Best Hindi Story: कैद

Best Hindi Story, लेखिका – नेहा अरोरा

‘‘अरे, क्यों रो रही है? अच्छा ही हुआ चला गया, तेरी जिंदगी नरक बना रखी थी,’’ श्यामा ने रोती हुई जीनत को चुप कराते हुए कहा. उस की आवाज में कड़वाहट तो थी, पर करुणा भी थी.

श्यामा की बात सुन कर एक पल को जीनत ने उसे नजर उठा कर देखा. उस की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे. उस के हाथ पर गरम चिमटे से लगी मार में अभी भी चीस उठ रही थी, लेकिन जिस ने उसे यह चीस दी थी, वह जिंदा साहिल था, पर अब उस के सामने मुर्दा साहिल था, जो न उसे मार सकता था, न गाली दे सकता था.

जीनत थोड़ा और पीछे हो कर दरवाजे से टेक ले कर बैठ गई. वहां कुछ ही लोग थे. साहिल के घर वालों ने बहुत पहले ही उस की हरकतों से तंग आ कर उस से रिश्ता तोड़ लिया था और जीनत के घर वालों ने उसे समझासमझा कर थक कर अपनी दूरी बना ली थी, पर जीनत सबकुछ जानतेसमझते, सहते हुए भी अलग नहीं हो पाई.

ऐसा नहीं है कि जीनत को ऐसा खयाल ही नहीं आया, पर जब भी उस ने अपना मन बनाया, कुछ न कुछ ऐसा हुआ कि वह वापस साहिल के पास आ गई.

जीनत को पता था कि अगर वह साहिल को छोड़ कर गई तो साहिल जिंदा नहीं रह पाएगा और वह उस की मौत की जिम्मेदारी अपने सिर नहीं लेना चाहती थी.

यह वही साहिल था, जिस के साथ जीनत ने जीनेमरने की कसमें खाई थीं, साथ निभाने का वादा किया था, कई खूबसूरत साल बिताए थे… उसे छोड़ कर वह कैसे जाती?

जीनत और साहिल ने अपनी पसंद से निकाह किया था. दोनों एकदूसरे पर जान छिड़कते थे. घर वालों ने भी इस रिश्ते को मंजूरी दे दी थी.

कोई कमी नहीं थी. न परिवारों में और न ही दोनों की जोड़ी में. सब इतना बढि़या चल रहा था, पर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि…

एक दिन साहिल काम पर से जल्दी लौट आया था. उस ने सोचा था कि जीनत को सरप्राइज देगा, लेकिन उस दिन जो सरप्राइज उसे मिला, वह उस की जिंदगी ले गया.

साहिल के पास घर की एक चाबी थी. धीरे से वह दबे पैर घर के भीतर आ गया था. उसे लगा था कि इस समय जीनत आराम कर रही होगी, इसलिए वह बैडरूम की तरफ चल दिया.

पर बैडरूम से आती किसी की धीमी आवाज से साहिल का माथा थोड़ा ठनका. उस ने धीरे से बैडरूम के दरवाजे की दरार से झांका, तो बिस्तर पर जीनत को अपने ही चचेरे भाई इफ्तार के साथ देख कर जैसे एक पल को उस को चक्कर ही आ गया. उन दोनों का ही ध्यान उस की तरफ नहीं गया था.

साहिल ने किसी तरह खुद को संभाला और जैसे आया था, वैसे ही वापस चला गया.

उस दिन के बाद वह साहिल शायद मर चुका था और उस की जगह एक दूसरे साहिल ने ले ली थी, इसलिए तो घर वालों को यह नया साहिल पहचान में नहीं आ रहा था.

साहिल ने अपने मुंह से उस दिन की बात कभी किसी के आगे नहीं कही, जीनत से भी नहीं. उस ने बहुत मौके दिए जीनत को कि वह यह घर छोड़ कर चली जाए.

जीनत को एहसास तो हो गया था कि शायद साहिल को पता चल चुका है, लेकिन उस ने जब भी जानने की कोशिश की, साहिल ने कुछ नहीं कहा.

जीनत ने घर छोड़ कर जाने का मन भी बना लिया था, लेकिन जब उस ने यह बात इफ्तार को बताई, तो उस ने फौरन वहां से तबादला ले लिया और पलट कर जीनत का फोन तक उठाना बंद कर दिया.

जीनत और साहिल दोनों अपने ही अंदर घुट रहे थे. इसी घुटन में साहिल ने शराब पीना शुरू कर दिया.

उस के घर वाले इस सब की वजह नहीं समझ पा रहे थे. उन्होंने साहिल को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन सब बेकार.

साहिल ने अब नशे में जीनत पर हाथ तक उठाना शुरू कर दिया था. जब वह नशे में चूर हो कर गिर पड़ता, तब जीनत उसे बिस्तर पर सही से लिटाती, चादर उढ़ाती.

नशे की हालत में गिरने के बाद साहिल के आंखों के कोनों से आंसू बह रहे होते. उन्हें देख कर जीनत का दिल पिघल जाता. उसे कई बार लगता खुद बता दे साहिल को तो शायद यह घुटन कम हो जाती, लेकिन साहिल जीनत को देखते ही भड़क जाता और जीनत को मौका ही नहीं मिल पाता.

जीनत पहले वाले साहिल की याद को मन में संजोए इंतजार करती रहती, पर उसे भी पता था कि साहिल की इस हालत की वही जिम्मेदार है और यह अपराधबोध उसे सब चीजों के बावजूद वहीं रोके रखता.

पता नहीं क्यों साहिल ने यह बात कभी किसी के आगे नहीं बताई. जीनत के घर वाले, साहिल के खुद के घर वाले साहिल को कोसते रहे, समझाते रहे और एक दिन तो साहिल के अब्बू ने उसे तमाचा भी लगा दिया, लेकिन साहिल के मुंह से फिर भी एक भी शब्द नहीं निकला.

आज भी साहिल इसी तरह नशे में चूर घर आया था. जीनत ने जब तक रोटी प्लेट में ला कर रखी, वह ठंडी हो गई थी.

साहिल गुस्से में पता नहीं क्याक्या बड़बड़ाता हुआ रसोईघर में आया और जीनत के हाथ से गरम चिमटा छीना और उस का हाथ पकड़ कर उस पर दाग दिया.

जीनत की चीख निकल गई और उस ने हाथ को छुड़ाने के लिए जोर से झटका दिया.

साहिल उस झटके से एकदम लड़खड़ा गया और पीछे की ओर गिरा. उस का सिर दीवार से जा टकराया.

जीनत भाग कर आई और उस ने साहिल को बहुत हिलाया, लेकिन शायद वह अब इस घुटन से आजाद हो गया था.

पता नहीं अब तक कौन किस की कैद में था. Best Hindi Story

Long Hindi Story: बस खाली करो – पहला भाग

Long Hindi Story: दिल्ली में कई साल से रहते हुए भी हसामुद्दीन इस शहर को ठीक ढंग से देख नहीं पाया था. कभी प्लान करता, तो पैसे न होते, जब पैसे होते, तो कारखाने की छुट्टी न होती. जब छुट्टी होती, तो कुछ घरेलू काम पड़ जाता था.

लेकिन उस शनिवार को हसामुद्दीन अपने कमरे से यह सोच कर निकला था कि आज तो कनाट प्लेस में घूमनाफिरना होगा. उस की इच्छा तो मैट्रो से जाने की हुई थी, लेकिन किराया ज्यादा होने की वजह से वह डीटीसी की नारंगी क्लस्टर बस में ही चढ़ गया, जो टर्मिनल से ही भर चुकी थी. फिर भी उसे सब से पीछे वाली एक सीट मिल गई थी.

उसी समय 2 लड़के पिछले दरवाजे की सीढि़यों पर आ कर बैठ गए. टर्मिनल से चलने तक बस में और ज्यादा भीड़ हो गई थी.

कई आदमी हसामुद्दीन के सामने खड़े थे. उस ने ‘पत्ते शाह बाबा’ को याद किया और कहा, ‘‘अगर सीट न मिलती तो आज खड़े हो कर ही जाना पड़ता.’’

जब बस अगले बस स्टौप पर रुकी, तो वहां से एक ट्रांसजैंडर पिछले दरवाजे से बस में चढ़ी, जो काफी पतली थी. उस का चेहरा लंबा और गोरा रंग था.

उस ने ‘हायहाय’ कहते हुए अपनी हथेलियों से 2 बार ताली बजाई. उस के माथे पर लाल गोल टीका लगा था. नाक में नथ और कान में झुमकी थी.

उस का साधारण सा सूटसलवार था. उस की क्लीन शेव, जो गहरे हरे रंग की थी, को चेहरे पर लगी सफेद क्रीम ने छिपा रखा था. उस ने अपने बाल ऊपर कर के टाइट बांधे हुए थे, जिन में गर्द भी भरा था और रूसी भी नजर आ रही थी.

हसामुद्दीन ने सोचा, ‘ताली बजाना इन लोगों की अपनी एक अलग पहचान है…’

तब तक वह ट्रांसजैंडर सवारियों से पैसे मांगने लगी थी. ताली बजाते हुए उस ने हसामुद्दीन से कहा, ‘‘दे न भाई.’’

हसामुद्दीन ने हाथ के इशारे से कहा, ‘‘मेरे 5 रुपए कंडक्टर के पास बकाया हैं. आप उन से ले लो.’’

हसामुद्दीन की यह बात सुन कर वह ट्रांसजैंडर मुंह बना कर आगे बढ़ गई.

हसामुद्दीन अपनी सीट से उचक कर देखने लगा कि कंडक्टर से उस ट्रांसजैंडर ने पैसे लिए या नहीं. अगर ले लिए होंगे, तो वह कंडक्टर से अपने पैसे नहीं मांगेगा.

अरे, यह क्या… वह ट्रांसजैंडर तो कंडक्टर के पास गई ही नहीं. हसामुद्दीन को अफसोस हुआ कि उसे कुछ दे देना चाहिए था.

जब हसामुद्दीन अपनी सीट से उचक कर उस ट्रांसजैंडर को देख रहा था, तब कुछ लोगों को लगा कि वह अगले बस स्टौप पर उतरेगा.

उसे उचकता देख कर एक आदमी ने दूसरे आदमी को संकेत करते हुए कहा, ‘‘वहां बैठ जाओ.’’

लेकिन हसामुद्दीन तो दोबारा अपनी सीट पर बैठ गया. तब कुछ लोग ट्रांसजैंडर और उसे देखने लगे.

एक लड़के ने हसामुद्दीन को देख कर अपने चेहरे पर मंद सी मुसकराहट दिखाई. अगले बस स्टौप पर वह ट्रांसजैंडर उतर गई.

उस लड़के के रिऐक्शन पर हसामुद्दीन ने अपना मुंह नीचे कर लिया और सोचा, ‘देश में जातिवाद, छुआछूत, बंधक मजदूर, लिंग असमानता, दहेज प्रथा, औरतों पर घरेलू हिंसा, बाल

यौन शोषण, धार्मिक हिंसा, दलितों आदिवासियों का शोषण जैसे बहुत से मुद्दे हैं, फिर ट्रांसजैंडर को हीन भावना से देखना तो परिवार और समाज से ही मिलता है. पर क्या ये लोग हमारी तरह इनसान नहीं हैं?

‘सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल, 2014 को ट्रांसजैंडर समुदाय को तीसरे लिंग के रूप में मंजूरी तो दे दी थी, पर समाज का नजरिया अभी भी बदला नहीं है…’

हसामुद्दीन ने अपनी दाईं तरफ बैठे एक आदमी को देखा. उस के देखने पर उस आदमी ने पूछा, ‘‘भाई साहब, अभी मैडिकल कितना दूर है? आने से पहले मुझे बता देना.’’

हसामुद्दीन ने अपना सिर ‘हां’ में हिलाया और उस आदमी से पूछा, ‘‘क्या आप इलाज कराने जा रहे हैं?’’

‘‘नहीं, कोई और भरती है,’’ उस आदमी ने कहा.

‘‘अभी मैं उस ट्रांसजैंडर के बारे में सोच रहा था. ऐसे बहुत से ट्रैफिक सिगनल पर, रेल में लोगों से भीख
मांगते दिख जाते हैं. इन की हालत बहुत पतली है.’’

वह आदमी बोला, ‘‘पर भाई साहब, पैसे न देने पर ये लोगों से बदतमीजी करते हैं. किसी के घर खुशी होने पर ये उस के घर जाते हैं और मुंहमांगे पैसे ले कर ही वहां से टलते हैं. ऐसा माना जाता है कि इन में लोगों को दुआ और बद्दुआ देने की ताकत होती है. लोगों को इन से डर भी लगता है.’’

‘‘लेकिन बहुत से लोग तो इन्हें ‘छक्का’ कह कर मजाक उड़ाते हैं. अगर ऐसा किसी के साथ होगा, तो वह आप के खिलाफ कड़ा रुख ही अपनाएगा न?

‘‘अगर बसों, रेलगाडि़यों में ये नरमी बरतेंगे, तो मुझे नहीं लगता कि लोग इन्हें सही से जीने भी देंगे. जहां जातिधर्म, क्षेत्र, भाषा, रंगरूप के नाम पर लोगों को जिंदा जला डालते हों, तो ऐसे समाज में ये क्या करें?

‘‘सही माने में देखें तो इन्होंने जीने के लिए अपना ऐसा रुख किया है. इन को समाज में अच्छी तरह बसाने के बारे में हम सभी को सोचना चाहिए,’’ हसामुद्दीन ने कहा.

उस आदमी ने कहा, ‘‘आप की बात ठीक है, लेकिन क्षेत्र के विधायक, सांसद इन के बारे में क्यों नहीं सोचते हैं? लोग तो एकदूसरे को ‘हिजड़ा’ बोल कर बेइज्जती करते हैं. आप ने बसों और ट्रेनों में सफर करते समय इन्हें लोगों से पैसे मांगते देखा होगा.

‘‘इन में से ज्यादातर तो नकली होते हैं, जो हिजड़ों जैसा हुलिया बना कर लोगों को ठगते हैं. उन में से कइयों की तो पोल भी खुल चुकी है,’’ उस आदमी ने अपनी बात रखी.

जसोला अपोलो बस स्टौप से कुछ और सवारियां चढ़ीं, लेकिन वे लड़के सीढि़यों पर ज्यों के त्यों बैठे रहे.
जब एक आदमी बस से उतरने के लिए उन के पीछे खड़ा हुआ, तब उन लड़कों में से एक ने उसे हड़काते हुए कहा, ‘‘अबे, यहीं उतरेगा क्या?’’

लेकिन उस आदमी ने तनते हुए कहा, ‘‘क्या कह रहा है बे?’’

वे लड़के उस आदमी की बात सुन कर चुप तो हो गए, लेकिन उसे घूरने लगे. उस आदमी के चेहरे पर डर का भाव तो नहीं था, पर वह दाएंबाएं देख कर चुप रहा.

बस आगे बढ़ती जा रही थी. हरकेश नगर ओखला बस स्टौप पर कुछ और सवारियां चढ़ीं और उतरीं. बस रुकते ही एक आदमी दौड़ता हुआ उन लड़कों के सामने आ कर बोला, ‘‘भाई, यह बस मैडिकल जाएगी?’’

एक लड़के ने उस से कहा, ‘‘अबे, नहीं जाएगी.’’

जब वह आदमी कुछ पीछे हटने लगा, तभी कंडक्टर ने उसे आवाज दी, ‘‘हां, जाएगी.’’

वह आदमी उन लड़कों के बगल से होता हुआ हड़बड़ी में अंदर आया और उन्हें डांटते हुए कहा, ‘‘अबे, तू तो कह रहा था कि बस मैडिकल नहीं जाएगी…’’

इस पर वे दोनों लड़के तमतमाते हुए खड़े हो गए और उन में से एक ने कहा, ‘‘देखने में सही लग रहा है, जहां जा रहा है सही से जा, नहीं तो पीछे आ. अभी तेरी सारी गरमी निकालता हूं.’’

उस आदमी ने दूसरी सवारियों से कहा, ‘‘बताएं, क्या इस की गलती नहीं है… ऊपर से कह रहा है कि गरमी निकाल दूंगा.’’

उन में से एक लड़का बोला, ‘‘बस में गरमी बहुत है, तू पीछे आ…’’

उन के बीच में न कंडक्टर कुछ बोल रहा था, न सवारियां ही कुछ बोल रही थीं. बस, सब यह तमाशा देख रहे थे.

