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Story in Hindi: सही सजा – मठ की जायदाद

Story in Hindi. पुरेनवा गांव में एक पुराना मठ था. जब उस मठ के महंत की मौत हुई, तो एक बहुत बड़ी उलझन खड़ी हो गई. महंत ने ऐसा कोई वारिस नहीं चुना था, जो उन के मरने के बाद मठ की गद्दी संभालता.

मठ के पास खूब जायदाद थी. कहते हैं कि यह जायदाद मठ को पूजापाठ के लिए तब के रजवाड़े द्वारा मिली थी.

मठ के मैनेजर श्रद्धानंद की नजर बहुत दिनों से मठ की जायदाद पर लगी हुई थी, पर महंत की सूझबूझ के चलते उन की दाल नहीं गल रही थी.

महंत की मौत से श्रद्धानंद का चेहरा खिल उठा. वे महंत की गद्दी संभालने के लिए ऐसे आदमी की तलाश में जुट गए, जो उन का कहा माने. नया महंत जितना बेअक्ल होता, भविष्य में उन्हें उतना ही फायदा मिलने वाला था.

उन दिनों महंत के एक दूर के रिश्तेदारी का एक लड़का रामाया गिरि मठ की गायभैंस चराया करता था. वह पढ़ालिखा था, लेकिन घनघोर गरीबी ने उसे मजदूर बना दिया था.

मठ की गद्दी संभालने के लिए श्रद्धानंद को रामाया गिरि सब से सही आदमी लगा. उसे आसानी से उंगलियों पर नचाया जा सकता था. यह सोच कर श्रद्धानंद शतरंज की बिसात बिछाने लगे.

मैनेजर श्रद्धानंद ने गांव के लोगों की मीटिंग बुलाई और नए महंत के लिए रामाया गिरि का नाम सु?ाया. वह महंत का रिश्तेदार था, इसलिए गांव वाले आसानी से मान गए.

रामाया गिरि के महंत बनने से श्रद्धानंद के मन की मुराद पूरी हो गई. उन्होंने धीरेधीरे मठ की बाहरी जमीन बेचनी शुरू कर दी. कुछ जमीन उन्होंने तिकड़म लगा कर अपने बेटेबेटियों के नाम करा ली. पहले मठ के खर्च का हिसाब बही पर लिखा जाता था, अब वे मुंहजबानी निबटाने लगे. इस तरह थोड़े दिनों में उन्होंने अपने नाम काफी जायदाद बना ली.

रामाया गिरि सबकुछ जानते हुए भी अनजान बना रहा. वह शुरू में श्रद्धानंद के एहसान तले दबा रहा, पर यह हालत ज्यादा दिन तक नहीं रही.

जब रामाया गिरि को उम्दा भोजन और तन को आराम मिला, तो उस के दिमाग पर छाई धुंध हटने लगी. उस के गाल निकल आए, पेट पर चरबी चढ़ने लगी. वह केसरिया रंग के सिल्क के कपड़े पहनने लगा. जब वह माथे और दोनों बाजुओं पर भारीभरकम त्रिपुंड चंदन लगा कर कहीं बाहर निकलता, तो बिलकुल शंकराचार्य सा दिखता.

गरीबगुरबे लोग रामाया गिरि के पैर छू कर आदर जताने लगे. इज्जत और पैसा पा कर उसे अपनी हैसियत समझ में आने लगी.

रामाया गिरि ने श्रद्धानंद को आदर के साथ बहुत समझाया, लेकिन उलटे वे उसी को धौंस दिखाने लगे.

श्रद्धानंद मठ के मैनेजर थे. उन्हें मठ की बहुत सारी गुप्त बातों की जानकारी थी. उन बातों का खुलासा कर देने की धमकी दे कर वे रामाया गिरि को चुप रहने पर मजबूर कर देते थे. इस से रामाया गिरि परेशान रहने लगा.

एक दिन श्रद्धानंद मठ के बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे. चाय खत्म हुई कि वे कुरसी से लुढ़क गए. किसी ने पुलिस को खबर कर दी. पुलिस श्रद्धानंद की लाश को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहती थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भेद खुलने का डर था, इसलिए रामाया गिरि थानेदार को मठ के अंदर ले गया और लेदे कर मामले को रफादफा करा दिया.

श्रद्धानंद को रास्ते से हटा कर रामाया गिरि बहुत खुश हुआ. यह उस की जिंदगी की पहली जीत थी. उस में हौसला आ चुका था. अब उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं थी.

रामाया गिरि नौजवान था. उस के दिल में भी आम नौजवानों की तरह तमाम तरह की हसरतें भरी पड़ी थीं. खूबसूरत औरतें उसे पसंद थीं. सो, वह पूजापाठ का दिखावा करते हुए औरत पाने का सपना संजोने लगा.

उन दिनों मठ की रसोई बनाने के लिए रामप्यारी नईनई आई थी. उस की एक जवान बेटी कमली भी थी. इस के बावजूद उस की खूबसूरती देखते ही बनती थी. गालों को चूमती जुल्फें, कंटीली आंखें और गदराया बदन.

एक रात रामप्यारी को घर लौटने में देर हो गई. मठ के दूसरे नौकर छुट्टी पर थे, इसलिए कई दिनों से बरतन भी उसे ही साफ करने पड़ रहे थे.

रामाया गिरि खाना खा कर अपने कमरे में सोने चला गया था, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. चारों ओर खामोशी थी. आंगन में बरतन मांजने की आवाज के साथ चूडि़यों की खनक साफसाफ सुनाई दे रही थी.

रामाया गिरि की आंखों में रामप्यारी की मस्त जवानी तैरने लगी. शायद उसे पाने का इस से अच्छा मौका नहीं मिलने वाला था. उस ने आवाज दी, ‘‘रामप्यारी, जरा इधर आना.’’

रामाया गिरि की आवाज सुन कर रामप्यारी सिहर उठी. वह अनसुनी करते हुए फिर से बरतन मांजने लगी.

रामाया गिरि खीज उठा. उस ने बहाना बनाते हुए फिर उसे पुकारा, ‘‘रामप्यारी, जरा जल्दी आना. दर्द से सिर फटा जा रहा है.’’

अब की बार रामप्यारी अनसुनी नहीं कर पाई. वह हाथ धो कर सकुचाती हुई रामाया गिरि के कमरे में पहुंच गई.

रामाया गिरि बिछावन पर लेटा हुआ था. उस ने रामप्यारी को देख कर अपने सूखे होंठों पर जीभ फिराई, फिर टेबिल पर रखी बाम की शीशी की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘जरा, मेरे माथे पर बाम लगा दो…’’

मजबूरन रामप्यारी बाम ले कर रामाया गिरि के माथे पर मलने लगी. कोमल हाथों की छुअन से रामाया गिरि का पूरा बदन झनझना गया. उस ने सुख से अपनी आंखें बंद कर लीं.

रामाया गिरि को इस तरह पड़ा देख कर रामप्यारी का डर कुछ कम हो चला था. रामाया गिरि उसी का हमउम्र था, सो रामप्यारी को मजाक सूझाने लगा.

वह हंसती हुई बोली, ‘‘जब तुम्हें औरत के हाथों ही बाम लगवानी थी, तो कंठीमाला के झमेले में क्यों फंस गए? डंका बजा कर अपना ब्याह रचाते. अपनी घरवाली लाते, फिर उस से जी भर कर बाम लगवाते रहते…’’

वह उठ बैठा और हंसते हुए कहने लगा, ‘‘रामप्यारी, तू मुझ से मजाक करने लगी? वैसे, सुना है कि तुम्हारे पति को सिक्किम गए 10 साल से ऊपर हो गए. वह आज तक नहीं लौटा. मुझे नहीं समझ आ रहा कि उस के बिना तुम अपनी जवान बेटी की शादी कैसे करोगी?’’

रामाया गिरि की बातों ने रामप्यारी के जख्म हरे कर दिए. उस की आंखें भर उठीं. वह आंचल से आंसू पोंछने लगी.

रामाया गिरि हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘रामप्यारी, रोने से कुछ नहीं होगा. मेरे पास एक रास्ता है. अगर तुम मान गई, तो हम दोनों की परेशानी हल हो सकती है.’’

‘‘सो कैसे?’’ रामप्यारी पूछ बैठी.

‘‘अगर तुम चाहो, तो मैं तेरे लिए पक्का मकान बनवा दूंगा. तेरी बेटी की शादी मेरे पैसों से होगी. तुझे इतना पैसा दूंगा कि तू राज करेगी…’’

रामप्यारी उतावली हो कर बोली, ‘‘उस के बदले में मुझे क्या करना होगा?’’

रामाया गिरि उस की बांह को थामते हुए बोला, ‘‘रामप्यारी, सचमुच तुम बहुत भोली हो. अरी, तुम्हारे पास अनमोल जवानी है. वह मुझे दे दो. मैं किसी को खबर नहीं लगने दूंगा.’’

रामाया गिरि का इरादा जान कर रामप्यारी का चेहरा फीका पड़ गया. वह उस से अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली, ‘‘मुझ से भारी भूल हो गई. मैं सम?ाती थी कि तुम गरीबी में पले हो, इसलिए गरीबों का दुखदर्द समझाते होगे. लेकिन तुम तो जिस्म के सौदागर निकले…’’

इन बातों का रामाया गिरि पर कोई असर नहीं पड़ा. वासना से उस का बदन ऐंठ रहा था. इस समय उसे उपदेश के बदले देह की जरूरत थी.

रामप्यारी कमरे से बाहर निकलने वाली थी कि रामाया गिरि ने झपट कर उस का आंचल पकड़ लिया.

रामप्यारी धक से रह गई. वह गुस्से से पलटी और रामाया गिरि के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया.

रात के सन्नाटे में तमाचे की आवाज गूंज उठी. रामाया गिरि हक्काबक्का हो कर अपना गाल सहलाने लगा.

रामप्यारी बिफरती हुई बोली, ‘‘रामाया, ऐसी गलती फिर कभी किसी गरीब औरत के साथ नहीं करना. वैसे मैं पहले से मठमंदिरों के अंदरूनी किस्से जानती हूं. बेचारी कुसुमी तुम्हारे गुरु महाराज की सेवा करते हुए अचानक गायब हो गई. उस का आज तक पता नहीं चल पाया.

‘‘मैं थूकती हूं तुम्हारी महंती और तुम्हारे पैसों पर. मैं गरीब हूं तो क्या हुआ, मुझे इज्जत के साथ सिर उठा कर जीना आता है.’’

इस घटना को कई महीने बीत गए, लेकिन रामाया गिरि रामप्यारी के चांटे को भूल नहीं पाया.

एक रात उस ने अपने खास आदमी खड्ग सिंह के हाथों रामप्यारी की बेटी कमली को उठवा लिया. कमली नीबू की तरह निचुड़ी हुई लस्तपस्त हालत में सुबह घर पहुंची. कमली से सारा हाल जान कर रामप्यारी ने माथा पीट लिया.

समय के साथ रामाया गिरि की मनमानी बढ़ती गई. उस ने अपने विरोधियों को दबाने के लिए कचहरी में दर्जनों मुकदमे दायर कर दिए. मठ के घंटेघडि़याल बजने बंद हो गए. अब मठ पर थानाकचहरी के लोग जुटने लगे.

रामाया गिरि ने अपनी हिफाजत के लिए बंदूक खरीद ली. उस की दबंगई के चलते इलाके के लोगों से उस का रिश्ता टूटता चला गया.

रामाया गिरि कमली वाली घटना भूल सा गया. लेकिन रामप्यारी और कमली के लिए अपनी इज्जत बहुत माने रखती थी.

एक दिन रामप्यारी और कमली धान की कटाई कर रही थीं, तभी रामप्यारी ने सड़क से रामाया गिरि को मोटरसाइकिल से आते देखा.

बदला चुकाने की आग में जल रही दोनों मांबेटी ने एकदूसरे को इशारा किया. फिर दोनों मांबेटी हाथ में हंसिया लिए रामाया गिरि को पकड़ने के लिए दौड़ पड़ीं.

रामाया गिरि सारा माजरा समझ गया. उस ने मोटरसाइकिल को और तेज चला कर निकल जाना चाहा, पर हड़बड़ी में मोटरसाइकिल उलट गई.

रामाया गिरि चारों खाने चित गिरा. रामप्यारी के लिए मौका अच्छा था. वह फुरती से रामाया गिरि के सीने पर चढ़ गई. इधर कमली ने उस के पैरों को मजबूती से जकड़ लिया.

रामप्यारी रामाया गिरि के गले पर हंसिया रखती हुई बोली, ‘‘बोल रामाया, तू ने मेरी बेटी की इज्जत क्यों लूटी?’’

इतने में वहां भारी भीड़ जमा हो गई. रामाया गिरि लोगों की हमदर्दी खो चुका था, सो किसी ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की.

रामाया गिरि का चेहरा पीला पड़ चुका था. जान जाने के खौफ से वह हकलाता हुआ बोला, ‘‘रामप्यारी… रामप्यारी, मेरा गला मत रेतना.’’

‘‘नहीं, मैं तुम्हारा गला नहीं रेतूंगी. गला रेत दिया तो तुम झटके से आजाद हो जाओगे. मैं सिर्फ तुम्हारी गंदी आंखों को निकालूंगी. दूसरों की जिंदगी में अंधेरा फैलाने वालों के लिए यही सही सजा है.’’

रामप्यारी बिलकुल चंडी बन चुकी थी. रामाया गिरि के लाख छटपटाने के बाद भी उस ने नहीं छोड़ा. हंसिया के वार से रामाया गिरि की आंखों से खून का फव्वारा उछल पड़ा.

Story in Hindi : फैसला- कैसे थे इंद्रजीत और सुरेखा के संबंध

Story in Hindi . ‘‘अरे, तुम्हारी तबीयत अचानक कैसे खराब हो गई?’’ इंद्रजीत जैसे सुरेखा की हालत देख कर एकदम से घबरा गया, ‘‘बड़ी मुश्किल से समय निकाल कर हम यहां बुद्ध पार्क में आए थे और तुम्हें एकदम से क्या हो गया? रुको, मैं तुम्हें घर छोड़ आता हूं.’’

‘‘पता नहीं, बहुत दर्द कर रहा है…’’ सुरेखा बेचैन होते हुए बोली, ‘‘नहीं, मैं आटोरिकशा से चली जाऊंगी. वहां तुम्हें मेरे साथ देख कर मेरे घर वाले पता नहीं क्या सोचें. मैं तुम्हारी बेइज्जती नहीं करा सकती.’’

‘‘समय हमेशा एक सा नहीं रहता. समाज की सोच एक दिन में नहीं बदल सकती. तुम्हारे घर वाले भी कैसे इस बात को मान लें कि एक दलित लड़के के साथ कोई ऊंची जाति की लड़की प्यार करे. बेइज्जती सहने की तो मुझे आदत सी है. तुम्हारे लिए तो मैं कुछ भी सहन कर लूंगा. मगर मुझे लगता है कि तुम्हारी जो हालत है, ऐसे में हमें सीधे डाक्टर के पास जाना चाहिए.’’

इंद्रजीत अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा कर सुरेखा को शहर की भीड़भाड़ से बचतेबचाते एक प्राइवेट क्लिनिक में ले आया.

डाक्टर ने सुरेखा को देखा और कुछ दर्दनिवारक दवा दे दीं, तो वह कुछ ठीक हुई. आधा घंटे बाद इंद्रजीत उसे घर छोड़ आया.

अगले दिन सुरेखा की तकलीफ और ज्यादा बढ़ गई. घर वाले तत्काल उसे अस्पताल ले गए. वहां उसे दाखिल कराना पड़ गया.

इंद्रजीत को जब पता चला, तो वह भी उसे देखने चला आया. सुरेखा के भाई ने उसे देखा, तो बुरा सा मुंह बना लिया.

‘‘सुरेखाजी को क्या हुआ है?’’ अपनी अनदेखी की परवाह न करते हुए इंद्रजीत ने भाई से पूछा, ‘‘कल तक तो तो वह ठीक ही थी.’’

‘‘अब मुझे क्या पता कि उसे क्या हुआ है. मैं कोई डाक्टर थोड़े ही हूं कि मुझे पता चले,’’ भाई अकड़ कर बोला, ‘‘मगर, तुम उस के पीछे क्यों पड़े हो? जानते नहीं हो कि सुरेखा की शादी तय होने वाली है?’’

‘‘यह तो खुशी की बात है. मगर, एक दोस्त होने के नाते हमें एकदूसरे की मदद करनी ही चाहिए,’’ इंद्रजीत बोला.

‘‘बड़ा आया मदद करने वाला. अरे, वह मेरी बहन है. हमारे रहते किसी की मदद की उसे क्या जरूरत है…’’

‘‘आप कहते तो ठीक हैं, फिर भी जब कभी जरूरत हो, तो आप फोन कर लेना,’’ कह कर इंद्रजीत वापस अपने घर लौट गया. वह अस्पताल में कोई तनाव नहीं पैदा करना चाहता था.

कितनी खुशीखुशी इंद्रजीत गुवाहाटी से घर छुट्टी पर लौटा था. कितनी मुश्किल से वह छुट्टी ले कर आया था. मन में एक आस थी कि उस की अच्छी नौकरी देख कर अब सुरेखा के घर वाले बदल जाएंगे, मगर ये तो उसी पुरानी सोच वाले लोग निकले. पर कोई बात नहीं, उसे भी तो अपना फर्ज पूरा करना चाहिए. इस में सुरेखा का क्या कुसूर है, जो वह उसे अकेला छोड़ दे.

सुरेखा ने कई बार आड़े वक्त में इंद्रजीत की मदद की थी. वह उसे पसंद करती है, यही उस के लिए बहुत है.

सुरेखा को अपने भाई के घटिया बरताव पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी. मगर, जब वह खुद लाचार हो और बिस्तर पर पड़ी हो, तो क्या कर सकती है.

अगले 3 दिन तक सुरेखा का डायग्नोस्टिक होता रहा और तमाम डायग्नोस्टिक के बाद जब उसे पता चला कि उस की दोनों किडनी खराब हैं, तो घर वाले हैरान रह गए.

