Feel-Good Story in Hindi : मुरलीजी की कचौड़ी

Feel-Good Story in Hindi. मुरलीजी की कचौड़ी पूरे इलाके में अपने स्वाद के लिए मशहूर थीं. पर अब उन के बेटों ने वहां रैस्टोरैंट बना दिया. मुरलीजी को लगा कि कुछ तो गलत हो रहा है और इसी चिंता में वे बीमार हो गए. क्या गलत हुआ था?

मुरलीजी की कचौड़ी की दुकान शहर की छोटी, पर बहुत ही पुरानी दुकान थी. यह दुकान जितनी जगह में छोटी थी, उतनी ही मशहूरी में बहुत बड़ी थी. दुकान पर उन के नाम का कोई बोर्ड नहीं लगा था, बस शहर के लोग उसे ‘मुरलीजी की कचौड़ी’ के नाम से जानते थे.

दुकान के बाहर खुद मुरलीजी कोयले की भट्ठी लगा कर गरम तेल की बहुत बड़ी कड़ाही में कचौडि़यां बनाते थे. वे कचौडि़यां बना कर बहुत बड़े बरतन में उन्हें डालते थे, जहां पर उन का बड़ा बेटा मोहन और नौकर पैसे ले कर कचौडि़यां पैक कर के ग्राहकों को देते थे. साथ में बहुत ही चटपटी चटनी भी देते थे. जो लोग वहीं दुकान पर खाना चाहते थे, उन्हें पुराने अखबार के कागज पर कचौड़ी के ऊपर चटनी डाल कर देते थे.

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ज्यादातर ग्राहक दुकान के बाहर खड़े हो कर कचौड़ी को बहुत चाव से स्वाद लेले कर खाते थे, क्योंकि दुकान के अंदर बैठने के लिए बहुत ही कम जगह थी. सिर्फ एक ही बैंच थी. दुकान पर हमेशा लंबी लाइन लगी रहती थी.

लाइन में खड़े लोग कचौडि़यां बनाते हुए मुरलीजी को बड़े ध्यान से देखते थे. वे गुंदे हुए मैदे के बड़े गोले को कटोरी बना कर उस में आलू का मसाला भरते थे, फिर दोबारा उस का गोला बनाते और दोनों हाथों से दबा कर तश्तरी जैसा आकार दे कर गरम तेल की कड़ाही में एकएक कर के डाल देते थे.

जब 50-50 कचौडि़यां एकसाथ कड़ाही में तलती थीं, तो वह छटा देखते ही बनती थी. कचौडि़यों की खुशबू आसपास फैलती थी और सड़क पर चलते हुए लोग उस खुशबू से खिंच कर वहां चले आते थे.

कई लोग तो कचौडि़यां पैक करा कर दूसरे शहरों में अपने सगेसंबंधियों को भेजते थे, क्योंकि वे कचौडि़यां दूसरे दिन और भी अपना स्वाद बरकरार रखती थीं और इसीलिए दिन में मुरलीजी हजारों कचौडि़यां बेचते थे. इस के चलते शाम तक उन की बड़ी मजबूत तिजोरी पैसों से भर जाती थी. पर उन्हें कभी भी पैसे का घमंड नहीं था, न ही इतनी छोटी दुकान चलाते हुए शर्म आती थी.

हालांकि, मुरलीजी के पास 2-3 बहुत बड़े बंगले थे और शहर में दूसरी जगह खरीदी गई दुकानें भाड़े पर दी हुई थीं, पर उन के दोनों बेटों को इस छोटी सी दुकान पर बैठ कर शर्म आती थी.

मुरलीजी ने अपने बेटों के लिए बहुत ही शानदार बंगला रहने को बनवाया था, पर दुकान जैसे 30 साल पहले थी, वैसे ही आज थी. उन के पास वाली बहुत बड़ी दुकान बिक रही थी और उस के ऊपर का हाल भी बिक रहा था. मुरलीजी ने अपने बेटों के कहने पर रैस्टोरैंट बनाने के लिए हाल समेत वह दुकान मुंहमांगे दामों पर खरीद ली.

बेटों ने उस रैस्टोरैंट में महंगा और शानदार फर्नीचर लगवाया और डिजाइनर टेबलकुरसियां भी रखवाईं. साथ में यूनिफौर्म वाले वेटर भी थे.

यह सारा आइडिया मुरलीजी के छोटे बेटे सोहन का था, जो दिल्ली में पढ़ कर आया था. दिल्ली में उसे अच्छी नौकरी मिली भी, पर तनख्वाह उस के पापा की दुकान की रोज की कमाई से काफी कम थी, इसीलिए उस ने 2-3 महीने नौकरी कर के छोड़ दी. इतने में तो शहर के अच्छे मकान का किराया भी मुश्किल से चुकाया जा पाता है.

