ही मन मरियम के जिस्म को भोगने के सपने देखने लगा था.

रफीक समझ गया था कि मरियम एक जरूरतमंद औरत है और उसे अपने कब्जे में कर पाना बहुत आसान होगा, इसलिए उस ने मरियम से कहा, ‘‘आप चिंता बिलकुल मत करो. अपना बनाया हुआ सारा सामान हमारी दुकान पर छोड़ जाया करो. हम उसे बेच कर वाजिब दाम दे दिया करेंगे.’’

बड़े पंडितजी भी चुपचाप बैठे हुए मरियम के जिस्म के उतारचढ़ाव का मुआयना कर रहे थे.

रफीक की बात सुन कर मरियम मन ही मन बहुत खुश हो गई थी. उस ने रफीक को शुक्रिया कहा और घर आ कर कढ़ाई का काम और भी तेजी से करने लगी.

कुछ ही दिनों में मरियम ने बाजार से खरीदी हुई एक सादा चुनरी पर कढ़ाई कर के उसे और भी खूबसूरत बना दिया था.

अपना काढ़ा हुआ सामान ले कर मरियम रफीक के पास गई. रफीक मरियम को देख कर फिर से खूब मीठी बातें करने लगा और बातोंबातों में मरियम के जिस्म को छूने की कोशिश भी कर लेता था.

रफीक की ऐसी हरकतों से मरियम परेशान तो महसूस कर रही थी, पर इस समय उस की मजबूरी थी, क्योंकि कसबे में रफीक की ही ऐसी दुकान थी, जो खूब चलती थी और फिर शहर में कई बड़े दुकानदारों से रफीक की अच्छी पहचान थी.

रफीक चाहे तो मरियम का धंधा चुटकियों में पनपा सकता है, ऐसा सोच कर मरियम खामोश थी, पर उस ने अपने जिस्म को समेटते हुए दुपट्टे को अपने जिस्म पर कस कर लपेट लिया था.

रफीक ने मरियम को एक हफ्ते के बाद आने को कहा, पर मरियम को तो यह एक हफ्ता बहुत लग रहा था, इसलिए वह 5वें दिन ही रफीक के पास पहुंच गई थी.

रफीक उस समय अपनी दुकान पर बैठा हुआ कुछ काम कर रहा था. पास ही बड़े पंडितजी भी बैठे हुए मोबाइल में रील देख रहे थे. मरियम को देख कर रफीक खुश हो गया. ऐसा लगा कि आज वह उस का पहले से इंतजार कर रहा था.

रफीक ने मरियम को एक स्टूल पर बिठाया. मरियम ने कुछ कहना चाहा, पर रफीक ने अनसुना कर दिया और दुकान के अंदर चला गया. वापसी में उस के हाथ में चाय के 2 गिलास थे.

‘‘लो, पहले तुम चाय पियो मरियम,’’ रफीक ने चाय आगे बढ़ाई.

पहले तो मरियम थोड़ा हिचकी, पर रफीक के बारबार कहने पर मरियम ने चाय ले ली और छोटेछोटे घूंट भरने लगी.

बड़े पंडितजी मरियम को चाय पीते देख रहे थे. चाय पीने के बाद मरियम बात शुरू करने जा ही रही थी कि उस का सिर भारी होने लगा और आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा.

मरियम अपनेआप पर काबू न रख सकी और बेहोश हो कर एक ओर लुढ़क गई. रफीक को तो इसी पल का इंतजार था. उस ने तुरंत अपनी दुकान का शटर अंदर से बंद कर लिया.

बेहोश मरियम को निहारते हुए रफीक ने मरियम की सलवार का नाड़ा खोल कर एक ओर फेंक दिया और फिर कुरता भी उतार फेंका.

रफीक मरियम के नंगे जिस्म को देख कर पागल हो उठा था. वह कभी मरियम के निढाल जिस्म को अपनी बांहों में कसता, तो कभी मरियम के अंगों पर अपने होंठ रगड़ने लगता.

रफीक पर हवस का भूत बहुत हावी हो चुका था और फिर जल्दी से उस ने अपने भी कपड़े उतार फेंके और फिर मरियम के कोमल जिस्म पर हावी हो गया.

उस दौरान बड़े पंडितजी अपने मोबाइल में यह सारा गंदा काम कैद करते रहे.

रफीक के हटने के बाद बड़े पंडितजी ने भी अपने कपड़े उतार फेंके और मरियम के जिस्म का मजा लेने लगे.

मरियम के साथ कई बार सैक्स करने के बाद उस के नंगे बदन को रफीक अपने मोबाइल में कैद करना नहीं भूला था.

जब मरियम को होश आया, तब रफीक उस के पैरों के पास बैठा हुआ था और अपने मोबाइल पर वही वीडियो देख रहा था. मरियम को सम?ाते देर नहीं लगी कि उस की इज्जत लुट चुकी है.

रफीक और बड़े पंडितजी की निगाहें मरियम को पहले से ही ठीक नहीं लग रही थीं, पर उस की मजबूरी और गरीबी उसे आज इस हाल में ले आई थी कि इन दोनों भेडि़यों ने उस के साथ मुंह काला कर के कहीं का नहीं छोड़ा था.

मरियम ने भारी मन से अपने कपड़े पहने. उस के मन में तूफान सा चल रहा था. उस की आबरू लुट चुकी थी. अब उसे दुनिया में सिर्फ खुदकुशी कर लेने के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था. दरिंदों ने इस तरह उस के जिस्म को नोचा था कि उस की हर नस दर्द हो रही थी.

‘पर, अगर मैं मर गई तो मेरे बच्चे का क्या होगा? वह किस के सहारे रहेगा?’ अपने 5 साल के बच्चे आदिल का खयाल आते ही मरियम ने तुरंत अपना फैसला बदल लिया. वह गुस्से में अपने घर पहुंची और बालटी भरभर कर नहाने लगी.

मरियम के मासूम बच्चे को भला क्या पता था कि उस की अम्मी पर क्या गुजरी है.

इस घटना को 3 दिन ही गुजरे थे कि मरियम के पास रफीक आया और अपने मोबाइल की तरफ इशारा कर के उस से आज फिर हमबिस्तर होने की मांग की और ऐसा न करने पर उसे पूरे कसबे में बदनाम कर देने की धमकी दे डाली. साथ ही, उस के धंधे को भी खत्म कर देने की बात कही.

मरियम आंसुओं में डूब गई, क्योंकि अब तो रफीक और बड़े पंडितजी उसे उस की वीडियो का डर दिखा कर न जाने कितने दिनों तक हमबिस्तरी की मांग करते रहेंगे… यह सोच कर वह परेशान हो उठी, पर अगले पल ही उसे उम्मीद की एक किरण दिखाई दी और वह उम्मीद की किरण थी कानून और पुलिस.

मरियम ने कोठरी में ताला लगाया और पुलिस चौकी पहुंच गई. वह पुलिस को आपबीती सुनाते हुए रफीक और बड़े पंडितजी को गिरफ्तार करने की मांग करने लगी.

पुलिस वालों ने चटकारे ले कर मरियम की कहानी को एक नहीं, बल्कि कई बार सुना, पर रिपोर्ट नहीं लिखी. और तो और, मरियम से यह भी कहा कि वे कैसे भरोसा करें कि उस का रेप हुआ है और मरियम से सुबूत दिखाने को कहा गया.

बेचारी मरियम शर्म से गड़ गई और बिना कुछ कहे वापस आने लगी.

मरियम पुलिस चौकी से बाहर निकली, तो उसे पीछे से किसी ने आवाज दी. वह एक 35 साल का नौजवान था. उस नौजवान ने बताया कि वह इसी कसबे का एक दलित जाति का नौजवान घामू है, जो बचपन से ही फिल्मों में जाना चाहता था और शौक के चलते कसबे में होने वाले ड्रामा और नाटकों में भाग लिया करता था, पर बड़े पंडितजी को यह कतई मंजूर नहीं था कि कोई पिछड़ी जाति का ऊंची जाति के बनाए मंच पर आए और उन के साथ उठेबैठे, इसलिए बड़े पंडितजी ने घामू को बुला कर नाटक में भाग लेने से
मना किया.

पर घामू को तो ऐक्टिंग का शौक था और कसबे के लोग भी उसे पसंद करते थे, इसलिए उस ने ऐक्टिंग को जारी रखा. उस की इस बात से बड़े पंडितजी चिढ़ गए और अपने गुरगों द्वारा घामू की 16 साल की बहन को उठवा लिया, उस के साथ रेप किया और उस की वीडियो बना कर घामू की बहन को ब्लैकमेल करने लगे. बाद में परेशान हो कर घामू की बहन ने नदी में कूद कर अपनी जान दे दी.

मरियम और घामू चलते हुए पुलिस चौकी से काफी दूर निकल आए थे.

मरियम घामू की बात तो सुन रही थी, पर यह सम?ा नहीं पाई थी कि वह उसे यह सब क्यों बता रहा है?

घामू ने मरियम को आगे बताया कि उसे एक ऐसी औरत की तलाश है, जो थोड़ी सी हिम्मत दिखाते हुए रफीक और बड़े पंडितजी के खिलाफ पुख्ता सुबूत जमा कर सके.

‘‘पर, मुझे तो सिलाईकढ़ाई और खाना बनाने के अलावा कुछ नहीं आता. ऐसे में बदला लेने जैसी बात तो मैं सोच भी नहीं सकती,’’ मरियम ने कहा,

जिस के बदले में घामू ने उसे अपना मोबाइल दिखाते हुए कहा कि मरियम, तुम बिलकुल मत घबराओ. वह उसे सबकुछ सिखा देगा, बस उसे एक नाटक खेलना होगा.

मरियम ने उन खतरनाक और गंदे किरदार वाले लोगों से किसी भी तरह का बदला लेने से इनकार कर दिया, तो घामू ने उस की हिम्मत बढ़ाते हुए कहा कि तब तो वे लोग उसे जिंदगीभर यों ही परेशान करते रहेंगे और उस के जिस्म से खिलवाड़ भी करते रहेंगे. यह बात मरियम की समझ में आ गई थी, इसलिए उस ने हां में सिर हिला दिया.

2-3 दिन बीतने के बाद घामू मरियम के घर पहुंचा. घामू ने मरियम से कहा, ‘‘देखो मरियम, तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं है, क्योंकि उन के पास तुम्हारी वीडियो और फोटो हैं, इसलिए अब तुम्हें मोबाइल की कुछ तकनीक सीखनी होगी और तुम अब वह करो, जो मैं तुम्हें बताता हूं.’’

घामू ने मरियम को एक प्लान बताया, जिसे सुन कर मरियम की आंखें हैरत से फैलती चली गईं.

उस दिन दोपहर में जब मरियम बाजार से आ रही थी, तब रफीक ने उसे फिर से घेर लिया और आज उस की दुकान पर आ कर शाम को रंगीन बनाने की बात कहने लगा, जिस के बदले में मरियम ने सकुचाते हुए हां कर दी.

शाम को 7 बजे मरियम रफीक की दुकान पर पहुंच गई. रफीक ने मरियम के आते ही दुकान का शटर बंद कर दिया और मरियम को दुकान के अंदर बने एक कमरे में ले गया.

यह कमरा साफसुथरा था. वहां कोने में एक दीवान पड़ा हुआ था, जिस पर बड़े पंडितजी पहले से बैठे थे और शराब पी रहे थे.

रफीक ने मरियम को अपनी बांहों में भरना चाहा, तो वह तुरंत छिटक गई और बोल्ड अंदाज दिखाते हुए बोली कि आज वह उन लोगों को मरजीना वाला डांस दिखाएगी और फिर उन का मूड बनाएगी.

‘यह मरजीना वाला डांस कौन सा होता है भाई?’ वे दोनों एक आवाज में बोले, तो मरियम ने उन्हें बताया कि मरजीना वाला डांस यानी वह डांस, जो ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ नाम की फिल्म में मरजीना करती है.

ऐसा कहने के साथ ही मरियम ने अपना कुरता अपने बदन से अलग कर दिया, पर अंदर वह एक छोटी कुरती पहने हुए थी, जिसे देख कर रफीक और बड़े पंडितजी मूड में आ गए और पागल से होने लगे.

मरियम अपने साथ एक मिनी स्पीकर लाई थी और उस पर ‘महबूबा ओ महबूबा’ वाला गाना बजा दिया और अपनी कमर को सैक्सी अंदाज में लचकाने लगी. बीचबीच में वह किसी साकी की तरह उन दोनों को शराब भी पिला देती थी.

मरियम का सैक्सी डांस देख कर रफीक से रहा नहीं गया और उस ने मरियम को पकड़ लिया और कुछ कहने लगा, पर मरियम ने उसे पहले स्पीकर की ओर इशारा कर के गाना बंद करने को कहा और फिर अपना कुरता पहन कर वापस रफीक के सामने आ कर बैठ गई.

‘‘अब बताओ कि क्या कहना चाह रहे हो?’’ मरियम ने शांत लहजे में पूछा, तो रफीक और बड़े पंडितजी ने मरियम से कहा, ‘‘नाच बहुत हुआ, अब तुम हमारा बिस्तर गरम कर दो.’’

मरियम ने उन से पूछा, ‘‘तुम लोग किसी औरत की गंदी वीडियो क्यों बनाते हो?’’

‘‘अरे, तुम जैसी सैक्सी औरतों और लड़कियों को बेहोश कर के हम पहले तो उन का रेप करते हैं और उस के बाद उन की गंदी वीडियो अपने पास रख लेते हैं, जिस के बल पर हम बारबार उन औरतों का रेप करते हैं,’’ शराब के नशे में बड़े पंडितजी सबकुछ बोले जा रहे थे.

‘‘तो क्या मेरे अलावा और कोई भी आप के जाल में फंस चुकी है,’’ मरियम के इस सवाल के जवाब में रफीक ने कई लड़कियों के नाम गिना दिए.

‘‘लेकिन, सब से ज्यादा मजा उस नाटक करने वाले घामू की बहन के साथ आया था. बहुत कसावट भरी थी वह,’’ बड़े पंडितजी अपनी आंखों को सिकोड़ते हुए बोले.

मरियम अचानक उठी. उस ने अपना स्पीकर भी उठा लिया और उस के पीछे छिपे मोबाइल को उठा कर चल दी.

रफीक और बड़े पंडितजी उसे रोकने लगे, तो मरियम ने गुस्से से घूरते हुए कहा, ‘‘तुम लोगों के खिलाफ सारे सुबूत इस मोबाइल में आ चुके हैं. अब पुलिस ही तुम लोगों से बात करेगी,’’ और इस के बाद मरियम ने अंदर से बंद शटर को खोलने की कोशिश की, पर उस से भारी शटर नहीं खुला.

पर अचानक किसी ने बाहर से हाथ लगाते हुए शटर खोल दिया. वह और कोई नहीं, बल्कि घामू ही था और उस के साथ थी पुलिस और न्यूज चैनल के पत्रकार.

पुलिस ने पूरे हालात का जायजा लिया. मरियम ने रफीक और बड़े पंडितजी पर ब्लैकमेलिंग और यौन शोषण का आरोप लगाते हुए चोरी से बनाए गए उस वीडियो को मीडिया और पुलिस को सौंप दिया, जिस में वे दोनों शराब के नशे में अपने गलत कामों की शेखी बघार रहे थे.

पुलिस को मीडिया के दबाव में उन दोनों को गिरफ्तार करना पड़ गया था.

घामू और मरियम का बदला पूरा हो गया था. भले ही मरियम के साथ हुए रेप की बात फैल गई थी, पर कम से कम रफीक और बड़े पंडितजी अब किसी और लड़की की जिंदगी तो बरबाद नहीं कर सकेंगे.

कुछ दिन बीतने के बाद घामू मरियम के घर पहुंचा, तो मरियम उसे देख कर सहज भाव से मुसकरा दी और उस का बेटा आदिल घामू के गले लग गया.

घामू ने मरियम से उस की तारीफ करते हुए कहा कि कितनी जल्दी उस ने डांस करना और मोबाइल से चोरी से वीडियो बनाना और दूसरी बातों को सीख लिया, जिस के बदले में मरियम के गोरे गालों पर शर्म की लाली दौड़ गई थी.

मरियम को मुसकराते देख फौरन ही घामू ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया, पर मरियम चुप थी.

घामू मरियम के चेहरे पर छाई खामोशी का मतलब नहीं सम?ा पा रहा था. उस ने बेसब्री से कहा, ‘‘तुम खामोश क्यों हो मरियम?’’

