Family Story: धोखा – क्या संदेश और शुभ्रा शादी से खुश थे?

Family Story: संदेश और शुभ्रा ने एकदूसरे को पसंद कर शादी के लिए रजामंदी दी थी. दोनों के परिवारों ने खूब अच्छी तरह देखपरख कर संदेश और शुभ्रा की शादी करने का फैसला किया था. यह कोई प्रेम विवाह नहीं था. रिश्तेदारों ने ही ये रिश्ता करवाया था.

संदेश एमबीए कर के एक कंपनी में सहायक मैनेजर के पद पर काम कर रहा था, तो शुभ्रा भी एमए कर के सिविल सर्विस के लिए कोशिश कर रही थी. ऐसे में शुभ्रा के एक रिश्तेदार ने संदेश के बारे में शुभ्रा के मम्मीपापा को बताया. शुभ्रा के मम्मीपापा रिश्ते की बात करने के लिए संदेश के घर गए.

संदेश के पिताजी बैंक से रिटायर्ड थे तो मम्मी घरेलू औरत थी. इस तरह देखादिखाई के बाद संदेश और शुभ्रा की शादी हुई.

संदेश के मातापिता उस के बड़े भाई के साथ रहते थे, तो संदेश दूसरे शहर में सर्विस करता था, इसलिए संदेश के मातापिता ने शुभ्रा को उस के साथ भेज दिया, ताकि उन को रहनेखाने में कोई दिक्कत न हो.

शुभ्रा संदेश के साथ रहने के लिए इस शहर में चली आई. संदेश के परिवार ने शहर की एक अच्छी सोसाइटी में फ्लैट ले कर दे दिया था, ताकि बारबार किराए के मकान के बदलने से छुटकारा मिल जाए.

3 कमरों का यह फ्लैट तीसरी मंजिल पर था. शुभ्रा के आने से तो मानो फ्लैट महक उठा. सुबह जब संदेश औफिस चला जाता, तो शुभ्रा अपने हाथों से साफसफाई करती, झाड़पोंछ कर घर को एकदम साफसुथरा रखती.

शाम को जैसे ही संदेश घर आता, उस के हाथ से ब्रीफकेस ले कर शुभ्रा रखती. उस के शर्ट के बटन खोलती, फिर पहले पानी और उस के बाद दोनों इकट्ठा ही चायनाश्ता करते. शाम को कभी पार्क, कभी मौल, तो कभी किधर घूमने अकसर निकल जाते संदेश और शुभ्रा. नईनई शादी हुई है, तो दोनों एकदूसरे को टूट कर प्यार करतेकरते एकदूसरे की बांहों में ऐसे समा जाते कि सुबह ही आंखें खुलती.

एकदूसरे की बांहों में समाए, प्यार करतेकरते कब शादी की सालगिरह आ गई, पता नहीं चला. शुभ्रा को तो सुबह जब संदेश ने चूम कर मुबारकबाद दी, तब याद आया.

औफिस जाते समय संदेश ने शुभ्रा से कहा, ‘‘आज शाम को बाहर चलेंगे, वहीं खाना खा कर आएंगे.’’

शाम 6 बजे सही समय पर संदेश घर आ गया, शुभ्रा पहले से ही तैयार थी. बस, संदेश तैयार होने लगा और थोड़ी देर में ही वे घर से निकल पड़े.

संदेश ने पहले से ही होटल में टेबल बुक करवा रखी थी. वहां पहुंच कर संदेश ने पहले स्नैक्स, उस के बाद खाने का और्डर दे दिया था.

जब तक वेटर ये सब ले कर आता, संदेश ने शुभ्रा को हाथ आगे करने को कहा.

जैसे ही शुभ्रा ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, संदेश ने एक हीरे की बहुत ही सुंदर अंगूठी उस की उंगली में पहना दी.

यह देख शुभ्रा की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने संदेश को चूम लिया. दोनों खाना खा कर खुशीखुशी घर लौटे और सो गए.

प्यार का यह सिलसिला ठीकठाक चल ही रहा था कि अचानक संदेश के बरताव में शुभ्रा ने बदलाव महसूस करना शुरू कर दिया.

अब शाम को संदेश बहुत थकाहारा सा औफिस से लेट आता. इस के बाद खाना खा कर थोड़ीबहुत इधरउधर की बात करता, फिर सोने की तैयारी करता.

शुभ्रा उस को प्यार करने के लिए कहती, तो कभी थकावट, कभी गैस, तो कभी कोई बहाना बना कर मुंह फेर कर सो जाता. सुबह भी औफिस के लिए एक घंटा तय समय से पहले निकल जाता. सुबह इतनी हड़बड़ाहट में होता कि कभी लंच बौक्स भूल जाता, तो शुभ्रा भाग कर उस को थमा कर आती.

शुभ्रा इस की वजह जानने की कोशिश में थी, लेकिन अभी तो वह जान नहीं पाई.

ऐसे बोझिल माहौल से छुटकारा पाने के लिए शुभ्रा सुबह सोसाइटी के पार्क में घूमने लगी. सोसाइटी की एक आंटी से शुभ्रा की मुलाकात हो गई. अब सुबहसुबह दोनों इकट्ठे बैठ कर कसरत करतीं और बतियाती थीं.

एक दिन एक नौजवान लड़का भी वहां जौगिंग कर रहा था. शुभ्रा ने उसे देखा, तो आंटी ने शुभ्रा को देख लिया और शुभ्रा से कहा, ‘‘मीठा है ये.’’

शुभ्रा इस का मतलब नहीं समझी, तो आंटी ने बताया, ‘‘यह ‘गे’ है.’’

शुभ्रा ने पूछा, ‘‘कहां रहता है, यह?’’

आंटी ने कहा, ‘‘तेरे फ्लैट के नीचे वाले फ्लैट में किराए पर रहता हैं.’’

इस के बाद शुभ्रा अपने घर आ गई और आंटी अपने घर चली गई. लेकिन शुभ्रा उस नौजवान के बारे में सोच कर भिन्नाती रही कि आदमी हो कर भी यह सब. यह बात शुभ्रा के दिमाग से निकल ही नहीं रही थी.

आज भी संदेश बड़ी हड़बड़ाहट में तैयार हो कर निकला. शुभ्रा संदेश के जाने के बाद कपड़े धो कर बालकनी में सुखाने के लिए डाल रही थी, तभी उस ने नीचे देखा कि संदेश सोसाइटी से दफ्तर के लिए अब निकल रहा है, घर से निकलने के एक घंटे बाद…

शुभ्रा के दिल में शक ने जन्म ले लिया था. शाम को संदेश दफ्तर से घर आया, तो शुभ्रा ने ब्रीफकेस लिया और उस को टेबल पर रख ही रही थी कि वह खुल गया और उस में से डीओ, परफ्यूम, अंडरवियर जैसी चीजें बाहर आ गईं.

संदेश की नजर उन पर पड़ी, तो भाग कर उन को ब्रीफकेस में डाल कर बंद कर दिया.

शुभ्रा ने जब देखा, तो पूछ ही लिया, ‘‘यह सब किस के लिए…?’’

संदेश ने बहाना बना दिया कि औफिस का एक कर्मचारी रिटायर हो रहा?है, उस को गिफ्ट में देने के लिए यह सब लाया है. शुभ्रा ने कहा, ‘‘रिटायरमैंट के गिफ्ट में यह सब कौन देता है?’’

खैर, बात आईगई हो गई.

अब शुभ्रा को सब समझ आने लगा था. उस ने कई दिन जांचपड़ताल की और एक दिन सही समय पर संदेश को उस नौजवान के फ्लैट से निकलते हुए रंगेहाथ पकड़ लिया. संदेश के चेहरे का रंग उड़ गया.

शुभ्रा संदेश को फ्लैट में ले कर आई. वहां संदेश ने उस नौजवान के साथ अपना संबंध स्वीकार कर लिया और कहा कि इस से संबंध बनाने के बाद मुझे तुम में या लड़कियों में कोई दिलचस्पी नहीं रही. दोनों में काफी कहासुनी हुई.

शुभ्रा ने संदेश से कहा, ‘‘तुम ने मुझे धोखा दिया है. मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रह सकती,’’ वह गुस्से में फुफकारती हुई निकल गई और संदेश भी अपना सूटकेस ले कर घर से निकल पड़ा.

संदेश ने शुभ्रा को रोकने की काफी कोशिश की, लेकिन वह नहीं रुकी.

संदेश आंखों से ओझल होती शुभ्रा को देख कर अपने बाल नोचने लगा.

Family Story: अपना घर – सीमा अपने मायके में खुश क्यों नहीं थी?

Family Story, लेखिका- अर्चना खंडेलवाल

मोबाइल की घंटी बजते ही सीमा ने तुरंत फोन उठा लिया. रिसीवर के दूसरी ओर मां थी, ‘‘मां, आप को ही याद कर रही थी. भैया रवाना हो गए? आप सब को देखे महीना हो गया.’’ सीमा थोड़ी सी रोंआसी हो कर बोली, ‘‘भैया कब तक आएंगे? मु?ा से तो सब्र नहीं हो रहा. अब कब आ कर आप सब से मिलूं.’’

‘‘आ रहा है बेटा, तेरे बिना घर ही सूना हो गया. तू तो हमारे घर की रौनक थी. तेरे बाबूजी, भैया, मैं, हम सब को तू बहुत ही याद आती है. तेरी नई भाभी भी तु?ा से मिलने को अधीर है. दीदी कब आएंगी, बस यही पूछती रहती है. अच्छे से सामान पैक कर लेना. खानेपीने का सब रख लेना. ट्रेन से नीचे मत उतरना. मौसम थोड़ा ठंडा है, कुछ हलका ओढ़ने को रख लेना.’’

‘‘हां मां हां, अब मैं बच्ची नहीं रही. शादी हो चुकी है, मैं सब मैनेज कर लूंगी.’’ कह कर सीमा ने फोन रख दिया. ‘मां भी न,’ यह सोच कर सीमा मुसकरा दी.

दूसरे दिन सवेरे जल्दी उठ कर सीमा ने फाइनल पैकिंग कर ली. सीमा की सास ने आज उसे रसोई से छुट्टी दे दी ताकि वह आराम से सब पैक कर ले. रोहन से दूर होने का दुख था पर महीनेभर बाद मायके जाने की खुशी अलग थी. तभी डोरबेल बजी, ‘‘भैया, आप आ गए,’’ भैया को देख कर सीमा की प्रसन्नता देखने लायक थी.

सास ने दोपहर का खाना लगाया. पहली बार बहू के भाई की आवभगत में कोई कमी नहीं रखी. आते ही पूरा घर संभाल लिया. सीमा तो हमारे घर के कणकण में रचबस गई है, बेटा. इस के जाते ही बहुत अखरेगा. सीमा अपनी तारीफ में सास द्वारा कहे गए शब्दों के बो?ातले दबे जा रही थी.

‘‘जी,’’ मांजी, सास के पांव छू कर विदा ली. रोहन ने भैया, सीमा को रेलवे स्टेशन तक छोड़ दिया.

सीमा और उस के भैया की शादी दो दिनों के अंतराल से हुई थी. पहले भाभी घर में आई, एक दिन बाद सीमा की बिदाई. ज्यादा दिन साथ रहे नहीं, दोनों अपनीअपनी शादी में व्यस्त थीं. आज सीमा शादी के एक महीने बाद मायके में रहने जा रही है. दूर भी तो इतना भेज दिया, बारबार जल्दी से मायके आ भी नहीं सकते. ट्रेन की दूरी तो बहुत खल रही थी. काफी उत्साहित थी, सब से मिलने के लिए.

शादी के बाद रस्मोरिवाज, रिश्तेदारों के यहां आनेजाने में ही वक्त निकल गया. रोहन के साथ हनीमून की मीठी यादें याद करती रही, कभी मायके में बिताया हर पल. शादी के बाद लड़की 2 नावों की सवारी करती है, दोनों में संतुलन कर के चलती है. मायके वाले भी उतने ही प्रिय होते हैं जितने ससुराल वाले. मायके में जिंदगी का अल्हड़पन बीतता है. और ससुराल में जिम्मेदारी और कर्त्तव्यों को वहन करना होता है. मायके में कोई रोकटोक नहीं, कोई बंदिश नहीं, सब से बड़ी बात वहां अपेक्षाएं नहीं थीं.

ट्रेन में भैया, भाभी के गुणों की ही व्याख्या करते रहे हैं. सीमा का मन अधीर हो गया, भाभी से मिलने को.

घर की इकलौती लाड़ली सीमा काफी चतुर व सम?ादार थी. मां की बीमारी के चलते सारे घर की जिम्मेदारी सीमा के कंधों पर थी. कौन सी चीज कहां रखनी है, कौन सा सामान किस तरह से घर में सैट करना है. अमुक चादर बैड पर जंचेगी या नहीं. अमुक टेबल कमरे के किस कौर्नर में रखें, गमले में आज कौन से फूल महकेंगे. सुबह के नाश्ते से ले कर रात के खाने में क्या बनेगा. सब काम सीमा के फैसले से होते थे. सीमा मां, बाबूजी, भैया के साथ अपनी ही दुनिया में डूबी हुई थी.

एकाएक उसे आभास हुआ घर में उस की शादी के चर्चा होने लगी. रोज कहीं न कहीं बाबूजी लड़का देख कर आते. उस दिन जब बूआ आई थीं, सम?ा रही थीं, ‘‘लड़की को सही वक्त पर उस के घर भेज दो, यह तो पराया घर है. एक दिन तो उसे यह घर छोड़ कर जाना है,’’ बूआ की बात कानों से सुनी, तभी से सीमा की सांस ऊपरनीचे हो गई. क्यों यह पराया घर है. जिस घर पलीबढ़ी, खेलीकूदी, हर खुशी पाई. किसी के पास जवाब नहीं था, पर सब को यही कहना था, जाना तो होगा. आखिर सब के सम?ाने पर सीमा मान गई. पर उस ने शर्त रखी कि वह मां को बीमार छोड़ कर नहीं जाएंगी. पहले भैया की भी शादी कीजिए. शर्त मान  ली गई संयोग से सुयोग्य लड़की भी  मिल गई.

ज्योंज्यों मायका नजदीक आ रहा था, वैसे ही सीमा की बेचैनी भी बढ़ने लगी. आखिर उस का घर दिख गया. रोमरोम पुलकित हो गया. भैया ने जैसे ही सामान उतारा, सीमा ने घर के आंगन में पांव रखा कि चौंक गई. बाहर आंगन में उस ने जो छोटा सा बगीचा तैयार किया था, सुबहशाम पानी डाला करती थी, जहां बैठ कर अकसर पढ़ाई किया करती थी, कितनी मेहनत से तरहतरह के पौधे लगाए थे, उस के बगीचे का नामोनिशान नहीं था. आंगन की महकती खुशबू को बेजान पत्थरों ने दबा दिया था. सारा आंगन पक्का करवा दिया गया था.

भैया ने सीमा के चेहरे के भाव पढ़ लिए, दबी जबान में बोले, ‘‘यह तुम्हारी भाभी ने कहा, सारा घर मिट्टी से सन जाता है, वैसे भी तुम्हारे जाते ही सारे फूल मुर?ा गए थे.’’

उतरे चेहरे से सीमा अंदर ड्राइंगरूम में पहुंची. मांभाभी से मिली. भाभी चायनाश्ते में जुट गई. ड्राइंगरूम का नक्शा ही बदल गया था. सीमा की पेंटिंग्स दीवार से उतर कर घर के पिछवाड़े तक जा पहुंचीं, भाभी की बनाई पेंटिंग से रूम सज रहा था. दीवान पर पेंटिंग की चादर की जगह भाभी के हाथ की कशीदे की चादर फब रही थी. अब सोफा सैट की दिशा भी बदल गई. गमलों में बनावटी फूल खिल रहे थे. परदों के रंग भी उलटपुलट हो गए.

उसे लगा वह किसी नई जगह पर आ गई है. सीमा मनमसोस कर रह गई, कहने वाली थी कि मां यह क्या? तभी मां बोली, ‘‘तेरे घर पर सब ठीक है.’’

सीमा बोली, ‘‘हां, मां, मेरे घर पर सब ठीक है.’’

उधर मां भाभी की बनाई चीजों की तारीफ करते नहीं थक रही थी. तेरी भाभी ने आते ही अपना घर संभाल लिया. ‘सच है, यह भाभी का घर है, मेरा तो कभी था ही नहीं,’ हौले से सीमा बुदबुदा दी. यह घर पराया था नहीं, पर अब लगने लगा. मेरी इस घर में कोई अहमियत नहीं रही, सीमा मन ही मन रो दी.

रात के खाने से निबटी थी. अब उसे मेहमानों का कमरा दिया गया. रातभर सोचसोच कर करवट बदलती रही.

बचपन के स्कूल के, हर पल, हर क्षण याद आते रहे. वह अपने ही मन को सम?ाती रही. मां, बाबूजी, भैया, भाभी के प्यारदुलार में कोई कमी नहीं है. फिर भी अब वह बात नहीं रही जो शादी से पहले थी. हिचकिचाहट नहीं थी. कुछ भी काम करना हो, अब पूछना होता है. भाभी के हिसाब से घर की किचन की सैटिंग है, तो मु?ो क्यों अखर रहा है. अपनेआप से सवाल करने लगी. मैं ने भी तो रोहन का घर संभाल लिया है. जैसे मु?ो पता है, घर की कौन सी चीज कहां रखी है. यह सोचतेसोचते जाने कब आंख लग गई.