मुरलीजी के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. रैस्टोरैंट पर पानी की तरह पैसा बहाया गया. एक दिन शहर के बड़ेबड़े लोगों को न्योता दे कर उस रैस्टोरैंट का उद्घाटन किया गया.

सुबह स्थानीय अखबार में पहले पन्ने पर इश्तिहार भी दिया गया. अमीर घर के लोगों के लिए यह अच्छा था, क्योंकि शहर में कोई बड़ा रैस्टोरैंट था भी नहीं. पर रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो छोटेमोटे ग्राहक रोजाना वहां नहीं आ पाते थे.

अब मुरलीजी को सिर्फ कैश काउंटर पर बैठना था और साथ ही रैस्टोरैंट पर नजर रखनी थी कि सभी को सर्विस बराबर मिल रही है या न. कचौडि़यां दुकान के पुराने नौकर बना रहे थे, साथ में उस के लिए 2-3 नए कुक भी रख लिए गए. वे कई बार कचौडि़यां बना कर गरम करने के लिए उन्हें बड़े ओवन में रख देते थे. अब हर काम दुकान की तरह न हो कर कंपनी की तरह होता था.

भट्ठी अब दुकान के पिछले भाग में लगा दी गई, क्योंकि इतने बड़े रैस्टोरैंट के आगे भट्ठी अच्छी नहीं लगती है. भट्ठी आगे नहीं थी, तो कचौडि़यों की खुशबू भी सड़क पर नहीं फैलती थी. लोग अब दुकान के आगे से आतेजाते, तो महसूस करते थे कि कुछ तो कमी है.

इस तरह से शाही अंदाज में खाना हो तो बड़ा बिल भी चुकाना पड़ेगा. रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो मिडिल क्लास ग्राहक वहां रोजरोज नहीं आ पाते थे. सामने एक बहुत बड़ा स्कूल था. उस में बहुत सारे बच्चे पढ़ते थे. पहले वे आधी छुट्टी होते ही काफी तादाद में कचौड़ी खाने आते थे.

उस समय पूरी सड़क ब्लौक हो जाती थी, इसीलिए मुरलीजी एक घंटा पहले ही कचौडि़यां बना कर रख देते थे और दूसरे ग्राहकों को आधी छुट्टी खत्म होने के बाद आने को कहते थे.

पहले कचौड़ी का जितना बिल होता था, उतनी तो अब रैस्टोरैंट में वेटर की टिप हो जाती थी. अब छोटेछोटे बच्चे रोज रैस्टोरैंट में बैठ कर कचौड़ी नहीं खा सकते ठें, क्योंकि इतना ज्यादा बिल देना उन के बस का नहीं था.

इस सब के बावजूद महंगा वाला रैस्टोरैंट अच्छा ही चल रहा था. हालांकि, अब वहां के खर्चे भी बहुत बढ़ गए थे, धीरेधीरे पहले जो कचौड़ी बेचने में मुनाफा रहता था, वह अब रैस्टोरैंट में नहीं रहा. मुरलीजी को पूरे दिन काउंटर पर बैठना और पैसे गिनना और शाम को हिसाब लगाना अच्छा नहीं लगता था. कह सकते हैं कि उन्हें मजा नहीं आ रहा था और न ही उन्हें ग्राहकों के चेहरे पर संतुष्टि दिख रही थी.

ऐसे ही 2-3 महीने निकल गए. एक दिन मुरलीजी बहुत ज्यादा बीमार हो गए. उन्हें जिंदगी में पहली बार हौस्पिटल में भरती कराया गया. उन के बहुत सारे टैस्ट हुए, पर डाक्टर को उन की बीमारी समझ  में नहीं आ रही थी. इस वजह से डाक्टर टैस्ट पर टैस्ट कराए जा रहे थे कि शायद कोई कहीं तकलीफ पकड़ में आए.

डाक्टर को मुरलीजी की बीमारी पकड़ में नहीं आई, पर मुरलीजी समझ  गए कि वे क्यों बीमार हो गए. उन्हें याद आया कि एक बार वे बिल बनाते समय पैसों को ले कर ग्राहक से ही उलझ  गए थे. वह बहुत पुराना ग्राहक था और सालों से दुकान आता रहा था, पर अब दूसरे शहर में नौकरी के चलते उस का कभीकभार आना होता था. वह ग्राहक जब भी घर आता, तो यहां से 100 के आसपास कचौडि़यां पैक करा कर अपने शहर ले जाता था.