‘‘पगले इतना भी नहीं जानते कि औरत की खामोशी का मतलब ही उस का इकरार होता है,’’ शरमाते हुए मरियम ने कहा, तो घामू ने भी खुशी से मरियम के माथे को चूम लिया.

ठीक उसी समय आदिल ने मोबाइल से उन दोनों की तसवीर खींच ली.

Hindi Story : डांस बार पर्यटन

Hindi Story : जीवन बीमा निगम में काम करते हुए गुप्ताजी अब रिटायरमैंट के नजदीक थे. एक बेहतरीन मैनेजर के रूप में उन्होंने अपने सेवाकाल के पूरे 34 साल गुजार दिए थे. 2 बेटों की शादी कर अपनी बड़ी पारिवारिक जिम्मेदारी पूरी कर वे संतोष के भाव से अपनी नौकरी कर रहे थे. अब तक मशीन की तरह की दिनचर्या में खास रंगों की कमी, जिसे काफी हद तक बोरिंग लाइफ कहा जा सकता है, में ही उन के दिन कट रहे थे. न पर्यटन, न तीर्थाटन, बस किसी तरह उन्होंने इतने साल बिता दिए थे.

पूजापाठी धर्मपत्नी भी बाहर घूमने की इच्छा रखने वाली कभी न रही, तो पत्नी के साथ घर छोड़ कर साथ में कभी न घूमना तय हो पाया, न कभी देवालय दर्शन की योजना पूरी हो पाई.

औफिस के 3-4 नौजवान शिरडी के सांईं बाबा के दर्शन का प्रोग्राम बना रहे थे, तो गुप्ताजी से भी चलने के लिए पूछा गया. पहले तो उन्होंने आदतन मना कर दिया, पर शाम तक विचार करने और पत्नी से मोबाइल पर सलाह करने के बाद साथ चलने की रजामंदी दे दी.

सबकुछ तय होने के बाद 3-4 दिन का कार्यक्रम राजस्थान, गुजरात के रास्ते पड़ने वाली जगहों को बहुत कम समय देते हुए दिल्ली से एक गाड़ी में 5 लोग 2 दिन में शिरडी पहुंच गए.

आस्था का सैलाब भक्तों की भीड़ के साथ दर्शन करने के बाद पूरी तरह शांत हो चुका था. गुप्ताजी अपनेआप को बहुत हलका महसूस कर रहे थे. ऐसा कि जो उन्होंने कई सालों में महसूस नहीं किया था.

एक जगह भोजन करते हुए अब आगे के प्रोग्राम के लिए चर्चा होने लगी, तो गुप्ताजी हैरान हो कर बोले, ‘‘तो यहां से वापस घर लौटने का अभी कोई प्रोग्राम नहीं है न?’’

एक साथी मजाकिया अंदाज में बोला, ‘‘हम ने पुराने पाप तो धो लिए हैं, अब कुछ नए पाप कर लेते हैं.’’

एक जोर का ठहाका लगा और दूसरे साथी ने सु?ाया, ‘‘अब यहां से गोवा चलते हैं. खूब बीयर पिएंगे और बीच पर मस्ती करेंगे.’’

सब ने गुप्ताजी की तरफ देखा, जैसे वे सब तो तय कर ही चुके हैं, अब उन को भी अपनी रजामंदी दे देनी चाहिए.

गुप्ताजी 5 मिनट तक कुछ न बोले, तो एक साथी फिर से बोला, ‘‘क्या बात है गुप्ताजी, मन क्या कह रहा है? हमारे साथ चलिए गोवा. आप की बरसों की थकान वहां मसाज करा कर मिटा देंगे.’’

गुप्ताजी ने पूरा कौर चबाया, फिर धीरे से बोले, ‘‘हमारी जवानी में मनोरंजन के नाम पर सिर्फ सिनेमाघर में मूवी देखना होता था. उन मूवीज में कैबरे और बार में डांस देख कर मन बड़ा खुश हो जाता था. कब से मेरी इच्छा रूबरू ऐसा बार डांस देखने की है.’’

गुप्ताजी की यह बात सुन कर कुछ समय के लिए बाकी लोगों की चुप्पी आंखों ही आंखों में बात करती रही. किसी को भी गुप्ताजी की मनतरंग के ऐसे धमाके की कतई उम्मीद नहीं थी.

एक साथी बोला, ‘‘डांस बार तो मुंबई में थे, जो अब बंद हो चुके हैं. यह कैसे मुमकिन है…’’

सब से पहले एक और नौजवान साथी बोला, ‘‘पहली बार तो गुप्ताजी ने कोई इच्छा जाहिर की है. हम इसे पूरा करने की कोशिश तो कर ही सकते हैं. मेरा एक दोस्त मुंबई के एक होटल में मैनेजर है. उस से बात करता हूं,’’

और उस ने तुरंत मुंबई फोन लगाया, तो छूटते ही सामने से जवाब आया, ‘अब कौन से डांस बार… वे तो कब के बंद हो चुके हैं…’

‘‘भाई, कैसे भी यह इंतजाम करना ही है. कहीं से भी पता करो, पर यह इंतजाम कराओ.’’

‘ठीक है, मैं पता करने की कोशिश करता हूं कि कहीं पर चोरीछिपे चल रहे हैं क्या…’ उधर से आवाज आई.

आधे घंटे बाद ही उस मैनेजर का फोन आया और उन्हें अंधेरी में एक बार का नाम बताते हुए वहां पहुंचने की जरूरी जानकारी दे दी गई.

दिल्ली का दल फटाफट पूरी ऊर्जा के साथ मुंबई पंहुच गया. ट्रैफिक की भीड़भाड़ को देखते हुए गाड़ी को छोड़ अंधेरी तक का सफर लोकल ट्रेन से किया गया.

अंधेरी स्टेशन के बाहर खड़ी टैक्सी को जब बार का नाम ले कर चलने के लिए कहा गया, तो 3 लोगों ने तो मना कर दिया, फिर चौथे टैक्सी वाले की जेब में चुपचाप 500 का नोट डाल कर उस से बार का नाम ले कर छोड़ने को कहा गया.

ड्राइवर बोला, ‘‘मैं चुपचाप थोड़ी दूरी पर छोड़ कर चला आऊंगा. वहां से अपनेआप चले जाना.’’

‘‘क्यों भाई, ऐसा क्या है वहां, जो तुम इतना बिदक रहे हो?’’ एक साथी ने टैक्सी ड्राइवर से पूछा.

‘‘भाई, तुम जगह ही ऐसी जा रहे हो. वहां पहुंचोगे तो पता चल जाएगा,’’ वह टैक्सी ड्राइवर बोला.

इतना सुनते ही सब लोग फुरती से गाड़ी में बैठे और तकरीबन 20 मिनट में टैक्सी ड्राइवर उन्हें बार से कुछ ही दूर उतार कर रफूचक्कर हो गया.

थोड़ी देर के बाद वे लोग उस दबेछिपे डांस बार को खोजने में कामयाब हो गए. आगे से बेकरी की दुकान से एक छोटा सा दरवाजा उन्हें एक बड़े से कमरे में ले आया, जहां उन का सामना 3 लंबेचौड़े बाउंसर से हुआ.

परखने के बाद उन्हें भीतर बने स्टेज के पास रखी गोल मेज के चारों तरफ रखी कुरसियों पर बैठा दिया गया. बीयर भी उन की मांग के मुताबिक परोस दी गई.

10 मिनट तक कोई हलचल नहीं हुई, फिर हिम्मत कर के एक नौजवान साथी बाउंसर से पूछने गया कि डांस कब और कैसे शुरू होगा.

बाउंसर ने पास आ कर धीरे से कहा, ‘‘वह देखो लड़कियां स्टेज पर आ कर खड़ी हो गई हैं. अब उन में से पसंद कर जिस भी लड़की को टिप दोगे, वह आप की पसंद के गाने पर डांस कर के दिखाएगी.’’

उस साथी ने लौट कर सब को बात बताई और गुप्ताजी की पसंद पूछी, जिन पर बीयर का नशा अब कुछकुछ चढ़ने लगा था. शादी के बाद यह उन का पहला सुरासेवन हो रहा था.

गुप्ताजी ने हौले से अपनी पसंद की लड़की की ओर इशारा किया, तो नौजवान साथी ने दौड़ कर 500 रुपए लड़की को थमाए और 1,000 के छुट्टे 10-20 रुपए के नोट में ले आया और टेबल पर जमा दिए.

‘तू चीज बड़ी है मस्तमस्त…’ गाने पर गुप्ताजी की पसंद वाली लड़की ने 5-6 मिनट तक अपने डांस से उन पांचों का मनोरंजन करने की कोशिश की. नोट भी खूब बरसाए, पर अभी मजा नहीं आया था.

फिर उस नौजवान साथी ने माहौल को गरमाने का भार अपने कंधे पर ले लिया. अपनी पैनी नजर से उस ने एक और लड़की को 500 के 2 नोट दिए और गुप्ताजी की ओर इशारा कर ‘टिपटिप बरसा पानी…’ गाने पर मदमस्त डांस करने को कहा. पैसे की मिठास ने बार डांसर को गाने की पहली बीट से ही जोश में ला दिया.

अपनी घनी जुल्फों को उस लड़की ने पूरी तरह खोल दिया और अगले 10 मिनट में मस्त हो कर वह ऐसे नाचने लगी कि गुप्ताजी भी सबकुछ भुला कर उस के साथ ठुमके लगाने लगे.

सभी लोग मजे ले रहे थे, पर एक साथी उस समूह में ऐसा था, जो सुरापान से परहेज रखता था और अब सब को लौटने के लिए कहने लगा. गुप्ताजी अभी और समय वहां बिताना चाहते थे, पर थोड़ी देर में बिल चुकता कर सब वहां से निकल गए.

गुप्ताजी नशे में चूर बारबार गा रहे थे, ‘‘टिपटिप बरसा पानी…’’ जिंदगी में पहली बार इस तरह का मजा उन्होंने लिया था, जिस ने उन्हें अपनी बरसों से दबी फैंटेसी को पूरा होने से खुद को खुद से भुला दिया था.

वे बारबार अपने सफर के साथियों के गले लग कर बस एक ही लाइन दोहराते, ‘‘टिपटिप बरसा पानी…’’ जैसे उस शाम के लिए वे बारबार धन्यवाद कह रहे हों.

रात की मस्ती होटल पहुंच कर पूरी हो गई. हावी हो रही थकान और नशे के सुरूर ने जल्दी सब को नींद के आगोश में ले लिया. अगली सुबह सब ने एकमत हो कर घर लौटने का फैसला कर लिया.

घर लौटे गुप्ताजी की चुस्ती और फुरती को देख कर घर वाले हैरान थे. सांईं बाबा की कृपा मान कर बाकी घर वाले भी जल्द ही शिरडी दर्शन जाने का विचार करने लग गए थे.

लेकिन असलियत तो गुप्ताजी ही जानते थे, जिन पर अभी तक डांस बार की लड़कियों की खुमारी नहीं
उतरी थी.

Funny Story : चला गब्बर बब्बर होने

Funny Story : अगर आप के पास चुनाव पर चर्चा करने से जरा सी भी फुरसत हो तो एक बात तो बताना कि आदमी बूढ़ा क्यों होता है? जब वह जवान होता है, तो उस की जवानी वहीं क्यों नहीं रुक जाती?

बस, मजबूरी का चिंतक हुआ इसी उधेड़बुन में चुनावी बुखार से सने अखबार का वासंती धूप में कभी इस टांग के दर्द को दबाता, तो कभी उस टांग के दर्द को सहलाते हुए चुनावी खबरों का रसपान करता पड़ोसी के दरवाजे की ओर अपनी लातें किए मजे ले रहा था कि अचानक सामने से गब्बर सिंह आ गया. मु झे उसे पहचानते देर न लगी.

अब आप पूछोगे कि मैं ने गब्बर सिंह को कैसे पहचान लिया? तो सच यह है कि अपनी इमेज वालों को सज्जन से सज्जन भी आंखें मूंद कर पहचान लेते हैं. अपनी इमेज वालों के बदन से एक खास किस्म की बदबू आती है, जो उन्हें कभी न मिलने के बाद भी मु झ जैसों को अपनी ओर खींच लेती है, लाख नाक बंद करने के बाद भी.

सच कहूं तो अपने समय में मैं भी अपने औफिस में किसी गब्बर सिंह से कम न था. तब पूरे औफिस में साहब के होते हुए भी मेरा ही लौ ऐंड और्डर चलता था. होली हो या दीवाली. अहा, क्या दिन थे वे भी.

‘‘और चचाजान, कैसे हो?’’ गब्बर ने मेरी कुरसी के साथ अपने कंधे से अपनी बंदूक उतार खड़ी करते हुए मेरी दाढ़ी को हाथ लगाया, तो मु झे अपने औफिस के दिन याद आ गए. काश, मैं लाइफटाइम औफिस में ही रहता लाइफटाइम सिम की तरह.

‘‘बस, बुढ़ापे की दया से ठीक ही हूं भतीजे. अरे, जमीन पर नहीं, कुरसी पर बैठो. अब गए दिन डाकूलुटेरों के जमीन पर बैठने के. व्यवस्थागत कुरसियां अब तुम जैसों से ही सार्थकता को प्राप्त होती हैं. बुढ़ापा इस उम्र में जो दिन न दिखाए वही सही.’’

‘‘और अब तुम्हारे घुटनों का दर्द कैसा है?’’ गब्बर सिंह ने मेरे दाएं घुटने पर जोरों से हाथ रखा, तो मैं चिल्लातेचिल्लाते बचा.

‘‘खा रहा हूं डाक्टर की कमीशन वाली दवाएं, जिन में दवा कम डाक्टर का कमीशन ज्यादा होता है. पर एक घुटनों का दर्द है कि न कम हो रहा है, न बढ़ रहा है.’’

‘‘तो चचाजान, इस का मतलब साफ है कि दवा काम कर रही है. काश, इसी तरह तुम्हारी जवानी की दवाएं भी काम करतीं तो आज…’’ गब्बर सिंह ने कुरसी पर बैठते कामदेव से मेरे बुढ़ापे में जवानी बरकरार रहने की दुआ मांगी, तो मन किया कि उसे अपनी गोद में बिठा कर गोदी डाकू बना लूं.

मैं ने उसे सामने की खाली कुरसी पर जबरदस्ती बैठाते हुए कहा, तो वह थोड़ा झेंपा. पता नहीं क्यों?
‘‘आराम से कुरसी पर बैठो गब्बर. बड़े दिनों बाद आए हो?’’

मेरी गुजारिश पर गब्बर सिंह िझ झकते हुए कुरसी पर बैठा. इस का मतलब उसे इस बात का कतई इल्म न था कि आजकल कुरसियां उस की बिरादरी की बांदी चल रही हैं.

‘‘हां चचाजान, जंगल में कौवों, गिद्धों, सियारों से पता चला था कि लोकतंत्र का महापर्व मनाया जा रहा है, तो सोचा कि लोकतंत्र के महापर्व में जरा घूमघाम आऊं. जंगल में रहतेरहते बहुत बोर हो रहा था.’’

‘‘गुड… अच्छा नहीं, बहुत अच्छा किया मेरे भतीजे. हवापानी बदलने के लिए बीचबीच में जंगली गुंडों को मौडर्न गुंडों के बीच आ जाना चाहिए. इस से न केवल कुलीन गुंडों से मधुर संबंध बनते रहते हैं, बल्कि सुरक्षित गुंडई की नई तकनीकों का पता भी चलता रहता है.’’

‘‘सो तो ठीक है चचाजान, पर अब मैं भी सोच रहा हूं कि चुनाव में खड़ा हो जाऊं, पर…’’

‘‘तो इस में पर वाली बात ही क्या है? चुनाव की गंगा बह रही है, तुम भी डुबकी लगा लो,’’ मैं ने उसे सलाह दी, तो वह तनिक चिंतित लगा, तो मैं ने उस से पूछा, ‘‘परेशान क्यों हो गए?’’

‘‘यही चचा कि मैं ठहरा आपराधिक इमेज का और…’’ कह कर उसे डिप्रैशन ने घेर लिया.

‘‘अरे, तो क्या हो गया… यहां चुनाव होते ही अपराधियों को चुनने के लिए हैं. तुम तो केवल आपराधिक इमेज वाले हो. इस पर्व का बेसब्री से इंतजार गंभीर आपराधिक इमेज वाले तक करते हैं, ताकि इस में डुबकी लगा कर वे अपना चरित्र धो सकें और जैसे ही आपराधिक छवियों को माननीय छवियों में बदलने का यह महापर्व आता है, वे सब अपराधी से माननीय, सम्माननीय सज्जनता को प्राप्त हो कर कानून व्यवस्था को मजबूत करने में जुट जाते हैं.