सुबह नाश्ते की टेबल पर भैया ने मां के हाथ में रुपए दिए. मां ने आवाज लगाई, ‘‘बहू ये रुपए अलमारी में रख दे,’’ सीमा ने रुपयों से एकाएक नजरें चुरा लीं. शादी से पहले चाबी सीमा के ही हाथ में रहती थी. कुछ दिन मायके में रही. उस की उपस्थिति मात्र मेहमानस्वरूप ही रही. उसे महसूस हुआ, शादी के बाद लड़की ही नहीं, उस की तमाम चीजें शौक, पसंद भी पराए हो जाते हैं.

मां, भैया, भाभी ने कुछ और दिन रुकने को कहा पर सीमा टस से मस नहीं हुई. उस के अपने पराए और पराए अपने हो गए थे. अगले दिन रोहन लेने आ गए. बिना किसी मोह, आंसू के सीमा अपने पति के साथ अपने घर चल दी.

घर की इकलौती लाड़ली सीमा काफी चतुर व सम?ादार थी. मां की बीमारी के चलते सारे घर की जिम्मेदारी सीमा के कंधों पर थी. कौन सी चीज कहां रखनी है, कौन सा सामान किस तरह से घर में सैट करना है. अमुक चादर बैड पर जंचेगी या नहीं. अमुक टेबल कमरे के किस कौर्नर में रखें, गमले में आज कौन से फूल महकेंगे.

Family Story: निराधार डर – माया क्यों शक करती थी

Family Story: ‘‘शादी हुई नहीं कि बेटा पराया हो जाता है,’’ माया किसी से फोन पर कह रही थीं, ‘‘दीप की शादी हुए अभी तो केवल 15 दिन ही हुए हैं और अभी से उस में इतना बदलाव आ गया है. पलक के सिवा उसे न कोई दिखाई देता है, न ही कुछ सूझता है. ठीक है कि पत्नी के साथ वह ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहता है, पर मां की उपेक्षा करना क्या ठीक है.’’ यह सुन कर दीप हैरान रह गया. उस ने अनुमान लगाया कि फोन के दूसरी तरफ सोमा बूआ ही होंगी. वही हैं जो इस तरह की बातों को शह देती हैं. वह भी तो हमेशा अपने बेटेबहू को ले कर नाराज रहती हैं. सब जानते हैं कि सोमा बूआ की किसी से नहीं बनती. वे तो सभी से परेशान रहती हैं और दूरपास का कोई ऐसा रिश्तेदार नहीं है जो उन के व्यंग्यबाणों का शिकार न हुआ हो. अपने बेटे को तो वे सब के सामने जोरू का गुलाम तक कहने से नहीं चूकती हैं. पर मां, उस के बारे में ऐसा सोचती हैं, यह बात उसे भीतर तक झकझोर गई. घर में और तो किसी ने ऐसा कुछ नहीं कहा, तो मां को ऐसा क्यों लग रहा है. पापा, उस की बहन दीपा, किसी ने भी तो ऐसा कुछ जाहिर नहीं किया है जिस से लगे कि वह शादी के बाद बदल गया है. फिर मां को ही क्यों लग रहा है कि वह बदल गया है.

पलक को इस समय नए घर में एडजस्ट होने में उस का सहयोग और साथ चाहिए और वही वह उसे दे रहा है तो इस से क्या वह मां के लिए पराया हो गया है. पलक के लिए यह घर नया है, यहां के तौरतरीके, रहनसहन सीखनेसमझने में उसे समय तो लगेगा ही और अगर वह यहां के अनुरूप नहीं ढलेगी तो क्या मां नाराज नहीं होंगी. आखिर मां क्यों नहीं समझ पा रही हैं कि पलक के लिए नए माहौल में ढल पाना सहज नहीं है. इस के लिए उसे पूरी तरह से अपने को बदलना होगा और वह चाहती है कि इस घर को जल्दी से जल्दी अपना बना लें ताकि सारी असहजता खत्म हो जाए. वह पूरी कोशिश कर रही है, पर मां का असहयोग उसे विचलित कर देता है. दीप खुद हैरान था मां के व्यवहार को देख कर. मां तो ऐसी नहीं हैं, फिर पलक के प्रति वे कटु कैसे हो गई हैं.

‘‘मां, ये कैसी बातें कर रही हैं आप? मैं पराया कहां हुआ हूं? बताइए न मुझ से कहां चूक हो गई या आप की कौन सी बात की अवहेलना की है मैं ने? हां, इतना अवश्य हुआ है कि मेरा समय अब बंट गया है. मुझे अब पलक को भी समय देना है ताकि वह अकेलापन महसूस न करे.

‘‘अभी मायके की यादें, मांबाप, भाईबहन से बिछुड़ने का दुख उस पर हावी है. हम सब को उसे सहयोग देना चाहिए ताकि वह खुल कर अपनी बात सब से कह सके. उसे थोड़ा वक्त तो हमें देना ही होगा, मां छुट्टियां खत्म हो जाने से पहले वह भी सब कुछ समझ लेना चाहती है, जिस से औफिस और घर के काम में उसे तालमेल बिठाने में दिक्कत न हो.’’

‘‘मुझे तुझ से बहस नहीं करनी है, चार दिन हुए हैं उसे आए और लगा है उस की तरफदारी करने.’’ पलक अपने कमरे में बैठी मांबेटे की बातें सुन रही थी. उसे हैरानी के साथसाथ दुख भी हो रहा था कि आखिर मां, इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही हैं. वह तो उन के तौरतरीके अपनाने को पूरे मन से तैयार है, फिर मां की यह सोच कैसे बन गई कि उस ने दीप को अपनी मुट्ठी में कर लिया है. कमरे में दीप के आते ही उस ने पूछा, ‘‘मुझ से कहां चूक हो गई, दीप, जो मां इस तरह की बात कर रही हैं. मैं ने कब कहा कि तुम हमेशा मेरे पल्लू से बंधे रहो. इतना अवश्य है कि मां से मुझे किसी तरह भी सहयोग नहीं मिल रहा है, इसलिए मुझे तुम्हारे ऊपर ज्यादा निर्भर होना पड़ रहा है. फिर चाहे वह घरगृहस्थी से जुड़ी बात हो या रसोई के काम की या फिर मेरे दायित्वों की. इसी कारण तो हम हनीमून के लिए भी नहीं गए ताकि मुझे इस माहौल में एडजस्ट होने के लिए समय मिल जाए. जानते ही हो कि छुट्टी भी मुश्किल से एक महीने की ही मिली है.’’

‘‘मैं खुद हैरान हूं, पलक कि मां इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही हैं. जबकि उन्हें ही मेरी शादी की जल्दी थी. हमारी लव मैरिज उन की स्वीकृति के बाद ही हुई है. शादी से पहले तो वे तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकती थीं, फिर अब अचानक क्या हो गया. कितने चाव से उन्होंने शादी की एकएक रस्म निभाई थी. सोमा बूआ टोकती थीं तो मां उन की बातों को नजरअंदाज कर देती थीं. सब से यही कहतीं, मेरा तो एक ही बेटा है, उस की शादी में अपने सारे चाव पूरे करूंगी. आज वे सोमा बूआ की बातों को सुन रही हैं, उन से ही हमारी शिकायत कर रही हैं. ‘‘आज उन्हें अपने ही बेटे की खुशी खल रही है. उन्हें तो इस बात की तसल्ली होनी चाहिए कि हम दोनों खुश हैं और एकदूसरे से प्यार करते हैं. डरता हूं सोमा बूआ कहीं हमारे बीच भी तनाव न पैदा कर दें. मां ने उन की बातें सुनीं तो अवश्य ही उन के बेटेबहू की तरह हमारे बीच भी झगड़े होने लगेंगे.’’

‘‘मुझ पर विश्वास रखो दीप, ऐसा कुछ नहीं होगा,’’ पलक के स्वर में दृढ़ता थी. ‘‘हमें मां के भीतर चल रही उथलपुथल को समझ कर उन से व्यवहार करना होगा. उन के मनोविज्ञान को समझना होगा. दीप, मनोविज्ञान की छात्र रहने के कारण मैं उन की मानसिक स्थिति बखूबी समझ सकती हूं. जब बेटे की शादी होती है तो कई बार एक डर मां के मन में समा जाता है कि अब तो उस का बेटा हाथ से निकल गया. उस में सब से खराब स्थिति बेटे की ही होती है, क्योंकि वह ‘किस की सुने’ के चक्रव्यूह में फंस जाता है. त्रिशंकु जैसी स्थिति हो जाती है उस की. पत्नी जो दूसरे घर से आती है वह पूरी तरह से नए परिवेश में ढलने के लिए उस पर ही निर्भर होती है, और मां को लगता है कि बेटा जो आज तक हर काम उन से पूछ कर करता था, अब बीवी को हर बात बताने लगा है. बस, यही वजह है जब मां को लगता है कि उन की सत्ता में सेंध लगाने वाली आ गई है और वह बहू के खिलाफ मोरचा संभाल लेती है. लेकिन हमें मां को उस डर से बाहर निकालना ही होगा.’’

‘‘पर यह कैसे होगा?’’ दीप पलक की बात सुन थोड़ा असमंजस में था. वह किसी भी तरह से मां को दुखी नहीं देख सकता था और न ही चाहता था कि पलक और मां के संबंधों में कटुता आए.

‘‘यह तुम मुझ पर छोड़ दो, दीप. बस यह खयाल रखना कि मां चाहे मुझ से जो भी कहें, तुम हमारे बीच में नहीं बोलोगे. इस तरह बात और बिगड़ जाएगी और मां को लगेगा कि मेरी वजह से मांबेटे के रिश्ते में दरार आ रही है या बेटा मां से बहस कर रहा है. हालांकि उन की जगह कोई नहीं ले सकता पर फिर भी हमें उन्हें बारबार यह एहसास कराना होगा कि उन की सत्ता में सेंध लगाने का मेरा कोई इरादा नहीं है. ‘‘हर सदस्य की परिवार में अपनी तरह से अहमियत होती है. बस, यही उन्हें समझाना होगा. उस के बाद उन के मन से सारे भय निकल जाएंगे तब वे तुम्हें ले कर शंकित नहीं होंगी कि तुम उन के बुढ़ापे का सहारा नहीं बनोगे, न ही वे इस बात से चिंतित रहेंगी कि मैं उन के बेटे को उन से छीन लूंगी.’’

‘‘सही कह रही हो तुम, पलक. मैं ने भी कई घरों में यही बात देखी है. इसी की वजह से न चाहते हुए मेरे दोस्त वैभव को शादी के बाद अलग होने को मजबूर होना पड़ा था. सासबहू की लड़ाई में वह पिस रहा था. यह देख उस के पापा ने ही उस से अलग हो जाने को कहा था. बेटा हाथ से न निकल जाए का डर, यह अनिश्चतता कि बुढ़ापे में कहीं वे अकेले न रह जाएं, बहू घर पर अधिकार न कर ले, बहू की बातों में आ कर कहीं बेटा बुरा व्यवहार न करे या घर से न निकाल दे, ये बातें जब मन में पलने लगती हैं तो निराधार होने के बावजूद संबंधों में कड़वाहट ले आती हैं. मैं नहीं चाहता कि मेरे परिवार में ऐसा कुछ हो. मैं अपने मांबाप को किसी हाल में नहीं छोड़ सकता,’’ दीप भावुक हो गया था.

‘‘दीप, अब अंदर ही बैठा रहेगा या बाहर भी आएगा. देखो, तुम्हारे मामामामी आए हैं,’’ मां के स्वर में झल्लाहट साफ झलक रही थी. दीप को बुरा लगा पर पलक ने उसे शांत रहने का इशारा किया. बाहर आ कर दोनों ने मामामामी के पैर छुए. फिर पलक किचन में उन के लिए चायनाश्ता लेने चली गई. ‘‘दीदी, अब तो आप का मन खूब लग रहा होगा. पलक काफी मिलनसार और खुशमिजाज लड़की है. बड़ों का आदर भी करती है. जब कुछ दिन पहले दीप और पलक घर आए थे तभी पता लग गया था. बहुत प्यारी बच्ची है.’’ अपनी भाभी के मुंह से पलक की तारीफ सुन माया ने सिर्फ सिर हिलाया. यह सच था कि पलक उन्हें भी अच्छी लगती थी, पर उस की तारीफ करने से वे डरती थीं कि कहीं इस से उन का दिमाग खराब न हो जाए. पलक उस की हर बात को मानती थी, पर वे थीं कि एक दूरी बनाए हुए थीं, पता नहीं पढ़ीलिखी, नौकरी वाली बहू बाद में कैसे रंग दिखाए. वैसे ही बेटा उस के आगेपीछे घूमता रहता है, न जाने क्यों उन के अंदर एक खीझ भर गई थी जिस के कारण वे पलक से खिंचीखिंची रहती थी. और इस वजह से उन के पति और बेटी भी उन से नाराज थे.

‘‘मां, आप एक मिनट के लिए यहां आएंगी,’’ पलक ने 5 मिनट बाद आवाज लगाई, ‘‘मां, प्लीज मुझे बता दीजिए कि मामामामी को क्या पसंद है. आप तो सब जानती हैं.’’ माया को यह सुन अच्छा लगा. पलक जब नाश्ता ले कर आ रही थी तो उस ने मामी को कहते सुना, ‘‘मानना पड़ेगा दीदी, इतनी पढ़ीलिखी होने पर भी पलक में घमंड बिलकुल नहीं है, वरना कमाने वाली लड़कियां तो आजकल रसोई में जाने से ही परहेज करती हैं. ‘‘उस दिन जब हमारे घर आई थी तभी परख लिया था मैं ने कि इस में नखरे तो बिलकुल नहीं हैं. मेरी भाभी की बहू को ही देख लो. उस ने शादी के बाद ही साफ कह दिया था कि घर का कोई काम नहीं करेगी. नौकर रखो या और कोई व्यवस्था करो, उसे कोई मतलब नहीं है. भाभी की तो उस के सामने एक नहीं चलती. आप को तो खुश होना चाहिए बेटाबहू दोनों ही आप को इतना मान देते हैं.’’

‘‘अरे, अभी उसे आए दिन ही कितने हुए हैं. औफिस जाना एक बार शुरू करने दो, सारे रंग सामने आ जाएंगे,’’ पलक को आते देख माया एकदम चुप हो गईं. पलक को बुरा तो बहुत लगा पर वह हंसते हुए नाश्ता परोसने लगी. दीप अंदर ही अंदर कुढ़ कर रहा गया था. वह कुछ कहना ही चाहता था कि पलक ने उसे इशारे से मना कर दिया. मामी ने महसूस किया कि माया पलक के प्रति कुछ ज्यादा ही कटु हो रही हैं और दीप को अच्छा न लगना स्वाभाविक ही था. जातेजाते वे बोलीं, ‘‘दीदी, हो सकता है आप को मेरा कुछ कहना अच्छा न लगे, पर आप पलक के बारे में कुछ ज्यादा ही गलत सोच रही हैं. हो सकता है उस में कुछ कमियां हों, तो क्या हुआ. वे तो सभी में होती हैं. बच्ची को प्यार देंगी तो वह भी आप का सम्मान करेगी. मुझे तो लगता है कि वह आप के जितना निकट आना चाहती है, आप उस से उतनी ही दूरियां बनाती जा रही हैं. ‘‘दीप की खुशी के बारे में सोचें. पलक की वजह से ही वह चुप है, पर कब तक चुप रहेगा. बेटा चाहे वैसे दूर न हो, पर आप की सोच की वजह से दूर हो जाएगा. बहू बेटे को छीन लेगी, यह डर ही आप को रिश्ते में दरार डालने के लिए मजबूर कर रहा है. पलक को खुलेदिल से अपना लीजिए, वरना बेटा सचमुच छिन जाएगा.’’

‘‘सही तो कह रही थीं तुम्हारी भाभी,’’ रात को मौका पाते ही उन के पति ने उन्हें समझाना चाहा, ‘‘इतनी अच्छी बहू मिली है, पर तुम ने दूसरों के बेटेबहू के किस्से सुन एक धारणा बना ली है जो निराधार है. आज वह हर बात तुम से पूछ रही है, लेकिन अगर तुम्हारा यही रवैया रहा तो दीप ही सब से पहले तुम्हारा विरोध करेगा. ‘‘सोचो, अगर पलक उसे तुम्हारे खिलाफ भड़काने लगे तो क्या होगा. सोमा की बातों पर मत जाओ. बहू को दिनरात ताने दे कर उस ने संबंध खराब किए हैं. नए घर में जब एक लड़की आती है तो उस के कुछ सपने होते हैं, वह नए रिश्तों से जुड़ने की कोशिश करती है. पर तुम हो कि उस की गलतियां ही ढूंढ़ती रहती हो. इस तरह तुम दीप को दुखी कर रही हो. क्या तुम नहीं चाहतीं कि तुम्हारा बेटा खुश रहे.

