मेरा संसार – भाग 2 : अपने रिश्ते में फंसते हुए व्यक्ति की कहानी

तब तक फक्कड़ की तरह… मजबूरी जो होती है. सचमुच ज्योति कितना सारा काम करती है, बावजूद उस के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं देखी. यहां तक कि कभी उस ने मुझ से शिकायत भी नहीं की. ऊपर से जब मैं दफ्तर से लौटता हूं तो थका हुआ मान कर मेरे पैर दबाने लगती है. मानो दफ्तर जा कर मैं कोई नाहर मार कर लौटता हूं. दफ्तर और घर के दरम्यान मेरे ज्यादा घंटे दफ्तर में गुजरते हैं. न ज्योति का खयाल रख पाता हूं, न रोमी का. दायित्वों के नाम पर महज पैसा कमा कर देने के कुछ और तो करता ही नहीं. फोन की घंटी घनघनाई तो मेरा ध्यान भंग हुआ. ‘‘हैलो…? हां ज्योति…कैसी हो?…रोमी कैसी है?…मैं…मैं तो ठीक हूं…बस बैठा तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था. अकेले मन नहीं लगता यार…’’ कुछ देर बात करने के बाद जब ज्योति ने फोन रखा तो फिर मेरा दिमाग दौड़ने लगा. ज्योति को सिर्फ मेरी चिंता है जबकि मैं उसे ले कर कभी इतना गंभीर नहीं हो पाया. कितना प्रेम करती है वह मुझ से…सच तो यह है कि प्रेम शरणागति का पर्याय है. बस देते रहना उस का धर्म है. ज्योति अपने लिए कभी कुछ मांगती नहीं…उसे तो मैं, रोमी और हम से जुडे़ तमाम लोगों की फिक्र रहती है. वह कहती भी तो है कि यदि तुम सुखी हो तो मेरा जीवन सुखी है. मैं तुम्हारे सुख, प्रसन्नता के बीच कैसे रोड़ा बन सकती हूं? उफ, मैं ने कभी क्यों नहीं इतना गंभीर हो कर सोचा? आज मुझे ऐसा क्यों लग रहा है?

इसलिए कि मैं अकेला हूं? रचना…फिर उस की याद…लड़ाई… गुस्सा…स्वार्थ…सिर्फ स्वयं के बारे में सोचनाविचारना….बावजूद मैं उसे प्रेम करता हूं? यही एक सत्य है. वह मुझे समझ नहीं पाई. मेरे प्रेम को, मेरे त्याग को, मेरे विचारों को. कितना नजरअंदाज करता हूं रचना को ले कर अपने इस छोटे से परिवार को? …ज्योति को, रोमी को, अपनी जिंदगी को. बिजली गुल हो गई तो पंखा चलतेचलते अचानक रुक गया. गरमी को भगाने और मुझे राहत देने के लिए जो पंखा इस तपन से संघर्ष कर रहा था वह भी हार कर थम गया. मैं समझता हूं, सुखी होने के लिए बिजली की तरह निरंतर प्रेम प्रवाहित होते रहना चाहिए, यदि कहीं व्यवधान होता है या प्रवाह रुकता है तो इसी तरह तपना पड़ता है, इंतजार करना होता है बिजली का, प्रेम प्रवाह का. घड़ी पर निगाहें डालीं तो पता चला कि दिन के साढे़ 3 बज रहे हैं और मैं यहां इसी तरह पिछले 2 घंटों से बैठा हूं. आदमी के पास कोई काम नहीं होता है तो दिमाग चौकड़ी भर दौड़ता है. थमने का नाम ही नहीं लेता. कुछ चीजें ऐसी होती हैं जहां दिमाग केंद्रित हो कर रस लेने लगता है, चाहे वह सुख हो या दुख. अपनी तरह का अध्ययन होता है, किसी प्रसंग की चीरफाड़ होती है और निष्कर्ष निकालने की उधेड़बुन. किंतु निष्कर्ष कभी निकलता नहीं क्योंकि परिस्थितियां व्यक्ति को पुन: धरातल पर ला पटकती हैं और वर्तमान का नजारा उस कल्पना लोक को किनारे कर देता है.

फिर जब भी उस विचार का कोना पकड़ सोचने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है तो नईनई बातें, नएनए शोध होने लगते हैं. तब का निष्कर्ष बदल कर नया रूप धरने लगता है. सोचा, डायरी लिखने बैठ जाऊं. डायरी निकाली तो रचना के लिखे कुछ पत्र उस में से गिरे. ये पत्र और आज का उस का व्यवहार, दोनों में जमीनआसमान का फर्क है. पत्रों में लिखी बातें, उन में दर्शाया गया प्रेम, उस के आज के व्यवहार से कतई मेल नहीं खाते. जिस प्रेम की बातें वह किया करती है, आज उसी के जरिए अपना सुख प्राप्त करने का यत्न करती है. उस के लिए पे्रेम के माने हैं कि मैं उस की हरेक बातों को स्वीकार करूं. जिस प्रकार वह सोचती है उसी प्रकार व्यवहार करूं, उस को हमेशा मानता रहूं, कभी दुख न पहुंचाऊं, यही उस का फंडा है. मैं उसे समझाने की कोशिश करता हूं कि यह महज व्यवहार होता है, प्रेम नहीं, तो वह भड़क जाती है. उस का अहम् सिर चढ़ कर बोलने लगता है कि प्रेम के संदर्भ में मैं उसे कैसे समझाने लगा? जो प्रेम वह करती है वही एकमात्र सही है. और यदि मुझे उस से बातें करनी हैं या प्रेम करना है तो नतमस्तक हो कर उस की हां में हां मिलाता रहूं. यह अप्रत्यक्ष शर्त है उस की. किंतु मेरे लिए पे्रेम का अर्थ सिर्फ प्रेम है, कोई शर्त नहीं, कोई बंधन नहीं. प्रेम तो स्वतंत्र, विस्तृत होता है. एकदम खुला हुआ, जहां स्वयं का भान नहीं बल्कि जिस से प्रेम होता है उस की ही मूर्ति, उस का ही गुणगान होता है. मैं प्रेम को किसी प्रकार का संबंध भी नहीं मानता क्योंकि संबंध भी तो एक बंधन होता है और प्रेम बंधता कहां है? वह तो खुले आसमान की तरह अपनी बांहें फैलाए रखता है. क्योंकि व्यवहार में अंतर आना हो सकता है किंतु प्रेम में? …संभव नहीं. सच तो यह है कि रचना मेरे प्रेम को समझना नहीं चाहती और मैं भी उसे कुछ समझाना नहीं चाहता. कभीकभी मुझे लगता है कि मैं बेकार ही अपने दिमाग को परेशान किए रखता हूं.