कहां तो सुरेखा की शादी की तैयारी करनी थी, जिस में भारी खर्च होना था और अब यह बड़ी बीमारी लग गई है. कहां से आएगा लाखों का इतना भारी खर्च? एक तो किडनी मिलती नहीं और मिल भी गई, तो उस के लिए ही बहुत सारे पैसे लगेंगे. इस के बाद आगे क्या होगा, कौन जाने.

‘‘ऐसा है मिश्राजी कि अब तो आप कहीं से किडनी का इंतजाम कीजिए, तो ही बेटी की जान बच सकती है…’’ डाक्टर सुरेखा के पापा से कह रहे थे, ‘‘और इस में हम कुछ कर भी नहीं सकते.’’

‘‘बाप रे, कौन देगा हमें अपनी किडनी…’’ सुरेखा के पापा आंखें फाड़ कर बोले, ‘‘यह बाजार में तो मिलती नहीं कि हम किसी तरह पैसे का जुगाड़ कर के खरीद लाएं और आप को उसे लगाने को दे दें.’’

‘‘ढूंढ़ने से ऐसे किडनी देने वाले मिल भी जाते हैं. आप के परिवार का कोई सदस्य या रिश्तेदार भी किडनी डोनेट कर सकता है. बाहर से भी इंतजाम हो सकता है.

‘‘बहुत से ऐसे लोग हैं, जो अपनी गरीबी की वजह से पैसों की खातिर अपनी किडनी डोनेट करते हैं. मैं प्रैक्टिकल बात कह रहा हूं. हालांकि, मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि मैं एक डाक्टर हूं.’’

‘‘अब आप ही कुछ देख लीजिए,’’ सुरेखा की मां अपने पति से यह कहते हुए फफक पड़ी थीं. उन की बेटी की जान जा रही थी और वे चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रही थीं.

मिश्राजी ने अपनी पत्नी को झिड़क दिया और फुसफुसा कर बोले, ‘‘न जाने कहां से यह बीमारी ले कर आ गई है. अब मरती है तो मरने दो. इस के लिए लाखों रुपए खर्च कर के किडनी का इंतजाम हो भी जाए, तो हम कंगाल नहीं हो जाएंगे? फिर इस की शादी के सौ झंझट और हजार खर्चे. इस से अच्छा है कि…’’

‘‘शुभशुभ बोलो…’’ मां बिलखते हुए बोलीं, ‘‘कैसे बाप हो, जो अपनी बेटी के बारे में ऐसा सोचते हो. कोई न कोई तो उसे अपनी किडनी दे ही देगा. अगर न हो, तो मेरी ही किडनी उसे लगा दो.’’

‘‘पागल हो गई हो क्या?’’ मिश्राजी ने उन्हें फिर झिड़क दिया, ‘‘किडनी लगाने के बाद क्या गारंटी है कि सुरेखा बच ही जाएगी? अब जो होना है, वह हो जाए. हम क्या कर सकते हैं.’’

‘‘ऐसा है मैडम कि आप की ज्यादा उम्र हो गई है, इसलिए आप की किडनी उस के लिए ठीक नहीं होगी. आप किसी नई उम्र के डोनेटर से बात कीजिए,’’ डाक्टर सुरेखा की मां को समझ रहे थे.

सुलेखा का भाई अलग सन्न था कि यह अचानक क्या हो गया कि एक अलग भारी खर्च की बात हो रही है.

कुछ महीने पहले ही सुरेखा ने सुना था कि एक बड़े नेता की दोनों किडनी खराब हो गई थीं और उन की बेटी ने अपनी किडनी दे कर उन की जान बचाई थी. मगर एक लड़की को कौन अपनी किडनी दे कर जान जोखिम में डालेगा. रुपयों के लालच में कोई किडनी दे भी दे, तो लाखों रुपए खर्च कौन करेगा. एक लड़की की जान की कीमत ही क्या है.

इंद्रजीत ने सुरेखा के साथ ही पढ़ाई की थी. दोनों ने साथ ही ग्रेजुएशन किया था. फिर इंद्रजीत इलैक्ट्रिकल डिप्लोमा की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक सरकारी नौकरी में आ गया था और अब गुवाहाटी में पोस्टेड था.

सभी को इंद्रजीत और सुरेखा के संबंध के बारे में पता था, मगर उन्हें इस रिश्ते पर एतराज था. इस छोटे से शहर में जहां जातीय बंधन इतने मुश्किल हों, ऐसा सोचना भी गुनाह ही था. औनर किलिंग तक की वारदात यहां आएदिन हो जाती हैं और इंद्रजीत इस मामले में कोई खतरा उठाना नहीं चाहता था.

3 दिन के इंतजार के बाद इंद्रजीत का मन नहीं माना, तो वह अस्पताल चला आया. वहां वह सुरेखा के परिवार वालों से मिला, मगर किसी ने उसे सही जानकारी नहीं दी. वह सुरेखा से भी कुछ पूछने में झिझक गया, इसलिए सीधा डाक्टर के चैंबर में चला गया.

‘‘पेशेंट की दोनों किडनी खराब हैं…’’ डाक्टर ने रुखाई से कहा, ‘‘पहले इस की किडनी का इंतजाम करो, उस के बाद ही आपरेशन का कोई चक्कर चलेगा न…’’

‘‘अरे, इतनी सी बात है…’’ इंद्रजीत बोला, ‘‘आप मेरी एक किडनी तो उसे लगा ही सकते हैं न. मुझे उस की जिंदगी ज्यादा प्यारी है.’’

‘‘तब ठीक है. मगर, इस के लिए आप को ब्लड प्रैशर, एचआईवी, ब्लड शुगर जैसे कुछ चैकअप कराने होंगे. अगर सबकुछ सही रहा, तभी किडनी के ट्रांसप्लांट का इंतजाम होगा.’’

‘‘मैं इस के लिए तैयार हूं. आप मेरा चैकअप कराएं,’’ इंद्रजीत ने कहा.

सुरेखा के घर वाले इंद्रजीत के इस फैसले पर हैरान थे कि कोई किसी को यों ही अपने शरीर का एक अंग दान में कैसे दे सकता है?

सुरेखा की मां खुशी के मारे रोने लगीं. उन के लिए इंद्रजीत जैसे कोई फरिश्ता बन कर आया था. अब उन की बेटी की जान बच सकती है.

‘‘मैं सुरेखा से जीजान से प्यार करता हूं आंटीजी…’’ इंद्रजीत हंस कर बोला, ‘‘मैं उसे हमेशा खुश देखना चाहता था और आगे भी देखना चाहूंगा.’’

‘‘फिर तुम यह कहोगे कि उस की शादी तुम्हारे साथ कर दी जाए,’’ सुरेखा के पापा अब भी अपनी आन पर अड़े थे, ‘‘मगर, मेरे जीतेजी तो यह मुमकिन नहीं होगा.’’

‘‘तो आप क्या समजाते हैं कि मैं किसी लालच में उसे कुछ दान कर रहा हूं अंकलजी. मैं ने कहा न कि मुझे बस उस की खुशी देखनी है. चाहे आप उस की शादी कहीं दूसरी जगह करा दें, मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. हां, बस वह खुश रहे.’’

और इस प्रकार सारी औपचारिकताएं पूरी हो गई थीं. इंद्रजीत का भी चैकअप हो गया था और डाक्टर ने उसे सेहतमंद होने का सर्टिफिकेट सा देते हुए उस के किडनी ट्रांसप्लांट की रजामंदी दे दी.

मगर, ऐन वक्त पर एक सीनियर डाक्टर ने सुरेखा का एक बार फिर से डायग्नोस्टिक कराया, तो वे दंग रह गए. सुरेखा की दोनों किडनी ठीक थीं. उसे जो तकलीफ थी, वह एपैंडिसाइटिस के शुरुआती लक्षणों के चलते उभरी थी. उन्होंने तुरंत एक छोटा सा आपरेशन किया और अब सुरेखा खतरे से बाहर थी. इंद्रजीत को किडनी डोनेट करने की नौबत ही नहीं आई.

‘‘मैं कहता था न कि सुरेखा ठीक हो जाएगी. यह मेरे पूजापाठ का असर है…’’ सुरेखा के पापा गर्व से बोले, ‘‘मैं ने इस के लिए महामृत्युंजय पाठ जो किया था, उस से यह अच्छी हो गई है.’’

‘‘इस जमाने में आप ऐसी फुजूल की बात क्यों करते हैं. पहले वाले डायग्नोस्टिक में गलत जानकारी मिली थी. मैडिकल चैकअप में ऐसी गलतियां हो जाती हैं…’’ डाक्टर हंस कर बोले, ‘‘मगर, फिर भी आप को इंद्रजीत का शुक्रगुजार होना चाहिए, जो अपनी

जान की परवाह न करते हुए वह आप की बेटी को किडनी देने के लिए तैयार हो गया. वाकई वह आप की बेटी सुरेखा को अपनी जान से ज्यादा चाहता है.’’

‘‘वह तो ठीक है डाक्टर साहब. हम वाकई उस के शुक्रगुजार हैं. दुनिया में अच्छाई और इनसानियत अभी भी बाकी है, मगर हमारी सामाजिक हैसियत इस की इजाजत नहीं देती कि उसे अपना लें. फिर भी हम उस की इस भलमनसाहत को जिंदगीभर याद रखेंगे. पर अब हमें अपनी बेटी की शादी की तैयारी करनी है,’’ सुरेखा के पापा ने कहा.

सुरेखा अस्पताल से घर आ गई. इंद्रजीत उस से मिलने आया, क्योंकि उस की छुट्टियां खत्म हो रही थीं. अब इस घर में उस के आनेजाने पर पहले जैसी रोकटोक नहीं थी, फिर भी अहं का एक परदा तो था ही.

सुरेखा ने इंद्रजीत को देखा. वह भी उसे ही देख रहा था. तभी सुरेखा की मां एक तसवीर ले कर कमरे के अंदर आईं और इंद्रजीत को दिखा कर बोलीं, ‘‘सुरेखा के लिए यह रिश्ता आया है बेटा. देखो तो इस तसवीर को.’’

सुरेखा उस तसवीर को अपनी मां से झपट कर उस के टुकड़ेटुकड़े करते हुए बोली, ‘‘जब सामने जीताजागता इनसान हो, तो किसी की तसवीर की क्या जरूरत है. मैं जब अस्पताल में जिंदगी और मौत से खेल रही थी, उस समय यह तसवीर वाला लड़का वहां था क्या?

‘‘इंद्रजीत अपनी जान की परवाह न करते हुए मुझे अपनी किडनी डोनेट करने को तैयार हो गया था. भला ऐसे इनसान को छोड़ कर मैं किसी दूसरे के साथ सुखी कैसे रह सकती हूं? अब तो यह जिंदगी इंद्रजीत की अमानत है.

‘‘आप लोगों को अपने सामाजिक रुतबे की चिंता है न, तो कोई बात नहीं. हम कोर्ट मैरिज कर लेंगे. हमें आज की खर्चीली शादियां पसंद भी नहीं हैं. यह मेरा आखिरी फैसला है.’’

बाहर सुरेखा के पापा और भाई खड़े थे. उन में हिम्मत नहीं हुई कि आगे बढ़ कर वह सुरेखा के इस फैसले की खिलाफत करें. उन के मन में भी इंद्रजीत के लिए इज्जत का भाव तो आया ही था. ठीक है कि ऐनवक्त पर किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत नहीं पड़ी, फिर भी इंद्रजीत किडनी डोनेट के लिए तैयार तो था ही न.

जब जिद की एक गांठ खुल जाती है, तो उलझे हुए सभी रिश्ते सुलझ जाते हैं. उधर इंद्रजीत के चेहरे पर सुरेखा के इस हिम्मत भरे फैसले से खुशी का भाव था.

नीला पत्थर : गूंगी और बहरी काकी का दर्द

‘‘कहीं नहीं जाएगी काकी…’’ पार्वती बूआ की कड़कती आवाज ने सब को चुप करा दिया. काकी की अटैची फिर हवेली के अंदर रख दी गई.

यह तीसरी बार की बात थी. काकी के कुनबे ने फैसला किया था कि शादीशुदा लड़की का असली घर उस की ससुराल ही होती है. न चाहते हुए भी काकी मायका छोड़ कर ससुराल जा रही थी.

हालांकि ससुराल से उसे लिवाने कोई नहीं आया था. काकी को बोझ समझ कर उस के परिवार वाले उसे खुद ही उस की ससुराल फेंकने का मन बना चुके थे कि पार्वती बूआ को अपनी बरबाद हो चुकी जवानी याद आ गई. खुद उस के साथ कुनबे वालों ने कोई इंसाफ नहीं किया था और उसे कई बार उस की मरजी के खिलाफ ससुराल भेजा था, जहां उस की कोई कद्र नहीं थी.

तभी तो पार्वती बूआ बड़ेबूढ़ों की परवाह न करते हुए चीख उठी थी, ‘‘कहीं नहीं जाएगी काकी. उन कसाइयों के पास भेजने के बजाय उसे अपने खेतों के पास वाली नहर में ही धक्का क्यों न दे दिया जाए. बिना किसी बुलावे के या बिना कुछ कहेसुने, बिना कोई इकरारनामे के काकी को ससुराल भेज देंगे, तो वे ससुरे इस बार जला कर मार डालेंगे इस मासूम बेजबान लड़की को. फिर उन का एकाध आदमी तुम मार आना और सारी उम्र कोर्टकचहरी के चक्कर में अपने आधे खेतों को गिरवी रखवा देना.’’

दूसरी बार काकी के एकलौते भाई की आंखों में खून उतर आया था. उस ने हवेली के दरवाजे से ही चीख कर कहा था, ‘‘काकी ससुराल नहीं जाएगी. उन्हें आ कर हम से माफी मांगनी होगी. हर तीसरे दिन का बखेड़ा अच्छा नहीं. क्या फायदा… किसी की जान चली जाएगी और कोई दूसरा जेल में अपनी जवानी गला देगा. बेहतर है कि कुछ और ही सोचो काकी के लिए.’’

काकी के लिए बस 3 बार पूरा कुनबा जुटा था उस के आंगन में. काकी को यहीं मायके में रखने पर सहमति बना कर वे लोग अपनेअपने कामों में मसरूफ हो गए थे. उस के बाद काकी के बारे में सोचने की किसी ने जरूरत नहीं समझ और न ही कोई ऐसा मौका आया कि काकी के बारे में कोई अहम फैसला लेना पड़े.

काकी का कुसूर सिर्फ इतना था कि वह गूंगी थी और बहरी भी. मगर गूंगी तो गांव की 99 फीसदी लड़कियां होती हैं. क्या उन के बारे में भी कुनबा पंचायत या बिरादरी आंखें मींच कर फैसले करती है? कोई एकाध सिरफिरी लड़की अपने बारे में लिए गए इन एकतरफा फैसलों के खिलाफ बोल भी पड़ती है, तो उस के अपने ही भाइयों की आंखों में खून उतर आता है. ससुराल की लाठी उस पर चोट करती है या उस के जेठ के हाथ उस के बाल नोंचने लगते हैं.

ऐसी सिरफिरी मुंहफट लड़की की मां बस इतना कह कर चुप हो जाती है कि जहां एक लड़की की डोली उतरती है, वहां से ही उस की अरथी उठती है. यह एक हारे हुए परेशान आदमी का बेमेल सा तर्क ही तो है. एक अकेली छुईमुई लड़की क्या विद्रोह करे. उसे किसी फैसले में कब शामिल किया जाता है. सदियों से उस के खिलाफ फतवे ही जारी होते रहे हैं. वह कुछ बोले तो बिजली टूट कर गिरती है, आसमान फट पड़ता है.

अनगनित लोगों की शादियां टूटती हैं, मगर वे सब पागल नहीं हो जाते. बेहतर तो यही होता कि अपनी नाकाम शादी के बारे में काकी जितना जल्दी होता भूल जाती. ये शादीब्याह के मामले थानेकचहरी में चले जाएं, तो फिर रुसवाई तो तय ही है. आखिर हुआ क्या? शीशा पत्थर से टकराया और चूरचूर हो गया.

काकी का पति तो पहले भी वैसा ही था लंपट, औरतबाज और बाद में भी वैसा ही बना रहा. काकी से अलग होने के बाद भी उस की जिंदगी पर कोई खास असर नहीं पड़ा.

काकी के कुनबे का फैसला सुनने के बाद तो वह हर तरफ से आजाद हो चुका था. उस के सुख के सारे दरवाजे खुल गए, मगर काकी का मोह भंग हो गया. अब वह खुद को एक चुकी हुई बूढ़ी खूसट मानने लगी थी.

भरी जवानी में ही काकी की हर रस, रंग, साज और मौजमस्ती से दूरी हो गई थी. उस के मन में नफरत और बदले के नागफनी इतने विकराल आकार लेते गए कि फिर उन में किसी दूसरे आदमी के प्रति प्यार या चाहत के फूल खिल ही न सके.

किसी ने उसे यह नहीं समझाया, ‘लाड़ो, अपने बेवफा शौहर के फिर मुंह लगेगी, तो क्या हासिल होगा तुझे वह सच्चा होता तो क्या यों छोड़ कर जाता तुझे उसे वापस ले भी आएगी, तो क्या अब वह तेरे भरोसे लायक बचा है? क्या करेगी अब उस का तू? वह तो ऐसी चीज है कि जो निगले भी नहीं बनेगा और बाहर थूकेगी, तो भी कसैली हो जाएगी तू.

‘वह तो बदचलन है ही, तू भी अगर उस की तलाश में थानाकचहरी जाएगी, तो तू तो वैसी ही हो जाएगी. शरीफ लोगों का काम नहीं है यह सब.’

