Hindi Family Story: चक्रव्यूह भेदन – क्या सही थी वान्या की सोच?

Hindi Family Story: जून का महीना था. सुबह के साढ़े 8 ही बजे थे, परंतु धूप शरीर को चुभने लगी थी. दिल्ली महानगर की सड़कों पर भीड़ का सिलसिला जैसे उमड़ता ही चला आ रहा था. बसें, मोटरें, तिपहिए, स्कूटर सब एकदूसरे के पीछे भागे चले जा रहे थे. आंखों पर काला चश्मा चढ़ाए वान्या तेज कदमों से चली आ रही थी. उसे घर से निकलने में देर हो गई थी. वह मन ही मन आशंकित थी कि कहीं उस की बस न निकल जाए. ‘अब तो मुझे यह बस किसी भी तरह नहीं मिल सकती,’ अपनी आंखों के सामने से गुजरती हुई बस को देख कर वान्या ने एक लंबी सांस खींची. अचानक लाल बत्ती जल उठी और वान्या की बस सड़क की क्रौसिंग पर जा कर रुक गई.

वान्या भाग कर बस में चढ़ गई और धक्कामुक्की करती हुई अपने लिए थोड़ी सी जगह बनाने लगी. उस ने इधरउधर दृष्टि दौड़ाई. बस की सारी सीटें भर चुकी थीं. कहींकहीं 2 की सीट पर 3 लोग बैठे थे. कोई और उपाय न देख कर वह भी बस में खड़े अन्य यात्रियों की कतार में खड़ी हो गई. बस में बैठे पुरुषों में से किसी ने भी उठ कर उसे सीट देने की सहानुभूति न जताई. वान्या सोचने लगी, ‘ठीक ही तो है, जब महिलाओं ने घर से निकल कर बाहर की दुनिया में कदम रखा है, तो उन्हें अब अपनी सुकुमारता भी छोड़नी ही होगी.’

हरी बत्ती जल चुकी थी और बस ने क्रौसिंग पार कर के गति पकड़ ली थी. ‘उफ, इतनी गरमी और ऊपर से यह भीड़,’ वान्या पर्स से टिकट के पैसे निकालते हुए बुदबुदाई. वह अपनेआप को संभाल भी नहीं पाई थी कि बस अचानक एक ओर मुड़ी. बस के मुड़ने के साथ ही वान्या सामने की सीट पर बैठे पुरुष यात्रियों के ऊपर जा गिरी. किसी तरह उस ने पर्स से पैसे निकाल कर टिकट खरीदा और बस की छत में लगे पाइप को मजबूती से पकड़ कर खड़ी हो गई.

पड़ोसिन ने एक दिन व्यंग्य कसा था, ‘नौकरी करने में कितना आनंद है, प्रतिदिन अच्छीअच्छी साडि़यां पहनना और सुबहसुबह बनसंवर कर सैर को चल देना.’ ‘उन्हें तो मेरा सिर्फ बननासंवरना ही नजर आता है. बसों में भीड़ के बीच इस तरह पिचके रहना और घंटों हाथ ऊपर कर के खड़े रहना नजर ही नहीं आता. उस पर सारा दिन शिशु सदन में पड़े बच्चों की चिंता अलग से रहती है,’ वान्या अपने विचारों में खोई हुई थी कि अचानक उस ने अपने ऊपर कुछ भार सा महसूस किया. पलट कर देखा तो एक महाशय भीड़ का फायदा उठा कर अनावश्यक रूप से उस के ऊपर झुके जा रहे थे.

‘‘जरा सीधे खड़े रहिए,’’ वान्या खिसियाते हुए बोली.

बस ने गति पकड़ ली थी और इस के साथ ही वान्या के मन की परतें भी उघड़ने लगीं… 

आज तो कपड़े धो कर सूखने के लिए डालना ही भूल गई. सारे कपड़ों में सिलवटें पड़ गई होंगी और शाम को जा कर उन्हें फिर से पानी में निकालना पड़ेगा. सुबहसुबह काम का इतना तूफान मचा होता है कि कुछ होश ही नहीं रहता. बिस्तर से उठते ही सब से पहले पानी का झमेला. इसी बीच पति की चाय की फरमाइश. नौकरीपेशा महिलाओं की जिम्मेदारियां तो दोहरी हो गईं, परंतु पुरुषों की जिम्म्ेदारियां वहीं की वहीं रह गईं. शायद पुरुष यह सोचते हैं कि जब औरत में इतनी सामर्थ्य है कि वह घर का कामकाज संभालने के साथ बाहर का भी कर सकती है तो क्यों न उस के सामर्थ्य का सदुपयोग किया जाए.’

‘वान्या, जरा बाहर देखना, शायद समाचारपत्र आ गया होगा,’ अक्षत ने बिस्तर में लेटेलेटे ही आवाज दी थी. सोनू और लवी अभी सो कर नहीं उठे थे. सो उसे ही समाचारपत्र लाने के लिए बाहर भागना पड़ा था. वह चाय का घूंट भी नहीं ले पाई थी कि उस की कामवाली आ गई थी. फिर तो सारे काम छोड़ कर वह मायारानी की सहायिका बन कर उस के पीछेपीछे घूमती रही. मायारानी को बरतन धोने हैं तो पानी गरम कर के वह दे, उसे झाड़ू मारनी है तो सोफा, टेबल वह खिसकाए. माया की बच्ची रोए तो उसे भी चुप कराए. फिर मायारानी का काम समाप्त होने पर उसे चाय बना कर पिलाए. उसे दफ्तर के लिए देर माया के कारण ही हुई थी.

वान्या चिल्लाती रही, ‘माया, जल्दी, चाय पी ले, मुझे दफ्तर को देर हो रही है.’ पर वह बालकनी में बैठी अपनी 2 वर्षीया बेटी कमली को खिलाने में लगी थी.

‘तू यहां क्या कर रही है माया, अभी कमरे में पोंछा लगाना बाकी है.’आवाज सुनते ही वह हड़बड़ा कर उठी थी और पोंछा लगाने के लिए चल पड़ी थी. वान्या सोनू के टिफिन में सैंडविच डाल कर लवी की शिशु सदन की टोकरी तैयार करने लगी थी. दूध की बोतल, बदलने के लिए फ्रौक, बिस्कुट, फल आदि सबकुछ उस ने ध्यान से टोकरी में रख दिया था. अब सिर्फ लवी को दलिया खिलाना बाकी था. उस ने अक्षत को आवाज दी, ‘सुनो जी, जरा लवी को दलिया खिला देना, मैं सोनू की कमीज में बटन टांक रही हूं.’

‘वान्या, तुम मुझे प्रतिदिन दफ्तर के लिए देर कराती हो. अभी मुझे स्वयं भी तैयार होना है, सोनू को बस तक छोड़ना है.’ शिशु सदन का नाम सुनते ही वान्या की 3 वर्षीया बेटी लवी बिफर पड़ी थी, ‘मैं नहीं जाऊंगी वहां.’ लवी का यह रोनाधोना और फिर उसे मनाना उस का प्रतिदिन का काम था. 10-15 मिनट का समय तो इसी में निकल जाता था. वान्या लवी के आंसू पोंछ कर उसे पुचकारने लगी थी.

‘मैं तो कहता हूं वान्या, तुम यह नौकरी छोड़ दो. मेरा वेतन अब इतना तो हो ही चुका है कि मैं तुम्हारी नौकरी के बिना भी घर का खर्च चला सकता हूं,’ अक्षत ने गुसलखाने में जातेजाते कहा था. शायद अपनी लाड़ली बेटी को रोता हुआ देख कर उस का हृदय द्रवित हो उठा था. ‘तुम्हारी यह बेटी जरा सा रोई नहीं कि तुम तुरंत मेरी नौकरी छुड़वाने के बारे में सोचने लगते हो. याद नहीं तुम्हें, कितनी मुश्किलों से मिली है मुझे यह नौकरी,’ वान्या अक्षत को बीते दिनों की याद दिलाना चाहती थी.

अक्षत को कार्यालय के लिए देर हो रही थी. वह नहाने के लिए गुसलखाने की ओर चला गया और वान्या सोचती रही, ‘कितने पापड़ बेले हैं इस नौकरी को पाने के लिए और आज चार पैसे घर में लाने लगी हूं तभी तो थोड़ा सलीके से रह पा रहे हैं. इस नौकरी के पहले तो न उन के पास ढंग के कपड़ेलत्ते होते थे और न ही कोई कीमती सामान. उसे तो सिर्फ 2-4 साडि़यों में ही गुजारा करना पड़ता था. बेचारे सोनू के पास तो केवल 2 ही स्वेटर हुआ करते थे. अक्षत के पास स्कूटर तो क्या साइकिल भी नहीं हुआ करती थी. बस स्टौप तक पहुंचने के लिए उन्हें काफी दूर तक पैदल चलना पड़ता था. उन दिनों प्रतिदिन रिकशे का भाड़ा भी तो देने की सामर्थ्य नहीं थी उन में. एक बच्चे को भी वह पूरा पौष्टिक आहार नहीं दे पाती थी.

‘नहींनहीं, कभी नहीं छोड़ूंगी मैं यह नौकरी,’ वान्या सोचतेसोचते मुखर हो उठी थी.

डै्रसिंग टेबल के सामने खड़ा अक्षत उसे तिरछी नजरों से देख रहा था. शायद वह वान्या की मनोस्थिति को समझने की कोशिश कर रहा था. वान्या सोनू को नाश्ते के लिए आवाज लगा कर उस का बैग स्कूटर पर रखने लगी थी. अक्षत ने स्कूटर स्टार्ट किया तो उस ने स्कूटर के पीछे बैठे सोनू के सिर पर प्यार से हाथ फेरा. 10 वर्षीय सोनू समय से पहले ही इतना गंभीर हो गया था. वान्या को ऐसा लगता, जैसे वह अपराधिनी है, उस ने ही अपने बच्चों से उन का बचपन छीन लेने का अपराध किया है. वह खयालों में खोई हुई दूर तक जाते हुए अक्षत के स्कूटर को देखती रही. अचानक उसे ध्यान आया, अभी तो कमरे में फैला सारा सामान समेटना है. वह भाग कर ऊपर आई. उस ने एक दृष्टि पूरे कमरे में दौड़ाई. बिस्तर पर गीला तौलिया पड़ा था. उस ने तौलिए को निचोड़ कर बालकनी में फैला दिया. वान्या ने बिजली की गति से भागभाग कर सामान समेटना शुरू किया. सभी वस्तुओं को यथास्थान रखने में उसे कम से कम 10 चक्कर लगाने पड़े. नाश्ते का निवाला निगलतेनिगलते उसे ध्यान आया, ‘कहीं मायारानी गुसलखाने की बालटी खाली तो नहीं कर गई.’

वान्या ने स्नानघर में जा कर देखा तो बालटी सचमुच ही खाली पड़ी थी. अब तो पानी भी जा चुका था. वह गुस्सा पी कर रह गई. अभी उसे तैयार भी होना था. घड़ी की सूइयों पर नजर गई तो हड़बड़ा कर अलमारी में से साड़ी निकालने लगी. लवी को शिशु सदन में छोड़ते समय वान्या का मन बहुत विचलित हो गया था. उस की सोच जारी थी, ‘आखिर क्या दे पा रही है वह अपने बच्चों को इस नौकरी से? इस उम्र में जब उन्हें उस के प्यार की जरूरत है, तो वह उन्हें छोड़ कर दफ्तर चली जाती है और शाम को जब थकीहारी लौटती है तो उन्हें दुलारने, पुचकारने का उस के पास समय नहीं होता. आखिर इस नौकरी से उसे मिलता ही क्या है? सुबह से शाम तक की भागदौड़ जीवन स्तर बढ़ाने की होड़ और इस होड़ में कुछ भी तो नहीं बचा पाती वह अपनी आमदनी का.

‘जब वह नौकरी नहीं करती थी तो उस का काम 4-5 साडि़यों में ही चल जाता था, लेकिन कार्यालय के लिए अब 15-20 साडि़यां भी कम पड़ती हैं. वर्ष में 2-3 जोड़ी चप्पलें घिस ही जाती हैं. ऊपर से पाउडर, क्रीम, लिपस्टिक का खर्चा अलग से. पतिपत्नी दोनों कमाऊ हों तो ससुराल वाले भी कुछ ज्यादा ही अपेक्षा करते हैं. वह तो बस सुखसुविधा के साधन जुटाने की मशीन बन कर रह गई है और दिनरात पिस रही है, इसी चक्की में. पारिवारिक स्नेह और प्यार की जगह अब टीवी और स्टीरियो ने ले ली है. किसी को एकदूसरे से बात करने तक की फुरसत नहीं है.

‘उफ, नहीं करूंगी मैं ऐसी नौकरी,’ वान्या के होंठों से कुछ अस्फुट स्वर निकल पड़े. आसपास की सवारियों ने उसे चौंक कर देखा, तो उस की विचारतंद्रा रुकी. अब उस की आंखें बस की खिड़की से कहीं दूर कुछ तलाश रही थीं.

उसे फैसला करने में 4-5 दिन लगे. साथ काम करने वाली महिलाओं ने विरोध किया, ‘‘क्या मियां की पैर की जूती बन कर रहेगी?’’

चटकमटक वीना ने कहा, ‘‘लीना का पति रोज उस से झगड़ता था. उस ने पिछले 3 साल से अलग मकान ले रखा है.’’

‘‘हमारे पास इतनी दौलत कहां कि नौकरी छोड़ सकें,’’ यह सरोज का कहना था. कांतिहीन चेहरे वाली सरोज घर और दफ्तर के बीच पिस रही थी. वान्या को दोनों की सलाह में स्वार्थ नजर आया. फिर भी उस ने जी कड़ा कर के त्यागपत्र दे दिया. 2-4 दिन घर पर बेफिक्री से बीते. ढेरों काम थे, रसोई सड़ी हुई थी. पहले घर में डब्बाबंद सामान ही खाया जाता था, अब वह खुद बनाने लगी. बेटी भी अब संयत होने लगी. 7-8 दिन बाद अक्षत बोला, ‘‘मैं 4 दिनों के लिए टूर पर जा रहा हूं. तुम्हें दिक्कत तो न होगी?’’

‘लो बोलो, घर बैठी नहीं कि पति के पर निकलने लगे,’ वान्या ने सोचा. फिर विवाद न खड़ा करने की नीयत से बोली, ‘‘दिक्कत क्यों होगी, आप निश्चिंत हो कर जाइए.’’ अक्षत के बिना 4 दिन काफी लगने लगे. पहले वह टूर पर जाना टाल देता था कि वान्या को दिक्कत होगी. वह घर का जो छोटामोटा काम कर देता था, वह कौन करेगा… 

4 दिन बाद जब अक्षत लौटा तो बहुत खिलाखिला था, बोला, ‘‘मेरे अधिकारी भी साथ थे. मेरे काम से बहुत खुश थे. वहीं मेरी तरक्की भी कर दी और यह लो 5 हजार रुपए बोनस भी दिया है.’’

थोड़ी देर बाद अक्षत फिर बोला, ‘‘अधिकारी कह रहे थे कि पहले घरेलू कठिनाइयों के कारण ही वे मुझे जिम्मेदारियां देने से कतरा रहे थे. वे नहीं चाहते थे कि बाहर जाने के कारण घर में विवाद हो.’’ वान्या सन्न रह गई. वह तो सोचती थी कि उस की नौकरी से घर में बरकत थी, पर यह तो उलटा था. उसे अपने निर्णय पर गर्व हो आया. उस ने सोचा कि नौकरी नहीं तो क्या, वह भी तो अक्षत की कमाई में हिस्सा देती ही है. Hindi Family Story

Family Story In Hindi: पैकेज 24 लाख का – आशा को किस बात का गुमान था

Family Story In Hindi: अरुणा को जब पता चला कि उस की बहन आशा पुणे से नोएडा पिताजी के पास 4-5 दिनों के लिए रहने के लिए आ रही है, तो उस ने एक पल भी नहीं गंवाया सोचने में और उस से मिलने का मन बना लिया. हापुड़ से नोएडा दूर ही कितना था. उस के पति ने भी मना नहीं किया.

4 साल पहले मां की मृत्यु के समय ही आशा से मिलना हुआ था. मां के जाने के बाद अरुणा का उस घर में न तो कभी जाना ही हुआ और न ही कभी उस ने जाना चाहा. मां के बिना उस घर की कल्पना कर के ही वह सिहर उठती थी. लेकिन इस बार उस ने 3-4 दिनों का कार्यक्रम बना कर झटपट अटैची लगाई और बेटी के साथ बस में बैठ कर नोएडा के लिए रवाना हो गई.

रास्तेभर जहां उसे इतने सालों बाद आशा से मिलने की खुशी हो रही थी, वहीं मां विहीन उस उजड़े घर में कैसे प्रवेश करेगी, इस की भी चिंता हो रही थी. आशा को सरप्राइज देने का मन हुआ, इसलिए अरुणा ने उसे सूचित नहीं किया और पहुंच गई. अचानक उसे आया देख कर आशा ने हमेशा की तरह बनावटी खुशी दिखाई. उस के इस स्वभाव को जानते हुए भी यह सोच कर कि पता नहीं फिर कब मिलना होगा, अपने को आने से रोक नहीं पाई. आखिर थी तो उस की छोटी और इकलौती सगी बहन.