मैं ने कोई ठेका तो नहीं ले रखा है उसे समझाने का या उसे अपनी हालत बता कर सहानुभूति बटोरने का…यदि ऐसा है तो फिर मेरे प्रेम का अर्थ क्या हुआ? पेन पता नहीं कहां रख दिया…ज्योति मेरी हरेक चीज को कायदे से जमा कर रखती है, और जब भी मुझे कुछ लेना होता है उसे आवाज दे देता हूं…. ज्योति कहती है कि जब तक मैं हूं तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं. इतने सारे कामों के बीच भी वह कभी कहती नहीं कि मैं थक चुकी हूं, कुछ तुम ही कर लो….पता नहीं ज्योति किस मिट्टी की बनी है. ओह, ज्योति तुम कहां हो. अचानक ज्योति की याद तेज हो गई. रचना कहीं खो गई. मैं ज्योति को कितना नजरअंदाज करता हूं इस के बावजूद ज्योति मेरा उतना ही ध्यान रखती है…क्या प्रेम यही होता है? ज्योति द्वारा किया जाने वाला व्यवहार मेरे प्रेम की परिभाषा को नए मोड़ पर ले जा रहा है, क्या मैं अब तक…यह जान नहीं पाया कि प्रेम होता क्या है? रचना द्वारा किए जाने वाला प्रेम और ज्योति द्वारा किया जाने वाला प्रेम…इस मुकाबले में मुझे तय करना है कि आखिर कौन सही है? आज इस अकेलेपन में निर्णय तो लेना ही होगा…मैं ने डायरी लिखने का मन बदल दिया और इसी द्वंद्व में स्वयं को धकेल दिया कि अचानक मोबाइल की रिंग बजी. 

मेरा संसार – भाग 1 : अपने रिश्ते में फंसते हुए व्यक्ति की कहानी

आज पूरा एक साल गुजर गया. आज के दिन ही उस से मेरी बातें बंद हुई थीं. उन 2 लोगों की बातें बंद हुई थीं, जो बगैर बात किए एक दिन भी नहीं रह पाते थे. कारण सिर्फ यही था कि किसी ऐसी बात पर वह नाराज हुई जिस का आभास मुझे आज तक नहीं लग पाया.

मैं पिछले साल की उस तारीख से ले कर आज तक इसी खोजबीन में लगा रहा कि आखिर ऐसा क्या घट गया कि जान छिड़कने वाली मुझ से अब बात करना भी पसंद नहीं करती? कभीकभी तो मुझे यह भी लगता है कि शायद वह इसी बहाने मुझ से दूर रहना चाहती हो. वैसे भी उस की दुनिया अलग है और मेरी दुनिया अलग. मैं उस की दुनिया की तरह कभी ढल नहीं पाया. सीधासादा मेरा परिवेश है, किसी तरह का कोई मुखौटा पहन कर बनावटी जीवन जीना मुझे कभी नहीं आया. सच को हमेशा सच की तरह पेश किया और जीवन के यथार्थ को ठीक उसी तरह उकेरा, जिस तरह वह होता है. यही बात उसे पसंद नहीं आती थी और यही मुझ से गलती हो जाती. वह चाहती है दिल बहलाने वाली बातें, उस के मन की तरह की जाने वाली हरकतें, चाहे वे झूठी ही क्यों न हों, चाहे जीवन के सत्य से वह कोसों दूर हों. यहीं मैं मात खा जाता रहा हूं. मैं अपने स्वभाव के आगे नतमस्तक हूं तो वह अपने स्वभाव को बदलना नहीं चाहती. विरोधाभास की यह रेखा हमारे प्रेम संबंधों में हमेशा आड़े आती रही है और पिछले वर्ष उस ने ऐसी दरार डाल दी कि अब सिर्फ यादें हैं और इंतजार है कि उस का कोई समाचार आ जाए. जीवन को जीने और उस के धर्म को निभाने की मेरी प्रकृति है अत: उस की यादों को समेटे अपने जैविक व्यवहार में लीन हूं, फिर भी हृदय का एक कोना अपनी रिक्तता का आभास हमेशा देता रहता है

तभी तो फोन पर आने वाली हर काल ऐसी लगती हैं मानो उस ने ही फोन किया हो. यही नहीं हर एसएमएस की टोन मेरे दिल की धड़कन बढ़ा देती हैं, किंतु जब भी देखता हूं मोबाइल पर उस का नाम नहीं मिलता. मेरी इस बेचैनी और बेबसी का रत्तीभर भी उसे ज्ञान नहीं होगा, यह मैं जानता हूं क्योंकि हर व्यक्ति सिर्फ अपने बारे में सोचता है और अपनी तरह के विचारों से अपना वातावरण तैयार करता है व उसी की तरह जीने की इच्छा रखता है. मेरे लिए मेरी सोच और मेरा व्यवहार ठीक है तो उस के लिए उस की सोच और उस का व्यवहार उत्तम है. यही एक कारण है हर संबंधों के बीच खाई पैदा करने का. दूरियां उसे समझने नहीं देतीं और मन में व्यर्थ विचारों की ऐसी पोटली बांध देती है जिस में व्यक्ति का कोरा प्रेममय हृदय भी मन मसोस कर पड़ा रह जाता है. जहां जिद होती है, अहम होता है, गुस्सा होता है. ऐसे में बेचारा प्रेम नितांत अकेला सिर्फ इंतजार की आग में झुलसता रहता है, जिस की तपन का एहसास भी किसी को नहीं हो पाता. मेरी स्थिति ठीक इसी प्रकार है. इन 365 दिनों में एक दिन भी ऐसा नहीं गया जब उस की याद न आई हो, उस के फोन का इंतजार न किया हो. रोज उस से बात करने के लिए मैं अपने फोन के बटन दबाता हूं किंतु फिर नंबर को यह सोच कर डिलीट कर देता हूं कि जब मेरी बातें ही उसे दुख पहुंचाती हैं तो क्यों उस से बातों का सिलसिला दोबारा प्रारंभ करूं? हालांकि मन उस से संपर्क करने को उतावला है. बावजूद उस के व्यवहार ने मेरी तमाम प्रेमशक्ति को संकुचित कर रख दिया है. मन सोचता है, आज जैसी भी वह है, कम से कम अपनी दुनिया में व्यस्त तो है, क्योंकि व्यस्त नहीं होती तो उस की जिद इतने दिन तक तो स्थिर नहीं रहती कि मुझ से वह कोई नाता ही न रखे.

