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आजादी: राधिका का आखिर क्या था कुसूर

फैमिली कोर्ट की सीढि़यां उतरते हुए पीछे से आती हुई आवाज सुन कर वह ठिठक कर वहीं रुक गई. उस ने पीछे मुड़ कर देखा. वहां होते कोलाहल के बीच लोगों की भीड़ को चीरता हुआ नीरज उस की तरफ तेज कदमों से चला आ रहा था.

‘‘थैंक्स राधिका,’’ उस के नजदीक पहुंच नीरज ने अपने मुंह से जब आभार के दो शब्द निकाले तो राधिका का चेहरा एक अनचाही पीड़ा के दर्द से तन गया. उस ने नीरज के चेहरे पर नजर डाली. उस की आंखों में उसे मुक्ति की चमक दिखाई दे रही थी. अभी चंद मिनटों पहले ही तो एक साइन कर वह एक रिश्ते के भार को टेबल पर रखे कागज पर छोड़ आगे बढ़ गई थी.

‘‘थैंक्स राधिका टू डू फेवर. मुझे तो डर था कि कहीं तुम सभी के सामने सचाई जाहिर कर मुझे जीने लायक भी न छोड़ोगी,’’ राधिका को चुप पा कर नीरज ने आगे कहा.

राधिका ने एक बार फिर ध्यान से नीरज के चेहरे को देखा और बिना कुछ कहे आगे बढ़ गई. फैमिली कोर्ट के बाहर से रिकशा ले कर वह सीधे औफिस ही पहुंच गई. उस के मन में था कि औफिस के कामों में अपने को व्यस्त रख कर मन में उठ रही टीस को वह कम कर पाएगी. लेकिन वहां पहुंच कर भी उस का मन किसी भी काम में नहीं लगा. उस ने घड़ी पर नजर डाली. एक बज रहा था. औफिस में आए उसे अभी एक घंटा ही हुआ था. अपनी तबीयत ठीक न होने का बहाना कर उस ने हाफडे लीव को फुल डे सिकलीव में कन्वर्ट करवा लिया और औफिस से निकल कर सीधे घर जाने के लिए रिकशा पकड़ लिया.

सोसाइटी कंपाउंड में प्रवेश कर उस ने लिफ्ट का बटन दबाया, पर सहसा याद आया कि आज सुबह से बिजली बंद है और शाम 5 बजे के बाद ही सप्लाई वापस चालू होगी. बुझे मन से वह सीढि़यां चढ़ कर तीसरी मंजिल पर आई. फ्लैट नंबर सी-302 का ताला खोल कर अंदर से दरवाजा बंद कर वह सीधे जा कर बिस्तर पर पसर गई.

कुछ देर पहले बरस कर थम चुकी बारिश की वजह से वातावरण में ठंडक छा गई थी. लेकिन उस का मन अंदर से एक आग की तपिश से जला जा रहा था. नेहा अपने बौस के साथ बिजनैस टूर पर गई हुई थी और कल सुबह से पहले नहीं आने वाली थी वरना मन में उठ रही टीस उस के संग बांट कर अपने को कुछ हलका कर लेती. बैडरूम में उसे घबराहट होने लगी, तो वह उठ कर हौल में आ कर सोफे पर सिर टिका कर बैठ गई. उस की आंखों के आगे जिंदगी के पिछले 4 साल घूमने लगे…

‘चलो अच्छा ही है 2 दोस्तों के बच्चे अब शादी की गांठ से बंध जाएंगे तो दोस्ती अब रिश्तेदारी में बदल कर और पक्की हो जाएगी,’ राधिका के नीरज से शादी के लिए हां कहते ही जैसे पूरे घर में खुशियां छा गई थीं. राधिका के पिता ने अपने दोस्त का मुंह मीठा करवाया और गले से लगा लिया.

राधिका ने अपने सामने बैठे नीरज को चोरीछिपे नजरें उठा कर देखा. वह शरमाता हुआ नीची नजरें किए हुए चुपचाप बैठा था. न्यूजर्सी से अपनी पढ़ाई पूरी कर अभी कुछ महीने पहले ही आया नीरज शायद यहां के माहौल में अपनेआप को फिर से पूरी तरह से एडजस्ट नहीं कर पाया. यही सोच कर राधिका उस वक्त उस के चेहरे के भाव नहीं पढ़ पाई. अपने पापा के दोस्त दीनानाथजी को वह बचपन से जानती थी लेकिन नीरज से उस की मुलाकात इस रिश्ते की नींव बनने से पहले कभीकभी ही हुई थी. 12वीं पास करने के बाद नीरज 5 साल के लिए स्टूडैंट वीजा पर न्यूजर्सी चला गया था और जब वापस आया तो पहली ही मुलाकात में चंद घंटों की बातों के बाद उन की शादी का फैसला हो गया.

‘‘नीरज, मैं तुम्हें पसंद तो हूं न?’’ बगीचे में नीरज का हाथ थाम कर चलती राधिका ने पूछा.

‘‘हां. लेकिन क्यों ऐसा पूछ रही हो?’’ उस की बात का जवाब देते हुए नीरज ने पूछा.

‘बस ऐसे ही. अगले महीने हमारी शादी होने वाली है. पर तुम्हारे चेहरे पर कोई उत्साह न देख कर मुझे डर सा लगता है. कहीं तुम ने किसी दबाव में आ कर तो इस शादी के लिए हां नहीं की न?’ पास ही लगी बैंच पर बैठते हुए राधिका ने नीरज को देखा.

‘वैल. अपना बिजनैस सैट करने की थोड़ी टैंशन है. इसी उलझन में रहता हूं कि कहीं शादी का यह फैसला जल्दी तो नहीं ले लिया,’ कहते हुए नीरज ने अपनी पैंट की जेब से रूमाल निकाला और माथे पर उभर आई पसीने की बूंदों को पोंछ डाला.

‘इस में टैंशन लेने वाली बात ही क्या है? शादी तो समय पर हो ही जानी चाहिए. वैसे भी, जीने के लिए पैसा नहीं, अपने लोगों के पास होने की जरूरत होती है,’ कहती हुई राधिका ने नीरज के कंधे पर अपना सिर टिका दिया.

‘बात तो सच है तुम्हारी पर फिर भी हर वक्त एक डर सा बना रहता है,’ नीरज ने अपने हाथ में अभी भी रूमाल पकड़ रखा था.

‘छोड़ो भी अब यह डर और कोई रोमांटिक बात करो न मुझ से,’ कहती हुई राधिका ने आसपास नजर दौड़ाई. बगीचे में अधिकांश जोड़े अपनी ही मस्ती में खोए हुए थे. सहसा राधिका नीरज के और करीब आ गई और उस के हाथ की उंगलियां उस की छाती पर हरकत करने लगीं.

‘यह क्या हरकत है राधिका?’ कहते हुए नीरज ने एक झटके से राधिका को अपने से दूर कर दिया और अपनी जगह से खड़ा हो गया. राधिका के लिए नीरज का यह व्यवहार अप्रत्याशित था. वह नीरज की इस हरकत से सहम गई. तभी दरवाजे की घंटी बज उठी. राधिका अपनी यादों से बाहर निकल कर खड़ी हुई और दरवाजा खोला.

‘‘नेहा प्रधान हैं?’’

दरवाजे पर कूरियर वाला खड़ा था. ‘‘जी, इस वक्त वह घर पर नहीं है. लाइए मैं साइन कर देती हूं,’’ राधिका ने पैकेट लेने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया.

पैकेट दे कर कूरियर वाला चला गया. दरवाजा बंद करती हुई राधिका ने पैकेट को देख कर उस के अंदर कोई पुस्तक होने का अंदाजा लगाया. नेहा अकसर कोई न कोई पुस्तक मंगाती रहती थी. उस ने पैकेट टेबल पर रख दिया और वापस सोफे पर बैठ गई.

4 वर्षों का साथ आज यों ही एक झटके में तो नहीं टूट गया था. उस के पीछे की भूमिका तो शायद शादी के पहले से ही बन चुकी थी. पर नीरज का मौन राधिका की जिंदगी भी दांव पर लगा गया. नीरज के बारे में और सोचते हुए उस का चेहरा तन गया.

‘नीरज,  तुम्हारे मन में आखिर चल क्या रहा है? हमारी शादी हुए एक महीने से ज्यादा हो गया और 10 दिनों के अच्छेखासे हनीमून के बाद भी तुम्हारे चेहरे पर नईनई शादी वाली खुशी नदारद सी है. बात क्या है? मुझ से तो खुल कर कहो,’ पूरे हनीमून के दौरान राधिका ने महसूस किया कि नीरज हमेशा उस से एक सीमित अंतर बना कर रह रहा है. रात के हसीन पल भी उसे रोमांचित नहीं कर पा रहे थे. वह, बस, शादी के बाद की रातों को एक जिम्मेदारी मान कर जैसेतैसे निभा ही रहा था. हनीमून से लौट कर आने के बाद राधिका के चेहरे पर अतृप्ति के भाव छाए हुए थे.

‘कुछ नहीं राधिका. मुझे लगता है हम ने शादी करने में जल्दबाजी कर दी है,’ राधिका की बात सुन कर नीरज इतना ही बोल पाया.

‘जनाब, अब ये सब बातें सोचने का समय बीत चुका है. बेहतर होगा हम मिल कर अपनी शादी का जश्न पूरे मन से मनाएं,’ राधिका ने नीरज की बात सुन कर कहा.

‘तुम नहीं समझ पाओगी राधिका और मैं तुम्हें अपनी समस्या समझ भी नहीं पाऊंगा,’ कह कर नीरज राधिका की प्रतिक्रिया की परवा किए बिना ही कमरे से बाहर चला गया.

अकेले बैठी हुई राधिका का मन बारबार पिछली बातों में जा कर अटक रहा था. लाइट भी नहीं थी जो टीवी औन कर अपना मन बहला पाती. तभी उस के मन में कुछ कौंधा और उस ने नेहा के नाम से अभी आया पैकेट खोल लिया. उस के हाथों में किसी नवोदित लेखक की पुस्तक थी. पुस्तक के कवर पर एक स्त्री की एक पुरुष के साथ हाथों में हाथ डाले हुए मनमोहक छवि थी और उस के ऊपर पुस्तक का शीर्षक छपा हुआ था- ‘उस के हिस्से का प्यार’. कहानियों की इस पुस्तक की विषय सूची पर नजर डालते हुए उस ने एक के बाद एक कुछ कहानियां पढ़नी शुरू कर दीं. बच्चे के यौन उत्पीड़न और फिर उस को ले कर वैवाहिक जीवन में आने वाली समस्या को ले कर लिखी गई एक कहानी पढ़ कर वह फिर से नीरज की यादों में खो गई.

उस दिन नीरज बेहद खुश था. वह घर खाने पर अपने किसी विदेशी दोस्त को ले कर आया था.

‘राधिका, 2 दिनों पहले मैं अपने जिस दोस्त की बात कर रहा था वह यह माइक है. न्यूजर्सी में हम दोनों रूममेट थे और साथ ही पढ़ते थे,’ नीरज ने राधिका को माइक का परिचय देते हुए कहा.

राधिका ने अपने पति की बाजू में खड़े उस श्वेतवर्णी स्निग्ध त्वचा वाले लंबे व छरहरे युवक पर नजर डाली. राधिका को पहली ही नजर में नीरज का यह दोस्त बिलकुल पसंद नहीं आया. उस का क्लीनशेव्ड नाजुक चेहरा और उस पर सिर पर थोड़े लंबे बालों को बांध कर बनाई गई छोटी सी चोटी देख कर राधिका को आश्चर्य हो रहा था कि ऐसा लड़का नीरज का दोस्त कैसे हो सकता है. नीरज तो खुद अपने पहनावे और लुक को ले कर काफी कौन्शियस रहता है. उस वक्त इस बात को नजरअंदाज कर वह इस बात पर ज्यादा कुछ न सोचते हुए खाना बनाने में जुट गई.

उसी रात नीरज ने जब राधिका से सीधेसीधे तलाक लेने की बात छेड़ी तो राधिका के पैरोंतले जमीन खिसक गई.

‘लेकिन बात क्या हुई नीरज? न हमारे बीच कोई झगड़ा है न कोई परेशानी. सबकुछ तो बराबर चल रहा है. कहीं तुम्हारा किसी के संग अफेयर तो…’ रिश्तों को बांधे रखने की दुहाई देते हुए सहसा उस का मन एक आशंका से भर गया.

‘अफेयर ही समझ लो. अब तुम से मैं आगे कुछ और नहीं छिपाऊंगा,’ कहते हुए नीरज चुप हो गया. राधिका ने नीरज के चेहरे को देखते हुए उस की आंखों में अजीब सी मदहोशी महसूस की.

‘तुम कहना क्या चाहते हो नीरज?’ राधिका नीरज की अधूरी छोड़ी बात पूरी सुनना चाहती थी. उस के बाद नीरज ने जो कुछ उस से कहा, उन में से आधी बात तो वह ठीक से सुन ही नहीं पाई.

‘तुम्हारे संग मेरी शादी मेरे लिए एक जुआ ही थी. मैं अपनी सारी जिंदगी इसी तरह कशमकश में गुजार देता पर अब यह कुछ नामुमकिन सा लगता है राधिका. बेहतर होगा हम अपनेअपने रास्ते अलगअलग ही तय करें,’ नीरज से शादी टूटने से पहले कहे गए आखिरी वाक्य उस के दिमाग में बारबार कौंधने लगे.

राधिका ने कमरे की लाइट बंद कर दी और चुपचाप लेट कर सारी रात अपनी बरबादी पर आंसू बहाती रही.

अब एक ही घर में नीरज के साथ रहते हुए वह अपनेआप को एक अजनबी महसूस कर रही थी. अपने मन की बात राधिका को जता कर जैसे नीरज के मन का भार हलका हो चुका था लेकिन राधिका जैसे मन पर एक अनचाहा भार ले कर जी रही थी. जब उस के मन का भार असहनीय हो गया तो वह नीरज के घर की दहलीज छोड़ कर अपने पिता के घर आ गई.

फिर जो हुआ वह आज के दिन में परिणत हो कर उस के सामने खड़ा था. कानूनी तौर पर वह भले ही नीरज से अलग हो चुकी थी लेकिन नीरज की सचाई और उस के द्वारा दी गई अनचाही पीड़ा अब भी उस के मन के कोने में कैद थी जिसे वह चाह कर भी किसी से बयान नहीं कर सकती थी. घर में बैठेबैठे अकेले घुटन होने से वह घर लौक कर बाहर निकल गई और एमजी रोड पर स्थित मौल में दिल बहलाने के लिए चक्कर लगाने लगी.

रात देर से नींद आने की वजह से सुबह उस की नींद देर से ही खुली. वैसे भी आज उस का वीकली औफ होने से औफिस जाने का कोई झंझट न था. उस ने उठ कर समाचार सुनने के लिए टीवी औन ही किया था कि डोरबेल बज उठी.

‘‘हाय राधिका. हाऊ आर यू?’’ दरवाजा खोलते ही नेहा राधिका से लिपट गई.

‘‘मैं ठीक हूं. तेरा टूर कैसा रहा?’’ राधिका के चेहरे पर एक फीकी सी मुसकान तैर गई.

‘‘बौस के साथ टूर हमेशा ही मजेदार रहता है. वैसे भी अब जिंदगी ऐसे मोड़ तक पहुंच गई है जहां से वापस लौटना संभव ही नहीं. यह टूर तो एक बहाना होता है एकांत पाने का,’’ कहती हुई नेहा सोफे पर पसर गई.

राधिका ने रिमोट उठा कर चुपचाप न्यूज चैनल शुरू कर दिया.

‘‘सुन, कल तेरी आखिरी सुनवाई थी न फैमिली कोर्ट में. क्या फैसला आया?’’ नेहा ने राधिका को अपने पास खींचते हुए उस से पूछा.

‘‘फैसला तो पहले से ही तय था. बस, साइन ही करने तो जाना था,’’ राधिका ने बुझेमन से जवाब दिया.

‘‘लेकिन तू ने अभी तक नहीं बताया कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो तू ने नीरज से अलग होने का फैसला ले लिया?’’ पिछले एक साल से साथ रहने के बावजूद राधिका ने अपनी जिंदगी का एक अधूरा सच नेहा से अब तक छिपाए रखा था.

‘भारत की न्याय प्रणाली में एक ऐतिहासिक फैसला सैक्शन 377 के तहत अब गे और लैस्बियन संबंध वैध.’

तभी टीवी स्क्रीन पर आती ब्रैकिंग न्यूज देख कर राधिका असहज हो गई.

‘‘स्ट्रैंज,’’ नेहा ने न्यूज पर अपनी छोटी सी प्रतिक्रिया जताते हुए राधिका से फिर से पूछा, ‘‘तू ने बताया नहीं राधिका? कुछ कारण तो रहा होगा न?’’

‘‘बस, समझ ले कल उसे एक अनचाहे रिश्ते से कानूनीतौर पर मुक्ति मिली और आज उस मुक्ति की खुशी मनाने का मौका भी उसी कानून ने उसे दे दिया,’’ राधिका की नजरें अभी भी टीवी स्क्रीन पर जमी हुई थीं. लेकिन नेहा उस की नम हो चुकी आंखों में तैर रही खामोशी को पढ़ चुकी थी.

आभास: शारदा को कैसे हुआ गलती का एहसास

‘‘ओ  ह मम्मी, भावुक मत बनो, समझने की कोशिश करो,’’ दूसरी तरफ की आवाज सुनते ही शारदा के हाथ से टेलीफोन का चोंगा छूट कर अधर में झूल गया. कानों में जैसे पिघलता सीसा पड़ गया. दिल दहला देने वाली एक दारुण चीख दीवारों और खिड़कियों को पार करती हुई पड़ोसियों के घरों से जा टकराई. सब चौंक पड़े और चीख की दिशा की ओर दौड़ पड़े.

‘‘क्या हुआ, बहनजी?’’ किसी पड़ोसी ने पूछा तो शारदा ने कुरसी की ओर इशारा किया.

‘‘अरे…कैसे हुआ यह सब?’’

‘‘कब हुआ?’’ सभी चकित से रह गए.

‘‘अभीअभी आए थे,’’ शारदा ने रोतेरोते कहा, ‘‘अखबार ले कर बैठे थे. मैं चाय का प्याला रख कर गई. थोड़ी देर में चाय का प्याला उठाने आई तो देखा चाय वैसी ही पड़ी है, ‘अखबार हाथ में है. सो रहे हो क्या?’ मैं ने पूछा, पर कोई जवाब नहीं, ‘चाय तो पी लो’, मैं ने फिर कहा मगर बोले ही नहीं. मैं ने कंधा पकड़ कर झिंझोड़ा तो गरदन एक तरफ ढुलक गई. मैं घबरा गई.’’

‘‘डाक्टर को दिखाया?’’

‘‘डाक्टर को ही तो दिखा कर आए थे,’’ शारदा ने रोते हुए बताया, ‘‘1-2 दिन से कह रहे थे कि तबीयत कुछ ठीक नहीं है, कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है. डाक्टर के पास गए तो उस ने ईसीजी वगैरह किया और कहा कि सीढि़यां नहीं चढ़ना, आप को हार्ट प्रौब्लम है.

‘‘घर आ कर मुझ से बोले, ‘ये डाक्टर लोग तो ऐसे ही डरा देते हैं, कहता है, हार्ट प्रौब्लम है. सीढि़यां नहीं चढ़ना, भला सीढि़यां चढ़ कर नहीं आऊंगा तो क्या उड़ कर आऊंगा घर. हुआ क्या है मुझे? भलाचंगा तो हूं. लाओ, चाय लाओ. अखबार भी नहीं देखा आज तो.’

‘‘अखबार ले कर बैठे ही थे, बस, मैं चाय का प्याला रख कर गई, इतनी ही देर में सबकुछ खत्म…’’ शारदा बिलख पड़ीं.

‘‘बेटे को फोन किया?’’ पड़ोसी महेशजी ने झूलता हुआ चोंगा क्रेडल पर रखते हुए पूछा.

‘‘हां, किया था.’’

‘‘कब तक पहुंच रहा है?’’

‘‘वह नहीं आ रहा,’’ शारदा फिर बिलख पड़ीं, ‘‘कह रहा था आना बहुत मुश्किल है, यहां इतनी आसानी से छुट्टी नहीं मिलती. दूसरे, उस की पत्नी डैनी वहां अकेली नहीं रह सकती. यहां वह आना नहीं चाहती क्योंकि यहां दंगे बहुत हो रहे हैं. मुसलमान, ईसाई कोई भी सुरक्षित नहीं यहां. कोई मार दे तो मुसीबत. बिजलीघर में कर दो सब, वहां किसी की जरूरत नहीं, सबकुछ अपनेआप ही हो जाएगा.’’

‘‘और कोई रिश्तेदार है यहां?’’

‘‘हां, एक बहन है,’’ शारदा ने बताया.

‘‘अरे, हां, याद आया. परसों ही तो मिल कर आए थे सुहासजी उन से. कह रहे थे कि यहां मेरी दीदी है, उन से ही मिल कर आ रहा हूं. आप उन का पता बता दें तो हम उन्हें खबर कर दें,’’ शर्मा जी ने कहा.

वहां फौरन एक आदमी दौड़ाया गया. सब ने मिल कर सुहास के पार्थिव शरीर को जमीन पर लिटा दिया. आसपास की और महिलाएं भी आ गईं जो शारदा को सांत्वना देने लगीं.

तभी रोतीबिलखती सुधा दीदी आ पहुंचीं.

‘‘हाय रे, भाई रे…क्या हुआ तुझे, परसों ही तो मेरे पास आया था. भलाचंगा था. यह क्या हो गया तुझे एक ही दिन में. जाना तो मुझे था, चला तू गया, मेरे से पहले ही सबकुछ छोड़छाड़ कर…हाय रे, यह क्या हो गया तुझे…’’

बहुत ही मुश्किल से सब ने उन्हें संभाला. उन्होंने अपनी तीनों बहनों, सरोज, ऊषा, मंजूषा व अन्य सब रिश्तेदारों के पते बता दिए. फौरन सब को सूचना दे दी गई. थोड़ी ही देर में सब आ पहुंचे.

