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Hindi Story : आओ बीमारी कैश करें- मेरी अनूठी कहानी

Hindi Story. इधर घर का बोझ ढोतेढोते जब से मेरा हीमोग्लोबिन कम और ब्लडप्रैशर हाई हुआ, तो घर में कुहराम मच गया. घर में सभी लोग मुझे एक से बढ़ कर एक कभी न सुने सुझाव देने लगे. मैं ने पहली बार ऐसा महसूस किया कि घर के लोग मेरे लिए भी परेशान होते हैं. घर वालों का अपने प्रति इतना लगाव देखा, तो मेरी आंखोें में पानी न होने के बाद भी आंसू छलक पड़े.

कोई कहता कि तुम मीठा कम खाओ, तो कोई कहता कि हंसना बंद कर दो. कोई आ कर मुझे नमक न खाने की सलाह दे जाता, तो कोई रिश्वत न खाने की.

दरअसल, हाई ब्लडप्रैशर उन लोगों के पास ज्यादा रहता है, जो हरदम हंसते रहते हैं. मुरदा चेहरों से उसे भी नफरत है. मेरे एक रसिया दोस्त को जब पता चला कि मैं हाई ब्लडप्रैशर का शिकार हो गया हूं, तो वह आते ही मेरे कान में फुसफुसाते हुए बोला, ‘‘मेरे दोस्त, अब वक्त आ गया है कि इधरउधर ताकझांक बंद कर दो. इस उम्र में हाई ब्लडप्रैशर होने की असली वजह बस एक यही होती है.’’

ऐसी सलाह पर मुझे उस दोस्त पर इतना गुस्सा आया कि…

पत्नी ने मेरी हालत देख कर मुझे कई बार अस्पताल जाने को कहा, पर मैं हर बार टाल गया.

मैं यह बात अच्छी तरह जानता हूं कि एक बार जो डाक्टर के चुंगल में फंस गया तो समझो कि मारने के बाद भी जो डाक्टर मरीज को छोड़ दे, वह डाक्टर ही किस बात का. आखिरकार पाउडरशाउडर से प्यार करने वाली मेरी पत्नी उस दिन मुझे जबरदस्ती अस्पताल ले ही गई.

अस्पताल जाते ही मैं ने देखा कि डाक्टर साहब मरीजों का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. मुझे अपने सामने पा कर वे मुझ पर ऐसे झपटे, जैसे चील अपने शिकार पर झपटती है.

मुझ से ज्यादा परेशान होते डाक्टर साहब ऐसे बोले, जैसे ब्लडप्रैशर मेरा नहीं, बल्कि उन का बढ़ा हो.

सच्चे डाक्टर की आज की तारीख में यही पहचान है कि वह मरीज को देख कर मरीज से ज्यादा परेशान हो जाता है. होना भी चाहिए. एक सच्चा पंडित और एक सच्चा डाक्टर अगर अपने यजमान और मरीज को डराएगा नहीं, तो खाएगा क्या?

उन की अपने धंधे के प्रति ऐसी लगन देख कर मैं खुश हो गया. मेरी बीमारी की परेशानी को डाक्टर साहब अपने चेहरे पर लाते हुए बड़ी मायूसी से  बोले, ‘‘ओ मेरे धंधे के बकरे, तुम्हें आखिर हुआ क्या है? अब तुम सही जगह पहुंच गए हो. अब अगर तुम चाहो, तब भी हम तुम्हें चैन से मरने नहीं देंगे.’’

‘‘पता नहीं सर. यह मेरी घरवाली है कि मुझे आप के पास जबरदस्ती ले आई है. यह कहकह कर मेरा ब्लडप्रैशर हाई कर दिया है कि आजकल मेरा ब्लडप्रैशर बढ़ गया है.

‘‘अब आप ही बताइए कि इस उम्र में ब्लडप्रैशर नहीं बढ़ेगा तो और क्या बढ़ेगा? घर में जब शादी करने लायक जवान बेटी हो, तो किस समझदार बाप का ब्लडप्रैशर नहीं बढ़ेगा?

‘‘घर में पढ़ालिखा जवान बेटा बाप की जेब से बीडि़यां तक चुराचुरा कर पीने को मजबूर हो, तो भला किस बाप का ब्लडप्रैशर ठीक रहेगा?

‘‘बाजार जाने के लिए मैं झोला उठाता हूं कि चक्कर आने लगता है. दूध वाले का हर महीने पहली तारीख को बिल देखता हूं, तो दूध पीने से जो थोड़ाबहुत अपने को फिट महसूस करने की कोशिश करता हूं, फिर अपने को वहीं पाता हूं.

‘‘अब आप ही बताइए कि ऐसे में ब्लडप्रैशर हाई नहीं होगा, तो और क्या होगा?’’

मैं ने डाक्टर से कुछ न छिपाते हुए सब साफसाफ कहा, तो पत्नी को गुस्सा आ गया, पर मैं ने उस के गुस्से की कोई परवाह नहीं की.