संभव है मेरी तरह वह भी सोचती हो, किंतु मुझे लगता है यदि वह मुझ जैसा सोचती तो शायद यह दिन कभी देखने में ही नहीं आता, क्योंकि मेरी सोच हमेशा लचीली रही है, तरल रही है, हर पात्र में ढलने जैसी रही है, पर अफसोस वह आज तक समझ नहीं पाई. मई का सूरज आग उगल रहा है. इस सूनी दोपहर में मैं आज घर पर ही हूं. एक कमरा, एक किचन का छोटा सा घर और इस में मैं, मेरी बीवी और एक बच्ची. छोटा घर, छोटा परिवार. किंतु काम इतने कि हम तीनों एक समय मिलबैठ कर आराम से कभी बातें नहीं कर पाते. रोमी की तो शिकायत रहती है कि पापा का घर तो उन का आफिस है. मैं भी क्या करूं? कभी समझ नहीं पाया. चूंकि रोमी के स्कूल की छुट्टियां हैं तो उस की मां ज्योति उसे ले कर अपने मायके चली गई है. पिछले कुछ वर्षों से ज्योति अपनी मां से मिलने नहीं जा पाई थी. मैं अकेला हूं. यदि गंभीरता से सोच कर देखूं तो लगता है कि वाकई मैं बहुत अकेला हूं, घर में सब के रहने और बाहर भीड़ में रहने के बावजूद.

किंतु निरंतर व्यस्त रहने में उस अकेलेपन का भाव उपजता ही नहीं. बस, महसूस होता है तमाम उलझनों, समस्याओं को झेलते रहने और उस के समाधान में जुटे रहने की क्रियाओं के बीच, क्योंकि जिम्मेदारियों के साथ बाहरी दुनिया से लड़ना, हारना, जीतना मुझे ही तो है. आज छुट्टी है और कोई अपना दफ्तर का काम भी नहीं है इसलिए इस दोपहर की सूनी सी तपन के बीच खुद को देख पा रहा हूं. दूरदूर तक सिर्फ सूरज की आग और अपने अंदर भी विचारों की एक आग, ‘उस के’ निरंतर दिए जाने वाले दर्द की आग. गरमी से राहत पाने का इकलौता साधन कूलर खराब हो चुका है जिसे ठीक करना है, अखबार की रद्दी बेचनी है, दूध वाले का हिसाब करना है, ज्योति कह कर गई थी. रोमी का रिजल्ट भी लाना है और इन सब से भारी काम खाना बनाना है, और बर्तन भी मांजना है. घर की सफाई पिछले 2 दिनों से नहीं हुई है तो मकडि़यों ने भी अपने जाले बुनने का काम शुरू कर दिया है.

उफ…बहुत सा काम है…, ज्योति रोज कैसे सबकुछ करती होगी और यदि एक दिन भी वह आराम से बैठती है तो मेरी आवाज बुलंद हो जाती है…मानो मैं सफाईपसंद इनसान हूं…कैसा पड़ा है घर? चिल्ला उठता हूं. ज्योति न केवल घर संभालती है, बल्कि रोमी के साथसाथ मुझे भी संभालती है. यह मैं आज महसूस कर रहा हूं, जब अलमारी में तमाम कपडे़ बगैर धुले ठुसे पडे़ हैं. रोज सोचता हूं, पानी आएगा तो धो डालूंगा. मगर आलस…पानी भी कहां भर पाता हूं, अकेला हूं तो सिर्फ एक घड़ा पीने का पानी और हाथपैर, नहाधो लेने के लिए एक बालटी पानी काफी है. ज्योति आएगी तभी सलीकेदार होगी जिंदगी, यही लगता है.

दर्द – भाग- 1 : जिंदगी के उतार चढ़ावों को झेलती कनीजा

कनीजा बी करीब 1 घंटे से परेशान थीं. उन का पोता नदीम बाहर कहीं खेलने चला गया था. उसे 15 मिनट की खेलने की मुहलत दी गई थी, लेकिन अब 1 घंटे से भी ऊपर वक्त गुजर गया था. वह घर आने का नाम ही नहीं ले रहा था.

कनीजा बी को आशंका थी कि वह महल्ले के आवारा बच्चों के साथ खेलने के लिए जरूर कहीं दूर चला गया होगा.

वह नदीम को जीजान से चाहतीं. उन्हें उस का आवारा बच्चों के साथ घर से जाना कतई नहीं सुहाता था.

अत: वह चिंताग्रस्त हो कर भुनभुनाने लगी थीं, ‘‘कितना ही समझाओ, लेकिन ढीठ मानता ही नहीं. लाख बार कहा कि गली के आवारा बच्चों के साथ मत खेला कर, बिगड़ जाएगा, पर उस के कान पर जूं तक नहीं रेंगी. आने दो ढीठ को. इस बार वह मरम्मत करूंगी कि तौबा पुकार उठेगा. 7 साल का होने को आया है, पर जरा अक्ल नहीं आई. कोई दुर्घटना हो सकती है, कोई धोखा हो सकता है…’’

कनीजा बी का भुनभुनाना खत्म हुआ ही था कि नदीम दौड़ता हुआ घर में आ गया और कनीजा की खुशामद करता हुआ बोला, ‘‘दादीजान, कुलफी वाला आया है. कुलफी ले दीजिए न. हम ने बहुत दिनों से कुलफी नहीं खाई. आज हम कुलफी खाएंगे.’’

‘‘इधर आ, तुझे अच्छी तरह कुलफी खिलाती हूं,’’ कहते हुए कनीजा बी नदीम पर अपना गुस्सा उतारने लगीं. उन्होंने उस के गाल पर जोर से 3-4 तमाचे जड़ दिए.

नदीम सुबकसुबक कर रोने लगा. वह रोतेरोते कहता जाता, ‘‘पड़ोस वाली चचीजान सच कहती हैं. आप मेरी सगी दादीजान नहीं हैं, तभी तो मुझे इस बेदर्दी से मारती हैं.

‘‘आप मेरी सगी दादीजान होतीं तो मुझ पर ऐसे हाथ न उठातीं. तब्बो की दादीजान उसे कितना प्यार करती हैं. वह उस की सगी दादीजान हैं न. वह उसे उंगली भी नहीं छुआतीं.

‘‘अब मैं इस घर में नहीं रहूंगा. मैं भी अपने अम्मीअब्बू के पास चला जाऊंगा. दूर…बहुत दूर…फिर मारना किसे मारेंगी. ऊं…ऊं…ऊं…’’ वह और जोरजोर से सुबकसुबक कर रोने लगा.

नदीम की हृदयस्पर्शी बातों से कनीजा बी को लगा, जैसे किसी ने उन के दिल पर नश्तर चला दिया हो. अनायास ही उन की आंखें छलक आईं. वह कुछ क्षणों के लिए कहीं खो गईं. उन की आंखों के सामने उन का अतीत एक चलचित्र की तरह आने लगा.