कोई तो एक बार उसे कहता, ‘देख काकी, तेरे पास हुस्न है, जवानी है, अरमान हैं. तू क्यों आग में झोंकती है खुद को? दफा कर ऐसे पति को. पीछा छोड़ उस का. तू दोबारा घर बसा ले. वह 20 साल बाद आ कर तु?ा पर अपना दावा दायर करने से रहा. फिर किस आधार पर वह तुझ पर अपना हक जमाएगा? इतने सालों से तेरे लिए बिलकुल पराया था. तेरे तन की जमीन को बंजर ही बनाता रहा वह.

‘शादी के पहले के कुछ दिनों में ही तेरे साथ रहा, सोया वह. यह तो अच्छा हुआ कि तेरी कोख में अपना कोई गंदा बीज रोप कर नहीं गया वह दुष्ट, वरना सारी उम्र उस से जान छुड़ानी मुश्किल हो जाती तुझे.’

कुनबे ने काकी के बारे में 3 बार फतवे जारी किए थे. पहली बार काकी की मां ने ऐसे ही विद्रोही शब्द कहे थे कि कहीं नहीं जाएगी काकी. पहली बार गांव में तब हंगामा हुआ था, जब काकी दीनू काका के बेटे रमेश के बहकावे में आ गई थी और उस ने उस के साथ भाग जाने की योजना बना ली थी. वह करती भी तो क्या करती.

35 बरस की हो गई थी वह, मगर कहीं उस के रिश्ते की बात जम नहीं रही थी. ऐसे में लड़कियां कब तक खिड़कियों के बाहर ताकझांक करती रहें कि उन के सपनों का राजकुमार कब आएगा. इन दिनों राजकुमार लड़की के रंगरूप या गुण नहीं देखता, वह उस के पिता की जागीर पर नजर रखता है, जहां से उसे मोटा दहेज मिलना होता है.

गरीब की बेटी और वह भी जन्म से गूंगीबहरी. कौन हाथ धरेगा उस पर? वैसे, काकी गजब की खूबसूरत थी. घर के कामकाज में भी माहिर. गोरीचिट्टी, लंबा कद. जब किसी शादीब्याह के लिए सजधज कर निकलती, तो कइयों के दिल पर सांप लोटने लगते. मगर उस के साथ जिंदगी बिताने के बारे में सोचने मात्र की कोई कल्पना नहीं करता था.

वैसे तो किसी कुंआरी लड़की का दिल धड़कना ही नहीं चाहिए, अगर धड़के भी तो किसी को कानोंकान खबर न हो, वरना बरछे, तलवारें व गंड़ासियां लहराने लगती हैं. यह कैसा निजाम है कि जहां मर्द पचासों जगह मुंह मार सकता था, मगर औरत अपने दिल के आईने में किसी पराए मर्द की तसवीर नहीं देख सकती थी? न शादी से पहले और शादी के बाद तो कतई नहीं.

पर दीनू काका के फौजी बेटे रमेश का दिल काकी पर फिदा हो गया था. काकी भी उस से बेपनाह मुहब्बत करने लगी थी. मगर कहां दीनू काका की लंबीचौड़ी खेती और कहां काकी का गरीब कुनबा. कोई मेल नहीं था दोनों परिवारों में.

पहली ही नजर में रमेश काकी पर अपना सबकुछ लुटा बैठा, मगर काकी को क्या पता था कि ऐसा प्यार उस के भविष्य को चौपट कर देगा.

रमेश जानता था कि उस के परिवार वाले उस गूंगी लड़की से उस की शादी नहीं होने देंगे. बस, एक ही रास्ता बचा था कि कहीं भाग कर शादी कर ली जाए.

उन की इस योजना का पता अगले ही दिन चल गया था और कई परिवार, जो रमेश के साथ अपनी लड़की का रिश्ता जोड़ना चाहते थे, सब दिशाओं में फैल गए. इश्क और मुश्क कहां छिपते हैं भला. फिर जब सारी दुनिया प्रेमियों के खिलाफ हो जाए, तो उस प्यार को जमाने वालों की बुरी नजर लग जाती है.

काकी का बचपन बड़े प्यार और खुशनुमा माहौल में बीता था. उस के छोटे भाई राजा को कोई चिढ़ाताडांटता या मारता, तो काकी की आंखें छलछला आतीं. अपनी एक साल की भूरी कटिया के मरने पर 2 दिन रोती रही थी वह. जब उस का प्यारा कुत्ता मरा तो कैसे फट पड़ी थी वह. सब से ज्यादा दुख तो उसे पिता के मरने पर हुआ था. मां के गले लग कर वह इतना रोई थी कि मानो सारे दुखों का अंत ही कर डालेगी. आंसू चुक गए. आवाज तो पहले से ही गूंगी थी. बस गला भरभर करता था और दिल रेशारेशा बिखरता जाता था. सबकुछ खत्म सा हो गया था तब.

अब जिंदा बच गई थी तो जीना तो था ही न. दुखों को रोरो कर हलका कर लेने की आदत तब से ही पड़ गई थी उसे. दुख रोने से और बढ़ते जाते थे.

रमेश से बलात छीन कर काकी को दूर फेंक दिया गया था एक अधेड़ उम्र के पिलपिले गरीब किसान के झोपड़े में, जहां उस के जवान बेटों की भूखी नजरें काकी को नोंचने पर आमादा थीं.

काकी वहां कितने दिन साबुत बची रहती. भाग आई भेडि़यों के उस जंगल से. कोई रास्ता नहीं था उस जंगल से बाहर निकलने का.

जो रास्ता काकी ने खुद चुना था, उस के दरमियान सैकड़ों लोग खड़े हो गए थे. काकी के मायके की हालत खराब तो न थी, मगर इतने सोखे दिन भी नहीं थे कि कई दिन दिल खोल कर हंस लिया जाए. कभी धरती पर पड़े बीजों के अंकुरित होने पर नजरें गड़ी रहतीं, तो कभी आसमान के बादलों से मुरादें मांगती झोलियां फैलाए बैठी रहतीं मांबेटी.

रमेश से छिटक कर और फिर ससुराल से ठुकराई जाने के बाद काकी का दिल बुरी तरह हार माने बैठा था. अब काकी ने अपने शरीर की देखभाल करनी छोड़ दी थी. उस की मां उस से अकसर कहती कि गरीब की जवानी और पौष की चांदनी रात को कौन देखता है.

फटी हुई आंखों से काकी इस बात को समझाने की कोशिश करती. मां झंझला कर कहती, ‘‘तू तो जबान से ही नहीं, दिल से भी बिलकुल गूंगी ही है. मेरे कहने का मतलब है कि जैसे पूस की कड़कती सर्दी वाली रात में चांदनी को निहारने कोई नहीं बाहर निकलता, वैसे ही गरीब की जवानी को कोई नहीं देखता.’’

मां चल बसीं. काकी के भाई की गृहस्थी बढ़ चली थी. काकी की अपनी भाभी से जरा भी नहीं बनती थी. अब काकी काफी चिड़चिड़ी सी हो गई थी. भाई से अनबन क्या हुई, काकी तो दरबदर की ठोकरें खाने लगी. कभी चाची के पास कुछ दिन रहती, तो कभी बूआ काम करकर के थकटूट जाती थी. काकी एक बार खाट से क्या लगी कि सब उसे बोझ समझाने लगे थे.

आखिरकार काकी की बिरादरी ने एक बार फिर काकी के बारे में फैसला करने के लिए समय निकाला. इन लोगों ने उस के लिए ऐसा इंतजाम कर दिया, जिस के तहत दिन तय कर दिए गए कि कुलीन व खातेपीते घरों में जा कर काकी खाना खा लिया करेगी.

कुछ दिन तक यह बंदोबस्त चला, मगर काकी को यों आंखें झाका कर गैर लोगों के घर जा कर रहम की भीख खाना चुभने लगा. अपनी बिरादरी के अब तक के तमाम फैसलों का काकी ने विरोध नहीं किया था, मगर इस आखिरी फैसले का काकी ने जवाब दिया. सुबह उस की लाश नहर से बरामद हुई थी. अब काकी गूंगीबहरी ही नहीं, बल्कि अहल्या की तरह सर्द नीला पत्थर हो चुकी थी.

Hindi Kahani: रखैल – क्या बेवफा थी लक्षमण की पत्नी मीनाक्षी

Hindi Kahani: आज से तकरीबन 15 साल पहले मीनाक्षी की शादी लक्ष्मण के साथ हुई थी. उन दिनों लक्ष्मण एक फैक्टरी में काम करता था.

जब लक्ष्मण के फैक्टरी से घर आने का समय होता, तब मीनाक्षी बड़ी बेसब्री से दरवाजे पर उस का इंतजार करती थी.

कभीकभार इंतजार करतेकरते थोड़ी देर हो जाती, तब घर के भीतर घुसते ही मीनाक्षी लक्ष्मण की छाती पर मुक्का मारते हुए कहती थी, ‘‘इतनी देर क्यों हो गई?’’

तब लक्ष्मण चिढ़ा कर उसे कहता था, ‘‘आज वह मिल गई थी.’’ फिर वे दोनों खिलखिला कर हंस पड़ते थे.

धीरेधीरे समय पंख लगा कर उड़ता रहा. पहले बेटी, दूसरा बेटा, फिर तीसरा बेटा होने से मीनाक्षी परिवार में मसरूफ हो गई थी. परिवार बढ़ने की वजह से घर का खर्चा भी बढ़ गया था. तब लक्ष्मण चिड़ाचिड़ा सा रहने लगा था. 5 साल पहले एक घटना हो गई थी. जिस फैक्टरी में लक्ष्मण काम करता था, वह फैक्टरी घाटे में चलने की वजह से बंद कर दी गई.

लक्ष्मण भी बेरोजगार हो गया. वह कोई दूसरा काम तलाशने लगा, मगर शहर में फैक्टरी जैसा काम नहीं मिला.

घर में रखा पैसा भी धीरेधीरे खर्च होने लगा. घर में तंगी होने के चलते लक्ष्मण के गुस्से का पारा चढ़ने लगा.

आखिरकार एक दिन तंग आ कर मीनाक्षी ने कहा, ‘‘अब मैं भी आप के साथ मजदूरी करने चलूंगी…’’

‘‘तू औरत जात ठहरी, घर से बाहर काम करने जाएगी?’’ लक्ष्मण बोला.

‘‘इस में हर्ज क्या है? क्या आजकल औरतें मजदूरी करने नहीं जाती हैं? क्या औरतें दफ्तरों में काम नहीं करती हैं?’’ मीनाक्षी ने अपनी बात रखते हुए कहा, ‘‘इस बस्ती की दूसरी औरतें भी तो काम पर जाती हैं.’’

मीनाक्षी की बात सुन कर लक्ष्मण सोच में पड़ गया. मीनाक्षी ने जो कहा, सही कहा था. मगर जब औरत घर की दहलीज से बाहर निकलती है, तब वह पराए मर्दों से महफूज नहीं रह पाती है. बस्ती की कितनी ही औरतों के संबंध दूसरे मर्दों से थे.

लक्ष्मण को चुप देख कर मीनाक्षी बोली, ‘‘तो क्या सोचा है?’’

‘‘मेरी मीनाक्षी बाहर काम करने नहीं जाएगी,’’ लक्ष्मण ने कहा.

‘‘क्यों नहीं जा सकती है?’’

‘‘इसलिए कि यह मर्दों की दुनिया बड़ी खराब होती है.’’

‘‘खराब से मतलब?’’

‘‘मतलब…’’ कह कर लक्ष्मण के शब्द गले में ही अटक गए. वह आगे बोला, ‘‘मैं ने कहा न कि मेरी मीनाक्षी काम करने बाहर नहीं जाएगी.’’

‘‘देखिए, आप की भी नौकरी छूट गई. आप मजदूरी के लिए इधरउधर मारेमारे फिरते हो, ऐसे में घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है. जब हम दोनों काम करने जाएंगे, तब मजदूरी भी दोगुनी मिला करेगी.

‘‘मैं अकेली कहीं नहीं जाऊंगी, बल्कि आप के साथ चलूंगी,’’ कह कर मीनाक्षी लक्ष्मण का चेहरा देखने लगी.

शायद लक्ष्मण इस बात से सहमत हो गया था. लिहाजा, अब मीनाक्षी भी लक्ष्मण के साथ ठेकेदार के यहां काम करने लगी.

उस ठेकेदार का नाम मांगीलाल था. मीनाक्षी को देख कर वह उस पर लट््टू हो गया था. उसे जहां भी मकान का ठेका मिलता था, वह लक्ष्मण और मीनाक्षी को वहीं रखता था.

ठेकेदार मांगीलाल के पास मोटरसाइकिल थी, इसलिए वह कई बार मीनाक्षी को उस पर बैठा कर ले जाता था.

मीनाक्षी का ठेकेदार के इतना करीब रहना लक्ष्मण को पसंद नहीं था, मगर वह कुछ बोल नहीं पाता था.

एक दिन एक अधेड़ औरत ने मीनाक्षी से पूछा, ‘‘तुम ने ठेकेदार पर क्या जादू कर रखा है?’’

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ मीनाक्षी उस से जरा नाराज हो कर बोली.

‘‘मतलब यह है कि ठेकेदार तु झे इतना क्यों चाहता है?’’

‘‘मगर तुम यह क्यों पूछ रही हो?’’ मीनाक्षी बोली.

‘‘इसलिए कि ठेकेदार किसी औरत को घास नहीं डालता है. उस ने तु झे ही घास क्यों डाली?’’ वह अधेड़ औरत ऊपर से नीचे तक उसे देख कर बोली, ‘‘लगता है कि तेरी इस खूबसूरत अदा में जादू है, इसलिए वह तुम पर लट्टू हुआ है.’’

‘‘तुम्हारी सोच गलत है.’’

‘‘अरे, मैं ने ये बाल धूप में सफेद नहीं किए हैं. मैं इन मर्दों को अच्छी तरह जानती हूं. तू उसे अपने साथ सुलाती होगी.’’

‘‘तुम्हें यह कहते हुए शर्म नहीं आती है,’’ मीनाक्षी बोली.

‘‘बुरा मत मानो बहन. मैं ने अच्छीअच्छी औरतों को पराए बिस्तर पर देखा है. तुम्हारे बीच कोई रिश्ता जरूर है,’’ आगे वह अधेड़ औरत कुछ न बोल सकी, क्योंकि ठेकेदार मांगीलाल वहां आ गया था.

‘‘क्या बात है मीनाक्षी, तुम सुस्त क्यों दिख रही हो?’’ मांगीलाल ने पूछा.

‘‘नहीं तो…’’ कह कर उस ने होंठों पर बनावटी मुसकान बिखेर दी.

ठेकेदार को भी उसे भांपते देर न लगी, इसलिए वह बोला, ‘‘तुम्हारा चेहरा बता रहा है कि किसी ने कुछ कह दिया है.’’

‘‘मीनाक्षी को कुछ कहने की किस में हिम्मत है. अगर किसी ने कुछ कह भी दिया न, तो मैं उस की चमड़ी उधेड़ दूंगी,’’ उस औरत की ओर देख कर मीनाक्षी ने ताना कसा.

अब लोगों में कानाफूसी होने लगी थी कि मीनाक्षी ठेकेदार की रखैल है.

वैसे, शुरुआत के दिनों में ठेकेदार ने एक बार मीनाक्षी के बदन से खेलने की कोशिश की थी. उस दिन वह ठेकेदार के घर पर अकेली थी. ठेकेदार की पत्नी मायके गई थी.

उस दिन वह मीनाक्षी के कंधे पर हाथ रख कर बोला था, ‘‘मीनाक्षी, बहुत दिनों से इस पके फल को खाने की इच्छा थी. क्या आज मेरी इच्छा पूरी करोगी?’’

‘‘आप के सामने जो पका फल है, उस पर सिर्फ लक्ष्मण का ही हक है, आज के बाद कभी मेरे बदन से खेलने की कोशिश मत करना.’’

मीनाक्षी का गुस्से से भरा चेहरा देख कर ठेकेदार सहम गया था, इसलिए वह प्यार से बोला था, ‘‘तू तो बुरा मान गई मीनाक्षी.’’

‘‘बात ही ऐसी करता है तू,’’ मीनाक्षी आप से तू पर आ गई थी. फिर वह आगे बोली थी, ‘‘तेरे पास औरत है. तू उस से चाहे जिस तरह से खेल.’’

‘‘देख मीनाक्षी, मैं अब कभी तु झे बुरी नीयत से नहीं देखूंगा. मगर तू वचन दे कि मु झे छोड़ कर नहीं जाएगी.’

लेकिन जब से बाकी मजदूरों में उन दोनों के संबंध की अफवाह फैली, तो लक्ष्मण के मन में भी शक घर कर गया.

एक दिन लक्ष्मण का गुस्सा फट पड़ा और बोला, ‘‘मीनाक्षी, तू उस ठेकेदार के घर में जा कर क्यों नहीं बैठ जाती?’’

‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’ मीनाक्षी ने हैरानी से पूछा.

‘‘मैं नहीं, सारी बस्ती वाले कह रहे हैं कि तुम उस की रखैल हो.’’

‘‘बस्ती वाले कुछ भी कह देंगे और तुम उसे सच मान लोगे?’’

‘‘जो बातें आंखों के सामने हो रही हों, उन्हें सच मानना ही पड़ेगा.’’

‘‘आखिर तुम्हारे भीतर भी शक का वही कीड़ा बैठ गया, जो बस्ती वालों के भीतर बैठा है.’’

‘‘मैं ने खुद तुम्हें कई बार ठेकेदार की मोटरसाइकिल पर चिपक कर बैठे देखा है,’’ लक्ष्मण ने जब यह बात कही, तब मीनाक्षी जवाब देते हुए बोली, ‘‘ठीक है, जब तुम मु झे ठेकेदार की रखैल मानते हो, तब मैं भी कबूल करती हूं कि मैं हूं उस की रखैल. अब बोलो क्या चाहते हो तुम?’’

‘‘मैं जानता हूं कि ठेकेदार तेरा यार है और अपने यार को कोई औरत कैसे छोड़ सकती है.’’

‘‘ठीक है, ठेकेदार मेरा यार है. मैं उस की रखैल हूं. तब तुम मु झे घर से निकाल क्यों नहीं देते?’’ जवाबी हमला करते हुए मीनाक्षी बोली.