‘‘कल हमारी दीपा के साथ भी उस की सास ऐसा ही व्यवहार करेगी तो क्या वह सुखी रह पाएगी या तुम बरदाश्त कर पाओगी? अपने डर से बाहर निकलो माया, और पलक व दीप पर विश्वास करो.’’ पूरी रात माया कशमकश से जूझती रहीं. सच में बेटे के छिन जाने का डर ही उन्हें पलक के साथ कठोर व्यवहार करने को मजबूर कर रहा है. आखिर जितना प्यार वे दीप और दीपा पर उड़ेलती हैं, पलक को दें तो क्या वह भी उन की बेटी नहीं बन जाएगी. जरूरी है कि उसे बहू के खांचे में जकड़ कर ही रखा जाए? वह भी तो माया में मां को ही तलाश रही होगी? माया जब सुबह उठीं तो उन के चेहरे पर कठोरता और खीझ के भाव की जगह एक कोमलता व नजरों में प्यार देख पलक बोली, ‘‘मां, आइए न, साथ बैठ कर चाय पीते हैं. आज संडे है तो दीप तो देर तक ही सोने वाले हैं.’’

‘‘तुम क्यों इतनी जल्दी उठ गईं? जाओ आराम करो. नाश्ता मैं बना लूंगी.’’ ‘‘नहीं मां, हम मिल कर नाश्ता बनाएंगे और इस बहाने मैं आप से नईनई चीजें भी सीख लूंगी.’’ डाइनिंग टेबल पर मां को पलक से बात करते और खिलखिलाते देख दीप हैरान था. पलक ने आंखों ही आंखों में जैसे उसे बताया कि उसे यहां भी मां मिल गई हैं.

Hindi Story: चिड़िया का बच्चा

Hindi Story: ‘टिंग टांग…टिंग टांग’…घंटी बजते ही मैं बोली, ‘‘आई दीपू.’’

मगर जब तक दरवाजा न खुल जाए, दीपू की आदत है कि घंटी बजाता ही रहता है. बड़ा ही शैतान है. दरवाजा खुलते ही वह चहकने लगा, ‘‘मौसी, आप को कैसे पता चलता है कि बाहर कौन है?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘पता कैसे नहीं चलेगा.’’

तभी अचानक मेरे मुंह से चीख निकल गई, मैं ने फौरन दीपू को उस जगह से सावधानी से परे कर दिया. वह हैरान हो कर बोला, ‘‘क्या हुआ, मौसी?’’

मैं आंगन में वहीं बैठ गई जहां अभीअभी एक चिडि़या का बच्चा गिरा था. मैं ने ध्यान से उसे देखा. वह जिंदा था. मैं फौरन ठंडा पानी ले आई और उसे चिडि़या के बच्चे की चोंच में डाला. पानी मिलते ही उसे कुछ आराम मिला. मैं ने फर्श से उठा कर उसे एक डब्बे पर रख दिया. फिर सोच में पड़ गई कि अगर दीपू का पांव इस के ऊपर पड़ गया होता तो? कल्पना मात्र से ही मैं सिहर उठी.

मैं ने ऊपर देखा. पड़ोसियों का वृक्ष हमारे आंगन की ओर झुका हुआ था. शायद उस में कोई घोंसला होगा. बहुत सारी चिडि़यां चूंचूं कर रही थीं. मुझे लगा, जैसे वे अपनी भाषा में रो रही हैं. पशुपक्षी बेचारे कितने मजबूर होते हैं. उन का बच्चा उन से जुदा हो गया पर वह कुछ नहीं कर पा रहे थे.

‘‘करुणा…’’ कमला दीदी की आवाज ने मुझे चौंका दिया. मैं ने फौरन चिडि़या के बच्चे को उठाया और नल के पास ऊंचाई पर बनी एक सुरक्षित जगह पर रख दिया.

छुट्टियों में हमारे घर बड़ी रौनक रहती है. इस बार तो मेरी दीदी और उस के बच्चे भी अहमदाबाद से आए थे. इत्तफाक से विदेश से फूफाजी भी आए हुए थे. फूफाजी को सब लोग ‘दादाजी’ कहते थे. यह विदेशी दादाजी हमारे छोटे शहर के लिए बहुत बड़ी चीज थे. सुबह से शाम तक लोग उन्हें घेरे ही रहते. कभी लोग मेहमानों से मिलने आते तो कभी मेहमान लोग घूमनेफिरने निकल जाते.

मेहमानों के लिए शाम का नाश्ता तैयार कर के मैं फिर चिडि़या के बच्चे के पास चली आई. वह अपना छोटा सा मुंह पूरा खोले हुए था. ऐसा लगता था जैसे वह पानी पीना चाहता है. पर नहीं, पानी तो बहुत पिलाया था. मुझे अच्छी तरह पता भी तो नहीं था कि यह क्या खाएगा?

‘‘ओ करुणा मौसी, चिडि़या को पानी में डाल दो,’’ दीपू ने मेरे पास रखी गेंद उठाते हुए कहा.

मैं ने उसे पकड़ा, ‘‘अरे दीपू, सामने जो सफेद प्याला पड़ा है, उसे ले आ. मैं ने उस में दूधचीनी घोल कर रखी है. इसे भूख लगी होगी.’’

मेरी बात सुन कर दीपू जोर से हंसा, ‘‘मौसी, इसे उठा कर बाहर फेंक दो,’’ कहते हुए वह गेंद नचाते हुए बाहर चला गया.

मैं दूध ले आई, चिडि़या का बच्चा बारबार मुंह खोल रहा था. मैं अपनी उंगली दूध में डुबो कर दूध की बूंदें उस की चोंच में डालने लगी.

‘‘बूआ…’’ मेरी भतीजी उर्मिला की आवाज थी, ‘‘अरे बूआ, यहां क्या कर रही हो?’’ वह करीब आ कर बोली.

मैं ने उसे चिडि़या के बच्चे के बारे में बताया. मैं चाहती थी कि मेरी गैरमौजूदगी में उर्मिला जरा उस का खयाल रखे.

‘‘वाह बूआ, वाह, भला चिडि़या के बच्चे के पास बैठने से क्या फायदा?’’ कह कर वह अंदर चली गई. नल के पास बैठे हुए जो भी मुझे देखता वह खिलखिला कर हंस पड़ता. सब के लिए चिडि़या का बच्चा मजाक का विषय बन गया था.

मैं फिर रसोई में चली गई. थोड़ी देर बाद मैं ने बाहर झांका तो देखा कि मेरी भतीजी जूली, उर्मिला और कुछ अन्य लड़कियां नल के पास आ कर खड़ी हो गई थीं. मैं एकदम चिल्लाई, ‘‘अरे, रुको.’’

मैं उन के पास आई तो वे बोलीं, ‘‘क्या बात है?’’

‘‘वहां एक चिडि़या का बच्चा है.’’

‘‘चिडि़या का बच्चा? अरे हम ने सोचा, पता नहीं क्या बात है जो आप इतनी घबराई हुई हैं,’’ वे भी जोरदार ठहाके मारती हुई चली गईं.

मैं खीज उठी और शीघ्र ही ऊपर चली गई. वहां आले में रखे एक घोंसले को देखा,जो इत्तफाक से खाली था. मैं ने उस में चिडि़या के बच्चे को रख कर घोंसले को ऊपर एक कोने में रख दिया.

मैं रसोई में आ गई और सब्जी काटने लगी. तभी पड़ोसन सुषमा बोली, ‘‘आज तो पता नहीं, करुणा का ध्यान कहां है? मैं रसोई में आ गई और इसे पता नहीं चला.’’

‘‘इस का ध्यान चिडि़या के बच्चे में है,’’ नमिता ने उसे चिडि़या के बच्चे के बारे में बताया.

‘‘अरे, पक्षी बिना घोंसले के बड़ा नहीं होगा. उसे किसी घोंसले में रखो,’’ सुषमा सलाह देती हुई बोली.

‘‘मैं उसे घोंसले में ही रख कर आई हूं,’’ मैं ने खुश होते हुए कहा.

रात को सब लोग खाना खाने के बाद घूमने गए. शायद किशनचंद के यहां से भी हो कर आए थे, ‘‘भई, हद हो गई, किशनचंद की औरत इतनी बीमार है. इतनी छटपटाहट घर के लोग कैसे देख रहे थे?’’ यह दादाजी की आवाज थी.

सब लोग आंगन में बैठे बातचीत कर रहे थे. दादाजी विदेश की बातें सुना रहे थे, ‘‘भई, हमारे अमेरिका में तो कोई इस कदर छटपटाए तो उसे ऐसा इंजेक्शन दे देते हैं कि वह फौरन शांत हो जाए. भारत न तो कभी बदला है और न ही बदलेगा. अभी मैं मुंबई से हो कर ही राजस्थान आया हूं. वहां मूलचंद की दादी की मृत्यु हो गई. अजीब बात है, अभी तक यहां लोग अग्निसंस्कार करते हैं.’’

सुनते ही अम्मां बोलीं, ‘‘आप लोग मृत व्यक्ति का क्या करते हैं?’’

‘‘अरे, बस एक बटन दबाते हैं और सारा झंझट खत्म. अमेरिका में तो…’’ दादाजी पता नहीं कैसी विचित्र बातें सुना रहे थे.

मैं ने सोने से पहले चिडि़या के बच्चे की देखभाल की और फिर सो गई. सुबह उठते ही देखा, चिडि़या का बच्चा बड़ा ही खुश हो कर फुदक रहा था. दीपू ने उस की ओर पांव बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मौसी, रख दूं पैर इस के ऊपर?’’

‘‘अरे, नहीं…’’ मैं उस का पैर हटाते हुए चीख पड़ी. अचानक मैं ने सामने देखा, ‘‘अरे, यह तो वही आदमी है…’’

शायद जीजाजी ने मेरी बात सुन ली थी. वह बाहर ‘विजय स्टोर’ की तरफ देखते हुए बोले, ‘‘तुम जानती हो क्या उस आदमी को?’’

मेरे सामने एक दर्दनाक दृश्य ताजा हो उठा, ‘‘हां,’’ मैं ने कहा, ‘‘यह वही आदमी है. एक प्यारा सा कुत्ता लगभग मेरे ही पास पलता था, क्योंकि मैं उसे कुछ न कुछ खिलाती रहती थी. एक दिन वह सामने भाभी के घर से दीदी के घर की तरफ आ रहा था कि इस आदमी का स्कूटर उसे तेजी से कुचलता हुआ निकल गया. कुत्ता बुरी तरह तड़प कर शांत हो गया. हैरत की बात यह थी कि इस आदमी ने एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा था.’’

जीजाजी पहले तो ठहाका मार कर हंसे फिर जरा क्र्रोधित होते हुए बोले, ‘‘अब कहीं वह फिर तुम्हें नजर आ जाए तो उसे कुछ कह मत देना. हम कुत्ते वाली फालतू बात के लिए किसी से कहासुनी करेंगे क्या?’’

कुछ दिन पहले की ही तो बात है. पड़ोस में शोर उठा, ‘अरे पास वाली झाडि़यों से सांप निकला है,’ सुनते ही मेरा बड़ा भतीजा फौरन एक लाठी ले कर गया और कुछ ही पलों में खुश होते हुए उस ने बताया कि सांप को मार कर उस ने तालाब में फेंक दिया है.

‘‘क्या?…तुम ने उसे जान से मार दिया है?’’ मैं ने सहमे स्वर में पूछा.

‘‘मारता नहीं तो क्या उसे घर ले आता? अगर किसी को काट लेता तो?’’

एक दिन दादाजी बालकनी में कुछ लोगों के साथ बैठे कौफी पी रहे थे, बाहर का दृश्य देखते हुए बोले, ‘‘अफ्रीका में सूअर को घंटों खौलते हुए पानी में डालते हैं और फिर उसे पकाने के लिए…’’ दादाजी बोले जा रहे थे और मैं सूअर की दशा की कल्पना मात्र से ही तड़प उठी थी. मुझे डर लगने लगा कि कहीं चिडि़या के बच्चे को कोई बाहर न फेंक दे.

घोंसले में झांका तो देखा कि बच्चा उलटा पड़ा था. मैं ने डरतेडरते हाथों में कपड़ा ले कर उसे सीधा किया. बिना कपड़ा लिए मेरे नाखून उसे चुभ जाते.

‘‘करुणा मौसी, आप ने चिडि़या के बच्चे को हाथ लगाया?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘हां, क्यों?’’ मैं ने उसे आश्चर्य से देखा.

‘‘अब देखना मौसी, चिडि़या के बच्चे को उस की मां अपनाएगी नहीं. मनुष्य के हाथ लगाने के बाद दूसरे पक्षी उस की ओर देखते भी नहीं.’’

‘‘अरे, उठाती कैसे नहीं, आंगन के बीचोबीच पड़ा था. किसी का पांव आ जाता तो?’’ मैं ने कहा और अपने काम में लग गई.

3 दिन गुजर गए. जराजरा सी देर में मैं चिडि़या के बच्चे की देखभाल करती. चौथे दिन बहुत सवेरे ही चिडि़यों के झुंड के झुंड घोंसले के पास आ कर जोरजोर से चींचीं, चूंचूं करने लगे. मुझे लगा जैसे वे रो रहे हों. मैं ने घोंसले के अंदर देखा. चिडि़या का बच्चा बिलकुल शांत पड़ा था. मेरा दिल भर आया. तरहतरह के खयाल मन में उठे. रात को वह बिलकुल ठीक था. कहीं सच में दीपू ने उस के ऊपर पांव तो नहीं रख दिया?

चिडि़या के बच्चे पर किसी तरह के हमले का कोई निशान नहीं था. मगर फिर भी मैं ने दीपू से पूछा, ‘‘सच बता दीपू, तू ने चिडि़या के बच्चे को कुछ किया तो नहीं?’’

पर दीपू ने तो जैसे सोच ही रखा था कि मौसी को दुखी करना है. वह बोला, ‘‘मौसी, मैं ने सुबह उठते ही पहले उस का गला दबाया और फिर सैर करने चला गया.’’

मैं सरला दीदी से बोली, ‘‘दीदी, ऐसा नहीं लगता कि यह आराम से सो रहा है?’’

दीपू ने मुझे दुखी देख कर फिर कहा, ‘‘मौसी, मैं ने इसे मारा ही ऐसे है कि जैसे हत्या न लग कर स्वाभाविक मौत लगे.’’

पता नहीं क्यों, मुझ से उस दिन कुछ खायापिया नहीं गया. संगीतशाला भी नहीं गई. दिल भर आया था. कागजकलम ले कर दिल के दर्द को रचना के जरिए कागज की जमीन पर उतारने लगी. रचना भेजने के बाद लगा कि जैसे मैं ने उस चिडि़या के बच्चे को अपनी श्रद्धांजलि दे दी है.

Funny Hindi Story: दूल्हे का घोड़ा रस्म अदायगी का रोड़ा

Funny Story, लेखक – राकेश सोहम

मुझे बचपन से ब्याहबरातों में जाने का शौक है. गुड्डेगुडि़यों की शादी से ले कर अपनी बरात भी हंस कर ‘अटैंड’ की है. पर हाय, बचपन के दिनों की वह शादी जो कभी नहीं भूलती.

टिल्लू के बड़े भाई की बरात 2 ट्रैक्टर में लद कर एक छोटे से गांव में पहुंची थी. पूरे 2 घंटे धूल भरी पगडंडियों से हिचकोले खाते हुए जब गांव पहुंचे, तो पहचानना मुश्किल था कि कौन दूल्हा है और कौन बराती. सभी धूल में सने एक से दिखाई पड़ते थे.

दूल्हे के गले में खींचतान कर लटकाई हुई टाई गले में झूलते सांप सी जान पड़ती थी. औरतों की गोद में
खेलते नदान बराती उसे देख कर भाग खड़े होते.

गांव में बरातियों का स्वागत मीठे पानी में खाने वाले रंग को घोल कर किया गया.

बरातियों के स्वागत के बाद जब रस्म अदायगी का समय आया तो घोड़ा भी मौजूद न था. वहां के एकलौते घोड़ा मालिक ने बताया कि उस के पास एक ही घोड़ा है, जो शाम से लापता है. कहीं खेत में घास चरने निकल गया है.

सवाल था कि उसे खोजेगा कौन? गांव में लाइट नहीं थी. घुप अंधेरे में चलना दूभर था, उधर पंडितजी जोर डाल रहे थे कि दूल्हे का घोड़े पर बैठना शुभ होता है. दूल्हा घोड़े पर नहीं चढ़ेगा तो अशुभ हो जाएगा.

हमारी मित्र मंडली बड़े जोश में थी. एक मित्र कहने लगे कि शादी में हमारे रहते अशुभ कैसे हो सकता है, इसलिए हम घोड़ा मालिक के घर गए औए उसे खूब धमकाया, पर वह बेचारा मजबूर था.

आखिर जवानी के जोश से भरे हम मित्रों ने पांडवों की तरह स्वर्ग से एरावत उतारने की ठानी. लालटेन के सहारे अंधेरे खेतों में निकल पड़े घोड़े को ढूंढ़ने. एक घंटे की कड़ी मेहनत के बाद हम सब ने उसे धर दबोचा.

घोड़े को खींचतान कर उस के मालिक के घर तक ले गए. सभी ने उसे फिर धमकाया. वह घबरा गया. उस ने डर के मारे एक बड़ा सा कांच की कढ़ाई वाला दुशाला घोड़े की पीठ पर चढ़ा दिया और हाथ जोड़ कर नतमस्तक हो गया. हम ने उस की टिमटिमाती लालटेन लौटा दी.