उन दोनों के बीच होती बहस के बीच हसामुद्दीन हिम्मत करते हुए बड़बड़ाया, ‘‘लड़ो मत, शांत हो जाओ.’’

कंडक्टर बिलकुल शांत हो कर अपनी जगह पर बैठा था और ड्राइवर निश्चिंत भाव से बस चला रहा था. उन्हें इस लफड़े से कोई मतलब नहीं था.

बस में अब पीछे उतनी भीड़ नहीं थी. बस आश्रम बस स्टौप पार कर चुकी थी.

उन लड़कों में एक लड़का सांवला था. उस की उम्र 15-16 साल के बीच होगी. उस के दांत साफ दिखे, कान में बाली पहनी हुई थी. दूसरे लड़के की उम्र 20-22 साल के बीच होगी, जिस के बाएं हाथ पर जगहजगह गहरे कट के निशान थे, जो उभरे हुए दिख रहे थे. उस लड़के के दांत मटमैले और रंग साफ था.

बाल भूरे थे, जो उलझे हुए थे.

छोटा लड़का उस से कह रहा था, ‘‘भाई, मुझे घर जाना है, कुछ पैसे दे दे…’’

बड़ा लड़का लंपटता से बोला, ‘‘अबे, ‘स्टाफ’ बोल कर चला जा.’’

उस लड़के के ‘स्टाफ’ कहने पर हसामुद्दीन को याद याद आया कि जब दिल्ली में ब्लूलाइन बसें चला करती थीं, उन में स्कूलकालेज के बच्चे और दबंगई करने वाले दूसरे लोग अपनेअपने ‘स्टाफ’ चलाते थे और ब्लूलाइन वाले डीटीसी बसों के ड्राइवर और कंडक्टर से मिलीभगत कर के डीटीसी बसों को रुकवा लेते थे और अपनी बसें पहले चलवाते थे.

सभी ब्लूलाइन प्राइवेट बसें थीं, जो ठेके पर चला करती थीं. उन्हें चलाने वाले अपने रूट पर ज्यादा से ज्यादा चक्कर लगा कर 2-3 गुना पैसे कमाने के चक्कर में बड़ी तेज रफ्तार से चलते थे, जिस से आएदिन हादसे होते रहते थे.

लोग इन को दिल्ली की ‘हत्यारी ब्लूलाइन बसें’ भी कहते थे. लेकिन सितंबर, 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान दिल्ली की कांग्रेस सरकार ने इन सभी ब्लूलाइन बसों को बंद कर दिया था.

उस बड़े लड़के की गरदन पर त्रिशूल और डमरू का टैटू बना हुआ था और उस के दाएं हाथ पर ‘जय माता दी’ गुदा हुआ था. उस की पैंट सरकी हुई थी और अंडरवियर के साथ अंदर की तरफ एक पेचकस जैसा कुछ ठुंसा दिख रहा था.

जब वह लड़का उस आदमी को धमकाने के लिए खड़ा हुआ, तब उस ने अपने बाएं हाथ में लोहे के एक कड़े को कस कर फंसा लिया था, जिसे देख कर हसामुद्दीन डर गया था.

उस लड़के से नजर बचाते हुए हसामुद्दीन ने जल्दी से अपना मोबाइल पैंट की जेब में रखा. उसे लगा कि कहीं वह मोबाइल न छीन ले.

तभी बस की बाईं तरफ की सीटों पर बैठी 2 औरतों में किसी बात को ले कर गालीगलौज शुरू हुआ.

एक ने दूसरी से कहा, ‘‘सही से बैठो.’’

दूसरी ने कहा, ‘‘तझे बैठने की तमीज नहीं है.’’

दूसरी औरत बूढ़ी थी. कंडक्टर ने समझाया, ‘‘माताजी, गलत मत बोलो.’’

उस लड़के ने कंडक्टर से कहा, ‘‘अबे, तुझे चाकू चाहिए, तो मुझ से ले ले. मेरे पास है. नहीं तो मैं इन दोनों को ठीक कर देता हूं. बहुत देर से ‘चैंचैं’ लगा रखी है.’’

कंडक्टर ने उस लड़के की बात का जवाब नहीं दिया. कुछ सवारियां और कंडक्टर की दखलअंदाजी से वे दोनों औरतें चुप हुईं.

बस के ज्यादातर मर्द इन औरतों के बीच हुई बहस को सीरियसली नहीं ले रहे थे. वे उन की बहस को केवल हंसी की बात समझ रहे थे. बस के अंदर उन औरतों के अगलबगल खड़े मर्द तो मंदमंद मुसकरा रहे थे, जबकि पीछे वाले कुछ लोग ठहाके मार रहे थे.

दरअसल, ज्यादातर मर्द समाज औरतों को इनसान ही नहीं मानता है, न ही उन की बातों को गंभीरता से लेता है. सही माने में मर्द औरतों को समझाना ही नहीं चाहते हैं, क्योंकि वे खुद को बेहतर समझते हैं, जबकि औरतें मर्दों से किसी भी मामले में पीछे नहीं हैं. वे पुलिस, सैनिक, डाक्टर, व्यापारी, टीचर, प्रोफैसर, ड्राइवर हैं. और तो और मर्दों को पैदा करने वाली भी वे ही हैं.

लाजपत नगर बस स्टौप पर कुछ और सवारियां उतर गईं. हसामुद्दीन के बाईं तरफ एक सीट खाली हो गई और एक सीट उस से आगे की भी खाली हुई.

कंडक्टर ने उन लड़कों को मान देते हुए कहा, ‘‘भाई, सीट पर बैठ जाओ.’’

बड़ा लड़का कुछ संकोच करते हुए हसामुद्दीन के बगल वाली सीट पर आ कर बैठ गया और दूसरा लड़का आगे वाली सीट पर बैठा.

हसामुद्दीन उस बड़े लड़के से कुछ डरा हुआ था, फिर भी उस से पूछा, ‘‘तुम बदरपुर में रहते हो?’’

उस लड़के ने धीरे से कहा, ‘‘नहीं, दक्षिणपुरी में.’’

उस लड़के के मुंह से बदबू आ रही थी. उस ने कहा, ‘‘सरजी, मैं आप को जानता हूं. मैं ने आप को बदरपुर के एक स्कूल में देखा है.’’

यह सुन कर हसामुद्दीन को कुछ राहत मिली. सोचा कि कहीं किसी स्कूल के कार्यक्रम में देख लिया होगा.

हसामुद्दीन ने उस लड़के से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे मम्मीपापा हैं?’’

उस लड़के ने कहा, ‘‘सरजी, सब हैं, लेकिन दुनिया बड़ी जालिम है, हमें जीने नहीं देती है.’’

हसामुद्दीन को लगा कि वह लड़का पूरी बात नहीं आप ही बता रहा है.

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘तुम कुछ काम सीख लो और जिंदगी में आगे बढ़ो. जो भी तुम्हारे साथ बुरा हुआ, वह बीत गया है. उसे छोड़ कर आगे बढ़ो. अपनी जिंदगी क्यों बरबाद कर रहे हो…’’

उस लड़के ने कहा, ‘‘सरजी, दुनिया बहुत खराब है. क्या काम करें, आप ही बताओ?’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘भाई, बहुत से काम हैं. मोटर मेकैनिक का काम सीख लो, बिजली का काम सीख लो, और भी बहुत से काम हैं.’’

उस लड़के ने दोबारा कहा, ‘‘सरजी, दुनिया जीने नहीं देती,’’ कह कर वह अपना सिर दिखाने लगा और बोला, ‘‘इस में डाक्टरों ने गलत आपरेशन कर दिया था.’’

लेकिन हसामुद्दीन ने उस चोट को देखने की कोशिश नहीं की, क्योंकि उसे ऐसा करना सही नहीं लग रहा था.

फिर उस लड़के ने कहा, ‘‘सरजी, 50 रुपए दे दो.’’

हसामुद्दीन के मन में उस लड़के को 50 रुपए देने की बात आई, लेकिन वह 20 रुपए ही देने लगा, जिसे

वह लड़का नहीं ले रहा था. उस ने कहा, ‘‘सरजी, इतने कम पैसे मैं नहीं लेता.’’

लेकिन हसामुद्दीन ने उस लड़के के हाथ में जबरदस्ती पैसे रख दिए और कहा, ‘‘कुछ खा लेना.’’

उस लड़के ने कहा, ‘‘सरजी, इतने में कहां कुछ मिलता है…’’ और अपने साथी के साथ वह एम्स (मैडिकल) वाले बस स्टौप पर उतर गया.

उस लड़के ने बात तो ठीक कही थी. इस जमाने में पैसे कीमत ही कहां है. महंगाई के दौर में आम आदमी की जिंदगी कितनी मुश्किल हो गई है.

उन दोनों लड़कों के उतरने पर बस कंडक्टर ने सवारियों से कहा, ‘‘ये दोनों जेबकतरे थे. इन से कौन बहस करे…’’

बस कंडक्टर ने एक बात और कही, ‘‘शनिवार के दिन दिल्ली की बसों में किसी की जेब नहीं कटती है.’’

हसामुद्दीन की बाईं तरफ एक सीट छोड़ कर एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा था.

हसामुद्दीन ने उस आदमी से कहा, ‘‘ये लड़के पहले ऐसा नहीं होंगे, जैसा हम ने इन्हें फिलहाल देखा है.

किसी के हालात उसे क्या से क्या बना देते हैं. मुझे लगा कि मैं ने एक लड़के को कहीं देखा है. जन्म से कोई बुरा या अच्छा नहीं होता है. अच्छा या बुरा बनने में भी समय लगता है. यह समाज उसे अच्छा या बुरा बनाता है.

उस अधेड़ आदमी ने हसामुद्दीन की तरफ देख कर कहा, ‘‘आप की बात तो ठीक है, पर बच्चे समझते कहां हैं…’’

हसामुद्दीन ने उस आदमी से पूछा, ‘‘आप कहां जा रहे हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘केंद्रीय सचिवालय.’’

‘‘क्या आप सरकारी नौकरी में हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘नहीं… एक क्लब है, वहीं पर काम करता हूं.’’

‘‘आप कब से वहां काम कर रहे हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘पिछले 3 साल से.’’

‘‘बड़ा क्लब है?’’

हां. उस क्लब में बहुत से लोग काम करते हैं, लेकिन सब ठेकेदारी पर हैं.’’

‘‘आप पहले कहां काम करते थे?’’

‘‘साउथ ऐक्सटैंशन में एक होटल है, मैं वहीं पर कुक था.’’

हसामुद्दीन ने पूछा, ‘‘आप ने कितने साल वहां काम किया?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘25 साल से ज्यादा ही.’’

‘‘फिर तो आप को छोड़ना नहीं चाहिए था.’’

‘‘क्या करें, मालिक ने लौकडाउन का फायदा उठाते हुए 18 लोगों को निकाल दिया, जिन में मैं भी शामिल था.’’

‘‘वहां पर तो आप परमानैंट होंगे?’’

‘‘हां, छुट्टियां भी मिलती थीं. अभी भी वहां पर बहुत लोग काम करते हैं, लेकिन सब ठेकेदारी पर हैं. हमारी तो वहां एक यूनियन भी थी. मालिक ने धीरेधीरे सभी को निकालना शुरू कर दिया था.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘मालिक को यूनियन से डर होता है.’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘डर तो होता है, क्योंकि यूनियन होने से कामगार को एक तरह की सिक्योरिटी मिलती है. अगर किसी ने कामगार को उचित वेतन नहीं दिया है, तब यूनियन मैनेजमैंट के सामने अपनी बात रखती है. यूनियन न होने से कामगार अपनी बात को मजबूती से और बिना डर के नहीं रख सकता है.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘आप उस क्लब में क्यों नहीं एक यूनियन बना लें?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘अब ट्रेड यूनियन बनाना आसान काम नहीं है. सरकार ने ट्रेड यूनियन बनाने के लिए नियमों में बड़ी कड़ाई की है. पहले जहां 7 लोग मिल कर यूनियन बना लेते थे, अब कुल कामगारों का 10 फीसदी कर दिया गया है. न 10 फीसदी कामगार होंगे, न यूनियन बनेगी. अब कारखाना और फैक्टरी के अंदर धरनाप्रदर्शन करने की भी छूट नहीं है. सरकार केवल पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए काम कर रही है.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘जब ट्रेड यूनियनें नहीं होंगी, तब कामगारों की आवाज कौन उठाएगा?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘अब आवाज ही कौन उठा रहा है… जो हैं वे बहुत कमजोर हैं. देखिए, इस क्लब में काम करते हुए मुझे 3 साल हो गए हैं, लेकिन कोई छुट्टी नहीं मिलती है. जिस दिन काम करने नहीं गए, उस दिन की दिहाड़ी नहीं मिलती है.’’

हसामुद्दीन ने पूछा, ‘‘आप को यहां कितने पैसे मिलते हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘15,000 मिलते हैं, लेकिन आनेजाने का किराया और छुट्टी निकल लूं, तो 10,000 बच जाते हैं. लेकिन भाई साहब, बगैर छुट्टी के कैसे काम चलेगा. बस, यही सोचता हूं कि खाली बैठने से अच्छा है कि कुछ करता रहूं.’’

हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘आप के बच्चे तो बड़े हो गए होंगे…’’

‘‘जी…’’ उस आदमी ने कहा.

‘‘कहां रहते आप हैं?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘विनय नगर, फरीदाबाद में.’’

‘‘किराए पर रहते हैं?’’

‘‘नहीं. 30 गज का प्लौट ले कर बना लिया है. उसी में रहते हैं.’’

हसामुद्दीन ने उस आदमी के पीले और जंग लगे हुए दांत देख कर पूछा, ‘‘क्या आप गुटका या पान मसाला खाते हैं?’’

‘‘नहीं, पर बीड़ी जरूर पीता हूं.’’

हसामुद्दीन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा, ‘‘आप वादा कीजिए कि आज से बीड़ी नहीं पीएंगे?’’

उस आदमी ने अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया, लेकिन कहा, ‘‘वादा कर के तोड़ना नहीं चाहता हूं.’’

हसामुद्दीन ने उसे एक सलाह दी, ‘‘आप आलू, प्याज, फल बेचने का अपना काम करें. इतना पैसा तो आप फरीदाबाद में ही कमा लेंगे.

उस आदमी ने कहा, ‘‘एक बार ढाबा शुरू किया था, लेकिन चला नहीं.’’

वह आदमी केंद्रीय सचिवालय उतरने लगा, तब हसामुद्दीन ने कहा, ‘‘मैं ने आप को 2 बातें बताई हैं. एक बीड़ी न पीने की और दूसरी अपना कोई काम करने की.’’

उस आदमज ने कहा, ‘‘बिलकुल भाई साहब, मैं आप की बात याद रखूंगा.’’

हसामुद्दीन सोचने लगा, ‘‘आमजन में बेरोजगारी के चलते ही ठेकेदारी प्रथा फलफूल रही है और नवउदारवादी नीति का मतलब है कि काम ज्यादा, पैसे कम और न कोई छुट्टी, न कोई स्वास्थ्य सुरक्षा और न ही कोई दूसरा फायदा. इस नीति ने केवल पूंजीपतियों को मजबूत किया है. सरकार की इच्छाशक्ति से ही इस देश में ठेकेदारी प्रथा को खत्म किया जा सकता है या लोग ठेकेदारी पर काम ही न करें.’’

निजीकरण पर हसामुद्दीन को अपनी कालोनी के एक साथी दशरथ ठाकुर की बात याद आई. वे कहते हैं, ‘सरकारी मुलाजिम खुद इस के लिए जिम्मेदार हैं. जिस की नौकरी लग जाती है, वह खुद को सरकारी दामाद समझने लगता है.’

दशरथ ठाकुर रेलवे महकमे से रिटायर हो चुके हैं. हसामुद्दीन ने उन से एक बार पूछा था, ‘‘क्या रेलवे में सभी मुलाजिम काम नहीं करते हैं?’’

तब उन्होंने कहा था, ‘‘सरकारी मुलाजिम देरी से आता है और जल्दी घर चला जाता है.’’

हसामुद्दीन इस बारे में विचार करता है कि कैंटीन में चाय पीना, सिगरेट फूंकना या किसी से बात करने का मतलब यह नहीं है कि वह काम नहीं करता है. कुछ मुलाजिम कामचोर जरूर होते हैं, लेकिन उन्हें कड़ाई से दुरुस्त किया जा सकता है न कि उदारवादी लोककल्याणकारी व्यवस्था को बदल कर पूंजीवादी व्यवस्था लागू कर दिया जाए. अंगरेजी राज में भी तो सरकारी स्कूल थे. सरकारी रेलवे और डाक महकमे थे. तब वहां काम होता था, तो आज क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या केवल डर से ही लोग सही से काम करेंगे?