‘‘कोई बात नहीं. अगर देश में लोग बीमार नहीं होंगे, तो भाई साहब हम डाक्टर लोग कहां जाएंगे? इसलिए हमारे सेहतमंद रहने के लिए देश की जनता

का बीमार होना बेहद जरूरी है,’’ यह कह कर वे मेरी बाजू में ब्लडप्रैशर चैक करने की पट्टी सी बांध कर उस में हवा भरने लगे.

मेरी पत्नी की नजर डाक्टर से ज्यादा ब्लडप्रैशर चैक करने वाली मशीन पर इस तरह जमी थी, जैसे पिछले जन्म में वही डाक्टर रही हो और इस जन्म में अपने पिछले कर्मों का फल भोगने के लिए मुझ चपरासी की घरवाली जा बनी हो.

‘‘कितना ब्लडप्रैशर है इन का?’’ मेरी पत्नी ने सांसें रोक कर डाक्टर से पूछा, तो वे बड़ी लंबी सांस लेते हुए ऐसे बोले, मानो फेफड़ों को सेहतमंद रखने की कसरत कर रहे हों, ‘‘खतरे के निशान से 4 गुना ज्यादा…’’

इतना कहते हुए वे मेरे चेहरे की ओर मायूस हो कर देखने लगे, जैसे किसी मनहूस का चेहरा देख लिया हो. वे बड़ी देर तक मुझे घूरते रहे, तो मुझे उन के सामने अपने को बीमार की तरह पेश करना ही पड़ा.

‘‘ऊपर का लैवल कितना है?’’

‘‘210…’’ कह कर डाक्टर मेरा चेहरा फिर देखने लगे, मानो जैसे वे जानना चाह रहे हों कि मैं डरा या नहीं.

‘‘और नीचे का?’’

‘‘120… पर भाई साहब, आप को डरने की कोई बात नहीं. हम डाक्टर हैं किस खेत की मूली?

‘‘अब आप सही जगह पर अपने पति को ले आई हैं मैडम? हम तो वे डाक्टर हैं, जो अपने मरीज की दवाओं से मिल रहे कमीशन के लिए यमराज तक से भिड़ जाते हैं.

‘‘हमारा बस चले तो हम मुरदे तक को भी दवाएं खिलाते रहें और कंपनियों से अपना कमीशन पाते रहें.

‘‘पर आप चिंता न कीजिए. हर महीने दवाएं लेते रहिए और मजे से जीते रहिए. पर आप करते क्या हैं? सरकारी मुलाजिम हैं या…’’

‘‘साहब, मैं माल महकमे में अदना सा चपरासी हूं…’’ मैं ने पहली बार सच कहा, तो डाक्टर साहब हंसते हुए बोले, ‘‘कोई बात नहीं. माल महकमे का तो चपरासी भी राजा भोज से कम नहीं होता. हम तुम्हारा ऐसा इलाज करेंगे कि…रीइंबर्समैंट तो लेते ही हो न?’’

‘‘हां साहब, वह तो बीमार न होने पर भी पत्नी की बीमारी के झूठे बिल बनवा कर उस के शैंपूपाउडर के लिए ले ही लेता हूं. अपना क्या… पत्नी जवान रहे बस. मर्द तो अपनी पत्नी को देख कर जवान बना ही रहता है.’’

‘‘तो ऐसा करते हैं कि…’’ डाक्टर साहब जरा रुके और उन्होंने दरवाजे की ओर देखा. जब दरवाजे के बाहर उन्हें किसी के न होने का एहसास हो गया, तो वे मेरे कान में फुसफुसाते हुए बोले, ‘‘कुछ प्रोडक्ट आजकल पूरे देश में धूम मचा रहे हैं. उन को लेने वाला 60 में भी 20 का ही लगता है. तुम चाहो तो… बीमारी को कैश कर सकते हो.

‘‘डरो मत. आजकल हर ईमानदार मुलाजिम ऐसा ही कर रहा है, इसलिए आज बीमारी से घबराते नहीं, बल्कि उसे लगने पर जश्न मनाते हैं.’’

‘‘पर डाक्टर साहब, किट है कितने की?’’

मैं डरा. अगर माना तो कुछ दवा न ही दे मारे. अभी ब्लडप्रैशर ही बढ़ा है, कल को दवा खा कर कुछ और ही न बढ़ जाए.

‘‘अच्छा, तो मैं ऐसा करता हूं कि तुम्हें 5 हजार की दवा लिख देता हूं. रीइंबर्स तो हो ही जाएगा न सारा पैसा?’’

‘‘मुझे अपने नीचे एक मैंबर मिल गया और तुम्हें हमेशा के लिए एक जवान पत्नी और कमाई का एक और जरीया,’’ डाक्टर ने मुसकराते हुए कहा, तो पत्नी के चेहरे पर आती रौनक देखने लायक थी. सच कहूं, उस वक्त जो कोई फिल्म का डायरैक्टर उसे देख ले, तो अपनी फिल्म के लिए साइन कर बैठता.

खैर, ब्लडप्रैशर की बात किनारे हो गई और उन प्रोडक्टों को ले कर हम दोनों के बीच एक समझौता हुआ और मैं 5 हजार रुपए की ब्लडप्रैशर की दवा लिखवा कर शान से घर आ गया.

