Romantic Story : अनकहा प्यार- बिनब्याहे मिली सासूमां

Romantic Story. कालेकाले बादलों ने आसमान में डेरा डाल दिया था. मुक्ता सूखे कपड़े उतारने के लिए तेजी से आंगन की तरफ दौड़ी. बूंदों ने झमाझम बरसना शुरू कर दिया था.

कपड़े उतारतेउतारते मुक्ता काफी भीग चुकी थी. अंदर आते ही उस ने छींकना शुरू कर दिया.

मां बड़बड़ाते हुए बोलीं, ‘‘मुक्ता, मैं ने तुझ से कितनी बार कहा है कि भीगा मत कर, लेकिन तू मानती ही नहीं. मुझे आवाज दे देती, तो मैं उतार लाती कपड़े.’’

मुक्ता ने शांत भाव से कहा, ‘‘मां, आप सो रही थीं, इसलिए मैं खुद ही चली गई. अगर आप जातीं, तो आप भी तो भीग जातीं न.’’

मां उसे दुलारते हुए बोलीं, ‘‘मेरी बेटी अपनी मां को इतना प्यार करती है…’’

‘‘हां,’’ मुक्ता ने सिर हिलाते हुए कहा और मां के कांधे से लिपट गई.

‘‘तू पूरी तरह से भीग गई है… जा, जा कर पहले तौलिए से बाल सुखा ले और कपड़े बदल ले. मैं तेरे लिए तुलसीअदरक वाली चाय बना कर लाती हूं,’’ कहतेकहते मां चाय बनाने चली गईं.

मुक्ता कपड़े बदल कर सिर पर तौलिया लपेटे हुए सोफे पर आ कर बैठ गई.

‘‘ले, गरमागरम चाय पी ले और चाय पी कर आराम कर,’’ मां चाय दे कर दूसरे काम के लिए किचन में चली गईं.

मुक्ता खिड़की से बारिश की बूंदों को गिरते हुए देख रही थी और देखतेदेखते पुरानी यादों में खो गई.

औफिस जाने के लिए मुक्ता बस स्टौप पर खड़ी बस का इंतजार कर रही थी कि तभी एक नौजवान उस की बगल में आ कर खड़ा हो गया. सुंदर कदकाठी का महत्त्व नाम का वह नौजवान औफिस के लिए लेट हो रहा था. आज उस की बाइक खराब हो गई थी.

महत्त्व रहरह कर कभी अपने हाथ की घड़ी, तो कभी बस को देख रहा था. तभी एक बस आ कर खड़ी हो गई. सब लोग उस बस में जल्दीजल्दी चढ़ने लगे. मुक्ता और महत्त्व ने भी बस में चढ़ने के लिए बस के दरवाजे को पकड़ा. गलती से महत्त्व का हाथ मुक्ता के हाथ पर रखा गया. वह सहम गई और बस से दूर जा कर खड़ी हो गई.

महत्त्व जल्दी से बस में चढ़ गया. पर जब बस में चारों तरफ नजरें दौड़ाने पर उसे मुक्ता नहीं दिखाई दी, तो वह बस से उतर गया और बस स्टौप की तरफ चलने लगा. मुक्ता वहीं पर खड़ी दूसरी बस का इंतजार कर रही थी.

महत्त्व ने पास आ कर मुक्ता से पूछा, ‘‘आप बस में क्यों नहीं चढ़ीं?’’ ‘‘जी, बस यों ही… भीड़ बहुत ज्यादा थी, इसलिए…’’

तभी दूसरी बस आ कर खड़ी हो गई. मुक्ता बस में चढ़ गई. महत्त्व भी बस में चढ़ गया. थोड़ी देर में मुक्ता का औफिस आ गया… वह बस से उतर गई. कुछ देर बाद महत्त्व का भी औफिस आ गया था.

शाम को औफिस छूटने के बाद दोनों इत्तिफाक से एक ही बस में चढ़े और दोनों ने एकदूसरे को हलकी सी स्माइल दी.

अब दोनों का एक ही बस से आनाजाना शुरू हो गया. ये मुलाकातें एकदूसरे से बोले बिना ही कब प्यार में बदल गईं, पता ही नहीं चला.

एक दिन वे दोनों बस स्टौप पर खड़े थे. काले बादलों ने घुमड़घुमड़ कर शोर मचाना शुरू कर दिया. महत्त्व ने मुक्ता से कहा, ‘‘मौसम कितना सुहाना है… क्यों न कहीं घूमने चलें?’’

मुक्ता ने धीरे से कहा, ‘‘लेकिन, औफिस भी तो जाना है…’’

‘‘आज औफिस को गोली मारो… मैं बाइक ले कर आता हूं… बाइक से घूमने चलेंगे. तुम मेरा यहीं इंतजार करना… मैं बस 2 मिनट में आया,’’ कह कर महत्त्व बाइक लेने चला गया.

थोड़ी देर में महत्त्व बाइक ले कर आ गया. उस ने अपना हाथ मुक्ता की तरफ बढ़ाया. मुक्ता ने अपना हाथ महत्त्व के हाथ पर रख दिया और बाइक पर बैठ गई. दोनों घूमतेघूमते बहुत दूर निकल गए.

जब बहुत देर हो गई, तब मुक्ता ने कहा, ‘‘काले बादल घने होते जा रहे हैं और अंधेरा भी बढ़ रहा है. अब हमें चलना चाहिए. बारिश कभी भी शुरू हो सकती है.’’

महत्त्व ने बाइक स्टार्ट की. मुक्ता पीछे बैठ गई. दोनों चहकते हुए चले जा रहे थे. काले बादलों ने झमाझम बरसना शुरू कर दिया. मुक्ता ने दोनों हाथों से महत्व को कस के पकड़ लिया. महत्त्व भी प्यार की मीठी धुन में गुनगुनाता हुआ बाइक चला रहा था.

आगे गड्ढा था, जिस में पानी भरा हुआ था. महत्त्व ने ध्यान नहीं दिया. बाइक गड्ढे में जा गिरी, जिस से महत्त्व और मुक्ता बुरी तरह जख्मी हो गए. कुछ लोग उन्हें अस्पताल ले कर पहुंचे.

महत्त्व की अस्पताल पहुंचते ही मौत हो गई. उस की मौत से मुक्ता अंदर से टूट गई और सोचने लगी, ‘अनकहा प्यार अनकहा ही रह गया…’

अपनी यादों में खोई मुक्ता की आंखों से आंसू गिरने लगे.

‘‘मुक्ता… ओ मुक्ता, किन यादों में खो गई… देख, तेरी चाय ठंडी हो गई. चल छोड़, मैं दूसरी बना कर लाती हूं. मां और मुक्ता दोनों साथ चाय पीते हैं.’’

चाय पीते हुए मां ने मुक्ता से पूछा, ‘‘महत्त्व को याद कर रही थी?’’

मुक्ता लंबी गहरी सांस लेते हुए बोली, ‘‘हां, मां… मां, बस आप ही समझ सकती हो कि महत्त्व का मेरी जिंदगी में क्या महत्त्व था. मम्मीपापा के चले जाने के बाद मैं बिलकुल अकेली हो गई थी. फिर महत्त्व मेरी जिंदगी में आया और मेरी दुनिया ही बदल गई. लेकिन, वह भी मुझे छोड़ कर चला गया. मैं बिलकुल टूट कर बिखर गई.

‘‘महत्त्व के चले जाने के बाद आप ने मुझे संभाला. आप सिर्फ महत्त्व की ही मां नहीं हो… आप मेरी भी मां हो. अब आप मेरी जिम्मेदारी हो. मैं आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’Romantic Story

Story in Hindi : भभूत का कमाल – स्वामीजी का जादू या जंजाल

Story in Hindi. आज फिर बिस्तर पर निढाल पड़े पति को शीला आंखों में आंसू लिए नफरत की नजरों से देख रही थी. आधी रात जवानी पर थी, लेकिन शीला तड़प रही थी. वजह, उस की कोख अभी तक नहीं भरी थी.

शीला का पति नामर्द जो निकला था. वह काम से आते ही थकामांदा खापी कर सो जाता. कभीकभार उस की नसों में खून दौड़ जाता, तो थोड़ी देर के लिए वह शीला से प्यार जता देता. फिर शीला जल बिन मछली की तरह आधी भूख लिए तड़प कर रह जाती.

शीला सोचने लगी कि कुछ तो उपाय करना चाहिए. पड़ोस की लालमती को भी 7 साल के बाद बच्चा हुआ था.

यह सब शायद स्वामीजी की कृपा थी, जो लालमती को औलाद सुख मिला.

स्वामी कृपानंद पास के गांव धरमपुर में तालाब के किनारे आश्रम बना कर रहते थे. लालमती स्वामीजी के पास जा कर दवा और भभूत लाई थी.

एक दिन लालमती बता रही थी कि स्वामीजी दवा और भभूत देते हैं, जिसे पतिपत्नी को 3 महीने तक खानी पड़ती है.

‘अब मैं लालमती से मिलूंगी, तभी काम बनेगा,’ यह सोचतेसोचते शीला न जाने कब सो गई.

सुबह हुई, तो शीला आंखें मलते हुए उठी. वह जल्दी से नहाईधोई, फिर घर के सारे काम निबटा कर लालमती के घर जा पहुंची.

लालमती अपने बेटे को खाना खिला रही थी. यह देख कर शीला के अंदर भी टीस उभरी. काश, मुझे भी एक ऐसी औलाद मिल जाए, तो क्या कहने. शीला ने लालमती के सामने अपने मन की बात कह दी.

लालमती हंसते हुए उस से बोली, ‘‘बिलकुल न घबराओ बहन, मैं भी तुम्हारी तरह 7 साल तक बच्चे के लिए परेशान हुई, तमाम डाक्टरों से इलाज कराया, लेकिन आखिर में स्वामीजी की मेहरबानी से ही यह औलाद मिली.

‘‘तुम चाहो, तो मेरे साथ आज ही स्वामीजी के पास चलो. वैसे, स्वामीजी रविवार और मंगलवार को ही ज्यादा औरतों की कोख भरने के लिए भभूत देते हैं और झाड़फूंक भी करते हैं.’’

‘‘चलो, अभी चलें,’’ शीला आंखों में चमक लिए बोली. वे दोनों स्वामीजी के पास चल दीं.

स्वामीजी की कुटिया एकांत में बनी थी. उस के आसपास 2-3 किलोमीटर दूर गांव बसे थे. स्वामीजी के पास जा कर दोनों उन के पैरों पर गिर पड़ीं और उन का आशीर्वाद लिया.

स्वामीजी 6 फुट के हट्टेकट्टे कसरती बदन के मालिक थे. उन्होंने जब शीला को पैर छूते देखा, तो उस के उभारों पर नजर रखते हुए वे चिडि़या को जाल में फंसाने की बात सोचने लगे.

शीला के सिर पर हाथ रख कर सहलाते हुए उन्होंने आशीर्वाद दिया, ‘‘तुम्हारी इच्छा पूरी हो.’’

शीला को यह सुन कर रोना आ गया. आंखों में आंसू भर कर वह बोली, ‘‘स्वामीजी, 5 साल से अभी तक मेरी इच्छा पूरी नहीं हुई. अब तो मैं बड़ी उम्मीद ले कर आप के पास आई हूं.’’

वे बोले, ‘‘मेरे दरबार से अभी तक कोई भी खाली हाथ नहीं लौटा है. बताओ, क्या बात है?’’

शीला से पहले ही लालमती बोल पड़ी, ‘‘बाबाजी, जो मेरी समस्या थी, वही शीला की भी है. 5 साल हो गए, अभी तक इस की गोद नहीं भरी है.’’

‘‘ठीक है, कुछ पूजा करनी होगी. तकरीबन 5 हजार रुपए लग जाएंगे और तुम अपने पति को भी साथ लाना. परसों मंगलवार को पूजा होगी,’’ स्वामीजी ने शीला से मुखातिब होते हुए कहा.

कुछ प्रसाद और भभूत दे कर उन्होंने शीला और लालमती को घर भेज दिया.

शाम को शीला ने अपने पति को सारी बातें बताईं. उस का पति रमेश स्वामीजी के पास जाने को तैयार हो गया, क्योंकि वह भी औलाद की चाह में तमाम ओझागुनियों, मुल्लामौलवियों को दिखा चुका था.

रमेश हर पल अंधविश्वास में पड़ कर अनापशनाप सोचता रहता. उसे लगता कि किसी पड़ोसी ने उस के घर पर कुछ तंत्रमंत्र कर दिया है. दूसरे दिन लालमती के साथ शीला और उस का पति रमेश स्वामीजी के आश्रम में पहुंचे.

स्वामीजी बोले, ‘‘बेटा, घबराओ मत. सब ठीक हो जाएगा. घर पर भी हवन करना होगा. अब तुम पूजा का सामान ले आओ. 7 दिनों तक पूजा करनी पड़ेगी. मंत्रों का जाप भी करना होगा.’’

रमेश की आंखों पर धर्म की पट्टी पड़ चुकी थी. स्वामीजी पर भरोसा कर के वह सामान लेने चला गया. इधर बंद कमरे में पहले ही एक गिलास में पानी भर कर उस में नशीली गोली मिला दी गई थी. कुछ देर बाद स्वामीजी ने वह पानी शीला को पीने के लिए दिया, फिर शीला की जवानी का भरपूर मजा लूटा.

इस तरह रोज झाड़फूंक व पूजापाठ का झांसा दे कर स्वामीजी शीला की इज्जत से खेलते रहे.

शीला को भी सबकुछ मालूम हो गया, क्योंकि पहले ही दिन पानी पीने के बाद नशा छाया और होश में आने पर उसे एहसास हो गया कि स्वामीजी उस के साथ क्या कर चुके हैं.

एक दिन स्वामीजी ने शीला से फिर गिलास में पानी मंगवाया, तो शीला बोल पड़ी, ‘‘स्वामीजी, अब गिलास और पानी की जरूरत नहीं. अब तो जो हो रहा है, वह वैसे भी हो सकता है, क्योंकि बच्चे पैदा करना मेरे पति के बस की बात नहीं.

‘‘आप मुझे बेहोशी में लूट ही चुके हैं. अब जब तक बच्चा ठहर नहीं जाता, तब तक मैं खुद को आप को सौंपती हूं.’’

यह सुन कर स्वामीजी और शीला खूब देर तक वासना का खेल खेलते रहे. कुछ दिनों बाद शीला के पैर भारी हो गए.

रमेश कभीकभार शीला के साथ सो पाता था और स्वामीजी की दी गई भभूत खाता रहता था.

शीला को एक दिन सुबहसुबह उलटी होती देख रमेश शीला से पूछ बैठा, ‘‘क्या पैर भारी हो गए?’’

शीला ने मुसकरा कर ‘हां’ में सिर हिलाया.

रमेश खुशी से समझाते हुए बोला, ‘‘यह सब स्वामीजी की भभूत का कमाल है.’’ खुश हो कर रमेश ने स्वामीजी को 5 हजार रुपए दे दिए. Story in Hindi

Family Story : मेरी स्वीट मिट्ठी- नाना की रिटायरमेंट बाद क्या हुआ

Family Story. मेरे नाना रिटायरमैंट के बाद सपरिवार कोलकाता में बस गए थे. उन का कोलकाता के बाहर बसी एक नामचीन डैवलपर की टाउनशिप में बड़ा सा फ्लैट था.

मेरी नानी पश्चिम बंगाल के मिदनापुर की थीं. वे अच्छीखासी पढ़ीलिखी थीं. वे महिला कालेज में प्रिंसिपल के पद पर थीं. नाना ने उन की इच्छा के मुताबिक कोलकाता में बसने का फैसला लिया था.

मैं अपनी मम्मी के साथ दुर्गा पूजा में कोलकाता गया था. मैं ने रांची से एमबीए की पढ़ाई की थी. कैंपस से ही मेरा एक मल्टीनैशनल कंपनी में सैलेक्शन हो चुका था. औफर लैटर मिलने में अभी थोड़ी देरी थी.

मिट्ठी से मेरी मुलाकात कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान हुई. कौंप्लैक्स के मेन गेट पर वह सिक्योरिटी गार्डों से उलझ गई थी.

शाम के समय पास की झुग्गी बस्ती से कुछ बच्चियां दुर्गा पूजा देखने आई थीं. चिथड़ों में लिपटी बच्चियों को सिक्योरिटी गार्ड ने रोक दिया था.

टाउनशिप के बनने के दौरान मजदूरों ने वहां सालों अपना पसीना बहाया था. ये उन्हीं की बच्चियां थीं.

मिट्ठी वहां अकसर जाती थी. वह उन की चहेती दीदी थी. वह बच्चों के टीकाकरण में मदद करती थी. स्कूलों में उन को दाखिला दिलाती थी. बच्चियों को पूजा पंडाल तक ले जाने और प्रसाद दिलाने में मिट्ठी को तमाम विरोध का सामना करना पड़ा था.

मिट्ठी विजयादशमी के दिन भी दिखाई दी थी. लाल बौर्डर की साड़ी में वह बेहद खूबसूरत दिख रही थी. मिट्ठी मुझे भा गई थी.

मम्मी जल्दी मेरे फेरे कराना चाहती थीं. उन्होंने रांची शहर के कई रिश्ते भी देखे थे. नानी से सलाहमशवरा करने के लिए मम्मी मुझे कोलकाता ले कर आई थीं.

‘‘अमोल खुद अपना ‘जीवनसाथी’ चुनेगा… मेरा पोता अपने लिए बैस्ट साथी चुनेगा… एकदम हीरा…’’ नानी मेरी अपनी पसंद की बहू के हक में थीं.