निजीकरण तो इस का कोई हल नहीं है.

फैक्टरी मालिक ग्रैच्युटी नहीं देना चाहते हैं, क्योंकि नवउदारवादी नीति तो केवल टैंपरेरी नौकरी देने के पक्ष में है. आज बड़ेबड़े उद्योगों में भी टैंपरेरी नौकरियां ही दी जा रही हैं.

पूंजीपतियों के पक्षधर कहते हैं, ‘भाई, सभी को परमानैंट नौकरी नहीं दी जा सकती है…’ यह सोच हमारे समाज में तेजी से बढ़ाई गई है. पर लोग यह क्यों नहीं सोचते कि कोई पूंजीपति खुद पूंजीपति नहीं बनता है, उसे मजदूर और मुलाजिम पूंजीपति बनाता है. क्या पूंजीपति मजे नहीं करते हैं? उन के बच्चों की शादी में करोड़ों रुपए खर्च नहीं होते हैं?

खर्च करना गलत नहीं है, क्योंकि एक का खर्च होना भी तो अर्थशास्त्र में दूसरे की आमदनी है. सरकारी मुलाजिमों की आड़ में तो प्राइवेट कंपनियों में काम कर रहे मजदूरों, दूसरे मुलाजिमों के हकों को इन बीते दशकों में तेजी से हड़प लिया गया है.

7 लोग मिल कर यूनियन क्यों नहीं बना सकते हैं, जबकि धर्म को बचाने के लिए 4 लोग खड़े हो कर होहल्ला कर सकते हैं? कामगारों का हक क्या हक नहीं है? किसी कंपनी के मालिक ने किसी को रोजगार दे कर क्या उसे अपना गुलाम बना लिया है?

हसामुद्दीन को बस की सीढि़यों पर बैठे उस बड़े लड़के की याद आई, जिस के शरीर पर टैटू खुदे थे. क्या वे पैदाइशी थे या समाज ने ही उसे इतना धर्मभीरू बना दिया? अच्छेबुरे की परवाह न करते हुए उस ने अपने धर्म को ज्यादा अहमियत दी, लेकिन धर्म भी एक पदार्थ है… निकालने वाले तो उस में से अच्छीअच्छी चीजें निकाल कर अपनी जिंदगी संवार लेते हैं.

दूसरी तरफ सांप्रदायिक और धार्मिक अवसरवादी तत्त्व हैं, जो ऐसे लड़कों का इस्तेमाल हैं, क्योंकि धर्मभीरूता और पक्षधरता तो हर आदमी में होती है, लेकिन सांप्रदायिकता उस के अनुपात को बढ़ा देती है.

वे दोनों लड़के भयमुक्त लग रहे थे, लेकिन उन्हें भी भूख और प्यास लगती है. उन्होंने बस में कुछ लोगों को धमकाया भी था.

आदमी में डर होता है, पर जिसे सजा का डर न हो तो वह भयमुक्त हो जाता है या व्यवस्था ही अमानवीय हो जाए, तब आदमी का डर खत्म हो जाता है. अगर आदमी की जीने की चाह ही मर जाए, तब भी आदमी को डर नहीं लगता है.

कालोनी के साथी दशरथ ठाकुर को अब सरकारी नौकरियों में कमियां नजर आती हैं, जबकि वे खुद सरकारी मुलाजिम थे. उन का पैर रेल से कट गया था. रेलवे ने उन्हें अपने महकमे में दूसरा काम दिया, उन का इलाज करवाया. यहां तक कि नकली पैर भी लगवाया. उन की रेलवे की पैंशन है, पर प्राइवेट सैक्टर में काम कर रहे कामगारों के साथ होने वाले हादसों में मालिक उन्हें बाहर का रास्ता ही दिखा देते हैं.

इतने में हसामुद्दीन को कंडक्टर की आवाज सुनाई देने लगी, ‘‘अरे भाई, बस खाली कर दो…’’

बस मिंटो रोड तक पहुंच गई थी. हसामुद्दीन बस से उतर कर मिंटो ब्रिज से होता हुआ रीगल सिनेमा की तरफ चल दिया. Long Hindi Story

Story In Hindi: अछूत की तलाशी

Story In Hindi: समसपुर पंचायत में चौधरी साहब का काफी दबदबा था. आखिर हो भी क्यों न. मुसहर टोले का शायद ही कोई ऐसा आदमी था, जो चौधरी साहब का कर्जदार न हो या उन के खेत और ईंटभट्ठे में मजदूरी न करता हो.

देवन भी चौधरी साहब का खेतिहर मजदूर था. इंदिरा आवास योजना के तहत उस के पास रहने को पक्का मकान था. वह कभी चौधरी साहब के खेत में तो कभी ईंटभट्ठे पर मजदूरी किया करता था. मजदूरी से जो भी अनाज या पैसा मिलता था, उसी से देवन का गुजारा होता था.

3 साल पहले टीबी के मरीज देवन ने अपनी बीमारी के इलाज के लिए 10,000 रुपए सैकड़ा की दर से 5,000 रुपए चौधरी साहब से उधार लिए थे. वह हर महीने ब्याज का बाकायदा भुगतान भी कर दिया करता था.

पर पिछले 2 महीने से लगातार बीमार रहने के चलते देवन चौधरी साहब के ईंटभट्ठे पर नहीं जा रहा था. इस वजह से वह मूलधन तो दूर 2 महीने से ब्याज तक नहीं चुका पाया था.

चौधरी साहब जितनी आसानी से ब्याज पर रुपए लगाते थे, उस से कई गुना सख्ती से वसूली करने के लिए भी बदनाम थे. 2 महीने तक देवन जब काम पर नहीं पहुंचा और ब्याज भी नहीं भिजवाया, तो एक शाम चौधरी साहब खुद 4 लठैतों को ले कर मुसहर टोले की ओर चल दिए.

देवन की झोपड़ी के पास पहुंच कर चौधरी साहब के एक लठैत ने आवाज लगाई, ‘‘अरे देवना, कहां है रे… निकल बाहर…’’

आवाज सुन कर देवन किसी तरह लाठी टेकता हुआ बाहर निकला.

37 साल का गबरू जवान दिखने वाला देवन आज टीबी की वजह से 60 साल की उम्र वाला हड्डियों का ढांचा सा दिख रहा था.

‘‘अरे, मालिक आप…पाय लागूं …’’ बोल कर देवन ने चौधरी साहब के जूते को पकड़ लिया.

चौधरी साहब पैर से देवन के हाथों को ?ाटकते हुए चिल्लाए, ‘‘अरे, छू कर मेरा धरम भ्रष्ट करेगा क्या?’’

एक लठैत देवन द्वारा छुए गए चौधरी साहब के जूते को गमछे से साफ करने लगा.

‘‘ए देवना, चल फटाफट निकाल दो महीने का ब्याज… 1,000 रुपए,’’ चौधरी साहब चिल्लाए.

‘‘आप को तो पता ही है मालिक, 2 महीने से लगातार तबीयत बिगड़ी हुई है. दवादारू के चक्कर में ही जमा किया हुआ सारा रुपयापैसा खर्च हो गया,’’ देवन ने अपनी मजबूरी जाहिर की.

‘‘ऐ सुन… हम यहां तुम्हारी रामकथा सुनने नहीं, बल्कि सूद लेने आए हैं,’’ चौधरी साहब ने हड़काया.

‘‘मालिक, 3 साल से तो हर महीने समय पर 500 रुपए दे ही देते थे, बस इधर 2 महीने से तबीयत ज्यादा बिगड़ गई, तो काम पर नहीं जा सके, इसलिए ब्याज रुक गया…’’ देवन बोला.

‘‘चल, तलाशी दे… कितना माल छिपा रखा है अपनी अंटी में,’’ कमर से बंधी अंटी पर नजर टिकाते हुए चौधरी साहब ने बीच में टोकते हुए पूछा.

देवन ने अंटी से सौ के 3, पचास के 3, बीस के 2 और एक दस का एक नोट निकाल कर दिखाते हुए हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मालिक, अभी हमारे पास ब्याज देने के पैसे नहीं हैं. ये बस 500 रुपए हैं, जिन से आज इलाज की आखिरी दवा लेने शहर में डाक्टर के पास जाना है.

‘‘डाक्टर साहब ने कहा है कि आज आखिरी खुराक लेने के एक हफ्ते बाद मैं पूरी तरह से ठीक हो जाऊंगा… मालिक, एक बार तबीयत ठीक हो जाने दीजिए, फिर मैं आप के ईंटभट्ठे पर काम कर के आप की पाईपाई चुका दूंगा.’’

‘‘चल ड्रामेबाज, गांव की सरकारी डिस्पैंसरी में इलाज न करा कर शहर में जाएगा डाक्टर को दिखाने…’’ इतना कह कर चौधरी साहब ने एक लठैत को कुछ इशारा किया.

उस लठैत ने एक झटके में 500 रुपए देवन के हाथ से छीन कर चौधरी साहब को थमा दिए.

‘‘यह तो हुआ एक महीने का ब्याज, बाकी एक महीने का भी निकाल फटाफट,’’ नोटों को उलटपुलट कर जांचते हुए चौधरी साहब गुर्राए.

‘‘सच कह रहे हैं मालिक, बच्चे की कसम… ये पैसे मुझे दे दीजिए, दवा मंगवानी है साहब… ठीक होने के बाद मैं आप का सारा कर्जा चुका दूंगा,’’ गिड़गिड़ाते हुए देवन रोने लगा.

बाहर होहल्ला सुन कर देवन की बीवी गोद में 8 महीने के बेटे को ले कर बाहर निकल आई. वह सारी बात को समझ चुकी थी.

वह भी पति के साथ गिड़गिड़ाने लगी, ‘‘हुजूर, एक भी पैसा नहीं है अभी… आप यह पैसा हमारे मालिक को दे दीजिए… दवा लानी है… बाद में ये मजदूरी कर के धीरेधीरे आप का सारा पैसा लौटा देंगे.’’

चौधरी साहब ने ऊपर से नीचे तक देवन की बीवी को ताड़ा. गठीले शरीर वाली गोरीचिट्टी देवन की बीवी ने एक मैलीकुचैली साड़ी से किसी तरह अपने अधनंगे बदन को ढका हुआ था. गोद में लिए हुए बच्चे के अंग पर कोई भी कपड़ा नहीं था.

बिना ब्लाउज के साड़ी से ढकी छाती पर आंखें गड़ाते हुए चौधरी साहब कुटिलता से मुसकराए, फिर बोले, ‘‘क्या रे, तुम दोनों प्राणी हम को बेवकूफ सम?ाते हो… पैसा घर में छिपा कर रखा है और यहां मगरमच्छ के आंसू बहा रहे हो.’’

‘‘सच कहते हैं हुजूर, एक भी रुपया नहीं है घर में,’’ देवन ने जवाब दिया.

‘‘तो चल तलाशी दे घर की,’’ इतना बोल कर चौधरी साहब ने देवन की बीवी की गोद से बच्चा ले कर देवन को थमा दिया और उस की पत्नी की बांह पकड़ कर झोपड़ी के अंदर ले जाने लगे.

थोड़ी देर पहले देवन को अछूत कहने वाले चौधरी साहब को उस की बीवी का शरीर छूते समय छूतअछूत से कोई मतलब नहीं था.

‘‘मालिक, रुक्मिणी को छोड़ दीजिए, हम चलते हैं साथ में,’’ देवन टोकते हुए बोला.

चौधरी साहब के इशारे पर लठैतों ने देवन को घेर लिया. तलाशी के नाम पर चौधरी साहब देवन की बीवी के साथ घर के अंदर चले गए और दरवाजे को अंदर से बंद कर दिया.

आधा घंटे बाद चौधरी साहब कुरते के बटन लगाते हुए बाहर निकले और बोला, ‘‘सही कह रहा था देवना… पैसा नहीं था अंदर…’’

गोद में बच्चा लिए देवन बिलखबिलख कर रो रहा था. अंदर निढाल पड़ी उस की बीवी, जो कल तक अछूत मानी जाती थी, आज पराए मर्द की छुअन से खुद को दूषित महसूस कर रही थी.

चौधरी साहब ने लठैतों को चलने का इशारा किया और मूंछ पर उंगली फेरते हुए देवन से कहा, ‘‘तुझे पता है न देवन, मैं सूद से समझौता नहीं करता… इस बार तो 2 महीने का ब्याज बराबर हो गया, बाकी अगले महीने से समय पर दे देना, नहीं तो हमें आ कर इसी तरह घर की तलाशी लेनी पड़ेगी.’’ Story In Hindi

Family Story In Hindi: बड़का घराना की हार

Family Story In Hindi: 55 साल के बजरंगी सिंह ने जब विधवा दुर्गा देवी को अपने घर के कामकाज के लिए रखा तो उन की नीयत में खोट था. दुर्गा देवी ने वह काम छोड़ दिया. गांव वालों के कहने पर वह मुखिया का चुनाव लड़ बैठी. उस के सामने थी बजरंगी सिंह की बहू और बड़का घराना की शान. क्या दुर्गा देवी लोहा ले पाई?

गांव में धीरेधीरे भोर का उजाला फैल रहा था. पूरब की ओर खेतों के किनारे खड़े पेड़ों की कतार पर लालिमा ऐसे बिखर रही थी, जैसे किसी ने कूची से रंग भर दिया हो.

यह गांव बेलाडीह कहलाता था. वही गांव जहां एकएक घर की कहानी कई पीढि़यों तक फैली रहती थी. यहीं, इसी गांव के बीचोंबीच एक बड़ा सा पक्का मकान था, लोग उसे ‘बड़का घराना’ कहते थे. मालिक थे बजरंगी सिंह.

एक समय ऐसा था जब बजरंगी सिंह की हुकूमत पूरे इलाके में चलती थी. उन के बापदादा जमींदार थे. गांव के आधे खेतों पर उन्हीं का कब्जा था.

बजरंगी सिंह की उम्र होगी तकरीबन 55 साल. शरीर गठीला, मूंछ तनी हुई, चाल में अकड़. पर वक्त ने जैसे उन की रियासत का कद थोड़ाथोड़ा काटना शुरू कर दिया था. नए कानून, नई पीढ़ी और बदलते हालात ने ‘बड़का घराना’ के रसूख को हिला दिया था.

उसी गांव में रहती थी दुर्गा देवी.

40 के आसपास की औरत. रंग सांवला, कद औसत, आंखों में अजीब सी हिम्मत. पति की मौत के बाद वह अपने 4 बच्चों को ले कर अकेली रह रही थी. तो सब से बड़ी बेटी 10वीं जमात में पढ़ती थी, तो सब से छोटा बेटा अभी 3 साल का था. घर में दो वक्त की रोटी का भी भरोसा नहीं था.

पति रमेंद्र की मौत के बाद दुर्गा देवी के दिन ऐसे बीते जैसे रात खत्म ही नहीं हो रही. गांव के लोगों ने शुरूशुरू में सहारा दिया, लेकिन धीरेधीरे सब अपनीअपनी दुनिया में लग गए. उस के पास खेती लायक जमीन थी ही नहीं. मजदूरी से जो मिलता, उसी से गुजारा होता.

बच्चे रोज पेटभर खाना मांगते और दुर्गा देवी मन ही मन टूटती. वह गांव के हर बड़े आदमी के दरवाजे पर मदद की उम्मीद ले कर गई, पर कहीं से कुछ खास सहारा नहीं मिला.

तभी गांव के सब से रसूखदार आदमी बजरंगी सिंह ने उसे बुलाया और कहा, ‘‘देखो दुर्गा, हम को घर में झाड़ूपोंछा के लिए एक औरत चाहिए. तुम आ जाओ. महीने के 2,000 रुपए देंगे. इस से तुम्हारे राशनपानी का भी इंतजाम हो जाएगा.’’

दुर्गा देवी ने सोचा, ‘2,000 कम हैं, पर बच्चों के लिए कुछ तो होगा.’

मजबूरी में दुर्गा देवी ने हां कर दी. काम शुरू हुआ. वह रोज सुबह बजरंगी सिंह के घर पहुंचती. वह घर बड़ा था और पुरानी जमींदारी के ठाटबाट की गवाही देता था.

