Social Story: डियो और काना हर समय साथसाथ ही दिखाई देते थे. डियो जरमनी से थी और काना जापान से. दोनों बेंगलुरु के एक आश्रम में मिले थे. इंग्लिश दोनों को आती थी. आज आश्रम का आखिरी दिन था. काना ने डियो को बताया था कि आश्रम का एक सहयोगी उस पर आश्रम को अनुदान देने का अनुचित दबाव बना रहा है.
वहीं, डियो कुछ भारतीय परिधान खरीदने के लिए जाना चाहती थी. अभी कल ही काना ने डियो को एक साथी भारतीय योगी को बेइज्जत करते देखा था. किसी की पर्सनल बात पूछना वैसे भी उस की आदत या जापानी संस्कारों के खिलाफ था. एक योगिनी राधिका ने बीचबचाव करवाया था.
शांत होने पर राधिका ने डियो को भारतीय परिधान पहनने की भी सलाह दे दी थी. डियो इस के बाद जयपुर, अजमेर और पुष्कर घूमने जाना चाहती थी. काना दक्षिण भारत में कुछ दिन और रुकना चाहती थी. रात को खाना खा कर आश्रम में बनी एक दुकान पर दोनों रुक गईं. अचानक, डियो एक डीवीडी कैसेट उठा कर देखने लगी. यह देख कर दुकानदार ने हंसते हुए एक दूसरी डीवीडी थमा दी. यह इंग्लिश में थी. उत्सुकतावश, दोनों कमरे में आ कर देखने लगीं. आश्रम के संचालक अलगअलग तरह से विदेशियों से चंदे के लिए अपील कर रहे थे. गरीब बच्चों, असहाय महिलाओं, इलाज की प्रतीक्षा कर रहे मरीज, सभी तो थे डीवीडी में. काना को कहीं न कहीं ग्लानि का अनुभव हो रहा था. ‘‘शायद ये सब विदेशियों को अमीर मानते हैं. और अमीर लोगों से लोग अपेक्षा करते ही हैं कि वे गरीबों की मदद करें,’’ काना ने दुखी स्वर में कहा.
‘‘हां, पर हम लोग तो खुद ही अभी पढ़ रहे हैं. कोई हाईप्रोफाइल लोग नहीं हैं. मैं पार्टटाइम जौब कर के अपनी पढ़ाई का खर्र्च खुद ही निकालती हूं. साउथ एशिया घूमने इसलिए आई हूं कि कम खर्च में घूमनाफिरना हो जाएगा,’’ डियो का कहना था.
डियो और काना दोनों ही अपनेअपने देशों में मैडिसिन की पढ़ाई कर रही थी. शायद, इसीलिए दोनों की खास जमती थी.
काना अपनी दादी की दुकान में काम करती थी. वह वीकैंड पर टैक्सी चलाती थी. उच्च शिक्षा के लिए उस ने जीतोड़ मेहनत की थी. लगातार 3 साल टैक्सी चला कर पैसे बचाए थे. तब जा कर मैडिसिन पढ़ रही थी. बेहद मेहनती काना ने आश्रम में भी कुछ कार्य करने की संभावना तलाश की थी.
आश्रम के संचालक ने उसे फंड इकट्ठा करने की जिम्मेदारी देना स्वीकार भी किया था. परंतु इस से पहले वह काना से भरपूर चंदा लेना चाहता था. दरअसल, विदेशियों की वजह से ही आश्रम में सभी ऐश्वर्य के साधन उपलब्ध थे.
आश्रम छोड़ते समय विदेशियों को रोका गया. उन से आश्रम के बारे में, गुरुजी के बारे में कुछ बोलने को कहा गया.
स्वाभाविक तौर पर, विदेशी पराए देश में कुछ बुरा क्यों बोलते. अनुभव कैसा भी रहा हो, सभी ने लाइफचेंजिंग बताया. फिर, एक अन्य बिल आया. डियो और काना समेत सभी बेहद हैरान हुए. क्योंकि अपनी समझ से वे सभी बिलों का भुगतान कर चुके थे. उस के बाद अनुदान राशि के लिए प्रार्थनापत्र, काना और डियो को दिया गया. सिर्फ यही 2 विदेशी ऐसे थे जिन्होंने अभी तक आश्रम संचालक को कुछ नहीं दिया था.
न चाहते हुए भी दोनों ने सौ डौलर के चैक दे दिए. राशि देख कर चैक लेने वाले व्यक्ति ने बुरा सा मुंह बनाया और आश्रम के संचालक के कान में फुसफुसाने लगा. इस के बाद डियो और काना को रुखाई से विदा कर दिया गया.
दोनों ने तय किया कि साथ में मैसूर घूमने जाया जाए. डियो के पास 2 दिन शेष थे. उस के बाद राजस्थान घूमने जाना चाहती थी. एकदो अन्य पर्यटक भी उन के साथ शामिल हो गए. डियो ने रास्ते में आश्रम में हुई घटना के बारे में विस्तार से बताया, ‘‘वह तथाकथित गुरुजी का सहायक है. उस ने मुझ से कई बार अपने कक्ष में आने को कहा. एक बार मैं अकेली शाम को लौंग वौक के लिए निकली थी. पता नहीं कहां से आ गया. उस ने मुझे बताया कि उसे गुरुजी ने बताया था कि जरमनी से आई युवती ही मेरा उद्धार करेगी. इतना कह कर वह मुझे गले लगाने लगा.
‘‘मैं उस से पीछा छुड़ा कर भागी. अगले दिन वह मुझे छोटे कपड़ों को ले कर सब के सामने जलील करने लगा. उस ने कहा कि मैं आश्रम की सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ कपड़े पहन रही हूं.’’
‘‘परंतु सिर्फ हमीं लोगों को इस तरह क्यों प्रताडि़त किया. तुम्हें उसी समय उस सहायक की शिकायत करनी चाहिए थी,’’ काना ने रोष से कहा.
‘‘करना तो चाहती थी परंतु उस ने अगले दिन सुबह खुद ही ड्रामा शुरू कर दिया,’’ डियो ने सोचते हुए कहा.
‘‘तुम जानती हो जब मैं ने चंदा देने से मना किया तो मुझे भी गलत इशारे किए गए. इन भारतीयों को ऐसा क्यों लगता है कि हम विदेशी किसी के साथ भी बैड शेयर कर सकते हैं,’’ काना ने दुख से कहा.
‘‘खैर, कुछ भी हो, पर तुम मेल जरूर करना आश्रम को इन सभी के बारे में. मैं भी शिकायती मेल जरूर डालूंगी,’’ काना ने डियो को समझाया.
दोनों ने रवि नामक गाइड को मैसूर दर्शन के लिए साथ लिया. दोनों जब गाइड के लिए मोलभाव कर रही थीं तो उस ने सब से कम दाम बताए थे. घूमने के बाद जब वापसी का समय आया तो खीसें निपोरते हुए उस ने कहा, ‘‘मैम, एनी अदर सर्विस यू वौंट. आई एम अबेलएबल एट फ्री औफ कौस्ट.’’
दोनों ने हैरानी से एकदूसरे की तरफ देखा. अध्यात्म की अनुभूति तो आश्रम में ही खत्म हो चुकी थी. अब घूमनेफिरने का उत्साह भी ठंडा हो गया था. तभी एक वृद्धा उन के पास आ कर हालचाल पूछने लगी. फर्राटेदार इंग्लिश बोलती वृद्ध महिला बैंक में औफिसर रह चुकी थी.
‘‘नैक्स्ट टाइम, कम एटलीस्ट विद वन मेल फ्रैंड,’’ वृद्धा ने बिना मांगी सलाह देना जारी रखा, ‘‘ऐंड वियर इंडियन वियर औल द टाइम.’’
‘‘अब मुझे अच्छी तरह समझ में आ गया कि इंडिया में पर्यटक इतने कम क्यों आते हैं. मैं दूसरी बार नहीं आना चाहती, इसलिए राजस्थान घूमने जरूर जाऊंगी,’’ डियो ने काना के कान में फुसफुसाते हुए कहा.
‘‘हां, मैं भी केरल घूम कर वापस जाऊंगी. सोचती हूं, वियतनाम घूम आती हूं,’’ काना ने अपनी योजना बताई.
दोनों ने एक नेक काम जरूर किया, वह था अपने बैंक में फोन कर के चैक की स्टौप पेमैंट कराना.
Social Story: अलका औफिस में सब के लिए जिज्ञासा का विषय बनी हुई थी. वह किस से, क्यों, कहां जाती है, इस बारे में सब अटकलें लगाते थे लेकिन असलियत कुछ और ही थी.
अलका को जैसे ही यह खबर लगी कि उस का तबादला फिर भोपाल होने का मेल हैडऔफिस से आया है, तो उस की आंखें छलक पड़ीं. वह तो फिर से भोपाल जाने के लिए जैसे रातदिन बाट ही जोह रही थी.
उस के तबादले पर इंदौर कार्यालय के उस के सहकर्मियों ने उस का बाकायदा विदाई समारोह आयोजित किया. विदाई समारोह के भाषण में वह अपने बारे में बहुतकुछ कहना चाहती थी, लेकिन यह सोच कर उस ने कुछ नहीं कहा कि बनर्जी साहब को सबकुछ पता चल ही गया है, तो अब सारी बात बाकी के लोगों को भी पता चल ही जाएगी. तब, यह सबकुछ जान कर शायद किसी के दिल में यह बात आ जाए कि
‘माफ करना अलका,’ हम तुम्हें समझ नहीं पाए.
वह जल्दी से घर आई. उस ने अपने 2 सूटकेसों में सारा सामान भरा और रेलवे स्टेशन पहुंची. भोपाल जाने के लिए 2 साल पहले किन हालात से गुजर कर उसे भोपाल से इंदौर कार्यालय में आना पड़ा. जब वह इंदौर आई, तब इस शहर से पूरी तरह अनजान थी.
इंदौर कार्यालय में जब वह पहुंची तो उस ने एक मैडम से कहा, ‘मुझे बनर्जी साहब से मिलना है,’ वह मैडम उस के सौम्य रूप को देख कर उस पर एकदम से मुग्ध सी हो गई. फिर बोली, ‘मैडम, आप किसलिए उन से मिलना चाहती हैं?’ जवाब में वह बोली, ‘मैं अलका हूं और भोपाल कार्यालय से ट्रांसफर हो कर यहां आई हूं और मुझे अपनी जौइनिंग रिपोर्ट देनी है.’
‘सामने वाला केबिन बनर्र्जी साहब का है और मैं उन की पीए श्वेता शर्मा हूं. आप उन से जा कर मिल सकती हैं,’ उस के केबिन में जाने के 5 मिनट बाद बनर्र्जी साहब ने अपनी पीए श्वेता को केबिन में बुलाया और कहा, ‘मैडम, ये अलका हैं, आज ही भोपाल दफ्तर से आई हैं. आप इन्हें आज अपने साथ बैठाइए और कविता जोकि मैटरनिटी लीव पर हैं. उन की सीट का काम इन्हें समझा दीजिए.’
‘देखिए अलकाजी, मिसेस कविता की डिलिवरी हुई है, इसलिए शायद वे 6 माह तक अवकाश पर रहेंगी. इस सीट का कार्यभार आप को संभालना है,’ श्वेता ने कहा.
‘देखिए, कृपया आप मुझे अलकाजी और आप वगैरह मत कहिए. हम एक ही दफ्तर में काम करते हैं, इसलिए हम सब एकदूसरे के कलीग हैं. यदि तुम मुझे अलका कहोगी तो ज्यादा अच्छा लगेगा,’ फिर श्वेता ने उसे उस सीट के कार्यभार की पूरी जानकारी दी. अब लंच होने को था, इसलिए उस ने कहा, ‘अलका, लंच के लिए टिफिन लाई हो या रैस्टोरैंट में जाने का इरादा है?’
‘मैं तो भोपाल की बस से उतरी और सीधे यहां औफिस में आ गई, इसलिए मेरे पास लंच की व्यवस्था नहीं है.’
‘‘देखो अलका, आज तुम मेरे साथ लंच लो, फिर कल से व्यवस्था कर लेना.’’
लंच करने के दौरान श्वेता ने सहज ही पूछ लिया, ‘अलका, भोपाल से तुम्हारे साथ कोई आया है और तुम्हारे रहने की क्या व्यवस्था है?’
‘मैं अकेली ही भोपाल से आई हूं और मेरे पास रहने का अभी कोई इंतजाम नहीं है. सोच रही हूं कि आज किसी होटल में स्टे कर लूं और फिर किसी की सहायता से कहीं मकान किराए पर ले लूंगी.’
‘ठीक है, तो फिर आज रात तुम मेरी मेहमान बन कर मेरे घर चलो. कल कहीं तुम्हारे लिए मकान की व्यवस्था कर लेंगे.’
अगले दिन श्वेता ने एक मकान उसे दिखाया, जो उसे पसंद आ गया और वह उसी दिन उस में शिफ्ट भी हो गई. जब अलका उस मकान से शिफ्ट होने के लिए श्वेता के घर से निकली तब वह बोली, ‘अलका, तुम अलग मकान में शिफ्ट हो रही हो, इस का मतलब यह नहीं कि हमारी दोस्ती खत्म हो गई. तुम मेरी एक अच्छी सहेली हो और हमेशा रहोगी. यदि तुम्हें कभी भी मेरी सहायता की जरूरत पड़े तो मुझे जरूर बताना.’
कुछ ही दिनों में अलका को इंदौर कार्यालय का माहौल भा गया. वह रोजाना नियत समय पर दफ्तर जाने लगी. लेकिन उस की एक बात पर दफ्तर के सहकर्मियों की नजर थी कि कभीकभी वह अचानक सीट से उठ कर बाहर जाती है और किसी से मोबाइल पर देर तक बातें करती रहती है. यह सिलसिला तकरीबन रोजाना ही होता है. वह इतनी देर तक किस से, क्या बातें करती है, यह सब के लिए चौंकाने वाली बात थी.
चूंकि वह जवान है, बेहद सुंदर है और कदकाठी बहुत आकर्षक है, इसलिए सब के मन में एक भ्रम यह था कि यह किसी लड़के से प्यार करती है और उसी से इतनी देर तक बातें करती है. दफ्तर में 5 दिन का सप्ताह है और हर शनिवाररविवार अवकाश रहता है, इसलिए वह शनिवाररविवार को अवकाश के दिन क्या करती होगी, यह उन सब के लिए जिज्ञासा का विषय था.
एक दिन रात 11 बजे वह उठी और अपने मकान की बालकनी में जा कर किसी से धीमी आवाज में बातें करने लगी. अब दफ्तर में अचानक अपनी सीट से उठ कर उस का किसी से देर तक बातें करना और देररात एक बालकनी में खड़े हो कर धीमी आवाज में बातें करना कुछ रहस्यमय सा लगने लगा था.
दफ्तर के कुछ सहकर्मियों के मन में यह बात आई भी कि अलका से पूछा जाए कि सीट पर से अचानक उठ कर बाहर जा कर वह इतनी देर तक किस से, क्या बातें करती है? लेकिन किसी से मोबाइल पर बातें करना एक पर्सनल मामला है, इसलिए किसी ने उस से यह पूछने की हिम्मत नहीं की. हां, उस के इस बरताव से सब के मन में एक शंका अवश्य हो गई कि वह किसी लड़के के प्रेमजाल में पड़ी हुई है.
अब अलका हर शनिवाररविवार अवकाश के दिन भोपाल जाने लगी. अकसर शुक्रवार की शाम दफ्तर छूटते ही वह वहां से ही रिकशा पकड़ कर बसस्टैंड चली जाती और भोपाल पहुंच जाती. वह इंदौर में नौकरी अवश्य कर रही थी, लेकिन उस का मन और ध्यान भोपाल में ही लगा रहता था. हर महीने वह अपनी पगार की राशि का अधिकांश हिस्सा भोपाल भिजवा देती थी.
एक दिन जैसे ही वह भोपाल से इंदौर लौटी, कार्यालय में आते ही उस ने कार्यालय की सोसाइटी से 10 हजार रुपए का कर्ज लिया और वे रुपए तत्काल भोपाल भिजवा दिए. वह अपनी पगार की राशि का अधिकांश हिस्सा भोपाल में किसे भेजती है और दफ्तर की सोसाइटी से लिए 10 हजार रुपए के कर्ज की राशि उस ने किसे भेजी, यह रहस्य ही था.
एक दिन वह दफ्तर आई और उस ने अपने भविष्यनिधि खाते में से 20 हजार रुपए निकलवाने के लिए आवेदन दिया. कैशियर ने उसे 20 हजार रुपयों का भुगतान उसी दिन दोपहर को कर दिया. कैशियर से रुपए ले कर सीधे बनर्जी साहब के केबिन में गई और अगले एक दिन का अवकाश स्वीकृत कराते हुए वह भोपाल चली गई.
