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जीवनज्योति- भाग 2: क्या हुआ था ज्योति के साथ

ज्योति तो उन के दिल का टुकड़ा थी, उसे मर जाने तक को कह दिया उन्होंने. कैसे निकली यह बात उन की जबान से. खुद को धिक्कारते हुए बिस्तर से उतर कर विक्षिप्तों की तरह टहलने लगे थे मुंशीजी. बारबार एक ही यक्षप्रश्न, आखिर कैसे हुआ यह हादसा?

आत्मग्लानि की आग से पसीज उठा था उन का सर्वस्व. यह सोच कर अपने कमरे से निकल गए थे कि ज्योति बिटिया को सारा अंतर्द्वंद्व, सारी व्यथा सुना कर पश्चात्ताप कर लेंगे.

…इस बार मुंशीजी की व्यथा सुमित्रा नहीं सह सकी. लौट कर बिस्तर पर उन के लेटते ही धीरे से उन के सीने पर हाथ रखा था सुमित्रा ने. करवट बदल कर मुंशीजी ने भी देखा था सुमित्रा की बंद पलकों से सहानुभूति की बूंदें अब भी लुढ़क रही थीं.

आंख लगी ही थी कि अचानक चिहुंक कर जाग गई ज्योति.

बाबूजी का क्रोध एवं आवेश में फुंफकारता चेहरा अवचेतन से निकल कर बारबार उसे डरा रहा था. प्रतिध्वनित हो रही थी वही सारी दिल दरकाती बातें जो उस के अंतस में बहुत दूर जा कर धंस गई थीं. इस असह्य पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए ज्योति कईकई प्रयास कर चुकी थी, पर सब बेकार.

अचानक ही उस का चेहरा सख्त हो गया. आंखों में बेगानेपन का एक ऐसा मरुस्थल उतर आया था जहां मोहमाया, वेदनासंवेदना, मानअपमान के न तो झाड़झंखाड़ थे और न ही आंसूअवसाद का कोई अस्तित्व. एक निर्णय ने उस के भय के सारे अंतर्द्वंद्वों को धो डाला था और दरवाजे का सांकल खोल, अमावस की इस काली निशा में वह गुम हो गई थी.

वह अपने घर से जितनी दूर होती जा रही थी, बाबूजी का स्वर अनुगूंज अंतस में और अधिक शोर मचाने लगा था. वह जल्द से जल्द उस पुल पर पहुंच जाना चाहती थी जहां नदी का अथाह पानी उसे इन तमाम पीड़ाओं से मुक्ति दिला कर अपने आगोश में बहा ले जाता. दूर, बहुत दूर.

इस धुन में उस की चाल तेज, और तेज होती जा रही थी. बाहर में गूंजते बाबूजी के शब्द ‘मरती क्यों नहीं…नदी, तालाब में डूब क्यों नहीं जाती…बोझ है…अभिशाप है…’ और अंदर में जान दे देने की, खुद को मिटा देने की एक खीझभरी जिद.

अचानक ज्योति को लगा कि बाबूजी की आवाज के साथसाथ कहीं से कोई दूसरा स्वर भी घुलमिल कर आ रहा है. उस ने थोड़ा थम कर उस आवाज को गौर से सुननेसमझने की चेष्टा की थी. हां, कोई तो था जो दबे स्वर में उसे बारबार पुकार रहा था, ‘ज्योति…ज्योति…ज्योति…’

एक पल को ठिठक गई ज्योति. पलट कर उस ने चारों ओर देखा तो कोई नहीं था दूरदूर तक. तो फिर कौन है इस निर्जन वन में जो उसे आवाज दे रहा था.

‘‘आत्महत्या करने जा रही हो ज्योति,’’ करीब आता स्वर सुनाई दिया ज्योति को.

ज्योति ने खीज कर पूछा था, ‘‘देखो, तुम जो भी हो मेरे सामने आ कर बात करो. मुझे डराने की कोशिश मत करो. आखिर कौन हो तुम?’’ ज्योति ने अपना मन कड़ा किया था.

‘‘मौत के जिस रास्ते पर तुम जा रही हो उसी रास्ते में मैं तुम्हारे सामने हूं, ज्योति.’’

कानों पर तो यकीन हो रहा था, मगर कहीं आंखें तो धोखा नहीं दे रही हैं उसे. पलकों को कस कर भींचा और झपकाया था ज्योति ने. विस्फारित नेत्रों से इस अंधेरे की खाक छान रही थी वह. कुछ भी तो नहीं था आसपास.

‘‘सामने? खड़े हो तो दिखाई क्यों नहीं देते?’’

‘‘इसलिए कि तुम मुझे देखना नहीं चाहतीं. देखो, मैं ठीक तुम्हारे सामने आ कर खड़ा हो गया हूं देख रही हो मुझे?’’

‘‘नहीं…मगर तुम चाहते क्या हो, कौन हो तुम?’’ गहराते रहस्य ने ज्योति की व्यग्रता को और उत्प्रेरित किया था.

‘‘मुझे अनदेखा कर रही हो तुम. जरा दिल की गहराइयों में मन की आंखों से देखो, ज्योति…मैं जीवन हूं.’’

‘‘जीवन, कौन जीवन? मैं किसी जीवन को नहीं जानती…’’

‘‘तुम जैसी समझदार लड़की के मुंह से इस तरह की बातें अच्छी नहीं लगतीं. मुझे पहचानो. मैं जीवन हूं, तुम्हारा जीवन.’’