पत्नी उन प्रोडक्टों को देखने और इस्तेमाल करने को इतनी बेचैन कि…उन प्रोडक्टों के प्रति उस की इतनी उत्सकुता देखी, तो आखिर मैं ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘हे मेरी सूरजमुखी, लगता है कि अब तुम मेरा नहीं, बल्कि इन प्रोडक्टों का पलकें बिछाए इंतजार करती रहती हो…’’ वह तुनकते हुए बोली, ‘‘अब तुम में इस्तेमाल करने को बचा ही क्या है?’’

पर मैं इसलिए चुप हूं कि घर में अगर पत्नी खुशी रहे, तो घर वाले का आधा ब्लडप्रैशर तो अपनेआप ही ठीक हो जाता है. Hindi Story

Hindi Funny Story : आइए, आप का चालान काटते हैं

Hindi Funny Story. आ इए, आप का चालान काटते हैं. आप का चालान कभी भी और कहीं भी कट सकता है. इस के लिए आप हमेशा ही तैयार रहिए.

आप अपनी जेब को हलका करने के लिए हमेशा आप तैयार रहिए. आजकल सीसीटीवी कैमरों से आप की निगरानी की जा रही है. आप बिना हैलमैट, बिना लाइसैंस के गाड़ी चला रहे हैं. कोई बात नहीं. पहले ट्रैफिक हवलदार डंडा ले कर या चला कर आप को रोकता था, अब मुसकरा कर काम चलाता है. बंदा जाएगा कहां. मुल्ले की दौड़ मसजिद तक. आना और जाना आप को इसी सड़क से है. जाइएगा कहां.

आप का लाइसैंस फेल है. आप का गाड़ी नंबर डाला और आप की कुंडली निकल कर बाहर आ गई. आप का क्याक्या फेल है. सब जानकारी हाजिर. आप के लिए बड़ेबड़े गड्ढे खोदे गए हैं. कहीं न कहीं आप को फंसना ही है. आप ट्रैफिक पुलिस के चक्कर में पड़े नहीं कि आप को छठी का दूध याद आ जाता है.

आप का लाइसैंस फेल है. नहीं फेल है. अच्छा, कोई बात नहीं. आप का प्रदूषण तो फेल होगा ही. प्रदूषण ठीक है, तो गाड़ी के पेपर दिखाइए. अच्छा, गाड़ी के पेपर भी ठीक हैं. तब आगे बढि़ए. आप का स्वागत टोल प्लाजा पर हो रहा है. वहां टोल तो देना ही है.

हमारे शहर में एक दिन ट्रैफिक पुलिस कुछ ज्यादा सक्रिय हो गई और तितरबितर और इधरउधर खड़ी गाडि़यों का चालान कटना शुरू किया. लोगों में चर्चा होने लगी. चालान कटना या कोई अच्छीबुरी घटना हम भारतीयों के लिए एक उत्सव की तरह होता है.

सब के चेहरे चकल्लस हो रहे थे. बहुत तरह के चर्चे होने लगे. चालान किस का किस का कटा है. कुछ ने कहा. चारपहिए और निजी वाहनों का. एक सज्जन बिदक कर बोले. अच्छा, टैंपो वालों को छोड़ दिया. यह तो बहुत बुरा हुआ. चालान निजी और सार्वजनिक वाहनों दोनों का कटना चाहिए था.

हालात ये हैं कि लोग चालान कटने से पहले ही परेशान हैं. उलटा किसी को यह दुख सता रहा है कि चालान सिर्फ और सिर्फ निजी वाहनों का क्यों

काटा गया. यह तो बहुत नाइंसाफी है. क्या मोटरसाइकिल वालों का नहीं काटा? ऐसा भी कहीं होता है भला कि चारपहिया निजी वाहनों का चालान काटा और दुपहिया वाहनों का नहीं काटा. यह तो बहुत बुरा हुआ.

तभी एक तीसरे सज्जन पहुंच गए. चौथे सज्जन से बोले यार, श्यामलाल का चालान आज कट गया. गनीमत है मैं ने आज कार निकाली ही नहीं, नहीं तो बेकार में 2,000 का फटका लगता. तीसरे सज्जन अपनी होशियारी दिखा कर शेखी बघार रहे थे.

5वें सज्जन बोले. यह यहां की टीम नहीं थी. बाहर की टीम थी. हां, ठीक बोल रहे हैं. बाहर से आई थी. उन की बातों से लग रहा था कि जैसे उन के चचा सीबीआई में थे.

हमारे यहां गुटखा बैन है. एक बार एक मैजिस्ट्रेट हमारे यहां गुटखा की छापेमारी करने के लिए आए. गुटखा की छापेमारी वे क्या करते, वे पीछे चल रही भीड़ से परेशान थे. सब दुकानदार हुजूम बना कर मैजिस्ट्रेट के पीछेपीछे चल रहे थे. सब को उत्सुकता थी कि किस के यहां रेड में कितना पैकेट गुटखा मिला है.

