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Long Hindi Story: वे दो अनमोल दिन – पहला भाग

Long Hindi Story, लेखक – शकील प्रेम

विनय के पास इनोवा जैसी 2 गाडि़यां थीं. एक वह खुद चलाता था और दूसरी गाड़ी किराए पर दी हुई थी. विनय बिहार के दूरदराज इलाकों तक सवारियों को ले जाता था. हालांकि, ज्यादातर सवारियां रेलवे स्टेशन तक की होती थीं.

सुबह ही विनय की गाड़ी को भगीरथ नाम के एक आदमी ने बुक किया था, जो इस वक्त ड्राइवर की पिछली सीट पर बैठा था. 7 सीटों वाली इनोवा कार में विनय समेत कुल 8 लोग बैठे थे, जिन्हें मोतिहारी से पटना तक जाना था. वे सभी भगीरथ के परिवार के लोग थे. मोतिहारी से पटना का सफर 6 घंटे का था.

गाड़ी के अंदर लगे बैक मिरर पर विनय की नजर पड़ी, तो उस में एक खूबसूरत सा चेहरा नजर आया.

सवारियों में एक शादीशुदा खूबसूरत औरत थी, जिस के बगल में ही भगीरथ बैठा था, जो शायद उस खूबसूरत औरत का पति था.

विनय ने गाड़ी स्टार्ट की और मोतिहारी की भीड़ भरी सड़कों से आगे हाईवे पर आ गया. कभीकभार वह बैक मिरर में झांक कर उस खूबसूरत औरत को देख लेता था.

पीछे बैठी उस औरत के चेहरे पर एक अजीब सी खामोशी थी. यह खामोशी थी या उदासी विनय समझ नहीं पा रहा था.

मुजफ्फरपुर हाईवे पर गाड़ी पहुंचते ही विनय ने म्यूजिक सिस्टम को औन किया. एक रोमांटिक गाना बजना शुरू हुआ, ‘प्यार कभी कम नहीं करना…’

यह गाना बजना शुरू ही हुआ था

कि पीछे बैठी वह खूबसूरत औरत झल्लाते हुए बोली, ‘‘प्लीज… यह गाना बंद कर दो.’’

विनय ने तुरंत उंगली से म्यूजिक सिस्टम का अगला बटन दबा दिया और ‘जिंदगी का सफर, है ये कैसा सफर, कोई समझ नहीं, कोई जाना नहीं…’ गीत बजने लगा.

इस गाने के बजने के साथ ही विनय ने आवाज को कम कर दिया, तभी फिर वही आवाज विनय के कानों में आई, ‘‘आवाज क्यों कम की?’’

आवाज को तेज करते हुए विनय समझ गया था कि पीछे बैठी औरत को शायद पुराने गाने पसंद हैं.

विनय की गाड़ी मुजफ्फरपुर हाईवे पर तेजी से दौड़ रही थी. टोल आने से पहले ही विनय को गाड़ी रोकनी पड़ी, क्योंकि पीछे बैठी एक बूढ़ी औरत को उलटियां होने लगी थीं. गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे तीनों लोग नीचे उतरे और उस बूढ़ी औरत को संभालने लगे.

भगीरथ अपनी पत्नी को डांटते हुए बोला, ‘‘सुमन, तुम्हें सुबहसुबह परांठे बनाने की क्या जरूरत थी… तुम मेरी मां को मारना चाहती हो.’’

सुमन कुछ नहीं बोली और पानी से अपनी सास के मुंह को अच्छी तरह साफ कर उन्हें थामते हुए गाड़ी में
ले आई.

जब सुमन की सास गाड़ी में बैठ गईं, तो सुमन ने अपने हाथ धोए और पानी पीने के बाद उस ने विनय की ओर पानी की बोतल बढ़ाते हुए कहा, ‘‘पानी पी लीजिए.’’

भगीरथ के साथ आया एक लड़का विनय के बराबर में बैठा था, जिसे सुमन की यह हरकत पसंद नहीं आई. वह सुमन की ओर देखते हुए बोला, ‘‘भाभी, ड्राइवर को प्यास लगेगी तो वह खुद पानी पी लेगा. तुम्हें ज्यादा मदर टैरेसा बनने की जरूरत नहीं है.’’

विनय ने गाड़ी स्टार्ट की और आगे बढ़ गया. पीछे बैठा भगीरथ धीमी आवाज में सुमन से कुछ कह रहा था और सुमन सिर नीचे किए सुने जा रही थी.

एक घंटे के बाद भगीरथ के कहने पर विनय ने मुजफ्फरपुरपटना हाईवे के किनारे एक रैस्टोरैंट पर गाड़ी रोक दी. भगीरथ का परिवार गाड़ी से उतर कर सीधा रैस्टोरैंट की ओर बढ़ गया.

सब से आगे भगीरथ अपनी मां के हाथ को थामे चल रहा था, उस के पीछे परिवार के बाकी लोग थे और सब से पीछे सुमन थी.

सुमन को देख कर कोई कह नहीं सकता था कि वह भी भगीरथ के परिवार का हिस्सा है. भगीरथ को तो अपनी पत्नी की जरा भी परवाह नहीं थी और ऐसा लगता था कि सुमन ने भी परिवार की परवाह करना छोड़ दिया था.

रैस्टोरैंट में अंदर दाखिल होने से पहले सुमन ने विनय की ओर देखा और हाथ के इशारे से कुछ खा लेने को कह कर वह अंदर दाखिल हो गई.