उस के द्वारा बारबार इतनी बड़ी राशि का इंतजाम करना और फिर तत्काल भोपाल रवाना हो जाने की बात अब एक गहरे रहस्य को जन्म देने लगी थी. दफ्तर के सहकर्मियों के दिल में कई बार यह विचार भी कौंध गया कि जवानी के इस दौर में उस से कोई गलती तो नहीं हो गई? क्योंकि वह दिखने में बहुत सुंदर थी. कहीं कोई उस का एमएमएस (वीडियो) बना कर उसे ब्लैकमेल तो नहीं कर रहा है? क्योंकि कहते हैं न कि जब कहीं प्रकाश होता है तो परछाईं भी उस के साथसाथ रहती है. वह सुंदर है, गोरीचिट्टी है, सो, संभव है कुछ ‘काला’ उस के आसपास मंडरा रहा हो?’
अलका भोपाल से वापस लौटी तो बहुत गुमसुम थी. उस के मन के भीतर का दर्द अब उस के चेहरे पर साफ नजर आने लगा था. वह दफ्तर में अपनी सीट पर बैठी थी. लेकिन उस का मन काम में नहीं लग रहा था. वह ठीक से निर्णय नहीं कर पा रही थी कि ऐसी स्थिति में वह क्या करे? वह तत्काल उठ कर बनर्जी साहब के केबिन में गई और उन से बोली, ‘सर, मैं आज फिर भोपाल जाना चाहती हूं, प्लीज, मेरी कुछ दिनों की छुट्टी स्वीकृत कर दीजिए.’
‘लेकिन मैडम, दफ्तर में औडिट पार्टी आई है, इसलिए किसी को भी छुट्टी नहीं दी जा रही है, तब मैं आप को छुट्टी कैसे दे सकता हूं?’
जब साहब ने उसे छुट्टी देने में असमर्थता व्यक्त की तो वह असमंजस में पड़ गई कि अब क्या करे? वह फिर बनर्जी साहब के केबिन में गई और उस ने सविनय निवेदन किया, ‘सर, मेरा रुपए ले कर भोपाल जाना बहुत जरूरी है. यदि रुपए समय पर भोपाल नहीं पहुंच सके तो मेरे जीने का मकसद ही खत्म हो जाएगा.’
‘सौरी मैडम, मैं आप को छुट्टी नहीं दे सकता, लेकिन मानवीयता के नाते इतना कर सकता हूं कि भोपाल में मेरे एक मित्र हैं, उन को संदेश दे कर आप के रुपए भिजवाने का इंतजाम करवा सकता हूं.’
अलका ने तत्काल एक कागज पर नाम व पता लिख कर बनर्जी साहब के हाथ में दिया और कहा, ‘इस स्थान पर 20 हजार रुपए तत्काल पहुंचाने हैं.’
बनर्जी साहब ने तत्काल मोबाइल पर अपने मित्र से बात की कि ‘मैं तुम को एक मैसेज कर रहा हूं, कृपया उस के अनुसार बताए नियत स्थान पर रुपए तत्काल पहुंचवा दें.’
बनर्जी साहब के मित्र ने भी रुपए तत्काल नियत स्थान पर पहुंचा दिए और फिर मोबाइल पर उन को बताया कि, ‘जहां मैडम ने रुपए पहुंचाने के लिए कहा था, वास्तव में वह एक निजी हौस्पिटल है. जब मैं ने हौस्पिटल के काउंटर पर आप के बताए नाम का जिक्र किया तो उन्होंने मुझे एक प्राइवेट रूम में पहुंचा दिया. उस रूम में पहुंचते ही मैं ने देखा कि 4-5 वार्ड बौय मिल कर एक आदमी को पकड़ कर रस्सी से बांध रहे हैं. मुझे उस रूप में देखते ही एक नर्स ने पूछा, ‘सर, आप को किस से मिलना है, क्या आप अभिषेक से मिलने आए हैं?’ मेरे ‘हां’ कहते ही उस ने मुझे बताया कि इन का 3 वर्षों से यहां इलाज चल रहा है. ये एक भयंकर मानसिक रोगी हैं. सर, अभिषेक की हालत देख कर तो मुझ जैसे पत्थर दिल की आंख भी नम हो गई. डाक्टरों से बात करने पर उन्होंने बताया कि ऐसे मरीज कब ठीक होंगे, यह कहना बहुत मुश्किल होता है.’
यह सारी बात जान कर बनर्जी साहब भी स्तब्ध रह गए.
अगले दिन उन्होंने अलका को अपने केबिन में बुलवाया और कहा, ‘मैडम, आप के बताए हौस्पिटल में मेरे मित्र ने रुपए जमा करा दिए हैं और उस ने अभिषेक की स्थिति के बारे में जो मुझे बताया उसे सुन कर मुझे भी बहुत दुख हुआ,’ बनर्जी साहब उस से कुछ पूछते उस के पहले ही वह बोल पड़ी, ‘सर, अभिषेक और मैं ने लवमैरिज की है. हमारी शादी को 5 साल हो गए. अभिषेक का बिल्ंिडग कंस्ट्रक्शन का व्यवसाय था. उस का एक पार्टनर था. उस का नाम कैलाश था. उस ने अभिषेक को विश्वास में ले कर चालाकी से सारा व्यवसाय अपने नाम कर लिया और उस को बाहर का रास्ता दिखा दिया.
‘बिल्ंिडग कंस्ट्रक्शन के व्यवसाय में अभिषेक के भी 2 करोड़ रुपए लगे हुए थे. पार्टनर द्वारा इतनी बड़ी रकम अचानक हड़पने का सदमा वह सह नहीं पाया और उस के दिलोदिमाग पर इतना बुरा और गहरा असर हुआ कि वह पागल हो गया. सर, चूंकि मैं ने और अभिषेक ने लवमैरिज की थी, इसलिए हम दोनों के परिवार हम पर नाराज हैं और उन्होंने हम से रिश्ता तोड़ दिया है. ‘वे हैं या नहीं,’ यह हमारे लिए कोई माने नहीं रखता. रही बात मेरे द्वारा मोबाइल पर देर तक बातें करने की, तो मैं अभिषेक के इलाज के लिए पूरी तरह डाक्टरों और वहां की नर्सों पर निर्भर हूं.
‘मैं ने उन को अपना मोबाइल नंबर दे रखा है. जब भी कोई सीरियस बात होती है तो वे मुझे समयअसमय मोबाइल पर सूचित करते हैं और मुझे तत्काल सीट से उठ कर उन से बात करनी पड़ती है. चूंकि अभिषेक का इलाज एक निजी हौस्पिटल में चल रहा है. इसीलिए आप समझ सकते हैं कि निजी हौस्पिटल में इलाज कराना कितना महंगा होता है.
‘सर, मैं भोपाल दफ्तर में काम करते हुए उस का इलाज करा रही थी. मेरी यह कहानी अपने दफ्तर के डिप्टी डायरैक्टर को पता चल गई. एक दिन, रात को वे मेरे घर आए और उन्होंने अपनी बुरी नियत का साया मेरे पर डालने की कोशिश की, तब मैं ने गुस्से में लालपीली होते हुए उन के गाल पर चारपांच थप्पड़ जड़ दिए. उन के गाल पर थप्पड़ों की झड़ी लगते वे बौखला उठे. उन्होंने अपनी जेब से रुपयों की गड्डी निकाली और कमरेभर में रुपए उड़ाते हुए जोरजोर से चिल्लाने लगे कि एक तो धंधा करती है उस पर भी मारपीट करती है.
‘यह सब देख कर मैं बुरी तरह घबरा गई, उस पर भी उन की चिल्लाहट सुन कर हमारी बिल्ंिडग के सारे रहवासी इकट्ठा हो गए और वे मेरे विरुद्ध ही बातें करने लगे कि अब यह पति का इलाज कराने के लिए रुपए जुटाने के चक्कर में धंधा भी करने लगी है.’
‘पुरुषप्रधान व्यवस्था में अकसर लोग पुरुषों का ही साथ देते हैं. सर, मैं चाहती भी थी कि उन डिप्टी डायरैक्टर के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराऊं. लेकिन जब हमारे बिल्ंिडग वाले ही मेरे खिलाफ बोलने लगे तो मैं पुलिस के सामने गवाह या साक्ष्य के रूप में किन लोगों को पेश करती? मैं वहां अकेली पड़ गई. इसीलिए यह बदनामी सह कर मुझे चुप रहना पड़ा. मैं मन ही मन समझ गई थी कि अब भोपाल दफ्तर में काम करना मेरे लिए मुश्किलोंभरा होगा, इसीलिए मैं ने अपना तबादला इंदौर करा लिया. इस के बाद यहां जौइनिंग देने के बाद की सारी कहानी आप के सामने है ही.’
करीब 2 वर्षों बाद भोपाल के उस डिप्टी डायरैक्टर का तबादला नई दिल्ली हो गया. इसलिए अलका ने भी अपना तबादला फिर भोपाल करवा लिया.
अंत में बनर्जी साहब बोले, माफ करना अलका, मैं ने भी तुम्हें गलत समझा था. शायद सारा स्टाफ ऐसा ही गलत समझता था क्योंकि डिप्टी डायरैक्टर के सूत्र यहां हैं जो तुम्हारे बारे में बहुतकुछ बताते रहते थे. तुम्हें अपने ध्येय में सफलता मिले, यही मेरी कामना है.
Social Story: घंटी की आवाज सुन कर अलका के दरवाजा खोलते ही नवागुंतक ने कहा, ‘‘नमस्कार, आप मुझे नहीं जानतीं, मेरा नाम पूनम है. मैं इसी अपार्टमैंट में रहती हूं.’’
‘‘नमस्कार, मैं अलका, आइए,’’ कहते हुए अलका ने पूनम को अंदर आने का निमंत्रण दिया.
‘‘फिर कभी, आज जरा जल्दी में हूं. कल गुरुपूर्णिमा है, गुरुजी के आश्रम से गुरुजी के अनुयाई आए हैं. उन के सान्निध्य से लाभ उठाने के लिए गुरुपूर्णिमा के अवसर पर हम ने घर में सत्संग का आयोजन किया है. उस के बाद महाप्रसाद की भी व्यवस्था है. आप सपरिवार आइएगा,’’ पूनम ने अलका से कहा.
‘‘सत्संग…’’ अलका ने वाक्य अधूरा छोड़ते हुए कहा.
‘‘हमारी गुरुमाता हैं, उन का मुंबई में आश्रम है. वे तो देशविदेश धर्म के प्रचारप्रसार के लिए जाती रहती हैं, लेकिन उन के अनुशासित शिष्य उन के काम को आगे बढ़ाते रहते हैं. हम उन के प्रवचन औडियो, वीडियो सीडी के जरिए दिखाते हैं. हम चाहते हैं ज्यादा से ज्यादा लोग गुरुमाई के विचारों को आत्मसात कर धर्मकर्म को अपनाएं. इस से उन के जीवन में सुख व शांति का प्रवाह होने के साथ उन का जीवन सफल होगा. यही नहीं दूसरों को भी उन के विचारों से अवगत करा कर उन के जीवन को भी सफल बनाने में सहयोग दें.’’
अलका इस अपार्टमैंट में कुछ दिनों पहले आई थी. सो, अभी तक उस का किसी से ज्यादा परिचय नहीं हुआ था. पूनम के निमंत्रण पर सोच में पड़ गई. वह कभी सत्संग में नहीं गई थी. उस ने अपनी सासुमां को टीवी पर कई बाबाओं का सत्संग सुनते देखा था. सब की एक ही बातें. एक ही चालें. अपनी करनी के चलते जब आसाराम जेल गए तो सासुमां को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था. बारबार वे यही कहती रहीं कि उन को फंसाया गया है. कई बार उस ने उन्हें सचाई बतानी चाही, तो उन्होंने उसे धर्म, कर्म से विमुख की उपाधि से विभूषित कर उस का मुंह बंद कर दिया था. नतीजा यह हुआ कि वह उन की बातें चुपचाप सुनती रहती थी, लेकिन कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती थी. वैसे भी, उस का मानना था जिस ने अपने मनमस्तिष्क के दरवाजे बंद कर रखे हैं, उस को समझा पाना बेहद कठिन है.
अलका को इन बाबाओं पर कोई विश्वास नहीं था, क्योंकि उसे लगता था कि ये आम भोलेभाले इंसानों को फंसा कर उन्हें कर्म से विमुख कर, अकर्मण्य बना कर सिर्फ धर्म की अफीम चटा कर ही जीवनरूपी नाव को वैतरणी पार करने के लिए विवश कर रहे हैं.
साधुसंन्यासियों से सदा दूर रहने वाली अलका को इस समय पूनम के आग्रह को ठुकरा पाना उचित नहीं लग रहा था. अब उसे यहीं रहना है, सो, जल में रह कर मगर से बैर लेना उचित नहीं है. यह सोच कर उस ने जाने का मन बना लिया था. वैसे भी, इस अपार्टमैंट वालों से मेलजोल बढ़ाने का सुनहरा अवसर वह खोना नहीं चाहती थी.
सुबह 10 बजे से ही अपार्टमैंट में गहमागहमी शुरू हो गई. लगभग 11 बजे ढोलमंजीरों की आवाज सुनाई देने लगी. आवाज सुन कर घर का दरवाजा बंद कर वह पूनम के घर गई. वहां पूनम के अतिरिक्त कई अन्य स्त्रियां सुंदरसुंदर परिधानों में उपस्थित थीं, जबकि पुरुष बाहर खड़े थे, साधुओं के दल का इंतजार कर रहे थे.
कुछ ही देर में उस ने एक युवा को हाथ में चरणपादुकाएं तथा उस के पीछे भगवा वस्त्र पहने हुए लगभग 15-20 युवा युवकयुवती आते देखे. सभी लगभग 25 से 40 वर्ष की उम्र के होंगे. उन को देख कर अलका को आश्चर्य हुआ. जो उम्र किसी भी इंसान के कैरियर के लिए अत्यंत मूल्यवान होती है, उस उम्र में संन्यास लेना क्या उचित है? अभी वह सोच ही रही थी कि चरणपादुकाएं पकड़े युवक ने घर में प्रवेश किया. गृहस्वामिनी उस का स्वागत करते हुए उसे उस स्थान तक ले गई जहां गुरुमाई का एक बड़ा सा तैलीय चित्र एक लाल कपड़े वाले आसन पर रखा था. आगे वाले युवक ने चरणपादुकाएं आसन पर चित्र के सामने रख दीं.
दीप प्रज्ज्वलित कर सभी मेहमानों ने गुरुमाई के चित्र तथा चरणपादुका को फूलमालाएं पहना कर पूजा की. इस के बाद सभी लोगों ने अपनेअपने आसन ग्रहण किए. लगभग 2 घंटे तक पूजासत्संग चला. सब से पहले गुरुमाई की औडियो, वीडियो, सीडी द्वारा सभी अनुयाइयों को उन के संदेश सुनाए गए. आधा घंटा भजन चला तथा 10 मिनट का ध्यान व उस के बाद आरती हुई. आरती का थाल 50-100 रुपए के नोटों से भर गया था. आश्चर्य तो यह था कि किसी को 10-20 रुपए देने में आनाकानी करने वाली स्त्रियां थाल में बड़ेबड़े नोट डाल कर गर्वोन्मुक्त हो रही थीं.
आरती के बाद गुरुमाई का भोग लगा कर उन के शिष्यों को प्रसाद दिया गया. फिर दूसरे लोग महाप्रसाद के लिए बैठे. जो महिलाएं अभी आस्था से ओतप्रोत थीं, वही अब कपड़े, गहनों के साथ, सासबहू तो कुछ पतिपुराण पर भी आ गईं.
एक महिला ने अपना परिचय देते हुए अलका का परिचय पूछा. अलका के परिचय देने के बाद उस महिला ने जिस ने अपना नाम अर्चना बताया था, कहा, ‘‘आप यहां नएनए आए हो. गृहप्रवेश की पूजा करा ली होगी. आप ने किसी को बुलाया नहीं?’’
उस की बात सुन कर कई दूसरी महिलाओं के चेहरे अलका की ओर घूमे.
‘‘अर्चना जी, मैं तथा आलोक इन सब में विश्वास नहीं करते. हमारे लिए तो हर दिन एकसमान है. जिस दिन हमें सुविधा लगी, उस दिन हम ने शिफ्ट कर लिया.’’
‘‘अच्छा, विवाह तो शुभ मुहूर्त देख कर ही किया होगा,’’ अर्चना के बगल में बैठी शोभना ने पूछा.