जब वह 3 साल की मासूम बच्ची थीं, तभी उन के सिर से बाप का साया उठ गया था. सभी रिश्तेदारों ने किनारा कर लिया था. किसी ने भी उन्हें अंग नहीं लगाया था.

मां अनपढ़ थीं और कमाई का कोई साधन नहीं था, लेकिन मां ने कमर कस ली थी. वह मेहनतमजदूरी कर के अपना और अपनी बेटी का पेट पालने लगी थीं. अत: कनीजा बी के बचपन से ले कर जवानी तक के दिन तंगदस्ती में ही गुजरे थे.

तंगदस्ती के बावजूद मां ने कनीजा बी की पढ़ाईलिखाई की ओर खासा ध्यान दिया था. कनीजा बी ने भी अपनी बेवा, बेसहारा मां के सपनों को साकार करने के लिए पूरी लगन व मेहनत से प्रथम श्रेणी में 10वीं पास की थी और यों अपनी तेज बुद्धि का परिचय दिया था.

मैट्रिक पास करते ही कनीजा बी को एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क की नौकरी मिल गई थी. अत: जल्दी ही उन के घर की तंगदस्ती खुशहाली में बदलने लगी थी.

कनीजा बी एक सांवलीसलोनी एवं सुशील लड़की थीं. उन की नौकरी लगने के बाद जब उन के घर में खुशहाली आने लगी थी तो लोगों का ध्यान उन की ओर जाने लगा था. देखते ही देखते शादी के पैगाम आने लगे थे.

मुसीबत यह थी कि इतने पैगाम आने के बावजूद, रिश्ता कहीं तय नहीं हो रहा था. ज्यादातर लड़कों के अभिभावकों को कनीजा बी की नौकरी पर आपत्ति थी.

वे यह भूल जाते थे कि कनीजा बी के घर की खुशहाली का राज उन की नौकरी में ही तो छिपा है. उन की एक खास शर्त यह होती कि शादी के बाद नौकरी छोड़नी पड़ेगी, लेकिन कनीजा बी किसी भी कीमत पर लगीलगाई अपनी सरकारी नौकरी छोड़ना नहीं चाहती थीं.

कनीजा बी पिता की असमय मृत्यु से बहुत बड़ा सबक सीख चुकी थीं. अर्थोपार्जन की समस्या ने उन की मां को कम परेशान नहीं किया था. रूखेसूखे में ही बचपन से जवानी तक के दिन बीते थे. अत: वह नौकरी छोड़ कर किसी किस्म का जोखिम मोल नहीं लेना चाहती थीं.

कनीजा बी का खयाल था कि अगर शादी के बाद उन के पति को कुछ हो गया तो उन की नौकरी एक बहुत बड़े सहारे के रूप में काम आ सकती थी.

वैसे भी पतिपत्नी दोनों के द्वारा अर्थोपार्जन से घर की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो सकती थी, जिंदगी मजे में गुजर सकती थी.

देखते ही देखते 4-5 साल का अरसा गुजर गया था और कनीजा बी की शादी की बात कहीं पक्की नहीं हो सकी थी. उन की उम्र भी दिनोदिन बढ़ती जा रही थी. अत: शादी की बात को ले कर मांबेटी परेशान रहने लगी थीं.

एक दिन पड़ोस के ही प्यारे मियां आए थे. वह उसी शहर के दूसरे महल्ले के रशीद का रिश्ता कनीजा बी के लिए लाए थे. उन के साथ एक महिला?भी थीं, जो स्वयं को रशीद की?भाभी बताती थीं.

रशीद एक छोटे से निजी प्रतिष्ठान में लेखाकार था और खातेपीते घर का था. कनीजा बी की नौकरी पर उसे कोई आपत्ति नहीं थी.

महल्लेपड़ोस वालों ने कनीजा बी की मां पर दबाव डाला था कि उस रिश्ते को हाथ से न जाने दें क्योंकि रिश्ता अच्छा है. वैसे भी लड़कियों के लिए अच्छे रिश्ते मुश्किल से आते हैं. फिर यह रिश्ता तो प्यारे मियां ले कर आए थे.

कनीजा बी की मां ने महल्लेपड़ोस के बुजुर्गों की सलाह मान कर कनीजा बी के लिए रशीद से रिश्ते की हामी भर दी थी.

कनीजा बी अपनी शादी की खबर सुन कर मारे खुशी के झूम उठी थीं. वह दिनरात अपने सुखी गृहस्थ जीवन की कल्पना करती रहती थीं.

और एक दिन वह घड़ी भी आ गई, जब कनीजा बी की शादी रशीद के साथ हो गई और वह मायके से विदा हो गईं. लेकिन ससुराल पहुंचते ही इस बात ने उन के होश उड़ा दिए कि जो महिला स्वयं को रशीद की भाभी बता रही थी, वह वास्तव में रशीद की पहली बीवी थी.

असलियत सामने आते ही कनीजा बी का सिर चकराने लगा. उन्हें लगा कि उन के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है और उन्हें फंसाया गया है. प्यारे मियां ने उन के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया था. वह मन ही मन तड़प कर रह गईं.

लेकिन जल्दी ही रशीद ने कनीजा बी के समक्ष वस्तुस्थिति स्पष्ट कर दी, ‘‘बेगम, दरअसल बात यह थी कि शादी के 7 साल बाद भी जब हलीमा बी मुझे कोई औलाद नहीं दे सकी तो मैं औलाद के लिए तरसने लगा.

‘हम दोनों पतिपत्नी ने किसकिस डाक्टर से इलाज नहीं कराया, क्याक्या कोशिशें नहीं कीं, लेकिन नतीजा शून्य रहा. आखिर, हलीमा बी मुझ पर जोर देने लगी कि मैं दूसरी शादी कर लूं. औलाद और मेरी खुशी की खातिर उस ने घर में सौत लाना मंजूर कर लिया. बड़ी ही अनिच्छा से मुझे संतान सुख की खातिर दूसरी शादी का निर्णय लेना पड़ा.

‘मैं अपनी तनख्वाह में 2 बीवियों का बोझ उठाने के काबिल नहीं था. अत: दूसरी बीवी का चुनाव करते वक्त मैं इस बात पर जोर दे रहा था कि अगर वह नौकरी वाली हो तो बात बन सकती है. जब हमें, प्यारे मियां के जरिए तुम्हारा पता चला तो बात बनाने के लिए इस सचाई को छिपाना पड़ा कि मैं शादीशुदा हूं.

‘मैं झूठ नहीं बोलता. मैं संतान सुख की प्राप्ति की उत्कट इच्छा में इतना अंधा हो चुका था कि मुझे तुम लोगों से अपने विवाहित होने की सचाई छिपाने में कोई संकोच नहीं हुआ.