ऐसे लोग चलतेफिरते दूरबीन की तरह होते हैं, जो जान लेते हैं कि किस के पेट में कितना पानी है.

एक सज्जन बोले. जानते हैं, चुन्नूजी का चालान आज सुबहसुबह कट गया. 25,000 फाइन लगा है. सुबहसुबह 2 बोरा गुटखा ले कर पुलिस गई है उन के यहां से.

दूसरे सज्जन बोले. अरे, मुझे  तो कल रात ही पता चल गया था कि अगले दिन गुटखा बेचने वालों के यहां रेड पड़ने वाली है. सारा माल दुकान से उठा कर घर ले कर चला गया था.

मेरे यहां भी मैजिस्ट्रेट आया था. दुकान में कुछ नहीं मिला. मैं ने इतनी होशियारी जरूर दिखाई. ऐसा लगता था मानो वे सज्जन अंतर्यामी हों.

ऐसे बहुत से लोग हैं जो होशियार होते हैं और मौका देखदेख कर इन की होशियारी ऐसेवैसे मौकों पर कूदकूद कर बाहर निकल आती है. ऐसे होशियारचंद लोगों की वजह से ही ‘होशियारी’ शब्द जिंदा है. ऐसे लोगों को दूसरों की बदहाली और बरबादी देखने में बड़ा मजा आता है. उस पर रस लेले कर वे घंटों चर्चा करते हैं. उस के स्वाद में जो मजा है, उस के क्या कहने.

एक समय की बात है. उन दिनों  कोरोना बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ था. ये उन दिनों राज्य में गुटखे की बिक्री बंद थी. जुगाड़ से गुटखा बिक रहा था.

एक दिन थाने के एक वजनदार थानेदार ने दुकानदार से 4 पुडि़या गुटखा फ्री में मांग लिया. दुकानदार ने देने से मना कर दिया. थानेदारजी ने जहमत उठाई. उन को हर चीज फ्री में खाने की आदत थी, लिहाजा थाने के सज्जनजी बिलबिलाए और राज्य सरकार को पत्र लिख दिया. यह सूचित करने की जहमत उठाई कि हमारे राज्य में गुटखा पहले से ही प्रतिबंधित है और अमुक दुकानदार गुटखे को फलां जगह धुआंधार तरीके से बेच रहा है.

खैर, पुलिस आई और सारा गुटखा जब्त कर के ले गई. दुकानदार पर केस हो गया. अदालत से बेल करवानी पड़ी. दुकानदार पहले से ही खीजा हुआ था. बोला कि हम को पकड़ने से कुछ नहीं होगा. रिटेलर को मत पकडि़ए. जो होलसेल कर रहा है उस को पकडि़ए. इस तरह दुकानदार की उदारता के कारण बड़ी मछली भी पकड़ में आ गई.

Humor : मिस सेजल का स्वयंवर

Humor. मिस सेजल की उम्र 30 पार हो चुकी थी, लेकिन उन की शादी नहीं हुई थी. जब वे 17-18 साल की थीं, तब महल्ले के तकरीबन सारे लड़के उन के ऊपर फिदा थे. आतेजाते मुसकराते और उन को लव लैटर देते थे. उन को देख कर आहें भरते थे, लेकिन मिस सेजल किसी को भाव नहीं देती थीं.

मिस सेजल जब कालेज जाती थीं, तो कितने ही आवारा और मजनू किस्म के लड़के उन को देख कर मुस्कुरा कर मरमर जाते थे, लेकिन वे पलट कर देखती तक नहीं थीं.

इस वजह से मिस सेजल के बारे में धीरेधीरे महल्ले के लड़कों में यह बात फैल गई कि वे बहुत हद तक नकचढ़ी हैं और आसानी से किसी के हाथ नहीं आने वाली हैं.

जब मिस सेजल 24-25 साल की हुईं, तो उन के मांबाप को उन की शादी की चिंता हुई. मिस सेजल के पिताजी पड़ोसियोंरिश्तेदारों वगैरह के कहने पर इधरऊधर लड़का देखने जाते थे, लेकिन मिस सेजल को तो अपने सपनों का राजकुमार चाहिए था, जो लाखोंकरोड़ों में एक हो.

मिस सेजल अपने मांबाप की एकलौती औलाद थीं. मांबाप ने उन को बड़े नाजों से पाला था. उन की हर बात मांबाप मानते थे.

मिस सेजल के लिए जब लड़का देखने की शुरुआत हुई, तो लड़के वालों के लिए उन की बहुत सी शर्तें थीं. यह इतिहास में शायद पहली बार हो रहा था कि एक लड़की की शर्तों पर शादी होनी थी. और जो इन शर्तों को पूरा करता, वही मिस सेजल का पति बनता.

मिस सेजल ने शादी को कभी गंभीरता से नहीं लिया. आसपड़ोस, नातेरिश्तेदार सब लोग 30 की उम्र होने के बाद जोर देने लगे, लेकिन मिस सेजल के कान पर जूं नहीं रेंग रही थी. वे पहले कैरियर बनाना चाह रही थीं. इसी खब्त में उन के शादी के दिन निकलने लगे.