काफी देर तक कुहराम मचा रहा, फिर सब शांत हो गए पर शारदा रोए ही जा रही थीं.

सुधा दीदी कितनी ही देर तक शारदा के चेहरे की ओर एकटक देखती रहीं. शारदा के चेहरे पर 22 वर्ष पुराना मां का चेहरा उभर आया, जब बाबूजी गुजरे थे और उन्होंने बंगलौर फोन किया था, ‘बाबूजी नहीें रहे, फौरन आ जाओ.’

‘पर ये तो दौरे पर गए हुए हैं, कैसे आ सकते हैं एकदम सब?’ शारदा ने बेरुखी से कहा था.

‘तुम उस के दफ्तर फोन करो, वह बुला देंगे.’

‘किया था पर उन्हें कुछ मालूम नहीं कि वह कहां हैं.’

‘ऐसा कैसे है, दफ्तर वालों को तो सब पता रहता है कि कौन कहां है.’

‘वहां रहता होगा पता, यहां नहीं,’ शारदा ने तीखे स्वर में कहा था.

‘मुझे दफ्तर का फोन नंबर दो, मैं वहां कांटेक्ट कर लूंगी.’

‘मेरे पास नहीं है नंबर…’ कह कर शारदा ने रिसीवर पटक दिया था.

ऐसे समय में भी शारदा ऐसा व्यवहार करेगी, कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था. आखिरकार चाचाजी ने ही सब क्रियाकर्म किए. इस ने जैसा किया वैसा ही अब इस के आगे आया.

यह तो शुरू से ही परिवार से कटीकटी रही थी. हम 4 बहनें थीं, भाई एक ही था, बस. कितना चाव था इस का सब को कि बहू आएगी घर में, रौनक होगी. सब के साथ मिलजुल कर बैठेगी.

अम्मां तो इसे जमीन पर पैर ही ना रखने दें, हर समय ऊषा, मंजूषा से कहती रहतीं, ‘जा, अपनी भाभी के लिए हलवा बना कर ले जा…हलवाई के यहां से गरमगरम पूरियां ले आओ नाश्ते के लिए… भाभी से पूछ ले, ठंडा लेगी या गरम…भाभी के नहाने की तैयारी कर दे… गुसलखाना अच्छी तरह साफ कर देना…’

शाम को कभी गरमगरम इमरती मंगातीं तो कभी समोसे मंगातीं, ‘जा अपनी भाभी के लिए ले जा,’ पर भाभी की तो भौं तनी ही रहतीं हरदम.

एक दिन बिफर ही पड़ीं दोनों, ‘हम नहीं जाएंगी भाभी के पास. झिड़क पड़ती हैं, कहती हैं ‘कुछ नहीं चाहिए मुझे, ले जाओ यह सब…’

सरोज ने मां से 1-2 बार कहा भी, ‘क्या जरूरत है इतना सिर चढ़ाने की, रहने दो स्वाभाविक तरीके से. अपनेआप खाएपीएगी जब भूख लगेगी, तुम क्यों चिंता करती हो बेकार…’

‘अरे, कौन सी 5-7 बहुएं आएंगी. एक ही तो है, उसी पर अपना लाड़चाव पूरा कर लूं.’

पर इस ने तो उन के लाड़चाव की कभी कद्र ही न जानी, न ही ननदें कभी सुहाईं. आते ही यह तो अलग रहना चाहती थी. इत्तिफाकन सुहास की बदली हो गई और बंगलौर चली गई, सब से दूर…

ऊषा, मंजूषा की शादियों में आई थी बिलकुल मेहमान की तरह.

न किसी से बोलनाचालना, न किसी कामधंधे से ही मतलब. कमरे में ही बैठी रही थी अलगथलग सब से, गुमसुम बिलकुल…और अभी भी ऐसी बैठी है जैसे पहचानती ही न हो. चलो, नहीं तो न सही, हमें क्या, हम तो अपने भाई की आखिरी सूरत देखने आए थे…देख ली…अब हम काहे को आएंगे यहां…

‘‘राम नाम सत्य है…राम नाम सत्य है…’’ की आवाज से दीदी की तंद्रा टूटी. अर्थी उठ गई. हाहाकार मच गया. सब अरथी के पीछेपीछे चल पड़े. आज मां के घर का यह संपर्क भी खत्म हो गया.

औरत कितनी भी बड़ी उम्र की हो जाए, मां के घर का मोह कभी नहीं टूटता, नियति ने आज वह भी तुड़वा दिया. कैसा इंतजार रहता था राखीटीके का, सुबह ही आ जाता था और सारा दिन हंसाहंसा कर पेट दुखा देता था. ये तीनों भी यहां आ जाती थीं मेरे पास ही.

अरथी के पीछेपीछे चलते हुए वह फिर फूट पड़ीं, ‘‘अब कहां आनाजाना होगा यहां…जिस के लिए आते थे, वही नहीं रहा…अब रखा ही क्या है यहां…’’

अचानक उन की नजर शारदा पर पड़ी, जो अरथी के पीछेपीछे जा रही थी. उस के चेहरे पर मेकअप की जगह अवसाद छाया हुआ था, आंखों का आईलाइनर आंसुओं से धुल चुका था. होंठों पर लिपस्टिक की जगह पपड़ी जमी थी. ‘सैट’ किए बाल बुरी तरह बिखर कर रह गए थे, मुड़ीतुड़ी सफेद साड़ी, बिना बिंदी के सूना माथा, सूनी मांग…रूखे केश और उजड़े वेश में उस का इस तरह वैधव्य रूप देख कर दीदी का दिल बुरी तरह दहल उठा. रंगत ही बदल गई इस की तो जरा सी देर में. कैसी सजीसजाई दुलहन के वेश में आई थी 35 साल पहले, कितना सजाती थी खुद को और आज…आज सुहास के बिना कैसी हो गई. आज रहा ही कौन इस का दुनिया में.

मांबाप तो बाबूजी से पहले चल बसे थे, एक बहन थी वह शादी के दोढाई साल बाद अपने साल भर के बेटे को ले कर ऐसी बाजार गई, सो आज तक नहीं लौटी. एक भाई है, वह किसी माफिया गिरोह से जुड़ा है. कभी जेल में, कभी बाहर. एक ही एक बेटा है, वह भी इस दुख की घड़ी में मुंह फेर कर बैठ गया. उन्हें उस पर बहुत तरस आया, ‘बेचारी, कैसी खड़ी की खड़ी रह गई.’

अरथी को गाड़ी में रख दिया गया. गाड़ी धीरेधीरे चलने लगी और कुछ ही देर में आंखों से ओझल हो गई.

गाड़ी के जाने के बाद शारदा का मन बेहद अवसादग्रस्त हो गया.

जब हम दुख में होते हैं तो अपनों का सान्निध्य सब से अधिक चाहते हैं, पर ऐसे दुखद समय में भी अपनों का सान्निध्य न मिले तो मन बुरी तरह टूट जाता है. अकेलापन, बेबसी बुरी तरह मन को सालने लगती है.

यही हाल उस समय शारदा का हो रहा था. बारबार उसे अपने बेटे की याद आ रही थी कि काश, इस घड़ी में वह उस के पास होता. उसे गले लगा कर रो लेती. कुछ शांति मिलती, कितनी अकेली है आज वह, न मांबाप, न भाईर्बहन. कोई भी तो नहीं आज उस का जो आ कर उस के दुख में खड़ा हो. नीचे धरती, ऊपर आसमान, कोई सहारा देने वाला नहीं.

बेटे के शब्द बारबार कानों से टकरा कर उस के दिल को बुरी तरह कचोट रहे थे, जिसे जिंदगी भर अपने से ज्यादा चाहा, जिस के कारण उम्र भर किसी की परवा नहीं की, उसी ने आज ऐसे दुर्दिनों में किनारा कर लिया, मां के लिए जरा सा भी दर्द नहीं. बाप के जाने का जरा भी गम नहीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो.

कैसी पत्थर दिल औलाद है. जब अपनी पेटजाई औलाद ही अपनी न बनी तो और कौन बनेगा अपना. सासननदें तो भला कब हुईं किसी की, वे तो उम्र भर उस के और सुहास के बीच दीवार ही बनी रहीं. सुहास तो सदा अपनी मांबहनों में ही रमा रहा. उस की तो कभी परवा ही नहीं की. इस कारण सदैव सुहास और उस के बीच दूरी ही बनी रही.

अब भी तो देखो, एक शब्द भी नहीं कहा किसी ने…सुहास के सामने ही कभी अपनी न बनी, तो अब क्या होगी भला. कैसे रहेगी वह अकेली जीवन भर?  न जाने कितनी पहाड़ सी उम्र पड़ी है, कैसे कटेगी? किस के सहारे कटेगी? उसे अपने पर काबू नहीं हो पा रहा था.

दूसरी ओर बेटे की बेरुखी साल रही थी. उसे लगा जैसे वह एक गहरे मझधार में फंसी बारबार डूबउतरा रही है. कोई उसे सहारा देने वाला नहीं कि किनारे आ जाए. क्या करे, कैसे करे?

उस ने तो कभी सोचा भी न था कि ऐसा बुरा समय भी देखना पड़ेगा. वह वहीें सीढि़यों की दीवार का सहारा ले कर बिलख पड़ी जोरजोर से.

सामने से उसे सुधा दीदी, सरोज, ऊषा, मंजूषा आती दिखाई दीं. उन्होंने उसे चारों ओर से घेर लिया और सांत्वना देने लगीं, ‘‘चुप कर शारदा, बहुत रो चुकी. वह तो सारी उम्र का रोना दे गया. कब तक रोएगी…’’ कहतेकहते सुधा दीदी स्वयं रो पड़ीं और तीनों बहनें भी शारदा के गले लग फफक पड़ीं, सब का दुख समान था. अत: जीवन भर का सारा वैमनस्य पल भर में ही आंसुओं में धुल गया.

‘‘हाय, क्या हाल हो गया भाभी का,’’ ऊषा, मंजूषा ने उस के गले लगते हुए कहा.

‘‘मैं क्या करूं, दीदी? कैसे करूं? कहां जाऊं?’’ शारदा ने बिलखते हुए कहा.

‘‘तू धीरज रख, शारदा, जाने वाला तो चला गया, अब लौट कर तो आएगा नहीं,’’ सुधा दीदी ने उसे प्यार से सीने से लगाते हुए कहा.

‘‘पर मैं अकेली कैसे रहूंगी, सारी उम्र पड़ी है. वह तो मुझे धोखा दे गए बीच में ही.’’

‘‘कौन कहता है तू अकेली है, वह नहीं रहा तो क्या, हम 4 तो हैं तेरे साथ. तुझे ऐसे अकेले थोड़े ही छोडे़ंगे. चलो, घर में चलो.’’

वे चारों शारदा को घर में ले आईं, ऊषा, मंजूषा ने सारा घर धो डाला. सरोज ने उस के नहाने की तैयारी कर दी. तब तक सुधा दीदी उस के पास बैठी उस के आंसू पोंछती रहीं.

थोड़ी ही देर में सब नहा लिए, ऊषा, मंजूषा चाय बना लाईं. नहा कर, चाय पी कर शारदा का मन कुछ शांत हुआ. उस वक्त शारदा को वे चारों अपने किसी घनिष्ठ से कम नहीं लग रही थीं, जिन्होंने उसे ऐसे दुख में संभाला.

उसे लगा, जिन्हें उस ने सदा अपने और सुहास के बीच दीवार समझा, असल में वह दीवार नहीं थी, वह तो उस के मन का वहम था. उस के मन के शीशे पर जमी ईर्ष्या की गर्द थी. आज वह वहम की दीवार गहन दुख ने तोड़ दी. मन के शीशे पर जमी ईर्ष्या की गर्द आंसुओं में धुल गई.

बेटा नहीं आया तो क्या, उस की 4-4 ननदें तो हैं, उस के दुख को बांटने वाली. वे चारों उसे अपनी सगी बहन से भी ज्यादा लग रही थीं, आज दुख की घड़ी में वे ही चारों अपनी लग रही थीं. आज पहली बार उस के मन में उन चारों ननदों के प्रति अपनत्व का आभास हुआ.

तोसे लागी लगन: क्या हो रहा था ससुराल में निहारिका के साथ

मनोविज्ञान की छात्रा निहारिका सांवलीसलोनी सूरत की नवयुवती थी. तरूण से विवाह करना उस की अपनी मरजी थी, जिस में उस के मातापिता की रजामंदी भी थी. तरूण हैदराबाद का रहने वाला था और निहारिका लखनऊ की. दोनों दिल के रिश्ते में कब बंधे यह तो वे ही जानें.

सात फेरों के बंधन में बंध कर दोनों एअरपोर्ट पहुंचे. हवाईजहाज ने जब उड़ान भरी तो निहारिका ने आंखे बंद कर लीं और कस कर तरूण को थाम लिया। स्थिति सामान्य हुई तो लज्जावश नजरें झुक गईं पर तरुण की मंद मुसकराहट ने रिश्ते में मिठास घोल दी थी.

“हम पग फेरे के लिए इसी हवाई जहाज से वापस आएंगे,” निहारिका ने आत्मियता से कहा.

“नहीं, अब आप कहीं नहीं जाएंगी, हमेशाहमेशा मेरे पास रहेंगी,” तरूण ने निहारिका के कंधे पर सिर रखते हुए कहा.

सैकड़ों की भीड़ में नवविवाहिता जोड़ा एकदूसरे की आंखों में खोने लगा था.

तरूण की मां ने पड़ोसियों की मदद से रस्मों को निभाते हुए निहारिका का गृहप्रवेश करवाया. घर में बस 3 ही
सदस्य थे. शुरू के 2-4 दिन वह अपने कमरे में ही रहती थी फिर धीरेधीरे उस ने पूरा घर देखा। पूरा घर पुरानी कीमती चीजों से भरा पङा था। एक कोने में कोई पुरानी मूर्ति रखी हुई थी. निहारिका ने उसे हाथ में उठाया ही था कि पीछे से आवाज आई,”क्या देख रही हो, चुरा मत लेना।”

आवाज में कड़वाहट घुली हुई थी. निहारिका ने पीछे मुड़ कर देखा, तरूण की मां खड़ी थीं.

“नहीं मम्मीजी, बस यों ही देख रही थी,” निहारिका ने सहम कर जबाव दिया.

ससुराल में पहली बार इस तरह का व्यवहार… उस का मन भारी हो गया. मां की याद आने लगी. रात को बातों ही बातों में तरूण के सामने दिन वाले घटना का जिक्र हो आया.

“हां वे थोड़ी कड़क मिजाज हैं… पर प्लीज, तुम उन की किसी बात को दिल पर मत लेना। वे दिल की बेहद अच्छी हैं,” तरुण अपनी तरफ से निहारिका को बहलाने लगा.

एक दिन दोपहर को जब निहारिका लेटी हुई कोई पत्रिका पढ़ रही थी तभी तरूण की मां मनोहरा देवी उस के कमरे में आईं. उन्हें देख वह उठ कर बैठ गई। उस के बाद सासबहु में इधरउधर की बातें हुईं, बातों ही बातों में निहारिका के गहनों का जिक्र हो आया तो निहारिका खुशी से उन्हें गहने दिखाने लगीं. बातों का सिलसिला चलता रहा। करीब आधे
घंटे बाद जब निहारिका गहनों को डब्बे में डालने लगीं तो सोने के कंगन गायब थे. वह परेशान हो कर उसे ढूंढ़ने लगी.

आश्चर्य भी हो रहा था उसे। सासुमां से कुछ पूछे इतनी हिम्मत कहां थी उस में. रात को तरूण से बताया तो उस ने भी ज्यादा तवज्जो नहीं दी.

“तुम औरतें केवल पहनना जानती हो, यहीं कहीं रख कर भूल गईं होगी। मिल जाएंगे। अभी सो जाओ,” दिनभर का थका हुआ तरूण करवट बदल कर सो गया.

‘नईनवेली दुलहन का ज्यादा बोलना भी ठीक नहीं,’ यह सोच कर निहारिका चुपचाप रह गई.

लेकिन वह मनोविज्ञान की छात्रा थी। अनकहे भावों को पढ़ना जानती थी, पर कहे किस से? तरूण के बारे में सोचते ही कंगन बेकार लगने लगे. लेकिन अगले ही दिन घर में सोने की एक और मूर्ति दिखाई दिए.

“मम्मीजी, बहुत सुंदर है यह मूर्ति। कहां से खरीद कर लाईं आप?” निहारिका ने तारीफ करते हुए पूछा.

“कहीं से भी, तुम से मतलब…” मनोहरा देवी ने तुनक कर जवाब दिया.

निहारिका स्तब्ध रह गई.

15 दिन के अंदरअंदर उस के नाक की नथ कहीं गुम हो गई थी. पानी सिर के ऊपर जा रहा था. तरूण कुछ सुनने को तैयार न था। स्थिति दिनबदिन बिगड़ती जा रही थी.

एक दिन दोपहर के भोजन के बाद सभी अपनेअपने कमरे में आराम करने गए। उस वक्त मनोहरा देवी पूरे गहने पहन कर स्वयं को आईने में निहार रही थीं। तरहतरह के भावभंगिमा कर रही थीं. संयोगवश उसी वक्त निहारिका किसी काम से उन के पास आना चाहती थी. अपने कमरे से निकली ही थी कि खिड़की से ही उसे वह मंजर दिख गया.

उस वक्त उन के शरीर पर वे गहने भी थे जो उस के डब्बे से गायब हुए थे. शक को यकीन में बदलते देख निहारिका सिहर उठी। उस ने चुपके से 1-2 तसवीरें ले लीं।

रात को डिनर खत्म करने के बाद…

“तरूण, मुझे कुछ गहने चाहिए थे…” निहारिका अभी वाक्य पूरा भी नहीं कर पाई थी कि तरूण बोला,”मेरी खूबसूरत बीबी को गहनों की क्या जरूरत है? सच कह रहा हूं नीरू, तुम बहुत बहुत खूबसूरत हो।”

पर तरुण की बातें अभी उसे बेमानी लग रही थीं क्योंकि वह जहां पहुंचना चाहती वह रास्ता ही तरुण ने बंद कर
दिया था. हार कर निहारिका ने वे फोटोज दिखाए जिसे देखते ही तरुण उछल पड़ा। उस की आंखें आश्चर्य से फैल गईं।

“मम्मी के पास इतने गहने हैं, मुझे तो पता ही नहीं था,” तरूण ने आश्चर्य से फैली आंखों को सिकोड़ते हुए कहा.

“नहीं यह अच्छी बात नहीं है। तरूण, तुम ने शायद देखा नहीं। इन में वे गहने भी हैं जो मेरे डब्बे से गायब हुए थे,” निहारिका ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

मामला संजीदा था लेकिन उसे दबाना और भी मुश्किल स्थिति को जन्म दे
सकता था.

“मां के गहने यानी तुम्हारे गहने…” तरूण को शर्मिंदगी महसूस हो रही थी तो उस ने बात को टालते हुए कहा.

“तरूण, तुम क्यों समझना नहीं चाहते या फिर…” निहारिका उस के चेहरे पर आ रहे भाव को पढ़ने की कोशिश करने लगी, क्योंकि जो बात सामने आ रही थी वह अजीब सी थी.

“या फिर क्या…” तरूण ने तैश से कहा.

“यही कि तुम जानबूझ कर कुछ छिपाना चाहते हो,” निहारिका ने गंभीर आवाज में कहा.

“मैं क्या छिपा रहा हूं?”

निहारिका चुप रही।

“बोलो नीरू, मैं क्या छिपा रहा हूं?”

“यही कि मम्मी जी क्लाप्टोमैनिया की शिकार हैं…”

“क्या… यह क्या होता है?” तरुण ने कभी नहीं सुना था यह नाम.

“यह एक तरह की बीमारी है। इस बीमारी में व्यक्ति चीजें चुराता है और भूल जाता है,” निहारिका एक ही सांस में सारी बातें कह गई.

“देखो नीरू, मैं मानता हूं मेरी मां बीमार हैं पर चोरी… तरूण बौखला गया.

“वे चोर नहीं हैं। प्लीज मुझे गलत मत समझो,” निहारिका ने अपनी सफाई दी.

“तुम्हें पग फेरे के लिए घर जाना था न, बताओ कब जाना है?” तरूण बहस को और बढ़ाना नहीं चाहता था.

निहारिका स्तब्ध रह गई.

दोनों ने करवट फेर ली लेकिन नींद किसी के आंखों में न थी. तरूण ने वापस जाने के लिए कह दिया था। सपनों में जो ‘होम स्वीट होम’ का सपना था वह टूट कर चकनाचूर हो गया था.

निहारिका ने हार नहीं मानी। उस ने अपने प्रोफैसर साहब से बात की,”सर, मुझे आप की मदद चाहिए,” निहारिका का दृढ़ स्वर बता रहा था कि वह अपने काम के प्रति कितनी संकल्पित है.

“अवश्य मिलेगी, काम तो बताओ,” प्रोफेसर की आश्वस्त करने वाली आवाज ने निहारिका को निस्संकोच हो अपनी बात रखने का हौसला दिया। इस से पहले वह अपराधबोध से दबी जा रही थी.

“सर, मेरी सासूमां यहांवहां से चुरा कर वस्तुएं ले आती हैं और पूछे जाने पर इनकार कर देती हैं,” निहारिका के आंसुओं ने अनकही बात भी कह दी थी.

“घबराओ मत, धीरज से काम लो निहारिका। सब ठीक हो जाएगा। कभीकभी जीवन का एकाकीपन इस की वजह बन जाती है। आगे तुम खुद समझदार हो,” प्रोफैसर साहब ने रिश्ते की नाजुकता को समझते हुए कहा.

“क्लाप्टोमैनिया लाइलाज बीमारी नहीं, अपनापन और लगाव से इसे दूर किया जा सकता है,” प्रोफैसर साहब के आखिरी वाक्य ने निहारिका के मनोबल को बढ़ा दिया था. वह उन के द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करने लगी। इलाज का पहला कदम था गाढ़ी दोस्ती…

“मम्मीजी, आज से मैं आप के कमरे में आप के साथ रहूंगी, आप के बेटे से मेरी लड़ाई हो गई है,” निहारिका ने अपना तकिया मनोहरा देवी के बिस्तर पर रखते हुए कहा.