हमारी मित्र मंडली सजेधजे घोड़े को ले कर रस्म अदायगी के लिए पहुंची, तो सभी खुश हो गए. गैस बत्ती की रोशनी में दूल्हा घोड़ी चढ़ा.

दूल्हा 6 फुट से भी लंबा गबरू जवान था. घोड़े पर बैठने से उस के दोनों पैर जमीन को छूते थे. हालात यों थे कि दूल्हा अपने दोनों पैर जमीन पर ठीक से टिका ले तो घोड़ा नीचे से निकल भागे. देखने वालों का समझना मुश्किल था कि घोड़ा सामान्य कद से ज्यादा छोटा है या दूल्हा ज्यादा लंबा.

बरात लगी और रस्म अदायगी के बाद मित्र मंडली घोड़े को ले कर उस के मालिक के घर तक आई, लेकिन उस के आंगन में लंबेतगड़े घोड़े को देख कर सभी चौंक गए.

तभी घोड़े के मालिक की पत्नी उलाहना देते हुए बाहर आई और चिल्ला कर बोली, ‘‘कहां चले गए थे? रमुआ कब से आ कर खड़ा है. बरात में नहीं जाना है क्या? पेशगी लिए हो. रमुआ को ले जाओ, वरना शादी का मुहूर्त निकल जाएगा.’’

घोड़े का मालिक पोल खुल जाने के डर से हाथपैर जोड़ने लगा.

दरअसल, हमारी मित्र मंडली जिसे घोड़ा समझ कर पकड़ कर लाई थी, वह एक खच्चर था. अंधेरा होने और हमारी मित्र मंडली के डर से घोड़े के मालिक ने चुप्पी साध ली थी और असलियत नहीं बताई.

News Story: नक्सली सफाया और चांदी का दर्द

News Story: ‘आपरेशन सिंदूर’ के नाम पर भगवाधारी गैंग के मार्किट में मचाए गए उत्पात को अब अनामिका भुला चुकी थी. उस चांदनी रात में विजय और अनामिका ने छत पर खूब प्यार बरसाया था. तब बातोंबातों में अनामिका ने विजय से पूछा था, ‘‘तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो?’’

‘‘अचानक से यह सवाल क्यों? तुम जानती हो कि मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं,’’ विजय ने अनामिका के बालों में हाथ फेरते हुए कहा.

‘‘कहने में और करने में बड़ा फर्क होता है जनाब. क्या मेरे लिए सरकार से भी पंगा सकते हो?’’ अनामिका बोली.

‘‘अब हम दोनों के बीच में सरकार कहां से आ गई?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘जैसे उस दिन मंजू आंटी और उन लफंगों के बीच मैं आ गई थी, जो देशभक्ति के नाम पर मार्किट में लूट मचा रहे थे,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘तुम पहेलियां मत बुझाओ. जो बात है साफसाफ कहो,’’ विजय थोड़ा चिढ़ गया था.

‘‘समय आने पर सब पता चल जाएगा. ‘तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं’… अपनी इस बात पर कायम
रहना बस,’’ अनामिका थोड़ा सीरियस हो कर बोली.

इस बात को कुछ दिन बीत गए थे. एक शाम को अनामिका ने विजय को फोन किया, ‘‘अभी कहां हो?’’

‘घर पर. क्या हुआ? सब ठीक?’ विजय ने पूछा.

‘‘मेरे लिए कुछ भी करने का वक्त आ गया है. मैं थोड़ी देर में तुम्हारे घर आ रही हूं,’’ इतना कह कर अनामिका ने फोन काट दिया.

विजय को कुछ समझ नहीं आया. वह अनामिका के आने का इंतजार करने लगा.

‘‘किस का फोन था?’’ विजय की मम्मी ने पूछा.

विजय का ध्यान टूटा, तो वह बोला, ‘‘अनामिका का. बड़ी अजीब सी बात कर रही थी.’’

‘‘अजीब सी… क्या मतलब?’’ पापा ने विजय से पूछा.

‘‘बोल रही थी कि थोड़ी देर में घर आ रही है. पर पूरी बात नहीं बताई,’’ विजय ने कहा.

‘‘अरे, ऐसे ही बोल दिया होगा. काफी दिनों से आई नहीं है. शरारत कर रही होगी,’’ विजय की बहन सुधा
ने कहा.

‘‘दीदी, आप तो अनामिका को जानती हो न. अभी तो उस के मन में कुछ और ही चल रहा है,’’ विजय ने चिंतित हो कर कहा.

2 घंटे बाद अनामिका विजय के घर पर थी. उस के साथ एक लड़की थी, जिस के पास एक पुराना सा पिट्ठू बैग था.

सांवले रंग की उस लड़की के नैननक्श बड़े तीखे थे. उम्र होगी तकरीबन 20 साल. देह की मजबूत और दरमियाने कद की.

सब लोग ड्राइंगरूम में बैठे थे. बिना कुछ बोले. टेबल पर रखी चाय भी ठंडी हो रही थी. विजय अनामिका की ओर देख रहा था, मानो पूछ रहा हो कि यह लड़की कौन है और तुम ने इस का पहले कभी जिक्र क्यों नहीं किया?

इतने में विजय के पापा ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘अरे भई, चाय ठंडी हो रही है. पीनी भी है या सिर्फ देख कर ही स्वाद लेना है… अनामिका बेटा, तुम कैसी हो? इस बच्ची से तो हमारा परिचय कराओ…’’

अनामिका मुसकराई और चाय का कप उठाते हुए बोली, ‘‘अंकल, यह चांदी है. छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा इलाके के एक आदिवासी गांव में रहती है. मेरी एक सहेली की छोटी बहन है… मुझे आप सब की मदद चाहिए.’’

विजय और उस के परिवार वालों को सम?ा नहीं आ रहा था कि अनामिका क्या कहना चाहती है.
थोड़ी देर के बाद विजय ने पूछ ही लिया, ‘‘किस तरह की मदद?’’

‘‘आप लोगों को कुछ दिन के लिए चांदी को अपने घर पनाह देनी होगी. यह मेरे पास नहीं रह सकती. पर यहां एकदम महफूज रहेगी,’’ अनामिका बोली.

यह सुन कर सब को लगा कि मामला कुछ गड़बड़ है. विजय के पापा ने माहौल को हलका करते हुए कहा, ‘‘बिलकुल पनाह मिलेगी. पर यह मामला क्या है, वह तो हमें बताओ?’’

‘‘अंकल, चांदी नक्सली इलाके से है. आजकल सरकार नक्सलियों का सफाया कर रही है. यह भी सुरक्षाबलों की हिटलिस्ट में है. यह किसी तरह पहले रायपुर पहुंची और वहां से यहां दिल्ली आ गई. मैं इसे अपने पास नहीं रख सकती,’’ अनामिका ने कहा.

विजय समझ गया कि अनामिका उस रात को चांदी का ही जिक्र करना चाह रही थी. पर यह फैसला वह अकेला नहीं ले सकता था. उस ने अपने मम्मीपापा की तरफ देखा.

‘‘देखो अनामिका, हमें तुम पर पूरा भरोसा है. चांदी जितने दिन चाहे यहां रह सकती है. हम इस की पूरी जिम्मेदारी लेते हैं,’’ विजय की मम्मी ने कहा.

‘‘पर आंटी, यह जिस जगह से आई है, इस पर खुफिया विभाग की नजर भी हो सकती है. फिर आप पासपड़ोस में क्या कहोगे कि यह कौन है?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘यहां इस का नाम बिंदिया होगा. जब भी कोई बाहर वाला इस से पूछेगा तो यह सिर्फ इतना कहेगी कि हमारे यहां मेड है. 24 घंटे हमारे साथ रहती है. बाकी हम संभाल लेंगे. इसे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. कोई इस का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा,’’ विजय की बहन सुधा ने कहा.

इतना सुन कर चांदी के चेहरे पर हलकी सी मुसकान आ गई. उस ने अनामिका की तरफ देखा. अनामिका भी हंसने लगी.

‘‘हंस क्यों रही हो? हम ने कुछ गलत कह दिया क्या?’’ विजय के पापा बोले.

अनामिका से पहले चांदी ने कहा, ‘‘अंकल, आप लोगों ने जो फैसला लिया है, उस से मुझे बड़ी राहत मिली है. मैं जितने दिन यहां रहूंगी, आप सब की सेवा करूंगी. आप ने मुझे बिंदिया नाम दिया है, जो बहुत अच्छा है.

‘‘जहां तक मेरा बाल बांका होने की बात है, तो आप चिंता मत कीजिए. जब तक मैं यहां हूं, कोई आप का बाल बांका नहीं कर पाएगा. मैं ने कराटे की ट्रेनिंग ली हुई है और मुझे चाकू चलाने से ले कर बंदूक चलाना भी आता है,’’ चांदी ने कहा.

‘‘फिर तो तुम हम सब की बौडीगार्ड हो,’’ विजय ने इतना कहा, तो सब हंसने लगे.

‘‘अच्छा अंकल, अब मैं चलती हूं. बीचबीच में यहां आती रहूंगी. चांदी, इसे अपना ही घर समझो. बाहर वालों
से थोड़ा सतर्क रहना. ज्यादातर घर पर ही रहना,’’ अनामिका बोली.

‘‘ठीक है दीदी. मैं आप को कभी भी शर्मिंदा होने का मौका नहीं दूंगी,’’ चांदी ने कहा.

इस बात को एक हफ्ता बीत गया था. टैलीविजन पर नक्सलियों से जुड़ी खूब खबरें आ रही थीं. रात का खाना खा कर सब बातें कर रहे थे.

विजय के पापा ने चांदी से सवाल किया, ‘‘क्या वाकई सरकार नक्सलियों का सफाया कर देगी?’’

चांदी कुछ देर चुप रही, फिर बोली, ‘‘यह पूरा सच नहीं है. मामला बहुत ज्यादा पेचीदा है.’’

‘‘पर 21 मई को तो सरकार ने कई नक्सलियों का सफाया किया था और उन में से एक तो डेढ़ करोड़ के इनाम वाला खतरनाक नक्सली था. यह सब क्या मामला था?’’ विजय ने चांदी को कुरेदते हुए पूछा.

चांदी एक फीकी मुसकान के साथ बोली, ‘‘अच्छा तो तुम छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले वाले कांड की बात कर रहे हो…’’

‘‘हां, बताओ वहां क्या हुआ था?’’ विजय ने कहा.

‘‘खबरों के मुताबिक, अबूझमाड़ के जंगल में सुरक्षाबलों ने तथाकथित 27 नक्सलियों को मार गिराया था. मारे गए नक्सलियों में डेढ़ करोड़ का इनामी नक्सली बसवा राजू भी शामिल था. यह मुठभेड़ दंतेवाड़ा, नारायणपुर और बीजापुर जिले की सरहद पर हुई थी.

‘‘पुलिस को सूचना मिली थी कि अबूझमाड़ के बोटेर इलाके में नक्सलियों का पोलित ब्यूरो सदस्य और नक्सल संगठन का महासचिव बसवा राजू मौजूद था. इसी आधार पर फोर्स को रवाना किया गया था. वहां पहुंचते ही जवानों पर नक्सलियों ने फायरिंग कर दी. सुरक्षाबलों के इस आपरेशन को प्रदेश के गृह मंत्री विजय शर्मा ने बड़ी कामयाबी बताया है.

‘‘इस के पहले पुलिस ने 7 दिन पहले ही प्रैस कौंफ्रैंस कर कर्रेगुट्टा आपरेशन की जानकारी दी थी. छत्तीसगढ़तेलंगाना बौर्डर पर कर्रेगुट्टा के पहाड़ों पर सुरक्षाबलों ने 24 दिनों तक चले एक आपरेशन में 31 नक्सलियों को मार गिराया था.

‘‘नक्सल सूत्रों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में तकरीबन 40 सालों में हिडमा ही एकलौता ऐसा नक्सली है, जिसे संगठन की टौप-2 टीम (सैंट्रल कमेटी) में जगह मिली है. वह भी तब जब नक्सल संगठन में अंदरूनी
कलह चली और नक्सलियों को सिर्फ ढाल के रूप में इस्तेमाल करने की बात उठने लगी.

‘‘वहीं, डिविजनल कमेटी मैंबर के पद से देवा बारसे का प्रमोशन कर उसे दंडकारण्य स्पैशल जोनल कमेटी मैंबर के कैडर में शामिल कर कमांडर बनाया गया.

‘‘केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अगस्त, 2024 और दिसंबर, 2024 में छत्तीसगढ़ के रायपुर और जगदलपुर आए थे. वे यहां अलगअलग कार्यक्रमों में शामिल हुए थे. इस दौरान उन्होंने अलगअलग मंचों से नक्सलियों को चेताते हुए कहा था कि हथियार डाल दें. हिंसा करोगे तो हमारे जवान निबटेंगे.

‘‘वहीं उन्होंने एक डैडलाइन भी जारी की थी कि 31 मार्च, 2026 तक पूरे देश से नक्सलवाद का खात्मा कर दिया जाएगा. उन के डैडलाइन जारी करने के बाद से बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन काफी तेज हो गए हैं,’’ चांदी ने पूरी खबर सुनाई.

‘‘गृह मंत्री अमित शाह ने तो 21 मई के हमले के बाद मिली कामयाबी को बहुत बड़ी उपलब्धि बताया है कहा है कि जल्दी ही हम देश से नक्सलवाद खत्म कर देंगे,’’ विजय ने चांदी से कहा.

इस पर चांदी बोली, ‘‘मु?ो पता है कि इस मामले के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि नक्सलवाद को खत्म करने की लड़ाई में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है.

‘‘छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में एक आपरेशन में हमारे सुरक्षाबलों ने 27 खतरनाक माओवादियों को मार गिराया है, जिन में सीपीआई (माओवादी) के महासचिव, शीर्ष नेता और नक्सल आंदोलन की रीढ़ नंबाला केशव राव उर्फ बसवा राजू भी शामिल है.

‘‘अमित शाह ने आगे कहा कि नक्सलवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई के 3 दशकों में यह पहली बार है कि हमारे सुरक्षाबलों द्वारा एक महासचिव स्तर के नेता को मार गिराया गया है. मैं इस बड़ी सफलता के लिए हमारे बहादुर सुरक्षाबलों और एजेंसियों की सराहना करता हूं. यह बताते हुए भी खुशी हो रही है कि आपरेशन ब्लैक फौरैस्ट के पूरा होने के बाद, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में 54 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया है और 84 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है. मोदी सरकार 31 मार्च, 2026 से पहले नक्सलवाद को खत्म करने के लिए संकल्पित है.’’

‘‘तो इस में बुराई क्या है… देश के दुश्मनों का तो सफाया होना ही चाहिए,’’ विजय ने खुल कर बोला.

‘‘तुम्हें नक्सलवाद के बारे में कुछ नहीं पता. जो लोग सरकार की गलत नीतियों के शिकार होते हैं, तब बंदूक उठा लेते हैं. अपनी जान बचाने की खातिर गांव का एक 15 साल का बच्चा भी बंदूक चलाना सीख जाता है.

‘‘छत्तीसगढ़ राज्य घने जंगलों और पहाडि़यों से घिरा हुआ है. यहां के आदिवासी समाज में सरकार की नीतियों के खिलाफ नाराजगी है.

‘‘विजय बाबू, आप तो जानते ही होंगे कि इस राज्य में बड़ी तादाद में आदिवासी रहते हैं, जिन के साथ अकसर भेदभाव से भरा बरताव किया जाना है. आदिवासियों की जमीनें कोयले की खदानों में बदल दी जाती हैं और विकास परियोजनाओं के लिए ले ली जाती हैं, लेकिन उन्हें उचित मुआवजा या रहने के लिए दूसरी जगह नहीं मिलती है, जबकि उन की पारंपरिक आजीविका के साधन छीन लिए जाते हैं और वे अपनी सांस्कृतिक पहचान खोने लगते हैं.

‘‘कोढ़ पर खाज यह है कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में बुनियादी जरूरतों की भारी कमी है. पढ़ाईलिखाई, सेहत, पीने का पानी और रोजगार जैसी जरूरी सेवाएं यहां के लोगों तक नहीं पहुंच पाती हैं. कई गांवों में स्कूल और अस्पतालों की हालत खराब है और टीचरों व डाक्टरों की भारी कमी है.

‘‘बेरोजगारी और गरीबी के चलते लोग अपने परिवारों को पालने में नाकाम रहते हैं. उन्हें लगता है कि सरकार उन की समस्याओं को हल करने में नाकाम रही है.’’

‘‘समस्याएं तो हर जगह हैं, पर इस का मतलब यह तो नहीं कि लोग बंदूक उठा कर देश के ही खिलाफ हो जाएं?’’ विजय की बहन सुधा ने सवाल किया.

‘‘दीदी, यहां देश की राजधानी में बैठ कर ऐसे सवाल करना बड़ा आसान है, पर जमीनी हकीकत बड़ी ही भयावह है. गांव में हमारे साथ जो बीतती है, उस पर तो कभी खबर ही नहीं बन पाती है.

‘‘यह खबर तो बाहर आ जाती है कि नक्सली औरतों और लड़कियों के साथ सैक्स संबंध बनाते हैं और उन्हें अपने ग्रुप में शामिल कर लेते हैं, पर जब प्रशासन के लोग हमारा शोषण करते हैं, तो उस का हिसाब कौन रखेगा. सुरक्षाबलों की बुरी नजर से हम नहीं बच पाती हैं.