‘‘गोरीचिट्टी, देशी मेम बहू बनेगी…’’ मम्मी की यही सोच थी. सुंदर, सुशील, घर के कामों में माहिर बहू उन की पसंद थी.

‘‘भाभी, हमारी बहू तो फर्राटेदार अंगरेजी में बतियाने वाली सांवलीसलोनी और स्मार्ट होगी…’’ छोटी मामी ने भी अपनी पसंद जताई थी.

‘‘मुझे मिट्ठी पसंद है…’’ मैं ने छोटी मामी को अपनी पसंद बताई.

मिट्ठी कौंप्लैक्स में ही रहती थी. मेरी मम्मी समेत परिवार के सभी लोग मिट्ठी की हरकतों से अनजान नहीं थे.

‘‘कौंप्लैक्स में मिट्ठी की इमेज ज्यादा अच्छी नहीं है. वह तेजतर्रार है… अमीरजादों के साथ आवारागर्दी करती है… मोटरसाइकिल से स्टंट करती है… बेहद बिंदास है… शौर्ट्स पहन कर घूमती है…’’ छोटी मामी ने मुझे जानकारी दी.

‘‘मुझे बोल्ड लड़कियां पसंद हैं…’’

‘‘उम्र में भी बड़ी है…’’

मैं ने उम्र की बात को भी नकार दिया.

‘‘मिट्ठी कैंपस के लड़कों के साथ टैनिस… क्रिकेट… बास्केटबाल खेलती है… मौडलिंग करती है… कंडोम की मौडलिंग… उस के मम्मीपापा ने कितनी आजादी दे रखी है…’’ मेरी बात से छोटी मामी शायद नाराज हो गई थीं.

‘‘मैं क्या सुन रही हूं…? मेरी रजामंदी बिलकुल नहीं है… नहीं… मैं मिट्ठी को बहू नहीं बना सकती…’’ मम्मी बेहद नाराज थीं. उन्होंने मुझ से दूरी बना ली थी.

मैं मिट्ठी को अपना मान चुका था. शीतयुद्ध का अंत हुआ. नानी को भनक लगी. उन्होंने सब को अपने कमरे में बुलाया. सब की बातों को बड़े ही ध्यान से सुना.

‘‘अमोल ने जिद पकड़ ली है… बदनाम लड़की से रिश्ता करने पर तुले हैं…’’ छोटी मामी ने नानी को बताया.

‘‘यह बदनाम लड़की कौन है…? कहां की है…?’’ नानी ने सवाल किया.

‘‘अपने कौंप्लैक्स की ही है… अपनी मिट्ठी… आवारागर्दी, गुंडागर्दी करती है… पूजा के पंडाल में हंगामा भी किया था… आप ने सुना होगा…’’ छोटी मामी ने मिट्ठी की खूबियों का बखान किया.

‘‘मिट्ठी तो अच्छी बच्ची है… कई बार मंदिर में मिली है… मेरे पैर छुए हैं… मैं ने आशीर्वाद दिया है… वह बदनाम कैसे हो सकती है,’’ नानी छोटी मामी से सहमत नहीं थीं.

‘‘क्या अच्छे परिवार की बच्चियां पराए जवान लड़कों के साथ क्रिकेट… बास्केटबाल और टैनिस खेलती हैं? कंडोम की मौडलिंग करती हैं? छोटे कपड़े पहनती हैं? मुंहफट और बेशर्म होती हैं?’’ मम्मी ने एकसाथ कई बातें बताईं और सवाल उठाए.

‘‘मैं ने अपने लैवल पर इन बातों की पड़ताल की है… जानकारियां इकट्ठी की हैं… मैं मिट्ठी से मिला हूं. वह मर्दऔरत के समान हक की बात करती है… वह एक समाजसेविका है… उसे कई मर्द दोस्तों का भी साथ मिला है… सब मिल कर काम करते हैं… ऐक्टिव रहने के लिए फिटनैस जरूरी है…

‘‘सामाजिक कामों के लिए रुपएपैसों की जरूरत पड़ती है. कंडोम की मौडलिंग में कोई बुराई नहीं है… बढ़ती आबादी को कंडोम से ही रोका जा सकता है… इन पैसों से बस्ती के गरीब बच्चों के स्कूल की फीस दी जा सकती है…

‘‘मिट्ठी बोल्ड है… गलतसही की पहचान और परख उसे है… वह अपने काम में जुटी है… जानती है कि वह गलत

रास्ते पर नहीं है… फुजूल की कानाफूसी और बदनामी की उसे कोई परवाह नहीं है. सब बकवास है…’’ मैं ने नानी की अदालत में मिट्ठी का पक्ष रखा.

‘‘मेरे पोते ने बैस्ट लड़की को चुना है. मिट्ठी ही मेरी बहू बनेगी…’’ नानी ने सहज भाव से अपना फैसला सुनाया. मुझे गले से लगाया… रिश्ते के लिए खुद पहल करने की बात कही. Family Story

Romantic Story in Hindi: उसका घर- खामोश और वीरान क्यों थी प्रेरणा की जिंदगी

Romantic Story in Hindi : बहुत अजीब थी वह सुबह. आवाजरहित सुबह. सबकुछ खामोश. भयानक सन्नाटा. किसी तरह ही आवाज का नामोनिशान न था. उस ने हथेलियां रगड़ीं, सर्दी के लिए नहीं, सरसराहट की आवाज के लिए. खिड़की खोली, सोचा, हवा के झोंके से ही कोई आवाज हो सकती है. लकड़ी के फर्श पर भी थपथपाया कि आवाज तो हो. कुछ भी, कहीं से सुनाई तो पड़े. पेड़ भी सुन्न खड़े थे, आवाजरहित. उस ने अपनी घंटी बजाई, थोड़ी आवाज हुई…आवाज होती थी, मर जाती थी, कोई अनुगूंज नहीं बचती थी. ये कैसे पेड़ थे. कैसी हवा थी, हरकतरहित जिस में न सुर, न ताल. उस ने खांस कर देखा. खांसी भी मर गई थी जैसे प्रेरणा, उस की दोस्त…अब उस की कभी आवाज नहीं आएगी. वह क्या गई, मानो सबकुछ अचानक मर गया हो. यह सोच कर उस के हाथपैर ठंडे पड़ने लगे. शायद वह प्रेरणा की मौत की खबर को सहन नहीं कर पा रहा था. पिछले सप्ताह ही तो मिली थी उसे वह.

अब तक तो अंतिम संस्कार भी हो गया होगा. हैरान था वह खुद पर. अब तक हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाया उस के घर जाने की. शायद लोगों को उस की मौत का मातम मनाते देख नहीं सकता था, या फिर प्रेरणा की छवि जो उस के जेहन में थी उसे संजो कर रखना चाहता था. अंतिम संस्कार हुए 4 दिन हो चुके थे. तैयार हो कर उस ने गैराज से कार निकाली और भारी मन से चल दिया. रास्तेभर यही सोचता रहा, वहां जा कर क्या कहेगा. आज तक वह किसी शोकाकुल माहौल में गया नहीं. वह नहीं जानता था कि ऐसी स्थिति में क्या कहना चाहिए, क्या करना चाहिए. यही सोचतेसोचते प्रेरणा के घर की सड़क भी आ गई.

उस का दिल धड़कने लगा. दोनों ओर कतारों में पेड़ थे. उस का मन तो धुंधला था ही, धुंध ने वातावरण को भी धुंधला कर दिया था. उस ने अपना चश्मा साफ किया, बड़ी मुश्किल से उस के घर का नंबर दिखाई दिया. घर बहुत अंदर की तरफ था. उस ने कार बाहर ही पार्क कर दी. कार से पांव बाहर रखते ही उस के पांव साथ देने से इनकार करने लगे. बाहर लगे लोहे के गेट की कुंडी हटाते ही, लोहे के टकराव से, कुछ क्षणों के लिए वातावरण में एक आवाज गूंजी. वह भी धीरेधीरे मरती गई. पलभर को उसे लगा, मानो प्रेरणा सिसकियां भर रही हो…

वहां 3 कारें खड़ी थीं. घर के चारों ओर इतने पेड़ लगे थे कि उस के मन के अंधेरे और बढ़ने लगे. एक भयानक नीरवता चारों ओर घिरी थी. लगता था हमेशा की तरह ब्रिटेन की मरियल धूप कहीं दुबक कर बैठ गई थी. बादल बरसने को तैयार थे. मन के भंवर में धंसताधंसता न जाने कब और कैसे उस के दरवाजे पर पहुंचा. दिल की धड़कन बढ़ने लगी. एक पायदान दरवाजे के बाहर पड़ा था. उस ने जूते साफ किए और गहरी सांस ली. उस ने घंटी बजाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि दरवाजा खुला. शायद लोहे के गेट की गुंजन ने इत्तला दे दी होगी. प्रेरणा के पति ने उस के आगे बढ़े हाथ को अनदेखा कर, रूखेपन से कहा, ‘‘अंदर आओ.’’

उस ने अपना हाथ पीछे करते कहा, ‘‘आई एम राहुल. प्रेरणा और मैं एक ही कंपनी में काम करते थे.’’ ‘‘आई एम सुरेश, बैठो,’’ उस ने सोफे की ओर इशारा करते कहा.

सोफे पर बैठने से पहले राहुल ने नजरें इधरउधर दौड़ाईं और कुछ बिखरी चीजें सोफे से हटा कर बैठ गया. राहुल को विश्वास नहीं हुआ, हैरान था वह, क्या सचमुच यह प्रेरणा का घर है. यहां तो उस के व्यक्तित्व से कुछ भी तालमेल नहीं खाता. दीवारें भी सूनीसहमी खड़ी थीं. उन पर न कोई पेंटिंग, न ही कोई तसवीर. अखबारों के पन्ने, कुशन यहांवहां बिखरे पड़े थे. टैलीविजन व फर्नीचर पर धूल चमक रही थी. बीच की मेज पर पड़े चाय के खाली प्यालों में से चाय के सूखे दाग झांकझांक कर अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहे थे. हर तरफ वीरानगी थी. लगता था मानो घर की दीवारें तक मातम मना रही हों. दिलों के विभाजन की गंध सारे घर में फैली थी. अचानक उस की नजर एक कोने में बैठे 2 उदास कुत्तों पर पड़ी जो सिर झुकाए बैठे थे. शायद वे भी प्रेरणा की मौत का मातम मना रहे थे.

‘‘राहुल, चाय?’’ ‘‘नहींनहीं, चाय की आवश्यकता नहीं, आ तो मैं पहले ही जाता, सोचा, अंतिम संस्कार के बाद ही जाऊंगा, तब तक लोगों का आनाजाना कुछ कम हो जाएगा.

‘‘वैसे, प्रेरणा ने आप का जिक्र तो कभी किया नहीं. हां, अगर आप पहले आ जाते तो अच्छा ही रहता, आप का नाम भी उस के चाहने वालों की सूची में आ जाता. सच पूछो तो मैं नहीं जानता था कि हिंदी में कविता और कहानियों की इतनी मांग है. क्या आज के युग में भी सभ्य इंसान हिंदी बोलता या पढ़ता है?’’ प्रेरणा के पति ने बड़े पस्त और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा. ‘‘प्रेरणा तो बहुत अच्छा लिखती थी. उस की एकएक कविता मन को छू लेने वाली है. व्यक्तिगत दुखसुख व प्रेम के रंगों की सुगंध है. ऐसी संवदेनाएं हैं जो पाठकों व श्रोताओं को आपबीती लगती हैं. आप ने तो पढ़ी होंगी,’’ राहुल ने कहा.

इतना सुनते ही एक कुटिल छिपी मुसकराहट उस के चेहरे पर फैल गई. उस ने राहुल की बात को तूल न देते हुए संदर्भ बदल कर कहना शुरू किया, ‘‘अच्छा हुआ, आप वहां नहीं थे. कैसे बेवकूफ बना गई वह मुझे, मैं जान ही नहीं पाया कि मेरी पार्टनर कितनी फ्लर्ट थी. कितने दोस्त आए थे अंतिम संस्कार के मौके पर. उस वक्त हमारे परिवार का समाज के सामने नजरें उठाना दूभर हो गया था. उम्रभर मना करता रहा, ऐसी प्रेमभरी कविताएं मत लिखो, बदनामी होगी, लोग क्या कहेंगे. वही हुआ जिस का डर था. लोग कानाफूसी कर रहे थे, बुदबुदा रहे थे, ‘पति हैं, बच्चे हैं…’ किस के लिए लिखती थी?’’ इतना कह कर कुछ क्षण वह चुप रहा, फिर बिफरता सा बोला, ‘‘राहुल, कहीं वह तुम्हारे लिए तो…’’ उस की जबान बेलगाम चलती रही.

राहुल हैरान था, क्या यह वही दरिंदा है जिस से वह एक बार कंपनी के सालाना डिनर पर मिला था. राहुल कसमसाता रहा, तय नहीं कर पा रहा था कि उस की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए. पलभर को उस का मन किया कि उठ कर चला जाए, फिर मन को समझाते बुदबुदाया, ‘मैं उस के स्तर पर नहीं गिर सकता.’ वक्त की नजाकत को देखते वह गुस्से को पी गया. मन में तो उस के आया कि इस पत्थरदिल से साफसाफ कह दे, हां, हां, था रिश्ता. मानवता के रिश्ते को जो नाम देना चाहो, दे दो. जीवन का सच तो यह है कि प्रेरणा मेरे जीवन में रोशनी बन कर आई थी और आंसू बन कर चली गई.

वहां बैठेबैठे राहुल को एक घंटा हो चुका था. अभी तक घर में अक्षुब्ध शांति थी. चुप्पी को भंग करते राहुल ने पूछ ही लिया, ‘‘सर, बच्चे दिखाई नहीं दे रहे?’’ ‘‘श्रुति तो कालेज गई है, रुचि सहेलियों के साथ बाहर गई है. सारा दिन घर में बैठ कर करेगी भी क्या. मैं उस की मां की मौत को बड़ा मुद्दा बना कर उन की पढ़ाई में विघ्न नहीं डालना चाहता. घर को बिखरते नहीं देख सकता. मेरा घर मेरे लिए सबकुछ है, इसे बनाने में मैं ने बहुत पैसा और जान लगाई है. प्रेरणा ने तो पीछा छुड़ा लिया है सभी जिम्मेदारियों से. बच्चों की पढ़ाई, विवाह, घर का लोन सब मुझे ही तो चुकाना है. इस के लिए पैसा भी तो चाहिए,’’ वह भावहीन बोलता गया.

राहुल ने सबकुछ जानते हुए भी विरोध का नहीं, मौन के हथियार को अपनाना सही समझा. सोचने लगा, जो तुम नहीं जानते, मैं वह जानता हूं. मैं ने ही तो करवाया था प्रेरणा के मकान के लिए इतना बड़ा लोन सैंक्शन. फिर लोन का इंश्योरैंस कराने के लिए उसे बाध्य भी किया. इस सुरेश पाखंडी ने प्रेरणा को बदले में क्या दिया? आंसू, यातनाएं, उम्रभर आजादी से कलम न उठा पाने की बंदिशें? एक मैं ही था जिसे वह पति के नुकीले शब्दों के कंकड़ों से पड़े दाग दिखा सकती थी. उस की हंसी तक खोखली हो चुकी थी. अकसर वह कहती थी कि उसे अपना घर कभी अपना नहीं लगा.

वह सीखती रही अशांति में भी शांति से जीने की कला. वह खुद पर मुखौटा चढ़ा कर उम्रभर खुद को धोखा देती रही. राहुल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. वह प्रेरणा की लिखनेपढ़ने की जगह देखने को उतावला हो रहा था. अभी तक उसे कोई सुराग नहीं मिला था. कभी बाथरूम इस्तेमाल करने का बहाना कर के दूसरे कमरों में झांक कर देखा, कहीं भी स्टडी टेबल दिखाई नहीं दी. राहुल टटोलता रहा. चाय पीतेपीते जब राहुल से रहा नहीं गया, तो हिम्मत बटोर कर उस ने पूछ ही लिया, ‘‘सर, क्या मैं प्रेरणा का अध्ययन करने का स्थान देख सकता हूं. आई मीन, जहां बैठ कर वह पढ़ालिखा करती थी?’’

‘‘क्यों नहीं,’’ वह व्यंग्यात्मक लहजे में बोला, ‘‘आओ मेरे साथ, वह देखो, सामने,’’ उस ने गार्डन में एक खोके की ओर इशारा किया और फिर बोला, ‘‘वह जो आखिर में कमरा है वही था उस का स्टडीरूम.’’ राहुल भलीभांति जानता था कि जिसे वह कमरा कह रहा है वह कमरा नहीं, 5×8 फुट का लकड़ी का शैड है. मुरगीखाने से भी छोटा. शैड को खोलते ही राहुल का दिमाग चकरी की तरह घूमने लगा. शैड के चारों और मकड़ी के जाले लगे थे. सीलन की गंध पसरी थी. शैड फालतू सामान से भरा था. उस की दीवारों पर फावड़ा, खुरपी, कैंची, फौर्क वगैरह टंगे थे.

एकदो पुराने सूटकेस और पेंट के खाली डब्बे पड़े थे. आधा हिस्सा तो घास काटने वाली मशीन ने ले लिया था, बाकी थोड़ी सी जगह में पुराना लोहे का बुकशैल्फ था, जिस पर शायद प्रेरणा किताबें, पैन, पेपर रखती रही होगी. कुछ मोमबत्तियां और बैट्री वाली हैलोजन की बत्तियां पड़ी थीं. दीवार से टिकी 2 फुट की फोल्डिंग मेज और फोल्डिंग गार्डनकुरसी पड़ी थीं.