वह ग्राहक इस बार मुरलीजी का यह रूप देख कर हैरानी में पड़ गया कि इस आदमी के चेहरे पर हमेशा ही मुसकराहट होती थी, पर आज झुनझुलाहट क्यों दिख रही है.

‘‘मुरलीजी, आप की तबीयत तो ठीक है न?’’ उस ग्राहक ने प्यार व अपनेपन से सिर्फ इतना ही पूछा.

मुरलीजी को हौस्पिटल के बिस्तर पर लेटेलेटे न जाने कितने ही ऐसे किस्से याद आने लगे. फिर एक दिन उन्हें हौस्पिटल से छुट्टी मिल गई.

एक दिन जब दोनों बेटे सुबह 10 बजे रैस्टोरैंट पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि उन के पापा पुरानी दुकान के आगे भट्ठी लगा कर कचौडि़यां तल रहे थे और उस की वही पुरानी खुशबू के चलते दुकान के आगे लोगों की लंबी लाइन लगी हुई थी.

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आज दुकान में वैसा ही इंतजाम था, जैसा रैस्टोरैंट खोलने से पहले था. तमाम लोग हैरानी से दुकान की ओर बढ़ने लगे और देखने लगे कि आज खुद मुरलीजी कचौडि़यां बना रहे हैं. आज मुरलीजी के चेहरे पर वही पहले वाली रौनक थी.

लोग कानाफूसी करते हुए मुरलीजी से बात करने की कोशिश कर रहे थे, पर आज वे अपने मन के अलावा किसी की नहीं सुन रहे थे. बस, किस ग्राहक को कितनी कचौडि़यां चाहिए, वही पूछ रहे थे और यह भी पूछ रहे थे कि कचौडि़यां पहले जैसी ही बनी हैं न?

दोनों बेटे अपने पापा को देख रहे थे, उन पर गुस्सा हो रहे थे, पर इतने ग्राहकों की भीड़ के सामने उन्हें कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई.

दोपहर को जब मुरलीजी थोड़े फ्री हुए तो छोटे बेटे सोहन ने कहा, ‘‘पापा, यह सब क्या है? इतना खर्च किया हम ने रैस्टोरैंट बनाने पर और आप…’’

मुरलीजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘पंछी को पिंजरे में बंद हो कर जैसा लगता होगा, वैसा ही मुझे  लग रहा था. कह सकते हैं कि बहुत बुरा लग रहा था. शायद इसी वजह से मैं अपनी जिंदगी में पहली बार बीमार हुआ.

‘‘मैं ने 40 साल से इसी तरह काम किया है और बंगले बनवाए, बैंक बैलेंस खड़ा किया. अब इस उम्र में मैं बदल नहीं सकता और न ही अपनेआप से कोई समझोता कर सकता हूं. मैं अगर पहले जैसा नहीं बना, तो शायद जी भी नहीं पाऊंगा.’’

‘‘पर पापा, यह जो इतना बड़ा रैस्टोरैंट खोला है, इस का क्या करना?’’ बड़े बेटे मोहन को कुछ समझ  में नहीं आ रहा था.

‘‘बेटा, मैं तो इसलिए तैयार हुआ था कि तुम लोगों को एक छोटी सी दुकान में भट्ठी पर बैठने में शर्म आती है. गलती तुम्हारी नहीं है, क्योंकि तुम ने वह नहीं देखा, जो मैं ने देखा है. तुम लोग पढ़ेलिखे हो, तुम्हारी दोस्ती अच्छे पढ़ेलिखे लोगों से है. तुम लोगों ने शुरू से ही बंगलागाड़ी देखी है, शायद इसीलिए मैं ने रैस्टोरैंट खोलने के लिए तुम लोगों की बात मानी.

‘‘अब यह रैस्टोरैंट तुम लोग चलाओ. जो लोग फास्ट फूड खाना चाहते हैं, पंजाबी और विदेशी खाना खाना चाहते हैं और अच्छी कीमत देना चाहते हैं, उन्हें तुम संभालो. मैं अपनी कचौड़ी की दुकान में ही ठीक हूं.

‘‘मैं कचौडि़यां बनाऊंगा, क्योंकि इस रैस्टोरैंट के चलते मेरे बरसों पुराने कचौड़ी खाने वाले ग्राहक और स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे इस जगह से दूर हो चुके हैं, क्योंकि वे रोजरोज ज्यादा पैसे खर्च नहीं कर सकते हैं. न मेरी कचौड़ी खाने वाले खुश हैं और न ही मैं कचौड़ी बनाने वाला. पर आज हम दोनों ही खुश हैं,’’ लंबी लाइन देख कर वे खुशी से उठते हुए बोले.