‘‘मैं हूं नक्सली विचारधारा की और मुझे पता है कि आज नहीं तो कल मुझ पर गाज गिरेगी ही, पर मेरे बाद और कोई हथियार नहीं उठाएगा, इस की गारंटी कौन लेगा? क्या सरकार नक्सलियों को खत्म कर के इस सोच को भी मार देगी कि अब किसी के साथ नाइंसाफी नहीं होगी?’’ इतना कह कर चांदी खामोश हो गई. उस की आंखें मानो पथरा गई थीं. उसे उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी.

कमरे में अब सन्नाटा पसरा हुआ था. विजय, उस के मातापिता और बहन सब चुप थे. उन के पास चांदी के किसी सवाल का कोई जवाब नहीं था.

Family Story: दूसरा विवाह – विकास शादी क्यों नहीं करना चाहता था?

Family Story: अपने दूसरे विवाह के बाद, विकास पहली बार जब मेरे घर आया तो मैं उसे देखती रह गई थी. उस का व्यक्तित्व ही बदल गया था. उस के गालों के गड्ढे भर गए थे. आंखों पर मोटा चश्मा, जो किसी चश्मे वाले मास्टरजी के कार्टून वाले चेहरे पर लगा होता है वैसे ही उस की नाक पर टिका रहता था लेकिन अब वही चश्मा व्यवस्थित तरीके से लगा होने के कारण उस के चेहरे की शोभा बढ़ा रहा था. कपड़ों की तरफ भी जो उस का लापरवाही भरा दृष्टिकोण रहता था उस में भी बहुत परिवर्तन दिखा. पहले के विपरीत उस ने कपड़े और सलीके से पहने हुए थे. लग रहा था जैसे किसी के सधे हाथों ने उस के पूरे व्यक्तित्व को ही संवार दिया हो. उस के चेहरे से खुशी छलकी पड़ रही थी.

मैं उसे देखते ही अपने पास बैठाते हुए खुशी से बोली, ‘‘वाह, विकास, तुम तो बिलकुल बदल गए. बड़ा अच्छा लग रहा है तुम्हें देख कर. शादी कर के तुम ने बहुत अच्छा किया. तुम्हारा घर बस गया. आखिर कितने दिन तुम ममता का इंतजार करते. अच्छा हुआ तुम्हें उस से छुटकारा मिल गया.’’

उस के लिए चाय बनातेबनाते, मैं मन ही मन सोचने लगी कि इस लड़के ने कितना झेला है. पूरे 8 साल अपनी पहली पत्नी ममता का मायके से लौटने का इंतजार करता रहा. लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही कि वह नहीं आएगी. विकास को ही अपना परिवार, जिस में उस की मां और एक कुंआरी बहन थी, को छोड़ कर उस के साथ रहना होगा.

विकास के छोटे से घर में उन सब के साथ रहना उस को अच्छा नहीं लगता था. ममता की अपनी मां का घर बहुत बड़ा था. विकास ने उसे बहुत समझाया कि बहन का विवाह करने के बाद वह बड़ा घर ले लेगा. लेकिन ममता को अपने सुख के सामने कुछ भी दिखाई ही नहीं पड़ता था. उस के मायके वालों ने भी उसे कभी समझाने की कोशिश नहीं की. विकास ने ममता की अनुचित मांग को मानने से साफ इनकार कर दिया. लेकिन ससुराल में जा कर ममता को समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अंत में वही हुआ, दोनों का तलाक हो गया. उन 8 सालों में हम ने विकास को तिलतिल मरते देखा था. वह मेरे बेटे रवि का सहकर्मी था. अकसर वह हमारे घर आ जाता था. मैं ने उस को कई बार समझाया कि वह अब पत्नी ममता का इंतजार न करे और तलाक ले ले. लेकिन वह कहता कि वह ममता को तलाक नहीं देगा, ममता को पहल करनी है तो करे. ममता को जब यह विश्वास हो गया कि विकास उस की शर्त कदापि पूरी नहीं करेगा तो उस ने विकास से अलग होने का फैसला ले लिया.

चाय पीते हुए मैं ने विकास से उस की नई पत्नी के बारे में पूछा तो उस ने बताया, ‘‘आंटी, मैं तो शादी करना ही नहीं चाहता था, लेकिन मां और बहन की जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा. आप को पता है कि उमा जिस से मैं ने शादी की है, वह एक स्कूल में टीचर है. उस के 2 बच्चे, एक लड़का और एक लड़की हैं. लड़का 12 साल का और लड़की 16 साल की है. उमा भी शादी नहीं करना चाहती थी. उमा के मांबाप तो उसे समझा कर थक गए थे, लेकिन अपने बच्चों की जिद के आगे उस ने शादी करना स्वीकार किया. जब उन बच्चों ने मुझे अपने पापा के रूप में पसंद किया, तभी हमारा विवाह हुआ. ‘‘मेरी होने वाली बेटी ने विवाह से पहले, मुझ से कई सवाल किए, पहला कि मैं उस के पहले पापा की तरह उन से मारपीट तो नहीं करूंगा. दूसरा, मुझे शराब पीने की आदत तो नहीं है? जब उसे तसल्ली हो गई तब उस ने मुझे पापा के रूप में स्वीकार करने की घोषणा की. मैं ने भी उन को बताया कि मेरे ऊपर जिम्मेदारी है, मैं उन को उतनी सुखसुविधाएं तो नहीं दे पाऊंगा, जो वर्तमान समय में उन्हें अपने नाना के घर में मिल रही हैं. मैं ने अभी बात भी पूरी नहीं की कि मेरी बेटी बोली कि उसे कुछ नहीं चाहिए, बस, पापा चाहिए. मुझे पलेपलाए बच्चे मिल गए और उन्हें पापा मिल गए.

‘‘मेरा तो कोई बच्चा है नहीं, अब इस उम्र में ऐसा सुख मिल जाए तो और क्या चाहिए. उमा भी यह सोच कर धन्य है कि उस को एक जीवनसाथी मिल गया और उस के बच्चों को पापा मिल गए. अब घर, घर लगता है. बच्चे जब मुझे पापा कहते हैं तो मेरा सीना गर्व से फूल जाता है. एक बार मेरी बेटी ने मेरे जन्मदिन पर एक नोट लिख कर मेरे तकिए के नीचे रख दिया. उस में लिखा था, ‘दुनिया के बैस्ट पापा’. उसे पढ़ कर मुझे लगा कि मेरा जीवन ही सार्थक हो गया है.’’

उस ने एक ही सांस में अपने मन के उद्गार मेरे सामने व्यक्त कर दिए. ऐसा करते हुए उस के चेहरे की चमक देखने लायक थी. बातबात में जब वह बड़े आत्मविश्वास के साथ ‘मेरी बेटी’ शब्द इस्तेमाल कर रहा था, उस समय मैं सोच रही थी कि कितनी खुश होगी वह लड़की, लोग तो अपनी पैदा की हुई बेटी को भी इतना प्यार नहीं करते. मैं ने कहा, ‘‘सच में, तुम ने एक औरत और उस के बच्चों को अपना नाम दे कर उन का जीवन खुशियों से भर दिया. एक तरह से उन का नया जन्म हो गया है. तुम ने इतना बड़ा काम किया है कि जिस की जितनी भी प्रशंसा की जाए, कम है. तुम्हें घर बसाने वाली पत्नी के साथ पापा कहने वाले बच्चे भी मिल गए. मुझे तुम पर गर्व है. कभी परिवार सहित जरूर आना.’’ उस ने मोबाइल पर सब की फोटो दिखाई और दिखाते समय उस के चेहरे के हावभाव से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह कोई नैशनल लैवल का मैडल जीत कर आया है और दिखा रहा है.

‘‘चलता हूं, आंटीजी, बेटी को स्कूल से लेने जाना है. वह मेरा इंतजार कर रही होगी. अगली बार सब को ले कर आऊंगा…’’ और झुकते हुए मेरे पांव छू कर दरवाजे की ओर वह चल दिया. मैं उसे विदा कर के सोच में पड़ गई कि समय के साथ लोगों की सोच में कितना सकारात्मक परिवर्तन आ गया है. पहले परित्यक्ता और विधवा औरतों को कितनी हेय दृष्टि से देखा जाता था, जैसे उन्होंने ही कोई अपराध किया हो. पहली बात तो उन के पुनर्विवाह के लिए समाज आज्ञा ही नहीं देता था और किसी तरह हो भी जाता तो, विवाह के बाद भी ससुराल वाले उन को मन से स्वीकार नहीं करते थे. अच्छी बात यह है कि अब बच्चे ही अपनी मां को उन के जीवन के खालीपन को भरने के लिए उन्हें दूसरे विवाह के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जैसा कि विकास के साथ घटित हुआ है. यह सब देख कर मुझे बहुत सुखद अनुभूति हुई और आज की युवा पीढ़ी की सोच को मैं ने मन ही मन नमन करते हुए आत्मसंतुष्टि का अनुभव किया.

Hindi Family Story: महुआ

Hindi Family Story, लेखिका – प्रगति त्रिपाठी

‘‘अम्मां, तुम दादी और बड़ी मां की तरह बिंदी, सिंदूर और महावर क्यों नहीं लगातीं? चूड़ी और पायल क्यों नहीं पहनतीं?’’ 7 साल की रानी ने अपनी मां महुआ से सवाल किया.

महुआ भला उसे क्या जवाब देती. वह टालती रही और वहीं खड़ी सास और जेठानी को मनिहारिन से चूड़ी पहनते हुए देखती रही.

महुआ यह कैसे कहे कि वह विधवा है. समाज के नियमकानून विधवा औरत को साजसिंगार करने का हक नहीं देते. विधवा… यह नाम उस औरत को देते हैं, जिस का पति मर जाता है और अपने साथ ही उस की जिंदगी से साजसिंगार के साथसाथ सारे रंग भी हमेशा के लिए ले कर चला जाता है.

वह औरत न तो खुल कर हंस सकती है, न ही पर्वत्योहार का हिस्सा बन सकती है. ऐसी औरत अपनी ख्वाहिशों की पुडि़या बना कर मन के संदूक में बंद कर के बड़ा सा ताला लगा देती है और चाबी कहीं दूर सागर की गहराइयों में फेंक देती है, जिस का कभी भी पता नहीं चलता.

लेकिन है तो वह भी इनसान, तिस पर औरत. कभी उस का भी मन करता होगा कि वह मांग में सिंदूर न सही माथे पर एक छोटी बिंदी ही लगा ले, दर्जनभर चूडि़यां न सही, पर हाथों में 2-2 चूडि़यां ही पहन ले.
मांजी महुआ का दर्द जानती थीं, लेकिन समाज के नियमों के खिलाफ जाना भी ठीक नहीं समझती थीं.

परंपरा और नियमों को आगे बढ़ाने का ठेका घर की औरतों ने ही ले रखा है न. मर्दों के दबदबे वाले समाज का पोषण वही तो करती आई हैं, आगे भी करती रहेंगी.

एक जमुना ही थी, महुआ की जेठानी, जिस से महुआ का दुख देखा नहीं जाता था. वह मांजी से छिप कर महुआ का साथ देती और कहती, ‘‘छोटी, तू बिंदी लगाया कर. बिना बिंदी तेरा चेहरा बड़ा सूना लगता है.’’

इस पर महुआ कहती, ‘‘दीदी, काश, यह बात मांजी मुझ से कहतीं, तो मैं बिंदी जरूर लगाती.’’

जमुना के अपनी मांजी से बहुत लड़नेझगड़ने के बाद महुआ को रंगीन साड़ी पहनने की इजाजत मिली थी. उतने में ही महुआ संतुष्ट थी, लेकिन जमुना ने बहुत दूर की सोच रखी थी, जो न मांजी जानती थीं, न महुआ ही.

दरअसल, जमुना तो महुआ की दूसरी शादी करवाने की सोच रही थी.

तीज का त्योहार करीब था. उसी के लिए आज मनिहारिन मांजी और जमुना को चूड़ी पहनाने आई थी. यह देख कर रानी भी खुश थी, तो उसे भी प्यारीप्यारी लाल चूडि़यां पहना दी गईं, जिन्हें पहन कर वह दालान के एक कोने में खड़ी अपनी मां को दिखाने चली आई और मन में उठे सवाल भी पूछे लिए, लेकिन मां के टालने के बाद वह दौड़ कर मनिहारिन के पास जा कर बोली, ‘‘काकी, मेरी मां को भी तो चूड़ी पहना दो.’’

मासूम बच्ची की इस बात पर मनिहारिन आह भर कर रह गई. वह तो खुद यह दर्द सालों से झेल रही थी. उस के जवाब न देने पर रानी हार कर अपनी दादी से सवाल करने लगी, जिस पर दादी बिफर कर बोलीं, ‘‘सुहाग का सामान नहीं पहन सकती तेरी मां.’’

‘‘पर क्यों दादी?’’

‘‘तू नहीं समझेगी.’’

‘‘सब यही कहते हैं कि तू नहीं समझेगी, लेकिन स्कूल के मास्टर साहब तो कहते हैं कि मैं पढ़ाई में बहुत होशियार हूं. मैं हर बात जल्दी समझ जाती हूं.’’

‘‘इधर आ बिटिया, मैं बताती हूं तुझे. यह सवाल तेरे सिलेबस के बाहर का है. यह तो बड़ी क्लास के बच्चे ही समझ सकेंगे. तू अभी बहुत छोटी है बिटिया. जैसेजैसे तू बड़ी होगी, खुद ब खुद समझ जाएगी,’’ जमुना ने रानी को बहलाते हुए कहा.

‘‘बड़ी मां, आप कह रही हैं तो ठीक ही कह रही होंगी.’’

‘‘जा बिटिया, तू अपनी सहेलियों के साथ खेल,’’ जमुना ने रानी को पुचकारते हुए कहा.

रानी अपनी चूडि़यों के साथ खेलतीकूदती बाहर चली गई, लेकिन महुआ अपने कमरे में जा कर फूटफूट कर रोने लगी.

मानो कल की बात हो जब सहेलियों ने आ कर महुआ को बताया था कि बरात आ गई है. इतना सुनते ही उस के रोमरोम में बिजली सी कौंध गई थी.

‘‘महुआ, तेरा दूल्हा राजेश देखने में बहुत सजीला और रोबदार है. उस के आगे हमारे गांव के सभी लड़के पानी भरते नजर आ रहे हैं. ऐसा लड़का तुझे सचमुच कहीं नहीं मिलता,’’ महुआ की सहेलियां दूल्हे की तारीफ करते नहीं थक रही थीं और महुआ शर्म से लाल हुई जा रही थी.

चारों तरफ चहलपहल मची हुई थी. सभी बरातियों के स्वागत में लगे हुए थे. महुआ के ससुर दीनानाथ ने दहेज में एक गाय और 10,000 रुपए की डिमांड की थी, जो महुआ के पिता शांतिलाल खुशीखुशी देने को राजी हो गए थे. आखिर एक ही तो लड़की थी उन की. उन्होंने बंसवारी की एक जमीन बेच दी थी, जो कई सालों से विवादों में घिरी थी.

शांतिलाल के बेटा नहीं था, इसलिए पट्टीदारों की नजर उन की जमीनजायदाद पर थी. शांतिलाल ने सोचा कि बाद में न जाने क्या हो, अभी तो बेटी की शादी में जीभर कर खर्च कर देता हूं. उन के मनमुताबिक रिश्ता भी मिल गया था.

दीनानाथ सेना में सिपाही रह चुके थे. उन के पास 5 बीघा खेत था. छोटा परिवार था. बड़ा बेटा अनूप भी सेना में था. राजेश भी बहुत मेहनती और सुशील लड़का था, जो शहर में खाद और बीज की दुकान चलाता था.

शांतिलाल को भरोसा था कि महुआ को अपनी ससुराल में खानेपीने और पहनने की कोई कमी नहीं होगी. महुआ को खुशीखुशी विदा कर पतिपत्नी चार धाम की यात्रा पर निकल गए.

इधर महुआ भी अपनी ससुराल में धीरेधीरे रचबस गई. सासससुर, जेठजेठानी सभी उसे बहुत प्यारदुलार दे रहे थे और वह भी सब को मानसम्मान देती थी.

एक साल बाद महुआ को प्यारी सी बेटी हुई. बिलकुल रानी की तरह लगती थी वह, इसलिए उस का नाम रानी रख दिया गया. सभी उसे बहुत प्यार करते थे. राजेश तो जान छिड़कता था उस पर.

सबकुछ ठीक चल रहा था, लेकिन रिश्तों का जामा तब बदला, जब 3 साल बाद अचानक एक सड़क हादसे में राजेश की मौत हो गई. हंसताखेलता संसार शोक की आग में धधक उठा. अब रिश्तों में पहले की तरह गरमाहट न रही.

मांजी महुआ के प्रति सख्त हो चुकी थीं और दोनों के बीच संवाद तो न के बराबर रह गया था. बस, एक जमुना ही थी, जो महुआ की परछाईं बनी हुई थी.

महुआ के मातापिता भी इस सदमे से उबर न सके और साल, 2 साल में एकएक कर उसे बीच मझधार में छोड़ कर चले गए. शांतिलाल ने जो सोचा था, आखिर हुआ वही. उन की जमीनजायदाद पट्टीदारों ने हथिया ली. महुआ अपनी बेटी का चेहरा देख कर जिंदगी के दिन काट रही थी.