एक छोटा सा पोर्टेबल हीटर भी पड़ा था. फर्श पर चूहे व कीड़ेमकोडे़ दौड़ रहे थे. बिजली का वहां कोई प्रबंध नहीं था. हां, एक छोटी सी प्लास्टिक की खिड़की जरूर थी जहां से दिन की रोशनी झांक रही थी. अविश्वसनीय था कि कैसे एक इंसान दूसरे से किस हद तक क्रूर हो सकता है. डरतेडरते राहुल ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘भला बिना बिजली के कैसे लिखती होगी? डर भी तो लगता होगा?’’

‘‘डर, वह सामने 2 कुत्ते देख रहे हो, प्रेरणा के वफादार कुत्ते. उस की किसी चीज को हाथ लगा कर तो देखो, खाने को दौड़ पड़ेंगे.

‘‘प्रेरणा के अंगरक्षक या बौडीगार्ड, जो चाहे कह लो. यह कहावत तो सुनी होगी तुम ने, ‘जहां चाह वहां राह? मेरे सामने उसे लिखने की इजाजत ही कहां थी. मुझे तो बच्चों की मां और मेरी पत्नी चाहिए थी, लेखिका नहीं. मैं नहीं चाहता था मेरे घर में कविताओं के माध्यम से प्रेम का इजहार हो. देखो न, अब बेकार हैं उस की सब किताबें. कौन पढ़ना चाहेगा इन्हें? बच्चे तो पढ़ेंगे नहीं. नौकर से कह कर बक्से में रखना ही है. तुम चाहो तो ले जा सकते हो वरना रद्दी वाला ले जाएगा या फिर मैं गार्डन में लोहड़ी जला दूंगा,’’ उस ने क्रूरता से कहा.

राहुल को लगा उस के कानों में किसी ने किरचियां डाल दी हों. राहुल उसे कह भी क्या सकता था, वह प्रेरणा का पति था. बस, बड़बड़ाता रहा, ‘जा, थोड़ा सा दिल खरीद कर ला, कैसा मर्द है समानता का दर्जा तो क्या, उसे उस के हिसाब से जीने का हक तक न दे सका. तुम क्या जानो कुबेर का खजाना. लेखन का भी एक अनूठा नशा होता है. पत्रिका या किताबों पर अपना नाम देख कर अपने लिखे शब्दों को देख कर जो शब्द धुएं की तरह मन में उठते हैं और हमेशा के लिए कागज पर अंकित हो जाते हैं, दुनिया में कोई और चीज उन से अधिक स्थायी नहीं हो सकती.’

‘‘सर, कुछ किताबें तो रख लेते यादगार के लिए.’’ ‘‘यादगार, बेकार की बातें क्यों करते हो. औरत भी कोई याद रखने की चीज है क्या. हां, प्रेरणा ने 2 बच्चियां जरूर दी हैं, उन के लिए मैं आभारी हूं. जानवर भी घर में रहता है तो उस से मोह हो ही जाता है.’’

राहुल अब वहां पलभर भी रुकना नहीं चाहता था. सोचने लगा, इतनी तौहीन, कठोर शब्दों के बाण. शाबाशी है प्रेरणा को, जो ऐसी बंदिशों व घुटनभरी जिंदगी की रेलपेल से पिस्तेपिस्ते भी अपना काम करती रही. भारी मन से गार्डन से अंदर आतेआते राहुल का पांव हाल में पड़े एक खुले गत्ते के डब्बे से टकराया, जिस में से प्रेरणा का सभी सामान और ट्रौफियां उचकउचक कर झांक रहे थे.

‘‘लगी तो नहीं तुम्हें? मैं तो इन्हें देख कर आपे से बाहर हो जाता हूं. नौकर से कह कर इन्हें बक्से में रखवा दिया है. इन्हें कबाड़ी वाले को धातु के भाव दे दूंगा.’’ उस की हृदयहीन बातें राहुल के हृदय को बींधती रहीं. कितनी आसानी से समेट लिया था सुरेश ने सबकुछ. प्रेरणा की 25 वर्षों की मेहनत के अध्याय को चार दिन में अपने जीवन से निकाल कर फेंक दिया था उस ने. अभी तो उस की राख भी ठंडी नहीं हुई थी, उस का तो नामोनिशान तक मिटा दिया इस बेदर्द ने.

इतनी नफरत, आखिर क्यों? फिर वह मन ही मन ही बड़बड़ाने लगा, ‘हो सकता है प्रेरणा की तरक्की से जलता हो. इस का क्या गया, खोया तो मैं ने है अपना सोलमेट. अब किस से करूंगा मन की बातें. कौन सुनेगा एकदूसरे की कविताएं,’ बहुत रोकतेरोकते भी राहुल की आंखें भर्रा गईं. राहुल की भराई आंखें देख कर सुरेश का चेहरा तमतमा उठा, भौंहों पर बल पड़ गए, माथे की रेखाएं गहरा गईं. उस के स्वर में कसैलापन झलका, वह बोला, ‘‘आई सी, राहुल, कहीं तुम वह तो नहीं हो जिस के साथ वह रात को देरदेर तक बातें करती रहती थी, आई मीन उस के बौयफ्रैंड?’’

इतना सुनते ही राहुल की सांस रुक गई. निगाह ठहर गई. उसे लगा जैसे किसी ने उस के गाल पर तमाचा जड़ दिया हो या फिर पंजा डाल कर उस का दिल चाकचाक कर दिया हो. प्रेरणा तो उस की दोस्त थी, केवल दोस्त जिस में न कोई शर्त, न आडंबर, खालिस अपनेपन की गहनता. प्रेरणा के पास नई राह पर चलने का हौसला नहीं था. उस की खामोशी शब्दों में परिभाषित रहती थी. ऐसी थी वह.

राहुल वहां से भाग जाना चाहता था. वह अपनी खामोश गीली आंखों में चुपचाप प्रेरणा की असहनीय पीड़ा को गले लगाए, उस की कुर्बानियों पर कुर्बान महसूस करता अपने घर को निकलने की तैयारी करने लगा. उसे संतुष्टि थी कि अब प्रेरणा आजाद है. उसे याद आया प्रेरणा अकसर कहा करती थी, ‘भविष्य क्या है, मैं नहीं जानती. इतना जरूर जानती हूं कि सीतासावित्री का जीवन भी इस देश में गायभैंस के जीवन जैसा है, जिन के गले की रस्सी पर उस का कोई अधिकार नहीं.’’ जैसे ही राहुल अपना पैर चौखट के बाहर रखने लगा, उस ने दोनों बक्सों की ओर देखा और सोचा, ‘प्रेरणा की 25 वर्षों की अमूल्य कमाई मैं इस विषैले वातावरण में दोबारा मरने के लिए नहीं छोड़ सकता.’’

राहुल ने प्रेरणा के पति की ओर देखते इशारे से पूछा, ‘‘सर, क्या मैं इन्हें ले जा सकता हूं?’’ ‘‘शौक से, लेकिन इन कुत्तों से इजाजत ले लेना?’’

राहुल ने दोनों बक्सों को छूते हुए, कुत्तों की ओर देखा. कुत्ते पूंछ हिला रहे थे. उस ने बक्से कार में रखे. कुत्ते उस के पीछेपीछे कार तक गए, मानो, कह रहे हों प्रेरणा का घर तो कभी उस का था ही नहीं.

Family Story in Hindi : जिंदगी की तलाश में – कैसे बदला कृष्ण का जीवन

Family Story in Hindi. शाम गहराने लगी थी, मगर बाहर के अंधेरे से घोर अंधेरा कृष्ण के भीतर छाने लगा था. अपने चेहरे को हथेलियों से ढके, आंखें मूंदे उस ने मोबाइल के ईयरफोन कान में ठूंस कर सुनीता की आवाज दबाने की नाकाम कोशिश में अपना सारा ध्यान गाने पर लगा दिया था, ‘जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए…’

गाना खत्म होतेहोते कृष्ण की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली. उस के जी में आया कि वह अपने हालात पर खूब फूटफूट कर रोए… मगर उस से ऐसा नहीं हो सका और अंदर की हूक आंखों से आंसू बन कर बहती रही.

कृष्ण ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की जिंदगी इस मोड़ पर आ कर खड़ी हो जाएगी, जहां वह कहीं का नहीं रहेगा… काश, वह उस नर्स के इश्क में न फंसा होता… काश… उस ने घर वालों की बात मानी होती… काश… उस ने अपने और अपने परिवार के बारे में सोचा होता… काश… काश… काश… मगर अब क्या हो सकता था… जिंदगी इसी काश में उलझ कर रह गई थी.

कृष्ण को अच्छी तरह याद है कि पिता की अचानक हुई मौत के बाद उन की जगह पर उस की नौकरी लगते ही उस के जैसे पंख उग आए थे. जवानी का जोश और मुफ्त में मिली पिताजी की जगह रेलवे की नौकरी के बाद दोस्तीयारी में पैसे उड़ाना, मोटरसाइकिल पर सजसंवर कर इधर से उधर चक्कर काटना, मौका मिलते ही दोस्तों के साथ मौजमस्ती मारना… बस, यही उस का रोज का काम बन गया था. तब न उसे दोनों बहनों के ब्याह की चिंता थी और न विधवा मां की सेहत की फिक्र.

एक दिन दोस्तों के साथ पिकनिक पर भीग जाने पर कृष्ण को बुखार चढ़ गया था. अस्पताल में नर्स से सूई लगवाते हुए उस की नजरों से घायल हो कर कृष्ण उस का दीवाना हो उठा था, जब नर्स ने अपने मदभरे नैनों में ढेर सारा प्यार समेटे हुए पूछा था, ‘‘सूई से डरते तो नहीं हो? आप को सूई लगानी है.’’

कृष्ण उस नर्स की हिरनी सी बड़ीबड़ी आंखों को बस देखता रह गया था. सफेद पोशाक में गोलमटोल चेहरे वाली नर्स की उन आंखों ने जैसे उसे अपने अंदर समा लिया था. उसे लगा था, जैसे खुशबू से सराबोर हवा ने उसे मदहोश कर दिया हो, जैसे पहाड़ों पर घटाएं बरसने को उमड़ पड़ी हों…

नर्स ने बांह ऊंची करने के लिए कृष्ण का हाथ अपने कोमल हाथों में लिया, तो वह कंपकंपा कर बोला था, ‘‘डर तो लगता है, पर आप लगाएंगी तो लगवा लूंगा.’’

इतना कहते हुए नर्स ने शर्ट की बांह ऊपर चढ़ा दी थी. नर्स ने हौले से सूई लगा कर कृष्ण की आंखों में झांकते हुए पूछा था, ‘‘दर्द तो नहीं हुआ?’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं.’’

‘‘आप का नाम क्या है?’’

‘‘कृष्ण.’’

‘‘मतलब कृष्ण कन्हैया हैं आप… गोपियों के कन्हैया…’’ नर्स ने इंजैक्शन की जगह को रुई से रगड़ते हुए मुसकरा कर कहा था.

कृष्ण अपने घर चला आया था. शरीर का बुखार तो अब उतर चुका था, मगर नर्स के इश्क का बुखार उस पर इस कदर हावी हो गया था कि आंखें बंद करते ही नर्स की बड़ीबड़ी हिरनी सी आंखें नजर आती थीं.

बुखार उतरने के बाद भी कृष्ण कई बार अस्पताल के चक्कर लगा आता. नर्स से किसी न किसी बहाने दुआसलाम कर आता. नर्स भी उस से मुसकरा कर बात करती.

उसी दौरान क्रिसमस पर हिम्मत कर कृष्ण ने नर्स को रास्ते में रोक कर ‘मैरी क्रिसमस’ कह कर लाल गुलाबों का गुलदस्ता थमा दिया था. नर्स

ने भी मुसकरा कर उस का तोहफा कबूल कर लिया था.

बस, फिर वे दोनों मिलने लगे थे. प्यार हो चुका था, इजहार हो चुका था. घर में क्या हो रहा है, कृष्ण को कुछ परवाह न थी. वह उस नर्स को मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा कर घूमता… उस के प्यार में झूमता, मस्ताता बस.

उधर ब्याह लायक बहनें कृष्ण के इस आवारापन की हरकतों को देख कर मजबूरन मां को संभालने की खातिर अपना घर बसाने की सोच भी न पाती थीं. अगर उन्होंने ब्याह रचा लिया, तो दिल की मरीज विधवा मां को कौन संभालेगा? बस, इसी एक बड़े सवाल ने उन्हें कुंआरी रहने पर मजबूर कर दिया था. वे दोनों घर में ही ब्यूटीपार्लर खोल कर रोजीरोटी कमाने लगी थीं.

फिर अचानक ही नर्स का तबादला और उसी के चलते ही कृष्ण का घर से और दूर हो जाना… वह कईकई दिन घर से 200 किलोमीटर दूर अपने प्यार के नशे में चूर पड़ा रहता.

और एक दिन जैसे बिजली गिरी थी कृष्ण पर. नर्स के घर का दरवाजा बिना खटखटाए घनघोर घटाओं में भीगता वह अचानक अंदर दाखिल हुआ था, तो सामने का नजारा देख कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी. वह नर्स किसी और मर्द के साथ बिस्तर पर थी.

कृष्ण को यह सब देख कर ऐसा लगा था, जैसे किसी ने उस के दिल में छुरा भोंक दिया हो, जैसे सारा आसमान घूमने लगा हो… उसे लगा था कि वह खून से लथपथ हो कर वीरान रेगिस्तान में अकेला घायल खड़ा हो और तमाम चीलकौए उसे नोंच खाने को उस पर मंडरा रहे हों… कितने वादे… कितनी कसमें खाई थीं… कैसे कहती थी वह नर्स, ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती कृष्ण… मैं मर जाऊंगी, जो तुम मेरे न हुए…’

कृष्ण को लगा था कि जमीन फट जाए और वह उस में समा जाए… जैसे नर्स के क्वार्टर की दीवारें आग से भभक उठी हों, वैसे ही नफरत की आग में भभक उठा था कृष्ण.

कृष्ण नर्स को कुछ कह पाता, उस से पहले ही नर्स ने उस से रूखी आवाज में कहा था, ‘‘बेवकूफ इनसान, तुम को इतना भी नहीं पता कि किसी लड़की के घर का दरवाजा खटखटा कर अंदर आना चाहिए…’’ फिर गुर्राते हुए नफरत भरे अंदाज में उस ने घूरते हुए कृष्ण से कहा था, ‘‘ऐसे घूर कर क्या देख रहे हो मुझे? ये नए डाक्टर साहब हैं. मेरे नए फ्रैंड… अभी एक हफ्ता पहले ही डिस्पैंसरी में पोस्टिंग हुआ है…’’

कृष्ण मुट्ठी भींचे सब सुनता रहा था. जी में आया कि नर्स का गला ही घोंट दे, मगर वह कुछ और कहती, उस से पहले ही वह मुड़ कर मोटरसाइकिल स्टार्ट कर निकल पड़ा था तेज रफ्तार से घर की ओर… जैसे वह जल्दी से जल्दी दूर… बहुत दूर भाग जाना चाहता हो… जैसे नर्स की आवाज उस का पीछा कर रही हो और वह

उसे सुनना नहीं चाहता हो… वह टूट गया था अंदर ही अंदर.

इसी तरह उदासी और तनहाई में दिन रगड़रगड़ कर बीत रहे थे कि एक दिन अचानक ही कृष्ण के कानों में किसी की दिल भेद देने वाली रुलाई सुनाई पड़ी.

‘अरे, यह तो सुनीता के रोने की आवाज है,’ कृष्ण पहचान गया था. सुनीता, उस की पड़ोसन… मजबूर, बेसहारा सी, मगर निहायत ही खूबसूरत, जिसे उस का पति रोज शराब पी कर बिना बात मारता है और वह उस की मार खाती जाती है. आखिर जाए भी तो कहां… उस का इस दुनिया में कोई नहीं… मामा ने मामी की रोजरोज की चिकचिक से तंग आ कर उसे एक बेरोजगार शराबी से ब्याह कर मानो अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली थी.

कृष्ण, जो अपने प्यार में नाकाम हो कर टूट चुका था, न जाने क्यों अचानक ही उठ कर सुनीता के घर की ओर लपका. वह  रोजरोज सुनीता को यों पिटते नहीं देख सकता.

कृष्ण ने दरवाजा खोल कर पिटती सुनीता को हाथ से पकड़ा ही था कि वह उस के सीने से इस कदर लिपट पड़ी, जैसे कोई बच्चा मार के डर से लिपट जाता है.

‘‘बचा लो इस राक्षस से, वरना मुझे यह मार ही डालेगा…’’ सुनीता कृष्ण से लिपट कर फूट पड़ी थी. पता नहीं, कृष्ण के टूटे दिल को सुनीता के यों सीने से लग जाने से कितना सुकून मिला था. उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया था.

‘‘मैं तुम्हें इस तरह पिटता नहीं देख सकता सुनीता…’’

‘‘अबे हट, बड़ा आया सुनीता का आशिक. तू होता कौन है इसे बचाने वाला…?’’ कहते हुए सुनीता के पति ने कृष्ण को जोर का धक्का दे दिया और खुद कमरे में रखी हौकी उठा कर कृष्ण के ऊपर लपका. अगर पड़ोसी न बचाते, तो वह नशे में कृष्ण के सिर पर हौकी दे मारता.

मगर अब सुनीता कृष्ण के सामने आ खड़ी थी उसे बचाने के लिए. सारा महल्ला तमाशा देख रहा था.