‘‘बकवास बंद करो और हट जाओ मेरे रास्ते से.’’

अदृश्य तत्त्व का स्वर फिर ज्योति के कानों से टकराया था, ‘‘ठीक है, तुम्हारे रास्ते से हट जाऊंगा, मगर मुझे बता दो कि क्या तुम सचमुच आत्महत्या करने जा रही हो या…’’

‘‘जी हां, मैं सच में आत्महत्या ही करने जा रही हूं. पुल से नदी में कूद कर जान दे दूंगी, और कुछ?’’

एक क्षण की खामोशी और फिर, ‘‘अरे हां, सुनो? ज्योति, जब तक तुम मर नहीं जातीं, तब तक क्या मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूं? इस बीच बातें करते हुए तुम्हारा यह अंतिम सफर भी अच्छे से कट जाएगा…तो चलूं तुम्हारे साथ?’’

‘‘तुम आओ या जाओ, मेरी बला से,’’ एकदम से भन्ना कर बोली ज्योति.

और एक झटके के साथ आगे बढ़ी तो अनजान रास्ता और उस पर से किसी अदृश्य रहस्य की उपस्थिति का आभास. इसी घबराहट में किसी कटे पेड़ के ठूंठ से जा टकराई और दर्द से बिलबिला उठी थी.

फिर वही आवाज, ‘‘चोट लग गई न. बिना सोचेसमझे तुम कितने दुर्गम रास्ते पर निकल पड़ी हो, ज्योति.’’

‘मर नहीं जाऊंगी इन छोटीमोटी ठोकरों से,’ क्रोध के मनोवेग से चीखती हुई बड़बड़ाने लगी थी, ‘…बहुत चोटें सही हैं मैं ने अपने कलेजे पर…मर तो नहीं गई मैं. हां, मरूंगी…आत्महत्या करूंगी. मुझे चोट लगे, तुम्हें इस से क्या मतलब?’

‘‘नहीं, कोई मतलब नहीं. मगर मैं नहीं चाहता कि मरने से पहले तुम्हारे शरीर पर कोई चोट लगे. क्योंकि तुम्हारी चोट से मैं भी आहत होता हूं. जानती हो ज्योति, आत्महत्या में ऐसा भी होता है कि कई बार आदमी मर नहीं पाता. टूटफूट कर एक लंगड़ेलूले, अपंगता की जिंदगी जीता है. तब वह दोबारा आत्महत्या का प्रयास भी नहीं करता. क्योंकि एक बार के प्रयास का कठोर एहसास जो उसे होता है.’’

खामोश रहना ही उचित समझा था उस ने. कदम और तेज हो गए थे उस के संकल्पित लक्ष्य की ओर. तभी जीवन ने फिर पूछा, ‘‘तुम आत्महत्या क्यों करना चाहती हो?’’

इस तरह चुप रह कर आखिर कब तक वह इस आफत को टालती. गरज उठी थी, ‘‘क्या बताऊं मैं, क्या दुखड़ा रोऊं मैं, तुम जैसे अनजान, अदृश्य, गैर के सामने? यह बताऊं कि एक गरीब मुनीम के घर हम 3 बेटियां अभिशाप हैं, एक बोझ हैं हम. सब से बड़ी बोझ मैं, ज्योति सहाय, एम.ए. फर्स्ट क्लास. फर्स्ट… मगर नौकरी के लिए मोहताज…’’

‘‘मगर बेरोजगारी की समस्या तो सिर्फ तुम्हारे अकेले की समस्या नहीं है. यह तो एक आम सामाजिक बीमारी है जिस से हर कोई जूझ रहा है.’’

‘‘हां, बेरोजगारी मेरे अकेले की समस्या नहीं. मगर मैं एक समस्या हूं, गरीब बाप के सर पर पड़ी एक बोझ, क्या तुम नहीं जानते कि समाज में मध्य वर्गीय लड़कियों के लिए कई वर्जनाएं हैं. बातबात में मातापिता की पगडि़यां उछलती हैं. हर वक्त खानदान की इज्जत और भविष्य के सामने बदनामी, लोकलज्जा, मुंह चिढ़ाता समाज नजर आता है और वैसे भी लोग एक मजबूर, जरूरतमंद, गरीब और जवान लड़की को सिर्फ देखते ही नहीं, बल्कि निर्वस्त्र कर के महसूस भी करते रहते हैं. लेकिन तुम हो कौन, जो परत दर परत मुझ से सब कुछ जान लेना चाहते हो?’’

‘‘मैं ने कहा न, मैं जीवन हूं, तुम्हारा जीवन. बिलकुल सत्य और संघर्षों से भरा हूं. कोई मुझे प्यार का गीत समझ कर गुनगुनाता है तो कोई पहेली, कोई जंग समझता है. मैं तो एक सच हूं, ज्योति, मगर इतना कमजोर कि स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता. मौत के कू्रर पंजे एक झटके में मुझे शरीर से अलग कर देते हैं. मेरी भौतिकता ही खत्म कर देते हैं. और जबजब अपने अस्तित्व पर मुझे खतरा महसूस होता है, लोगों के सामने आता हूं, बातें करता हूं, खुद को तसल्ली देता हूं. आज भी तो इसीलिए आया हूं तुम्हारे पास, मेरी रक्षा करोगी न.’’