‘‘हां…हां, तेरी भी यही इच्छा है, तो बैठ क्यों नहीं जाती उस के घर में जा कर?’’ यह कहते हुए लक्ष्मण की सांस फूल गई.

मीनाक्षी चिल्लाते हुए बोली, ‘‘हांहां बैठ जाऊंगी उस के घर में. ऐसे निखट्टू मर्द को पा कर मैं भी कहां सुखी थी. यह तो ठेकेदार मिल गया, जो खर्चा चल रहा था. अब रहना अकेले ही,’’ कह कर मीनाक्षी अपने कपड़े समेटने लगी.

थोड़ी देर में मीनाक्षी अपनी बेटी को ले कर  झोंपड़ी से बाहर निकल गई. दोनों बेटे उसे टुकुरटुकुर देखते रहे.मीनाक्षी ठेकेदार के घर पहुंच गई और उसे सारा किस्सा कह सुनाया. ठेकेदार ने उस के लिए अपने पड़ोस में ही किराए का एक मकान दिला दिया.

एक रात को किसी ने मीनाक्षी के घर का दरवाजा खटखटाया. उस ने उठ कर दरवाजा खोला तो देखा कि बाहर ठेकेदार मांगीलाल खड़ा था.

वह बोली, ‘‘मैं आप का यह एहसान कभी नहीं भूल सकती. आप ने मु झे रहने को मकान दिया, मेरा खर्चा उठाया. मैं आप के एहसान तले दब कर रह गई हूं.

‘‘याद है न, जिस दिन हमारी दोस्ती हुई थी, तब आप मेरे बदन से खेलना चाहते थे, लेकिन मैं ने मना कर दिया था. लेकिन आज लक्ष्मण ने मु झे आप की रखैल सम झ कर घर से निकाल दिया. अब यह शरीर आप का है.’’

ठेकेदार बोला, ‘‘नहीं मीनाक्षी, यह शरीर अब भी लक्ष्मण का ही है,’’ कह कर उस ने बाहर अंधेरे में खड़े लक्ष्मण को बुला लिया. लक्ष्मण किसी अपराधी की तरह सामने आया.

ठेकेदार बोला, ‘‘लक्ष्मण, संभालो अपनी मीनाक्षी को. अब भी तुम्हारी मीनाक्षी पाकसाफ है. दरवाजा बंद कर लेना,’’ कह कर ठेकेदार बाहर चला गया.

लक्ष्मण ने दरवाजा बंद कर लिया. उस की मीनाक्षी उस के सामने खड़ी थी. लक्ष्मण ने आगे बढ़ कर उसे अपनी बांहों में भर लिया. Hindi Kahani

Family Story : चाय की दुकान – जब इमरान ने संभाला होश

Family Story. चाय की दुकान, जहां दुनिया से जुड़ी हर खबर मिल जाएगी आप को. भले हम डिजिटल युग में जी रहे हैं जहां कोई भी खबर सिर्फ उंगलियों को घुमाने से मिल जाती है पर उस से भी तेज खबर मिलेगी आप को चाय की दुकान पर.

किस के बेटे ने मूंछें मुंड़वा लीं, किस की बीवी झगड़ कर मायके चली गई, किस के घर में क्या पका है, किस की बकरी दूसरे का खेत चर गई… हर तरह की खबरें बगैर किसी फीस के. न कोई इंटरनैट और न ही कोई टैलीविजन या रेडियो, पर खबरें बिलकुल टैलीविजन के जैसी मसालेदार.

सब से मजेदार बात तो यह है कि वहां पर पुरानी से पुरानी खबरें सुनाने वाले भी आप को हमेशा मिल जाएंगे, भले ही वे आप के जन्म से पहले की ही क्यों न हों, जैसे कि वे उन के मैमोरी कार्ड में सेव हों.

इन्हीं खबरीलाल में से एक हैं बादो चाचा. उन के पास तो समय ही समय है. कोई भी घटना वे ऐसे सुनाते हैं मानो आंखों देखी बता रहे हों.

गांव के हर गलीनुक्कड़, चौकचौराहे पर मिल जाएंगे. आप उन से इस नुक्कड़ पर मिल कर जाएं और अगले नुक्कड़ पर आप से पहले वे पहुंचे रहते हैं. वे किस रास्ते से जाते हैं आज तक कोई नहीं जान पाया.

इमरान ने जब से होश संभाला है तब से उन्हें वैसा का वैसा ही देख रहा है. बाल तो उन के 20 साल पहले ही पक चुके थे, पर उन की शारीरिक बनावट में आज भी कोई बदलाव या बुढ़ापेपन की झलक नहीं दिखती है, मानो उन के लिए समय रुक गया हो. कोई कह नहीं सकता कि वे नातीपोते वाले हैं.

सुबहसुबह रघु चाचा की चाय की दुकान पर चाय प्रेमियों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया. यह ठीक उसी तरह होता है जिस तरह शहर के किसी रैस्टौरैंट में. वहां व्यंजन पसंद करने में कम से कम आधा घंटा लगता है, और्डर को सर्व होने में कम से कम आधा घंटा लगेगा, यह तो मेनू कार्ड में खुद लिखा होता है और फिर उस के बाद कोई समय सीमा नहीं. आप जब तक खाएं और जब तक बैठें आप की मरजी. खाएं या न खाएं, पर सैल्फी लेकर लोगों को बताएं जरूर कि सोनू विद मोनू ऐंड थर्टी फाइव अदर्स एट ओस्मानी रैस्टौरैंट.

यहां भी कुछ ऐसा ही नजारा रहता है. 5 रुपए की चाय पी कर लोग साढ़े 3 रुपए का अखबार पढ़ते हैं और फिर देशदुनिया के साथ पूरे गांव और आसपास के गांवों की कहानियां चलती हैं बगैर किसी समय सीमा के. सब को पता होता है कि घर के बुजुर्ग चाय की दुकान पर मिल जाएंगे, विद अदर्स.

हमेशा की तरह बादो चाचा की आकाशवाणी जारी थी, ‘‘यह हरी को भी क्या हो गया है, बड़ीबड़ी बच्चियों को पढ़ने के लिए ट्रेन से भेजता है. वे अभी साइकिल से स्टेशन जाएंगी और फिर वहां से लड़कों की तरह ट्रेन पकड़ कर बाजार…

‘‘पढ़लिख कर क्या करेंगी? कलक्टर बनेंगी क्या? कुछ तो गांव की मानमर्यादा का खयाल रखता. मैट्रिक कर ली, अब कोई आसान सा विषय दे कर घर से पढ़ा लेता.’’

इसी के साथ शुरू हो गई गरमागरम चाय के साथ ताजा विषय पर परिचर्चा. सब लोगों ने एकसाथ हरी चाचा पर ताने मारने में हिस्सा लिया.

कोई कहता कि खुद तो अंगूठाछाप है, अब चला है भैया बेटियों को पढ़ाने, तो कोई कहता कि पढ़ कर वही चूल्हाचौका ही संभालेंगी, इंदिरा गांधी थोड़े न बन जाएंगी.

अगले दिन बादो चाचा चाय की दुकान पर नहीं दिखे, पता चला कि पोती को जो स्कूल में सरकारी साइकिल के पैसे मिलने वाले हैं, उसी की रसीद लाने गए हैं.

इमरान को कल हरी चाचा पर मारे गए ताने याद आ गए. जब वह बचपन में साइकिल चलाना सीखता था तो उस समय उस की ही उम्र की कुछ लड़कियां भी साइकिल चलाना सीखती थीं और यही बादो चाचा और गांव के कुछ दूसरे बुजुर्ग उन पर ताने मारते नहीं थकते थे और आज वे अपनी ही पोती के लिए साइकिल के पैसे के लिए रसीद लाने गए हैं.

अगले दिन इमरान ने पूछा, ‘‘कल आप आए नहीं बादो चाचा?’’

वे कहने लगे, ‘‘क्या बताऊं बेटा, जगमला… मेरी पोती 9वीं जमात में चली गई है. उसी को साइकिल मिलने वाली है. उसी की रसीद लाने गया था. परेशान हो गया बेटा. कोई साइकिल का दुकानदार रसीद देने को तैयार ही नहीं था. सब को कमीशन चाहिए. पहले ही अगर चैक मिल जाए तो इतनी परेशानी न हो.

‘‘यह सरकार भी न, पहले रसीद स्कूल में जमा करो, फिर जा कर आप को चैक मिलेगा. जब साइकिल के पैसे देने ही हैं तो दे दो, रसीद क्यों मांगते हो? उन पैसों का कोई भोज थोड़े न कर लेगा, साइकिल ही लाएगा. आजकल के बच्चेबच्चियों को भी पता है कि सरकार उन्हें पैसे देती है वे खरीदवा कर ही दम लेते हैं, चैन से थोड़े न रहने देते हैं.’’

‘‘हां चाचा, पर जगमला तो लड़की है. वह साइकिल चलाए, यह शोभा थोड़े न देगा,’’ इमरान ने ताना मारा.

‘‘अरे नहीं बेटा, उस का स्कूल बहुत दूर है. नन्ही सी जान कितना पैदल चलेगी. स्कूलट्यूशन सब करना पड़ता है, साइकिल रहने से थोड़ी आसानी होगी. और देखो, आजकल जमाना कहां से कहां पहुंच गया है. पढ़ेगी नहीं तो अच्छे रिश्ते भी नहीं मिलेंगे.’’

‘‘पर, आप ही तो कल हरी चाचा की बेटी के बारे में कह रहे थे कि पढ़ कर कलक्टर बनेगी क्या?’’ इमराने ने फिर ताना मारा.

इस बार बादो चाचा ने कोई जवाब नहीं दिया.

इमरान ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘चाचा, जैसा आप अपनी पोती के बारे में सोचते हो, वैसा ही दूसरों की बेटियों के बारे में भी सोचा करो. याद है, मेरे बचपन में आप ताने मारते थे जब मेरे साथ गांव की कुछ लड़कियां भी साइकिल चलाना सीखती थीं और आज खुद अपनी पोती की साइकिल खरीदने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हो.

‘‘समय बदल रहा है चाचा, अपनी सोच भी बदलो. गांव में अगर साधन हों तो बच्चियां ट्रेन से पढ़ने क्यों जाएंगी? मजबूरी है तभी तो जा रही हैं. अभी ताने मारते हो और भविष्य में जब खुद पर आएगी तो उसी को फिर सराहोगे.

‘‘क्या पता हरी चाचा की बेटी सच में कलक्टर बन जाए. और नहीं तो कम से कम गांव में ही कोचिंग सैंटर खोल ले, तब शायद आप की जगमला को इस तरह बाजार न जाना पड़े…’’

तभी बीच में सत्तो चाचा कहने लगे, ‘‘लड़कियों की पढ़ाईलिखाई तो सिर्फ इसलिए है बेटा कि शादी के लिए कोई अच्छा सा रिश्ता मिल जाए, हमें कौन सा डाक्टरइंजीनियर बनाना है या नौकरी करवानी है.

‘‘आजकल जिस को देखो, अपनी बहूबेटियों को मास्टर बनाने में लगा हुआ है. उस के लिए आसानआसान तरीके ढूंढ़ रहा है. नौकरी करेंगी, मर्दों के साथ उठनाबैठना होगा, घर का सारा संस्कार स्वाहा हो जाएगा. यह सब लड़कियों को शोभा नहीं देता.’’

इमरान ने कहा, ‘‘चाचा, अगर सब आप की तरह सोचने लगे तो अपनी बहूबेटियों के लिए जो लेडीज डाक्टर ढूंढ़ते हो, वे कहां से लाओगे? घर की औरतें खेतों में जा कर मजदूरी करें, बकरियां चराएं, चारा लाएं, जलावन

चुन कर लाएं, यह शोभा देता है आप को…

‘‘ऐसी औरतें आप लोगों की नजरों में एकदम मेहनती और आज्ञाकारी

होती हैं पर पढ़ीलिखी, डाक्टरइंजीनियर या नौकरी करने वाली लड़कियां संस्कारहीन हैं.

‘‘क्या खेतखलिहानों में सिर्फ औरतें ही काम करती हैं? वहां भी तो मर्द रहते हैं. बचपन से देख रहा हूं कि चाची

ही चाय की दुकान संभालती हैं. रघु चाचा की तो रात वाली उतरी भी नहीं होगी अभी तक. यहां भी तो सिर्फ मर्द ही रहते हैं और यहां पर कितनी संस्कार की बातें होती हैं, यह तो आप सब भी जानते हो.’’

यह सुन कर सब चुप. किसी ने कोई सवालजवाब नहीं किया. इमरान वहां से चला गया.

2 दिन बाद जब इमरान सुबहसुबह ट्रेन पकड़ने जा रहा था तो उस ने देखा कि स्टेशन जाने के रास्ते में जो मैदान पड़ता था वहां बादो चाचा अपनी पोती को साइकिल चलाना सिखा रहे थे.

चाचा की नजरें इमरान से मिलीं और वे मुसकरा दिए. चाय की दुकान पर कही गई इमरान की बातें उन पर असर कर गई थीं. Family Story

Story in Hindi : रेल हादसा – मजा या सजा

Story in Hindi. वह उस रेल से पहली बार बिहार आ रहा था. इंदौर से पटना की यह रेल लाइन बिहार और मध्य प्रदेश को जोड़ती थी. वह मस्ती में दोपहर के 2 बजे चढ़ा. लेकिन 13-14 घंटे के सफर के बाद वह एक हादसे का शिकार हो गया. पूरी रेल को नुकसान पहुंचा था. वह किसी तरह जान बचा कर उतरा. उसे कम ही चोट लगी थी.

उसे पता नहीं था कि अब वह कहां है कि तभी एक बूढ़ी अम्मां ने उस का हाथ थाम कर कहा, ‘‘बेटा, अम्मां से रूठ कर तू कहां भाग गया था?’’

उस ने चौंक कर पीछे की ओर देखा. तकरीबन 64-65 साल की वे अम्मां उसे अपना बेटा समझ रही थीं. फिर तो आसपास के सारे लोगों ने उसे बुढ़िया का बेटा साबित कर दिया.

उसे जबरदस्ती बुढ़िया के घर जाना पड़ा. उस बुढ़िया के बेटे की शक्ल और उम्र पूरी तरह उस से मिलतीजुलती थी. ‘चलो, थोड़ा मजा ले लेते हैं,’ उस ने मन ही मन सोचा.

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रात को खाना खाने के बाद जैसे ही वह सोने के लिए कमरे में पहुंचा, तो चौंक गया. बुढि़या की बहू गरमागरम दूध ले कर उस के पास आई. वह भरेपूरे बदन की सांवले रंग की औरत थी.

‘‘अब मैं कभी आप से नहीं लड़ूंगी. आप की हर बात मानूंगी,’’ वह औरत उस से लिपटते हुए बोली. ‘‘क्यों, क्या हुआ था?’’ उस ने बड़ी हैरानी से पूछा. ‘‘आप शादी के 2 महीने बाद अचानक गायब हो गए थे. सब ने आप को बहुत ढूंढ़ा, पर आप कहीं नहीं मिले. इस गम में बाबूजी चल बसे,’’ वह रोते हुए बता रही थी.

‘‘मैं सब भूल चुका हूं. मुझे कुछ याद नहीं है. मैं किसी को नहीं पहचानता,’’ वह शांत भाव से बोला. उस औरत ने रात को उसे भरपूर देह सुख दिया. सुबह के तकरीबन 8 बजे उस की नींद खुली. उस ने ब्रश कर के चाय पी.

दिन में पता चला कि वह दुकान चलाता था. वह दिनभर में अपनी इस जिंदगी के बारे में काफीकुछ जान गया. उस की 5 बहनें थीं और वह एकलौता भाई है. उस की पत्नी चौथी बहन की ननद है.

तकरीबन 6 साल पहले शादी हुई थी. उस का बेटा लापता हो गया है. शायद सड़क हादसे में या किसी दूसरे हादसे में अपनी औलाद खो चुका है. बेटा वह भी एकलौता, इसलिए यह दर्द दिखाया नहीं जा सकता.

दूसरी ओर अनपढ़ और देहाती बहू है, जो 16-17 साल की उम्र में ही ब्याह कर यहां आई थी. कुछ ही दिनों में पति गुजर गया, इसलिए बड़ी मुश्किल से मिले इस पति को वह संभाल कर रखना चाह रही है.

कितना भी बड़ा हादसा हो, सरकार बस एक जांच कमीशन बिठा देगी. इस से ज्यादा करेगी, तो इस पीड़ित या उस के परिवार को 2-3 लाख रुपए का मुआवजा दे देगी. मगर उसे न तो मुआवजा मिला था, न ही लाश. वैसे भी जनरल डब्बे में सफर करने वाले लोगों की जिंदगी की कोई कीमत है क्या?

काफी दिन न मिलने के चलते उस ने मरा मान लिया था. क्या पता, कहीं जिंदा हो और लौट आया हो. उस हादसे में क्या पता याददाश्त चली गई हो, इसलिए सासबहू दोनों ही अपनेअपने तरीके से उसे याद दिलाने की कोशिश में थीं. 2 दिन बाद ही सभी बहनें, बहनोई और बच्चे आ गए.

‘‘अम्मां, यह तो अपना ही भाई है,’’ चौथी बहन उसे ढंग से देखते हुए उस के हाथपैरों को छू कर बोली. ‘‘क्या मैं अपने साले को नहीं पहचानता… पक्का वही है. मुझे तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं दिखती है.’’ ‘‘बालकिशन, मैं तेरा तीसरे नंबर का जीजा हूं. साथ ही, तेरी पत्नी का बड़ा भाई भी,’’ जीजा उस के कंधे पर हाथ रखते हुए बोल उठा. ‘‘जी,’’ कह कर वह चुप हो गया. बस वह सब को बड़े ही ध्यान से देख रहा था, मानो उन्हें पहचानने की कोशिश कर रहा हो.