सुनीता के पति ने तमाम महल्ले वालों के सामने चीखचीख कर कहा, ‘‘आशिक बनता है इस का… कब से चल रहा है तुम्हारा चक्कर… रख सकता है हमेशा के लिए इसे… चार दिन ऐश करेगा और छोड़ देगा… इतना ही मर्द है तो ले जा हमेशा के लिए और रख ले अपनी बीवी बना कर… मुझे इस की जरूरत भी नहीं…’’

सुनीता और सारा महल्ला खामोश हो कर कृष्ण के जवाब का इंतजार करने लगे. सुनीता उस से लिपटी कांप रही थी. कृष्ण के जवाब के इंतजार में उस का दिल जोरजोर से धड़कने लगा था.

‘‘हां, बना लूंगा अपनी बीवी… एक औरत पर हाथ उठाते, भूखीप्यासी रखते, जुल्म करते शर्म नहीं आती… बड़ा मर्द बनता है… देख, कैसा मारा है इसे…’’ कृष्ण ने जेब से रूमाल निकाल कर सुनीता के होंठों से बहता खून पोंछ दिया.

सुनीता कृष्ण के सीने से लगी आंखों में आंसू लिए बस उसे ही देखती रह गई, जैसे कहना चाह रही हो, ‘मेरे लिए इतना रहम… आखिर क्यों? मैं तो शादीशुदा और एक बच्ची की मां… फिर भी…’

किसी ने पुलिस को भी फोन कर दिया. फिर क्या, पुलिस के सामने ही सुनीता ने कृष्ण को और कृष्ण ने सुनीता को स्वीकार कर लिया. महिला थाने में रिपोर्ट, फिर फैमिली कोर्ट से आसानी से तलाक हो गया.

पता नहीं, कृष्ण ने अपने पहले प्यार को भुलाने के लिए या सुनीता पर इनसानियत के नाते तरस खा कर उसे घर वालों, महल्ले वालों और रिश्तेदारों की परवाह किए बगैर अपना लिया था… फिर किराए का अलग मकान… सुनीता की बेटी का नए स्कूल में दाखिला और लोन पर ली गई नई कार…

शायद अपने पहले प्यार को भुलाने की कोशिश में कृष्ण ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था और सुनीता उसे और उस के द्वारा मुहैया कराए गए ऐशोआराम पा कर निहाल हो गई थी.

उधर, कृष्ण सुनीता की बांहों में पड़ा उस की रेशमी जुल्फों से खेलता और नर्स के साथ बिताए पलों को सुनीता के साथ दोहराने की कोशिश करता. पड़ोस में रहने के चलते शायद सुनीता उस के पहले प्यार के बारे में सबकुछ जानती थी.

कृष्ण को न बूढ़ी मां की चिंता थी, न दोनों बहनों के प्रति फर्ज का भान. हां, कभी सुनीता को उस ने मांबहनों के साथ रहने के लिए दबाव दिया था, तो सुनीता ने दोटूक शब्दों में कह दिया था, ‘‘मैं उस महल्ले में तुम्हारी मांबहनों के साथ कभी नहीं रह सकती. लोग तुम्हारे और नर्स के किस्से छेड़ेंगे, जो मुझ से कभी बरदाश्त नहीं होगा…’’

समय के साथसाथ कृष्ण का अपने पहले प्यार को भुलाने और जोश में आ कर सुनीता को अपनाने की गलतियों का अहसास होने लगा.

सुनीता ऐशोआराम की आदी हो गई. वह कृष्ण के उस पर किए गए उपकार को भी भूल गई और एक लड़के को जन्म देने के बाद तो उस के बरताव में न जाने कैसा बदलाव आया कि कृष्ण अपने किए पर पछताने लगा.

कभीकभार मां के पास रुक जाने, दोस्तयारों के पास देर हो जाने पर सुनीता उसे इतना भलाबुरा कहने लगी कि उस का जी करता उसे जहर ही दे दे. वह अकसर नर्स को ले कर ताना मारने लगी. न समय पर नाश्ता, न समय पर खाना… कृष्ण के लेट घर आने पर खुद खा कर बेटी को ले कर सो जाना उस का स्वभाव बन गया.

सुनीता तो अब नर्स और कृष्ण के पहले प्यार को ले कर ताना मारती रहती थी. ज्यादा कुछ बोलने पर वह दोटूक कह देती थी, ‘‘नर्स ने धोखा दिया तुम्हें इस चक्कर में मुझे अपना लिया, वरना इतने बदनाम आदमी से कौन रचाता ब्याह? मुझे अपना कर कोई अहसान नहीं कर दिया तुम ने… अभी भी मुझे क्या पता कहांकहां जाते हो… किसकिस के साथ गुलछर्रे उड़ाते हो…’’

तब काटो तो खून नहीं वाली हालत हो जाती थी कृष्ण की. वह चीख पड़ता, ‘‘हां… उड़ाता हूं… खूब उड़ाता हूं गुलछर्रे… तेरी इच्छा है तो तू भी उड़ा ले…’’ और निकल जाता कार ले कर दूर जंगलों में.

एक दिन कृष्ण तेज बुखार से तपता जब नजदीकी डिस्पैंसरी में इलाज कराने पहुंचा, तो सन्न रह गया. हाथ

में इंजैक्शन लिए उस की वही नर्स खड़ी थी.

कृष्ण ने उस के हाथ से परची छीन ली. नर्स ने आसपास देखा. दोपहर के डेढ़ बजे का समय था. मरीज जा चुके थे. उस के और कृष्ण के अलावा वहां कोई नहीं था.

नर्स ने कृष्ण के हाथ से दोबारा परची ली और कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं आप के पैर पड़ती हूं. मुझ से बहुत बड़ी भूल हुई, जो मैं ने आप को…’’

बाकी शब्द नर्स के गले में अटक कर रह गए. कान पकड़ कर आंखों में आंसू भरे वह कृष्ण के कदमों में झुक गई.

कृष्ण का गुस्सा नर्स को यों गिड़गिड़ाते देख बुखार की गरमी से जैसे पिघल गया. उस ने बुखार से तपते अपने हाथों से उठाते हुए पहली बार नर्स को उस के नाम से पुकारा, ‘‘बस भी करो मारिया. मैं अब…’’

कहतेकहते रुक गया कृष्ण और अपनी बांहें खोल कर मारिया के सामने कर दीं.

‘‘पास ही स्टाफ क्वार्टर है, मैं उसी में रहती हूं. अभी एक हफ्ता पहले ही ट्रांसफर हुआ है यहां. आप को देखने की कितनी तमन्ना थी… आज पूरी हो गई. प्लीज आना… ए 41 नंबर है र्क्वाटर का,’’ कहते हुए मारिया ने आंसुओं से भरी आंखों से कृष्ण को इंजैक्शन लगा दिया.

घर आ कर कृष्ण निढाल सा पलंग पर पड़ गया. आंखों में मारिया की आंसुओं भरी आंखें और फूल

सा कुम्हलाया चेहरा था. आसमान में बादलों की गड़गड़ाहट के साथ तेज चमकती बिजली थी. कृष्ण पलंग पर आंखें मूंदे यों ही पड़ा रहा और आज के दिन के बारे में सोचता रहा…

सुनीता ने एक बार भी कृष्ण से तबीयत खराब होने के बावजूद खानेपीने, दवा वगैरह के बारे में नहीं पूछा. बस, नए दिलाए हुए मोबाइल फोन से वह चिपकी रही.

आज तीसरा दिन था. बुखार अभी भी महसूस हो रहा था, मगर रविवार के दिन डाक्टर कम ही मिलता है, फिर भी कृष्ण किसी तरह उठा और डिस्पैंसरी की ओर चल दिया. उस की सोच के मुताबिक डाक्टर नहीं आया था. मारिया ही डिस्पैंसरी संभाल रही थी.

कृष्ण को देखते ही मारिया गुलाब के फूल सी खिल उठी, ‘‘ओह कृष्ण… अब कैसा है आप का तबीयत?’’

केरल की होने के चलते मारिया के हिंदी के उच्चारण कुछ बिगड़े हुए होते थे. उस ने कृष्ण की कलाई को अपने नरम हाथों से पकड़ कर नब्ज टटोलने की कोशिश की ही थी कि तभी कृष्ण ने हाथ खींच लिया.

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘अभी तक नाराज हो…’’ कहते हुए मारिया ने कृष्ण को अपनी बांहों में भर लिया. कृष्ण को लगा जैसे वह कोयले की तरह धूधू कर जल उठा हो. जैसे उसे 104 डिगरी बुखार हो गया हो. तभी मारिया ने मौका पा कर अपने पंजों पर खड़े हो उस के होंठों पर अपने धधकते होंठ रख दिए.

मारिया की आंखों में नशा उतरने लगा था. डिस्पैंसरी खाली थी. खाली डिस्पैंसरी के एक खाली कमरे की हवा मारिया की गरम सांसों से गरम हो चली थी.

‘‘कृष्ण, मुझे माफ कर दो. देखो न, आप की मारिया आप से अपने प्यार की भीख मांग रही है. अभी भी वही आग, वही कसक और वही प्यार बाकी है मारिया में… एक बार, सिर्फ एक बार…’’

कृष्ण, जो मारिया का साथ पा कर कुछ पल को अपने होश खो बैठा था, ने मारिया को दूर धकेल दिया और बोला, ‘‘मुझे तुम से घिन आ रही है. तुम प्यार के नाम पर कलंक हो. मैं तुम से प्यार नहीं, बल्कि नफरत करता हूं. मुझे कभी अपनी सूरत भी मत दिखाना…’’

इतना कहता हुआ कृष्ण डिस्पैंसरी से बाहर चला गया था. मारिया ‘धम्म’ से कुरसी पर बैठ गई.

कृष्ण नफरत से भरा भनभनाता सीधे अपने घर की तरफ निकल पड़ा था. उसे लग रहा था जैसे उस के चारों ओर आग जल रही हो, जिस में वह जला जा रहा हो… मारिया ने जैसे उस के अंदर आग भर दी थी… प्यार की नहीं, नफरत की आग. बस, उसी आग में जलता जब घर पहुंचा तो वहां का नजारा देख हैरान रह गया.

घर के दरवाजे पर सुनीता का पहला पति सुनीता का हाथ अपने हाथों में लिए उस से कह रहा था, ‘‘चिंता मत करो, मैं जल्दी आऊंगा…’’ फिर कृष्ण को देख कर वह नजरें झुकाए हुए चुपचाप वहां से खिसक लिया.

कृष्ण ने सुनीता के गाल पर एक करारा तमाचा जड़ दिया और बोला, ‘‘मक्कार… धोखेबाज… बता, कब से चल रहा है यह सब?’’

सुनीता गाल को सहलाते हुए कृष्ण पर चिल्लाई, ‘‘जब से तुम्हारा नर्स के साथ चक्कर चल रहा है. कहां से आ रहे हो? मारिया से मिल कर न? अपने गरीबान में झांक लो, तब मुझे कुछ कहना. वे आएंगे… तुम उन्हें रोक भी नहीं सकते… उन की बेटी मेरे पास है… क्या कर लोगे तुम?’’

कृष्ण को लगा कि वह चक्कर खा कर वहीं गिर पड़ेगा. उस ने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था. इतना बड़ा धोखा.

कृष्ण चल पड़ा था अपने घर की ओर. मांबहनों के पास. टूटे कदम और बोझिल मन लिए. जा कर ‘धम्म’ के पलंग पर पड़ गया था. उसे लगा जैसे वह न घर का रहा न घाट का… न मांबहनों का हो पाया और न मारिया या सुनीता का… आखिर उसे उस के भटकने की सजा जो मिल गई थी.

कृष्ण की आंखों में आंसू थे. सुनीता की गूंजती आवाज दबाने के लिए उस ने मोबाइल फोन के ईयरफोन कानों में ठूंस लिए थे, ‘जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए… जब ये सोचा तो घबरा गए… आ गए, हम कहां आ गए…’ Family Story in Hindi

Humour : एक शाम थाने के नाम

Humour. एक लंबी सांस लेने के बाद प्रभु दयाल अपने घर की ओर जा रहा था कि उस ने देखा कि लालबत्ती के पास कुछ लोग जमा हो रहे हैं.

माजरा क्या है, यह जानने के लिए जब वह उन लोगों के पास पहुंचा तो पता चला कि जेब काटने के दौरान मिले माल के बंटवारे को ले कर 2 जेबकतरे आपस में झगड़ रहे थे.

तभी गश्त पर निकले 2 पुलिस वाले मोटरसाइकिल पर वहां आ धमके. होशियार लोग तो वहां से खिसक गए, लेकिन प्रभु दयाल पुलिस वालों के हत्थे चढ़ गया.

एक पुलिस वाला प्रभु दयाल की कलाई जोर से पकड़ कर बोला, ‘‘चल, थाने चल. चौकचौराहे पर झगड़ाफसाद करता है, दंगा करता है…’’

घबराया हुआ प्रभु दयाल घिघियाते हुए बोला, ‘‘अरे भाई साहब, मैं शरीफ आदमी हूं. मैं ने कुछ नहीं किया है. मुझे क्यों पकड़ रहे हैं? दंगा करने वाले बदमाश तो भाग गए.’’

दूसरा पुलिस वाला थोड़ा अकड़ कर बोला, ‘‘थाने चल, वहीं तुझे सब बताएंगे.’’

चौकचौराहे पर पुलिस के डंडे खाने के बजाय प्रभु दयाल ने थाने चलने में ही भलाई समझी.

थाने में प्रभु दयाल को जिस सबइंस्पैक्टर के सामने पेश किया गया, वह पहले से ही थाने लाए गए कुछ लोगों से निबटने में लगा था.

सबइंस्पैक्टर एक नौजवान को डांट रहा था, ‘‘देखो, तुम ने सरकारी जमीन को घेर कर रेहड़ी लगा रखी है. तुम्हारी अच्छी आमदनी होती है, तो फिर बीट कांस्टेबल से झगड़ा क्यों करते हो?

‘‘आपसी तालमेल से सब ठीकठाक चलता रहेगा. बीट कांस्टेबल जो कहता है मान लो, अकेले सब हजम करना तो ठीक नहीं है.’’

वह नौजवान घिघियाता हुआ बोला, ‘‘साहबजी, कोई नौकरी न मिलने पर ही यह काम शुरू किया था.

‘‘देखने से ही ऐसा लगता है कि हमें खूब कमाई हो रही है, पर हकीकत में ऐसा नहीं है. पुलिस वाले हर महीने पैसे बढ़ा कर लेना चाहते हैं. बताइए, उन को हम कैसे खुश रखें? आप मालिक हैं, हमें इंसाफ दीजिए.’’

सबइंस्पैक्टर पानी के साथ दवा की गोली गटकते हुए बोला, ‘‘हम फुजूल में किसी को तंग नहीं करना चाहते. तुम थोड़े कहे को ही ज्यादा समझो. बीट अफसर को खुश रखो. अब भाग लो यहां से. आगे से कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए. पानी में रह कर मगर से बैर न पालो.’’

अब अगला नंबर एक एसटीडी बूथ चलाने वाले का था. सबइंस्पैक्टर उस आदमी से बोला, ‘‘लालाजी, तय रेट से ज्यादा पैसा वसूल रहे हो. बहुत बड़ा जुर्म है यह. जेल में चक्की पीसनी पड़ेगी. तुम्हारे खिलाफ जो शिकायतें आई हैं, उन का निबटारा कर लो, नहीं तो तुम्हारे साथ बुरा हो सकता है. समझ गए न?’’

अब अगला नंबर प्रभु दयाल का था. सबइंस्पैक्टर प्रभु दयाल को घूरते हुए बोला, ‘‘आंखों पर चश्मा, जेब में पैन. तुम तो काफी पढ़ेलिखे लगते हो, फिर भी चौकचौराहे पर दंगा क्यों कर रहे थे? सबकुछ खुद ही बता दो. मेरा गुस्सा बहुत बुरा है. तुम मुझे गुस्सा मत दिलाना, नहीं तो बड़ी मार खाओगे.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘गुस्सा आप की सेहत के लिए अच्छा नहीं है साहब. हाई ब्लड प्रैशर के मरीज को तो गुस्से से हमेशा दूर ही रहना चाहिए.’’

सबइंस्पैक्टर हैरान हो कर बोला, ‘‘तुम्हें कैसे पता है कि मैं हाई ब्लड प्रैशर का मरीज हूं? यह तो कमाल है.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘साहबजी, यह तो छोटी सी बात है. मुझे तो यह भी मालूम है कि कुछ देर पहले आप कोर्ट में पेश होने वाले बदमाशों की फाइल की लिखापढ़ी में लगे थे. मैं ठीक कह रहा हूं न?’’

सबइंस्पैक्टर को लगा जैसे उस के सामने एक ऐसा आदमी खड़ा है, जो दीवारों के आरपार देख सकता है.

लोहा गरम देख प्रभु दयाल ने एक और चोट की, ‘‘साहबजी, मुझे तो यह भी पता?है कि आज आप ने चावल और रोटी के साथ कौन सी सब्जी खाई है. आज आप ने लंच में कद्दू की सब्जी खाई है. ठीक कहा न?’’

सबइंस्पैक्टर को ऐसा लग रहा था, जैसे उस की कुरसी के नीचे से जमीन खिसक रही है. ऐसे सच्चे भविष्य बताने वाले से तो उस का जिंदगी में कभी सामना ही नहीं हुआ था.

सबइंस्पैक्टर प्रभु दयाल के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘आप तो सबकुछ जानते हैं. मैं और मेरे बीवीबच्चों के बारे में भी कुछ बताइए. मैं खुशकिस्मत हूं कि आप जैसे बड़े लोगों के दर्शन हो गए.