“रहने दो, बीच रात में उठ कर न चली गई तो कहना,” मनोहरा देवी ने अपना अनुभव बांटते हुए कहा.

“कुछ भी हो जाए नहीं जाउंगी,” निहारिका ने आत्मविश्वास से कहा.

रात में उन दोनों ने एकदूसरे के पसंद की फिल्में देखीं। धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के करीब आने लगीं. मनोहरा देवी जब भी बाहर जाने के लिए तैयार होतीं तो निहारिका साथ चलने के लिए तैयार हो जाती या उन्हें अकेले जाने से रोक लेती। कभी मानमुनहार से तो कभी जिद्द से.

ऐसा नहीं था कि तरूण कुछ भी जानता नहीं था, कितनी बार उसे भी शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी पर मां तो आखिर मां है न… सबकुछ सह जाता था. मां को समझाने की कोशिश भी की पर बिजनैस की व्यस्तता की वजह से ध्यान बंट गया था। निहारिका की कोशिश रंग ला रही थी, यह बात उस से छिपी नहीं थी. अपनी नादानी पर शर्मिंदा भी था। अपने बीच
के मनमुटाव को कम करने के लिए निहारिका के पसंद की चौकलैट फ्लैवर वाली आइस्क्रीम लाया था जिसे अपने हाथों से खिला कर कान पकड़ कर माफी मांगी थी। उठकबैठक भी करने को तैयार था पर नीरू ने गले लगा कर रोक दिया
था.

“नीरू, तुम ने जिस तरह से मम्मी को संभाला है न उस के लिए तहेदिल से शुक्रगुजार हूं, तरूण ने नम आंखों से कहा.

“अभी नहीं, अभी हमें उन सभी चीजों की लिस्ट बनानी होगी जो मम्मीजी कहीं और से ले आई हैं, उन्हें लौटाना भी होगा,” निहारिका ने इलाज का दूसरा कदम उठाया.

“लौटाना क्यों है नीरू, इस से तो बात…” तरूण ने अपने घर की इज्जत की परवाह करते हुए कहा.

“लोगों को समझने दो। क्लापटोमेनिया एक बीमारी है, समाज को उन्हें उसी रूप में स्वीकारने दो, वे भी समाज का
हिस्सा हैं, कमरे में बंद रखना उपाय नहीं है,” निहारिका की 1-1 बात उस के आत्मविश्वास का परिचय दे रही
थी. निहारिका के रूप का दीवाना तो वह पहले से ही था पर आज अपनी मां के प्रति फिक्रमंद देख मन ही मन अपनी पसंद पर गर्व करने लगा था.
रातरात भर जाग कर दोनों ने उन सभी सामानों का लिस्ट बनाई जो घर के नहीं थे, सब को गिफ्ट की तरह रैपिंग किया। अंदर एक परची पर ‘सौरी’ लिख कर वस्तुओं को लोगों के घर तक पहुंचाया. पतिपत्नी दोनों ने
मिल कर मुश्किल काम को आसान कर लिया था. धीरेधीरे स्थिति सामान्य होने लगी थी.

मंगलवार की सुबह मम्मीजी को बाजार जाना था।

“मम्मी, तुम जल्दी से तैयार हो जाओ जाते वक्त छोड़ दूंगा,” तरूण ने नास्ता करते हुए कहा,

“नहींनहीं तुम जाओ, मैं नीरू के साथ चली जाउंगी।”

निहारिका ने तरुण की ओर देख कर अपनी पीठ अपने हाथों से थपथपाई।प्रतिउत्तर में तरूण ने हाथ जोड़ने का अभिनय किया. निहारिका मुसकरा दी।

तभी निहारिका की मम्मी का फोन आया,”बेटाजी, नीरू को मायके आए हुए बहुत दिन हो गए, पग फेरे के लिए भी नहीं आए आप दोनों, हो सके तो इस इस दशहरे में कुछ दिनों के लिए उसे छोड़ जाते,” निहारिका की मां अपनी बात एक ही सांस में कह गई थीं.

“माफी चाहूंगा मम्मीजी, लेकिन मेरी मम्मी अब नीरू के बगैर एक पल भी नहीं रहना चाहतीं, ऐसे में मैं उसे वहां
छोड़ना नहीं चाहता…” तरूण ने गर्व से कहा.

“कोई बात नहीं बेटाजी, बेटी अपने घर में खुश रहे, राज करे इस से ज्यादा और क्या चाहिए,” मां ने रुंधे गले से कहा और फोन रख दिया. तरूण के स्वर ने उसे उस घर में मुख्य भूमिका में ला दिया था. निहारिका का होम स्वीट होम का सपना साकार हो रहा था.

छोटे राजा: क्या थी गौरव की कहानी ?

हाथ की मेहंदी और पैर के महावर का रंग फीका भी नहीं पड़ा था कि कांता ने घर का काम संभाल लिया. घर में न सास थी, न कोई ननद, जो नई दुलहन के आने पर रस्में निभाती. पड़ोस की 2-4 औरतों के साथ मिल कर उस ने खुद ही उन रस्मों को पूरा किया था. गौने में आए तकरीबन सभी मेहमान जा चुके थे. कांता की पायल से रुनझुन की उठने वाली मीठीमीठी आवाज ने सौरभ के आंगन में पिछले 3 सालों से छाई उदासी दूर कर दी थी.  जब 3 साल पहले सौरभ की मां की मौत हुई थी, तब वह जवानी की दहलीज पर पैर रख चुका था. छोटे भाई गौरव की उम्र तब केवल 7 साल की थी. मां के मरने पर वह फूटफूट कर रोया था. अब उस के लिए भैया सौरभ ही मांबाप व भाई सबकुछ था. गौरव को कई रातें थपकियां दे कर सुलाना पड़ा था. वह भैया से बारबार एक ही सवाल पूछता था, ‘‘मां कब आएगी?’’ सौरभ हर बार झूठ बोलता था, ‘‘मां बहुत जल्द वापस आ जाएगी.’’ समझनेबूझने के लिए 10 साल की उम्र कम नहीं होती. पर गौरव को समझने में दिक्कत हो रही थी कि भैया जिसे नई दुलहन के रूप में लाया है, वह मां है या कोई और…? 3 साल में मां की याद धुंधली हो चली थी, लेकिन गौरव को भैया की बात अब तक याद थी कि मां बहुत जल्द वापस आ जाएगी. जब से घर में नईनवेली दुलहन को देखने का मेला लगा था, तब भी वह सब से अलग बैठ कर भैया की बातों को याद कर रहा था.

‘क्या सचमुच मां वापस आ गई? अगर वह मां नहीं है, तो इतनी सुंदर, जवान और काले बालों वाली कैसे हो गई? लेकिन, वह पूछे तो किस से पूछे?’ उस दिन जब भाभी ने पहली बार गौरव का हाथ पकड़ कर प्यार से अपने पास बैठाया, तो वह लाज के मारे पानीपानी हो गया.  भैया आंगन से बाहर निकल रहे थे. निकलतेनिकलते वह बोलते गए, ‘‘कांता, गौरव बड़ा नटखट है. यह तुम्हें बहुत तंग करेगा… और हां, अब तक तो इसे मैं ने संभाला, अब तुम संभालो.’’ कांता ने उसे अपने सीने से लगा लिया. उस दिन देवर और भाभी के बीच काफी देर तक बातें हुईं. गौरव की झिझक मिट चुकी थी. दोनों बहुत जल्दी घुलमिल गए. ‘‘गौरव, एक बात पूछूं?’’ ‘‘पूछिए न.’’ ‘‘आप मुझे क्या कह कर पुकारेंगे?’’ इस सवाल पर गौरव चुप रह गया. क्या कहना ठीक रहेगा, उस की समझ में नहीं आया. ‘‘कुछ बोले नहीं?’’ कांता ने टोका. ‘‘हूं… मां,’’ गौरव के मुंह से बिना सोचे ही निकल गया. कांता जोर से हंस पड़ी और प्यार से गौरव का कान पकड़ कर बोली, ‘‘सिर्फ मां नहीं… भाभी मां.’’ ‘‘भाभी मां,’’ गौरव ने दोहराया.

‘‘हां…’’ कांता पूछ बैठी, ‘‘और मैं आप को क्या कह कर पुकारूंगी?’’ ‘‘गौरव.’’ ‘‘नहीं… छोटे राजा.’’ इस बात पर वे दोनों काफी देर तक हंसते रहे.  वक्त गुजरता गया. सौरभ गांव का सब से बड़ा किसान था. गौरव की पढ़ाई गांव के स्कूल में ही हो रही थी. वह भाभी मां के लाड़प्यार में कुछ ज्यादा ही चंचल हो गया था. सौरभ कभीकभी इस की शिकायत कांता से करता कि तुम ने गौरव को बिगाड़ दिया?है. कभी गुस्से में आ कर वह गौरव को मारने दौड़ता, तो गौरव भाभी मां की साड़ी पकड़ कर उस के पीछे छिप जाता. इस पर कभीकभी सौरभ व कांता में कहासुनी भी हो जाती. सौरभ चिल्ला कर कहता, ‘‘देखना कांता, यह भी मेरी तरह गंवार ही रह जाएगा. और इस में सारी गलती तुम्हारी होगी.’’ ‘‘नहीं, छोटे राजा गंवार नहीं रहेगा… खूब पढ़ेगा और साहब बनेगा,’’ कांता गौरव को अपने पीछे रख कर भैया की पिटाई से बचा लेती. गौरव पढ़नेलिखने में बहुत तेज था. लेकिन ज्यादा चंचल होने के चलते वह अकसर स्कूल से पढ़ाई छोड़ कर भाग जाया करता.  सौरभ दिनरात खेती में लगा रहता.

इस की उसे जानकारी भी नहीं हो पाती. जब स्कूल के मास्टर इस की शिकायत करते, तो वह घर आ कर कांता पर बरस पड़ता.  तब भी कांता यह कर कर गौरव का बचाव करती, ‘‘आप बेकार ही चिंतित हो रहे हैं. अपना गौरव पढ़ने में बहुत तेज है. अच्छे डिवीजन से क्लास पास करेगा.’’ यों तो सौरभ नहीं चाहता था कि गौरव खेती में हाथ बंटाए और उस की पढ़ाई बरबाद हो. फिर भी जरूरत पड़ने पर खेत जाने की हिदायत जरूर करता.  लेकिन गौरव को खेत जाना पसंद नहीं था. वह खेत से लौट कर भाभी मां को पैर और कपड़े में लगे कीचड़ को दिखाते हुए कहता, ‘‘देखो भाभी मां, इसीलिए मैं खेत पर जाना नहीं चाहता.’’ ‘‘लेकिन, आप तो किसान के लड़के हैं. आप को खेत पर जाने में कहीं हिचकना चाहिए?’’ कांता गौरव को प्यार से समझाती.  इस पर गौरव ठुनकने लगता, तो कांता को मजबूर हो कर कहना पड़ता, ‘‘ठीक है, आइंदा आप खेत पर नहीं जाएंगे. मैं आप के भैया से कह दूंगी.’’

सौरभ को यह बात पसंद नहीं थी. गौरव ने स्कूल का इम्तिहान अच्छे नंबर से पास कर लिया. भाभी मां को मना कर के उस ने शहर के अच्छे कालेज में दाखिला ले लिया.  गौरव के बिना कांता को पूरा घर सूनासूना सा लगने लगता था. बाद में अपने बच्चे के साथ रह कर वह इस कमी को भूल गई. सौरभ ने गौरव को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. एक दिन गौरव जब गांव आया, तो आते ही भाभी मां को एक खुशखबरी सुनाई. सुन कर कांता खुशी से उछल पड़ी. घर आते ही सौरभ पूछ बैठा, ‘‘अरे कांता, आज तुम बहुत खुश हो.’’ ‘‘हां, बहुत खुश हूं,’’ कांता सौरभ के सामने दोनों हाथ पीछे कर थोड़ा झुकते हुए बोली, ‘‘जरा मैं भी तो सुनूं कि कैसी खुशी है?’’ ‘‘ऐसे नहीं, पहले वादा.’’ ‘‘कैसा वादा?’’ सौरभ मुसकराया. ‘‘यही कि इस बार फसल बिकने पर अपनी पूजा बेटी के लिए सोने का एक जोड़ा कंगन बनवा दोगे,’’ कांता ने चहकते हुए कहा. ‘‘यह भी कोई शर्त हुई? पूजा तो अभी बच्ची है, भला वह कंगन ले कर क्या करेगी?’’ सौरभ बोला. ‘‘इसलिए कि इसी बहाने उस की शादी के लिए कुछ गहने हो जाएंगे.’’ ‘‘उस की शादी की अभी से चिंता?’’ सौरभ कह कर जोर से हंस पड़ा और कांता के और नजदीक हो कर बोला, ‘‘चलो, यह शर्त मंजूर है. सिर्फ पूजा का ही नहीं… इस बार तुम्हारा भी कंगन.’’ ‘‘शर्त?’’ ‘‘हां.’’ ‘‘अपना गौरव डाक्टरी की पढ़ाई में दाखिला लेने के लिए होने वाले इम्तिहान में पास हो गया है…

वह अब डाक्टर बनेगा… डाक्टर…’’ ‘‘सच…? कहां है वह? पहले मुझे नहीं बताया. आज उस की पिटाई करूंगा…’’ कहतेकहते सौरभ खुशी से रो पड़ा. गौरव का दाखिला डाक्टरी की पढ़ाई वाले कालेज में हो गया. अब तो वह गांव से और भी दूर चला गया था. लेकिन भैया, भाभी मां और भतीजाभतीजी से मिलने वह बारबार गांव आता. भाभी मां अब उसे ‘डाक्टर साहब’ कह कर पुकारने लगी.  गौरव इस पर एतराज करता. वह कहता, ‘‘मुझे ‘छोटे राजा’ सुनने में ही अच्छा लगता है.’’ डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद गौरव किसी बड़े डाक्टर के साथ रह कर मरीजों का इलाज करने की तरकीब सीख रहा था. उस के बाद वह किसी बड़े शहर में डाक्टर की नौकरी करना चाहता था. गौरव कुछ समय के लिए गांव आया था. बातचीत के दौरान उस ने भाभी मां को भी बताया कि वह किसी बड़े शहर में नौकरी करना चाहता है. इस का कांता ने हंसते हुए विरोध किया, ‘‘अगर सभी डाक्टर शहर में ही रहना पसंद करेंगे, तो गांव के लोग कहां जाएंगे?’’ ‘‘भाभी मां, इतना पढ़लिख कर भी गांव की नौकरी? गांव में क्या रखा है? न बिजली, न सड़कें, न मन बहलाने के लिए सिनेमाघर, जबकि शहरों में सड़कें, बिजली की चकाचौंध, बड़ीबड़ी इमारतें, गाडि़यां, पढ़ेलिखे लोग.’’ कांता गौरव का मुंह देख रही.

गौरव इसी धुन में बोलता रहा, ‘‘हर कोई पैसा कमाना चाहता है. मैं भी यही चाहूंगा. गांव में सेवा तो हो सकती है, पैसे नहीं मिल सकते. गांव के लोग गरीब होते हैं, वे डाक्टर को पैसा कहां से देंगे? और शहरों में तो जितना जी चाहे पैसे वसूले जा सकते हैं.’’ ‘‘डाक्टर साहब, यह आप क्या बोल रहे हैं? गांव में जनमे, बड़े हुए, आज गांव से ही नफरत करते हैं? सारे डाक्टर ऐसा ही सोचने लगेंगे, तो गांवों का क्या होगा, जबकि देश के ज्यादातर लोग गांवों में ही रहते हैं?’’ ‘‘छोड़ो भी भाभी मां, यह सब सरकारी भाषा है. सरकार भी यही कहती है कि डाक्टरों को गांवों में अस्पताल खोलने चाहिए, लेकिन कितने डाक्टर गांव में आना चाहते हैं?’’ गौरव की इस बात ने कांता को काफी दुखी किया. गौरव तो वापस चला गया, लेकिन कांता कई दिनों तक बेचैन रही. गौरव की एकएक बात आग बन कर उस के अंदर उतर चुकी थी. हालांकि वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. फिर भी जितना वह समझ सकी, गौरव का फैसला उसे अच्छा नहीं लगा. कुछ दिनों बाद गौरव मनचाहे शहर में सरकारी डाक्टर बन गया. यह खबर पा कर सौरभ और कांता को काफी खुशी हुई. अब गौरव बहुत कम गांव आ पाता. लेकिन हर महीने भैया को रुपए भेजना नहीं भूलता. जब कभी छुट्टी मिलती, तो घर के सभी लोगों के लिए तरहतरह के तोहफे ले कर जरूर आता. इस बार जब वह घर आया, तो भाभी मां को बीमार देख कर चिंतित हो गया. उस ने भाभी मां से शहर चलने के लिए कहा, ताकि ठीक से इलाज हो सके. लेकिन कांता ने यह कह कर शहर जाने से इनकार कर दिया कि शहर में उस का दम घुटने लगता है.  देहात की ताजा हवा, साफसुथरा माहौल, दूरदूर तक फैली हरियाली, भोलेभाले लोग और मिट्टी की सोंधीसोंधी महक को छोड़ कर वह शहर में नहीं रह सकेगी. शहर में गंदी हवा, भीड़भाड़, कलकारखाने व मशीनों के चिंघाड़ने की आवाजें, चिमनियों से निकलता जहरीला धुआं उसे और ज्यादा बीमार कर देंगे. ‘‘लेकिन, आप वहां नहीं जाएंगी, तो आप की सेहत का क्या होगा?’’ गौरव ने समझाया. ‘‘छोटे राजा साहब, मुझे कुछ नहीं होगा. आप मेरी चिंता मत कीजिए. छोडि़ए भी ये बेतुकी बातें, एक जरूरी बात पूछूं?’’ कांता ने कहा. ‘‘हां, पूछिए.’’

‘‘आप ने अपने लिए कहीं पसंद की है?’’ कांता कह कर हंस पड़ी. ‘‘समझा नहीं…?’’ गौरव भाभी मां का मुंह देखने लगा. ‘‘बुद्धू,’’ कांता ठठा कर हंस पड़ी. ‘‘साफसाफ कहिए न भाभी मां.’’ ‘‘बुद्धू राजा, मेरा मतलब है कि अपने लिए कोई लड़की पसंद की है?’’ ‘‘भाभी मां, जब बाप के समान भैया और मां के समान आप हैं, तो फिर यह हिम्मत मैं कैसे कर सकता हूं?’’ ‘‘भाषणबाजी छोडि़ए,’’ कांता गंभीर होने का नाटक करने लगी. बोली, ‘‘भैया ही पूछ रहे थे. एक लड़की के बाप से बात चल रही है. सोचे, गौरव अपनी पसंद की लड़की खुद चुन लिया होगा तो बाद में दिक्कत होगी.’’ ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है भाभी मां?’’ ‘‘ठीक है, आप खुद भी उस लड़की को देख लेते,’’ कांता ने कहा.

‘‘नहीं, आप लोग जो पसंद करेंगे, मुझे मंजूर होगा.’’ ‘‘अच्छा मेरे लाला, आप के लिए परी ही लाऊंगी. जल्दी इस की खबर मिल जाएगी,’’ कह कर कांता हंसने लगी. गौरव ने भी इस में साथ दिया. गौरव अगले दिन ही वापस चला गया. 2-3 महीने सबकुछ ठीकठाक चला. उस दिन गौरव सो कर उठा ही था कि गांव से आए रिश्ते में भाई लगने वाले अरुण को देख कर चौंक गया. एक झटके में ही उस ने अंदाजा लगाया कि शायद उस की शादी पक्की हो गई?है. यह उसी की खबर ले कर आया होगा. ‘‘अरुण गांव से आ रहे हो? सभी कुशल तो हैं?’’ गौरव ने पूछा. ‘‘अरे, तुम कुछ बोलते क्यों नहीं… भैया, भाभी मां, पूजा, राहुल, पिंकी सब कुशल तो हैं?’’ गौरव चिंतित हो गया. ‘‘अरुण,’’ गौरव उसे जोर से झकझोरते हुए चिल्लाया. वह किसी अनहोनी के डर से कांपने लगा. ‘‘कांता भाभी…’’ अरुण पूरा नहीं बोल सका.

‘‘क्या हुआ भाभी मां को?’’ गौरव पागलों की तरह चिल्लाया. ‘‘नहीं…’’ गौरव की चीख देर तक गूंजती रही. रेलगाड़ी महानगर से निकल कर खेतखलिहानों से हो कर गांव की ओर दौड़ रही थी. रात आधी बीत चुकी थी. डब्बे के लगभग सभी मुसाफिर सो चुके थे. केवल गौरव और अरुण ही ऐसे थे, जिन्हें नींद नहीं आ रही थी. गौरव तो पत्थर की मूरत की तरह बैठा था. अरुण धीरेधीरे कुछ बतिया रहा था. ‘‘गौरव.’’ ‘‘क्या?’’ ‘‘जानते हो, कांता भाभी पूरे 24 घंटे तक दर्द से तड़पती रहीं. उन की  पित्त की थैली फट गई थी. अगर कोई अच्छा डाक्टर होता तो कांता भाभी नहीं मरतीं.  ‘‘सौरभ भैया ने तो कहा था, ‘पूरी जमीन बेच दूंगा, लेकिन कांता को नहीं मरने दूंगा…’ मगर कोई डाक्टर आता तब तो… कीचड़ होने के चलते मनमानी फीस का लोभ देने पर भी कोई डाक्टर गांव नहीं आया.