विनय के लिए यह लमहा बेहद भावुकता भरा था. विनय की उम्र 27 साल थी और उस की 3 साल पहले शादी हो चुकी थी, लेकिन शादी के 2 महीने बाद ही विनय की बीवी मीनाक्षी अपने पहले प्रेमी के साथ चली गई थी.

विनय तभी से औरतों से नफरत करता था, लेकिन सुमन जैसी औरत को देख कर उसे एहसास हुआ कि कुछ औरतों के वजूद में ही मुहब्बत की खुशबू होती है.

सुमन के प्रति विनय का खिंचाव हर पल बढ़ता जा रहा था, लेकिन उसे पता था कि बस कुछ ही देर में मुहब्बत की यह खुशबू दुनिया की भीड़ में हमेशा के लिए खो जाएगी.

रैस्टोरैंट से निकलते भगीरथ को देख कर विनय ने गाड़ी का दरवाजा खोल दिया. विनय की नजरें सब से पीछे चल रही सुमन को ढूंढ़ रही थीं. सभी के गाड़ी में बैठने के बाद सुमन भी बैठ गई और विनय ने गाड़ी को स्टार्ट कर वहां से आगे बढ़ा ली.

पीछे बैठा भगीरथ सुमन पर चिल्ला रहा था, ‘‘तुम्हारे मांबाप ने यही सिखाया है कि किसी की इज्जत न करो. अरे, अगर तुम मां के साथ टौयलेट में चली जाती तो छोटी हो जाती. मेरी किस्मत ही खराब थी, जो तुम जैसी औरत मेरे गले पड़ गई.’’

भगीरथ गुस्से में था. अपने बेटे के गुस्से को शांत करने के बजाय भगीरथ की मां उस के गुस्से को और भड़काने में लगी थीं, ‘‘जाने दे बेटा, किस्मत तो मेरी फूटी थी, जो मैं ने सोहनलाल की बेटी के रिश्ते को ठुकरा कर इस नकचढ़ी से तेरी शादी कराई.’’

दोनों मांबेटे के बीच बैठी सुमन बिलकुल खामोश थी. उस की आंखों में आए आंसू भी सूख चुके थे. विनय के लिए सुमन के साथ होने वाला यह बरताव बरदाश्त से बाहर की बात थी, लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था.

तभी भगीरथ की तेज आवाज विनय तक आई, ‘‘भैया, थोड़ा तेज चलाओ.

5 बज कर 10 मिनट पर हमें पटना से चेन्नई की ट्रेन पकड़नी है. और 4 यहीं बज गए हैं.’’

विनय ने कहा, ‘‘आप चिंता न कीजिए. मुझे खुद भी जल्दी है, क्योंकि आप लोगों को स्टेशन छोड़ने के बाद मुझे घर भी लौटना है.’’

विनय ने गाड़ी की स्पीड बढ़ाई और थोड़ी देर में ही वह गांधी सेतु पर पहुंच गया. भयंकर ट्रैफिक जाम से निकलते ही पटना स्टेशन आ गया.

विनय ने गाड़ी की छत से सामान उतारना शुरू किया. गाड़ी की छत पर सुमन का सूटकेस भी था, जिस के लिए वह खड़ी थी.

तभी भगीरथ सुमन के करीब आया और उस ने एक जोरदार थप्पड़ सुमन के गाल पर जड़ दिया, ‘‘तुम्हें अपने सूटकेस की पड़ी है और गाड़ी में जो सामान है, उस की कोई चिंता नहीं. वह सामान क्या तुम्हारा बाप उठाएगा.’’

विनय के मन में आया कि वह अभी छत से नीचे उतरे और भगीरथ को जान से मार दे, लेकिन तभी सुमन ने उस की ओर देखा जैसे कह रही हो कि ‘गुस्से पर काबू पाओ विनय’.

सुमन के कंधे पर एक भारी बैग था और उस के हाथ में एक सूटकेस था, जिसे वह घसीटते हुए भगीरथ के परिवार के पीछेपीछे चल रही थी. भगीरथ सामान उठाने के लिए कुली भी कर सकता था, लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया. भगीरथ सारा सामान परिवार वालों के हाथों में दे कर खुद खाली हाथ चल रहा था.

विनय को अपनी गाड़ी का किराया मिल चुका था. अब वह अपनी गाड़ी ले कर घर जा सकता था, लेकिन सुमन अभी उस की आंखों से ओझल नहीं हुई थी.

प्लेटफार्म नंबर एक की ओर मुड़ते हुए सुमन ने पीछे मुड़ कर विनय की ओर देखा और फिर विनय की आंखों से ओझल हो गई.

विनय ने गाड़ी स्टार्ट की और उसे सड़क पर एक साइड में खड़ी कर प्लेटफार्म नंबर एक की ओर बढ़ गया. विनय को खुद नहीं मालूम था कि वह प्लेटफार्म पर क्यों जा रहा है. उसे न गाड़ी की फिक्र थी और न ही अपनी कोई चिंता थी. वह तो सुमन के सम्मोहन में खोया हुआ था.

ऐसा नहीं था कि विनय सुमन की खूबसूरती के सम्मोहन में उस के पीछे चल पड़ा था, बल्कि विनय को सुमन की चिंता सता रही थी, इसलिए वह प्लेटफार्म नंबर एक की तरफ बढ़ गया.

पटना स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर खड़ी चेन्नई जाने वाली ट्रेन खचाखच भरी हुई थी. विनय ने भीड़ में सुमन को ढूंढ़ना शुरू किया. इसी बीच गाड़ी तेज हौर्न के साथ प्लेटफार्म से खिसकना शुरू हो गई. बहुत से लोग तेजी से चलती ट्रेन में घुस रहे थे.