मिस सेजल को लगता था कि शादी ही तो है, कोई बहुत बड़ी चीज तो है नहीं. ताजमहल नहीं है, जिस को बनवाने में 20 साल लगे थे. पलक झपकते ही हो जाएगी. कामयाब होने के बाद तो लोग उन के आगेपीछे शादी करने के लिए घूमेंगे.

खैर, इसी उधेड़बुन में समय निकलता रहा. मिस सेजल का न तो कैरियर बन सका, न ही शादी ही हो सकी. लिहाजा, उन को भी लगा कि चलो कैरियर तो न बना सकी, अब शादी कर ही लेनी चाहिए.

लेकिन मिस सेजल ऐसीवैसी लड़की नहीं थीं. वे व्यवस्था से टकराने वाली और कुछकुछ क्रांतिकारी थीं. उन्होंने कानून की पढ़ाई की थी. लिहाजा, उन के खून में हमेशा गरमी रहती थी.

मिस सेजल की शादी के लिए बहुत सी शर्तें थीं, जैसे लड़का पानबीड़ी, सिगरेट, तंबाकू जैसी किसी नशीली चीज का सेवन न करता हो. शराबियों से तो मिस सेजल को सख्त नफरत थी.

इतना ही नहीं, लड़का अकेला होना चाहिए यानी उस के कोई भाईबहन नहीं होने चाहिए. लड़का गांव में नहीं रहता हो, बल्कि शहर में रहता हो. घर अच्छा होना चाहिए, फिल्मी दुनिया में लगाए गए सैटों की तरह. घर अच्छी जगह पर होना चाहिए. लड़का गोराचिट्टा होना चाहिए. लड़के की कमाई 20-25 लाख रुपए सालाना होनी चाहिए. मतलब, लड़का लाखों में एक नहीं, बल्कि करोड़ों में एक हो.

मिस सेजल की और भी कई छोटीबड़ी शर्तें थीं, जैसे शादी के बाद मिस सेजल को खाना बनाना, कपड़े धोना, बरतन मांजना, घर की साफसफाई करना न पड़े. उन को तो  कदमकदम पर नौकरचाकर दिखने वाला घर चाहिए था.

इस के अलावा शादी के तुरंत बाद मिस सेजल को मां नहीं बनना था. 5-7 साल के बाद ही वे मां बनना चाहेंगी. वे बच्चे को अपना दूध पिलाना पसंद नहीं करेंगी, बल्कि डब्बे का दूध पिलाएंगी… और भी बहुतकुछ.

जब अब मिस सेजल 35 की नहीं, बल्कि 40 साल की हो गई हैं और उन की डिमांड के मुताबिक लड़का नहीं मिल रहा है, तो उन के मांबाप ने स्वयंवर का आयोजन किया है. जो लोग मिस सेजल की शर्तों के साथ शादी करना चाहते हैं, वे तुरंत संपर्क करें.

इस स्वयंवर की घोषणा हुए भी 2 साल बीत गए हैं, लेकिन किसी ने स्वयंवर में आने का कष्ट नहीं उठाया. लिहाजा, औनलाइन आवेदन भेजने की तारीख को अगले 5 साल के लिए बढ़ा दिया गया है.

बदलते जमाने का सच: भाग 1

‘‘हैलो,’’ प्रियांशु ने मुसकरा कर नैनी की ओर देखा.

‘‘हैलो,’’ नैनी भी उसे देख कर मुसकराई.

‘‘तुम्हारा प्रोजैक्ट बन गया क्या?’’

‘‘नहीं, मेरा लैपटौप खराब हो गया है. ठीक होने के लिए दिया है. एक घंटे के लिए अपना लैपटौप दोगे मुझे?’’

‘‘क्यों नहीं, कब चाहिए?’’ प्रियांशु ने पूछा.

‘‘कल दोपहर में आ कर ले जाऊंगी. लंच भी तुम्हारे साथ करूंगी. संडे है न, कोई न कोई नौनवैज तो बनाओगे ही.’’

‘‘बिलकुल. क्या खाना पसंद करोगी, चिकन या मटन?

‘‘जो तुम्हें पसंद हो. वैसे, तुम्हारा प्राजैक्ट बन गया क्या?’’

‘‘हां, देखना चाहोगी?’’

‘‘हां, क्यों नहीं. कल आने के बाद,’’ नैनी ‘बायबाय’ कहते हुए चली गई. प्रियांशु भी अपने र्क्वाटर पर लौट आया.

प्रियांशु और नैनी एक कंपनी में साथसाथ काम करते थे. उन के क्वार्टर भी अगलबगल में थे. दोनों अभी कुंआरे थे. साथसाथ काम करने के चलते अकसर उन में बातचीत होती रहती थी. दोनों के विचार मिलते थे और दोस्ती के लिए इस से ज्यादा चाहिए भी क्या.

दूसरे दिन प्रियांशु मटन ले कर लौटा ही था कि नैनी आई.

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‘‘बहुत जल्दी आ गई तुम नैनी?’’ प्रियांशु ने लान में रखी कुरसी पर बैठने का इशारा किया और खुद मटन रखने रसोईघर में चला गया.