‘मैं अब महसूस कर रहा हूं कि यह अच्छा नहीं हुआ. सचाई तुम्हें पहले ही बता देनी चाहिए थी. लेकिन अब जो हो गया, सो हो गया.

‘वैसे देखा जाए तो एक तरह से मैं तुम्हारा गुनाहगार हुआ. बेगम, मेरे इस गुनाह को बख्श दो. मेरी तुम से गुजारिश है.’

कनीजा बी ने बहुत सोचविचार के बाद परिस्थिति से समझौता करना ही उचित समझा था, और वह अपनी गृहस्थी के प्रति समर्पित होती चली गई थीं.

कनीजा बी की शादी के बाद डेढ़ साल का अरसा गुजर गया था, लेकिन उन के भी मां बनने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे. उस के विपरीत हलीमा बी में ही मां बनने के लक्षण दिखाई दे रहे थे. डाक्टरी परीक्षण से भी यह बात निश्चित हो गई थी कि हलीमा बी सचमुच मां बनने वाली हैं.

हलीमा बी के दिन पूरे होते ही प्रसव पीड़ा शुरू हो गई, लेकिन बच्चा था कि बाहर आने का नाम ही नहीं ले रहा था. आखिर, आपरेशन द्वारा हलीमा बी के बेटे का जन्म हुआ. लेकिन हलीमा बी की हालत नाजुक हो गई. डाक्टरों की लाख कोशिशों के बावजूद वह बच नहीं सकी.

हलीमा बी की अकाल मौत से उस के बेटे गनी के लालनपालन की संपूर्ण जिम्मेदारी कनीजा बी पर आन पड़ी. अपनी कोख से बच्चा जने बगैर ही मातृत्व का बोझ ढोने के लिए कनीजा बी को विवश हो जाना पड़ा. उन्होंने उस जिम्मेदारी से दूर भागना उचित नहीं समझा. आखिर, गनी उन के पति की ही औलाद था.

रशीद इस बात का हमेशा खयाल रखा करता था कि उस के व्यवहार से कनीजा बी को किसी किस्म का दुख या तकलीफ न पहुंचे, वह हमेशा खुश रहें, गनी को मां का प्यार देती रहें और उसे किसी किस्म की कमी महसूस न होने दें.

जल समाधि- आखिर क्यूं परेशान था सुशील?

उदास क्षितिज की नीलिमा: आभा को बहू नीलिमा से क्या दिक्कत थी

जल समाधि: आखिर क्यूं परेशान था सुशील? भाग 3

तभी उन दोनों को किसी के आने की आहट सुनाई दी, तो वे संभल कर बैठ  गए. प्रकाश ने छोटे बच्चे को गोद में ले लिया और अपने साथ लाया हुआ पाउडर का डब्बा रीता को दिखाने लगा. समाज की नजर में भले ही रीता ने पराए मर्द के साथ सैक्स कर के गलत काम किया था, पर उस के अपने विचार से वह एकदम सही थी, क्योंकि उस के इस एक कदम ने घर के सभी लोगों को खुश कर दिया था.

रीता के ससुर को वंश आगे बढ़ाने वाला मिल गया था, बेटियों को भाई और सुशील को बेटा. इसी वजह से सुशील पहले से ज्यादा खुश रहने लगा था और अपने काम को हंसीखुशी करने लगा था. इसी बीच प्रकाश की आवाजाही रीता के घर में अब और ज्यादा बढ़ गई थी. समय और बीता तो लोगों में बातें बनने लगीं कि हो न हो, जरूर इन दोनों में कोई लफड़ा है. और यह लड़का सुशील का नहीं, बल्कि प्रकाश का ही है. जिस घर में सभी काले और सांवले रंग के हों, वहां कोई गोरा लड़का पैदा कैसे हो सकता है?

बेटे के जन्म के बाद सुशील और उस के पिता के बीच सबकुछ ठीक होने लगा था. आज वह अपने पिता के पास आया और बोला, ‘‘क्या आप को नहीं लगता कि प्रकाश की आवाजाही कुछ ज्यादा बढ़ने लगी है? अब तो महल्ले में लोग बातें भी बनाने लगे हैं…’’

साथ ही साथ सुशील ने अपने मोबाइल को राममोहन की नजरों के सामने कर दिया. मोबाइल की स्क्रीन पर एक तसवीर थी, जिस में प्रकाश और रीता एकदूसरे के साथ ऐसे चिपक कर बैठे थे, जैसे पतिपत्नी हों.

सुशील ने बताया कि रीता के मोबाइल में यह तसवीर उस की बड़ी बेटी ने अनजाने में ही ले ली थी और आज जब रीता के नहाने जाने के बाद  सुशील उस के मोबाइल की भर चुकी मैमोरी की तसवीरें डिलीट कर के खाली कर रहा था, तभी उस की नजर इस तसवीर पर पड़ी और उस ने अपने मोबाइल में उस तसवीर को ले लिया.

राममोहन पर इन सब बातों का कोई असर नहीं हुआ और वे बोले, ‘‘ये सारी बातें मुझ से छिपी नहीं हैं. पर जैसे भी हो, आज हमारे वंश को आगे ले जाने वाला एक लड़का तो हमें प्रकाश ने ही दिया है, इसलिए जैसा चल रहा है, वैसा ही चलने दो और अपना मुंह बंद रखो. और हां, हो सके तो अपनी आंखें भी बंद कर लो.’’

सुशील अपने पिता की बातें सुन कर सन्न रह गया. आज सुबह से ही सुशील अपने कागजपत्र इकट्ठे कर रहा था, क्योंकि उसे अनाथ बच्चों के भविष्य के लिए चंदा जमा करने के लिए मंत्रीजी से मिलने जाना था.

‘‘पूरे 2 दिन का प्रोग्राम है. बच्चों का ध्यान रखना,’’ रीता को कह कर सुशील निकल गया था.

सुशील के जाते ही रीता ने एक अलग ही आजादी का अहसास किया और नौकरानी को जल्दीजल्दी काम निबटाने की हिदायत देने लगी.

बीचबीच में प्रकाश का फोन भी आता रहा. रीता उस से पता नहीं क्या फुसफुसा कर बात करती कि किसी और को सुनाई भी नहीं देता था.

आज शाम को रीता के ससुर और उस की बेटियों ने खाना खा लिया और अपने कमरों में आराम करने लगे… राममोहन सोने जाने से पहले अपने पोते को प्यार करना नहीं भूले. आज सुशील भी नहीं था, सो रीता भी अपने बेटे को ले कर बिस्तर पर चली गई थी.

कुछ ही देर बाद रीता के मोबाइल पर प्रकाश का फोन आ गया, ‘तुम से मिलने आ रहा हूं. दरवाजा खुला रखना,’ कह कर फोन कट गया था.