‘‘अरी अम्मां, यह हादसे में अपनी याददाश्त बिलकुल ही खो बैठा है. बाद में इसे सब याद आ जाएगा,’’ इतना कह कर उस की बहन उस का हाथ सहलाने लगी. वह इंदौर में अकेला रहता था. वहीं रह कर छोटामोटा काम करता था, जबकि यहां उसे पत्नी, भरापूरा परिवार मिल रहा था. वह बालकिशन का हूबहू था.

पासपड़ोस वालों के साथसाथ सारे नातेरिश्तेदार उसे बालकिशन बता रहे थे और याददाश्त खोया हुआ भी. पत्नी एकदम साए की तरह उस के साथ रहती, ताकि वह दोबारा न भाग जाए.

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एक दिन दोपहर का खाना खाने के तकरीबन डेढ़ घंटे बाद वह अपना काम समझने की कोशिश कर रहा था. यहां उस की पान की दुकान थी. कोई रजिस्टर या कागज… पता चला कि सभी अंगूठाछाप थे. बस, वही 10वीं फेल था. अब कैसे बताए कि वह बीटैक है. लेकिन छोटामोटा चोर है. मोटरसाइकिल पर मास्क लगा कर जाना, औरतों के जेवर उड़ाना और घरों में चोरी करना उस का पेशा है.

मगर, इस परिवार में सभी सीधेसादे हैं. उस की तीसरे नंबर की बहन ने पूरे 5 तोले का सोने का हार पहना हुआ था. गोरा रंग, दोहरा बदन. भारीभरकम शरीर पर वह हार जंच रहा था. जब वह गौर से उस हार को देखने लगा, तो झट से बहनोई बोला, ‘‘क्यों साले साहब, पसंद है तो रख लो इस हार को.’’ ‘‘ऐसी बात नहीं है,’’ वह सकपका कर बोला था.

‘‘फिर भी, तुम मेरी बहन के सुहाग हो. अगर कुछ चाहिए तो बोलो? मेरी बहन की वीरान जिंदगी में बहार आ चुकी है,’’ जीजा भावुक होते हुए बोला.  ‘‘ऐसा कुछ नहीं है,’’ वह मना करते हुए बोला.

शाम को उस का साला जब जाने लगा, तो कुछ रुपए उस की पत्नी को देने लगा और बोला, ‘‘दुकान काफी दिनों से बंद पड़ी हुई है. मैं कल ही जा कर दुकान को सही कर दूंगा.’’ ‘‘न भैया, मेरे पास पैसे हैं. इन के पास भी जेब में 20 हजार रुपए हैं,’’ वह भाई को पैसे देने से मना करते हुए बोली.

‘मगर, मैं तो पान की दुकान चलाना भूल गया हूं. पान लगाना तक नहीं आता मुझे. कैसे बेचूंगा?’ उस के दिमाग में तेजी से कुछ चलने लगा. ‘‘क्या सोच रहे हो साले साहब?’’ जीजा मानो उस के चेहरे को गौर से पढ़ते हुए बोला. ‘‘पान की दुकान मैं ने कभी चलाई नहीं है. मैं तो टैलीविजन, ट्रांजिस्टर, फ्रिज सुधारना जरूर जानता हूं,’’ वह जीजा को समझाते हुए बोला. ‘‘फिर तो हमारे पड़ोस में दुकान ले लेते हैं. 5-10 किलोमीटर में एक भी दुकान नहीं है. खूब चलेगी,’’ जीजा हंसते हुए बोला.

अगले दिन सुबह घर से तकरीबन डेढ़ किलोमीटर दूर बंद पड़ी दुकान उसे सौंपी गई, तो दिनभर में उसे सुधार कर दुकान की शक्ल दे दी. जरूरी सामान का इंतजाम किया गया. पहले दिन वह 5 सौ रुपए कमा कर लाया, तो बहुत खुश था. जीजा भी उस के काम से खुश था. वह उसे खुद घर छोड़ने आया था.

‘‘अम्मां, यह तो कुशल कारीगर है. देखो, आज ही इस ने 5 सौ रुपए कमा लिए. अब तक यह 4 और्डर पा चुका है,’’ जीजा जोश में बोल रहा था. ‘‘अब बेटा आ गया है न, मेरी सारी गरीबी दूर हो जाएगी,’’ अम्मां तकरीबन रोते हुए कह रही थीं. ‘‘रो मत अम्मां. मैं सब ठीक कर लूंगा,’’ वह पहली बार बोला था.

रात को खाना खाने के बाद जब वह बिस्तर पर सोने पहुंचा, तो पत्नी खुशी से भरी थी, ‘‘अरे, आप तो बहुत ही कुशल कारीगर निकले,’’ वह चुहल करते हुए पूछ रही थी. ‘‘कुछ नहीं. बस यों ही थोड़ाबहुत जानता हूं.’’

सोते समय वह सोचने लगा, ‘अब तक मैं चोरउचक्का था. गंदे काम से पैसे कमाने वाला. अब मैं मेहनत से पैसा कमाऊंगा और परिवार का पेट भरूंगा,’ इतना सोचतेसोचते उस ने पत्नी के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और बोला, ‘‘मैं तुम्हें अब कभी नहीं छोड़ूंगा… कभी नहीं.’’ इतना कहते ही उसे सुख की नींद आने लगी. सच कहें, तो इस सजा में भी मजा था. Story in Hindi

Family Story : अदलाबदली – क्यों था झगड़ा चौकोर जमीन का?

Family Story. जब से गांव की कच्ची सड़क को हाईवे से जोड़ने की बात छिड़ी है, कारू के घर में कुहराम मच गया. उस की पत्नी को लगा कि जेठजी की जमीन के ज्यादा दाम मिलेंगे, जबकि जमीन का बंटवारा कारू के मनमुताबिक हुआ था. कारू इस बवाल से परेशान हो गया था. क्या उस का बड़ा भाई ललन इस समस्या का हल निकाल पाया?

ललन और कारू 2 भाई अपने परिवार के साथ पुश्तैनी जमीन पर अपनेअपने हिस्से में रह रहे थे. दोनों भाइयों की आपस में कभीकभार 2-4 बातें हो जाया करती थीं, पर दोनों की पत्नियां एकदूसरे को फूटी आंख न सुहाती थीं. अब तो एक नया बखेड़ा खड़ा हो गया था, जिस से आएदिन हीलहुज्जत तय थी.

पहले जमीन के आगे कच्चा रास्ता हुआ करता था, पर जब से उसे नैशनल हाईवे से उसे पक्की सड़क बना कर जोड़े जाने की खबर उड़ी है, तब से छोटे भाई कारू के घर अकसर चिकचिक होती रहती थी.

सड़क बनने के सिलसिले में कुछ लोगों की जमीन उस हिस्से में पड़ रही थी. कारू की 4 हाथ और ललन की कुछ ज्यादा ही जमीन थी.

जाहिर था कि सरकार की तरफ से पैसा भी उसी हिसाब से मिलना था. कारू की पत्नी को लग रहा था कि उस के साथ गलत हुआ है. ललन को पहले से ही मालूम था कि भविष्य में इधर से बड़ी सड़क गुजरेगी, तभी उस ने आसानी से हर बात मान ली थी.

कारू तो हमेशा से शहर में रहता रहा था. उसे गांव का कुछ खास अतापता भी तो न था. बारबार उस के दिमाग में एक ही विचार कौंध रहा था कि आखिर कोई सामने की जगह छोड़ कर तिरछा हिस्सा क्यों लेना चाहेगा, जैसा कि ललन ने किया था?

गांव वालों के सामने सब की रजामंदी से 2 हिस्से हुए थे. ललन ने तो छोटे भाई की मरजी पर ही छोड़ दिया. जिधर तुम्हें चाहिए वह ले लो. सब ने ललन की दरियादिली पर उस की तारीफ भी की थी.

‘‘आखिर ललन ने राम की मिसाल पेश कर दी, वरना कौन इस तरह किसी की मरजी पर छोड़ता है आज के कलयुगी जमाने में.’’

कारू की पत्नी झट से बोल पड़ी थी, ‘‘मुझे तो सामने का ही हिस्सा चाहिए…’’ चौकोर जमीन उस की आंखों में तैर रही थी. ललन ने बस इतना ही कहा था, ‘‘भाई, जमीन 2 हिस्सों में बंटी है, हमारे दिल नहीं बंटने चाहिए.’’

कारू की पत्नी बहुत खुश थी, पर आज वह अपने ही फैसले पर सिर फोड़ रही थी. हर वक्त बुराभला कहती रहती. ‘‘आज जो तुम ने बात नहीं की, तो मेरा मरा मुंह देखना. आखिरी बार कहे देती हूं तुम्हें…’’

वह कारू को कहती, ‘‘जाओ, अपने बड़े भाई से कहो कि यह 4 हाथ जमीन भी ले ले. हमें तो जानबूझ कर ठगा गया है. आज हमारे पास भी ज्यादा जमीन होती, तो ज्यादा पैसे मिलते.’’

वह भी चिढ़ कर कह देता, ‘‘भैया ने कोई जोरजबरदस्ती नहीं की थी. तुम ने ही आगे बढ़ कर कहा था. जो चाहा वह मिला. यह उन का नसीब है कि उन की जमीन रास्ते में जाएगी. मैं नहीं जाता कहने, तुम्हें जो करना है करो.’’ कारू किस मुंह से बड़े भाई को कहता. ललन ने उसे ही तो फैसले का हक दिया था.

कारू को अपनी पत्नी पर बहुत गुस्सा आ रहा था. खुद ही तो आगे बढ़ कर बोली थी और आज घर में कुहराम मचा रखा है. 2 दिन से खानापीना सब पर आफत छाई थी. बच्चे बाहर से कुछकुछ ला कर खा रहे थे. कारू भी कल सुबह से जो गया देर शाम होने को आया, वह घर नहीं लौटा था.

न जाने क्यों ललन का मन बेचैन हो रहा था. खून के रिश्ते जब तक गाढ़े रहते हैं तो सुखदुख का भी भान होता है. आज उसे कारू की चिंता सता रही थी. कुछ तो बात है. इतना सन्नाटा कि कोई आवाज भी नहीं. धड़कते दिल से बच्चों को आवाज लगाई.

मालूम चला कि पिछले 2 दिन से घर में चूल्हा नहीं जल रहा है, खाना नहीं बन रहा है और कारू भी घर नहीं आया. अब तो पक्का यकीन हो गया था कि कुछ तो गड़बड़ है. पर क्या…?

ललन ने टौर्च उठाई और हर ठिकाने पर जाजा कर ढूंढ़ता रहा, लोगों से पूछता रहा, ‘‘किसी ने कारू को देखा है क्या?’’ कहीं कोई खाबर नहीं थी. मन में तरहतरह के खयाल हिलोरें मार रहे थे. आखिर गया तो कहां गया?

तभी किसी ने बताया कि कारू को गांव के बाहर बने देवस्थान के चबूतरे पर लेटे हुए देखा था, जहां कभी किसी खास मौके पर लोग जाते थे. ललन दौड़ कर उस ओर आवाज लगाता हुआ गया.

‘‘कारू, यह क्या भाई… तू यहां क्यों लेटा है? बच्चों से मालूम चला कि कल सुबह से ही घर से निकले हो तुम. ऐसा कोई करता है भला. 2-4 बातें पतिपत्नी में हो भी गईं तो क्या हुआ. सब ठीक हो जाएगा. चलो मेरे साथ… गांव वाले क्या कहेंगे…’’

‘‘घर… कौन सा घर भैया… जहां पत्नी मेरे सिर पर तांडव करती है. सब तो उस का ही कियाधरा है, फिर भी आएदिन के झगड़ों से परेशान हो गया हूं. घर में मैं सो नहीं पा रहा हूं. यहां काफी अच्छी नींद आई.’’

‘‘इस तरह की बहकीबहकी बातें मत करो. चलो मेरे साथ. क्या बात है, मुझे बताओ… बच्चों से पूछना अच्छा नहीं लगता. तुम ही बता दो अब. मुझे बड़ा भाई मानते हो तो…’’ ‘‘भैया… मानूंगा क्यों नहीं. हमेशा मेरे लिए आप खड़े रहे. आप ने कितने त्याग किए हैं, मुझ से ज्यादा और कौन जान सकता है…’’ और वह बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगा.

ललन कारू के सिर पर हाथ फिराते हुए बोला, ‘‘बोल न, बात क्या है, जिस ने तुझे इतना परेशान कर रखा है?’’ ‘‘भैया, वह कहती है कि वह 4 हाथ जमीन भी आप ही ले लें, जो सड़क बनने में जा रही है. आप की ज्यादा जमीन गई है, तो पैसे भी आप को ज्यादा मिलेंगे. आप ने जानबूझ कर पीछे की तरफ की जमीन ली थी. यही झगड़े की वजह है.’’

‘‘ठीक है… तो एक काम करते हैं कि अपनीअपनी जगह बदल लेते हैं, तब तो कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. तुम मेरे हिस्से की और मैं तुम्हारे हिस्से की जमीन ले लेता हूं. चलो, चल कर घर में बात कर लो.’’

‘‘पर भैया, क्या भाभी कुछ नहीं बोलेंगी?’’ ‘‘वह बाद में देख लेंगे. पहले अपनी पत्नी से बात तो करो. सब हल निकल जाएगा.’’ कारू ने अपनी पत्नी के सामने यह प्रस्ताव रखा. इस बार ललन की पत्नी ने भी कुछ बोलना चाहा, पर सारी बात समझाने पर वह चुप ही रही.

इधर कारू ने अपनी पत्नी से सारी बात कही. पहले तो वह सुन कर बहुत खुश हुई, लेकिन जब दिमाग लगाया तो उस की गणना ही उसे ठेंगा दिखाती मिली.

ललन की जमीन हमेशा दबंगों की नजर में खटकती रहती, पर ललन की भलमनसाहत और अच्छा स्वभाव उन्हें हर बार रोक लेता था. सरकार जमीन ले रही थी तो एवज में पैसे भी दे रही थी, जिस से वह कहीं दूसरी जमीन खरीद सकता था.

यह बात कारू की पत्नी को पता थी कि उस के स्वभाव के चलते उस की गांव में अच्छी इमेज नहीं थी. कोई साथ भी नहीं देगा. आखिर में उस ने चुप रहना ही बेहतर समझ.

कारू के पूछने पर उस ने कहा, ‘‘जो जिसे मिला वही ठीक है. मेरे 4 हाथ तो 4 हाथ ही सही, मुझे अदलाबदली नहीं करनी.’’

अब दोनों भाइयों के चेहरे पर सुकून आ गया था. Family Story

Hindi Story. मां जल्दी आना: विनीता अपनी मां को क्यों साथ रखना चाहती थी?

Hindi Story. औफिस से आ कर जैसे ही मैं ने घर में प्रवेश किया एक सोंधी सी महक मेरे पूरे तनमन में फैल गई. बैग को सोफे पर पटक हाथमुंह धो कर मैं सीधे किचन में जा घुसी. कड़ाही में सिक रहे समोसों को देख कर पीछे से मां के गले में बांहें डाल कर बोली, ‘‘अरे वाह मां, आज तो आप ने समोसे बना कर मोगैंबो को खुश कर दिया. बोलिए आप को क्या चाहिए.’’

‘‘तू खुद मां बन गई है पर अभी भी बचपना नहीं गया तेरा, ले जल्दी से खा कर बता कैसे बने हैं.’’ प्लेट में 2 समोसे और धनिया की चटनी डाल कर देते हुए मां ने हलकी सी चपत मेरे गाल पर लगा दी.

‘‘मां बन गई तो क्या मैं आप की बच्ची नहीं रही,’’ कहते हुए मैं समोसे खाने लगी. सर्दियों में मां के हाथ के समोसों के हम सब दीवाने थे. मुझे याद है मां किलोकिलो मैदा के समोसे बनातीं पर हम भाईबहन खाने में प्रतियोगिता सी करते और सारे समोसों को चट कर जाते थे. मां को कुकिंग का बहुत शौक था इसीलिए शायद हम भाईबहन बहुत चटोरे हो गए थे. मैं बचपन की सुनहरी यादों में कुछ और खोती उस से पहले मेरे पतिदेव अमन ने घर में प्रवेश किया और आते ही फरमान जारी किया.

‘‘विनू, जल्दी से कड़क चाय पिला दो सिर में तेज दर्द हो रहा है.’’

‘‘बेटा तुम हाथमुंह धो कर आ जाओ मैं ने तुम्हारी पसंद के पनीर के समोसे बनाए हैं और कड़क चाय बस तैयार होने ही वाली है.’’

‘‘अरे मां, आप क्यों परेशान होती हो इतनी बार आप से कहा है कि आप बस आराम किया करिए पर नहीं आप मान नहीं सकतीं.’’

‘‘बेटा हाथपैर चलते रहेंगे तो बुढ़ापा आराम से कट जाएगा पर अगर जाम हो गए तो मेरे साथसाथ तुम लोग भी परेशान हो जाओगे. इसलिए हलकाफुलका काम तो करने ही देते रहो… जिंदगीभर तो काम में कोल्हू के बैल की तरह जुते रहे और अब तुम आराम करने को कह रहे हो तो बताओ कैसे हो पाएगा…’’ मां ने मुसकराते हुए कहा तो अमन निशब्द से हो गए.

हमें खिला कर मां अपनी प्लेट लगा कर ले आईं और टीवी देखते हुए स्वयं भी खाने लगीं. मां की शुरू से आदत है कि जब तक घर के एकएक सदस्य को खिला नहीं लेंगी तब तक स्वयं नहीं खाएंगी.

मैं चेंज कर के कुछ देर आराम करने के उद्देश्य से बिस्तर पर लेट गई. लेटते ही मन आज से 2 वर्ष पूर्व जा पहुंचा जब एक दिन सुबहसुबह मेरे भाई अनंत का मेरे पास फोन आया. मां और बाबूजी उस समय अनंत के ही पास थे. मेरे फोन उठाते ही वह बोला, ‘‘मैं तो परेशान हो गया हूं इन दोनों से, जब भी घर में आओ तो लगता है मानो 2 जासूस बैठे हैं घर में, हमारा इन के साथ एडजस्ट करना बहुत मुश्किल हो रहा है. दीदी आप ही कोई तरीका बताओ जिस से ये दोनों यहां से चले जाएं,’’ अनंत की बातें सुन कर मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया था.