इस पर सोहन ने कहा, ‘‘पापा, आप हमें माफ कर दो. हम ने आप को इस उम्र में बदलने की कोशिश की. पर जब हम इस उम्र में नहीं बदल सकते हैं, तो कैसे उम्मीद रखें कि आप को इस उम्र में बदल देंगे.’’  Feel-Good Story in Hindi

Hindi Story:अब पछताए क्या होत- बाबागीरी में बनते ब्रैंड

Hindi Story.उस दिन कई दिनों बाद थोड़ी गुनगुनी धूप निकली हुई थी. सर्दी के मौसम में गुनगुनी धूप और वह भी शनिवार को जब आस्ट्रेलिया में सभी व्यापारिक संस्थान बंद होते हैं, सोने पर सुहागा वाली बात थी.

मैं अवकाश का आनंद लेने किलडा बीच पर चला आया था. काफी देर तक वहां प्राकृतिक दृश्यों का लुत्फ लेता रहा. कुछ ऐसे नजारे भी देखे जो विदेशों में ही देखे जा सकते थे. उस के बाद मैं लूणा पार्क चला आया था. दोपहर के बाद फलिंडर स्ट्रीट स्टेशन के निकट भारतीय रैस्टोरैंट फलोरा में खाना खाने के पश्चात सराइन आप रिमैंबरेंस चला गया और वहां काफी देर बैठा रहा.

जब घर लौटा तो आंसरिंग मशीन और मेरे मोबाइल पर भी एक मित्र के कई संदेश आए हुए थे.

मैं ने तुरंत उस का नंबर डायल किया. उस ने फोन उठाते ही गुस्से से कहा, ‘‘कहां गायब हो गया था सुबह से? मैं तो फोन करकर के थक गया. तुम तो मोबाइल भी नहीं उठा रहे थे.’’

‘‘सौरी यार,’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं मोबाइल घर पर ही भूल गया था.’’ उस से मैं ने कह तो दिया लेकिन वास्तव में मैं स्वयं ही जानबूझ कर मोबाइल घर छोड़ गया था. वास्तव में मैं शांति से दिन गुजारना चाहता था.

मेरे यह पूछने पर कि कैसे याद किया, उस ने अत्यंत प्रसन्नता से बताया, ‘‘ओह यार, आजकल इंडिया से अपने गुरु महाराज आस्ट्रेलिया आए हुए हैं. कल वे हमारे घर पर प्रवचन करेंगे. तुम अवश्य आना.’’

‘‘यार, मुझ से कहां आया जाएगा?’’

‘‘क्यों, तुम्हारे क्या पैर भारी हैं?’’

‘‘तुम जानते तो हो, मेरी धार्मिक कार्यों में…’’

‘‘दिलचस्पी नहीं,’’ उस ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘‘वाइन की तो पूरी बोतल डकार जाता है मगर धार्मिक कार्यों के नाम पर तुम्हारे पेट में मरोड़ उठने लगती है.’’ उस ने अपनत्व की भावना से आगे कहा, ‘‘ज्यादा इधरउधर की मत हांक… और हां, आते हुए बेबी तथा उस के बच्चों को भी साथ ले आना. जीजाजी तो सिडनी गए हुए हैं.’’

लो, एक और मुसीबत गले पड़ गई. मेरे घर से मैलटन, जहां उस की बहन बेबी रहती है, कम से कम 45 किलोमीटर दूर होगा. पहले तो शायद न जाता, मगर अब तो उस की बहन और बच्चों को भी साथ ले कर जाना पड़ेगा. फोन पर मेरी ओर से कोई जवाब न मिलने पर वह बोला, ‘‘क्या हुआ, मेरी आवाज सुनाई नहीं दे रही है?’’

‘‘अरे, सुन रहा हूं भई, निश्ंिचत रह, मैं बेबी तथा बच्चों को साथ ले आऊंगा.’’

‘‘यार, तुम से एक और रिक्वैस्ट है,’’ उस की आवाज अत्यंत हलीमीभरी थी, ‘‘गुरु महाराज को 100 डौलर से कम दक्षिणा मत देना.’’

‘‘अरे, यह भी कोई कहने वाली बात है,’’ मैं ने तुरंत कह तो दिया, लेकिन मन ही मन यह अवश्य सोचा था कि यहां डौलर छापने की मशीन तो नहीं लगी हुई है. इसे क्या मालूम कि ट्रेन के किराए

के 5-6 डौलर बचाने के लिए मैं 5 किलोमीटर की दूरी पर अपने इंस्टिट्यूट तक प्रतिदिन पैदल आताजाता हूं.