राजेश के जाने के बाद उसे समझ नहीं आ रहा था कि दिनरात इतने लंबे क्यों हो गए हैं. घरद्वार सब काटने को दौड़ता था, ऊपर से मांजी की जलीकटी बातें उस के जख्म को और हरा कर देती थीं. खैर, वह भी अपना दुख, गुस्सा किस पर निकालती, इसलिए उन की कही गई बातों का महुआ कोई जवाब नहीं देती, बस चुपचाप सुन लेती.

‘‘महुआ… महुआ, दरवाजा खोलो,’’ जमुना की आवाज से महुआ की तंद्रा भंग हुई और उस ने दरवाजा खोल दिया.

‘‘यह क्या, तू फिर रोने लगी? मैं ने कितनी बार कहा है न कि तेरी आंखों में आंसू बिलकुल नहीं आने चाहिए.’’

‘‘मैं क्या करूं दीदी? यादें पीछा नहीं छोड़ती हैं. आप को याद है न 3 साल पहले तीज के दिन राजेश मेरे लिए खुद साड़ी और सिंगार का सामान ले कर आए थे. मेरा सजनासंवरना कितना भाता था उन्हें,’’ इतना कह कर महुआ फिर रोने लगी.

‘‘मैं तेरा दुख समझ सकती हूं छोटी, लेकिन अब हालात वैसे नहीं रहे, राजेश लौट कर वापस नहीं आएगा. तू भी यह बात जानती है, बस मान नहीं पा रही. इस भंवर से बाहर निकल. अपने और रानी के लिए सोच. कब तक यों ही बोझ लिए जीती रहेगी.

‘‘एक बात याद रख, चाहे तेरे लिए कोई हो या न हो, पर तेरी यह दीदी मरते दम तक तेरा साथ देगी,’’ जमुना ने दिलासा देते हुए कहा.

‘‘बस, आप के सहारे ही जिंदा हूं दीदी. मेरे लिए तो आप मांबाप, भाईबहन सबकुछ हैं. आप नहीं होतीं, तो न जाने मैं क्या कर बैठती.’’

‘‘एकदम चुप. अब ऐसीवैसी कोई बात नहीं करेगी. चल, रसोई में मेरी मदद कर. आज मेरा भाई मधुकर तीज का सिंधारा ले कर आने वाला है और साथ ही मांजी का भतीजा रोशन भी आ रहा है,’’ जमुना ने महुआ को याद दिलाते हुए कहा.

‘‘आप चिंता मत करिए दीदी, मैं रसोई संभाल लूंगी,’’ इतना कह कर महुआ मेहमानों के लिए खाना तैयार करने लगी.

तय समय पर मधुकर और रोशन पहुंच गए. अभी वे लोग दालान में बैठ कर जमुना के सासससुर से बातें कर रहे थे. कुछ देर बाद खाना खाने आंगन में पहुंचे.

मधुकर जमुना के साथसाथ महुआ के लिए भी साड़ी लाया था. वह उसे भी अपनी बहन से कम नहीं मानता था.

महुआ जैसे ही खाना परोसने आई, रोशन की आंखें उस पर टिक गईं. उस ने मन ही मन ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह महुआ से ही शादी करेगा. हालांकि, महुआ पर उस की नजर बहुत पहले से ही थी. महुआ भी रोशन के इरादे भांप गई थी.

रोशन का चालचलन ठीक नहीं था. एक साल पहले ही उस की पत्नी की कैंसर से मौत हो गई थी. उस की
2 बेटियां और एक बेटा था, लेकिन उसे जिम्मेदारी का बिलकुल भी अहसास नहीं था.

खाना खाने के बाद रोशन सीधा दालान में गया और अपनी बूआ के पास बैठ गया.

‘‘बेटा, तुम्हारे बालबच्चे कैसे हैं?’’

‘‘ठीक ही हैं बूआ. गौरी के जाने के बाद जिंदगी वीरान सी हो गई है. अब तो दुखसुख बांटने वाला भी कोई नहीं है. मुझ से तो अकेले घरगृहस्थी नहीं संभाली जा रही है बूआ,’’ घडि़याली आंसू बहाते हुए रोशन अपना दुखड़ा रोने लगा.

‘‘मैं तुम्हारा दुख समझती हूं बेटा. एक बात कहूं, तुम दूसरा ब्याह क्यों नहीं कर लेते? इस से तुम्हारी गृहस्थी पटरी पर लौट आएगी.’’

‘‘उस के लिए लड़की भी तो मिलनी चाहिए न बूआ. मुझे तो कोई ऐसी समझदार लड़की चाहिए, जो मेरी घरगृहस्थी के साथसाथ बच्चों की भी जिम्मेदारी उठाए, उन्हें गौरी जैसा प्यार दे.’’

‘‘हां, यह बात तो सही कही तू ने. ऐसी कोई लड़की तेरी नजर में है तो बता?’’

‘‘मेरी नजर में एक ऐसी लड़की तो है,’’ रोशन बोला.

‘‘कौन है? बता मुझे, मैं तेरा रिश्ता ले कर उस के घर जाऊंगी.’’

‘‘तुम बुरा तो नहीं मानोगी न…?’’ रोशन ने सवाल किया.

‘‘मैं क्यों बुरा… कहीं तेरा मतलब महुआ से तो नहीं है? सोचना भी मत उस के बारे में,’’ महुआ की सास गुस्से से लाल हो गईं.

‘‘अरे बूआ, तुम तो नाराज हो गईं. पहले ठंडे दिमाग से मेरी बात तो सुनो. अगर तुम्हें मेरी बात गलत लगे, तो दस जूते मार कर भगा देना.’’

‘‘आज तुम हो, फूफाजी हैं, तो महुआ के सिर पर तुम दोनों का हाथ है, लेकिन कल को तुम दोनों के न रहने पर महुआ और रानी का क्या होगा? इस बारे में कभी सोचा है?

‘‘औरत को समाज में इज्जत से जीने के लिए पति की छत्रछाया की जरूरत होती है, यह बात तुम्हें भी पता है. अगर कल को कोई ऊंचनीच हो जाए, तो क्या करोगी तुम?

‘‘अगर महुआ मेरे घर की बहू बन कर आएगी तो रानी की भी जिंदगी संवर जाएगी और घर की इज्जत घर में ही रह जाएगी. बोलो, अगर मैं ने कोई गलत बात कही हो तो…?’’ रोशन अपनी बूआ को दुनियादारी की घुट्टी पिलाता गया और वे उसे गटकती गईं.

उस समय मांजी रोशन की बात का कोई जवाब नहीं दे पाईं. शाम को मधुकर और रोशन दोनों चले गए. जातेजाते रोशन अपनी बूआ से कह गया कि वे इस बारे में सोचें और आराम से बताएं.

‘मैं ने तो सोचा ही नहीं था कि मेरे बाद महुआ और रानी का क्या होगा? देवरानी और जेठानी में कब बनी है, आज नहीं तो कल अलग हो ही जाएंगी. फिर दूसरे घर तो मैं कभी ब्याह न करूं.

‘रोशन अपना है. उस ने जो भी बात कही, वह बिलकुल सही कही. मेरे दिमाग में पहले यह खयाल क्यों नहीं आया. आज रोशन ने मेरी आंखें खोल दी हैं…’ मांजी यही सोचती रहीं.

रोशन की बात सुन कर मांजी चिंता में पड़ गई थीं. नींद आंखों से कोसों दूर चली गई थी. वे रातभर करवट बदलती रहीं और महुआ के बारे में सोचती रहीं.

इधर महुआ रोशन की हवसभरी नजरों को पहचान चुकी थी. उस ने इस बारे में जमुना को बताया. जमुना रोशन को अच्छे से जानती थी. रोशन ने कई बार जमुना के साथ भी छेड़खानी की थी.

जब एक बार जमुना मांजी से इस बारे में बोली, तब मांजी ने डांट दिया था, उसे, क्योंकि उन की नजरों में रोशन ने अपनी छवि बहुत अच्छी बना रखी थी. मांजी का लाड़ला जो था.

जमुना ने फिर इस बात का जिक्र किसी से नहीं किया. यहां तक कि अपने पति से भी नहीं, लेकिन अब वह रोशन से बिलकुल नहीं डरती थी. एकदो बार मजाकमजाक में ही जमुना ने उस के कान बहुत जोरों से मसले थे. तब से वह जमुना से नहीं उलझता था.

जमुना ने कहा, ‘‘जब तक मैं हूं, तब तक तुझे चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं तेरे साथ ढाल बन कर खड़ी रहूंगी.’’

अगले दिन मांजी ने इस बाबत अपने पति से बात की. उन्होंने भी इस प्रस्ताव के लिए हामी भर दी. अब बारी महुआ से इस बारे में बात करने की थी.

मांजी जानती थीं कि महुआ जमुना की कही कोई बात नहीं टालती, इसलिए वे पहले जमुना को अपने पाले में लेने लगीं, ‘‘जमुना, इधर आ बहू. तुझ से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

जमुना आटा गूंद रही थी. जल्दी से हाथ धो कर वह आई और बोली, ‘‘क्या बात है मांजी?’’

‘‘महुआ के बारे में तुझ से बात करनी है. बैठ यहां. देख, अब मेरी और तेरे ससुर की तबीयत ठीक नहीं रहती. अब हमारी उम्र हो रही है और न जाने कब सांसों की यह लड़ी टूट जाए, इसलिए हम अपने जीते ही महुआ का दूसरा ब्याह कर देना चाहते हैं.’’

जिस बात के लिए मांजी खिलाफ थीं, आज वही बात उन के मुंह से सुन कर जमुना दंग रह गई. एक बार उस ने इस बारे में मांजी से बात करनी चाही थी, तब उन्होंने उसे बहुत खरीखोटी सुनाई थी, लेकिन अब मांजी में आए इस बदलाव को देख कर जमुना बहुत खुश हुई और कहने लगी, ‘‘बहुत अच्छे विचार है मांजी, लेकिन कोई लड़का भी तो मिलना चाहिए न…’’

‘‘लड़का मिल गया है, तभी तो तुझ से इस बारे में बात कर रही हूं. अब बस महुआ तैयार हो जाए.’’

‘‘कौन है वह?’’

‘‘अपना रोशन, भला उस से अच्छा लड़का महुआ को और कहां मिलेगा? और तो और, ब्याह हो कर कहीं दूर न जा कर अपने ही घर रहेगी.’’

रोशन का नाम सुनते ही जमुना के होश उड़ गए. वह समझ गई कि कल रोशन ने मांजी को जरूर बरगलाया है.

‘‘मांजी, अगर आप रोशन के बदले किसी और का नाम लेतीं, तो मैं एक बार सोचती, लेकिन रोशन से महुआ की शादी तो बिलकुल नहीं होने दूंगी.’’

‘‘ऐसी क्या बुराई है उस में?’’

‘‘मैं पहले भी आप को उस की करतूत बता चुकी हूं, लेकिन आप ने कभी मेरी बात नहीं सुनी.’’

‘‘अब वह बदल चुका है बहू. उस के भी बालबच्चे हैं. सब से बड़ी बात यह है कि महुआ अपने ही घर में रहेगी.’’

‘‘मुझे नहीं लगता. न ही मुझे उस पर रत्तीभर भरोसा है.’’

‘‘ठीक है, अगर तू महुआ से बात नहीं करेगी, तो मैं खुद कर लूंगी और वह मेरी बात कभी नहीं टालेगी.’’

‘‘महुआ… बहू…’’ महुआ अपने नाम के साथ बहू सुनते ही चौंक पड़ी, क्योंकि राजेश के जाने के बाद मांजी ने उसे कभी बहू कह कर नहीं बुलाया था.

‘‘जी मांजी,’’ महुआ ने कहा.

‘‘मुझे तुझ से बहुत जरूरी बात करनी है.’’

‘‘हां, कहिए न…’’

‘‘मैं रोशन के साथ तेरा दूसरा ब्याह कराना चाहती हूं. आखिर कब तक जिंदा रहेंगे हम दोनों. तेरे बारे में भी तो सोचना होगा,’’ बिना कोई लागलपेट के मांजी ने अपनी बात कह डाली.

आखिर महुआ का डर सच में बदल गया. मगर, उस ने बड़ी मजबूती से कहा, ‘‘मुझे पता है कि आप को मेरी और रानी की चिंता लगी रहती है, लेकिन मैं रोशन तो क्या किसी से भी शादी नहीं कर सकती.’’

‘‘दोबारा घर बसाना क्या इतना आसान होता है? किसी अनजान को पति के रूप में स्वीकार करना इतना आसान होता है, जबकि पति की छवि दिल में बसी हो? नहीं… मेरे लिए तो बिलकुल नहीं.

‘‘मैं ने सिर्फ राजेशजी से प्यार किया है और इस जन्म में मैं सिर्फ राजेशजी की पत्नी कहलाना पसंद करूंगी. आप लोग मेरा परिवार हैं. मैं आप लोगों को छोड़ कर भला कैसे जा सकती हूं. मेरा मकसद सिर्फ रानी को पढ़ालिखा कर उस का भविष्य संवारना है और मुझे कुछ नहीं चाहिए,’’ महुआ बोली.

‘‘माना मैं तुम्हारे प्रति हमेशा सख्त रही हूं, लेकिन तुम्हारे भले के लिए… यह दुनिया और यह समाज हमें जीने नहीं देते बहू. क्या भरोसा कल को जमुना भी तुम्हारा साथ न दे. समय बदलते देर नहीं लगती, इसलिए मैं जीतेजी तुम दोनों का भविष्य सुरक्षित कर देना चाहती हूं,’’ मांजी बोलीं.

‘‘दुनिया का क्या है मांजी, वह तो अच्छे को भी बुरा कह देती है. क्या पता कल को रोशन से मेरी न निभे या जितनी खुश और सुरक्षित मैं यहां महसूस करती हूं, वहां न कर सकूं. रही बात जमुना दीदी की, तो उन पर मुझे सब से ज्यादा भरोसा है.

‘‘मुझे सिर्फ आप का प्यार और साथ चाहिए. आप मुझ से बात कीजिए, पराया मत समझिए. मैं मानती हूं कि आप ने अपना बेटा खोया है, मैं ने भी तो अपना सबकुछ खो दिया है.

‘‘मेरे जैसी न जाने कितनी औरतें हैं, जो परिवार से मदद न मिलने के चलते जिंदगीभर तकलीफ उठाती हैं और जिन का फायदा रोशन जैसे लोग उठाते हैं,’’ महुआ बोली.

‘‘बस कर, बहुत बड़ी भूल हुई मुझ से, जो तेरे साथ परायों जैसा बरताव किया. आज से जमुना ही नहीं तेरी मांजी भी तेरे साथ हैं,’’ महुआ के दिल में अपने परिवार और बेटे के लिए इतना प्यार और सम्मान देख कर मांजी मोम की तरह पिघल गईं.

मांजी ने आज महुआ को बहू से बेटी बना लिया था. महुआ बच्चों की तरह उन से लिपट कर रोने लगी.

Social Story: हद हुई पार

Social Story: आज से 10 साल पहले अफरोज से रहमान का निकाह बहुत धूमधाम से उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के एक गांव नारायणपुर में हुआ था. उस वक्त रहमान की उम्र 32 साल थी, जबकि अफरोज की उम्र महज 19 साल थी.

रहमान देखने में जितना साधारण था, उस के उलट अफरोज देखने में उतनी ही खूबसूरत और स्मार्ट थी. तकरीबन साढ़े 5 फुट कद की गोरीचिट्टी, गदराए बदन की अफरोज की खूबसूरती के क्या ही कहने थे. जो भी उसे देखता, बस देखता रह जाता.

और देखता भी क्यों न. अफरोज थी ही बला की खूबसूरत. सुर्ख गाल, गुलाबी होंठ, कालेघने लंबे बाल, संगमरमर की तरह चमकता बदन और मोती की तरह दमकते दांत, ऊपर से उठी हुई उस की मदमस्त छातियां, जो उस की खूबसूरती में चार चांद लगा देती थीं.

खूबसूरती के मुकाबले अगर अफरोज आसमान थी, तो रहमान जमीन था. उन दोनों का मिलन होना कोई आसान काम नहीं था, पर रहमान का मुंबई में अच्छाखासा कारोबार और खूब पैसा होने की वजह से उन दोनों का निकाह आसानी से हो गया था.

शादी के 10 दिन बाद ही रहमान अपने अब्बा, भाईबहन और सब रिश्तेदारों को छोड़ कर अफरोज को मुंबई अपने साथ ले गया था.

शादी के एक साल बाद ही अफरोज एक बेटी की मां बन गई. बेटी पा कर वे दोनों बहुत खुश थे. उन की जिंदगी बड़े मजे से गुजर रही थी. यही वजह रही कि अफरोज ने शादी के 9 साल में ही 4 बच्चों को जन्म दे दिया था, जिन में सब से बड़ी 2 बेटियां थीं और उन के बाद 2 बेटे थे.

शादी के इतने साल के बाद अफरोज काफी मोटी हो गई थी. उसे अपने बढ़ते हुए वजन की चिंता होने लगी थी, तो खुद को फिट रखने के लिए उस ने जिम जाना शुरू कर दिया था, जिस में रहमान को कोई एतराज नहीं था. वह तो उस की खुशी में ही अपनी खुशी समझता था.