अरुणा की बहन आशा, उस से 2 साल छोटी थी, लेकिन बचपन से ही, उस से बेहतर अपनी कदकाठी के कारण तथा अपने व्यवहार से, अपना वर्चस्व रख कर उस पर हावी रहती थी.

अरुणा इस के विपरीत बहुत मृदुल स्वभाव की थी. कोई भी अनजान व्यक्ति आशा को अरुणा की बड़ी बहन समझ सकता था. पढ़ाईलिखाई में अरुणा हमेशा उस से अव्वल रही, लेकिन फिर भी आशा उसे अपने आगे कुछ भी नहीं गिनती थी. अरुणा को बहुत मानसिक कष्ट भी होता था, लेकिन आशा को कोई परवा न थी. उस का विवाह अरुणा के विवाह के सालभर बाद ही हो गया था.

जहां अरुणा के पति हापुड़ जैसे छोटे शहर में छोटी सी सरकारी नौकरी करते थे, वहीं आशा के पति पुणे में किसी बहुत बड़ी कंपनी के मालिक थे. विवाह के बाद भी आशा के स्वभाव में रत्तीभर परिवर्तन नहीं आया, बल्कि ससुराल में बड़ी बहू होने के कारण और पति के ऊंचे ओहदे पर होने के कारण वह पहले से भी अधिक अभिमानी हो गई थी.

मायके में जब भी वे दोनों मिलतीं, आशा अरुणा को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी. और तो और, उस के बच्चों में और अपने बच्चों में भी बहुत अंतर रखती थी. एक दिन तो हद हो गई जब अरुणा ने अपनी मां के घर, रसोई से फुरसत पा कर कमरे में जा कर देखा कि आशा अपनी बेटी के साथ रजाई में बैठ कर टैलीविजन देख रही थी और उस की बेटी बिना रजाई के ठिठुर रही थी. उस ने अपनी बेटी को रजाई तो ओढ़ा दी, लेकिन अपना रिश्ता स्थिर रखने के लिए आशा से कुछ नहीं कहा, जानती थी कि बोलने पर बात बहुत बढ़ जाएगी.

उन की मां भी यदि आशा को कुछ समझाने के लिए कुछ कहती तो वह उलट कर तुरंत उत्तर देती, ‘हां, हां, आप की लाड़ली बेटी है न. आप तो उस की तरफदारी करेंगी ही.’ मां क्या बोलती, चुप रह जाती थी. लाड़ली बेटी का ताना तो आशा अकसर देती रहती थी. उसे यह समझ नहीं थी कि मां के लिए सभी बच्चे बराबर होते हैं, वे अपने स्वभाव से ही अंतर पैदा करवाते हैं.

मां की असमय मृत्यु होने पर सभी भाईबहन इकट्ठे हुए थे. अरुणा का मन हुआ कि अपनी बहन आशा के गले से लिपट कर खूब रो ले, लेकिन उस का रुख देख कर लगा ही नहीं कि उस को रत्ती भर भी मां के जाने का संताप है. वह मन मसोस कर रह गई, दोनों भाई तो विवाह के बाद पहले ही पराए हो चुके थे, सभी अपनों के असली चेहरे देख कर अरुणा का मन बहुत क्षुब्ध हुआ. उस को लगा कि वह अकेली रह गई है.

उस का बेटा और बेटी दोनों ही नानी से बहुत जुड़े हुए थे. बेटी तो समझदार थी, लेकिन बेटा छोटा होने के कारण सब क्रियाकलाप देख कर बहुत विचलित हो गया था और सब से अजीब व्यवहार करने लगा था. आशा कारण की गहराई में गए बिना सब के सामने जोरजोर से बोलने लगी, ‘मांबाप ने सिर पर चढ़ा रखा है. जरा भी तमीज नहीं सिखाई. अभी से यह हाल है तो आगे क्या करेगा.’

अरुणा यह देख कर हतप्रभ रह गई. पहले तो वह समझ नहीं पाई कि वह किस के लिए बोल रही है, समझ में आने पर उस को विश्वास ही नहीं हुआ कि उस की बहन उस के बेटे की भावना को समझने के स्थान पर उस के लिए इतना अनर्गल बोल सकती है, वह भी ऐसे मौके पर. उस की 2 बेटियां ही थीं इसलिए वह इतनी कुंठित रहती थी कि उस को अरुणा का बेटा फूटी आंख नहीं सुहाता था.

मौसी को तो मां-सी माना गया है, फिर यह कैसी मौसी है, जिस ने इस रिश्ते को पराया करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उस की बेटियों को अपनी मां का व्यवहार बिलकुल ठीक नहीं लग रहा था, यह साफ उन के चेहरे के भाव बता रहे थे. लेकिन वे अपनी मां से अत्यधिक डरती थीं, इसलिए मूकदर्शक बनी रहती थीं. अरुणा को बच्चों को इस तरह डरा कर रखना उचित नहीं लगता था. मां की तेरहवीं के अगले दिन ही वह आहत मन से वापस हापुड़ लौट गई.

उस के बाद आज मिलना हो रहा था. इतना कुछ होने के बाद भी अरुणा, उस से मिलने का लोभ संवरण नहीं कर पाई. इसी को तो खून का रिश्ता कहते हैं, जो अटूट माने जाते हैं. आशा अपनी बेटियों के साथ आई थी. बड़ी बेटी, नेहा ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई रुड़की के आईआईटी कालेज से पास की थी, आशा उसी को स्थायी रूप से वहां से ले जाने के लिए ही, रुड़की से लौटते हुए नोएडा आई थी. वह नेहा के गुणगान गाते नहीं थक रही थी कि पुणे जाते ही उसे नौकरी मिल जाएगी. फिर कंपनी अवश्य उसे अमेरिका भेजेगी. उस की शादी की वह जल्दी नहीं करेगी. उस का साथ उस के पति भी भरपूर दे रहे थे.

अरुणा उन की दंभभरी बातें सुन कर अवाक रह गई. वह तो उन की बातचीत का हिस्सा बनने लायक ही नहीं थी क्योंकि उस की बेटी, जो नेहा से कुछ ही महीने बड़ी थी, ने तो साधारण बीए किया था और टैक्सटाइल डिजाइनिंग का कोर्स, दिल्ली के किसी इंस्टिट्यूट से कर रही थी. इस बारे में सुनते ही आशा ने नाकभौं सिकोड़ ली. इस कोर्स के बाद उस को किसी फैक्टरी में ही नौकरी मिल सकती है. क्या पैकेज मिलेगा उस को, ज्यादा से ज्यादा साल का डेढ़ लाख. नेहा की तो एक महीने की इतनी सैलरी होगी,’’ उस ने अरुणा की बेटी की ओर तिरस्कारपूर्ण दृष्टि डालते हुए कहा. ‘‘लड़कियों का भविष्य अच्छा पैकेज नहीं, अच्छा ससुराल और उसे समझने वाला पति है. मैं ने उसे पैरों पर खड़ा कर दिया है, जिस से आवश्यकता पड़ने पर वह अपने परिवार की आर्थिक आवश्यकता भी पूरी कर सके, बस. और उस की पढ़ाई तो ऐसी है कि जिस से वह अपना व्यवसाय भी कर सकती है, जिस से उस का घर भी डिस्टर्ब नहीं होगा. मैं तो कोर्स पूरा होते ही उस के लिए अच्छा वर ढूंढ़ कर जल्द विवाह कर दूंगी, ससुराल जा कर जो चाहे करे. लड़कियों की प्राथमिकता घरपरिवार और बच्चे संभालना है, न कि नौकरी. पढ़ाई का सदुपयोग केवल नौकरी करना नहीं है, बल्कि पढ़ीलिखी लड़कियां, जागरूक होने के कारण अधिक अच्छी तरह, सुचारु रूप से परिवार को चला सकती हैं और बच्चे की बेहतर परवरिश कर सकती हैं,’’ अरुणा ने दो टूक जवाब देते हुए कहा. उस की बेटी के आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचे, इसलिए बोले बिना अपने को रोक नहीं पाई.

‘‘दीदी, पढ़ीलिखी होने के बाद भी कैसी दकियानूसी बातें कर रही हैं आप. जमाना बहुत बदल गया है. पैसा हो तो घर संभालने के लिए हाउसकीपर रख सकते हैं और बच्चों के लिए, जैसा चाहो वैसे क्रेच खुले हुए हैं, उन में उन को छोड़ सकते हैं. उन को, वे जो चाहें, खरीद कर दे सकते हैं. हर उम्र के अनुसार खिलौने बाजार में आते हैं, जिन में वे बिजी रह सकते हैं. पैसे से हम बच्चों के लिए क्या नहीं उपलब्ध करा सकते…’’

आशा ने उस की बात नकारते हुए कहा, ‘‘बच्चे महंगे खिलौनों से सजे कमरे में नहीं, अपनी मां की गोद में सुरक्षित महसूस करते हैं. उन की प्रतिदिन की गतिविधियों को निहारने में जो सुख है, वह महंगी कारों में घूमने में और भोगविलास में भी नहीं है. पैसे से बच्चों के लिए भौतिक साधन तो जुटाए जा सकते हैं लेकिन अपने लिए उन के मन में जुड़ाव पैदा नहीं कर सकते. यह तभी संभव है जब हम उन्हें अपना साथ और समय देंगे, नहीं तो बड़े हो कर वे भी हमारे लिए सुखसाधन तो जुटा देंगे, लेकिन अपना समय नहीं देंगे और तुम्हें पता है, बुढ़ापे में अकेलापन किसी त्रासदी से कम नहीं होता है.’’

अरुणा को अपनी बहन की सोच पर तरस आ रहा था. लेकिन वह समझने वाली कहां थी. पलट कर थोड़ा उत्तेजित हो कर बोली, ‘‘ठीक है दीदी, आप अपनी बेटी को हाउसवाइफ बनाओ, मेरी बेटी ने इंजीनियरिंग घर में बैठने के लिए नहीं की है.’’ उस के इस तीखे जवाब से अरुणा का मन कसैला सा हो गया. उस ने चुप रहना ही उचित समझा. रात को आशा और उस के पति एक कमरे में, बाकी सभी दूसरे कमरे में सोने चले गए. आशा की बेटियां जैसे मौके की तलाश में थीं, बोलीं, ‘‘मौसी, आप तो ममा से बड़ी हैं न. फिर वे क्यों आप की बात नहीं सुनतीं? मुझे उन का आप से इस तरह का व्यवहार बिलकुल अच्छा नहीं लगता, पता है हम अपने घर में कुछ भी अपने मन का नहीं कर सकते. हमारे लिए सारे निर्णय वे ही लेती हैं, पापा की भी नहीं सुनतीं. अदिति कितनी अच्छी है न, कि उसे आप जैसी मां मिलीं.’’

‘‘नहीं बेटा, ऐसा कुछ नहीं है, अपनीअपनी सोच है, समय सब ठीक कर देगा.’’ इतना कहते ही अरुणा को नींद ने घेर लिया, लेकिन तीनों बहनों का वार्त्तालाप रातभर चलता रहा. अगले ही दिन भारी मन से अरुणा ने अपनी बहन से विदा ली. उस ने 1-2 दिन और रुकने के लिए उस से कहा. ‘‘नहीं, तेरे जीजाजी को खानेपीने की तकलीफ हो रही होगी,’’ अरुणा ने बहाना बनाया, जबकि आशा भी जानती थी कि वे बहुत अच्छा खाना पकाते हैं, फिर भी उस ने बात अनसुनी कर दी. अपनी बेटी को होस्टल छोड़ते हुए अरुणा वापस अपने घर पहुंच गई. समय बीतता गया.

अरुणा की बेटी, अदिति की सगाई एक कपड़े के व्यावसायिक परिवार में हो गई. लड़का पढ़ालिखा था और अकेला होने के कारण पिता के कपड़े के व्यवसाय से ही जुड़ा हुआ था. उस ने ही अदिति को किसी समारोह में देख कर पसंद किया था. अरुणा तथा उस के पति ने उन की सामाजिक स्थिति को देखते हुए कहा कि वे उन की हैसियत के अनुसार विवाह में खर्च नहीं कर पाएंगे, तो प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा कि उन्हें सिर्फ उन की बेटी चाहिए और कुछ नहीं.

विवाह में आशा भी अपनी दोनों बेटियों के साथ आई थी. नेहा को देख कर, कई लोगों ने उस के रिश्ते की बात चलाई, तो उस ने अहंकारभरी आवाज में उत्तर दिया कि अभी 2 साल वह और नौकरी कर ले, उस के बाद ही वह उस का विवाह करना चाहती है. तब तक उस का पैकेज 24 लाख रुपए का हो जाएगा. लेकिन शर्त यह है कि लड़का इंजीनियर हो, दूसरा, लड़के का पैकेज नेहा के पैकेज से अधिक होना चाहिए.

नेहा अपनी मां की बात बड़े ध्यान से सुन रही थी. अदिति का विवाह धूमधाम से हो गया. बेटी को विदा करने के बाद सभी मेहमान एकएक कर के वापस चले गए, सिर्फ आशा अपने परिवार के साथ 2 दिनों के लिए रुकी थी. विवाह के अगले ही दिन आशा की बेटी नेहा ने कहा, ‘‘ममा, मैं थोड़े दिन मौसी के पास रहना चाहती हूं, जिस से इन को अदिति की कमी न महसूस हो. मैं औफिस से छुट्टी ले लूंगी, प्लीज ममा मना मत करना.’’

‘‘तेरा दिमाग तो नहीं खराब हो गया? यहां हापुड़ में रह कर क्या करेगी? टाइम वैस्ट होगा. न कोई घूमने की जगह…’’ इस से पहले कि आशा अपनी बात पूरी करे, नेहा बोली, ‘‘मुझे मौसी के साथ कुछ दिन रहना है, जिस से कि मैं इन से कुछ अच्छे संस्कार ले सकूं.’’

‘‘मतलब, तू अदिति जैसा जीवन जीना चाहती है. तुझे इसी दिन के लिए इंजीनियरिंग करवाई है मैं ने?’’

‘‘क्या बुराई है ममा, मैं अपने सहयोगी चेतन से विवाह करने वाली हूं और उस की मां की तबीयत ठीक नहीं रहती है, इसलिए मुझे नौकरी छोड़ कर घर पर रहना पड़ेगा. आप तो किटी पार्टी और क्लब में इतनी बिजी रहती हैं कि मुझे कुछ सीखने को मिला ही नहीं, इसलिए इन के पास रह कर कुछ लड़कियों वाले गुण सीखूंगी, जिस से चेतन और उस की मां को खुश रख सकूं.’’

‘‘चेतन, जो तेरा सबौर्डिनेट है, उस से विवाह करेगी, ऐसा तू ने सोचा भी कैसे?’’

‘‘ममा, अभी तक अपना जीवन आप के अनुसार जीती आई हूं, अब अपने विवाह का निर्णय मैं स्वयं लेना चाहती हूं. यह मेरा व्यक्तिगत मामला है.’’ आशा अवाक अपनी बेटी का मुंह देखती रह गई. नेहा, जिस ने कभी उस के सामने मुंह भी नहीं खोला था, उस को जवाबसवाल करते देख कर आशा भौचक्की रह गई थी. अरुणा ने नेहा को समझाते हुए कहा, ‘‘नहीं बेटा, ममा से इस तरह बात नहीं करते.’’ अरुणा की बात बीच में काट नेहा बोली, ‘‘यह तो मैं ने इन से ही सीखा है, नानी को और आप को भी तो ये इसी तरह जवाब देती हैं. मैं तंग आ गई हूं इन की तानाशाही से, अपने मन का कुछ कर ही नहीं सकती.’’

इतना कह कर नेहा रोंआसी हो कर सोफे पर बैठ गई. आशा को अपनी बेटी के इस अप्रत्याशित रूप को देख कर बहुत धक्का लगा, और धम्म से अपना सिर पकड़ कर सोफे पर बैठ गई तो अरुणा उसे गले लगाते हुए बोली, ‘‘आशा, मेरी बहन, आजकल के बच्चे हमारे जमाने वाले नहीं हैं. इन की डोर जितनी खींचोगे, उतनी ही दूर ये टूट कर जा गिरेंगे, आवश्यकतानुसार ही डोर खींचनी चाहिए. मैं बड़ी हूं, इसलिए समझा रही हूं, बुरा मत मानना.’’