बजरंगी सिंह अकेले रहते थे. उन की पत्नी शहर में बहूबेटों के पास रहती थीं.

दुर्गा देवी को पहले दिन ही बजरंगी सिंह की नजर का मतलब समझ आ गया. उन की आंखों में वही लालच, वही वहशी चमक थी, जिस से गांव की हर औरत डरती थी.

एक दिन बजरंगी सिंह ने दुर्गा देवी का हाथ पकड़ लिया. वह कांप गई और बोली, ‘‘मालिक, छोड़ दीजिए. हम मजदूरी करने आए हैं, यह मत कीजिए.’’

यह सुन कर बजरंगी सिंह हंस पड़े और बोले, ‘‘अरे, इतना घबराती क्यों हो? मैं तुम्हारा भला ही तो करूंगा. यहां जितनी मजदूरी करोगी, उस से ज्यादा कमा सकती हो.’’

दुर्गा देवी को लगा जैसे कोई उसे आग में धकेल रहा हो. वह भाग कर बाहर निकल गई, पर मन में डर बैठ गया कि अगर काम छोड़ दिया तो बच्चों को क्या खिलाएगी?

उसी समय गांव में पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी थी. इस बार मुखिया का पद महिला के लिए रिज्वर्ड सीट थी. ‘बड़का घराना’ चाहता था कि बजरंगी सिंह की बहू चुनाव लड़े.

‘‘सीट हमारी होगी…’’ बजरंगी सिंह हर सभा में दहाड़ते थे, ‘‘गांव का मुखिया हमेशा ‘बड़का घराना’ से ही होगा.’’

पर गांव की नई पीढ़ी अब पुरानी दहशत में नहीं जीती थी. कई नौजवान चाहते थे कि कोई गरीब घर की औरत खड़ी हो. किसी ने दुर्गा देवी का नाम सुझाया.

यह सुन कर दुर्गा देवी हंस पड़ी और बोली, ‘‘तुम लोग पागल हो गए हो क्या? हम कैसे चुनाव लड़ेंगे… खर्चा कहां से आएगा?’’

पर उन नौजवानों ने ठान लिया था. धीरेधीरे बहुत सी औरतें भी दुर्गा देवी के साथ जुड़ गईं.

‘‘तुम्हारी जीत हमारी जीत होगी,’’ एक औरत ने दुर्गा देवी से कहा.

बजरंगी सिंह को जब यह खबर लगी कि दुर्गा देवी चुनाव लड़ रही है, तो वे तिलमिला उठे.

‘‘एक विधवा हमारे सामने खड़ी होगी? अपनी औकात भूल गई है,’’ बजरंगी सिंह ने अपने चमचों से कहा.

इस के बाद बजरंगी सिंह दुर्गा देवी के खिलाफ अफवाहें फैलाने लगे. उन का कोई चमचा कहता, ‘‘दुर्गा तो लालची औरत है, उसे पंचायत की कुरसी चाहिए.’’

कोई चमचा कहता, ‘‘बजरंगीजी का घर छोड़ कर अब राजनीति में जाएगी.’’

दुर्गा देवी को धमकी दी जाने लगी कि अगर वह चुनाव लड़ेगी, तो बुरा होगा.

पर दुर्गा देवी नहीं डरी. उस ने घरघर जा कर लोगों से बातें कीं. अपने भाषणों में कहा, ‘‘भाइयो, मैं गरीब हूं, पर आप की बहनबेटी हूं. अगर आप साथ दें तो हम सब इस गांव में तरक्की ला सकते हैं.’’

चुनाव नजदीक आते ही सियासी माहौल गरम हो गया. बजरंगी सिंह की बहू जीप में घूमघूम कर वोट मांगती. पंडालों में दावतें होतीं. शराब का दौर चलता. मटनचिकन का पार्टी होती.

दुर्गा देवी के पास न गाड़ी थी, न पैसे. वह पैदल गलियों में घूमघूमकर हर घर के लोगों से मिलती. लोगों का हुजूम नारे लगाता कि ‘हमारा मुखिया कैसा हो दुर्गा भाभी जैसा हो’.

एक दिन बजरंगी सिंह ने दुर्गा देवी को धमकाया, ‘‘दुर्गा, अगर तू ने चुनाव से नाम वापस नहीं लिया, तो इस का अंजाम अच्छा नहीं होगा.’’

दुर्गा देवी ने बजरंगी सिंह की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘मालिक, अब डरने का वक्त निकल गया. जो होगा, देखा जाएगा.’’

वोटिंग का दिन आया. गांव में भीड़ उमड़ पड़ी. औरतें पहली बार इतने जोश से वोट देने आईं. दोनों तरफ के समर्थक नारेबाजी कर रहे थे.

शाम को गिनती शुरू हुई. पहले दौर में बजरंगी सिंह की बहू आगे थी, पर उस के बाद धीरेधीरे दुर्गा देवी के वोट बढ़ने लगे.

रात के 12 बजे नतीजा आया. दुर्गा देवी 112 वोटों से जीत गई. गांव में हंगामा मच गया. औरतें नाचने लगीं. बच्चे पटाके फोड़ने लगे. ‘दुर्गा भाभी जिंदाबाद’ के नारे लगने लगे.

बजरंगी सिंह का चेहरा उतर गया. उन की बहू रोतेरोते कमरे में बंद हो गई.

दुर्गा देवी गाजेबाजे और फूलमाला से लदी घर लौटी. उस ने अपने बच्चों को गले लगाया और कहा, ‘‘अब हमारे गांव में गरीबों की भी आवाज होगी.’’

अगली सुबह गांव की गलियां अलग ही लग रही थीं. लोग कहते, ‘अब समय बदल गया. ‘बड़का घराना’ की नहीं, सब की पंचायत होगी. सब की बात सुनी जाएगी और उन का समाधान किया जाएगा.’

दुर्गा देवी ने सब से वादा किया, ‘‘हम गांव में स्कूल और डिस्पैंसरी खुलवाएंगे. अब पंचायत सिर्फ अमीरों की नहीं रहेगी.’’

बजरंगी सिंह पहली बार निराश हो कर घर के ओसारे में बैठे थे. उन का ‘बड़का घराना’ जैसे ढह चुका था. Family Story In Hindi

15 August Special: गर्व से कहो हम भारतीय हैं

15 August Special: ऐसी ही एक टौप क्लास तौलियाधारियों की है. पूरा जहां, जहां घर में कुरतापाजामा, लुंगी, अपरलोअर, बरमूडाटीशर्ट वगैरह पहनता हो तो पहनता रहे, अपनी बला से. हम नहीं बदलेंगे की तर्ज पर सुबह उठने के बाद और नौकरी या दुकान से घर आने के बाद ये उसी तौलिए को, जिसे नहाने के बाद इस्तेमाल किया था, लपेटे घूमते रहते हैं. इसी तौलिए को लपेटेलपेटे ये रात को नींद के आगोश में चले जाते हैं.

आप सोचते होंगे कि तौलिया अगर सोते समय खुल जाता होगा तो बड़ी दिक्कत होती होगी? जिसे आजकल की भाषा में ऊप्स मूमैंट कहते हैं. सोते समय तौलिया खुल जाए तो खुल जाए, क्या पता चलता है. वह तो जब कोई सुबहसवेरे दरवाजे की घंटी बजा दे और ये अलसाए से बिस्तर से उठें तब जा कर पता चलता है कि तौलिया तो बिस्तर की चादर से गलबहियां करे पड़ा है. तब वे जल्दी में तौलिए को लपेट दरवाजा खोलने आगे बढ़ते हैं.

वैसे भी सोते समय क्या, यह तौलिया किसी भी समय, खिसकते समय की तरह जब चाहे कमर से खिसक जाता है और ये उसे बारबार संभालते देखे जा सकते हैं. लेकिन ये तौलिया टाइप वाले भाईजी लोग बड़े जीवट होते हैं. भले ही ये बड़े अफसर हों, नेता हों या बड़ेछोटे कारोबारी हों, तौलिए से अपना लगाव नहीं छोड़ पाते हैं.

मैं तो अपने पड़ोस में एक मूंदड़ाजी को जानता हूं. बाजार के बड़े सेठ हैं, लेकिन बचपन से ही उन को जो तौलिए में देखता आ रहा हूं तो आखिरी समय में भी तौलिए में ही देखा. बाद में घर वालों को पता नहीं क्या सू झा कि तौलिया रूपी कफन में ही उन का दाह संस्कार कर दिया गया. शायद कहीं वसीयत में उन की आखिरी इच्छा ही यह न रही हो?

मेरा बचपन से जवानी का समय उन के तौलिए में ही लिपटेलिपटे कट गया. उन की पत्नी और बच्चों ने कई बार कोशिश की थी कि वे कुरतापाजामा नहीं तो कम से कम लुंगीबंडी अवतार में आ जाएं, लेकिन वे नहीं माने तो नहीं माने. बोले, ‘यह हमारी परंपरा है. हमारे पिता और उन के पिता भी इसी तरह से रहते थे.’

वे आगे गर्व से दलील देते हैं कि गरमी प्रधान इस देश में तौलिए से अच्छा व आरामदायक और कोई दूसरा कपड़ा नहीं है. वे यह भी बताने लगते हैं कि अगर एक आदमी साल में 2 जोड़ी कुरतापाजामा या लुंगी लेता हो, तो उन पर कम से कम 1,000 रुपए का खर्चा आता है और उन्होंने जब से होश संभाला है, तब से तौलिए से ही काम चला

रहे हैं, तो सोचें कि 40-50 सालों में 50,000 रुपए तो बचा ही लिए होंगे. वाह रे परंपरा के धनी आदमी, वाह रे तेरा गणित.

हम तौलिए में ही अपना यह पूरा लेख नहीं लपेटना चाहते. महज तौलिए की ही बात से तो कई पाठक भटकाव के रास्ते पर चले जाएंगे. कई हिंदी फिल्मों के सीन दिमाग पर छा जाएंगे कि कैसे किसी छरहरी हीरोइन के गोरे व चिकने बदन से तौलिया आहिस्ता से सरका था.

चाहे फिल्म का कोई सीन हो या कोई रोमांटिक गाना हो, जो बाथरूम में फिल्माया गया हो या बाथरूम से मादक अदाओं के साथ बाहर निकलती हीरोइन पर फिल्माया गया हो, दोस्तों की कही इसी बात पर तो फिल्म को देखने हम लोग दौड़े चले गए थे.

दूसरी ओर तौलिया नापसंदधारी टाइप सज्जन भी होते हैं. ये धारी वाला कच्छा पहन कर ही सुबह से देर रात तक घरआंगन, बाहर, बाजार, पड़ोस में दिखते रहते हैं.

हां, इस क्लास में हर चीज की तरह थोड़ा विकास यह हुआ है कि कुछेक धारीदार कच्छे में नहीं तो पैंटनुमा अंडरवियर में ही अब घर के अंदरबाहर होते रहते हैं. कुछ तो इन में इतने वीर हैं कि अपनी दुकान में भी इस परंपरागत कपड़े में ही काम चला लेते हैं. जो नहाधो कर शरीर पर तो एक कच्छा और एक बनियान चढ़ाई रात तक का काम हो गया. अल्प बचत वालों को अगर बचत सीखनी है तो इन से सीखें. लोग साल में 4 जोड़ी कपड़े खरीदते हैं तो ये 4 जोड़ी कच्छेबनियान खरीदते हैं.

आइए, अब आते हैं अगले परंपरागत संस्कारी पर. ये स्वच्छता अभियान को  झाड़ू लगाने वाले लोग हैं. ये कहीं भी हलके हो लेते हैं. ये वे लोग हैं, जो घर के बाहर की ही नाली में परंपरागत आत्मविश्वास से मूत्र त्याग करने का लोभ छोड़ नहीं पाते हैं. इस काम में वे पता नहीं क्यों गजब की ताजगी महसूस करते हैं.

डीएनए जोर मारने लगता है तो वे क्या करें? कितने भी धनी हों, इन्हें इस बात से  बिलकुल भी  िझ झक नहीं होती कि वे कहां खड़े हो कर या बैठ कर मूत्र विसर्जन कर रहे हैं.

यह तो साफ है कि अगर ये धोती, लुंगीधारी या तौलियाधारी हैं तो बैठ कर और पैंटकमीज में हों तो खड़े हो कर धारा प्रवाह हो जाते हैं, इसीलिए शायद ऐसे लोगों का पैंटकमीज से छत्तीस का आंकड़ा रहता है.

एक और परंपरागत जन हमारे यहां पाए जाते हैं. डायनासौर भले ही लुप्त हो गए हों, लेकिन ये सदियों से पाए जाते रहे हैं और कभी लुप्त नहीं होने वाले.

ये बस में हों, रेल में हों, बाजार में हों, आप से बात कर रहे हों, न कर रहे हों, इन का हाथ बराबर उन की एक पसंदीदा जगह पर पहुंच जाता है और अपने इस अनमोल अंग को चाहे जब अपनेपन से छू लेता है, सफाई से मसल लेता है.

आप किसी शराबी की शराब छुड़वा सकते हैं, लेकिन इन के हाथ को वहां जाने से नहीं रोक सकते. यकीन न हो तो ऐसे किसी सज्जन पर प्रयोग कर के देख लें. हां, सब के खाते में 1-2 पड़ोसी दोस्त ऐसे होते ही हैं. जैसे आदमी अपनी पलकें अपनेआप  झपकाता रहता है, वैसे ही इन का हाथ भी अपनेआप अपनी पसंदीदा जगह पर वजह या बेवजह पहुंचता रहता है. इन के बड़े पहुंच वाले लंबे हाथ होते हैं.

अब वक्त हो गया है, दूसरे परंपरागत जन की तरफ जाने का. ये कहीं भी खड़े हों, कुछ भी कर रहे हों, लेकिन खखारना नहीं छोड़ते. मौका मिलते ही गले को साधा, बजाया और थूका. पार्क में घूम रहे हों, कार, स्कूटर, साइकिल पर जा रहे हों, दफ्तर में बैठें हों, बस जब इच्छा हुई थूक दिया.

यह सीन तब और भी ज्यादा कलरफुल हो जाता है, जब ये पानतंबाकू चबाने के शौकीन हों. तब ये अपने आसपास की जगह के साथ हर रोज ही मुंह से होली खेलते रहते हैं.

गंगू ने तो अभी आप को केवल 4 जनों की क्लास बताई है, बाकी बाद में. नहीं तो आप अपनी संस्कृति पर गर्व करने लगेंगे और ‘गर्व से कहो हम भारतीय हैं’ कहने से खुद को रोक नहीं पाएंगे. 15 August Special

Story In Hindi: बाढ़ – क्या मीरा और रघु के संबंध लगे सुधरने

Story In Hindi: बौस ने जरूरी काम बता कर मीरा को दफ्तर में ही रोक लिया और खुद चले गए.

मीरा को घर लौटने की जल्दी थी. उसे शानू की चिंता सता रही थी. ट्यूशन पढ़ कर लौट आया होगा, खुद ब्रेड सेंक कर भी नहीं खा सकता, उस के इंतजार में बैठा होगा.

बाहर तेज बारिश हो रही थी…अचानक बिजली चली गई तो मीरा इनवर्टर की रोशनी में काम पूरा करने लगी. तभी फोन की घंटी बज उठी.

‘‘मां, तुम कितनी देर में आओगी?’’ फोन कर शानू ने जानना चाहा, ‘‘घर में कुछ खाने को नहीं है.’’

‘‘पड़ोस की निर्मला आंटी से ब्रेड ले लेना,’’ मीना ने बेटे को समझाया.

‘‘बिजली के बगैर घर में कितना अंधेरा हो गया है, मां. डर लग रहा है.’’

‘‘निर्मला आंटी के घर बैठे रहना.’’

‘‘कितनी देर में आओगी?’’

‘‘बस, आधा घंटा और लगेगा. देखो, मैं लौटते वक्त तुम्हारे लिए बर्गर, केले व आम ले कर आऊंगी, होटल से पनीर की सब्जी भी लेती आऊंगी.’’

बेटे को सांत्वना दे कर मीरा तेजी से काम पूरा करने लगी. वह सोच रही थी कि महानगर में इतनी देर तक बिजली नहीं जाती, शायद बरसात की वजह से खराबी हुई होगी.

काम पूरा कर के मीरा ने सिर उठाया तो 9 बज चुके थे. चौकीदार बैंच पर बैठा ऊंघ रहा था.