‘‘यह देखो, आज के अपराधियों को मिले टिकटों की लिस्ट. हर पार्टी ने तुम से छोटे दागियोंबागियों को टिकट पर टिकट दिए हैं. तुम एक बार किसी भी पार्टी में टिकट के लिए आवेदन करना तो छोड़ो, उन के पार्टी प्रमुख से जरा मेरे फोन से बात भर कर के तो देखो, वे उसी वक्त तुम्हें टिकट औफर न करें, तो मु झे कल से अपना चचा मत कहना.

‘‘मुझे तो ताज्जुब इस बात का हो रहा है कि अब तक किसी पार्टी की इतने ख्यातिप्राप्त पर अपना उम्मीदवार बनाने की नजर क्यों नहीं पड़ी, जबकि… भतीजे, यह समय तुम्हारा जंगल में लेटे रहने का नहीं, सांसद बन कर संसद में खानेकमाने का है,’’ मैं ने गब्बर सिंह को अखबार में गंभीर से गंभीर अपराधियों को मिले टिकटों की लिस्ट दिखाई, तो उस के मुंह में पानी आ गया.वह अपने मुंह से बहता पानी पोंछता हुआ बोला, ‘‘तो चचाजान, इस का मतलब है कि मैं सही समय पर जंगल से बाहर आया हूं?’’

‘‘बिलकुल सही समय पर आए हो मेरे गब्बर,’’ मैं ने उस की पीठ थपथपाते हुए कहा.

‘‘तो मुझे टिकट के लिए अब क्या करना होगा?’’

‘‘यह लो मेरा फोन और जिस पार्टी को चाहो बस एक फोन भर कर दो. तुम्हारा फोन सुन कर वे खुशी से झूम उठेंगे. बस, सम झ लो फिर तुम्हारा टिकट पक्का.’’

‘‘तुम जैसे लोकतंत्र रक्षकों को तो आज पार्टियां हाथोंहाथ ले रही हैं, क्योंकि अब तुम जैसों के हाथों में आधुनिक लोकतंत्र जितना महफूज है, उतना ईमानदारों के हाथों में नहीं. फिर मजे से अपराधी से माननीय बन कर पुलिस की सलामी लेते रहना. पुलिस को कानून व्यवस्था बनाने के जब चाहे और्डर देते रहना…’’

मेरे इतना भर कहने की देर थी कि गब्बर सिंह ने मेरी जेब से मोबाइल निकाला और मिला दिया. पता नहीं, पार्टी मुख्यालय में… और 2 मिनट बाद ही गब्बर का चेहरा सांसदी के टिकट से गुलाल हो उठा. तय है, अगली दफा अब मैं ही उस से मिलने दिल्ली जाऊंगा.

पता नहीं, तब उस के पास अपने चचा से मिलने का वक्त भी होगा या नहीं? पर चलो, किसी के धंधे का तरीका इज्जतदार हो जाए, मैं तो बस इसी में खुश हूं.

News Story : शराब और सांवरी

News Story : मनोहर दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती में रहता था. 2 साल पहले उस की शादी सांवरी से हुई थी. नाम की सांवरी देखने में बहुत खूबसूरत और गोरी थी. वह पतली देह की बड़ी कमेरी औरत थी और मनोहर से बहुत प्यार करती थी.

शादी के 2-3 महीने तो बड़े अच्छे बीते, पर जब मनोहर ने अपना असली रंग दिखाया, तो सांवरी की जिंदगी ही बदरंग हो गई.

मनोहर को शराब पीने की लत थी. कहने को वह ईरिकशा चलाता था, पर उस का ध्यान घरगृहस्थी से ज्यादा अपने पीने की लत पर रहता था. अंटी में थोड़े पैसे आए नहीं कि वह सीधा देशी शराब के ठेके पर जा कर अद्धा खरीद लेता था और दिन में ही शराब पीना शुरू कर देता था.

एक दिन सांवरी ने उसे टोका भी था, ‘‘आप रोजरोज शराब मत पिया करो. फिर आप जानवर बन जाते हो. आप की सारी कमाई यह शराब चूस जाती है.’’

‘‘अब तू मुझे दुनियादारी सिखाएगी. औरत जात है तो ज्यादा सिर पर मत चढ़. मेरी कमाई, मैं जो चाहे करूं, तू कौन होती है दखल देने वाली,’’ मनोहर सांवरी पर चिल्लाया था.

सांवरी समझ गई कि मनोहर नहीं सुनेगा. उस ने अपना टाइमपास करने के लिए पास की सोसाइटी में बरतन मांजने का काम शुरू कर दिया.

पर सांवरी की मेहनत तब बेकार हो जाती, जब मनोहर उस की कमाई भी हथिया लेता था. टोकने पर उस की जम कर पिटाई भी करता था.

जिस सोसाइटी में सांवरी बरतन मांजने जाती थी, वहां महेश नाम का एक सिक्योरिटी गार्ड था, जो सांवरी को बहुत पसंद करता था. महेश की अभी शादी नहीं हुई थी. वह उसी सोसाइटी के पीछे बने गार्डरूम में रहता था.

एक दिन जब सांवरी सोसाइटी में आई, तब महेश की ड्यूटी मेन गेट पर ही थी. जब सांवरी ऐंट्री कर रही थी, तब महेश ने उस का मुरझाया चेहरा देख कर पूछ ही लिया, ‘‘क्या हुआ सांवरी? घर पर सब ठीक…?’’

सांवरी को महेश में अपना हमदर्द नजर आया. उस ने कहा, ‘‘अब क्या बताऊं महेश बाबू, मेरी तो जिंदगी ही नरक हो गई है.’’

‘‘क्या हुआ?’’ महेश ने पूछा.

‘‘अभी जल्दी में हूं. बाद में बताती हूं,’’ सांवरी बोली.

‘‘जब तू दोपहर को बाहर जाएगी, तो उस से पहले मेरे कमरे पर आ जाना. करते हैं आराम से बात,’’ महेश बोला.

सांवरी मुसकरा कर चली गई.

दोपहर को सोसाइटी में लोग अपने घरों में ही रहते थे. सांवरी अपना काम खत्म कर के सीधा महेश के कमरे में चली गई.

महेश चाय बना रहा था. सांवरी को देखते ही वह बोला, ‘‘आओ, मैं हम दोनों के लिए चाय बना रहा था.’’

सांवरी एक स्टूल पर बैठ गई. महेश ने उसे पानी दिया और चाय के साथ खाने के लिए बिसकुट का एक छोटा पैकेट खोल दिया.

चाय पीते हुए महेश ने सांवरी की आंखों में देखते हुए पूछा, ‘‘अब बताओ कि क्या बात है?’’

सांवरी आह भरते हुए बोली, ‘‘इस शराब ने मेरी जिंदगी का बेड़ा गर्क कर दिया है. मनोहर रोज शराब पीता है और टोकने पर मुझे मारता है,’’ इतना कह कर सांवरी ने अपनी साड़ी का पल्लू हटा कर महेश को मनोहर के दिए जख्म दिखाए.

सांवरी की गोरी पीठ पर नील पड़ा हुआ था. देख कर महेश की रूह कांप गई. वह उठा और अपनी अटैची से एक मरहम निकाल कर सांवरी के नील पर मलने लगा.

पहले तो सांवरी डर के मारे पीछे को हट गई, पर महेश ने उस का हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘‘आज मत रोकना. अपने जख्मों पर मुझे मरहम लगाने दो.’’

सांवरी की आंखों में आंसू आ गए. वह कुछ नहीं बोली. महेश बड़े इतमीनान से सांवरी की पीठ सहलाता हुआ मरहम लगा रहा था. सांवरी का बदन गरम होने लगा. उस ने महेश का एक हाथ कस कर पकड़ लिया.

महेश ने मरहम लगा कर सांवरी के चेहरे पर नजर डाली. सांवरी ने आंखें बंद कर लीं. महेश ने उस के होंठ चूम लिए. सांवरी की सांसें तेज हो गईं.

महेश सांवरी को अपने बिस्तर पर ले गया और उसे देह सुख दिया. आज कई महीनों के बाद सांवरी को मर्द का प्यार मिला था. उस ने महेश को कस कर जकड़ लिया.

इस के बाद जब भी मौका मिलता, महेश सांवरी के जिस्म और मन पर पड़े नील पर अपने प्यार की मरहम लगाने लगा.

इसी बीच मनोहर को शराब पीने के साथसाथ जुआ खेलने की भी आदत पड़ गई थी. एक रात वह नशे में चूर हो कर घर आया और आते ही सांवरी पर बरस गया, ‘‘तेरा पति एकएक पाई को मुहताज है और तुझे जरा सा भी फर्क नहीं पड़ता. कैसी जोरू है तू, जिसे अपने मर्द की जरा सी भी परवाह नहीं है.

‘‘मेरे ऊपर 15,000 रुपए का कर्ज चढ़ गया है. सोचा था, जुए में लंबा हाथ मारूंगा, पर मैं तो अपना ईरिकशा ही गिरवी रख आया. अगर पैसे नहीं चुकाए, तो सब बरबाद हो जाएगा.’’

इतना सुनते ही सांवरी ने अपना माथा पकड़ लिया. उसे लगा कि आज तो उस की जिंदगी ही तबाह हो गई है. फिर भी उस ने मनोहर को समझाया, ‘‘चिंता मत करो. मैं कुछ सोचती हूं.’’

मनोहर नशे में भूल गया था कि सांवरी उस की ब्याहता है. वह अपनी मर्दानगी पर चोट समझ कर बोला, ‘‘अब तू मेरा कर्ज उतारेगी… किस का बिस्तर गरम कर के पैसे लाएगी… बता?’’

सांवरी को उम्मीद नहीं थी कि मनोहर ऐसी बात करेगा. उसे महेश याद आ गया, जो उस की जरूरत पूरी करता था. उसे इनसान समझता था और उस के प्यार की कदर करता था.

अगले दिन सांवरी जब महेश से मिली, तो उस के सीने से लग कर रोने लगी और बोली, ‘‘मुझे 15,000 रुपए चाहिए. मैं कुछ भी करने को तैयार हूं. बताओ, किस घर में चोरी करूं या डाका डालूं…’’

महेश ने सांवरी के होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उसे बिस्तर पर ले गया. आज महेश ने सांवरी को जीभर कर प्यार किया. उस का अंगअंग चूम लिया. सांवरी ने भी महेश का खूब साथ दिया और अपने जिस्म की प्यास बुझाई.

जब वे दोनों निढाल हो कर बिस्तर पर पड़े थे, तब सांवरी बोली, ‘‘तेरे पास बीड़ी है? बड़ा मन है पीने का.’’

महेश ने एक बीड़ी सुलगा कर सांवरी को दे दी और सारी बात जान कर बोला, ‘‘तुम इतने कम समय में रुपयों का इंतजाम कैसे करोगी? मेरे पास भी ज्यादा पैसे नहीं है.’’

सांवरी ने कहा, ‘‘क्यों न किसी का बच्चा चुरा कर बेच दें. ढेर सारे पैसे मिल जाएंगे. फिर मेरी नरक जैसी जिंदगी में सुख ही सुख होगा.’’

‘‘कैसे भला? तुम किसी मासूम की जिंदगी क्यों खराब करना चाहती हो?’’ महेश ने पूछा.

‘‘मैं ने ठान लिया है. जल्दी ही मैं किसी का बच्चा चुरा कर पैसे का जुगाड़ कर लूंगी.’’

‘‘तुझे जरा भी फर्क नहीं पड़ेगा?’’ महेश ने हैरान हो कर पूछा.

बीड़ी पीती सांवरी ने कहा, ‘‘मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मेरा पति शराबी है. रोज शराब के लिए पैसे मांगता है. न दूं, तो देह तोड़ देता है. हमारे देश में इतनी गरीबी और आबादी है कि हर किसी भिखारी का बच्चा चोरी हो जाए, तो पुलिस के पास टाइम नहीं है कि उसे ढूंढ़े.

‘‘मांबाप भी थोड़े दिन रो कर दिल को तसल्ली दे लेते हैं कि बच्चा जिंदा तो है. अगर किसी सही आदमी के पल्ले पड़ गया तो उस की जिंदगी बन जाएगी. हमारे साथ अगर वह रहता तो नशेड़ी या चोरउचक्का ही बनता.’’

महेश ने कहा, ‘‘सांवरी, किसी का बच्चा चुराना कोई हंसीखेल नहीं है. अभी हाल ही में पुलिस ने बच्चे उठाने वाले गिरोह को पकड़ा है. ये लोग तो पूरी रेकी कर के बच्चा उठाते हैं. तू तो पहली बार ऐसा करने की सोच रही है. अपने पति की शराब पीने की लत और मार से बचने के लिए कोई भी ऐसा कदम मत उठाना कि तुम्हें लेने के देने पड़ जाएं.’’

‘‘किस गिरोह की बात कर रहा है तू?’’ सांवरी ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘अरे, दिल्ली में पुलिस ने हाल ही में बाल तस्करी के एक बड़े गिरोह का भंडाफोड़ किया है.’’

‘‘क्या है पूरी खबर?’’ सांवरी ने जानना चाहा.

‘‘मैं ने आज सुबह ही अखबार में पढ़ा था कि पुलिस ने 2 बच्चा तस्करों को गिरफ्तार करते हुए 2 बच्चों को बचा लिया. इस गिरोह का परदाफाश होने की वजह से बच्चा चोरी के 3 मामले सुलझा लिए गए, जिसे साल 2023 से साल 2025 के बीच दर्ज किया गया था.

‘‘इस गिरोह के लोग गोद लेने के बहाने बेऔलाद जोड़ों को तस्करी किए गए बच्चों की सप्लाई कर रहे थे. पुलिस उपायुक्त (रेलवे) केपीएस मल्होत्रा ने बताया कि पिछले साल 17 अक्तूबर को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बच्चा चोरी का एक केस दर्ज होने के बाद जांच शुरू की गई थी.

‘‘एक औरत ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उस के ढाई साल के बेटे का उस समय अपहरण कर लिया गया, जब वह स्टेशन के मेन हाल में सो रही थी. जांच के दौरान सीसीटीवी में एक औरत बच्चे को आटोरिकशा में ले जाती हुई दिखाई दी.’’

‘‘आगे क्या हुआ?’’ सांवरी ने पूछा.

‘‘इस के बाद पुलिस महकमे की अलगअलग टीमों ने आटोरिकशा ड्राइवर का पता लगाया. उस ने पूछताछ के दौरान पक्का किया कि उस ने संदिग्ध को बदरपुरफरीदाबाद टोल गेट के पास छोड़ा था.

‘‘इस केस की जांच करते समय पुलिस को यह भी पता चला कि 31 जुलाई को रेलवे स्टेशन पर टिकट काउंटर के हाल से एक और औरत के 3 साल के बेटे का अपहरण कर लिया गया था. उस केस की जांच के दौरान भी चोरी का एकजैसा पैटर्न दिखा था.

‘‘पुलिस को पता चला कि उसी औरत ने बच्चे का अपहरण किया और उसी जगह पर आटोरिकशा में भाग गई. 21 जनवरी को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर एक और अपहरण की सूचना मिली. एक औरत के 4 महीने के नवजात को फूड कोर्ट वेटिंग हाल से अपहरण कर लिया गया था.

‘‘जांच के तहत 3 एकजैसे मामलों के साथ पुलिस ने एक टीम बनाई और बड़े पैमाने पर बचाव अभियान शुरू कर दिया.’’

‘‘क्या किया था पुलिस ने?’’ सांवरी ने पूछा.

‘‘पुलिस ने 700 सीसीटीवी कैमरों के फुटेज की जांच की और फोन ट्रैकिंग डाटा के साथ संदिग्ध की गतिविधियों को मैप किया. इस मामले में कामयाबी तब मिली, जब संदिग्ध को रेलवे स्टेशन के मेन गेट से आटोरिकशा में चढ़ते देखा गया.

‘‘गाड़ी के रजिस्ट्रेशन नंबर को ट्रैक किया गया और बदरपुर में जांच की गई. पुलिस टीम ने छापेमारी के बाद संदिग्ध को फरीदाबाद में खोज निकाला और लोगों को हिरासत में लिया.