‘‘यहां पास ही में मेरा फ्लैट है. क्या आप मेरे घर चल कर कुछ चायनाश्ता करेंगे? इसी बहाने ही सही, आप के साथ मिलनेबैठने का मौका मिल जाएगा.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘फिर किसी दिन सही. आज बस इतना ही.’’

सबइंस्पैक्टर जैसे ही प्रभु दयाल के पैर छूने को आगे बढ़ा, प्रभु दयाल दूर हटते हुए बोला, ‘‘अजी साहब, ऐसा गजब मत कीजिए. अभी तो मैं अपने घर लौटना चाहूंगा, फिर किसी दिन फुरसत से आऊंगा.’’

सबइंस्पैक्टर गरजा, ‘‘मुबारक सिंह, भाई साहब को थाने की जीप में घर छोड़ कर आओ.

‘‘और हां, रास्ते में भोलू हलवाई की दुकान से साहब के बच्चों के लिए 5 किलो देशी घी के गुलाब जामुन दिलवा देना.’’

उधर महल्ले वाले प्रभु दयाल को थाने की जीप से उतरते व पुलिस द्वारा अदब से सलाम मारते देख हैरान थे. कुछ नौजवान भी वहां खड़े थे. उन में से एक ने कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘हमें तो पहले से ही शक था कि अपने में मस्त रहने वाला हमारा यह पड़ोसी प्रभु दयाल बड़ी ऊंची चीज है. थाने की जीप में आया है.’’

इधर, सारी बातें जानने के बाद प्रभु दयाल की बीवी हैरान हो कर पूछ रही थी, ‘‘शेर के मुंह में जाने के बाद भी आप सहीसलामत वापस कैसे आ गए? और साथ में देशी घी के गुलाब जामुन भी ले आए. कैसे हुआ यह चमत्कार? आप को तो ज्योतिष के बारे में कुछ भी नहीं आता, फिर वहां आप भविष्य बताने वाले कैसे बन गए?’’

प्रभु दयाल थोड़ा मुसकरा कर बोला, ‘‘अगर ज्योतिष के द्वारा कुछ बताया जा सकता, तो वाजपेयीजी समय से पहले चुनाव करा कर गद्दी नहीं खोते. ओसामा बिन लादेन कहां छिपा है, यह कब का पता लग गया होता. ज्योतिष के नाम पर जो बातें मैं ने सबइंस्पैक्टर को बताई थीं, वे तो कोई भी बता सकता था…’’

प्रभु दयाल ने राज खोला, ‘‘मैं ने देखा था कि पानी मंगा कर सबइंस्पैक्टर ने एनवास-10 की गोली गटकी थी. इस का मतलब यही था कि वह हाई ब्लड प्रैशर का मरीज है.

‘‘लिखते हुए शायद रिफिल लीक कर गई थी, जिस से उस की उंगली में स्याही लगी थी. इस से साफ जाहिर था कि उस ने थोड़ी देर पहले लिखाई का काम किया है.

‘‘उस की मूंछों में कद्दू की सब्जी का एक छोटा टुकड़ा फंसा हुआ था यानी दोपहर को उस ने कद्दू की सब्जी खाई थी.

‘‘मैं बेकुसूर था और बेमतलब ही फंसाया जा रहा था, सो बचने के लिए ही सबइंस्पैक्टर के सामने मैं ने कुछ बातें हवा में उछाल दी थीं. मेरे बुरे समय पर हाजिरजवाब होने की नीति काम कर गई थी.

‘‘मैं ने उन से एक बार भी नहीं कहा कि मैं कोई पहुंचा हुआ पीरपंडित या भविष्य बताने वाला हूं. अब वह अपनी समझ से खुद ही यह मानने लगा था कि मैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिषी हूं, तो उस हालत में मैं क्या कर सकता था? अंधविश्वासी लोग अकसर अपने जाल में खुद ही फंस जाते हैं.’’

प्रभु दयाल की बीवी बोली, ‘‘आप ने तो कहीं भी कोई गलतबयानी नहीं की. दूसरों की मेहनत की कमाई और हक पर हिस्सापत्ती चाहने वाले ऐसे लोगों को तो सेर का कोई सवा सेर मिलते ही रहना चाहिए.’’

फिर पत्नी अपने बड़े बेटे को बुला कर बोली, ‘‘बेटा, गुलाब जामुन की यह हांड़ी गरीबों में दे आ. कहीं इस धौंसपट्टी की कमाई को खाने से हमारे बच्चों पर भी बुरा असर न पड़ जाए.’’ Humour

Hindi Emotional Story : टेढ़ी चाल

Hindi Emotional Story. शौचालय से आ कर हाथ धोते हुए संगीता ने पूछा, ‘‘कौन आया था अभी? घंटी किस ने बजाई थी?’’

सुमन ने समाचारपत्र में आंखें गड़ाते हुए कहा, ‘‘कोई नहीं, रामप्रसाद आया था.’’

‘‘रामप्रसाद?’’ संगीता के स्वर में कटुता थी, ‘‘तो इस में छिपाने की क्या बात है? जरूर रुपए मांगने आया होगा. उस के जैसा भिखमंगा कोई नहीं देखा. कितने रुपए दिए?’’

‘‘अरे, कहा न, न मांगे, न मैं ने दिए,’’ सुमन के स्वर में एक लापरवाही सी थी.

‘‘मैं मान ही नहीं सकती. अरे, मेरा क्या, तुम सब रुपए लुटा दो,’’ संगीता ने क्रोध से कहा, ‘‘पर अपनी गृहस्थी का भी तो खयाल करो. बताओ न, कितने रुपए दिए?’’

तिलमिला कर सुमन ने कहा, ‘‘तुम हमेशा उल्टा क्यों सोचती हो? वह सिर्फ यह कहने आया था  कि उस के यहां आज सत्यनारायण की कथा है. निमंत्रण दिया था. मुझे तो इन ऊटपटांग बातों से चिढ़ है, इसलिए मैं ने टाल दिया.’’

‘‘मैं कहती थी न, रामप्रसाद यों ही नहीं आने का. तुम इन बातों को मानो या न मानो, पर उस ने तो कथा के नाम से पैसे जरूर मांगे होंगे,’’ संगीता बोली.

झींकते हुए सुमन ने कहा, ‘‘अगर मांगता भी तो क्या इन फालतू कामों के लिए दे देता?’’

‘‘तो देख लेना,’’ संगीता ने चेतावनी दी, ‘‘अगर अभी नहीं ले गया तो अब किसी न किसी बहाने आता ही होगा. आखिर प्रसाद भी तो बनाना होगा, पैसे कम पड़ गए होंगे,’’ संगीता ने नकल की.

सुमन ने क्रोध से कहा, ‘‘भलीमानस, अब आए तो तुम ही दरवाजा खोलना और तुम   ही उस से निबट लेना. मेरा दिमाग मत खराब करो. अगर हो सके तो एक प्याली चाय बना दो. कब से बैठा इंतजार कर रहा हूं.’’

‘‘छि, एक प्याली चाय भी नहीं बना सकते? बड़े तीसमारखां बनते हैं कि दफ्तर में यह करता हूं, दफ्तर में वह करता हूं.’’

सुमन ने चिढ़ कर कहा, ‘‘दफ्तर में तुम्हारे जैसे 50 चपरासी हैं यह सब काम करने के लिए.’’

रसोई में से आवाज आई, ‘‘क्या कहा? सुनाई नहीं दिया.’’

सुमन ने दोहराना ठीक नहीं समझा. इतवार का दिन था. सारा दिन बरबाद करने से क्या लाभ? फिर कहा, ‘‘जल्दी ले आओ चाय, तलब लग रही है.’’

सुमन की आदत कुछ ऐसी है कि वह समयअसमय असुविधा होते हुए भी किसी के सहायता मांगने पर कभी न नहीं करता. रुपए के मामले में तो सदा नुकसान ही उठाना पड़ता है.

थोड़े से रुपए दे कर तो वह भूल ही जाता है. संगीता उस के इस स्वभाव से तंग है. सदा खीजती ही रहती है.

उस का एक ही प्रश्न होता है, ‘‘क्या फायदा आलतूफालतू लोगों का काम करने से? बदले में क्या कभी कुछ   मिलता है?’’

‘‘तो क्या हमेशा बदले में कुछ पाने की आशा से ही कुछ करना चाहिए?

निस्वार्थ सेवा में जो आनंद है वह स्वार्थ में कहां?’’

‘‘धरे रहो अपनी निस्वार्थ सेवा,’’ संगीता तुनक कर कहती, ‘‘मरे, काम निकलने के बाद कभी झांकते तक नहीं.’’

‘‘यह अपने मन की बात है,’’ सुमन बोला.

वैसे वह संगीता से इतने असहयोग की आशा नहीं करता था. आरंभ में वह काफी प्रसन्न दिखाई देती थी, पर अब तो वह जलन और कुढ़न का भी शिकार हो गई है. बातबात पर चिढ़ती रहती है.

कुछ ही महीने पहले की बात है कि किसी के यहां दावत पर दफ्तर के सहयोगी प्रेमचंद और उस की पत्नी करुणा से भेंट हुई थी. करुणा एक स्कूल में पढ़ाती थी. बातों ही बातों में पता लगा कि सुमन को कागज के कई प्रकार के फूल बनाने आते हैं. करुणा ने सोचा कि अगर वह यह कला सीख लेगी तो बच्चों को भी सिखा सकेगी. उस ने सुमन से पूछा कि क्या वह उस के घर यह कला सीखने आ सकती है. सुमन को क्या आपत्ति हो सकती थी?

संगीता को अच्छा नहीं लगा कि करुणा इस तरह खुलेआम बेखौफ हो कर उस के पति से बात करे. इस पर तुर्रा यह कि बिना उस से पूछे सुमन ने उसे घर आने का खुला निमंत्रण भी दे दिया. इस बात पर घर में आ कर उस ने खूब लड़ाई की.

जब करुणा आई तो वह बेमन से बैठी रही. प्रेमचंद ने हंस कर उस का मन बहलाने का प्रयत्न किया, पर उस के चेहरे की सख्ती छिपी न रही.

सुमन ने करुणा को थोड़ाबहुत फूल बनाना बताया और देर हो जाने के कारण फिर आने का निमंत्रण दे दिया. उसे कोई काम अधूरा करना अच्छा नहीं लगता था.

उन के जाने के बाद संगीता फूट पड़ी, ‘‘मैं पहले से कहे देती हूं कि अब ये लोग यहां नहीं आएंगे. सारे काम छोड़ कर मरी को बस कागज के फूल बनाने ही सूझे.’’

‘‘ओहो, तो हमारा कौन सा नुकसान हो गया? अरे, जो आता था सो बता दिया. उस का भला हो गया. बच्चों को स्कूल में सिखाएगी. इस से कला का और विस्तार होगा,’’ सुमन ने कहा.

‘‘किसी व्यावसायिक स्कूल में जा कर सीखती तो गांठ से पैसे जो खर्च करने पड़ते. यहां तो मुफ्त में ही काम निकल गया. चायनाश्ता भी मिल गया.’’

‘‘तुम तो बेकार में झगड़ती हो. इस में चायपानी भी जोड़ दिया.’’

‘‘अपनेआप बनानी पड़े तो जानो. वैसे मैं ने कह दिया है कि अब वह इस घर में नहीं आएगी.’’

‘‘अब कल तो आएगी ही. उस के बाद मना कर दूंगा.’’

‘‘कल भी नहीं. मैं दरवाजा ही नहीं खोलूंगी.’’

‘‘दरवाजा मैं खोल दूंगा. तुम कष्ट मत करना,’’ सुमन ने हंसते हुए कहा.

‘‘क्यों, क्या वह तुम्हारी कुछ लगती है?’’ सुमन की हंसी से आहत हो कर संगीता ने व्यंग्य किया.

‘‘तुम तो पागल हो,’’ सुमन क्रोध से बोला और मेज पर से पत्रिका उठा कर पन्ने पलटने लगा.

अंत में घर में शांति बनाए रखने के प्रयास में दूसरे दिन सुमन को प्रेमचंद से कहना पड़ा कि संगीता की तबीयत ठीक नहीं. वह स्वयं किसी दिन आ कर करुणा को बाकी के फूल बनाना सिखा देगा.

दरवाजे पर घंटी बजी तो सुमन की तंद्रा टूटी. उठ कर देखा तो प्रेमदयाल खड़ा था. पड़ोसी था. हाथ में एक थैला था. देख कर मुसकराया.

‘‘आओ, आओ, प्रेमदयाल, कैसे आए?’’

अंदर आ कर बैठते हुए प्रेमदयाल ने कहा, ‘‘अपने बगीचे में इस बार अच्छे पपीते हुए हैं. एक पपीता ले कर आया हूं.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा किया. बहुत दिनों से मन भी कर रहा था पपीता खाने को,’’ सुमन ने हंस कर कहा.

पपीता हाथ में ले कर देखा, ‘‘सच ही बहुत अच्छा लग रहा है. काफी मेहनत करते हो.’’

‘‘अच्छा तो चलता हूं.’’

‘‘अरे, ऐसे कैसे? बैठो, एक प्याला चाय पी कर जाना. मैं भी सोच रहा था कि कोई आए तो चाय पीने का बहाना मिले.’’

अंदर आ कर मुसकरा कर पपीता संगीता को दिखा कर रखते हुए कहा, ‘‘जल्दी से चाय तो बना दो. प्रेमदयाल आया है.’’

‘‘वह तो देख रही हूं. महीने भर से सूरत नहीं दिखाई. आज पपीता लाया है तो जरूर कोई मतलब होगा.’’

‘‘क्यों, क्या बिना मतलब पपीता नहीं ला सकता?’’

‘‘सब हमारी तरह मूर्ख नहीं होते. देख लेना, अभी कोई काम बताएगा.’’

‘‘छोड़ो भी, कहां का खटराग ले बैठीं. झटपट चाय बना दो.’’

संगीता ने मुंह बनाते हुए चाय बनाने के लिए गैस पर पानी का पतीला रख दिया. चाय पीने के बाद प्रेमदयाल ने बाहर जाते हुए दरवाजे पर ठिठक कर कहा, ‘‘हां, एक बात कहना तो मैं भूल ही गया था. मुन्ना आएगा आप के पास. आप का कुछ समय लेगा.’’

‘‘अरे, तो इस में कहनेपूछने की क्या बात है? कभी भी आ जाए. उस का घर है. मैं नहीं होऊंगा तो संगीता होगी यहां.’’

‘‘नहीं, मेरा मतलब है उसे आप से कुछ पढ़ना है. परीक्षा सिर पर है. कल ढेर सारी समस्याएं सामने रख दीं उस ने. अब हम तो इतना पढ़ेलिखे हैं नहीं. जो कुछ पढ़ा था वह भी भूल गए. कुछ मदद कर देना उस की.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं. भेज देना,’’ सुमन ने कहा.

सुमन मन ही मन सोच रहा था कि संगीता को बताए या नहीं. पर पत्नी के कान तो बाहर ही लगे हुए थे.

‘‘कहा नहीं था मैं ने कि बिना मतलब के प्रेमदयाल कभी सूरत नहीं दिखाएगा, पिछले साल के 4 अमरूद क्या भूल गए?’’

‘‘ओहो, अब बच्चे को अगर कुछ समझा दूंगा तो मेरा क्या घिस जाएगा? इस तरह कभीकभी पढ़ता रहा तो कभी अपने बच्चों के काम आएगा,’’ सुमन ने हंस कर कहा.

संगीता ने क्रोध से कहा, ‘‘चलो हटो, मुझे यह ठिठोली अच्छी नहीं लगती. यहां आ कर घंटों सिर खपाता रहेगा. कहां मिलेगा मुफ्त का मास्टर? एक पपीता दे कर 500 रुपए बचा लिए.’’

‘‘लो, फिर हिसाबकिताब में उलझ गईं, अच्छा बताओ, क्या सब्जी लानी है?’’

सुमन ने बाहर पैर रखा ही था कि निरंजन ने आ कर हाथ पकड़ लिया, ‘‘तो मिल ही गए. मैं तो डर रहा था कि कहीं चले न गए हो.’’

‘‘क्या बात है? घबरा क्यों रहे हो?’’

‘‘पप्पू को कुत्ते ने काट लिया है. वैसे तो कुत्ता पालतू है, पर उस के इंजेक्शन तो लगवाने ही पड़ेंगे. जरा स्कूटर निकालो तो उसे अस्पताल ले चलें.’’

‘‘ठीक है, तुम चलो, मैं अभी आता हूं.’’

‘‘बड़ी मेहरबानी होगी.’’

‘‘बस, मुझे तुम्हारी यही बात अच्छी नहीं लगती. ऐसा कह कर शर्मिंदा मत करो.’’

सुमन स्कूटर की चाबी लेने घर में आया.

‘‘क्यों, क्या हो गया? थैला तो हाथ में है और रुपए भी मैं ने दे दिए थे?’’ संगीता ने संदेह से पूछा.

‘‘अरे, यह निरंजन है न, बाहर मिल गया. उस के बच्चे को कुत्ते ने काट लिया है. उसे अस्पताल पहुंचाना है.’’

संगीता ने भड़क कर कहा, ‘‘तो क्या शहर में स्कूटर और टैक्सी वालों ने हड़ताल कर दी है? लेकिन जब मुफ्त में सवारी मिलती हो तो कौन भाड़ा देना पसंद करता है?’’

‘‘इनसान को जो सहारा मिल जाए उस का ही तो आसरा लेगा. अभी आता हूं. ज्यादा देर नहीं लगेगी.’’