मीरा को इस वक्त एक प्याला चाय पीने की इच्छा हो रही थी, पर घर भी लौटने की जल्दी थी. चौकीदार से ताला बंद करने को कह कर मीरा ने पर्स उठाया और जीना उतरने लगी.

चारों तरफ घुप अंधेरा फैला हुआ था. क्या हुआ बिजली को, सोचती हुई मीरा अंदाज से टटोल कर सीढि़यां उतरने लगी. घोर अंधेरे में तीसरे माले से उतरना आसान नहीं होता.

सड़क पर खड़े हो कर उस ने रिकशा तलाश किया, जब नहीं मिला तो वह छाता लगा कर पैदल ही आगे बढ़ने लगी.

अब न तो कहीं रुक कर चाय पीने का समय रह गया था न कुछ खरीदारी करने का.

थोड़ा रुक कर मीरा ने बेटे को मोबाइल से फोन मिलाया तो टींटीं हो कर रह गई.

अंधेरे में अचानक मीरा को ऐसा लगा जैसे वह नदी में चली आई हो. सड़क पर इतना पानी कहां से आ गया…सुबह निकली थी तब तो थोड़ा सा ही पानी भरा हुआ था, फिर अचानक यह सब…

अभी वह यह सब सोच ही रही थी कि पानी गले तक पहुंचने लगा. वह घबरा कर कोई आश्रय स्थल खोजने लगी.

घने अंधेरे में उसे दूर कुछ बहुमंजिली इमारतें दिखाई पड़ीं. मीरा उसी तरफ बढ़ने लगी पर वहां पहुंचना उस के लिए आसान नहीं था.

जैसेतैसे मीरा एक बिल्ंिडग के नीचे बनी पार्किंग तक पहुंच पाई. पर उस वक्त वह थकान की अधिकता व भीगने की वजह से अपनेआप को कमजोर महसूस कर रही थी.

मीरा को यह स्थान कुछ जानापहचाना सा लगा. दिमाग पर जोर दिया तो याद आया, इसी इमारत की दूसरी मंजिल पर वह रघु के साथ रहती थी.

फिर रघु के गैरजिम्मेदाराना रवैये से परेशान हो कर उस ने उस के साथ संबंध विच्छेद कर लिया था. उस वक्त शानू सिर्फ ढाई वर्ष का था. अब तो कई वर्ष गुजर चुके हैं…शानू 10 वर्ष का हो चुका है.

क्या पता रघु अब भी यहां रहता है या चला गया, हो सकता है उस ने दूसरा विवाह कर लिया हो.

मीरा को लग रहा था कि वह अभी गिर पडे़गी. ठंड लगने से कंपकंपी शुरू हो गई थी.

एक बार ऊपर जाने में हर्ज ही क्या है. रघु न सही कोई दूसरा सही, उसे किसी का सहारा तो मिल ही जाएगा. उस ने सोचा और जीने की सीढि़यां चढ़ने लगी…फिर उस ने फ्लैट का दरवाजा जोर से खटखटा दिया.

किसी ने दरवाजा खोला और मोमबत्ती की रोशनी में उसे देखा, बोला, ‘‘मीरा, तुम?’’

रघु की आवाज पहचान कर मीरा को भारी राहत मिली…फिर वह रघु की बांहों में गिर कर बेसुध होती चली गई.

कंपकपाते हुए मीरा ने भीगे कपडे़ बदल कर, रघु के दिए कपडे़ पहने फिर चादर ओढ़ कर बिस्तर पर लेट गई.

कानूनी संबंध विच्छेद के वर्षों बाद फिर से उस घर में आना मीरा को बड़ा विचित्र लग रहा है, उस के  व रघु के बीच जैसे लाखों संकोच की दीवारें खड़ी हो गई हैं.

रघु चाय बना कर ले आया, ‘‘लो, चाय के साथ दवा खा लो, बुखार कम हो जाएगा.’’

दवा ने अच्छा काम किया…मीरा उठ कर बैठ गई.

रघु खाना बना रहा था.

‘‘तुम ने शादी नहीं की?’’ मीरा ने धीरे से प्रश्न किया.

‘‘मुझ से कौन औरत शादी करना पसंद करेगी, न सूरत है न अक्ल और न पैसा…तुम ने ही मुझे कब पसंद किया था, छोड़ कर चली गई थीं.’’

मीरा देख रही थी. पहले के रघु व इस रघु में बहुत बड़ा अंतर आ चुका है.

‘‘तुम ने खाना बनाना कब सीख लिया? सब्जी तो बहुत स्वादिष्ठ बनाई है.’’

‘‘तुम चली गईं तो मुझे खाना बना कर कौन खिलाता, सारा काम मुझे ही करना पड़ा, धीरेधीरे सारा कुछ सीख लिया, बरतन साफ करता हूं, कपड़े धोता हूं, इस्तिरी करता हूं.’’

‘‘आज बिजली को क्या हुआ, आ जाती तो मैं फोन चार्ज कर लेती.’’

‘‘तुम्हें शायद पता नहीं, पूरे शहर में बाढ़ का पानी फैल चुका है. बिजली, टेलीफोन सभी की लाइनें खराब हो चुकी हैं, ठीक करने में पता नहीं कितने दिन लग जाएं.’’

मीरा घबरा गई, ‘‘बाढ़ की वजह से मैं घर कैसे जा पाऊंगी…शानू घर में अकेला है.’’

‘‘शानू यानी हमारा बेटा,’’ रघु चिंतित हो उठा, ‘‘मैं वहां जाने का प्रयास करता हूं.’’

मीरा ने पता बताया तो रघु के चेहरे पर चिंता की लकीरें और अधिक बढ़ गईं. वह बोला, ‘‘मीरा, उस इलाके में 10 फुट तक पानी चढ़ चुका है. मैं उसी तरफ से आया था, मुझे तैरना आता है इसलिए निकल सका नहीं तो डूब जाता.’’

‘‘शानू, मेरा बेटा…किसी मुसीबत में न फंस गया हो,’’ कह कर मीरा रोने लगी.

‘‘चिंता करने से क्या हासिल होगा, अब तो सबकुछ समय पर छोड़ दो,’’ रघु उसे सांत्वना देने लगा. पर चिंता तो उसे भी हो रही थी.

दोनों ने जाग कर रात बिताई.

हलका सा उजाला हुआ तो रघु ने पाउडर वाले दूध से 2 कप चाय बनाई.

मीरा को चाय, बिस्कुट व दवा की गोली खिला कर बोला, ‘‘मैं जा कर देखता हूं, शानू को ले कर आऊंगा.’’

‘‘उसे पहचानोगे कैसे, वर्षों से तो तुम ने उसे देखा नहीं.’’

‘‘बाप के लिए अपना बेटा पहचानना कठिन नहीं होता, तुम ने कभी अपना पता नहीं बताया, कभी मुझ से मिलने नहीं आईं, जबकि मैं ने तुम्हें काफी तलाश किया था. एक ही शहर में रह कर हम दोनों अनजान बने रहे,’’ रघु के स्वर में शिकायत थी.

‘‘मैं ही गलती पर थी, तुम्हें पहचान नहीं पाई. मैं सोच भी नहीं सकती थी कि तुम इतना बदल सकते हो. शराब पीना और जुआ खेलना बंद कर के पूरी तरह से तुम जिम्मेदार इनसान बन चुके हो.’’

रघु ने बरसाती पहनी और छोटी सी टार्च जेब में रख ली.

मीरा, शानू का हुलिया बताती रही.

रघु चला गया, मीरा सीढि़यों पर खड़ी हो उसे जाते देखती रही.

आज दफ्तर जाने का तो सवाल ही नहीं था, बगैर बिजली के तो कुछ भी काम नहीं हो सकेगा.

मीरा ने पहले कमरे की फिर रसोई और बरतनों की सफाई का काम निबटा डाला. उस ने खाना बनाने के लिए दालचावल बीनने शुरू किए पर टंकी में पानी समाप्त हो चला था.

उसे याद आया कि नीचे एक हैंडपंप लगा था. वह बालटी भर कर ले आई और खाना बना कर रख दिया.

पर रघु अभी तक नहीं आया था. मीरा को चिंता सताने लगी…पता नहीं वह उस के कमरे तक पहुंचा भी है या नहीं. किस हाल में होगा शानू.

मीरा कुछ वक्त पड़ोसिन के साथ गुजारने के खयाल से जीना उतरी तो यह देख कर दंग रह गई कि सभी फ्लैट खाली थे. वहां रहने वाले बाढ़ के डर से कहीं चले गए थे.

बाहर सड़क पर अब भी पानी भरा हुआ था, बरसात भी हो रही थी. अकेलेपन के एहसास से डरी हुई मीरा फ्लैट का दरवाजा बंद कर के बैठ गई.

रघु काफी देरी से आया, उस के जिस्म पर चोटों के निशान थे.

मीरा घबरा गई, ‘‘चोटें कैसे लग गईं आप को, शानू कहां है?’’

उस ने रघु की चोटों पर दवा लगाई.

रघु ने बताया कि उस के घर में शानू नहीं था, पुलिस ने बाढ़ में फंसे लोगों को राहत शिविरों में पहुंचा दिया है, शानू भी वहीं गया होगा.

मीरा की आंखों में आंसू भर आए, ‘‘मैं ने कभी बेटे को अपने से अलग नहीं किया था. खैर, तुम ने यह तो बताया नहीं, चोटें कैसे लगी हैं.’’

‘‘फिसल कर गिर गया था…पैर की मोच के कारण कठिनाई से आ पाया हूं.’’

मीरा ने खाना लगाया, दोनों साथसाथ खाने लगे.

खाना खाने के तुरंत बाद रघु को नींद आने लगी और वह सो गया. जब उठा तो रात गहरा उठी थी.

मीरा खामोशी से कुरसी पर बैठी थी.

‘‘तुम ने मोमबत्ती नहीं जलाई,’’ रघु बोला और फिर ढूंढ़ कर मोमबत्ती ले आया और बोला, ‘‘मैं राहत शिविरों में जा कर शानू की खोज करता हूं.’’

‘‘इतनी रात को मत जाओ,’’ मीरा घबरा उठी.

‘‘तुम्हें अब भी मेरी चिंता है.’’

‘‘मैं ने तुम्हारे साथ वर्षों बिताए हैं.’’

रघु यह सुन कर बिस्तर पर बैठ गया, ‘‘जब सबकुछ सही है तो फिर गलत क्या है? क्या हम लोग फिर से एकसाथ नहीं रह सकते?’’

मीरा सोचने लगी.

‘‘हम दोनों दिन भर दफ्तरों में रहते हैं,’’ रघु बोला, ‘‘रात को कुछ घंटे एकसाथ बिता लें तो कितना अच्छा रहेगा, शानू की जिम्मेदारी हम दोनों मिल कर उठाएंगे.’’

मीरा मौन ही रही.

‘‘तुम बोलती क्यों नहीं, मीरा. मैं ने जिम्मेदारियां निभाना सीख लिया है. मैं घर के सभी काम कर लिया करूंगा,’’ रघु के स्वर मेें याचक जैसा भाव था.

मीरा का उत्तर हां में निकला.

रघु की मुसकान गहरी हो उठी.

सुबह एक प्याला चाय पी कर रघु घर से निकल पड़ा, फिर कुछ घंटे बाद ही उस का खुशी भरा स्वर फूटा, ‘‘मीरा, देखो तो कौन आया है.’’

मीरा ने दरवाजा खोल कर देखा तो सामने शानू खड़ा था.

‘‘मेरा बेटा,’’ मीरा ने शानू को सीने से चिपका लिया. फिर वह रघु की तरफ मुड़ी, ‘‘तुम ने आसानी से शानू को पहचान लिया या परेशानी हुई थी?’’

‘‘कैंप के रजिस्टर मेें तुम्हारा पता व नाम लिखा हुआ था.’’

रघु राहत शिविर से खाने का सामान ले कर आया था, सब्जियां, दूध का पैकेट, डबलरोटी, नमकीन आदि.

उस ने शानू के सामने प्लेटें लगा दीं.

‘‘बेटा, इन्हें जानते हो.’’

शानू ने मां की तरफ देखा और बोला, ‘‘यह मेरे डैडी हैं.’’

‘‘कैसे पहचाना?’’

‘‘इन्होंने बताया था.’’

‘‘शानू, तुम्हें पकौड़े, ब्रेड- मक्खन पसंद हैं न,’’ रघु बोला.

‘‘हां.’’

‘‘यह सब मुझे भी पसंद हैं. हम दोनों में अच्छी दोस्ती रहेगी.’’

‘‘हां, डैडी.’’

मुसकराती हुई मीरा बाप- बेटे की बातें सुनती रही, कितनी सरलता से रघु ने शानू के साथ पटरी बैठा ली.

‘‘शुक्र है इस बरसात के मौसम का कि हम दोनों मिल गए,’’ मीरा बोली और रसोई में जा कर पकौडे़ तलने लगी.

उसे लग रहा था कि उस का बोझ बहुत कुछ हलका हो गया है. सबकुछ रघु के साथ बंट जो चुका है.

बीच का लंबा फासला न जाने कहां गुम हो चुका था. जैसे कल की ही बात हो.

घर तो इनसानों से बनता है न कि दीवारों से. पशु भी तो मिल कर रहते हैं. मीरा न जाने क्याक्या सोचे जा रही थी. बापबेटे की संयुक्त हंसी उस के मन में खुशियां भर रही थी. Story In Hindi

Story In Hindi: गलीचा – रमेश की तीखी आलोचना करने वाली नगीना को क्या मिला जवाब

Story In Hindi: संगीता और नगीना का परिचय एक यात्रा के दौरान हुआ था. उस से पहले वे कभी नहीं मिली थीं. एक ही दफ्तर में काम करने के कारण उन दोनों के पति ही एकदूसरे के घर आतेजाते थे. इसीलिए वे दोनों एकदूसरे की पत्नियों से भी परिचित हो गए थे, लेकिन दोनों की पत्नियों का मिलन पहली बार इस यात्रा में ही हुआ था.

हुआ यों कि संगीता के पति दीपक ने दफ्तर से 15 दिन की छुट्टी ली. दीपक के साथ काम करने वालों ने सहज ही पूछलिया, ‘‘क्या बात है, दीपक, इतनी लंबी छुट्टी ले कर कहीं बाहर जाने का विचार है क्या?’’

दीपक ने सचाई बता दी, ‘‘हां, हमारा विचार राजस्थान के कुछ ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा करने का है. पत्नी कई दिनों से घूमनेके लिए चलने का आग्रह कर रही थी, इसीलिए मैं ने इस बार 15 दिन की यात्रा का कार्यक्रम बना डाला.’’

सभी ने दीपक के इस निश्चय की सराहना करते हुए कहा, ‘‘हो आओ. घूमनेफिरने से ताजगी आती है. आदमी को साल दो साल में घर से निकलना ही चाहिए. इस से मन की उदासी दूर हो जाती है.’’

तभी नगीना के पति रमेश ने दीपक से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे साथ और कोई भी जा रहा है?’’

‘‘नहीं, बस, श्रीमतीजी और मैं ही जा रहे हैं. बच्चे भी साथ नहीं जा रहे हैं, क्योंकि इस से उन की पढ़ाई में हर्ज होगा. वे अपने दादादादी के पास रहेंगे.’’

‘‘यह तो तुम ने बड़ी समझदारी का काम किया.’’

‘‘हां, मगर उन के बिना हमें कुछ अच्छा नहीं लगेगा. बच्चों के साथ रहने से मन लगा रहता है.’’

‘‘भई, मेरी पत्नी भी कहीं चलने के लिए जोर डाल रही है, पर सोचता हूं…’’

‘‘इस में सोचने की क्या बात है? अगर राजस्थान में घूमने की इच्छा हो तो हमारे साथ चलो.’’

‘‘तुम्हें कोई असुविधा तो नहीं होगी?’’

‘‘हमें क्या असुविधा होगी, भई, हनीमून मनाने थोड़े ही जा रहे हैं.’’

दफ्तर के सभी लोग ठठा कर हंस पड़े. सभी ने रमेश से आग्रह किया, ‘‘जाओ,भई, ऐसा मौका मत छोड़ो. सफर में एक से दो भले. पर्यटन में अपनों का साथ होना बहुत अच्छा रहता है.’’

रमेश को यह सलाह जंच गई. उस ने उसी समय छुट्टी की अरजी दे डाली. बड़े बाबू ने अपनी शुभकामनाएं व्यक्त करते हुए उस की छुट्टी की भी स्वीकृति दे दी. इसीलिए दोनों दंपतियों का साथ हो गया.