‘‘नहीं दीदी, मेरी आंखें खुल गई हैं, मुझे माफ कर दीजिए, किसी ने सच कहा है, अपनी औलाद ही मांबाप को एक न एक दिन सबक सिखाती है,’’ आशा इतना बोल कर सुबकने लगी. आशा बीता वक्त तो लौटा नहीं सकती थी लेकिन भविष्य को तो संवार सकती थी. Family Story In Hindi

Family Story In Hindi: मिजाज

Family Story In Hindi: तेजतर्रार माधवी बचपन से ही बड़ी उत्साही थी. पढ़ाई के अलावा वह दूसरी तमाम गतिविधियों में भी अव्वल रहती थी. उस की बड़ी बहन मनीषा थी. मनीषा उस से 5 साल बड़ी थी, जो पढ़ाई के साथसाथ बरताव में भी बेहद संजीदा थी.

घर का छोटा बच्चा अकसर चंचल स्वभाव का होता है और लापरवाह भी, सो माधवी भी वैसी ही थी. खूब शरारती और झगड़ालू, पर अपने तेज दिमाग और मनीषा की छोटी बहन होने के चलते वह सजा पाने से बची रहती थी. इस वजह से उस के भीतर एक अलग ही तरह का अहंकार जन्म ले कर फलताफूलता जा रहा था.

यह सब माधवी के शुभचिंतक देख तो रहे थे, पर उस को थाम पाने में नाकाम थे. कालेज में दाखिला लेते समय तक वह एक बिंदास और बेखौफ लड़की बन चुकी थी.

माधवी की बड़ी बहन मनीषा मैडिकल की पढ़ाई करने दूसरे शहर चली गई थी और माधवी प्रशासनिक सेवा में जाने की मंशा से एक नामी कालेज की आर्ट्स फैकल्टी में दाखिला ले चुकी थी.

पहले साल से ही कालेज के खुले माहौल ने माधवी को कालेज की राजनीति की तरफ खींच लिया था. कालेज के गुंडा टाइप छात्र भी उस के खतरनाक बरताव का सामना करने से डरते थे.

दूसरे साल में ही माधवी अपने कालेज छात्र संघ की अध्यक्ष बन गई. उस को अपने इस काम में इतना मजा आने लगा कि वह अपने दूसरे मकसद को तो बिलकुल भुला ही बैठी. अहंकार उस के दिमाग में इस कदर जम कर बैठ गया कि जो उसे सही सलाह देने की कोशिश करता, वह उस के गुस्से का सामना करता.

ग्रेजुएशन की डिगरी हाथ में आने तक माधवी का पढ़ाई से पूरी तरह मोह भंग हो चुका था. पर पूरे कालेज में वह एक जानापहचाना नाम बन चुकी थी. उस से डरने वाले लोग काफी थे, पर चाहने वाले भी इतने तो थे ही जो उस के अहंकार को सींच कर उस का पोषण बराबर करने में कमी न रखते.

ऐसे में माधवी के ब्याह के लिए प्रस्ताव घर पर आने लगे और एक बड़े नेता के बेटे मोहन के साथ बड़ी जद्दोजेहद के बाद उस के मातापिता ने उसे शादी करने के लिए राजी कर लिया था.

माधवी की बड़ी बहन मनीषा पिछले साल ही ब्याह की डोर में बंध चुकी थी और उस के समझाने पर ही माधवी ने भी शादी के बंधन में बंधने की बात मान ली.

माधवी समेत घर वालों ने यह बात स्वीकार कर ली थी कि प्रशासनिक सेवा में चयन होने का रास्ता अब बहुत दूर जा चुका है. शादी होने के बाद मायके से 500 किलोमीटर दूर ससुराल में माहौल पूरी तरह अलग था.

यह एक संयुक्त परिवार था, जहां माधवी से उम्र और रिश्ते में बड़े लोग काफी थे. मोहन नाम की वकालत करता था, पर कारोबार व राजनीति में रसूख रखने वाले परिवार से संबंधित होने से सभी लोग अमीर थे.

गांठ के पूरे थे, मगर आदत से वही पुरातनपंथी.

इस परिवार को रूढि़वाद ने अभी तक अपने शिकंजे से छुटकारा नहीं दिया था खासकर माधवी की सास की बहू से उम्मीदें उस की ज्यादातर इच्छाओं के उलट थीं.

थोड़े महीनों में ही परिवारिक खटपट ने कलह का रूप लेना शुरू कर दिया. बोलने में तेजी और खुले विचारों वाली माधवी को एक खराब और बेहया बहू का खिताब दिलवा दिया.

एक साल जैसेतैसे कटा, पर उस के बाद अलग घर में रहना मजबूरी हो गई. तब तक माधवी पेट से भी हो चुकी थी. मोहन उस का ध्यान तो रखता था, पर उस के दूसरी औरतों से भी नाजायज रिश्ते थे.

तेज नजर रखने वाली माधवी से यह बात कब तक छिपती. अपने हक से समझौता करना उस ने कभी सीखा ही नहीं था. लिहाजा, मोहन से ?ागड़े विकराल रूप लेने लगे.

जैसेतैसे 2 साल बीत गए और माधवी मां की जिम्मेदारी निभाती कुछ बिजी हो गई और मोहन घर के बजाय बाहर ज्यादा वक्त बिताने लगा.

मोहन का एक कुंआरा दोस्त सागर अकसर घर आया करता था, जिस से माधवी भी बेझिझक काम करवा लेती थी. भरोसे का होने से मोहन ने भी कभी रोकटोक नहीं की, पर सास जो पहले से ही उस की बदजबानी से गुस्सा थी, उस ने इस बात पर तूफान मचाना शुरू कर दिया.

माधवी ने भी जम कर खिलाफत की और बिना बात का लांछन अपने ऊपर लगाने से सास को खूब खरीखोटी सुना दी.

सास के अहम को इतनी ठेस पहुंची कि उस ने माधवी को उस के ही घर से जबरन बेदखल करवा दिया. बीचबचाव में मोहन की कोशिश धरी रह गई.

9 महीने का बच्चा गोद में और एक महीने का गर्भ पेट लिए गुस्साई माधवी मायके जाने के लिए बसस्टैंड आ गई, पर वह बस में चढ़ने के बजाय मोहन के उसी दोस्त सागर के घर चली गई.

सागर अकेला ही रहता था. उस के धर्मसंकट में आखिर एक आसरे की इच्छा रखने वाली औरत की पुकार की जीत हुई. उस ने माधवी को शरण दी.

माधवी को भरोसा था कि आज नहीं तो कल मोहन उसे समझ जाएगा और लेने आएगा, पर हफ्ता गुजर गया और मोहन को खबर भिजवाने के बावजूद वह माधवी से मिलने तक नहीं आया.

सागर ने भी मोहन को सम?ाने की पूरी कोशिश की, पर उलटा उस को भी लांछन के तीरों से बुरी तरह घायल होना पड़ा.

माधवी के मातापिता को भी पता चलते ही वे दौड़े आए. बेटी, दामाद और समधन से बातचीत कर समझाने की भरपूर कोशिश की, पर टूटी डोर को जोड़ने में कामयाबी न मिल सकी.

गुस्से ने अब बदले का रूप ले लिया था. माधवी ने सागर के सामने शादी का प्रस्ताव रखा. पहले तो वह कुछ अटका, मगर फिर हालात और माहौल को देख कर उस ने स्वीकार कर लिया.

कुछ महीनों पहले ही मोहन से तलाक और सागर से माधवी की कोर्टमैरिज हो गई. बेटे की कस्टडी भी पहले पति को मिल गई. जिंदगी में पहली बार माधवी अपनेआप को लाचार महसूस कर रही थी. एक बेटे को खोने का गम और दूसरे बच्चे का कुछ महीने में इस दुनिया में आने का संघर्ष उस के मन को तोड़ रहे थे, पर नए पति ने उस को बेहतर ढंग से समझाते हुए पूरा हौसला दिया और उस ने एक और बेटे को जन्म दिया.

राजसी ठाटबाट अब नहीं थे. एक स्कूल में टीचर पति अपने सीमित साधनों से माधवी की पूरी देखरेख कर रहा था. माधवी भी अब नौकरी तलाशने लगी और एक प्राइवेट स्कूल में उस ने पढ़ाना शुरू कर दिया. साथ ही, उस ने अपने आसपास के लोगों से मेलजोल बढ़ाना शुरू कर दिया.

आसपास ज्यादातर लोग गरीब थे. माधवी सब की मदद करने लगी. उस का तेज दिमाग लोगों की समस्याओं को सुलझाता और बेबाक बोली अपना असर छोड़ती.

दरअसल, वह सच का ही पक्ष लेती. समाज भी सच की फुसफुसाहट को जान और पहचान तो लेता ही है. वह एक मुहावरा बनती गई. कोई ‘शेरनी’ कहता था, कोई ‘झांसी की रानी’.

कुछ सालों में ही माधवी पूरे महल्ले में मशहूर हो गई. अपने स्कूल की भी वह अहम किरदार बन गई. उसे स्कूल का वाइस प्रिंसिपल बना दिया गया था.

अब नगरनिगम के चुनाव होने वाले थे और माधवी के महल्ले के कई लोग उसे अपने वार्ड में निर्दलीय पार्षद खड़ा होने के लिए कह रहे थे.

माधवी ने राजनीति में कदम रखने का फैसला कर लिया. लोगों से खूब समर्थन मिला और वह जीत गई.
अब माधवी अपने बच्चे के साथ अपने क्षेत्र के लोगों का भी ध्यान रखने लगी. अगले चुनाव में एक राष्ट्रीय पार्टी से उसे मेयर का टिकट औफर हुआ, जिसे उस ने स्वीकार कर लिया.

विरोधी पार्टी ने भी माधवी के पहले पति मोहन को मेयर का टिकट दिया था. चुनाव प्रचार में एक बार फिर उस पर लांछन लगा और बदनाम कर हराने के हथकंडे अपनाए गए. पर वह अपने किए गए कामों से लोगों के दिलों में जगह बना चुकी थी. उस की टीम ने दिल लगा कर पूरे जोश से प्रचार किया और अब वह शहर की मेयर थी.

शायद समय ने माधवी की जीवनधारा को इसी तरह बहाने का तय किया था. Family Story In Hindi

News Story In Hindi: जहाज बना आग का गोला

News Story In Hindi: 20 जून, 2025 की शाम. विजय और अनामिका आज 2 नाइट के लिए द्वारका के रैडिसन ब्लू होटल में रुके हुए थे. अनामिका के जन्मदिन पर तो विजय के साथ खतरनाक प्रैंक खेला गया था, जिस में अनामिका के दोस्तों ने उस की धुलाई कर दी थी. तब भी विजय अनामिका के साथ होटल में रात बिताना चाहता था, पर ऐसा हो नहीं पाया था.

फिलहाल तो विजय और अनामिका अपने रूम में थे. अनामिका अभीअभी नहा कर बाहर आई थी. गीले खुले बाल उस की खूबसूरती को बढ़ा रहे थे. सफेद रंग की शौर्ट ढीली टीशर्ट के अंदर उस ने कुछ नहीं पहना था. नीचे हलके गुलाबी रंग का पाजामा था.

विजय बालकनी में खड़ा था.

उसे बाथरूम का दरवाजा खुलने की आवाज आई, तो वह कमरे में आ गया. अनामिका को इस सैक्सी रूप में देख कर उस का मन मचल गया.

अनामिका समझ गई कि अब विजय के दिल में खुराफात ने जन्म ले लिया है, तो वह वहीं से बोली, ‘‘कोई भी फालतू की हरकत मत करना. मैं दोबारा नहाने के मूड में नहीं हूं. मुझ से दूर ही रहना.’’

‘‘पर यह तो सरासर चीटिंग है. तुम अकेलेअकेले नहा ली और अब मुझे करीब आने से मना कर रही हो. अब कहीं कली खिल रही हो तो भंवरा तो उस का रस चूसने के लिए आएगा ही न,’’ विजय ने इतना कहा और अनामिका को अपनी बांहों में जकड़ लिया.

अनामिका कुछ देर के लिए छटपटाई, पर विजय की मजबूत गिरफ्त से छूट न सकी.

विजय ने अनामिका को अपनी गोद में उठा लिया और बिस्तर पर पटक दिया. अनामिका समझ गई कि अब विजय नहीं मानेगा, तो उस ने भी ज्यादा नानुकर नहीं की.

थोड़ी देर में ही वे दोनों बिस्तर में थे और एकदूसरे के जिस्म से खेल रहे थे. रात के 9 बजे तक उन्होंने एकदूसरे का 2 बार बिस्तर पर साथ दिया और निढाल हो कर पड़ गए.

विजय की आंखों में शरारत थी, तो अनामिका बारबार उसे घड़ी दिखा रही थी कि डिनर का टाइम होने वाला है.

विजय ने कहा, ‘‘हम दोनों शानदार डिनर करेंगे, पर उस से पहले एकसाथ शावर लेंगे.’’

अनामिका समझ गई कि अभी भी विजय उस के जिस्म से खेलना चाहता है. वह जल्दी से उठ कर वाशरूम की तरफ भागी, पर दरवाजा बंद करने से पहले ही विजय भी उस के साथ वाशरूम में जा घुसा.

वे दोनों आधा घंटे के बाद वाशरूम से निकले. फिर 15 मिनट के बाद दोनों रैस्टोरैंट में बैठे थे. अभी डिनर सर्व नहीं हुआ था कि अनामिका का मोबाइल फोन बज उठा.

उधर से किसी लड़की की आवाज आई, ‘नमस्ते दीदी.’

अनामिका वह आवाज नहीं पहचान पाई. उस ने कहा, ‘‘नमस्ते. पर आप हैं कौन? मैं ने आप को पहचाना नहीं?’’

‘अरे दीदी, मैं डाक बाबू की बेटी देविका बोल रही हूं,’ उधर से दोबारा आवाज आई.

‘‘अरे देविका. अब पहचान लिया. कैसी हो? अपनी दीदी को कैसे याद कर लिया?’’ अनामिका ने कहा.

‘दीदी, मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से बोल रही हूं. अभी उतरी हूं. आप मुझे अपना पता बता दो. मुझे आप के पास आना है,’ देविका ने कहा.

‘‘पर देविका, अभी तो मैं अपने दोस्त के साथ होटल में हूं…’’ अनामिका ने इतना कहा, तो तभी विजय ने धीरे से कहा कि देविका को यहीं बुला लो. इतनी रात को कहां जाएगी. मैं होटल के मैनेजर से बात कर लूंगा. वह मेरे दोस्त का खास दोस्त है. वह कुछ न कुछ इंतजाम कर देगा.

अनामिका देविका से बोली, ‘‘तुम ऐसा करो कि मैट्रो ट्रेन से द्वारका सैक्टर 13 आ जाओ. यहां से हम तुम्हें ले लेंगे.’’

‘पर दीदी, मैं अकेली कैसे आऊंगी?’ देविका ने झिझकते हुए कहा.

‘‘बड़ा आसान है. किसी भी पुलिस वाले से पूछ लेना. वे लोग सही तरीका बता देंगे द्वारका आने का. वैसे, तुम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से पहले राजीव चौक की मैट्रो लेना और वहां से द्वारका सैक्टर 21 वाली मैट्रो में बैठ जाना. वहां तुम्हें हम मिल जाएंगे,’’ अनामिका ने समझाया.

‘ठीक है दीदी, मैं कोशिश करती हूं,’ देविका ने कहा.

‘‘कहीं भी किसी तरह की कोई दिक्कत हो, तो तुम फोन कर लेना. और हां, जब तुम उत्तम नगर पहुंच जाओ, तो मुझे फोन कर लेना. हम द्वारका सैक्टर 13 के मैट्रो स्टेशन पर तुम्हें लेने आ जाएंगे,’’ अनामिका ने देविका का हौसला बढ़ाया.

फोन काटने पर विजय ने अनामिका से पूछा, ‘‘यह देविका है कौन? पहले तो कभी तुम्हारे मुंह से इस का जिक्र नहीं सुना.’’

‘‘यह हमारे पड़ोस के डाक बाबू की बेटी है. अब यह अचानक दिल्ली क्यों आई है, यह तो मुझे भी नहीं पता,’’ अनामिका ने थोड़ा चिंतित होते हुए कहा.

रात के 11 बजे विजय, अनामिका और देविका होटल के कमरे में थे. दरमियाने कद की सांवले रंग की देविका फ्रैश हो चुकी थी. डिनर वह ट्रेन में ही कर चुकी थी, तो उस ने कहा, ‘‘दीदी, मुझे तो बड़ी तेज नींद आ रही है. कहां सोना है?’’

अनामिका बोली, ‘‘तुम सोफे पर सो जाओ.’’

‘‘आप कहां सोएंगी?’’ देविका ने पूरे कमरे पर नजर दौड़ाते हुए कहा. वहां डबल बैड के अलावा और कुछ नहीं था.

‘‘मैं और विजय इस डबल बैड पर सोएंगे,’’ अनामिका ने कहा.

यह सुन कर देविका हैरान रह गई. उसे पता था कि अनामिका दीदी ने अभी शादी नहीं की है, फिर शादी से पहले वे किसी लड़के के साथ एक ही बिस्तर पर सोएंगी…

पर फिलहाल देविका को गहरी नींद आ रही थी, तो वह सोफे पर सो गई.

देर रात हो गई थी, तो विजय और अनामिका भी सो गए.