विनय को लगा कि सुमन और उस का परिवार ट्रेन में बैठ चुका है, फिर भी वह गाड़ी को प्लेटफार्म से पूरी तरह चले जाने का इंतजार करने लगा.

जब ट्रेन पूरी तरह आंखों से ओझल हो गई, तब ही विनय प्लेटफार्म से बाहर जाने के लिए एक तरफ मुड़ा, तभी उस के सामने सुमन खड़ी नजर आई.

सुमन को देख कर विनय बुरी तरह चौंक गया. सुमन के हाथों में सिर्फ उस का सूटकेस था. विनय ने सूटकेस अपने हाथों में लिया और बोला, ‘‘सुमनजी, लगता है, आप की ट्रेन छूट गई है. आप अपने घर फोन कर दीजिए, मैं आप को आप के घर तक छोड़ दूंगा.’’

सुमन ने अपने हाथ में पकड़ी पानी की बोतल विनय की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मेरा कोई घर नहीं है.’’

विनय ने हैरानी भरी आवाज में कहा, ‘‘आप ऐसा क्यों बोल रहीं हैं? आप लोग मोतिहारी से बैठे थे न. वहीं आसपास आप की ससुराल होगी. ससुराल नहीं जाना हो तो मायके चली जाइएगा. बताइए, मैं आप को कहां तक छोड़ दूं?’’

सुमन ने विनय से पूछा, ‘‘क्या यहां आसपास कोई लौज होगा? चेन्नई की अगली ट्रेन 2 दिन के बाद इसी प्लेटफार्म से खुलेगी, तब तक के लिए मुझे स्टेशन के नजदीक के किसी लौज में ठहरने का बंदोबस्त कर दीजिए.’’

विनय ने कहा, ‘‘क्या आप का पति अगले स्टेशन पर उतर कर आप को यहां से नहीं ले जाएगा?’’

सुमन ने कहा, ‘‘मेरे पैरों में दर्द है, जिस की वजह से ट्रेन खुलते समय मैं पीछे रह गई. उन्होंने मुड़ कर भी नहीं देखा. ट्रेन खुल गई तो मैं ने उन्हें फोन किया, तो उन्होंने कहा कि नजदीक के लौज में ठहर जाओ, अगली ट्रेन से चेन्नई आ जाना.

मुझे कल सुबह तत्काल में अगली ट्रेन की रिजर्वेशन भी करवानी है, इसलिए स्टेशन के पास ही कोई लौज मिल जाए तो बेहतर होगा.’’

विनय ने कहा, ‘‘क्या आप के पति आप की टिकट करवा कर आप के ह्वाट्सएप पर नहीं भेज सकते? यह जिम्मेदारी तो उन की है न…’’

सुमन ने कहा, ‘‘प्लीज, आप लौज दिलवा दीजिए.’’

विनय ने कहा, ‘‘देखिए सुमनजी, यहां लौज तो मिल जाएगा, लेकिन आप अकेली हैं और यहां के माहौल से
भी आप बिलकुल अनजान हैं. अगर आप को मुझ पर भरोसा हो, तो आप मेरे घर चल सकती हैं. वहां मेरी मां और मेरी छोटी बहन हैं. उन के साथ आप का मन लग जाएगा. कल सुबह मैं ही आप की तत्काल टिकट निकलवा दूंगा और आप को यहां से ट्रेन में भी बिठा दूंगा.’’

सुमन काफी देर सोचती रही, फिर विनय के साथ उस के घर जाने को तैयार हो गई. एक अजनबी शहर में एक अजनबी के साथ अनजानी राहों पर सुमन की जिंदगी की गाड़ी विनय की गाड़ी के साथ चल रही थी. जिंदगी के इस सफर में सुमन को एक अनजाना सा हमराही मिल गया था, जिस पर उसे न जाने क्यों पूरा भरोसा था.

पटना से मोतिहारी के 6 घंटे के सफर में सुमन विनय के बगल वाली सीट पर खामोशी से बैठी रही. इस बीच विनय ने भी उस से कोई सवाल नहीं किया. जिस औरत की जिंदगी ही एक सवाल हो, उस से दूसरा सवाल भी क्या करना?

विनय की इनोवा की अगली सीट पर बैठी सुमन की आंखे बंद थीं. शायद थकान की वजह से वह सो गई थी या आंखें बंद कर अपनी जिंदगी की दुश्वारियों में खो चुकी थी.

विनय बारबार सुमन के खूबसूरत चेहरे को देखता और फिर नजरें घुमा लेता.

रात के 12 बज चुके थे. विनय ने सोती हुई सुमन को आवाज दी, ‘‘सुमनजी, मेरा घर आ गया है.’’

विनय सूटकेस ले कर घर में दाखिल हुआ. सामने विनय की मां और उस की बहन लता खड़ी थीं. विनय के साथ एक खूबसूरत औरत को देख कर वे दोनों काफी हैरान थीं.

विनय ने अपनी मां से कहा, ‘‘मां, ये सुमनजी हैं. इन की ट्रेन छूट गई है, तो मैं इन्हें अपने घर ले आया हूं. 2 दिन बाद अगली ट्रेन है, उस से ये चली जाएंगी.’’

सुमन का सूटकेस लता ने अपने हाथों में लिया और सुमन को ले कर अपने कमरे में चली गई.