रेलवे स्टेशन पर दोनों जोड़ों का जब मिलन हुआ तो संगीता ने नगीना से कहा, ‘‘देखिए, एक ही शहर में रहते हुए भी हम अभी तक नहीं मिल पाईं?’’

नगीना ने मोहक मुसकान के साथ जवाब दिया, ‘‘अब हम लोग खूब मिला करेंगी, पिछली सारी कसर पूरी कर लेंगी.’’

इस यात्रा में संगीता औैर नगीना का बराबर साथ रहा. रेल और मोटर में तो उन का साथ रहता ही था. वे लोग जहां ठहरते थे, वहां भी कमरे पासपास ही होते थे. एक बार तो एक ही कमरे में दोनों जोड़ों को रात बितानी पड़ी. लिहाजा, इस सफर में नगीना और संगीता को एकदूसरे को देखनेसमझने के खूब मौके मिले.

इस अवधि में संगीता ने यह जाना कि रमेश पत्नी का खूब खयाल रखता है. वह दिनरात उस की सुखसुविधा के लिए चिंतित रहता है. वह नगीना की पसंद की चीजें नजर आते ही ले आता है. आग्रह करकर के खिलातापिलाता. पत्नी को जरा सा उदास देखते ही वह प्रश्नों की झड़ी लगा देता, ‘‘क्या हो गया? तबीयत ठीक नहीं है क्या? सिरदर्द तो नहीं हो रहा है? क्या हाथपैर ही दर्द कर रहे हैं?’’

नगीना के मुंह से अगर कभी यह निकल जाता कि तबीयत कुछ ठीक नहीं है तो रमेश भागदौड़ मचा देता. पत्नी के सिर पर कभी बाम मलता तो कभी हाथपैर ही दबाने लगता. जरूरत होती तो डाक्टर को भी बुला लाता.

नगीना मना करती रह जाती, ‘‘घबराने की कोईर् बात नहीं. साधारण बुखार है.’’

मगर रमेश घबरा जाता. नगीना जब तक पूरी तरह से ठीक नहीं हो जाती थी, तब तक वह बेहद परेशान रहता. जब नगीना हंसहंस कर बातें करने लगती तब कहीं उस की जान में जान आती.

पत्नी को यों खिलीखिली सी रखने के लिए वह सतत प्रयत्नशील रहता.सब से बड़ी बात तो यह थी कि उस अवधि में वह अपनी पत्नी पर न तो कभी झल्लाता, न ही नाराज होता. कई बार नगीना ने उस की इच्छा के खिलाफ भी काम किया. फिर भी उस ने कुछ नहीं कहा.

रमेश के इस व्यवहार से संगीता बड़ी प्रभावित हुई. उसे नगीना से ईर्ष्या होने लगी. वह मन ही मन अपने पति दीपक और रमेश में तुलना करने लगती.

जिन बातों की ओर संगीता का पहले कभी ध्यान नहीं जाता था उस ओर भी उस का ध्यान जाने लगा था. एक टीस सी उस के मन में उठने लगी थी, ‘एक मेरा पति है और एक नगीना का. दोनों में कितना अंतरहै. दीपक तो मेरा कभी खयाल ही नहीं रखता. 15 वर्ष से अधिक अवधि बीत गई हमारे विवाह को, फिर भी कोई जानकारी ही नहीं है.

‘दीपक तो बस अपनेआप में ही डूबा रहता है. हां, कुछ कह दूं तो भले ही ध्यान दे दे. मगर मेरे मन की बात जानने की उसे स्वयं कभी इच्छा ही नहीं होती. मन की बात छिपाना ही उसे नहीं आता. जो मन में आता है, वह फौरन जीभ पर ले आता है. उस का चेहरा ही बहुत कुछ कह देता है. कठोर से कठोर बात भी उस के मुंह से निकल जाती है. ऐसे क्षणों में उसे इस बात का भी ध्यान नहीं रहताकि किसी को बुरा लगेगा या भला? वह तो बस अपने मन की बात कह के हलके हो जाते हैं. कोई मरे या जिए उस की बला से.

‘दीपक की सेवा करकर के भले ही कोई मर जाए, फिर भी प्रशंसा के दो बोल उस के मुंह से शायद ही निकलते हैं. बीमारी तक में उसे खयाल नहीं रहता कि मेरी कुछ मदद कर दे. जाने किस दुनिया में रहता है वह. उस के जीवन से कोई और भी जुड़ा हुआ है, इस का उसे ध्यान ही नहीं रहता. पत्नी का उसके लिए जैसे कोई महत्त्व ही नहीं है. न जाने किस मिट्टी का बना है वह. अच्छा बनेगा तो इतना अच्छा कि उस से अच्छा कोई और हो ही न शायद. बुरा बनेगा तो इतना बुरा कि वैरी से भी बढ़ कर. सचमुच बहुत ही विचित्र प्राणी है दीपक.’

संगीता के मन के ये उद्गार एक दिन नगीना के सामने प्रकट हो गए. उस दिन दोनों के पति यात्रा से वापस लौटने के लिए आरक्षण कराने गए थे. वे दोनों बैठी इधर- उधर की बातें कर रही थीं. तभी नगीना ने अपने पति की आलोचना शुरू कर दी. बच्चों के लिए खरीदे गए कपड़ों को ले कर पतिपत्नी में शायद खटक चुकी थी.

संगीता कुछ देर तक तो सुनती रही, किंतु जब नगीना रमेश के व्यवहार की तीखी आलोचना करने लगी तो वह अपनेआप को रोक नहीं पाई. उस के मुंह से निकल गया, ‘‘नहीं, तुम्हारे पति तो ऐसे नहीं लगते. इन 12-13 दिनों में मैं ने जो कुछ देखा है, उस के आधार पर तो मैं यही कह सकती हूं कि तुम्हें अच्छा पति मिला है. वह तुम्हारा बड़ा खयाल रखते हैं. तुम्हारी सुखसुविधा के लिए वह हमेशा चिंतित रहते हैं. आश्चर्य है कि तुम ऐसे आदर्श पति की बुराई कर रही हो.’’

नगीना ने बड़ी तल्खी से जवाब दिया, ‘‘काश, वह आदर्श पति होते?’’

संगीता ने साश्चर्य पूछा, ‘‘फिर आदर्श पति कैसा होता है?’’

नगीना ने बड़े दर्द भरे स्वर में कहा, ‘‘संगीता, तुम मेरे पति को सतही तौर पर ही जान पाई हो, इसीलिए ऐसी बातें कर रही हो. हकीकत में वह ऐसे नहीं हैं.’’

‘‘तो फिर कैसे हैं?’’

‘‘जैसे दिखते हैं वैसे नहीं हैं.’’

‘‘क्या मतलब?’’

नगीना ने फर्श पर बिछे गलीचे की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘‘वह इस गलीचे की तरह हैं.’’

संगीता का आश्चर्य बढ़ता ही जा रहा था. उस ने हैरानी से पूछा, ‘‘मैं तुम्हारी बात समझ नहीं पाई?’’

फर्श पर बिछे हुए गलीचे के एक कोने को थोड़ा सा उठाती हुई नगीना बोली, ‘‘संगीता, गलीचे के नीचे छिपी हुई यह धूल, यह गंदगी, किसी को नजर नहीं आती. लोगों को तो बस यह खूबसूरत गलीचा ही नजर आता है. इसे ही अगर सचाई मानना हो तो मान लो. मगर मैं तो उस नंगे फर्श को अच्छा समझती हूं जहां ऐसा कोई धोखा नहीं है. संगीता, मुझे तुम से ईर्ष्या होती है. तुम्हें कितने अच्छे पति मिले हैं. अंदरबाहर से एक से.’’

संगीता मुंहबाए नगीना को देखती रह गई. उस से कुछ कहते ही नहीं बना. ंिकंतु दीपक के प्रति उसे जैसे नई दृष्टि प्राप्त हुई थी. अपने सारे दोषों के बावजूद वह उसे बहुत अच्छा लगने लगा. संगीता के मन में उस के प्रति जैसे प्यार का ज्वार उमड़ पड़ा. Story In Hindi

Best Hindi Story: अपराधबोध – परिवार को क्या नहीं बताना चाहते थे मधुकर

Best Hindi Story: बड़ी मुश्किल से जज्ब किया था उन्होंने अपने मन के भावों को. अस्पताल में उन की पत्नी वर्षा जिंदगी और मौत से जूझ रही थी और घर में वह पश्चात्ताप की अग्नि में झुलस रहे थे.

और कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने बेटे को फोन मिलाया, ‘‘रवि, मैं अभी अस्पताल आ रहा हूं. मुझे एक बात बतानी है बेटे, सुन, मैं ने ही…’’

‘‘पापा, आप को मेरी कसम. आप अस्पताल नहीं आएंगे. घर में आराम करेंगे. मैं यहां सब संभाल लूंगा. आप को चिंता करने की कोई जरूरत नहीं पापा… ’’

फोन कट गया. सुबह से तीसरी बार बेटे ने कसम दे कर उन्हें अस्पताल आने से रोक दिया था. मानसिक तनाव था या फिर बुखार की हरारत, सहसा खड़ेखड़े चक्कर आ गया. वह आह भर कर बिस्तर पर लुढ़क पड़े. पुराने लमहे, दर्द की छाया बन कर, आंखों के आगे छाने लगे.

वर्षा, उन की पत्नी…22 सालों का साथ…जाने कैसे उसी के प्राणों के दुश्मन बन बैठे  जिसे जिंदगी से बढ़ कर चाहा था. लंबी, गोरी, आकर्षक , आत्मनिर्भर वर्षा से कालिज में हुई पहली मुलाकात उम्र भर का साथ बन गई थी. दीवानगी की हद तक चाहा उसे. शादी की, जिंदगी के एक नए और खूबसूरत पहलू को शिद्दत से जीया. उस के दामन में खुशियां लुटाईं. वर्ष दर वर्ष आगे खिसकते रहे. समय के साथ दोनों अपनेअपने कामों में मशगूल हो गए.

वर्षा जहां नौकरी करती थी उसी कंपनी में नायक मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव था. इधर कुछ समय से नायक, वर्षा में खासी दिलचस्पी लेने लगा था. दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई और यही बात मधुकर को खटकने लगी. वह जितना भी चाहते कि उन के रिश्ते के प्रति उदार बनें, इस दोस्ती को स्वीकार कर लें पर हर बार उन की इस चाहत के बीच अहम और शक की दीवार खड़ी हो जाती.

कभीकभी मधुकरजी सोचते थे, काश, वर्षा इतनी खूबसूरत न होती. 42 साल की होने के बावजूद वह एक कमसिन, नाजुक काया की स्वामिनी थी. एक्टिव इतनी कि कालिज की कमसिन लड़कियां भी उस के सामने पानी भरें जबकि वह अब प्रौढ़ नजर आने लगे थे.

जाने कब और कैसे मन में उठे गतिरोध और ईर्ष्या के इन्हीं भावों ने उन के दिल में असुरक्षा और शक का बीज बो दिया. नतीजा सामने था. अपनी बीवी को खत्म करने की साजिश रची उन्होंने. एक बार फिर अपराधबोध ने उन्हें अपने शिकंजे में जकड़ लिया.

डा. कर्ण की आवाज उन के कानों में गूंज रही थी, ‘आप को शुगर की शिकायत तो नहीं, मधुकर?’

‘नहीं, मुझे ऐसी कोई तकलीफ नहीं. मगर डाक्टर साहब, आप ने ऐसा क्यों पूछा? कोई खास वजह?’ मधुकर ने जिज्ञासावश प्रश्न किया था.

‘दरअसल, इस दवा को देने से पहले मुझे मरीज से यह सवाल करना ही पड़ता है. शुगर के रोगी के लिए ये गोलियां जहर का काम करेंगी. इस की एक खुराक भी उस की मौत का सबब बन सकती है. हमें इस मामले में खास चौकसी बरतनी पड़ती है. वैसे आप निश्ंिचत हो कर इसे खाइए. आप को तुरंत राहत मिलेगी.’

2 दिन पहले बुखार व दूसरी तकलीफों के दौरान दी गई डा. कर्ण की इसी दवा को उन्होंने वर्षा की हत्या का शगल बनाया. वह जानते हैं कि वर्षा को बहुत अधिक शुगर रहता है और वह इस के लिए नियमित रूप से दवा भी लेती है. बस, इसी आधार पर उन के दिमाग ने एक खौफनाक योजना बना डाली.

कल रात भी नायक के मसले को ले कर उन के बीच तीखी बहस हुई थी. देर तक दोनों झगड़ते रहे, अंत हमेशा की तरह, वर्षा के आंसुओं और मधुकर के मौन धारण से हुआ. वर्षा दूसरे कमरे में सोने चली गई. जाते समय उस ने रामू को आवाज दी और चाय बनाने को कहा. फिर खुद नहाने के लिए बाथरूम में घुस गई. रामू चाय रख कर गया तो मधुकरजी चुपके से उस के कमरे में घुसे और चाय में दवा की 3-4 गोलियां मिला दीं.

अब नहीं बचेगी. आजाद हो जाऊंगा मैं. यह सोचते हुए वह अपने कमरे में आ गए और बिस्तर पर लेट गए. इनसान जिसे हद से ज्यादा चाहता है, कभीकभी उसी से बेपनाह नफरत भी करने लगता है. यही हुआ था शायद मधुकरजी के साथ भी. वह सोच रहे थे…

…कितना कड़वा स्वभाव हो गया है, वर्षा का. जब देखो, झगड़ने को तैयार.

मैं कुछ नहीं, अब नायक ही सबकुछ हो गया है, उस के लिए. कहती है कि किस मनहूस घड़ी में मुझ से शादी कर ली. मेरा मुंह नहीं देखना चाहती. मुझे शक्की और झक्की कह कर पुकारती है. अब देखूंगा, कितनी जीभ चलती है इस की.

वह करवट बदल कर लेट गए थे. लेटेलेटे ही सोचा कि अब तक वह चाय पी चुकी होगी. खत्म हो जाएगी सारी चिकचिक. जीना हराम कर रखा था इस ने, जब भी नायक के साथ देखता हूं, मेरे सारे बदन में आग लग जाती है. यह बात वह अच्छी तरह समझती है, मगर अपनी हठ नहीं छोड़ेगी. काफी देर तक मन ही मन वर्षा को कोसते रहे वह, फिर मन के पंछी ने करवट ली. दिल में हूक सी उठी.

एकाएक कुछ खो जाने के एहसास से मन भीग गया.

क्या मैं ने ठीक किया? उसे इतनी बड़ी सजा दे डाली. क्या वह इस की हकदार थी? क्या अब मैं बिलकुल तनहा नहीं रह जाऊंगा? अब मेरा क्या होगा?

दिल में हलचल मच गई. अब पछतावे का तम उन के दिमाग को कुंद करने लगा. उस पर तेज बुखार की वजह से भी बेहोशी सी छा गई.

अचानक आधी रात के समय शोरशराबा सुन कर वह जग पड़े. बाहर निकले तो देखा, बेटा रवि, वर्षा को लाद कर कार में बिठा रहा है.

रामू ने बताया, ‘‘साहब, मालकिन की तबीयत बहुत बिगड़ गई है.’’

उन का दिल धक् से रह गया. वह चौकस हो उठे, ‘‘मैं भी चलूंगा.’’

उन्होंने बेटे को रोकना चाहा पर बेटे ने यह कहते हुए कार स्टार्ट कर दी, ‘‘नहीं, पापा. आप का शरीर तप रहा है. आप आराम करें. मैं हूं ना.’’

मधुकर पत्थर के बेजान बुत से खड़े रह गए. जैसे किसी ने उन के शरीर से प्राण निकाल लिए हों. क्या अब यही अकेलापन, यही तनहाई जीवन भर टीस बन कर उन के दिल को बेधती रहेगी?

‘‘बाबूजी, चाय ले आऊं क्या?’’ रामू ने आवाज दी तो मधुकर जैसे तंद्रा से जागे.

‘‘नहीं रे, दिल नहीं है. एक काम कर रामू, बिस्तर पर सहारा ले कर बैठते हुए वह बोले, जरा मेरे लिए एक आटोरिकशा ले आ. मुझे अस्पताल जाना ही होगा.’’

‘‘यह पाप मैं नहीं करूंगा मालिक. छोटे मालिक भी बोल कर गए हैं. 4 दिन से आप की तबीयत कितनी खराब चल रही है. वह सब संभाल लेंगे. आप नाहक ही परेशान हो रहे हैं.’’