‘‘विवाह का फैसला तो मेरे तथा आलोक के मातापिता का था, किंतु गृहप्रवेश का हमारा अपना,’’ अलका ने शोभना की आंखों में व्यंग्नात्मक मुसकान देख कर कहा.
‘‘क्या गृहप्रवेश में आप के और भाईसाहब के मातापिता नहीं आए थे?’’ शोभना ने फिर पूछा.
‘‘आए थे.’’
‘‘क्या उन्होंने विरोध नहीं किया?’’
‘‘नहीं,’’ कह कर अलका ने बेकार की चलती बहस को खत्म करने की कोशिश की.
‘‘शुभ समय देख कर किया हर काम अच्छा होता है वरना बाद में परेशानी आती है,’’ शोभना की बात सुन कर उस की पड़ोसिन रूचि भी कह उठी.
अलका ने किसी की भी बात का उत्तर देना अब उचित नहीं समझा. वैसे भी, उन लोगों की बात का क्या उत्तर देना जो अपनी सोच में इतने जकड़े हों कि दूसरों की बात व्यर्थ लगे.
पूनम के घर हर सोमवार, शाम को 7 से 8 बजे सत्संग होता था. 10 मिनट के ध्यान के समय वह दरवाजे के बाहर आ कर खड़ी हो जाती, जिस से वह हर आनेजाने वाले पर निगाह रख कर ध्यान करने वालों का ध्यान भंग होने से बचा सके. इस सत्संग में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की भागीदारी होती थी वह भी उन महिलाओं की जो स्वयं को अत्याधुनिक मानती थीं. कुछ तो जौब भी करती थीं. पूनम स्वयं महिला विद्यालय में रसायनशास्त्र की प्रवक्ता थी, इस के बावजूद उस की इतनी अंधभक्ति अलका को आश्चर्यचकित कर रही थी.
इस से अधिक आश्चर्य तो अलका को तब हुआ जब उस की पड़ोसिन रुचि ने उसे अपार्टमैंट में चल रही ‘सुंदरकांड किटी’ में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रण दिया. महिलाओं की सामान्य किटी तो उस ने सुनी थी, पर ‘सुंदरकांड किटी…’ वह सोच ही रही थी कि रुचि ने कहा, ‘‘अलकाजी, इस किटी में सुंदरकांड के पाठ के साथ सामान्य किटी की तरह ही आयोजक को आए अतिथियों के लिए खानपान का भी आयोजन करना होता है. इस बहाने धर्मकर्म के साथ हम महिलाएं अपना मनोरंजन भी कर लेती हैं.’’
अलका ने रुचि को नम्रतापूर्वक मना कर दिया था. लखनऊ में जेठ के महीने का हर मंगल ‘बड़ा मंगल’ माना जाता है. हर मंगल को किसी न किसी के घर से भंडारे का न्योता आ जाता. सुंदरकांड के साथ खानेपीने की अच्छीखासी व्यवस्था रहती थी.
प्रारंभ में अलका सामाजिकता निभाने चली जाती थी, किंतु धीरेधीरे उसे इन आयोजनों में अरुचि होने लगी. आस्था मन की चीज है, न कि दिखाने की. यही कारण था कि हर आयोजन उसे उस के करने वाले की प्रतिष्ठा का द्योतक लगने लगा था. आखिरकार, पहनावे से आधुनिक व विचारों से दकियानूसी महिलाओं का अपनी आस्था का भौंड़ा प्रदर्शन कर दूसरों को नीचा दिखाने को आतुर रहना उसे पसंद न था इसलिए ऐसी महिलाओं से उस ने दूरी बना लेना ही बेहतर समझा.
नतीजा यह हुआ कि धीरेधीरे आस्था के रंग में डूबी महिलाओं ने उसे नास्तिक की उपाधि से विभूषित कर उस का सामाजिक बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया. लेकिन, उस ने उन की इस मनोवृत्ति को भी सहजता से लिया. कम से कम अब उसे ऐसे आयोजनों में सम्मिलित न हो पाने पर बहाना बनाने से मुक्ति मिल गई थी.
Hindi Story: रवि को फ्लैट अच्छा लगा. हवादार, सारे दिन की धूप, बड़े कमरे, बड़ी रसोई, बड़े बाथरूम. पहली नजर में ही रवि को पसंद आ गया. दाम कुछ अधिक लग रहा है, दूसरे ब्रोकर्स कम कीमत में फ्लैट दिलाने को कह रहे थे परंतु रवि मनपसंद फ्लैट, जैसे उस की कल्पना थी वैसा, पा कर कुछ अधिक कीमत देने को तैयार हो गया. पत्नी रीना और बच्चों को भी फ्लैट पसंद आया. लोकेशन औफिस के पास होने के कारण रवि ने उस फ्लैट को खरीदने के लिए ब्रोकर से कहा. फ्लैट के मालिक से शाम को डील फाइनल करने के लिए समय तय हो गया.
रवि ने ब्रीफकेस में चैकबुक रखी और कैश निकालने के लिए बैंक गया. कार को बैंक के बाहर पार्क कर रवि ने बैंक से कैश निकाला. लगभग 10 मिनट बाद रवि जब बैंक से बाहर आया तब उस समय बहुत सी कारें आड़ीतिरछी पार्क थीं.
रवि सोचने लगा कि कार पार्किंग से कैसे बाहर आए. 2 कारों के बीच जगह थी. रवि कार को वहां से निकालने के लिए कार को उन 2 कारों के बीच में करने लगा, परंतु तेजी से एक बड़ी सी महंगी कार उन 2 कारों के बीच खाली जगह पर गोली की रफ्तार से दनदनाती हुई आई और रवि की कार के सामने तेजी से ब्रेक मार कर रुक गई.
कार में बैठा नवयुवक कीमती मोबाइल फोन पर बात कर रहा था और हाथ से कुछ इशारे कर रहा था जो रवि समझ नहीं सका. नवयुवक मोबाइल पर बात करता हुआ इशारे करता जा रहा था. रवि ने कार से उतर कर नवयुवक से अनुरोध किया कि उसे अपनी कार को निकालना है, सो प्लीज, उसे निकलने दीजिए, फिर आप इसी जगह पार्क कर लीजिए.
तभी वह युवक ताव में आ कर कहने लगा, ‘‘बुड्ढे, कार यहीं खड़ी होगी, इतनी देर से इशारा कर रहा हूं, कार पीछे कर. मेरी कार यहीं खड़ी होगी. समझा बुड्ढे या दूसरे तरीके से समझाना पड़ेगा. मेरे से बहस कर रहा है. पीछे हटा मच्छर को, नहीं तो मसल दूंगा, जरा सी आगे की तो उड़ जाएगी, पीछे हट. मेरी कार यहीं पार्क होगी.’’
इतना सुन कर रवि ने किसी अनहोनी से घबरा कर कार पीछे की और नवयुवक ने कार वहां पार्क की और गोली की रफ्तार से कार को लौक कर के मोबाइल पर बात करता हुआ चला गया. महंगी कार, सिरफिरा नवयुवक शायद कोई चाकू, पिस्तौल जेब में हो, चला दे. आजकल कुछ पता नहीं चलता. छोटीछोटी बातों पर आपा खो कर नवयुवक गोलीचाकू चला देते हैं. यही सोच कर रवि ने कार पीछे कर ली और लुटेपिटे खिलाड़ी की तरह होंठ पर हाथ रख कर सोचने लगा.
एक आम व्यक्ति की कोई औकात नहीं है. माना अमीर नहीं है, नौकरी करता है, मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता है. एक छोटी सी कार उस की नजर में बड़ी संपति है, मगर एक मगरूर इंसान ने उसे मच्छर बना दिया. कोई कीमत नहीं है छोटी कार की. अमीर आदमी की नजर में वह और उस की कार की कोई कीमत नहीं. न सही, किसी के बारे में वह क्या कर सकता है. उस नवयुवक के घमंड को देख कर उस ने दांतों तले उंगली दबा ली.
वह इंतजार करने लगा कि आसपास खड़ी कोई कार हिले, तो वह अपनी कार को हिलाए. लगभग 20 मिनट बाद उस के पास खड़ी कार हटी, तब रवि को शांति मिली. उस का दिमाग, जो अब तक कई सौ मील दूर तक की कल्पना कर चुका था, जमीन पर आया, कार स्टार्ट की और घर वापस आया.शाम को रवि, रीना ब्रोकर सतीश के साथ फ्लैट मालिक ओंकारनाथ के औफिस पहुंचे. सतीश ने सेठ ओंकारनाथ का गुणगान शुरू किया. ‘‘सेठजी का क्या कहना, धन्ना सेठ हैं. प्रौपर्टी में निवेश करते हैं. पूरे देश में, हर कोने में सेठजी की प्रौपर्टी मिलेगी. बस, शहर का नाम लो, प्रौपर्टी हाजिर है. 100 से अधिक प्रौपर्टी हैं सेठजी की.’’
‘‘आज इस समय 140 प्रौपर्टीज हैं,’’ सेठजी ने पुष्टि की. ‘लोन मेरा पास हो गया है. आप प्रौपर्टी के कागजों की कौपी दे दें. मुझे पेमैंट की कोई चिंता नहीं है. अधिक से अधिक एक सप्ताह में पूरी पेमैंट हो जाएगी. प्रौपर्टी के कागज बैंक में दिखा कर लोन की पेमैंट हो जाएगी. बयाना मैं अभी दे देता हूं. सौदा पक्का कर लेते हैं. बस, आप एक बार कागज दिखा दीजिए,’’ रवि ने सेठजी से कहा.
‘‘ठीक है. अलमारी की चाबी मेरे लड़के के पास है. फोन कर के बुलाता हूं,’’ कह कर सेठजी ने फोन किया. 2 मिनट बाद सेठजी के लड़के ने औफिस में प्रवेश किया. मोबाइल पर बात करतेकरते अलमारी खोली और फाइल टेबल पर रखी. रवि ने लड़के को देखा. लड़का वही सुबह वाला नवयुवक था, जिस की महंगी कार ने उस की कार को निकलने नहीं दिया और घमंड में रवि का उपहास किया. रवि ने उसे पहचान लिया. बुड्ढा, मच्छर, उड़ा दूंगा, कार यहीं पार्क करूंगा, नहीं निकलने दूंगा कार, ये शब्द उस के कानों में बारबार गूंज रहे थे. रवि उस लड़के को लगातार देखता रहा. सतीश ने फाइल रवि की ओर करते हुए चुप्पी तोड़ी.
‘‘तसल्ली कर लीजिए और बयाना दे कर सौदा पक्का कीजिए.’’
‘‘सतीशजी, अब इस की कोई जरूरत नहीं है. आप कोई दूसरा सौदा बताना.’’
‘‘क्या बात है, रविजी, आप के सपने का फ्लैट आप को मिल रहा है, जिस की तलाश कर रहे थे, वह आप के सामने है.’’ रवि ने ब्रीफकेस को बंद किया और सौदा न करने पर खेद व्यक्त किया और जाने के लिए कुरसी से उठा, ‘‘रीना, कोई दूसरा फ्लैट देखेंगे, अब चलते हैं.’’
‘‘मिस्टर रवि, कोई बात नहीं, आप फ्लैट खरीदना नहीं चाहते, यह आप का निर्णय है. परंतु मैं इस का कारण जानना चाहता हूं, क्योंकि आप इस फ्लैट के लिए उत्सुक थे. फाइल देखना चाहते थे. जब फाइल सामने रखी, तो बिना फाइल देखे इरादा बदल लिया,’’ सेठजी ने रवि से बैठने के लिए कहा.
‘‘सेठजी, यह मत पूछिए.’’
‘‘कोई बात नहीं. यदि कोई कड़वी बात है, वह भी बताओ. कारण जानना चाहता हूं.’’ ‘‘सेठजी, बात आत्मसम्मान की है. आज सुबह बहुत गालियां सुनी हैं. ठेस पहुंची है. कलेजे को चीर गई हैं बातें,’’ कह कर सुबह का किस्सा सुनाया, ‘‘वह नवयुवक और कोई नहीं, आप के सुपुत्र हैं. इसी कारण मैं ने अपने सपने को तोड़ा. जिस तरह के फ्लैट की चाह थी, जिस के लिए अधिक रकम देने को तैयार था, वही सौदा तोड़ रहा हूं. मेरा आत्मसम्मान मुझे सौदा करने की इजाजत नहीं देता. आप के सामने आर्थिक रूप में मेरी कोई औकात नहीं है. परंतु अमीरों का गरीबों की बिना बात के तौहीन करना उचित नहीं है. सिर्फ विनती की थी, कार निकालने के लिए, 10-15 सैकंड में क्या फर्क पड़ता. कार मुझे तो निकालनी थी, पार्क तो आप की कार ही होती, परंतु आप के बरखुरदार ने मेरी खूब बेइज्जती की.’’ उठतेउठते रवि ने एक बात कही, ‘‘सेठजी, आप ने रुपएपैसों से अपने लड़के की जेबें भर रखी हैं. थोड़ी समझदारी, दुनियादारी की तालीम दीजिए. संयम रखना सिखाइए. इज्जत दीजिए और इज्जत लीजिए.’’
रवि चला गया. औफिस में रह गए सेठजी और उन के सुपुत्र. सेठजी कुछ कह नहीं सके. लड़के ने मोबाइल से फोन मिलाया और दनदनाता हुआ औफिस से बाहर चला गया. Hindi Story
Social Story: पटना अहमदाबाद ऐक्सप्रैस ट्रेन अपनी पूरी गति से चली जा रही थी. पटना रेलवे स्टेशन पर इस ट्रेन पर सवार जितेंद्र अपनी बेटी मालती के साथ अहमदाबाद जा रहे थे. वहां उन्हें बेटी को मैडिकल ऐडमिशन के लिए टैस्ट दिलवाना था.
एक प्राइवेट फर्म के क्लर्क जितेंद्र के लिए यह एक अच्छा अवसर था. सो, वे खुशी से जा रहे थे. वहीं उन की 17 वर्षीया बेटी मालती की खुशी का ठिकाना नहीं था. स्टेशन पर उन की पत्नी और बाकी बच्चे उन्हें छोड़ने आए थे. वे गाड़ी पर चढ़ गए. उन के सामने की बर्थ पर
2 लड़के विराजमान थे, 24-25 वर्ष के रहे होंगे, जींसपैंट व शर्ट में कम के ही लग रहे थे.‘‘पापा, आजकल किसी ने कुछ उलटीसीधी हरकत की तो एक मैसेज रेलमंत्री को करने से अपराधी फौरन पकड़ा जाता है,’’ मालती शायद इन बातों से अपना डर कम कर रही थी या उन युवकों को सुना रही थी.
‘‘हां बेटा, आप ठीक कह रहे हो, हम अब पूरी तरह सुरक्षित हैं,’’ पिता बेटी की हां में हां मिला रहे थे.‘‘परंतु पापा, क्या वास्तव में कार्रवाई होती है या फिर नाम कमाने के लिए…’’ वह शायद बात को लंबा खींचना चाहती थी.
‘‘बेटा, कार्रवाई वास्तव में होती है और कई पकड़े भी जा चुके हैं,’’ यह पिता का स्वर था. इधर, ये दोनों युवक अपनी पुस्तक पढ़ने में लगे थे. एक बार भी उन की बातों की ओर ध्यान नहीं दिया था.
‘‘क्यों, आप दोनों का क्या मत है?’’ इन्होंने उन दोनों युवकों से प्रश्न किया. ‘‘जी, आप ने मु झ से कुछ कहा,’’ एक युवक बोला.‘‘हां, कार्य के संबंध में पूछा था,’’ जितेंद्र ने बात प्रारंभ करने की गरज से कहा. ‘‘सौरी, मैं सुन नहीं पाया था,’’ कहते वह इन की बात सुनने की मुद्रा में आ गया.
‘‘क्या रेलमंत्री को मैसेज करने पर कार्यवाही वास्तव में होती है?’’ यह मालती का स्वर था. ‘‘जी, अगर शिकायत सही हो तो, वरना गलत शिकायत करने पर उलटा पेनल्टी लगने की संभावना भी है,’’ इसी लड़के ने कहा और पढ़ने में खो गया.
इधर मालती को चैन नहीं आ रहा था. वह उभरे गले का टौप, नीचे टाइट जींस पहने हाथ में बैग हिलाती गाड़ी पर आई थी, जिस के पिता कुली के समान सामान ढोते आए थे. वह अपने पिता को मानो कुली सम झ रही थी, जबकि स्वयं को राजकुमारी. ऐसी दशा में पूरे 2 घंटे गाड़ी को दौड़ते हुए हो गए और इन दोनों लड़कों ने एक बार भी उस की ओर ध्यान नहीं दिया. सो, उसे गवारा नहीं हुआ या यों कहें कि वह पचा नहीं पा रही थी.