‘‘तुम्हारा हाथ बंटाने पहले आ गई,’’ कह कर नैनी मुसकराई.

नैनी की यही अदा प्रियांशु को उस का दीवाना बनाए हुई थी.

‘‘अभी चाय ले कर आता हूं, फिर इतमीनान से खाना बनाएंगे,’’ कह कर प्रियांशु रसोईघर में चला गया.

प्रियांशु के पिताजी किसान थे. उस से बड़ी एक बहन थी जिस की शादी हो चुकी थी. उस से एक छोटा भाई महीप था जो मैडिकल इम्तिहान की तैयारी कर रहा था. पिता के ऊपर काफी कर्ज हो गया था.

अब प्रियांशु कर्ज चुकाने और छोटे भाई महीप को पढ़ाने का खर्चा उठा रहा था. पिताजी उस की शादी में तिलक की एक मोटी रकम वसूलना चाहते थे. रिश्ते तो कई जगह से आए थे, पर उन की डिमांड ज्यादा होने के चलते कहीं शादी तय नहीं हो पा रही थी. इधर उस की बहन अपनी ननद के लिए लड़का ढूंढ़ रही थी. उस की ननद नाटे कद की थी और किसी तरह मैट्रिक पास हो गई थी. रंगरूप साधारण था, पर प्रियांशु के पिताजी की डिमांड को उस के समधी पूरा करने के लिए तैयार हो गए थे.

नैनी के पिताजी की मौत उस के बचपन में ही हो गई थी. कोई भाई नहीं था. मां ने उस की पढ़ाई के लिए कौनकौन से पापड़ न बेले थे. बाद में उस ने ऐजुकेशन लोन ले कर पढ़ाई पूरी की थी. अब लोन चुकाना और मां की देखभाल की जिम्मेदारी उस पर थी.

प्रियांशु जब रसोईघर में गया था तब उस का मोबाइल फोन बाहर ही छूट गया था. अचानक फोन बजने लगा तो नैनी ने प्रियांशु को पुकारा, पर चाय बनाने में बिजी होने के चलते उस की आवाज प्रियांशु के कानों तक न पहुंची.

नैनी ने फोन रिसीव किया तो उधर से आवाज आई. कोई औरत थी.

‘‘हैलो, आप कौन बोल रही हैं?’’ नैनी ने पूछा.

‘प्रियांशु कहां है? मैं उन की बहन बोल रही हूं. आप कौन हैं?’

‘‘मैं प्रियांशु की कलीग हूं, बगल में ही रहती हूं.’’

‘अच्छा, तुम नैनी हो क्या?’

‘‘हां जी, आप मुझे कैसे जानती हैं?’’ नैनी ने हैरान हो कर पूछा.

‘प्रियांशु ने बताया था. अब तुम उस का पीछा करना छोड़ दो. उस की शादी मेरी ननद से तय हो गई है,’ उधर से एक तीखी आवाज आई.

‘‘अच्छा जी… प्रियांशु अभी रसोईघर में हैं. वे आ जाते हैं तो उन्हें आप को फोन करने के लिए कहती हूं,’’ नैनी ने अपनेआप को संभालते हुए कहा.

प्रियांशु ने अपनी बहन की ननद के बारे में कुछ दिनों पहले बताया था. वह कुछ परेशान सा लग रहा था. उस की बातों से लग रहा था कि उस की बहन अपनी ननद के लिए उस के पीछे पड़ी थी. कहती थी कि यह शादी हो जाती है तो उसे मुंहमांगा दहेज मिलेगा. साथ ही, उस की ननद हमेशा के लिए उस के साथ रहेगी, पर प्रियांशु को यह रिश्ता बिलकुल पसंद नहीं था.

नैनी यह तो नहीं जानती थी कि प्रियांशु से उस का क्या रिश्ता है, पर उन दोनों को एकदूसरे का साथ बहुत भाता था. प्रियांशु जब कभी औफिस से गैरहाजिर होता था तो वह उसे बहुत याद करती. आज उसे पता चला कि प्रियांशु ने घर में उस की चर्चा की है, पर इस संबंध में उस ने कभी कुछ बताया न था. अभी वह इसी उधेड़बुन में थी कि प्रियांशु आ गया.

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‘‘तुम्हारा फोन था. बधाई, तुम्हारी शादी तय हो गई,’’ नैनी ने मुसकराने की कोशिश करते हुए कहा.

प्रियांशु चाय की ट्रे लिए खड़ा था. लगा, गिर जाएगा. किसी तरह अपनेआप को संभालते हुए वह बैठा. यह सुन कर उस का मन बैठता चला गया. तो क्या सच ही उस की शादी तय हो गई? क्या यह उस की बहन की चाल तो नहीं? अगर ऐसा है तो जरूर ही उस की ननद होगी. पर वे लोग उस से बिना पूछे ऐसा कैसे कर सकते हैं.