‘‘सब्जी नहीं होगी तो खाना नहीं बनेगा. उसी निरंजन से कह देना, होटल से कुछ ले कर बंधवा देगा. स्कूटर के 5 रुपए भी खर्च नहीं कर सकता.’’

‘‘तुम तब तक दालचावल चढ़ाओ, मैं लौट कर आता हूं.’’

‘‘मैं क्या जानती नहीं उस कंजूस को? वहां 2 घंटे खड़ा रखेगा और फिर वापस भी तुम्हारे साथ आएगा. 4 महीने हुए तब मैं ने कहा था कि दौरे पर हर महीने हैदराबाद जाते हो, मेरे लिए मोतियों की माला ले आना. उस दिन से आज तक सूरत नहीं दिखाई.’’

‘‘अब क्या कहूं, संगीता, तुम्हारी तो उल्टा सोचने की आदत है. अब उसे क्या परेशानी है, हमें क्या मालूम? एक बार रुपए दे कर देखतीं कि लाता है या नहीं.’’

‘‘भली चलाई. माला के तो दर्शन दूर रुपए भी हाथ से जाते. मैं कहे देती हूं कि उसे अस्पताल छोड़ कर चले आना, नहीं तो मैं ताला लगा कर चली जाऊंगी.’’

‘‘अच्छा, बाबा, अभी आता हूं,’’ सुमन झट से चाबी ले कर चला गया.

सब्जी ला कर आराम से बैठ कर सुमन ने पत्नी के कंधे पर हलके से थपथपाते हुए कहा, ‘‘अब एक प्याला चाय हो जाए तो कहूं कि धरती पर अगर सर्वोत्तम स्थान है तो बस यहीं है, यहीं है, यहीं है.’’

संगीता ने कर्कश स्वर में कहा, ‘‘मुझे नहीं अच्छी लगती यह खुशामद. अपनेआप बना लो.’’

‘‘किसी ने ठीक ही कहा है कि क्रोध में औरत की खूबसूरती दोगुनी हो जाती है. अब तुम मुझे दोगुनी सुंदर ही अच्छी लगती हो. अगर कहीं चौगुनी या आठगुनी सुंदर हो गईं तो भला मैं कहां बरदाश्त कर पाऊंगा? अब बना दोगी चाय तो तुम्हारे गुण गाऊंगा, नहीं तो… ’’

‘‘नहीं तो क्या?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘नहीं तो क्या, नीचे हिदायतुल्ला के ढाबे में जा कर पी लूंगा.’’

‘‘क्यों, ढाबे में क्यों जाओगे?’’ संगीता ने बिगड़ कर कहा, ‘‘निरंजन के जाओ, प्रेमदयाल के जाओ, उस के… उस के… करुणा के यहां जाओ. बढि़या खुशबूदार चाय मिलेगी.’’

गहरी आह भरते हुए सुमन ने कहा, ‘‘बस, मजा ही किरकिरा कर दिया. क्या तीर मारा है.’’

दूसरे ही दिन संगीता को पत्र मिला कि उस के छोटे भाईबहन कालिज की छुट्टियों में उस के पास कुछ दिनों के लिए आने वाले हैं. संगीता बहुत प्रसन्न थी. उस ने बाजार से सामान लाने के लिए एक बड़ी सूची बना ली. सुमन के दफ्तर से आने की प्रतीक्षा कर रही थी.

सुमन ने जल्दी आने का वादा किया था. उस का मन खराब न हो, इसलिए गैस पर पानी चढ़ा दिया था ताकि सुमन के आते ही उसे एक प्याला चाय प्रस्तुत की जा सके.

‘‘लगता है तुम्हारी शादी हुए एक महीना भी नहीं हुआ. क्या जंच रही हो. लगता है, आज बाजार जाना नहीं होगा,’’ सुमन ने शरारत से कहा.

‘‘क्या मतलब?’’ संगीता ने शरमाते हुए कहा.

‘‘अरे, मैं ठहरा मामूली इनसान. एक ही काम कर सकता हूं. या तो तुम्हारे साथ सामान खरीदने चलूं या तुम्हें लोगों की नजरों से बचाता फिरूं.’’

‘‘यह लो चाबी और उठो. ज्यादा बातें मत बनाओ,’’ संगीता पर्स उठा कर बाहर आ गई.

पता नहीं कैसे भूल हो गई कि जैसे ही सुमन ने किक मार कर स्कूटर चलाया तो गीयर न्यूट्रल में न होने से झटके से आगे भाग पड़ा. हैंडल हाथ से छूट गया और सुमन व स्कूटर दोनों गिर पड़े. नीचे नुकीले पत्थर पड़े थे. सुमन का सिर टकरा गया और वह अचेत हो गया. उस के शरीर से रक्त बहने लगा.

संगीता अवाक् रह गई. यह क्या हो गया? जब उसे होश आया तो चिल्लाने और रोने लगी. भीड़ इकट्ठी हो गई. सब अपनीअपनी राय दे रहे थे, पर कोई कुछ कर नहीं रहा था. तभी भीड़ को चीरता हुआ रामप्रसाद आया, ‘‘क्या हुआ, भाभी? अरे, सुमन बाबू को चोट आ गई? आप चिंता मत कीजिए. आप घर जाइए, मैं संभालता हूं.’’

रामप्रसाद ने लोगों की मदद से एक टैक्सी रोक कर सुमन को उस में लिटाया और जानपहचान के एक लड़के से स्कूटर घर में रखने को कह कर सुमन को अस्पताल ले गया. संगीता के आंसू नहीं रुक रहे थे. पासपड़ोस की कुछ स्त्रियां आ कर उसे सांत्वना दे रही थीं.

लगभग 1 घंटे के बाद प्रेमदयाल ने आ कर कहा, ‘‘चिंता की कोई बात नहीं है. अधिक चोट नहीं आई है. हैलमेट होने से बच गए, नहीं तो पता नहीं क्या हो जाता.’’

‘‘कब आएंगे?’’ संगीता ने आतुरता से पूछा.

‘‘अब कुछ दिन तो अस्पताल में रहना पड़ेगा. मरहमपट्टी हो गई है. इंजेक्शन भी लगा दिए गए हैं. अभी तो सो रहे हैं. यह देखने के लिए कि अंदरूनी चोट तो नहीं है एक्सरे करने पड़ेंगे. वैसे डाक्टर ने कहा है कि जैसी हालत है उस से लगता है कि घबराने की कोई बात नहीं है.’’

‘‘मैं चलूंगी उन के पास.’’

‘‘क्यों नहीं. अरे, आप को ही तो लेने आया हूं. एक बार आंख खुली थी तो आप को पूछ रहे थे. मुझ से कहा कि आप को साथ ले जा कर सामान ले आऊं.’’

संगीता बोली, ‘‘कोई बात नहीं. सामान फिर आ जाएगा. आप मुझे ले चलिए.’’

टैक्सी में बिठा कर प्रेमदयाल संगीता को अस्पताल ले आया. जैसे ही पैसे देने को संगीता ने पर्स खोला, प्रेमदयाल ने रोक दिया, ‘‘कभी तो हमें भी सेवा करने का मौका दीजिए.’’

संगीता चुप हो गई और आतुरता से प्रेमदयाल के साथ सुमन के कमरे में पहुंची. सुमन सो रहा था. नींद के इंजेक्शन लगे थे. एक ही स्टूल था. प्रेमदयाल ने संगीता के लिए आगे कर दिया.

पास ही निरंजन और रामप्रसाद भी खड़े थे. कुछ और लोग भी थे जिन्हें संगीता नहीं जानती थी.

निरंजन ने कहा, ‘‘चिंता की कोई बात नहीं. हम सब लोग हैं. आप बिलकुल आराम से बैठिए. डाक्टर थोड़ी देर में आएंगे.’’

संगीता ने अवरुद्ध कंठ से कहा, ‘‘खाने का क्या होगा? कुछ बताया डाक्टर ने? मैं घर से बना कर ले आऊंगी.’’

‘‘अब आप कहां जा सकती हैं?’’ प्रेमदयाल ने मुसकरा कर कहा, ‘‘आप तो बस, इन की देखभाल कीजिए. खाने  के लिए मैं ने घर खबर पहुंचा दी है. आप का खाना भी आ जाएगा.’’

‘‘पर इतना कष्ट करने की क्या आवश्यकता थी?’’ संगीता ने औपचारिक रूप से पूछा.

‘‘भाभीजी, कष्ट में जो आनंद है वह आनंद में कहां? कभी किसी के काम आएं इसी में प्रसन्नता है. पर वैसे ऐसा अवसर कभी न आए, बस, यही इच्छा है.’’

संगीता चुप हो गई. रात को वह वहीं सो गई.

प्रेमदयाल, निरंजन और रामप्रसाद काफी देर तक रहे. फिर सुबह आने को कह कर चले गए.

सुबह 8 बजे करुणा और प्रेमचंद भी आए. दोनों के हाथों में फलों के थैले थे. ‘‘हमें तो रात में देरी से पता चला. बहुत देर हो गई थी, इसलिए नहीं आ सके. अब कैसी तबीयत है?’’ करुणा ने कहा.

‘‘अब उठने पर पता चलेगा. वैसे डाक्टर ने कहा है कि घबराने की कोई बात नहीं है. एक्सरे वगैरह ले लिए हैं.’’

तभी सुमन ने आंखें खोलीं. चारों ओर देखा और फिर संगीता को देख कर मुसकराया, ‘‘आज शाम तक मैं चलने लायक हो जाऊंगा. आज सामान लाने चलेंगे, पर कपड़े जरा हलके पहनना.’’

‘‘छि,’’ संगीता ने शरमा कर कहा.

‘‘क्या हुआ?’’ करुणा ने पूछा, ‘‘जरा हम भी तो सुनें?’’

‘‘कुछ नहीं, यों ही बड़बड़ा रहे हैं.’’

उन के जाने के बाद सुमन ने पूछा, ‘‘यहां कौन लाया था?’’

‘‘रामप्रसाद.’’

‘‘उसे टैक्सी के पैसे देने होंगे. लोगों का खाने का भी उधार हो गया. समझ में नहीं आता कि यह सब एहसान कैसे चुकाऊंगा,’’ सुमन ने कहा.

सुमन के होंठों पर हाथ रखते हुए संगीता ने कहा, ‘‘बसबस, अब कुछ कहने की जरूरत नहीं है. मुझे सबक मिल गया है.’’ Hindi Emotional Story

Humour :ठोको ताली- शिल्पा ने कैसे सिखाया अनूप और सीमा को सबक?

Humour :

“शिल्पा आज अनूप का फोन आया था.”

“ओफ्फो!! फिर से…”

“अरे! परेशान होने की बात नहीं मैंने कह दिया हम दो दिन के लिए बाहर जा रहे हैं.”

“हम इस तरह कब तक मुंह चुराएंगे, कुछ ऐसा करना पड़ेगा कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.”
अनूप शिल्पा के छोटे भाई का दोस्त है. इसीलिए शिल्पा से पहले से परिचित भी है. नई शादी और उसके ही शहर में रहने के कारण शिल्पा जब भी कुछ नया बनाती उन दोनों को बुला लेती. वह नहीं जानती थी कि वह आ बैल मुझे मार वाला काम कर रही है.

वैसे भी शिल्पा को खाना बनाना और खिलाना दोनों में ही मजा आता था. पर अब तो अनूप और उसकी पत्नी सीमा कभी भी किसी समय आ धमकते और खाने की फरमाइश कर देते.

शिल्पा ने तो उन्हें अंगुली पकड़वाई थी पर वह तो पौंचा ही पकड़ बैठे. उस दिन शिल्पा खाने से फुरसत ही हुई थी कि ये दोनों आ गये.

“शिल्पा दी आज तो आपके हाथ की कढ़ी चावल खाने का बहुत मन हो रहा है.”
“दी, कढ़ी बनाती भी तो इतनी अच्छी है.” मस्का लगाते हुए सीमा बोली.
“दी, वो पकौड़े वाली कढ़ी बनाना और थोड़े पकौड़े ज्यादा बना लेना सूखे खाने के लिए.”

शिल्पा के तो तन बदन में आग सी लग गयी थी फिर भी बनावटी मुस्कान ओढ़कर खाना बनाया. शिल्पा ने अब इन्हें सबक सिखाने का मनसूबा बना लिया था.

शर्मा जी के बेटे की बर्थडे पार्टी से लौटने के बाद शिल्पा काफी थकावट महसूस कर रही थी और बर्तन वाली न आने से बर्तन भी पड़े थे. थोड़ी देर आराम करने की सोच कर लेट गई. तभी उसे अनूप की आवाज सुनाई दी “जीजा जी आज हमारा मन आलू के पराठें खाने का हो रहा था और दीदी के हाथ के पराठों का तो जवाब ही नहीं. बाजार में भी इतने अच्छे नहीं मिलते.”

शिल्पा ने एक चुन्नी सिर पर बांधी और बाहर आकर बोली “मेरे सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है अच्छा हुआ सीमा तुम आ गयीं पहले तो सबके लिए चाय बना लाओ.”

पति को चुप रहने का इशारा करती हुई “और हां कुकर धोकर आलू उबलने रख देना, बाई नहीं आई न. आज मैं तुम्हें आलू के पराठें बनाना सिखाऊंगी. आखिर तुम्हें भी तो अनूप की पसंद सीखना होगी.”

प्यार से “तुम तो अपनी हो, तो तुमसे कहने में क्या संकोच मेरी तो तबीयत ठीक नहीं है तो तुम्हें ही चारों के लिए पराठें बनाना होगें.”

चाय से ज्यादा तो सीमा का मन उबल रहा था.”क्या मैं नौकरानी हूं? जो बर्तन भी साफ करूं और सबके लिए पराठें भी बनाऊं.” अनूप से भी बात नहीं कर पा रही थी.

उसने अनूप को व्हाट्सएप पर सारी परेशानी बताई. और साथ ही उपाय भी.

चाय पीने के बाद कप रखने के बहाने अंदर जाकर सीमा ने अनूप को फोन लगाया .

फोन उठाते ही अनूप बोला. जी सर अभी घर पहुंच रहा हूं

“किसका फोन था?” शिल्पा ने पूछा.

“वो दीदी बौस का फोन है घर पर आ रहे हैं तो हमें निकलना पड़ेगा.”

“कोई बात नहीं फिर कभी, जब भी आओगे हम सीमा के हाथ के पराठें खा लेगें.”

अब तो अनूप और सीमा ऐसे नौ दो ग्यारह हुए कि शिल्पा के घर का रास्ता ही भूल गये.

लेखिका- मधु जैन 

Hindi Crime Story : पिंजरे का पंछी – झूठी ख्वाहिशों का दलदल

Hindi Crime Story. कामिनी दरवाजे के बाहर खड़ी थी. खूब सजधज कर. सामने उसे एक अधेड़ उम्र का आदमी आता दिखाई दिया. उसे लगा कि वह उस की ओर चला आ रहा है. पर यह क्या? वह उस के बगल में खड़ी लड़की के पास चला गया और उस से बातें करने लगा. कामिनी सोचने लगी, ‘अब मेरी जवानी ढलने लगी है, शायद इसीलिए लड़के तो दूर अधेड़ भी मेरे पास आने से कतराने लगे हैं. आज भी मैं कुछ कमा नहीं पाई. अब मैं दीदी को क्या जवाब दूंगी? यही हाल रहा तो एक दिन वे मुझे यहां से निकाल बाहर करेंगी.’

इस के बाद कामिनी पुरानी यादों में खो गई. कामिनी के मातापिता गरीब थे. उस की मां लोगों के बरतन साफ कर के घर का खर्चा चलाती थी.

मातापिता ने कामिनी को अपना पेट काट कर पढ़ाना चाहा और उसे शहर के एक स्कूल में भरती किया. उन का सपना था कि कामिनी भी पढ़लिख कर समाज में नाम कमाए.

एक दिन स्कूल से छुट्टी होने के बाद कामिनी घर आने के लिए आटोरिकशा का इंतजार करने लगी. तभी उस के सामने एक कार आ कर रुकी. उस कार से एक अधेड़ आदमी बाहर आया. वह कामिनी से बोला, ‘बेटी, यहां क्यों खड़ी हो?’

‘मुझे घर जाना है. मैं आटोरिकशा का इंतजार कर रही हूं.’  ‘बेटी, तुम्हारा घर कहां है?’ वह आदमी बोला. ‘देवनगर,’ कामिनी बोली. ‘मुझे भी देवनगर जाना है. हमारे साथ कार में बैठ जाओ.’

उस आदमी की बात सुन कर कामिनी उस की कार में बैठ गई. कार में 2 आदमी और भी बैठे थे.

कार को दूसरी तरफ अनजानी जगह पर जाते देख कामिनी हैरानी से बोली, ‘अंकल, आप कह रहे थे कि आप को देवनगर जाना है, पर आप तो…’

‘बेटी, मुझे जरूरी काम याद आ गया. मैं किसी दोस्त से मिलने जा रहा हूं. तुम्हें ये लोग तुम्हारे घर छोड़ देंगे,’ कामिनी की बात पूरी होने से पहले ही वह आदमी बोला.

कार आगे दौड़ने लगी. कार को दूसरी दिशा में जाते देख कामिनी बोली, ‘अंकल, यह तो देवनगर जाने का रास्ता नहीं है. आप मुझे कहां ले जा रहे हैं?’

‘बेटी, हम तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देंगे. उस से पहले हम तुम से एक बात करना चाहते हैं. हम कोई गैर नहीं हैं. हम तुम्हें और तुम्हारे मातापिता को अच्छी तरह से जानते हैं.