अगली सुबह विजय, अनामिका और देविका रैस्टोरैंट में नाश्ता करने बैठे थे. वहां कई विदेशी भी बैठे हुए थे. देविका बड़े होटल का माहौल देख कर हैरान थी और उसे समझ नहीं आ रहा था कि विजय और अनामिका शादी से पहले ही शादीशुदा जोड़े की तरह क्यों रह रहे हैं.

‘‘दीदी, मुझे तो दिल्ली का माहौल बिलकुल भी समझ नहीं आया. आप का और इन साहब का रिश्ता क्या है, जो शादी से पहले ही…’’ देविका ने अपने मन की बात रखी.

यह सुन कर अनामिका हंस दी और बोली, ‘‘इन साहब का नाम विजय है और ये मेरे बौयफ्रैंड हैं. हम दोनों यहां होटल में मेरा जन्मदिन मनाने आए हैं.’’

‘‘लेकिन तुम यहां अचानक दिल्ली में कैसे?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘विजय साहब, मुझे मुंबई से एक सिंगिंग कंपीटिशन में गाने के लिए बुलाया है. मेरा सिलैक्शन हो गया है. मेरे साथ कोई एक और जना वहां जा सकता है, तो मैं ने दीदी का नाम लिखवा दिया. ये पढ़ीलिखी हैं और मुंबई में मेरा साथ देंगी,’’ देविका ने कहा.

‘‘अरे, तुम ने पहले क्यों नहीं बताया… बधाई हो. कब जाना है वहां?’’ अनामिका खुश हो कर बोली.

‘‘दीदी, परसों चलेंगे. आप हवाईजहाज की टिकट करवा देना. वे लोग हम दोनों का हवाईजहाज से आनेजाने और वहां रहनेखाने का पूरा इंतजाम करेंगे,’’ देविका ने बताया.

‘‘ठीक है. मैं तुम्हारे साथ चलूंगी,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘हवाईजहाज से… दिमाग तो नहीं खराब हो गया है. 12 जून का हादसा भूल गई. ट्रेन की टिकट करा लो,’’ विजय ने कहा.

‘‘12 जून को क्या हुआ था?’’ देविका ने पूछा.

‘‘अरे, तुम्हें पता ही नहीं…’’ विजय हैरान था.

‘‘गांव में रहने की वजह से ज्यादा तो नहीं पता. आप ही बता दो कि ऐसा क्या हुआ था, जो आप इतना बौखला गए,’’ देविका बोली.

विजय ने बताया, ‘‘गुजरात के अहमदाबाद में गुरुवार, 12 जून को एयर इंडिया का एक हवाईजहाज क्रैश हो गया. यह बोइंग हवाईजहाज अहमदाबाद से लंदन जा रहा था और उड़ान भरने के 2 मिनट बाद ही एयरपोर्ट से सटे मेघानीनगर इलाके में हादसे का शिकार हुआ.

‘‘इस हवाईजहाज में 12 क्रू मैंबरों (2 पायलट भी) और 230 सवारियों समेत कुल 242 लोग सवार थे. इस हवाईजहाज में गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके विजय रुपाणी भी सवार थे.’’

‘‘ओह, यह तो बहुत बड़ी अनहोनी हो गई,’’ देविका के मुंह से निकला.

‘‘खबरों के मुताबिक, हवाईजहाज में उस समय 169 भारतीय, 53 ब्रिटिश, 7 पुर्तगाली और एक कनाडाई नागरिक सवार थे. हवाईजहाज का एक हिस्सा मेघानीनगर में बने रैजिडैंट डाक्टर्स के होस्टल पर जा कर गिरा और वहीं अटक गया. इस के बाद होस्टल में अफरातफरी मच गई.

‘‘हवाईजहाज का हिस्सा टकराने से बिल्डिंग में आग लग गई और पूरी इमारत खंडहर में बदल चुकी है. इमारत में मौजूद कई लोग घायल हुए, जिन्हें अस्पताल पहुंचाया गया. कुछ की तो जान भी चली गई,’’ विजय ने आगे बताया.

‘‘इस के बाद सरकार ने क्या कदम उठाए?’’ देविका ने पूछा.

‘‘इस हादसे के तुरंत बाद इमरजैंसी रिस्पौंस टीम की तैनाती मौके पर कर दी गई थी. दमकल, बीएसएफ और एनडीआरएफ की टीमों ने पहले दुर्घटनास्थल पर आग बुझाने का काम किया और हवाईजहाज के मलबे को हटाया गया. क्रैश प्लेन बोइंग का 787-8 ड्रीमलाइनर था, जो तकरीबन 11 साल पुराना बताया गया.’’

‘‘फिर तो बहुत सारे लोग मर गए होंगे,’’ देविका ने चिंता जताई.

विजय ने कहा, ‘‘इस हादसे के बाद अहमदाबाद पहुंचे गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, ‘‘सवा लाख लिटर ईंधन होने के चलते तापमान इतना ज्यादा था कि किसी को बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं थी.’’

‘‘क्या कोई भी जिंदा नहीं बचा?’’ देविका ने पूछा.

‘‘बस एक आदमी ही जिंदा बच पाया. समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर जीएस मलिक ने फोन पर बताया कि एक शख्स विश्वास कुमार रमेश जिंदा बचा है, जो बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर हवाईजहाज की सीट 11ए पर था.’’

‘‘जिस होस्टल पर वह हवाईजहाज गिरा था, क्या वहां भी लोग मरे?’’ देविका ने चिंतित हो कर पूछा.

‘‘जो पहली सूचना मिली थी, उस के मुताबिक, बीजे मैडिकल कालेज और सिविल अस्पताल की डीन मीनाक्षी पारिख ने बताया कि इस हादसे में 4 छात्रों और छात्रों के 4 परिजनों की मौत हुई थी,’’ विजय बोला.
‘‘वहां तो बड़ा ही भयावह मंजर रहा होगा,’’ देविका ने कहा.

‘‘मैं ने बीबीसी पर खबर पढ़ी थी. उस के मुताबिक, सब से पहले छत को हवाईजहाज के पंख ने चीर दिया, उस के बाद फ्यूसलेज (हवाईजहाज का मुख्य हिस्सा) गिरा. जब मुख्य हिस्सा गिरा, तो उस से सब से ज्यादा नुकसान हुआ.

‘‘इस अफरातफरी में छात्र जान बचाने के लिए इमारत से कूदने लगे. यहां तक कि इमारत के दूसरे और तीसरे माले से भी. बाद में छात्रों ने बताया कि होस्टल की एकमात्र सीढ़ी का रास्ता मलबे की वजह से बंद हो गया था.’’

‘‘उफ, बड़ा ही भयावह मंजर रहा होगा,’’ देविका अपने दिल पर हाथ रख कर बोली.

‘‘अरे, सोचो न कि लोग इतनी बुरी तरह से जल गए कि उन के शवों की पहचान डीएनए टैस्ट के जरीए शुरू की गई. हवाईजहाज के हादसों में कोई नहीं बचता है. मैं इसलिए तो बोल रहा हूं कि तुम दोनों रेल से मुंबई चली जाओ,’’ विजय ने अपनी बात रखी.

‘‘यह क्या बात हुई… एक हादसे के बाद क्या लोग हवाईजहाज में बैठना छोड़ तो नहीं देंगे,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘लेकिन रेल से जाने में क्या बुराई है?’’ विजय ने अपनी बात रखी.

‘‘बात रेल या बस से जाने की नहीं है. हादसा तो घर से बाहर निकलते ही हो सकता है. इस हादसे में उन होस्टल वालों का क्या कुसूर था, जो कैंटीन में बैठे खाना खा रहे थे? वे तो हवाईजहाज से सफर भी नहीं कर रहे थे,’’ अनामिका बोली.

थोड़ा रुक कर अनामिका ने दोबारा कहा, ‘‘तुम जानते हो कि रेल हादसों में भी लोग अपनी जान गंवा देते हैं. एक खबर के मुताबिक, 2023-24 में 40 रेल हादसों में कम से कम 313 लोगों की मौत हुई थी. ऐसा ही कुछ सड़क हादसों में भी होता है. देशभर में हर घंटे 53 सड़क हादसे हो रहे हैं और हर 4 मिनट में एक मौत होती है.’’

‘‘अरे, विजय साहब… इतना भी मत डरिए. मुझे और दीदी को हवाईजहाज से मुंबई जाने दीजिए. मेरी जैसी गांवदेहात की लड़की को दोबारा हवाईजहाज में बैठने का मौका कब मिलेगा, कोई नहीं जानता. फिर कौन सा हम अपने खर्च पर जा रही हैं. इतना भी अनहोनी से मत डरिए. चलो, अब नाश्ता करते हैं, मुजे बहुत तेज भूख लगी है,’’ देविका ने कहा. यह बात सुन कर उन तीनों के चेहरों पर मुसकान खिल उठी. News Story In Hindi

Family Story In Hindi: झूठी शान

Family Story In Hindi: अपने फ्लैट की बालकनी में दीपा खड़ी दिखाई दी. वह वहीं से आवाज देती हाथ के इशारे से बुला रही थी, ‘‘दीदी, ओ दीदी. कहां जा रही हो? आओ न… बगल से आने की सीढ़ी है.’’

रेखा चंद पलों तक दीपा को देखती रह गई. पहले से उस का रंग साफ हो गया था. जिस्म पर मांस भी चढ़ आया था. गाल भर आए थे. बाल भी ढंग से संवार रखे थे. कत्थई रंग की साड़ी और नीले ब्लाउज में वह खिल रही थी.

पहले दीपा गंवारों की तरह रहती थी. बातें भी बेवकूफों की तरह करती थी. चेहरा हमेशा तना रहता. अपने को ‘किराएदार’ समझ कर दुखी रहती. कभीकभार ऐंठ कर कह भी देती, ‘‘भाड़ा दे कर रहती हूं मुफ्त में नहीं…’’ तब वह रेखा के मकान में ही किराएदार की हैसियत से रहती थी.

तब रेखा ने दीपा को मकान देने से पहले सोचा था कि दोनों सहेलियों की तरह रहेंगी. उस ने कभी मकान मालकिन होने का रोब भी नहीं गांठा था. पर न जाने क्यों दीपा हमेशा दबीदबी रहती थी. अपने पति रमेश को डब्बा थमा कर कारखाने भेजती और कमरे में कैद हो जाती, टैलीविजन से दिल बहलाती.

कभीकभी दीपा सुनाती, ‘‘मेरा अपना मकान होता तो उसे सलीके से सजाती, कीमती साजसामान रखती.’’
रेखा कह देती, ‘‘हम ने तो मकान बनाने में ही इतने रुपए खर्च कर दिए कि नया और कीमती सामान खरीद ही नहीं पाए. प्रशांत की नौकरी से मकान बन गया, यही काफी है. अब आधा हिस्सा भाड़े पर उठा दिया है कि हाथ तंग न रहे.’’

भाड़े का नाम सुनते ही दीपा भड़क उठती. मुंह टेढ़ा कर लेती. तब रेखा कहती, ‘‘दीपा, मैं ने तुम्हें भाड़े के लिए नहीं, साथ हंसनेबोलने और अकेलापन दूर करने के लिए रखा है. प्रशांत दफ्तर जाते हैं तो मैं अकेली घर में रहती हूं. कोई दूसरा तो है नहीं कि गपशप मारूंगी. तुम्हारे पति भी दिन में काम पर जाते हैं. क्यों नहीं आ जाती मेरे पास… या अपने दरवाजे खुले रखो, मैं ही आ बैठूंगी.’’

‘‘मैं बंद कमरे में किसी दूसरे को ले कर पड़ी तो नहीं रहती न दीदी. कामकाज से थकी रहती हूं बस, आंख लग जाती है.’’

‘‘हंसनेबोलने से भी थकान दूर हो जाती है.’’

‘‘तुम अपने को बड़ी गुणी और तेज समझती हो दीदी… यही मुझे अच्छा नहीं लगता,’’ दीपा की बातों से रेखा झुंझला जाती.

‘‘दीपा, तुम्हें अगर मैं अच्छी नहीं लगती और तुम सहेली बन कर नहीं रह सकती तो कहीं और मकान ढूंढ़ लो.’’

तब दीपा ऐंठ कर बोलती, ‘‘दिखाने लगी न मालिकाना रुख.’’

फिर कुछ महीने बाद दीपा दूसरे मकान में चली गई. उस की जगह सुधा आ गई. वह बातबात में हंसनेहंसाने वाली और सलीकेदार औरत थी.

रेखा सुधा के साथ सीढि़यां चढ़ कर ऊपर आई. दीपा ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘आप कौन?’’ उस ने सुधा के बारे में जानना चाहा.

सुधा बोली, ‘‘मैं दीदी की किराएदारिन हूं. बड़ा सुखचैन है इन के यहां…’’

‘‘सुखचैन?’’ दीपा हंस पड़ी, ‘‘यहां जैसा तो नहीं होगा. यहां कंपनी की बिजली और पानी है. वहां की तरह बारबार बिजली गायब नहीं हो जाती कि अंधेरे में रहो और गरमी सहो. फिर वहां तो कुएं का पानी पीना पड़ता है.’’

रेखा को दीपा की बात तीर सी लगी. उसे महसूस हुआ जैसे दीपा ने शायद उसे जलील करने के लिए बुलाया है. सच ही उस का मकान कंपनी के इलाके से बाहर था, इसलिए सरकारी बिजली लेनी पड़ी थी, जो आतीजाती रहती थी.

दीपा ने दोनों को सोफे पर बैठाया. पहले सोफा नहीं था. शायद फ्लैट में आने के बाद नया ले लिया था.

फिर दीपा दूसरे कमरे में गई और 2 गिलासों में फ्रिज का ठंडा पानी ले आई. 2 प्लेटों में बिसकुट और नमकीन भी थी.

‘‘दीदी, चाय बनाऊं या कौफी? कहो तो शरबत…?’’

‘‘नहींनहीं… यही काफी?है,’’ रेखा जल्दी से बोली.

‘‘मेरी बचत की न सोचो दीदी, भले ही खुद बचत कर के कोठी बना लो,’’ दीपा हंस कर बोली. रेखा भला क्या बोलती, वह सुधा की ओर देखने लगी.

पानी पीते हुए रेखा पूछ बैठी, ‘‘दीपा, क्या कंपनी की ओर से यह फ्लैट मिला है?’’

‘‘नहीं, भाड़े पर लिया है. इन के एक दोस्त को मिला था. पर उस का अपना मकान है, बस्ती में. वह फ्लैट में आना नहीं चाहता था, सो हमें भाड़े पर दे दिया. 1 लाख रुपए ‘पगड़ी’ दे कर 5,000 देने पड़ते हैं हर महीने.

‘‘बड़ा आराम है यहां. न कोई झिकझिक न कोई दबाव और न ही कोई ‘किराएदार’ कहने वाला. हम तो अपने रहनसहन को ऊंचा उठाने में लगे हुए हैं.’’

फिर वह ताना सा देती हुई बोली, ‘‘दीदी, हमारे ठाटबाट देख कर जलन तो तुम्हें हो ही रही होगी. तुम भी न जाने क्यों बस्ती में रहने पर तुली हो. अरे, अपना मकान है तो क्या हुआ ऐसा सुख तो नहीं है न वहां? देखो, चारों ओर कितना खुलाखुला है.’’

रेखा भी थोड़ी देर के लिए उदास दिल से सोचने लगी, ‘सच, अब तक मकान बनाने में रुपए फेंकती रही, कभी बढि़या सामान से घर भरने के लिए सोचा ही नहीं. सिर्फ टैलीविजन, पंखा, कुरसी, मेज होने से क्या होता है, फ्रिज, कूलर, सोफा वगैरह भी होना चाहिए.

‘पता नहीं क्यों, प्रशांत के सिर पर शानदार मकान बनाने का भूत सवार है. अब तो दूसरी मंजिल की तैयारी चल रही है.’

‘‘दीपा, अब मैं चलती हूं,’’ थोड़ी देर बाद रेखा बोली.

‘‘क्यों, सिरदर्द होने लगा है क्या?’’

‘‘नहीं, बाजार जाना है.’’

‘‘क्यों दीदी, तुम्हारे पति को कंपनी की ओर से कब तक फ्लैट मिलेगा?’’

‘‘अभी कुछ पता नहीं.’’

रेखा मन पर ढेर सारा बोझ ले कर बाहर आ गई. सुधा पर भी शायद असर हुआ था. वह बोली, ‘‘दीदी, मेरे पति को भी क्वार्टर मिलेगा तो चली जाऊंगी.’’

‘‘चली जाना, रोकूंगी नहीं.’’

‘‘बुरा तो नहीं मान गईं?’’

‘‘नहीं, जो सच है, उसे मानना ही होगा न.’’

रेखा का दिल दुखी सा हो गया. वह थोड़ी सी सब्जी ले कर घर लौट आई.

प्रशांत घर में ही था. वह मिस्तरी से ऊपरी मंजिल के बारे में बात कर रहा था.

‘‘क्या बात है रेखा? उदासउदास सी क्यों लग रही हो?’’ प्रशांत उस के पास आ खड़ा हुआ.