खैर, मैं उस के घर चला गया, वहां उस के कई रिश्तेदार तथा परिचित आए हुए थे.

मैं ने धीरे से 50 डौलर महाराज के सिंहासन के सामने पड़ी थाली में डाल कर माथा टेक दिया, लेकिन अगले ही पल हिसाब भी लगा लिया कि भारतीय करैंसी में कितने रुपए बन गए तथा मन ही मन अपनेआप को कोसते हुए तथा मित्र को भी एक भद्दी सी गाली निकालते हुए कहा, ‘ससुरे ने अढ़ाईतीन हजार रुपए का नुकसान करवा दिया.’

गुरु महाराज प्रवचन देने लगे. उन का एकएक बोल मनमंदिर के किवाड़ खोल रहा था. चांदी जैसे उज्ज्वल वस्त्रों से सुशोभित वे किसी देवर्षि की तरह लग रहे थे. सचमुच ही ऊपर वाले ने इन महापुरुषों को कोई विशेष गुण दिया होता है. मगर गुरु महाराज की ओर देखते हुए यों प्रतीत हो रहा था मानो वे मेरे परिचित हों, लेकिन यह मेरे मन का वहम हो सकता था, क्योंकि मैं तो इंडिया में रहते हुए भी कभी किसी धार्मिक सम्मेलन में नहीं गया था.

महाराज को चढ़ावा भी काफी चढ़ गया था. घर वालों ने भी सोने की मोटी चेन, हाथ का कड़ा तथा डौलरों से भरा लिफाफा उन के चरणों में रख दिया था. तदोपरांत लंगर छक कर संगत चली गई थी.

महाराजजी से परिचय करवाने के लिए मेरा मित्र मुझे उन के निकट ले गया. मगर उस की बात पूरी होने से पहले ही महाराज बोल पड़े थे, ‘‘मैं जानता हूं इन्हें, डा. शुक्ला हैं. समाचारपत्रों में अकसर मैं इन के बारे में पढ़ता रहता हूं.’’ और उन्होंने मुझ से पूछा, ‘‘तू ने पहचाना नहीं मुझे? मैं रमेश हूं, मेछी?’’ और उन्होंने मुसकराते हुए मेरे मित्र से परदाफाश कर दिया, ‘‘यह तो मेरे साथ ही गांव के स्कूल में पढ़ा करता था.’’

पलभर में ही चलचित्र की रील की तरह सबकुछ मेरी आंखों के सामने घूमने लगा था. तभी तो महाराज का चेहरा मुझे इतना जानापहचाना लग रहा था.

हम दोनों गांव के राजकीय स्कूल में एकसाथ पढ़ते थे. वह पढ़ाई में नालायक विद्यार्थियों जैसा था, लेकिन बातचीत में इस कदर शातिर था कि आसमान को भी पैबंद लगा देता था. वह इस प्रकार की दलीलें देता कि झूठ भी सच साबित हो जाता था. हमारे अध्यापक अकसर उस से कहा करते थे कि तू इतना चालाक है कि बड़ा हो कर लीडर बनेगा. स्कूल में पढ़ते समय ही वह देसी शराब और सिगरेट भी पीता था.

मुझे अभी तक याद है कि कैसे उस ने एक बार मुझे पीटा था और मुख्य अध्यापक से भी मेरी पिटाई करवाई थी. स्कूल के निकट ही साइकिल पर तिनके वाली कुल्फी बेचने वाला आया करता था. एक टके (2 पैसे) की एक कुल्फी. मेछी (रमेश) ने मुझ से कुल्फी ले कर देने को कहा था. मैं ने मना कर दिया तो उस ने मुझे 3-4 थप्पड़ रसीद कर दिए. मैं ने उसी समय मुख्य अध्यापक से उस की शिकायत कर दी. उन्होंने झटपट उसे बुला लिया. लेकिन मेछी ने सरासर झूठ बोलते हुए पासा ही पलट दिया, ‘सर, यह बिना किसी बात के मुझे गालियां दे रहा था. मुझे क्रोध आ गया और तब मैं ने इस के 2-4 चांटे लगा दिए.’’ मुख्य अध्यापक ने उस की बात पर विश्वास करते हुए

2-3 थप्पड़ मारते हुए मुझे डांटा, ‘‘एक तो गालियां बकता है और फिर शिकायत भी करता है.’’