भाभी की हालत शहर ले जाने की नहीं थी.’’ रेलगाड़ी पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी. गौरव दीवार से पीठ टेके छत को निहार रहा था.  अरुण अब भी धीमी आवाज में  बोल रहा था, ‘‘गांव के नीमहकीम डाक्टरों ने कांता भाभी को बचाने की पूरी कोशिश की.’’ ‘‘जानते हो गौरव, गांव वाले क्या कानाफूसी कर रहे थे?’’ अरुण कुछ देर रुक कर बोला. ‘‘क्या…?’’ ‘‘अगर तुम होते तो कांता भाभी नहीं मरतीं… और मरतीं भी तो इस तरह  24 घंटे तक तड़प कर नहीं.’’ अरुण की एकएक बात जहर बुझे तीर की तरह गौरव के दिल में उतरती चली गई. भाभी मां की याद और उन की एकएक बात टीस पैदा करने लगी. उस ने पूछा, ‘‘अरुण, सुबह होने में कितनी देर है?’’ ‘‘बस, एक घंटा.’’ ‘‘शहर लौटने के लिए कितने बजे गाड़ी है?’’ ‘‘रात को है. क्या आज ही शहर लौट जाओगे?’’ अरुण ने हैरानी से पूछा. ‘‘हां, आज ही…’’ गौरव की आवाज सख्त थी, ‘‘मैं नौकरी से इस्तीफा दे कर अब गांव में ही डाक्टरी करूंगा, ताकि और कोई भाभी मां तड़पतड़प कर न मरने पाए.’’ ‘‘गौरव…’’ अरुण की आवाज भर आई. ‘‘हां अरुण, भाभी की मौत ने मेरी आंखें खोल दी हैं.’’

अति सर्वत्र वर्जएत : कैसी थी कल्याणी

“माँ! अब मैं थक चुकी हूँ. आपमेरी  भलाई चाहती हैं यह मैं जानती हूँ. आपमेरा बहुत खयाल रखती हैं. जरूरत से कहीं ज्यादा. और आपका यह जरूरत से ज्यादा खयाल मेरे अरमानों का मेरे स्वतन्त्रता का गला घोंट देती है. आप बात-बात पर उदाहरण देती हैं न कि अति सर्वत्र वर्जएत. यहाँ भी अति हो रहा है और इससे आपको परहेज करना चाहिए.” सपना ने तमतमाते हुए कहा.

दर असल अभी-अभी उसका बॉय फ्रेंड उमेश उसे छोड़कर वापस गया था और उसकी माँ कल्याणी ने उसके प्रति अपनी नापसंदगी जताई थी.

“लेकिन बेटा हम तुम्हारी भलाई के लिए ही तो कुछ कहते हैं. मुझे उमेश जरा भी पसंद नहीं है. उसकी पर्सनाल्टी तुम्हारे सामने कुछ भी नहीं है.” कल्याणी ने अपनी बेटी को समझाया.

“माँ वह मेरा फ्रेंड है. मुझे पसंद है उसका साथ. आपके पसंद होने न होने से क्या मतलब है? मैं अब बालिग हूँ और अपना भला बुरा समझ सकती हूँ.” सपना ने गुस्से से कहा.

“देखो, तुम बालिग जरूर हो गई हो. पर मेरे लिए तुम हमेशा बच्ची ही रहोगी और तुम्हारी भालाई सुनिश्चित करना मेरा अधिकार भी है और कर्तव्य भी.” कल्याणी ने क्रोधपूर्वक कहा. पर उसके क्रोध में भी प्यार झलक रहा था.

“आज तक आपको मेरा कोई भी दोस्त ठीक नहीं लगा. किसी न किसी कारण से आपने सबसे मुझे दूरी बनाने की सलाह दी. आपको हमेशा यही लगता रहा कि मुझे और अच्छे लड़के से दोस्ती करनी चाहिए. आपके स्टैंडर्ड तक पहुंचना मेरे लिए संभव नहीं है और न ही मैं पहुंचाना चाहती हूँ. आप कैसे व्यक्ति को पसंद करती हैं शायद आपको भी नहीं पता.” सपना ने पैर पटकते हुए कहा और अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर पलंग पर निढाल पड़ गई.

इतना ज्यादा प्यार भी बच्चों से माँ बाप को नहीं होना चाहिए. सपना ने सोचा. उमेश उसका चौथा बॉयफ्रेंड था जिसके प्रति माँ ने अपनी नापसंदगी जताई थी.और पापा? पापा तो बस अपने काम में व्यस्त रहते हैं. माँ के किसी भी निर्णय के खिलाफ वह जा ही नहीं सकते. और अपना कोए निर्णय उनका है ही नहीं. अतः उनसे कोई अपेक्षा किया जाए या नहीं यह समझना भी मुश्किल था.

उसका पहला दोस्त था दीपक.दीपक उसका बचपन का दोस्त था. साथ-साथ दोनों ने स्कूल में पढ़ाई की थी. कॉलेज में भले ही दोनों अलग हो गए थे परंतु साथ बना रहा था. जन्मदिन, नववर्ष, पर्व-त्योहार पर बधाई देना, बीच-बीच में किसी होटल में डिनर करना, साथ में मल्टीप्लेक्स जाना होता रहता था। दीपक ने कभी उसका साथ नहीं छोड़ा था. काफी दिनों के बाद उसने अपने प्यार का इजहार भी कर दिया था. वैसे उसने कभी दीपक को इस नजर से नहीं देखा था. उसने कहा भी था कि उसे कुछ दिनों की मोहलत चाहिए सोचने के लिए. घर में उसने अपनी माँ से दीपक के बारे में बात की तो माँ ने नाक भौं सिकोड़ लिया था. कारण बस एक ही था. दीपक संयुक्त परिवार में रहता था. उसका एक छोटा भाई और एक छोटी बहन थी. माँ का कहना था कि संयुक्त परिवार में आज के जमाने में एडजस्ट करना मुश्किल है. माँ की बात मान उसने दीपक को सॉरी बोल दिया था. धीरे-धीरे दीपक उससे दूर होता चला गया था. और अब वह उसका दोस्त भी नहीं रहा था. अब वह उससे किसी भी मौके पर संपर्क नहीं रखता था. फेसबुक से पता चला था कि उसने शादी कर ली है. उसने बधाई भी दी थी उसे पर उसने उसके कमेन्ट को न लाइक किया न ही कोई प्रतिक्रिया दी.

विनीत दूसरा दोस्त था उसका. विनीत उसके ऑफिस में काम करता था. काफी अंतर्मुखी और संकोची स्वभाव का था विनीत. उसे वह अलग हट कर इसलिए लगा था क्योंकि उसने कभी भी उसे अपने या किसी और महिला सहकर्मी के शरीर को घूरते या किसी से अनावश्यक संपर्क बनाने की कोशिश करते हुए नहीं देखा था. जबकि अन्य सहकर्मी चोरी छिपे महिला सहकर्मियों के शरीर का मुआयना करते हुए प्रतीत होते थे. हाँ! जब वह उसके पास जाती थी तो जरूर वह उसका स्वागत करता था. बात बात पर उसका शरमा जाना सपना को बहुत भाता था. बल्कि उस वर्ष रोजडे पर उसने उसे लाल गुलाब देने का मन भी बना लिया था. जब उसने अपनी माँ से इस बारे में बताया तो माँ ने साफ मना कर दिया. और कारण क्या था.? कारण यह था कि विनीत ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया था. पर माँ ने यह नहीं देखा था कि उसने तलाक क्यों दिया था. वास्तव में लड़की वालों ने धोखे से उसके पल्ले एक ऐसी असाध्य रोग से ग्रसित रोगिणी को बांध दिया था जिसके साथ रहना काफी खतरनाक था. माँ के सलाह पर उसने विनीत से प्यार का इजहार ही नहीं किया था.

तीसरा दोस्त निशांत था. उससे उसकी जान पहचान एक रिश्तेदार के घर किसी पारिवारिक समारोह में हुई थी. निशांत देखने में बड़ा ही आकर्षक था. बात व्यवहार में भी बड़ा ही भला था. एक बार जान पहचान होने के बाद सोशल मीडिया पर दोनों जुड़ गए थे. फिर मिलना जुलाना शुरू हो गया था. कई बार वह उसकी सहायता भी करता था. जब माँ को यह अहसास हुई कि वह निशांत के प्रति कोमल भावनाएँ रखती है तो उसने आगाह किया था, “बेटा निशांत से ज्यादा नजदीकी बनाना ठीक नहीं है.”

“क्यों माँ?क्या कमी हैं निशांत में? कितना सहयोग करता है मेरे साथ?”सपना ने मासूमियत से पूछा था.

“बेटा, उसके भाई ने अंतर्जातीय विवाह किया है. उसके परिवार को समाज में ठीक निगाह से नहीं देखा जाता है.” माँ ने बताया था.

“माँ! आज जात-पात को कौन मानता है? जमाना बादल गया है. ऐसी बातें आज के जमाने में कौन देखता है?” उसने अपना पक्ष रखा था.

“जमाना बादल गया होगा बेटा, पर मैं नहीं बदली. मैं तो इस तरह की शादी करने वालों के सख्त खिलाफ हूँ. और तुम्हें भी हिदायत देती हूँ. दोस्ती तक ठीक है पर उससे आगे बढ़ाने की सोचना भी मत.” माँ का सख्त निर्देश मिला था.और फिर निशांत से भी उसकी दोस्ती खतम हो गई थी.

अब बारी थी उमेश की. उमेश उसकी सहकर्मी, शिखा का भाई था. शिखा के घर आते-जाते उसका संपर्क उससे हो गया था. शिखा ने ही बातों-बातों में उसे बताया था कि उसका भाई उमेश उसे पसंद करता है और उसके साथ जीवन बिताना चाहता है. सपना भी पढ़ाई पूरी करने के बाद कई वर्षों से नौकरी कर रही थी. वह भी अब अपना घर बसाना चाहती थी.माँ की अपेक्षा होने वाले दामाद से इतनी अधिक थी कि कोई लड़का उन्हें पसंद ही नहीं आ रहा था.पापा तो मानो माँ के राज में ममोली प्रजा थे. उनकी पसंद नापसंद का कोई महत्व नहीं था.उमेश भी उन्हें नापसंद था और इसका कारण भी क्या था? उमेश की सांवला होना.

अब सपना थक चुकी थी.माँ की अपेक्षाओं के पहाड़ को पार करना उसके वश में नहीं था. पर वह करे क्या समझ नहीं पा रही थी.

पापा! उसके जेहन में पापा आए. वे माँ की इच्छा के सामने सामान्य तौर पर कुछ नहीं बोलते थे और अपने काम में व्यस्त रहते थे. क्या वे उसकी सहायता करेंगे या फिर माँ की हाँ में हाँ मिलाएंगे? पर बात करने में क्या हर्ज है? पर पापा नहीं माने तो? उसके दिल और दिमाग में कशमकश चल रहा था. पापा भी नहीं माने तो भी वह उमेश से शादी करेगी ही. अब वह बालिग है, अपने पैरों पर खड़ी है. अपना भला बुरा समझ सकती है.

उसने पापा के कमरे का दरवाजे पर दस्तक दी. पापा प्रायः अपने रूम बंद करके काम करते रहते थे.

“अंदर आ जाओ.” उन्होने कहा.

सपना दरवाजा खोल अंदर गई.

पापा डेस्कटॉप पर कुछ काम कर रहे थे. उन्होने तुरंत स्क्रीन ऑफ कर दिया और सपना की ओर मुखातिब हुए. यह उनका स्टाइल था. कोई भी उनसे मिलने आता तो वे पूरी तरह उस पर ध्यान केन्द्रित करते थे. यदि टीवी देख रहे हों तो टीवी बंद करते थे, मोबाइल पर कुछ काम कर रहे हों तो मोबाइल किनारे रख देते थे.

“बोलो बेटा.” उन्होने सपना की ओर प्रश्नभरी निगाहों से देखा.

“क्या बोलूँ पापा? आपके पास ऐसे बैठने नहीं आ सकती क्या?” सपना ने तुनकने का अभिनय किया.

“अरे बैठ क्यों नहीं सकती? पर आई हो कुछ विशेष काम से. इसलिए बता दो. फिर बैठना आराम से.” पापा ने कहा.

“पापा! मैं उमेश के साथ शादी करना चाहती हूँ और इस बार आपलोगों के अड़ंगे को मैं नहीं मानूँगी.”

“अड़ंगा? मैंने कभी अड़ंगा नहीं लगाया. तुमने अपने जीवन की बागडोर अपनी माँ के हाथों में दे रखी है. माँ से बात करो.” पापा ने कहा.

“माँ को तो कोई लड़का पसंद ही नहीं आता. मेरे तीन दोस्तों को रिजेक्ट कर चुकी है.” सपना ने निराश स्वर में कहा.

“देखो! मैं तुम्हारे साथ हूँ.मुझे तुम्हारे किसी भी निर्णय पर पूरा भरोसा है. यदि तुम उमेश के साथ शादी करना चाहती हो तो मेरा अपूरा समर्थन है. इसके लिए मैं तुम्हारी माँ से भी लड़ सकता हूँ. वैसे मेरी हिम्मत नहीं होती तुम्हारी माँ के सामने बोलने की पर तुम्हारे लिए मैं किसी भी मुसीबत से टकरा सकता हूँ. तुम्हारी माँ से भी.” पापा ने हँसते हुए कहा.

“पापा!” सपना ने अपना सर पापा के कंधे पर रख दिया. उसे विश्वास नहीं हो रहा था की पापा इतनी जल्द उसके बात मान जाएंगे.पापा ने प्यार से उसके सर पर हाथ रख दिया.

रात में जब आशीष कल्याणी से मिले तो उसे समझाया,” सपना अपने पसंद के लड़के से शादी कर रही है तो तुम क्यों बीच में बाधा बन रही हो.”

कल्याणी ने तल्ख शब्दों में कहा,”मैं बाधा नहीं बन रही, उसके भलाई के लिए कह रही हूँ. कहीं से भी उमेश टिकता है हमारी सपना के सामने. कहाँ सपना गोरी सुंदर कहाँ उमेश सांवला और देखने में एकदम साधारण.”

“भई हम भी तो साँवले और बिलकुल साधारण है. आपके गोरे रंग और सुंदरता के सामने मेरा क्या मोल. पर हम सुखद जीवन जी रहे हैं कि नहीं. यदि मेरे स्थान पर कोई गोरा सुंदर व्यक्ति आपका पति होता पर उतनी स्वतन्त्रता नहीं देता जितनी मैं देता हूँ तो क्या यह ठीक होता?” आशीष ने समझाया.

कुछ देर तर्क वितर्क होता रहा पर अंत में कल्याणी की समझ में बात आई कि रंग और सुंदरता से ज्यादा महत्वपूर्ण है आपसी समझ. और उमेश और सपना के बीच आपसी समझ काफी बेहतर है इसमें कोई दो मत तो था नहीं.

दूसरे दिन सुबह सपना को पापा की ओर से हरी झंडी मिल चुकी थी.और इस बार माँ की ओर से भी सहमति थी. अब सपना अपने पसंद के लड़के से शादी करने जा रही थी.

प्रमाणित किया जाता है कि “माँ! अब मैं थक चुकी….” शब्दों से प्रारंभ होने वाली  रचना ‘अति सर्वत्र वर्जएत’मेरी  स्वरचित मूल रचना है. इसे दिल्ली प्रेस प्रकाशन की पत्रिकाओं में प्रकाशन हेतु ‘विचारार्थ प्रेषित किया जा रहा है. यह कहीं  प्रकाशित  नहीं हुई है.

घर लौट जा माधुरी : जवानी की दहलीज

जवानी की दहलीज पर पैर रखते ही मन सातवें आसमान पर जा पहुंचता है. सारी दुनिया रंगीन और मदभरी लगती है. मन का घोड़ा बेलगाम होने लगता है और मदहोशी में किसी की बात सुनना नहीं चाहता है. कुछ ऐसा ही माधुरी के साथ हो रहा था.

रात के साढ़े 10 बज रहे थे. तृप्ति खाना खा कर पढ़ने के लिए बैठी थी. वह अपने जरूरी नोट रात में 11 बजे के बाद ही तैयार करती थी. रात में गली सुनसान हो जाती थी. कभीकभार तो कुत्तों के भूंकने की आवाज के अलावा कोई शोर नहीं होता था.

तृप्ति के कमरे का एक दरवाजा बनारस की एक संकरी गली में खुलता था. मकान मालकिन ऊपर की मंजिल पर रहती थीं. वे विधवा थीं. उन की एकलौती बेटी अपने पति के साथ इलाहाबाद में रहती थी.

नीचे छात्राओं को देने के लिए 3 छोटेछोटे कमरे बनाए गए थे. 2 कमरों के दरवाजे अंदर के गलियारे में खुलते थे. उन दोनों कमरों में भी छात्राएं रहती थीं.

दरवाजा बाहर की ओर खुलने का एक फायदा यह था कि तृप्ति को किसी वजह से बाहर से आने में देर हो जाती थी तो मकान मालकिन की डांट नहीं सुननी पड़ती थी.

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया. तृप्ति किसी अनजाने डर से सिहर उठी. उसे लगा, कोई गली का लफंगा

तो नहीं. वैसे, आज तक ऐसा नहीं हुआ था. रात 10 बजे के बाद गली की ओर खुलने वाले दरवाजे को किसी ने नहीं खटखटाया था.

कभीकभार बगल वाली छात्राएं कुछ पूछने के लिए साइड वाला दरवाजा खटखटा देती थीं. उन दोनों से वह सीनियर थी, इसलिए वे भी रात में ऐसा कभीकभार ही करती थीं.

पर जब ‘तृप्ति, दरवाजा खोलो… मैं माधुरी’ की आवाज सुनाई पड़ी, तो तृप्ति ने दरवाजे की दरार से झांक कर देखा. यह माधुरी थी. उस के बगल के गांव की एक सहेली. मैट्रिक तक दोनों साथसाथ पढ़ी थीं. बाद में तृप्ति बनारस आ गई थी. बीए करने के बाद बीएचयू की ला फैकल्टी में एडमिशन लेने के लिए वह एडमिशन टैस्ट की तैयारी कर रही थी.

माधुरी बगल के कसबे में ही एक कालेज से बीए करने के बाद घर बैठी थी. पिता उस की शादी करने के लिए किसी नौकरी करने वाले लड़के की तलाश में थे.

‘‘अरे तुम… इतनी रात गए… कहां से आ रही हो?’’ हैरान होते हुए तृप्ति ने पूछा.

‘‘बताती हूं, पहले अंदर तो आने दे,’’ कुछ बदहवास और चिंतित माधुरी आते ही बैड पर बैठ गई.

‘‘एक गिलास पानी तो ला… बहुत प्यास लगी है,’’ माधुरी ने इतमीनान की सांस लेते हुए कहा. ऐसा लग रहा था मानो वह दौड़ कर आई थी.

तृप्ति ने मटके से पानी निकाल कर उसे देते हुए कहा, ‘‘गलियां अभी पूरी तरह सुनसान नहीं हुई हैं… वरना अब तक तो इस गली में कुत्ते भी भूंकना बंद कर देते हैं,’’ फिर उस ने माधुरी की ओर एक प्लेट में बेसन का लड्डू बढ़ाते हुए कहा, ‘‘पहले कुछ खा ले, फिर पानी पीना. लगता है, तुम दौड़ कर आ रही हो?’’

माधुरी ने लड्डू खाते हुए कहा, ‘‘इतनी संकरी गली में कमरा लिया है कि तुम्हारे यहां कोई पहुंच भी नहीं सकता. यह तो मैं पिछले महीने ही आई थी इसलिए भूली नहीं, वरना जाने इतनी रात को अब तक कहां भटकती रहती.’’

‘‘पहले मैं गर्ल्स होस्टल में रहना चाहती थी, पर अगलबगल में कोई ढंग का मिल नहीं रहा था, महंगा भी बहुत था. यह बहुत सस्ते में मिल गया. यहां बहुत शांति रहती है, इसलिए इम्तिहान की तैयारी के लिए सही लगा. बस, आ गई. अगर मेरा एडमिशन बीएचयू में हो जाता है, तो आगे से वहीं होस्टल में रहूंगी.

‘‘अच्छा, अब तो बता कैसे आई हो? इतना बड़ा बैग… लगता है, काफी सामान भर रखा है इस में. कहीं जाने का प्लान है क्या?’’ तृप्ति ने पूछा.

‘‘हां, बताती हूं. अब एक कप चाय तो पिला,’’ माधुरी बोली.

‘‘खाना खाया है या बनाऊं… लेकिन, तुम ने खाना कहां से खाया होगा. घर से सीधे आ रही हो या…’’

‘‘खाना तो नहीं खाया है. मौका ही नहीं मिला, लेकिन रास्ते में एक दुकान से ब्रैड ले ली थी. अब इतनी रात को खाने की चिंता छोड़ो. ब्रैडचाय से काम चला लूंगी मैं,’’ माधुरी ने कहा.

चाय और ब्रैड खाने के बाद माधुरी की थकान तो मिट गई थी, पर उस के चेहरे पर अब भी चिंता की लकीरें साफ दिखाई पड़ रही थीं.

माधुरी बोली, ‘‘तृप्ति, तुम्हें याद है, जब हम लोग 9वीं जमात में थे, तब सौरभ नाम का एक लड़का 10वीं जमात में पढ़ता था. वही लंबी नाक वाला, गोरा, सुंदर, जो हमेशा मुसकराता रहता था…’’

‘‘हां, जिस के पीछे कई लड़कियां भागती थीं… और जिस के पिता की गहनों की मार्केट में बड़ी सी दुकान थी,’’ तृप्ति ने याद करते हुए कहा.

‘‘हां, वही.’’

‘‘पर, बात क्या है… तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘वही तो मैं बता रही हूं. वह 2 बार मैट्रिक में फेल हुआ तो उस के पिता ने उस की पढ़ाई छुड़वा कर दुकान पर बैठा दिया. पिछले साल भैया की शादी थी. मां भाभी के लिए गहनों के लिए और्डर देने जाने लगीं तो साथ में मुझे भी ले लिया.

‘‘मैं गहनों में बहुत काटछांट कर रही थी, इसलिए उस के पिता ने गहने दिखाने के लिए सौरभ को लगा दिया, तभी उस ने मुझ से पूछा था, ‘तुम माधुरी हो न?’