अफरोज जिम जाती और 1-2 घंटे में वापस आ जाती. उस का वजन कम होने लगा और कुछ ही महीनों की कड़ी मेहनत से उस ने अपनेआप को फिट बना लिया था.

अब अफरोज की पतली कमर और उभरी हुई मस्त छातियां एक अलग ही गजब ढाती थीं. कोई भी उसे देख कर यह नहीं कह सकता था कि वह 4 बच्चों की मां है. 30 साल की उम्र के करीब होने के बाद भी वह 20 साल की लड़की दिखाई देती थी.

अफरोज का ज्यादातर पहनावा टीशर्ट और जींस था. रहमान को भी उस के इस पहनावे से कोई एतराज नहीं था, क्योंकि उस की खुशी में ही वह अपनी खुशी समझता था.

वक्त के साथसाथ और काम के दबाव में रहमान जल्दी बूढ़ा दिखाई देने लगा था. उन दोनों को साथ देख कर कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा पाता था कि वे मियांबीवी हैं. रहमान तो उस के सामने अब ‘अंकल’ लगने लगा था.

धीरेधीरे अफरोज को रहमान के साथ चलने में भी शर्म महसूस होने लगी और वह जब कहीं बाहर जाती, तो उस से कहती, ‘‘तुम घर पर बच्चों को देखो. मैं अकेले ही शौपिंग कर के आती हूं. बस, तुम अपना एटीएम कार्ड मुझे दे दो.’’

पर कहते हैं कि जब कोई इनसान गुनाह करता है, तो वह भले ही कितनी भी सावधानी बरत ले, उस का राज खुल ही जाता है. ऐसा ही कुछ अफरोज के साथ भी हुआ.

रहमान के कई मिलने वालों और पड़ोसियों ने अफरोज को किसी लड़के के साथ बाइक पर आतेजाते देखा और उसे यहां तक बता दिया कि अफरोज का चक्कर उस के जिम ट्रेनर के साथ चल रहा है.

यह सुन कर रहमान के पैरों तले जमीन ही खिसक गई कि जिसे वह दिलोजान से प्यार करता है, जिस की हर ख्वाहिश वह पूरी करता है, वह उसे धोखा दे रही है.

शाम को जब अफरोज देर से घर आई, तो रहमान ने उस से देर से आने की वजह पूछी.

अफरोज ने रहमान को यह कह कर टाल दिया, ‘‘मैं अपनी एक सहेली के घर चली गई थी.’’

अफरोज का यह झूठ सुन कर रहमान को बहुत गुस्सा आया और वह चिल्लाया, ‘‘तुम अपनी सहेली या बौयफ्रैंड के साथ थी?’’

यह सुन कर अफरोज हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘क्या बोल रहे हो तुम… मैं भला तुम से झूठ बोलूंगी क्या? मैं अपनी सहेली के साथ थी.’’

रहमान ने उस से पूछा, ‘‘कौन सी सहेली? जरा उस का मोबाइल नंबर दो. मैं उस से बात करता हूं.’’
इस पर अफरोज गुस्से से पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गई और बोली, ‘‘हां, मैं अपने बौयफ्रैंड के साथ बाहर गई थी.’’

यह सुन कर रहमान ने उस से कहा, ‘‘अब तुम्हें जिम जाने की कोई जरूरत नहीं है. आज से तुम घर में ही रहोगी और जब भी कहीं बाहर जाओगी, मेरे साथ ही जाओगी.’’

इस पर अफरोज गुस्से से बोली, ‘‘मैं देखती हूं कि कौन मुझे अकेले जाने से रोकता है.’’

रहमान ने अफरोज को सख्ती से कहा, ‘‘मेरे जीतेजी तुम बिना मेरी इजाजत के इस घर से बाहर कदम नहीं रख सकती. अगर तुम ने ऐसा किया, तो अच्छा नहीं होगा. मैं दूसरी शादी कर लूंगा. फिर करना अपने मन की.’’

अफरोज हंसते हुए बोली, ‘‘इस उम्र में कौन तुम से शादी करेगी… यह तो मेरा अहसान समझ जो मैं अपने से इतनी बड़ी उम्र के आदमी से शादी की और तुम्हें इतनी खूबसूरत बीवी मिली’’

यह सुन कर रहमान को और गुस्सा आ गया और वह बोला, ‘‘तुम्हारा घमंड तभी चकनाचूर होगा, जब मैं दूसरी शादी कर के इसी घर में नई दुलहन ले कर आऊंगा,’’ कहते हुए वह अपने कमरे में सोने चला गया.

रहमान दूसरी शादी की सिर्फ धमकी दे कर अफरोज का घमंड तोड़ना चाहता था, ताकि वह सही रास्ते पर आ जाए, पर उस का ऐसा सोचना गलत साबित हुआ.

एक दिन रहमान ने अफरोज के सामने अपने एक दोस्त को फोन किया और उन से अपनी दूसरी शादी करने के लिए लड़की देखने को कहा.

यह सुन कर अफरोज ने एक कातिल हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘एक बीवी तो संभाली नहीं जाती, उस की जिस्मानी जरूरत पूरी नहीं की जाती, दूसरी का ख्वाब देख रहे हो. वह 2-4 दिन में ही तुम्हें छोड़ कर चली जाएगी. पहले अपना इलाज तो करा लो. औरत को खुश करने के लायक तो बन जाओ.

‘‘तुम क्या सम?ाते हो कि औरत को केवल पैसा चाहिए? अरे पागल इनसान, उसे अपनी जिस्मानी जरूरत भी पूरी करनी होती है, जो तुम्हारे बस की बात नहीं.’’

अफरोज का यह जुमला सुन कर रहमान दंग रह गया और उसे यह समझते देर न लगी कि अफरोज उस से संतुष्ट नहीं होती, उस की जिस्मानी इच्छा अधूरी रह जाती है, इसलिए उस ने बाहर का रुख किया.

रहमान ने कहा, ‘‘ओह, अगर जवान लड़की न सही, तो मैं किसी हमउम्र औरत से ही शादी कर लूंगा.’’

यह बात सुन कर अफरोज के दिमाग में एक जुर्म ने जन्म ले लिया और उस ने रहमान को अपने रास्ते से हटाने का प्लान बना लिया.

अब अफरोज ने रोजाना रहमान के दूध में नशे की गोलियां मिलाना शुरू कर दिया, लेकिन जब इस से बात नहीं बनी, तो एक दिन उस ने रहमान के खाने में चूहेमार दवा डाल दी.

रहमान ने जैसे ही खाना खाया तो कुछ ही देर में उस की हालत बिगड़ने लगी और वह तड़पने लगा. तभी उस की बड़ी बेटी रोने लगी और पड़ोस वाले अंकल को अपने पापा की तबीयत खराब होने के बारे में बोली.

तभी फौरन 2-3 लोगों ने रहमान को अस्पताल पहुंचाया, जहां कुछ देर के इलाज के बाद उस की तबीयत में सुधार आ गया.

डाक्टर ने रहमान से पूछा, ‘‘आखिर तुम क्यों खुदकुशी करना चाहते हो, जो तुम ने जहर खा लिया?’’

रहमान कुछ नहीं बोला, पर वह इतना समझ गया कि हो न हो अफरोज ने खाने में उसे कुछ दिया था.
कुछ दिन बाद जब रहमान अस्पताल से घर वापस आया तो उसे चूहेमार दवा रसोईघर में मिल गई, जो न कभी वह लाया था और न ही उन के घर में चूहे थे.

रहमान ने वह चूहेमार दवा अफरोज को दिखाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती जो अपने ही शौहर को मार कर बेवा होना चाहती हो… अगर तुम्हें अपना खयाल नहीं है, तो कम से कम इन बच्चों का तो खयाल करती, जिन्हें तुम यतीम बनाना चाहती हो.’’

अफरोज बोली, ‘‘कौन से बच्चे? इन बच्चों को क्या मैं अपने घर से लाई थी? तुम्हारी औलाद है, तुम जानो. मुझे किसी से कोई मतलब नहीं.

‘‘तुम भी तो दूसरी शादी कर के इन बच्चों और मेरा हक छीन कर दूसरों को देना चाहते हो. जब तुम्हें अपने बच्चों की परवाह नहीं, तो मैं क्यों करूं?’’

रहमान ने अफरोज को समझाते हुए कहा, ‘‘अगर मुझे कुछ हो जाता, तो तुम भी जेल जाती और बच्चों के सिर से मांबाप दोनों का साया उठ जाता. अफरोज, इस घर को मत तोड़ो. बच्चों की खातिर तुम भी सुधर जाओ.’’

इस पर अफरोज बोली, ‘‘तो तुम मुझ पर पाबंदी क्यों लगा रहे हो? तुम ने मुझे घर में कैद क्यों किया है?

मेरी भी जिंदगी है, मेरे भी कुछ अरमान हैं. मैं इस चारदीवारी में घुटघुट कर नहीं जीना चाहती, भले ही उस के लिए कुछ भी करना पड़े.’’

अफरोज किसी भी कीमत पर मानने को तैयार न थी. फिर कुछ दिन बाद रहमान काम पर जा रहा था, तो एक कार वाले ने उसे टक्कर मार दी और वह जमीन पर गिर कर बेहोश हो गया.

वहां मौजूद कुछ लोगों ने रहमान को अस्पताल पहुंचाया और जब उसे होश आया, तो उस का एक हाथ टूट चुका था, सिर पर कई जगह गहरी चोट आई थी.

रहमान के होश में आने के बाद 2 पुलिस वाले आए और उन में से एक पुलिस वाले ने उस से सवाल पूछा, ‘‘तुम्हारी किसी से कोई दुश्मनी है क्या, जो तुम्हारी जान लेने की खातिर तुम पर हमला हुआ? कार वाला तुम्हें जानबूझ कर टक्कर मार कर वहां से भाग गया था. क्या यह एक सोचीसमझी साजिश तो नहीं थी?’’

रहमान सम?ा गया कि यह हमला अफरोज ने ही कराया होगा, पर अगर वह उस के खिलाफ पुलिस को बता देता, तो पुलिस अफरोज को गिरफ्तार कर लेती, तब बच्चों का क्या होता?

रहमान की हालत तो ऐसी थी कि वह उठ भी नहीं सकता था, इसलिए उस ने पुलिस से कहा, ‘‘नहीं, मेरी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. और भला कोई मुझे मारने की कोशिश क्यों करेगा?’’

पुलिस वाले रहमान का स्टेटमैंट ले कर चले गए. 10 दिन बाद उसे भी अस्पताल से छुट्टी मिल गई और वह घर आ गया.

रहमान ने अफरोज से पूछा, ‘‘यह हमला तुम ने ही कराया था न?’’

अफरोज गुस्से में बोली, ‘‘मैं क्यों कराऊंगी?’’

रहमान ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘क्यों तुम मेरी जान के पीछे पड़ी हो? अगर मेरा खयाल नहीं है, तो कम से कम इन बच्चों का खयाल तो करो.’’

अफरोज ने कहा, ‘‘तुम मुझ पर झूठा इलजाम लगा रहे हो. अगर तुम्हें मुझे अपने साथ नहीं रखना, तो मेरा हक दे दो, फिर मैं तुम्हारी जिंदगी से चली जाऊंगी.’’

रहमान ने उस से कहा, ‘‘यह मेरे सवाल का जवाब नहीं हुआ. तुम कहां जाना चाहती हो और कौन सा हक मांग रही हो?’’

अफरोज बोली, ‘‘वह हक जो एक बीवी का उस के शौहर की जायदाद में होता है. वही हक जो मेरा तुम्हारी जायदाद में इसलाम के हिसाब से और कानून के हिसाब से बनता है.’’

रहमान ने अफरोज को साफ शब्दों में समझा दिया, ‘‘मेरी सारी प्रोपर्टी और पैसा सिर्फ मेरे बच्चों का है, उसे मैं किसी को नहीं दूंगा. तुम कुछ भी कर लो… चाहे मुझे मार दो, पर मैं वह तुम्हें और तुम्हारे उस आशिक को नहीं दूंगा, जिस के लिए तुम यह हरकतें कर रही हो.’’

यह सुन कर अफरोज चिल्लाई, ‘‘इस जायदाद पर मेरा भी हक है और वह मैं ले कर रहूंगी, चाहे उस के लिए मुझे कोई भी हद पार करनी पड़े. अगर तुम अपनी खैरियत चाहते हो, तो मुझे मेरा हक दे दो, उस के बाद तुम अपने रास्ते और मैं अपने रास्ते.’’

रहमान ने उस से कहा, ‘‘मैं वकील को बुला कर अपनी सारी जायदाद अपने बच्चों के नाम कर दूंगा, फिर ले लेना तुम आप हक.’’

अफरोज ने भी अपना फैसला सुना दिया, ‘‘ठीक है… तुम अपना काम करो और मैं अपना. आज से तुम्हारा रास्ता अलग और मेरा रास्ता अलग…’’ कहते हुए उस ने अपना बैग पैक किया और घर छोड़ कर चली गई.
अफरोज के जाने से रहमान को दुख तो बहुत हुआ, पर उसे यह भी उम्मीद थी कि 1-2 दिन में वह थकहार कर वापस आ जाएगी.

पर रहमान का ऐसा सोचना गलत साबित हुआ और अफरोज नहीं आई, बल्कि उस का कानूनी नोटिस आया, जिस में उस ने रहमान पर मारपीट और जबरन कैद के साथसाथ रेप और दहेज का मुकदमा दर्ज कर दिया. साथ ही, उस ने रहमान के घर वालों, जो गांव में रहते थे, को भी इस सब में लपेट दिया.

मुकदमा चालू हो चुका था. अब अफरोज रहमान से एक ही बात कहती कि या तो 50 लाख रुपए नकद और एक फ्लैट उस के नाम किया जाए, वरना वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगी.

रहमान अफरोज की धमकी में इतनी आसानी से नहीं आने वाला था, क्योंकि बच्चे उस के पास थे और उस ने भी इरादा कर लिया था कि चाहे जो हो जाए, पर वह उसे इतनी आसानी से कुछ नहीं देगा.

मुकदमा चलता रहा. तारीख पर तारीख लगती रही. रहमान और उस के परिवार वालों ने अपनी जमानत करा ली थी. फिर एक दिन रहमान के पास अफरोज का फोन आया और वह बोली, ‘तुम मेरा हक दे दो, वरना तुम्हारे लिए ठीक नहीं होगा.’

रहमान ने उस से साफसाफ कह दिया, ‘‘तुम भले ही मुझे मरवा दो, पर मैं तुम्हें कुछ नहीं दूंगा. यह सब मेरे बच्चों का है,’’ यह सुन कर अफरोज ने गुस्से में फोन काट दिया.

इस के बाद अफरोज का कोई अतापता नहीं चला कि वह कहां है, किस के साथ है और क्या कर रही है. न उस ने कभी रहमान और बच्चों से मिलने की कोशिश की, न कभी कोई फोन किया और न ही उन का तलाक हुआ. केस की तारीख पर भी वह नहीं आई, तो केस खत्म हो गया.

अब रहमान अपने बच्चों को पाल रहा है, पर उस के भीतर एक अनजाना डर भी है कि कहीं अफरोज उसे या बच्चों को कोई नुकसान न पहुंचा दे.

Social Story: धंधेबाज

Social Story: चालाक आंखें, दिमाग में खुराफात और हर पल रुपया कमाने की उधेड़बुन के साथ वह अपनी आवाज को एकदम मधुर रखता है. अपनी बनावटी आवाज को उस ने एक कामयाब मुखौटा बना रखा है.

उस का नाम छलिया है. जैसा नाम वैसा गुण. छलिया अपनी फितरत और हर हरकत में कपटी है, चालबाज है. आज वह इस शहर में जमीन का दलाल है, मगर कभी वह निपट देहाती हुआ करता था और उस के काम ही ऐसे थे कि एक दिन उसे अपना गांव रातोंरात छोड़ कर वहां से भागना पड़ा था.

दरअसल, छलिया कुछ रुपयों के लालच में गांव के लड़कों को बीड़ीसिगरेट पीने की लत लगा रहा था. वह गांव की अच्छीभली कालेज जाती लड़कियों को मौडल बन कर ऐशोआराम की जिंदगी जीने के खूबसूरत सपने दिखाया करता था. अपने भाईबहनों में सब से छोटा छलिया अपनी बुजुर्ग, लाचार मां के लिए भी एक नासूर बन चुका था.

यह सोच कर छलिया का ब्याह कराया गया कि वह अपनी खुराफात से तोबा कर लेगा, मगर पत्नी को भी उस ने अपने जैसा बना लिया था. खेती में उस का मन लगता नहीं था. उसे मवेशी की देखभाल करना पसंद नहीं था. सुबह से रात तक वह कुछ न कुछ प्रपंच करता रहता था.

दमा से पीडि़त छलिया की बीमार मां एक दिन उसे ‘अब तो सुधर जा रे छल्लू’ कहते हुए इस दुनिया से विदा हो गई. इस के बाद तो छलिया और ज्यादा आजाद हो गया.

मगर एक दोपहर छलिया को गांव की पंचायत ने यहां से फौरन दफा हो जाने का आदेश दे ही दिया और यह होना ही था. उस ने काम ही ऐसा किया था. शहर के एक राजनीतिक दल से सांठगांठ कर के उस ने गांव के इंटर कालेज और स्कूल के छात्रों को गलत रास्ते पर चल कर आत्मदाह और प्रदर्शन के लिए उकसाया था. मिठाई, सिगरेट, शराब और मांस भी बांटा था.