अगली सुबह विनय को बहुत सारा काम था. सुमन का तत्काल टिकट करवाना था और सुमन के साथ कुछ वक्त भी गुजारना था, वरना वह 2 अजनबी महिलाओं के साथ बोरियत महसूस करती.

विनय की बहन लता सुमन के साथ घुलमिल गई थी. वह तो सुमन से ऐसे खुश थी जैसे सुमन उस की भाभी हो. सुमन नहाधो कर फ्रैश हो चुकी थी. नए सूट में वह और भी खूबसूरत लग रही थी.

मां ने सुबह का नाश्ता तैयार कर दिया और चारों ने साथ बैठ कर नाश्ता किया. सुमन के घर में आने से घर की रौनक बढ़ गई थी, लेकिन यह रौनक सिर्फ अगले दिन के लिए ही तो थी.

नाश्ते के बाद विनय सुबहसवेरे सुमन की तत्काल टिकट निकलवा लाया और सुमन के हाथों में टिकट रखते हुए वह धीरे से बोला, ‘‘यह लीजिए, कल शाम 5 बज कर 10 मिनट पर चेन्नई की टिकट.’’

सुमन ने विनय के हाथों से टिकट थामते हुए विनय की ओर देखा और बोली, ‘‘टिकट के कितने रुपए देने हैं?’’

विनय ने कहा, ‘‘आप रुपयों की टैंशन छोडि़ए, जब सहीसलामत चेन्नई पहुंच जाना, तो मुझे एक फोन कर देना. बस, वही मेरा मेहनताना होगा.’’

टिकट को मुट्ठी में भींचे सुमन कमरे की ओर बढ़ गई. टिकट कंफर्म होने की कोई खुशी सुमन के चेहरे पर नहीं थी, बल्कि वह चेन्नई जाने का नाम सुन कर ही उदास हो गई थी.

विनय ने लता को आवाज दी और कहा, ‘‘लता, देखो मौसम कितना सुहाना है, तुम सुमन को नदी के किनारे वाले हमारे बगीचे में घुमा लाओ. उन्हें अच्छा लगेगा और दिन भी कट जाएगा. दोपहर तक आ जाना, तब तक खाना तैयार हो जाएगा. फिर सब साथ ही बैठ कर खाएंगे.’’

विनय की बात सुमन ने भी सुन ली थी. वह बोली, ‘‘लता के साथ आप भी चलो न बगीचे में.’’

सुमन की बात सुन कर लता मन ही मन मुसकराई और बोली, ‘‘भैया, आप और सुमनजी दोनों ही बगीचे में चले जाओ. मुझे पढ़ाई करनी है. 2 दिन बाद मेरा इम्तिहान है.’’

थोड़ी ही देर में विनय और सुमन नदी के किनारे बैठे थे. हवा का तेज झांका जब भी सुमन के चेहरे पर पड़ता, उस के खूबसूरत बाल हवा में लहराने लगते. सुहाना मौसम, नदी का किनारा और विनय जैसे आदमी का साथ पा कर सुमन बहुत खुश थी और विनय के लिए भी यह जिंदगी का सब से खूबसूरत पल था.

तभी सुमन की खूबसूरत आवाज विनय के कानों तक आई, ‘‘विनय, पता है, आसमान और जमीन कभी नहीं मिल पाते, लेकिन ये बादल और यह मौसम ही दोनों को मिला देते हैं. आसमान में उठती हवाएं और आसमान के बादलों से बरसती बूंदें कुछ पल के लिए आसमान और जमीन को एक कर देती हैं.’’

विनय को सुमन की बातों की गहराई सम?ा नहीं आई. वह बोला, ‘‘सुमनजी, क्या मैं आप के बारे में कुछ जान सकता हूं?’’

सुमन ने गहरी सांस ली और कहा, ‘‘भगीरथ से मेरी शादी पिछले साल ही हुई थी. मैं गोपालगंज की रहने वाली हूं और भागीरथ का गांव मोतिहारी है.

2 साल पहले जब मैं बीए में थी, तभी भागीरथ का रिश्ता आया. उस वक्त मैं प्रकाश से प्यार करती थी.
प्रकाश गरीब परिवार से था और जाति भी उस की अलग थी. वह आजीविका के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था. भगीरथ सरकारी नौकरी में था और पिछले कई सालों से चेन्नई में पोस्टैड था.

‘‘सरकारी नौकरी के चक्कर में मेरे घर वालों ने भगीरथ से मेरी शादी कर दी. मैं चाह कर भी कुछ न कर पाई.

10 दिन पहले भगीरथ के पापा का देहांत हुआ, तो वह अपने परिवार के साथ गांव आया था.

‘‘मैं शादी के बाद भगीरथ के संग चेन्नई चली गई. शादी के बाद मैं भी बहुत खुश थी, लेकिन मेरी यह खुशी जल्दी ही खत्म हो गई. भगीरथ में प्यार नाम की कोई चीज नहीं है. वह छोटीछोटी बात पर मुझे डांटता है और कई बार हाथ उठा देता है. उस के घर वाले भी उसी का साथ देते हैं. भगीरथ के घर में नौकरानी से ज्यादा मेरी कोई औकात नहीं.’’

‘‘मायके में मेरे भैयाभाभी के अलावा कोई नहीं है. मां पहले ही मर चुकी थीं और मेरी शादी के अगले महीने ही मेरे पिताजी भी गुजर गए. तब मैं चेन्नई में थी और भगीरथ ने मुझे अपने पिता के अंतिम संस्कार में भी नहीं आने दिया था.’’