विचारों की इस उमड़घुमड़ में ज्योति इतना गुम हो गई कि जंगल कब खत्म हो गया पता तक नहीं चला. सड़क पर और तेज कदमों से उस पुल की दिशा में बढ़ गई थी वह जो अब ज्यादा दूर नहीं था. अचानक एक झटका सा लगा ज्योति को कि इतनी देर से जीवन ने कुछ कहा नहीं, कहां गया वह? इतना चुप तो रहने वाला नहीं था वह. कहीं चला तो नहीं गया अचानक.

आगे पढ़ें- अचानक ठठा कर हंस पड़ी ज्योति. कुछ ऐसा कि…

जीवनज्योति- भाग 3: क्या हुआ था ज्योति के साथ

सुनसान रात में जिस भय की उपस्थिति से भी नहीं घबराई थी ज्योति, अचानक उस के न होने की कल्पना मात्र से कांप गई थी वह. एक हांक लगाई थी ज्योति ने, ‘‘ज…ज…जीवन?…मिस्टर जीवन, चले गए क्या?’’

‘‘गलत सोच रही हो, ज्योति. मैं तो तुम्हारा जीवन हूं और तुम्हारी खातिर मौत से भी लड़ने को तैयार हूं. अगर तुम मेरा साथ दो तो मैं तो तुम्हें तभी छोड़ं ूगा जब मुझे यह विश्वास हो जाएगा कि मौत की गोद में तुम गहरी नींद सो गई हो.’’

‘‘अच्छा, फिर तुम गायब कहां हो गए थे?’’

‘‘गायब तो नहीं, हां चुप जरूर हो गया था. क्यों मेरा चुप हो जाना तुम्हें अच्छा नहीं लगा?’’

अब क्या जवाब दे ज्योति इस प्रश्न का. एकदम से कोई बहाना नहीं सूझ रहा था उसे.

‘‘ऐ ज्योति, सच क्यों नहीं कहतीं कि तुम्हें मुझ से यानी अपने इस जीवन से पे्रम हो गया है.’’

अचानक ठठा कर हंस पड़ी ज्योति. कुछ ऐसा कि एक क्षण तक कुछ बोल नहीं पाई. किसी तरह खिलखिलाते हुए एकएक शब्द जोड़जोड़ कर बोल पड़ी वह, ‘‘तुम्हारा मतलब प्यार,’’ और इसी के साथ हंसती हुई वह दोहरी होती जा रही थी.

‘‘हंसो ज्योति, इतना हंसो कि अवसाद का अंधेरा छंट जाए, निराशा भरी इस निशा का अंत हो जाए. आशा की एक नई सुबह आए, उम्मीदों की किरणें फूटें, उमंग और उत्साह के पक्षी चहचहाने लगें.’’

हांफती हुई ज्योति ने स्वयं को कुछ नियंत्रित किया और आंखों की नमी को पोंछती हुई कह उठी थी, ‘‘पता नहीं मैं इतना क्यों हंसने लगी?’’

‘‘इसलिए कि तुम्हारा जीवन बहुत प्यारा है. वह तुम्हें हंसाना चाहता है. जिंदा देखना चाहता है क्योंकि जीवन ही हंसी है, खुशी है, आशा है, प्रेम है और मौत निराशा है, खामोशी है.’’

ज्योति ने गंभीरता ओढ़ ली थी. लेकिन जीवन गंभीर नहीं था. उस ने एक के बाद एक कई सवाल कर डाले.

‘‘अच्छा ज्योति, यह तो बता दो कि तुम ने अपने घर वालों के नाम कोई संदेश, कोई चिट्ठी छोड़ी है या नहीं? तुम्हारे इस तरह चले जाने से क्या बीतेगी तुम्हारे मांबाप पर, बहनें क्या सोचेंगी, इस बारे में भी तुम ने कुछ सोचा है? वह बेचारा मुनीम, क्या तुम्हारी मौत और समाज की उठती उंगलियों को एकसाथ झेल पाएगा?’’

सच के एकएक बड़े पत्थर बारबार जीवन व्यावहारिकता के उस तालाब में फेंक रहा था जिस की ऊपरी परत पर बर्फ का एक बड़ा आवरण पसर गया था. ऐसा भी नहीं था कि बर्फ के नीचे का पानी हिलोरे नहीं ले रहा था. क्षोभ की तरंगें उठ रही थीं ज्योति के अंतस में भी. पर सोच लिया था उस ने कि अब किसी बात की कोई सफाई नहीं देगी वह.

‘‘वाह, ज्योति वाह, जिंदगी भर तुम्हारी खुशी के लिए जीतेमरते तुम्हारे बाप ने अपने दिल का बोझ कम करने के लिए दो कड़वे बोल बोल दिए जो तुम्हें इतने चुभ गए कि अब आत्महत्या कर के यह जताना चाहती हो कि बेटी के बाप को हर वक्त पश्चात्ताप की आग में ही जलते रहना चाहिए. अरे, वह तो एडि़यां घिसघिस कर तुम तीनों बहनों की शादी करने और गृहस्थी बसा देने के बाद ही मरेगा मगर तुम अभी से ही उसे जीतेजी क्यों मारना चाहती हो?

‘‘सोच लो ज्योति, तुम्हारी मौत की खबर पा कर जमाने के ताने सुन कर तो तुम्हारे पिताजी किसी सेठ की ड्योढ़ी पर मुनीमगीरी के लायक भी नहीं रहेंगे. फिर क्या तुम्हारा बाप, मुंशी रामप्यारे सहाय, किसी मंदिर या रेलवे स्टेशन की सीढि़यों पर बैठ कर भीख मांगेगा? क्या तुम्हारी मां, सुमित्रा देवी इस बुढ़ापे में पेट के लिए घरघर जा कर झाड़ूबर्तन, चूल्हेचौके का काम करेंगी? नीतू और पिंकी अपनी तमन्नाओं का गला घोंट कर किसी नाचनेगाने वाली गली के कोठे की जीनत बनेंगी?’’