रीता को प्रकाश का इस समय चोरीछिपे आना अजीब तो लगा, पर उस के जिस्म की जरूरत ने उसे प्रकाश को आने से नहीं रोका. तकरीबन आधे घंटे के बाद प्रकाश रीता के साथ उस के बिस्तर पर था.

‘‘कहीं बाबूजी ने तुम्हें देखा तो नहीं?’’ रीता फुसफुसाई.

‘‘अरे, वे हमारे बारे में सब जानते हैं, पर उन्हें तो सिर्फ अपने पोते से मतलब है, जो मैं ने उन्हें दिया है,’’ कहते हुए प्रकाश ने रीता के कपड़े हटाने शुरू कर दिए. आज बहुत दिनों के बाद प्रकाश ने रीता को इस हालत में देखा था, इसलिए उस के अंदर जोश जाग चुका था.

रीता और प्रकाश अभी नाजायज रिश्ते का मजा ले ही रहे थे कि अचानक कमरे का दरवाजा खुल गया. सामने कोई खड़ा था.

रीता ने आंखें फाड़ कर देखा कि वह कोई और नहीं, बल्कि उस का पति सुशील था, जो अपनी बीवी को गैरमर्द के साथ देख कर हैरान था.

रीता ने प्रकाश को धक्का दिया और कपड़े पहनने लगी. प्रकाश भी चौंक गया था, फिर भी वह बेशर्मी दिखाते हुए बोला, ‘‘अरे सुशील, इतनी जल्दी वापस कैसे आ गए? तुम ने तो हमारा सारा मजा ही खराब कर दिया.’’

प्रकाश बाहर जा चुका था और सुशील की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उस की जबान हलक से जा चिपकी थी और आंखें पथरा रही थीं. उस ने रीता को बड़े जबरदस्त तरीके से घूरा, पर रीता पर उस के घूरने का भी कोई असर नहीं हुआ. सुशील उसी समय बिना कुछ कहे वहां से चला गया.

तकरीबन 20 दिन के बाद भी सुशील जब वापस नहीं आया, तो रीता को थोड़ी चिंता हुई. हालांकि उस की आंखों पर तो बेशर्मी का परदा पड़ा हुआ था, फिर भी उस ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना जरूरी समझा, पर तभी उसे एक चिट्ठी मिली, जो साधारण डाक से आई थी. उस में लिखा था :

‘तुम दूसरे आदमी के साथ लड़का पाने के लिए सोई या सिर्फ मजे के लिए, यह तो सिर्फ तुम जानती हो. मैं अगर तुम दोनों के खिलाफ कोई भी कार्यवाही करता हूं, तो उस में मेरी और मेरे खानदान की बदनामी ही होगी, इसलिए मैं खामोश हूं… और मेरी दोनों लड़कियों की जिम्मेदारी अब से मेरी एनजीओ उठाएगी. अफसोस है कि उन की मां के होते हुए भी वे दोनों अनाथालय में पलेंगी.

‘मैं तुम्हारे इस रिश्ते पर खामोश रहा और अब हमेशा के लिए खामोश ही रहूंगा. मेरे पिता ने एक पोते के लिए इस गंदे रिश्ते पर मुंह और आंखें बंद रखने को कहा था. मेरा मुंह तो पहले से ही बंद था और अब मेरी आंखें भी बंद हो रही हैं. ‘और हां, मेरी लाश तुम्हें नहीं मिल पाएगी, क्योंकि मेरा शरीर पानी की लहर के साथ कहां तक बहता चला जाएगा, यह मुझे भी नहीं पता…’चिट्ठी पढ़ कर रीता की समझ में आ चुका था कि सुशील ने जल समाधि ले ली है. पर क्या सुशील की खुदकुशी हकीकत में खुदकुशी थी या रीता द्वारा न चाहते हुए भी की गई हत्या?

जल समाधि: आखिर क्यूं परेशान था सुशील? भाग 2

प्रकाश समझ गया था कि लोहा गरम है. उस ने रीता को अपनी बांहों में भर लिया और उस के होंठों को चूमने लगा. रीता भी किसी लता की तरह उस की बांहों में समा गई और फिर दोनों की गरम सांसें पूरे कमरे में गूंजने लगीं. दोनों के शरीर एकदूसरे से ऐसे चिपटे हुए थे, जैसे उन्हें किसी ने एक ही कर दिया हो. उस दिन के बाद उन दोनों ने कई बार जम कर सैक्स का मजा लूटा.

ऐसा नहीं था कि यह जिस्मानी रिश्ता अनजाने में बना था, बल्कि रीता ने जानबूझ कर प्रकाश के साथ संबंध को बढ़ने दिया, ताकि वह उस के साथ हमबिस्तर हो कर एक लड़का पैदा कर सके. यही नहीं, बातोंबातों में रीता ने यह डर भी प्रकाश पर जाहिर कर दिया था कि उसे फिर से लड़की हुई तो क्या होगा? प्रकाश ने रीता से वादा किया था कि उस की मर्दानगी में वह दम है, जो लड़की नहीं, बल्कि लड़का ही पैदा करेगी और अगर फिर भी भ्रूण की जांच में लड़की होती है, तो वह उसे गिरवा देगा.

और ऐसा भी लगता था कि रीता के ससुर ने इन दोनों के बीच आने की कोई कोशिश नहीं की. कहीं न कहीं वे भी चाहते थे कि जो हो रहा है, होने दिया जाए. आखिरकार वे भी तो एक पोता चाहते ही थे. कुछ समय के बाद वही हुआ, जिस का इंतजार रीता को था. वह पेट से हो गई. सुशील खुश तो हुआ, पर अगले पल ही मायूसी ने उसे घेर लिया.

‘‘इस बार भी लड़की हो गई तो…?’’ सुशील बोला. ‘‘हम पहले जांच करा लेंगे, उस के बाद ही इसे पनपने देंगे,’’ यह कहते हुए रीता के चेहरे पर चमक थी. जांच के नतीजे ने बताया कि रीता के पेट में पल रहा बच्चा एक लड़का ही है, तो यह जान कर राममोहन, सुशील और रीता सभी खुशी से झूम उठे.

ठीक समय आने पर रीता ने सुंदर चेहरे वाले गोरे लड़के को जन्म दिया… छोटे बालक को देख कर सब की आंखें फैल गई थीं, क्योंकि राममोहन के परिवार में तो सभी सांवले थे, ऐसे में एक गोरे बालक का जन्म सब को सुहा रहा था. राममोहन तो बस इसी बात से खुश थे कि उन के वंश को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें एक पोता मिल गया था. 2 महीने बीत गए थे. रीता अपने बेटे को जी भर कर देखती और मन ही मन अपने उस फैसले पर खुश होती, जब उस ने प्रकाश के साथ संबंध कायम किए थे.