‘‘सुनिए,’’ मालती से जब नहीं रहा गया तो बोल उठी. ‘‘जी,’’ एक ने उस की ओर देखते कहा.‘‘पीने का पानी होगा आप के पास?’’ वह बोली. इस पर बिना कुछ बोले एक युवक ने पानी उस की ओर बढ़ा दिया. पानी पी कर मालती ने थैंक्स कहा तो वह बिना बोले मुसकरा कर अभिवादन स्वीकार करते, बोतल वापस बैग में रख फिर पढ़ने में खो गया.
डाक्टर राकेश, डाक्टर मोहन मिश्रा, टीटीई ने नाम ले कर पुकारा तो दोनों ने मुसकरा कर सिर हिला दिया.‘‘डाक्टर साहब, आप अहमदाबाद में?’’ टीटीई न जाने क्यों पूछ बैठा.‘‘हम दोनों वहां एमजीएमसी में कार्यरत हैं,’’ एक युवक ने संक्षिप्त उत्तर दिया. ‘‘डाक्टर साहब? तो क्या आप दोनों डाक्टर हैं?’’ जितेंद्र टीटीई के बाद बोल पड़े.
‘‘जी सर, हम दोनों भाई हाउस सर्जन के रूप में कार्यरत हैं और एमएस भी कर रहे हैं,’’ इस बार दूसरा युवक यानी डा. मोहन बोल उठा. ‘‘हम वहीं अपनी बिटिया का ऐडमिशन टेस्ट दिलवाने ले जा रहे हैं,’’ जितेंद्र बिना पूछे बोल उठे. ‘‘जी, परंतु मैडिकल की पढ़ाई तो पटना में भी हो सकती है. फिर इतनी दूर?’’ इस बार डा. राकेश ने प्रश्न किया.
‘‘बात यह है कि बाहर पढ़ने का मजा कुछ और है और वहां किसी की ज्यादा टोकाटाकी नहीं होती,’’ यह उन की बेटी मालती थी जो बीच में टपक पड़ी थी.‘‘अच्छा,’’ एक शब्द बोल दोनों फिर चुप हो गए.‘‘आप लोग कहां के रहने वाले हैं?’’ जितेंद्र ने पूछा.‘‘पटना का ही हूं. मेरे पिताजी पटना में ही नौकरी में हैं और वहीं से एमबीबीएस किया. फिर यहां नौकरी करने चले आए.’’
अब इन की आंखों में दूसरा स्वप्न तैरने लगा. एक जवान होती बेटी के पिता की आंखों में बेटी के भावी वर की तसवीर तैरती रहती है.‘‘आप लोग पटना के हैं, लगते तो नहीं?’’ यह मालती का प्रश्न था.‘‘हम लोग 2 साल से अहमदाबाद में काम कर रहे हैं. हो सकता है बोली में बदलाव आ गया हो,’’ डा. मोहन ने बात को खत्म करने की गरज से कहा.
‘‘मेरी बेटी कुछ ज्यादा ही बोलती है,’’ जितेंद्र ने बेटी का बचाव करते हुए कहा.‘‘ऐसा कुछ नहीं है. बड़े होने पर संभल जाएगी,’’ यहां भी दोनों बात को समाप्त कर फिर पढ़ने में खोते हुए बोले.अब दोनों बापबेटी इन दोनों से परेशान हो गए थे. ये लोग कभी भी कुछ भी बोलना नहीं चाहते. मात्र पढ़ते रहते हैं. बीच में चाय मंगा कर दोनों ने पी. एक बार भी नहीं पूछा.
जितेंद्र को झट मौका मिल गया. जैसे ही मुगलसराय से गाड़ी आगे चली, एक चाय वाला चाय ले कर आया.उन्होंने 3 चाय का और्डर दिया. एक खुद के लिए और 2 उन दोनों डाक्टरों के लिए.‘‘नो थैंक्स, हम दोनों चाय पी चुके हैं,’’ दोनों स्पष्ट मना करते बोले.
‘‘मगर हम ने खरीद ली है. मैं पीने लगा तो सोचा आप को भी पिला दूं. आखिर आप पटना के हैं न,’’ इन्होंने बातों की कड़ी जोड़नी चाही.‘‘जी धन्यवाद, परंतु हम अभी चाय पी चुके हैं,’’ संक्षिप्त उत्तर दे कर दोनों चुप हो गए.जितेंद्र ने चाय का कप अन्य 2 पास की सीटों पर विराजमान लोगों को पकड़ा दिया. उन्हें बोलने की आदत थी, वहीं वे दोनों मानो न बोलने की कसम खाए बैठे थे.
इधर टे्रन अपनी गति से दौड़ती जा रही थी. अनायास ही एक फोन डाक्टर मोहन के पास आया, ‘‘जी, हम परसों सुबह पहुंच जाएंगे. दोपहर 1 बजे तक औपरेशन कर सकते हैं. आप पेशेंट को तब तक एक दवा दे कर रखें.’’ इस जवाब ने बाकी पैसेंजर्स को चौंका दिया. वे उन की ओर देख रहे थे.
डाक्टर मोहन फोन सुनने के बाद राकेश से कह रहे थे, ‘‘कुल 5 औपरेशन परसों करने हैं. पांचों मेजर हैं. तुम सफर के बाद…’’‘‘आप चिंता न करें. रिजर्व कूपे में आराम से जा रहे हैं. रात भरपूर नींद ले लेंगे. सो, मन ताजा रहेगा. अलबत्ता डिस्कस करना जरूरी है,’’ राकेश ने भी भाई की हां में हां मिलाई.
अब सारे पैसेंजर्स की निगाहों में मानो दोनों हीरो बने जा रहे थे.‘‘डाक्टर साहब, ट्रेन में एक को अटैक आ गया. क्या आप…’’ यह भागते आते टीटीई का स्वर था.‘‘बिलकुल, चलिए,’’ कहते अपना बैग उठाए दोनों डाक्टर चल दिए.
करीब 1 घंटे बाद दोनों लौटे. पसीने से तरबतर थे. डाक्टर का यह रूप यात्रियों ने नहीं देखा था.‘‘थैंक्स डाक्टर, आप ने उन की जान बचा ली. रेलवे पर एहसान किया है.’’‘‘थैंक्स कैसा सर, हम ने बस अपना फर्ज निभाया है. उन्हें अंडरकंट्रोल कर नींद का इंजैक्शन दे दिया है. जबलपुर या इटारसी कहीं भी हौस्पिटल में शिफ्ट कर दीजिएगा,’’ अत्यंत सरल स्वर में ये दोनों युवक बोल रहे थे.
थोड़ी देर बाद उस आदमी के साथ का अटैंडैंट इन के पास आया और फीस लेने का आग्रह करने लगा.‘‘नो थैंक्स, हम सरकारी डाक्टर हैं. पैसेंजर का इलाज करना हमारा फर्ज बनता है,’’ इन्होंने मना करते कहा.
अब तो टीटीई से ले कर टे्रन के सारे पैंसेजर इन दोनों डाक्टरों को पहचान गए थे. इधर जितेंद्र के दिमाग में अलग खिचड़ी पकने लगी. अपनी बिरादरी के हैं. काबिल डाक्टर हैं. उम्र भी ज्यादा से ज्यादा 25 की होगी. बेटी भी 18 की है, कौन सी छोटी है. फिर 7-8 साल का अंतर तो हर जगह रहता है.
‘‘क्यों डाक्टर साहब, आप के पूरे परिवार के सदस्य पटना में ही रहते हैं?’’ जितेंद्र ने सवाल पूछा.‘‘पूरे कहां, हम दोनों भाई अहमदाबाद में, शेष बचे मांपापा पटना में हैं,’’ डाक्टर ने बात पूरी की, या यों कहें कि जवाब दिया.
‘‘फिर उन की देखरेख?’’इस प्रश्न पर दोनों भाई मानो चौंक गए, ‘‘मेरे पितामाता दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं. पिताजी नौकरी में हैं.’’‘‘परंतु आप कभीकभार ही देख पाते होंगे न?’’ जितेंद्र ने फिर से प्रश्न किया.‘‘हम दोनों में से कोई एक 2-4 माह में आ ही जाता है. फिर पास में चाचाका परिवार है,’’ डा. मोहन का जवाब था.
नौकरी में दांवपेंच ज्यादा चलाने वाले, काम से कोसों दूर रहने वाले जितेंद्र अपना निश्चय लगभग कर चुके थे. वे 2 बार बाथरूम जाने के बहाने वहां से हट कर अपनी पत्नी को इन के बारे में बता चुके थे. पत्नी की राय भी यही थी कि लड़के के परिवार का पता ले लिया जाए तो एक लड़का अवश्य अपनी लड़की के लिए मांग लेंगे. अगर देने से मना किया तो पैसे दे कर…
उन्होंने टीटीई के पास जा कर उन्हें चाय पिला कर यात्रियों की सूची से इन दोनों का पता मालूम कर लिया था. बस, ट्रेन अहमदाबाद तो पहुंचे. वहां बेटी के बहाने इनका होस्टल देख लेंगे. और पटना लौट कर शादी भी पक्की कर लेंगे इतने काबिल डाक्टर दोनों भाई हैं कहीं किसी दूसरे ने इन्हें लपक लिया तो… 15-20 लाख में भी सस्ता सौदा होगा. मकान 3-4 साल बाद ले लेंगे या किराए में जिंदगी काट लेंगे.
यह सब सोचतेसोचते पता नहीं इन के खयालों की उड़ान कहां तक पहुंच जाती. सब से खराबी यह थी कि दोनों भाई एक शब्द नहीं बोले थे. बस, सवाल का जवाब दे रहे थे. यदि लड़का मान जाए तो पटना मेंइस का कौल फिक्स कर ही लाखों कमाया जा सकता है. बड़ा काबिल डाक्टर है.
पता नहीं वे कहां तक और क्याक्या सोचते, मगर उन की सोच पर पत्थर पड़ गया जब मोहन ने फोन पर अपनी पत्नी से बात की. ‘‘सुनो, परसों सुबह अहमदाबाद में हम लोग होंगे, दोपहर औपरेशन का टाइम दे रखा है. सो, परेशान मत होना.’’‘अच्छा, तो मोहन विवाहित है. तो कोई बात नहीं. दूसरा भाई यदि कुंआरा हो तो…’ टूटती उम्मीद के बीच एक चिराग उन्हें दिखने लगा.
‘‘आप दोनों भाई परिवार से इतनी दूर रहते हैं?’’ जितेंद्र न जाने क्यों यह पूछ बैठे.‘‘अकेले कहां हम दोनों अपने परिवार के साथ रहते हैं.’’ डा. मोहन के इस जवाब को सुनते ही जितेंद्र धम्म से बर्थ पर गिर पड़े.उन के शरीर को इस प्रकार पसीने से गीला देख कर दोनों हड़बड़ा गए, ‘‘क्या हुआ जितेंद्रजी, आप की तबीयत तो ठीक है न?’’
‘‘बस, घबराहट हो रही है,’’ वे अपने हृदय को दबाते बोले.‘‘आप लेटिए,’’ कहते हुए डाक्टरों ने उन्हें बैड पर लिटा दिया और उन का बीपी चैक करने लगे. टीटीई फिर आ गया. बीपी की दवा के साथ नींद की गोलियां भी खिला दीं.‘‘अब 4 घंटे बाद इन्हें होश आ जाएगा. हम अहमदाबाद में होंगे,’’ डा. मोहन टीटीई को बता रहे थे.‘‘मगर हुआ क्या?’’ टीटीई ने हैरानी से पूछा.
‘‘पता नहीं, जैसे ही मैं ने कहा कि मैं परिवार के साथ रहता हूं, सुनते ही ये धम्म से बिस्तर पर गिर पड़े.’’‘‘क्या आप के परिवार के बारे में पूछा था?’’ टीटीई ने प्रश्न किया.‘‘जी, पूरे रास्ते हमारे बारे में पूछते रहे हैं,’’ यह बताते हुए डाक्टर का चेहरा अजीब हो रहा था. वहीं टीटीई गंभीर स्वर में बोला, ‘‘कोई बात नहीं, इन की आस की डोर टूट गई है. हर बेटी का बाप आस की डोर टूटने पर ऐसे ही बिखरता है. वही बिखरन है.’’
‘‘क्या मतलब?’’ ये मुंहबाए पूछ बैठे.इस पर टीटीई ने कहा, ‘‘कुछ नहीं, उन्होंने आप में भावी दमाद देख लिया था. सो, आप की शादी की बात सुन कर झटका खा गए.’’
Social Story, सुबह 10 बजे के करीब मीना बूआ अचानक घर आईं और मुझे देखते ही जोशीले लहजे में बोलीं, ‘‘शिखा, फटाफट तैयार हो जा. तू और मैं बाहर घूमने चल रहे हैं.’’
‘‘कहां?’’ मैं ने फौरन खुश हो कर पूछा.
‘‘घर से निकलने के बाद मालूम हो जाएगा. तू जल्दी से तैयार तो हो जा.’’
‘‘क्या मोहित को भी साथ ले चलूं?’’
मैं ने अपने 3 वर्षीय बेटे के बारे में पूछा.
‘‘अरी, उसे उस की नानी संभाल लेंगी.’’
मैं ने सवालिया नजरों से मां की तरफ देखा.
मोहित को रखने के लिए ‘हां’ कहते हुए मां कई दिनों के बाद मेरी तरफ देख कर मुसकराईं.
मीना बूआ के साथ मेरी हमेशा से बहुत अच्छी पटती रही है. स्मार्ट, सुंदर और समझदार होने के साथसाथ उन का स्वभाव भी मस्ती भरा है. फूफाजी को जब से दिल की बीमारी ने पकड़ा है, वे ही उन का बिजनैस सलीके से संभाल रही हैं.
‘‘बूआ, आज फैक्टरी जाना कैसे टाल दिया?’’ घर से बाहर निकलते ही मैं ने पूछा.
‘‘मैं ने सोचा 2-4 दिनों में तू ससुराल लौट जाएगी, तो तेरे साथ घूमने का मौका कहां मिलेगा. तेरे फूफाजी की बीमारी के कारण कभीकभी उदास हो जाती हूं. सोचा, आज तेरे साथ घूमफिर कर गपशप करूंगी, तो मन बहल जाएगा.’’
सचमुच बूआ ने 2 घंटे तक मुझे खूब ऐश कराई. हम ने एक अच्छे रेस्तरां में खायापिया और शौपिंग की.
मैं सोच रही थी कि अब हम घर लौटेंगे, पर बूआ ने एक बहुमंजिला इमारत के सामने गाड़ी रोकी. मेरे कुछ पूछने से पहले ही बूआ झेंपे से अंदाज में मुसकराते हुए बोलीं, ‘‘हम दोनों एक पुराने जानकार से मिलने चल रहे हैं. इस व्यक्ति से आज मैं करीब 15 साल बाद मिलूंगी.’’
‘‘कौन हैं ये व्यक्ति?’’
‘‘राकेश नाम है उन का. वे मेरे साथ कालेज में पढ़े भी हैं और 15 साल पहले हम पड़ोसी भी थे.’’
‘‘फिर क्या ये कहीं बाहर चले गए थे, जो 15 साल तक आप की इन से मुलाकात नहीं हुई?’’ मैं ने कार से उतरते हुए पूछा.
‘‘ये बाहर तो नहीं गए थे, पर हमारे परिवारों के बीच संपर्क नहीं रहा.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘वह तुम हमारी बातें सुन कर समझ जाओगी,’’ बूआ की आंखों में शरारत भरी चमक उभरी, ‘‘बस, तुम राकेश के सामने एक बात का ध्यान रखना.’’
‘‘किस बात का, बूआ?’’
‘‘इस का कि तुम मेरी भतीजी नहीं, बल्कि पड़ोसिन की बेटी हो. तभी वे और मैं खुल कर बातें कर पाएंगे. मैं उन की लच्छेदार बातें सुनने ही इतने सालों बाद आई हूं.’’
‘‘बूआ, चक्कर क्या है, जरा खुल कर बताओ न,’’ मेरी यह बात सुन कर बूआ जिस शोख अदा से हंसीं, वह मुझे उलझन का शिकार बना गई थी. बूआ के करीब हमउम्र 42 साल के राकेश से हम दोनों उन के औफिस में मिलीं.