‘‘मैं ने कहा था, ‘हां, पर तुम

कैसे जानते हो?’

‘‘उस ने बताया, ‘भूल गई क्या… हम दोनों एक ही स्कूल में तो पढ़ते थे.’

‘‘मैं उसे पहचानती तो थी, लेकिन जानबूझ कर अनजान बन रही थी. फिर उस ने मेरी ओर देखा तो शर्म से मेरी आंखें झुक गईं. उस दिन गहनों के और्डर दे कर हम लोग घर चले आए, फिर एक हफ्ते बाद मां के साथ मैं भी गहने लेने दुकान पर गई थी.

‘‘मां ने मुझ से कहा था, ‘दुकानदार का बेटा तुम्हारा परिचित है, तो दाम में कुछ छूट करा देना.’

‘‘मैं ने कहा था, ‘अच्छा मां, मैं उस से बोल दूंगी.’

‘‘पर, दाम उस के पिताजी ने लगाए. उस ने पिता से कहा, तो कुछ कम हो गया… घर आने पर मालूम हुआ कि भाभी के लिए जो सोने की अंगूठी खरीदी गई थी, वह नाप में छोटी थी. मां बोलीं, ‘माधुरी, कल अंगूठी ले जा कर बदलवा देना, मुझे मौका नहीं मिलेगा. कल कुछ लोग आने वाले हैं.’

‘‘मैं दूसरे दिन जब दुकान पर पहुंची तो सौरभ के पिताजी नहीं थे. मुझे देख कर वह मुसकराते हुए बोला, ‘आओ माधुरी, बैठो. आज क्या और्डर करना है?’

‘‘मैं ने कहा था, ‘कुछ नहीं… बस, यह अंगूठी बदलवानी है. भाभी की उंगली में नहीं आएगी. नाप में बहुत छोटी है.’

‘‘वह बोला था, ‘कोई बात नहीं,

इसे तुम रख लो. भाभी के लिए मैं दूसरी दे देता हूं.’

‘‘मैं ने छेड़ते हुए कहा था, ‘बड़े आए देने वाले… दाम तो कम कर नहीं सकते… मुफ्त में देने चले हो.’

‘‘यह सुन कर उस ने कहा था, ‘कल पिताजी मालिक थे, आज मैं हूं. आज मेरा और्डर चलेगा.’

‘‘सचमुच ही उस ने वही किया, जो कहा. मैं ने बहुत कोशिश की, लेकिन उस ने अंगूठी वापस नहीं ली. भाभी के नाप की वैसी ही दूसरी अंगूठी भी दे दी.

‘‘मैं जब घर पहुंची तो मेरी उंगली में पहले वाली अंगूठी देख कर मां ने पूछा था, ‘इस को लौटाया नहीं क्या?’

‘‘मैं ने डरतेडरते कहा था, ‘इस को वापस लेने से इनकार कर दिया मां.’

‘‘यह सुन कर मां ने कठोर आवाज में पूछा था, ‘किस ने? उस छोकरे ने या उस के बाप ने?’

‘‘मैं ने कहा था, ‘उस के पिताजी नहीं थे, आज वही था.’

‘‘मां ने कहा था, ‘अंगूठी निकाल दे. कल मैं लौटा आऊंगी. बेवकूफ लड़की, तुम नहीं जानती, यह सुनार का छोकरा तु?ा पर चारा डाल रहा है. उस की मंशा ठीक नहीं है. अब आगे से उस की दुकान पर मत जाना.’

‘‘मां की बात मु?ो बिलकुल नहीं सुहाई. पिछली बार जब मैं उस की दुकान पर गई थी तब तो दाम कम कराने के लिए उसी से पैरवी करवा रही थीं. अब जब इतना बड़ा उपहार अपनी इच्छा से दिया तो नखरे कर रही हैं.

‘‘सच कहूं तृप्ति, मां के इस बरताव से मेरा सौरभ के प्रति और झुकाव बढ़ गया. उस दिन के बाद से मैं उस की दुकान पर जाने का बहाना ढूंढ़ने लगी.

‘‘एक दिन मौका मिल ही गया. बड़े वाले जीजाजी घर आए थे. मां ने जब भाभी के लिए खरीदे गए गहनों को दिखाया तो वे बोले, ‘सुनार ने वाजिब दाम लगाया है. मुझे भी उपहार में देने के लिए एक अंगूठी की जरूरत है. सलहज की उंगली का नाप आप के पास है ही, इस से थोड़ी अलग डिजाइन की अंगूठी मैं भी उसी दुकान से ले लेता हूं.’

‘‘मां ने कहा था, ‘माधुरी साथ चली जाएगी. दुकानदार का लड़का इस का परिचित है. कुछ छूट भी कर देगा.’

‘‘मां ने अंगूठी लौटाने वाली बात को जानबूझ कर छिपा लिया था. वे नहीं चाहती थीं कि मुझ पर किसी तरह का आरोप लगे. मेरी शादी के लिए बाबूजी किसी नौकरी वाले लड़के की तलाश में थे.

‘‘दूसरे दिन जीजाजी के साथ जब मैं उस की दुकान पर पहुंची तब सौरभ किसी औरत को अंगूठी दिखा रहा था. मुझे देखते ही वह मुसकराया और बैठने के लिए इशारा किया. जब जीजाजी ने अंगूठी दिखाने को कहा तो उस के पिताजी ने उसी की ओर इशारा कर दिया.

‘‘तभी कोई फोन आया और उस के पिताजी बोले, ‘2-3 घंटे के लिए मैं कुछ जरूरी काम से बाहर जा रहा हूं. ये लोग पुराने ग्राहक हैं, इन का ध्यान रखना.’

‘‘यह सुन कर सौरभ के चेहरे पर मुसकान थिरक गई. वह बोला, ‘जी बाबूजी, मैं सब संभाल लूंगा.’’

‘‘जीजाजी ने एक अंगूठी पसंद की और उस का दाम पूछा. मैं ने कहा, ‘मेरे जीजाजी हैं.’

‘‘मेरा इशारा समझ कर सौरभ ने कहा, ‘फिर तो जो आप दे दें, मुझे मंजूर होगा.’

‘‘जीजाजी ने बहुत कहा, लेकिन वह एक ही रट लगाए रहा, ‘आप जो देंगे, ले लूंगा. आप लोग पुराने ग्राहक हैं. आप लोगों से क्या मोलभाव करना है.’

‘‘जीजाजी धर्मसंकट में थे. उन्होंने अपना डैबिट कार्ड बढ़ाते हुए कहा, ‘अब मैं भी मोलभाव नहीं करूंगा. आप जो दाम भर देंगे, स्वीकार कर लूंगा.’

‘‘खैर, जीजाजी ने जो सोचा था, उस से कम दाम उस ने लगाया. उस ने हम लोगों के लिए मिठाई मंगाई और जब जीजाजी मुंह धोने वाशबेसिन की ओर गए तो वही पुरानी अंगूठी मुझे जबरन थमाते हुए कहा था, ‘अब फिर न लौटाना… नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा.’

‘‘जीजाजी देख न लें, इसलिए मैं ने उस अंगूठी को ले कर छिपा लिया.

‘‘उस दिन के बाद हम दोनों मौका निकाल कर चोरीछिपे एकदूसरे से मिलते रहे. सौरभ से मालूम हुआ कि उस के पिताजी ने पिछले साल उस की शादी एक अमीर लड़की से दहेज के लालच में करा दी थी. लड़की तो सुंदर है, लेकिन गूंगीबहरी है. वह अपने मातापिता की एकलौती बेटी है. मां का देहांत हो चुका है. पिता ने अपनी जायदाद लड़की के नाम कर दी है. शहर में एक तिमंजिला मकान भी उस की नाम से है. उस मकान से हर महीने अच्छा किराया मिलता है. रुपयापैसा उसी के अकाउंट में जमा होता है. पिताजी ने भी गहनों की यह दुकान उस के नाम कर दी है.

‘‘तृप्ति, सौरभ मुझ पर इतना पैसा खर्च करने लगा कि मैं उसी की हो कर रह गई.’’

‘‘यानी तुम ने अपना जिस्म भी उसे सौंप दिया?’’ तृप्ति ने हैरान होते हुए पूछ लिया.

‘‘क्या करती… कई बार हम लोग होटल में मिले. कोई न कोई बहाना बना कर मैं सुबह निकलती और उस के बुक कराए होटल में पहुंच जाती. शुरू में तो काफी हिचकिचाई, पर बाद में उस के आग्रह के आगे झुक गई.’’

‘‘फिर…?’’ तृप्ति ने पूछा.

‘‘फिर क्या… मैं हर वक्त उसी के बारे में सोचने लगी. उस ने मुझे भरोसा दिलाया कि कुछ दिनों बाद वह अपनी पत्नी को तलाक दे देगा और मुझ से शादी कर लेगा.’’

‘‘और तुम्हें विश्वास हो गया?’’

‘‘उस ने शपथ ले कर कहा है. मुझे विश्वास है कि वह धोखा नहीं देगा.’’

‘‘अब बताओ कि तुम यहां कैसे आई हो?’’ तृप्ति ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘एक हफ्ता पहले जीजाजी आए थे. उन्होंने बाबूजी के सामने एक लड़के का प्रस्ताव रखा था. लड़का एक सरकारी दफ्तर में है, लेकिन बचपन से ही उस का एक पैर खराब है, इसलिए लंगड़ा कर चलता है. वह मुझ से बिना दहेज की शादी करने को तैयार है.

‘‘बाबूजी तैयार हो गए. मां ने विरोध किया तो कहने लगे, ‘एक पैर ही तो खराब है. सरकारी नौकरी है. उसे कई रियायतें भी मिलेंगी.

‘‘जब मां भी तैयार हो गईं तो मैं ने मुंह खोला, पर उन्होंने मुझे डांटते हुए कहा, ‘तुम्हें तो नौकरी मिली नहीं, अब मुश्किल से नौकरी वाला एक लड़का मिला है, तो जबान चलाती है.’

‘‘लेकिन, बात यह नहीं थी. किसी ने मां के कान में डाल दिया था कि मेरा सौरभ से मिलनाजुलना है. मां को तो उसी समय शक हो गया था, जब मैं अंगूठी बिना लौटाए आ गई थी.

‘‘इधर सौरभ मेरे लिए कुछ न कुछ हमेशा खरीदता रहता था. अब घर में क्याक्या छिपाती मैं. कोई न कोई बहाना बनाती, पर मां का शक दूर न होता. वे भी चाहती थीं कि किसी तरह जल्द से जल्द मेरी शादी हो जाए, ताकि समाज में उन की नाक न कटे.

‘‘मां का मुझ पर भरोसा नहीं रहा था. उन्होंने मुझे गांव से बाहर जाने की मनाही कर दी. उधर बाबूजी ने जीजाजी के प्रस्ताव पर हामी भर दी.

लड़के ने मेरा फोटो और बायोडाटा देख कर शादी करने का फैसला मुझ पर छोड़ दिया. बिना मुझ से सलाह लिए मांबाबूजी ने अगले महीने मेरी शादी की तारीख भी पक्की कर दी है.

‘‘मांबाबूजी का यह रवैया मुझे नागवार लगा, इसलिए मैं  सौरभ से इस संबंध में बात करना चाहती थी. मैं उस के साथ कहीं भाग जाना चाहती थी.

‘‘बहुत मुश्किल से किसी तरह दवा लाने का बहाना कर के मैं गांव से निकली. फोन पर सौरभ को सारी बातें बताईं. उस ने कहा कि मैं रात में बनारस पहुंच जाऊं. सुबह वहीं से मुंबई के लिए ट्रेन पकड़ लेंगे. उस ने रिजर्वेशन भी करा लिया है. उस का एक दोस्त वहां रहता है. मुझे दोस्त के पास रख कर वह लौट आएगा, फिर पत्नी को तलाक दे कर मुझ से शादी कर लेगा.’’

‘‘ओह… तो तुम मुंबई जाने की तैयारी कर के आई हो?’’ तृप्ति ने कहा.

‘‘हां.’’

‘‘माधुरी, तुम समदार हो, इसलिए तुम को मैं समझ तो नहीं सकती… और फिर अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने का हक सभी को है, पर हम आपस में इस बारे में बात तो कर ही सकते हैं, जिस से सही दिशा मिल सके और तुम समझ पाओ कि जानेअनजाने में तुम से कोई गलत फैसला तो नहीं हो रहा है.’’

‘‘बोल तृप्ति, समय कम है, मुझे सुबह निकलना भी है. यह तो मुझे भी एहसास हो रहा है कि मैं कुछ गलत कर रही हूं. पर मेरे सामने इस के अलावा कोई रास्ता भी तो नहीं है,’’ माधुरी की चिंता उस के चेहरे से साफ झलक रही थी.

‘‘अच्छा माधुरी, सौरभ के पिता से गहनों की कीमत में छूट कराने के लिए तुम्हें सौरभ से कहना पड़ा था न?’’

‘‘हां.’’

‘‘सौरभ से तुम्हारी जानपहचान भी नहीं थी. सिर्फ इतना ही कि तुम्हारे साथ सौरभ भी एक ही स्कूल में पढ़ता था.’’

‘‘हां.’’

‘‘सौरभ के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. काफी सारा पैसा उस के बैंक अकाउंट में था, जिसे खर्चने के लिए उसे अपने पिता की इजाजत लेने की जरूरत नहीं थी.’’

‘‘यह भी सही है.’’

‘‘सौरभ की शादी उस की मरजी से नहीं हुई थी. गूंगीबहरी होने के चलते अपनी पत्नी को वह पसंद नहीं करता था. कहीं न कहीं उस के मन में किसी दूसरी सुंदर लड़की की चाह थी.’’

‘‘तुम्हारी बातों में सचाई है. कई बार उस ने ऐसा कहा था. लेकिन तुम जिरह बहुत अच्छा कर लेती हो. देखना, तुम अच्छी वकील बनोगी.’’

‘‘वह खुद जवान और सुंदर है और तुम भी उस की सुंदरता की ओर खिंचने लगी थी.’’

‘‘यह भी सही है.’’

‘‘फिर अब तो तुम मानोगी कि तुम से ज्यादा तुम्हारी शारीरिक सुंदरता उसे अपनी ओर खींच रही थी और पहली ही ?ालक में उस ने तुम में अपनी हवस पूरी की इच्छा की संभावना तलाश ली होगी. और जब तुम ने उस की सोने की महंगी अंगूठी स्वीकार कर ली तब वह पक्का हो गया कि अब तुम उस के जाल में आसानी से फंस सकती हो.

‘‘फिर वही हुआ, अपने पैसे का उस ने भरपूर इस्तेमाल किया और तुम पर बेतहाशा खर्च किया, जिस के नीचे तुम्हारा विवेक भी मर गया. तुम्हारी समझ कुंठित हो गई और तुम ने अपनी जिंदगी का सब से बड़ा धन गंवा दिया, जिसे कुंआरापन कहते हैं.’’

माधुरी के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं.

‘‘बोल तृप्ति बोल, अपने मन की बात खुल कर मेरे सामने रख,’’ माधुरी उत्सुकता से उस की बातें सुन रही थी.

‘‘माधुरी, अब जिस सैक्स सुख के लिए मर्द शादी तक इंतजार करता है, वही उसे उस के पहले ही मिल जाए और उसे यह विश्वास हो जाए कि अपने पैसों से तुम्हारी जैसी लड़कियों को आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है, तो वह अपनी पत्नी को तलाक देने और दूसरी से शादी करने का ?ां?ाट क्यों मोल लेगा?

‘‘फिर वह अच्छी तरह जानता है कि उस की पत्नी की बदौलत ही उस के पास इतनी दौलत है और उसे तलाक देते ही उस को इस जायदाद से हाथ धोना पड़ जाएगा. मुकदमे का झंझंट होगा, सो अलग.

‘‘मुझे तो लगता है, तुम किसी बड़ी साजिश की शिकार होने वाली हो. तुम से उस का मन भर गया है. अब वह तुम्हें अपने दोस्त को सौंपना चाहता है.’’

‘‘नहींनहीं…’’ अचानक माधुरी के मुंह से चीख सी निकली.

‘‘पर, इस सब में केवल सौरभ ही कुसूरवार नहीं है, तुम भी हो. तुम ने क्या सोच कर अंगूठी अपने जीजाजी और मां से छिपाई.

‘‘जीजाजी के सामने ही क्यों नहीं कहा कि सौरभ, यह अंगूठी तुम्हें उपहार में दे रहा है. मां को भी क्यों नहीं बताया कि लाख मना करने पर भी सौरभ ने अंगूठी नहीं ली.

‘‘अगर तुम ने ऐसा किया होता तो फिर सौरभ समझ जाता कि उस ने गलत जगह अपनी गोटी डाली है और वह आगे बात न बढ़ाता. जवानी और पैसे के लालच में तुम्हारी मति मारी गई थी. तुम गलत को सही और सही को गलत समझाने लगी थी.

‘‘तुम्हारी मां गहनों में छूट चाहती थीं. हर ग्राहक की चाहत सस्ता खरीदने की होती है, उन की भी थी. लेकिन वे नाजायज कुछ नहीं चाहती थीं. उन्होंने धूप में अपने बाल सफेद नहीं किए हैं. उन को सौरभ की अंगूठी देने के पीछे की मंशा पता चल गई थी, इसीलिए ऐसे लोगों से दूर रहने की सलाह दी थी.

‘‘अब तुम्हारी शादी जिस लड़के से तय हुई है, तुम उस से बात करती. उस के स्वभाव, व्यवहार और चरित्र का पता लगाती. अगर पसंद नहीं आता तो साफ इनकार कर देती. यह एक सही कदम होता. इस के लिए कई लोग तुम्हारी मदद में आगे आ जाते. तुम्हारा आत्मविश्वास बना रहता और मनोबल भी ऊंचा रहता.’’

माधुरी बोली, ‘‘एक गिलास पानी पिला तृप्ति. अब मैं सब समझ गई हूं. कल घर लौट जाऊंगी. मां से बोल दूंगी, आगे की पढ़ाई के लिए सम?ाने मैं तृप्ति के पास आई थी. मां पूछेंगी तो तुम भी यही कह देना.’’

तृप्ति ने कहा, ‘‘कल सुबह मैं चाची को फोन कर के बता दूंगी. सौरभ को अभी तुम बोल दो. अभी वह भी सोया न होगा. बनारस आने की तैयारी में लगा होगा. उस से कहो कि मैं अब गांव लौट रही हूं. मांबाबूजी का दिल दुखाना नहीं चाहती. तुम्हारा घर तोड़ कर किसी की आह नहीं लेना चाहती.

‘‘मुझे पूरा भरोसा है कि सौरभ खुश होगा कि बला उस के सिर से टलेगी.’’

तृप्ति ने सच ही कहा था. सौरभ अभी जाग रहा था और थोड़ी देर पहले ही मुंबई वाले अपने दोस्त से कहा था, ‘यार, अब इस बला को तुम संभालो. वह सुंदर है. खर्च करोगे तो तुम्हारी हो जाएगी. जब मन भर जाएगा तो कुछ दे कर उस के गांव वाली ट्रेन पर बिठा देना. अब मुझे एक दूसरी मिल गई है.’

सौरभ ने एक छोटा सा जवाब दिया था, ‘जैसी तुम्हारी इच्छा. मैं रिजर्वेशन कैंसिल करा देता हूं.’

माधुरी का मन अब हलका था, ‘‘तृप्ति, अब एक काम और कर दे. कल क्यों आज ही घर में फोन कर दे. अभी रात के 12 बजे हैं. मांबाबूजी बहुत चिंतित होंगे. मैं चुपके से यहां आ गई हूं.’’

‘‘अच्छा, बोलती हूं…’’ तृप्ति माधुरी की मां को समझ रही थी, ‘‘चिंता न करें आंटीजी. माधुरी मेरे पास आ गई है. वह आगे पढ़ना चाहती है. आप ने उस को घर से निकलने पर बंदिश लगा दी थी न, इसलिए… हां, उसे बता कर निकलना चाहिए था… अच्छा प्रणाम, माधुरी सो गई है, कल सुबह बात कर लेगी.’’

फोन कट गया. माधुरी को अपने किए पर पछतावा तो था, पर आगे साजिश में फंसने से बच जाने की खुशी भी थी. साथ ही, अपनी सहेली तृप्ति पर गर्व भी था. दोनों सहेलियां बात करतेकरते सो गईं.

सन्नाटा: आखिर कौन समझ सकता था वृद्ध दंपती की व्यथा को?

इस वृद्ध दंपती का यह 5वां नौकर सुखलाल भी काम छोड़ कर चला गया. अब वे फिर से असहाय हो गए. नौकर के चले जाने से घर का सन्नाटा और भी बढ़ गया. नौकर था तो वह इस सन्नाटे को अपनी मौजूदगी से भंग करता रहता था. काम करते-करते कोई गाना गुन-गुनाता रहता था. मुंह से सीटी बजाता रहता था. काम से फारिग हो जाने पर टीवी देखता रहता था. बाहर गैलरी में खड़े हो कर सड़क का नजारा देखने लगता था. उस की उपस्थिति का एहसास इस वृद्ध दंपती को होता रहता था. उन के जीवन की एकरसता इस के कारण ही भंग होती थी, इसीलिए वे आंखें फाड़फाड़ कर उसे देखते रहते थे. दोनों जब तब नौकर से बतियाने का प्रयास भी करते रहते थे.

दोनों ऊंचा सुनते थे, लिहाजा, आपस में बातचीत कम ही कर पाते थे. संकेतों से ही काम चलाते थे. इसी कारण आधीअधूरी बातें ही हो पाती थीं.

जब कभी वे आधीअधूरी बात सुन कर कुछ का कुछ जवाब दे देते थे तो नौकर की मुसकराहट या हंसी फूट पड़ती थी. तब वे समझ जाते थे कि उन्होंने कुछ गलत बोल दिया है. उन्हें अपनी गलती पर हंसी आती थी. इस तरह घर के भीतर का सन्नाटा कुछ क्षणों के लिए भंग हो जाता था.