मधुकरजी को गुस्सा आया रामू पर. सोचा, खुद ही चला जाऊं. मगर डगमगाते कदमों से ज्यादा आगे नहीं जा सके. आंखों के आगे अंधेरा छा गया. फिर क्या हुआ, उन्हें याद नहीं. होश आया तो खुद को बिस्तर पर पाया. सामने डाक्टर खड़ा था और रामू उन से कह रहा था :

‘‘मालिक पिछले 2 घंटे से बेहोशी में जाने क्याक्या बड़बड़ा रहे थे. कभी कहते थे, मैं हत्यारा हूं, तो कभी मालकिन का नाम ले कर कहते थे, वापस लौट आ, तुझे मेरी कसम…’’

मधुकरजी को महसूस हुआ जैसे उन का सिर दर्द से फटा जा रहा है. उन्होंने चुपचाप आंखें बंद कर लीं. बंद आंखों के आगे वर्षा का चेहरा घूम गया. जैसे वह कह रही हो कि क्या सोचते हो, मुझे मार कर तुम चैन से जी सकोगे? नहीं मधुकर, यह तुम्हारा भ्रम है. मैं भटकूंगी तो तुम्हें भी चैन नहीं लेने दूंगी. पलपल तड़पाऊंगी…यह कहतेकहते वर्षा का चेहरा विकराल हो गया. वह चीख उठे, ‘‘नहीं…’’

सामने रामू खड़ा था, बोला, ‘‘क्या हुआ, मालिक?’’

‘‘कुछ नहीं, वर्षा नहीं बचेगी, रामू. मैं ने उसे मार दिया…’’ वह होंठों से बुदबुदाए.

‘‘मालिक, मैं अभी ठंडे पानी की पट्टी लाता हूं. आप की तबीयत ठीक नहीं.’’

रामू दौड़ कर ठंडा पानी ले आया और माथे पर ठंडी पट्टी रखने लगा.

मधुकरजी सोचने लगे कि ये मैं ने क्या किया? वर्षा ही तो मेरी दोस्त, बीवी, हमसफर, सलाहकार…सबकुछ थी. मेरा दर्द समझती थी. पिछले साल मैं बीमार पड़ा था तो कैसे रातदिन जाग कर सेवा की थी. परसों भी, जरा सी तबीयत बिगड़ी तो एकदम से घबरा गई थी वह, जबरदस्ती मुझे डाक्टर के पास ले गई.

मैं ने बेवजह उस पर शक किया. दफ्तर में चार लोग मिल कर काम करेंगे तो उन में दोस्ती तो होगी ही. इस में गलत क्या है? इस के लिए रोजरोज मैं उसे टीज करता था. तभी तो वह झल्ला उठती थी. हमारे बीच झगड़े की वजह मेरा गलत नजरिया ही था. काश, गया वक्त वापस लौट आता तो मैं उसे खुद से जुदा न करता. अब शायद कभी जीवन में सुकून न पा सकूं. यह सब सोच कर मधुकरजी और भी परेशान हो उठे.

‘‘रामू, फोन दे इधर…’’ और रामू के हाथ से झट फोन ले कर उन्होंने सीधे अस्पताल का नंबर मिलाया. वह इंगेज था. फिर डाक्टर के मोबाइल पर बात करनी चाही मगर नेटवर्क काम नहीं कर रहा था.

क्या करूं? मैं जब तक किसी को हकीकत न बता दूं, मुझे शांति नहीं मिलेगी. डाक्टर को जानकारी मिल जाए कि उसे वह दवा दी गई है तो शायद वह बेहतर इलाज कर सकेंगे. यह सोच कर उन्होंने फिर से बेटे को फोन लगाया.

‘‘पापा, ममा को ले कर टेंशन न करें. यहां मैं हूं. आप अपनी तबीयत का खयाल रखें…’’

‘‘होश आया उसे?’’

‘‘हां, बस आधेएक घंटे में…हैलो डाक्टर, एक मिनट प्लीज…’’

‘‘हैलो….हैलो बेटे, मैं एक बात बताना चाहता हूं…जरा डाक्टर साहब को फोन दो…’’

‘‘…डाक्टर साहब, जरा देखिए, यह तीसरे नंबर की दवा…’’

रवि उन से बात करतेकरते अचानक डाक्टर से बातें करने में मशगूल हो गया और फोन कट गया.

वह सिर पकड़ कर बैठ गए.

‘‘दवा खा लीजिए, मालिक,’’ रामू दवा ले कर आया.

‘‘जहन्नुम में जाए ये दवा…’’ गोली फेंकते हुए मधुकरजी उठे और वर्षा के कमरे की तरफ बढ़ गए.

अंदर खड़े हो कर देखने लगे. वर्षा का बिस्तर…मेज पर रखी तसवीर… अलमारी…कपड़े…सबकुछ छू कर वह वर्षा को महसूस करना चाहते थे. अचानक ईयररिंग हाथ से छूट कर नीचे जा गिरा. वह उठाने के लिए झुके तो चक्कर सा आ गया. वह वहीं आंख बंद कर बैठ गए.

थोड़ी देर बाद मुश्किल से आंखें खोलीं. यह क्या? चाय का वही नया वाला ग्लास नीचे रखा था जिस में वह चुपके से आ कर गोली डाल गए थे. ग्लास में चाय अब भी ज्यों की त्यों भरी पड़ी थी.

तब तक रामू आ गया, ‘‘…ये चाय…’’ वह असमंजस से रामू की तरफ देख रहे थे.

‘‘ये चाय, हां…वह दूध में मक्खी पड़ गई थी. इसीलिए मालकिन ने पी नहीं. जब तक मैं दूसरा ग्लास चाय बना कर लाया, वह सो चुकी थीं.’’

मधुकरजी चुपचाप रामू को देखते रहे. अचानक ही दिमाग में चल रही सारी उथलपुथल को विराम लग गया. एक मक्खी ने उन के सीने का सारा बोझ उतार दिया था…यानी, मैं दोषी नहीं. यह सोच कर वह खुश हो उठे.

तभी मोबाइल बज उठा, ‘‘पापा, मैं ममा को ले कर आधे घंटे में घर पहुंच रहा हूं.’’

‘‘वर्षा ठीक हो गई?’’

‘‘हां, पापा, अब बेहतर हैं. हार्ट अटैक का झटका था, पर हलका सा. डाक्टर ने काबू कर लिया है. बस, दवा नियम से खानी होगी.’’

ओह, मेरी वर्षा…कितना खुश हूं मैं…तुम्हारा लौट कर आना, आज कितना भला लग रहा है.

मधुकर मुसकराते हुए शांति से सोफे पर बैठ कर पत्नी और बेटे का इंतजार करने लगे. अब उन्हें किसी को कुछ बताने की चिंता नहीं थी. Best Hindi Story

Story In Hindi: प्रतिक्रिया – असीम ने कौनसा सवाल पूछा था

Story In Hindi: उस बेढंगे से आदमी का चेहरा मुझे आज भी याद है. वह शायद मेरे भाषण की समाप्ति की प्रतीक्षा ही कर रहा था. वक्ताओं की सूची में उस का कहीं नाम न था, किंतु मेरे तुरंत बाद उस ने बिना संयोजक की अनुमति के ही माइक संभाल लिया और धाराप्रवाह बोलना शुरू कर दिया.

वह बहुत उम्दा बोल रहा था और श्रोता उस के भाषण से प्रभावित भी लग रहे थे. एकाएक ही उस ने कड़ा रुख अपना लिया. वह कह रहा था, ‘‘मेरी बात कान खोल कर सुन लो. जब तक देश में ये राक्षस मौजूद हैं, हिंदी यहां कभी फलफूल नहीं सकती. ये लोग अपने को हिंदी के सेवक और प्रचारक बताते हैं. लंबेलंबे भाषण देते हैं. दूसरों को उपदेश देते हैं और स्वयं…मैं इन लोगों से पूछना चाहूंगा कि इन में से ऐसे कितने हिंदीसेवी हैं, जिन के बच्चे अंगरेजी स्कूलों में नहीं पढ़ते.’’

उस का संकेत व्यक्तिगत रूप से मेरी ओर नहीं था. मुझे तो इस से पूर्व वह कभी मिला भी नहीं था. मगर तब लगा यही था कि उस ने यह तमाचा मेरे ही गाल पर जड़ा है.

मैं कई दिनों तक उधेड़बुन में रहा. फिर मैं ने अपना निर्णय घर में और मित्रों के बीच सुना दिया था. यह बात नहीं कि मुझे तब किसी ने टोका या समझाया नहीं था. सभी ने एक ही बात कही थी, ‘‘आप गलती कर रहे हैं. इस तरह भावुकता में आ कर बच्चे का भविष्य तबाह करना कहां की अक्लमंदी है?’’

किंतु मैं तो भावनाओं की बाढ़ में बह ही चुका था. असीम के स्कूल जा कर मैं ने उस का तबादला प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिया. हिंदी माध्यम स्कूल में उसे आसानी से प्रवेश मिल गया. स्कूल बदलते हुए उस ने मामूली सी आपत्ति उठाई थी. वह शायद थोड़ा सा रोया भी था, किंतु मेरे आदर्शवादी भाषण और पुचकार के आगे उस ने शीघ्र ही घुटने टेक दिए और एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह वह कंधे पर बस्ता लटका कर नए स्कूल जाने लगा.

मैं उसे बाद में भी समझाता रहा कि यह नया स्कूल मामूली नहीं है. यह सरकारी स्कूल है जहां अंगरेजी स्कूलों के अनुपात में अध्यापकों को तीनगुना वेतन मिलता है. सभी अध्यापक योग्य और प्रशिक्षित हैं. इन्हीं स्कूलों में पढ़े हुए कितने ही विद्यार्थी बाद में ऊंचे पदों पर पहुंचे हैं. तुम भी मन लगा कर मेहनत करो और बड़े आदमी बनो.

किंतु असीम बुझाबुझा सा रहने लगा था. अब वह स्कूल जाते समय न स्कूल की वरदी की परवा करता और न पहले की तरह जूते चमकाता. पहले साल वह काफी अच्छे अंक ले कर पास हुआ. किंतु अगले वर्ष न जाने क्या हुआ, वह मध्य स्तर के विद्यार्थियों में गिना जाने लगा. स्कूल में उस का कोई मित्र न था. अब वह किसी खेल या नाटक आदि में भी भाग न लेता. मैं कुछ समझाता तो वह चुपचाप बैठा जमीन की ओर देखता रहता. एक दिन सोचा कि स्कूल जा कर पता किया जाए. किंतु स्कूल की दशा देख कर दिल धक से रह गया. अनुशासन नाम की वहां कोई चीज ही न थी. अध्यापक गप्पें हांकने या अखबार पढ़ने में व्यस्त थे. अध्यापिकाएं स्वेटर बुन रही थीं और आपस में दुखसुख की बातें कर रही थीं. बच्चे शोर मचा रहे थे, मारपीट कर रहे थे या डेस्कों पर तबला बजाते हुए फिल्मी गाने गा रहे थे. असीम कक्षा में एक कोने में गुमसुम बैठा था. वह न पढ़लिख रहा था और न अन्य बच्चों की किसी गतिविधि में ही शामिल था.

मैं प्रिंसिपल साहब के कमरे में गया. चाहा कि उन से स्कूल की दशा के बारे में बातचीत करूं, किंतु मेरे कुछ कहने से पूर्व ही वह अखबार को एक ओर पटक कर मुझ पर झपट पड़े और बोले, ‘‘मैं पत्र लिख कर आप को बुलाने ही वाला था. आप अपने लड़के की बिलकुल परवा नहीं कर रहे हैं. मेरे स्कूल में तो ऐसा नहीं चलेगा. बहुत मुश्किल होगा इस तरह तो. घर पर इस का मार्गदर्शन कीजिए या पढ़ाने के लिए घर पर किसी अध्यापक की व्यवस्था कीजिए, वरना…’’

असीम को इस स्कूल से निकाल कर पुन: पहले वाले स्कूल में दाखिल कराना संभव नहीं था. वहां न तो उसे प्रवेश मिल सकता था और न वह अब इस योग्य ही रह गया था कि वहां के स्तर पर अपने को चला सके. मैं ने इस विषय में उस के लिए ट्यूशन का प्रबंध कर दिया. किंतु उस का तो अब सभी विषयों में बुरा हाल था.

उस ने मरखप कर हाईस्कूल पास कर लिया. इंटर में भी उस के कुछ अच्छे अंक नहीं रहे. उसी तरह उस ने बी.ए. में रेंगना शुरू कर दिया. मैं ने उस से पूछा कि यदि वह पढ़ना नहीं चाहता तो कोई हाथ का काम सीखने की कोशिश करे. मगर उस ने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया.

वैसे भी वह अब मुझ से कम ही बात करता था. उस का शरीर सूख सा गया था. दाढ़ी बढ़ा ली थी. हर रोज वह कंधे पर थैला लटका कर न जाने किधर चल देता और कभीकभी शाम को भी लौट कर घर न आता.

उस के पुराने साथी कामधंधे पर लग गए थे. उन में से कुछ अफसर भी चुन लिए गए थे, किंतु असीम कितनी ही प्रतियोगिताओं में भाग लेने के बावजूद किसी साधारण पद के लिए भी नहीं चुना गया था.

एक दिन वह सुबह का नाश्ता ले कर और हर रोज की तरह कंधे पर थैला लटका कर घर से निकलने ही लगा था कि मैं ने रोक कर पूछा, ‘‘ऐसा कब तक चलेगा?’’

वह चुपचाप मेरी ओर देखता रहा, तो मैं ने पूछा, ‘‘तुम क्या समझते हो, यह सब ठीक कर रहे हो?’’ इस बार उस ने नजर उठा कर मेरी ओर देखा और सधे हुए लहजे में बोला, ‘‘आप ने जो मेरे साथ किया, क्या वह ठीक था?’’

‘‘मैं ने क्या किया?’’

‘‘अपने खोखले आदर्शों की बलिवेदी पर मुझे चढ़ा दिया, यह अच्छा किया आप ने?’’

मैं उसे कोई उत्तर न दे सका. यह भी नहीं समझा सका कि ये आदर्श खोखले नहीं हैं. खोखली है यह व्यवस्था जिस की चक्की के पाट कमजोर नहीं हैं और इन पाटों के बीच कुछ लोग नहीं, युग भी पिस कर रह जाते हैं.

जब वह चला गया तो मैं ने गौर किया कि मेरे अपने बेटे का चेहरा उस दिन मंच पर भाषण देने वाले बेढंगे से आदमी के चेहरे से कितना मेल खाने लगा है. Story In Hindi

Story In Hindi: कैसी है सीमा – गांव से किसका पत्र आया था

Story In Hindi: ‘आज जरा चेक पर दस्तखत कर देना,’’ प्रभात ने शहद घुली आवाज में कहा.

सीमा ने रोटी बेलतेबेलते पलट कर देखा, चेक पर दस्तखत करवाते समय प्रभात कितने बदल जाते हैं, ‘‘आप की तनख्वाह खत्म हो गई?’’ वह बोली.

‘‘गांव से पिताजी का पत्र आया था. वहां 400 रुपए भेजने पड़े. फिर लीला मौसी भी आई हुई हैं. घर में मेहमान हों तो खर्च बढ़ेगा ही न?’’

सीमा चुप रह गई.

‘‘पैसा नहीं देना है तो मत दो. किसी से उधार ले कर काम चला लूंगा. जब भी पैसों की जरूरत होती है, तुम इसी तरह अकड़ दिखाती हो.’’

‘‘अकड़ दिखाने की बात नहीं है. प्रश्न यह है कि रुपया देने वाली की कुछ कद्र तो हो.’’

‘‘मैं बीवी का गुलाम बन कर नहीं रह सकता, समझीं.’’

बीवी के गुलाम होने वाली सदियों पुरानी उक्ति पुरुष को आज भी याद है. किंतु स्त्रीधन का उपयोग न करने की गौरवशाली परंपरा को वह कैसे भूल गया?

बहस और कटु हो जाए, इस के पहले ही सीमा ने चेक पर हस्ताक्षर कर दिए.

शाम को प्रभात दफ्तर से लौटे तो लीला मौसी को 100 का नोट दे कर बोले, ‘‘मौसी, तुम पड़ोस वाली चाची के साथ जा कर आंखों की जांच करवा आना.’’