इस में कमीशन के तौर पर छलिया को भी खूब रुपया मिला था, मगर समय रहते किसी ने मुखबिरी कर दी थी. उस का भांडा फूट गया था और छलिया को आननफानन में पंचायत के सामने पेश किया गया था.

छलिया इतनी मोटी चमड़ी का बना हुआ था कि वह पत्नी और अपने एक साल के बेटे को ले कर बेशर्मी से कोई टपोरी सा गीत गाता हुआ गांव की सरहद पार कर गया. शहर में बलुआ तो उस का पुराना यार था ही.

बलुआ ही तो तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, पान मसाला का सप्लायर था. उस ने छलिया को एक गैस्ट हाउस में 150 रुपए प्रतिदिन पर कमरा दिलवा दिया. छलिया को रोजगार की चिंता थी ही नहीं. कितनी ही तरकीबें थीं उस के शातिर दिमाग में.

कबाड़ी महल्ले जा कर बलुआ के होलसेल के गोदाम से छलिया ने 2 थैले उठाए और अगले दिन सुबह 8 बजे रेलवे स्टेशन के बाहर की सड़क से मटर गली, वहां से पुरानी मंडी, फिर सदर बाजार और मेला मैदान होता हुआ दोपहर तक 8-9 किलोमीटर तक हो आया. तब तक उस के थैले से पान मसाला, सुपारी, अगरबत्ती, बीड़ी, सिगरेट, कंडोम वगैरह अच्छेखासे बिक चुके थे.

दोपहर को उसी गैस्ट हाउस में छलिया ने पत्नी के साथ लंच किया. इस के बाद वह गहरी नींद में ऐसा सोया कि रात को साढ़े 10 बजे ही जागा.

छलिया ने बगल में गौर से देखा कि पत्नी और बेटा तो बेसुध पड़े हुए थे. जागते ही भविष्य की सोच में मगन छलिया ने अंदाजा लगाया कि अभी 1-2 महीने तक इसी गैस्ट हाउस में समय काट लेना चाहिए.

खानापीना, रहना सब मिला कर 700 रुपए लग रहे हैं.

यही सब सोचता हुआ छलिया गैस्ट हाउस से बाहर आ गया. बाहर काफी सुनसान था. वह पैदल चलता रहा. इस से पहले भी वह शहर आता रहता था, मगर इतनी रात के समय उस ने शहर को पहली बार ही देखा था.

छलिया को तेज पेशाब आया. एक कोना खोज कर वह पेशाब कर रहा था कि एक महंगी कार आ कर रुकी. कुछ ही पल में एक बाइक आई. घने अंधेरे में 2-3 लोग आए और आपस में बातें करने लगे.

एक आदमी कह रहा था, ‘‘आजकल तो फोन पर बात करना बहुत खतरनाक हो गया है. दफ्तर में तो जासूस हैं.

कोई भी जगह महफूज नहीं है, इसीलिए यहां बुला कर आमनेसामने बात कर रहा हूं.’’

वह बाइक सवार था. सब ने गरदन हिलाई. वह बाइक वाला आगे बोला, ‘‘यह जो रामनगर में औषधि वाला सरकारी पार्क बन रहा है न, उस के आसपास की बहुत सारी जमीन कब्जे की है, बेनामी है. वहां अगर तुम लोग अपने फड़ लगा लो या कोई धार्मिक स्थल बना लो या फिर कोई प्याऊ भी लगा लो, तो बाद में हौलेहौले इसे किसी बाहरी को बेच देना. मुझे यही बताना था. और हां, यह रहा इस जगह का पूरा नक्शा.’’

बाकी सभी लोग बेहद खुश लग रहे थे. बताने वाले आदमी के कंधे थपथपाए जा रहे थे.

कुछ और बातें आपस में कहसुन कर कार वाला एक दिशा में, तो बाइक वाला दूसरी दिशा में चल दिया.

उधर कोने में छिपा छलिया एकएक बात सुन चुका था. इस वक्त के घने अंधकार में उस को जगमग रोशनी दिखने लगी. वह हंसने लगा. उस शातिर की बांछें खिल उठीं.

अगली सुबह छलिया थैला उठा कर फेरी वाला बनने के बजाय सीधा बलुआ के पास गया. उस को पिछली रात का सारा मामला कह सुनाया.

बलुआ ने उसे गले से लगा लिया. अब वे दोनों सामान जमा करने निकल पड़े. दोपहर तक रामनगर के उस पार्क के साथ सटी जमीन का एक कोना घेर लिया और वहां पर तुलसी और पीपल के पौधे रोप दिए.

छोटेछोटे पोस्टर लगा दिए, जिन में लिखा था कि ‘यह पावन जगह है. थूकने और पेशाब करने की सख्त मनाही’.

देवताओं के चित्र लगा कर गुल्लक रख दिए. ?ाडि़यां लगा दीं. चारों तरफ गेरू का लेपन कर के उसे आकर्षण का केंद्र बना दिया. इस के बाद वे दोनों गैस्ट हाउस चले गए.

उन को देखते ही छलिया की पत्नी ने बताया कि वह और बेटा तो नाश्ता और लंच कर चुके हैं. छलिया ने बेटे को खूब प्यार किया. पत्नी को कुछ रुपए दिए और कान में कुछ समझा कर बाहर टहलने भेज दिया.

पत्नी और बेटा जैसे ही बाहर गए, बलुआ और छलिया ने सिगरेट जलाई. अब उन दोनों का दिमाग चलने लगा कि कैसे इस जमीन के टुकड़े को लाखों रुपए में बेच कर रकम अपनी अंटी में डाली जाए. उन को इस बात का तोड़ भी मिल गया. गैरकानूनी धंधे में घुसे किसी भूमाफिया की सरपरस्ती.

10-12 दिन की जुगत के बाद बलुआ को एक ऐसा जमीन माफिया मिल ही गया. इतने दिन में एक बात और हो चुकी थी. उस खाली जमीन के 90 फीसदी हिस्से पर जबरन कब्जा हो गया था. एक प्याऊ, एक बंजारा परिवार, एक मूर्ति बनाने और बेचने वाला, एक कबाड़ वाला समेत कुछ छिटपुट प्लास्टिक की मड़ई लग चुकी थीं.

छलिया और बलुआ को अच्छी तरह से पता था कि जिस जरा सी जमीन पर उन दोनों ने कब्जा किया है, उस पर कोई कुछ नहीं कहेगा. वजह यह थी कि यह जमीन कम से कम 2000 वर्गगज तो थी ही, तो 150 वर्गगज में कोई बवाल किसलिए खड़ा करेगा. दूसरा, उन दोनों ने इस में धार्मिक प्रतीक लगा कर इसे संवेदनशील बना दिया था.

चारों तरफ के कब्जे को अच्छी तरह से देखते हुए बलुआ ने छलिया को बताया, ‘‘देखो, ये सब लोग फर्जी हैं, बनावटी हैं. इन सब को दिहाड़ी दे कर बिठाया गया है. जमीन का सौदा होते ही ये सब ऐसे गायब होंगे जैसे कि यहां थे ही नहीं,’’ कह कर वह खामोश हो गया.

‘‘तुम इन के बारे में इतना सब जानते हो?’’ छलिया ने हैरत से पूछ लिया, तो बलुआ बोला, ‘‘अरे हां, मैं तो इन के परिवारों को भी जानता हूं. आज 6 राजनीतिक दल हैं शहर में. ये लोग 300 रुपए रोज के हिसाब से सभी की रैली, प्रदर्शन, जुलूस, नारेबाजी में शामिल होते हैं. बाकी समय में ये लोग शादी में रोटियां बनाने का, लाइट उठाने का काम करते हैं.

‘‘एक और बात… सूने घरों की रेकी भी इन से कराई जाती है. एक रात की रेकी और पुख्ता जानकारी के 500 रुपए तक मिल जाते हैं इन को. छलिया, यह सब सच है. यह शहर इसी तरह इन को पाल रहा है.’’

वैसे छलिया को इस शहर के काफी सारे दबेछिपे रंग और काली करतूतें पहले से ही पता थीं, आज एक और जानकारी मिल गई थी. इस बीच कभीकभार वह थैले ले कर फेरी लगा लेता था. बस, 5 घंटे के दौरान ही वह दिन के 500 रुपए आराम से कमा लेता था, मगर छलिया को इतने से संतुष्टि कहां मिलने वाली थी.

उसे तो अपनी दोनों जेब लाखों रुपए से लबालब चाहिए थीं.

इसी बीच छलिया की पत्नी ने भी एकाध बार शिकायत कर दी थी कि कुछ दिन तो आराम करते हुए मजा आया, मगर अब तो गैस्ट हाउस में बैठेबैठे दम घुट रहा है. टैलीविजन भी कितना देखे. आंखें दुखने लग गई हैं.

तब छलिया ने पत्नी के लिए सिलाई मशीन खरीद दी. बेटे के लिए इतने खिलौने थे कि जरूरत से ज्यादा. वह इतना छोटा था कि अभी ढंग से बोल नहीं सकता था, शिकायत नहीं कर सकता था. छलिया ने पत्नी को भी सुनहरे सपने दिखा रखे थे.

कुछ दिन बाद बलुआ और छलिया को एक भूमाफिया मिल ही गया. नगरपालिका से नकली कागज और नक्शे निकलवाना उस के लिए बाएं हाथ का खेल था. उस ने चारों तरफ देखा. यह जमीन उस की जहरीली नजर से आज तक बच कर रह कैसे गई. वह हैरत में था.

बलुआ और छलिया की कब्जाई 150 गज जमीन की असली कीमत तो 60-70 लाख रुपए के आसपास थी, मगर उन को केवल 7 लाख रुपए नकद दे कर भूमाफिया ने उन को धमका कर, खबरदार भी कर दिया कि खयाल रहे, यह बात कहीं खुलनी नहीं चाहिए… बलुआ और छलिया ने वहीं के वहीं कसम खा ली.

छलिया ने सारी रकम बलुआ को थमा दी. बलुआ ने उस के हिस्से के रुपए से पगड़ी की रकम दे कर एक फ्लैट किराए पर दिला दिया. बचे रुपयों से घरगृहस्थी का जरूरी सामान आ गया.

छलिया की पत्नी को इस बात से कोई लेनादेना नहीं था कि अचानक इतने सारे रुपए किधर से और कैसे आ गए हैं. उसे तो अपना घर अच्छा लगा, चाहे वह किराए का ही था.

छलिया समझ गया कि अब पत्नी को सारा दिन बिजी रहने का काफी काम मिल गया है. अब वह आगे की खुराफात में लग गया.

छलिया ने एक साल के अंदर नशे के कारोबार में भी कुरियर बन कर लाखों रुपए के वारेन्यारे कर लिए थे. अब वह भी प्रोपर्टी डीलर बन गया था. बेटा अब 4 साल का था और नर्सरी स्कूल में जा रहा था. छलिया काले धंधे में रमने लगा था. अपने घर की कोई कहानी उसे पता नहीं थी.

एक दिन छलिया को किसी अनजान आदमी का फोन आया, ‘‘तुम बलुआ को समझाओ, वरना वह जेल जाएगा.’’

बलुआ ने ऐसी कौन सी चूक कर दी? छलिया तुरंत फोन करने वाले से मिलने गया.

फोन करने वाला एक दमदार पुलिस वाला था. उस को पक्की खबर मिली थी कि उस के थाने के तहत जो रंगोली कालोनी है, वहां बलुआ एक शादीशुदा औरत के साथ एक साल से गलत रिश्ता बनाए हुए है. उस औरत के पति ने रिपोर्ट दर्ज कराई है. एक वीडियो भेजा है, जिस में बलुआ और उस आदमी की पत्नी आपस में जिस्मानी रिश्ता बना रहे हैं.

वहां जा कर छलिया ने यह सब सुना, तो अपना पसीना पोंछ कर अपनी घबराहट को छिपाया. बलुआ को फोन लगाया, पर वह उठा ही नहीं रहा था. मन में कुछ शक पैदा हुआ. वह सीधा रंगोली कालोनी पहुंच गया. बलुआ वहीं मिल गया. एक औरत और बलुआ दोनों चाय पी रहे थे.

उस औरत ने बहुत ही बेढंगे कपड़े पहने हुए थे. बाल बिखरे हुए थे. बलुआ भी काफी थकाथका सा लग रहा था.

छलिया को अचानक देखा तो बलुआ कुछ झेंप गया. बहाना बना कर उस ने चाय जैसेतैसे गटक ली. कुछ पल ठहर कर वह चलता बना. छलिया से वह नजरें नहीं मिला पा रहा था और छलिया इस समय खुद भी उस से नजरें नहीं मिलाना चाहता था.

‘‘शरम नहीं आती. इतना अच्छा पति है, बालबच्चे हैं और उस पर यह करतूत?’’ छलिया ने फटकारा, तो वह औरत अपने जिस्म को हिलाडुला कर बोली, ‘‘प्यार में कैसी शरम?’’

‘‘अगर तेरे पति को बता दूं तो?’’ छलिया ने धमकाया.

‘‘तो मैं अभी आप से लिपट कर एक सैल्फी लूंगी. आप को अपराधी साबित कर दूंगी. फिर आप का दोस्त बलुआ ही आप का दुश्मन होगा. बहुत मजा आएगा.’’

छलिया को समझते देर न लगी कि यह बहुत ही शातिर औरत है. इस ने कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं. लगता है घाटघाट का पानी पी चुकी है, इसीलिए शरम तक नहीं है.

छलिया ने उस औरत को नमस्कार किया. उस के पास और भी काम थे. वह उठा और सीधा पुलिस वाले के पास गया. उस को 1,000 रुपए थमा कर कहा कि 2-4 दिन में सब ठीक हो जाएगा.

अब छलिया ने अपना काम किया. उस के पास सीधी उंगली से घी निकालने के अनेक रास्ते थे. सब से पहले उस ने बलुआ पर अपनी नाराजगी जाहिर तक न होने दी, मगर उस औरत के पति का सारा हिसाबकिताब पता लगाता रहा. वह हर महीने 7 दिन के दौरे पर बाहर जाता ही जाता था. छलिया ने पुलिस वाले को 2-3 हजार और टिका दिए. उस ने मुंह बंद रखा.

उधर बलुआ बहुत खुश था कि चलो सब ठीक है. उन दोनों का मिलना बदस्तूर जारी था. छलिया जानता था
कि ईमानदार पति किसी न किसी दिन कांड कर के ही छोड़ेगा. कुछ न कुछ तो करना ही था. इसी में छलिया की भी सुरक्षा थी.

अगर बलुआ गिरफ्तार होता तो छलिया के बचने की भी न के बराबर गुंजाइश थी. कुछ न कुछ ऐसा हो ही जाता कि छलिया को भी सलाखों के पीछे जाना होता.

अब छलिया ने अगला कदम यह उठाया कि इधर उस औरत का पति दौरे पर गया और उधर उस औरत के मासूम बालक का स्कूल के बाहर से अपहरण किया गया. फिरौती की रकम के तौर पर लाखों रुपए की मांग की गई और पति से यह अपहरण छिपाए रखने को भी कहा गया.

साथ ही, उस औरत के सारे फोन टेप कराए. उस औरत ने सीधे बलुआ से बात की और बलुआ ने छलिया से. हर तरह से कठपुतली की डोर अब छलिया के हाथ में ही थी.

उधर जैसे ही बलुआ से 2 लाख रुपए की मांग की, तो बलुआ ने उस से हमदर्दी जताने की जगह उस को खरीखोटी सुना दी. पिछले ही महीने महंगी दारू की शौकीन वह औरत 70 हजार की दारू बलुआ के रुपयों से गटक गई थी.

बलुआ ने अब उस से कन्नी काटने का संकल्प कर लिया था. छलिया ने उस के हावभाव पढ़ लिए थे. यही मौका था. छलिया ने अपनी पत्नी को फोन किया कि उस के दोस्त का जो बालक उस के घर पर रह रहा है, उस को तैयार कर के बाहर भेजो. उस के मातापिता लौट आए हैं.

छलिया की पत्नी ने बताया कि वह बालक तो यहां बहुत खुश है. उस को छलिया के बेटे के रूप में एक बड़ा भैया मिल गया है. खैर, बहुत ही होशियारी से उस मासूम को सकुशल घर भेज दिया गया.

अब तक बलुआ को खबर नहीं थी कि उस के पीछे क्या साजिश चल रही थी. छलिया ने शहर के बड़े साहब से मिल कर उस औरत के पति का तबादला करवा दिया. 10 दिन में कहीं दूरदराज तबादला भी हो गया था. सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी.

अब तो धंधेबाज छलिया इतने रुतबे वाला था कि दौलतमंद होने के साथसाथ सरकार में भी असर रखता था. 1-2 दिन बाद छलिया और बलुआ वापस अपने काले धंधे पर लग गए.

हैरानी की बात उस औरत के साथ थी. उस का साढ़े 3 साल का मासूम बालक उन लोगों की रहरह कर तारीफ करता था, जो उस का अपहरण कर के ले गए थे. उस घर में एक बड़ा भाई भी था, जो उसे गिनती और कविता सिखाता था. बगैर फिरौती के उस औरत के बेटे को 2-3 दिन में छोड़ दिया गया था.

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