‘‘माई डियर मीना, व्हाट ए ग्रेट सरप्राइज,’’ उन्होंने खड़े हो कर बूआ का स्वागत किया, ‘‘तुम्हें अचानक सामने देख कर बड़ी खुशी हो रही है. कैसे बना रखा है तुम ने अपने को 15 साल पहले जैसा खूबसूरत, फिट और स्मार्ट?’’
‘‘राकेश, तुम्हारे सिर के बाल कम जरूर हुए हैं, पर झूठी तारीफ कर के किसी भी स्त्री को खुश करने की आदत अभी भी कायम है. कैसी गुजर रही है, जनाब?’’ बूआ ने उन का हाथ हलके से पकड़ कर छोड़ दिया और खुल कर मुसकराती हुई कुरसी पर बैठ गईं.
मेरे झूठे परिचय पर जरा सा ध्यान देने के बाद राकेश मुझे जैसे भूल सा गए. उन की प्रशंसा भरी दृष्टि का केंद्र पूरी तरह से बूआ ही थीं.
उन के बीच पुरानी घटनाओं व पिछले 15 साल की जानकारियों का आदानप्रदान शुरू हो गया. मेरे लिए यह अंदाजा लगाना बिलकुल कठिन नहीं था कि राकेश आज भी बूआ के जबरदस्त प्रशंसक हैं.
‘क्या इन दोनों के बीच में पहले कभी कोई प्यार का चक्कर था?’ यह प्रश्न मेरे मन
में अचानक उभरा, तो मैं मुसकराए बिना नहीं रह सकी.
औफिस में लंचटाइम चल रहा था. राकेश ने हमारे लिए बढि़या कौफी व स्वादिष्ठ पेस्ट्री मंगवाई. उन का बस चलता तो वे मारे उत्साह के अपने हाथ से जबरदस्ती उन्हें पेस्ट्री खिलाने लगते.
‘‘अजय के क्या हाल हैं?’’ राकेश ने फूफाजी के बारे में सवाल पूछा, तो बूआ गंभीर नजर आने लगीं.
बूआ ने उदास स्वर में उन्हें फूफाजी की दिल की बीमारी के बारे में बताया. बिजनैस में इस कारण जो परेशानियां आई थीं, उन की भी चर्चा की.
‘‘अपनी हिम्मत और समझदारी के कारण तुम ने काफी बिजनैस संभाल लिया है, यह सचमुच खुशी की बात है. मैं आता हूं किसी दिन अजय से मिलने,’’ आखिरी वाक्य बोलते हुए राकेश ने बेचैनी भरे अंदाज में बूआ की तरफ देखा.
बूआ ने कोई जवाब नहीं दिया, तो राकेश ने भावुक लहजे में कहा, ‘‘मीना, आगे कोई भी कठिनाई आए, तो तुम मुझे जरूर याद करना. मुझे लगता है कि हमें अब आपस में संपर्क बनाए रखना चाहिए.’’
‘‘श्योर. अब चलने की इजाजत दो.’’
‘‘अपना मोबाइल नंबर तो दे दो और जल्द ही फिर मिलने का वादा कर के जाओ,’’ राकेश ने आगे झुक कर बूआ से हाथ मिलाया और जल्दी से छोड़ा नहीं.
‘‘कुदरत को मंजूर होगा तो जल्द मिलेंगे.’’
‘‘देखो, लंबे समय के लिए फिर से गायब मत हो जाना. पुरानी दोस्ती की जड़ें हमें फिर से मजबूत करनी हैं,’’ बड़े अपनेपन से अपनी इच्छा जाहिर करने के बाद राकेश ने बूआ का मोबाइल नंबर नोट कर लिया.
लिफ्ट से नीचे आते हुए मैं ने बूआ को छेड़ा, ‘‘बूआ, यह बंदा तो आज भी आप पर पूरी तरह से फिदा है. था न आप दोनों के बीच प्यार का चक्कर कभी?’’
‘‘ऐसी बातें किसी और के सामने कभी मत करना, शिखा.’’
‘‘मेरा अंदाजा सही है न?’’
‘‘चुप कर,’’ बूआ ने मुझे प्यार से डपटा.
बूआ की जिंदगी में अजय फूफाजी के अलावा एक अन्य पुरुष भी कभी प्रेमी के रूप में मौजूद रहा है, इस बात को सोच कर मन ही मन अचंभा महसूस करती मैं बूआ की बगल में बैठ गई.
कार को घर की दिशा में न जाते देख मैं ने बूआ से पूछा, ‘‘अब हम कहां जा रहे हैं?’’
‘‘अतीत के एक दोस्त से तुम मिल चुकी हो. अब एक पुरानी सहेली से मिलवाने ले जा रही हूं तुम्हें,’’ बूआ अजीब ढंग से मुसकराईं.
मैं ने उन से वार्त्तालाप करने की कोशिश की पर वे अचानक ‘हूं, हां’ में जवाब देने लगीं. उन के यों अचानक गंभीर हो जाने से मैं ने अंदाजा लगाया कि शायद वे राकेश या अपनी इस पुरानी सहेली के बारे में बातें करने में उत्सुक नहीं हैं.
बूआ ने एक बड़े बंगले के सामने कार रोकी. कुछ देर उन्होंने स्टेयरिंग व्हील पर उंगलियों से इस अंदाज में तबला बजाया मानो सोच रही हों कि उतरूं या नहीं.
फिर उन्होंने मेरे चेहरे को कुछ पलों तक ध्यान से देखने के बाद गंभीर लहजे में कहा, ‘‘चलो, मेरी पड़ोसिन की बिटिया रानी, मेरे अतीत के एक और पृष्ठ को पढ़ने के लिए मेरे साथ चलो.’’
घंटी बजाने पर जिस स्त्री ने दरवाजा खोला वे भी मुझे बूआ की उम्र की ही लगीं. उन के माथे पर पड़े बल और भिंचे होंठ शायद उन के स्वभाव की सख्ती की तरफ इशारा कर रहे थे.
पहली नजर में वे बूआ को पहचान नहीं पाईं. फिर आंखों में पहचान के भाव उठने के साथसाथ पहले हैरानी और फिर नफरत व गुस्से के भाव उभरे.
मैं ने बूआ की तरफ देखा तो पाया कि वे एक मशीनी मुसकराहट होंठों पर बनाए रखने का पूरा प्रयास कर रही हैं.
‘‘पहचाना मुझे, अनीता?’’ बूआ ने असहज लहजे में वार्त्तालाप आरंभ किया.
‘‘तुम मेरे घर किसलिए आई हो?’’
‘‘क्या अंदर आने को नहीं कहोगी?’’ बूआ ने सवाल पूछने से पहले एक गहरी सांस ली थी.
‘‘सौरी, अपने घर के दरवाजे मैं ने बहुत पहले तुम्हारे लिए बंद कर दिए थे.’’
‘‘आज 15 साल बाद भी मुझ से तुम्हारी नाराजगी खत्म नहीं हुई?’’
‘‘जो जख्म तुम ने मुझे दिया था, वह कभी नहीं भरेगा.’’
‘‘शायद मेरे माफी मांगने से भर जाए और यही काम करने मैं आज यहां आई हूं.’’
‘‘जीतेजी तो मैं तुम्हें कभी माफ नहीं कर सकती हूं, मीना.’’
‘‘पर क्यों?’’
‘‘दोस्ती की आड़ में तुम ने मेरे वैवाहिक जीवन की खुशियों को नष्ट करने की कोशिश की थी. मेरे साथ विश्वासघात किया था तुम ने.’’
‘‘मैं अपना अपराध स्वीकार करती हूं. मेरी 15 साल पुरानी गलती को भुला कर मुझे माफ कर दो, अनीता. प्लीज, तुम्हारे माफ कर देने से मेरे दिलोदिमाग को बहुत शांति मिलेगी,’’ बूआ ने उन के सामने हाथ जोड़ दिए.
‘‘मैं चाह कर भी तुम्हें माफ नहीं कर सकती हूं,’’ अनीता की आवाज गुस्से और नफरत की अधिकता के कारण कांप उठी, ‘‘मेरे पति के साथ अवैध संबंध बना कर तुम ने हम पतिपत्नी के प्रेम व विश्वास की नींव को सदा के लिए खोखला कर दिया था. तुम्हारी उस भूल के कारण हम आज तक फिर कभी एकदूसरे के दिल में प्यार की जगह नहीं बना पाए. तुम चली जाओ यहां से. आई हेट यू.’’
अनीता की ऊंची आवाज सुन कर एक किशोर लड़की घर के अंदर से हमारे पास आ पहुंची. उस का चेहरा अनीता की बातें सुन लेने के कारण गुस्से से तमतमा रहा था.
इस वक्त बूआ और अनीता की आंखों में आंसू थे. बूआ ने सहानुभूतिपूर्ण, कोमल अंदाज में अनीता के कंधे पर हाथ रखना चाहा, तो उस लड़की ने बूआ का हाथ झटके से दूर कर दिया.
‘‘मेरी मां को अपने नापाक हाथों से मत छुओ, गंदी औरत,’’ वह लड़की गुस्से से फट पड़ी, ‘‘मैं सब जानती हूं तुम्हारे बारे में. तुम्हारे चक्कर में फंसने के बाद पापा न कभी अच्छे पति बने, न अच्छे पिता. हम तुम्हारी शक्ल कभी नहीं देखना चाहते हैं. भाग जाओ यहां से.’’
‘‘नेहा बेटी, तुम शांत रहो. मैं निबट लूंगी तुम्हारी इस मीना आंटी से,’’ नेहा की पीठ सहलाने के बाद अनीता ने फिर से बूआ को नफरत भरे अंदाज में घूरना शुरू कर दिया.
‘‘नेहा बेटी, तुम्हें मैं ने बहुत लाड़प्यार से अपनी गोद में खिलाया है. हम बड़ों के बीच में बोल कर तुम तो मेरा अपमान करने की कोशिश मत करो,’’ बूआ रोआंसी हो उठीं.
‘‘अगर अपमानित नहीं होना चाहती हो, तो हमारी आंखों के सामने आने से बचना. अगर पापा के साथ मैं ने कभी तुम्हें देख लिया, तो तुम्हारी खैर नहीं.’’
‘‘राकेश के पास अब क्या लौटोगी तुम. अब तक तो दसियों प्रेमी पाल कर छोड़ चुकी होगी तुम,’’ अनीता का स्वर बेहद जहरीला हो गया, ‘‘तुम्हारी तो कोई बेटी नहीं है, तो यह लड़की कौन है? कहीं पुरुषों को फांसने की अपनी कुशलता के बल पर लड़कियों से धंधा तो नहीं…’’
‘‘शटअप,’’ मैं एकाएक चीख पड़ी, ‘‘मेरी बूआ माफी मांगने आई हैं और आप हैं कि बेकार की बकवास करती ही जा रही हैं. ऐसा घटिया व्यवहार आप को शोभा नहीं देता है.’’
‘‘मैं ने तुम्हारी बूआ को 15 साल पहले ही मेरे घर की दहलीज कभी न लांघने को आगाह कर दिया था. अब ले क्यों नहीं जाती हो तुम इन्हें यहां से?’’ मुझ से भी ज्यादा जोर से वह मुझ पर चिल्लाईं और फिर धड़ाम की आवाज के साथ उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया.
वापस कार में आ कर बैठने तक हम दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई. फिर मैं ने बूआ की आंखों में झांका तो वहां मुझे दुख से ज्यादा हैरानी के भाव नजर आए.
‘‘मुझे इन पतिपत्नी व बेटी का ध्यान कभीकभी आता है, पर इन के दिलों में कितना गुस्सा… कितनी नफरत भरी हुई है आज भी मेरे प्रति,’’ बूआ के होंठों पर थकी सी मुसकान उभरी.
‘‘आप को क्या जरूरत थी इन से मिलने आने की?’’ मैं अभी भी तेज गुस्से का शिकार बनी हुई थी.
‘‘तुम्हें साथ ले कर मेरा राकेश व अनीता से मिलने आना मुझे जरूरी लगा था,’’ बूआ ने अर्थपूर्ण अंदाज में मेरी तरफ देखा.
‘‘ऐसा क्यों कह रही हो, बूआ?’’ अपराधबोध की एक तेज लहर अचानक मेरे मन में उठ कर मुझे सुस्त सा कर गई.
‘‘शिखा बेटी, 15 साल पहले मैं ने राकेश से अवैध संबंध बनाने की नासमझी की थी. इस कारण मैं ने अनीता की दोस्ती खो कर उसे सदा के लिए अपना दुश्मन बना लिया. आज उस की बेटी भी मुझ से नफरत करती है.
‘‘तू ने देखा न कि राकेश की दिलचस्पी आज भी मेरे साथ अवैध प्रेम का चक्कर फिर से शुरू करने में है. कुछ पुरुषों का स्वभाव ऐसा ही होता है… शायद तुम्हारा दोस्त नवीन भी इसी श्रेणी का एक दिलफेंक खिलाड़ी है.’’
बूआ की पैनी नजरों का सामना न कर पाने के कारण मैं ने नजरें झुका लीं.
मुझे चुप देख कर बूआ ने मुझे समझाया, ‘‘देख शिखा, तुम्हारी अच्छी सहेली वंदना का भाई तुम्हारी ही तरह शादीशुदा है. कभी तुम दोनों एकदूसरे से प्यार करते थे, पर अब उस प्यार को जिंदा करने की नासमझी मत करो, प्लीज.’’
‘‘ऐसी कोई बात नहीं है, बूआ,’’ झूठ बोलने के कारण मेरी आवाज बेहद भारी सी हो गई थी.
‘‘मुझ से असलियत छिपाने का क्या फायदा है, शिखा? तुम मायके आती हो, तो उस से मिलने जाती हो. वंदना को तुम्हारी ससुराल में लाने व छोड़ने के बहाने नवीन तुम्हारे पति संजय का भी दोस्त बन गया है. बिलकुल ऐसी ही परिस्थितियां 15 साल पहले तब थीं जब मैं ने मर्यादाओं को तोड़ कर राकेश से अवैध संबंध कायम कर लिए थे.’’
मैं ने अपनी सफाई में कुछ बोलने के लिए मुंह खोला ही था कि बूआ उत्तेजित लहजे में आगे बोलीं, ‘‘पहले मुझे अपनी बात पूरी कर लेने दो शिखा. राकेश और मैं भी यही सोचते थे कि हम अपने संबंधोंके बारे में अजय या अनीता को कभी कुछ पता नहीं लगने देंगे, पर ऐसे चक्कर कभी छिपाए नहीं छिपते.
‘‘हमारे उस एक गलत कदम के परिणाम की ही झलक तुम्हें अनीता व नेहा के व्यवहार में दिखी ही है. कहीं सारी बात तुम्हारे फूफाजी को मालूम हो जाती, तो मेरे वैवाहिक जीवन की खुशियों व सुरक्षा की नींव भी जरूर खोखली हो जाती. अपने जीवनसाथी के चरित्र पर लगे धब्बे को भुलाना आसान नहीं होता. नवीन से संबंध बनाए रखने की मूर्खता कर के अपने व उस के वैवाहिक जीवन की खुशियों को दांव पर लगाने का खतरा मत मोल ले, मेरी बच्ची.’’
बूआ ने झुक कर मुझे अपनी छाती से लगाया, तो मेरी आंखों से आंसू बह निकले. मेरा मन अजीब से डर का शिकार हो गया था. रहरह कर अनीता और नेहा की गुस्से व नफरत भरी आंखें याद आ रही थीं. संजय को नवीन और मेरे संबंध की जानकारी लग गई, तो क्या होगा, इस सवाल का जवाब सोचना शुरू करते ही बदन कांप उठा.
‘‘मां ने आप को सब बता कर अच्छा ही किया, बूआ. आप की हिम्मत व समझदारी के कारण, जो मुझे देखनेसुनने को मिला, उस ने मेरी आंखें खोल दी हैं. मैं वादा करती हूं कि गलत राह पर अब मेरा एक कदम भी और नहीं उठेगा,’’ बूआ को यह वादा देते हुए मेरा आत्मविश्वास लौट आया था और निडर भाव से उन की आंखों में देख पाना मेरे दृढ़ निश्चय की घोषणा कर रहा था.
लेखक – Vipin Chachra
Social Story: सुबह. नीले आकाश में उड़ रही चिडि़या. आजाद. लोहे का बड़ा वाला फाटक बंद है. ताकि बच्चों के अभिभावक स्कूटरबाइक ले कर स्कूल के अंदर तक न चले आएं. दाहिने, पिंजड़े के दरवाजे की तरह एक छोटा सा पल्ला खुला है. बगल में खाकी वरदी में रामवृक्ष दरबान खड़ा है. सभी मैडम गंभीर मुद्रा में अपनाअपना सिर तान कर या झुका कर छोटे वाले गेट से अंदर दाखिल हो रही हैं. छोटे बच्चे तो उछलतेकूदते पिंजड़े के भीतर घुसे जा रहे हैं. मगर दरजा 6-7 के 2-4 बच्चों का सिर अंदर जाते समय दरवाजे के फ्रेम से टकरा गया, आउच, हिंदीकोश में एक नया अव्यय.