‘‘दीपा मिली थी… अरे वही, पहले वाली किराएदारिन.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’

‘‘उस के ठाट देखते ही बनते हैं. क्या नहीं है उस के घर में? फ्लैट में रहती है. फ्रिज, कूलर, सोफा, अलमारी, मिक्सी सब है. अपने यहां क्या है? तुम तो सिर्फ घर बनाने में लगे हो.’’

प्रशांत हंस पड़ा, ‘‘रेखा, कहो तो काम बंद कर दूं और कल ही उठा लाऊं सब सामान. पर सोचता हूं कि पहले शानदार मकान पूरा हो जाए. इस से हमारी शान बढ़ेगी, दोस्तों और रिश्तेदारों में इज्जत होगी.’’

रेखा ने प्रशांत से बहस न की. वह महसूस करने लगी कि वह अपनी जगह सही है पर दीपा के ताने उसे अब भी कांटों से चुभ रहे थे.

रेखा यह भी सोच रही थी, ‘प्रशांत को जब कंपनी की ओर से फ्लैट या क्वार्टर मिलेगा तो उस में जा कर रहनसहन को ऊंचा उठाने की कोशिश करेगी.’

उस ने एक दिन प्रशांत से पूछा, ‘‘तुम्हें कब क्वार्टर मिलने वाला है?’’

‘‘क्या तुम यहां से भागना चाहती हो? दीपा ने शायद तुम्हें दुखी कर दिया है?’’ प्रशांत बोला.

अपनी कमजोरी पकड़ी जाती देख वह उठ कर पानी पीने लगी. फिर बोली, ‘‘कुएं का पानी कुछ खारा लगता है. साफ करा देना या ब्लीचिंग पाउडर डलवा देना.’’

‘‘4 महीने पहले ही तो कुआं साफ कराया था.’’

‘‘एक फ्रिज लेना ठीक रहेगा.’’

‘‘ले लेंगे. वैसे कुएं का पानी गरमी में ठंडा और जाड़े में गरम रहता है.’’

एक दिन सुधा बोली, ‘‘दीदी, एक अच्छी सी साड़ी खरीदनी है… बाजार चलो न.’’

सुधा की जिद पर रेखा तैयार होने लगी. उसे कीमती साड़ी में देख सुधा पूछ बैठी, ‘‘दीदी, हम किसी बरात में तो नहीं जा रहे हैं?’’

‘‘अरे दीपा मिल गई तो मुझे टोक देगी. साधारण साड़ी में देख फब्ती कसेगी. उस का ठिकाना नहीं कि कब क्या बोल दे.’’

दोनों चल पड़ीं. दीपा का फ्लैट निकट आता जा रहा था.

‘‘दीदी, दीपा के घर के सामने औरतों की भीड़ क्यों है? चलो देखें तो,’’ सुधा बोली. फिर दोनों उधर बढ़ गई.

कुछ औरतें एक सब्जी बेचने वाले को घेर कर खड़ी थीं. उन के बीच दीपा का चेहरा लाल हो रहा था.

रेखा और सुधा को देख कर दीपा झल्ला कर बोली, ‘‘अरे सब्जी वाले, मैं भाग तो नहीं रही हूं. सिर्फ 300 के लिए मेरी बेइज्जती पर उतर आए हो. तनख्वाह मिलते ही पूरा चुकता कर दूंगी.’’

‘‘आप तो हर महीने यही कहती हैं बहनजी. पर देती नहीं… उलटे उधार लेती जाती हैं,’’ सब्जी वाला भुनभुनाता हुआ चला गया. दूसरी औरतें भी हंसती हुई चली गईं.

दीपा रेखा और सुधा को ऊपर ले गई. उन के बैठते ही बोली, ‘‘देखा न दीदी, बेइज्जती कर गया वह. ठीक
ही कहा गया है कि छोटों के मुंह नहीं लगना चाहिए.’’

‘‘तुम कौन सी बड़ी हो? बड़ी होती तो उधार नहीं लेती,’’ रेखा की बात से दीपा तिलमिला उठी. वह बोली, ‘‘तंगी तो हर किसी को होती है. सरकार भी उधार लेतीदेती है.’’

फिर दीपा ट्रे में 2 गिलास ठंडा पानी ले आई और बोली, ‘‘उन को बिसकुट लाने के लिए बोला था, पर नहीं लाए. रुकोगी तो शरबत बना दूंगी.’’

‘‘चलो, मैं तुम्हें बाजार में आइसक्रीम खिलाऊंगी,’’ रेखा ने कहा तो दीपा साथ चलने को तैयार हो गई. उस ने भी कीमती साड़ी पहन ली.

दुकान में घुसते ही मालिक दीपा की ओर देख कर बोला, ‘‘बहनजी, हम उधार देने से रहे… पहले ही 2,000 चढ़े हैं.’’

दीपा का चेहरा लाल हो उठा.

रेखा बोल उठी, ‘‘भाई साहब, हम नकद लेने आई हैं.’’

दीपा बीचबीच में रेखा को देख लेती थी. उस से नजर मिलाने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी.

आइसक्रीम खाते वक्त रेखा ने पूछ लिया, ‘‘क्यों दीपा, ज्यादा कर्ज तो नहीं चढ़ा लिया है, तू ने?’’

‘‘इस की परवाह मुझे नहीं. धीरेधीरे दूंगी. अपने को रुपयों की कमी नहीं. अभी हाथ तंग है. पिछले महीने मैं ने प्रेमलाल का उधार चुकता किया था.’’

‘‘प्रेमलाल को किसी प्यारेलाल से ले कर दिया होगा, यही हेराफेरी है न?’’ रेखा हंस पड़ी. दीपा का चेहरा देखते ही बनता था.

सुधा को भी हंसी आ गई, पर मुंह पर पल्लू रख लिया.

‘‘दीदी, इस में छिपाना क्या… तुम तो अपनी हो. एक बात कहूं?’’ दीपा बोली.

‘‘कहो,’’ रेखा ने कहा.

‘‘तुम मुझे 10,000 दे दो तो दूसरों के सारे कर्ज उतार दूं. उन लोगों से बातें तो नहीं सुननी पड़ेंगी. तुम्हारा कर्ज धीरेधीरे उतार दूंगी.’’

‘‘कहीं रुपए ले कर कीमती साड़ी खरीद लाई तो कर्जे रह जाएंगे. वैसे भी मैं मकान की दूसरी मंजिल बनाने में लगी हूं.’’

दीपा झुंझला गई, ‘‘तुम तो हमेशा मकान में ही रुपए लगाती रहती हो कि भाड़ा आता रहे. किसी की मदद करने से पहले भी तुम दूर रहती थीं. यह ठीक नहीं कि देखसुन कर भी बहाना बनाया जाए. अपना तो वह, जो दुख में साथ दे.’’

दीपा का साथ छूटते ही रेखा हंसने लगी. सुधा ने भी उस का साथ दिया.

घर में प्रशांत ने भी सुना तो हंस पड़ा. वह बोला, ‘‘रेखा, तुम्हारी बुनियाद मजबूत है और उन की खोखली.’’

मकान का काम पूरा हो गया तो रेखा ऊपरी मंजिल में रहने लगी. नीचे का हिस्सा किराए पर देने की सोच ही रही थी कि एक दिन दीपा आ गई.

रेखा ने पूछा, ‘‘कहो, कैसे आना हुआ?’’

‘‘तुम्हारे कुएं का पानी मीठा लग रहा है न, सो मेरा मन यहां आने को करने लगा है.’’ दीपा बोली.

‘‘मजाक मत करो.’’ रेखा बोली.

‘‘दीदी, तुम नीचे के 2 कमरे हमें ही किराए पर दे दो न… आधे में सुधा है ही. हम तीनों सहेलियों की तरह रह लेंगी. मजा भी आएगा.’’

‘‘बात क्या है, साफसाफ कहो?’’ रेखा ने पूछा.

‘‘फ्लैट मालिक हमें वह घर खाली करने को कह रहा है.’’

‘‘तुम्हारा दिल यहां नहीं लगेगा. फिर रहनसहन में भी फर्क आ जाएगा.’’

‘‘यह कहो न कि देने का मन नहीं. सोचती हूं कि तुम ही ठीक हो. तुम्हारा अपना मकान है, किसी का रोबदाब नहीं. भाड़े का झंझट नहीं… कहीं भाड़े का मकान खोजने की भागदौड़ नहीं.’’ दीपा बोली.

रेखा समझ न सकी कि क्या जवाब दे. वह उस की आदतें अच्छी तरह जानती थी.

प्रशांत ने ही हल ढूंढ़ निकाला. वह बोला, ‘‘4-5 महीने में मुझे कंपनी की ओर से क्वार्टर मिल जाएगा. तुम उसे ही ले लेना. इस से तुम्हारा रहनसहन भी ऊंचा रहेगा.’’

‘‘कितनी पगड़ी देनी होगी?’’ दीपा ने पूछा

ढाई लाख का रेट चल रहा है, ऊपर से भाड़े के 6,000 रुपए.’’

‘‘मैं पगड़ी तो नहीं दे सकूंगी. वैसे आप सब अपने हैं… और अपनों से क्या लेना. हां, भाड़े के दे दूंगी.’’

‘‘अगर रहनसहन ऊंचा बनाए रखना है तो खर्च से डर क्यों? क्वार्टर लेने के लिए लोग पगड़ी और भाड़ा ले कर पीछे घूमते रहते हैं,’’ प्रशांत मुसकराया.

फिर एक दिन पता चला कि दीपा पर ढेर सारा कर्ज है. उस ने कर्ज चुकाने के लिए फ्रिज, अलमारी और सोफा बेच दिया है.

एक बार रेखा सुधा के साथ दीपा के फ्लैट पर गई तो पता चला कि वह वहां से एक बस्ती में रहने चली गई है. वहां अब वह एक कमरे में ही रह रही है, 2,000 रुपए किराया दे कर.

रहनसहन ऊंचा करने के चक्कर में कर्जदार हो कर वह नीचे ही गिरी थी. Family Story In Hindi

Social Story In Hindi: जाति क्यों नहीं जाती

Social Story In Hindi, लेखक – शकील प्रेम

रघुराम छोटी जाति का था. उस का बेटा सिपाही भरती हुआ, तो उस ने भोज कराया, पर ऊंची जाति का जानकीदास भोज में नहीं आया. उसे निराशा हुई. इसी बीच जानकीदास और एक ठेकेदार गंगू में घर की बिजली का ठेका हुआ, पर जानकीदास ने उसे कम पैसे दिए. यह मामला डीएम तक गया. क्या मामला सुलझ पाया?

रघुराम के बेटे का सिपाही पद के लिए सिलैक्शन हुआ था. घर वाले बहुत खुश थे. उन्हें अपने होनहार लड़के पर गर्व था. दौड़ में वह पूरे राज्य में 9वें नंबर पर आया था. 2 दिन पहले लड़के का जौइनिंग लैटर भी आ चुका था. तब से रघुराम के परिवार में खुशी का माहौल था. यह अलग बात थी कि घूस देने में जमीन चली गई थी, लेकिन अब रघुराम को इस का कोई मलाल नहीं था.

गांव की जिस बस्ती में रघुराम रहता था, वहां के लिए यह बहुत बड़ी बात थी, क्योंकि उन लोगों की पूरी बस्ती में एक भी सरकारी नौकरी वाला नहीं था. पहली बार उन की जाति का कोई लड़का सिपाही बनने वाला था.

हालांकि, उसी गांव के कई दबंग परिवारों में बड़ीबड़ी नौकरियां थीं. कोई प्रोफैसर, तो कोई दारोगा. टीचर तो कई थे. कुछ रेलवे में भी थे, लेकिन इस दलित बस्ती में यह पहली सरकारी नौकरी थी.

रघुराम ने इस खुशी में भोज का आयोजन किया, जिस में उस ने बड़े लोगों को भी न्योता दिया. जानकीदास को भी न्योता दिया गया, लेकिन उस के घर से कोई नहीं आया, तो रघुराम को इस बात से बहुत दुख पहुंचा.

रघुराम अगले कई दिनों तक अपनी बस्ती के लोगों से कहता रहा, ‘‘अरे, ये बड़े लोग जब भी कोई काम कहते हैं हम बिना मोलभाव किए कर देते हैं, लेकिन आज मेरे बेटे की नौकरी से इन की छाती सुलग गई है.

‘‘अब देखते हैं, इन बड़े लोगों का काम कौन करता है? अब सब से पहले दिहाड़ी तय होगी, उस के बाद ही कोई काम होगा.’’

रघुराम ने पूरी बस्ती को चेता दिया था कि उन लोगों का कोई भी काम हो तो नहीं करना है. अगर करना ही पड़ जाए तो पहले मजदूरी तय कर के ही करना है. किसी से अब कोई लागलपेट नहीं रखना है.

रघुराम अपनी बस्ती में पहले से ही रोबदाब रखता था. अब तो वह एक सिपाही बेटे का बाप हो चुका था, इसलिए बस्ती पर उस का रोब सीधे डबल हो गया था.

एक महीने के बाद एक सुबह रघुराम हाथ में थैला लिए घर का सामान लेने पास की किराना की दुकान की ओर जा रहा था कि तभी उस के कानों में आवाज आई, ‘‘रघु चाचा…’’

रघुराम ने मुड़ कर देखा तो वह गंगू था जो उस की ओर साइकिल लिए चला आ रहा था.

‘‘चाचा, तुम से एक जरूरी काम है,’’ गंगू बोला.

‘‘इतना भी क्या जरूरी काम है? मैं दुकान से कुछ सामान लेने जा रहा हूं,’’ रघुराम बोला.

‘‘चाचा, तुम सामान ले कर आ जाओ, मैं तुम्हारे घर बैठा हूं,’’ गंगू ने कहा.

‘‘ठीक है, तू घर चल. मैं 10 मिनट में आ रहा हूं,’’ रघुराम बोला.

एक घंटे के बाद रघुराम हाथमुंह धो कर घर की चारपाई पर गंगू के साथ बैठा चाय पी रहा था.

‘‘हां गंगू, अब बोल कि तुझे क्या परेशानी है?’’ रघुराम ने पूछा.

‘‘चाचा, जानकीदास का जो नया मकान बना है न, मैं ने उस मकान में बिजली का ठेका लिया था, जो 20,000 रुपए में तय हुआ था. लेकिन अब काम पूरा हो गया तो जानकीदास ने 6,000 रुपए थमाए और बोला कि इस से ज्यादा की मेरी औकात नहीं है.’’

गंगू के मुंह से इतना सुनते ही रघुराम को गुस्सा आ गया और वह बोला, ‘‘मैं ने पहले ही तुम लोगों से कहा था कि इन ऊंचे लोगों का कोई भी काम मेरे बिना पूछे नहीं करना है, लेकिन अब मेरी सुनता कौन है. अब जाओ रोओ, मरो मैं क्या कर सकता हूं…

‘‘अगर तुम ने मुझे पहले बताया होता तो जानकीदास की इतनी मजाल नहीं होती…’’ रघुराम ने कहा.

गंगू ने कहा, ‘‘चाचा, मुझ से गलती हो गई. मुझे माफ कर दो और मेरा बकाया पैसा दिलवा दो. पूरा नहीं तो 6,000 रुपए और मिल जाएंगे, तो मेरा काम बन जाएगा.’’

‘‘ठीक है, पहले तू चाय पी ले, उस के बाद चल मेरे साथ,’’ रघुराम ने कुछ सोचते हुए कहा.

जानकीदास के घर पर रघु ने काफी हंगामा खड़ा किया.

जानकीदास बोला, ‘‘इस गंगू ने मेरे पूरे मकान का सत्यानाश कर दिया. जब इस को बिजली का काम आता ही नहीं तो क्यों जिम्मेदारी ली. बल्ब का बटन दबाओ तो पंखा चलता है. बाथरूम में भी ठीक से वायरिंग नहीं की. बाकी सारा काम भी उलटासीधा किया है. सब दोबारा करवाना पड़ेगा.’’

गंगू बोला, ‘‘नहीं रघु चाचा. यह सरासर ?ाठ है. मैं पिछले 5 साल से यही काम कर रहा हूं. गुजरात, दिल्ली और पंजाब तक में मैं ने काम किया है. पिछले महीने ही महाराष्ट्र से काम खत्म कर के आया हूं.

‘‘मैं गांव आया तो इन्होंने ही मु?ा से कहा कि बिजली की फिटिंग का काम बाकी है. चलो, तुम कर दो. 20,000 रुपए में ठेका हुआ. काम पूरा हो गया तो इन्होंने खुद ही कनैक्शन उलटासीधा कर दिया, ताकि मेरे काम में गलती निकाल कर पूरे पैसे न देने पड़ें.’’

रघुराम ने गंगू की ओर से जानकीदास पर अपनी सारी भड़ास निकाल दी. बात बनने के बजाय और बिगड़ गई. मामला बातचीत से शुरू हो कर हाथापाई तक पहुंच गया. किसी तरह मास्टरजी के बीचबचाव के बाद दोनों अलग हुए.