इतना कह कर सुमन फफकफफक कर रोने लगी. विनय को समझ नहीं आ रहा था कि सुमन को बिना हाथ लगाए चुप कैसे कराए. आखिरकार विनय ने सुमन के सिर पर हाथ रखा और बोला, ‘‘सुमन, चुप हो जाओ. थोड़ी देर में बारिश होने वाली है. हमें घर चलना चाहिए.’’ Long Hindi Story

Hindi Funny Story: गिरगिर रिकौर्ड गिर

Hindi Funny Story: जबजब सज्जनों की तर्ज पर मैं गलती से सच्ची में नेकी वाला कोई काम करता हूं, तो हफ्ताभर शर्म से सिर नीचा किए रहता हूं. यह सोच कर कि जन्मजात समाज विरोधी काम करने वाले गधे, यह तू ने क्या कर दिया? इसे आप सीधेसीधे यों भी कह सकते हैं कि शायद मुझे नेकी का काम करते हुए शर्म आती है.

दरअसल, मैं अपने हाथ चलाता बुरे काम के लिए हूं और उन से गलती से यों अच्छा काम हो ही जाता है. इसे आप मेरी नहीं, बल्कि मेरे हाथों की लापरवाही भी कह सकते हैं.

अच्छा काम गलती से हो जाने के बाद पछतावे के तौर पर सिर नीचा किए मैं सुबह सैर को निकला था कि सामने रुपया गिरने की बेशर्मी के सारे रिकौर्ड तोड़़ने के बाद भी गर्व से सिर ऊंचा किए सीना ताने चला आ रहा था जौगिंग करता हुआ.

मैं दिमाग से ही नहीं, दिल से भी मानता हूं कि आज समाज में बेशर्मों की जयजयकार का जमाना है. मैं दिमाग से ही नहीं, दिल से भी मानता हूं कि आज समाज में बेशर्मों की हुंकार का जमाना है. फिर भी पता नहीं क्यों आप से यों ही पूछ रहा हूं कि ये बेशर्म टाइप के लोग ऐसे क्यों होते होंगे भाई साहब? इन्हें इज्जतबेइज्जती में कोई फर्क नजर आता होगा कि नहीं?

कर ले प्यारे रुपए, अपने आज तक के अपने सब से निचले स्तर पर गिरने के बाद भी इतराते हुए जितनी चाहे जौगिंग. कर ले प्यारे रुपए, अपने आज तक के निचले स्तर पर गिरने के बाद भी इतराते हुए जितनी चाहे अपनी सेहत सुधारने के लिए सैर. गले में स्मार्ट वाच लटकाए रोज 10 हजार स्टैप्स चल, चाहे 20 हजार. अपनी सेहत के हित में जिस की सेहत बिगाड़ने वाले सड़क से संसद तक बैठे हों, उस की सेहत में सुधार वह खुद तो क्या, कुदरत भी नहीं कर सकती.

वह चाहे कितनी ही जौगिंग कर ले. वह चाहे कितनी ही सैर कर ले. वह कितने ही अपनी सेहत सुधार के लिए स्वदेशी से ले कर विदेशी टौनिक ले ले. उस की अपनी सेहत सुधार के लिए हर इंपोर्टेड टौनिक उस की सेहत बिगाड़ने वालों को ही लगते हैं. टौनिक वह लेता है और हट्टेकट्टे वे होते हैं बिस्तर पर लेटेलेटे. इन दिनों पेट मेहनत की खाने वालों के बढ़ते देखे गए हैं, दूसरों के हिस्से की खाने वालों के नहीं.

खुद हद का गिरा हुआ होने के बावजूद भी हर टाइप के गिरे हुए की तरह उस गिरे हुए से भी बात करने को मन तो नहीं हो रहा था, फिर भी पता नहीं उस से क्यों बात कर बैठा? मतलबी से मतलबी आदमी किसी से बात किए बिना आखिर कब तक रह सकता है.

‘रुपया भाई, एक बात तो बताना बुरा न लगे तो, रिकौर्ड स्तर पर गिरने के बाद भी तुम इतनी जिंदादिली से यह सब कैसे कर लेते हो? रोजरोज गिरते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती क्या? अब तो जनता पर रहम करो.

‘अरे यार, मेरी तरह ऊपर उठ नहीं सकते तो कम से कम कुछ दिनों के लिए वहां तो रुक जाया करो जहां गिरते हो. मुझे तुम्हारा सबकुछ पसंद है, लेकिन रोजरोज गिरना कतई पसंद नहीं.

‘अपने हो, इसलिए कह रहा हूं. पड़ोसी होते तो कुछ न कहता. जितना गिरना होता गिरते रहते, मेरी
बला से.’

इस पर रुपए ने कहा, ‘रहम करें वे जो मुझे गिरातेगिराते ऊपर से ऊपर उठे जा रहे हैं. वैसे डियर, गिरा हुआ यहां कौन नहीं? यहां पलपल कौन नहीं गिर रहा बंधु. यहां नंदू से ले कर चंदू तक सब तो गिर रहे हैं.

‘किसी का यहां ईमान गिर रहा है, तो किसी का सम्मान. कोई अपने कर्म से गिर रहा है, तो कोई जीने के मर्म से. यहां गिरना सच है तो ऊपर उठना ?ाठ. ऐसे में मु?ा गिरे हुए को काहे की शर्म? शर्म वे करें जिन्हें गिरने में शर्म महसूस होती हो.