फिर भी वे खुश हो गए, ‘पंकज देख, मेरी हाइट कितनी हो गई है. तू तो ठिगना का ठिगना ही रह गया.’ स्कूल के सामने स्कूटर और बाइक की जमघट. दोएक रिकशा भी आ कर सवारी उतार कर चलते बन रहे हैं. कोई बच्चा पापा से पितृकर वसूल रहा है चिप्स खाने के लिए, तो किसी के पिताश्री जेब से कंघी निकाल कर बच्चे के बाल संवार रहे हैं.
प्रयाग ने अपनी बाइक एक किनारे खड़ी कर दी. बेटे को गोद में ले कर पिछली सीट से उसे नीचे उतारते, इस के पहले ही पुलकित बाइक से कूद गया.‘‘अरे रे रे बेटा, इतनी भी जल्दी क्या है, कहीं गिर गया तो? तेरी मम्मी मुझे ही डांटेगी,’’ प्रयाग कहते रह गए.
अभी तो हफ्ताभर भी नहीं हुआ उस का एडमिशन हुए. पुलकित है तो चंचल. दिनभर घर में दादा और चाचा को दौड़ाता रहता है. पर स्कूल नाम केइस पिंजड़े के अंदर जाते ही वह एकदम शांत हो जाता है. यहां वह बिलकुल अकेला जो है. अभी दोस्तों से घुलमिल जो नहीं पाया. प्रयाग ने सोचा, बेटे को स्वनिर्भर बनाना है. यह क्या कि रोज डैडी का हाथ थाम कर स्कूल के दरवाजे तक जाए. स्कूलबैग तो पुलकित की पीठ पर था ही. उन्होंने बाइक की हैंडिल से वाटर बौटल निकाल कर उस के हाथ में थमा दिया, ‘‘टाटा बेटा. मम्मी ने कहा था न कि आज से तुम अकेले ही स्कूल के अंदर चले जाओगे?’’
उन की ओर देख कर पुलकित हलका सा मुसकरा दिया, ‘‘बाय डैडी.’’
‘‘वह देखो, रामवृक्ष अंकल है, वह तुम्हें अंदर कर देगा. मेरा बहादुर बेटा, टाटा.’’
सीमा पर जाने वाले जवानों की तरह पुलकित आगे बढ़ता है. प्रयाग बाइक के पास ही खड़े हैं. एक बार सोचा कि मुंह दूसरी ओर कर लें. मगर फिर मन में स्नेह का उफान- आज इतना ही ठीक है. कल से दूसरी ओर ताका करेंगे. मेरे पुलकित को अपने पैरों पर खड़ा होना है. दुनिया बहुत जालिम है. उसे जीना है तो लड़ना होगा. जीवन का दूसरा नाम ही है संघर्ष. जीवन संघर्ष.
‘‘आओ भैया,’’ दरवाजे पर खड़ा रामवृक्ष उसे हाथ पकड़ कर अंदर भेजने लगा, ‘‘आज अकेले आ गए? वाह, मेरे बहादुर बच्चे.’’
छोटे वाले गेट से अंदर जाते समय पुलकित ने एकबार पीछे मुड़ कर देखा, डैडी कहां हैं? ‘‘अरे चलो बेटा, और बच्चों को आने दो.’’ रामवृक्ष उसे हलका सा धकेल कर अंदर कर देता है.
‘क्या मैं भी चला जाऊं? पुलकित तो अंदर पहुंच ही गया,’ प्रयाग इसी ऊहापोह में बाइक के पास खड़ा था.
पुलकित अंदर जा कर बंद गेट के पास आ गया. चेहरे को लोहे की सीखचों से सटा कर वह देखने का प्रयास करने लगा. डैडी, डैडी कहां हैं? दिख नहीं रहे हैं? बस, एक बार टाटा कह देता. बस, एक बार… तब तक सामने एक रिकशा आ गया. उस पर से 2 मैडम उतर आईं. उधर पिं्रसिपल मैडम की कार आ गई. रामवृक्ष चिल्लाने लगा, ‘‘सारे बच्चों, अंदर हो जाओ. गेट खोलना है. यहां कोई खड़े मत रहना. वरना मैडम डांटेंगी.’’
अफरातफरी. बड़े बच्चे बीच में से कार गुजरने लायक जगह छोड़ कर एकतरफ हो गए. अंदर जाते हुए एक मैडम ने पुलकित का हाथ पकड़ लिया, ‘चलो, क्लास में चलो.’ ‘गुड…गुड मौर्निंग टीचर,’ किसी तरह बेचारा वह कह पाया. जातेजाते वह पीछे मुड़ कर देखने लगा, डैडी नहीं दिखेंगे? एक बार भी नहीं? चले गए? डैडी घर वापस चले गए?
पुलकित को कुछ नहीं दिख रहा है. पानी के घर की खिड़कियां यानी पलकें बंद हैं. क्या दिखे? कैसे दिखे? मम्मी याद आ रही है. दादा, दादी, चाचू…चाचू ने कल मुझे साइकिल पर नहीं बिठाया था. भाग गया. कुट्टी, कुट्टी, कुट्टी… ‘‘तुम तो न्यू ऐडमिशन हो, कौन सा क्लास है तुम्हारा?’’ हाथ पकड़ने वाली मैडम पूछती हैं.
पुलकित उंगली से ऊपर की ओर दिखाता है.
‘‘जाओ, क्लास में बैग रख कर नीचे आ जाओ. अभी प्रेयर की घंटी बजेगी.’’
भारी कदमों से पुलकित सीढ़ी चढ़ता है. इतने में घंटी बजती है टनटनटन… आपाधापी, भागदौड़…उसे रौलकौल ग्राउंड में पहुंचना है.
फिर…
एक हवा चली. चलती गई. जिंदगी के कलैंडर के पन्ने उड़ते जा रहे हैं. पलटते जा रहे हैं. फरफरफर… जीवन की हवा के झोंकों ने आज पुलकित को नेताजी सुभाषचंद्र बोस इंटरनैशनल एयरपोर्ट के सामने ला कर खड़ा कर दिया है. पुलकित टैक्सी से अपना सामान उतार रहा है. प्रयाग और पुलकित की मां टैक्सी से उतर कर बगल में खड़े हैं. बेटा जरमनी जा रहा है. उसे जरमनी की डीएएडी स्कौलरशिप मिली है.
पुलकित वहां कालोन के मैक्स प्लैंक इंस्टिट्यूट से प्लैंट बायोटैक्नोलौजी में पीएचडी करने जा रहा है. 2-2 परीक्षाएं पास करना, स्काइप पर सीधे वहां के डा. केनेची से रूबरू हो कर इंटरव्यू देना, अपनी थीसिस के लिए प्रारूप तैयार करना, फिर दिल्ली जा कर मैक्स प्लैंक के बोर्ड के सामने इंटरव्यू देना, लोहे के चने चबाना और किसे कहते हैं? सारे हिंदुस्तान से केवल 15-16 लोगों का सिलैक्शन हो सका. उन में भी वह अकेला है जिसे पूरी पीएचडी वहां से करनी है. बाकी लोग तो एकाध साल के लिए ट्रेनिंग पर या सैंडविच कोर्स के लिए ही जा रहे हैं. अपनी यूनिवर्सिटी, अपने प्रदेश से वह अकेला ही है.
जब 15 दिनों की जरमन भाषा शिक्षा के लिए उसे दिल्ली जाना पड़ा तो उस ने मोबाइल पर मां से कहा था, ‘मां, मुझे तो अभी तक विश्वास ही नहीं हो रहा है कि सचमुच मेरा सिलैक्शन हो गया है.’ मां ने हंस कर समझाया, ‘बस बेटा, मन लगा कर काम करना. तुझे अपना प्रदेश अपने देश का नाम ऊंचा जो करना है, क्यों?’
‘हां, मां.’
फिर तो और ढेर सारी बातें. भारतसेवाश्रम यात्री निवास से मैक्समूलर भवन के लिए निकलने के पहले पुलकित मां से बात कर लेता. फिर बीच में ब्रेक में. अंत में रात में दिनभर की दास्तान…
मां हर रोज वही सवाल, ‘आज तू ने क्या खाया?’ बेटा नाराज हो जाता, ‘हर समय सिर्फ खाने की बात मत पूछा करो. मैं कोई बच्चा हूं क्या?’
‘नहीं, अब तो तू मेरा डैडी बन गया है. मैं ही तेरी बेटी हूं.’
उधर से प्रयाग रूठे हुए बच्चे की तरह कहते, ‘मुझ से तो कोई बात ही नहीं करना चाहता. अब तो इन के लिए मम्मी ही सबकुछ है.’ ‘ले, अपने पापा से बात कर ले. वे रूठ गए हैं.’ पुलकित की मां प्रयाग को मोबाइल थमा देतीं.
‘क्या पापा, आप भी न…मैं तो आप से ही बात करना चाहता हूं. मम्मी तो बस वही दालभातसब्जी की ही बातें करेंगी.’
‘झूठा कहीं का. तेरी दीदी भी फोन करती है तो तेरी मां को. क्यों मैं घर में नहीं हूं? तू ने मुझे फिर मोबाइल खरीद के दिया ही क्यों? उस में भी तो वह फोन कर सकती है.’
ऐसी ही बातें, रूठना, मनाना, हंसना, रोना. जिंदगी का पलपल, क्षणक्षण, चुस्की लगाते हुए पी जाना…
प्रयाग को निहायत औपचारिक बातों से चिढ़ होती है. शादी के बाद शुरूशुरू में बेटी ने पूछा था, ‘डैडी, आप कैसे हैं?’
‘क्यों, मुझे क्या हुआ है?’ यह हाऊ आर यू वाला फौरमल सवाल उन्हें पसंद नहीं. देशदुनिया की ढेर सारी बातें हैं, वो नहीं पूछी जा सकतीं? क्रिकेट से ले कर उत्तराखंड में आए जल प्लावन, काजीरंगा की बाढ़ में फंसे गैंडे, राष्ट्रीय उद्यान में ट्रेन से कट कर हाथियों का मारा जाना, बस्तर में आदिवासियों के साथ छल, क्रांति के छद्म नकाब पहन कर ट्रेन की पटरी उड़ा कर सैकड़ों परिवारों का सर्वनाश करना, दादरी में बेगुनाह मुसलमान की हत्या, प्रयाग बच्चों से तरहतरह की बातें किया करते थेऔर आज भी वही सुनना चाहते हैं. वे पुलकित की मां से भुनभुनाते, ‘मैं क्या कोई बूढ़ा हो गया हूं कि मेरी तबीयत के बारे में पूछताछ की जाए?’
खैर, सभी खुश हैं कि इतने दिनों बाद बेटे की मेहनत रंग लाई. आज अगर पुलकित के दादाजी होते, तो कितना खुश होते. ईमेल में सिलैक्शन की बात पढ़ कर जब पुलकित ने दौड़ कर मां को सीने में जकड़ लिया था, तो सबकुछ सुन कर मारे खुशी के दादी अपनी आंखें पोंछने बैठ गईं. शाम को घर वापस आ कर जब चाचू ने सुना तो उछल पड़े, ‘जिओ, मेरे शेर. आखिर भतीजा किस का है? मैं ने कहा था न, डौंट वरी, देर है, अंधेर नहीं.’ फिर भी प्याला और होंठों के बीच फासला बहुत होता है. नाव किनारे लगतेलगते भी कई बार जाने किनकिन थपेड़ों से किनारे से दूर जाने लगी. पुलकित के पासपोर्ट और हैल्थ सर्टिफिकेट को ले कर मामला फंसने लगा. प्रयाग ने इंटर के बाद ही बेटे का पासपोर्ट बनवा दिया था. उस फोटो में पुलकित की मूछें थीं, और कंपीटिशन के लिए नाम लिखी हुई तख्ती वह छाती के सामने पकड़े हुए था. तो उस फोटो को देख कर जरमन एंबैसी के एक भारतीय औफिसर ने कहा था, ‘यह फोटो तो तुम से एकदम मेल नहीं खाती. अरे भाई, यह तो कैदी जैसा है.’ फोटो में टीशर्ट धारीदार जो थी.
जरमन अधिकारी ने भी कहा, ‘नया पासपोर्ट बना कर लाओ, हम 3 दिनों के अंदर तुम्हें वीजा दे देंगे.’
तो फिर भागदौड़…
उधर यूनिवर्सिटी हैल्थ सैंटर से डीएएडी के प्रारूप पर हैल्थ सर्टिफिकेट लेते समय डाक्टर ने पूछा था, ‘कभी जौंडिस वगैरा कुछ हुआ था?’
पुलकित ने सिर हिलाया, ‘बचपन में एक बार हुआ था.’
डाक्टर ने उस कौलम के आगे ‘नो’ के बजाय ‘यस’ लिख दिया. अब उस सत्यवादी हरिश्चंद्र के कारण वह सर्टिफिकेट जरमनी से ईमेल के जरिए लौटा दिया गया कि उसी डाक्टर से यह लिखवाओ कि ‘तुम्हें अब किसी इलाज की जरूरत नहीं है. तुम बिलकुल स्वस्थ हो.’लो, फिर से एडि़यां रगड़ो. उनींदी रात गुजारो. पापामम्मी दोनों उदास. अब आगे क्या होगा? खैर, भागदौड़ का यह हिस्सा भी खत्म हुआ.
तो, एक ट्रौली पर सामान रख कर पुलकित लगेज चैकिंग वाले काउंटर की ओर जा रहा है. जाने के पहले उस ने डैडी के पैर छुए. मां से देर तक लिपटा रहा. मां की आंखें, तो बस, पानी का बसेरा, पंछी है निगाहें. प्रयाग काफी देर तक उसे सीने से लगाए रहे. अब तो सालभर बाद ही बेटे से मिलना होगा. पुलकित ने उन को कई बार मना किया था, ‘डैडी, मेरी फ्लाइट रात ढाई बजे की है. मुझे 3-4 घंटे पहलेही चैक-इन करना पड़ेगा. आप लोग मेरे साथ दिल्ली के एयरपोर्ट तक जा कर क्या कीजिएगा? आप घर ही पर रहिए न.’
मगर उस की मम्मी ने कहा था, ‘नहीं, हमें तुझे सी औफ करने जाना है.’
दादी और चाचा ने भी वही बात दोहराई, ‘अरे वहां तक तो साथ रहने दे.’ एयरपोर्ट सिक्योरिटी औफिसर ने पुलकित का सामान एक कैरियर बैल्ट पर रख दिया. मैटल डिटैक्टर से हर चीज की चैकिंग होगी. शीशे के दरवाजे के अंदर जा कर उसे अपना सामान ले कर बोर्डिंग पास लेना है. फिर तो घंटों की प्रतीक्षा. जब तकफ्लाइट की घोषणा न हो जाए.
पुलकित हाथ हिलाते हुए शीशे के दरवाजे के अंदर दाखिल हो जाता है. प्रयाग अपनी पत्नी के साथ बाहर खड़े हैं. सामान की चैकिंग हो गई. फिर से ट्रौली पर उन्हें रख कर पुलकित आगे जा रहा है. इधर मुड़मुड़ कर देख रहा है. हाथ हिला रहा है. सामने से किसी फ्लाइट से उतरने वाले यात्रियों की भीड़ चली आ रही है. पुलकित इन की आंखों से ओझल हो गया. प्रयाग बस एक बार बेटे को देख लेने के लिए बाहर लाउंज पर दौड़ रहे हैं.
‘अरे, यह आप क्या कर रहे हैं?’’ पुलकित की मां उन्हें रोकना चाहती है.
कितने सारे लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं. हाथों में भारीभरकम सूटकेस या पीठ पर टूरिस्ट बैग, यूरोपियन, जापानी, अफ्रीकी, हज से लौटने वाले या बुद्धिस्ट- और दूसरे शहरों के यात्री भी.
‘‘वो रहा पुलकित,’’ प्रयाग सामने देखे बिना चले जा रहे हैं. जैसे बचपन में स्कूलगेट के अंदर जाते समय नन्हा पुलकित बारबार पीछे मुड़ कर देखता था. कांच की दीवार के इस पार किसी पिंजड़े में बंद पंछी की तरह प्रयाग इधर से उधर दौड़ रहे हैं.