मगर अब नौकर के चले जाने से यह क्षण भी दुर्लभ हो गए. बाहर का सन्नाटा बोझिल हो गया. अपनी असहाय स्थिति पर वे दुखी होने लगे. इस दुख ने भीतर के सन्नाटे को और भी बढ़ा दिया. इस नौकर ने काम छोड़ने के जो कारण बताए उस से इन की व्यथा और भी बढ़ गई. उन्हें अफसोस हुआ कि सुखलाल के लिए इस घर का वातावरण इतना असहनीय हो गया कि वह 17 दिन में ही चला गया.

वृद्ध दंपती को अफसोस के साथसाथ आश्चर्य भी हुआ कि मांगीबाई तो इस माहौल में 7-8 साल तक बनी रही. उस ने तो कभी कोई शिकायत नहीं की. वह तो इस माहौल का एक तरह से अंग बन गई थी. इस छोकरे सुखलाल का ही यहां दम घुटने लगा.

सुखलाल से पहले आए 4 नौकरों ने भी इस घर के माहौल की कभी कोई शिकायत नहीं की. वे अन्य कारणों से काम छोड़ कर चले गए. मांगीबाई के निधन के बाद उन्हें सब से पहले आई छोकरी को चोर होने के कारण हटाना पड़ा था. उस के बाद आई पार्वतीबाई को दूसरी जगह ज्यादा पैसे में काम मिल गया था, इसलिए उस ने क्षमायाचना करते हुए यहां का काम त्यागा था.

पार्वतीबाई के बाद आई हेमा कामचोर और लापरवाह निकली थी. बारबार की टोकाटाकी से लज्जित हो कर वह चली गई थी. इस के बाद आया वह भील युवक जो यहां आ कर खुश हुआ था. उसे यह घर बहुत अच्छा लगा था. पक्का मकान, गद्देदार बिस्तर, अच्छी चाय, अच्छा भोजन आदि पा कर वह अपनी नियति को सराहता रहा था. उस ने वृद्ध दंपती की अपने मातापिता की तरह बड़े मन से सेवा की थी. पुलिस में चयन हो जाने की सूचना उसे यदि नहीं मिलती तो वह घर छोड़ कर कभी नहीं जाता. वह विवशता में गया था.

उस के बाद आया यह सुखलाल, यहां आ कर दुखीलाल बन गया. 17 दिन बाद एक दिन भी यहां गुजारना उसे असहनीय लगा. 14-15 साल का किशोर होते हुए भी वह छोटे बच्चों की तरह रोने लगा था. रोरो कर बस, यही विनती कर रहा था कि उसे अपने घर जाने दिया जाए.

दंपती हैरान हुए थे कि इसे एकाएक यह क्या हो गया. यह रस्सी तुड़ाने जैसा आचरण क्यों करने लगा? इसीलिए उन्होंने पूछा था, ‘‘बात क्या है? रो क्यों रहा है?’’

इस के उत्तर में सुखलाल बस, यही कहता रहा था, ‘‘मुझे जाने दीजिए, मालिक. मुझ से यहां नहीं रहा जाएगा.’’

तब प्रश्न हुआ था, ‘‘क्यों नहीं रहा जाएगा? यहां क्या तकलीफ है?’’

सुखलाल ने हाथ जोड़ कर कहा था, ‘‘कोई तकलीफ नहीं है, मालिक. यहां हर बात की सुविधा है, सुख है. जो सुख मैं ने अभी तक भोगा नहीं था वह यहां मिला मुझे. अच्छा खानापीना, पहनना सबकुछ एक नंबर. चमचम चमकता मकान, गद्देदार पलंग और सोफे. रंगीन टीवी, फुहारे से नहाने का मजा. ऐसा सुख जो मेरी सात पीढि़यों ने भी नहीं भोगा, वह मैं ने भोगा. तकलीफ का नाम नहीं, मालिक.’’

‘‘तो फिर तुझ से यहां रहा क्यों नहीं जा रहा है? यहां से भाग क्यों रहा है?’’

‘‘मन नहीं लगता है यहां?’’

‘‘क्यों नहीं लगता है?’’

‘‘घर की याद सताती है. मैं अपने परिवार से कभी दूर रहा नहीं, इसलिए?’’

‘‘मन को मार सुखलाल?’’ वृद्ध दंपती ने समझाने की पूरी कोशिश की थी.

‘‘यह मेरे वश की बात नहीं है, मालकिन.’’

‘‘तो फिर किस के वश की है?’’

इस प्रश्न का उत्तर सुखलाल दे न पाया था. वह एकटक उन्हें देखता रहा था. जब इस बारे में उसे और कुरेदा गया था तो वह फिर रोने लगा था. रोतेरोते ही विनती करने लगा था, ‘‘आप तो मुझे बस, जाने दीजिए. अपने मन की बात मैं समझा नहीं पा रहा हूं.’’

वृद्ध दंपती ने इस जिरह से तंग आ कर कह दिया था, ‘‘तो जा, तुझे हम ने बांध कर थोड़े ही रखा है.’’

सुखलाल ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा था, ‘‘जाऊं? आप की इजाजत है?’’

‘‘हां सुखलाल, हां. हम तुझे यहां रहने के लिए मजबूर तो नहीं कर सकते?’’

सुखलाल का चेहरा खिल उठा. वह अपना सामान समेटने लगा था. इस बीच वृद्ध दंपती ने उस का हिसाब कर दिया था. वह अपना झोला ले कर उन के पास आया तो उन्होंने हिसाब की रकम उस की ओर बढ़ाते हुए कहा था, ‘‘ले.’’

सुखलाल ने यह रकम अपनी जेब में रख कर अपना झोला दंपती के सामने फैलाते हुए कहा था, ‘‘देख लीजिए,’’ मगर वृद्ध दंपती ने इनकार में हाथ हिला दिए थे.

सुखलाल ने दोनों के चरणस्पर्श कर भर्राए स्वर में कहा था, ‘‘मुझे माफ कर देना, मालिक. आप लोगों को यों छोड़ कर जाते हुए मुझे दुख हो रहा है, पर करूं भी क्या?’’ इतना कह कर वह फर्श पर बैठते हुए हाथ जोड़ कर बोला था, ‘‘एक विनती और है?’’

‘‘क्या…बोलो?’’

‘‘बड़े साहब से मेरी शिकायत मत करिएगा वरना मेरे मांबाप आदि की नौकरी खतरे में पड़ जाएगी. इतनी दया हम पर करना.’’

बड़े साहब से सुखलाल का आशय वृद्धा के भाई फारेस्ट रेंजर से था. वही अपने विश्वसनीय नौकर भिजवाता रहा था. उसी ने ही इस सुखलाल को भी नर्सरी में परख कर भिजवाया था. वह अपने परिवार के साथ वहीं काम कर रहा था.

वृद्ध दंपती से कोई आश्वासन न मिलने पर वह फिर गिड़गिड़ाया था, ‘‘बड़े साहब के डर के कारण ही इतने दिन मैं ने यहां काटे हैं. वरना मैं 2-4 दिन पहले ही चल देता. मेरा मन तो तभी से उखड़ गया था.’’

‘‘मन क्यों उखड़ गया था?’’

तब सुखलाल आलथीपालथी मार कर इतमीनान से बैठते हुए बोला था, ‘‘मन उखड़ने का खास कारण था यहां का सन्नाटा, घर के भीतर का सन्नाटा. यह सन्नाटा मेरे लिए अनोखा था क्योंकि मैं भरेपूरे परिवार का हूं, मेरे घर में हमेशा हाट बाजार की तरह शोरगुल मचा रहता है.

‘‘मगर यहां तो मरघट जैसे सन्नाटे से मेरा वास्ता पड़ा. हमेशा सन्नाटा. किसी से बातें करने तक की सुविधा नहीं. आप दोनों बहरे, इस कारण आप से भी बातें नहीं कर पाता था. अभी की तरह जोरजोर से बोल कर काम लायक बातें ही हो पाती थीं, इसीलिए मेरा दम जैसे घुटने लगता था. मैं बातूनी प्रवृत्ति का हूं. मगर यहां मुझे जैसे मौन व्रत साधना पड़ा, इसीलिए यह सन्नाटा मुझे जैसे डसने लगा.

‘‘मुझे ऐसा लगने लगा कि जैसे मैं किसी पिंजरे में बंद कर दिया गया हूं. इसीलिए मेरा मन यहां लगा नहीं. मेरा घर मुझे चुंबक की तरह खींचने लगा. आप दोनों को जब तब इस छोटी गैलरी में बैठ कर सामने सड़क की ओर ताकते देख कर मुझे पिंजरे के पंछी याद आने लगे. इस पिंजरे से बाहर जाने को मैं छटपटाने लगा. मेरा मन बेचैन हो गया. इसीलिए आप से यह विनती करनी पड़ी. मेरे मन की दशा बड़े साहब को समझा देना. मैं बड़े भारी मन से जा रहा हूं.’’

छोटे मुंह बड़ी बातें सुन कर वृद्ध दंपती चकित थे. उन्हें आश्चर्य हुआ था कि साधारण, दुबलेपतले इस किशोर की मूंछें अभी उग ही रही हैं मगर इस ने उन की व्यथा को मात्र 17 दिन में ही समझ लिया. गैलरी में बैठ कर हसरत भरी निगाहों से सामने सड़क पर बहते जीवन के प्रवाह को निहारने के उन के दर्द को भी वह छोकरा समझ गया, इसीलिए उन का मन हुआ था कि इस समझदार लड़के से कहें कि तू ने पिंजरे के पंछी वाली जो बात कही वह बिलकुल सही है. हम सच में पिंजरे के पंछी जैसे ही हो गए हैं. शारीरिक अक्षमता ने हमें इस स्थिति में ला दिया.

शारीरिक अक्षमता से पहले हम भी जीवन के प्रवाह के अंग थे, अब दर्शक भर हो गए. शारीरिक अक्षमता ने हमें गैलरी में बिठा कर जीवन के प्रवाह को हसरत भरी नजरों से देखते रहने के लिए विवश कर दिया. सामने सड़क पर जीवन को अठखेलियां करते, मस्ती से झूमते, फुदकते एवं इसी तरह अन्य क्रियाएं करते देख हमारे भीतर हूक सी उठती है. अपनी अक्षमता कचोटती है. हमारी शारीरिक अकर्मण्यता हमारी हथकड़ी, बेड़ी बन गई. पिंजरा बन गई. हम चहचहाना भूल गए.

वृद्ध दंपती का मन हो रहा था कि वे सुखलाल से कहें कि हाथपांव होते हुए भी वे हाथपांवविहीन से हो गए. बल्कि जैसे पराश्रित हो गए. पाजामे का नाड़ा बांधना, कमीज के बटन लगाना, खोलना, शीशी का ढक्कन खोलना, पैंट की बेल्ट कसना, अखबार के पन्ने पलटना, शेव करना, नाखून काटना, नहाना, पीठ पर साबुन मलना जैसे साधारण काम भी उन के लिए कठिन हो गए. घूमनाफिरना दूभर हो गया. हाथपांव के कंपन ने उन्हें लाचार कर दिया.

भील युवक ने उन की लाचारी समझ कर उन्हें हर काम में सहायता देना शुरू किया था. वह उन के नाखून काटने लगा था. शेव में सहायता करने लगा था. कपड़े पहनाने लगा था. बिना कहे ही वह उन की जरूरत को समझ लेता था. समझदार युवक था. ऐसी असमर्थता ने जीवन दूभर कर दिया है.

वृद्धा के मन में भी हिलोर उठी थी कि इस सहृदय किशोर को अपनी व्यथा से परिचित कराए. इसे बतलाए कि डायबिटीज की मरीज हो जाने से वह गठिया, हार्ट, ब्लडप्रेशर आदि रोगों से ग्रसित हो गई. उस की चाल बदल गई. टांगें फैला कर चलने लगी. एक कदम चलना भी मुश्किल हो गया. फीकी चाय, परहेजी खाना लेना पड़ गया. खानेपीने की शौकीन को इन वर्जनाओं में जीना पड़ रहा है. फिर भी जब तब ब्लड में शुगर की मात्रा बढ़ ही जाती है. मौत सिर पर मंडराती सी लगती है. परकटे पंछी जैसी हो गई है वह. पिंजरे के पंछी पिंजरे में पंख तो फड़फड़ा लेते हैं मगर उस में तो इतनी क्षमता भी नहीं रही.

मगर दोनों ने अपने मन का यह गुबार सुखलाल को नहीं बताया. वे मन की बात मन में ही दबाए रहे. सुखलाल से तो वह इतना ही कह पाए, ‘‘हम रेंजर साहब से तुम्हारी शिकायत नहीं करेंगे, बल्कि तुम्हारी सिफारिश करेंगे. तुम निश्चिंत हो कर जाओ. हम उन से कहेंगे कि तुम्हें आगे पढ़ाया जाए.’’

सुखलाल की बांछें खिल उठी थीं. वह खुशी से झूमता हुआ चल पड़ा था. जातेजाते उस ने वृद्ध दंपती के चरण स्पर्श किए थे. बाहर सड़क पर से उस ने गैलरी में आ खड़े हुए दंपती को ‘टाटा’  किया था. उन्होंने भी ‘टाटा’ का जवाब हाथ हिला कर ‘टाटा’ में दिया था. वे आंखें फाड़फाड़ कर दूर जाते हुए सुखलाल को देखते रहे. उन्हें वही प्रसन्नता हुई थी जैसे पिंजरे के पंछी को आजाद हो कर मुक्त गगन में उड़ने पर होती है.

लेखक- चंद्रशेखर दुबे

टूटे कांच की चमक : मैट्रो में लगी नई फिल्म

उस बिल्डिंग में वह हमारा पहला दिन था. थकान की वजह से सब का बुरा हाल था. हम लोग व्यवस्थित होने की कोशिश में थे कि घंटी बजी. दरवाजा खोल कर देखा तो सामने एक महिला खड़ी थीं.

अपना परिचय देते हुए वह बोलीं, ‘‘मेरा नाम नीलिमा है. आप के सामने वाले फ्लैट में रहती हूं्. आप नएनए आए हैं, यदि किसी चीज की जरूरत हो तो बेहिचक कहिएगा.

मैं ने नीचे से ऊपर तक उन्हें देखा. माथे पर लगी गोल बड़ी सी बिंदी, साड़ी का सीधा पल्ला, लंबा कद, भरा बदन उन के संभ्रांत होने का परिचय दे रहा था.

कुछ ही देर बाद उन की बाई आई और चाय की केतली के साथ नाश्ते की ट्रे भी रख गई. सचमुच उस समय मुझे बेहद राहत सी महसूस हुई थी.

‘‘आज रात का डिनर आप लोग हमारे साथ कीजिए.’’

मेरे मना करने पर भी नीलिमाजी आग्रहपूर्वक बोलीं, ‘‘देखिए, आप के लिए मैं कुछ विशेष तो बना नहीं रही हूं, जो दालरोटी हम खाते हैं वही आप को भी खिलाएंगे.’’

रात्रि भोज पर नीलिमाजी ने कई तरह के स्वादिष्ठ पकवानों से मेज सजा दी. राजमा, चावल, दहीबड़े, आलू, गोभी और न जाने क्याक्या.

‘‘तो इस भोजन को आप दालरोटी कहती हैं?’’ मैं ने मजाकिया स्वर में नीलिमा से पूछा तो वह हंस दी थीं.

जवाब उन के पति प्रो. रमाकांतजी ने दिया, ‘‘आप के बहाने आज मुझे भी अच्छा भोजन मिला वरना सच में, दालरोटी से ही गुजारा करना पड़ता है.’’

लौटते समय नीलिमाजी ने 2 फोल्ंिडग चारपाई और गद्दे भी भिजवा दिए. हम दोनों पतिपत्नी इस के लिए उन्हें मना ही करते रहे पर उन्होंने हमारी एक न चलने दी.

अगली सुबह, रवि दफ्तर जाते समय सोनल को भी साथ ले गए. स्कूल में दाखिले के साथ, नए गैस कनेक्शन, राशन कार्ड जैसे कई छोटेछोटे काम थे, जो वह एकसाथ निबटाना चाह रहे थे. ब्रीफकेस ले कर रवि जैसे ही बाहर निकले नीलिमाजी से भेंट हो गई. उन के हाथ में एक परची थी. रवि को हाथ में देते हुए बोलीं, ‘‘भाई साहब, कल रात मैं आप को अपना टेलीफोन नंबर देना भूल गई थी. जब तक आप को फोन कनेक्शन मिले, आप मेरा फोन इस्तेमाल कर सकते हैं.’’

नीलिमाजी ने 2 दिन में काम वाली बाई और अखबार वाले का इंतजाम भी कर दिया. जब घर सेट हो गया तब भी नीलिमा को जब भी समय मिलता आ कर बैठ जातीं. सड़क के आरपार के समाचारों का आदानप्रदान करते उन्हें देख मैं ने सहजता से अनुमान लगा लिया था कि उन्होंने महिलाओं से अच्छाखासा संपर्क बना रखा है.

उस समय मैं सामान का कार्टन खोल रही थी कि अचानक उंगली में पेचकस लगने से मेरे मुंह से चीख निकल गई तो नीलिमाजी मेरे पास सरक आई थीं. उंगली से खून निकलता देख कर वह अपने घर से कुछ दवाइयां और पट्टी ले आईं और मेरी चोट पर बांधते हुए बोलीं, ‘‘जो काम पुरुषों का है वह तुम क्यों करती हो. यह सोनल क्या करता रहता है पूरा दिन?’’

नीलिमा दीदी का तेज स्वर सुन कर सोनल कांप उठा. बेचारा, वैसे ही मेरी चोट को देख कर घबरा रहा था. जब तक मैं कुछ कहती, उन्होंने लगभग डांटते हुए सोनल को समझाया, ‘‘मां का हाथ बंटाया करो. ये कहां की अक्लमंदी है कि बच्चे आराम फरमाते रहें और मां काम करती रहे.’’

सोनल अपने आंसू दबाता हुआ घर के अंदर चला गया. मैं अपने बेटे की उदासी कैसे सहती. अत: बोली, ‘‘दीदी, सोनल मेरी बहुत मदद करता है पर आजकल इंटरव्यू की तैयारी में व्यस्त है.’’

‘‘इंटरव्यू, कैसा इंटरव्यू?’’

‘‘दरअसल, इसे दूसरे स्कूलों में ही दाखिला मिल रहा है. लेकिन हम चाहते हैं कि इसे ‘माउंट मेरी’ स्कूल में ही दाखिला मिले.’’

‘‘क्यों? माउंट मेरी स्कूल में कोई खास बात है क्या?’’ नीलिमा ने भौंहें उचका कर पूछा तो मुझे अच्छा नहीं लगा था. अपने घर किसी पड़ोसी का हस्तक्षेप उस समय मुझे बुरी तरह खल गया था.

बात को स्पष्ट करने के लिए मैं ने कहा, ‘‘यह स्कूल इस समय नंबर वन पर है. यहां आई.आई.टी. और मेडिकल की कोचिंग भी छात्रों को मिलती है.’’

‘‘अजी, स्कूल के नाम से कुछ नहीं होता,’’ नीलिमा बोलीं, ‘‘पढ़ने वाले बच्चे कहीं भी पढ़ लेते हैं.’’

‘‘यह तो है फिर भी स्कूल पर काफी कुछ निर्भर करता है. कुशाग्र बुद्धि वाले बच्चों को अच्छी प्रतिस्पर्धा मिले तो वे सफलता के सोपान चढ़ते चले जाते हैं.’’

‘‘लेकिन इतना याद रखना सविता, इन्हीं स्कूलों के बच्चे ड्रग एडिक्ट भी होते हैं. कुछ तो असामाजिक गतिविधियों में भी भाग लेते देखे गए हैं,’’ इतना कहतेकहते नीलिमा हांफने लगी थीं.

खैर, जैसेतैसे मैं ने उन्हें विदा किया.

नीलिमा की जरूरत से ज्यादा आवाजाही और मेरे घरेलू मामले में दखलंदाजी अब मुझे खलने लगी थी. कई बार सुना था कि पड़ोसिनें दूसरे के घर में घुस कर पहले तो दोस्ती करती हैं, बातें कुरेदकुरेद कर पूछती हैं फिर उन्हें झगड़े में तबदील करते देर नहीं लगती.

एक दिन मैं और पड़ोसिन ममता एक साथ कमरे में बैठे थे. तभी नीलिमा आ गईं और बोलीं, ‘‘यह तुम्हारा पंखा बहुत आवाज करता है, कैसे सो पाती हो?’’

यह कह कर वह अपने घर गईं और टेबल फैन उठा कर ले आईं.

‘‘कल ही मिस्तरी को बुलवा कर पंखा ठीक करवा लो. तब तक इस टेबल फैन से काम चला लेना.’’

पड़ोसिन ममता के सामने उन की यह बेवजह की घुसपैठ मुझे अच्छी नहीं लगी थी. रवि दफ्तर के काम में बेहद व्यस्त थे इसलिए इन छोटेछोटे कामों के लिए समय नहीं निकाल पा रहे थे. सोनल भी ‘माउंट मेरी स्कूल’ के पाठ्यक्रम के  साथ खुद को स्थापित करने में कुछ परेशानियों का सामना कर रहा था, मिस्तरी कहां से बुलाता? मैं भी इस ओर विशेष ध्यान नहीं दे पाई थी. मैं ने उन्हें धन्यवाद दिया और एक प्याली चाय बना कर ले आई.

चाय की चुस्कियों के बीच उन्होंने टटोलती सी नजर चारों ओर फेंक कर पूछा, ‘‘सोनल कहां है?’’

‘‘स्कूल में ही रुक गया है. कालिज की लाइब्रेरी में बैठ कर पढे़गा. आ जाएगा 4 बजे तक .’’

नीलिमा के चेहरे पर चिंता की आड़ीतिरछी रेखाएं उभर आईं. कभी घड़ी की तरफ  देखतीं तो कभी मेरी तरफ. लगभग सवा 4 बजे सोनल लौटा और किताबें अपने कमरे में रख कर बाथरूम में घुस गया. मैं ने तब तक दूध गरम कर के मेज पर रख दिया था.