उस से उम्र में 10 वर्ष बड़ी होने के बावजूद समझ नहीं पाई कि उस के प्रश्न का क्या जवाब दूं. जिस बेटे के जन्म के लिए मांबाबूजी ने न जाने कितनी मन्नतें मांगी, कितने मंदिर मस्जिद के दरवाजे खटखटाए और जिस के जन्म होने पर लगा मानो उन के जीवन के समस्त दुखों का हरण हो गया हो वही बेटा आज उन्हें जासूस कह रहा था. अपनी संतान की प्रगति से खुश होने वाले मातापिता अपने ही बेटे के घर में जासूस कैसे हो सकते हैं. भारतीय संस्कृति में पुत्र को मोक्ष के द्वार तक पहुंचाने वाला कहा गया है.

हमारे धर्मरक्षकों ने इस पर और चाशनी चढ़ाई कि मरणोपरांत पुत्र के द्वारा दी गई मुखाग्नि से ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है अन्यथा तो मानव बस नरक में ही जाता है बस इसी मानसिकता के शिकार धर्मभीरू मांबाबूजी इस कमर तोड़ती महंगाई में भी एक के बाद एक तीन बेटियों की कतार लगाते गए. इस बीच मां के गर्भ में पल रहीं कुछ बेटियों को तो जन्म ही नहीं लेने दिया गया. खैर इंतजार का फल मीठा होता है यह कहावत हमारे घर में भी चरितार्थ हुई और अंत में जब बेटा हुआ तो लगा मानो साक्षात स्वर्ग के द्वार खुल गए हों.

मांबाबूजी को उन का वह अनमोल हीरा मिल गया था जो उन की वृद्धावस्था को तारने वाला था. अपने हीरेमोती जैसे भाई को पा कर हम बहनों की खुशी का भी कोई ठिकाना नहीं था क्योंकि हर रक्षाबंधन और भाईदूज पर हमें ताऊजी के बेटों की राह देखनी पड़ती थी. अब वह औपचारिकता समाप्त हो गई थी. समय अपनी गति से बढ़ रहा था. हम तीनों बहनों की शादियां हो गईं. दोनों बड़ी बहनें अपने परिवार के साथ विदेश जा बसीं थी सो सालदोसाल में एक बार ही आ पातीं थी. न केवल भाई अनंत बल्कि हम बहनों को पढ़ाने लिखाने में भी मांबाबूजी ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. अब तक अनंत भी इंजीनियरिंग कर के दिल्ली में एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छे पैकेज पर नौकरी करने लगा था. मैं भी यहां मुंबई में एक बैंक में कार्यरत थी.

भारतीय समाज में लड़केकी नौकरी लगते ही उस की बोली लगनी प्रारंभ हो जाती है सो अनंत के लिए भी रिश्तों की लाइन लगी थी. जब भी किसी लड़की का फोटो आता तो मांबाबूजी की खुशी देखते ही बनती थी. अपने बुढ़ापे का सुखमय होने का सपना देख रहे मांबाबूजी को उस समय तगड़ा झटका लगा जब एक बार अनंत छुट्टियों में घर आया और मांबाबूजी की लड़की देखने की तैयारी देख कर घोषणा की.

‘‘मां मैं एक लड़की से प्यार करता हूं और उसी से विवाह करूंगा. आप लोग

नाहक परेशान न हों.’’ अनंत एक वाक्य में अपनी बात कह कर घर से बाहर निकल गया.

‘‘मांबाबूजी को काटो तो खून नहीं. मां कभी उस दरवाजे को देखतीं जहां से अभी अनंत निकल कर गया था और कभी बाबूजी को. अपने कानों सुनी बात पर वे भरोसा ही नहीं कर पा रहीं थीं. अचानक किए गए अनंत के इस विस्फोट से वे बुरी तरह घबरा गईं और फूटफूट कर रोने लगीं और बोली,’’ इसी दिन के लिए पैदा किया था इसे. इसे पता भी है कि कितने बलिदानों के बाद हम ने इसे पाया है. क्याक्या सपने संजोए थे बहू को ले कर, इस ने एक बार भी नहीं सोचा हमारे बारे में. बाबूजी शायद मामले की गंभीरता को भांप नहीं पाए थे या अपने बेटे पर अतिविश्वास को सो वे मां को दिलासा देते हुए बोले, ‘‘मैं समझाऊंगा उसे, बच्चा है, समझ जाएगा. सब ठीक हो जाएगा. यह सब क्षणिक आवेश है. मेरा बेटा है अपने पिता की बात अवश्य मानेगा.’’

मां को भी बाबूजी की बातों पर और उस से भी ज्यादा अपने बेटे पर भरोसा था. सो बोलीं, ‘‘हां तुम सही कह रहे हो मुझे लगता है मजाक कर रहा होगा. ऐसा नहीं कर सकता वह. हमारे अरमानों पर पानी नहीं फेरेगा हमारा बेटा.’’

चूंकि अगले दिन अनंत वापस दिल्ली चला गया था सो बात आईगई हो गई पर अगली बार जब अनंत आया तो बाबूजी ने एक लड़की वाले को भी आने का समय दे दिया. अनंत ने उन के सामने बड़ा ही रूखा और तटस्थ व्यवहार किया और लड़की वालों के जाते ही मांबाबूजी पर बिफर पड़ा.

‘‘ये क्या तमाशा लगा रखा है आप लोगों ने, जब मैं ने आप को बता दिया कि मैं एक लड़की से प्यार करता हूं और शादी भी उसी से करूंगा फिर इन लोगों को क्यों बुलाया. वह मेरे साथ मेरे ही औफिस में काम करती है. और यह रही उस की फोटो,’’ कहते हुए अनंत ने एक पोस्टकार्ड साइज की फोटो टेबल पर पटक दी.

अपने बेटे की बातों को किंकर्त्तव्यविमूढ़ सी सुन रहीं मां ने लपक कर टेबल से फोटो उठा ली. सामान्य से नैननक्श और सांवले रंग की लड़की को देख कर उन की त्यौरियां चढ़ गईं और बोलीं, ‘‘बेटा ये तो हमारे घर में पैबंद जैसी लगेगी. तुझे इस में क्या दिखा जो लट्टू हो गया.’’

‘‘मां मेरे लिए नैननक्श और रंग नहीं बल्कि गुण और योग्यता मायने रखते हैं और यामिनी बहुत योग्य है. हां एक बात और बता दूं कि यामिनी हमारी जाति की नहीं है,’’ अनंत ने कुछ सहमते हुए कहा.

‘‘अपनी जाति की नहीं है मतलब???’’ बाबूजी गरजते स्वर में बोले.

‘‘मतलब वह जाति से वर्मा हैं’’ अनंत ने दबे से स्वर में कहा.

‘‘वर्मा!!! मतलब!! सुनार!!! यही दिन और देखने को रह गया था. ब्राह्मण परिवार में एक सुनार की बेटी बहू बन कर आएगी… वाहवाह इसी दिन के लिए तो पैदा किया था तुझे. यह सब देखने से पहले मैं मर क्यों न गया. मुझे यह शादी कतई मंजूर नहीं,’’ बाबूजी आवेश और क्रोध से कांपने लगे थे. किसी तरह मां ने उन्हें संभाला.

‘‘तो ठीक है यह नहीं तो कोई नहीं. मैं आप लोगों की खुशी के लिए आजीवन कुंआरा रहूंगा.’’ अनंत अपना फैसला सुना कर घर से बाहर चला गया था. उस दिन न घर में खाना बना और न ही किसी ने कुछ खाया. प्रतिपल हंसीखुशी से गुंजायमान रहने वाले हमारे घर में ऐसी मनहूसियत छाई कि सब के जीवन से उल्लास और खुशी ने मानो अपना मुंह ही फेर लिया हो. विवाहित होने के बावजूद हम बहनों को भी इस घटना ने कुछ कम प्रभावित नहीं किया. मांबाबूजी का दुख हम से देखा नहीं जाता था और भाई अपने पर अटल था पर शायद समय सब से बड़ा मरहम होता है. कुछ ही माह में पुत्रमोह में डूबे मांबाबूजी को समझ आ गया था कि अब उन के पास बेटे की बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं है. जिस घर की बेटियों को उन की मर्जी पूछे बगैर ससुराल के लिए विदा कर दिया गया था उस घर में बेटे की इच्छा का मान रखते हुए अंतर्जातीय विवाह के लिए भी जोरशोर से तैयारियां की गईं.

अनंत मांबाबूजी की कमजोर नस थी सो उन के पास और कोई चारा भी तो नहीं था. खैर गाजेबाजे के साथ हम सब यामिनी को हमारे घर की बहू बना कर ले आए थे. सांवली रंगत और बेहद साधारण नैननक्श वाली यामिनी गोरेचिट्टे, लंबे कदकाठी और बेहद सुंदर व्यक्तित्व के स्वामी अनंत के आसपास जरा भी नहीं ठहरती थी पर कहते हैं न कि ‘‘दिल आया गधी पे तो परी क्या चीज है?’’

एक तो बड़ा जैनरेशन गैप दूसरे प्रेम विवाह तीसरे मांबाबूजी की बहू से आवश्यकता से अधिक अपेक्षा, इन सब के कारण परिवार के समीकरण धीरेधीरे गड़बड़ाने लगे थे. बहू के आते ही जब मांबाबूजी ने ही अपनी जिंदगी से अपनी ही पेटजायी बेटियों को दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका था तो बेटेबहू के लिए तो वे स्वत: ही महत्वहीन हो गई थी. कुछ ही समय में बहू ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे.

अनंत और उस की पत्नी यामिनी को परिवार के किसी भी सदस्य से कोई मतलब नहीं था. कुछ समय पूर्व ही यामिनी की डिलीवरी होने वाली थी तब मांबाबूजी गए थे अनंत के पास. नवजात पोते के मोह में बड़ी मुश्किल से एक माह तक रहे थे दोनों तभी अनंत ने मुझ से उन्हें वापस भोपाल आने का उपाय पूछा था. मैं ने भी येनकेन प्रकारेण उन्हें दिल्ली से भोपाल वापस आने के लिए राजी कर लिया था.

अभी उन्हें आए कुछ माह ही हुए थे कि अचानक एक दिन बाबूजी को दिल का दौरा पड़ा और वे इस दुनिया से ही कूच कर गए पीछे रह गई मां अकेली. लोकलाज निभाते हुए अनंत मां को अपने साथ ले तो गया परंतु वहां के दमघोंटू वातावरण और यामिनी के कटु व्यवहार के कारण वे वापस भोपाल आ गईं और अब तो पुन: दिल्ली जाने से साफ इंकार कर दिया. सोने पे सुहागा यह कि अनंत और यामिनी ने भी मां को अपने साथ ले जाने में कोई रुचि नहीं दिखाई. मनुष्य का जीवन ही ऐसा होता है कि एक समस्या का अंत होता है तो दूसरी उठ खड़ी होती है.

अचानक एक दिन मां बाथरूम में गिर गईं और अपना हाथ तोड़ बैठीं. अनंत ने इतनी छोटी सी बात के लिए भोपाल आना उचित नहीं समझा बस फोन पर ही हालचाल पूछ कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली. दोनों बड़ी बहनें तो विदेश में होने के कारण यूं भी सारी जिम्मेदारियों से मुक्त थीं. बची मैं सो अनंत का रुख देख कर मेरे अंदर बेटी का कर्त्तव्य भाव जाग उठा. फ्रैक्चर के बाद जब मां को देखने गई तो उन्हें अकेला एक नौकरानी के भरोसे छोड़ कर आने की मेरी अंतआर्त्मा ने गवाही नहीं दी और मैं मां को अपने साथ मुंबई ले कर आ गई. मैं कुछ और आगे की यादों में विचरण कर पाती तभी मेरे कानों में अमन का स्वर गूंजा.

‘‘कहां हो भाई खानावाना मिलेगा… 9 बजने जा रहे हैं.’’ मैं ने अपने खुले बालों का जूड़ा बनाया और फटाफट किचन में जा पहुंची. देखा तो मां ने रात के डिनर की पूरी तैयारी कर ही दी थी बस केवल परांठे बनाने शेष थे. मैं ने फुर्ती से गैस जलाई और सब को गरमागरम परांठे खिलाए. सारे काम समाप्त कर के मैं अपने बैडरूम में आ गई. अमन तो लेटते ही खर्राटे लेने लगे थे पर मैं तो अभी अपने विगत से ही बाहर नहीं आ पाई थी. आज भी वह दिन मुझे याद है जब मां को देखने गई मैं वापस मां को अपने साथ ले कर लौटी थी. मुझे एअरपोर्ट पर लेने आए अमन ने मां के आने पर उत्साह नहीं दिखाया था बल्कि घर आ कर तल्ख स्वर में बोले,’’ ये सब क्या है विनू मुझ से बिना पूछे इतना बड़ा निर्णय तुम ने कैसे ले लिया.

‘‘कैसे मतलब… अपनी मां को अपने साथ लाने के लिए मुझे तुम से परमीशन लेनी पड़ेगी.’’ मैं ने भी कुछ व्यंग्यात्मक स्वर में उतर दिया था.

‘‘क्यों अब क्यों नहीं ले गया इन का सगा बेटा इन्हें अपने साथ जिस के लिए इन्होंने बेटी तो क्या दामादों तक को सदैव नजरंदाज किया.’’

‘‘अमन आखिर वे मेरी मां हैं… वह नहीं ले गया तभी तो मैं ले कर आई हूं. मां हैं वो मेरी ऐसे ही तो नहीं छोड़ दूंगी.’’ मेरी बात सुन कर अमन चुप तो हो गए पर कहीं न कहीं अपनी बातों से मुझे जता गए कि मां का यहां लाना उन्हें जंचा नहीं. इस के बाद मेरी असली परीक्षा प्रारंभ हो गई थी. अपने 20 साल के वैवाहिक जीवन में मैं ने अमन का जो रूप आज तक नहीं देखा था वह अब मेरे सामने आ रहा था.

घर आ कर सब से बड़ा यक्षप्रश्न था हमारे 2 बैडरूम के घर में मां को ठहराने का. 10 वर्षीय बेटी अवनि के रूम में मां का सामान रखा तो अवनि एकदम बिदक गई. अपने कमरे में साम्राज्ञी की भांति अब तक एकछत्र राज करती आई अवनि नानी के साथ कमरा शेयर करने को तैयार नहीं थी. बड़ी मुश्किल से मैं ने उसे समझाया तब कहीं मानी पर रात को तो अपना तकिया और चादर ले कर उस ने हमारे बैड पर ही अपने पैर पसार लिए कि ‘‘आज तो मैं आप लोगों के साथ सोउंगी भले ही कल से नानी के साथ सो जाउंगी.’’

पर जैसे ही अमन सोने के लिए कमरे में आए तो अवनि को बैडरूम में देख कर चौंक गए.

‘‘लो अब प्राइवेसी भी नहीं रही.’’

‘‘आज के लिए थोड़ा एडजस्ट कर लो कल से तो अवनि नानी के साथ ही सोएगी.’’ मैं ने दबी आवाज में कहा कि कहीं मां न सुन लें.

‘‘एडजस्ट ही तो करना है, और कर भी क्या सकते हैं.’’ अमन ने कुछ इस अंदाज में कहा मानो जो हो रहा है वह उन्हें लेशमात्र भी पसंद नहीं आ रहा पर उन्हें इग्नोर करने के अलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं था. मां को सुबह जल्दी उठने की आदत रही है सो सुबह 5 बजे उठ कर उन्होंने किचन में बर्तन खड़खड़ाने प्रारंभ कर दिए थे. मैं मुंह के ऊपर से चादर तान कर सब कुछ अनसुना करने का प्रयास करने लगी. अभी मेरी फिर से आंख लगी ही थी कि अमन की आवाज मेरे कानों में पड़ी.

‘‘विनू ये मम्मी की घंटी की आवाज बंद कराओ मैं सो नहीं पा रहा हूं.’’ मैं ने लपक कर मुंह से चादर हटाई तो मां की मंदिर की घंटी की आवाज मेरे कानों में भी शोर मचाने लगी. सुबह के सर्दी भरे दिनों में भी मैं रजाई में से बाहर आई और किसी तरह मां की घंटी की आवाज को शांत किया. जब से मां आईं मेरे लिए हर दिन एक नई चुनौती ले कर आता. 2 दिन बाद रात को जैसे ही मैं सोने की तैयारी कर रही थी कि अवनि ने पिनपिनाते हुए बैडरूम में प्रवेश किया.

‘‘मम्मी मैं नानी के पास तो नहीं सो सकती, वे इतने खर्राटे लेती हैं कि मैं सो ही नहीं पाती.’’ और वह रजाई तान कर सो गई. अमन का रात का कुछ प्लान था जो पूरी तरह चौपट हो गया था और वे मुझे घूरते हुए करवट ले कर सो गए थे बस मेरी आंखों में नींद नहीं थी. अगले दिन अमन को जल्दी औफिस जाना था पर जैसे ही वे सुबह उठे तो बाथरूम पर मां का कब्जा था उन्हें सुबह जल्दी नहाने का आदत जो थी. बाथरूम बंद देख कर अमन अपना आपा खो बैठे.

‘‘विनू मैं लेट हो जाऊंगा मम्मी से कहो हमारे औफिस जाने के बाद नहाया करें उन्हें कौन सा औफिस जाना है.’’

‘‘अरे औफिस नहीं जाना है तो क्या हुआ बेटा चाय तो पीनी है न और तुम जानते हो कि मैं बिना नहाए चाय भी नहीं पीती.’’ मां ने बाथरूम से बाहर निकल कर सफाई देते हुए कहा. जिंदगीभर अपनी शर्तों पर जीतीं आईं मां के लिए स्वयं को बदलना बहुत मुश्किल था और अमन मेरे साथ कोऔपरेट करने को तैयार नहीं थे. इस सब के बीच मैं खुद को तो भूल ही गई थी. किसी तरह तैयार हो कर लेटलतीफ बैंक पहुंचती और शाम को बैंक से निकलते समय दिमाग में बस घर की समस्याएं ही घूमतीं. इस से मेरा काम भी प्रभावित होने लगा था. मेरी हालत ज्यादा दिनों तक बैंक मैनेजर से छुपी नहीं रह सकी और एक दिन मैनेजर ने मुझे अपने केबिन में बुला ही भेजा.