‘‘डीसीपी ने कहा कि पुलिस टीम ने रेलवे स्टेशन से बच्चों का अपहरण करने वाली एक औरत और उस के पति को पकड़ा. उस औरत का पति सूरज तस्करों और खरीदारों के बीच काम करता था. एक और औरत, जो एक वकील के लिए क्लर्क थी, तस्करी को कानूनी दिखाने के लिए जाली गोद लेने के दस्तावेज तैयार करती थी.

‘‘पुलिस ने बाद में एक फर्जी डाक्टर को भी गिरफ्तार किया, जो 10वीं पास है और गिरोह में काम करता है.’’

‘‘पर, ये लोग काम कैसे करते थे?’’ सांवरी ने पूछा.

‘‘इस गिरोह के हर सदस्य बहुत ही योजना वाले तरीके से काम कर रहे थे. पुलिस ने उन के काम करने के तरीके को साझा करते हुए कहा कि तस्कर बसअड्डे, रेलवे स्टेशनों जैसी भीड़भाड़ वाली सार्वजनिक जगहों से बच्चों को निशाना बनाते थे. मुख्य संदिग्ध ने चुपके से बच्चों का अपहरण किया और बचने के लिए पहले से ही योजना वाले तरीके से भागने के रास्ते का इस्तेमाल किया. इस के बाद में एक दूसरी औरत ने उन के फर्जी कागज बनाए.

‘‘वह औरत बच्चा गोद लेने वाले मांबाप को गुमराह करने का काम करती थी. सूरज पैसे का लेनदेन देखता था. वह अपहरण करने वालों और खरीदारों के बीच दलाल के रूप में काम करता था.

‘‘इस गिरोह ने गिरफ्तारी से बचने के लिए कोड भाषा का इस्तेमाल किया. वे लोग अकसर अपना फोन नंबर बदल लेते थे. खुद को डाक्टर बताने वाली एक औरत ने तस्करी किए गए बच्चों को गलत तरीके से छोड़े गए या नाजायज बताया.

‘‘उस औरत ने अस्पताल में अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर के तस्करी किए गए बच्चों को गोद लेने की इच्छा रखने वाले लोगों से मिलवाया. इस के बाद बच्चों को उन बेऔलाद जोड़ों को बेच दिया गया, जिन्हें लगा कि वे कानूनी रूप से बच्चे गोद ले रहे हैं. लेनदेन को कानूनी दिखाने के लिए फर्जी गोद लेने के कागजात, मैडिकल रिकौर्ड और हलफनामे बनाए गए.’’

महेश ने जब यह पूरी खबर सांवरी को सुनाई, तो वह कांप कर रह गई और बोली, ‘‘मैं तो बच्चा चुराना बड़ा आसान काम समझ रही थी. सोचा था कि आराम से बच्चा चुरा कर किसी जरूरतमंद को बेच दूंगी और अपने पति के मुंह पर पैसे मार कर रोजरोज के झगड़े से पिंड छुड़ा लूंगी.’’

‘‘तू गलत सोच रही थी सांवरी. जुर्म की राह जेल तक जाती है. अभी तेरी उम्र ही क्या है. जेल में सड़ने से अच्छा है कि तू कोई और रास्ता देख,’’ महेश सांवरी का हाथ पकड़ कर बोला.

‘‘तो मैं क्या करूं? मैं ऐसी नरक जैसी जिंदगी से तंग आ गई हूं. अब मुझ से सहा नहीं जाता,’’ सांवरी रोते हुए बोली.

‘‘तू अपने पति को छोड़ दे और चल मेरे साथ. मैं दिल्ली छोड़ कर हमेशा के लिए अपने गांव जा रहा हूं. यहां की भीड़भाड़ मुझे रास नहीं आ रही. हम दोनों गांव में नई जिंदगी शुरू करेंगे,’’ कहते हुए महेश ने सांवरी का हाथ कस कर पकड़ लिया.

सांवरी को लगा कि महेश ने उसे जुर्म का रास्ता अपनाने से रोक कर उस की जिंदगी को नरक होने से बचा लिया है. उस ने महेश के कंधे पर अपना सिर रख दिया और फैसला कर लिया कि अब वह और नहीं सहेगी और सारी उम्र महेश की बन कर रहेगी.

Family Story : मंगलसूत्र

Family Story : आधी रात गुजर चुकी थी. अचानक किसी ने कमरे का दरवाजा खोला, तो आवाज सुन कर शकुंतला सोते से जाग उठी. थोड़ी देर पहले ही तो उसे नींद आई थी. देखा तो लड़खड़ाता हुआ उमेश कमरे के अंदर दाखिल हो रहा था. उस के पैर जमीन पर सीधे नहीं पड़ रहे थे. उस ने काफी शराब पी रखी थी.

‘‘सौरी शकुंतला, दोस्तों ने जबरदस्ती दारू पिला दी. मैं ने उन्हें काफी मना किया, लेकिन उन सब ने मेरी…’’ अपनी बात पूरी करने से पहले ही नशे की हालत में उमेश बेसुध सा पलंग पर गिर पड़ा.

शकुंतला चुपचाप उमेश की ओर देखती रही. उसे कुछ भी सम झ में नहीं आ रहा था. उमेश को इस हालत में देख कर शकुंतला के भीतर कहीं पत्थर सी जड़ता उभर आई थी. कुछ देर तक शकुंतला जड़वत सी उमेश को बेसुध पड़ा हुआ देखती रही.

कमरे में रजनीगंधा और गुलाब के फूलों की खुशबू फैली हुई थी. विवाहित जोड़े के स्वागत के लिए कमरे की सजावट में कोई कोरकसर नहीं थी. लाल सुर्ख जोड़े में सजीसंवरी शकुंतला पिछले कई घंटों से उमेश का इंतजार कर रही थी. थोड़ी देर पहले ही तो उस की आंख लगी थी.

कितनी सारी बातें शकुंतला ने सोच रखी थीं कहनेसुनने को, पर… शकुंतला ने भरपूर नजर से सोते हुए उमेश की ओर देखा और मन ही मन सोचा, ‘बेचारा उमेश… सच में इस सब में इस की क्या गलती… जरूर इस के दोस्तों ने ही इसे जबरदस्ती दारू पिलाई होगी…’

बेहद सरल स्वभाव की शकुंतला शादी के बाद जब विदा हो कर अपनी ससुराल आई तो किसी भी नई ब्याहता की तरह ही उस की आंखों में भी शादीशुदा जिंदगी के प्रति कुछ सपने थे.

2 कमरे का एक छोटा सा फ्लैट, जिस में शकुंतला की ससुराल वालों के नाम पर, उस की विधवा ननद और शकुंतला का पति उमेश था. उस के सासससुर का देहांत काफी पहले हो चुका था. विधवा ननद प्रतिमा की ससुराल भी पटना में ही थी, लेकिन वह अपने मायके में अपने भाई के पास ही रहती थी.

शकुंतला का पति उमेश किसी प्राइवेट कंपनी में था. ग्रेजुएशन करने के बाद शकुंतला ने अपने कैरियर को ले कर ज्यादा कुछ कभी सोचा नहीं था. उस का सपना भी उस के गांव की सहेलियों की तरह ही एक छोटे से खुशहाल परिवार और एक बेहद प्यार करने वाले पति तक ही सीमित था.

सुबह जैसे ही शकुंतला कमरे से बाहर निकलने को हुई कि उस के कानों में बेहद हलका स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘शकुंतला…’’ उस के पास आ कर किसी ने बेहद धीमे से उस के कानों में कहा, तो वह चौंक कर ठिठक गई.

शकुंतला की सहमी हुई सी आंखें उमेश पर ठहर गईं, ‘‘आप…’’

‘‘कल रात के लिए मु झे माफ कर दो,’’ उमेश ने शकुंतला को अपनी बांहों में समेटते हुए कहा.

धीरेधीरे उमेश की सांसों की गरमाहट शकुंतला के पूरे बदन पर फैलने लगी. वह शरमाते हुए वहां से चली गई.

शकुंतला को नाश्ता बनाने में देर हो गई. इस बात पर उमेश काफी नाराज हो गया.

‘‘इस से भूख बरदाश्त नहीं होती. अब जब तुम ने देरी की है, तो इस की नाराजगी भी तुम्हें ही झेलनी होगी,’’ प्रतिमा ने उमेश को कुछ कहने के बजाय शकुंतला को ही हिदायत दे दी.

‘‘कोई बात नहीं. अभी नईनई गृहस्थी है, धीरेधीरे सीख जाएगी,’’ प्रतिमा ने नाश्ते की प्लेट उमेश के आगे कर दी.

धीरेधीरे उमेश हर छोटीबड़ी बात पर शकुंतला को डांटने लगा और जब शकुंतला इन बातों से आहत होती, तो प्रतिमा उसे घरगृहस्थी के तौरतरीके सम झा कर शांत कर देती.

जब कभी हद से ज्यादा बात बिगड़ जाती, तब उमेश से नाराज हो कर शकुंतला उस से कुछ दिन बात नहीं करती थी. तब उमेश कोई न कोई गिफ्ट उसे पकड़ा देता था, अपने किए की उस से माफी भी मांग लेता था और फिर बात आईगई हो जाती थी.

‘‘दोपहर की ट्रेन से मुझे कोलकाता निकलना है. औफिस का कुछ काम है,’’ एक दिन अचानक ही उमेश ने शकुंतला से कहा.

‘‘आप ने पहले से कुछ बताया नहीं, अचानक कोलकाता जाने का प्रोग्राम कैसे बना?’’ शकुंतला ने पूछा.

‘‘तुम ज्यादा सवाल मत पूछो. मेरे साथ सतीश और हरीश भी जा रहे हैं. किसी की भी पत्नी इतने सवाल नहीं पूछती… तुम फटाफट मेरा सामान पैक करो,’’ उमेश ने तेवर दिखाए.

उमेश को कोलकाता गए 3 दिन हो गए थे और उस ने एक बार भी न तो शकुंतला को फोन किया और न ही शकुंतला की किसी भी फोन काल को रिसीव किया, तब हार मान कर शकुंतला ने सतीश को फोन कर दिया.

सतीश ने फोन तो उठाया, पर वह घबराया सा लगा और उस ने तुरंत फोन काट दिया.

शकुंतला को सतीश का यह बरताव कुछ अजीब सा लगा. सतीश के फोन कट करते ही कुछ ही सैकंड के भीतर शकुंतला को उमेश का फोन आया, ‘क्या है? क्यों बारबार फोन कर के परेशान कर रही हो?’

उमेश फोन पर ही शकुंतला पर चिल्ला पड़ा, लेकिन तभी शकुंतला को दूसरी तरफ से किसी लड़की के हंसने की आवाज सुनाई पड़ी.

शकुंतला उमेश से कुछ पूछ पाती, इस से पहले ही उमेश ने फोन कट कर दिया और इस के बाद शकुंतला ने जितने भी फोन किए, उमेश ने किसी का भी रिप्लाई नहीं दिया.

थकहार कर शकुंतला ने हरीश को फोन लगाया. जवाब में उस ने बताया, ‘उमेश मेरे साथ नहीं है. वह सतीश के साथ इस समय सोनागाछी गया हुआ है. सोनागाछी कोलकाता का रैडलाइट एरिया है. वे दोनों हर रात वहीं जाते हैं.’

हरीश से मिली इस जानकारी के बाद शकुंतला ने दोबारा उमेश को फोन किया, पर उमेश का फोन स्विचऔफ था.

अगली सुबह उमेश ने खुद ही शकुंतला को फोन किया. उस ने बताया कि वह तो यहां के एक मंदिर में देवी के दर्शन करने आया है.

लेकिन जब शकुंतला ने उमेश से पिछली रात की हकीकत के बारे में जानना चाहा और हरीश से मिली उस जानकारी पर सवाल किए, तब उमेश गुस्से में शकुंतला के ऊपर फोन पर ही चीखनेचिल्लाने लगा.

‘तुम्हें मु झ पर जरा भी भरोसा नहीं है, तुम उस हरीश की बातों में आ कर मु झ पर झूठा इलजाम लगा रही हो. यह हरीश मु झ से अपनी पुरानी दुश्मनी निकालने की खातिर तुम्हें बरगला रहा है. वहां आने पर तुम्हें सारी हकीकत बताऊंगा,’ इतना कह कर उमेश ने फोन कट कर दिया.

शकुंतला बेसब्री से उमेश के लौटने का इंतजार करने लगी.

‘‘आज तुम्हारी पटना के लिए ट्रेन थी. तुम कोलकाता से अब तक नहीं लौटे,’’ फोन पर कहते हुए शकुंतला परेशान हो उठी.

‘मैं पटना पहुंच गया हूं, लेकिन रास्ते में हनुमान मंदिर पड़ता है न… तो बिना दर्शन किए कैसे आगे निकल जाता, पूजापाठ करने में ही वक्त निकल गया. तुम चिंता मत करो. मैं बस पहुंच ही रहा हूं.’

2 घंटे बाद वापस शकुंतला ने फोन किया, तो जवाब में उमेश ने कहा, ‘रास्ते में सुनार की दुकान दिख गई.

मु झे याद आया कि तुम्हारे लिए मैं ने झुमके बनाने का और्डर दिया था, वही झुमके जो तुम कितने दिनों से खरीदना चाह रही थी… वही लेने के लिए रुका था कि इतने में तुम्हारा मंगलसूत्र जो टूट गया था, जो बनाने के लिए दिया था, उस दुकानदार का भी फोन आ गया, तो उसे भी लेने आ गया. मैं बस पहुंच ही रहा हूं.’

उमेश जब घर पहुंचा, तो शकुंतला बाहर ड्राइंगरूम में बैठी उस के आने का इंतजार कर रही थी. शकुंतला को कुछ भी पूछने या कहने का मौका दिए बिना ही उस के हाथ में प्रसाद के साथसाथ मंगलसूत्र और झुमके पकड़ा कर उमेश फ्रैश होने चला गया और कुछ देर बाद वह खुद को बेहद थका हुआ बता कर अपने कमरे में आराम करने चला गया.

रात को कमरे में आने के बाद शकुंतला ने वापस उमेश के सामने अपने वही सवाल दोहराए, लेकिन शकुंतला के सवालों का कोई भी सही जवाब दिए बिना उमेश ने उसे खींच कर अपने सीने से लगा लिया.

‘‘तुम्हें तो इस बात का भी एहसास नहीं है कि मैं तुम्हारे लिए मंदिरमंदिर घूमघूम कर किस तरह पूजाअर्चना करता आया हूं. अपने घर की सुखशांति और खुशियों के लिए मन्नत मांगता फिर रहा हूं और तुम हो कि किसी बाहर वाले के बहकावे में आ कर अपनी ही बसीबसाई गृहस्थी को उजाड़ने पर तुली हो…’’

उमेश ने दुखी होने का नाटक किया, ‘‘तुम जानती नहीं हो कि हरीश कैसा आदमी है. वह जलता है मु झ से. उस की अपनी पत्नी तो हर वक्त मायके भागी रहती है, इसीलिए दूसरों की गृहस्थी में आग लगाने की कोशिश करता रहता है.’’

उमेश को इस तरह दुखी होता देख शकुंतला खुद को ही इन सारी बातों का कुसूरवार सम झने लगी.

‘‘शकुंतला, आज मैं तुम्हें ऐसी खबर सुनाने वाला हूं, जिसे सुनते ही तुम खुशी से झूम उठोगी,’’ एक दिन अचानक ही उमेश ने शकुंतला से कहा, ‘‘मु झे मुंबई की एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिली है. मैं अगले हफ्ते ही मुंबई जा रहा हूं.’’

शकुंतला हैरानी से उमेश को देखती रह गई, क्योंकि उमेश ने कभी भी शकुंतला से इस बात का जिक्र भी नहीं किया था कि वह नौकरी बदलने की सोच रहा है या वह मुंबई की किसी कंपनी में नौकरी के लिए अप्लाई कर रहा है. अब आज अचानक उसे यह खबर सुनाई जा रही है.

शकुंतला को यह सम झ में नहीं आ रहा था कि वह खुशी जाहिर करे या नाराजगी, क्योंकि उमेश ने अभी तक उस से यह बात छिपा कर रखी थी. अगर उमेश यह बात उसे पहले बता देता, तो भी शकुंतला उस के इस फैसले में कौन सी अड़चन डालने वाली थी, बल्कि उसे तो खुशी होती.

मुंबई जाने से पहले नाटक करते हुए उमेश शकुंतला के गले से लिपट कर रोने लगा कि जैसे उसे शकुंतला को यहां अकेली छोड़ कर जाते हुए बहुत दुख हो रहा हो कि वह जा तो रहा है, पर उस का दिल तो यहां शकुंतला के पास ही रहेगा.