‘‘अरे, रहने दे भैया, मैं तो यों ही कह रही थी. अभी ऐसी जल्दी नहीं है. रायपुर जा कर जांच करा लूंगी.’’

‘‘नहीं मौसी, आंखों की बात है. जल्दी दिखा देना ही ठीक है.’’

मौसी मन ही मन गद्गद हो गईं.

प्रभात मौसी का बहुत खयाल रखते हैं. मौसी का ही क्यों, रिश्ते की बहनों, बूआओं, चाचाताउओं सभी का. कोई रिश्तेदार आ जाए तो प्रभात एकदम प्रसन्न हो उठते हैं. उस समय वह इतने उदार हो जाते हैं कि खर्च करते समय आगापीछा नहीं सोचते. मेहमानों की तीमारदारी के लिए ऐसे आकुलव्याकुल हो उठते हैं कि उन के आदेशों की धमक से सीमा का सिर घूमने लगता है.

‘‘सीमा, आज क्या सब्जी बनी?है?’’ प्रभात पूछ रहे थे.

‘‘बैगन की.’’

‘‘बैगन की. मौसी की आंखों में तकलीफ है. बैगन की सब्जी खाने से तकलीफ बढ़ेगी नहीं? उन के लिए परवल की सब्जी बना लो.’’

‘‘नहीं. मैं बैगन की सब्जी खा लूंगी, बेटा. बहू को एक और सब्जी बनाने में कष्ट होगा. कालिज से थक कर आई है.’’

‘‘इस उम्र में थकना क्या है, मौसी? वह तो इन के घर वालों ने काम की आदत नहीं डाली, इसी से थक जाती हैं.’’

‘‘हां, बेटा. आजकल लड़कियों को घरगृहस्थी संभालने की आदत ही नहीं रहती. हम लोग घर के सब काम कर के 10 किलो चना दल कर फेंक देते थे,’’ मौसी बोलीं.

बस, इसी बात से सीमा चिढ़ जाती है. उस के मायके वालों ने काम की आदत नहीं डाली तो क्या प्रभात ने उस के लिए नौकरों की फौज खड़ी कर दी? एक बरतनकपड़े साफ करने वाली के अलावा दूसरा कोई नौकर तो देखा ही नहीं इस घर में.

और लीला मौसी के जमाने में घरगृहस्थी ही तो संभालती थीं लड़कियां. न पढ़ाईलिखाई में सिर खपाना था और न नौकरी के पीछे मारेमारे घूमना था.

सीमा सोचने लगी, ‘लीला मौसी तो खैर अशिक्षित महिला हैं, परंतु प्रभात की समझ में यह बात क्यों नहीं आती?’

अभी पिछले सप्ताह भी ऐसा ही हुआ था. सीमा ने करेले की सब्जी बनाई थी. प्रभात ने देखा तो बोले, ‘‘करेले बनाए हैं? क्या मौसी को दुबला करने का विचार है? उन के लिए कुछ और बना लो.’’

सीमा एकदम हतप्रभ रह गई. मौसी हंसीं, ‘‘नहीं… नहीं, कुछ मत बनाओ, बहू. बस, दाल को तड़का दे दो. तब तक मैं टमाटर की चटनी पीस लेती हूं.’’

‘‘मौसी, बहू के रहते तुम्हें काम करने की क्या जरूरत है? आओ, उस कमरे में बैठें,’’ प्रभात बोले.

सीमा अकेली रसोई में खटती रही. उधर साथ वाले कमरे में मौसी प्रभात को झूठेसच्चे किस्से बताती रहीं, ‘‘तुम्हारे बड़े नानाजी खेत में पहुंचे तो देखा, सामने गांव के धोबी का भूत खड़ा है…’’

मौसी खूब अंधविश्वासी हैं. मनगढ़ंत किस्से खूब बताती हैं. भूतप्रेतों के, प्रभात के बड़े नाना, मझले नाना और छोटे नाना के, दूध सी सफेद छोटी नानी के, प्रभात की ननिहाल के जमींदार महेंद्रप्रताप सिंह और रूपा डाकू के भी. इन किस्सों के साथसाथ मौसी लोगों की मेहमाननवाजी और बढि़या भोजन को भी खूब याद करतीं. उन की व्यंजन चर्चा सुन कर श्रोताओं के मुंह में भी पानी भर आता.

मौसी मूंग के लड्डू, खस्ता, कचौरी, मेवे की गुझिया और खोए की पूरियों को याद किया करतीं.

प्रभात उन की हर फरमाइश पूरी करवाते. सीमा को कालिज जाने तक रसोई में जुटे रहना पड़ता. थकान के कारण खाना भी न खाया जाता. उस दिन भी ऐसा ही हुआ था. कालिज से लौट कर वह कुछ खाना ही चाहती थी कि प्रभात के मित्र आ गए. उस ने किसी तरह उन्हें चायनाश्ता करवाया. दूध का बरतन उठा कर अलमारी में रखने लगी तो सहसा चक्कर खा कर गिर पड़ी. सारे कमरे में दूध ही दूध फैल गया.

मौसी और प्रभात दौड़े आए. अपने निष्प्राण से शरीर को किसी तरह खींचती हुई सीमा पलंग पर जा लेटी. आंखें बंद कर के वह न जाने कितनी देर तक लेटी रही.

अचानक प्रभात ने धीरे से उसे उठाते हुए कहा, ‘‘सुनो, अब उठ कर जरा रसोई में देख लो. तब से मौसी ही लगी हुई हैं.’’

शरीर में उठने की शक्ति ही नहीं थी. ‘हूं’ कह कर सीमा ने दूसरी ओर करवट ले ली.

‘‘तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है, यह मैं मानता हूं परंतु अपने घर का काम कोई और करे यह तो शोभा नहीं देता,’’ प्रभात धीरे से बोले.

सीमा का मन हुआ चीख कर कह दे, ‘मौसी के घर में बहूबेटी बीमार होती हैं, तब क्या वह हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती हैं? एक समय भोजन बना भी लेंगी तो ऐसी क्या प्रलय हो जाएगी?’ लेकिन कहा कुछ नहीं. आवाज कहीं गले में ही फंस कर रह गई. आंखों से आंसू बह निकले. उठ कर बचा हुआ काम निबटाया.

मौसी प्रभात की प्रशंसा करते नहीं थकतीं. उस दिन किसी से कह रही थीं, ‘‘हमारे परिवार में प्रभात हीरा है. सब के सुखदुख में साथ देता है. रुपएपैसे की परवाह नहीं करता. ऐसा आदरसम्मान करता है कि पूछो मत. बहू बड़े घर की लड़की?है, पर प्रभात का ऐसा शासन?है कि मजाल है बहू जरा भी गड़बड़ कर जाए.’’

यह प्रशंसा वह पहली बार नहीं सुन रही थी. ऐसी प्रशंसा प्रभात के परिवार के हर छोटेबड़े के मुख पर रहती है. ससुराल वालों को इतना आतिथ्यसत्कार तथा सेवा करने और बैंक के चेक फाड़फाड़ कर देने के बाद भी वह प्रभात के इस सुयश की भागीदार नहीं बन सकी. या यों कहा जाए कि प्रभात ने इस में उसे भागीदार बनाया ही नहीं बल्कि अपने लोगों के सामने उसे बौना बनाने में ही वह गर्व महसूस करते रहे. उस  की कमियों और गलतियों को वह बढ़ाचढ़ा कर सुनाया करते और सारा परिवार रस ले ले कर सुना करता.

इस संबंध में सीमा को अपनी देवरानी मंगला से ईर्ष्या होती है. देवर सुनील उस के सम्मान को बढ़ाने का एक भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते. हैदराबाद से वह साल में एक बार घर आते हैं. छोटेबड़े सभी के लिए कुछ न कुछ लाने का उन का नियम है, लेकिन लेनदेन का दायित्व उन्होंने मंगला को ही सौंप रखा है.

जब सारा परिवार मिल कर बैठता?है तब सुनील पत्नी को गौरवान्वित करते हुए कहते हैं, ‘‘मंगला, निकालो भई, सब चीजें. दिखाओ सब को, क्याक्या लाई हो तुम उन के लिए,’’ सब की नजरें मंगला पर टिक जाती?हैं. वह कितनी ऊंची हो जाती है सब की दृष्टि में.

मंगला की अनुपस्थिति में जब परिवार के लोग मिल बैठते हैं तो उस के लाए उपहारों की चर्चा होती?है. उस की दरियादिली की प्रशंसा होती है. परंतु सीमा की मेहनत की कमाई से भेजे गए मनीआर्डरों का कभी जिक्र नहीं होता. उस का सारा श्रेय प्रभात को जाता है. कभी बात चलती?है तो अम्मां उसे सुना कर साफ कह देती हैं, ‘‘सीमा की कमाई से हमें क्या मतलब? प्रभात घर का बड़ा बेटा है, उस की कमाई पर तो हमारा पूरा हक है.’’

कभीकभी सीमा सोचती है, ‘नेकी करते हुए भी किसी के हिस्से में यश और किसी के हिस्से में अपयश क्यों आता है?’ वैसे इस विषय में ज्यादा सोच कर वह अपना मन खराब नहीं करती. फिर भी उस का स्वास्थ्य ठीक नहीं रह पाता. पिछले दिनों डाक्टर ने बताया था, ‘‘पैर भारी हैं. थोड़ा आराम करना चाहिए.’’

इधर मौसी कहती थीं, ‘‘एक रोटी बनाने का ही तो काम है घर में. न चक्की पीसनी है, न कुएं से पानी खींच कर लाना है. खूब मेहनत करो और डट कर खाओ. तभी तो सेहत बनेगी.’’

और एक दिन सेहत बनाने के चक्कर में लड्डू बांधतेबांधते कालिज जाने का समय हो गया था. सीमा जल्दीजल्दी सीढि़यां उतरने लगी तो अचानक पैर फिसल गया. 3-4 सीढि़यां लांघती हुई वह नीचे जा गिरी. चोट तो उसे विशेष नहीं आई, पर पेट में दर्द होने लगा था.

‘‘इन के लिए बिस्तर पर आराम करना बहुत जरूरी है,’’ डाक्टर ने प्रभात से कहा था.

प्रभात ने लापरवाही के लिए सीमा को जी भर कर कोसा, किंतु इस परिस्थिति में डाक्टर की सलाह मानना आवश्यक हो गया.

झाड़ूपोंछा तो महरी करने लगी पर भोजन बनाने का भार मौसी पर आ पड़ा. वह नाश्ता और खाना बनाने में परेशान हो जातीं. अब वह बिना मसाले की सादी सब्जी से काम चला लेतीं. कहतीं, ‘‘अब उम्र हो गई. काम करने की पहले जैसी ताकत थोड़े ही रह गई है.’’

सीमा का मन होता, पूछे, मौसी, सिर्फ खाना ही तो बनाना?है. और खाना बनाना भी कोई काम है? तुम तो कहती थीं, दालचावल और सब्जीरोटी तो कैदियों का खाना है. तुम ऐसा खाना क्यों बना रही हो, मौसी?

किसी तरह सप्ताह बीता था कि मौसी का मन उखड़ने लगा. एक दिन प्रभात से बोलीं, ‘‘बेटा, तुम्हारे पास बहुत दिन रह ली. सुरेखा रोज सपने में दिखाई देती है. जाने क्या बात है. बहू जैसी ही उस की भी हालत है.’’

प्रभात सन्न रह गए, ‘‘मौसी, ऐसी कोई बात होती तो सुरेखा का पत्र जरूर आता. तुम चली जाओगी तो बड़ी मुसीबत होगी. अच्छा होता जो कुछ दिन और रुकजातीं.’’

पर मौसी नहीं मानीं. वह बेटी को याद कर के रोने लगीं. प्रभात निरुपाय हो गए. उन्होंने उसी दिन गांव पत्र लिखा.

सुशीला जीजी पिछले साल 2 माह रह कर गई थीं. उन्हें भी एक पत्र विस्तार से लिखा. कई दिनों बाद गांव से पत्र आया कि 15 दिनों बाद अम्मां स्वयं आएंगी. पर 15 दिनों के लिए दूसरी क्या व्यवस्था हो सकेगी?

प्रभात को याद आया कि मंगला की बीमारी का समाचार मिलते ही गांव के लोग किस तरह हैदराबाद तक दौड़े चले जाते हैं. फिर सीमा के लिए ऐसा क्यों? शायद इस का कारण वह स्वयं ही है. जिस तरह सुनील ने अपने परिजनों के हृदय में मंगला के लिए स्नेह और सम्मान के बीज बोए थे, वैसा सीमा के लिए कभी किया था उस ने?

15 दिन बाद अम्मां गांव से आ गईं. उन के आते ही प्रभात निश्चिंत हो गए. उन्हें विश्वास था कि अम्मां अब सब संभाल लेंगी. मार्च का महीना?था. वह अपने दफ्तर के कार्यों में व्यस्त हो गए. सुबह घर से जल्द निकलते और रात को देर से घर लौटते.

पिछले वर्ष जब मंगला को आपरेशन से बच्चा हुआ था, उस समय अम्मां हैदराबाद में ही थीं. उन्होंने उस की खूब सेवा की थी. उस की सेवा का औचित्य उन की समझ में आता था, लेकिन सीमा को क्या हुआ, यह उन की समझ में ही न आता. वह दिनभर काम करें और बहू आराम करे, यह उन के लिए असहाय था.

प्रभात के सामने तो अम्मांजी चुपचाप काम किए जातीं, परंतु उन के जाते ही व्यंग्य बाण उन के तरकस में कसमसाने लगते. कभी वह इधरउधर निकल जातीं.

महल्ले की स्त्रियां मजा लेने के लिए उन्हें छेड़तीं, ‘‘अम्मां, हो गया काम?’’

‘‘हां भई, काम तो करना ही है. पुराने जमाने में बहुएं सास की सेवा करती थीं, आज के जमाने में सास को बहुओं की सेवा करनी पड़ती?है.’’

सीमा सुनती तो संकोच से गड़ जाती. किस मजबूरी में वह उन की सेवा ग्रहण कर रही थी, इसे तो वही जानती थी.

उसी समय प्रभात को दफ्तर के काम से सूरत जाना पड़ा. उन के जाने की बात सुन कर सीमा विकल हो उठी थी. जाने के 2 दिन पहले उस ने प्रभात से कहा भी, ‘‘अम्मां से कार्य करवाना मुझे अच्छा नहीं लगता. उन की यहां रहने की इच्छा भी नहीं है. उन्हें जाने दीजिए. यहां जैसा होगा, देखा जाएगा.’’

‘‘परिवार से संबंध बनाना तुम जानती ही नहीं हो,’’ प्रभात ने उपेक्षा से कहा था.

प्रभात के जाते ही अम्मां मुक्त हो गई थीं. वह कभी मंदिर निकल जातीं, कभी अड़ोसपड़ोस में जा बैठतीं. सीमा को यह सब अच्छा ही लगता. उन की उपस्थिति में जाने क्यों उस का दम घुटता था.

उस दिन अम्मां सामने के घर में बैठी बतिया रही थीं. सीमा ने टंकी में से आधी बालटी पानी निकाला और उठाने ही जा रही थी कि देखा, अम्मां सामने खड़ी हैं. उसे याद आया अम्मां पीछे वाली पड़ोसिन से कह रही थीं, ‘‘प्रभात पेट में था, तब छोटी ननद की शादी पड़ी. हमें बड़ेबड़े बरतन उठाने पड़े,  पर कहीं कुछ नहीं हुआ. हमारी बहू तो 2-2 लोटा पानी ले कर बालटी भरती है, तब नहाती?है.’’

सीमा ने झेंप कर बालटी भरी और उठा कर स्नानघर तक पहुंची ही थी कि दर्द के कारण बैठ जाना पड़ा. जिस का भय था, वही हो गया. डाक्टर निरुपाय थे. गर्भपात कराना जरूरी हो गया.

अम्मां रोरो कर सब से कह रही थीं, ‘‘हम इतना काम करते थे तो भला क्या इन्हें बालटी भर पानी नहीं दे सकते थे. हमारे रहने का क्या फायदा हुआ?’’

उसी दिन शाम को प्रभात घर लौटे. अस्पताल पहुंचे तो डाक्टर गर्भपात कर के बाहर निकल रही थीं. उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘बच्चा निकालना जरूरी हो गया था. लड़का था.’’

प्रभात हतबुद्धि से डाक्टर को देखते रह गए. फिर अचकचा कर पूछा, ‘‘सीमा कैसी है?’’ Story In Hindi

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