‘‘बैठो विनीता क्या बात है पिछले कुछ दिनों से देख रही हूं तुम कुछ परेशान सी लग रही हो. यदि कोई ऐसी समस्या है जिस में मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं तो बताओ. अपने काम में सदैव परफैक्शन को इंपोर्टैंस देने वाली विनीता के काम में अब खामियां आ रही हैं इसीलिए मैं ने तुम्हें बुलाया.’’

‘‘नहीं मैम ऐसी कोई बात नहीं है बस कुछ दिनों से तबियत ठीक नहीं चल रही है. सौरी अब मैं आगे से ध्यान रखूंगी.’’ कह कर मैं मैडम के केबिन से बाहर आ गई. क्या कहूं मैडम से कि बेटियां कितनी भी पढ़ लिख लें, आत्मनिर्भर हो जाएं पर अपने मातापिता को अपने साथ रखने या उन की जिम्मेदारी उठाने के लिए पति का मुंह ही देखना पड़ता है.

एक पति अपनी पत्नी से अपने मातापिता की सेवा करवाना तो पसंद करता है परंतु सासससुर की सेवा करने में अपनी हेठी समझता है. समाज की इस दोहरी मानसिकता से अमन भी अछूता नहीं था. यदि वह चाहता तो मां के साथ भलीभांति तालमेल बैठा कर नित नई उत्पन्न होने वाली समस्याओं को काफी हद तक कम कर सकता था. यों भी हम दोनों मिल कर अब तक के जीवन में आई प्रत्येक समस्या का सामना करते ही आए थे परंतु जब से मां आई हैं अमन ने उसे अकेला कर दिया. बीती यादों को सोचतेसोचते कब उस की आंख लग गई उसे पता ही नहीं चला.

सुबह बैड के बगल की खिड़की के झीने परदों से आती सूरज की मद्धिम रोशनी और चिडि़यों की चहचहाहट से उस की नींद खुल गई. तभी अमन ने चाय की ट्रे के साथ कमरे में प्रवेश किया, ‘‘उठिए मैडम मेरे हाथों की चाय से अपने संडे का आगाज कीजिए.’’

‘‘ओह क्या बात है आज तो मेरा संडे बन गया,’’ मैं फ्रैश हो कर चाय का कप ले कर अमन के बगल में बैठ गई.

‘‘तो आज संडे का क्या प्लान है मैडम, मम्मी और अवनि भी आते ही होंगे.’’

‘‘मम्मा आज हम लोग वंडरेला पार्क चलेंगे फोर होल डे इंजौयमैंट. चलोगे न मम्मा और नानी भी हमारे साथ चलेंगी.’’ मां के साथ वाक करके  लौटी अवनि ने हमारी बातें सुन कर संडे का अपना प्लान बताया.

‘‘हांहां हम सब चलेंगे. चलो जल्दी से ब्रेकफास्ट कर के सब तैयार हो जाओ.’’ मेरे बोलने से पहले ही अमन ने घोषणा कर दी. पूरे दिन के इंजौयमैंट के बाद लेटनाइट जब घर लौटे तो सब थक कर चूर हो चुके थे सो नींद के आगोश में चले गए. मुझे लेटते ही वह दिन याद आ गया जब मां के आने के बाद एक दिन यूएस से अमन की मां ने फोन कर के बताया कि अगले हफ्ते वे इंडिया वापस आ रहीं हैं. 4 साल पहले अमन के पिता का एक बीमारी के चलते देहांत हो गया था. उस के बाद से उन की मां ने ही अपने दोनों बच्चों को पालपोस कर बड़ा किया. अमन 2 ही भाई बहन हैं जिन में दीदी की शादी एक एनआरआई से हुई तो वे विवाह के बाद से ही अमेरिका जा बसीं थी. पिछले दिनों उन की डिलीवरी के समय मम्मीजी वहां गई थीं और अब उन का वापसी का समय हो गया था सो आ रही थीं. दोनों बच्चे अपनी मां से बहुत अटैच्ड हैं. उस दिन मैं बैंक से वापस आई तो अमन का मुंह फूला हुआ था. जैसे ही मां सोसाइटी के मंदिर में गईं थी वे फट पड़े.

‘‘अब बताओ मेरी मां कहां रहेंगी? क्या सोचेंगी वे कि मेरे बेटे के घर में तो मेरे लिए जगह तक नहीं है. आखिर इंडिया में है ही कौन मेरे अलावा जो उन्हें पूछेगा. तुम्हारे तो और भाईबहन भी हैं मैं तो एक ही हूं न मेरी मां के लिए.’’

‘‘अमन थोड़ी शांति तो रखो, आने दो मम्मीजी को सब हो जाएगा. मैं ने कहां मना किया है उन की जिम्मेदारी उठाने से पर अपनी मां की जिम्मेदारी भी है मेरे ऊपर. यह कह कर कि और भाईबहन उन्हें रखेंगे अपने पास मैं कैसे अकेला छोड़ दूं उन्हें. आखिर मेरा भी पालनपोषण उन्होंने ही किया है.’’

मेरी इतनी दलीलों में से एक भी शायद अमन को पसंद नहीं आई थी और वे अपने फूले मुंह के साथ बैडरूम में जा कर टीवी देखने लगे थे. एक सप्ताह बाद जब सासू मां आईं तो मैं बहुत डरी हुई थी कि अब न जाने किन नई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. यद्यपि मैं अपनी सास की समझदारी की शुरू से ही कायल रही हूं. परंतु मेरी मां को यहां देख कर उन की प्रतिक्रिया से तो अंजान ही थी.

मैं ने सासूमां के रहने का इंतजाम भी मां के कमरे में ही कर दिया था जो अमन को पसंद तो नहीं आया था परंतु 2 बैडरूम में फ्लैट में और कोई इंतजाम होना संभव भी नहीं था. मेरी मां की अपेक्षा सासू मां कुछ अधिक यंग, खुशमिजाज समझदार और सकारात्मक विचारधारा की थीं. मेरी भी उन से अच्छी पटती थी. इसीलिए तो उन के आने के दूसरे दिन अवसर देख कर अपनी सारी परेशानियां बयां करते हुए रो पड़ी थी मैं.

उन्होंने मुझे गले लगाया और बोलीं, ‘‘तू चिंता मत कर मैं कोई समाधान निकालती हूं. सब ठीक हो जाएगा.’’ उन की अपेक्षा मेरी मां का जीवन के प्रति उदासीन और नकारात्मक होना स्वाभाविक भी था क्योंकि पहले बेटे की चाह में बेटियों की कतार फिर बेटेबहू की उपेक्षा आखिर इंसान की सहने की भी सीमा होती है. परिस्थितियों ने उन्हें एकदम शांत, निरुत्साही बना दिया था. वहीं सासूमां के 2 बच्चे और दोनों ही वैल सैटल्ड.

दोचार दिन सब औब्जर्व करने के बाद उन्होंने अपने साथ मां को भी मौर्निंग वाक पर ले जाना प्रारंभ कर दिया था. वापस आ कर दोनों एकसाथ पेपर पढ़ते हुए चाय पीतीं थी जिस से अमन और मुझे अपने पर्सनल काम करने का अवसर प्राप्त हो जाता था. दोनों किचन में आ कर मेड की मदद करतीं जिस से मेरा काम बहुत आसान हो जाता. जब तक मैं और अमन तैयार होते मां और सासूमां मेड के साथ मिल कर नाश्ता टेबल पर लगा लेते. हम चारों साथसाथ नाश्ता करते और औफिस के लिए निकल जाते. अपनी मां को यों खुश देख कर अमन भी खुश होते. कुल मिला कर सासूमां के आने से मेरी कई समस्याओं का अंत होने लगा था. सासूमां को देख कर मेरी मां भी पौजिटिव होने लगीं थी. एक दिन जब हम सुबह नाश्ता कर रहे थे तो सासूमां बोलीं, ‘‘विनीता आज से अवनि अपनी दादीनानी के साथ सोएगी. कितनी किस्मत वाली है कि दादीनानी दोनों का प्यार एक साथ लेगी क्यों अवनि.’’

‘‘हां मां, अब से मैं आप दोनों के नहीं बल्कि दादीनानी के बीच में सोऊंगी. उन्होंने मुझे रोज एक नई कहानी सुनाने का प्रौमिस किया है.’’ अवनि ने भी चहकते हुए कहा.

इस बात से अमन भी बहुत खुश थे क्योंकि उन्हें उन का पर्सनल स्पेस वापस जो मिल गया था. सासूमां के आने के बाद मैं ने भी चैन की सांस ली थी. और बैंक पर वापस ध्यान केंद्रित कर लिया था. अब 3 माह तक हमारे बीच रह कर सासूमां वापस कुछ दिनों के लिए दिल्ली चलीं गई थीं. पर इन 3 महीनों में उन्होंने मेरे लिए जो किया वह मैं ताउम्र नहीं भूल सकती. सच में इंसान अपनी सकारात्मक सोच और समझदारी से बड़ी से बड़ी समस्याओं को भी चुटकियों में हल कर सकता है जैसा कि मेरी सासूमां ने किया था. मां के मेरे साथ रहने पर भी उन्होंने खुशी व्यक्त करते हुए कहा था.

‘‘जब मेरी बेटी मेरा ध्यान रख सकती है तो मेरी बहू अपनी मां का ध्यान क्यों नहीं रख सकती और मुझे फक्र है अपनी बहू पर कि अपने 3 अन्य भाईबहनों के होते हुए भी उस ने अपनी जिम्मेदारी को समझा और निभाया.’’ तभी तो उन के जाने के समय मैं फफकफफक कर रो पड़ी थी और उन के गले लग के बोली थी, ‘‘मां जल्दी आना.’’ Hindi Story

News Story: भगवाधारियों का फर्जी ‘आपरेशन सिंदूर’

News Story: कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव ज्यादा बढ़ गया था. ‘आपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान के 9 आतंकी ठिकानों पर हमला करने के बाद भारत में हर जगह भारतीय सेना की खूब तारीफ हो रही थी.

भारत और पाकिस्तान की सरहद पर तनाव बढ़ा, तो पूरे उत्तर भारत में लोगों को आगाह करने के लिए सरकार की तरफ से भी दिशानिर्देश दिए गए.

अनामिका भी रोज इस तरह की खबरें सुन रही थी. आज शाम को उसे मोती नगर की मार्केट में अपने लिए कुछ छोटे कपड़े खरीदने के लिए जाना था. वहां अनामिका की जानपहचान की एक मंजू आंटी की दुकान थी, जहां सिर्फ औरतों और लड़कियों से जुड़े निजी सामान ही मिलते थे.

अनामिका ने शाम के 5 बजे विजय को फोन किया, ‘‘हाय, अभी क्या कर रहे हो? मुझे मंजू आंटी की दुकान से कुछ सामान लेना है. तुम भी आ जाना. कौफी पी लेंगे.’’

‘यार, मैं आज नहीं आ पाऊंगा,’ विजय ने कहा.

‘‘क्या हुआ? घर पर सब ठीक तो है न?’’ अनामिका ने पूछा.

‘घर पर तो सब ठीक है, पर मेरा दोस्त रहमान आज के हालात से थोड़ा घबराया हुआ सा है. वह यहां किराए पर अकेला रहता है और पिछले 2-3 दिन से महल्ले के कुछ सिरफिरे लोग इसे ‘पाकिस्तान का जासूस’ कह कर चिढ़ा रहे हैं. जबरदस्ती ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने को बोल रहे हैं.

‘कल तो हद ही हो गई. यहीं के एक गुंडे ने उस से कह दिया कि ‘आपरेशन सिंदूर’ शुरू हो गया है, अब तुझ जैसों की मांग भरने का वक्त आ गया है,’ विजय ने बताया.

‘‘ओह, यह तो बहुत बुरा हुआ. कोई बात नहीं. तुम रहमान के साथ रहो. मुझे मंजू आंटी के पास ज्यादा समय नहीं लगेगा. कौफी फिर कभी पी लेंगे,’’ अनामिका बोली.

‘मेरा तुम्हारे साथ आने का बड़ा मन था, पर रहमान को मेरी ज्यादा जरूरत है. तुम मार्केट में अपना ध्यान रखना,’ विजय ने इतना कह कर फोन काट दिया.

शाम के साढ़े 6 बजे थे. अनामिका मोती नगर की मार्केट में जा रही थी. आम दिनों की तरह चहलपहल थी. एक दुकान के सामने भीड़ जमा थी. वह किराने की दुकान थी. कोई गुप्ताजी पिछले 30 साल से यह दुकान चला रहे थे. गल्ले पर वही बैठे थे.

दुकान पर जमा वह भीड़ ग्राहकों की नहीं थी, बल्कि 8-10 भगवाधारी नौजवान उन गुप्ताजी से उलझे हुए थे.

एक नौजवान चिल्ला रहा था, ‘‘समझ नहीं आता क्या… जब हम ने बोल दिया है कि ब्लैकआउट हो गया है, तो फिर दुकान खोलने की जिद क्यों कर रहे हो…?’’

‘‘पर मौक ड्रिल तो शाम को 8 बजे शुरू होगी. पहले सायरन बजेगा, फिर सब को 15 मिनट के लिए अपनी दुकान की बिजली बंद करनी है और शटर डाउन कर के दुकान के अंदर तब तक रहना है, जब तक अगला सायरन न बज जाए…’’ गुप्ताजी ने अपनी बात रखी.

‘‘पहलगाम में आतंकियों ने चुनचुन कर हिंदुओं को मार दिया और आप यहां हम से बहस कर रहे हो? इस इलाके का प्रशासन हम ही हैं. हमारी बात मानो और दुकान बंद कर के घर चले जाओ. आज की कमाई हो गई आप की,’’ एक और भगवाधारी ने कहा और दुकान के बाहर रखे कोल्डड्रिंक के क्रेट को पलटने का दिखावा करने लगा, ताकि गुप्ताजी डर जाएं.

इसी बीच 2-3 मुस्टंडे गुप्ताजी की नजर बचा कर चीनी की एक बोरी ही गायब कर गए. उन्होंने बड़ी चालाकी से वह बोरी उठाई और अपनी कार की डिग्गी में छिपा दी. एक लड़के ने तो गुप्ताजी के सामने ही एक जार से कुछ चौकलेट निकाल ली और बाकी सब लोगों में बांट दी.

‘‘चलो, अब अगली दुकान वाले को हड़काते हैं. जब तक सब की हवा टाइट नहीं होगी, हमारा दबदबा कैसे बनेगा. ‘आपरेशन सिंदूर’ के बहाने अपनी दुकान भी तो चमकानी है,’’ उन सब लोगों का नेता दिखने वाले एक नौजवान ने कहा और बाकी सब उस के पीछे हो लिए.

मंजू आंटी की दुकान थोड़ा आगे थी. मंजू आंटी विधवा थीं और उन्होंने अपने पति की दुकान को अब अच्छे से संभाला हुआ था. उन की एक बेटी थी, जो शादी के बाद अपने पति के साथ आस्ट्रेलिया में रह रही थी.

‘‘आंटी, मुझे ब्रा दिखाइए… और हां, गरमी है न तो सूती ही दिखाना, वरना पसीने से दिक्कत होती है,’’ अनामिका ने मंजू आंटी को बताया.

मंजू आंटी को अनामिका का साइज पता था. वे बोलीं, ‘‘कल ही नया माल आया है. बहुत अच्छी क्वालिटी का है. तुझे पसंद आएगा.’’

‘‘आंटी, दीदी की शादी और अंकल के जाने के बाद आप एकदम अकेली पड़ गई हैं. अच्छा है कि आप दुकान संभाल रही हैं, वरना घर बैठे बोर हो जातीं,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘यह तो है, पर जब से पहलगाम कांड हुआ है, तब से मन में अजीब सा डर भर गया है. भारत और पाकिस्तान की सरहद पर तनाव बढ़ा हुआ है. रोजाना एकदूसरे पर ड्रोन से हमले की खबरें आ रही हैं… पता नहीं, आगे क्या होगा,’’ मंजू आंटी ने पैकेट से ब्रा निकालते हुए अनामिका से कहा.

‘‘अच्छा आंटी, मुझे कोई बढि़या सा रेजर भी दे दीजिए,’’ अनामिका ने ब्रा की क्वालिटी चैक करते हुए कहा.

आज अनामिका बेहद खूबसूरत लग रही थी और बारबार खुद को आईने में देख रही थी, तभी उसे आईने में दिखा कि कुछ लड़के दुकान में घुस आए हैं. लेडीज सामान की दुकान में लड़कों का क्या काम… अनामिका को उन के इरादे ठीक नहीं लगे.

‘‘ओ आंटी, जल्दी से अपनी दुकान बंद करो और घर जाओ. ब्लैकआउट हो गया है,’’ एक भगवाधारी ने गेट पर डंडा मारते हुए कहा.

‘‘किस के कहने पर यह ब्लैकआउट किया गया है? प्रशासन ने तो मौक ड्रिल का समय रात 8 बजे रखा है,’’ अनामिका ने पूछा.

‘‘तू कौन है…? बड़ी जबान चला रही है. अपना सामान ले और निकल यहां से. जल्दी घर जा. कहीं कोई अनहोनी हो गई, तो दिक्कत हो जाएगी. घर पर मम्मीपापा इंतजार कर रहे होंगे,’’ एक भगवाधारी ने कहा.

‘‘छोटू, दीदी को उन के घर छोड़ आ. और हां, रास्ते में इन्हें कोई दिक्कत न हो,’’ एक कमउम्र साथी को आवाज लगाते हुए उस भगवाधारी ने अनामिका को ऊपर से नीचे तक देखा.