जातेजाते उस ने शकुंतला से कहा कि वह मुंबई में जैसे ही रहने की अच्छी जगह ढूंढ़ लेगा, उसे भी वहीं अपने पास बुला लेगा.

उमेश को विदा करते हुए शकुंतला की आंखें भी नम हो उठीं. उस का दिल भी यह सोच कर बैठा जा रहा था कि वहां मुंबई जैसे बड़े शहर में उमेश का खयाल कौन रखेगा.

खैर, देखतेदेखते समय भी अपनी रफ्तार से बीतता चला गया. पहले कुछ दिन, फिर हफ्ते, फिर महीने, फिर एकएक कर 3 साल का लंबा वक्त निकलता चला गया.

शकुंतला उमेश के आने का इंतजार करती रही और वह हर बार कोई न कोई बहाना बनाता रहा.

शुरू के कुछ महीने तो उमेश अकसर फोन कर के शकुंतला से उस का हालचाल पूछ लिया करता था. लेकिन, जैसेजैसे समय बीतता गया, उमेश का फोन भी आना बंद हो गया… धीरेधीरे घरखर्च के पैसे भी देने बंद कर दिए.

शकुंतला जब पूछती, तब वह अपनी ही मजबूरियों की गठरी उस के आगे खोल देता, अपनी बेचारगी का रोना शकुंतला के आगे वह कुछ इस तरह रोता कि शकुंतला की जबान पर ताले लग जाते.

शकुंतला ने भी धीरेधीरे हार मान कर उस से पैसे मांगने बंद कर दिए. अब वह शकुंतला के फोन का जवाब भी अपनी सुविधा के हिसाब से ही देता. धीरेधीरे उस ने फोन करने भी कम कर दिए. इधर शकुंतला ने भी हालात से सम झौता कर लिया था.

शकुंतला अब कैसे भी कर के उमेश की मदद करने की बात सोचने लगी. खुद के लिए नौकरी ढूंढ़नी शुरू कर दी, ताकि जिस से वह उमेश पर बो झ भी न बने और जरूरत पड़ने पर उस की पैसे से मदद भी कर सके.

शकुंतला ने जगहजगह नौकरी के लिए अर्जी भेजनी शुरू कर दी, लेकिन कुछ चीजों में उस की जानकारी की कमी के चलते उसे नौकरी मिलने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था.

शकुंतला की सब से बड़ी कमी उस के अंदर आत्मविश्वास की थी. इंटरव्यू के दौरान वह बोलने में अटक जाती थी, इसलिए अब वह अपनी ऐसी बहुत सी छोटीछोटी कमियों पर जीत हासिल करने की कोशिश में जुट गई.

सिलाई तो शकुंतला को पहले से आती थी, उस ने पास के ही एक बुटीक में पार्टटाइम नौकरी भी पकड़ ली. उन्हीं पैसों से उस ने पर्सनैलिटी डवलपमैंट का कोर्स किया. साथ ही साथ उस ने प्रोडक्ट मैनेजमैंट का भी कोर्स कर लिया.

एक दिन शकुंतला की खुशी का ठिकाना न था, जब उसे मुंबई की ही एक कंपनी से नौकरी का औफर आया. उस ने सोचा कि नौकरी मिलने की बात फिलहाल वह उमेश को नहीं बताएगी. नौकरी जौइन करने के बाद जब उस के हाथ में पहली तनख्वाह के पैसे आ जाएंगे, फिर वह उमेश को बता कर एकदम से हैरान कर देगी.

मुंबई शहर शकुंतला के लिए बिलकुल नया था. उस ने एक पीजी होस्टल में किराए पर एक कमरा ले लिया और रहने लगी. उस की रूम पार्टनर नीता बहुत ही खूबसूरत और मिलनसार थी. बहुत ही कम समय में वह उस की बैस्ट फ्रैंड बन गई.

शकुंतला को अब इंतजार था तो बस पहले महीने की मिलने वाली उस की सैलरी का, जिसे पाने के बाद वह उमेश के साथ रहने चली जाएगी.

शकुंतला उमेश को परेशान नहीं करना चाहती थी और न ही अपने खर्चे का बो झ उस पर डालना चाहती थी, इसलिए वह अपने पहले महीने की सैलरी मिलने के बाद ही मुंबई पहुंचने की सूचना उमेश को दे कर उस के साथ रहना चाहती थी.

अब जबकि वह भी कमा रही है, तो घर के खर्चे का बो झ दोनों साथ मिल कर उठाएंगे. ऐसे में साथ रहने पर उमेश को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी. यही सोचते हुए वह उमेश से मिलने के दिन गिनती रहती.

‘‘तुम्हारा कल का कोई प्रोग्राम तो नहीं है. मेरा मतलब है कि कल तुम फ्री हो न?’’ शकुंतला के औफिस से आते ही नीता ने अचानक पूछा.

‘‘नहीं, कुछ खास काम नहीं है. वैसे, कल औफिस की छुट्टी है, तो सारा दिन आराम करने की सोची है. लेकिन, तुम बताओ कि ऐसा क्यों पूछ रही हो?’’ शकुंतला नीता के पास आ कर बोली.

‘‘मैं तुम्हें निमंत्रण देना चाह रही थी. कल मेरी रिंग सैरेमनी है. बहुत ज्यादा लोगों को न्योता नहीं दिया है, सिर्फ कुछ खास दोस्तों को ही बुलाया है.

‘‘मम्मीपापा मेरे फैसले के खिलाफ हैं, इसलिए उन्होंने आने से मना कर दिया है. मैं पिछले एक साल से मम्मीपापा को मनाने की कोशिश कर रही हूं, लेकिन मालूम नहीं कि उन्हें उमेश में क्या खराबी नजर आती है.’’

उमेश का नाम सुन कर शकुंतला एक पल के लिए चौंक गई, फिर उस ने सोचा, ‘एक नाम के कई लोग हो सकते हैं.’

‘‘मैं उमेश से बहुत प्यार करती हूं. उस के बिना मैं जिंदगी के बारे में सोच भी नहीं सकती. तुम नहीं जानती शकुंतला कि उमेश कितना अच्छा और नेक है. जब से वह मेरी जिंदगी में आया है, मेरी तो दुनिया ही बदल गई है. सच्चा प्यार क्या होता है, उसी ने मु झे सिखाया है,’’ उमेश के प्यार में दीवानी नीता शकुंतला के सामने उमेश चालीसा पढ़े जा रही थी और शकुंतला चुपचाप उस की बातों को सुन रही थी.

‘‘क्या तुम्हारे पास उमेश की कोई तसवीर है? जरा मैं भी तो देखूं, मेरी प्यारी दोस्त जिस के प्यार में इतनी दीवानी है, वह दिखता कैसा है?’’

‘‘क्यों नहीं, यह देखो,’’ नीता एकएक कर उमेश के साथ वाली बहुत सारी तसवीरें अपने मोबाइल फोन की स्क्रीन पर शकुंतला को दिखाती चली गई.

शकुंतला अपलक उन तसवीरों को देखती रह गई. उस के लिए यकीन कर पाना मुश्किल हो रहा था. उस के दिल में टीस सी उठने लगी, चेहरा मुरझा गया, आंखों में आंसुओं का सैलाब उतरने लगा, जिसे उस ने बड़े ही जतन से काबू कर लिया.

‘‘नीता, तुम उमेश को कितने समय से जानती हो?’’ शकुंतला ने खुद को संभालते हुए नीता से सवाल पूछा.

‘‘पिछले 2 साल से.’’

‘‘क्या तुम ने उमेश के बारे में भी सबकुछ ठीक से जांचपड़ताल की है. मेरा मतलब है कि वह इनसान कैसा है और उस के परिवार में कौनकौन लोग हैं?’’

‘‘यार शकुंतला, तुम बिलकुल मेरे मम्मीपापा की तरह बातें कर रही हो. प्यार जांचपड़ताल कर के नहीं किया जाता, वह तो बस हो जाता है.

‘‘और रही बात उमेश के बारे में जानने की, तो उमेश ने मु झ से कभी भी कोई बात नहीं छिपाई. यहां तक कि उस ने अपनी पहली शादी के बारे में भी मु झे सबकुछ सचसच बता दिया है कि कैसे उस की पहली पत्नी की मौत शादी के कुछ दिन बाद हो गई.

‘‘बेचारे ने तो शादी का सुख भी नहीं भोगा. अब तुम बताओ, क्या अभी भी मु झे उस की ईमानदारी पर शक करना चाहिए?’’

‘‘नीता, क्या तुम ने उमेश की पहली पत्नी की तसवीर देखी है?’’

‘‘नहीं, इस की जरूरत ही नहीं है. जिस बात से उमेश को तकलीफ पहुंचती हो, वह बात मु झे करना भी पसंद नहीं. प्यार करने वाले जख्मों को भरा करते हैं, उसे कुरेदा नहीं करते.’’

‘‘पर, अगर कभी उमेश की पहली पत्नी अचानक तुम्हारे सामने आ कर खड़ी हो जाए, अगर वह जिंदा हो, उस की मौत ही न हुई हो, फिर तुम क्या करोगी?’’

‘‘यह बात तो मैं मान ही नहीं सकती. ऐसा कभी हो ही नहीं सकता. अगर ऐसा हुआ भी जैसा कि तुम कह रही हो, तब भी मैं उमेश का साथ नहीं छोड़ूंगी. मैं तब भी अपने कदम पीछे नहीं हटाऊंगी. उस की पहली पत्नी को ही पीछे हटना होगा. अगर वह जिंदा थी, तो इतने सालों तक उस ने उमेश की खोजखबर क्यों नहीं ली?

‘‘मैं यही सम झूंगी कि जरूर इस में उमेश की कोई न कोई मजबूरी रही होगी. मैं उमेश से जुदा हो कर जी नहीं सकूंगी.’’

शकुंतला का मन उमेश के प्रति नफरत से भर गया. कैसे उस ने जीतेजी उसे मरा हुआ बता दिया. उस का मन पीड़ा से भर उठा. क्या शादी का बंधन, उस की पवित्रता, उस की मर्यादा को निभाने की, अग्निकुंड के सामने मंत्र उच्चारण के साथ जो वचन लिए गए थे, उन्हें निभाने की जिम्मेदारी सिर्फ उसी की थी?

मंगलसूत्र टूट जाने पर शकुंतला को कितनाकुछ सुनाया था. वह हर वक्त डरती रही कि गलती से भी कहीं मंगलसूत्र उस के गले से निकल कर टूट न जाए, जबकि उमेश ने तो यहां उस के भरोसे, उस के आत्मसम्मान को ही चकनाचूर कर दिया.

क्या उस के आत्मसम्मान की कीमत उस के मंगलसूत्र से भी कम है? क्या इस समाज में मंगलसूत्र, सिंदूर और बिंदी की कीमत किसी औरत के आत्मसम्मान से ज्यादा है?

इस समाज में कितनी ही ऐसी औरतें हैं, जिन के पति उन्हें न तो पूरी तरह अपनाते हैं और न ही आजाद हो कर जीने का हक देते हैं. वे शादीशुदा होते हुए भी अकेले जिंदगी बिताने को मजबूर रहती हैं, जबकि उन के पति उन्हें अकेला छोड़ कर ऐशोआराम की जिंदगी बड़े शान से जी रहे होते हैं. तब यही समाज उन के पतियों से कुछ नहीं कहता. लेकिन, किसी औरत के गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर न पा कर सभी उस की बुराई करने लग जाते हैं.

अगर शकुंतला मुंबई नहीं आई होती, तो वह कभी भी अपने पति उमेश की हकीकत जान ही नहीं पाती. वह तो अकेली सुहागन होने का, शादीशुदा होने का तमगा लटकाए जिंदगी को ढोने के लिए मजबूर कर दी जाती.

शकुंतला कुरसी पर बैठे हुए बहुत देर तक मन ही मन काफीकुछ सोचती रही. उस के सामने ड्रैसिंग टेबल पर लगा हुआ आईना था, जिस पर उस ने पिछले दिन ही अपनी बिंदी उतार कर चिपकाई थी, जो उस की ओर झांक रही थी.

शकुंतला रूमाल से आईने को साफ करने लगी. वह रूमाल को आईने पर तब तक रगड़ती रही, जब तक कि वह बिंदी पूरी तरह निकल नहीं गई.

अगले दिन शकुंतला आत्मविश्वास के साथ रिंग सैरेमनी फंक्शन में नीता के बताए पते पर पहुंच गई. समारोह किसी होटल में था. नीता काफी खुश नजर आ रही थी.

शकुंतला को देखते ही नीता दौड़ कर उस के गले मिली. शकुंतला का हाथ पकड़ कर वह उसे उमेश के पास ले गई और उस का परिचय उमेश से कराते हुए बोली, ‘‘उमेश, यह है मेरी सहेली शकुंतला. यह मुंबई की एक बड़ी कंपनी में प्रोडक्ट मैनेजर है.’’

शकुंतला उमेश से ऐसे मिली, जैसे उसे पहली बार देखा हो, जबकि शकुंतला को देख कर उमेश हक्काबक्का रह गया.

शकुंतला उन दोनों के लिए 2 अलगअलग गिफ्ट ले आई थी. वह गिफ्ट दे कर वहां से होस्टल के लिए निकल गई.

नीता के होस्टल पहुंचने से पहले ही शकुंतला होस्टल छोड़ कर कहीं दूसरी जगह शिफ्ट हो गई थी. दूसरी तरफ समारोह खत्म होने के बाद जब उमेश अपने कमरे में अकेला था, तब उस ने शकुंतला का दिया हुआ गिफ्ट खोला. एक बौक्स के अंदर मंगलसूत्र और झुमके के साथ ही उस की लिखी एक चिट्ठी भी थी.

चिट्ठी में शकुंतला ने लिखा था, ‘यह मंगलसूत्र मेरे लिए जंजीर से ज्यादा कुछ नहीं. मैं इस के बो झ से खुद को आजाद कर रही हूं… लेकिन हां, तुम ने अब तक मेरे साथ जोकुछ किया, वह सब नीता के साथ मत करना. वह तुम से बहुत प्यार करती है. कम से कम उस की इस बात की ही इज्जत रखना.

‘मैं ने उसे तुम्हारी कोई भी हकीकत अभी तक नहीं बताई है, नहीं तो प्यार से उस का भरोसा उठ जाता. जिस दिन इस दुनिया में लोगों का प्यार से भरोसा उठ गया, उस दिन यह दुनिया जीने लायक नहीं रहेगी और यह मैं बिलकुल नहीं चाहती…

‘जो धोखा तुम ने मु झे दिया है, वह नीता को कभी मत देना. एक शादीशुदा औरत के लिए उस के पति से मिलने वाली इज्जत और प्यार ही सब से बड़ा सिंगार होता है, उस का सब से कीमती जेवर होता है, जिस की कमी को दुनिया का महंगा से महंगा जेवर भी पूरा नहीं कर सकता.

‘मंगलसूत्र के साथ मैं झुमके भी तुम्हें लौटा रही हूं, जो तुम ने उस दिन अपने उस बड़े से झूठ पर परदा डालने और मेरा विश्वास जीतने के लिए दिए थे. तुम्हें तलाक का नोटिस मैं बहुत जल्दी ही भेज दूंगी.’

शकुंतला की लिखी चिट्ठी को उमेश बारबार पढ़ता रहा. अपने दिल के किसी कोने में आज पहली बार उसे दर्द का एहसास हुआ.

लेखिका – गायत्री ठाकुर

Hindi Story : हैसियत

Hindi Story : ‘‘सौरभ, हम कब तक इस तरह मिलतेजुलते रहेंगे…’’ चंपा से आखिरकार रहा न गया, ‘‘अब हमें जल्दी ही शादी कर लेनी चाहिए.’’

‘‘शादी भी कर लेंगे चंपा,’’ सौरभ बोला, ‘‘पहले हम बीए कर लें.’’

‘‘तुम नहीं जानते हो सौरभ, मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं…’’

‘‘क्या कह रही हो तुम?’’ हैरानी से सौरभ बोला, ‘‘चलो, अस्पताल जा कर बच्चा गिरा देते हैं.’’

‘‘नहीं सौरभ, यह हमारे प्यार की निशानी है…’’ चंपा बोली, ‘‘मैं बच्चा नहीं गिराना चाहती हूं.’’

‘‘मगर, मैं तुम से शादी नहीं कर सकता,’’ सौरभ ने कहा.

