मुझ से दूर रहो : कैसा था मूलक का जीवन

तकरीबन 10 साल गांव से दूर रहने के बाद मूलक दोबारा लौटा था. जब वह यहां से गया था, तब यह गांव 20-30 झोंपड़ियों वाला एक छोटा सा डेरा था.

गांव के ज्यादातर मर्द कोयले और लोहे की खदानों में काम करते थे. दिनभर बदनतोड़ मेहनत के बाद कोई ताड़ी तो कोई कच्ची शराब पी कर नमकभात खा कर पड़ जाते थे. किसीकिसी परिवार की औरतें भी खदानों में काम करती थीं.

यह गांव मध्य प्रदेश के उस इलाके में था, जो अब छत्तीसगढ़ में आता है. जब मूलक गांव वापस लौटा, तब छत्तीसगढ़ बन चुका था. ज्यादातर गांव अभी भी मुख्य शहरों से बस कच्ची सड़कों से ही जुड़े थे. चारों ओर वही जंगली घास और बीहड़ थे.

गांव के कच्चे रास्तों पर सवारी के साधनों की अभी भी पूरी तरह कमी थी. संचार के साधन भी अभी तक केवल अमीरों को ही सुलभ थे. गरीब तो आज भी चिट्ठीपत्री के ही भरोसे पर थे.

भिलाई से गांव पहुंचतेपहुंचते मूलक को अच्छीखासी रात हो चुकी थी. दीए बुझ चुके थे और चारों तरफ घनघोर अंधेरा पसरा हुआ था. कहींकहीं एकाध जुगनू झिलमिल कर के मूलक को यहां की पगडंडी दिखा देता था.

यह पगडंडी बिलकुल भी नहीं बदली थी. एकदम वैसी ही एकडेढ़ गज चौड़ी, दोनों ओर जंगली बेर की कंटीली झाडि़यां और भुलावा की बेल…

‘अरे, यहां तो भुलना की बेल होती हैं. अगर उन पर मेरा पैर पड़ गया, तो मैं सब भूल जाऊंगा,’ अचानक चलतेचलते मूलक को बचपन में सुनी हुई बात याद आई और उस के कदम ठिठक गए.

‘‘भुलना की बेल… भला बेल भी किसी को रास्ता भुला सकती है?’’ मूलक ने खुद से कहा और तेजी से चलने लगा. अब सामने घना जंगल था और उस जंगल के उस पार नदी किनारे पर उस का गांव.

अभी मूलक मुश्किल से 20-30 कदम ही चला होगा कि अचानक उसे किसी चीज से ठोकर लगी और वह मुंह के बल झाडि़यों के ऊपर गिर पड़ा. उस के गिरते ही जंगली घास की उस झाड़ी से किसी औरत के चीखने की बहुत तेज आवाज आई, ‘‘आह… दूर रहो मुझ से.’’

औरत की आवाज सुन कर मूलक की जैसे सांस अटक गई. वह डर से सूखे गले को थूक निगल कर तर करने की कोशिश करते हुए मिमिया कर बोला, ‘‘कौन…? कौन हो तुम…?’’

 

‘‘चुड़ैल हूं मैं. दूर रहो मुझ से, नहीं तो तुम्हारा भी खून पी जाऊंगी,’’ वह औरत उसे डराने की कोशिश करतेहुए चीखी.

अब तक मूलक उठ कर खड़ा हो चुका था और गिरने और उठने के बीच वह यह जान चुका था कि यह कोई जवान औरत है. उस के हाथ उस जिस्म को महसूस कर चुके थे, लेकिन ऐसे अचानक इस अंधकार में इस झाड़ी में औरत के होने की कल्पना तो कोई सपने में भी नहीं कर सकता था, ऊपर से उस ने कहा था. ‘चुड़ैल…’

मूलक डर से कांप उठा, लेकिन फिर भी वह हिम्मत जुटा कर खड़ा हुआ.‘‘उठो यहां से, यहां झाड़ी में छिपी क्या कर रही हो तुम?’’ मूलक उसे पकड़ कर झकझोरते हुए बोला.‘‘भाग जा यहां से, कह तो दिया चुड़ैल हूं. जा, चला जा इस से पहले कि तुझ पर मेरा साया पड़ जाए, जान बचा ले अपनी,’’ वह औरत उसे डराने की कोशिश करते हुए बोली, पर उस की इस धमकी के बीच उस औरत की आवाजमें दर्दभरी सिसकी मूलक ने साफ सुन ली थी.

इस सिसकी ने न जाने क्यों मूलक के दिल की धड़कन बढ़ा दी थी. उसे न जाने क्यों इस सिसकी में किसी अपने का दर्द महसूस हुआ

मूलक ने उस औरत का हाथ पकड़ कर ऊपर उठाया और खींचते हुए उसे उठाने लगा, ‘‘चलो, उठो यहां से और उधर चल कर बताओ कि कौन हो तुम और तुम्हारे साथ क्या हुआ है?’’

वह गांव के बाहर एक उजाड़ ढाबे की ओर इशारा करते हुए बोला, जो इस जंगल के अंदर ही नदी के इस पार बना हुआ था.

‘‘आह… छोड़ो मुझे. तुम्हें समझ नहीं आता, दूर रहो तुम मुझ से. उधर ले जा कर तुम भी सब की तरह मुझे चुड़ैल होने की सजा दोगे.

‘‘तुम भी सब की तरह मुझ पर जुल्म करोगे. मेरी इज्जत से खेलोगे… अब मेरे पैरों में खड़े होने की ताकत नहीं बची और न ही जिस्म में किसी से जिस्मानी होने की ताकत.

‘‘जाओ, छोड़ दो मुझे. मैं मान तो रही हूं कि मैं चुड़ैल हूं. चले जाओ यहां से,’’ वह औरत घबरा कर हाथ जोड़ते हुए बोली.

उस औरत के उठने और हाथ जोड़ने के बीच मूलक यह जान चुका था कि उस के पैर घायल हैं और वह बहुत घबराई हुई है.

मूलक ने न जाने किस प्रेरणा से आगे बढ़ कर उसे उठा कर अपने कंधे पर डाल लिया और उसे ले कर ढाबे की ओर चल दिया. वह औरत निढाल हो कर उस के कंधे पर ऐसे लुढ़की हुई थी, मानो कोई बेजान लाश हो.

उस के मुंह से बारबार बस यही निकल रहा था, ‘‘दूर रहो मुझ से, मैं चुड़ैल हूं. मुझे सजा मत दो, मैं अब किसी का खून नहीं पीऊंगी. मेरे जिस्म से मत खेलो, मेरी इज्जत मत लूटो.’’

मूलक उस औरत को ले कर ढाबे में आ गया. वहां उस ने इधरउधर से कुछ लकडि़यां जमा कीं और फिर अपनी जेब से माचिस निकाल कर आग जला दी.

आग जलने से वहां उजाला फैल चुका था. अब मूलक ने उस औरत को ध्यान से देखा. वह बहुत कमजोर, काली सी, बिलकुल हड्डियों का ढांचा भर थी. उस के शरीर पर कपड़े के नाम पर थोड़े से पुराने चिथड़े थे, जिन से बड़ी मुश्किल से उस का एकचौथाई बदन ढक पा रहा था. उस के शरीर पर धूलमिट्टी की ऐसी मोटी परत चढ़ी हुई थी, मानो कई साल से वह नहाई न हो.

मूलक उसे देख कर दया से भर गया और बोला, ‘‘डरो मत तुम. मुझे बताओ कि तुम कौन हो और तुम्हारे साथ क्या हुआ है? तुम्हें कोई सजा नहीं देगा. डरो मत.’’

‘‘मैं चुड़ैल हूं, मुझ से दूर रहो. मैं तुम्हें लग जाऊंगी. तुम्हारा खून पी जाऊंगी, फिर तुम मर जाओगे. मैं चुड़ैल हूं, मुझ से दूर रहो,’’ उस औरत ने रटारटाया रिकौर्ड सा बजाया.

‘‘भूख लगी है तुम्हें? तुम कुछ खाओगी?’’ मूलक ने अपने थैले से केले निकाल कर उस की ओर बढ़ाते हुए धीरे से प्यारभरी आवाज में कहा.‘‘मैं चुड़ैल हूं, खून पीती हूं, मुझ से दूर रहो, मैं चुड़ैल हूं,’’ वह औरत सहमी सी बस यही दोहराती रही.

‘‘अच्छा, डरो मत. ये केले खाओ, मैं पानी ले कर आता हूं,’’ मूलक ने केले उस औरत के हाथ में पकड़ाते हुए कहा और ढाबे से एक पुरानी बालटी उठा कर नदी की ओर पानी लेने के लिए बढ़ गया.

जब मूलक पानी ले कर लौटा तो देखा कि वह औरत 2 केले खा कर आग के पास बैठी थी.

‘‘इधर आओ… लो, मुंह धो लो. इस से तुम्हें अच्छा लगेगा,’’ मूलक ने बालटी ढाबे के चबूतरे पर रखते हुए कहा.

लेकिन, वह औरत अपनी जगह से जरा भी नहीं हिली.

मूलक ने फिर उसे सहारा दे कर उठाया, लेकिन उस औरत के पैरों में तो जैसे जान ही नहीं थी. मूलक ने ध्यान से देखा कि उस औरत के दोनों पैर नीचे से ऊपर तक बुरी तरह घायल थे. पैर ही क्या उस के सारे बदन पर चोटों के नएपुराने न जाने कितने ही घाव थे.

मूलक ने उसे चबूतरे के पास बिठा कर उस के बदन से उस के चिथड़े हटाए और हाथ से पानी डाल कर उसे नहलाने लगा.

‘‘रहने दो मुझे सड़ा. मैं चुड़ैल हूं, मुझ से दूर रहो,’’ चिथड़े हटते ही वह औरत फिर से कांप उठी और सिसकने लगी.

मूलक ने जैसे ही उस औरत के मुंह को धोया, उस का काला रंग उतरने लगा. दूर जल रही आग के उजाले में उस का लाल गेहुंआ रंग दमकने लगा.

जैसेजैसे उस औरत का असली चेहरा नजर आ रहा था, मूलक के दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी.

जैसे ही पूरा मुंह धुलने के बाद मूलक ने आग के उजाले में उस का चेहरा देखा, उस के मुंह से तेज चीख निकल गई, ‘‘मनका… यह तुम हो मनका… क्या हो गया?’’ वह आंसुओं से रोने लगा, ‘‘मनका, इधर देख… मैं मूलक… तेरा अपना मूलक… देख मुझे मनका… पहचान मुझे.’’

‘‘मुझ से दूर रहो, मुझे छोड़ दो, मैं चुड़ैल हूं.’’ वह अभी भी यही शब्द दोहरा रही थी.‘‘होश में आ मनका और बता मुझे कि क्या हुआ तेरे साथ?’’ कहते हुए मूलक ने बालटी का सारा पानी उस के ऊपर डाल दिया और जल्दी से और पानी भर लाया.

मूलक ने कुछ देर अच्छे से मलमल कर मनका को नहलाया और फिर अपने थैले में से निकाल कर उसे अपना कुरता पहनाया. अपनी जींस भी दी. उसे उठा कर फिर आग के पास ले आया और उसे घास पर लिटा कर उस का सिर अपनी गोद में रख कर उस के बाल सहलाते हुए प्यार से बोला, ‘‘मनका, पहचान मुझे. और बता कि क्या हुआ तेरे साथ? कैसे हुई तेरी यह हालत? अरे भूल गई तू, ब्याह हुआ था हमारा 10 साल पहले.

‘‘और जब हमारा मुन्ना हुआ, तो खर्चे की फिक्र और मुन्ने को अच्छी जिंदगी देने की लालसा में मैं रुपए कमाने शहर चला गया था…

‘‘और मुन्ना…? अरे, मुन्ना कहां है मनका? बोल मनका, मुन्ना कहां है हमारा?’’ मूलक उसे झकझोरते हुए बोला.

‘‘मुन्ना… चुड़ैल खा गई. उसे, मैं उस का खून पी गई. मैं चुड़ैल हूं न, मुझ से दूर रहो. मैं अपने मुन्ना को खा गई, खून पी गई उस का,’’ मनका खोखली हंसी हंसने की कोशिश करतेकरते रोने लगी.

‘‘होश में आ मनका. बता मुझे यहां यह सब क्या हुआ है? क्या हुआ हमारे मुन्ना को? उन सारे रुपयों का क्या हुआ, जो मैं ने तुम्हें भेजे थे? और मेरी चिट्ठी? कहां हैं सब मनका?’’ मूलक रोते हुए मनका को झकझोर रहा था.

‘‘मैं चुड़ैल हूं, मुझे छोड़ दो, मैं सब को खा गई,’’ मनका जैसे इस के अलावा कुछ बोलना जानती ही नहीं थी.

‘‘होश में आओ मनका. मैं मूलक हूं तुम्हारा पति, तुम्हारे मुन्ना का पिता. बताओ क्या हुआ है यहां?’’ मूलक ने एक जोरदार तमाचा अपनी मनका के गाल पर मारा, जिस से उसे जोर का झटका लगा और वह रोने लगी.

मूलक ने उसे गले लगा लिया और प्यार से सहलाते हुए बोला, ‘‘होश में आजा मनका, देख मैं तेरा मूलक हूं.’’न्ना के बापू… कहां चले गए थे तुम… तुम्हारे पीछे तुम्हारे बड़े भाई और भाभी ने मुझ पर बहुत जुल्म किए, मेरा खानापानी बंद कर दिया और हमारे मुन्ना को न जाने क्या खिला कर मार डाला. उन्होंने लोगों से कहा कि मैं चुड़ैल हूं और अपने बेटे को खा गई.

‘‘उन्होंने मुझे तुम्हारा भेजा कोई पैसा कभी नहीं दिया. जब मैं ने उन से मनीऔर्डर के बारे में पूछा, तो उन्होंने पंचायत बुला कर मुझे चुड़ैल कह कर मारपीट कर गांव से निकाल दिया.

‘‘अब तो 2-3 साल हो गए मुन्ना के बापू, मैं यहीं जंगल में अपने दिन पूरे कर रही हूं. दिन में मैं जंगली झाडि़यों में छिपी रहती हूं और रात को निकल कर जंगली फलों से अपना पेट भरती हूं.

‘‘रात में जब कभी कोई मर्द मुझे पकड़ लेता है, तो चुड़ैल की सजा के नाम पर मेरे साथ…’’ मनका अब मूलक के गले लग कर रो रही थी.

‘‘ओह… यह सब क्या हो गया. अच्छा मनका, तुम ये बिसकुट खाओ और पानी पी कर आराम करो. हमें आधी रात के बाद बहुत दूर निकलना है,’’ इतना कह कर मूलक नदी की ओर बढ़ गया.

इधर मनका बदले की आग में सुलग रही थी. उसे रहरह कर अपने मुन्ना की याद आ रही थी. तभी अचानक वह उठी और एक जलती हुई लकड़ी उठा कर गांव की तरफ चल दी.

जब तक मूलक वापस आया, तब तक मनका भी लौट आई थी. मूलक को जरा भी अंदाजा नहीं था कि उस के पीछे से मनका ने क्या कांड कर दिया है. मूलक तो बस अपनी मनका को कंधे पर उठा कर बड़ी सड़क की ओर बढ़ गया.

अगले दिन अखबारों में छपा था, ‘एक चुड़ैल ने रात को एक पूरे परिवार समेत 20 लोगों को जला कर मार डाला. यह चुड़ैल बहुत दिन से गांव के बाहर जंगल में रह रही थी. घटना के बाद से चुड़ैल को किसी ने नहीं देखा. सरकार ने जंगल को खतरनाक मानते हुए लोगों को दूसरी जगह बसाने का फैसला लिया है और यह रास्ता बंद कर दिया है’

चिनम्मा: कौन कर रहा था चिन्नू का इंतजार ?

एक सीमित सी दुनिया थी चिनम्मा की. गरीबी में पलीबढ़ी वह, फिर भी पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी लेकिन उस के अप्पा की मंशा तो कुछ और ही थी…

पढ़तेपढ़ते बीच में ही चिनम्मा दीवार पर टंगे छोटे से आईने के सामने खड़े हो ढिबरी की मद्धिम रोशनी में अपना चेहरा फिर से बड़े गौर से देखने लगी. आज उस का दिल पढ़ाई में बिलकुल नहीं लग रहा था. शाम से ले कर अब तक न जाने कितनी बार आईने के सामने खड़ी हो वह खुद को निहार चुकी थी. बड़ीबड़ी कजरारी आंखें, खड़ी नाक, सांवला पर दमकता रंग और मासूमियतभरा अंडाकार चेहरा. तभी हवा का एक ?ोंका आया और काली घुंघराली लटों ने उस के आधे चेहरे को ढक कर उस की खूबसूरती में चारचांद लगा दिए. एक मधुर, मंद मुसकान उस 18 वर्षीया नवयुवती के चेहरे पर फैल गई. उसे अपनेआप पर नाज हो रहा था. हो भी क्यों न. किसी ने आज उस की तारीफ करते हुए कहा था, ‘चिनम्मा ही है न तू, क्या चंदा के माफिक चमकने लगी इन 3 सालों में, पहचान में ही नहीं आ रही तू तो.’

तभी अप्पा की कर्कश आवाज आई, ‘‘अरे चिन्नू, रातभर ढिबरी जलाए रखेगी क्या? क्या तेल खर्च नहीं हो रहा है?’’ तेल क्या तेरा मामा भरवाएगा. चल ढिबरी बुझा और सो जा चुपचाप. अप्पा की आवाज सुन कर वह डर गई और ?ाट से ढिबरी बु?ा कर जमीन पर बिछी नारियल की चटाई पर लेट गई. अप्पा शराब के नशे में टुन्न था. चिनम्मा को पता था कि ढिबरी बु?ाने में जरा सी भी देर हो जाती तो वह मारकूट कर उस की हालत खराब कर देता. अगर अम्मा बीचबचाव करने आती, तो उसे भी चुनचुन कर ऐसी गालियां देता कि गिनना मुश्किल हो जाता. पर आज उसे नींद भी नहीं आ रही थी. रहरह कर साई की आवाज उस के कानों को ?ांकृत कर रही थी.

चिनम्मा एक गरीब मछुआरे की इकलौती बेटी है. उस के आगेपीछे कई भाईबहन आए, पर जिंदा नहीं बच पाए. अम्मा व अप्पा और गांववालों को विश्वास है कि ऐसा समुद्र देवता के कोप के कारण हुआ है. चूंकि समुद्र के साथ मछुआरों का नाता अटूट होता है, इसलिए अपनी जिंदगी में घटित होने वाले सारे सुखोंदुखों को वे समुद्र से जोड़ कर ही देखते हैं. अप्पा चिनम्मा को प्यार करता है पर जब ज्यादा पी लेता है तो बेटा नहीं होने की भड़ास भी कभीकभी मांबेटी पर निकालता रहता है.

लंबेलंबे नारियल और ताड़ के वृक्षों से आच्छादित चिनम्मा का छोटा सा गांव यारडा, विशाखापट्टनम के डौल्फिन पहाड़ी की तलहटी में स्थित है, जिस का दूसरा हिस्सा बंगाल की खाड़ी की ऊंची हिलोरें मारती लहरों से जुड़ा हुआ है. आसपास का दृश्य काफी लुभावना है. लोग दूरदूर से यारडा बीच (समुद्र तट) घूमने आते हैं. प्राकृतिक सौंदर्य से यह गांव व इस के आसपास का इलाका जितना संपन्न है आर्थिक रूप से उतना ही विपन्न.