‘‘क्या सोच रहे हो? बहन से पूछ लो कि कब सगाई है. मुझे तो ले नहीं चलोगे. कहोगे तब भी मैं न चलूंगी. तुम्हारी बहन ने चेताया है, तुम्हारा पीछा छोड़ दूं,’’ नैनी बोल रही थी. वह सुन रहा था. लंच का सारा मजा किरकिरा हो गया था.

दूसरे दिन प्रियांशु गांव में था. उस ने पिताजी के पैर छुए.

‘‘अच्छा हुआ कि तू आ गया बेटा. अब हम कर्ज से जल्दी ही उबर जाएंगे. तुम्हारा रिश्ता तय हो गया है सरला से. वही तुम्हारी बहन की ननद. कद में तुम से थोड़ी छोटी जरूर है, पर घर के कामों में माहिर है. सुशील इतनी कि हर कोई उस के स्वभाव की तारीफ करता है. तुम्हारी बहन का भी काफी जोर था.’’

अरे, यह क्या कर दिया?

केदारनाथ धाम में मुंबई के मेरे एक दोस्त पिछले दिनों केदारनाथ धाम आए थे. अपने आने की खबर उन्होंने मुझे पहले से दे दी थी. वे एक होटल में ठहरे थे.

उन से मुलाकात कर के मैं वापस लौट रहा था. रास्ते में देखा कि एक कोढ़ी खस्ता हालत में शिवलिंग के दर्शन के लिए गुजरात से आया था.

वह कोढ़ी पूरी शिद्दत से मंदिर के अंदर चला गया. सब लोग लाइन में खड़े थे, तभी उस कोढ़ी के पास एक पंडा आया. उस कोढ़ी ने जेब से 500 रुपए निकाल कर पंडे को दे दिए. पंडा उसे स्पैशल पूजा के रास्ते से मंदिर के भीतर ले गया.

पूजा के बाद पंडा तो खिसक गया, लेकिन उस कोढ़ी ने शिवलिंग को कस कर पकड़ते हुए कहा, ‘‘महाराज, मैं गुजरात से आया हूं. न जाने मैं ने पिछले जन्म में क्या पाप किया था, जो मैं कोढ़ी हो गया…’’

वह कोढ़ी शिवलिंग पर ऐसे चिपटा हुआ था, मानो उस का कोढ़ गायब हो जाएगा. वह शिवलिंग को छोड़ने के मूड में नहीं था, तभी वहां तमाम भक्तों की भीड़ लग गई. सभी दर्शनों के लिए बेचैन थे. दूसरे पंडे उसे शिवलिंग को छोड़ने के लिए लगातार कह रहे थे, पर वह उन की बात न सुन कर केवल रोए जा रहा था.

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हार कर 4 पंडे और आए और उसे जबरन घसीट कर मंदिर से बाहर ले गए.

गुस्से में आगबबूला हो कर पंडे उसे गालियां देने लगे. कुछ पंडे उस पर लातें चला रहे थे, तो कई घूंसे जमा रहे थे.

थोड़ी देर बाद वह कोढ़ी लहूलुहान हो कर सीढ़ी के किनारे आ बैठा.

मैं ने उस की हालत देख कर कहा, ‘‘अरे, यह क्या कर दिया?’’

दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मुझे कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिए नागपुर जाना था. मैं ने स्टेशन पर पता किया कि नागपुर के लिए गाड़ी रात के 3 बजे मिलेगी. मैं रात के 12 बजे स्टेशन पहुंच गया. मैं ने सोचा कि 3 घंटे टहलतेटहलते कट जाएंगे.

मैं प्लेटफार्म नंबर 5 पर आया और एक लोहे की बैंच पर बैठ गया. मेरे बगल वाली बैंच पर धोतीकुरता पहने एक साहब गहरी नींद में सोए हुए थे.

मेरी दाईं तरफ एक साहब व उन की बीवी और 2 बच्चे एक बैंच पर बैठे थे. शायद वे भी गाड़ी का इंतजार कर रहे थे. उन के बच्चे बहुत नटखट नजर आ रहे थे. उन की मम्मी उन्हें बिट्टू व पिंटू नाम से पुकार रही थीं.

वे दोनों बच्चे मेरे बगल वाली बैंच पर सो रहे साहब को नाना पाटेकर कह रहे थे. एक भिखारी व एक भिखारिन को वे अनिल कपूर व जूही चावला कह रहे थे.

अचानक वे दोनों बच्चे मेरी बगल वाली बैंच पर सोए हुए साहब की बैंच पर बैठ गए और उन में से एक ने अपनी मम्मी से कहा, ‘‘मम्मी, हम नाना पाटेकर के साथ बैठे हैं.’’

उन की मम्मी मुसकराते हुए उन्हें चुप रहने का इशारा करने लगीं.

वे दोनों बच्चे उन साहब के नीचे रखे जूतों को इस तरह देख रहे थे, मानो जूतों की तहकीकात कर रहे हों. फिर उन दोनों ने जूतों में पेशाब करना शुरू कर दिया. वे पेशाब की धार की गिनती गिनने लगे. बिट्टू ने 50 की गिनती तक जूता भरा, जबकि पिंटू ने 30 की गिनती में ही जूता भर दिया. इस के बाद वे दोनों अपनी मम्मी के पास चले गए.