‘‘क्यों नहीं कर सकते? क्या परेशानी हैं तुम्हें?’’ चंपा जरा तेज आवाज में सौरभ से बोली.

‘‘तुम हमारी हैसियत के बराबर नहीं हो,’’ सौरभ बोला.

‘‘जब मैं तुम्हारी हैसियत के बराबर नहीं थी, तब तुम ने क्यों प्यार किया मुझ से…’’ नाराज हो कर चंपा बोली, ‘‘अब तुम्हें शादी तो करनी ही पड़ेगी मुझ से.’’

‘‘शादी करूं और तुम से… किसी और का पाप मुझ पर क्यों डाल रही हो?’’ जब सौरभ ने यह कहा, तब चंपा का गुस्सा भीतर ही भीतर बढ़ गया. वह गुस्से से बोली, ‘‘क्या कहा तुम ने कि शादी नहीं करोगे? मतलब, तुम्हारा प्यार केवल मेरे जिस्म तक ही था.’’

‘‘हां, यही समझ लो. अब कभी मिलने की कोशिश मत करना,’’ चंपा से इतना कह कर सौरभ गाड़ी में बैठ कर नौ दो ग्यारह हो गया.

चंपा ठगी सी रह गई. जिस सौरभ पर चंपा ने पूरा विश्वास किया, आगे रह कर उस ने प्रेम के अंकुर बोए, उस ने ही उसे धोखा दे दिया.

चंपा और सौरभ एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों एक ही गांव में रहते थे.

सौरभ गांव के एक अमीर किसान अमृतलाल का बेटा था. उस की गांव में ढेर सारी खेती थी. खेती के अलावा अमृतलाल के और भी धंधे थे, जिन्हें वह गुपचुप तरीके से करता था, इसलिए उस के पास काली दौलत भी बहुत थी.

अमृतलाल राजनीति में भी दखल देता था, इसलिए भोपाल तक अमृतलाल की पहचान थी. थाने को भी उस ने अपनी काली दौलत से खरीद लिया था. गांव में उस का दबदबा था. सब लोग उस से डरते भी थे, इसलिए कभी थाने में शिकायत भी नहीं करते थे. जिस थाने में शिकायत की गई, वह उसी थाने को खरीद लेता था.

अमृतलाल का सब से छोटा बेटा सौरभ कालेज में पढ़ रहा था और उस के लिए शहर में ही घर बना दिया था.

चंपा एक गरीब किसान चंपालाल की बेटी थी. उस के पिता के पास थोड़ी सी जमीन थी, उस से उतनी ही पैदावार होती थी, जिस से पेट भर सके, इसलिए कभीकभी वह अमृतलाल के यहां मजदूरी भी करता था.

जब चंपा ने हायर सैकेंडरी का इम्तिहान अच्छे नंबरों से पास किया, तब उस की इच्छी थी कि वह शहर जा कर कालेज में पढ़े. पर उस की मां दुर्गा देवी ने साफसाफ कह दिया था कि कालेज जा कर लड़की को बिगाड़ना नहीं है.

मां का विरोध देख कर पिता ने भी चंपा को कालेज जाने से मना कर दिया था. मगर, उस की जिद ने पिता को पिघला दिया.

जब चंपा का कालेज में एडमिशन हो गया, तब सुबह वह गांव से बस में बैठ कर शहर चली जाती, 2-4 पीरियड पढ़ कर गांव लौट आती.

एक बार चंपा कालेज के दालान में सौरभ से टकरा गई. दोनों की आंखें मिलीं. आंखों ही आंखों में इशारा
हो गया.

वे दोनों ही जानते थे कि एक ही गांव के रहने वाले हैं. दोनों में कब प्यार हो गया, उन्हें पता ही नहीं चला.

सौरभ चंपा की हर मांग पूरी करने लगा. चंपा भी उस के प्यार में पागल सी हो गई. कभीकभी वह कालेज से सौरभ के बंगले में पहुंच जाती. उस की बांहों में समा जाती. तब सौरभ कहता, ‘‘चंपा, मैं तुझ से ही शादी करूंगा.’’

‘‘सच कह रहे हो न सौरभ?’’ चंपा पूछती, ‘‘तुम मुझे धोखा दे कर जाओगे तो नहीं?’’

‘‘नहीं, कभी नहीं. यह मेरा वादा है, पक्का वादा है,’’ जब सौरभ बोला, तब जोश में आ कर चंपा ने शहर वाले बंगले में उसे अपना जिस्म सौंप दिया. इसी का नतीजा आज यह हुआ है कि वह उस के बच्चे की मां बनने वाली है.

भावुकता भरा कदम चंपा को इतना महंगा पड़ जाएगा, उसे पता नहीं था. आज सौरभ ने शादी करने से मना कर दिया, तब उस को लगा कि वह न घर की रही, न घाट की.

जब इस बात का पता मां और पिता को चलेगा, तब उन के दिल पर क्या बीतेगी. अब वह अपनी मां को कैसे बताए कि उस के पेट में सौरभ का बच्चा पल रहा है. वह प्यार में धोखा खा चुकी है. गांव वाले और रिश्तेदारों को पता चलेगा कि वह कुंआरी मां बन रही है, तब उस के मांबाप की कितनी किरकिरी होगी. क्या वह अपने बच्चे को गिरा दे? गिरा देगी… तब भी सब को यह पता चल ही जाएगा.

इस वजह से आज चंपा दोराहे पर खड़ी थी. आखिर दाई से वह कब तक पेट छिपाए रखेगी… शादी करने का वादा करने के बाद भी सौरभ ने मना कर दिया. प्यार में उस ने धोखा खाया.

कालेज से वापस अपने घर आने के बाद चंपा का मन बेचैन रहा. क्या वह मां को सचसच बता दे? आज नहीं तो कल मां को तो मालूम पड़ ही जाएगा. इस मामले में मांएं तो उड़ती चिडि़या भांप लेती हैं.

‘‘कालेज से आ गई बेटी… खाना खाया?’’ जब मां दुर्गा देवी ने कहा, तब चंपा बोली, ‘‘खाने की इच्छा नहीं है.’’

‘‘तो क्या शहर से खा कर आई है?’’ मां ने जब यह सवाल पूछा, तब चंपा बोली, ‘‘नहीं मां, मुझे तुम से एक बात कहनी है.’’

‘‘क्या बात है?’’

‘‘पहले मुझे यह वचन दो कि आप नाराज नहीं होंगी मुझ से,’’ अभी चंपा यह बात कह ही रही थी कि पिता चंपालाल भी आ गया.

तब दुर्गा देवी ने पूछा, ‘‘बोल, क्या कहना चाहती है?’’

‘‘मां, मेरी बात सुन कर तुम बहुत नाराज हो जाओगी, इसलिए कहने में डर रही हूं,’’ जब चंपा ने यह बात कही, तब चंपालाल बोला, ‘‘कह दे, बेझिझक कह दे. तेरी मां नाराज नहीं होगी. क्या कहना चाहती है?’’

‘‘बापू, मुझ से भारी भूल हो गई.’’

‘‘कुछ बताएगी भी, वरना हमें कैसे पता चलेगा… कह दे बेटी, हम नाराज न होंगे,’’ चंपालाल ने कहा.

‘‘बापू, मैं अमृतलाल के बेटे सौरभ से प्यार करती हूं. वह भी मुझे बहुत प्यार करता है. उस ने मुझ से शादी करने का वादा किया और मैं ने अपना जिस्म उसे सौंप दिया. अब उस का बच्चा मेरे पेट में पल रहा है,’’ अभी चंपा यह बात कह रही थी कि मां दुर्गा देवी बीच में ही गुस्से से उबल पड़ी, ‘‘क्या कहा कि तू पेट से है?… तू ने तो हमारी इज्जत को ही उछाल दिया. आग लगे तेरी जवानी को. मैं ने पहले ही कहा था कि इस करमजली को शहर में पढ़ने मत भेजो. उसी का नतीजा है कि इस के…’’

‘‘चुप रहो दुर्गा, कुछ भी बक देती हो,’’ नाराज हो कर चंपालाल बीच में ही बात काट कर बोला.

‘‘कैसे चुप रहूं…’’ दुर्गा देवी गुस्से से बोली, ‘‘इस ने हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी और आप कह रहे हो कि चुप हो जाऊं? मैं तो शहर में कालेज भेजने के खिलाफ थी, मगर आप ने कहां चलने दी मेरी.

‘‘आप की लाड़ली बेटी है न और यह गुल खिला दिया. अब कौन करेगा इस से शादी. इसे सब बदचलन कह कर नकार देंगे.’’

‘‘थोड़ी देर के लिए चुप भी हो जाओ…’’ फिर समझाते हुए चंपालाल बोला, ‘‘अभी मैं अमृतलाल के पास जाता हूं और उस से चंपा के रिश्ते की बात करता हूं.’’

‘‘बापू, वहां जाने से कोई फायदा नहीं. सौरभ ने मुझ से शादी करने से यह कह कर मना कर दिया कि हम गरीबों की हैसियत उन के बराबर नहीं है,’’ जब चंपा ने यह बात कही, तब चंपालाल बोला, ‘‘अरे, हैसियत बता कर वह बच नहीं सकता है. थाने में रपट…’’

‘‘थाने में रपट लिखवाने से कुछ न होगा. वह थाने को भी खरीद लेगा. उस के पास बहुत पैसा है…’’ बीच में ही बात काट कर दुर्गा देवी बोली, ‘‘माना कि थानेदार रपट लिख भी लेगा, मुकदमा चलेगा, तब कहां से लाओगे पैसे? पैसे हैं तुम्हारे पास क्या…’’

‘‘तुम ठीक कहती हो दुर्गा,’’ नरम पड़ते हुए चंपालाल बोला, ‘‘भावुकता में मुझे भी गुस्सा आ गया था… मैं मालिक को जा कर समझा तो सकता हूं.’’

इतना कह कर चंपालाल अमृतलाल की हवेली की ओर बढ़ गया. दुर्गा देवी अब भी चंपा को गालियां दे कर अपनी भड़ास निकाल रही थी.

जब चंपालाल अमृतलाल की हवेली में गया, तब वे अपनी बैठक में ही मिल गए, जो अपने कारिंदों के बीच घिरे हुए थे.

चंपालाल भी उन कारिंदों के बीच जा कर बैठ गया. उसे देख कर कारिंदे उठ कर बाहर चले गए. अब बैठक में दोनों ही अकेले रह गए. तब अमृतलाल बोले, ‘‘आओ चंपालाल, यहां किसलिए आए हो?

‘‘मालिक, मैं बहुत बुरा फंस गया हूं…’’ हाथ जोड़ते हुए चंपालाल बोला, ‘‘आप ही इस समस्या का हल निकाल सकते हैं.’’

‘‘पहले अपनी समस्या बताओ, मेरे हल करने जैसी होगी, तो मैं जरूर करूंगा,’’ अमृतलाल बोले.

‘‘मालिक, आप का बेटा सौरभ और मेरी बेटी चंपा शहर के एक ही कालेज में पढ़ते हैं. उन दोनों में इश्क हो गया. और…’’ बीच के शब्द चंपालाल के गले में ही अटक गए.

‘‘बोलो, रुक क्यों गए चंपालाल?’’ उसे रुकते देख कर अमृतलाल बोले ‘‘मालिक, चंपा के पेट में जो बच्चा पल रहा है, वह छोटे मालिक सौरभ का है,’’ बहुत मुश्किल से चंपालाल यह कह पाया.

‘‘क्या कहा…?’’ आगबबूला हो कर अमृतलाल बोले.

‘‘हां मालिक, मैं यही कहने आया हूं कि चंपा को अपनी बहू बना लो,’’ हाथ जोड़ कर चंपालाल बोला.

‘‘बहू बना लूं. अरे, तू ने कैसे कह दिया कि बहू बना लूं. तेरी लड़की गांव में न जाने किनकिन लड़कों से पैसों के लिए संबंध बनाती है और मेरे बेटे को बदनाम करती है. अब तेरी बेटी पेट से हो गई, तब उस का पाप मेरे होनहार बेटे पर डाल रहा है.

‘‘बहू बना लूं तेरी बेटी को. अपनी हैसियत देखी है. पहले अपनी आवारा लड़की को संभाल… फिर तेरे पास क्या सुबूत है कि उस के पेट में सौरभ का ही बच्चा है?’’

‘‘यह तो डाक्टर की रिपोर्ट बताएगी मालिक?’’ चंपालाल ने जब तेज आवाज में यह बात कही, तब अमृतलाल गुस्से से बोले, ‘‘मतलब, तू मुझे अदालत ले जाएगा.’’

‘‘हां मालिक, जरूरत पड़ी तो ले जाऊंगा,’’ इस समय चंपालाल में न जाने कहां से ताकत आ गई. वह पलभर के लिए रुक कर फिर बोला, ‘‘उस औरत का नाम तो मालूम नहीं है मालिक, मगर अपने नाजायज बच्चे को पिता का नाम देने के लिए वह कोर्ट गई थी. कई साल तक कोर्ट में लड़ी और आखिर में जीत उस की हुई. जानते हो, उस के पिता कौन थे?’’

‘‘मैं नहीं जानता. कौन थे वे?’’ अमृतलाल गुस्से से बोले.

‘‘वे थे भूतपूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत तिवारी.’’

‘‘अच्छा तो, तू मुझे धमकी दे रहा है. नालायक कहीं का,’’ गाली देते हुए अमृतलाल बोले, फिर गुस्से से उठ कर उस की पीठ पर एक लात जमा दी, फिर उसी गुस्से से बोले, ‘‘चला जा यहां से इसी समय. अब अपना मुंह कभी मत दिखाना हरामखोर.’’

चंपालाल ने ज्यादा बहस करना उचित नहीं समझा. वह अपनी कमर को सहलाते हुए हवेली से बाहर निकल गया.

चंपालाल ने अमृतलाल से पंगा जरूर ले लिया, मगर वह अब उस का बदला जरूर लेगा. तब उस ने मन ही मन सोचा कि मालिक ने उस से पंगा ले कर अच्छा नहीं किया. इस का नतीजा भुगतना पड़ेगा. जिसजिस ने भी अमृतलाल से पंगा लिया, उस को ठिकाने लगा दिया गया. देवीलाल, सुखराम, करण सिंह इस के उदाहरण हैं.

मगर अब वह कैसे साबित करे कि चंपा के पेट में जो बच्चा पल रहा है, वह सौरभ का है. मगर आज वैज्ञानिक ने इतनी तरक्की कर ली है कि सब पता चल जाता है. तब क्या वह सौरभ के खिलाफ रपट लिखा दे. पुलिस उस से सब पूछ लेगी. मगर कोर्ट में जाने के लिए पैसे चाहिए और पैसा कहां है उस के पास. इन्हीं विचारों ने चंपालाल को परेशान कर रखा था.

जब चंपालाल घर पहुंचा, तब दुर्गा देवी उसी का इंतजार कर रही थी. वह बोली, ‘‘क्या कहा मालिक ने?’’

‘‘वे तो यह मानने के लिए भी तैयार नहीं हैं कि चंपा के पेट में उन के बेटे का बच्चा पल रहा है. उन्होंने अपनी हैसियत बता दी,’’ निराश भरी आवाज में जब चंपालाल ने जवाब दिया, तब दुर्गा देवी बोली, ‘‘अब क्या होगा? कौन करेगा इस से शादी?’’

‘‘देखो दुर्गा, हम कोर्ट में जा कर इंसाफ मांगेंगे.’’

‘‘मगर, कोर्ट में जाने के लिए पैसा चाहिए. कहां है हमारे पास इतना पैसा…’’ जब दुर्गा देवी ने यह सवाल पूछा, तब कुछ सोच कर चंपालाल बोला, ‘‘इस के सिवा हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है. चाहे मकान या खेत भी बेचना पड़े…’’

यह बात आईगई हो गई. कुछ दिन तक वे दोनों सोचते रहे कि थाने में रपट लिखाएं या नहीं, मगर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए.

इसी बीच एक घटना हो गई. एक रात चंपा को किसी ने अगवा कर लिया. किस ने किया, यह पता नहीं चला.

सुबह होते ही जब चंपा बिस्तर पर नहीं मिली, तब घर में कुहराम मच गया. गांव वाले उसे आसपास टोली बना कर सब जगह ढूंढ़ने निकल गए. 3-4 घंटे ढूंढ़ने के बाद भी चंपा का कहीं पता नहीं चला. तब थाने में रपट लिखा दी गई. पुलिस भी हरकत में आई. उस ने छानबीन की, मगर चंपा का कहीं पता नहीं चला.
2 दिन बाद चंपा की लाश अमृतलाल के कुएं में तैरती पाई गई.