गांव के अधिकांश निवासी गरीब मछुआरे हैं. मछली पकड़ कर जीवननिर्वाह करना ही उन का मुख्य व्यवसाय है. 30-35 घरों वाले इस गांव में 5-6 पक्के मकान हैं जो बड़े और संपन्न मछुआरों के हैं. बाकी सब ?ोंपडि़यां ईटपत्थर और मिट्टी की बनी हैं, जिन पर टीन और नारियल के छप्पर हैं. गांव में 2 सरकारी नल हैं, जहां सुबहशाम पानी लेने वालों की भीड़ लगी रहती है. नजर बचा कर एकदूसरे के मटके को आगेपीछे करने के चक्कर में लगभग रोज वहां महाभारत छिड़ा रहता है. कभीकभी तो हाथापाई की नौबत भी आ जाती है.

गांव से करीब एक किलोमीटर पर 12वीं कक्षा तक का सरकारी विद्यालय है जहां आसपास के कई गांव के बच्चे पढ़ने जाते हैं. कहने को तो वे बच्चे विद्यालय जाते हैं पढ़ने, पर पढ़ने वाले इक्कादुक्का ही हैं, बाकी सब टीवी, सिनेमा, फैशन, फिल्मी गाने और सैक्स आदि की बातें ही करते हैं. उन्हें पता है कि बड़े हो कर मछली पकड़ने का अपना पुश्तैनी धंधा ही करना है तो फिर इन पुस्तकों को पढ़ने से क्या फायदा?

पर चिनम्मा इन से थोड़ी अलग है. वह बहुत ध्यान से पढ़ाई करती है. उसे बिलकुल पसंद नहीं है मछुआरों की अभावभरी जिंदगी, जहां लगभग रोज ही मर्र्द शराब के नशे में औरतों, बच्चों से गालीगलौज और मारपीट करते हैं. ये औरतें भी कुछ कम नहीं. जब मर्द अकेला पीता है तो उन्हें बरदाश्त नहीं होता, अगर हाथ में कुछ पैसे आ जाएं तो ये भी पी कर मदहोश हो जाती हैं.

गांव में सरकारी बिजली की सुविधा भी है. फलस्वरूप हर ?ोंपड़ी में चाहे खाने को कुछ न भी हो पर सैकंडहैंड टीवी जरूर है. हां, यह बात अलग है कि समुद्री चक्रवात आने या तेज समुद्री हवा चलने के कारण अकसर इस इलाके में बिजली 8-10 दिनों के लिए गुल हो जाती है. अभी 3 दिनों पहले आए समुद्री हवा के तेज ?ोंके से बिजली फिर गुल हो गई है गांव में. शायद 2-4 दिन और लगें टूटे तारों को ठीक होने और बिजली आने में. तब तक तो ढिबरी से ही काम चलाना पड़ेगा पूरे गांव वालों को.

आज अम्मा जब काम से लौटी तो शाम होने वाली थी, ज्यादा थकी होने के कारण उस ने चिन्नू (चिनम्मा) को रामुलु अन्ना से उधार में केरोसिन तेल लाने भेजा था. अन्ना ने उधार के नाम पर तेल देने से मना कर दिया क्योंकि पहले का ही काफी पैसा बाकी था उस का. पर चिन्नु कहां मानने वाली थी, मिन्नतें करने लगी, ‘‘अन्ना तेल दे दो वरना अंधेरे में खाना कैसे बनाऊंगी आज मैं? अम्मा ने कहा है, अभी अप्पा पैसे ले कर आने वाला है. अप्पा जैसे ही पैसे ले कर आएगा, मैं दौड़ कर तुम्हें दे जाऊंगी.’’

अन्ना और चिनम्मा का वार्त्तालाप जारी था. इसी बीच किसी ने 100 रुपए का एक नया नोट अन्ना को पकड़ाते हुए चिनम्मा के पीछे खड़े हो कर कहा, ‘‘अन्ना, एक ठंडी पैप्सी देना, बहुत प्यास लग रही है,’’ आवाज कुछ पहचानी सी लगी. पलट कर चिन्नू ने देखा तो उस से 3 कक्षा आगे पढ़ने वाला उस के स्कूल का सब से शैतान बच्चा साई खड़ा है. वह एकटक उसे देख कर सोचने लगी, यह यहां कैसे? स्कूल में सब कहते थे कि इसे तो इस की शैतानी से परेशान हो कर इस की विधवा अम्मा ने 3 साल पहले ही कहीं भेज दिया था किसी रिश्तेदार के घर.

उसे लगातार अपनी तरफ देख कर साई ने हंसते हुए कहा, ‘‘चिनम्मा ही है न तू, क्या चंदा के माफिक चमकने लगी इन 3 सालों में, पहचान में ही नहीं आ रही तू तो.’’

एकदम से सकपका सी गई वह साई की इस बात को सुन कर. कहना तो वह भी चाहती थी, ‘तू भी तो बिलकुल पवन तेजा (तेलुगू फिल्मी हीरो) की माफिक स्मार्ट और सयाना बन गया है. पर पता नहीं क्यों बोलने में शर्म आई उसे. वह तेल ले, नजर ?ाका, घर भाग आई तेजी से.

अप्पा के आने का समय हो रहा था. ढिबरी जला कर जल्दीजल्दी सूखी मछली का शोरबा और चावल बनाया तथा थोड़ी लालमिर्च भी भून कर रख दी अलग से. अप्पा को भुनी मिर्च बहुत पसंद है. घर का सारा काम निबटा कर पढ़ने बैठ गई. पर पता नहीं क्यों सामने किताब खुली होने पर भी वह पढ़ नहीं पा रही थी आज.

इसी बीच, अप्पा के तेज खर्राटों की आवाज आनी शुरू हो गई. चिनम्मा ने करवट बदली. अम्मा भी बेसुध सो रही थी. खर्राटों की आवाज से उस का सोना मुश्किल हो रहा था. आज ढंग से पढ़ाई न कर पाने के कारण अपनेआप से खफा भी थी वह. चिनम्मा को तो बहुत सारी पढ़ाई करनी है, उसे वरलक्ष्मी मैडम की तरह टीचर बनना है जो उस के स्कूल में पढ़ाती हैं.

रोज साफसुथरी और सुंदरसुंदर साडि़यां पहन कर कंधे पर बड़ा सा बैग लटकाए जब मैडम स्कूल आती हैं तो उन्हें देखते ही बनता है. क्या ठाट हैं उन के? पढ़ाई के संबंध में अम्मा तो उसे कुछ ज्यादा नहीं कहती पर जब किताब खरीदने या स्कूल के मामूली खर्चे की भी बात आती तो अप्पा नाराज हो कर अम्मा से कहने लगता है, ‘देखो, लड़की बिगड़ न जाए ज्यादा पढ़ कर. ज्यादा पढ़ लेगी, तो हमारे मछुआरे समाज में कोई अच्छा लड़का शादी को भी तैयार नहीं होगा. फिर उसे पढ़ा कर फायदा भी क्या? कौन सा हम लोगों के बुढ़ापे का सहारा बनेगी, चली जाएगी दूसरे का घर भरने.’

काफी करवटें बदलने के बाद भी जब उसे नींद नहीं आई तो वह उठ कर ?ोंपड़ी की छोटी सी खिड़की से बाहर देखने लगी. रात के लगभग 10 बजे होंगे. पूरा गांव सो रहा था. बस, बीचबीच में कुत्तों के भूंकने की आवाज आ रही थी. चांद की दूधिया रोशनी से सारा समुद्र बहुत शांत और गंभीर लग रहा था. समुद्रतट पर रखी छोटीछोटी नावों को देख कर ऐसा महसूस हो रहा था मानो वे भी आराम कर रही हों.

मुंहअंधेरे (ढाई से 3 बजे के लगभग) गांव के अधिकांश मर्द अपना जाल समेटे, लालटेन लिए तीनचार समूह बना कर एकएक नाव में बैठ जाएंगे और निकल पड़ेंगे अथाह समुद्र में दूर तक मछलियां पकड़ने. दोचार मछुआरों के पास अपनी नावें हैं, नहीं तो ज्यादातर किराए की नावों का ही प्रयोग करते हैं. समुद्र में जाल डाल कर घंटों इंतजार करना पड़ता है उन्हें. कभी तो ढेर सारी मछलियां हाथ लग जाती हैं एकसाथ, पर कभीकभी खाली हाथ भी आना पड़ता है. वापस आतेआते 9-10 बज जाते हैं. औरतें खाना बना कर पति का इंतजार करती रहती हैं. जैसे ही नाव आनी शुरू हो जाती, शहर से आए थोक व्यापारी मोलभाव कर के सस्ते में मछलियां खरीद कर ले जाते हैं.

बची हुई पारा, सुरमई, पाम्फ्रेड, बांगडा, प्रौन आदि मिश्रित मछलियों को ले कर औरतें तुरंत निकल जाती हैं घरघर बेचने. मर्द खाना खा कर सो जाते हैं. जब तक मर्दों की नींद पूरी होती, तब तक औरतें मछलियां बेच कर मिले पैसों से घर का जरूरी सामान खरीद वापस आ जाती हैं. फिर शाम का खानापीना, शहर की लंबीलंबी बातें, फिल्मों की गपशप, हंसीमजाक और अकसर गालीगलौज भी.

मछुआरों में मुख्यतया हिंदू या ईसाई धर्मावलंबी हैं. पर उन सब का पहला धर्म यह है कि वे मछुआरे हैं. मछली पकड़ने भी रोज नहीं जाया जा सकता, मछुआरे समाज की मान्यता है कि ऐसा करने से समुद्र जल्दी ही खाली हो जाएगा और फिर देवता के कोप से उन्हें कोई बचा नहीं सकता. साल के लगभग 3 महीने जब मछलियों के ब्रीडिंग का समय होता है, मछुआरे समुद्र में मछली मारने नहीं जाते. यह उन का उसूल है. ऐसे समय छोटे मछुआरों के घरों की हालत और खराब हो जाती है. तब इन में से ज्यादातर मजदूरी करने विशाखापट्टनम या हैदराबाद जैसे शहरों में चले जाते हैं.

चिनम्मा का परिवार पहले हिंदू था. पर आर्थिक सहायता मिलने की आशा में अप्पा ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है. और हर रविवार को चर्च जरूर जाता है. घर में चाहे कितनी भी आर्थिक तंगी हो, चिनम्मा का अप्पा तो गांव छोड़ कर कभी कहीं नहीं जाता कमाने. उसे कमाने से ज्यादा पीने से मतलब है. जिस दिन कमाई के पैसे नहीं हों, तो घर का कोई बरतन ही बेच कर अपना काम चला लेता है. अम्मा बेचारी करे भी तो क्या करे? लड़ती?ागड़ती और अपने समय को कोसती हुई अप्पा को गालियां देती रहती है. उस ने तो गृहस्थी चलाने और पेट भरने के लिए डौल्फिन पहाड़ी पर बसी नेवी कालोनी में नौकरानी का काम शुरू कर दिया है.

अप्पा के खांसने की आवाज से चिनम्मा का ध्यान भंग हुआ, वह वापस आ कर लेट गई. सोचतेसोचते पता नहीं कब नींद ने उसे अपनी आगोश में ले लिया. सुबह अम्मा की तेज आवाज से नींद खुली. साढ़े 6 बज गए. आज बिस्तर पर ही पड़ी रहेगी क्या चिन्नू? कौफी बना कर रख दी है, पी लेना. मैं काम पर जा रही हूं.

हड़बड़ा कर उठी तो देखा, अप्पा आज भी मछली पकड़ने नहीं गया. वह रोज कोई न कोई बहाना बना कर घर में ही पड़ा रहता है. कौफी पी कर चिन्नू जल्दीजल्दी घर का सारा काम निबटाने लगी. उसे 9 बजे स्कूल पहुंचना होता है. स्कूल पहुंची, तो देखा स्कूल गेट के पास खड़ा साई उसे तिरछी नजर से देख रहा है. अपना सिर नीचे ?ाका लिया, पर न जाने क्यों दिल को अच्छा लगा.

3 बजे स्कूल की छुट्टी हुई. स्कूल के अधिकांश बच्चे घर चले गए. पर चिनम्मा और उस की कक्षा के कुछ बच्चे स्कूल के राव सर से ट्यूशन पढ़ने के लिए रुक गए. ट्यूशन खत्म होने के बाद सभी अपनेअपने गांव की ओर चल दिए. चिनम्मा भी तेज कदमों से घर की ओर चल पड़ी. तभी उसे लगा कि किसी ने पुकारा ‘चिन्नू’. बढ़ते कदम एकाएक थम गए. पीछे मुड़ कर देखा, साई उस के पीछेपीछे चला आ रहा है.

वह घबरा गई कि कहीं अप्पा ने देख लिया तो? उस की घबराहट देख कर साई ने हंसते हुए कहा, ‘मैं कोई भूत हूं क्या, जो तु?ो खा जाऊंगा?’

चिनम्मा के मुंह से निकला ‘लेकिन अप्पा?’

‘अरे अप्पा की चिंता मत कर तू, दुकान पर बैठ मस्त हो कर दारू पी रहा है. उसे देख कर इस बात की गारंटी है कि अभी कम से कम 2 घंटे तक घर पहुंचने वाला नहीं है वह. और तेरी अम्मा तो इस समय काम पर गई हुई है.’

‘तु?ो ये सारी बातें कैसे पता?’ चिनम्मा ने आश्चर्य से पूछा.

मैं सब चैक कर के आया हूं, साई ने अपनी शरारतभरी आवाज में इस ढंग से कहा कि चिनम्मा को हंसी आ गई. दोनों ही एकसाथ खिलखिला कर हंस पड़े.

चिनम्मा ने कहा, ‘तू इस जन्म में कभी नहीं सुधरेगा साई.’

फिर दोनों साथसाथ चलने लगे. कुछ कदम चलने पर जब चिनम्मा थोड़ी आश्वस्त सी हुई, तो धीरे से बोली, ‘‘एक बात पूछूं, पिछले 3 सालों से कहां था रे तू?’’ मु?ो तो लगा कि अब तो तू लौट कर आएगा ही नहीं अपने गांव.’’

साई बताने लगा, ‘‘मेरी शरारतों और शिकायतों से तंग आ कर अम्मा अचानक मु?ो मामा के पास हैदराबाद ले कर चली गई थी. मेरा मामा वहां मछली की दुकान चलाता है. अच्छा कमाताखाता है. अम्मा ने अपने भाई से कहा कि तू इस की पढ़ाई करवा दे और बदले में यह सुबहशाम तुम्हारी दुकान पर काम कर दिया करेगा मुफ्त में. जब लायक बन जाए तो भाई तेरी बेटी को मैं अपनी बहू बना लूंगी बिना दहेज के. (यहां पाठकों को यह बताना आवश्यक है कि दक्षिण भारत के कुछ राज्यों के सभी धर्मों में सगे ममेरेफुफेरे भाईबहनों की शादी को समाज द्वारा स्वीकृति है).

‘‘मामा खुश हो गया यह सुन कर. उस ने मेरा नाम टीवी रिपेयरिंग डिप्लोमा कोर्स’ में लिखवा दिया. मैं भी खुशीखुशी जाने लगा. खूब बड़ा शहर है हैदराबाद, चारों तरफ मोटरगाडि़यां और चकाचौंध करने वाली भीड़. जब तक अम्मा हैदराबाद रही, सबकुछ ठीकठाक चलता रहा. पर जैसे ही वह मु?ो छोड़ कर गांव चली आई, मामी का व्यवहार मेरे लिए बदल गया. वह रोज किसी न किसी बहाने मु?ो पढ़ने जाने से रोकने की कोशिश करती. वह मामा और मु?ा से लड़ाई भी करती रहती. उसे और उस की बेटी को मेरा वहां रहना, खाना और मामा द्वारा मेरी फीस भरना बिलकुल नहीं भाता था. कारण, मामी अपने सगे भाई के बेटे से अपनी बेटी की शादी करना चाहती थी. मैं उसे गंवार और निकम्मा लगता था.

‘‘उन दिनों मु?ो पहली बार अपने अम्माअप्पा और गांव की बहुत याद आई. जब मामा के घर में रहना मुश्किल हो गया तो एक दिन चुपचाप मैं घर से भाग गया किसी अनजान महल्ले में. एक संकल्प के साथ कि जीवन में कुछ बन कर मामी और उस की बेटी को दिखा दूंगा. उस के बाद से अपना खर्चा चलाने के लिए मैं सुबह क्लास करता और शाम के समय दुकान में नौकरी करता. इसी तरह मैं ने टीवी रिपेयरिंग डिप्लोमा कोर्स के बाद धीरेधीरे मोबाइल और कंप्यूटर रिपेयरिंग कोर्स भी कर लिया और पिछले एक साल से हैदराबाद की एक बड़ी दुकान में काम कर रहा हूं. छुट्टी ले कर अम्मा को देखने आया हूं.’’

चिनम्मा ने साई को छेड़ते हुए कहा, ‘‘तेरी बातें सुन कर लगता है कि अब तो बड़ा सयाना और सम?ादार हो गया है रे तू तो. अच्छा बता, इतने दिनों बाद गांव आ कर तु?ो कैसा लग रहा है, कहीं वापस तो नहीं चला जाएगा शहर फिर से?’’

साई उस के जरा नजदीक आ कर बोला, ‘‘सच कहूं, तो ज्यादा कुछ अच्छा नहीं लगा यहां आ कर. कहीं कुछ भी तो नहीं बदला है इस इलाके में. मेरा अप्पा देशी शराब पीपी कर बेमौत मर गया और तेरे अप्पा जैसे लोग मरने की तैयारी में हैं. मैं तो वापस जाने की सोच रहा था पर समय की कृपा से तभी कल तू दिख गई रामुलु अन्ना की दुकान पर. और तब से अब सबकुछ अच्छा लगने लगा है मु?ो.’’ यह कह कर साई ने प्यार से चिनम्मा का हाथ पकड़ लिया.

‘‘धत,’’ कह कर चिनम्मा ने अपना हाथ छुड़ाया और शरमा कर घर भाग आई.

फिर कई दिनों तक दोनों स्कूल से लौटते वक्त किसी न किसी बहाने मिलते रहे. एकदूसरे के साथ रहना अच्छा लगने लगा था उन्हें. शायद प्यार का अंकुर फूट चुका था दोनों के दिलों में.

बातों ही बातों में साई ने बताया कि वह गांव की अपनी ?ोंपड़ी बेच कर शहर में दुकान खोलने जा रहा है टीवी, मोबाइल और कंप्यूटर रिपेयरिंग की, क्योंकि अब उसे अच्छा अनुभव हो गया है अपने काम का.

चिनम्मा ने भी जब भविष्य में अपने टीचर बनने की बात बताई साई को तो साई ने पूछा, ‘‘लेकिन तू टीचर बनेगी कैसे? तु?ो तो शहर जाना पड़ेगा टीचर बनने का कोर्स (टीचर्स ट्रेनिंग) करने, और तेरा अप्पा तो पक्का नहीं भेजेगा तु?ो.’’

‘‘हां, यह बात तो मैं भी जानती हूं, पर मैं कर भी क्या सकती हूं?’’ निराशाभरे स्वर में चिनम्मा ने कहा.

‘‘एक उपाय है,’’ साई ने कहा.