‘एक दिन हम ने तुम्हें अपनी सहेली से कहते सुना था कि तुम हीरोइन बनना चाहती हो. तुम चाहो तो हम तुम्हें किसी फिल्म में हीरोइन का रोल दिला देंगे. तब दुनियाभर में तुम्हारा नाम होगा. तुम्हारे पास इतनी दौलत हो जाएगी कि तुम अपने मांबाप के सारे सपने पूरे कर सकोगी.

‘हीरोइन बनने के बाद तुम अपने मातापिता से मिलने जाओगी, तो सोचो कि वे कितने खुश होंगे? कुछ दिनों के बाद तुम्हें फिल्म में रोल मिल जाएगा, तब तक तुम्हें अपने मातापिता से दूर रहना होगा.’

कामिनी की आंखों में हीरोइन बनने का सपना तैरने लगा. वह ख्वाब देखने लगी कि उसे बड़े बैनर की फिल्म मिल गई है. पत्रपत्रिकाओं और टैलीविजन के खबरिया चैनलों में उस के नाम की चर्चा हो रही है. समाज में उस के मातापिता की इज्जत बढ़ गई है. उस के पुराने मकान की जगह पर अब आलीशान कोठी है. सब उसी में रह रहे हैं.

‘बेटी, क्या सोच रही हो?’ उस आदमी के सवाल ने कामिनी का ध्यान भंग किया. ‘अंकल, मैं फिल्म में हीरोइन बनने को तैयार हूं,’ कामिनी ने कहा.

2-3 घंटे के सफर के बाद वह कार शहर से दूर एक इलाके में पहुंच गई. कामिनी को इस जगह के बारे में पता नहीं था. कार से उतर कर वे दोनों आदमी कामिनी को ले कर एक मकान में गए.

दरवाजे पर खटखट करने पर एक मोटी औरत बाहर आई. वहां आसपास खड़ी लड़कियां उसे ‘दीदी’ कह कर पुकार रही थीं.

उन आदमियों को देख कर वह औरत बोली, ‘ले आए तुम नई को?’

‘बेटी, तुम्हें कुछ दिन यहीं रहना है. उस के बाद हम तुम्हें फिल्म बनाने वाले के पास ले चलेंगे,’ एक आदमीने कहा और वे दोनों वहां से चले गए.

दीदी ने कामिनी के रहने का इंतजाम एक अलग कमरे में कर दिया. वहां सुखसुविधाएं तो सभी थीं, पर कामिनी को वहां का माहौल घुटन भरा लगा.

3 दिन के बाद दीदी कामिनी से बोली, ‘आज हम तुम्हें एक फिल्म बनाने वाले के पास ले चलेंगे. वे जो भी कहें, सबकुछ करने को तैयार रहना.’

कुछ देर बाद एक कार आई. उस में 2 आदमी बैठे थे. दीदी के कहने पर कामिनी उस कार में बैठ गई. एक घंटे के सफर के बाद वह एक आलीशान कोठी में पहुंच गई. वहां वे आदमी उसे एक कमरे में ले गए.

उस कमरे में एक आदमी बैठा था. उसे वहां के लोग सेठजी कह रहे थे. कामिनी को उस कमरे में छोड़ वे दोनों आदमी बाहर निकले. जाते समय उन में से एक ने कामिनी से कहा, ‘ये सेठजी ही तुम्हारे लिए फिल्म बनाने वाले हैं.’

सेठजी ने कामिनी को कुरसी पर बिठाया. इंटरव्यू लेने का दिखावा करते हुए वे कामिनी से कुछ सवालपूछने लगे. इसी बीच एक आदमी शरबत के 2 गिलास ले कर वहां आया. एक गिलास सेठजी ने पीया और दूसरा गिलास कामिनी को पीने को दिया.

शरबत पीने के बाद कामिनी पर बेहोशी छा गई. उसे जब होश आया, तो उस ने अपने सामने सेठजी को मुसकराते हुए देखा. वह दर्द से कराह रही थी. ‘मेरे साथ धोखा हुआ है. मैं तुम सब को देख लूंगी. मैं तुम्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दूंगी,’ कामिनी चिल्लाई.

‘तुम्हारे साथ कोई धोखा नहीं हुआ है. तुम फिल्म में हीरोइन बनना चाहती थीं. लो, देख लो अपनी फिल्म,’ कह कर सेठजी ने कंप्यूटर में सीडी डाल कर उसे दिखा दी.

सीडी को देख कर कामिनी सन्न रह गई. उस फिल्म में सेठजी उस की इज्जत के साथ खेलते दिखाई दिए. ‘वैसे तो यह फिल्म हम किसी को नहीं दिखाएंगे. अगर तुम ने हमारी शिकायत पुलिस से की, तो हम इसे सारी दुनिया में पहुंचा देंगे,’ कंप्यूटर बंद करते हुए सेठजी बोले.

कमिनी को इस घटना से सदमा पहुंच गया. वह बेहोश हो गई. कुछ देर बाद वे दोनों आदमी कामिनी को कार में बैठा कर दीदी के पास ले गए. कामिनी गुमसुम रहने लगी. वह न कुछ खाती थी, न किसी से बातें करती थी.

एक दिन दीदी कामिनी के कमरे में आ कर बोली, ‘देखो, यहां जो भी लड़की आती है, वह अपनी इच्छा से नहीं आती. वह कुछ दिनों तक तेरी तरह गुमसुम रहती है, बाद में खुद को संभाल लेती है. इस दलदल में जो एक बार पहुंच गई, वह चाह कर भी वापस नहीं जा सकती.

‘अगर तुम यहां से चली भी गई, तो तुम्हारा समाज तुम्हें फिर से नहीं अपनाएगा, इसलिए तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम अब यहीं के समाज में रहने का मन बनाओ. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’

दूसरे दिन दीदी ने कामिनी को कार में बिठा कर दूसरे आदमी के पास भेजा. अब वह इसी तरह कामिनी को इधरउधर भेजने लगी. एक दिन दीदी ने कामिनी से कहा, ‘तुझे इधरउधर जाते हुए काफी समय हो गया है. अब मैं तुझे एक नया काम सिखाऊंगी.’

‘नया काम… मतलब?’ कामिनी चौंकते हुए बोली. ‘मतलब यह है कि अब तुझे किसी सेठ के पास नहीं जाना है. तुझे यहीं दुकान में रह कर ग्राहकों को अपनी ओर खींचना है.’ ‘किस दुकान में?’ ‘यहीं.’ ‘लेकिन यह तो मकान है, दुकान कहां है?’

‘यही मकान तुम्हारे धंधे की दुकान है. जैसे शोरूम में अलगअलग डिजाइन के कपड़े सजा कर रखे रहते हैं, वैसे ही तुम्हें यहां सजधज कर आधे कपड़ों में रहना है. तुम्हें कुछ नहीं करना है. बस, यहां से गुजरने वाले मर्दों को ललचाई नजरों से देखना है.’

दीदी के समझाने पर कामिनी सोचने लगी, ‘यहां रहने वाली सभी लड़कियां इस शोरूम की चीजें हैं. शोरूम में रखी चीजों को ग्राहक देख कर पसंद करता है. खरीदने के बाद वे चीजें उसी की हो जाती हैं. ग्राहक उस चीज की इज्जत करता है. हम जिस्म के सौदे की वे चीजें हैं, जिन्हें ग्राहक कुछ देर के लिए खरीद कर मजा ले कर चला जाता है

‘वासना के भूखे दरिंदे हमारे पास आ कर अपनी भूख मिटाते हैं. हम भी चाहते हैं कि हमारा दिल किसी के लिए धड़के. वह एक हो. वह हम पर मरमिटने को तैयार हो. हम भी समाज के रिश्तों की डोर से बंधें.’

पिंजरे में बंद पंछी की तरह कामिनी का मन फड़फड़ा रहा था.

एक दिन कामिनी ने सोच लिया कि वह इस दुनिया से बाहर आ कर रहेगी. ज्यादा से ज्यादा इस कोशिश में उस की जान चली जाएगी. जिस्म के शोरूम की चीज बने रहने से अच्छा है कि वह मौत को गले लगा ले. अगर वह बच गई, तो समाज का हिस्सा बन जाएगी.

कामिनी ने दीदी को भरोसे में ले लिया. अपने बरताव और काम से उस ने दीदी पर असर जमा लिया. दीदी को यकीन हो गया था कि कामिनी ने खुद को यहां की दुनिया में ढाल लिया है.

एक दिन मौका देख कर कामिनी वहां से भाग गई और ट्रेन में बैठ कर अपने घर चली गई. इतने सालों के बाद कामिनी को देख कर उस के भाई खुश हो गए. उन्होंने कामिनी को बताया कि मातापिता की मौत हो चुकी है. वह अपने भाई विनोद और सोहन के साथ रहने लगी.

भाइयों को दुख न पहुंचे, यह सोच कर उस ने अपने बीते दिनों के बारे में कुछ नहीं बताया. कामिनी का भाई विनोद एक कंपनी में काम करता था. उस कंपनी का मालिक रवींद्र नौजवान था. एक दिन वह विनोद के जन्मदिन की पार्टी में उस के घर आया. विनोद ने उस से कामिनी का परिचय कराया. उसे कामिनी पसंद आ गई. धीरेधीरे रवींद्र और कामिनी के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं.

एक दिन दोनों ने प्रेमविवाह कर लिया. रवींद्र और कामिनी एकदूसरे को बहुत प्यार करते थे. शादी के बाद कामिनी रवींद्र के साथ शहर में किराए के मकान में रहने लगी. एक दिन रवींद्र की कंपनी में बैठक चल रही थी. रवींद्र को याद आया कि उस की जरूरी फाइल तो घर पर ही रह गई है. रवींद्र ने सुपरवाइजर प्रदीप को वह फाइल लेने अपने घर भेज दिया.

रवींद्र के घर पहुंच कर प्रदीप ने दरवाजे पर खटखट की. थोड़ी देर बाद कामिनी बाहर आ गई. ‘कामिनी, तू यहां? तू ने मुझे पहचाना?’ कामिनी को देख कर प्रदीप बोला. ‘नहीं तो,’ कामिनी बोली. ‘वहां मैं तुम्हारे पास कई बार आया करता था. क्या तुझे यहां साहब किराए पर लाए हैं?’

प्रदीप की बात सुन कर कामिनी चुप रही. प्रदीप कामिनी को बांहों में भरने लगा. वह उसे चूमने की कोशिश करने लगा. ‘परे हट जाओ मेरे सामने से,’ कामिनी चिल्लाई. ‘जानम, मैं ने तुम्हें कई बार प्यार किया है. आज यहां तू और मैं ही तो हैं. मेरी इच्छा पूरी नहीं करोगी?’ ‘नहीं, तुम्हें मुझ से तमीज से बात करनी चाहिए. मैं तुम्हारे साहब की बीवी हूं,’ कामिनी चिल्लाई.

‘तमीज से?’ प्रदीप हंस कर बोला. ‘मैं साहब को तुम्हारे बारे में सबकुछ बता दूंगा,’ प्रदीप बोला. ‘नहीं, तुम ऐसा नहीं करोगे. मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी.’

‘ठीक है. अगर तुम अपनी जिंदगी बरबाद होने से बचाना चाहती हो, तो मैं जब चाहूं तुम्हें मेरी इच्छा पूरी करनी होगी. तुम्हें यह काम आज और अभी से करना होगा. जिस दिन तुम ने मेरा कहा नहीं माना, मैं तुम्हारी पूरी कहानी साहब को बता दूंगा,’ जातेजाते प्रदीप कामिनी से बोला.

अब प्रदीप रवींद्र की गैरहाजिरी में समयसमय पर कामिनी से मिलने आने लगा.

एक दिन किसी काम से रवींद्र अपने घर समय से पहले आ गया. उस ने प्रदीप और कामिनी को एकसाथ देख लिया. उस ने प्रदीप और कामिनी को बुरी तरह डांटा. उस ने प्रदीप को नौकरी से हटाने की धमकी दी. प्रदीप ने रवींद्र को कामिनी के बारे में सबकुछ बता दिया. रवींद्र ने कामिनी का साथ छोड़ दिया. कामिनी के बारे में जब उस के भाइयों को पता चला, तो उन्होंने भी उसे अपने साथ रखने से मना कर दिया.

कामिनी के पास फिर उसी दुनिया में लौटने के सिवा कोई रास्ता नहीं रह गया था. ‘‘कामिनी, आज भी कुछ कमाया या नहीं?’’ दीदी की बात सुन कर कामिनी यादों से बाहर आ गई. Hindi Crime Story

Hindi Love Story : साथ-साथ

Hindi Love Story. आपरेशन थियेटर के दरवाजे पर लालबत्ती अब भी जल रही थी और रुखसाना बेगम की नजर लगातार उस पर टिकी थी. पलकें मानो झपकना ही भूल गई थीं, लग रहा था जैसे उसी लालबत्ती की चमक पर उस की जिंदगी रुकी है.

रुखसाना की जिंदगी जिस धुरी के चारों तरफ घूमती थी वही रज्जाक मियां अंदर आपरेशन टेबल पर जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे. जिन बांहों का सहारा ले कर वह कश्मीर के एक छोटे से गांव से सुदूर कोलकाता आई थी उन्हीं बांहों पर 3-3 गोलियां लगी थीं. शायद उस बांह को काट कर शरीर से अलग करना पड़े, ऐसा ही कुछ डाक्टर साहब कह रहे थे उस के मकान मालिक गोविंदरामजी से. रुखसाना की तो जैसे उस वक्त सुनने की शक्ति भी कमजोर पड़ गई थी.

क्या सोच रहे होंगे गोविंदरामजी और उन की पत्नी शीला उस के और रज्जाक के बारे में? कुछ भी सोचें पर भला हो शीला बहन का जो उन्होंने उस के 1 साल के पुत्र रफीक को अपने पास घर में ही रख लिया, वरना वह क्या करती? यहां तो अपने ही खानेपीने की कोई सुध नहीं है.

रुखसाना ने मन ही मन ठान लिया कि अब जब घर लौटेगी तो गोविंद भाई साहब और शीला भाभी को अपने बारे में सबकुछ सचसच बता देगी. जिन से छिपाना था जब उन्हीं से नहीं छिपा तो अब किस का डर? और फिर गोविंद भाई और शीला भाभी ने उस के इस मुसीबत के समय जो उपकार किया, वह तो कोई अपना ही कर सकता है न. अपनों की बात आते ही रुखसाना की आंखों के आगे उस का अतीत घूम गया.

ऊंचेऊंचे बर्फ से ढके पहाड़, हरेभरे मैदान, बीचबीच में पहाड़ी झरने और उन के बीच अपनी सखियों और भाईबहनों के साथ हंसताखेलता रुखसाना का बचपन.

वह रहा सरहद के पास उस का बदनसीब गांव जहां के लोग नहीं जानते कि उन्हें किस बात की सजा मिल रही है. साल पर साल, कभी मजहब के नाम पर तो कभी धरती के नाम पर, कभी कोई वरदीधारी तो कभी कोई नकाबधारी यह कहता कि वतन के नाम पर वफा करो… धर्म के नाम पर वफा करो, बेवफाई की सजा मौत है.

रुखसाना को अब भी याद है कि दरवाजे पर दस्तक पड़ते ही अम्मीजान कैसे 3 बहनों को और जवान बेवा भाभी को अंदर खींच कर तहखाने में बिठा देती थीं और अब्बूजान सहमेसहमे दरवाजा खोलते.

इन्हीं भयावह हालात में जिंदगी अपनी रफ्तार से गुजर रही थी.

कहते हैं हंसतेखेलते बचपन के बाद जवानी आती ही आती है पर यहां तो जवानी मातम का पैगाम ले कर आई थी. अब्बू ने घर से मेरा निकलना ही बंद करवा दिया था. न सखियों से हंसना- बोलना, न खुली वादियों में घूमना. जब देखो इज्जत का डर. जवानी क्या आई जैसे कोई आफत आ गई.

उस रोज मझली को बुखार चढ़ आया था तो छोटी को साथ ले कर वह ही पानी भरने आई थी. बड़े दिनों के बाद घर से बाहर निकलने का उसे मौका मिला था. चेहरे से परदा उठा कर आंखें बंद किए वह पहाड़ी हवा का आनंद ले रही थी. छोटी थोड़ी दूरी पर एक बकरी के बच्चे से खेल रही थी.

सहसा किसी की गरम सांसों को उस ने अपने बहुत करीब अनुभव किया. फिर आंखें जो खुलीं तो खुली की खुली ही रह गईं. जवानी की दहलीज पर कदम रखने के बाद यह पहला मौका था जब किसी अजनबी पुरुष से इतना करीबी सामना हुआ था. इस से पहले उस ने जो भी अजनबी पुरुष देखे थे वे या तो वरदीधारी थे या नकाबधारी…रुखसाना को उन दोनों से ही डर लगता था.

लंबा कद, गठा हुआ बदन, तीखे नैननक्श, रूखे चेहरे पर कठोरता और कोमलता का अजीब सा मिश्रण. रुखसाना को लगा जैसे उस के दिल ने धड़कना ही बंद कर दिया हो. अपने मदहोशी के आलम में उसे इस बात का भी खयाल न रहा कि वह बेपरदा है.

तभी अजनबी युवक बोल उठा, ‘वाह, क्या खूब. समझ नहीं आता, इस हसीन वादी को देखूं या आप के हुस्न को. 3-4 रात की थकान तो चुटकी में दूर हो गई.’

शायराना अंदाज में कहे इन शब्दों के कानों में पड़ते ही रुखसाना जैसे होश में आ गई. लजा कर परदा गिरा लिया और उठ खड़ी हुई.

अजनबी युवक फिर बोला, ‘वैसे गुलाम को रज्जाक कहते हैं और आप?’