‘‘अरे रे रे, सर, जरा देख कर चलिए. अभी टक्कर हो जाती,’’ एयरपोर्ट का एक कर्मचारी कई ट्रौलियों को एकसाथ धकेलते हुए एक किनारे लगा रहा था. घरघर की तेज आवाज हो रही थी. प्रयाग उन्हीं से जा टकराए. उस आदमी ने संभाल लिया, वरना… पुलकित की मां दौड़ कर आ पहुंची, ‘‘अभी कुछ हो जाता तो? अब उसे कैसे देख पाइएगा?’’
प्रयाग ने किसी की कोई बात नहीं सुनी. शीशे की दीवार के पार उन की निगाहें पुलकित को बस एक बार और देख लेने को आतुर थीं. मगर वे पुलकित को देखते भी तो कैसे? निगाहें कैद हैं पानी के घर में. आंखों की यह कैसी बेवफाई?
Hindi Kahani: मैं पापी हूं. इस बात को आज मैं सार्वजनिक तौर पर मान रहा हूं. पिछले तकरीबन 40 साल से मैं ने इस बात को अपने सीने में दफन कर रखा है, लेकिन अब जिंदगी की गाड़ी और आगे खिंचती नहीं लगती.
बात उन दिनों की है, जब मेरी जवानी उछाल मार रही थी. मैं ने ‘शहर के मशहूर समाजसेवी श्रीश्री डालरिया मल ने सभा की अध्यक्षता की…’ जैसी रिपोर्टिंग करतेकरते आगरा से निकलने वाली एडल्ट मैगजीन ‘मचलती जवानी’ के लिए भी लिखना शुरू कर दिया था. यह ‘मचलती जवानी’ ही मेरे पाप की जड़ है. एक दिन ‘मचलती जवानी’ के संपादक रसीले लाल राजदार की एक ऐसी चिट्ठी आई, जिस ने मेरी दुनिया ही बदल डाली.
उस चिट्ठी में उन्होंने लिखा था, ‘रहते हैं ऐसे महानगर में, जो सोनागाछी और बहू बाजार के लिए सारे देश मशहूर हैं, और आप हैं कि दमदार तसवीरें तक नहीं भिजवा सकते. भेजिए, भेजिए… अच्छी रकम दिलवा दूंगा प्रकाशक से.’
कैमरा खरीदने के लिए मैं ने सेठजी से कहा कि कुछ पैसे दे दें. यह सुन कर सेठ डालरिया मल ‘होहो’ कर हंसे थे और शाम तक मैं एक अच्छे से कैमरे का मालिक बन गया था.
बहू बाजार की खोली नंबर 34 में एक नई लड़की सीमा आई थी. चेहरा किसी बंबइया हीरोइन से कम न था. एक दिन सीमा नहाधो कर मुंह में पान रख अपने अधसूखे बालों को धीरेधीरे सुलझा रही थी, तभी मैं उस की खोली में जा धमका.
सीमा ने तुरंत दरवाजा बंद कर सिटकिनी लगा दी और बोली, ‘‘मेरा नाम सीमा है. आप अंदर आइए, बैठिए.’’ मैं पलंग पर बैठते हुए बोला, ‘‘देखो, मैं कुछ करनेधरने नहीं आया हूं. बात यह है कि…’’ ‘‘बेवकूफकहीं के… आज मेरी बोहनी खराब कर दी. चल, निकल यहां से,’’ सीमा चीखते हुए बोली थी.
मैं हकबका गया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी. मैं बोला, ‘‘मैं तुम्हारी बोहनी कहां खराब कर रहा हूं? लो ये रुपए.’’
यह सुनते ही सीमा चौंकी. वह बोली, ‘‘मैं मुफ्त के पैसे नहीं लेती.’’
‘‘मैं मुफ्त के पैसे कहां दे रहा हूं? इस के बदले मुझे दूसरा काम है.’’
‘‘दूसरा काम…? क्या काम है?’’
‘‘मैं तुम्हारी कुछ तसवीरें खींचना चाहता हूं…’’
यह सुनना था कि सीमा मेरी बात बीच में ही काट कर ठहाका मार कर हंसी, ‘‘अरे, मां रे. ऐसेऐसे मर्द भी हैं दुनिया में?’’
फिर सीमा मेरी ओर मुखातिब हो कर बोली, ‘‘मेरे तसवीर देखदेख कर ही मजे लेगा… चल, ले खींच. तू भी क्या याद करेगा…
‘‘और पैसे भी रख अपने पास. जरूरत है, तो मुझ से ले जा 10-20.’’ सीमा ने अंगरेजी हीरोइनों को भी मात देने वाले पोजों में तसवीरें खिंचवाईं. वे छपीं तो अच्छे पैसे भी मिले. जब पहला मनीऔर्डर आया, तो उन पैसों से मैं ने उस के लिए साड़ी और ब्लाउज खरीदा.
जब मैं उसे देने गया, तो यह सब देख कर उस की आंखें भर आईं. वह बोली, ‘‘तुम आया करो न.’’ और मैं सीमा के पास आनेजाने लगा. यही मेरा पाप था. उस के लिए कुछ साल पीछे जाना होगा. बात शायद साल 1946 की है. मेरे मातापिता ढाका के धान मंडी इलाके में रहा करते थे, तब मैं प्राइमरी स्कूल की पहली क्लास में भरती हुआ था.
स्कूल घर से एक मील दूर था, लेकिन मैं ने जो रास्ता दोस्तों के साथ कंचे खेलते हुए पता कर लिया था, वह चौथाई मील से भी कम था. मेरे पिता लंबे रास्ते से ले जा कर मुझे स्कूल में भरती करा कर आए. लेकिन अगले दिन से मुझे अकेले ही आनाजाना था और इस के लिए मुझे शौर्टकट रास्ता ही पसंद आया.
बहुत दिनों के बाद देश के बंटवारे के बाद जब मैं कलकत्ता आ गया, तो मुझे पता चला कि उस शौर्टकट रास्ते का नाम गली चांद रहमान था. एक दिन मैं ने जब मां से पूछा, ‘‘मांमां, उस रास्ते में बहुत सारी दीदियां और मौसियां अपनेअपने घरों के सामने बैठी रहती हैं. वे कौन हैं?’’
यह सुन कर मां ने मुझे डपटा था, ‘‘खबरदार, जो दोबारा उस रास्ते से गया तो…’’ इस के बाद 2-3 दिनों तक मैं मेन रोड से आयागया, लेकिन फिर वही गली पकड़ ली.
एक दिन मैं ने मां को जब अच्छे मूड में देखा, तो अपना सवाल दोहरा दिया. वे बोलीं, ‘‘जा, उन्हीं से पूछ लेना.’’
एक मौसी मुझ से हर रोज बोला करती थीं, ‘‘ऐ लड़के, बदरू चाय वाले को बोल देना तो, लिली 4 कप चाय मांग रही है.’’ वे कभी मुझे एक पैसा देतीं, तो कभी 2 पैसे दिया करती थीं.
अगले दिन मैं ने हिम्मत कर के लिली से ही पूछ लिया, ‘‘मेरी मां ने पूछा है कि आप लोग कौन हैं?’’
मेरा यह सवाल सुन कर लिली के अलावा और भी मौसियां और दीदियां हंस पड़ीं. उन में से एक बोली थी, ‘‘बता देना, हम लोग धंधेवालियां हैं.’’
मां को जब एक दिन फिर अच्छे मूड में देखा, तो उन को बताया, ‘‘मां, वे कह रही हैं कि धंधेवालियां हैं.’’ लेकिन मां शायद अंदर से जलभुनी बैठी थीं. वे बोलीं, ‘‘जा, उन से यह भी पूछना कि कैसा चल रहा है धंधा?’’
मैं ने वाकई यह बात पूछ डाली थी. इस के जवाब में लिली ने हंस कर कहा था, ‘‘जा कर कह देना उन से कि बड़ा अच्छा चल रहा है. इतना अच्छा चल रहा है कि सलवार पहनने की भी फुरसत नहीं मिलती.’’ यह जवाब सुन कर मां ने इतनी जोर से तमाचा मारा था कि गाल सूज जाने की वजह से मैं कई दिनों तक स्कूल नहीं जा पाया था.
एक दिन पता नहीं क्या बात हुई कि लंच टाइम में ही छुट्टी हो गई. मास्टर ने कहा, ‘‘सभी सीधे घर जाना. संभल कर जाना.’’
जब मैं गली चांद रहमान से निकल रहा था, तो पाया कि सारी गली में सन्नाटा पसरा था. सिर्फ लिली मौसी ही दरवाजे पर खड़ी थीं और काफी परेशान दिख रही थीं. मुझे देखते ही वे बोलीं, ‘‘तू हिंदू है?’’ हिंदू क्या होता है, तब मैं यह नहीं जानता था, इसलिए चुप रहा.
वे फिर बोलीं, ‘‘सब्जी वाले महल्ले में रहता है न. वहां दंगा फैल गया है. जब तक सब ठीक न हो जाए, तू यहीं छिपा रह.’’ कर्फ्यू लग गया था. 3 दिनों के बाद हालत सुधरी और कर्फ्यू में ढील हुई, तो लिली ने बताया, ‘‘सब्जी वाले महल्ले में एक भी हिंदू नहीं है. लगता है, जो मारे जाने से बच गए हैं, वे कहीं और चले गए हैं.’’
अगले दिन वे मुझे ले कर मेरे टोले में गईं, लेकिन वहां कुछ भी नहीं था, सिर्फ जले हुए मकान थे. यह देख कर मैं रोने लगा. वे मुझे अपने साथ ले आईं और अपने बेटे की तरह पालने लगीं.
तकरीबन सालभर बाद की बात है. मैं गली में गुल्लीडंडी खेल रहा था, तभी कानों में आवाज आई, ‘‘अरे सोनू, तू यहां है? ठीक तो है न? तुझे कहांकहां नहीं ढूंढ़ा.’’ देखा कि मेरी मां और पिता थे. पिता बोले, ‘‘चल, देश आजाद हो गया है. हम लोगों को उस पार के बंगाल जाना है.’’
तब तक लिली भी बाहर आ गई थीं. उन की आंखों में छिपे आंसुओं को सिर्फ मैं ने ही महसूस किया था. अब आज में लौट आते हैं. सीमा ने पहले दिन के बाद मुझ से कभी कोई पैसा नहीं लिया, बल्कि हर बार देने की कोशिश की.
मैं उस के जरीए एक बच्चे का बाप भी बन गया और देखते ही देखते वह लड़का एक साल का हो गया. एक दिन दोपहर को उस के पास गया, तो वह बोली, ‘‘ऊपर से पेटी उतारना तो… मेरी मां ने मुझे चांदी के कंगन दिए थे. कहा था, तेरा बच्चा होगा तो मेरी तरफ से उसे पहना देना.’’
पेटी उतारी गई. कई तरह के पुराने कपड़े भरे हुए थे. उस ने सारी पेटी फर्श पर उलट दी और कहा, ‘‘लगे हाथ सफाई भी हो जाएगी.’’ ट्रंक के नीचे बिछाया गया अखबार उलट कर मैं पढ़ने लगा. तभी उस में से एक तसवीर निकल कर नीचे गिरी. मैं ने उठाई. चेहरा पहचाना हुआ लगा.
मैं ने पूछा, ‘‘ये कौन हैं?’’
‘‘मेरी मां है.’’
‘‘क्या तुम्हारी मां धान मंडी में रहती थीं?’’ मैं ने चौंक कर पूछा.
‘‘हां, तुम को कैसे मालूम?’’ सीमा ताज्जुब से मुझे देखने लगी.
मैं ने पूछा, ‘‘क्या तुम्हारी मां का नाम लिली है?’’
‘‘हां, लेकिन यह सब तुम को कैसे मालूम?’’ सीमा की हैरानी बढ़ती जा रही थी.
लेकिन उस के सवाल के जवाब में मैं ने बहुत बड़ी बेवकूफी कर दी. मैं ने जोश में आ कर बता दिया, ‘‘मैं भी धान मंडी का हूं. बचपन में तुम्हारी मां ने मुझे अपने बेटे की तरह पाला था.’’
यह सुनना था कि सीमा का चेहरा सफेद हो गया. उस दिन के बाद से सीमा गुमसुम सी रहने लगी थी. एक दिन वह बोली, ‘‘भाईबहन हो कर हम लोगों ने यह क्या कर डाला? कैसे होगा प्रायश्चित्त?’’ पर इस का कोई जवाब होता, तब न मैं उस को देता.
कुछ दिनों बाद मुझे बिहार में अपने गांव जाना पड़ गया. तकरीबन एक महीने बाद मैं लौटा, तो पता चला कि सीमा ने फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली थी. हमारा बेटा कहां गया, इस का पता नहीं चल पाया. अनजाने में हो गए पाप का सीमा ने तो जान दे कर प्रायश्चित्त कर लिया था, लेकिन मैं बुजदिल उस पाप को आज तक ढो रहा हूं. मेरे घर के पास ही फकीरचंद रहता था. वह टैक्सी ड्राइवर था. वह एक अच्छा शायर भी था. मेरी तरह उस का भी आगेपीछे कोई नहीं था. सो, हम दोनों में अच्छी पट रही थी.
मैं जोकुछ लिखता था, उस का पहला पाठक वही होता था. एक दिन वह मेरे लिखे को पढ़ने लगा. वह ज्योंज्यों मेरा लिखा पढ़ता गया, उस की आंखें आंसुओं से भरती जा रही थीं और जब पढ़ना पूरा हुआ, तो देखा कि वह फफकफफक कर रो रहा था. मैं ने हैरान होते हुए पूछा, ‘‘अरे, तुम को क्या हो गया फकीरचंद?’’
वह भर्राए गले से बोला, ‘‘हुआ कुछ नहीं. सीमा का बेटा मैं ही हूं.’’
Social Story: विद्युत विभाग में जूनियर इंजीनियर प्रियंका जब विभागीय प्रमोशन के बाद पहली बार अधिकारी की कुरसी पर बैठी तो लगा मानो सारे विभाग की पावर उस के हाथों में आ गई. एक नई ऊर्जा, नए जोश और ईमानदार सोच के साथ जब उस ने 7 साल पहले जूनियर इंजीनियर के रूप में जौइन किया था तो कुछ ही दिनों में विभाग में फैले भ्रष्टाचार व कर्मचारियों में फैली कामचोरी की आदत ने उस के कोमल मन को बेहद आहत कर दिया था.
जूनियर होने के नाते उस के पास अपने फैसले लेने के अधिकार नहीं थे और नई होने या फिर शायद महिला होने के नाते भी उसे अधिक जिम्मेदारी वाले काम भी नहीं दिए जाते थे, इसलिए भी वह मन मसोस कर रह जाती थी. उन्हीं दिनों उस ने ठान लिया था कि जिस दिन उस के पास अधिकार और फैसले लेने की पावर आ जाएगी उसी दिन से वह आम लोगों में अति भ्रष्ट विभाग की छवि के नाम से कुख्यात इस विभाग की कालिख को धोने का प्रयास करेगी.
7 साल के लंबे इंतजार के बाद उसे यह प्रमोशन मिला है और सीट भी वह जिसे विभागीय भाषा में मलाईदार कहा जाता है. जाहिर सी बात है कि घर में खुशी का माहौल था. पति शेखर ने अपने खास दोस्तों और नजदीकी रिश्तेदारों के लिए एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया. सभी यारदोस्त बधाइयों के साथसाथ विद्युत विभाग में अटके अपने काम करवाने के लिए सिफारिश भी कर रहे थे. साथ ही साथ, विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों व कर्मचारियों को भी कोस रहे थे.
रात को शेखर ने प्रियंका को बाहों में भरते हुए कहा, ‘‘तो भई, हम भी अफसर बीवी के पति हो गए अब. हमारा भी कुछ तो रुतबा बढ़ा ही होगा. आप को मलाई मिलेगी तो कुछ खुरचन हमारे भी हिस्से में आएगी ही.’’
पति की महत्त्वाकांक्षा और ऊंचे सपने देख कर प्रियंका सोच में पड़ गई, ‘लगता है युद्ध की शुरुआत घर से ही करनी पड़ेगी.’ यह सोचतेसोचते उसे नींद आ? गई.
सुबह साढ़े 9 बजे तक औफिस की गाड़ी नहीं आई तो प्रियंका ने ड्राइवर को फोन लगाया तो ड्राइवर बोला, ‘‘बस मैडम, रास्ते में ही हूं. अभी पहुंच रहा हूं.’’
‘पूरे कुएं में ही भांग घुली हुई है,’ ड्राइवर का उत्तर सुन कर प्रियंका खीझ उठी. लगभग 10 बजे ड्राइवर गाड़ी ले कर आया तो प्रियंका ने सख्ती से कहा, ‘‘विभाग ने यह गाड़ी 24 घंटे के लिए अनुबंधित की है. मुझे 9 बजे गाड़ी घर के सामने चाहिए, याद रहे, वरना सिर्फ एक नोटिस पर गाड़ी हटा दूंगी.’’