‘‘वह कौन सा है, बता तो जरा?’’ चिनम्मा ने उत्सकुता से पूछा.

‘‘तू मु?ा से शादी कर ले और चल शहर मेरे साथ आगे की पढ़ाई करने,’’ पता नहीं कैसे साई अपने मन की बात बोल गया अचानक.

‘‘बुद्धू, यह कैसे हो सकता है भला? हम दोनों 2 धर्म के हैं, तू हिंदू और मैं ईसाई. अगर दोनों के घरवालों और समाज को पता चल गया तो तेरीमेरी खैर नहीं, मार कर फेंक देंगे हमें,’’ कह कर चिनम्मा चुप हो गई.

‘‘2 धर्म के हुए तो क्या हुआ, दिल तो मिलता है न अपना. शादी के बाद तू अपना धर्म मानेगी और मैं अपना. हम चर्च और मंदिर दोनों जगह जाया करेंगे, क्या फर्क पड़ता है इन बेबुनियादी बातों से. अगर हिम्मत और हौसला हो तो कोई परिवार और समाज नहीं रोक सकता हम दोनों को,’’ फिल्मी हीरो की तरह बोला साई.

‘‘पर ऐसा करने से तो अप्पा की इज्जत चली जाएगी. मेरे साथ मेरी अम्मा को भी मार डालेगा वह. मु?ो नहीं जाना अपने अम्माअप्पा को छोड़ कर किसी अनजान शहर में कहीं दूर तेरे साथ,’’ चिनम्मा ने छोटे बच्चे की तरह कहा.

उस का डरना स्वाभाविक ही था. असल जिंदगी में वह अपने गांव, चर्च और आसपास के इलाके को छोड़ कर कहीं नहीं गई थी अभी तक.

साई हंसने लगा. फिर गंभीर स्वर में बोला, ‘‘तू बेवकूफ और डरपोक है चिन्नू, जिंदगी में कुछ बनना तो चाहती है पर हिम्मत करने से डरती है. अगर मैं भी तेरी तरह मामी की गालियों और जुल्मों से डर जाता तो कभी भी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाता. बस, मामा की दुकान का एक नौकर बन कर रह जाता.’’

कुछ दिनों बाद साई चला गया, पर जातेजाते अपना, फोन नंबर दे गया अपनी चिन्नू को. यह कह कर, ‘‘जब दिल करे फोन कर लेना दोस्त सम?ा कर.’’ एकदो बार उस का दिल किया साई को फोन करने का, पर अप्पा का खयाल कर वह डर गई.

3 महीने बीत गए. 12वीं की परीक्षा के फौर्म भरने के लिए चिनम्मा को रुपयों की जरूरत थी. अप्पा से तो मांगने का प्रश्न ही नहीं था. बदले में उसे इतनी गालियां मिलतीं, इस का अनुमान कर के ही कांप जाती. पर वह अपना एक साल बरबाद भी नहीं करना चाहती थी. वह रुपए लाए कहां से. बड़ी हिम्मत कर के दबी जबान से अम्मा को बता रही थी, तभी पता नहीं कहां से अप्पा आ गया. आते ही बोला, ‘‘क्या बातें कर रही हो दोनों मांबेटी?’’ अम्मा के बताने पर उस ने तुरंत पूछा, ‘‘कितने रुपए चाहिए तु?ो 12वीं पास करने के लिए?’’

चिनम्मा अवाक रह गई जब अप्पा ने 100-100 के 4 नोट उस के हाथ पर रख दिए. ‘अप्पा के पास इतने रुपए आए कहां से,’ सोचते हुए उस ने पैसे ले लिए. अगले दिन स्कूल जा कर परीक्षा का फौर्म भर दिया चिनम्मा ने. पर उस ने यह भी महसूस किया कि आजकल अप्पा बहुत खुश रहता है और उसे डांटतामारता भी नहीं. तो उस का मन शंका से भर उठा.

12वीं की फाइनल परीक्षा शुरू हो चुकी थी. अंतिम परीक्षा दे कर स्कूल से आने के बाद चिनम्मा ने देखा अम्माअप्पा बड़े मेलमिलाप से धीरेधीरे कुछ बातें कर रहे हैं. उत्सुकता हुई तो दवेपांव अंदर आ कर वह उन की बातें सुनने लगी.

अप्पा अम्मा से कह रहा था कि परसों सोमवार को तू छुट्टी ले ले अपने काम से. शहर जाना है.

अम्मा बोली, ‘‘मगर क्यों?’’

अप्पा ने कहा, ‘‘चिन्नू का पासपोर्ट बनवाना है.’’

‘‘12वीं परीक्षा पास करने के लिए पासपोर्ट बनवाना पड़ता है क्या?’’ अम्मा ने भोलेपन से पूछा.

‘‘अरे नहीं रे, बिलकुल पागल है तू तो,’’ अम्मा को ?िड़कते हुए अप्पा ने कहा, ‘‘मैं ने चिन्नू की शादी तय कर दी है, अपनी मुंहबोली बहन पद्मा अक्का के बेटे नागन्ना से.’’

‘‘वही नागन्ना जो पुलिस के डर से अपनी बीवी और दुधमुंहे बच्चे को छोड़ कर कहीं गायब हो गया था कुछ सालों पहले,’’ अम्मा ने घबरा कर कहा.

‘‘अरे, अब वह पुराना वाला नागन्ना कहां रहा. दुबई में काम करता है. अच्छा कमाताखाता है. पुलिस भी उस का कुछ नहीं कर सकती अब तो. अक्का बता रही थी कि जब वह देश आएगा तो पैसे खर्च कर सारा मामला दबा देगा,’’ अप्पा ने जवाब दिया.

‘‘नहीं करना मु?ो अपनी चिन्नू की शादी ऐसे मवाली से, फिर तेरी पद्मा अक्का कौन सी भली औरत है,’’ यह कह कर अम्मा सुबकने लगी.

‘‘बहुत पैसा है नागन्ना के पास, अपनी चिन्नू राज करेगी वहां. फिर सोच, इस जमाने में बिना दहेज के कौन शादी करेगा हमारी बेटी से. नागन्ना ने दहेज मांगने के बजाय उलटे कहा है कि अगर शादी हो गई तो वह हमें भी हर महीने कुछ पैसे भेजा करेगा अपनी कमाई के. सोच, फिर तु?ो कहीं काम पर भी जाना नहीं पड़ेगा, घर पर आराम से रहेगी तू मेरी रानी बन कर,’’ अप्पा लाड़ से बोला.

‘‘शादी कब होगी?’’ अम्मा के पूछने पर अप्पा बोला, ‘‘12वीं के बाद अपनी चिन्नू दुबई चली जाएगी पद्मा अक्का के साथ. जहां नागन्ना काम करता है. शादी भी वहीं जा कर होगी दोनों की. इसलिए पासपोर्ट बनवाना जरूरी है.’’

यह सुन कर अम्मा शांत हो गई भविष्य में मिलने वाले सुख की कल्पना कर के. गरीबी और अभावभरी जिंदगी होती ही ऐसी है कि जरा सी सुख की चाहत इंसान से हर तरह के सम?ौते करवा लेती है.

यह सब सुन कर सन्न रह गई चिनम्मा. अब उसे सम?ा आ गया कि अप्पा ने पैसे क्यों दिए थे फौर्म भरने के लिए, क्यों खुश रहता है वह आजकल? यह सोच कर कि अप्पा ने उस का सौदा किया है अपने पीने के वास्ते, रातभर रोती रही तकिए में मुंह छिपा कर वह. मन फट गया था उस का अप्पाअम्मा की तरफ से. नहीं माननी है उसे अप्पा की कोई बात, नहीं करनी है उसे उस आपराधिक प्रवृत्ति वाले नागन्ना से शादी, चाहे कितने भी पैसे हों उस के पास या अपने ही धर्म का हो. यह सब सोच कर उस की आंखों से बहने वाले आंसुओं की धार तेज हो गई और उन आंसुओं के साथ धीरेधीरे उस की भय, चिंता और परेशानी सब बह गए.

सुबह उठी, तो दिल और दिमाग थोड़ा शांत था. उसे बारबार साई की कही बात याद आने लगी थी, ‘तू बेवकूफ और डरपोक है चिन्नू, जिंदगी में कुछ बनना तो चाहती है पर हिम्मत करने से डरती है,’ ठीक ही तो कह रहा था साई. मु?ा में हिम्मत की कमी थी अब तक. पर अब नहीं. अब वह किसी से भी नहीं डरेगी, अपने अप्पा से तो बिलकुल नहीं.

ऐसा निश्चय कर पूर्ण आत्मविश्वास के साथ चिनम्मा चुपचाप निकल पड़ी साई को फोन करने.

पता नहीं, क्या बात हुई दोनों में, 2 दिनों बाद पासपोर्ट बनवाने विशाखापट्टनम गई चिनम्मा अचानक गायब हो गई. अम्माअप्पा ने बहुत ढूंढ़ा, पर कुछ पता नहीं चला. रोतेबिलखते दोनों गांव वापस आ गए. कुछ दिनों तक उस के गायब होने की चर्चा होती रही, फिर सबकुछ शांत हो गया. 6 वर्षों बाद वह लौटी अपने साई के साथ उसी स्कूल की मैडम बन कर, जहां वह पढ़ती थी. उस की गोद में एक नन्ही सी गुडि़या भी थी.

News Kahani: रेप की सजा

‘‘अब उन्होंने ऐसा क्या कर दिया, जो आप ने अपनी सारी शर्म बेच खाई. मेरे पिताजी हैं वे और आप उन्हें इतना गंदा बोल रहे हैं,’’ हरपाल की बीवी दयावती ने अपना माथा पीटते हुए कहा.

‘‘ज्यादा चपरचपर मत कर. तेरा भाई कौन सा कम है. बहन का… इतने साल हो गए शादी को, मेरी कोई इज्जत ही नहीं है,’’ हरपाल दारू की बोतल नीट ही गटकते हुए बोला और फिर बच्चों के सामने ही गालियां बकने लगा.

हरपाल कुछ साल पहले ही गांव से दिल्ली आया था. ट्रांसपोर्ट का धंधा था, जो चमक गया. पैसा तो आ गया, पर

यह जो गाली देने की लत लगी थी, वह नहीं गई.

दयावती मौके की नजाकत सम?ाते हुए रसोईघर में चली गई थी. वह ऐसा ही करती थी, जब भी हरपाल का दिमाग फिरता था, वह गूंगी गाय बन जाती थी.

कुछ भी हो, दयावती दया का भंडार थी. हरपाल से उस की शादी 20 साल पहले हुई थी. अब वह 3 बच्चों की

मां बन गई थी, पर कोई भी ऐसा दिन नहीं था, जब हरपाल दयावती के घर वालों को गंदीगंदी गालियां नहीं देता था. उन्हें ही क्या, हरपाल, जो कहने को दिल्ली की मालवीय नगर कालोनी में रहता था, अपने पड़ोसियों पर भी बिना कुछ सोचेसम?ो गालियों की बौछार कर देता था.

यही वजह थी कि कोई भी पड़ोसी हरपाल के घर से बच कर ही निकलता था. हैरत की बात तो यह थी कि हरपाल के बच्चे भी उसी की राह पर थे. बड़ी बेटी मोनिका 18 साल की थी और कालेज के पहले साल में पढ़ रही थी. हरपाल का बेटा शेखर 15 साल का था और एक बढि़या प्राइवेट स्कूल में पढ़ता था. उसी के साथ 12 साल की छोटी बहन संगीता भी पढ़ती थी.

हरपाल के बातबात पर गाली देने की वजह से उस के बच्चे भी हाथ से निकल गए थे. शेखर तो हरपाल से ही भिड़ जाता था. पढ़ाई में वह निल बटे सन्नाटा था, पर गाली देने में अपने बाप का भी बाप.

एक दिन तो शेखर ने घर के बाहर खड़े हो कर अपने बाप को ही गाली देदे कर नंगा कर दिया था. दोनों में खूब मांबहन की हुई थी. बीच में कुछ पड़ोसी आ गए थे, बापबेटे को चुप कराने के लिए, पर हरपाल और शेखर ने उन्हीं पर गालियों की बौछार कर दी. पड़ोस में रहने वाले गुप्ताजी तो इतने डर गए थे कि कुछ दिनों के लिए परिवार के साथ पहाड़ों पर कहीं घूमने चले गए थे.

एक दिन तो मोनिका अपनी सोसाइटी के सिक्योरिटी गार्ड से ही भिड़ गई थी. दरअसल, वह डीप कट का सूट पहन कर कालेज जा रही थी. उस के उभार उछल रहे थे.

गार्ड सीने पर हाथ रख कर बोला, ‘‘इतना भी मत उछाल कि बाहर ही न आ जाएं.’’

जब मोनिका ने उस गार्ड की तरफ देखा, तो वह दाएंबाएं देखने लगा. मोनिका मां की गाली देते हुए बोली, ‘‘ज्यादा मर्द बनता है न. इतना कस कर दबाऊंगी कि फिर खड़ा रहने लायक नहीं बचेगा.’’

यह कहानी अकेले हरपाल के घर की नहीं है, बल्कि पूरे भारत में गाली देने वालों की भरमार है. कुछ लोग तो अपने मवेशियों तक को भी मांबहन की गालियां देने से गुरेज नहीं करते हैं.

90 फीसदी से ज्यादा गालियां लड़कियों और औरतों के नाजुक अंगों से जुड़ी होती हैं. गालीगलौज मर्दों में होता है, पर शरीर औरतों का उघाड़ा जाता है. मांबहन, चाचीताई, सालीभौजाई सब के नाम से खूब गालियां बनी हुई हैं.

पर हरपाल जैसे परिवारों की अक्ल पर तो जैसे पत्थर पड़े होते हैं. बदला लेने के लिए होता है. किसी को काबू में रखने के लिए, किसी को डराने के लिए, किसी को सरेआम अपनी ही नजरों में नीचा गिराने के लिए, सिर्फ मजा लेने के लिए वे सब के सामने धड़ल्ले से गालियों का इस्तेमाल करते हैं.

बीए में पढ़ने वाली मोनिका का भी यही सोचना है. वह कहती है, ‘‘हम लड़कियां वे सभी गालियां देती हैं, जो लड़के देते हैं. ओटीटी प्लेटफार्म पर आने वाली फिल्मों और सीरियलों ने गालियों को ‘कूल’ बना दिया है यानी गालियां बातचीत का सहज हिस्सा बन गई हैं. अगर गालियों का इस्तेमाल न हो, तो लगता है कि हम नए जमाने के नहीं हैं.’’

मोनिका भले ही गंदी जबान की थी, पर खूबसूरत बदन की मालकिन थी. साढ़े 5 फुट कद, गोरा रंग, लंबे बाल, बड़ेबड़े उभार, मदमस्त चाल के चलते वह कालेज में हर मनचले की पहली पसंद बन गई थी.

कालेज में 23 साल का चपरासी बृजेश तो दिनरात मोनिका के सपने देखता था. मोनिका की बेलगाम जबान के चलते वह सोचता था कि यह लड़की जल्दी से पके आम की तरह उस की ?ाली में आ जाएगी.

एक दिन बृजेश ने मौका देख कर मोनिका से कहा, ‘‘मैडम, मेरी छोटी बहन 12वीं क्लास में आई है. घर में आप की पुरानी किताबें होंगी. अगर मुझे मिल जातीं तो मेरा खर्चा बच जाता.’’

मोनिका बोली, ‘‘अबे बहन के टके. इतनी सी बात है. कल दिन में घर आ जाना. घर पर कोई नहीं होगा, तो मैं तुझे आराम से किताबें दे दूंगी.’’

अगले दिन सुबह की बात है. हरपाल अखबार पढ़ रहा था. कोलकाता में लेडी डाक्टर के साथ रेप और फिर मर्डर

का कांड हो चुका था. पूरे देश में इस अपराध को ले कर डाक्टरों में गुस्सा था. आरोपी संजय राय की सीबीआई में पेशी चल रही थी.

इस पूरे मामले की बात करें, तो सीबीआई के सूत्रों के मुताबिक, यह कांड होने से पहले पीडि़ता महिला ट्रेनी डाक्टर और 2 साथियों ने आधी रात के आसपास खाना खाया था, जिस के बाद वे सैमिनार रूम में गए और ओलिंपिक में नीरज चोपड़ा का भाला फेंक कंपीटिशन टीवी पर देखा.

इस के बाद रात के तकरीबन 2 बजे दोनों साथी सोने चले गए, जहां ड्यूटी पर मौजूद डाक्टर आराम कर रहे थे, जबकि महिला ट्रेनी डाक्टर सैमिनार रूम में ही रुकी रही. वहीं, इंटर्न का कहना है कि वह रूम में था. दरअसल, ये तीनों कमरे सैमिनार रूम, स्लीप रूम और इंटर्न रूम तीसरी मंजिल पर एकदूसरे के करीब ही बने हुए हैं.

इस के बाद सुबह के तकरीबन साढ़े 9 बजे पोस्ट ग्रेजुएट ट्रेनी डाक्टरों में से एक, जिस के साथ पीड़िता ने पिछली रात खाना खाया था, वार्ड का राउंड शुरू होने से पहले उसे देखने गया. कोलकाता पुलिस की टाइमलाइन के मुताबिक, उस ने दूर से उस का शव अर्धनग्न अवस्था में देखा. फिर उस ने अपने साथियों और सीनियर डाक्टरों को घटना की जानकारी दी.

‘‘बड़ा मादर… निकला,’’ यह खबर पढ़ते ही हरपाल के मुंह से गाली निकल गई.

शेखर और संगीता स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे. शेखर बोला, ‘‘अरे पापा, लड़की ने ही उकसाया होगा. जवानी मचल रही होगी. आजकल तो शादी से पहले ही सबकुछ हो जाता है.’’

दयावती ने अपने सपूत को टेढ़ी निगाह से देखा जरूर, पर वह बोली कुछ नहीं. पर मोनिका कहां चुप रहने वाली थी, ‘‘तुझे पता भी है कि आजकल रेप के कितने केस आते हैं… कभी कोलकाता, कभी महाराष्ट्र, कभी दिल्ली… कम उम्र की बच्चियों को भी नहीं छोड़ते हैं… और तू ने कोलकाता के केस वाले आरोपी के बारे में नहीं पढ़ा?’’

‘‘क्या…?’’ शेखर ने सवाल किया, ‘‘पर, वह लड़की भी कम चालू नहीं रही होगी.’’

मोनिका ने शेखर को एक भद्दी सी गाली देते हुए आरोपी संजय राय की खबर के बारे में बताया, ‘‘सीबीआई ने आरोपी संजय राय का साइकोलौजिकल टैस्ट किया है. इस टैस्ट के दौरान संजय से कई सवाल किए गए थे. उस के मोबाइल फोन से मिले पौर्न वीडियो को ले कर भी सवाल हुए थे.

‘‘संजय राय ने इस टैस्ट के दौरान यह भी बताया था कि वह रैडलाइट एरिया जाता रहता था. उस ने कबूल किया कि वारदात के दिन पौर्न वीडियो देखे थे.

‘‘ऐसे लोगों में हाइपरसैक्सुअलिटी डिसऔर्डर होता है और इस बीमारी से पीडि़त कुछ इनसान हर दिन अपनी सैक्स इच्छा किसी न किसी तरह पूरी करना चाहता है. ऐसे आदमी शरीर की जरूरत पूरी करने के लिए किसी भी तरह का अपराध कर सकता है और उस के मन में अफसोस तक नहीं होता है.’’