तभी एक पुलिस वाला आया. उसने सोए हुए आदमी को डंडा चुभा कर कहा, ‘‘अबे ओ घोंचू, घर में सोया है क्या?’’

उन साहब की नींद खुली और वे जूता पहनने लगे कि जूतों में भरे पेशाब ने वहां का फर्श गीला कर दिया.

‘‘अरे, यह क्या किया. जूतों में पेशाब कर के सो रहा था. प्रदूषण फैलाता है. तुझे सामने लिखा नहीं दिखाई दिया कि गंदगी फैलाने वाले से 500 रुपए जुर्माना वसूल किया जाएगा. चल थाने,’’ कह कर पुलिस वाला उसे थाने ले जाने लगा.

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वे साहब चलतेचलते गिड़गिड़ाने लगे, ‘‘नहीं जनाब, मैं ने पेशाब नहीं किया…’’

पुलिस वाले ने उन की एक न सुनी. वह उन्हें प्लेटफार्म नंबर 4 की तरफ ले गया.

मैं ने उन दोनों बच्चों की तरफ देखा. वे भी सारा माजरा समझ गए थे. उन में से एक ने दूसरे से कहा, ‘‘अभी तो फिल्म का ट्रेलर चल रहा है, पिक्चर शुरू नहीं हुई.’’

मैं धीरे से कहने लगा, ‘‘अरे, यह क्या कर दिया?’’

राजस्थान की बस में मैं अजमेर में एक अखबार में सहायक संपादक था. प्रधान संपादक ने मुझे निजी काम से दिल्ली भेजा था. मैं अजमेर से दिल्ली के लिए सुबह बस से चला था. जयपुर से आगे एक छोटे शहर में बस का टायर पंचर हो गया. सभी सवारियां समय बिताने व कुछ खानेपीने के लिए आसपास की दुकानों में चली गईं.

मैं एक पेड़ की छाया में बैठ गया. बगल वाली गली में कुछ बच्चे खेल रहे थे, तभी वहां से एक गधा गुजरा. गधे को देख कर बच्चों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया. 3 बच्चे गधे पर सवार हो गए और 2 बच्चे डंडे से पीटते हुए उसे दौड़ाने लगे. गधा ‘ढेंचूढेंचू’ करता हुआ दौड़ता जा रहा था.

सभी सवारियां यह तमाशा देख रही थीं. हमारी बस का ड्राइवर लंबी चोटी रखे हुए था. वे बच्चे ड्राइवर को चिढ़ाने लगे, ‘चोटी वाला साबुन क्या भाव है?’

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ड्राइवर को गुस्सा आ गया. उस ने सड़क के किनारे पड़ा एक पुराना सैल उठाया और बच्चों की तरफ फेंक दिया. सैल एक बच्चे की खोपड़ी में जोर से लगा और उस की खोपड़ी से खून बहने लगा.

बस का टायर बदला जा चुका था. ड्राइवर ने हौर्न बजाया. सब सवारियां बस में बैठ गईं और बस दिल्ली की तरफ चल पड़ी.

रेवाड़ी पहुंचते ही पुलिस ने बस को घेर लिया और ड्राइवर को हथकड़ी पहना दी.

मैं ने कहा, ‘‘अरे, यह क्या कर दिया?’’

मसजिद के बाहर बात मुरादाबाद की है. एक मसजिद के बाहर एक हिंदू दंपती ने अपना तकरीबन 15 साल का लड़का नंगा कर के जमीन पर बैठा रखा था. जो भी नमाज पढ़ने अंदर जाता, उस से लड़के का पिता गुजारिश करता कि बाहर आते समय लड़के के ऊपर थूक कर चले जाना, क्योंकि यह लड़का दुष्ट आत्मा का शिकार है.

मैं ने अपने दोस्त से पूछा कि यह क्या हो रहा है, तो उस ने बताया कि यह किसी जिन का चक्कर है.

हम दोनों मसजिद के सामने वाली दुकान पर अखबार पढ़ने के बहाने बैठ गए. मेरी नजर उसी लड़के पर टिकी थी. जो भी नमाजी बाहर आ रहा था,

वह लड़के पर थूक रहा था. कोई पान वाला लाल थूक डाल रहा था तो कोई सादा थूक.

नमाजियों की भीड़ बढ़ती जा रही थी. एक नमाजी नया सफेद पठानी सूट पहने था. भीड़ की वजह से उस की सलवार पर उस लड़के के बदन का थूक लग गया.

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‘‘बेवकूफ, मेरी सलवार को कौन साफ करेगा? तेरा बाप…?’’ कहते हुए उस ने एक जोरदार लात लड़के के मुंह पर जमा दी. मैं ने देखा कि लड़के की दाईं आंख लात की चोट से बंद हो चुकी थी.

दुष्ट आत्मा तो थूकने या लात खाने से भले ही न निकली हो, पर उस लड़के को रिकशे पर लाद कर अस्पताल ले जाना पड़ा.

मैं ने कहा, ‘‘अरे, यह क्या कर दिया?’’

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