औफिस में, जैसा कि वह शुरू के दिनों से देखती आई थी, अभी तक कोई कर्मचारी नहीं पहुंचा था. मगर तब उस के पास अधिकार नहीं था उन पर सख्ती करने का. आज वक्त बदल चुका था. उस ने चपरासी से हाजिरी रजिस्टर अपने पास मंगवा लिया. 11 बजतेबजते कर्मचारियों का एकएक कर आना शुरू हुआ. जब सब आ चुके तो उस ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी, ‘‘चूंकि आज मेरे साथ आप का पहला दिन है इसलिए समझा रही हूं. कल से जिसे औफिस टाइम में अगर कोई पर्सनल काम हो तो कैजुअल लीव ले कर आराम से अपने काम करे और जिसे ड्यूटी करनी है वह समय से औफिस आ जाए.’’
अब तक सरकारी कार्यालय को आरामगाह समझते आए कर्मचारियों के लिए यह 440 वोल्ट का झटका था. कुछ वरिष्ठ कर्मचारी तो यह भी हजम नहीं कर पा रहे थे कि इतनी कम उम्र की बौस और वह भी एक महिला. सभी तिलमिला गए. रोष में भरे कामचोर कर्मचारी प्रियंका के खिलाफ गुटबाजी करने लगे. ऐसा नहीं था कि सभी लोग भ्रष्ट और कामचोर थे, कुछ ईमानदार लोग भी थे मगर उन्हें दूसरे कर्मचारी ‘विभाग का चमचा’ कह कर पथभ्रष्ट करने की कोशिश करते थे, उन्हें चिढ़ाते थे. उन्होंने प्रियंका की निष्ठा और लगन का सम्मान किया. शायद, वे बरसों से ऐसे ही किसी अधिकारी की तलाश कर रहे थे जिस के साथ काम कर के वे अपने जमीर को जवाब दे सकें, मन की संतुष्टि पा सकें.
प्रियंका के औफिस का तकनीकी सहायक राकेश भी उन्हीं में से एक था. तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त राकेश अपने काम में बेहद होशियार था. यही नहीं, औफिस के अन्य रूटीन काम भी वह बखूबी कर लेता था. एक सौम्य मुसकान हमेशा उस के चेहरे पर रहती थी. उस के पास काम करने के कई तरीके होते थे, न करने का कोई बहाना नहीं. जल्दी ही प्रियंका का भरोसा जीत लिया था उस ने.
धीरेधीरे सारा स्टाफ 2 खेमों में बंट गया. एक काम करने वालों का और एक काम को अटकाने वालों का. मगर राकेश का साथ मिलने से प्रियंका का हौसला मजबूत होता गया और काम न करने वालों को अकसर मुंह की खानी पड़ती.
एक दिन प्रियंका के पास एक फोन आया. उस व्यक्ति ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा, ‘‘मैडम, पिछले एक महीने से आप के कर्मचारी मेरी फैक्टरी को विद्युत कनैक्शन नहीं दे रहे. मैं रिश्वत नहीं देता, इसलिए वे फाइल पर बारबार औब्जैक्शन लगा कर वापस भेज देते हैं. अगर मैं रिश्वत नहीं दूंगा तो क्या मेरा काम नहीं होगा?’’
‘‘आप कल सुबह अपनी फाइल ले कर मेरे औफिस आइए,’’ प्रियंका ने संयत स्वर में कहा.
प्रियंका ने पूरी फाइल को ध्यान से पढ़ा और उस में जो औपचारिक कमियां थीं वे उसे समझाईं. साथ ही, कहा कि इन्हें दूर कर के फाइल मेरे पास लाइए. आप का काम हो जाएगा.
2 दिनों बाद वह व्यक्ति फाइल कंपलीट कर के हाजिर हुआ. प्रियंका ने स्टाफ को कनैक्शन जारी करने के आदेश दिए मगर चूंकि स्टाफ पहले भी इस तरह के काम के लिए रिश्वत लेता रहा है इसलिए बिना पैसे काम करना उन्हें बहुत अखर रहा था. एक तरह से उस व्यक्ति के सामने वे अपनेआप को बेइज्जत सा महसूस कर रहे थे. स्टाफ में किसी ने तबीयत खराब होने का बहाना बनाया तो किसी ने जरूरी काम का बहाना बना कर आधे दिन की छुट्टी ले ली. प्रियंका परेशान हो गई. तभी राकेश ने कहा, ‘‘आप फिक्र न करें, मैं हूं न. मैं करवा दूंगा.’’
‘‘मगर तुम अकेले कैसे करोगे? जानते हो न कि कितना रिस्की काम है. बिजली किसी की दोस्त नहीं होती, जरा सी चूक जान पर भारी पड़ सकती है,’’ प्रियंका ने कहा.
‘‘मैं पूरी सेफ्टी के साथ काम करूंगा,’’ राकेश ने उसे आश्वस्त किया.
पता नहीं क्यों जब तक राकेश का फोन नहीं आया कि काम हो गया है तब तक उस की सांसें अटकी रहीं. जैसे ही राकेश का फोन आया, उस ने राहत की सांस ली. काम होने के बाद प्रार्थी ने प्रियंका को धन्यवाद देते हुए फोन किया और कहा, ‘‘मैं ने इस विभाग में पहली बार ऐसा अफसर देखा है. आप अपनी यह सोच बनाए रखें.’’ सुन कर प्रियंका मुसकरा दी.
ऐसे न जाने कितने ही नाजुक मौकों पर राकेश प्रियंका के विश्वास पर खरा उतरा था. प्रियंका उसे थैंक्यू कहती और राकेश बस मुसकरा देता. एक बेनाम से रिश्ते की कोंपलें फूट रही थीं दोनों के दिलों में.
नया काम, नई जिम्मेदारियां, औफिस का पहले से बिगड़ा हुआ ढर्रा और स्टाफ के असहयोगात्मक रवैये से प्रियंका परेशान हो जाती थी. घर पहुंचते ही बच्चों की फरमाइशें और फिर रात में पति की इच्छाएं. सबकुछ इतना थका देने वाला होता था कि कभीकभी सोचने लगती, ‘प्रमोशन के नाम पर अच्छी मुसीबत गले पड़ गई. इस से तो जूनियर ही ठीक थी. कम से कम दिल का सुकून तो था.’ मगर अगले ही दिन फिर उसी जोश और हिम्मत के साथ काम पर जुट जाती.
औफिस में काफीकुछ व्यवस्थित हो चला था. हर रिकौर्ड, हर फाइल अपडेट हो गई थी. सिर्फ एक कर्मचारी रामदेव के अलावा सब अपनाअपना काम भी जिम्मेदारी से करने लगे थे. कुल मिला कर प्रियंका को संतोषजनक लग रहा था.
दीवाली का त्योहार नजदीक आ गया. सभी विद्युत लाइनों और ट्रांसफौर्मरों की सालाना मेंटेनैंस करवानी थी. दिनभर शहर में घूमतेघूमते प्रियंका थक जाती थी.
एक दिन वह अपनी टीम को साइट पर भेज कर खुद औफिस के आवश्यक कागजात निबटा रही थी. अपनी मदद के लिए उस ने राकेश को भी रोक लिया था. काम निबटातेनिबटाते बाहर अंधेरा सा हो गया. वह अपने चैंबर में थी और राकेश अपनी सीट पर. तभी राकेश
2 कप कौफी ले आया. उसे सचमुच इस की बहुत जरूरत थी. राकेश ने कहा, ‘‘आप इतना टैंशन न लिया करें. सरकारी कामकाज ऐसे ही चलते रहते हैं. यों बेवजह परेशान होती रहीं तो कोई बीमारी पाल लेंगी. अगर आप को मुझ पर भरोसा हो तो बाहर के काम आप मुझे सौंप सकती हैं.’’
अचानक राकेश उठा और स्नेह से उस के कंधे पर हाथ रख कर बोला, ‘‘आप घर जाइए, सुबह आप को ये सारे कागजात तैयार मिलेंगे.’’ न जाने क्या था उन आंखों में कि प्रियंका ने अपना सिर उस भरोसेमंद हाथ पर टिका दिया.
दीवाली वाले दिन सुबहसुबह ही शिकायत मिली कि वाल्मीकि बस्ती में ट्रांसफौर्मर जल गया. प्रियंका इस इमरजैंसी को अटैंड कर के घर लौटी तो डाइनिंग टेबल पर ढेर सारे पटाखे, मिठाइयां और कई गिफ्ट देख कर चौंक गई. शेखर ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘भई, इतने दिनों में आज पहली बार लग रहा है कि सरकारी अफसर के अलग ही ठाठ होते हैं. तुम्हारे जाते ही ठेकेदारों की लाइन लग गई. और देखो, घर गिफ्ट से भर गया.’’
‘‘हमें इस में से कुछ भी नहीं रखना है,’’ कहते हुए प्रियंका ने एकएक कर सारे ठेकेदारों को फोन कर के सारा सामान वापस ले जाने की सख्त हिदायत दे दी. शेखर को पत्नी से ऐसी उम्मीद न थी. उस ने उसे काफी भलाबुरा सुना दिया. बच्चों के मुंह उतर गए, सो अलग. त्योहार का सारा मजा किरकिरा हो गया. बच्चे तो खैर थोड़ी देर में सबकुछ भूल गए मगर शेखर ने अगले कई दिनों तक उस से सीधेमुंह बात नहीं की.
दीवाली निबटते ही मौजूदा वित्तीय वर्ष के बकाया टारगेट पूरे करने का प्रैशर बनने लगता है. प्रियंका को भी स्पैशल विजिलैंस चैकिंग के टारगेट दिए गए. राकेश भी उस के साथ ही होता था. एक दिन चैकिंग करतेकरते शहर से बाहर बने एक बड़े से फार्महाउस के बाहर उन्होंने गाड़ी रोकी. साफसाफ बिजली चोरी का केस था. प्रियंका ने विजिलैंस शीट भर कर 5 लाख रुपए का जुर्माना लगा दिया. फार्महाउस का मालिक शहर के विधायक का रिश्तेदार था. विधायक ने फोन पर प्रियंका को मामला
रफादफा करने के लिए दबाव डाला. प्रियंका ने इनकार कर दिया. बात उच्च अधिकारियों तक पहुंची तो उन्होंने भी प्रियंका को समझाया कि पानी में रह कर मगरमच्छ से बैर ठीक नहीं. शेखर ने भी डराया कि कहीं दूरदराज ट्रांसफर न हो जाए. मगर उस पर तो ईमानदारी का जनून सवार था.विधायक के रिश्तेदार ने पैनल्टी जमा नहीं करवाई तो प्रियंका ने फार्महाउस का कनैक्शन काटने का आदेश जारी कर दिया. कर्मचारियों ने विधायक के डर से वहां जाने से मना कर दिया तो राकेश के साथ पुलिस प्रोटैक्शन ले कर प्रियंका स्वयं गई. वहां मौजूद विधायक के आदमियों ने प्रियंका से बदतमीजी करने की कोशिश की. पुलिस चुपचाप खड़ी उन की आपसी बहस देख रही थी. तभी एक गुंडाटाइप आदमी आगे बढ़ा और प्रियंका के दुपट्टे की तरफ हाथ बढ़ाया. राकेश ने उसे प्रियंका तक पहुंचने से पहले ही मजबूती से पकड़ लिया. प्रियंका को जीप में बैठने का इशारा किया और ड्राइवर के साथ गाड़ी रवाना कर दी. प्रियंका की आंखें छलछला उठीं मगर उन आंसुओं में राकेश के प्रति अनुराग भी शामिल था.
यह केस अभी लोगों में चर्चा का विषय बना ही हुआ था कि अचानक जैसे प्रियंका की जिंदगी में तूफान आ गया. उस का कर्मचारी रामदेव एक ठेकेदार की टैंडर फाइल पास करने के एवज में रिश्वत लेते हुए रंगेहाथों पकड़ा गया. पुलिस को दिए अपने बयान में उस ने कहा कि यह काम वह प्रियंका मैडम के लिए करता है. उस के बयान के आधार पर प्रियंका को भी गिरफ्तार कर लिया गया. विभागीय नियमानुसार उसे निलंबित कर दिया गया. अखबारों ने सुर्खियों में इस खबर को प्रकाशित किया. महल्ले वाले कनखियों से देखदेख कर मुसकराते. सामने तो सहानुभूति दिखाते मगर पीठपीछे कई तरह की बातें करते. कोई कहता, ‘बड़ी ईमानदार बनती थी, आ गई न असलियत सामने.’ किसी ने कहा, ‘जितना रिश्वत ले कर कमाया था, सारा कोर्टकचहरी की भेंट चढ़ जाएगा, बदनामी हुई सो अलग.’ जितने मुंह उतनी बातें. कहते हैं न कि ‘मारने वाले का हाथ पकड़ा जा सकता है मगर बोलने वाले की जबान नहीं.’
बच्चों के दोस्त उन्हें स्कूल में चिढ़ाते. शेखर के औफिस में भी सब चटकारे लेले कर बातें करते. प्रियंका बुरी तरह से आहत थी. तन से भी और मन से भी. कुल मिला कर अब वह खुद भी इसे अपनी ईमानदारी और काम के प्रति निष्ठा की सजा मानने लगी थी. शेखर को भी सारा दोष उसी में दिखाई देता था. आएदिन उसे ताना देता था कि क्या जरूरत थी हरिशचंद्र की औलाद बनने की. अच्छीभली घर में आती कमाई का अपमान किया. यह उसी का नतीजा है. आपसी नाराजगी के चलते शेखर और उस के रिश्ते में भी ठंडापन आ गया था. आजकल उन में आपस में भी बहुत कम बात होती थी.
दम तोड़ती हुई मछली सी प्रियंका के लिए राकेश जैसे पानी की बूंद बन कर आया. शेखर के लाख मना करने के बावजूद, एक बड़े वकील से मिल कर उस ने प्रियंका से उस के निलंबन के खिलाफ कोर्ट में याचिका दाखिल करवाई. व्यक्तिगत प्रयास कर के उन तमाम उपभोक्ताओं और ठेकेदारों से प्रियंका के पक्ष में गवाही दिलवाई जिन के अटके हुए काम और लटके हुए बिलों का भुगतान प्रियंका ने बिना रिश्वत लिए करवाए थे. उसी के समझाने पर स्टाफ में भी कई लोगों ने अपनी अधिकारी के पक्ष में बयान दिए.
उन्हीं बयानों में यह बात भी निकल कर सामने आई कि रामदेव आदतन इस तरह की हरकतें करता है. वह अकसर मैडम के खिलाफ साजिशें रचता रहता था. यही नहीं, प्रियंका से पहले भी वह कई अधिकारियों को परेशान कर चुका था. स्वयं रामदेव अदालत में प्रियंका के खिलाफ सुबूत नहीं पेश कर सका. काफी लंबी कानूनी लड़ाई चली. सभी गवाहों को सुनने और सुबूतों को देखने के बाद कोर्ट की कार्यवाही तो पूरी हो गई थी मगर कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.
आज प्रियंका की याचिका पर फैसले का दिन है. राकेश ने उसे कोर्ट जाने के लिए मना कर दिया क्योंकि वह जानता था कि अगर कोर्ट का फैसला प्रियंका के हक में नहीं आया तो वह बिखर जाएगी. सचाई और ईमानदारी पर से उस का विश्वास उठ जाएगा. राकेश वकील के साथ कोर्ट गया.
दोपहर के लगभग 3 बजे दरवाजे की घंटी बजने पर प्रियंका ने सेफ्टीहोल से झांक कर देखा. राकेश का उतरा हुआ चेहरा देख कर उस के पांव वहीं जम गए. दोबारा घंटी बजने पर उस ने बुझे मन से दरवाजा खोला. राकेश चुपचाप खड़ा था. उस ने कोर्ट का फैसला उसे थमा दिया. प्रियंका ने कांपते हाथों में पकड़ कर डबडबाई आंखों से उसे पढ़ा. यह क्या, कोर्ट ने मुझे बेकुसूर मानते हुए बाइज्जत बरी कर दिया. पढ़तेपढ़ते प्रियंका फूटफूट कर रो पड़ी. राकेश ने उसे बांहों में थाम लिया. प्रियंका ने भी आज अपनेआप को रोका नहीं. न जाने कितना दर्द, कितना लावा था जिसे आज बहना था. आज जीत हुई थी, सचाई की, विश्वास की, ईमानदारी की, दोस्ती की.