पुलिस ने चंपा की लाश कुएं से बाहर निकाली. उस का पोस्टमार्टम किया गया. डाक्टर ने पोस्टमार्टम की रपट में बताया कि चंपा ने खुदकुशी नहीं की, बल्कि उसे मार कर कुएं में फेंक दिया गया.

तब पुलिस को अमृतलाल पर शक हुआ, मगर वह सुबूत नहीं जुटा पाई. पोस्टमार्टम में यह रिपोर्ट भी थी कि चंपा 2 महीने के पेट से थी. तब गांव वाले खुल कर नहीं, दबी आवाज में यह चर्चा कर रहे थे कि हो न हो, चंपा का खून अमृतलाल के कारिंदों ने ही किया है. मगर, डर के मारे कोई खुल कर सामने नहीं आना चाहता था.

पुलिस जब चंपालाल के घर पर एक बार फिर तलाश करने आई, तब उन्हें वहां चंपा की दस्तखत की गई एक चिट्ठी पुलिस के हाथ लगी. उस का मजमून इस तरह था :

‘मैं जनता कालेज में पढ़ती हूं. बस से रोजाना अपने गांव से अपडाउन करती हूं. कालेज में इसी गांव के अमृतलाल का बेटा सौरभ पढ़ता है. उस ने लालच दे कर पहले मुझे अपने प्रेमजाल में फंसाया. मुझ से शादी करने का वादा किया. तब मैं ने अपना जिस्म उसे सौंप दिया. इस का नतीजा यह हुआ कि मेरे पेट में उस का बच्चा पलने लगा.

‘मैं ने सबकुछ सच बता कर उस से शादी करने की बात कही. तब उस ने मेरे गरीब पिता की हैसियत देख कर मुझ से शादी करने से मना कर दिया.

‘मैं खूब रोईगिड़गिड़ाई, मगर उस पर कोई असर नहीं पड़ा. तब मैं ने अपने पेट से होने की बात अपने गरीब मांबाप को बताई. मेरे गरीब पिता अमृतलाल के पास मुझे अपनी बहू बनाने की बात कहने गए. तब उन्हें लात मार कर भगा दिया गया. तब से मैं भीतर ही भीतर घबरा रही थी कि मेरे गरीब पिता ने अमृतलाल से पंगा लिया.

‘कहीं वह मेरा या मेरे पिता का खून न करवा दे, इस डर से मैं परेशान सी रही. अगर मेरा इन लोगों ने खून कर दिया, तब पिता और मां को कानून में मत घसीटना. मैं बहुत घबराई हुई हूं कि कहीं ये लोग मेरी हत्या न कर दें.’

वह चिट्ठी पढ़ कर पुलिस हरकत में आ गई. शहर जा कर सब से पहले सौरभ को गिरफ्तार किया. इस तरह चिट्ठी ने अपनी हैसियत बता दी.

Hindi Story : बदलाव के कदम

Hindi Story : लक्ष्मण अपनी अंधेरी कोठरी का बल्ब जला कर चारपाई पर लेट गया और कुछ सोचने लगा. कल ही तो लक्ष्मण की शादी है. अब तक कोई भी ठोस इंतजाम नहीं हो सका है. तिलक के दिन भी लक्ष्मण को ही अपने घर के सारे इंतजाम करने पड़े थे. बैंक में जमा रुपए निकाल कर वह अपनी शादी का इंतजाम कर रहा था. उस की इच्छा थी कि कोर्ट में ही शादी कर ले. आलतूफालतू खर्च तो बच जाएंगे, लेकिन लड़की के घर वालों की इच्छा की अनदेखी वह नहीं कर सका. लड़की वाले अपनी तरफ से उस की खातिरदारी में अपनी इच्छा से सबकुछ खर्च कर रहे हैं, तो क्या उस का अपना कोई फर्ज नहीं बनता?

लक्ष्मण के बाबूजी लालधारी इस शादी से खुश नहीं थे. उन का स्वभाव शुरू से ही खराब रहा है, ऐसा नहीं
था. हां, शादी के मुद्दे पर मनमुटाव हुआ है.

लालधारी को इस बात का दुख था कि उन का बेटा लक्ष्मण अपनी बिरादरी की इज्जत का खयाल न कर दूसरी जाति की, वह भी अछूत जाति की लड़की से ब्याह कर रहा है.

प्यारव्यार तो ठीक था, लेकिन शादीब्याह की बात से तो पूरी बिरादरी के लोग लालधारी पर थूथू कर रहे थे. इसे सही और गलत के तराजू पर तौल कर लालधारी लक्ष्मण का पक्ष लिए होते, तब लक्ष्मण इतना दुखी नहीं होता. उसे दुख तो इस बात पर हो रहा था कि वे अपने बेटे के बजाय बिरादरी का ही समर्थन कर रहे थे.

लालधारी को ज्यादा दुख इस बात का था कि इस शादी में दहेज की मोटी रकम नहीं मिल रही थी. उन्होंने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था कि जिस बेटे को एमए की डिगरी दिलाने में उन्होंने एड़ीचोटी एक कर दी, उस के ब्याह में उन्हें फूटी कौड़ी भी हाथ नहीं लगेगी. हताश हो कर वे अपने हाथ मलते रह गए थे. बेटा नासमझ तो था नहीं, जो उसे डांटनेफटकारने के बाद लड़की वाले से मोटी रकम की मांग कर बैठते. सच बात तो यह थी कि लक्ष्मण के आदर्शवादी खयालों से वे नाराज हुए बैठे थे.

एक बार लालधारी ने लक्ष्मण से कहा भी था, ‘‘बेटा, गैरजाति में शादी कर तू ने बिरादरी में मेरी नाक तो कटवा ही दी. अब एक पैसा भी दहेज न लेने की जिद कर के क्यों हाथ आ रहे पैसे को तू ठुकरा रहा है? कुछ नहीं, तो जमीनजायदाद ही लिखवा ले…’’

तब लक्ष्मण एकदम गंभीर हो गया था और फिर तैश में आ कर बोल उठा था, ‘‘बाबूजी, बिरादरी से हमें कोई लेनादेना नहीं है. मैं जाति नहीं, इनसान की इनसानियत की कद्र करता हूं. मेरे ऊपर आप का बहुत अहसान और कर्ज है, लेकिन वह अहसान और कर्ज इतना छोटा नहीं है कि उसे पैसे से चुका दूं.

‘‘आप अपने लक्ष्मण से इज्जत जरूर पा सकेंगे. लेकिन बेटे की शादी के एवज में दानदहेज नहीं. मैं पैसे को ठुकरा नहीं रहा हूं, अपने घर में इज्जत के साथ पैसे को ला रहा हूं. क्या अच्छी बहू किसी पैसे से कम होती है?’’

लक्ष्मण की बातों के चलते पूरी बिरादरी वाले यह सोचसोच कर डर रहे थे कि कहीं यह हवा उन के घर के भीतर भी न घुस जाए, उन का बेटा भी बगावत पर न उतर जाए, गैरजाति की लड़की से प्यार न कर बैठे और फिर लाखों रुपए के दानदहेज से अछूते न रह जाएं.

उसी समय लालधारी से मिलने सरपू और अवधेश आए थे. बातचीत के दौरान लालधारी ने उन से कहा था, ‘‘मैं ने भी तय कर लिया है कि जिस तरह लक्ष्मण की शादी में मुझे एक भी पैसा नहीं मिला है, उसी तरह मैं भी उस की शादी में एक भी पैसा खर्च नहीं करूंगा. देखता हूं, बच्चों को कौन उधार देता है और वह कैसे कर लेता है ब्याह… और हां, सरयू और अवधेश, तुम लोग भी एक पैसा मत देना लक्ष्मण को.’’

‘‘मैं क्यों पैसे दूंगा? कल लक्ष्मण 500 रुपए उधार मांगने के लिए मेरे पास आया था, लेकिन मैं ने साफसाफ कह दिया कि अपने बाबूजी से जा कर मांगने में लाज लगती है क्या?

‘‘बस, इतना सुनना था कि उल्लू जैसा मुंह बना कर वह चला गया. अरे भाई, अब तो उस का मुंह भी बंद हो गया है. उस की शादी न रुक गई, तो फिर देखना.’’

लक्ष्मण का लंगोटिया दोस्त सुरेश मन ही मन मना रहा था कि मेरे दोस्त की यह परेशानी दूर हो जाती, ताकि वह अपनी बात पर अटल रहते हुए अपनी मंजिल को पा सके.

सुरेश को यकीन नहीं हो पा रहा था कि इतने विरोधों और परेशानियों के बावजूद लक्ष्मण और किरण की शादी हो सकेगी. लक्ष्मण और किरण का आकर्षण अनजाने में हुआ था. लक्ष्मण ट्यूशन पढ़ाने हर शाम जाया करता था. पढ़ातेपढ़ाते वह खुद प्रेम का पाठ पढ़ने लगा. दोनों के विचार जब आपसी लगाव का कारण बन गए, तब वे एकदूसरे को पसंद करने लगे.

यह जोड़ी किरण की मां को भी बहुत भली लगी. किरण के बाबूजी तो 2 साल पहले ही इस दुनिया से जा चुके थे, इसलिए सारे फैसले मां को ही लेने थे. वे इस से बढि़या लड़का कहां से ढूंढ़तीं? पढ़ालिखा और समझदार लड़का बैठेबैठे मिला है. फिर जातपांत में क्या रखा है? जमाना बदल रहा है, तो विचारों में भी बदलाव लाना ही चाहिए.

किरण की मां को जब यह लगा कि किरण भी लक्ष्मण से सचमुच प्रेम करती है, तब उन्होंने बातबात में ही बात चला दी थी, ‘‘बेटा, मेरी बेटी तुम्हारी बहुत बड़ाई किया करती है. अगर तुम्हें मेरी बेटी पसंद हो, तो मैं उस की शादी तुम से करने के लिए तैयार हूं.’’

‘‘मांजी, मैं खुद ऐसी ही बात आप के सामने कहने वाला था. जल्दी ही किरण से शादी कर के आप को भरोसा दिला दूंगा कि मेरा प्यार झूठा नहीं है.’’

‘‘लेकिन, अगर तुम्हारे बाबूजी इस शादी के खिलाफ हुए, तब तुम क्या करोगे बेटा?’’ अपना शक सामने रखते हुए किरण की मां बोलीं.

‘‘उन के खिलाफ भी कदम बढ़ाने की मेरी पूरी कोशिश रहेगी.’’

‘‘लेकिन, दहेज के रूप में मैं…’’

‘‘दहेज का नाम न लीजिए मांजी. मुझे दहेज से सख्त नफरत है. न जाने कितनी मासूम जानें ली हैं इस दहेज के नाग ने.’’

किरण की मां लक्ष्मण से बहुत खुश हो चुकी थीं. उन्होंने सोचा, ‘एमए पास है ही, 4-5 ट्यूशन कर लेता है. अभी नौकरी नहीं करता है तो क्या? मेहनती लड़का है, कुछ न कुछ तो करेगा ही. इसलिए जल्दी ही उस की नौकरी भी लग जाएगी.’

लक्ष्मण का दोस्त सुरेश भी किरण के घर पर आनेजाने लगा था. किरण से बातचीत भी किया करता था. उसे लगा कि सचमुच, लक्ष्मण के लिए यह खुशी की बात है कि इतनी विचारवान, पढ़ीलिखी और सुशील लड़की के दिल पर उस ने अधिकार प्राप्त कर लिया है.

लक्ष्मण अब तक इसी सोच में था कि आखिर वह बिना दहेज लिए कहां से इतने पैसों का इंतजाम करे कि किरण के घर वालों की इज्जत कर सके और अपने दोस्तों का खयाल भी रख सके.

अचानक उसे उपाय सूझा. उस ने सोचा, आखिर इतने दोस्त कब साथ देंगे? अबू, रवींद्र, श्यामल, देवनाथ और सुरेश. सभी अपने ही तो हैं. क्यों न उन्हीं लोगों से कुछ रुपए उधार ले लूं?

उस ने उदास मन में भी आस का दीप जलाए रखा था. उसे पूरा यकीन था कि उस के दोस्त इस मौके पर उस का साथ जरूर देंगे.

आज सुरेश को लग रहा था कि लक्ष्मण जोकुछ कर रहा है, अपनी नैतिकता के कारण. इसी के आगे लक्ष्मण ने अपने बाप से भी मुंह मोड़ लिया है. उस की जाति के लोग उस पर थूथू कर रहे हैं, तिरछी नजर से देख रहे हैं. फिर भी लक्ष्मण के चेहरे पर खुशी के बादल ही मंडरा रहे हैं. उस के दिल को इस बात पर तसल्ली मिलती है कि दहेज न ले कर और अछूत कही जाने वाली जाति की लड़की से शादी करने का फैसला ले कर वह अपने सामाजिक फर्ज को निभा रहा है. आखिर गलत परंपरा को तोड़ कर नई परंपरा को अपनाने में बुराई ही क्या है?

आखिर इस नई परंपरा को अपनाने में मदद करने के लिए लक्ष्मण को मुंह खोलना ही पड़ा. मुंह खोलने भर की देर थी, उस के दोस्तों ने अपनीअपनी पहुंच के मुताबिक दिल खोल कर लक्ष्मण को मदद दी.

इसी का यह फल था कि लक्ष्मण की शादी धूमधाम से हो रही थी. बेकार खर्च नहीं किए जाने के बावजूद बरात में कोई खास कमी नजर नहीं आ रही थी. झाड़बत्ती के खर्च को बचाने के खयाल से शाम के उजाले में ही बरात दरवाजे पर लगा दी गई थी. बरात में अपने ही परिवार के लोग नजर नहीं आ रहे थे. हां, दोस्तों की भीड़ जरूर बरात की शोभा बढ़ा रही थी.

शादी के समय मंडवे में जब लक्ष्मण के पिताजी की उपस्थिति की जरूरत पड़ी, तब समस्या आ पड़ी. उस के बाबूजी तो गुस्से के चलते वहां पर आए ही नहीं थे.

इसी बीच लक्ष्मण के दोस्त देवनाथ ने मंडवे में सामने आ कर लक्ष्मण से कहा, ‘‘इस में परेशान होने की क्या बात है लक्ष्मण? जिस लड़के का बाप या भाई जिंदा नहीं रहता, क्या उस की शादी रुक जाती है? मैं बन जाता हूं तुम्हारा बड़ा भाई.’’

यह सुन कर लक्ष्मण गदगद हो उठा. लड़की वालों का भी यही हाल था. सभी सोच रहे थे, ‘‘लड़की के पिता न होने के कारण उपस्थित नहीं हैं और लक्ष्मण के बाबूजी जिंदा हो कर भी अनुपस्थित हैं. क्या फर्क रह जाता है ऐसे मौके पर… जिंदगी और मौत में… अपने और बेगाने में?’’

शादी आखिर हो गई. दूसरे दिन किरण ब्याहता बन कर दुलहन के रूप में लक्ष्मण के घर में आई.

लक्ष्मण की मां के अनुरोध और जिद पर उस के बाप ने कोई विरोध तो नहीं किया, लेकिन मन ही मन अनबन बनी रही.

उस घर में किरण जिंदा दुलहन नहीं, बल्कि निर्जीव गुडि़या बन कर रह गई. किसी ने पूछा नहीं. किसी का भी प्यार उसे न मिला. उस घर में सारे लोगों के होते हुए भी उस के लिए सिर्फ लक्ष्मण ही रह गया था.

कुछ दिनों में ही लक्ष्मण को लगा कि यह घर अपना हो कर भी अपना नहीं है, यहां के लोग अपने हो कर भी बेगाने हैं. इस तरह अपने लोगों के बीच कटकट कर रहने से तो बेहतर है, खुले आकाश के नीचे रह कर जीना.

उस ने किसी से कोई शिकायत नहीं की. वह जानता था कि मांगने से दुश्मनी मिल सकती है, प्यार नहीं मिल सकता.

और फिर एक दिन अपने मन से उस ने उसी शहर में किराए पर 2 कमरे का एक मकान ले लिया. उस में वह किरण के साथ रहने लगा.

किराए के मकान में घुसते ही उसे असली घर जैसा सुख मिला. वहां के पड़ोसी लोगों के साथ भी धीरेधीरे मेलजोल बढ़ गया. तब वे आपस में घुलमिल गए.