और तभी उन्होंने झट से मेछी को आदेश दे डाला, ‘‘लगा इस के दोचार थप्पड़ और.’’ मेछी ने फिर मेरे चांटे मार दिए. मैं स्तब्ध सा मुख्य अध्यापक के कार्यालय से जब बाहर आया तो मेछी ने पहले से भी ज्यादा अकड़ कर कहा, ‘‘अब कुल्फी ले कर देगा या तेरी और करवाऊं पिटाई.’’

….और आज वही मेछी मेरे सम्मुख सिंहासन पर विराजमान है.

गुरु महाराज से बहुत सारी बातें हुईं. उन के अमेरिका, कनाडा, इंगलैंड, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में आश्रम भी थे और उपासक भी. मेरे आकलन के अनुसार, उन के पास करोड़ों की संपत्ति तो अवश्य होगी.

घरपरिवार के बारे में पूछने पर उन्होंने मुसकराते हुए कहा था, ‘साधुसंतों का परिवार तो उन के शिष्य होते हैं. यही लोग हमारा परिवार हैं तथा समाज भी.’

गुरु महाराज तो शाम की फ्लाइट से अपने भक्तों से मिलने के लिए ब्रिसबेन चले गए थे मगर मेरे मन की यादों की पिटारी खोल गए थे.

मैं बचपन से ही संगीतप्रेमी था और नाटकों में अभिनय भी किया करता था. गाना गाने के लिए स्कूल की ओर से हमेशा मुझे ही भेजा जाता था. और मैं हर बार कोई न कोई पुरस्कार प्राप्त करता था.

कहीं भी ढोल बजने लगता तो स्वयं ही मेरे पैर थिरकने लग जाते.

हमारे गांव से 4-5 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव में मजार है. कुछ लोग अपने कष्ट दूर करने के बहाने वहां जाते थे. जिन लोगों में पीर की ‘हवा’ आती थी, वे वहां ‘खेलने’ (झूमने) लगते थे. वहां यह मान्यता भी थी कि लगातार 5 बार वहां जाने से मनोकामना पूरी हो जाती है.

मैं भी प्रत्येक वीरवार ऊबड़खाबड़ और कंकड़ोंभरे रास्ते पैदल चल कर वहां जाता था. मगर शायद मेरी भावना में स्वार्थीपन अधिक तथा श्रद्धा कम थी. लेकिन लगातार 5 बार जाने के बावजूद मेरी मनोकामना पूरी नहीं हुई थी. आप यह भी जानना चाहोगे कि मैं वहां क्या मांगता था. वास्तव में मैं वहां जा कर हर बार यही प्रार्थना किया करता था कि पीर मुझे भी ‘खेलने’ में लगा दे.

लेकिन मेरी ख्वाहिश मन में ही रह गई थी.

गांव में एक कुम्हारों यानी मुसलमानों का घर था. अब तो पूरी तरह याद नहीं कि  वे लोग कुम्हार थे या मुसलमान. वर्षों पुरानी बात है. उन के परिवार के सदस्यों में पीर की ‘हवा’ आती थी. वे लोग वीरवार वाले दिन शाम को ढोल बजाने लगते तथा कुछ समय बाद उन के परिवार का कोई सदस्य ‘खेलने’ लग जाता और अपने शरीर पर ‘छेंटे’ मारने लगता.

मैं कभीकभी उन के घर चला जाता था. वे लोग खुले आंगन में ढोल बजा कर ‘खेलते’ थे. लेकिन एक बार न जाने क्या हुआ. कुछ पता ही न चल पाया कि  कब ढोल की थाप मुझ पर हावी हो गई थी और मैं भी ढोल की थाप के साथसाथ झूमने लगा था. उन्होंने मुझे ‘छेंटा’ पकड़ा दिया और मैं ‘छेंटे’ से अपने शरीर पर वार करने लगा था तथा जैसे वे बोलते गए वैसे ही हक, हक… कहता रहा.

मगर शीघ्र ही यह खबर मेरे घर खबर पहुंच गई थी. मेरे घर वाले कुम्हारों को भलाबुरा कहते हुए मुझे घसीटते हुए ले गए थे. घर वालों ने मेरी धुनाई भी कर डाली थी और स्वयं भी बहुत परेशान हुए थे.

जंगल की आग की तरह यह खबर पूरे गांव में फैल गई थी कि मुझे भी असर हो गया है और मुझ में भी हवा आने लगी है.