ऐसे सख्त पत्थरों की वार से दरक गया था ज्योति का मन. बर्फ का आवरण था, कोई लोहे की चादर नहीं. बिलबिला कर बाहर आ गया था भीतर का सारा गुबार, झल्ला कर चीख पड़ी थी ज्योति अपना फैसला सुनाते हुए, ‘‘तो जहन्नुम में जाएं? कोई जिए या मरे मुझे क्या? मैं सिर्फ इतना जानती हूं कि लड़की होना अभिशाप है और मैं अपनी जीवनलीला समाप्त कर खुद को इस अभिशाप से मुक्त करना चाहती हूं, सुन रहे हो तुम? मैं खुद को मार देना चाहती हूं.’’

और इसी झल्लाहट में पुल के आखिरी किनारे पर अपना कदम बढ़ा गई थी ज्योति.

जीवन भी चुप नहीं था. जताना चाहता था कि सचमुच जिंदगी की आखिरी सांस तक वह उस के साथ है. उस की आवाज अब भी गूंज रही थी, ‘‘ज्योति, जीवन एक जंग है. इस से भागने वाले कायर कहलाते हैं. जिन में विश्वास, उत्साह, साहस और लगन होती है वह मौत को धत्ता बता कर जीवन को गले लगाते हैं. निराशा को नहीं आशा को गले लगाते हैं. वैसे तुम आत्महत्या कर रही हो तो करो, मगर मुझे यकीन है कि अनिश्चितताओं और हताशा के अंधेरे में भी राह दिखाने के लिए एक ज्योति जरूर जगमगाती रहेगी. याद रखना इस रात की भी एक सुबह जरूर होगी, इस निशा का अंत होगा, ज्योति.’’

हर रात की सुबह होती है. उस रात की भी सुबह हुई और सूर्य भी कब सिर पर चढ़ आया. पता नहीं चला. मुंशीजी के घर में व्याप्त खामोशी को किसी ने झंझोड़ा था, सांकल पीटपीट कर खटखट खट्टाक…खट…

आंखों पर चश्मा चढ़ाते मुंशीजी ने थके कदमों से चल कर दरवाजा खोला था. पोस्टमैन लिफाफा थामे बड़बड़ाया, ‘‘रजिस्ट्री डाक है, लीजिए और यहां दस्तखत कर दीजिए.’’

लिफाफे में से कागज निकाल कर पढ़ते ही मुंशी रामप्यारे सहाय की आंखें आश्चर्य से फैलती चली गईं. सहसा विश्वास नहीं हो पा रहा था कि मुंशीजी को, उस आशय पर जो इस पत्र में लिखा था. झुरझुरी ले कर स्वयं को सामान्य किया तो आंखें बरस पड़ीं. रुंधे गले से भावातिरेक में उन्होंने पुकारा, ‘‘अजी सुनती हो, सुमित्रा… नीतू, पिंकी…जानता था मैं कि ज्योति एक न एक दिन जरूर कुछ न कुछ ऐसा करेगी. अरे, सुनती हो…सुमित्रा…’’

बाबूजी का इस तरह सुबहसुबह चिल्लाना सब को एक घबराहट दे गया था. बदहवासी के कुछ ऐसे ही आलम में सभी दौड़तेकूदते बाबूजी के पास आ गए थे. सुमित्रा, नीतू, पिंकी सब की आंखों में एक सवालिया निशान और मन में बेचैनी कि आखिर हुआ क्या?

बाबूजी, बच्चों की भांति बिलखते हुए बोले, ‘‘कितना गलत कहा था मैं ने सुमित्रा, काश, इतनी कड़वी बातें उसे कल न कहता तो इतनी आत्मग्लानि, इतना पछतावा तो मुझे न होता, ज्योति… ज्योति…कहां हो ज्योति?’’

‘‘जी, मैं यहां हूं, बाबूजी…’’ कमरे के अंदर, दरवाजे की ओट से लगी, ज्योति सामने आ कर खड़ी हो गई थी. बाबूजी के बचेखुचे शब्द ज्योति के करीब आते ही तरलता में परिवर्तित हो कर मुंह के अंदर ही उमड़ने लगे थे. क्या कहें, कैसे कहें, बाबूजी की इस भावविह्वलता को देख कर ज्योति की आंखें अपनेआप छलक आई थीं.

‘‘मैं ने सब सुन लिया है, बाबूजी. आप मन में ग्लानि क्यों लाते हैं. आप की जगह कोई भी होता तो वही कहता जो आप ने कहा था. दरअसल, गलती हमें समझने में हुई, बाबूजी.’’

खुशी से चहक उठे थे मुंशीजी, ‘‘अरे, गोली मार अलतीगलती को. सुमित्रा…3-3 बेटियों का बाप, यह मुनीम रामप्यारे सहाय ग्लानि क्यों करेगा? सीना ठोक कर चलेगा जमाने के सामने…सीना ठोक कर.’’

पत्र दिखाते हुए ज्योति के ठीक सामने तन कर खड़े हो गए थे बाबूजी, ‘‘ये देख, तेरा नियुक्तिपत्र. पढ़ न? पुलिस की सब से बड़ी आफीसर की नौकरी मिल गई है तुझे, ज्योति सहाय, आई.पी.एस. जयहिंद, मैडम.’’