‘रुखसाना बेगम,’ कहते हुए उस ने घर का रुख किया. इस अजनबी से दूर जाना ही अच्छा है. कहीं उस ने उस के दिल की कमजोरी को समझ लिया तो बस, कयामत ही आ जाएगी.

‘कहीं आप अब्दुल मौला की बेटी रुखसाना तो नहीं?’

‘हां, आप ने सही पहचाना. पर आप को इतना कैसे मालूम?’

‘अरे, मुझे तो यह भी पता है कि आप के मकान में एक तहखाना है और फिलहाल मेरा डेरा भी वहीं है.’

अजनबी युवक का इतना कहना था कि रुखसाना का हाथ अपनेआप उस के सीने पर ठहर गया जैसे वह तेजी से बढ़ती धड़कनों को रोकने की कोशिश कर रही हो. दिल आया भी तो किस पत्थर दिल पर. वह जानती थी कि तहखानों में किन लोगों को रखा जाता है.

पिछली बार जब महजबीन से बात हुई थी तब वह भी कुछ ऐसा ही कह रही थी. उस का लोभीलालची अब्बा तो कभी अपना तहखाना खाली ही नहीं रखता. हमेशा 2-3 जेहादियों को भरे रखता है और महजबीन से जबरदस्ती उन लोगों की हर तरह की खिदमत करवाता है. बदले में उन से मोटी रकम ऐंठता है. एक बार जब महजबीन ने उन से हुक्मउदूली की थी तो उस के अब्बू के सामने ही जेहादियों ने उसे बेपरदा कर पीटा था और उस के अब्बू दूसरी तरफ मुंह घुमाए बैठे थे.

तब रुखसाना का चेहरा यह सुन कर गुस्से से तमतमा उठा था पर लाचार महजबीन ने तो हालात से समझौता कर लिया था. उस के अब्बू में तो यह अच्छाई है कि वह पैसे के लालची नहीं हैं और जब से उस के सीधेसादे बड़े भाई साहब को जेहादी उठा कर ले गए तब से तो अब्बा इन जेहादियों से कुछ कटेकटे ही रहते हैं. पर अब सुना है कि अब्बू के छोटे भाई साहब जेहादियों से जा मिले हैं. क्या पता यह उन की ही करतूत हो.

एक अनजानी दहशत से रुखसाना का दिल कांप उठा था. उसे अपनी बरबादी बहुत करीब नजर आ रही थी. भलाई इसी में है कि इस अजनबी को यहीं से चलता कर दे.

कुछ कहने के उद्देश्य से रुखसाना ने ज्यों ही पलट कर उस अजनबी को देखा तो उस के जवान खूबसूरत चेहरे की कशिश रुखसाना को कमजोर बना गई और होंठ अपनेआप सिल गए. रज्जाक अभी भी मुहब्बत भरी नजरों से उसी को निहार रहा था.

नजरों का टकराना था कि फिर धड़कनों में तेजी आ गई. उस ने नजरें झुका लीं. सोच लिया कि भाई साहब बड़े जिद्दी हैं. जब उन्होेंने सोच ही लिया है कि तहखाने को जेहादियों के हाथों भाड़े पर देंगे तो इसे भगा कर क्या फायदा? कल को वह किसी और को पकड़ लाएंगे. अपना आगापीछा सोच कर रुखसाना चुपचाप रज्जाक को घर ले आई थी.

बेटे से बिछुड़ने का गम और ढलती उम्र ने अब्बू को बहुत कमजोर बना दिया था. अपने छोटे भाई के खिलाफ जाने की शक्ति अब उन में नहीं थी और फिर वह अकेले किसकिस का विरोध करते. नतीजतन, रज्जाक मियां आराम से तहखाने में रहने लगे और रुखसाना को उन की खिदमत में लगा दिया गया.

रुखसाना खूब समझ रही थी कि उसे भी उस के बचपन की सहेली महजबीन और अफसाना की तरह जेहादियों के हाथों बेच दिया गया है पर उस का किस्सा उस की सहेलियों से कुछ अलग था. न तो वह महजबीन की तरह मजबूर थी और न अफसाना की तरह लालची. उसे तो रज्जाक मियां की खिदमत में बड़ा सुकून मिलता था.

रज्जाक भी उस के साथ बड़ी इज्जत से पेश आता था. हां, कभीकभी आवेश में आ कर मुहब्बत का इजहार जरूर कर बैठता था और रुखसाना को उस का पे्रम इजहार बहुत अच्छा लगता था. अजीब सा मदहोशी का आलम छाया रहता था उस समय तहखाने में, जब दोनों एक दूसरे का हाथ थामे सुखदुख की बातें करते रहते थे.

रज्जाक के व्यक्तित्व का जो भाग रुखसाना को सब से अधिक आकर्षित करता था वह था उस के प्रति रज्जाक का रक्षात्मक रवैया. जब भी किसी जेहादी को रज्जाक से मिलने आना होता वह पहले से ही रुखसाना को सावधान कर देता कि उन के सामने न आए.

उस दिन की बात रुखसाना को आज भी याद है. सुबह से 2-3 जेहादी तहखाने में रज्जाक मियां के पास आए हुए थे. पता नहीं किस तरह की सलाह कर रहे थे…कभीकभी नीचे से जोरों की बहस की आवाज आ रही थी, जिसे सुन कर रुखसाना की बेचैनी हर पल बढ़ रही थी. रज्जाक को वह नाराज नहीं करना चाहती थी इसलिए उस ने खाना भी छोटी के हाथों ही पहुंचाया था. जैसे ही वे लोग गए रुखसाना भागीभागी रज्जाक के पास पहुंची.

रज्जाक घुटने में सिर टिकाए बैठा था. रुखसाना के कंधे पर हाथ रखते ही उस ने सिर उठा कर उस की तरफ देखा. आंखें लाल और सूजीसूजी सी, चेहरा बेहद गंभीर. अनजानी आशंका से रुखसाना कांप उठी. उस ने रज्जाक का यह रूप पहले कभी नहीं देखा था.

‘क्या हुआ? वे लोग कुछ कह गए क्या?’ रुखसाना ने सहमे लहजे में पूछा.

‘रुखसाना, खुदा ने हमारी मुहब्बत को इतने ही दिन दिए थे. जिस मिशन के लिए मुझे यहां भेजा गया था ये लोग उसी का पैगाम ले कर आए थे. अब मुझे जाना होगा,’ कहतेकहते रज्जाक का गला भर आया.

‘आप ने कहा नहीं कि आप यह सब काम अब नहीं करना चाहते. मेरे साथ घर बसा कर वापस अपने गांव फैजलाबाद लौटना चाहते हैं.’

‘अगर यह सब मैं कहता तो कयामत आ जाती. तू इन्हें नहीं जानती रुखी…ये लोग आदमी नहीं हैवान हैं,’ रज्जाक बेबसी के मारे छटपटाने लगा.

‘तो आप ने इन हैवानों का साथ चुन लिया,’ रुखसाना का मासूम चेहरा धीरेधीरे कठोर हो रहा था.

‘मेरे पास और कोई रास्ता नहीं है रुखी. मैं ने इन लोगों के पास अपनी जिंदगी गिरवी रखी हुई है. बदले में मुझे जो मोटी रकम मिली थी उसे मैं बहन के निकाह में खर्च कर आया हूं और जो बचा था उसे घर से चलते समय अम्मीजान को दे आया था.’

‘जिंदगी कोई गहना नहीं जिसे किसी के भी पास गिरवी रख दिया जाए. मैं मन ही मन आप को अपना शौहर मान चुकी हूं.’

‘इन बातों से मुझे कमजोर मत बनाओ, रुखी.’

‘आप क्यों कमजोर पड़ने लगे भला?’ रुखसाना बोली, ‘कमजोर तो मैं हूं जिस के बारे में सोचने वाला कोई नहीं है. मैं ने आप को सब से अलग समझा था पर आप भी दूसरों की तरह स्वार्थी निकले. एक पल को भी नहीं सोचा कि आप के जाने के बाद मेरा क्या होगा,’ कहतेकहते रुखसाना फफकफफक कर रो पड़ी.

रज्जाक ने उसे प्यार से अपनी बांहों में भर लिया और गुलाबी गालों पर एक चुंबन की मोहर लगा दी.

चढ़ती जवानी का पहला आलिंगन… दोनों जैसे किसी तूफान में बह निकले. जब तूफान ठहरा तो हर हाल में अपनी मुहब्बत को कुर्बान होने से बचाने का दृढ़ निश्चय दोनों के चेहरों पर था.

रुखसाना के चेहरे को अपने हाथों में लेते हुए रज्जाक बोला, ‘रुखी, मैं अपनी मुहब्बत को हरगिज बरबाद नहीं होने दूंगा. बोल, क्या इरादा है?’

मुहब्बत के इस नए रंग से सराबोर रुखसाना ने रज्जाक की आंखों में आंखें डाल कर कुछ सोचते हुए कहा, ‘भाग निकलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रज्जाक मियां. बोलो, क्या इरादा है?’

‘पैसे की चिंता नहीं, जेब में हजारों रुपए पडे़ हैं पर भाग कर जाएंगे कहां?’ रज्जाक चिंतित हो कर बोला.

महबूब के एक स्पर्श ने मासूम रुखसाना को औरत बना दिया था. उस के स्वर में दृढ़ता आ गई थी. हठात् उस ने रज्जाक का हाथ पकड़ा और दोनों दबेपांव झरोखे से निकल पड़े. झाडि़यों की आड़ में खुद को छिपातेबचाते चल पड़े थे 2 प्रेमी एक अनिश्चित भविष्य की ओर.

रज्जाक के साथ गांव से भाग कर रुखसाना अपने मामूजान के घर आ गई. मामीजान ने रज्जाक के बारे में पूछा तो वह बोली, ‘यह मेरे शौहर हैं.’

मामीजान को हैरत में छोड़ कर रुखसाना रज्जाक को साथ ले सीधा मामूजान के कमरे की तरफ चल दी. क्योंकि एकएक पल उस के लिए बेहद कीमती था.

मामूजान एक कीमती कश्मीरी शाल पर नक्काशी कर रहे थे. दुआसलाम कर के वह चुपचाप मामूजान के पास बैठ गई और रज्जाक को भी बैठने का इशारा किया.

बचपन से रुखसाना की आदत थी कि जब भी कोई मुसीबत आती तो वह मामूजान के पास जा कर चुपचाप बैठ जाती. मामूजान खुद ही समझ जाते कि बच्ची परेशान है और उस की परेशानी का कोेई न कोई रास्ता निकाल देते.

कनखियों से रज्जाक को देख मामूजान बोल पड़े, ‘इस बार कौन सी मुसीबत उठा लाई है, बच्ची?’

‘मामूजान, इस बार की मुसीबत वाकई जानलेवा है. किसी को भनक भी लग गई तो सब मारे जाएंगे. दरअसल, मामूजान इन को मजबूरी में जेहादियों का साथ देना पड़ा था पर अब ये इस अंधी गली से निकलना चाहते हैं. हम साथसाथ घर बसाना चाहते हैं. अब तो आप ही का सहारा है मामू, वरना आप की बच्ची मर जाएगी,’ इतना कह कर रुखसाना मामूजान के कदमों में गिर कर रोने लगी.

अपने प्रति रुखसाना की यह बेपनाह मुहब्बत देख कर रज्जाक मियां का दिल भर आया. चेहरे पर दृढ़ता चमकने लगी. मामूजान ने एक नजर रज्जाक की तरफ देखा और अनुभवी आंखें प्रेम की गहराई को ताड़ गईं. बोले, ‘सच्ची मुहब्बत करने वालों का साथ देना हर नेक बंदे का धर्म है. तुम लोग चिंता मत करो. मैं तुम्हें एक ऐसे शहर का पता देता हूं जो यहां से बहुत दूर है और साथ ही इतना विशाल है कि अपने आगोश में तुम दोनों को आसानी से छिपा सकता है. देखो, तुम दोनों कोलकाता चले जाओ. वहां मेरा अच्छाखासा कारोबार है. जहां मैं ठहरता हूं वह मकान मालिक गोविंदरामजी भी बड़े अच्छे इनसान हैं. वहां पहुंचने के बाद कोई चिंता नहीं…उन के नाम मैं एक खत लिखे देता हूं.’

मामूजान ने खत लिख कर रज्जाक को पकड़ा दिया था जिस पर गोविंदरामजी का पूरा पता लिखा था. फिर वह घर के अंदर गए और अपने बेटे की जीन्स की पैंट और कमीज ले आए और बोले, ‘इन्हें पहन लो रज्जाक मियां, शक के दायरे में नहीं आओगे. और यहां से तुम दोनों सीधे जम्मू जा कर कोलकाता जाने वाली गाड़ी पर बैठ जाना.’

जिस मुहब्बत की मंजिल सिर्फ बरबादी नजर आ रही थी उसे रुखसाना ने अपनी इच्छाशक्ति से आबाद कर दिया था. एक युवक को जेहादियों की अंधी गली से निकाल कर जीवन की मुख्यधारा में शामिल कर के एक खुशहाल गृहस्थी का मालिक बनाना कोई आसान काम नहीं था. पर न जाने रुखसाना पर कौन सा जनून सवार था कि वह अपने महबूब और मुहब्बत को उस मुसीबत से निकाल लाई थी.

पता ही नहीं चला कब साल पर साल बीत गए और वे कोलकाता शहर के भीड़़ का एक हिस्सा बन गए. रज्जाक बड़ा मेहनती और ईमानदार था. शायद इसीलिए गोविंदराम ने उसे अपनी ही दुकान में अच्छेखासे वेतन पर रख लिया था और जब रफीक गोद में आया तो उन की गृहस्थी झूम उठी.

शुरुआत में पहचान लिए जाने के डर से रज्जाक और रुखसाना घर से कम ही निकलते थे पर जैसेजैसे रफीक बड़ा होने लगा उसे घुमाने के बहाने वे दोनों भी खूब घूमने लगे थे. लेकिन कहते हैं न कि काले अतीत को हम बेशक छोड़ना चाहें पर अतीत का काला साया हमें आसानी से नहीं छोड़ता.

रोज की तरह उस दिन भी रज्जाक काम पर जा रहा था और रुखसाना डेढ़ साल के रफीक को गोद में लिए चौखट पर खड़ी थी. तभी न जाने 2 नकाबपोश कहां से हाजिर हुए और धांयधांय की आवाज से सुबह का शांत वातावरण गूंज उठा.

उस खौफनाक दृश्य की याद आते ही रुखसाना जोर से चीख पड़ी तो आसपास के लोग उस की तरफ भागे. रुखसाना बिलखबिलख कर रो रही थी. इतने में गोविंदराम की जानीपहचानी आवाज ने उस को अतीत से वर्तमान में ला खड़ा किया, वह कह रहे थे, ‘‘रुखसाना बहन, अब घबराने की कोई जरूरत नहीं. आपरेशन ठीकठाक हो गया है. रज्जाक मियां अब ठीक हैं. कुछ ही घंटों में उन्हें होश आ जाएगा.’’

रुखसाना के आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. उसे कहां चोट लगी थी यह किसी की समझ से परे था.

इतने में किसी ने रफीक को उस की गोद में डाल दिया. रुखसाना ने चेहरा उठा कर देखा तो शीला बहन बड़े प्यार से उस की तरफ देख रही थीं. बोलीं, ‘‘चलो, रुखसाना, घर चलो. नहाधो कर कुछ खा लो. अब तो रज्जाक भाई भी ठीक हैं और फिर तुम्हारे गोविंदभाई तो यहीं रहेंगे. रफीक तुम्हारी गोद को तरस गया था इसलिए मैं इसे यहां ले आई.’’

रुखसाना भौचक्क हो कर कभी शीला को तो कभी गोविंदराम को देख रही थी. और सोच रही थी कि अब तक तो इन्हें उस की और रज्जाक की असलियत का पता चल गया होगा. तो पुलिस के झमेले भी इन्होंने झेले होंगे. फिर भी कितने प्यार से उसे लेने आए हैं.

रुखसाना आंखें पोंछती हुई बोली, ‘‘नहीं बहन, अब हम आप पर और बोझ नहीं बनेंगे. पहले ही आप के हम पर बड़े एहसान हैं. हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए. कुछ लोग दुनिया में सिर्फ गम झेलने और मरने को आते हैं. हम अपने गुनाह की सजा आप को नहीं भोगने देंगे. आप समझती होंगी कि वे लोग हमें छोड़ देंगे? कभी नहीं.’’

‘‘रुखसाना कि वे आतंकवादी गली से बाहर निकल भी न पाए थे कि महल्ले वाले उन पर झपट पड़े. फिर क्या था, जिस के हाथों में जो भी था उसी से मारमार कर उन्हें अधमरा कर दिया, तब जा कर पुलिस के हवाले किया. दरअसल, इनसान न तो धर्म से बड़ा होता है और न ही जन्म से. वह तो अपने कर्म से बड़ा होता है. तुम ने जिस भटके हुए युवक को सही रास्ता दिखाया वह वाकई काबिलेतारीफ है. आज तुम अकेली नहीं, सारा महल्ला तुम्हारे साथ है .’’

शीला की इन हौसला भरी बातों ने रुखसाना की आंखों के आगे से काला परदा हटा दिया. रुखसाना ने देखा शाम ढल चुकी थी और एक नई सुबह उस का इंतजार कर रही थी. महल्ले के सभी बड़ेबुजुर्ग और जवान हाथ फैलाए उस के स्वागत के लिए खड़े थे. वह धीरेधीरे गुनगुनाने लगी, ‘हम साथसाथ हैं.’ Hindi Love Story

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