‘‘तू कुछ भी कह, लड़की की भी गलती रही होगी. कोई भी बेवजह ही सरकारी सांड़ नहीं बनता है,’’ शेखर ने अपनी बात रखी और संगीता के साथ स्कूल चला गया.

आज मोनिका के कालेज में छुट्टी थी. पापा के अपने काम पर और मम्मी के मौसी के घर जाने के बाद वह घर पर अकेली थी. चूंकि घर पर थी तो उस ने ढीली सी टीशर्ट और टाइट शौट्स पहनी हुई थी. टीशर्ट के नीचे ब्रा भी नहीं थी. उस के उभार ?ालक रहे थे.

इधर, बृजेश मोनिका के घर के लिए निकल चुका था. उसे लगता था कि मोनिका बिंदास है, लड़कों की तरह गालियां देती है, तो वह आसानी से मान जाएगी और वह आज अपनी हसरत पूरी कर लेगा.

दरवाजे की घंटी बजी, तो मोनिका को लगा कि मां जल्दी आ गई हैं. वह उन्हीं कपड़ों में दरवाजा खोलने चली गई. पर सामने बृजेश को देख कर ठिठक गई. उधर, जब बृजेश ने मोनिका को ऊपर से नीचे तक देखा, तो उस की लार टपकने लगी.

मोनिका ने पूछा, ‘‘क्या काम है?’’

बृजेश ने किताबों की याद दिलाई, तो मोनिका ने उसे भीतर बुला लिया. वह अपने कमरे में किताबें लेने चली गई, तो पीछेपीछे ब्रजेश भी चला आया. उसे पसीना आ रहा था. अब उसे मोनिका बस देह लग रही थी. उस का जिस्म

तनाव से भर गया. वह हरी झंडी समझ रहा था, तो उस ने कमरे में जाते ही कुंडी लगा दी.

मोनिका यह देखते ही सावधान हो गई, पर बृजेश पर हवस सवार हो चुकी थी. वह जा कर मोनिका से लिपट गया और उसे यहांवहां दबाने लगा.

मोनिका ने उसे धक्का दिया पर अब बृजेश हवस का पुजारी बन चुका था. उस ने मोनिका को कब्जे में कर लिया. मोनिका ने चिल्लाते हुए उसे कई गालियां दीं और मदद के लिए चिल्लाने लगी, पर आसपास के लोगों ने सोचा कि यह तो इस घर का रोज का काम है.

बृजेश ने तब तक मोनिका पर काबू पा लिया था और उसे पटक कर उस पर हावी हो गया था. मोनिका थी तो 18 साल की ही. वह बृजेश की पकड़ से छूट नहीं पाई और उस की दरिंदगी का शिकार हो गई.

इतने में मोनिका की मां दयावती आ गई. उस के पास घर की चाबी थी. जब काफी खटखटाने पर मोनिका ने दरवाजा नहीं खोला, तो मां ने चाबी से खोल लिया. पर भीतर जाते ही दयावती समझ गई कि दाल में कुछ काला है.

दयावती ने बिना देर किए घर के बाहर जा कर ‘चोरचोर’ चिल्लाना शुरू कर दिया. इस शोर से पड़ोसियों के कान खड़े हो गए और भीतर कमरे में बृजेश के होश उड़ गए. वह भागने की फिराक में था कि दरवाजे पर ही धर लिया गया.

आसपास के लोगों ने समझ कि कोई चोरउचच्का है, पर जब भीतर से मोनिका रोती हुई बाहर निकली, तो सब समझ गए कि मामला कुछ और ही है.

‘इसी ने मुझे आज बुलाया था. यह कालेज में मझ पर डोरे डालती थी. लड़कों की तरह गंदे चुटकुले सुनाती थी, तो मुझे लगा कि बहती गंगा में हाथ धो लूं,’ बृजेश ने अपनी जान बचानी चाही, पर भीड़ तो भीड़ होती है. एक आदमी ने ‘मारो इसे’ कहा ही था कि सब लोग पिल पड़े उस पर. कुछ ही देर में बृजेश लाश बन चुका था. इस रेप की सजा उसे तुरंत मिल गई थी.

इनसानियत: कालू मेहतर की समझदारी

सु बह से ही रुकरुक कर बारिश हो रही थी. बच्चे नहाने का पूरा मजा लूट रहे थे. गांव के सभी तालतलैया लबालब थे.दोपहर बाद बारिश रुकी. थोड़ी ही देर बाद गांव में तूफान सा आ गया. लोग एक ही दिशा में भागे जा रहे थे. गांव के दक्षिणी छोर पर भारी भीड़ जमा हो रही थी. जोरजोर से शोर हो रहा था. ऐसा जान पड़ता था, जैसे कोई बहुत बड़ा तमाशा हो रहा हो.जब कालू मेहतर वहां पहुंचा, तो दिल दहला देने वाला नजारा था. अलादीन के चारों बेटे अपने बाप के जनाजे के पास बैठे सुबक रहे थे.

कोई भी उन की हालत से पसीज नहीं रहा था. सब मरनेमारने को तैयार खड़े नजर आ रहे थे. किसी के पास लाठी, तो किसी के पास फावड़ा था.मौलवी नूरुद्दीन गिड़गिड़ा रहा था, ‘‘आखिर हम क्या करें? हमारा कब्रिस्तान पानी से लबालब है, मुरदा दफनाने को जगह तो चाहिए न?’’‘‘अपने मुरदे को यहां से ले जाओ, वरना हम इसे आग लगा देंगे.

किस से पूछ कर खोदी है यहां कब्र?’’ पंडितजी ने तैश में आ कर कहा.‘‘रहम करो पंडितजी, हमें लाश को दफना लेने दो या कोई दूसरी जगह बता दो,’’ नूरुद्दीन फिर गिड़गिड़ाया.‘‘हम ने आप को जगह बताने का ठेका नहीं ले रखा. मुरदे को उठा कर चलते बनो,’’ पंडितजी ने गुस्से से कहा.‘‘हमारा कब्रिस्तान कब्र खोदने लायक नहीं है. फिर हम कोई रोजरोज तो मुरदे यहां दफनाएंगे नहीं.

मौत पर तो किसी का बस नहीं होता,’’ नूरुद्दीन ने समझाया.‘‘ये ऐसे ही नहीं मानेंगे, इस कब्र को मिट्टी से भर डालो,’’ पंडितजी ने अपने आदमियों से कहा.पंडितजी का इशारा पाते ही कुछ जवान लड़के हाथों में फावड़े ले कर कब्र पाटने के लिए आगे बढ़े. उन को आगे बढ़ता देख कालू मेहतर बोल उठा, ‘‘रुक जाओ. खबरदार, किसी ने कब्र पाटने की हिम्मत की तो…’’जवानों के आगे बढ़ते कदम जाम हो गए. अचानक पंडितजी ने कालू की ओर देखते हुए कहा, ‘‘अरे कालू, तू ने आने में देर कर दी.’’

‘‘हां पंडितजी, मैं ने आने में देर कर दी, वरना अब तक मुरदा कब का ही दफनवा देता,’’ कालू ने उन की ओर देखते हुए कहा.‘‘क्यों?’’ पंडितजी ने सवाल किया.‘‘क्योंकि धर्मकर्म तो सब जीतेजी के झगड़े हैं. मरे हुए आदमी का कोई धर्म नहीं होता, वह तो माटी होता है.’’‘

‘लेकिन, एक मुसलमान हिंदू मंदिर की जगह पर तो नहीं दफनाया जा सकता…’’‘‘हिंदू मंदिर है ही कहां? यह तो एक बेरी का पेड़ है.’’‘‘यह एक पेड़ ही नहीं, बल्कि इस से भी ज्यादा बहुतकुछ है.’’‘‘क्या है? बताओ तो, जरा हम भी सुनें.’’‘‘इस पेड़ की पूजा होती है. हर सुहागिन हिंदू औरत इस पेड़ पर आए महीने की शुक्ल अष्टमी को तेल चढ़ा कर अपने बच्चों के लिए आशीष मांगती है.’’

‘‘हिंदू औरत इस की पूजा करती है, तभी यह हिंदू पेड़ है?’’ कालू मेहतर ने कहा.‘‘हां.’’‘‘बहुत खूब, पंडितजी. आप जैसे लोगों ने पेड़ों को भी जातियों में बांट दिया. पेड़ का धर्म तो परोपकार होता है, वह हिंदूमुसलिम का फर्क नहीं करता. इस बेरी के बेर तो सभी खाते हैं.

इस के ‘देवता’ ने तो कभी किसी का हाथ नहीं पकड़ा?’’‘‘तू समझता क्यों नहीं कालू, आखिर इस पेड़ के साथ हमारी पूजा का सवाल जुड़ा हुआ है, इसीलिए तो इस के चारों ओर की जगह खाली रखवा रखी है, नहीं तो यहां कब के मकान बन गए होते.’’

‘‘आप जैसे लोगों के लिए देवस्थान अलग बनाना कोई बड़ी बात नहीं है. आप इस बेरी के देवता को दूसरी बेरी में बैठा दीजिए.’’‘‘नामुमकिन.’’‘‘जब आप लोगों के घरों के भूत भगा सकते हैं, उन के रूठे देवता मना सकते हैं, तब इस देवता को दूसरी जगह क्यों नहीं ले जा सकते?’’

‘‘इन दोनों बातों में रातदिन का फर्क है.’’‘‘कोई फर्क नहीं… फर्क है तो बस आप की नीयत का…’’‘‘मेरी नीयत में कोई खोट नहीं है. दूसरों के दुखों को दूर करने के लिए ही मैं उन के भूत भगाता हूं.’’‘‘बड़े हमदर्द हैं आप दूसरों के… तभी तो शायद आप ने आज गांव में यह बवंडर फैला दिया कि मुसलिम हमारे देवता की जगह पर कब्जा कर रहे हैं.’’‘‘मैं ने कोई बवंडर नहीं फैलाया.

मैं ने तो गांव वालों को हकीकत बताई है.’’‘‘हकीकत नहीं पंडितजी, आप ने घरघर जा कर यह आग लगाई है.’’‘‘यह झूठ है. अगर मैं ने गांव में यह आग लगाई है, तो मैं किसी भी गाय की कसम खाने को तैयार हूं. चल कौन सी गाय की पूंछ पकड़वाता है. अगर मैं सच्चा हूं तो भगवान मेरी रक्षा करेंगे, नहीं तो मैं आसऔलाद समेत गल जाऊंगा. मुझ पर झूठे इलजाम मत लगाओ.’’

‘‘इलजाम सोलह आने सच हैं. गाय की पूंछ पकड़ना तो आप लोगों ने पेशा बना रखा है. क्या आप मेरे घर नहीं गए? आप ने मुझे नहीं कहा कि उस बेरी के पास चलो, नहीं तो वे लोग कब्जा कर लेंगे.’’‘‘हां, यह तो कहा था.’’‘‘आप ने न सिर्फ मुझे, बल्कि यहां आए हुए सभी लोगों के घरघर जा कर यही बात कही है. तभी हम सब यहां आए हैं, नहीं तो हमें कोई खुशबू नहीं आ रही थी कि वहां चलना है.’’

‘‘हां, कहा है. आप सब हिंदू हैं और मैं आप सब का पुजारी हूं. पुजारी होने के नाते यह मेरा फर्ज था… मैं ने उसे पूरा किया… और अब आप लोग जानो…’’‘‘हम सब हिंदू हैं?’’‘‘हां, इस में कोई शक नहीं.’’‘‘नहीं पंडितजी… आप सब हिंदू हो सकते हैं, पर मैं हिंदू नहीं हूं. मैं तो एक मेहतर हूं, गयाबीता हूं और न जाने क्याक्या हूं.’’‘‘यह तू क्या कह रहा है?’’‘‘मैं वही कह रहा हूं, जो आप ने कहा था.

याद करो, उस दिन को…’’‘‘किस दिन को?’’‘‘कृष्ण जन्माष्टमी… याद आया? मैं मंदिर में जाने लगा तो आप ने मुझे धक्के मार कर, गालियां दे कर बाहर निकाल दिया था. उस दिन मैं छोटी जाति का था और आज जब आप को भीड़ इकट्ठी करनी पड़ रही है, तब आप मुझे हिंदू बना कर मुझे इज्जत बख्श रहे हैं. क्या उस दिन मैं हिंदू नहीं था?’’‘‘मुझ से गलती हो गई थी.’’‘‘गलती तो मेरी थी, जो मैं दलित हो कर भी मंदिर दर्शन करने चल दिया.’’‘‘उन बातों को भूल जाओ.

आज मैं तुम्हें सारा मंदिर घुमाघुमा कर दिखा दूंगा.’’‘‘नहीं, मैं ऐसा काम नहीं करूंगा, जिस से आप को सारा मंदिर एक बार फिर धो कर पवित्र करना पड़े.’’‘‘देखो कालू, उस दिन मैं अंधा था. अब मेरी आंखें खुल गई हैं… मुझे और जलील न करो.’’‘‘आप अब भी अंधे हैं. अगर उस मंदिर और भगवान में मेरा कोई हिस्सा न था, तो इस बेरी के देवता पर मेरा क्या हक है? यहां भी तो सवर्णों का देवता है.’’‘‘अरे, तू समझता क्यों नहीं है, अवर्णसवर्ण क्या होता है?’’

‘‘अगर अवर्णसवर्ण नहीं होते, तो यह झमेला क्यों खड़ा कर रखा है? आप धर्मकर्म के लफड़े को छोड़ कर इनसानियत का रास्ता क्यों नहीं अपना लेते? अगर धर्मकर्म और अवर्णसवर्ण नहीं होते, तो आप ने इन लोगों को क्यों बुला रखा है? क्यों ये मरनेमारने को तैयार खड़े हैं?

‘‘पंडितजी, इनसानियत के नाते मुरदा अब भी यहां दफना लेने दीजिए, नहीं तो मुरदों के ढेर लग जाएंगे, तब न किसी को गाड़ने की जगह मिलेगी और न जलाने की.’’‘‘चाहे धरती उलटपलट हो जाए, पर धर्म भ्रष्ट नहीं होने दूंगा. किसी भी कीमत पर अलादीन को यहां नहीं दफनाया जाएगा.’’‘‘पंडितजी, सीधी तरह क्यों नहीं कह देते कि आज आप दोनों जातियों में खून की नदियां बहती देखना चाहते हैं?’’‘‘मुझे झगड़े से कोई सरोकार नहीं. मैं गांव में किसी तरह शांति चाहता हूं.’’

‘‘यदि दिल से शांति चाहते हो, तो आप को और गांव वालों को मेरी यह बात माननी पड़ेगी.’’‘‘कैसी बात?’‘‘मैं हिंदू या मुसलिम होने से पहले एक इनसान हूं और इसी नाते यह सबकुछ कर रहा हूं. यह जगह गांव से कुछ दूर है. इसे मैं ‘हड़खोरी’ (जहां मरे हुए पशुओं को डाला जाता है और उन के अस्थिपंजर इकट्ठे किए जाते हैं) बना लूंगा, और मेरी मंजूरशुदा ‘हड़खोरी’ की जमीन जो गांव के बिलकुल पास आ गई है, उसे मैं मंदिर और कब्रिस्तान दोनों के लिए दे दूंगा.’’

दोनों तरफ के लोगों में खुसुरफुसुर होने लगी. पंडितजी के माथे पर सोच की रेखाएं उभर आईं. अलादीन के जनाजे के इर्दगिर्द बैठे लोगों को भी कुछ उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी.‘‘पंडितजी, आप कुछ बोले नहीं?’’ कालू मेहतर ने पूछा.‘‘मुझे तो कुछ समझ नहीं आता.

यदि दोनों जगहों की अदलाबदली हो गई, कब्रिस्तान और पूजास्थल एक जगह हो गए, तो सतकाली (लगातार 7 अकाल) पड़ेगी. गांव उजड़ जाएगा… सत्यानाश हो जाएगा,’’ पंडितजी ने आखिरी हथियार फेंका.‘‘समझ में क्यों नहीं आता आप के? सतकाली पड़ेगी तब देखा जाएगा, पर फिलहाल तो शांति हो जाएगी. न गांव वालों को मरे पशुओं की सड़ांध आएगी और न कभी किसी को दफनाने की शिकायत होगी.’’‘‘इन के पास कब्रिस्तान की जगह न होती तब तो सोचते…’’

‘‘होने से क्या होता है? कुदरती मुसीबतों से बचने के लिए आधी से कम दे देना.’’‘‘लेकिन, यह होगा कैसे?’’‘‘हड़खोरी भी 2 बीघा जमीन पर है, और इतनी ही यह जमीन है. उस में भी एक तरफ बेरी का पेड़ है, आप चंदे से बाद में वहां चारदीवारी बनवा लेना, सारी दिक्कतें मिट जाएंगी.’’‘‘लेकिन…?’’‘‘लेकिनवेकिन कुछ नहीं, आप इस बेरी वाले देवता को उस बेरी में बैठा दीजिए.’’

‘‘और तुम…?’’‘‘मेरे इस स्थान पर हड़खोरी बनाते वक्त जो दिक्कत आएगी, उस से अपनेआप ही निबट लूंगा,’’ कालू मेहतर ने अपनी बात कही और फिर गांव वालों से पूछा, ‘‘किसी को कोई एतराज हो, तो अब भी बोल देना, भाइयो?’’‘‘हमें कोई एतराज नहीं, बस झगड़ा हमेशाहमेशा के लिए मिट जाना चाहिए,’’ एक बूढ़े ने सब की तरफ से कहा.‘‘ठीक है, मैं अभी जा कर उस हड़खोरी को साफ करवा देता हूं. आप इन को बता दीजिए कि अलादीन की कब्र किस ओर खोदें,’’ कह कर कालू मेहतर चल पड़ा.सभी की तनी हुई लाठियां झुक गईं. सब अपनेअपने घरों की ओर चल पड़े.3-4 घंटे बाद हड़खोरी साफ हो गई. उस जमीन पर पंडितजी ने गंगाजल छिड़का.

फिर उन्होंने हवन कर के हड़खोरी को पवित्र किया और मंत्र बोलते हुए पुरानी बेरी के देवता को इस नई बेरी में बैठाया. उधर जो जगह मुसलिमों को दी गई, उस में मौलवीजी ‘तिलावत’ (इसलाम के मुताबिक क्रियाकर्म) करने में लग गए.शाम तक अलादीन की लाश दफना दी गई. गांव में सब तरफ कालू मेहतर की सूझबूझ की बातें हो रही थीं.वक्त गुजरता रहा और कालू मेहतर अपना काम करता रहा. न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर, अपने काम से काम.

एक दिन जब वह मरी हुई भैंस हड़खोरी में डाल रहा था, तो अचानक उस ने आवाजें सुनीं, ‘‘अरे ओ कालू, यहां जानवर मत डालना.’’‘‘क्यों भाई, क्या बात है? इस हड़खोरी में भी पशु न डालूं, तो कहां डालूं?’’ कालू मेहतर ने सवाल किया.‘‘कहांवहां का मुझे पता नहीं, यहां तो मेरा प्लाट है.’’‘‘यहां और प्लाट?’’‘‘हां, सरपंच ने परसों ही दिया है.’’‘‘कुछ तो शर्म करते भाई, यदि प्लाट ही लेना था तो किसी अच्छी जगह लेते.’’‘‘तू तो भोला है कालू, शर्म किस बात की?