एक दिन शाम को मैं बंजर जमीन की ओर जा रहा था. गांव की एक महिला ने मुझे रोक कर मेरे पांव छुए और गोद में उठाए हुए बालक की ओर इशारा करते हुए कहने लगी, ‘जी, कहते हैं इस पर किसी प्रेत का साया है. दिनभर रोता रहता है. आप कोई उपाय बताइएगा.’

और मैं ने भी झट से यों कह दिया जैसे मैं तंत्रविद्या में निपुण था. ‘इस के सिर के ऊपर से कलौंजी घुमा कर पक्षियों को डाल देना, शीघ्र ही ठीक हो जाएगा.’

वास्तव में उस महिला के पूछने पर तुरंत ही मुझे कुछ याद आ गया था. एक बार मेरी माताजी ने किसी साधु से मेरे बारे में पूछा था तो उस ने यह उपचार बताया था.

मुझ में हवा आने की खबर हमारे गांव से शीघ्र ही निकटवर्ती गांवों में जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी. उस महिला की तरह और भी कई लोग अपने दुखों के समाधान के लिए मेरे पास आने लगे थे. दिमाग तो मेरा पहले से ही तेज था. मैं घरपरिवार में सुने टोटके और साथ ही अंधविश्वास से जुड़े ढंग भी बता देता था.

एक बार मैं कुबैहड़ी गांव जा रहा था. एक महिला अपने पोते को मेरे पास ला कर बोली, ‘महाराज, यह कुछ भी खातापीता नहीं है. दूध तो बिलकुल भी नहीं पीता. पहले तो पूरी बोतल पी जाता था. मुझे शक है कि मेरी बड़ी बहू ने इस के लिए टोना कर दिया है.’

मैं ने मस्तिष्क पर बल डाला तो मुझे शीघ्र ही याद आ गया कि जब मेरे छोटे भाई को भूख नहीं लगती थी तो एक हकीम ने बताया था कि लोहे के चाकू को गरम कर के दूध में डुबो कर उस दूध को पिलाना  चाहिए. मैं ने भी वही नुस्खा उसे बता दिया. और साथ में यह भी बोल दिया कि इस के गले में सुराख वाला तांबे का सिक्का काले धागे में डाल कर बांध देना.

संभवतया मेरी ख्याति और फैल जाती, अगर भेद न खुलता. दरअसल, उस औरत के बच्चे को भूख लगने लगी थी और वह खुश हो कर दूध की गड़वी तथा गुड़ का बड़ा सा ढेला मेरे घर दे गई थी, क्योंकि मेरे बतलाए उपाय से उस का पोता ठीक हो गया था.

एक वैज्ञानिक होने के नाते अब मैं स्पष्टीकरण दे सकता हूं कि लोहे के चाकू को गरम कर के दूध में डालने से उस दूध में खनिज पदार्थ लोहे की मात्रा बढ़ गई होगी और बच्चे की रक्ताल्पता (अनीमिया) में सुधार आ गया होगा. बाकी सब तो अंधविश्वास की बातें थीं जिन के बिना लोगों की संतुष्टि नहीं होती.

घरपरिवार में पता चलते ही मेरी खूब पिटाई हुई थी. पिताजी चीखचीख कर पूछ रहे थे, ‘तू कब से सयाना बन कर लोगों को उपाय बताने लगा है.’ उन्होंने मुझे गांव से निकाल दिया और लुधियाना पढ़ने भेज दिया. मैं बस डिगरियां ही प्राप्त करता रहा और एक वैज्ञानिक बन गया. अब तो सेवानिवृत्त भी हो चुका हूं.

….और आज गुरु महाराज से मिल कर सबकुछ याद आने लगा था, लेकिन मेरे मन में यह विचार भी बारबार कौंधता रहा कि इतनी उपाधियां प्राप्त कर के और अंतराष्ट्रीय स्तर का वैज्ञानिक बन कर मुझे क्या मिला. 34-35 वर्ष की नौकरी के उपरांत सेवानिवृत्त होने पर जितनी राशि मुझे मिली थी उतनी तो गुरु महाराज ने आस्ट्रेलिया के एक फेरे में ही बना ली होगी. फिर उन की और भी कई प्रकार की सेवाएं होती होंगी.

मुझे पछतावा होने लगा था. इस से तो अच्छा होता गांव में ही रहता. मेरी तो उन दिनों भी काफी ख्याति हो गई थी. अब तक मेरे भी कई बंगले व आश्रम बन जाते तथा करोड़ों में बैंक बैलेंस होता. मगर अब तो बहुत देर हो चुकी है. अब तो मेरा मन भी बारबार यही कह रहा है, अब पछताए क्या होत. Hindi Story

Romantic Story : वे सूखे पत्ते

Romantic Story. आज से 15 साल पहले की बात है. मैं 11वीं जमात में पढ़ता था. वह लड़की हमारी क्लास में नईनई आई थी. उस के पैर में कुछ लचक थी. शायद कुछ चोट लगी हो, इसलिए वह थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी. उस ने 10वीं क्लास में पूरे उदयपुर में टौप किया था और मैं ने अपने स्कूल में.