‘हां, शुरूशुरू में गिरने पर शर्म जरूर महसूस होती थी. पर जब कोई बारबार गिरने लग जाए तो वह शर्म से ऊपर उठ जाता है. बारबार गिरने की लत लग जाने के बाद उसे नैतिकता की कितनी ही ब्रांडेड घुट्टियां पिला लो, उसे उठने को जोर देने के लिए कितने ही प्रवचन सुना लो, पर तब वह पलपल गुनगुनाता हुआ, इतराता हुआ गिरता ही जाता है, क्योंकि तब उस की जिंदगी का एकलौता मकसद बचता है, बस गिरना… गिरना… गिरना…

‘अब तो हर गिरने वाले की तरह मुझे भी अपने रोजाना गिरने पर खुशी नहीं, बहुत खुशी होती है. अब सब की तरह चाहता हूं कि मैं अपने गिरने के रोज अपने रिकौर्ड अपनेआप ही तोड़ता रहूं, इसलिए जबजब पिछले गिरने के रिकौर्ड से और नीचे गिरता हूं, तो अपने गिरने पर जम कर अब्दुल्ला हो नागिन डांस कर लेता हूं. खुद को खुद की बांहों में जी भर लेता हूं.

‘दोस्त, इज्जत की कुरसियों पर लेटे रोजाना गिरने वालों से पूछो तो पता चले कि आज गिरने में कितना मजा छिपा है.

‘आज मेहनत करतेकरते ऊपर उठना सब से बड़ी गलती है. दूसरे, मेहनत करते हुए कोई आज ऊपर उठ भी नहीं सकता. मेहनत के बाद भी गिरे किसी को कहां उठने देते हैं? गिरने के लिए कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती.

तुम्हारे पास दूर तक देखने की नजर नहीं है तो लो, मेरी दूरबीन से देखो, यहां जो आज जितना गिरा हुआ है, वह आज उतना ही इज्जत से उठा हुआ है.

‘आज इज्जत ऊपर उठने वालों की नहीं, गिरने वालों की है. समाज आज इज्जत ऊपर उठने वालों को नहीं, गिरने वालों को देता है. ऐसे में रिकौर्ड गिरने के बाद भी जो मैं शान से फिट रहने की कोशिश कर रहा हूं, तो तुम्हारे पेट में मरोड़ क्यों उठ रही है?’ रुपए ने मेरे माथे पर आया पसीना पोंछा और नकटा आगे हो लिया.

बेशर्मों के क्या सींग होते हैं भाई साहब… Hindi Funny Story

Family Story In Hindi: सोमा

Family Story In Hindi, लेखक – रंगनाथ द्विवेदी

सोमा अपने 2 कमरे के मकान में बिलकुल अकेली रहती थी. ऐसा नहीं है कि अकेले रहना उस का कोई शौक था. दरअसल, उस के मांबाप उसे बचपन में ही अकेला छोड़ कर इस दुनिया से चले गए थे. उन के मरने के बाद सोमा घर में बिलकुल अकेली रह गई थी.

सोमा के मम्मीपापा ने गैरजातीय ब्याह किया था, जिस की नाराजगी की वजह से सोमा के मम्मीपापा से उन के घर वालों ने अपना सारा रिश्ता हमेशाहमेशा के लिए खत्म कर लिया था.

अनाथ और बेसहारा सोमा ने मेहनतमजदूरी कर के खुद को बिना किसी सहारे के पालापोसा था. अब वह पूरे 24 साल की हो चुकी थी. उस का रंग यों तो सांवला था, लेकिन उसे कुदरत ने इतनी अच्छी शक्लसूरत दी थी कि वह किसी भी गोरी लड़की से ज्यादा खूबसूरत लगती थी.

एक तरह से कहूं तो सोमा मुझे मन ही मन बहुत पसंद थी, लेकिन अपने दिल की बात उस से कहने की कभी मेरी हिम्मत ही नहीं पड़ती थी.

इस की सब से बड़ी वजह थी सोमा का झगड़ालू स्वभाव. अकसर जब मैं दफ्तर जाने के लिए तैयार हो कर अपने घर से निकलता था, तो उसे रोजाना महल्ले में किसी न किसी से जोरजोर से लड़तेझगड़ते हुए देखता था.

कभीकभार तो सोमा औरतों और मर्दों को ऐसीऐसी गालियां दे देती थी कि अच्छेअच्छे गाली देने वालों तक की टैं बोल जाए. सच तो यह था कि पूरी कालोनी ही उस के इस झगड़ालू स्वभाव की वजह से उस से बचती थी.

यहां तक कि महल्ले के ऐसे जवानजहान लड़के भी सोमा को देखते ही अपना रास्ता बदल लेते थे, जो दूसरी जवान लड़कियों पर दिनभर डोरे डालने की फिराक में रहा करते थे. उन्हें हमेशा यह डर लगा रहता था कि कहीं गलती से भी अगर सोमा की तरफ उन की आंख उठ गई, तो उन की इज्जत की खैर नहीं. न जाने कब वह चप्पल निकाल कर उन की धुनाई शुरू कर दे और लड़?ागड़ कर पूरे महल्ले को अपने सिर पर उठा ले.

आज लगातार यह चौथा दिन था, जब मेरे दफ्तर जाते समय मैं ने कालोनी में किसी औरत या मर्द से सोमा के झगड़ने और गालीगलौज देने की आवाज नहीं सुनी. शाम को जब मैं अपने दफ्तर से घर के लिए निकला, तो रास्तेभर यह सोचता हुआ अपने कमरे पर लौटा कि किसी तरह हिम्मत कर के आज मैं यह जानने की कोशिश करूंगा कि आखिर सोमा 3-4 दिन से कहां है?