इस के बाद जानकीदास ने एक फूटी कौड़ी और देने से इनकार कर दिया और बोला, ‘‘तेरा बेटा सिपाही बना है तो इतना घमंड और अगर वह ससुरा कलक्टर बन गया होता तब तू न जाने क्या करता. जा, तुझे जो करना है कर ले, अब एक फूटी कौड़ी भी मैं इस गंगू को नहीं दूंगा.’’

रघुराम के लिए अब बात महज चंद रुपयों की नहीं रह गई थी, बल्कि उस की इज्जत का सवाल बन गया था. उसे अब हर हाल में जानकीदास को सबक सिखाना था.

रघुराम अपनी बस्ती के कुछ लोगों को ले कर थाने पहुंचा और हरिजन ऐक्ट में मारपीट का मामला दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन दारोगा को पहले ही खबर मिल चुकी थी. उस ने रघुराम को समझाया और किसी तरह उसे वापस घर भेज दिया.

घर पहुंच कर रघुराम को लगा कि दारोगा और जानकीदास की जाति एक होने की वजह से दारोगा ने उस की नहीं सुनी.

अगले दिन रघुराम अपने साथ कुछ लोगों को ले कर सीधे डीएम के यहां पहुंचा. डीएम से मुलाकात होने पर रघुराम ने कहा, ‘‘हमारे गांव के कुछ ऊंची जाति के लोगों ने हमारा जीना दूभर किया हुआ है. वे हम से छुआछूत करते हैं और काम करवा कर पूरा पैसा नहीं देते हैं. पैसा मांगने जाओ तो मारते हैं.’’

डीएम ने कहा, ‘‘कल हमारा उस तरफ का दौरा भी है, इसलिए हम कल 12 बजे तक तुम्हारे गांव आएंगे. तुम अभी जाओ.’’

रघुराम घर लौट आया, लेकिन उसे डीएम की बात पर रत्तीभर भी यकीन नहीं था. उसे लगा कि उस ने उसे बेवकूफ बना कर भगा दिया है.

अगले दिन रघुराम अपनी चारपाई पर बैठा बस्ती के कुछ लोगों के साथ बात कर रहा था कि तभी गंगू हड़बड़ाता हुआ उस के दरवाजे पर पहुंचा और चिल्ला कर बोला, ‘‘डीएम साहब आए हैं. प्रधान के यहां बैठे हैं. तुम्हें बुला रहे है. दारोगा भी हैं साथ में और डीएम साहब ने जानकीदास को भी बुलाया है.’’

थोड़ी देर में प्रधान के घर लोगों का मजमा लगा हुआ था. बाहर डीएम की गाड़ी के साथ 4-5 गाडि़यां और लगी हुई थीं. डीएम साहब सामने कुरसी पर बैठे थे. दारोगा और प्रधान दोनों चारपाई पर बैठे थे. सामने वाली चारपाई पर जानकीदास और कुछ और लोग थे.

रघुराम ने दारोगा की ओर देखे बिना सीधे डीएम साहब को नमस्कार किया और खाली पड़ी कुरसी पर बैठ गया.

डीएम साहब की फटकार के बाद जानकीदास ने गंगू के बकाया पैसे दे दिए. डीएम साहब ने रघुराम से कहा, ‘‘अब से कोई भी मजदूरी रोके तो सीधे डीएम औफिस चले आना, सब को ठीक कर दूंगा. अब तो तुम्हें कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए, फिर भी और कोई शिकायत है, तो अभी बता दो.’’

रघुराम ने कहा, ‘‘ये लोग हम से छुआछूत करते हैं. हमारे यहां भोज नहीं करते, क्योंकि हम निचली जाति के हैं. इस जानकीदास से पूछो. मेरे बेटे की नौकरी लगने की खुशी में मैं ने भोज किया था. जानकीदास को न्योता भेजा था, लेकिन यह नहीं आया, क्योंकि मैं छोटी जाति से हूं न.’’

डीएम साहब ने पूछा, ‘‘तुम किस जाति से हो?’’

रघुराम ने जवाब दिया, ‘‘मल्लाह.’’

डीएम ने फिर पूछा, ‘‘तुम्हारी बस्ती में और कौनकौन सी जातियां हैं?’’

रघुराम बोला, ‘‘हमारी बस्ती में केवल हमारी जाति के ही लोग रहते हैं. दूसरी छोटी जाति के लोगों का टोला अलग है.’’

डीएम ने बाल्मीकि टोले से एक आदमी को बुलाया और उस से पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘जी हुजूर, मेरा नाम भुवन है,’’ उस आदमी ने हाथ जोड़ कर कहा.

डीएम साहब ने कहा, ‘‘भुवन, जाओ और अपने घर से एक थाली में खिचड़ी बनवा लाओ.’’

भुवन ने आदेश का पालन किया. थोड़ी देर में वह थाली हाथ में लिए हाजिर था, जो अब भी थोड़ी गरम थी. सब लोग इस नजारे को हैरत भरी निगाहों से देख रहे थे.

डीएम ने प्रधान के यहां से चम्मच मंगवाया और पहले खुद 2-3 चम्मच खिचड़ी खाई, फिर दारोगा को बोला
कि खाओ तो दारोगा ने भी 2 चम्मच खिचड़ी निगल ली. उस के बाद डीएम ने जानकीदास से कहा, ‘‘लो भई, तुम भी खाओ.’’

न चाहते हुए जानकीदास ने भी एक चम्मच खिचड़ी खा ही ली. अब बारी रघुराम की थी. डीएम ने थाली उस के आगे बढ़ा दी और बोले, ‘‘लो, तुम भी खाओ. भुवन ने बड़ी स्वाद खिचड़ी बनाई है.’’

भुवन ने कहा, ‘‘नहीं सरकार, मैं ने नहीं बनाई, बल्कि मेरी बीवी ने बनाई है. जल्दबाजी में शायद थोड़ी कच्ची रह गई है.’’

डीएम साहब ने कहा, ‘‘अरे नहीं भुवन, ऐसी खिचड़ी तो मैं ने जिंदगी में पहली बार खाई है. लाजवाब है.’’

डीएम साहब ने थाली रघुराम के सामने रख दी, लेकिन उसे तो जैसे सांप सूंघ गया था. उस के सामने खिचड़ी पड़ी रही, लेकिन उस ने उसे हाथ तक नहीं लगाया.

थोड़ी देर इंतजार करने के बाद डीएम साहब ने रघुराम के सामने से थाली उठा ली और प्रधान के यहां से थोड़ा अचार मंगा कर खुद ही बची हुई खिचड़ी डकार गए.

डीएम साहब जाने लगे तो उन्होंने जानकीदास से कहा, ‘‘जातिवाद हमारे समाज की काली सचाई है. जब तक तुम जैसे लोग अपने श्रेष्ठ होने का भरम पाले रखोगे, तब तक यह सामाजिक कलंक बना रहेगा, इसलिए जितनी जल्दी हो सके अपना जातीय दंभ छोड़ कर इनसान बन जाओ.’’

जातेजाते डीएम साहब ने रघुराम से भी कहा, ‘‘जातिवाद खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की एक दिमागी बीमारी भी है, जिस से पूरा समाज ग्रसित है. तुम दूसरों के बदलने की उम्मीद तब तक नहीं कर सकते, जब तक तुम खुद इस बीमारी से न निकल जाओ, इसलिए आज के बाद कभी भी किसी से भी जातिवाद या छुआछूत की शिकायत मत करना.

‘‘पहले तुम खुद इस बीमारी से नजात पा जाओ, उस के बाद ही किसी और से इस की उम्मीद करना. जब तक तुम्हारा बरताव तुम से नीचे के लोगों के प्रति जायज नहीं है, तब तक तुम्हें अपने से ऊपर के लोगों पर उंगली उठाने का कोई हक नहीं है.’’

शर्मिंदा रघुराम नजरें नीची किए वहीं खड़ा रहा. Social Story In Hindi

Funny Story In Hindi: नाक के नीचे

Funny Story In Hindi: दुनिया में बहुत तरह की नाक होती हैं. लंबी नाक, मोटी नाक, पतली नाक वगैरह. नाक की बनावट भौगोलिक हालात और आबोहवा के असर के चलते भी अलगअलग होती है.

हमारे देश में बहुत सी बातें कहीं गई हैं, जो मुहावरों में देखीसुनी और पढ़ी जाती हैं. नाक का बाल होना. मतलब बहुत ही खास शख्स होना. नाकों चने चबवाना. मतलब बहुत ज्यादा परेशान करना. क्रिकेट और दूसरे खेलों में लोग देश की इज्जत बचाने की बात को नाक बचाना कह लेते हैं.

अजीब बात है कि जिस नाक को हम जिंदगीभर बहुत देर तक देख भी नहीं पाते, उस को ले कर जान दिए रहते हैं. दिनभर में एक बार अगर गलती से भी अपनी नाक को कभी ढंग से हम देख पाएं, तो शायद यह बहुत बड़ी बात होगी. ऐसा सब के साथ होता है.

कभी आप रोजमर्रा की जिंदगी से समय निकाल कर देखिएगा. आप अपनी नाक को एक मिनट भी ठीक से नहीं देख पाते. जिस नाक को हम अपनी दोनों आंखों की पुतलियों को बहुत सीधा कर के भी नहीं देख पाते, उसी नाक के लिए हम जिंदगीभर लड़ते रहते हैं.

यह आखिर है क्या? यकीनन हमारी खीझ. इसी को हम नाक कहते हैं. जब हम बेबस हो जाते हैं और अपनी खीझ को नहीं मिटा पाते हैं, तो नाक का सवाल बना लेते हैं. अपनों से, खासकर रिश्तेदारों से हम मनमुटाव कर लेते हैं. उन के जैसा मकान, उन के जैसी कार, उन के जितनी पगार, उन के जितना बैंक बैलेंस जब तक नहीं हो जाता, तब तक हम नाक उठा कर नहीं चल सकते. हमारे सामने भला उन की औकात ही क्या है?

इसी नाक के लिए आदमी तीन की जगह तेरह देने को तैयार हो जाता है. टैंडर मुझे मिलना चाहिए. नुकसान होगा तो होगा. बहुत कमाया है. इस बार घर से घाटा देंगे, लेकिन तुम को खत्म कर देंगे. बच्चू, तुम को यह टैंडर नहीं लेने देंगे. तुम को नाकों चने चबवा देंगे. हो किस फेर में. अपना माल खरीद के दाम पर बचेंगे, लेकिन तुम को नहीं बेचने देंगे.

लोग आन में कान कटाने को तैयार रहते हैं, लेकिन आन में कान नहीं कटता, बल्कि नाक कट जाती है और उन को पता भी नहीं चलता.

खापों में नाक बहुत ऊंची है. उन के फैसले नाक के लिए किए जाते हैं. वहां औनर किलिंग आम बात है. नाक के लिए जिंदा लोग टांग दिए जाते हैं, नहीं तो टंग जाते हैं. हुक्कापानी बंद होने का खतरा है. समाज से खदेड़े जाने का डर. रोटीपानी, दियासलाई न मिल पाने का दुख.

कहते हैं कि कुत्ते की नाक बहुत तेज होती है, लेकिन कुत्तों में नाक के लिए लड़ाई नहीं होती. कुत्ते नाक के लिए नहीं लड़ते. आदमी नाक के लिए लड़ता है. इतना लड़ता है कि लड़तेलड़ते वह आदमी से कब जानवर बन जाता है, उस को पता ही नहीं चलता. इस मामले में कुत्ते आदमी से ज्यादा समझदार हैं. कम से कम बेअक्ल हो कर अक्ल वालों को मात दे रहे हैं.

औरतों की नाक बहुत तेज होती है. वे गांवसमाज में सूंघ लेती हैं कि किस का किस से चक्कर चल रहा है. किस का पेट कितने महीने का है. किस के घर में बाप और बेटे की नहीं बन रही है. किस घर में सासबहू में अनबन है. गांवसमाज की औरतों के नाक के सूंघने की ताकत सब से ज्यादा होती है.

सत्तासीन या सरकार में बैठे लोग बड़ेबड़े घोटालों को अंजाम दे देते हैं और यह उसी नाक का कमाल है कि जिन प्रशासनिक अमलों की नाक के नीचे यह सब होता है, उन को कुछ पता ही नहीं होता है. Funny Story In Hindi

Story In Hindi: घुसपैठिए

Story In Hindi: सरहद पर पहुंचते ही सरगना ने कहा, ‘‘देखो, तुम सब घुसपैठिए हो. सामने हिंदुस्तान नाम की बहुत बड़ी सराय है. एक बार किसी तरह सीमा सुरक्षा बल से बच कर दाखिल हो जाएं, उस के बाद उस भीड़ भरे देश में कहीं भी समा जाओ. शासन और प्रशासन भ्रष्ट हैं ही. पैसा फेंको और अपने सारे कागजात बनवा लो.

राशनकार्ड, वोटरकार्ड और इस देश की नागरिकता हासिल.’’

एक घुसपैठिए ने पूछा, ‘‘आप तो कह रहे थे कि सरहद पार करवाने के लिए भारतीय सेना में हमारे कुछ मददगार हैं?’’

सरगना बोला, ‘‘हां हैं, लेकिन अभी उन की ड्यूटी नहीं है. मुझे दूसरी घुसपैठिया खेप भी भेजनी है. बहुत ज्यादा लोगों को एकसाथ नहीं भेज सकते. मेरा रोज का काम है. हर पड़ोसी देश से घुसपैठिए घुसते हैं.

कभी मीडिया वाले ज्यादा हल्ला मचाते हैं, तो कुछ सख्ती हो जाती है.’’

‘‘लेकिन अगर हम पकड़े गए तो?’’ घुसपैठिए ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं होगा. तुम्हें वापस भेज दिया जाएगा. वैसे ऐसा होगा नहीं. कब, किस समय सरहद पार करनी है, मुझे सारी जानकारी है. एक बार घुस गए तो बात खत्म.

‘‘हां, अगर वहां पहुंच कर पहचानपत्र बनवाने में कोई समस्या हो तो फोन करना. अपने एजेंट हैं. सब हो जाएगा. चिंता करने की जरूरत नहीं.’’

यह नजारा भारतबंगलादेश की सरहद का है. यह नजारा भारत और पाकिस्तान की सरहद का भी हो सकता है. भारतश्रीलंका, भारतनेपाल की सरहद का भी. नेपालियों को तो वैसे भी खुली छूट है. इस देश में कोई भी कहीं से भी आ कर बस सकता है. घुसपैठिया बन कर घुसता है, फिर मूल निवासी बन कर अपने लोगों को बुलाता है, बसाता है और बसनेबसाने का यह सिलसिला लगातार जारी रहता है.

अचानक सरगना ने इशारा किया और घुसपैठिए भारत की सरहद में दाखिल हो गए. यहां काम दिलाने, बसाने के लिए उन के धर्म, जाति, भाषा वाले पहले से ही थे. फिर दलाल तो हैं ही. उन की आमदनी का जरीया है. उन का धंधा है.

न जाने कितने पाकिस्तानी, बंगलादेशी, नेपाली, श्रीलंकाई भारत के मूल निवासी बन कर यहां की आबादी बढ़ा रहे हैं. मूल निवासी की भूख और बेकारी पहले से ही है. उन की अपनी समस्याएं तो हैं ही, उस पर ये घुसपैठिए जो पूरा बैलेंस बिगाड़ कर रख देते हैं.

शरणार्थी आ ही रहे हैं. जो नियम से चलते हैं. कानून का पालन करते हैं, सो आज सालों बाद भी शरणार्थी बने हुए हैं. उन का अपना निजी कुछ भी नहीं है. जो गैरकानूनी तरीका अपनाते हैं वे मूल निवासी बन जाते हैं.

17 लाख शरणार्थी अकेले जम्मू में हैं. घुसपैठिए भी अपने देश की भूख बेकारी से दुखी हो कर रोटी, छत
की तलाश में घुसते हैं, वरना किसे पड़ी है अपनी जमीन, अपना देश छोड़ कर जाने की.

पूर्वोत्तर के इस राज्य में लाखों घुसपैठिए यहां की नागरिकता ले कर पूरे का पूरा शहर बसा चुके थे. इन्हें
20 सालों से ज्यादा हो गए यहां रहते हुए. इस धरती पर उन्होंने मकान बनाया. खेतीबारी की. जमीन खरीद कर किसान बने. उन के बच्चे यहीं की आबोहवा में पल कर बड़े हुए. यहीं उन की शादी हुई. उन के बच्चे हुए.

नेताओं को यह बात मालूम थी. वे इन्हें अपने वोट बैंक के रूप में भुनाते रहे और यह भरोसा देते रहे कि उन की सरकार बनी तो उन्हें यहीं का निवासी माना जाएगा. हर पार्टी यही कहती और सरकार बनने के बाद चुप्पी साध लेती.