बाबा आना चाहिए, चाहे पिछली गली से आ जाए. फिर गांव में और जगह है ही कहां?’’‘‘ठीक है भाई, तेरी मरजी. मैं इसे दूसरी जगह डाल दूंगा,’’ कह कर कालू मेहतर भैंस को दूसरी जगह डालने चल दिया.भैंस को दूसरी जगह डाल कर वह अपनी गधागाड़ी पर लौट आया. घर पहुंच कर वह हाथमुंह धो ही रहा था कि शेरू की आवाज सुनाई दी, ‘‘कालू, उस भैंस को उठा, उसे तू मेरे प्लाट में डाल आया है. आइंदा वहां कोई जानवर मत डालना, नहीं तो खैर मत समझना.’’

‘‘अरे भाई, उसे तो मैं हड़खोरी में ही डाल कर आया हूं,’’ कालू मेहतर ने धीरे से कहा.‘‘किस की हड़खोरी? वहां तो मेरा प्लाट है,’’ शेरू ने धौंस जमाई.‘‘ये प्लाट कब काट दिए?’’ कालू ने पूछा.‘‘तुझे पता नहीं, सरपंचों के चुनाव नजदीक हैं?’’‘‘तो यह करामात सरपंच ने की है. ठीक है भाई, आप चलो. मैं अभी आता हूं… उठा लूंगा. फिर कभी नहीं डालूंगा,’’ कह कर कालू मेहतर ने अपना पिंड छुड़़ाया.उस के चले जाने पर कुछ देर तो कालू मेहतर हैरानपरेशान सा बैठा रहा.

फिर गांव के लोगों के पास चला गया. सभी लोग मंदिर के चबूतरे पर इकट्ठे हो गए.कालू मेहतर ने पंडितजी से कहा, ‘‘हड़खोरी पर कब्जा हो गया है, वहां लोगों ने प्लाट ले लिए हैं, मैं मरे पशुओं को कहां डालूंगा?’’पंडितजी ने कोई जवाब नहीं दिया. वे लोगों की शक्ल पहचानने में लगे थे. कुछ देर बाद कालू मेहतर ने फिर कहा, ‘‘पंडितजी, मैं जानवरों को कहां डालूंगा?’’

‘‘अरे कालू, पंडितजी क्या जवाब देंगे, इन्होंने खुद वहां प्लाट ले रखा है,’’ भीड़ में से एक आवाज आई.‘‘यदि यह सच है तो डूब मरो, पंडितजी डूब मरो. याद करो उस दिन को, जब अलादीन को 5 हाथ जमीन नहीं देने दे रहे थे और आज खुद हड़खोरी पर कब्जा कर रहे हो?’’ कालू ने गरम होते हुए कहा.‘‘अरे, बोलते क्यों नहीं पंडितजी, कहां गई आप की वह भक्ति? कहां है आप का वह धर्म, जो दूसरों को गलत काम न करने की सलाह देता है? चुल्लूभर पानी में डूब मरो… ‘धर्मात्मा’ हो कर भी 20-30 गज टुकड़े के लिए मर रहे हो. बोलो, मैं पशुओं को कहां डालूंगा?’’

कालू मेहतर ने तेज आवाज में कहा.‘‘भाई कालू, जो करेगा, वह भरेगा. तू कोई और काम देख ले,’’ भीड़ में से फिर वही आवाज आई.‘‘पंडितजी चुप क्यों हो? मेरी बातों का जवाब दो… या तो यह कब्जा छोड़ देना या अपनी मरी हुई भैंस हड़खोरी से उठा लाना और अपने घर, खेत में कहीं डाल लेना. मैं आइंदा यह काम नहीं करूंगा,’’ कह कर कालू मेहतर चला गया.

दिन छिप चुका था. अंधेरा भी हो चुका था. हवा जोरों से बह रही थी. किसी ने आ कर कालू मेहतर का दरवाजा खटखटाया.कालू मेहतर की छोटी लड़की ने दरवाजा खोला. 2 आदमी अंदर आ गए. कालू भी बरामदे में आ गया.कालू मेहतर को देखते ही पंडितजी ने कहा, ‘‘जय श्रीरामजी की.’’कालू मेहतर ने कोई जवाब नहीं दिया. वह खामोश बैठा पंडितजी के साथ आए सरपंच को सवालिया निगाहों से घूरता रहा. कुछ पल बीतने पर पंडितजी ने कहा, ‘‘यह लो कालू, संभालो.’’‘‘क्या है?’’ कालू मेहतर ने बेरुखी से पूछा.

‘‘प्लाट का पट्टा और 20,000 रुपए हैं. देखो, हड़खोरी वाले मामले को अब मत उछालना,’’ कहते हुए पंडितजी ने दोनों चीजें कालू को पकड़ाईं.‘‘मुझे इन से कोई सरोकार नहीं. आप की चीजें आप को मुबारक हों,’’ कहते हुए कालू मेहतर ने दोनों चीजें वापस करनी चाही.तभी सरपंच बोल उठा, ‘‘देखो कालू, गांव की राजनीति बड़ी घटिया होती है. उस में टांग अड़ा कर तुझे कुछ नहीं मिलेगा, उलटे तू उजड़ जाएगा.’’‘‘मुझे राजनीति से कोई मतलब नहीं. मैं तो हड़खोरी को टुकड़ों में बंटा नहीं देखना चाहता.

मुझे या तो हड़खोरी चाहिए या इस काम से नजात.’’‘‘भाड़ में जाए तारी हड़खोरी. तू ने मैला ढोने का ठेका ले रखा है क्या? इन पैसों से कोई और काम देख लेना.’’‘‘नहीं सरपंच साहब, मैं बिक नहीं सकता. अपने हक के लिए मैं कचहरी का दरवाजा खटखटाऊंगा,’’ कालू मेहतर ने इतमीनान से कहा.‘‘वहां तो तू हारेगा. पहले तो दानवीर कर्ण बन कर अपनी मंजूरशुदा हड़खोरी की जमीन गांव को दान में दे चुका है. और अब वाली हड़खोरी की जमीन पंचायत की है. इस जमीन पर पट्टे बांटने का पंचायत को पूरा हक है.

‘‘वैसे भी केस लड़ना कोई बच्चों का खेल नहीं. उस में पैसा भी पानी की तरह बहेगा, जो मेरी औकात की बात नहीं. हड़खोरी के लिए सारे पट्टे वालों से दुश्मनी मोल ले लेगा क्या? ये सब पट्टेदार गांव के पैसे वाले लोग हैं,’’ सरपंच ने धौंस जमाई.‘‘ठीक है सरपंच साहब, मैं एक गरीब आदमी हूं, लेकिन मेरा जमीर इस बात की गवाही नहीं देता. मैं चांदी के चंद टुकड़ों के बदले जमीर नहीं बेच सकता.

मैं मरे पशुओं की खाल नोचता हूं, मैला ढोता हूं, फिर भी इनसान हूं. इनसानियत मेरा धर्म है और इसी नाते मैं ने पुरानी हड़खोरी गांव को दे कर झगड़ा मिटाया था.‘‘अब अगर आप अपना धर्म बेच रहे हो तो बेचो, पर मैं अपना धर्म, ईमान नहीं बेचूंगा. ये लो अपने रुपए और ये रहा आप का पट्टा,’’ कहते हुए कालू मेहतर ने रुपए सरपंच की ओर फेंक दिए और पट्टे के टुकड़ेटुकड़े कर के हवा में उड़ा दिए.सरपंच और पंडितजी के चेहरे देखने लायक थे. शायद उन की हेकड़ी निकल चुकी थी.

आन का फैसला : एक जमींदार की जिद

हालांकि फैसला सुनाते समय बिंदा प्रसाद उर्फ ‘भैयाजी’ का मन उन्हें धिक्कार रहा था, पर हमेशा की तरह उन्होंने अपने मन की आवाज को यों ही चिल्लाने दिया. इस मन के चक्कर में ही उन के हालात आज ऐसे हो गए हैं कि अब गांव में उन्हें कोई पूछता तक नहीं है. वे अब गांव के मुखिया नहीं थे, पर जब उन के पिताजी मुखिया हुआ करते थे, तब शान ही कुछ और थी.कामती भले ही छोटा सा गांव था, पर एक समय में इस गांव में बिंदा प्रसाद के पिताजी गया प्रसाद की हुकूमत चलती थी.

वे अपनी नुकीली मूंछों पर ताव देते हुए सफेद धोतीकुरते पर पीला गमछा डाल कर जब अपनी बैठक के बाहर दालान में बिछे बड़े से तख्त पर बैठते थे, तो लोगों का मजमा लग जाता था.गांव में किसी के भी घर में कोई भी अच्छाबुरा काम होता, तो वह उस की इजाजत सब से पहले गया प्रसाद से ही लेने आता था. गया प्रसाद हां कह देते तो हां और अगर उन्होंने न कह दिया तो फिर किसी की मजाल नहीं कि कुछ कर ले.

वे कहीं नहीं जाते थे, दिनभर अपने तख्त पर बैठेबैठे हुक्म बजाते रहते थे.बिंदा प्रसाद को याद है कि एक बार उन के पिताजी गया प्रसाद को शहर की ओर जाना था. बहुत दिनों बाद वे घर से निकल रहे थे. तांगा अच्छी तरह सजा कर तैयार कर दिया गया था.

गया प्रसाद को सिर्फ तांगे की सवारी ही पसंद थी. वैसे तो उन के घर पर एक कार भी थी, जिसे बाकी लोग ही इस्तेमाल किया करते थे, पर वे कभी उस में नहीं बैठे थे. गया प्रसाद का तांगा गांव के रास्ते से निकला. थोड़ा सा आगे सड़क के किनारे बने किसी घर की कंटीली बाड़ से उन का कुरता फट गया और वे आगबबूला हो गए.

उस घर में रहने वाला परिवार गया प्रसाद के पैरों पर लोट गया और माफी की गुहार लगाता रहा.गया प्रसाद ने उस परिवार को माफ भी कर दिया, पर उन्होंने शहर जाना छोड़ कर सब से पहले अपने आदमियों को बुला कर सड़क के किनारे लगी उस बाड़ को हटवाया.गांव के बहुत सारे लोग, जो रोजाना इस परेशानी से जूझ रहे थे, उन्होंने गया प्रसाद के इस काम के लिए उन का शुक्रिया अदा किया.गया प्रसाद जब तक जिंदा रहे, तब तक उन की शान बनी रही, पर उन के गुजर जाने के बाद धीरेधीरे इस शान में ग्रहण लगता चला गया.

इस के बाद बिंदा प्रसाद को मुखिया बनाया गया, पर सब उन्हें ‘भैयाजी’ कहते थे. वे अपने पिताजी से अलग थे. वे चूड़ीदार कुरतापाजामा और उस के ऊपर काली बंडी पहनते थे. वे हलकी दाढ़ीमूंछ रखते थे, जो उन्हें रोबीला बनाती थी.काफी दिनों तक तो लोग ‘भैयाजी’ को भी वैसे ही स्नेह देते रहे और उन से पूछ कर ही हर काम करते रहे, पर बाद में यह कम हो गया.

गांव के बच्चे शहर पढ़ने जाते थे और वहां से कुछ नया सीख कर आते थे. बच्चियां भी साइकिल से पढ़ने जाती थीं. शासन उन्हें साइकिल से ले कर ड्रैस तक दे रहा था.नए बच्चों में बिंदा प्रसाद की इस अघोषित गुलामी की प्रथा को ले कर गुस्सा पनप रहा था. पर ‘भैयाजी’ की नसों में जो खून दौड़ रहा था, वह इस सब को स्वीकार नहीं कर पा रहा था.‘भैयाजी’ के अपने बच्चे भी बाहर पढ़ रहे थे. वे अपने पिताजी को समझाते थे कि अब जमाना बदल गया है. कोई किसी का गुलाम नहीं है.

अपनी इज्जत बनाए रखनी है, तो इन के साथ मिल कर चलो.दूसरी तरफ ‘भैयाजी’ की बढ़ती उम्र के साथ गांव के लोग उन से अब पंचायत भी नहीं करा रहे थे. ज्यादातर मामले वे अपनी समाज की पंचायत में ही सुलझा लेते या फिर ग्राम पंचायत में बैठक हो जाती. ‘भैयाजी’ इसे अपनी शान के खिलाफ मान रहे थे. वे दिनभर तख्त पर बैठे रहते, पर 2-4 लोगों को छोड़ कर कोई उन से मिलने तक नहीं आता था.

गांव की एक सरोज काकी की एकलौती बेटी सावित्री ने कालेज में फर्स्ट आ कर गोल्ड मैडल जीता था. गांव में जश्न मनाया गया. सावित्री के साथ पढ़ने वाली लड़कियां भी गांव में आ कर इस जश्न में शामिल हुईं. बड़ीबड़ी गाडि़यों में बैठ कर कालेज के प्रोफैसर और अखबार वाले भी आए. सावित्री देखते ही देखते हीरो बन गई थी. ‘भैयाजी’ को भी सरोज काकी ने जश्न में बुलाया था, पर वे नहीं गए.

कल ही ‘भैयाजी’ की शादी के बाद पहली बार गांव में किसी और दूल्हे ने घोड़ी पर बैठ कर बरात निकाली थी. डीजे भी बज रहा था और जनरेटर से रोशनी भी की जा रही थी. ‘भैयाजी’ से यह सब बरदाश्त नहीं हो रहा था. उन्होंने उसे रोकने की कोशिश नहीं की. वे जानते थे कि ऐसा कर के वे कानूनी दांवपेंच में उलझ जाएंगे, पर उन के मन में एक टीस पैदा हो चुकी थी. वे अपनी और अपने पुरखों की हो रही इस बेइज्जती को सहन नहीं कर पा रहे थे. उन का मन अब काम में भी नहीं लगता था.

वैसे, ‘भैयाजी’ की खेतीकिसानी बहुत थी. दर्जनों नौकरचाकर काम करते थे. ‘भैयाजी’ खेत तो कभीकभार ही जाते थे, पर हिसाबकिताब पुख्ता रखते थे. मजाल है कि कोई उन की इजाजत के बिना एक बोरा भूसा भी ले जाए.भैयाजी की सारी खेतीकिसानी तख्त पर बैठेबैठे ही हो जाती थी. पहले दिनभर लोगों का आनाजाना लगा रहता था, पर अब उन की बैठक व्यवस्था खत्म सी हो चुकी है, तब उन्हें दिन काटना मुश्किल जान पड़ने लगा. वे इस का कुसूर गांव वालों और शहर में पढ़ रहे नौजवानों पर डालते थे.रामलाल ‘भैयाजी’ का खासमखास था. वह बचपन से उन के साथ साए की तरह लगा रहता था.

रामलाल को भी गांव के लोगों की यह अनदेखी सहन नहीं हो रही थी. वह मालिक को उदास देखता तो उस का खून खौलने लगता. धीरेधीरे उस के मन का गुस्सा भयानक रूप लेता जा रहा था.‘भैयाजी’ सरोज काकी के अलावा गांव के कुछ और लोगों को सबक सिखाने का मन बना चुके थे. वे जानते थे कि उन्हें कुछ ऐसा करना ही पड़ेगा कि गांव में उन की इज्जत फिर पहले जैसी हो जाए. वे इस के लिए कुछ भी करने को तैयार थे.मनसुख गांव का ईमानदार और मेहनती आदमी था.

कभी उस के पिताजी ‘भैयाजी’ के घर का गोबर डाला करते थे, पर मनसुख ने जब से होश संभाला, उस के परिवार ने तरक्की करनी शुरू कर दी थी.मनसुख गांव में गल्ला खरीदता और मंडी में ले जा कर बेच देता था. उस ने इस धंधे से ही पैसे कमाए थे. गांव वाले उस की ईमानदारी से खुश रहते थे. वह गांव के लोगों की मदद दिल खोल कर करता था. इस वजह से गांव में उस की बहुत इज्जत थी.‘भैयाजी’ ने मनसुख को अपने निशाने पर लिया था. मनसुख सरंपच का सगा भाई था.

‘भैयाजी’ एकसाथ कई निशाने लगाने की योजना में थे. सरोज काकी मनसुख के धंधे में मदद करती थीं. उन्हें भी दो पैसे मिल जाते थे. उन के पास यही एकमात्र रोजगार का साधन था. ज्यादा उम्र न तो मनसुख की हुई थी और न ही सरोज काकी की. इस वजह से ‘भैयाजी’ को उन के बारे में अफवाह फैलाने में कोई परेशानी भी नहीं हुई.‘भैयाजी’ तो गांव में कहीं आतेजाते नहीं थे, सो रामलाल ने गलीगली खबर फैलाने की जिम्मेदारी ले ली और इस अफवाह को पंख लग गए.

सरोज काकी ने मनसुख के यहां आनाजाना बंद कर दिया. कुछ ही दिन में मनसुख का धंधा चौपट हो गया. मनसुख इसे सहन नहीं कर पाया. गांव के लोगों को भरी दोपहरी में उस की लाश एक पेड़ से लटकी मिली.देखते ही देखते मनसुख के खुदकुशी कर लेने की खबर पूरे गांव में फैल गई. गांव वाले पुलिस के चक्कर में पड़ना नहीं चाहते थे, बल्कि यों कहें कि रामलाल ने खुदकुशी के मामले में पुलिस किस तरह से लोगों को परेशान कर सकती है की ऐसी भयानक कहानी गांव वालों को सुनाई थी कि गांव वाले इस मामले को गांव में ही निबटा लेने में भलाई समझने लगे थे.

सालों बाद गांव के लोगों को ‘भैयाजी’ की याद आई. ‘भैयाजी’ का मन फूला नहीं समा रहा था, पर उन्होंने गांव वालों की इस गुजारिश को साफ शब्दों में ठुकरा दिया. गांव वाले निराश हो कर लौटने भी लगे, पर रामलाल ने हालात को संभाला और अपनी सेवाओं की दुहाई दे कर ‘भैयाजी’ से पंचायत करने की इजाजत ले ली.रामलाल को लगा कि आज उस ने मालिक का कर्ज अदा कर दिया और ‘भैयाजी’ को लगा कि रामलाल को खिलानापिलाना काम आ गया.पंचायत ‘भैयाजी’ के दालान में ही लगी. गांव के सारे लोग जमा हुए. सरोज काकी को बुलाया गया और सरपंच को भी.

सरपंच ने सारा कुसूर सरोज काकी पर मढ़ दिया. हालांकि उसे ऐसा करने की सलाह खुद ‘भैयाजी’ ने ही दी थी. सरपंच उन की गिरफ्त में आ चुका था.सरोज काकी के साथ कोई नहीं था. वे औरत थीं, इस वजह से वे बहुत खुल कर अपनी बात रख भी नहीं पाईं. सारा माहौल ऐसा बन गया था कि लोग उन के खिलाफ नजर आने लगे.‘भैयाजी’ की चाल कामयाब हो गई थी.

अब उन्हें अपना फैसला देने में कोई परेशानी नहीं थी. वे जानते थे कि लोग सरोज काकी के खिलाफ फैसला सुनना चाहते हैं और अगर वे ऐसा ही फैसला देंगे, तो गांव वालों की नजरों में उन की इज्जत बढ़ जाएगी.‘भैयाजी’ ने बहुत सोचनेविचारने के बाद कहा, ‘पंचायत सावित्री की मां को मनसुख की खुदकुशी के लिए कुसूरवार मानती है और फैसला देती है कि सावित्री की मां यानी सरोज काकी का दानापानी बंद किया जाता है और उसे गांव में घुसने की भी इजाजत नहीं होगी.’’पंचायत ऐसे ही फैसले का इंतजार कर रही थी.