नए कपड़ों में सोनल को देख कर नीलिमाजी ने मुझ से प्रश्न किया, ‘‘सोनल कहीं जा रहा है?’’

‘‘हां, इस के एक दोस्त का आज जन्मदिन है, उसी पार्टी में जा रहा है.’’

सोनल घर से बाहर निकला तो बुरा सा मुंह बना कर बोलीं, ‘‘सविता, जमाना बड़ा खराब है. लड़का कहां जाता है, क्या करता है, इस की संगत कैसी है आदि बातों का ध्यान रखा करो. अपना बच्चा चाहे बुरा न हो लेकिन दूसरे तो बिगाड़ने में देर नहीं करते.’’

नीलिमा की आएदिन की टीका- टिप्पणी के कारण सोनल अब उन से चिढ़ने लगा था. उन के आते ही उठ कर चला जाता. मुझे भी उन की जरूरत से ज्यादा घुसपैठ अच्छी नहीं लगती थी, किंतु उन के सहृदयी, स्नेही स्वभाव के कारण विवश हो जाती थी.

धीरेधीरे, मैं ने अपने घर का दरवाजा बंद रखना शुरू कर दिया. घर के  अंदर घंटी बंद करने का स्विच और लगवा लिया. अब जब भी दरवाजे पर घंटी बजती मैं ‘आईहोल’ में से झांकती. अगर नीलिमा होतीं तो मैं घंटी को कुछ देर के लिए अनसुनी कर देती और यह समझ कर कि घर के अंदर कोई नहीं है, वह लौट जातीं.

काफी राहत सी महसूस होने लगी थी मुझे. कई आधेअधूरे काम निबट गए. कुछ लिखनेपढ़ने का समय भी मिलने लगा. सोनल भी अब खुश रहता था. पढ़ने के बाद जो भी थोड़ाबहुत समय मिलता वह मेरे पास बैठ कर बिताता. शाम को जब रवि दफ्तर से लौटते, हम नीचे जा कर बैठ जाते. कुछ नए लोगों से जानपहचान बढ़ी, कुछ नए मित्र भी बने.

उन्हीं दिनों मैट्रो में एक नई फिल्म लगी थी. हम दोनों पतिपत्नी पिक्चर गए थे, बरसों बाद.

अचानक, रवि के मोबाइल की घंटी बजी. नीलिमाजी थीं. बदहवास, परेशान सी बोलीं, ‘‘भाई साहब, आप जहां भी हैं जल्दी घर आ जाइए. आप के घर का ताला तोड़ कर चोरी करने का प्रयास किया गया है.’’

धक्क से रह गया दिल. पिक्चर आधे में ही छोड़ कर दौड़तीभागती मैं घर की सीढि़यां चढ़ गई थी. रवि गाड़ी पार्क कर रहे थे. दरवाजे पर ही रमाकांतजी मिल गए. बोले, ‘‘घबराने की कोई बात नहीं है, भाभीजी. हम ने चोर को पकड़ कर अपने घर में बंद कर रखा है. पुलिस के आते ही उस लड़के को हम उन के हवाले कर देंगे.’’

मैं ने बदहवासी में दरवाजा खोला. अलमारी खुली हुई थी. कैमरा, वाकमैन, घड़ी के साथ और भी कई छोटीछोटी चीजें थैले में डाल दी गई थीं. लाकर को भी चोर ने हथौड़े से तोड़ने का प्रयास किया था पर सफल नहीं हो पाया था. एक दिन पहले ही रवि के एक मित्र की शादी में पहनने के लिए मैं बैंक से सारे गहने निकलवा कर लाई थी. कुछ नगदी भी घर में पड़ी थी. अगर नीलिमा ने समय पर बचाव न किया होता तो आज अनर्थ ही हो जाता.

मैंऔर रवि कुछ क्षण बाद जब नीलिमा के घर पहुंचे तो वह उस चोर लड़के को बुरी तरह मार रही थीं. रमाकांतजी ने पत्नी के चंगुल से उस लड़के को छुड़ाया, फिर बोले, ‘‘जान से ही मार डालोगी क्या इसे?’’ तब नीलिमा गुस्से में बोली थीं, ‘‘कम्बख्त, पैदा होते ही मर क्यों नहीं गया.’’

कुछ ही देर में पुलिस आ गई और उस लड़के को पकड़ कर अपने साथ ले गई. हम सब के चेहरे पर राहत के भाव उभर आए थे.

इस के बाद ही पसीने से लथपथ नीलिमा के सीने में तेज दर्द उठा तो सब उन्हें सिटी अस्पताल ले गए. डाक्टरों ने बताया कि हार्ट अटैक है. 3 दिन और 2 रातों के  बाद उन्हें होश आया. जिस दिन उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज होना था हम पतिपत्नी सुबह ही अस्पताल पहुंच गए थे. डाक्टरों ने हमें समझाया कि इन्हें हर प्रकार के टेंशन से दूर रहना होगा. जरा सा रक्तचाप बढ़ा तो दोबारा हार्टअटैक पड़ सकता है.

रमाकांतजी कुरसी पर बैठे एकटक पत्नी को देखे जा रहे थे. अचानक उन का गला भर आया. वे कांपते स्वर में बोले, ‘‘जिस के दिल में, ज्ंिदगी भर का नासूर पल रहा हो वह भला टेंशन से कैसे दूर रह सकता है. सविताजी, जिस लड़के ने आप के घर का ताला तोड़ कर चोरी करने का प्रयास किया वह हमारा बेटा था.’’

विश्वास नहीं हुआ था अपने कानों पर. लोगों को शिक्षित करने वाले रमाकांतजी और पूरे महल्ले की हितैषी नीलिमा का बेटा चोर, जो खुद के स्नेह से सब को स्ंिचित करती रहती थीं उन का अपना बेटा अपराधी?

रमाकांतजी ने बताया, ‘‘दरअसल, नीलिमा ने आप लोगों को कार में बिल्ंिडग से बाहर जाते हुए देख लिया था. कोई आधा घंटा भी नहीं बीता होगा, जब दूध ले कर लौट रही थीं कि आप के घर का ताला नदारद था और दरवाजा अंदर से बंद था. पहले नीलिमा ने सोचा कि शायद आप लोग लौट आए हैं लेकिन जब खटखट का स्वर सुनाई दिया तो उन्हें शक हुआ. धीरे से उन्होंने दरवाजा बाहर से बंद किया और चौकीदार को बुला लाई. थोड़ी देर में चौकीदार की सहायता से चोर को अपने घर में बंद कर दिया और फोन कर पुलिस को सूचित भी कर दिया.’’

हतप्रभ से हम पतिपत्नी एकदूसरे का चेहरा देखते तो कभी रमाकांतजी के चेहरे पर उतरतेचढ़ते हावभावों को पढ़ने का प्रयास करते.

‘‘शहर के सब से अच्छे स्कूल ‘माउंट मेरी कानवेंट’ में हम ने अपने बेटे का दाखिला करवाया था,’’ टूटतेबिखरते स्वर में रमाकांत बताने लगे, ‘‘इकलौती संतान से हमें भी ढेरों उम्मीदें थीं. यही सोचते थे कि हमारा बेटा भी होनहार निकलेगा. पर वह बुरी संगत में फंस गया. हम दोनों पतिपत्नी समझते थे कि वह स्कूल गया है पर वह स्कूल नहीं, अपने दोस्तों के पास जाता था. स्कूल से शिकायतें आईं तो डांटफटकार शुरू की, मारपीट का सिलसिला चला पर सब बेकार गया. उसे तो चरस की ऐसी लत लगी कि पहले अपने घर से पैसे चुराता, फिर पड़ोसियों के घरों में चोरी करने लगा. लोग हम से शिकायतें करने लगे तो हम ने स्पष्ट शब्दों में सब से कह दिया कि ऐसी नालायक औलाद से हमारा कोई संबंध नहीं है.’’

सहसा मुझे याद आया वह दिन जब निर्मला ने स्कूल के मुद्दे को छेड़ कर मुझ से कितनी बहस की थी. मेरे सोनल में शायद वह अपने बेटे की छवि देखती होंगी. तभी तो समयअसमय आ कर सलाहमशविरा दे जाती थीं. यह सोचते ही मेरी आंखों की कोर से टपटप आंसू टपक पड़े.

निर्मला की तांकनेझांकने की आदत से मैं कितना परेशान रहती थी. यही सोचती थी कि इन का अपने घर में मन नहीं लगता पर आज असलियत जान कर पता चला कि जब अपना ही खून अपने अस्तित्व को नकारते हुए बगावत का झंडा खड़ा कर बीच बाजार में इज्जत नीलाम कर दे तो कैसा महसूस होता होगा अभिभावकों को?

सच, व्यक्तित्व तो दर्पण की तरह होता है. जहां तक नजर देख पाती है उतना ही सत्य हम पहचानते हैं, शीशे के पीछे पारे की पालिश तक कौन देख सकता है? काश, नीलिमा की प्रतिछवि को पार कर कांच की चमक के पीछे दरकती गर्द की चुभन को मैं ने पहचाना होता पर अब भी देर नहीं हुई थी. वह मेरे लिए पड़ोसिन ही नहीं, आदरणीय बहन भी बन गई थीं.

हियरिंग ऐड : क्या सालों बाद भी माया ने किया उसका इंतजार

फूलों सी नाजुक उस लड़की से कोई तो रिश्ता है मेरा वरना उसे देखते ही दिल
इतना बेचैन क्यों होता है? उस की आंखों में मैं अपना अक्स क्यों ढूंढने
लगता हूं ? एक अजनबी लड़की के होठों से अपना नाम क्यों सुनना चाहता हूं ?
मेरा दिल कह रहा था एक बार उस से अपने दिल की बात कह दूं. मैं मौके की
तलाश में था.

उस दिन वह कॉलेज कैंटीन में अकेली बैठी कुछ पढ़ रही थी. कैंटीन उस वक्त
खाली सा था. मैं उस के सामने वाली चेयर पर जा कर बैठ गया और गला साफ करते
हुए कुछ कहने की हिम्मत जुटाने लगा. मगर उस का ध्यान मेरी तरफ नहीं था.
वह नौवल पढ़ने में मशगूल थी.

मैं ने फिर से अपना गला साफ किया और टेबल पर रखे उस के हाथ थाम कर कहना
शुरू किया,” आज तक मैं ने कभी किसी के लिए ऐसा महसूस नहीं किया जैसा आप
के लिए करता हूं. यह प्यारी बोलती सी आंखें, ये घुंघराले बाल, यह मासूम
सा चेहरा मेरी आंखों में बस गया है. सोतेजागते, पढ़तेलिखते हर वक्त आप ही
नजर आती हो. यू आर माय फर्स्ट लव एंड द फर्स्ट लव विल बी द लास्ट लव. डू
यू लाइक मी?”

माया एक हल्की मुस्कान लिए मेरी नजरों में देख रही थी. उस ने कोई जवाब
नहीं दिया तो मैं थोड़ा असहज हो गया,” देखिए मैं दूसरे लड़कों की तरह
नहीं हूं. आई रियली लव यू. रूह की गहराइयों से प्यार करता हूं आप को. ”

वह अब भी मुझे वैसे ही देखती रही. एक बार फिर कोई जवाब न पा कर मैं ने उस
के हाथ छोड़ दिए और आंखें नीची कर ली.

तब जैसे वह होश में आई और तुरंत बोली,” एक्चुअली आई डोंट नो व्हाट डिड यू
से. मैं ने सुना नहीं. मेरे कान खराब हैं न. ”

मैं हतप्रभ रह गया. मेरी इतनी मेहनत बेकार गई थी. इतनी फीलिंग्स के साथ
मैं ने इतना कुछ कहा और वह तो कुछ सुन ही नहीं सकी. बहरी है बेचारी. मन
में अफसोस हुआ. इशारे से कुछ कहती हुई वह बैग खोलने लगी और मैं सॉरी कह
कर वहां से उठ गया.

“अरे सुनो. रुको तो. कहाँ जा रहे हो?” वह पुकार रही थी. मगर मैं अपनी ही
धुन में बाहर निकल आया.

मेरे पहले प्यार का पहला प्रपोजल सुना ही नहीं गया था. पर मैं ने हिम्मत
नहीं आ हारी और वही सब बातें एक कागज पर लिख कर फिर से उस के पास पहुंचा
और उसे कागज थमा दिया. मैं ने यह भी लिख दिया था कि आप बहरी हैं यह जान
कर बहुत दुख हुआ. मगर आप के अंदर इतनी खूबियां हैं कि है एक कमी कोई
मायने नहीं रखती.

कागज पढ़ कर वह मुस्कुरा उठी और सहजता से बोली,” आई रियली लाइक यू. कल
तुम क्या कह रहे थे यह मैं ने कानों से तो नहीं सुना मगर तुम्हारे दिल
में क्या है यह अच्छी तरह महसूस किया था. जब तुम मेरे पास आ कर बैठे थे
उसी पल मैं ने तुम्हें अपना दिल दे दिया था. तुम दूसरे लड़कों से बहुत
अलग हो. जैसा मैं चाहती थी बिल्कुल वैसे हो. तुम्हें यह भी बता दूं कि
मैं बहरी नहीं, बस सुनाई कम देता है. यह हियरिंग ऐड न लगाऊं तो हल्की
आवाज कान तक नहीं पहुंचती. जब कोई चिल्ला कर बोले तभी सुनाई देता है. पर
यह हियरिंग ऐड लगाते ही सब कुछ क्लियर सुन सकती हूं. कल मैं इसे निकालने
के लिए ही बैग खोल रही थी. तब तक तुम चले गए. मुझे लगा बहरी समझ कर तुम
दोबारा नहीं आओगे. मगर आज तुम फिर से वापस आए तो मुझे यकीन हो गया है कि
तुम्हारा प्यार सच्चा है. ”

” प्यार तो रूह से होता है. एक जुड़ाव जो तुम्हारे लिए महसूस किया, कभी
किसी और के लिए नहीं किया, ” मैं ने कहा.

” मेरे आगेपीछे हजारों लड़के घूमते हैं मगर किसी की आंखों में वह प्यार
नहीं था जो प्यार तुम्हारी आंखों में है. कितनी सादगी और सरलता से तुमने
अपने दिल की बात कह दी. सच तुम्हारी ही तलाश थी मुझे, ” वह मुझे चाहत भरी
नजरों से देख रही थी.

इस तरह वह यानी माया मेरी जिंदगी में आ गई. हम साथ हंसते, साथ खातेपीते
और साथ ही पढ़ते. वह ऐसी लड़की थी जो जिंदगी पूरी तरह जीना चाहती थी. खुद
के साथ दूसरों का भी ख्याल रखती. खूब मस्ती करती और पढ़ाई के समय सीरियस
हो कर पढ़ती भी. उसे नोवेल्स पढ़ने का बहुत शौक था. अक्सर नोवेल्स के
किरदारों में गुम रहती.

हम ने बेहद खूबसूरत लम्हे साथ बिताए. वह कभी मुझ से बोर हो जाती या झगड़ा
होता तो वह अपने हियरिंग ऐड कान से निकाल कर पर्स में रख लेती. फिर मैं
कितना भी बोलता रहता उसे फर्क नहीं पड़ता. थोड़ी देर के बाद मुझे याद आता
कि उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा होगा. हम दोनों बाद में इस बात पर बहुत
हंसते.

इसी तरह समय बीत रहा था. हम ने ग्रेजुएशन कर लिया. माया और मैं ने अब
एमबीए का कोर्स ज्वाइन कर लिया था. इधर कुछ दिनों से मां मेरी शादी की
बातें करने लगी थी. मगर मैं अभी माया के मन की थाह लेना चाहता था. हम ने
अब तक शादी को ले कर कोई चर्चा नहीं की थी.

एक दिन माया एक नौवेल पढ़ती हुई उस के किरदारों के बारे में बताने लगी, ”
जानते हो इस नौवेल के दोनों मुख्य किरदारों ने शादी कहां की ?”

“कहां की?”

” उन्होंने पानी के जहाज पर शादी की,” यह बात बताते वक्त उस की आंखों में
एक चमक थी. फिर अचानक गंभीर हो कर बोली,” अच्छा यह बताओ कि हम अपनी शादी
कहां करेंगे?”

मैं मुस्कुरा पड़ा. मेरे दिल को तसल्ली मिली कि माया मेरे साथ पूरी
जिंदगी के सपने देख रही है. उस ने फिर से मुझ से पूछा तो मैं ने उस के
हाथों को चूम कर कहा,” हम आसमान में शादी करेंगे. बादलों के बीच प्लेन
में बैठ कर हमेशा के लिए एकदूसरे के बन जाएंगे. ”

सुन कर वह खिलखिला उठी और मेरे गले लग गई. बिना कुछ कहे ही हम ने एकदूसरे
को शादी के लिए प्रपोज कर लिया था. अगले दिन मैं ने विचार किया कि अब
मुझे मां से शादी की बात कर लेनी चाहिए. आखिर मां मेरी शादी को ले कर
बहुत सपने देख रही है. दरअसल मैं मां का इकलौता बेटा हूं. बड़ी दीदी की
शादी हो चुकी है और पापा 2 साल पहले हमें छोड़ कर जा चुके हैं. सही मायने
में मां के सिवा मेरा कोई नहीं था.

मैं ने मां को हर बात सच बताने की ठानी और उन के पास पहुंच गया.

” मां आप काफी समय से पूछ रही थीं न कि मैं शादी कब करूंगा. तो बस आज आप
से यही कहने आया हूं कि मैं अब शादी के लिए तैयार हूं. मैं ने आप के लिए
बहू भी देख रखी है. ”

“अच्छा सच,” मां का चेहरा खुशी से खिल उठा था.

मैं ने मां को माया के बारे में सब कुछ बताते हुए कहा ,” मां वह इतनी
खूबसूरत है जैसे स्वर्ग की अप्सरा हो, सांचे में ढला हुआ उस का बदन और मन
से इतनी भली लड़की है कि क्या बताऊँ. आंखें इतनी प्यारी हैं कि किसी को
देख ले तो वह फिर से जी जाए और बाल तो ऐसे कि आप देखोगे न तो आप को लगेगा
कि उस के अंदर कुदरत ने केवल खूबसूरती ही भर दी है. पर मां उसे नजर न लग
जाए इसलिए कुदरत ने एक छोटी सी कमी भी रख छोड़ी है, ” मेरी आवाज थोड़ी धीमी
हो गई थी.

” कमी? कैसी कमी बेटा ?” मां ने पूछा.

” मां उस के कानों में समस्या है. सुनने की समस्या.”

” यह क्या कह रहा है तू? मेरा इकलौता बेटा एक बहरी लड़की से शादी करेगा?
लोग क्या कहेंगे और भला तुझ में कौन सी कमी है जो तुझे ऐसी लड़की लाने की
सूझी?”मां एकदम से भड़क उठी.

” अरे मां वह बहरी नहीं है बस ऊंचा सुनती है. मगर हियरिंग ऐड लगा कर सब
कुछ सुन सकती है,” मैं ने मां को समझाना चाहा.

मगर मां अड़ गई थीं,” अरे बेटा वह हर समय तो मशीन लगा कर नहीं रहेगी न.
मान ले जब वह सो रही है या आराम कर रही है और उस ने मशीन उठा कर रखी हुई
है उस वक्त अचानक घर में कोई हादसा हो जाए, मैं गिर जाऊं, उस के बच्चे का
पैर फिसल जाए या फिर कुछ और हो जाए. तब हम तो चिल्लाते रह जाएंगे न और
उसे कुछ सुनाई ही नहीं देगा. बेटे आंखों देखी मक्खी नहीं निगली जा सकती.
केवल खूबसूरत होना काफी नहीं. घर भी तो चलाना होगा न. पूरी दुनिया में
तुझे एक बहरी लड़की ही मिली थी? नहीं बेटा मैं इस शादी की अनुमति नहीं दे
सकती.” मां ने अपना फैसला सुना दिया था. इस के बाद मैं ने मां को लाख
समझाना चाहा मगर वह नहीं मानी.

मां ने मुझे साफ शब्दों में कहा,” सुन ले अगर मां के लिए जरा सी भी
मोहब्बत और इज्जत है तो तू उस लड़की से शादी नहीं करेगा. उसे भूल जा या
फिर मुझे भूल जा. ”

मेरे लिए मां से बढ़ कर कोई नहीं था सो मैं ने मां के बजाय माया को भूलना
ही मुनासिब समझा. मैं माया से दूरियां बढ़ाने लगा. वह करीब आने की कोशिश
करती तो मैं बहाने बना कर दूर चला जाता. बहुत दिनों तक ऐसा ही चलता रहा.

एक दिन उस ने मेरा हाथ पकड़ कर नम आंखों से पूछा,” तुम मुझे अवॉयड क्यों
कर रहे हो मनीष? मुझ से शादी नहीं करोगे?”

” नहीं मैं तुम से शादी नहीं कर सकता. तुम किसी और को देख लो.,” मैं ने
जानबूझ कर बात इतनी खराब अंदाज में कही ताकि उसे बुरा लगे और वह मुझ से
दूर हो जाए. सचमुच ऐसा ही हुआ.

माया भड़क उठी,” किसी और को देख लो, इस का क्या मतलब होता है मनीष? आज तक
हम ने एकसाथ कितने ही सपने देखे और आज तुम ..”

” हां मैं कह रहा हूं कि किसी से भी कर लो शादी और मेरा पीछा छोड़ो ,” कह
कर मैं उस से हाथ छुड़ा कर घर आ गया और फिर कमरा बंद कर शाम तक रोता रहा.

मैं जानता था अब माया कभी भी मुझ से बात तक नहीं करेगी. ऐसा लग रहा था
जैसे किसी ने मेरे शरीर से रूह निकाल कर अलग कर दिया हो. मेरे होठों की
हंसी छिन गई हो. उस दिन के बाद माया मुझ से बिल्कुल कटीकटी रहने लगी. एक
दो महीने बाद ही फाइनल एग्जाम थे सो हमारे कॉलेज में प्रिपरेशन के लिए
छुट्टी हो गई. फिर एग्जाम हुए और इस बीच मेरा प्लेसमेंट एक मल्टीनेशनल
कंपनी में हो गया. माया ने भी कहीं और ज्वाइन कर लिया था. उस से मेरा कोई
संपर्क नहीं रह गया.