‘‘यह कैसी जबरदस्ती है. हमें कोई आदेश नहीं मिला है जल्दी दुकान बंद करने का,’’ मंजू आंटी ने कहा.

‘‘वहां भारत की सेना हमारे दुश्मन देश पाकिस्तान से लोहा ले रही है और यहां आंटीजी को जल्दी दुकान बंद करने में दिक्कत हो रही है. पहलगाम में मारे गए हिंदुओं की विधवाओं के नाम पर सरकार ने ‘आपरेशन सिंदूर’ चलाया है और आंटीजी को ब्रा बेच कर अपना घर पैसों से भरना है,’’ एक भगवाधारी ने कहा.

‘‘तो तुम्हें क्या लगता है कि पहलगाम में मारे गए लोगों का दुख हमें नहीं है. बेटा, मैं अपनी दुकान की हर शादीशुदा ग्राहक को सिंदूर की डब्बी मुफ्त में दे रही हूं,’’ मंजू आंटी भावुक हो कर बोलीं.

यह सुन कर भगवाधारी लीडर ने कहा, ‘‘यह तो बड़ा महान काम किया आप ने. पर ‘आपरेशन सिंदूर’ की तूती हर जगह बोल रही है. भारत ने 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद जवाबी ऐक्शन के रूप में 7 मई की सुबह ‘आपरेशन सिंदूर’ शुरू किया था.

‘‘पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 28 लोगों की मौत हुई थी. वहीं, इस के जवाब में ‘आपरेशन सिंदूर’ के तहत 100 से ज्यादा आतंकियों का खात्मा किया गया.

‘‘कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका ने ‘आपरेशन सिंदूर’ के बारे में जानकारी साझा करते हुए बताया कि इस मिशन के दौरान आतंकियों के 9 ठिकानों को कामयाबी के साथ बरबाद किया गया है.

‘‘समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, प्रतिबंधित आतंकी संगठनों जैश ए मोहम्मद, लश्कर ए तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन के हैडक्वार्टरों को निशाना बना कर 9 ठिकानों बहावलपुर के मरकज सुब्हान अल्लाह, मुरिदके के मरकज तैयबा, टेहड़ा कलां के सरजाल, सियालकोट के महमूना जोया, बरनाला के मरकज अहले हदीस, कोटली के मरकज अब्बास और मस्कर रहील शहीद, मुजफ्फराबाद के सवाई नाला कैंप और सैयदना बिलाल कैंप पर हमला कर उन्हें खत्म किया गया.’’

‘‘मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में कई बेकुसूर लोग मारे गए थे, कइयों की मांग का सिंदूर उजड़ गया था. उस कायराना हमले में विवाहित महिलाओं के सिंदूर को आतंकियों ने उजाड़ दिया था, इसलिए बदले के इस ऐक्शन को ‘आपरेशन सिंदूर’ नाम दिया गया था. इस नाम का मतलब उन बेकुसूर महिलाओं, जिन का सिंदूर उजड़ गया, को इंसाफ दिलाना था,’’ एक और भगवाधारी ने अपनी बात रखी.

‘‘तो क्या जिन कुंआरी लड़कियों ने अपने पिता, भाई या दूसरे पारिवारिक सदस्य को खोया है, उन्हें इंसाफ दिलाने का सरकार का कोई इरादा नहीं था?’’ अनामिका ने चुटकी ली.

‘‘तुम जैसे लोग भी आतंकियों से कम नहीं हो. न सरकार पर यकीन करते हो और न ही हिंदुत्व की बात करने वालों पर. तुम से अच्छी तो ये आंटी हैं, जो मुफ्त में सिंदूर बांट रही हैं,’’ उन लोगों के लीडर ने गुस्से में कहा.

इतने में एक लड़के ने सिंदूर का बक्सा उठा लिया और बोला, ‘‘आंटीजी, आप अपने दिल पर ज्यादा बोझ मत लेना. आप के नाम से हम बांट देंगे औरतों को. आप तो दुकान बंद करो और घर जाओ.’’

‘‘यह क्या गुंडागर्दी है… सिंदूर का बक्सा वापस रखो, वरना अच्छा नहीं होगा,’’ अनामिका बोली.

‘‘क्या कर लेगी?’’ भगवाधरी गैंग का लीडर चिल्लाया.

‘‘वाह, एक तरफ तुम पाकिस्तानी आतंकवाद का रोना रो रहे हो और वहीं दूसरी तरफ यहां कमजोर को सता रहे हो. तुम भी आतंकियों से कम नहीं हो. देश को तुम जैसे लोगों से सावधान रहना चाहिए, जो अपने नकली हिंदुत्व की दुकान चमकाने के लिए यह सब नौटंकी कर रहे हो,’’ अनामिका को अब गुस्सा आ गया था.

‘‘बड़ी जबान चल रही है तेरी,’’ एक लड़के ने अनामिका को हड़काया.

‘‘जबान ही नहीं, मेरे लातघूंसे भी खूब चलते हैं,’’ इतना कह कर अनामिका ने वहां रखी कैंची उठा ली और चिल्लाई, ‘‘निकलो यहां से, वरना एकएक का पेट चीर दूंगी.’’

एक भगवाधारी अनामिका के करीब आया, तो उस ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया और मंजू आंटी के सामने जा कर अड़ गई.

यह सब देख कर वे लोग थोड़ा घबरा गए, क्योंकि उन्होंने पहले ही किराने वाले को लूटा था. वे आंखें दिखाते हुए वहां से चले गए.

‘‘बेटी, तुम बड़ी दिलेर निकली. पर, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था. अगर कुछ हो जाता तो मैं अपनेआप को कभी माफ नहीं कर पाती,’’ मंजू आंटी ने कहा.

‘‘मैं इन जैसे टुच्चों से बखूबी निबटना जानती हूं. आप चिंता मत करें. पर अब दुकान बंद कर लो,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘तुम ठीक कहती हो. रुको, हम दोनों साथ चलेंगे. आज पहले मेरे घर चलना. अपने हाथ की चाय पिलाऊंगी,’’ मंजू आंटी ने कहा.

दुकान बंद कर के वे दोनों वहां से चली गईं. घर पर मंजू आंटी ने बढि़या सी चाय बनाई और बोलीं, ‘‘आज का माहौल बड़ा खराब है. हर कोई चौधरी बना फिर रहा है. इस से देश का माहौल काफी बिगड़ता है.’’

‘‘आप ठीक कहती हैं. मेरे बौयफ्रैंड को आज मेरे साथ आना था, पर वह अपने एक दोस्त रहमान के साथ है. जब से देश में यह भारत और पाकिस्तान का माहौल बना है, रहमान काफी डरा हुआ सा है,’’ अनामिका बोली.

‘‘सब ठीक हो जाएगा. हर समाज में अच्छेबुरे लोग होते हैं. तुम यह चाय लो, ठंडी हो रही है,’’ मंजू आंटी बोलीं.

‘‘जी आंटी. पर, मैं जरा विजय को फोन कर लूं,’’ इतना कह कर अनामिका ने विजय को फोन लगाया.

‘‘क्या हो रहा है?’’ अनामिका बोली.

‘कुछ नहीं. तुम्हारी खरीदारी कैसी रही?’

‘‘एकदम बेकार,’’ अनामिका ने उदास हो कर कहा.

‘कल मिलें?’ विजय ने पूछा.

‘‘हां, मुझे तुम से कुछ कहना भी है,’’ अनामिका बोली.

‘कल रात को छत पर आ जाना. पूर्णिमा आने वाली है. चांदनी रात में प्यारभरी बातें करेेंगे. ब्लैकआउट होगा तो और मजा आएगा,’’ विजय बोला.

‘‘ओह, जनाब को इश्कबाजी करनी है,’’ अनामिका का मूड थोड़ा ठीक हुआ.

‘‘हां, बहुत दिन हो गए, अकेले में मिले.’’

‘‘ठीक है. कल रात को मिलते हैं,’’ अनामिका बोली.

Funny Story: कर्ज ले कर घी पीना तरक्की का पैमाना

Funny Story: कर्ज ले कर घी पीना पुरानी कहावत है. आज के आदमी में तो घी पीने का स्टैमिना ही नहीं बचा. गंगाधर को तो उस समय हैरानी हुई, जब उसे पता चला कि दुनिया के अमीर देश अमेरिका के ऊपर तकरीबन 37 लाख करोड़ डौलर का कर्ज है, जो इस की जीडीपी का तकरीबन 122 फीसदी है. वहां की सरकार अब इस के बारे में चिंतित है कि कहीं अमेरिका, जो दुनिया के भविष्य के लिए तरहतरह से चिंतित रहता है, दिवालियापन के चलते इस का भविष्य ही अंधकार से न भर जाए.

भारतीय रुपए में यह तकरीबन 3,250 लाख करोड़ रुपए है. कहां भारत 5 ट्रिलियन डौलर की इकोनौमी बनने के सपने न जाने कब से देख रहा है, जबकि अमेरिका पर कर्ज ही इस के 6 गुना से ज्यादा है. भारत का कर्ज सितंबर, 2024 में 161 लाख करोड़ था यानी अमेरिका से 20 गुना कम, जो हमारी जीडीपी का भी महज 60 फीसदी के आसपास है.

ब्रिटेन और फ्रांस जैसे विकसित देशों का भी कर्ज उन की जीडीपी से ज्यादा है. अब समझ आ रहा है कि हम पिछडे़ के पिछडे़ क्यों बने हुए हैं. अगर कुछ साल पहले ही थोड़ा ज्यादा कर्ज ले कर घी पीने की आदत डाल ली होती, तो पिछडे़पन के शाप से कब का छुटकारा पा गए होते.

पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था ही कर्ज पर टिकी है. अब सुपर पावर का मतलब सुपर कर्ज से है और विकासशील मतलब कर्जशील से है. पहले आमदनी, फिर उस के बाद खपत के आधार पर गरीबी की रेखा तय की गई थी, लेकिन अब कर्ज की बुनियाद पर इसे तय करना चाहिए. जिस पर बहुत मामूली सा कर्ज है, वह गरीब. जिस पर बिलकुल भी कर्ज नहीं है, वह दीनहीन या बहुत ज्यादा गरीब और जिस पर ज्यादा कर्ज है, वह अमीर कहलाएगा. जिस पर बहुत ही ज्यादा कर्ज है वह अमीरेआजम.

लगता है कि हमारे नेता अब जा कर इस बात को सम?ा पाए हैं, इसलिए वे ज्यादा से ज्यादा कर्ज लेने के लिए एक पैर से तैयार रहते हैं. वोटरों को मुफ्त की रेवड़ी बांटने का सब से आसान जरीया कर्ज ले कर बांटना ही है, जिस में कोई भी सरकार बंटी नहीं है, सब एकमत हैं. यहां ‘बंटेंगे तो सत्ता से हटेंगे’ इन का नारा है.

आलोचकों को अब आम बजट के समय अपना मुंह बंद रखना चाहिए. रुपया आता कहां से है और जाता कहां है के पाई चार्ट में कर्ज की देनदारी अभी भी एकचौथाई से ज्यादा नहीं रहती. क्या यह एक सब से बड़ी वजह है हमारे मुद्दत से विकासशील ही बने रहने की?

अगर जम कर कर्ज न लेने के शील को जल्द ही हम ने नहीं उतार फेंका, तो हम साल 2047 क्या साल 2147 तक भी विकसित नहीं बन पाएंगे. सरकार को तो रेवड़ी बांटने की आधा दर्जन और योजनाएं जल्दी ही ले आनी चाहिए. सरकार का आज मतलब ही है, जो कि खुद भी कर्ज ले कर घी पीए व वोटरों को भी पिलाती रहे.

मोटी बात है कि भारत का कर्ज अमेरिका और दूसरे विकसित देशों के लैवल से कोसों दूर है, तो विकसित का टैग भी कोसों दूर रहेगा. तो इसे उस लैवल पर पंहुचाने के लिए सारे जरूरी कदम पहली फुरसत में उठाने चाहिए. पहला कदम यह कि यहां का एकएक आदमी कर्ज में डूबा होना चाहिए. क्रेडिट कार्ड लेना मैंडेटरी कर दिया जाए.

बहुत से कारोबारी घराने अपनी कंपनी को पब्लिक नहीं करना चाहते. यह सब धांधली सरकार को एक कानून बना कर बंद कर देनी चाहिए. मतलब इतना सा है कि जो भी कर्ज का घी नहीं पी रहा है, उस के लिए घी पीना मैंडेटरी कर दिया जाएगा. नसबंदी के समय जैसी कड़ाई कर देनी चाहिए. जो उधार का घी पीना न चाह रहा हो, उसे पकड़ कर उधार का घी मुंह में जबरन डाल दिया जाए.

अगर आप के पास पूंजी रूपी घी है तो भी कर्ज रूपी घी पीना ही होगा. जब कर्ज विकसित देशों के लैवल का पहुंचेगा, तो हमें विकास के उस लैवल तक पहुंचने से कोई रोक नहीं पाएगा.

साल 2023 में चीन तक का कर्ज उस की जीडीपी का 83 फीसदी था. हाथ कंगन को आरसी क्या… देखिए, चीन के सामने हम कहां खडे़ हैं.

हमारी सरकार भले ही रोजगार के मौके बढ़ाने की बात को सालों से आत्मसात नहीं कर पा रही हो, पर इस बात को आत्मसात कर गई है. सरकार को एक नई कर्ज नीति जल्दी ही बना देनी चाहिए, जिस में पैदा होने से ले कर मरने तक बारबार कर्ज लेना मैंडेटरी होगा. इस से बहुत जल्दी बजट में रुपया आता कहां से है, जाता कहां है संबंधी पाई चार्ट के एकचौथाई पर और कब्जा हो जाएगा यानी आधी कमाई कर्ज व ब्याज चुकाने पर.

आदर्श हालात वही होंगे कि एक रुपया कमाओ तो कम से कम एक रुपए का कर्ज तुरंत लो. जितनी आवक हो, वह कर्ज व ब्याज पटाने में चली जाए, बल्कि अमेरिका जैसे और अमीर बनना है, तो 122 फीसदी का बैंचमार्क है. अमेरिका कौन सा अपनी वर्तमान तरक्की से संतुष्ट है. वह तो लगातार तरक्की करते हुए जीडीपी का 200 फीसदी कर्ज ले कर तरक्की की हद पर पहुंच कर ही मानेगा.

एक और बात कि अगर कोई राज्य सरकार उधार का घी पीने के मामले में पिछड़ी है, तो केंद्र सरकार अपनी ओर से ही उस का उधारी का घी ले कर उस को भी अच्छा कर्जदार बना कर तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ाने का बीड़ा खुद उठाए. क्षेत्रीय असमानता न बढे़, यह जिम्मेदारी आखिर केंद्र सरकार की ही होती है.

केंद्र सरकार को अगर मां माना जाए तो राज्य सरकारें उस की संतानें हुईं. मां का काम है कि अपने सभी बच्चों को एक ही नजर से देखना. जो उधार का घी न पी कर कमजोर हो रहा है, उसे जबरन घी पिला कर सेहतमंद बनाए रखना.

निजी कर्ज की भी बात की जाए, तो आज जिस ने लाखों रुपए का तरहतरह का कर्ज नहीं ले रखा है या उस के पास क्रेडिट कार्ड नहीं है तो वह पिछडा़ ही माना जाता है. ऐसा आदमी गर्लफ्रैंड पर क्या खर्च कर पाएगा. होनहार नौजवान तो इस के लिए चेन स्नैचिंग तक करते हैं. जो अपनी तनख्वाह का आधा क्रेडिट कार्ड के भुगतान पर न करे, वह प्रगतिशील कैसे हो सकता है.

वैसे, हम तरक्की के रास्ते पर हैं. हमारे यहां अब किसान, नौजवान, कारोबारी कर्ज से परेशान हो कर खुदकुशी कर रहे हैं, जो पिछड़े समाज के लक्षण हैं.

पहले जब देश गरीब था, आप एक भी घटना बताओ, जब किसी किसान ने खुदकुशी की हो. गरीब की पहचान ही है कि उसे कर्ज नहीं मिलता. पर जिसे अरबों रुपए का कर्ज मिलता है, वह ‘राष्ट्र निर्माता’ कहलाता है.

कर्ज का ज्यादा घी पीने वाले की बैंक में आवभगत की जाती है. जिस ने ऐसा घी पिया ही नहीं, उसे खड़ा रखा जाता है या दुत्कार कर भगा दिया जाता है.

सरकार कितनी दयालु है. उस ने ढेरों योजनाएं नौजवानोंअधेड़ों को कर्ज देने के लिए बना रखी हैं. वह चाहती है कि औसत प्रति व्यक्ति घरेलू कर्ज है, वह अभी के तकरीबन 40,000 से बढ़ कर कम से कम एक लाख रुपए हो जाए, तो अपनेआप तरक्की दिखने लगेगी. उधार अब प्रेम की कैंची नहीं, बल्कि विकास की सीढ़ी माना जाता है.

आम आदमी सरकार के उधार पर ही तो मस्त है. लाड़ली बहना फ्रिज, टीवी, वाशिंग मशीन सरकार द्वारा दी गई किस्तों के दम पर किस्तों पर उठा रही है.

आम आदमी का सरकार को कम से कम इस बात का कर्जदार होना चाहिए कि वह खुद के साथ ही सब को मोटा कर्जदार बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रख रही है.

आत्मनिर्भर भारत भी कर्ज की बुनियाद पर ही बनाया गया है. अरे, उधार ले कर घी पीने से डरते क्यों हो…? आगामी चुनाव में माफी हो जाएगी. यहां ये सुविधा भी तो है कि सैकड़ोंहजारों करोड़ का कर्ज न चुका पाओ, तो रातोंरात दूसरे देश भाग सकते हो. उधार पर जितना ऐश कर सकते हो कर लो, सरकार भी तो कर रही है.

अब जल्दी ही वह समय आने वाला है, जब कहा जाएगा कि यहां का हर आदमी अच्छाखासा कर्ज ले कर अच्छाखासा घी पी रहा है और ईएमआई में गुमशुदा है.

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