इस वजह से किसी को भी कोई हैरत नहीं हुई सिवा रामलाल के, जो मुखिया का सब से खास राजदार था.‘भैयाजी’ को लग रहा था कि उन्होंने अपनी हारी हुई बाजी अपने हाथ में कर ली थी. सरपंच तो उन की चपेट में आ ही चुका था, गांव वाले भी उन के फैसले से खुश थे. सो, देरसवेर वे भी उन को सलाम करने लगेंगे.पर ऐसा हुआ नहीं. सरोज काकी को पंचायत के फैसले के हिसाब से गांव छोड़ना था.

वे इस की तैयारी भी कर रही थीं कि तभी सावित्री अपने दलबल के साथ वहां आ पहुंची. सावित्री को एकाएक अपने सामने देख कर सरोज काकी की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली. सावित्री को सारे मामले की जानकारी तो पहले ही हो चुकी थी. इस वजह से तो वह गांव में आई थी.सावित्री अब बड़ी सरकारी अफसर बन चुकी थी. पुलिस उस के साथ रहती थी.

‘भैयाजी’ पुलिस के नाम से ही घबरा गए थे.सावित्री ने ‘भैयाजी’ की उम्र का लिहाज किया और बोली, ‘‘देखो अंकल, मैं चाहती तो अब तक आप सलाखों के पीछे होते, पर मैं आप की उम्र का लिहाज कर रही हूं. ‘‘मां को तो मैं अपने साथ ले जा रही हूं, पर आप को चेतावनी भी देती जा रही हूं कि भविष्य में ऐसा कुछ भी मत दोहराना, वरना…’’‘भैयाजी’ की बाजी पलट गई. वे मुंह लटकाए खड़े रह गए.

लाल गुलाब : विजय की मौत कैसे हुई

जयपुर रेलवे स्टेशन पर ‘अजमेरदिल्ली शताब्दी’ ट्रेन खड़ी थी. आकाश तेजी से कदम बढ़ाता हुआ कंपार्टमैंट में चढ़ा. अपनी सीट पर बैठने लगा तो उस की नजर बराबर की सीट पर बैठी एक प्यारी सी 3 साल की बच्ची पर पड़ी, जो एक औरत के साथ बैठी थी.

औरत को गौर से देखते ही आकाश चौंक उठा. उस के मुंह से निकला, ‘‘माधवी…’’

माधवी ने जैसे ही आकाश की ओर देखा तो वह भी चौंक उठी और बोली, ‘‘अरे, आप?’’

एकदूसरे को देख कर उन दोनों के चेहरे पर खुशी बढ़ गई.

‘‘बड़ी प्यारी बच्ची है. क्या नाम है इस का?’’ आकाश ने बच्ची की ओर देख कर पूछा.

‘‘सोनम.’’

‘‘बहुत प्यारा नाम है,’’ आकाश ने कहा और बच्ची के सिर पर हाथ फेरा.

‘‘कहां से आ रहे हैं आप?’’ माधवी ने पूछा.

‘‘कंपनी के काम से मैं जयपुर आया था. और तुम?’’

‘‘मैं भी मौसेरी बहन की शादी में जयपुर आई थी.’’

रात के 8 बजने को थे. ट्रेन चल दी.

आज आकाश और माधवी अचानक ही 7-8 साल बाद मिले थे. दोनों के

मन में बहुत से सवाल उठ रहे थे. तभी सोनम ने माधवी के कान में कुछ कहा और माधवी उसे वाशरूम की तरफ ले कर चल दी.

आकाश सीट पर सिर लगा कर आराम से बैठ गया और आंखें बंद कर लीं. भूलीबिसरी यादें फिर से ताजा होने लगीं.

आकाश जब कंप्यूटर इंजीनियरिंग कर चुका था, उस ने अपने एक दोस्त की शादी में माधवी को पहली बार देखा था. माधवी की खूबसूरती पर वह मरमिटा था.

आकाश ने अपने उस दोस्त से ही माधवी के बारे में पता कर लिया था. वह अभी एमए में पढ़ रही थी. परिवार में मातापिता व एक छोटा भाई था. पिता का अपना कारोबार था.

आकाश माधवी से मिलना और उस से बात करना चाहता था, पर समझ नहीं पा रहा था कि कैसे मिले?

एक दिन आकाश स्कूटर पर किसी काम से जा रहा था, तभी उस ने देखा कि सड़क के एक किनारे खड़ी स्कूटी पर माधवी किक मार रही थी, पर वह स्टार्ट नहीं हो रही थी.

आकाश ने माधवी के निकट अपना?स्कूटर रोक कर पूछा था, ‘क्या हुआ माधवीजी?’

अपना नाम सुनते ही माधवी चौंक उठी थी. वह उस की ओर गौर से देख रही थी, पहचानने की कोशिश कर रही थी. वह बोली थी, ‘मैं ने आप को पहचाना नहीं मिस्टर…?’

‘आकाश नाम है मेरा. आप मेरी भाभी की सहेली हैं. मेरे दोस्त का नाम राजन है. मैं ने आप को राजन की शादी में देखा था. मैं इस समय आप की मदद करना चाहता हूं. आगे चौक पर स्कूटर मिस्त्री की दुकान है. आप मेरा स्कूटर ले जाइए. मैं आप की स्कूटी पैदल ले कर पहुंच रहा हूं. यह हम से स्टार्ट नहीं होगी. इसे मिस्त्री ही ठीक करेगा,’ आकाश ने कहा था.

माधवी मना नहीं कर सकी थी और उस का स्कूटर ले कर मिस्त्री की दुकान पर पहुंच गई थी.

कुछ देर बाद आकाश भी स्कूटी धकेलता हुआ मिस्त्री की दुकान पर जा पहुंचा था.

स्कूटर ठीक करा कर चलते हुए माधवी ने खुश होते हुए कहा था, ‘थैंक्स मिस्टर आकाश.’

इस के बाद दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगी थीं. वे दोनों शादी कर के घर बसाने के सपने देखने लगे थे.

एक दिन माधवी की उदासी में डूबी आवाज मोबाइल पर सुनाई दी थी, ‘आकाश, शाम को पटेल पार्क में मिलना.’

‘क्या बात है माधवी? तुम बहुत उदास लग रही हो,’ आकाश ने पूछा था.

‘हां आकाश, पापा ने हमारी शादी को मना कर दिया है.’

‘क्यों?’

‘वे कहते हैं कि हम अपनी बिरादरी में ही शादी करेंगे. मम्मी को तो मैं ने किसी तरह मना लिया था, पर पापा नहीं माने. उन का कहना है कि हमारी जाति ऊंची है. मेरे पापा जातबिरादरी और छुआछूत को बहुत मानते हैं.’

‘अब क्या होगा माधवी?’

‘सारी बातें फोन पर नहीं होंगी. मैं शाम को पार्क में मिलती हूं.’

शाम को आकाश पार्क में पहुंच कर बेसब्री से माधवी का इंतजार करने लगा.

कुछ देर बाद माधवी पार्क में आई और उदास लहजे में बोली, ‘अब क्या होगा आकाश?’

‘मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि क्या किया जाए.’

‘अब तो एक ही उपाय है कि हम दोनों घर से भाग कर कोर्ट मैरिज कर लें.’

‘वह सब तो ठीक है, लेकिन माधवी मैं अभी बेरोजगार हूं. जल्दी से नौकरी मिलती कहां है? बहुत कंपीटिशन है. हमें घर से नहीं भागना है. औलाद के घर से भागने पर मांबाप को बहुत बेइज्जती सहनी पड़ती है.

‘जिन मातापिता ने हमें पालपोस कर बड़ा किया, हमें पढ़ायालिखाया, हमारी हर जरूरत पूरी की, हम उन को  बेइज्जत क्यों महसूस होने दें,’ आकाश ने माधवी को समझाते हुए कहा था.

‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती.’

‘माधवी, एक बात जान लो कि हर प्रेमी को उस की मंजिल नहीं मिलती. हम ने हमेशा साथ रहने का वादा किया था, पर मजबूरी है कि मैं इस वादे को पूरा नहीं करा पा रहा हूं.’

कुछ देर बाद दोनों भारी मन से पार्क से बाहर निकले थे.

आकाश नौकरी की खोज में लग गया था. एक साल बाद उसे आगरा में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई थी.

‘‘क्या सोच रहे हैं आप?’’ माधवी ने वाशरूम से सोनम के साथ आते ही पूछा.

‘‘पुरानी यादों में खो गया था.’’

‘‘अब तो बस यादें ही रह गई हैं.’’

‘‘सोनम के पापा का क्या नाम है?’’

‘‘विजय.’’

‘‘तुम यहां अकेली आई हो? उन को शादी में साथ नहीं लाई?’’

‘‘वे नहीं रहे. एक साल पहले उन का एक्सिडैंट हो गया था.’’

‘‘ओह…’’ आकाश के मुंह से निकला. उस ने माधवी की तरफ देखा. उस का चेहरा भी कुछ कमजोर सा हो गया था. चेहरे का रंगरूप और आकर्षण भी काफी ढल चुका था.

कुछ पल के लिए वे दोनों चुप हो गए, फिर आकाश ने पूछा, ‘‘माधवी, मुझे आगरा में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई थी. एक दिन राजन ने बता दिया कि तुम्हारी शादी हो चुकी है और शादी के बाद तुम दिल्ली पहुंची गई हो.

‘‘मैं फोन कर के तुम्हारी शादीशुदा जिंदगी में आग नहीं लगाना चाहता था, इसलिए मैं ने मोबाइल से तुम्हारा नंबर ही हटा दिया था, पर मैं तुम्हें दिल से नहीं भुला पाया.’’

माधवी बोल उठी, ‘‘जब तुम नौकरी करने आगरा चले गए तो पापा ने हमारी बिरादरी के ही एक लड़के विजय से मेरी शादी कर दी. मैं ने कोई खिलाफत नहीं की.

‘‘विजय दिल्ली में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. परिवार में केवल उन की मां थीं. वे सिगरेट, शराब और गुटके के बहुत शौकीन थे. देखने में खूबसूरत थे, पर दिल काला था. रोजाना शराब पीना, गाली देना और कठोर शब्द बोलना उन की आदत में शामिल था. कभीकभार वे मारपीट भी कर देते थे.

‘‘न जाने किस ने हमारे बारे में विजय को बता दिया था. बस, फिर क्या था. बातबात में मुझे ताने दिए जाने लगे.

‘‘एक रात तकरीबन 10 बजे थे. उस समय सोनम केवल एक साल की थी. पता नहीं, क्या हो गया था उसे, वह रो रही थी. वह चुप ही नहीं हो रही थी. मैं उसे सुलाने की कोशिश कर रही थी कि तभी विजय ने मुझे घूरते हुए कहा था, ‘अबे, इसे अपने यार के पास छोड़ आ, जिस की निशानी है यह.’

‘‘मैं ने भी तुरंत कह दिया था, ‘नहीं, यह तो आप की बेटी है.’

‘‘पर, वे नहीं माने और बोले, ‘रहने दे झूठी कहीं की. मैं तेरा विश्वास तब करूंगा, जब तू यह जलती सिगरेट अपने सीने से लगा लेगी.’

‘‘मैं ने भी आव देखा न ताव और कह दिया, ‘मैं यह भी कर सकती हूं.’

‘‘यह कहते हुए मैं ने जलती सिगरेट अपने सीने से लगा ली. जलन और दर्द के चलते मुंह से चीख निकल रही थी, पर मैं सब दुखदर्द चुपचाप पी गई थी.

‘‘उस रात मैं सो नहीं पाई थी. सारी रात रोती रही कि प्रेम करने की ऐसी सजा उन को ही मिलती है, जिन की प्रेमी से शादी नहीं हो पाती.

‘‘इस का भी विजय पर कोई असर नहीं पड़ा था. ताने और गाली उसी तरह चलती रही.

‘‘एक दिन मैं मायके आई, तो मैं ने पापा से कहा था, ‘पापाजी, अब तो आप बहुत खुश होंगे कि आप ने अपनी बेटी की शादी अपनी बिरादरी में ही की है. अब तो आप की खूब इज्जत हो रही होगी. भले ही बेटी तड़पतड़प कर मर जाए.’

‘‘यह कहते हुए मैं ने पापा को छाती पर सिगरेट के जलने के निशान दिखाए. देखते ही मम्मीपापा की आंखों में आंसू आ गए.

‘‘पापा ने भर्राई आवाज में कहा था, ‘बेटी, मैं तेरा गुनाहगार हूं. मेरी बहुत बड़ी भूल रही कि मैं ने विजय के बारे में पता नहीं कराया. बस मेरी आंखों पर तो बिरादरी में शादी करने की पट्टी बंधी थी. वह इतना बेरहम होगा, कभी सपने में भी नहीं सोचा था.’

‘‘तभी मम्मी रोते हुए बोली थीं, ‘बेटी, तुम वहां दुखी रहती हो और हम यहां तेरे बारे में सोच कर दुखी हैं. कभीकभी तो रात को सो भी नहीं पाते. भला जिस मातापिता की बेटी ससुराल में दुखी हो, वे रात को आराम से कैसे सो सकते हैं.’

‘‘तभी पापा ने कहा था, ‘बस बेटी, अब और सहन नहीं करेगी तू. अब तुझे वहां जाने की भी जरूरत नहीं है. मैं उस जालिम से तेरा पीछे छुड़ा दूंगा. 1-2 दिन में वकील से तलाक लेने की बात करता हूं.’

‘‘मैं चुप रही. मुझे लगा कि अब पापा का फैसला ठीक है.

‘‘2 दिन बाद ही मुझे मोबाइल पर सूचना मिली कि हरिद्वार जाते समय विजय की कार का एक्सिडैंट हो गया और वे चल बसे.

‘‘विजय के मरने का मुझे जरा भी दुख नहीं हुआ. विजय की मां भी 3 महीने बाद चल बसीं.

‘‘मुझे उसी कंपनी में नौकरी मिल गई. अब तो मैं अपनी बेटी के साथ चैन से रह रही हूं,’’ माधवी ने अपने बारे में बताया.

यह सुन कर आकाश कुछ सोचने लगा.

‘‘तुम अपने बारे में कुछ नहीं बताओगे क्या? पत्नी का क्या नाम है? बच्चों के क्या नाम हैं?’’ माधवी ने पूछा.

आकाश ने लंबी सांस छोड़ कर कहना शुरू किया, ‘‘माधवी, तुम्हारी शादी हो जाने के बाद मैं ने भी शादी कर ली. पत्नी के रूप में आई माधुरी उस की एक बड़ी बहन थी मीनाक्षी. वह माधुरी से 5 साल बड़ी थी. उस का पति काफी अमीर था. अच्छाखासा कारोबार था.

‘‘मैं ने सोचा भी नहीं था कि माधुरी की इच्छाएं इतनी ऊंची हैं. वह हमेशा कह देती कि इतनी छोटी सी नौकरी में जिंदगी कैसे चलेगी? जीजाजी की तरह कोई कारोबार कर लो.

‘‘माधुरी के जीजा प्रदीप ने माधुरी पर अपनी धनदौलत का ऐसा सुनहरा जाल फेंका कि वह उस में उलझती चली गई. वह जब देखो, अपने जीजा की ही तारीफ करती रहती.

‘‘एक दिन मैं ने गुस्से में कह दिया, ‘जब जीजा ही इतना प्यारा लगता है तो उस से ही शादी कर लेनी चाहिए थी.’

‘‘इस पर वह बोली, ‘शादी कैसे कर लेती? वहां तो पहले ही मेरी बहन है.’

‘‘मैं ने झल्ला कर कहा, ‘रखैल बन जाओ उस की और मेरा पीछा छोड़ो.’

इस पर माधुरी ने बुरा सा मुंह बना कर कहा था, ‘मैं भी तुम जैसे इनसान के साथ नहीं रहना चाहती, जो कभी अपनी तरक्की के बारे में न सोचे.’

‘‘उस दिन के बाद मुझे माधुरी से नफरत हो गई थी. धीरेधीरे माधुरी और प्रदीप के बीच की दूरी घटती चली गई. वह कभी भी प्रदीप के पास पहुंच जाती.

‘‘एक दिन माधुरी एक चिट्ठी लिख कर घर से चली गई. चिट्ठी में लिखा था, ‘मैं अब यहां नहीं रहना चाहती. यहां रहते हुए मैं अधूरी जिंदगी जी रही हूं. मुझे यहां अजीब सी घुटन हो रही है. तुम मेरी इच्छाएं कभी पूरी नहीं कर सकते हो. मैं अपने जीजा के पास जा रही हूं. मुझे वापस बुलाने की कोशिश भी मत करना.’

‘‘मैं जानता था कि यह तो एक दिन होना ही था. मैं ने अदालत में तलाक का केस कर दिया. एकडेढ़ साल के बाद मुझे तलाक मिल गया. बस, तब से मैं अकेला ही रह रहा हूं माधवी.’’

तकरीबन 11 बजे ट्रेन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रुकी.

स्टेशन से बाहर निकल कर आकाश ने एक आटोरिकशा किया और माधवी से कहा, ‘‘बैठो माधवी, रात का समय है. मैं तुम दोनों को अकेले नहीं जाने दूंगा.’’

माधवी भी मना नहीं कर सकी. करोलबाग में एक मकान के बाहर आटोरिकशा रुका. माधवी उतर कर बोली, ‘‘आइए…’’

‘‘नहीं माधवी, फिर कभी. मैं ने तुम्हारा मोबाइल नंबर ले लिया है. फोन पर बात हो जाएगी,’’ आकाश ने कहा और आटोरिकशा वाले को चलने का संकेत किया.

2 दिन बाद रविवार था. सुबह के 7 बज रहे थे. माधवी अलसाई सी लेटी हुई थी. बगल में सोनम सो रही थी.

मोबाइल की घंटी बजने लगी. माधवी ने फोन उठा कर देखा कि आकाश का फोन था. वह बोली, ‘‘हैलो…’’

‘माधवी, जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं,’ उधर से आवाज आई.

यह सुनते ही माधवी चौंक उठी. वह तो अपना जन्मदिन भी भूल गई थी. यहां आ कर तो बहुतकुछ भूल गई. लेकिन आकाश को याद रहा. उस के चेहरे पर खुशी फैल गई. वह बोली, ‘‘आप को याद रहा मेरा जन्मदिन…’’

‘बहुत सी बातें भूली नहीं जातीं. उन को भुलाने की नाकाम कोशिश की जाती है. मैं 10 बजे के बाद आऊंगा.’

‘‘ठीक है. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’ माधवी ने कहा.

तकरीबन साढ़े 10 बजे आकाश माधवी के मकान पर पहुंचा. उस के हाथों में गहरे लाल रंग के गुलाब के फूल थे.

गुलाब देखते ही माधवी की आंखों की चमक बढ़ गई.

चाय पीते हुए आकाश ने माधवी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘देखो माधवी, मैं ने सपने में भी नहीं न सोचा था कि तुम से कभी इस तरह मुलाकात हो पाएगी. इस बीच इतने साल हम दोनों को ही पता नहीं क्याक्या सहन करना पड़ा. मैं तुम्हें अपनाना चाहता हूं.’’

माधवी चुप रही. वह आकाश की ओर गौर से देखने लगी.