यह एक तरह से मेरे दिल में सोमा के लिए छिपा हुआ वह प्यार ही था जो मुझे कहीं न कहीं सोमा की खोजखबर लेने के लिए बढ़ावा दे रहा था. लेकिन सवाल यह था कि मैं सोमा के बारे में कालोनी में किस से पूछूंगा कि आखिर वह 3-4 दिनों से दिख क्यों नहीं रही? क्या कोई बात है या कहीं वह किसी नातेरिश्तेदार के आने पर उस के साथ चली गई है?

लेकिन नातेरिश्तेदार वाला सवाल मेरे मन को जमा नहीं, क्योंकि जितना मैं ने सोमा के बारे में लोगों से जाना और सुना था, उस के मुताबिक ऐसा होना मुमकिन नहीं था.

फिर कुछ देर यों ही सोचते रहने के बाद मैं खुद ही डरता और मन ही मन कांपता हुआ सोमा के उस 2 कमरे की मकान की तरफ चल पड़ा.

जब मैं उस के मकान के पास पहुंचा तो लगा कि जैसे अभी सोमा धड़धड़ाते हुए अपने कमरे का दरवाजा खोलेगी और मुझ से बिना कुछ पूछे बेतहाशा झगड़ पड़ेगी.

लेकिन यह मेरा भरम ही साबित हुआ, क्योंकि सोमा का दरवाजा बिना खटखटाए ही भला वह कैसे जान सकती थी कि मैं उस के दरवाजे के पास खड़ा हूं.

फिर थोड़ी देर मैं ने खुद को सोमा के घर के दरवाजे के सामने सामान्य हो लेने दिया. जब खुद को काफी सामान्य महसूस किया, तो मैं ने हिम्मत कर के उस के दरवाजे की सांकल खटखटा कर पूछा, ‘‘कोई है?’’

लेकिन मेरे ‘कोई है?’ कहने में वह दम नहीं था, जो अगले को साफ सुनाई दे. एक बार फिर मैं ने किसी तरह जोर से सांकल बजाने के साथ ही कहा, ‘‘कोई है?’’

इस बार शायद मेरी आवाज को सोमा ने सुन लिया लिया था, क्योंकि अंदर से आवाज आई, ‘‘कौन है?’’
मैं ने जब गौर किया तो मुझे एकबारगी यकीन ही नहीं आया कि यह उसी सोमा की आवाज थी, जो अगर एक बार बोल देती थी तो कालोनी के किसी भी आदमी या औरत की घिग्गी बंध जाती थी.

सोमा ने फिर कहा, ‘‘कौन है?’’

मैं ने कहा, ‘‘जी मैं.’’

‘‘अरे, कौन मैं?’’ इस बार सोमा ने अपनी आवाज कड़क करने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन मुझे साफसाफ लग रहा था कि उस दबंग सोमा की आवाज यह भी नहीं थी.

कुछ देर बाद पता नहीं सोमा ने क्या सोचा और कहा, ‘‘अच्छा, ठीक है. अंदर आ जाओ.’’

जब मैं कमरे के अंदर सोमा के पास पहुंचा, तो मैं ने उसे एक पुराने से बिस्तर पर लेटे हुए देखा. मैं यह अच्छे से समझ गया था कि सोमा की तबीयत ठीक नहीं है.

फिर सोमा धीरे से बोली, ‘‘अरे, अंबर तुम.’’

हालांकि सोमा ने चौंकने की कोशिश की थी, लेकिन मैं यह पहले ही जान गया था कि सोमा पहचान गई थी.
‘‘आओ, बैठो,’’ सोमा ने एक खाली पड़े हुए एक पुराने से स्टूल की तरफ इशारा किया.

मैं उस स्टूल पर बैठ तो गया, लेकिन चुपचाप अपना सिर नीचे किए रहा.

मेरी यह हालत देखने के बाद सोमा ने मुझ से खुद ही पूछा, ‘‘और बताओ अंबर, तुम मेरे पास किसलिए आए हो?’’

सोमा को इस तरह से बोलते हुए देख कर मुझे भी थोड़ी सी हिम्मत हुई, तो मैं ने कहा, ‘‘तुम 3-4 दिनों से दिखी नहीं, इसलिए मैं ने सोचा कि क्यों न तुम्हारे घर चल कर तुम्हारा हालचाल जान लिया जाए.’’

मेरे इतना कहने के बाद सोमा कुछ देर अपलक मेरे चेहरे की तरफ देखती रही, जैसे वह मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही हो.

कुछ देर के बाद सोमा बोली, ‘‘तुम झूठ बोल रहे हो अंबर. तुम ने 3-4 दिनों से महल्ले में मुझे किसी से लड़तेझगड़ते या गालीगलौज देते हुए नहीं देखा, इसलिए तुम मेरे बारे में जानने के लिए घर चले आए.

‘‘लेकिन अंबर, यह भी तुम्हारा आधा ही सच है, पूरा नहीं. सच तो यह है कि तुम्हारे मन में कुछ और भी है, जिसे तुम केवल इसलिए मुझ से कह पाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हो कि कहीं मैं तुम्हारी बात सुन कर तुम से लड़नेझगड़ने न लगूं. यही बात है न अंबर?’’

मैं ने सिर झुकाए हुए ही छोटा सा अपना जवाव उसे ‘जी हां’ में दिया.

‘‘अंबर, तुम मुझ से साफसाफ क्यों नहीं कहते कि तुम मुझ से मन ही मन बहुत प्यार करते हो…’’

एक बार फिर मेरे मुंह से ‘जी हां’ निकल गया. और फिर जैसे मेरी हिम्मत जवाब दे गई और लगा कि यह मैं क्या कह गया? कहीं सच में सोमा मुझ से लड़नेझगड़ने और गाली न देने लगे.

लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, बल्कि सोमा अचानक से सुबक कर किसी मासूम सी बच्ची की तरह रोने लगी. मैं टुकुरटुकुर सोमा के चेहरे की तरफ देखता ही रहा. उसे चुप कराने की मेरी हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी.

कुछ देर रो लेने के बाद एक बार फिर सोमा बोली, ‘‘जानते हो अंबर… मैं पैदा होने के बाद पता नहीं कब और किस उम्र में रोई थी, इस का मुझे कुछ पता नहीं. मैं तो यह तक नहीं जानती थी कि ये आंखें रोने के लिए भी होती है. आज पहली बार तुम्हारी वजह से मेरी इन सूनी आंखों को रोने का सुख मिला है अंबर.’’

मैं ने पहली बार सोमा का ऐसा रूप देखा था, इसलिए मैं कुछ भी कह पाने की हालत में नहीं था.

सोमा फिर बोली, ‘‘मैं बहुत पहले से जानती हूं कि तुम मन ही मन मुझ से प्यार करते हो. अंबर, लेकिन मेरे स्वभाव की वजह से तुम्हारी हिम्मत कुछ कहने की नहीं हो पा रही थी. और मैं भला एक लड़की हो कर इतनी बेहया कैसे हो सकती थी कि तुम से अपने दिल की बात खुद कहती.

‘‘अंबर, मैं ने चाहे जैसा भी स्वभाव लोगों के मन में गढ़ा हो, वह एक तरह से मेरी मजबूरी थी, क्योंकि अगर मैं ऐसा न करती तो मुझे घर में अकेली जान कर इसी महल्ले के शरीफ और इज्जतदार लोग मु?ो कहीं का नहीं छोड़ते.

‘‘दूसरी आम लड़कियों की तरह मेरे भी अरमान हैं, लेकिन मेरे अनाथ होने का एहसास मुझे अंदर तक तोड़ देता है. तुम खुद सोचो अंबर, अगर मैं अनाथ न होती तो आज पूरे 4 दिनों से बुखार से तपतीतड़पती क्या मैं अकेले पड़ी होती. आज मेरे आसपास कोई यह तक पूछने वाला नहीं है कि मेरी तबीयत कैसी है?

‘‘यह देखो अंबर…’’ इतना कह कर सोमा ने अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ा दिया.

जब मैं ने सोमा का हाथ छुआ, तो बरबस ही मेरा हाथ उस के माथे पर भी पड़ गया. सोमा का माथा किसी गरम तवे की तरह जल रहा था.

मैं बोला, ‘‘अरे, सोमा. तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है और तुम चुपचाप घर में पड़ी हो. क्या तुम्हें अपने तबीयत की जरा भी फिक्र नहीं है…’’

सोमा तेज बुखार में भी मुसकराई और बोली, ‘‘बैठ जाओ अंबर. मुझे कुछ भी नहीं हुआ है. मैं 2-4 दिनों में ठीक हो जाऊंगी.’’

‘‘नहीं सोमा. तुम्हें तो किसी अच्छे डाक्टर को दिखाना चाहिए. यह शायद सोमा के प्रति अंबर का प्यार ही था, जो वह उस से इस हक से बोला, ‘‘अच्छा, तुम जल्दी से तैयार हो जाओ. मैं तुम्हें किसी अच्छे डाक्टर को दिखा लाता हूं.’’

‘‘नहीं अंबर, मैं ऐसे ही ठीक हूं. तुम अपने घर जाओ. तुम्हें परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है,’’ सोमा बोली.

थोड़ा रुक कर सोमा ने कहा, ‘‘तुम्हें नहीं पता जब कालोनी वाले मुझे तुम्हारे साथ अकेला जाते हुए देखेंगे तो वे मुझे चरित्रहीन भी समझना और कहना शुरू कर देंगे. तब शायद मैं इतनी बड़ी गाली बरदाश्त न कर पाऊं…’’

अंबर ने एक लंबी सांस ली, फिर वह बोला, ‘‘सोमा, ऐसी कोई नौबत ही नहीं आएगी. तुम इस की जरा भी चिंता मत करो.’’

सोमा बोली, ‘‘क्यों?’’

अंबर ने कहा, ‘‘क्योंकि तुम जैसे ही बुखार से ठीक होगी, हम उस के तीसरे ही दिन शादी कर लेंगे. तुम मेरी बात का यकीन करो और जल्दी से डाक्टर के यहां चलने के लिए तैयार हो जाओ.’’

सोमा धीरे से बिस्तर से उठी, लेकिन अंबर को लगा कि सोमा को खड़े होने में दिक्कत होगी, इसलिए उस ने सोमा को सहारा दे कर खड़ा किया.

सोमा चुपचाप दूसरे कमरे में चली गई. थोड़ी देर बाद जब वह उस कमरे से अपने कपड़े बदल कर बाहर निकली, तो उसे देख कर अंबर ने कहा, ‘‘चलो सोमा.’’

सोमा हलके से मुसकरा दी. उसे सबकुछ बड़ा अजीब सा लग रहा था. लगता भी क्यों न, आखिर आज पहली बार वह किसी के साथ कहीं बाहर जा रही थी. वह भी एक झगड़ालू, गालीगलौज देने वाली सोमा बन कर नहीं, बल्कि किसी के दिल की रानी बन कर. Family Story In Hindi

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