40 साल के आसपास हो चुके थे, जब अहमद खान पूर्वोत्तर के इस राज्य में बसे थे. जब वे आए थे तो अपने कुछ रिश्तेदारों और साथियों के साथ यहां आ कर मजदूरी करना शुरू किया था. धीरेधीरे अपनी मेहनत से उन्होंने जमीन खरीदी. मकान खरीदा.

उस समय यहां के स्थानीय निवासियों ने भी उन की मदद की. यहीं उन की शादी हुई, फिर उन के बच्चों की शादियां हुईं. अब भरापूरा परिवार था. बंगलादेश को तो वे भूल चुके थे. उन का वहां कोई था भी नहीं.

जो थे उन्हें खोने में 40 साल का समय बहुत होता है. इसी धरती को वे अपना मानते थे. इसी को सलाम करते थे.

अब जबकि राजनीति दलों का दलदल बन चुकी थी. केंद्र और राज्य सरकार से ज्यादा क्षेत्रीय भाषा, जाति की राजनीति होने लगी थी. आबादी बढ़ने से क्षेत्रीय लोग पिछड़े और गरीब रह गए थे. उन के पास न जमीन थी, न रोजगार. वे दिल्ली में बैठी सरकार को कोसते रहते थे कि दूर पड़े किनारे के राज्यों के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया.

यह कोसना उन्हें वहां के स्थानीय नेताओं ने सिखाया था. स्थानीय नेताओं के पास पड़ोसी देश से हासिल हथियार थे और बेरोजगार की फौज उन के पास थी. जो असंतुष्ट हो कर हथियार भी उठा चुके थे. जो हथियार उठाने की हिम्मत नहीं कर पाए, वे उन हथियारधारियों के समर्थन में थे. अपना विरोध वे अहिंसक तरीके से करते थे. नारा था भूमिपुत्र का.

भूमिपुत्र वे जो इस प्रांत, क्षेत्र का स्थायी निवासी है. भाषा, बोली, संस्कार, उस का है. जो उस जाति, धर्म से संबंधित है. यह ठीक वैसा ही नारा था जो आंध प्रदेश और महाराष्ट्र में उठता रहा है. बाहरियों को खदेड़ो. जो इसी देश के दूसरे क्षेत्रों से आए थे. रोजगार के लिए वे तो चले गए. मजदूर बन कर आए थे.

लेकिन अहमद खान जैसे लोग कहा जाएं? उन के पास तो यही जमीन, यही मकान, दुकान उन का मुल्क था. फिर उन्हें क्या पता था कि 40 साल बाद स्थानीय लोग ही जो कभी उन के मददगार थे, भाषा, भूमिपुत्र आंदोलन के नाम पर उन के दुश्मन बन जाएंगे.

हत्याओं, बम, धमाकों की खबर पूरे राज्य में फैल रही थी. दहशत का माहौल छाया हुआ था. अहमद खान खुद को बेवतन महसूस कर रहे थे. न जाने कब वे इस हिंसक आंदोलन की बलि चढ़ जाएं. वे करें तो क्या करें. जाएं तो कहां जाएं. उन के पास कोई रास्ता भी नहीं था. आखिर उन के पास संदेशा आ ही गया. वे उल्फा के कमांडर के सामने हाथ जोड़े खड़े थे.

कमांडर ने कहा, ‘‘यह धरती भूमिपुत्रों की है. खाली करो.’’

‘‘मैं 40 साल से यहां रह रहा हूं. यह धरती मेरी भी है. मैं भी भूमिपुत्र हुआ.’’

‘‘नहीं, न तो तुम असमिया हो, न तुम्हारे पूर्वज यहां के हैं. तुम्हारे रहने से हमारे हितों पर असर पड़ता है. यहां केवल यहां के लोग रहेंगे.’’

‘‘मैं नहीं जाऊंगा. पूरी जिंदगी यहीं गुजर गई.’’

‘‘नहीं जाओगे तो मरोगे,’’ कमांडर ने अपनी बात खत्म कर दी.

अहमद खान सोचते रहे कि उन का मुल्क कौन सा है? कुछ सालों में तो किसी भी देश की नागरिकता मिल जाती है, फिर उन्हें तो पूरे 40 साल हो गए. इस जगह के अलावा उन का कहीं कुछ भी नहीं है. वे अपना घरद्वार छोड़ कर जाएं तो कहां जाएं? क्या करेंगे? कहां रहेंगे?

टैलीविजन, रेडियो पर सरकार की तसल्ली आती रही कि सब ठीक हो जाएगा. डरने की कोई बात नहीं. आपसी बातचीत जारी है. पर सरकार की तसल्ली हर बार की तरह झूठी और खोखली रही.

एक रात भूमिपुत्र, विद्रोही अपने लावलश्कर के साथ उन की बस्ती में घुस आए. गोलियों, बमों की आवाजों के साथ चीखों की आवाज भी माहौल में गूंजने लगी.

अहमद खान अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए. उन्होंने तय कर लिया था कि जहां 40 साल, सुख, परिवार के साथ गुजारे. वहां मौत आती है तो मौत ही सही. कोई माने या न माने, वे भी इस भूमि के पुत्र हैं. वे कहीं नहीं जाएंगे.

माहौल में बारूद की गंध फैलने लगी. मकान धूंधूं कर जलने लगे. औरतों और बच्चों की चीखें गूंजने लगीं.

चारों ओर खून ही खून बहने लगा. तभी 2-3 गोलियां अहमद खान के सीने में लगीं. एक लंबी कराह के साथ उन्होंने दम तोड़ दिया. Story In Hindi

Long Hindi Story: वे दो अनमोल दिन – आखिरी भाग

Long Hindi Story, लेखक – शकील प्रेम

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था : विनय किराए की गाड़ी चलाता था. एक बार वह एक परिवार को मोतिहारी से पटना के रेलवे स्टेशन छोड़ने गया. उन में सुमन नाम की एक शादीशुदा औरत थी, जिस से परिवार वालों का रवैया बहुत गलत था. पटना रेलवे स्टेशन पर सुमन की ट्रेन छूट गई. उसे चेन्नई जाना था. फिर वह वापस विनय के साथ उस के घर चली गई, क्योंकि चेन्नई की गाड़ी 2 दिन बाद की थी. वहां सुमन और विनय में नजदीकियां बढ़ गईं. अब पढि़ए आगे…

घर पहुंच कर सभी ने साथ बैठ कर दोपहर का खाना खाया और खाना खाने के बाद विनय लता से बोला, ‘‘लता, तुम सुमन का खयाल रखना. मैं गाड़ी सर्विस करवाने जा रहा हूं. शाम तक वापस आ जाऊंगा.’’
विनय की बात सुन कर सुमन उदास हो गई. विनय भी सुमन की भावनाओं को समझ गया, लेकिन वह रुका नहीं.

शाम को 7 बजे विनय घर लौट आया. विनय को घर में देख कर सुमन के चेहरे पर ताजगी आ गई. सभी ने रात का खाना साथ खाया और काफी देर तक बातें करने के बाद सुमन को ले कर लता अपने कमरे में सोने चली गई और विनय अपने कमरे में बिस्तर पर लेट कर नींद आने का इंतजार करने लगा.

अगली सुबह नाश्ता करते वक्त विनय ने सुमन से कहा, ‘‘सुमन, तुम्हारी ट्रेन शाम 5 बजे की है, लेकिन हमें
10 बजे ही निकलना होगा. तुम जल्दी से तैयार हो जाओ.’’

सुमन इस घर से अलग कहीं नहीं जाना चाहती थी. विनय का छोटा सा परिवार उसे अपने परिवार जैसा लगने लगा था. चेन्नई के नाम से ही सुमन को नफरत थी, लेकिन वह जाती भी कहां?

4 बजे तक विनय पटना स्टेशन पर पहुंच चुका था. सुमन और विनय ने स्टेशन के पास वाले एक रैस्टोरैंट में खाना खाया और प्लेटफार्म नंबर एक पर आ कर ट्रेन का इंतजार करने लगे.

विनय सम?ा ही नहीं पा रहा था कि वह अपनी सब से कीमती चीज को ऐसी जगह क्यों भेज रहा है, जहां वह नहीं जाना चाहती. समय पर गाड़ी प्लेटफार्म पर लग गई और रिजर्वेशन के हिसाब से विनय ने सुमन को उस की सीट पर बिठा दिया.

सुमन ने विनय से कहा, ‘‘विनय, तुम मुझे अपने घर ले गए. तुम ने मेरी टिकट करवाई और फिर मुझे ट्रेन तक छोड़ने आए. तुम्हारा यह सारा कर्ज मैं जल्द तुम्हें लौटा दूंगी.’’

विनय ने कहा, ‘‘यह कर्ज नहीं, बल्कि मेरा फर्ज है. तुम पहुंच कर मुझे फोन कर देना.’’

ट्रेन खिसकनी शुरू हुई, तो विनय ने सुमन से विदा ली और सुमन का चेहरा देखे बिना ट्रेन से नीचे उतर गया. इस बीच वह सुमन का फोन नंबर भी नहीं ले पाया. यह पल विनय के लिए बेहद मुश्किल था.

ट्रेन खिसकनी शुरू हुई, लेकिन विनय काफी देर तक प्लेटफार्म पर ही बैठा रहा और उन पलों को याद करता रहा, जब सुमन उस के साथ थी.

विनय ट्रेन के पूरी तरह आंखों से ओझल हो जाने का इंतजार करता रहा कि तभी ट्रेन रुक गई. विनय प्लेटफार्म की बैंच से उठा और सुमन की एक झलक देखने के लिए उस के डब्बे की ओर दौड़ पड़ा, तभी उस ने देखा कि सुमन अपना सूटकेस लिए ट्रेन से नीचे उतर रही थी.

नजदीक पहुंच कर विनय ने हैरानी भरी आवाज में सुमन से पूछा, ‘‘सुमन, क्या हुआ? तुम ट्रेन से उतर क्यों गई?’’

सुमन ने विनय की ओर देखा और बोली, ‘‘मुजे चेन्नई नहीं जाना, इसलिए मैं ने ट्रेन की चेन खींच दी. मुझे घर ले चलो.’’

सुमन के मुंह से ‘मुझे घर ले चलो’ सुन कर विनय ने उसे गले से लगा लिया और उस का सूटकेस हाथों में थाम कर स्टेशन से बाहर निकल आया.

रात के 11 बजे विनय घर पहुंच गया. सुमन को दोबारा घर मे देख कर लता बेहद खुश थी. वह बोली, ‘‘मुझे पूरा यकीन था कि सुमनजी की ट्रेन फिर मिस हो जाएगी.’’

सुमन पहले से शादीशुदा थी. उसे विनय से शादी करने से पहले भगीरथ से तलाक लेना पड़ता, लेकिन एक औरत के लिए पति से तलाक हासिल करना इतना भी आसान नहीं था.

सुमन पढ़ीलिखी थी और कानून के बारे में उसे थोड़ीबहुत जानकारी थी. बिना शादी के सुमन और विनय एक छत के नीचे साथ भी नहीं रह सकते थे.

धीरेधीरे 15 दिन बीत गए. इस बीच भगीरथ ने सुमन को कई बार फोन किया. भगीरथ ने सुमन को डरायाधमकाया, लेकिन सुमन चेन्नई जाने को राजी नहीं हुई.

विनय सुमन से प्यार करता था और सुमन भी विनय को चाहने लगी थी, लेकिन बिना शादी के घर में साथ रहना मुश्किल था. एक शादीशुदा जवान औरत का घर में रहना विनय की मां को भी पसंद नहीं आ रहा था. विनय के जानने वाले भी तरहतरह की बातें बनाने लगे थे.

एक दिन सुमन ने विनय से कहा, ‘‘विनय, मेरे पास कुछ गहने हैं और कुछ कैश भी है. मुझे मोतिहारी मार्केट में किराए पर एक दुकान दिलवा दो. मैं लेडी गारमैंट्स की दुकान खोलना चाहती हूं. दुकान के आसपास ही मुझे एक कमरे का फ्लैट भी दिलवा देना, मैं वहीं रह लूंगी.’’

विनय को सुमन का यह आइडिया अच्छा लगा, लेकिन वह सुमन के गहने बेच कर उस की मदद नहीं करना चाहता था.

विनय अगले ही दिन बैंक गया. लता की शादी के लिए विनय ने बैंक में 10 लाख की एफडी करवाई थी, वह पूरी रकम निकलवा ली और अगले हफ्ते में ही मोतिहारी के जानपुल रोड पर सुमन की दुकान खुल चुकी थी. पास में ही सुमन के रहने के लिए एक फ्लैट भी मिल गया था.

सुमन बेहद खुश थी, लेकिन अब वह पूरी तरह विनय की कर्जदार हो चुकी थी.

लेडी गारमैंट्स की दुकान का फैसला सुमन के लिए बेहद अच्छा साबित हुआ. आमदनी होने लगी. हर महीने दुकान और फ्लैट का किराया देने के बाद भी सुमन के पास काफी रुपया बच जाता, जिसे वह अपने बिजनैस में लगा देती.

सुमन ने तय किया था कि लता की शादी के वक्त तक वह विनय के 10 लाख रुपए लौटा देगी. सुमन की तरक्की को देख कर विनय भी बेहद खुश था.

रविवार को सुमन की दुकान बंद रहती और उस दिन विनय भी छुट्टी कर लेता. दोनों पूरे दिन साथ रहते. पढ़ाई से वक्त निकाल कर लता भी सुमन की दुकान पर उस का हाथ बंटाती और कई बार सुमन अपनी दुकान बंद करने के बाद विनय के घर पहुंच जाती. सभी रात का खाना साथ खाते और खाना खा लेने के बाद विनय सुमन को उस के फ्लैट पर छोड़ आता.

धीरेधीरे 6 महीने बीत गए. एक दिन सुबह विनय अपने बिस्तर से उठा ही था कि घर के दरवाजे पर ‘खटखट’ की तेज आवाज उस के कानों तक आई.

विनय की मां ने दरवाजा खोला, तो सामने पुलिस को खड़ा देख वे डर गईं. तभी विनय दरवाजे पर आ गया. सामने खड़े पुलिस वाले ने पूछा, ‘‘सुमन कहां है?’’

विनय ने कहा, ‘‘सुमन तो अपने फ्लैट पर होगी. आखिर बात क्या है?’’

पुलिस वाले ने उस से कहा, ‘‘तुम्हारे खिलाफ मोतिहारी थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई गई है. तुम्हें अभी मेरे साथ थाने चलना होगा और सुमन को भी फोन करो. उसे भी थाने चलना होगा.’’

थोड़ी देर में विनय और सुमन थाने में महिला दारोगा अंजलि के सामने बैठे थे.

अंजलि ने सुमन से सवाल किया, ‘‘क्या तुम शादीशुदा हो?’’

सुमन ने कहा, ‘‘जी, हां.’’

अंजलि ने उस से कहा, ‘‘तुम पिछले 6 महीने से अपने पति भगीरथ को धोखा दे कर इस आदमी के साथ फरार हो.’’

सुमन ने कहा, ‘‘नहीं, मैं अपनी मरजी से यहां हूं और यहीं मेरी दुकान भी है.’’

अंजलि ने कहा, ‘‘तुम्हारे पति भगीरथ ने तुम दोनों के खिलाफ थाने में एफआईआर लिखवाई है.’’

सुमन बोली, ‘‘मैडम, क्या आप मुझे यह बता सकती हैं कि भगीरथ ने जो रिपोर्ट दर्ज करवाई है, उस की बुनियाद क्या है?’’

‘‘एफआईआर के मुताबिक, तुम ने भगीरथ को धोखा दिया है. शादीशुदा होने के बावजूद तुम पिछले 6 महीने से पति को छोड़ कर इस आदमी के साथ यहां हो और भगीरथ के 5 लाख के गहने भी तुम चोरी कर के भागी हो.’’

‘‘हां, मैं शादीशुदा हूं और कानूनी रूप से भगीरथ मेरा पति है, लेकिन मैं भगीरथ के साथ न रहूं, यह कोई जुर्म तो नहीं है.

‘‘अगस्त, 2022 के सुप्रीम कोर्ट के एक जजमैंट के मुताबिक, शादीशुदा औरत अगर बिना तलाक के अपने पति से अलग रहती है, तो इस के लिए वह पूरी तरह आजाद है. ऐसे किसी औरत को कोई भी पति के साथ जबरदस्ती रहने को मजबूर नहीं कर सकता.

‘‘भगीरथ को मेरे अलग रहने से दिक्कत है, तो वह मुझे तलाक दे सकता है. मैं ने इस 6 महीने के दौरान भगीरथ से फोन पर तलाक की बात की, लेकिन वह ऐसा करने को राजी नहीं है. ऐसे में मैं क्या करूं बताइए?

‘‘मुझे भगीरथ के साथ नहीं रहना है और रही 5 लाख के गहनों की बात, तो ये गहने मेरे घर वालों ने मेरी शादी में मुझे दिए थे. इन गहनों पर भगीरथ का कोई हक नहीं है. अगर वह यह साबित कर दे कि मेरे पास जो गहने हैं, ये उस ने मुझे खरीद कर दिए हैं, तो मैं चोरी की सजा भुगतने को तैयार हूं.’’