‘‘माधवी, तब हमारे सामने मजबूरी थी, पर अब ऐसा नहीं है और फिर बेटी सोनम को भी तो पापा का लाड़प्यार चाहिए. अब हम दोनों को जिंदगी के रास्ते पर अकेले नहीं साथसाथ चलना है,’’ आकाश ने कहा.

माधवी ने मुसकरा कर हामी भर दी. उसे लग रहा था, मानो आज वह किसी पंछी की तरह आसमान में उड़ान भर रही है.

लाश की सवारी : टैक्सी ड्राइवर की कहानी

टैक्सी ड्राइवर को उस सवारी पर शक हुआ था. उस की हरकतें ही कुछ वैसी थीं. उस सवारी ने एयरपोर्ट जाने के लिए टैक्सी बुक कराई थी.

मुमताज हुसैन नाम से उस के ऐप पर बुकिंग हुई थी. इस से पहले कि ड्राइवर जीपीएस की मदद से वहां पहुंचता, तभी मुमताज हुसैन का फोन आ गया था, ‘‘हैलो, आप कहां हो?’’

‘‘बस 2 मिनट में लोकेशन पर पहुंच जाऊंगा,’’ टैक्सी ड्राइवर ने जवाब दिया था और 2 मिनट बाद ही वह उस के लोकेशन पर पहुंच भी गया था.

टैक्सी किनारे कर टैक्सी ड्राइवर उस के टैक्सी में आने का इंतजार करने लगा. उस ने किनारे खड़े लड़के को गौर से देखा.

मुमताज हुसैन तकरीबन 20-22 साल का लड़का था. बड़ी बेचैनी से वह उस का इंतजार कर रहा था. हर आनेजाने वाली टैक्सी को बड़े ही गौर से देख रहा था. खासकर टैक्सी की नंबरप्लेट को वह ध्यान से देखता था.

जैसे ही उस की टैक्सी का नंबर मुमताज हुसैन ने देखा, उस के चेहरे पर संतोष के भाव आ गए. वह सूटकेस उठाने में दिक्कत महसूस कर रहा था. टैक्सी ड्राइवर ने टैक्सी से उतर कर सूटकेस उठाने में उस की मदद की.

ड्राइवर ने सूटकेस रखने के लिए कार की डिक्की खोली थी, पर मुमताज हुसैन उसे अपने साथ पिछली सीट पर ले कर बैठना चाहता था.

ड्राइवर को सूटकेस काफी वजनी लगा था. शायद कोई कीमती चीज थी उस में, जिस के चलते वह उसे अपने साथ ही रखना चाहता था. ठीक भी है. कोई अपने कीमती सामान को अपनी नजर के सामने रखना चाहेगा ही.

दोनों ने साथ उठा कर सूटकेस को टैक्सी की पिछली सीट पर रखा था. टैक्सी की पिछली सीट पर मुमताज हुसैन उस सूटकेस पर ऐसे हाथ रख कर बैठा था मानो हाथ हटाते ही कोई उस सूटकेस को ले भागेगा.

जीपीएस औन कर ड्राइवर ने एयरपोर्ट की ओर गाड़ी मोड़ दी. बैक व्यू मिरर में वह मुमताज हुसैन को बीचबीच में देख लेता था. उस के चेहरे पर बेचैनी थी. वह किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था.

वह थोड़ा घबराया हुआ भी लग रहा था. रास्ते में उस ने पहले बेलापुर चलने को कहा. इस से पहले कि अगले मोड़ पर वह टैक्सी को मोड़ पाता, उस ने उसे कुर्ला की ओर चलने का आदेश दिया.

टैक्सी ड्राइवर को उस के बरताव पर शक हुआ. कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है, तभी तो यह कभी यहां तो कभी वहां जाने के लिए कह रहा है.

मलाड से गुजरते हुए मुमताज हुसैन ने टैक्सी रुकवाई. उसे भुगतान कर वह सूटकेस किसी तरह उठा कर एक झड़ी की ओर गया.

टैक्सी ड्राइवर का मुमताज हुसैन पर शक गहरा हो गया. बुकिंग एयरपोर्ट के लिए करवा कर पहले उस ने उसे बेलापुर जाने को कहा, फिर कुर्ला और अब मलाड में उतर गया. कुछ तो गड़बड़ है इस लड़के के साथ.

ड्राइवर नई बुकिंग के इंतजार में वहीं रुक गया और एक ओर गाड़ी खड़ी कर के मुमताज हुसैन की हरकतों पर ध्यान रखने लगा. थोड़ी ही देर में वह चौंक गया.

मुमताज हुसैन ने सूटकेस वहीं झड़ी की ओट में छोड़ एक आटोरिकशा पकड़ लिया और वहां से चल दिया.

कोई भी आदमी अपना सूटकेस छोड़ कर क्यों भागेगा भला? वह भी उस सूटकेस को, जिसे वह डिक्की में न रख कर अपने पास रख कर लाया था. कहीं वह भी किसी झमेले में न पड़ जाए क्योंकि उस लड़के ने उस की टैक्सी को मोबाइल फोन से बुक कराया था. वैसे भी किसी लावारिस सामान की जानकारी पुलिस को देनी ही चाहिए. हो सकता है, सूटकेस में बम हो या बम बनाने का सामान हो या फिर किसी और चीज की स्मगलिंग की जा रही हो.

ड्राइवर ने तुरंत पुलिस को फोन किया और पूरी जानकारी दी. कुछ ही देर में पुलिस वहां पहुंच गई.

पुलिस ने सूटकेस खोला तो उस में एक लड़की की जैसेतैसे मोड़ कर रखी गई लाश मिली. उस के सिर पर जख्मों के निशान थे, जो ज्यादा पुराने नहीं लग रहे थे.

पुलिस ने टैक्सी कंपनी से उस के संबंध में जानकारी ली. वह उस टैक्सी सर्विस का काफी पुराना ग्राहक था. टैक्सी सर्विस से उस के बारे में काफी जानकारी मिली. पुलिस ने जल्दी ही उस की खोज की और 4 घंटे के अंदर वह पकड़ा गया. उस की मोबाइल लोकेशन से यह काम और आसान हो गया था.

पुलिस की सख्त पूछताछ में जो बातें सामने आईं, वे काफी चौंकाने वाली थीं. सूटकेस में जिस लड़की की लाश

थी, वह एक मौडल थी, मानसी. वह पिछले 3 सालों से मुंबई में रह रही थी और मौडलिंग के साथसाथ फिल्म और टैलीविजन की दुनिया में जद्दोजेहद कर रही थी. वह राजस्थान के कोटा शहर की रहने वाली थी. उस का ज्यादातर समय मुंबई में ही बीतता था.

मुमताज हुसैन हैदराबाद का रहने वाला था और एक हफ्ते से मुंबई में था. यहां एक अपार्टमैंट में एक कमरे का फ्लैट उस ने किराए पर ले रखा था, क्योंकि उस का काम के सिलसिले में मुंबई आनाजाना लगा रहता था.

वह एक फ्रीलांस फोटोग्राफर था और हैदराबाद की कई कंपनियों के लिए मौडलों की तसवीरें खींचा करता था. मानसी से भी किसी इश्तिहार के सिलसिले में उस की जानपहचान हुई थी.

मानसी का दोस्त सचिन भी उस इश्तिहार के फोटो शूट के लिए मानसी के साथ था. सचिन मानसी का पुराना दोस्त था और दोनों साथसाथ फिल्म, टीवी और विज्ञापन की दुनिया में पैर जमाने के लिए मेहनत कर रहे थे.

मानसी और सचिन में काफी नजदीकियां थीं. मुमताज हुसैन ने जब मानसी और सचिन की दोस्ती का मतलब यही निकाला कि मानसी सभी के लिए मुहैया है. उस ने इशारेइशारे में सचिन से इस बारे में बात भी की, पर सचिन ने मजाक में बात को उड़ा दिया.

सचिन के साथ मुमताज हुसैन का पहले से ही फोटो शूट के लिए परिचय था और उस के परिचय का फायदा उठा कर उस ने मानसी से भी नजदीकियां बढ़ाई थीं.

धीरेधीरे दोनों की दोस्ती बढ़ती चली गई थी. दोनों हमउम्र थे इसलिए फेसबुक, ह्वाट्सएप वगैरह पर लगातार दोनों में बातें होती रहती थीं.

मानसी शायद मुमताज हुसैन को सिर्फ एक परिचित के रूप में देखती थी, पर उस के मन में मानसी के बदन को भोगने की हवस थी. इसी के चलते उस ने उस से मेलजोल बनाए रखा था खासकर उस के मन में यह बात थी कि जब मानसी सचिन के लिए मुहैया है तो उस के लिए क्यों नहीं?

पर वह जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहता था. धीरेधीरे उस ने मानसी से इतना परिचय बढ़ा लिया कि मानसी उस पर यकीन करने लगी.

उस दिन मुमताज हुसैन ने किसी बहाने मानसी को मुंबई में अपने फ्लैट पर बुलाया था. मानसी के पास कुछ खास काम नहीं था, इसलिए वह भी समय बिताने के लिए अपने इस फोटोग्राफर दोस्त के पास चली गई थी.

कुछ देर खानेपीने, इधरउधर की बातें करने के बाद मुमताज हुसैन बोला था, ‘‘मानसी, मैं जब से तुम से मिला हूं, तुम्हारा दीवाना हो गया हूं. मैं कई लड़कियों से मिला, पर कोई भी तुम्हारे टक्कर की नहीं.’’

‘‘इस तरह की बातें तो हर लड़का हर लड़की से करता है. इस में कुछ नया नहीं है,’’ मानसी ने हंस कर कहा था.

‘‘मैं सच बोल रहा हूं मानसी. तुम इसे मजाक समझ रही हो.’’

‘‘देखो मुमताज, हमारी दोस्ती एक फोटो शूट के जरीए हुई है. न मैं अपने कैरियर को संवार पाई हूं और न तुम. अच्छा होगा कि हम अपनाअपना कैरियर संभालें और दोस्त बन कर एकदूसरे की मदद करें.’’

‘‘वह सब तो ठीक है, पर आज तो सैक्स कौमन बात है. मैं तो तुम्हारे साथ सिर्फ सैक्स का मजा लेना चाहता हूं. वह भी सुरक्षित सैक्स. कहीं कोई खतरा नहीं. किसी को कोई भनक तक नहीं.

‘‘मुमताज, मैं वैसी लड़की नहीं हूं. मैं एक छोटे से शहर की रहने वाली हूं. कपड़े भले ही मौडर्न पहनती हूं और सोच से नई हूं, पर सैक्स मेरे लिए सिर्फ पतिपत्नी के बीच होने वाला काम है. मैं इस तरह का संबंध नहीं बना सकती. चाहे तुम मेरे दोस्त रहो या न रहो.’’

पहले तो मुमताज हुसैन ने बारबार उसे मनानेसम?ाने की कोशिश की थी, पर जब वह नहीं मानी तो उस के सब्र का बांध टूट गया और वह गुस्से से आगबबूला हो गया.

मुमताज हुसैन ने मानसी को धमकाया, ‘‘आज तुम्हें मेरी बात माननी पड़ेगी. राजीखुशी से मानो या फिर मेरी जबरदस्ती को मानो.’’

‘‘ऐसी गलतफहमी में मत रहना. यह देखो, मिर्च स्प्रे…’’ मानसी ने अपने पर्स से मिर्च स्प्रे निकाल कर उसे दिखाया, ‘‘कुछ देर के लिए तो तुम अंधे हो जाओगे और अपने गंदे इरादे को पूरा नहीं कर पाओगे. अगर अपना भला चाहते हो तो मेरे रास्ते से हट जाओ…’’

मुमताज हुसैन ने आव देखा न ताव नजदीक रखे लकड़ी के स्टूल को उस के सिर पर दे मारा. चोट सिर के ऐसे हिस्से में लगी कि कुछ ही देर में मानसी की मौत हो गई.

मुमताज हुसैन यह देख कर हक्काबक्का रह गया. उस का हत्या करने का हरगिज इरादा नहीं था. वह तो बस अपनी हवस को शांत करना चाहता था. घबराहट में वह कुछ सम?ा नहीं पा रहा था कि क्या करे.

मुमताज हुसैन कुछ सोच पाता, इस से पहले ही किसी ने डोरबैल की घंटी बजा दी. मैजिक आई से ?ांक कर उस ने देखा तो सचिन को वहां खड़ा पाया. गनीमत थी कि मानसी की लाश अंदर कमरे में पड़ी थी.

‘‘मानसी आई है क्या यहां?’’ सचिन ने पूछा.

‘‘नहीं तो,’’ मुमताज हुसैन घबरा कर बोला.

‘‘उस ने मुझे ह्वाट्सएप पर संदेश दिया था कि वह तुम्हारे घर आ रही है. मुझे इस ओर ही आना था इसलिए सोचा कि उसे भी साथ ले चलूं.’’

‘‘हां… हां… उस ने यहां आने को कहा था, पर किसी काम से नहीं आ पाई,’’ मुमताज हुसैन ने कहा.

‘‘पर, तुम तो घर में हो. तुम्हें इतना पसीना क्यों आ रहा है?’’ सचिन ने पूछा.

‘‘क… क… कुछ नहीं. थोड़ा वर्कआउट कर रहा था. आओ बैठो…’’ डरतेडरते मुमताज हुसैन ने कहा. वह सोच रहा था कि कहीं सचमुच ही सचिन अंदर न आ जाए.

‘‘अभी नहीं, समय पर स्टूडियो पहुंचना है, फिर कभी आऊंगा तो बैठूंगा. मानसी से मैं मोबाइल पर बात कर लूंगा. उसे भी स्टूडियो में किसी से मिलवाना था,’’ सचिन ने कहा और चलता बना.

मुमताज हुसैन ने जल्दी से दरवाजा बंद किया और अंदर रूम में जा कर सब से पहले मानसी का फोन स्वीच औफ किया. वह समझ सकता था कि लाश वहीं पड़ी रहेगी तो उस से बदबू आएगी और राज खुल जाएगा. आखिरकार लाश को ठिकाने लगाना जरूरी था. लेकिन, कैसे? यह उस की समझ में नहीं आ रहा था.

अपार्टमैंट के बाहर सिक्योरिटी गार्ड की चौकस ड्यूटी रहती थी. मुमताज हुसैन ने काफी सोचविचार के बाद फैसला किया कि एक बड़े से सूटकेस में लाश को ले कर कहीं छोड़ दिया जाए. कहीं और लाश मिलेगी तो पुलिस को उस पर शक नहीं होगा.

इसी योजना के तहत मुमताज हुसैन ने कार बुक की और मलाड में झड़ी के पास सूटकेस को छोड़ आया था, पर उस की चाल कामयाब नहीं हो पाई और घटना के 5-6 घंटे के अंदर ही वह पुलिस की गिरफ्त में था. थाने में बैठा मुमताज हुसैन सोच रहा था अपनी बदहाली की वजह. उस ने पाया कि उस की अनुचित मांग ही उस की इस हालत की वजह बनी.

दलदल : नौकरी के जंजाल में फंसा मोहनलाल

मोहनलाल की जब बैंक में नौकरी लगी, तो उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उसे बैंक की शेखपुर ग्रामीण ब्रांच में पहली पोस्टिंग मिली.

शहर में पलेबढ़े मोहनलाल को शेखपुर गांव की जिंदगी रास नहीं आई, पर गांव से शहर की किसी ब्रांच में तबादला कराना आसान नहीं था, इसलिए वह न चाहते हुए भी गांव में रहने के लिए मजबूर था, जहां बिजली, सड़कें, अच्छे घर और दूसरी बुनियादी जरूरतों की कमी थी.

बैंक में नौकरी मिलने के एक साल बाद ही मोहनलाल की शादी मोनिका से हो गई. मोनिका बहुत खूबसूरत थी और उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी. शादी के बाद वह 2 महीने तक मोहनलाल के मातापिता के साथ रही और फिर उस के साथ शेखपुर गांव चली गई.

मोनिका को शेखपुर गांव में रहना सजा काटने के बराबर लगा, पर बिना पति के साथ के रात काट पाना भी उस के लिए आसान नहीं था. वह मजबूर हो कर गांव में एकएक दिन काट रही थी और पति से अपना तबादला किसी शहरी ब्रांच में कराने की जिद कर रही थी.

मोहनलाल ने उसे सम?ाया कि बैंक के जितने मुलाजिम गांव की ब्रांचों में काम करते हैं, उन में से आधे से ज्यादा लोग अपना तबादला किसी शहरी ब्रांच में कराना चाहते हैं, इसलिए तबादले के लिए दी गई अर्जियों पर बैंक कोई ध्यान नहीं देता और यूनियन के नेता भी ऐसे तबादलों के केस अपने हाथ में नहीं लेते.

मोहनलाल ने मोनिका को यह भी बताया कि उस की तो अभी 2 साल की ही नौकरी हुई है, यहां तो 10-12 साल से लोग लगे हैं और अभी तक उन की अर्जियों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई.

मोनिका के बारबार पूछने पर मोहनलाल ने बताया कि अगर जोनल मैनेजर चाहें, तो उस का तबादला शहर में हो सकता है.

मोनिका जिद कर के मोहनलाल के साथ जोनल मैनेजर से मिलने उन के घर पहुंच गई.

जोनल मैनेजर नरेश को जब मालूम हुआ कि मोहनलाल बैंक की शेखपुर ब्रांच में क्लर्क है, तो उन्हें उस का बिना इजाजत के घर आना बुरा लगा, पर मोनिका ने लपक कर उन के पैर छू लिए.जोनल मैनेजर नरेश ने एक निगाह मोनिका पर डाली, तो उस के तीखे नाकनक्श और कसी हुईर् देह देख कर उन के तेवर ढीले पड़ गए. मोनिका को आशीर्वाद देने के बहाने वे देर तक उस की नंगी पीठ सहलाते रहे. मोनिका भी निगाह नीची किए उन से सटी मुसकराती रही.

नरेश उन दोनों को घर के अंदर ले गए और नौकर से चाय लाने के लिए कहा. इस बीच मोनिका ने मोहनलाल के तबादले के लिए उन से गुजारिश की, जिसे नरेश ने उस की खूबसूरत देह को ललचाई नजर से घूरते हुए मान लिया.

मोहनलाल चुपचाप जमीन पर नजर गड़ाए बैठा रहा. जब वे लोग लौटने लगे, तो मोनिका ने जबरन नरेश के फिर से पैर छू लिए.

इस घटना के 15 दिन बाद जोनल मैनेजर नरेश शेखपुर ब्रांच का दौरा करने आए और रात को शेखपुर के डाक बंगले में रुकने का इंतजाम करने के लिए ब्रांच मैनेजर को निर्देश दिया. बैंक मैनेजर ने उन के रुकने का सारा इंतजाम करा दिया.

शाम को मोहनलाल बैंक से घर आया, तो उस ने नरेश के शेखपुर गांव आने की बात मोनिका को बताई. मोनिका ने मोहनलाल से कहा कि नरेशजी को डिनर के लिए अपने घर बुला लो.

मोहनलाल ने ऐसा ही किया, जिसे नरेश ने बिना किसी नानुकर के मान लिया. साथ ही शराब पीने का इंतजाम रखने का इशारा भी किया. उन्होंने उस से यह भी कहा कि वे रात को 9 बजे डाक बंगले पर पहुंच जाए.