जमीन पर पांव धमका कर एक जोरदार सैल्यूट दिया था मुंशीजी ने अपनी ज्योति बिटिया को.

पुलक उठी थी सुमित्रा, नीतू और पिंकी भी. सचमुच कंगले की ड्योढ़ी पर आसमान भी झुक गया था आज. और इस आसमान को झुका लाई थी एक बेटी, ज्योति.

कुछ खुशियां ऐसी भी होती हैं जिन्हें सब के साथ बांटा तो जा सकता है, मगर उन्हें महसूस करने, आत्मसात करने के लिए किसी एकांत की आवश्यकता होती है. एक ऐसा एकांत जहां आंखें मूंद कर गुजरे वक्त के एकएक क्षण का हिसाबकिताब तो होता ही है, आने वाले समय के गर्भ में छिपे कई पहलुओं को सजायासंवारा भी जाता है.

ज्योति भाग कर अपने कमरे में चली गई. कभी हंसतेहंसते रोई, तो कभी रोतेरोते हंसती रही. मनोभावों का प्रवाह कम हुआ तो वह आईने के पास आ खड़ी हुई जहां अब ज्योति नहीं, बल्कि आई.पी.एस. ज्योति सहाय का अक्स उभर आया था. भरेपूरे गोरे बदन पर कसी खाकी वरदी, कंधे पर चमचमाता अशोक स्तंभ, सिर पर आई.पी.एस. बैज लगा हैट, चौड़े लाल बेल्ट में लटका रिवाल्वर, लाल बूट और चेहरे पर शालीनता से भरा एक अद्वितीय रौब.

शायद इसी अक्स को देख कर किसी ने बहुत करीब आ कर कहा था उसे, ‘‘बधाई हो, ज्योति.’’

मनप्राण में रचबस गई इस आवाज को अंतस में महसूस किया था ज्योति ने. आंखें बंद कर के वह अपने मन के अंदर झांक आई थी. जहां सचमुच मुसकराता हुआ उस का प्यारा जीवन था और जहां जल रही थी एक जीवनज्योति.

आंगन का बिरवा- भाग 2: मीरा ने नेहा को क्या दी सलाह

समय जैसेतैसे कट रहा था. इधर, सौम्या कुछ अनमनी सी रहने लगी थी. पिता की दूरी उसे कुछ ज्यादा ही खल रही थी. हां, इस बीच इन के मित्र कभी अकेले, कभी परिवार सहित आ कर हालचाल पूछ लिया करते थे.

मेरी सहयोगी शिक्षिकाएं भी बहुधा आती रहतीं, विशेषकर इन के मित्र शलभजी और मेरी सखी मीरा. शलभ इन के परममित्रों में से थे. इन के विभाग में ही रीडर थे एवं अभी तक कुंआरे ही थे. बड़ा मिलनसार स्वभाव था और बड़ा ही आकर्षक व्यक्तित्व. आते तो घंटों बातें करते. सौम्या भी उन से काफी हिलमिल गई थी.

मीरा मेरी सहयोगी प्राध्यापिका और घनिष्ठ मित्र थी. हम दोनों के विचारों में अद्भुत साम्य अंतरंगता स्थापित करने में सहायक हुआ था. मन की बातें, उलझनें, दुखसुख आपस में बता कर हम हलकी हो लेती थीं. उस के पति डाक्टर थे तथा 2 बेटे थे अक्षय और अभय. अक्षय का इसी साल पीसीएस में चयन हुआ था.

सत्र की समाप्ति के बाद संदीप भी आ गया था. उस के आने से घर की रौनक जाग उठी थी. दोनों भाईबहन नितनए कार्यक्रम बनाते और मुझे भी उन का साथ देना ही पड़ता. दोनों के दोस्तों और सहेलियों से घर भर उठता. बच्चों के बीच में मैं भी हंसबोल लेती, पर मन का कोई कोना खालीखाली, उदास रहता. इन की यादों की कसक टीस देती रहती थी.

वैसे भी उम्र के इस तीसरे प्रहर में साथी की दूरी कुछ ज्यादा ही तकलीफदेह होती है. पतिपत्नी एकदूसरे की आदत में शामिल हो जाते हैं. इन के लंबेलंबे पत्र आते. वहां कैसे रहते हैं, क्या करते हैं, सारी बातें लिखी रहतीं. जिस दिन पत्र मिलता, मैं और सौम्या बारबार पढ़ते, कई दिन तक मन तरोताजा, खुश रहता. फिर दूसरे पत्र का इंतजार शुरू हो जाता.

एक दिन विद्यालय में कक्षा लेते समय एकाएक जोर का चक्कर आ जाने से मैं गिर पड़ी. छात्राओं तथा मेरे अन्य सहयोगियों ने मिल कर मुझे तुरंत अस्पताल पहुंचाया. डाक्टर ने उच्च रक्तचाप बतलाया और कम से कम 1 महीना आराम करने की सलाह दी.

इस बीच, सौम्या बिलकुल अकेली पड़ गई. घर, अपना विद्यालय और फिर मुझे तीनों को संभालना उस अकेली के लिए बड़ा मुश्किल हो रहा था. तब शलभजी और मीरा ने काफी सहारा दिया.

मेरी तो तबीयत खराब थी, इसलिए जो भी आता उस की सौम्या से ही बातें होतीं. हां, मीरा आती तो विद्यालय के समाचार मिलते रहते. शलभजी भी मुझ से हाल पूछ सौम्या से ही अधिकतर बातें करते रहते.