सुमन की बात सुन कर थानेदार अंजलि समझ गई कि सुमन को कानून की अच्छी जानकारी है.

अंजलि ने कहा, ‘‘सुमन, विनय के साथ तुम्हारा क्या रिश्ता है? तुम पिछले 6 महीने से एक गैरमर्द के साथ हो… क्या यह सही है?’’

‘‘मैडम, विनय के साथ मेरा क्या रिश्ता है, यह बताने के लिए मुझे कोई भी कानून मजबूर नहीं कर सकता. मैं पिछले 6 महीने से अलग फ्लैट में रहती हूं और अगर मेरा विनय के साथ कोई रिश्ता है भी तो इस पर टिप्पणी करने का हक किसी को नहीं है.’’

अंजलि ने पूछा, ‘‘सुमन, कानून की बात छोड़ो. एक शादीशुदा औरत का किसी गैरमर्द के साथ रिलेशन बनाना क्या यह सामाजिक तौर पर सही है?’’

‘‘मैडम, हमारा समाज तो पुराने दकियानूसी रिवाजों पर चलता है. समाज औरत और मर्द को शादी के बंधन में बांध कर परंपरा की मुहर लगा देता है और शादी के बाद की जिम्मेदारियों और समस्याओं को दरकिनार कर देता है.

‘‘शादियों के नाम पर औरतों के साथ जो भी हो, समाज इस की परवाह नहीं करता. शादी के बाद औरत के साथ बुरा बरताव हो या शादी के बाद एक औरत के इनसान होने की गरिमा तारतार हो, समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता.

‘‘ऐसे समाज में हर कदम पर औरतों के लिए कई लक्ष्मण रेखाएं खींची गई हैं. मर्दों के लिए कोई रुकावट नहीं. वह औरत पर जुल्म करे तो भी वह कुसूरवार नहीं, लेकिन औरत अगर अपना रास्ता खुद तय करे, तो समाज सामने खड़ा हो जाता है. समाज की साख डूबने लगती है.

‘‘मेरी जिंदगी में विनय की क्या अहमियत है, यह मैं जानती हूं. जब मैं दरदर की ठोकरें खा रही थी, तब समाज ने मेरा साथ नहीं दिया था, बल्कि यह विनय ही था जिस ने मुझ में एक इनसान को देखा और मेरे साथ इनसानियत का रिश्ता निभाया.

‘‘आज मेरे और विनय के बीच कौन सा रिलेशन है और यह रिलेशन सही है या गलत, यह तय करने का हक सिर्फ मुझे है, समाज को नहीं.’’

सुमन की बातों को सुनने के बाद थानेदार अंजलि अपनी कुरसी छोड़ कर उठ खड़ी हुई और सुमन के करीब जा कर उस के कंधों पर हाथ रखते हुए बोली, ‘‘सुमन, तुम बिलकुल सही हो. अब तुम दोनों जा सकते हो.’’ Long Hindi Story

Family Story In Hindi: मर्यादा – आखिर क्या हुआ निशा के साथ

Family Story In Hindi: देर रात गए घर के सारे कामों से फुरसत मिलने पर जब रोहिणी अपने कमरे में जाने लगी तभी उसे याद आया कि वह छत से सूखे हुए कपड़े लाना तो भूल ही गई है. बारिश का मौसम था. आसमान साफ था तो उस ने कपड़ों के अलावा घर भर की चादरें भी धो कर छत पर सुखाने डाल दी थीं. थकान की वजह से एक बार तो मन हुआ कि सुबह ले आऊंगी, लेकिन फिर ध्यान आया कि अगर रात में कहीं बारिश हो गई तो सारी मेहनत बेकार चली जाएगी. फिर रोहिणी छत पर चली गई.

वह कपड़े उठा ही रही थी कि छत के कोने से उसे किसी के बात करने की धीमीधीमी आवाज सुनाई दी. रोहिणी आवाज की दिशा में बढ़ी. दायीं ओर के कमरे के सामने वाली छत पर मुंडेर से सट कर खड़ा हुआ कोई फोन पर धीमी आवाज में बातें कर रहा था. बीचबीच में हंसने की आवाज भी आ रही थी. बातें करने वाले की रोहिणी की ओर पीठ थी इसलिए उसे रोहिणी के आने का आभास नहीं हुआ, मगर रोहिणी समझ गई कि यह कौन है.

रोहिणी 3-4 महीनों से निशा के रंगढंग देख रही थी. वह हर समय मोबाइल से चिपकी या तो बातें करती रहती या मैसेज भेजती रहती. कालेज से आ कर वह कमरे में घुस कर बातें करती रहती और रात का खाना खाने के बाद जैसे ही मोबाइल की रिंग बजती वह छत पर भाग जाती और फिर घंटे भर बाद वापस आती.

रोहिणी के पूछने पर बहाना बना देती कि सहेली का फोन था या पढ़ाई के बारे में बातें कर रही थी. लेकिन रोहिणी इतनी नादान नहीं है कि वह सच न समझ पाए. वह अच्छी तरह जानती थी कि निशा फोन पर लड़कों से बातें करती है. वह भी एक लड़के से नहीं कई लड़कों से.

‘‘निशा इतनी रात गए यहां अंधेरे में क्या कर रही हो? चलो नीचे चलो,’’ रोहिणी की कठोर आवाज सुन कर निशा ने चौंक कर पीछे देखा.

‘‘चल यार, मैं तुझे बाद में काल करती हूं बाय,’’ कह कर निशा ने फोन काट दिया और बिना रोहिणी की ओर देखे नीचे जाने लगी.

‘‘तुम तो एकडेढ़ घंटा पहले छत पर आई थीं निशा, तब से यहीं हो? किस से बातें कर रही थीं इतनी देर तक?’’ रोहिणी ने डपट कर पूछा.

निशा बिफर कर बोली, ‘‘अब आप को क्या अपने हर फोन काल की जानकारी देनी पड़ेगी चाची? आप क्यों हर समय मेरी पहरेदारी करती रहती हैं? किस ने कहा है आप से? मेरा दोस्त है उस से बातें कर रही थी.’’

‘‘निशा, बड़ों से बातें करने की भी तमीज नहीं रही अब तुम्हें. मैं तुम्हारे भले के लिए ही तुम्हें टोकती हूं,’’ रोहिणी गुस्से से बोली.

‘‘मेरा भलाबुरा सोचने के लिए मेरी मां हैं. सच तो यह है कि आप मुझ से जलती हैं. आप की बेटी मेरे जितनी सुंदर नहीं है. उस का मेरे जैसा बड़ा सर्कल नहीं है, दोस्त नहीं हैं. इसीलिए मेरे फोन काल से आप को जलन होती है,’’ निशा कठोर स्वर में बोल कर बुदबुदाती हुई नीचे चली गई.

कपड़ों को हाथ में लिए हुए रोहिणी स्तब्ध सी खड़ी रह गई. उस की गोद में पली लड़की उसे ही उलटासीधा सुना गई.

रोहिणी की बेटी ऋचा निशा से कई गुना सुंदर है, लेकिन हर समय सादगी से रहती है और पढ़ाई में लगी रहती है.

रोहिणी बचपन से ही उसे समझती आई है और ऋचा ने बचपन से ले कर आज तक उस की बताई बात का पालन किया है. वह अपने आसपास फालतू भीड़ इकट्ठा करने में विश्वास नहीं करती. तभी तो हर साल स्कूल और कालेज में टौप करती आई है.

लेकिन निशा संस्कार और गुणों पर ध्यान न दे कर हर समय दोस्तों व सहेलियों से घिरे रहना पसंद करती है. तारीफ पाने के लिए लेटैस्ट फैशन के कपड़े, मेकअप बस यही उस का प्रिय शगल है और इसी में वह अपनी सफलता समझती है. तभी तो ऋचा से 2 साल बड़ी होने के बावजूद भी उसी की क्लास में है.

नीचे जा कर रोहिणी ने ऋचा के कमरे में झांक कर देखा. ऋचा पढ़ रही थी, क्योंकि वह पी.एस.सी. की तैयारी कर रही थी. रोहिणी ने अंदर जा कर उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और अपने कमरे में आ गई.

‘जिंदगी में हर बात का एक नियत समय होता है. समय निकल जाने के बाद सिवा पछतावे के कुछ हासिल नहीं होता. इसलिए जीवन में अपने लक्ष्य और प्राथमिकताएं तय कर लेना और उन्हीं के अनुसार प्रयत्न करना,’ यही समझाया था रोहिणी ने ऋचा को हमेशा. और उसे खुशी थी कि उस की बेटी ने जीवन का ध्येय चुनने में समझदारी दिखाई है. पूरी उम्मीद है कि ऋचा अपने लक्ष्य प्राप्ति में अवश्य सफल होगी.

अगले दिन ऋचा और निशा के कालेज जाने के बाद रोहिणी ने अपनी जेठानी से बोली कि निशा आजकल रोज घंटों फोन पर अलगअलग लड़कों से बातें करती है. आप जरा उसे समझाइए. लेकिन बदले में जेठानी का जवाब सुन कर वह अवाक रह गई.

‘‘करने दे रे, यही तो दिन हैं उस के हंसनेखेलने के. बाद में तो उसे हमारी तरह शादी की चक्की में ही पिसना है. बस बातें ही तो कर रही है न और वैसे भी सभी लड़के एक से एक अमीर खानदान से हैं.’’

रोहिणी को समझते देर नहीं लगी कि जेठानी की मनशा क्या है. वैसे भी उन्होंने निशा को ऐसे ढांचे में ही ढाला है कि अमीर खानदान में शादी कर के ऐश से रहना ही उस का एकमात्र ध्येय है. अमीर परिवार के इतने लड़कों में से वह एक मुरगा तो फांस ही लेगी.

रोहिणी को जेठानी की बात अच्छी नहीं लगी, लेकिन उस ने समझ लिया कि उन से और निशा से कुछ भी कहनासुनना बेकार है. वह ऋचा को उन दोनों से भरसक दूर रखने का प्रयत्न करती. वह नहीं चाहती थी कि ऋचा का ध्यान इन बातों पर जाए.

कई महीनों तक रोहिणी ऋचा की पढ़ाई को ले कर व्यस्त रही. उस ने निशा को टोकना छोड़ दिया और अपना सारा ध्यान ऋचा पर केंद्रित कर लिया. आखिर बेटी के भविष्य का सवाल है. रोहिणी अच्छी तरह समझती थी कि बेटी को अच्छे संस्कार दे कर बड़ा करना और बुरी सोहबत से बचा कर रखना एक मां का फर्ज होता है.

एक दिन रोहिणी ने निशा के हाथ में बहुत महंगा मोबाइल देखा तो उस का माथा ठनका. निशा और उस की मां की आपसी बातचीत से पता चला कि कुछ दिन पहले किसी हिमेश नामक लड़के से निशा की दोस्ती हुई है और उसी ने निशा को यह मोबाइल उपहार में दिया है.

जेठानी रोहिणी की ओर कटाक्ष कर के कहने लगीं कि लड़का आई.ए.एस. है. खानदान भी बहुत ऊंचा और अमीर है. निशा की तो लौटरी खुल गई. अब तो यह सरकारी अफसर की पत्नी बनेगी.

रोहिणी को इस बात पर बड़ी चिंता हुई. कुछ ही दिनों की दोस्ती पर कोई किसी पर इतना पैसा खर्च कर सकता है, यह बात उस के गले नहीं उतर रही थी.

उस ने अपने पति नीरज से बात की तो नीरज ने कहा, ‘‘मैं भी धीरज भैया को कह चुका हूं, लेकिन तुम तो जानती हो, वे भाभी और बेटी के सामने खामोश रहते हैं. तुम जबरन तनाव मत पालो. ऋचा पर ध्यान दो.

जब उन्हें अपनी बेटी के भविष्य की चिंता नहीं है तो हम क्यों करें? समझाना हमारा काम था हम ने कर दिया.’’

रोहिणी को नीरज की बात ठीक लगी. उस ने तो निशा को भी अपनी बेटी समान ही समझा, पर अब जब मांबेटी दोनों अपने आगे किसी को कुछ समझती ही नहीं तो वह भी क्या करे.

अगले कुछ महीनों में तो निशा अकसर हिमेश के साथ घूमने जाने लगी. कई बार रात में पार्टियां अटैंड कर के देर से घर आती. उस के कपड़ों से महंगे विदेशी परफ्यूम की खुशबू आती.

कपड़े दिन पर दिन कीमती होते जा रहे थे. रोहिणी ने कभी ऋचा और निशा में भेद नहीं किया था, इसलिए उस के भविष्य के बारे में सोच कर उस के मन में भय की लहर दौड़ जाती. पर वह मन मसोस कर मर्यादा का अंशअंश टूटना देखती रहती. घर में 2 विपरीत धाराएं बह रही थीं.

ऋचा सारे समय अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहती और निशा सारे समय हिमेश के साथ अपने सुनहरे भविष्य के सपनों में खोई रहती. उस के पैर जमीन पर नहीं टिकते थे. उस के सुंदर दिखने के उपायों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही थी. वह ऋचा और रोहिणी को ऐसी हेय दृष्टि से देखती थी मानो हिमेश का सारा पैसा और पद उसी का हो.

ऋचा के बी.ए. फाइनल और पी.एस.सी. प्रिलिम्स के इम्तिहान हो गए, लेकिन आखिरी पेपर दे कर आने के तुरंत बाद ही वह अन्य परीक्षा की तैयारियों में जुट गई. उस की दृढ़ता और विश्वास देख कर रोहिणी और नीरज भी आश्वस्त थे कि वह पी.एस.सी. की परीक्षा में जरूर सफल हो जाएगी.

और वह दिन भी आ गया जब रोहिणी और नीरज के चेहरे खिल गए. उन के संस्कार जीत गए. ऋचा की मेहनत सफल हो गई. वह प्रिलिम्स परीक्षा पास कर गई और साथ ही बी.ए. में पूरे विश्वविद्यालय में अव्वल रही.

लेकिन इस खुशी के मौके पर घर में एक तनावपूर्ण घटना घट गई. निशा रात में हिमेश के साथ उस की बर्थडे पार्टी में गई. घर में वह यही बात कह कर गई कि हिमेश ने बहुत से फ्रैंड्स को होटल में इन्वाइट किया है. खानापीना होगा और वह 11 बजे तक घर वापस आ जाएगी. लेकिन जब 12 बजे तक निशा घर नहीं आई तो घर में चिंता होने लगी. वह मोबाइल भी रिसीव नहीं कर रही थी. रात के 2 बजे तक उस की सारी सहेलियों के घर पर फोन किया जा चुका था पर उन में से किसी को भी हिमेश ने आमंत्रित नहीं किया था. जिस होटल का नाम निशा ने बताया था नीरज वहां गया तो पता चला कि ऐसी कोई बर्थडे पार्टी वहां थी ही नहीं.

गंभीर दुर्घटना की आशंका से सब का दिल धड़कने लगा. रोहिणी जेठानी को तसल्ली दे रही थी पर उन के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. वे रोहिणी से नजरें नहीं मिला पा रही थीं. सुबह 4 बजे जब वे लोग पुलिस में रिपोर्ट करने की सोच रहे थे कि तभी एक गाड़ी तेजी से आ कर दरवाजे पर रुकी और तेजी से चली गई. कुछ ही पलों बाद निशा अस्तव्यस्त और बुरी हालत में घर आई और फूटफूट कर रोने लगी.

उस की कहानी सुन कर धीरज और उस की पत्नी के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. रोहिणी और नीरज अफसोस से भर उठे.

बर्थडे पार्टी का बहाना बना कर हिमेश निशा को एक दोस्त के फार्म हाउस में ले गया. वहां उस के कुछ अधिकारी आए हुए थे. उसने निशा से उन्हें खुश करने को कहा. मना करने पर वह गुस्से से चिल्लाया कि महंगे उपहार मैं ने मुफ्त में नहीं दिए. तुम्हें मेरी बात माननी ही पड़ेगी. उपहार लेते समय तो हाथ बढ़ा कर सब बटोर लिया और अब ढोंग कर रही हो. और फिर पता नहीं उस ने निशा को क्या पिला दिया कि उस के हाथपांव बेदम हो गए और फिर…

कहां तो निशा उस की पत्नी बनने का सपना देख रही थी और हिमेश ने उसे क्या बना दिया. हिमेश ने धमकी दी थी कि किसी को बताया तो…

रोहिणी सोचने लगी अगर मर्यादा का पहला अंश भंग करने से पहले ही निशा सचेत हो जाती तो आज अपनी मर्यादा खो कर न आती.

निशा के कानों में रोहिणी के शब्द गूंज रहे थे, जो उन्होंने एक बार उस से कहे थे कि मर्यादा भंग करते जाने का साहस ही हम में एकबारगी सारी सीमाएं तोड़ डालने का दुस्साहस भर देता है.

वाकई एकएक कदम बिना सोचेसमझे अनजानी राह पर कदम बढ़ाती वह आज गड्ढे में गिर गई थी. Family Story In Hindi

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