रात के 9 बजे मोहनलाल जब डाक बंगले पर पहुंचा, तो नरेशजी उस का इंतजार कर रहे थे. उन्हें ले कर मोहनलाल घर पहुंचा, तो सजीधजी मोनिका ने दरवाजे पर उन का स्वागत किया.

फिर शराब का दौर चला. शुरू में तो मोहनलाल ?ि?ाका, मगर 2 पैग पीने के बाद ही वह खुल गया. इस के बाद नरेशजी के इशारा करने पर उस ने मोनिका को भी जबरदस्ती पैग पिला दिया. जब नरेशजी मस्ती में आ गए, तो डिनर हुआ. इस के बाद नरेशजी ने सिगरेट पीने की फरमाइश की. मोहनलाल सिगरेट लेने बाजार की ओर भागा.

इस बीच नरेशजी ने मोनिका की कमर में हाथ डाल दिया और उस की मांसल देह को सहलाने लगे.जब मोनिका ने उन की इस हरकत का कोई विरोध नहीं किया, तो उन की हिम्मत बढ़ गई. उन्होंने उसे खींच कर अपनी गोद में बैठा लिया और उन के हाथ तेजी से मोनिका की देह पर फिसलने लगे. कुछ ही देर में मोनिका के हाथ भी नरेशजी की देह में कुछ खोजने लगे.

जल्दी ही नरेशजी ने उसे उठा कर पलंग पर लिटा दिया. जब तक मोहनलाल लौटा, तब तक वे हलके हो कर कुरसी पर बैठ चुके थे. पर उन की तेज चल रही सांसों और मोनिका के गालों पर दांत के हलके निशान बीती हुई घटना की चुगली मोहनलाल से कर रहे थे.

मोहनलाल कुछ उदास हो गया, पर चलते समय जब नरेशजी ने उसे छाती से लगा कर कहा कि आज से तुम मेरे भाई जैसे हो, तो उस का दिल बल्लियों उछलने लगा.

नरेशजी ने जाते ही मोहनलाल के तबादले का आदेश जारी कर दिया. मोहनलाल और मोनिका अपने शहर के तबादले पर बेहद खुश थे. अब नरेशजी अकसर उस के घर आने लगे. शहर में मोहनलाल को बहुतकुछ मिला. उन के घर बेटी पैदा हुई और प्रमोशन में अफसर का पद भी मिल गया.

हां, प्रमोशन के लिए मोहनलाल को कई बार नरेशजी को डिनर के लिए अपने घर बुलाना पड़ा था और डिनर के बाद घर में सिगरेट होते हुए भी मोनिका के इशारे पर सिगरेट लाने के लिए उसे रात के 10-11 बजे के बाद बाजार जाना पड़ा था.क चतुर खिलाड़ी की तरह मोनिका ने मोहनलाल और नरेशजी दोनों को अपने इशारों पर नचाना शुरू कर दिया.

कुछ ही महीने बाद नरेशजी की पोस्टिंग दूसरे शहर में हो गई, पर मोनिका लगातार उन से मिलती रही और अपने पति के प्रमोशन और शहरी ब्रांचों में नियुक्ति का इंतजाम कराती रही. बदले में वह नरेशजी की खुल कर सेवा करती रही. मोहनलाल ने भी हालात से सम?ौता कर लिया था.

4 साल बाद नरेशजी दोबारा तबादला हो कर मोहनलाल के शहर में आ गए. अब उन की मेहरबानियां खुल कर मोनिका पर बरस रही थीं. यहां तक कि उन्होंने कई बड़े कर्ज भी उन के लिए मंजूर किए थे.

मोहनलाल के पास शहर में 2-2 मकान, बढि़या गाड़ी, नौकरचाकर सबकुछ था. उस के पुराने साथी अब भी बैंक में बाबू और बड़े बाबू के पद पर थे, जबकि वह मैनेजर बन गया था.

मोहनलाल की बेटी चेतना ने 12वीं जमात का इम्तिहान सैकंड डिविजन में पास किया, तो कालेज में दाखिला लेने के लिए किसी यूनिवर्सिटी में बात नहीं बनी. मजबूरन मोनिका को नरेशजी का सहारा लेना पड़ा और देखते ही देखते उस की बेटी को शहर के अच्छे कालेज में दाखिला मिल गया.

मोनिका के कहने पर नरेशजी ने दोपहर में उस के घर आना शुरू कर दिया.

ऐसे ही एक दिन जब नरेशजी मोनिका के घर में थे, तो कालेज में एक लड़की की मौत होने की वजह से जल्दी छुट्टी हो गई और मोनिका की बेटी चेतना 12 बजे ही घर पहुंच गई. घर का बाहरी दरवाजा खुला था.

चेतना ने बैग ड्राइंगरूम में रखा और फ्रिज से पानी की बोतल निकालने लगी, तभी उसे अपनी मां की चीख सुनाई दी. उस ने खिड़की से छिप कर देखा, तो दंग रह गई.

कुछ देर बाद मोनिका और नरेशजी जब कमरे से बाहर निकले, तो चेतना को ड्राइंगरूम में देख कर सकपका गए.

नरेशजी बिना कुछ बोले ही बाहर निकल गए और मोनिका ने खुद को घरेलू कामों में मसरूफ कर लिया.

एक दिन मोहनलाल घर लौट रहा था. रास्ते में उस ने देखा कि एक अधेड़ शख्स स्कूटर चला रहा था और चेतना उस के पीछे बैठी थी. वह अपने दोनों हाथों से उस अधेड़ शख्स को जकड़े हुए थी. शाम को घर आ कर मोहनलाल ने यह बात मोनिका को बताई. मोनिका ने अकेले में चेतना से पूछा, ‘‘आज तुम दोपहर में किस के साथ स्कूटर पर जा रही थीं?’’ चेतना ने बताया कि वह बायोलौजी पढ़ाने वाले सर के साथ थी. इस पर मोनिका ने पूछा, ‘‘तुम उन के साथ कहां गई थीं?’’ ‘‘फिल्म देखने.’’ ‘‘क्यों? तुम टीचर के साथ फिल्म देखने क्यों गई थीं?’’ ‘‘अरे मां, 30 नंबर का प्रैक्टिकल होता है. अगर सर खुश हो गए, तो 30 में से पूरे 30 नंबर भी दे सकते हैं. अगर वे चाहें, तो कैमिस्ट्री और फिजिक्स के टीचरों से भी प्रैक्टिकल में अच्छे नंबर दिला सकते हैं.’’‘‘तो प्रैक्टिकल में अच्छे नंबर पाने के लिए तुम अपनी इज्जत लुटा दोगी?’’ मोनिका ने चीखते हुए कहा. ‘‘क्यों मां, इस में बुराई क्या है? आखिर आप भी तो मनचाही चीजें पाने के लिए यही करती हैं,’’ चेतना ने मां को घूरते हुए कहा.

यह सुन कर मोनिका के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. उस का मुंह खुला का खुला रह गया. बैडरूम में चुपचाप बैठे मांबेटी की बात सुन रहे मोहनलाल का हाल भी कुछ ऐसा ही था. वे दोनों अपने ही बनाए गए दलदल में छटपटाने के लिए मजबूर थे.

दूसरा मर्द : दो नाव पर सवार श्यामली

श्यामली बैठ कर अखबार पढ़ने लगी. स्कूल के बच्चे बरामदे के पास घास पर बैठ कर दोपहर का खाना खाने लगे. मधुप भी अपना डब्बा खोलते हुए बोला, ‘‘श्यामलीजी, अब आ भी जाइए. खबरें तो बाद में भी पढ़ी जा सकती हैं. मुझे तो बड़ी जोर की भूख लगी है.’’

‘‘लेकिन मुझे भूख नहीं है. तुम खा लो,’’ अखबार से नजर हटाए बगैर श्यामली बोली.

‘‘इस का मतलब आज फिर अरुण से झगड़ा हुआ होगा?’’ मधुप ने श्यामली की उलझन समझते हुए पूछा.

‘‘हां… रात को वे देर से शराब पी कर आए. खाने में मिर्च कम होने पर तुनक पड़े और बेवजह मुझे मारने लगे,’’ कहते हुए श्यामली की आंखें भर आईं. बात जारी रखते हुए उस ने आगे बताया, ‘‘मैं रातभर सो न पाई. सुबहसुबह ही तो आंख लगी थी. अगर मैं जल्दी स्टेशन न आ पाती तो ट्रेन निकल जाती.’’

‘‘अब उठिए भी… मेरी मां ने आज वैसे ही ढेर सारा खाना रख दिया है,’’ मधुप ने कहा, तो श्यामली उस की बात टाल न सकी.

श्यामली को इस कसबे में नौकरी करते 5 साल बीत गए थे. वह सुबह 9 बजे तक अपने घर का सारा काम निबटा कर स्कूल आते समय साथ में खाने का डब्बा भी ले आती थी. उस का पति एक बैंक में क्लर्क था, जिस की सोहबत अच्छी नहीं थी. वह हमेशा नशे में धुत्त रहता था और अपनी बीवी की तनख्वाह पर नजर गड़ाए रहता था. जब कभी वह पैसा देने में आनाकानी करती, तब दोनों के बीच झगड़ा होता था.

एक तो रोजरोज रेलगाड़ी के धक्के खाना, ऊपर से स्कूल के बच्चों के साथ सिर खपाना, श्यामली बुरी तरह से थक जाती थी. उसे न घर में चैन था, न बाहर. उस के इस दुखभरे पलों को मुसकराहट में बदलने के लिए मधुप उस की जिंदगी में दाखिल हुआ था. वह उस के साथ ही नौकरी करता था.

मधुप भी उसी के शहर का रहने वाला था. रोजाना दोनों एक ही ट्रेन से साथसाथ आतेजाते थे. वे एकदूसरे में घुलमिल गए थे. श्यामली शादीशुदा थी, पर मधुप अभी कुंआरा था.

मधुप से श्यामली के घर की बात छिपी हुई नहीं थी. वह उस की दुखती रग को पहचान गया था. सोचना शायद उसे प्यार और हमदर्दी की जरूरत है, इसलिए वह उस की हिम्मत बढ़ाता रहता था.

तब श्यामली सोचती कि सब लोग एकजैसे नहीं होते. वह अपने मन की बात मधुप को बता कर हलकापन महसूस करती थी और उसे अपना हमराज मानने लगी थी.

एक दिन श्यामली तैयार हो कर बाहर निकली ही थी कि सामने मधुप को देख कर ठिठक गई.

‘‘क्या बात है?’’ श्यामली ने पूछा.

‘‘बाबूजी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है. उन्हें बाहर ले जाना होगा. यह छुट्टी की अर्जी रख लीजिए.’’

अर्जी देख कर श्यामली हैरान रह गई, फिर बोली, ‘‘क्या पूरे 15 दिन की छुट्टी ले रहे हो?’’

‘‘हां. डाक्टर ने सलाह दी है. अगर उन्हें आराम नहीं मिला, तो शायद और ज्यादा छुट्टी लेनी पड़ जाएं.’’

‘‘ठीक है,’’ कहते हुए श्यामली ने अर्जी अपने पास रख ली. वह मधुप को दूर तक जाते हुए देखती रही.

मधुप जब छुट्टी से लौट कर आया तो श्यामली खुशी से झूम उठी. फिर कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘मधुप, बच्चों के इम्तिहान होने से पहले क्यों न हम सब पिकनिक पर चलें?’’

मधुप फौरन श्यामली की बात मान गया.

स्कूल से 4 किलोमीटर दूर एक झील थी. बड़ी अच्छी जगह थी. वहां छुट्टी के दिन जाना तय हुआ.

श्यामली ने घर आ कर अरुण से कहा, ‘‘क्योंजी, पिकनिक पर आप भी चलेंगे न? उस दिन आप की भी छुट्टी रहेगी.’’

अरुण गुस्से से बोला, ‘‘हफ्ते में एक दिन तो यारदोस्तों के साथ दारू पीने का मौका मिलता है… उसे भी तुम छीन लेना चाहती हो?’’

उस की बात सुन कर श्यामली का दिल नफरत से भर उठा.

पिकनिक वाले दिन श्यामली भोर होेते ही उठ बैठी. अरुण अभी तक सो रहा था. वह उस का खाना बना कर नहाधो कर तैयार हुई और समय से पहले ही स्टेशन पर आ गई.

मधुप भी उसी का इंतजार कर रहा था. श्यामली बेहद खुश थी. उस ने अपने सिंगार में कोई कमी नहीं रखी थी. उस के जिस्म से इत्र की बड़ी अच्छी महक आ रही थी.

श्यामली की खूबसूरती देख कर मधुप अंदर ही अंदर तड़प उठा. उस से रहा नहीं गया, बोला, ‘‘श्यामलीजी, आप आज बहुत हसीन लग रही हैं.’’

शायद वह मधुप से तारीफ सुनना चाहती थी, इसलिए उस के गाल और ज्यादा गुलाबी हो गए.

सभी बच्चे भोजन कर आराम करने लगे. लेकिन मधुप झील के किनारे एक इमली के पेड़ तले बैठा था.

‘‘अरे, तुम यहां बैठे हो, मैं तुम्हें कब से खोज रही हूं,’’ श्यामली उस के बिलकुल नजदीक आ बैठी.

‘‘बस यों ही इस झील की लहरों को देख रहा हूं. पानी कितना ठंडा?है.’’

थोड़ी देर दोनों के बीच चुप्पी छाई रही.

अचानक श्यामली बोली, ‘‘मधुप.’’

‘‘जी कहो…’’ श्यामली की ओर निगाहें घुमाते हुए मधुप ने पूछा.

‘‘मैं चाहती हूं कि तुम मुझे अपना लो,’’ अटकते हुए श्यामली ने कहा.

मधुप हैरान रह गया. बोला, ‘‘लेकिन आप तो शादीशुदा हैं.’’

‘‘जिसे तुम शादी कहते हो, वह नरक है. वहां सांस लेते हुए भी मुझे दर्द होता है. अगर तुम ‘हां’ कह दो तो मैं अपने मर्द से तलाक ले लूंगी.’’

‘‘श्यामलीजी, झगड़े हर घर में होते हैं लेकिन इस का मतलब यह तो नहीं कि बीवी और मर्द हमेशा के लिए एकदूसरे से अपना मुंह मोड़ लें,’’ समझाते हुए मधुप ने कहा.

‘‘फिर मैं क्या करूं? मधुप, मैं अब बिलकुल टूट चुकी हूं. मुझे तुम्हारे सहारे की जरूरत है. बोलो, मेरा साथ दोगे?’’ श्यामली उस की आंखों में झांकते हुए बोली.

मधुप सोच में डूब गया. वह फैसला नहीं कर पा रहा था. कुछ देर बाद उस ने कहा, ‘‘मर्द अगर गलत रास्ते पर जाता है तो बीवी ही आगे आ कर उसे सही रास्ते पर लाती है. अरुण पर एक बार फिर अपने प्यार का बादल बरसा कर देख लीजिए. आओ, अब चलें, सूरज ढलने लगा है,’’ उठते हुए मधुप ने कहा.

श्यामली किसी मुजरिम की तरह मधुप के पीछेपीछे चल पड़ी.

उन के स्कूल से जिले की हौकी टीम में हिस्सा लेने के लिए 2 लड़कियों को चुना गया था. श्यामली ने मधुप से कहा, ‘‘अगर तुम भी मेरे साथ चलोगे तो सफर अच्छा कट जाएग.’’

‘‘आप कहती हैं तो चल देता हूं,’’ मधुप बोला.

उन के जिले की टीम मैच जीत गई थी. शाम को दोनों लड़कियों को होस्टल की दूसरी लड़कियों के बीच छोड़ कर श्यामली मधुप के साथ तांगे पर बैठ कर घूमने निकल पड़ी. दोनों ने खूब चाटपकौड़े खाए.

मधुप ने अपनी पसंद की एक साड़ी खरीदी और तोहफे के तौर पर श्यामली को दे दी. फिर एक होटल में खाना खाया, उस के बाद पार्क में आ बैठे, जहां फव्वारे चल रहे थे और रंगबिरंगी रोशनी भी थी.

मधुप एक फूल वाले से मोगरे की लडि़यां ले आया, जिन्हें उस ने अपने हाथों से श्यामली के बालों में लगा दिया. वह उस के और नजदीक सिमट आई.

श्यामली को अपनी जिंदगी में इतना प्यार कभी भी नहीं मिल पाया था, जितना कि मधुप उस पर उड़ेल रहा था. न चाहते हुए भी वह बोली, ‘‘मधुप, रात बहुत हो चुकी है… होस्टल में लड़कियां हमारा इंतजार कर रही होंगी?’’

मधुप कुछ नहीं बोला. तब श्यामली ने अपना सिर उस की गोद में रख दिया तो वह प्यार से उस के बाल सहलाने लगा. धीरेधीरे पार्क से लोग जाने लगे थे. तब मधुप ने उस का हाथ पकड़ कर उठाया, ‘‘आओ, चलते हैं.’’

श्यामली उठ खड़ी हुई. बाहर आ कर मधुप ने एक रिकशा वाले से पूछा,’’ यहां पास में कोई होटल है?’’

श्यामली हैरानी से मधुप का मुंह ताकने लगी.

‘‘हां साहब, पास में ही एक होटल है… सस्ता भी है,’’ रिकशा वाले ने कहा. तो दोनों रिकशा में बैठ गए.

श्यामली का कलेजा ‘धकधक’ कर रहा था. वह मधुप के इस फैसले से बेहद खुश थी, लेकिन दिल में डर भी समाया हुआ था.

रिकशा से उतर कर मधुप ने कमरा लेते वक्त श्यामली को अपनी बीवी बताया और उस की कमर में हाथ डाल कर सीढि़यां चढ़ने लगा. रातभर 2 जवान जिस्म एकदूसरे में समाए रहे.

सुबह श्यामली का शरीर टूट रहा था. चादर पर बिखरे मोगरे के फूल अपनी हलकीहलकी खुशबू अभी तक बिखेर रहे थे. रात की बात याद आते ही उस का दिल एक बार फिर गुदगुदा उठा.

मधुप अभी तक सोया हुआ था. वह उसे उठाते हुए बोली, ‘‘देखो, सुबह हो गई है.’’

मधुप आंखें मलते हुए उठा. उस ने श्यामली को एक बार फिर अपनी बांहों में भरने की कोशिश की तो वह छिटकते हुए बोली, ‘‘हटो, जाने रातभर लड़कियां होस्टल में कैसे रही होंगी?’’

वे दोनों तैयार हो कर होस्टल पहुंच गए.

तकरीबन 3 महीने बाद मधुप का वहां से तबादला हो गया तो श्यामली तड़प उठी. उस से बिछड़ते वक्त मधुप ने कहा, ‘‘मैं एक हफ्ते बाद तुम से मिलने आऊंगा. इस बीच तुम भी अपने आदमी से तलाक के बारे में पूरी बात कर लेना. जल्दी ही हम दोनों ब्याह कर लेंगे.’’

श्यामली ने आंसू भरी निगाहों से उसे विदा किया.

अब वह फिर से अकेली स्कूल जाने लगी. मधुप के इंतजार में हफ्ते, महीने और फिर साल बीतते गए पर न तो मधुप की कोई चिट्ठी आई और न ही वह खुद आया. बाद में श्यामली को पता चला कि मधुप तो वहां जा कर शादी कर चुका है. वह अपने आदमी के अलावा दूसरे मर्द द्वारा भी ठगी जा चुकी थी.

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