इधर, शलभजी और सौम्या में काफी पटने लगी. आश्चर्य तब होता जब मेरे सामने आते ही दोनों असहज होने लगते. बस, इसी बात ने मुझे चौकन्ना किया.

शलभजी और सौम्या? बापबेटी का सा अंतर, इन से बस 2-4 साल ही छोटे होंगे वे, कनपटियों पर से सफेद होते बाल, इकहरा शरीर, चुस्तदुरुस्त पोशाक और बातें करने का अपना एक विशिष्ट आकर्षक अंदाज, सब मिला कर मर्दाना खूबसूरती का प्रतीक.

मुझे आश्चर्य होता कि मेरा हाल पूछने आए शलभ, मेरा हाल पूछना भूल, खड़ेखड़े ही सौम्या को आवाज लगाते कि सौम्या, आओ, तुम्हें बाहर घुमा लाऊं, बोर हो रही होगी और सौम्या भी ‘अभी आई’ कह कर झट अपनी खूबसूरत पोशाक पहन, सैंडिल खटखटाती बाहर निकल जाती.

सौम्या तो खैर अभी कच्ची उम्र की नासमझ लड़की थी, पर इस परिपक्व प्रौढ़ की बेहयाई देख मैं दंग थी. सोचती, क्या दैहिक भूख इतनी प्रबल हो उठी है कि सारे समीकरण, सारी परिभाषाएं इस तृष्णा के बीच अपनी पहचान खो, बौनी हो जाती हैं, नैतिकता अतृप्ति की अंधी अंतहीन गलियों में कहीं गुम हो जाती है. शायद, हां. तभी तो जिस वर्जित फल का शलभ अपनी जवानी के दिनों में रसास्वादन न कर सके थे,

इस पकी उम्र में उस के लोभ से स्वयं को बचा पाना उन के लिए कठिन हो रहा था. वैसे भी बुढ़ापे में अगर मन विचलित हो जाए तो उस पर नियंत्रण करना कठिन ही होता है. तिस पर सुकोमल, कमनीय, सुंदर सौम्या. दिग्भ्रमित हो उठे थे शलभजी.

वे आए दिन उस के लिए उपहार लाने लगे थे. कभी सलवारकुरता, कभी स्कर्टब्लाउज तो कभी नाइटी. सौम्या भी उन्हें सहर्ष ग्रहण कर लेती. मैं ने 2-3 बार शलभजी से कहा, ‘भाईसाहब, आप इस की आदत खराब कर रहे हैं, कितनी सारी पोशाकें तो हैं इस के पास.’

‘क्यों, क्या मैं इस को कुछ नहीं दे सकता? इतना अधिकार भी नहीं है मुझे? बहुत स्नेह है मुझे इस से,’ कह कर वे प्यारभरी नजरों से सौम्या की तरफ देखते. उस दृष्टि में किसी बुजुर्ग का निश्छल स्नेह नहीं झलकता था, बल्कि वह किसी उच्छृंखल प्रेमी की वासनामय काकदृष्टि थी.

मुझे लगता कि कपटी पुरुष स्नेह का मुखौटा लगा, सौम्या की इस नादानी और भोलेपन का लाभ उठा, उस का जीवन बरबाद कर सकता है. मेरे सामने यह समस्या एक चुनौती के रूप में सामने खड़ी थी. इन के वापस आने में 7 महीने बाकी थे. संदीप का यह अंतिम वर्ष था. उस से कुछ कहना भी उचित नहीं था.

प्रश्नों और संदेहों के चक्रव्यूह में उलझी मैं इस समस्या के घेरे से निकलने के लिए बुरी तरह से हाथपैर मार रही थी. तभी निराशा के गहन अंधकार में दीपशिखा की ज्योति से चमके थे मीरा के ये शब्द, ‘नेहा, सौम्या को तू मुझे सौंप दे, अक्षय के लिए. तुझे लड़का ढूंढ़ना नहीं पड़ेगा और मुझे सुघड़ बहू.’

‘सोच ले, यह लड़की तेरी खटिया खड़ी कर देगी, फिर बाद में मत कहना कि मैं ने बताया नहीं था.’

‘वह तू मुझ पर छोड़ दे,’ और फिर हम दोनों खुल कर हंस पड़ीं.

मीरा के कहे इन शब्दों ने मुझे डूबते को तिनके का सहारा दिया. मैं ने तुरंत उसे फोन किया, ‘‘मीरा, आज तू सपरिवार मेरे घर खाने पर आ जा. अक्षय, अभय से मिले भी बहुत दिन हो गए. रात का खाना साथ ही खाएंगे.’’

‘‘क्यों, एकाएक तुझे ज्यादा शक्ति आ गई क्या? कहे तो 10-20 लोगों को और अपने साथ ले आऊं?’’ उस ने हंसते हुए कहा.

‘‘नहींनहीं, आज मन बहुत ऊब रहा है. सोचा, घर में थोड़ी रौनक हो जाए.’’

‘‘अच्छा जी, तो अब हम नौटंकी के कलाकार हो गए. ठीक है भई, आ जाएंगे सरकार का मनोरंजन करने.’’

मनमस्तिष्क पर छाया तनाव का कुहरा काफी हद तक छंट चुका था और मैं नए उत्साह से शाम की तैयारी में जुट गई. रमिया को निर्देश दे मैं ने कई चीजें बनवा ली थीं. सौम्या ने सारी तैयारियां देख कर कहा था, ‘‘मां, क्या बात है? आज आप बहुत मूड में हैं और यह इतना सारा खाना क्यों बन रहा है?’’