आज प्रकाश रीता के घर पहुंचा, तो राममोहन सिर्फ मुसकरा कर रह गए. रीता अपने कमरे में बैठी थी, जिस की देह चिकनी और गदराई हो गई थी… इधर कई महीनों से प्रकाश रीता के साथ हमबिस्तर भी नहीं हुआ था और आज इसी उम्मीद में वह रीता के पास आया था. प्रकाश ने रीता को चूमना चाहा, तो रीता ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, ‘‘मुझ से दूर ही रहो, अब मैं एक बेटे की मां हूं.’’ ‘‘अजी, इस में मेरी भी मेहनत लगी है,’’ प्रकाश ने रीता की पीठ सहलाते हुए कहा.

दादी अम्मा : आखिर कहां चली गई थी दादी अम्मा

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दादी अम्मा : आखिर कहां चली गई थी दादी अम्मा- भाग 4

जब नर्सिंग होम से डिस्चार्ज होने का समय आया तो दादी अम्मा ने दोनों से कहा, ‘बेटा, अब मुझे घर छोड़ आओ और तुम भी अपना घर देखो. तुम ने मुझ पर बहुत बड़ा एहसान किया है.’

‘यह क्या कह रही हैं, अम्मा. हम दोनों के मांबाप तो रहे नहीं. आप की खिदमत से लगा जैसे उन की कमी दूर हो गई,’ मेहनाज ने कहा.

अम्मा उस के सिर पर हाथ फिराने लगीं. लेकिन अम्मा को आरजू और पोतेपोतियों की याद सता रही थी. इसलिए साजिद और मेहनाज को आगे कभी उन के साथ रहने की तसल्ली दे कर अपने घर आ गईं. उन के आने पर कुछ दिन तक तो बेटेबहुएं उन के आसपास रहे, लेकिन फिर उन का रवैया पहले जैसा हो गया, अम्मा के प्रति उपेक्षित व्यवहार. वे फिर अपनी मौजमस्ती में डूब गए.

कुछ समय बीता तो दादी अम्मा की तबीयत फिर बिगड़ने लगी. अब कौन उन की देखभाल करेगा. वे जबरदस्ती अपने बेटों पर बोझ नहीं बनना चाहती थीं. एक दिन दादी अम्मा ने घर छोड़ दिया. किसी को बता कर नहीं गईं कि कहां जा रही हैं.

आज उन्हें घर छोड़े हुए 1 महीने से ऊपर हो चला था. सभी रिश्तेदारों के बीच खोजा, लेकिन कहीं पता नहीं चला. जब पूरा घर सूना और उजड़ा सा लगा तो बेटों को उन की अहमियत का पता चला. अब वे चाह रहे थे कि किसी भी तरह अम्मा घर वापस आ जाएं. इसीलिए हाजी फुरकान के आगे वे दुखड़ा रो रहे थे.

दूसरे दिन हाजी फुरकान, गफूर मियां, जाबिर मियां और मजहबी कार्यक्रमों के नाम पर चंदा उगाहने वाले रशीद अली को ले कर रेहान के घर पर पहुंच गए. आंगन में दरी बिछा कर उस पर कालीन डाल दी गई और बीच में हुक्का व पानदान रख दिया गया.

‘‘बताओ मियां, क्या परेशानी है?’’ थोड़ी देर हुक्का गुड़गुड़ाने के बाद राशिद अली ने पूछा.

‘‘अम्मा का कुछ पता नहीं चल रहा है. पता नहीं किस हाल में हैं. दुनिया में हैं भी या नहीं?’’ रेहान ने बुझी आवाज में कहा.

‘‘देखो मियां, घबराओ नहीं, हम अपने इलम से अभी पता लगा लेते हैं,’’ जाबिर मियां ने तसल्ली दी, फिर सब से बोले, ‘‘सब लोग खामोश रहें. हमें अपना काम करने दें.’’

वे कुछ देर तक आंखें बंद कर के मुंह ऊपर उठा कर बुदबुदाते रहे. फिर धीरे से बोले, ‘‘बेटा, सब्र से काम लेना. हम ने पता लगा लिया है. तुम्हारी अम्मा अब इस दुनिया में नहीं हैं.’’

‘‘आप ने कैसे पता लगाया?’’ जुबैर ने जिज्ञासावश पूछना चाहा कि गफूर मियां ने उसे बीच में ही झिड़क दिया, ‘‘देखो बेटे, या तो हम पर यकीन करो या फिर हमें बुलाते ही नहीं.’’ फिर हाजी फुरकान पर बिगड़ते हुए बोले, ‘‘मियां, कैसे दीन से फिरे हुए लोगों के घर ले आए हमें. चलो, जाबिर मियां. यहां रुकना अब ठीक नहीं है.’’

इस पर हाजी फुरकान ने जुबैर को डांटना शुरू कर दिया, ‘‘तुम लोग क्या जाबिर मियां को ऐसावैसा समझ रहे हो. बड़े पहुंचे हुए हैं. अपने कब्जे में की हुई रूहानी ताकतों से वे सात समंदर पार की खबर निकाल लेते हैं, यह तो फिर भी यहीं का मामला है. और सुनो, मेरे कहने से तो आ भी गए, वरना ऐसीवैसी जगह तो वैसे भी ये लोग हाथ नहीं डालते हैं,’’ फिर गफूर मियां और जाबिर मियां को समझाते हुए बोले, ‘‘बच्चा है, गलती से पूछ बैठा. आप कहीं मत जाइए, आप की जो खिदमत करनी होगी, उस के लिए ये लोग तैयार हैं. मैं गारंटी लेता हूं.’’

थोड़ी देर तक नाकभौं सिकोड़ने के बाद जाबिर मियां दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए रेहान से बोले, ‘‘देखो बेटे, आप की वालिदा को तो कोई वापस ला नहीं सकता, अलबत्ता उन को शांति मिले, इस के लिए काफी कुछ किया जा सकता है.’’

‘‘वह कैसे?’’ रेहान ने पूछा.

‘‘उन के जीतेजी जो ख्वाहिशें अधूरी रह गई हैं उन्हें पूरा कर के उन को सुकून मिल सकता है. बताओ, क्याक्या ख्वाहिशें थीं उन की? फिर हम ऐसे उपाय बताएंगे कि अम्मा को शांति मिल जाएगी और आप लोगों का प्रायश्चित्त भी हो जाएगा,’ जाबिर मियां उगलदान में पान की पीक थूकने के बाद बोले.

‘‘चचाजान, अम्मा को खीर, पान, रसगुल्ले, फल और मुरब्बे बहुत पसंद थे. बिरयानी भी चाव से खाती थीं,’’ फैजान ने बताया.