इन दिनों में जी तो रहा था मगर जीने की चाह मिट चुकी थी. मां सब समझ रही
थीं. फिर भी उन्हें लगता था कि कोई और लड़की मेरी जिंदगी में आएगी तो सब
नॉर्मल हो जाएगा. मगर मैं ने दिल के सारे दरवाजे इस कदर बंद कर लिए थे कि
कोई और लड़की दिल में आ ही नहीं सकती थी.

मां ने कई खूबसूरत लड़कियों के रिश्ते मुझे सुझाए. एक से बढ़ कर एक
लड़कियों के फोटो दिखाए मगर मुझे कोई पसंद नहीं आई. एक तो उन की बहन की
रिश्तेदार थी. मां ने उसे घर भी बुला लिया. मगर मुझे कोई रुचि लेते न देख
फिर उसे वापस भेज दिया. इस तरह 5 साल बीत गए. मां बीमार रहने लगी थी. वह
किसी भी तरह मुझे खुश देखना चाहती थीं .

अंत में एक दिन उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और कहा,” बेटा मैं समझ
चुकी हूं कि तू माया के बगैर खुश नहीं रह सकता. देख तो क्या हालत बना ली
है अपनी. जा मैं कहती हूं माया को ही अपना ले. मां हूँ, तेरे चेहरे पर यह
गमी बर्दाश्त नहीं कर सकती. ”

मां की बात सुन कर में फूटफूट कर रो पड़ा.,” मां अब अनुमति देने से क्या
होगा? 5 साल बीत चुके हैं. उस ने कब की शादी कर ली होगी. मेरा कोई
कांटेक्ट भी नहीं है उस से, ” मैं ने बुझे स्वर में कहा..

” बेटा मेरा दिल कहता है, अगर वह भी तुझ से प्यार करती होगी तो उस ने भी
जरूर अब तक शादी नहीं की होगी.”

मैं ने मां की बात का मान रखा और अपनी जिंदगी को ढूंढने निकल पड़ा.बड़ी
मुश्किल से उस की सहेली का पता मालूम किया जो ससुराल में थी. मैं ने उस
से माया का पता पूछा तो उस ने कहा कि उसे भी कुछ नहीं पता. शायद माया ने
उस से कुछ भी न बताने का वादा किया लिया होगा. बाद में मैं ने एक दो
दोस्तों से भी बात की मगर किसी को भी उस के बारे में पता नहीं था.

फिर एक दिन अचानक मेरी मुलाकात कॉलेज के एक लड़के से हुई जो दिल ही दिल
में माया को चाहता था. हालचाल पूछने पर उसी ने माया का जिक्र छेड़ा. उस
ने बताया कि वह एक मीटिंग में के सिलसिले में शिमला गया था. वही माया से
मुलाकात हुई थी. वह अपनी कंपनी को रिप्रेजेंट कर रही थी.

” क्या वह शादीशुदा है ?” मैं ने छूटते ही पूछा तो वह हंस पड़ा.

” उस समय तक मतलब करीब 3 महीने पहले तक तो वह अविवाहिता ही थी.”

मेरे चेहरे पर सुकून की रेखा खिंच गई. मैं ने जल्दी से उस से माया का
एड्रेस लिया और शिमला पहुंच गया. रास्ते भर में यही सोचता रहा कि माया
कैसी होगी? मुझे देख कर उस का रिएक्शन क्या होगा? कहीं वह मुझ से मिलने
से मना तो नहीं कर देगी? मैं दिए गए एड्रेस पर पहुंचा तो मुझे गार्डन में
एक लड़की खुले बालों में पौधों को पानी देती नजर आई. मैं ने एक पल में
पहचान लिया वह माया ही थी. चेहरे पर वही सादगी भरी मुस्कान और ललाट पर
सूर्य की लाली. बेहद हसीन गजल सा उस का व्यक्तित्व. दिल किया उसे बाहों
में समेट लूँ. 5 सालों से दिल में दफन सारे जज्बात उमड़ पड़ने को बेकरार
से थे.

मगर फिर ठहर गया. इन 5 सालों में आई दूरी कहीं उस के लिए मुझे अजनबी तो
नहीं बना गई? मैं उस के सामने जा कर खड़ा हो गया. वह उन्हीं निगाहों से
मुझे देखने लगी जब पहली बार मैं ने उसे प्रपोज किया था मगर उस ने हियरिंग
ऐड न लगा होने की वजह से सुना नहीं था.

मैं ने एक बार फिर अपने दिल की बात उसी अंदाज में कहनी शुरू की ,”माया
इतने सालों में एक भी लम्हा ऐसा नहीं जब मैं ने तुम्हें याद न किया हो.
मैं ने तुम्हारा दिल दुखाया मगर मैं विवश था. मां नहीं चाहती थी कि तुम
उन की बहू बनो पर मैं तुम्हें मां की रजामंदी के बाद ही अपने घर ले जाना
चाहता था. आज वह दिन आ गया है. मैं इसीलिए आया हूं. बताओ माया क्या मुझ
से शादी करोगी?”

माया एकटक मुझे देख रही थी. मेरी बात खत्म होने पर उस ने कान की तरफ
इशारा करते हुए कहा कि उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा. तब मैं ने चिल्ला कर
कहा,” माया मुझ से शादी करोगी?”

माया हंस कर हां कहती हुई मेरे सीने से लग गई. आज हमारी इतने सालों की
तपस्या पूर्ण हो गई थी. हम एकदूसरे की बाहों में थे.

फर्क: रवीना की एक गलती ने तबाह कर दी उसकी जिंदगी

18 साल की रवीना के हाथों में जैसे ही वोटर आईडी कार्ड आया, उसे लगा जैसे सारी दुनिया उस की मुट्ठी में समा गई हो. यह सिर्फ एक दस्तावेज मात्र नहीं था बल्कि उस की आजादी का सर्टिफिकेट था।

‘अब मैं कानूनी रूप से बालिग हूं और अपनी मरजी की मालिक, अपनी जिंदगी की सर्वेसर्वा. निर्णय लेने को स्वतंत्र. जो चाहे करूं, जहां चाहे जाऊं. जिस के साथ मरजी रहूं. कोई बंधन, कोई रोकटोक नहीं. बस, खुला आसमान और ऊंची उड़ान…’ मन ही मन खुश होती हुई रवीना पल्लव के साथ अपनी आजादी का जश्न मनाने का नायाब तरीका सोचने लगी.

ग्रैजुऐशन के आखिरी साल की स्टूडैंट रवीना मातापिता की इकलौती बेटी थी. फैशन और हाई प्रोफाइल लाइफ की दीवानी रवीना नाजों पली होने के कारण जिद्दी और मनमौजी थी. पढ़ाईलिखाई में तो वह एक औसत छात्रा ही थी इसलिए पास होने के लिए हर साल उसे ट्यूशन और कोचिंग का सहारा लेना पड़ता था.

पल्लव भी पिछले दिनों ही इस कोचिंग इंस्टिट्यूट में पढ़ाने लगा है. पहली नजर में ही रवीना उस की तरफ झुकने लगी थी. लंबा और ऊंचा कद, गहरीगंभीर आंखें और लापरवाही से पहने कस्बाई फैशन के हिसाब से आधुनिक लिबास. बाकी लड़कियों की निगाहों में पल्लव कुछ भी खास नहीं था मगर उस का बेपरवाह अंदाज अतिआधुनिक शहरी रवीना के दिलोदिमाग में खलबली मचाए हुए था.

पल्लव कहने को तो कोचिंग इंस्टिट्यूट में पढ़ाता था लेकिन असल में तो वह खुद भी एक स्टूडैंट ही था. उस ने इसी साल अपना ग्रैजुऐशन पूरा किया था और अब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए शहर में रुका था. कोचिंग इंस्टिट्यूट में पढ़ाने के पीछे उस का यह मकसद भी था कि इस तरीके से वह किताबों के संपर्क में रहेगा, साथ ही जेबखर्च के लिए कुछ अतिरिक्त आमदनी भी हो जाएगी.

पल्लव के पिता उस के इस फैसले से सहमत नहीं थे. वे चाहते थे कि पल्लव पूरी तरह से समर्पित हो कर अपना ध्यान केवल अपने भविष्य की तैयारी पर लगाए लेकिन पल्लव से पूरा दिन एक ही जगह बंद कमरे में बैठ कर पढ़ाई नहीं होती थी, इसलिए उस ने अपने पिता की इच्छा के खिलाफ पढ़ने के साथसाथ पढ़ाने का विकल्प चुना और इस तरह से रवीना के संपर्क में आया.

‘2 विपरीत ध्रुव एकदूसरे को आकर्षित करते हैं’, इस सर्वमान्य नियम से भला पल्लव कैसे अछूता रह सकता था. धीरेधीरे वह भी खुद के प्रति रवीना के आकर्षण को महसूस करने लगा था। मगर एक तो उस का संकोची स्वभाव, दूसरे सामाजिक स्तर पर कमतरी का एहसास उसे दोस्ती के लिए आमंत्रित करती रवीना की मुसकान के निमंत्रण को स्वीकार नहीं करने दे रहा था.

आखिर विज्ञान की जीत हुई और शुरुआती औपचारिकता के बाद अब दोनों के बीच अच्छीखासी ट्यूनिंग बनने लगी थी. फोन पर बातों का सिलसिला भी शुरू हो चुका था.

“लीजिए जनाब, सरकार ने हमें कानूनन बालिग घोषित कर दिया है,” पल्लव के चेहरे के सामने अपना वोटर कार्ड हवा में लहराते हुए रवीना खिलखिलाई.

“तो जश्न मनाएं…” पल्लव ने भी उसी गरमजोशी से जवाब दिया.

“चलो, आज तुम्हें पिज्जा खिलाने ले चलती हूं.”

“न… न… तुम अपने खुबसूरत हाथों से 1 कप चाय बना कर पिला दो. मैं तो इसी में खुश हो जाउंगा,” पल्लव ने रवीना के चेहरे पर शरारत करते बालों की लट को उस के कानों के पीछे ले जाते हुए कहा. रवीना उस का प्रस्ताव सुन कर हैरान थी.

“चाय? मगर कैसे? कहां?” रवीना ने पूछा.

“मेरे रूम पर और कहां?” पल्लव ने उसे आश्चर्य से बाहर निकाला. रवीना राजी हो गई.

रवीना ने मुसकरा कर स्कूटर स्टार्ट करते हुए पल्लव को पीछे बैठने के लिए आमंत्रित किया. यह पहला मौका था जब पल्लव उस से इतना सट कर बैठा था. कुछ ही मिनटों के बाद दोनों पल्लव के कमरे पर थे. जैसाकि आम पढ़ने वाले युवाओं का होता है, पल्लव के कमरे में भी सामान के नाम पर एक पलंग, टेबलकुरसी और रसोई का सामान था. रवीना अपने बैठने के लिए जगह तलाश कर ही रही थी कि पल्लव ने उसे पलंग पर बैठने का इशारा किया. रवीना सकुचाते हुए बैठ गई. पल्लव भी वहीं उस के पास आ बैठा.

एकांत में 2 युवा दिल एकदूसरे की धड़कनें महसूस करने लगे और कुछ ही पलों में दोनों के रिश्ते ने एक लंबा फासला तय कर लिया. दोनों के बीच बहुत सी औपचारिकताओं के किले ढह गए. एक बार ढहे तो फिर बारबार ये वर्जनाएं टूटने लगीं.

कहते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. दोनों की नजदीकियों की भनक जब रवीना के घर वालों को लगी तो उसे लाइन हाजिर किया गया.

“मैं पल्लव से प्यार करती हूं,” रवीना ने बेझिझक स्वीकार किया. बेटी की मुंहजोरी पर पिता आगबबूला हो गए.
यह उम्र कैरियर बनाने की है, रिश्ते नहीं. समझीं तुम…” पापा ने उसे लताड़ दिया.

“मैं बालिग हूं. अपने फैसले खुद लेने का अधिकार है मुझे,” रवीना बगावत पर उतर आई थी. इसी दौरान बीचबचाव करने के लिए मां उन के बीच आ खड़ी हुईं.

“कल से इस का कालेज और इंस्टिट्यूट दोनों जगह जाना बंद,” पिता ने उस की मां की तरफ मुखातिब होते हुए कहा तो रवीना पांव पटकते हुए अपने कमरे की तरफ चल दी. थोड़ी ही देर में कपड़ों से भरा सूटकेस हाथ में लिए वह खड़ी थी.

“मैं पल्लव के साथ रहने जा रही हूं,” रवीना के इस ऐलान ने घर में सब के होश उड़ा दिए.

“तुम बिना शादी किए एक पराए मर्द के साथ रहोगी? क्यों समाज में हमारी नाक कटवाने पर तुली हो?” इस बार मां उस के खिलाफ हो गई.

“हम दोनों बालिग हैं. अब तो कोर्ट ने भी इस बात की इजाजत दे दी है कि 2 बालिग लिव इन में रह सकते हैं, उम्र चाहे जो भी हो,” रवीना ने मां के विरोध को चुनौती दी.

“कोर्ट अपने फैसले नियमकानून और सुबूतों के आधार पर देता है. सामाजिक व्यवस्थाएं इन सब से बिलकुल अलग होती हैं. कानून और समाज के नियम सर्वथा भिन्न होते हैं,” पापा ने उसे समझाने की कोशिश की मगर रवीना के कान तो पल्लव के नाम के अलावा कुछ और सुनने को तैयार ही नहीं थे.

उसे अब अपने और पल्लव के बीच कोई बाधा स्वीकार नहीं थी. वह बिना पीछे मुड़ कर देखे अपने घर की दहलीज लांघ गई. यों अचानक रवीना को सामान सहित अपने सामने देख कर पल्लव अचकचा गया. रवीना ने एक ही सांस में उसे पूरे घटनाक्रम का ब्यौरा दे दिया.

“कोई बात नहीं, अब तुम मेरे पास आ गई हो न. पुराना सब बातें भूल जाओ और मिलन का जश्न मनाओ,” कमरा बंद कर के पल्लव ने उसे अपने पास खींच लिया और कुछ ही देर में हमेशा की तरह उन के बीच रहीसही सारी दूरियां भी मिट गईं. रवीना ने एक बार फिर अपना सबकुछ पल्लव को समर्पित कर दिया.

2-4 दिन में ही पल्लव के मकानमालिक को भी सारी हकीकत पता चल गई कि पल्लव अपने साथ किसी लड़की को रखे हुए है. उस ने पल्लव को धमकाते हुए कमरा खाली करने का अल्टीमेटम दे दिया. समाज की तरफ से उन पर यह पहला प्रहार था मगर उन्होंने हार नहीं मानी. कमरा खाली कर के दोनों एक सस्ते होटल में आ गए.

कुछ दिन तो सोने से दिन और चांदी सी रातें गुजरीं मगर साल बीततेबीतते ही उन के इश्क का इंद्रधनुष फीका पड़ने लगा. ‘प्यार से पेट नहीं भरता’ इस कहावत का मतलब पल्लव अच्छी तरह समझने लगा था.
समाज में बदनामी होने के कारण पल्लव की कोचिंग छूट गई और अब आमदनी का कोई दूसरा जरीया भी उन के पास नहीं था. पल्लव के पास प्रतियोगी परीक्षाओं का शुल्क भरने तक के पैसे नहीं बच पा रहे थे. उस ने वह होटल भी छोड़ दिया और अब रवीना को ले कर बहुत ही निम्न स्तर के मोहल्ले में रहने आ गया.

एक तरफ जहां पल्लव को रवीना के साथ अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा था, तो वहीं दूसरी तरफ रवीना तो अब पल्लव में ही अपना भविष्य तलाशने लगी थी. वह इस लिव इन को स्थाई संबंध में परिवर्तित करना चाहती थी और पल्लव से शादी करना चाहती थी. रवीना को भरोसा था कि जल्दी ही अंधेरी गलियां खत्म हो जाएंगी और उन्हें अपनी मंजिल के रास्ते मिल जाएंगे. बस, किसी तरह पल्लव कहीं सैट हो जाए.

एक बार फिर विज्ञान का यह आकर्षण का नियम पल्लव पर लागू हो रहा था,’2 विपरीत ध्रुव जब एक निश्चित सीमा तक नजदीक आ जाते हैं तो उन में विकर्षण पैदा होने लगता है।’ पल्लव भी इसी विकर्षण का शिकार होने लगा था. हालातों के सामने घुटने टेकता वह अपने पिता के सामने रो पड़ा तो उन्होंने रवीना से अलग होने की शर्त पर उस की मदद करना स्वीकार कर लिया. मरता क्या नहीं करता, पिता की शर्त के अनुसार उस ने फिर से कोचिंग जाना शुरू कर दिया और वहीं होस्टल में रहने लगा, मगर इस बार कोचिंग में पढ़ाने नहीं बल्कि स्वयं पढ़ने के लिए. रवीना के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं था. वह अपनेआप को ठगा सा महसूस करने लगी. मगर दोष दे भी तो किसे? यह तो उस का अपना फैसला था.

पल्लव के जाने के बाद वह अकेली ही उस मोहल्ले में रहने लगी. इतना सब होने के बाद भी उसे पल्लव का इंतजार था. वह भी उस के बैंक परीक्षा के रिजल्ट का इंतजार कर रही थी,’एक बार पल्लव का सिलैक्शन हो जाए तो फिर सब ठीक हो जाएगा. हमारा दम तोड़ता रिश्ता फिर से जी उठेगा,’ इसी उम्मीद पर वह हर चोट सहती जा रही थी.

आखिर रिजल्ट भी आ गया. पल्लव की मेहनत रंग लाई और उस का बैंक परीक्षा में में चयन हो गया. रवीना यह खुशी उत्सव की तरह मनाना चाहती थी. वह दिनभर तैयार हो कर उस का इंतजार करती रही मगर वह नहीं आया. रवीना पल्लव को फोन पर फोन लगाती रही मगर उस ने फोन भी नहीं उठाया.

आखिर रवीना उस के होस्टल जा पहुंची. वहां जा कर पता चला कि पल्लव तो सुबह रिजल्ट आते ही अपने घर चला गया. रवीना बिलकुल निराश हो गई. क्या करे? कहां जाए? वर्तमान तो खराब हुआ ही, भविष्य भी अंधकारमय हो गया. आसमान तो हासिल नहीं हुआ, पांवों के नीचे की जमीन भी अपनी नहीं रही. पल्लव का प्रेम तो मिला नहीं, मातापिता का स्नेह भी वह छोड़ आई. काश, उस ने अपनेआप को कुछ समय सोचने के लिए दिया होता. मगर अब क्या हो सकता है? पीछे लौटने के सारे रास्ते तो वह खुद ही बंद कर आई थी. रवीना बुरी तरह से हताश हो गई. वह कुछ भी सोच नहीं पा रही थी. कोई निर्णय नहीं ले पा रही थी.

आखिर उस ने एक खतरनाक निर्णय ले ही लिया,”तुम्हें तुम्हारा रास्ता मुबारक हो. मैं अपने रास्ते जा रही हूं. खुश रहो,” रवीना ने एक मैसेज पल्लव को भेजा और अपना मोबाइल स्विच औफ कर लिया. संदेश पढ़ते ही पल्लव के पांवों के नीचे से जमीन खिसक गई.

‘अगर इस लड़की ने कुछ उलटासीधा कर लिया तो मेरा कैरियर चौपट हो जाएगा,’ यह सोचते हुए उस ने 1-2 बार रवीना को फोन लगाने की कोशिश की मगर नाकाम होने पर तुरंत दोस्त के साथ बाइक ले कर उस के पास पहुंच गया. जैसाकि उसे अंदेशा था, रवीना नींद की गोलियां खा कर बेसुध पड़ी थी. पल्लव दोस्त की मदद से उसे हौस्पिटल ले कर आया और उस के घर पर भी खबर कर दी. डाक्टरों के इलाज शुरू करते ही दवा लेने के बहाने पल्लव वहां से खिसक गया.

बेशक रवीना अपने घर वालों से सारे रिश्ते खत्म कर आई थी मगर खून के रिश्ते भी कहीं टूटे हैं भला? खबर पाते ही मातापिता बदहवास से बेटी के पास पहुंच गए. समय पर चिकित्सा सहायता मिलने से रवीना अब खतरे से बाहर थी. मांपापा को सामने देख वह फफक पड़ी,”मां, मैं बहुत शर्मिंदा हूं. सिर्फ आज के लिए ही नहीं बल्कि उस दिन के अपने फैसले के लिए भी, जब मैं आप सब को छोड़ आई थी,” रवीना ने कहा तो मां ने कस कर उस का हाथ थाम लिया.

“यदि मैं ने उस दिन घर न छोड़ा होता तो आज कहीं बेहतर जिंदगी जी रही होती. मेरा वर्तमान और भविष्य, दोनों ही सुनहरे होते. मैं ने स्वतंत्र होने में बहुत जल्दबाजी की. मैं तो आप लोगों से माफी मांगने के लायक भी नहीं हूं…” रवीना फफक पङी.

“तुम घर लौट चलो. अपनेआप को वक्त दो और फिर से अपने फैसले का मूल्यांकन करो. जिंदगी किसी एक मोड़ पर रुकने का नाम नहीं बल्कि यह तो एक सतत प्रवाह है. इस के साथ बहने वाले ही अपनी मंजिल को पाते हैं,” पापा ने उसे समझाया.

“हां, किसी एक जगह अटके रहने का नाम जिंदगी नहीं है. यह तो अनवरत बहती रहने वाली नदी है. तुम भी इस के बाहव में खुद को छोड़ दो और एक बार फिर से मुकाम बनाने की कोशिश करो. हम सब तुम्हारे साथ हैं,” मां ने उस का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.

मन ही मन अपने फैसले से सबक लेने का दृढ संकल्प करते हुए रवीना मुसकरा दी. अब उसे स्वतंत्रता और स्वछंदता में फर्क साफसाफ नजर आ रहा था.

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