‘‘बस यों…अब तबीयत एकदम ठीक है और शाम को मीरा, अक्षय, अभय और डाक्टर साहब भी आ रहे हैं. खाना यहीं खाएंगे. अक्षय नौकरी मिलने के बाद से पहली बार घर आया है न, मैं ने सोचा एक बार तो खाने पर बुलाना ही चाहिए. हां, तू भी घर पर ही रहना,’’ मैं ने कहा.

‘‘पर मां, मेरा तो शलभजी के साथ फिल्म देखने का कार्यक्रम था?’’

‘‘देख बेटी, फिल्म तो कल भी देखी जा सकती है, आंटी सब के साथ आ रही हैं. मेरे सिवा एक तू ही तो है घर में. तू भी चली जाएगी तो कितना बुरा लगेगा उन्हें. ऐसा कर, तू शलभ अंकल को फोन कर के बता दे कि तू नहीं जा पाएगी,’’ मैं ने भीतर की चिढ़ को दबाते हुए प्यार से कहा.

‘‘ठीक है, मां,’’ सौम्या ने अनमने ढंगसे कहा. शाम को मीरा, डाक्टर साहब, अक्षय, अभय सभी आ गए. विनोदी स्वभाव के डाक्टर साहब ने आते ही कहा, ‘‘बीमारी से उठने के बाद तो आप और भी तरोताजा व खूबसूरत लग रही हैं, नेहाजी.’’

‘‘क्यों मेरी सहेली पर नीयत खराब करते हो इस बुढ़ापे में?’’ मीरा ने पति को टोका.

‘‘लो, सारी जवानी तो तुम ने दाएंबाएं देखने नहीं दिया, अब इस बुढ़ापे में तो बख्श दो.’’

उन की इस बात पर जोर का ठहाका लगा.

सौम्या ने भी बड़ी तत्परता और उत्साह से उन सब का स्वागत किया. कौफी, नाश्ता के बाद वह अक्षय और अभय से बातें करने लगी.

मैं ने अक्षय की ओर दृष्टि घुमाई, ‘ऊंचा, लंबा अक्षय, चेहरे पर शालीन मुसकराहट, दंभ का नामोनिशान नहीं, हंसमुख, मिलनसार स्वभाव. सच, सौम्या के साथ कितनी सटीक जोड़ी रहेगी,’ मैं सोचने लगी. डाक्टर साहब और मीरा के साथ बातें करते हुए भी मेरे मन का चोर अक्षय और सौम्या की गतिविधियों पर दृष्टि जमाए बैठा रहा. मैं ने अक्षय की आंखों में सौम्या के लिए प्रशंसा के भाव तैरते देख लिए. मन थोड़ा आश्वस्त तो हुआ, परंतु अभी सौम्या की प्रतिक्रिया देखनी बाकी थी.

बातों के बीच ही सौम्या ने कुशलता से खाना मेज पर लगा दिया. डाक्टर साहब और मीरा तो सौम्या के सलीके से परिचित थे ही, सौम्या के मोहक रूप और दक्षता ने अक्षय पर भी काफी प्रभाव डाला. खुशगवार माहौल में खाना खत्म हुआ तो अक्षय ने कहा, ‘‘आंटी, आप से मिले और आप के हाथ का स्वादिष्ठ खाना खाए बहुत दिन हो गए थे, आज की यह शाम बहुत दिनों तक याद रहेगी.’’

विदा होने तक अक्षय की मुग्ध दृष्टि सौम्या पर टिकी रही. और सौम्या हंसतीबोलती भी बीचबीच में कुछ सोचने सी लगी, मानो बड़ी असमंजस में हो.

चलतेचलते डाक्टर साहब ने मीरा को छेड़ा, ‘‘मैडम, आप सिर्फ खाना ही जानती हैं या खिलाना भी?’’

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शशि श्रीवास्तव

आंगन का बिरवा- भाग 3: मीरा ने नेहा को क्या दी सलाह

मीरा ने उन्हें प्यारभरी आंखों से घूरा और झट से मुझे और सौम्या को दूसरे दिन रात के खाने का न्योता दे डाला.

मेरे लिए तो यह मुंहमांगी मुराद थी, अक्षय और सौम्या को समीप करने के लिए. दूसरे दिन जब शलभजी आए तो सौम्या ने कुछ ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया. फिल्म के लिए जब उन्होंने पूछा तो उस ने कहा, ‘‘आज मीरा आंटी के यहां जाना है, मां के साथ…इसलिए…’’ उस ने बात अधूरी छोड़ दी.

वे थोड़ी देर बैठने के बाद चले गए. मैं भीतर ही भीतर पुलकित हो उठी. मुझे लगा कि प्रकृति शायद स्वयं सौम्या को समझा रही है और यही मैं चाहती भी थी.

दूसरे दिन शाम को मीरा के यहां जाने के लिए तैयार होने से पहले मैं ने सौम्या से कहा, ‘‘सौम्या, आज तू गुलाबी साड़ी पहन ले.’’

‘‘कौन सी? वह जार्जेट की जरीकिनारे वाली?’’

‘‘हांहां, वही.’’

इस साड़ी के लिए हमेशा ‘नानुकुर’ करने वाली सौम्या ने आज चुपचाप वही साड़ी पहन ली. यह मेरे लिए बहुत आश्चर्य की बात थी. गुलाबी साड़ी में खूबसूरत सौम्या का रूप और भी निखर आया.