‘‘अजी मियां, ये दोचार बातें क्या बता रहे हो, हम ने अपने इलम से पता लगा लिया है कि उन्हें क्याक्या पसंद था,’’ जाबिर मियां हुक्का गुड़गुड़ाने के बाद बोले, ‘‘देखो बेटे, तुम्हारी अम्मा को जो पसंद था, उस की लिस्ट हम दे देते हैं. ये सारा सामान ले आओ, जब तक हम और साथियों को बुला लेते हैं.’’

रेहान ने जब लिस्ट देखी तो उस के होश उड़ गए. उस में 40 मुल्लाओं को धार्मिक अनुष्ठान के मौके पर मुर्गमुसल्लम, पुलाव, खीर, फल और मिठाई मिला कर 25 व्यंजन खिलाने और कपड़े दिए जाने के अलावा गफूर मियां और रशीद अली को अलग से 11-11 हजार रुपए दिए जाने की हिदायत दे डाली थी जाबिर मियां ने.

इन कठमुल्लों के फरमान को टालना तीनों भाइयों के बस की बात नहीं थी. फिर भी थोड़ी देर के लिए वे सोच में पड़ गए.

उन्हें चुप देख कर हाजी फुरकान ने व्यंग्यात्मक शब्दों की तोप दागी, ‘‘मियां, ये लोग तो समझो मुफ्त में परेशानी दूर कर रहे हैं, वरना इस नेक काम के तो लाखों लेते हैं. और यह भी समझो कि अगर इन से आप लोगों का रिश्ता बना रहा तो अपनी रूहानी ताकत और तावीजगंडों से आगे भी इस घर को बुरी हवा से बचाए रखेंगे.’’

इस से आगे बढ़ कर गफूर मियां ने और डरा दिया, ‘‘बेटा, सोच लो, अगर मजहब की परंपराओं को भुला दिया तो इस घर को बरबाद होने से कोई नहीं बचा सकेगा, समझे. हमारा क्या, यहां नहीं तो दूसरों के दुखदर्द दूर करेंगे.’’

‘‘आप नाराज मत होइए. कल अम्मा का चालीसवां है. हम सारा इंतजाम कर देंगे. बस, आप दुआएं देते रहें, आप ही सहारा हैं,’’ रेहान उन के आगे गिड़गिड़ाने लगा.

दूसरे दिन सुबह से ही रेहान, जुबैर और फैजान व उन की पत्नियां चालीसवें के धार्मिक अनुष्ठान की तैयारी में जुट गए. घर के आंगन में बड़ी सी दरी बिछ गई, भट्ठियों पर देगें चढ़ा दी गईं और कठमुल्लों के प्रवचनों के लिए छत के कोनों पर लाउडस्पीकर लगा दिए गए.

दोपहर होतेहोते कठमुल्लों की भीड़ आंगन में इकट्ठी हो गई. जाबिर मियां के आदेश पर दरी के बीच में अम्मा की पसंद का नाम ले कर तरहतरह के पकवान सजा दिए गए. आरजू यह सब देख कर दुखी हो रही थी. वह खुले विचारों की थी और रूढि़यों व मजहब के नाम पर धंधेबाजों से उसे नफरत थी.

वह सोच रही थी कि मुसलिम समाज में कितना ढकोसला है. जब दादी अम्मा जीवित थीं तो ये बेटे उन को 2 रोटी और 1 कटोरी दालसब्जी नहीं देते थे और अब उन की मृत्यु हो जाने पर कितने पकवान उन के नाम पर बना रहे हैं, जिन्हें वे स्वयं ही खाएंगे. उसे जब इस ढकोसले से चिढ़ होने लगी तो कमरे में चली गई.

थोड़ी देर बाद जाबिर मियां ने प्रवचन शुरू किया. उन्होंने संबोधन के कुछ शब्द ही बोले थे कि दरवाजा खटखटाने की आवाज आई. कमरे से निकल कर आरजू ने जब दरवाजा खोला तो सामने दादी अम्मा खड़ी थीं, साथ में साजिद और मेहनाज भी थे.

कुछ पल के लिए आरजू चौंकी, फिर ‘दादी अम्मा’ कहते हुए उन से लिपट कर रोने लगी. जब दादी अम्मा आंगन में आईं तो उन्हें जिंदा देख कर अफरातफरी मच गई. तीनों बेटे और बहुएं उन्हें भय व आश्चर्य से देखने लगे.

‘‘घबराओ नहीं, अम्मा जिंदा हैं. लेकिन तुम लोगों ने तो इन्हें जीतेजी मार ही दिया था. जब इन्हें रोटी और कपड़ों की जरूरत थी तो पूछा नहीं और अब पकवानों व कपड़ों के ढेर लगा रहे हो. और ये लोग प्रवचन कर रहे हैं, इन की झूठी मौत का बहाना बना कर कमाई कर रहे हैं,’’ साजिद ने अपने दिल की भड़ास निकाल डाली.

आंगन में सन्नाटा सा छा गया. हाजी फुरकान और उन के साथ आए कठमुल्लों की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. उन्होंने वहां से खिसकने में ही भलाई समझी. कठमुल्लों के जाने के बाद सारे बच्चे अम्मा से लिपट गए.

‘‘कहां चली गई थीं, दादी अम्मा, मुझे छोड़ कर?’’ आरजू ने आंसू पोंछते हुए पूछा.

‘‘मैं बताता हूं,’’ साजिद ने कहा. और फिर साजिद ने जो बताया उसे सुन कर बेटे और बहुएं शर्म से गड़ गए.

दरअसल, पिछली बार जब दादी अम्मा बीमार पड़ीं तो वे लापरवाह बेटों व बहुओं पर बोझ बनने और अपनी देखभाल न हो पाने के दुख से बचने के लिए दूसरे शहर में बुजुर्गों की देखभाल करने वाले संस्थान में चली गईं, ताकि बाकी जिंदगी वहीं काट सकें. वे साजिद और मेहनाज के पास भी यह सोच कर नहीं गईं कि जब सगे बेटेबहुएं अपने नहीं हुए तो दूर के रिश्तेदार पर बोझ क्यों बना जाए. इस की जानकारी होने पर साजिद और मेहनाज ने तमाम दौड़धूप के बाद उन का पता लगाया और किसी तरह उन्हें वापस घर आने के लिए राजी किया.

‘‘अम्मा, हमें माफ कर दो. हम से बड़ी भूल हो गई. अब हम कभी ऐसा नहीं करेंगे. हमें एक मौका दे दो,’’ कहते हुए तीनों बेटे और बहुएं दादी अम्मा के पास आ गए. उन्होंने एकएक कर के सब को गले लगाया. ऐसा करते उन की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए.

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