लेकिन अभी भी उसे किनारा नजदीक नजर नहीं आ रहा था. इतना संतोष तो था ही कि दूर है किनारा तो क्या, जिस मंजिल की तलाश थी, उस के बहुत करीब वे बढ़ते जा रहे थे.

कुछ ही दिनों के बाद उन दोनों के दिन फिर गए. लक्ष्मण को अदालत में सहायक के पद पर नौकरी मिल गई. अब वह सोचने लगा, माली तंगी से छुटकारा पा सकेगा और खुशीखुशी जिंदगी का सफर तय कर सकेगा.

लेखक – सिद्धेश्वर

Family Story : लक्खू का गृहप्रवेश

Family Story : लक्खू मोची अपनी दुकान पर हर रोज सुबह 7 बजे आ कर बैठ जाता था. वह टूटी हुई चप्पलों और फटे हुए जूतों की मरम्मत करता था. उस की दुकान खूब चलती थी. वह चाहे जूते की पौलिश करता या टूटी चप्पलें बनाता, उस की मेहनत साफ झलकती थी. उस के सधे हुए काम से लोग खुश हो जाते थे.

लक्खू मोची की बीवी अंजू बहुत खूबसूरत थी. उस का रंगरूप मोहक था. वह लक्खू की घरगृहस्थी बखूबी संभाल रही थी. वह 10वीं जमात तक पढ़ी थी, जबकि लक्खू मोची ने तो स्कूल का मुंह तक नहीं देखा था. वह सिरे से अनपढ़ था. लेकिन शादी के बाद अंजू ने उसे थोड़ाबहुत पढ़नालिखना सिखा दिया था. अब तो वह अखबार भी पढ़ लेता था.

एक दिन औफिस जाने के लिए एक मैडम घर से निकलीं, तो रास्ते में उन की चप्पल टूट गई. वे लक्खू की दुकान पर पहुंचीं और बोलीं, ‘‘लक्खू, जरा जल्दी से मेरी चप्पल की मरम्मत कर दो, नहीं तो दफ्तर के लिए लेट हो जाऊंगी.’’

लक्खू मोची ने उस मैडम की चप्पल की मरम्मत 5 मिनट में कर दी.

‘‘ये लो 10 रुपए लक्खू,’’ उन मैडम ने चप्पल मरम्मत के पैसे दे दिए.

तभी एक साहब आ कर बोले, ‘‘लक्खू, मेरे जूते पौलिश कर दो.’’

लक्खू ने फटाफट ब्रश चला कर जूते पौलिश कर दिए.

‘‘लक्खू, ये लो 25 रुपए,’’ इतना कह कर वे साहब चमकते चूते पहन कर चल दिए.

शाम हो गई थी. लक्खू अपने घर पहुंच गया था. वह चारपाई पर जा कर लेट गया. वह दिनभर की थकान इसी चारपाई पर मिटाता था.

थोड़ी देर में अंजू चाय बना कर ले आई और बोली, ‘‘ये लीजिए, चाय पी लीजिए.’’

लक्खू चारपाई से उठ कर बैठ गया. वह खुश हो कर चाय पीने लगा. अंजू भी उस के पास बैठ कर चाय पीने लगी.

‘‘मकान मालिक को हर महीने किराए की मोटी रकम देनी पड़ती है. क्यों न हम लोग अपना मकान बना लें. इस से किराए का पैसा भी बच जाएगा,’’ अंजू ने लक्खू से कहा.

‘‘हम लोगों के पास इतने रुपए हैं कि अपना मकान बना सकें. मैं रोजाना चप्पलजूते मरम्मत कर तकरीबन 500 रुपए ही कमा पाता हूं. वे सब भी दालरोटी में खर्च हो जाते हैं,’’ कहते हुए लक्खू के चेहरे पर मजबूरी उभर आई थी.

‘‘मैं आप को एक उपाय बताऊं…’’ अंजू ने कहा.

‘‘हांहां, बताओ,’’ लक्खू बोला.

‘‘आप दुकान में नई चप्पलें और नए जूते बेचिए. इस से हमारी आमदनी और बढ़ जाएगी,’’ अंजू ने कहा.

‘‘लेकिन मैं इतनी पूंजी कहां से लाऊंगा?’’ लक्खू ने पूछा.

‘‘आप होलसेल से माल ले आइए. जब बिक्री हो जाए, तो दुकानदार को पैसे दे दीजिएगा,’’ अंजू ने बताया.

‘‘हां, ऐसा हो तो सकता है. आज तो मैं ने मान लिया कि तुम्हारा दिमाग कंप्यूटर की तरह तेज काम करता है,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘दिमाग तो लगाना पड़ता है, नहीं तो हम लोग का घर कैसे बनेगा,’’ अंजू ने मुसकरा कर कहा.

रात के 10 बज रहे थे. लक्खू और अंजू बिस्तर पर लेटे हुए थे. थकान से लक्खू को नींद आ रही थी, लेकिन अंजू के दिल में प्यार की उमंगें उठ रही थीं.

‘‘सो गए क्या?’’ अंजू ने लक्खू से पूछा.

‘‘नहीं, पर जल्दी ही सो जाऊंगा,’’ लक्खू ने अलसाई आवाज में कहा.

‘‘ज्यादा नहीं, आप 15 मिनट तो मेरे साथ जागिए,’’ कह कर अंजू ने लक्खू को चूम लिया.

लक्खू अंजू का इशारा समझ गया और बोला, ‘‘अब तो मुझे जागना ही पड़ेगा,’’ कह कर वह अंजू को अपनी बांहों में भर कर चूमने लगा. उन दोनों पर प्यार का नशा छा गया.

वे एकदूसरे के जिस्म से खेलने लगे. कुछ देर तक प्यार का खेल चलता रहा, फिर थक कर वे दोनों गहरी नींद में सो गए.

अगले दिन लक्खू थोक विक्रेता से जूतेचप्पल ले कर अपनी दुकान में बेचने लगा. जल्दी ही उस की आमदनी बढ़ने लगी.

3 साल में ही लक्खू के पास इतने रुपए हो गए कि उस ने एक नया मकान बना लिया. अंजू और लक्खू का नए मकान का सपना पूरा हुआ था, लेकिन अभी गृहप्रवेश करना बाकी था.

एक सुबह लक्खू अपनी दुकान के लिए जा रहा था कि तभी अंजू ने कहा, ‘‘आप गृहप्रवेश की पूजा के
लिए पंडितजी से बात कीजिए. यह काम जल्द निबट जाए, तो घर का किराया बच जाएगा.’’

‘‘ठीक है, मैं आज ही पंडितजी से बात करता हूं,’’ कह कर लक्खू वहां से चला गया.

पंडितजी कालोनी में पूजा कराते थे. वे लक्खू को रास्ते में ही मिल गए.

‘‘प्रणाम पंडितजी,’’ कह कर लक्खू ने हाथ जोड़े.

‘‘कहो, कोई खास बात है क्या?’’ पंडितजी ने लक्खू से पूछा.

‘‘हां, मुझे गृहप्रवेश की पूजा करानी थी,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘अरे लक्खू मोची, तुम ने भी घर बना लिया… चप्पलजूते मरम्मत कर के इतनी तरक्की कर ली,’’ पंडितजी ने हैरान हो कर लक्खू से कहा.

‘‘हां, मेहनतमशक्कत से एकएक पाई जोड़ कर घर बनाया है,’’ लक्खू ने थोड़ी नाराजगी जताई…

‘‘पंडितजी, आप की क्या दानदक्षिणा होगी, बता दीजिए. मुझे 1-2 दिन में पूजा करा लेनी है,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘अभी एक यजमान के यहां पूजा कराने जा रहा हूं. कल बता दूंगा,’’ पंडितजी अकड़ कर चले गए.
लक्खू रात में जब घर लौटा, तब अंजू ने पूछा, ‘‘क्या पंडितजी से बात हुई थी? वे दक्षिणा क्या लेंगे?’’

‘‘हां, उन से बात हुई थी. वे दक्षिणा क्या लेंगे, कल बताने को बोले हैं,’’ लक्खू ने कहा.

शाम को पंडितजी घर पर बैठे थे. पंडिताइन भी पास ही बैठी थीं. पंडितजी ने पंडिताइन से लक्खू का जिक्र किया, ‘‘लक्खू मोची के घर का गृहप्रवेश है. मुझे पूजा कराने को बोल रहा था. मैं तो धर्मसंकट में पड़ गया हूं. तुम्हीं बताओ, उस के यहां मैं जाऊं या नहीं?’’

पंडिताइन कुछ सोच कर बोलीं, ‘‘लक्खू मोची है. आप ब्राह्मण हो कर उस के घर पूजा कराने जाएंगे. लोग क्या कहेंगे कि पंडितजी मोची के घर भी पूजा कराने जाते हैं.

‘‘उन के यहां के बरतन कितने गंदे होते हैं. मुझे तो देख कर ही घिन आती है. उन्हीं बरतनों में आप को दहीपूरी और मिठाई का भोग लगाना पड़ेगा.’’

‘‘कोई उपाय बताओ कि मुझे करना क्या होगा?’’ पंडितजी ने पूछा.

‘‘आप को यही करना है कि दूसरे यजमानों से जो दक्षिणा लेते हैं, लक्खू मोची से उस का दोगुना मांगिएगा. वह दक्षिणा का रेट सुन कर भाग जाएगा. इस तरह लक्खू मोची से आप का पिंड छूट जाएगा.’’

पंडितजी को यह उपाय भा गया. उन के होंठों पर कुटिल मुसकान खिल गई.

पंडितजी लक्खू की दुकान पर पहुंचे. उस समय लक्खू खाली बैठा था. पंडितजी को देख कर लक्खू ने हाथ जोड़े और बोला, ‘‘प्रणाम पंडितजी… गृहप्रवेश की पूजा के लिए आप को कितनी दक्षिणा देनी होगी?’’

‘‘दक्षिणा के 1,000 रुपए लगेंगे,’’ पंडितजी ने कहा.

‘‘मुझ से दक्षिणा के 1,000 रुपए क्यों, जबकि दूसरों से तो आप 500 रुपए ही लेते हैं?’’ लक्खू ने पूछा.

‘‘देखो लक्खू, तुम मोची हो. मैं ब्राह्मण हूं. तुम्हारे घर जा कर पूजा करानी है. अपना धर्म भी भ्रष्ट करूं और दोगुनी दक्षिणा भी न लूं,’’ पंडितजी ने कहा.

‘‘अच्छा, तो यह बात है. पंडितजी, आप जातीय जंजाल में जी रहे हैं. पूजापाठ कराना तो आप का ढकोसला है. आप की रगरग में छुआछूत की भावना भरी हुई है.

‘‘मुझे ऐसे पंडितजी से गृहप्रवेश नहीं कराना है. मेरी समझ से आप का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘लक्खू मोची, तुम मेरा सामाजिक बहिष्कार करोगे. अधर्मी, पापी. छोटी जाति का आदमी,’’ पंडितजी गुस्से से कांप रहे थे.

लक्खू को भी काफी गुस्सा आ गया. उस ने अपने पैर से जूता निकाल कर पंडितजी को धमकाया, ‘‘जाओ, नहीं तो इसी जूते से चेहरे का हुलिया बिगाड़ दूंगा.’’

लक्खू और पंडितजी लड़नेमरने को तैयार थे. आसपास के लोगों ने बीचबचाव कर के उन दोनों को अलग कर दिया.

लक्खू जब शाम को घर पहुंचा, तब अंजू ने पूछा, ‘‘पंडितजी कल गृहप्रवेश कराने आ रहे हैं न?’’

‘‘नहीं. वे तो कहने लगे कि मोची के घर नहीं जाऊंगा. उन का धर्म भ्रष्ट हो जाएगा. वे हम लोगों को अछूत मानते हैं,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘जाने भी दीजिए. हम लोग नए ढंग से गृहप्रवेश कर लेंगे. ऐसे नालायक पंडित पर निर्भर रहना सरासर बेवकूफी है,’’ अंजू ने कहा.

दूसरे दिन लक्खू और अंजू ने मिल कर नए घर को फूलों की माला से सजा दिया था. अंजू ने पूरी, मटरपनीर की सब्जी और सेंवइयां बनाई थीं.

अंजू ने लक्खू से कहा, ‘‘बगल की बस्ती से गरीब बच्चों को बुला कर ले आइए. उन बच्चों को हम लोग भरपेट भोजन कराएंगे.’’

बस्ती के 8-10 बच्चे पंगत लगा कर बैठ गए थे. पूरी, मटरपनीर की सब्जी व सेंवइयां बच्चों को परोस दी गईं. बच्चों ने छक कर खाया. कुछ बच्चे खापी कर खुशी से नाचनेगाने लगे थे. बच्चों को नाचतेगाते देख कर अंजू और लक्खू बेहद खुश थे.

अंजू और लक्खू का गृहप्रवेश दूसरे से अलग और अनूठा था. अंजू और लक्खू अपने नए घर में खुशीखुशी रहने लगे थे.

इस बात को 2 महीने बीत चुके थे. लक्खू अपनी दुकान पर बैठा था. इतने में पंडितजी अपनी टूटी हुई चप्पल की मरम्मत के लिए लक्खू की दुकान पर आए थे.

‘‘लक्खू, मेरी चप्पल टूट गई है. फटाफट मरम्मत कर दो. मुझे पूजा कराने जाना है,’’ पंडितजी ने कहा.

लक्खू ने पंडितजी को पहचानते हुए कहा, ‘‘आप की चप्पल यहां मरम्मत नहीं होगी. कहीं और जा कर देखिए.’’

‘‘लेकिन, मेरी चप्पल क्यों नहीं मरम्मत होगी?’’ पंडितजी ने पूछा.

लक्खू ने कहा, ‘‘मेरे घर पूजा कराने पर आप का धर्म भ्रष्ट होता है. मेरे हाथ से चप्पल मरम्मत कराने पर क्या आप का धर्म भ्रष्ट नहीं होगा.’’

‘‘बकवास मत करो. जल्दी से मेरी चप्पल मरम्मत कर दो. जो पैसा लेना है, ले लो.’’

‘‘मैं ने कह दिया न कि आप की चप्पल मरम्मत नहीं करूंगा,’’ लक्खू ने कहा.

‘‘लक्खू मोची, घर आई लक्ष्मी को ठुकराना नहीं चाहिए. ग्राहक से ही तुम्हारी रोजीरोटी चलती है,’’ पंडितजी ने थोड़ी खुशामद की.

‘‘मुझे उपदेश मत दीजिए. अपना रास्ता नापिए,’’ कह कर लक्खू एक ग्राहक के जूते में पौलिश करने लगा.

पंडितजी टूटी चप्पल ही पहन कर घिसटते हुए चल दिए. उन को नंदन साहब के यहां पूजा करानी थी. वहां दक्षिणा की मोटी रकम मिलने वाली थी.

चिलचिलाती धूप थी. सड़क पर कोई सवारी नहीं थी. अमूमन रिकशा वाले टैंपो वाले दिख जाते थे, लेकिन इस आफत में सभी गायब थे.

समय बीता जा रहा था. पंडितजी की चिंता बढ़ती जा रही थी. वे मन ही मन लक्खू को कोस रहे थे, ‘लक्खू मोची, तुम ने मुझ से खूब बदला लिया है.’

आखिरकार पंडितजी टूटी चप्पल से पैर घिसटते हुए नंदन साहब के घर पहुंच गए थे. वहां का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. नंदन साहब कुरसी पर बैठे हुए थे. कोई दूसरे पंडितजी पूजा करा रहे थे.

नंदन साहब का ध्यान पंडितजी पर गया. वे बोले, ‘‘आप बहुत लेट आए हैं.’’

‘‘हां, एक घंटा लेट हो गया. थोड़ी परेशानी में पड़ गया था,’’ पंडितजी ने कहा.

‘‘खैर, कोई बात नहीं. पूजा कराने के लिए बगल के मंदिर से पंडितजी को बुला लिया है. अब तो पूजा भी खत्म होने वाली है. आप की जरूरत नहीं रही. आप जा सकते हैं,’’ नंदन साहब ने बेलौस आवाज में कहा.
ऐसा सुन कर पंडितजी का चेहरा उतर गया. दक्षिणा की मोटी रकम जो हाथ से निकल गई थी.

वे बुदबुदा रहे थे, ‘‘लक्खू मोची, तुझे जिंदगीभर नहीं भूलूंगा. तुम्हारे चलते मेरी इतनी फजीहत हुई है. लेकिन इस के लिए तो मैं खुद भी कम जिम्मेदार नहीं हूं.’’

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