न चाहते हुए भी एक बार फिर मेरी दृष्टि उस के ऊपर चली गई. अपलक, ठगी सी कुछ क्षण तक मैं अपनी मोहक, सलोनी बेटी का अप्रतिम, अनुपम, निर्दोष सौंदर्य देखती रह गई.

‘‘चलिए न मां, क्या सोचने लगीं?’’

सौम्या ने ही उबारा था इस स्थिति से मुझे.

मीरा के घर पहुंचतेपहुंचते हलकी सांझ घिर आई थी. डाक्टर साहब, मीरा, अक्षय सभी लौन में ही बैठे थे. अभय शायद अपने किसी दोस्त से मिलने गया था. हम दोनों जब उन के समीप पहुंचे तो सभी की दृष्टि कुछ पल को सौम्या पर स्थिर हो गई.

मैं ने अक्षय की ओर देखा तो पाया कि यंत्रविद्ध सी सम्मोहित उस की आंखें पलक झपकना भूल सौम्या को एकटक निहारे जा रही थीं.

‘‘अरे भई, इन्हें बिठाओगे भी तुम लोग कि खड़ेखड़े ही विदा कर देने का इरादा है?’’ डाक्टर साहब ने सम्मोहन भंग किया.

‘‘अरे हांहां, बैठो नेहा,’’ मीरा ने कहा और फिर हाथ पकड़ अपने पास ही सौम्या को बिठाते हुए मुझ से बोली, ‘‘नेहा, आज मेरी नजर सौम्या को जरूर लगेगी, बहुत ही प्यारी लग रही है.’’

‘‘मेरी भी,’’ डाक्टर साहब ने जोड़ा.

सौम्या शरमा उठी, ‘‘अंकल, क्यों मेरी खिंचाई कर रहे हैं?’’

‘‘इसलिए कि तू और लंबी हो जाए,’’ उन्होंने पट से कहा और जोर से हंस पड़े.

कुछ देर इधरउधर की बातों के बाद मीरा कौफी बनाने उठी थी, पर सौम्या ने तुरंत उन्हें बिठा दिया, ‘‘कौफी मैं बनाती हूं आंटी, आप लोग बातें कीजिए.’’

‘‘हांहां, मैं भी यही चाह रहा था बेटी. इन के हाथ का काढ़ा पीने से बेहतर है, ठंडा पानी पी कर संतोष कर लिया जाए,’’ डाक्टर साहब ने मीरा को तिरछी दृष्टि से देख कर कहा तो हम सभी हंस पड़े. सौम्या उठी तो अक्षय ने तुरंत कहा, ‘‘चलिए, मैं आप की मदद करता हूं.’’

दोनों को साथसाथ जाते देख डाक्टर साहब बोले, ‘‘वाह, कितनी सुंदर जोड़ी है.’’

‘‘सच,’’ मीरा ने समर्थन किया. फिर मुझ से बोली, ‘‘नेहा, सौम्या मुझे और इन्हें बेहद पसंद है और मुझे ऐसा लग रहा है कि अक्षय भी उस से प्रभावित है क्योंकि अभी तक तो शादी के नाम पर छत्तीस बहाने करता था, परंतु कल जब मैं ने सौम्या के लिए पूछा तो मुसकरा कर रह गया. अब अच्छी नौकरी में भी तो आ गया है…मुझे उस की शादी करनी ही है. नेहा, अगर कहे तो अभी मंगनी कर देते हैं. शादी भाईसाहब के आने पर कर देंगे. वैसे तू सौम्या से पूछ ले.’’

हर्ष के अतिरेक से मेरी आंखें भर आईं. मीरा ने मुझे किस मनोस्थिति से उबारा था, इस का रंचमात्र भी आभास नहीं था. भरे गले से मैं उस से बोली, ‘‘मेरी बेटी को इतना अच्छा लड़का मिलेगा मीरा, मैं नहीं जानती थी. उस से क्या पूछूं. अक्षय जैसा लड़का, ऐसे सासससुर और इतना अच्छा परिवार, सच, मुझे तो घरबैठे हीरा मिल गया.’’

‘‘मैं ने भी नहीं सोचा था कि इस बुद्धू अक्षय के हिस्से में ऐसा चांद का टुकड़ा आएगा,’’ मीरा बोली थी.

‘‘और मैं ने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि मुझे इतनी हसीन समधिन मिलेगी,’’ डाक्टर साहब ने हंसते हुए कहा तो हम सब एक बार फिर से हंस पड़े.

तभी एकाएक चौंक पड़े थे डाक्टर साहब, ‘‘अरे भई, यह कबूतरों की जोड़ी कौफी उगा रही है

क्या अंदर?’’

तब मैं और मीरा रसोई की तरफ चलीं पर द्वार पर ही ठिठक कर रुक जाना पड़ा. मीरा ने मेरा हाथ धीरे से दबा कर अंदर की ओर इशारा किया तो मैं ने देखा, अंदर गैस पर रखी हुई कौफी उबलउबल कर गिर रही है और सामने अक्षय सौम्या का हाथ थामे हुए धीमे स्वर में कुछ कह रहा है.

सौम्या की बड़ीबड़ी हिरनी की सी आंखें शर्म से झुकी हुई थीं और उस के पतले गुलाबी होंठों पर मीठी प्यारी सी मुसकान थी.

मैं और मीरा धीमे कदमों से बाहर चली आईं. उफनती नदी का चंचल बहाव प्रकृति ने सही दिशा की ओर मोड़ दिया था.

शशि श्रीवास्तव

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