दिखने में तो वह बला की खूबसूरत थी. मगर कहते हैं न कि चांद में भी दाग होता है, बिलकुल ऐसे ही उस के पैर की वह चोट उस चांद से हुस्न का दाग बन गई थी.

उस ने पहले दिन से ही क्लास के मनचले लड़कों को अपनी खूबसूरती का दीवाना बना दिया था. उस की सादगी की चर्चा हर जबान पर थी.

शुरुआत के चंद महीनों में ही क्लास के आधे से ज्यादा लड़के उसे प्रपोज कर चुके थे. सब को उस के हुस्न से मतलब था, उस से नहीं.

हम लड़कों की सोच गिरी हुई होती है. लड़की को इस्तेमाल करने की चीज सम?ाते हैं. इस्तेमाल किया और फेंक दिया. मगर सबकुछ जानते हुए भी उस ने कभी किसी को जवाब नहीं दिया. न ही नाराजगी से और न ही खुशी से.

और एक मैं था, जो अभी तक उस का नाम भी नहीं जानता था. सच कहूं, तो मैं ने कभी कोशिश भी नहीं की थी. नाम जान कर करना भी क्या था, जब दोनों की दुनिया और रास्ते ही अलग थे.

हर कोई उसे अलगअलग नाम से पुकारता था, इसलिए कभी सुनने में भी नहीं आया उस का असली नाम.

मैं ने उस की आंखें देखी थीं. कुछ बोलती थीं उस की आंखें, मगर क्या बोलती थीं, यह जानने के लिए कभी सोचा ही नहीं. मेरे लिए पढ़ाई ज्यादा जरूरी थी. अनाथ था न मैं. अपना सबकुछ खुद ही देखना था. अपना भविष्य खुद बनाना था.

जिस उम्र में लड़के तरहतरह के शौक पूरे करने में लगे होते हैं, उस उम्र में मैं खुद को एक सांचे में ढालने चला था. भला हो उस गैरसरकारी संस्था का, जो मुझे इस स्कूल में पढ़ा रही थी.

कुछ दिनों के बाद इम्तिहान हो गए. उस लड़की ने क्लास में फिर से टौप कर दिया. मेरी सालों से चली आ रही क्लास में पहली पोजीशन की हुकूमत को उस ने खत्म कर दिया था.

हमारे क्लास टीचर क्लास में आए और बोले, ‘‘सरोज, तुम ने 96 फीसदी नंबर ला कर क्लास में टौप किया है.’’

मुझे धक्का लगा कि मैं पीछे कैसे रह गया. मैं इतनी मेहनत से तो पढ़ा था. टीचर दोबारा बोले, ‘‘राघव, तुम्हारे  95.8 फीसदी नंबर आए हैं. तुम दूसरे नंबर पर हो.’’

इस पर मुझे राहत सी मिली कि बस थोड़ा सा फर्क है. मगर फर्क क्यों है, इस का जवाब मुझे  खुद को देना था. यह जवाब मैं कहां से लाता?

मैं पूरी क्लास में यही सोचता रहा. सब लड़के खुश थे. जो फेल थे वे भी, क्योंकि उन्हें उस का असली नाम पता लग गया था.

क्लास खत्म होने पर मैं उस से मिला और बधाई दी. वह इस की हकदार भी थी, इसलिए उस ने भी मुझे  बधाई दी.

यह हमारी पहली मुलाकात थी. इस के बाद आगे के दिनों में धीरेधीरे बातें होने लगीं, मगर जबान से नहीं, बस इशारों से. दूर से देख कर हाथ हिला देना, मगर सामने होने पर चुपचाप निकल जाना, यह हमारे लिए बहुत आम हो गया था.

फाइनल इम्तिहान आने वाले थे. हमारी बातें अब शुरू होने लगी थीं. मगर मैं ने कभी सरोज के बारे में जानने की कोशिश नहीं की, बस हालचाल पूछ लिया करता था.

फिर एक दिन वह बोली, ‘‘इम्तिहान के बाद मिलना.’’

मगर कहां मिलना, यह नहीं बताया. मैं कुछ देर सोचता ही रहा कि कहां और क्यों? क्यों का जवाब तो यह था कि हम दोस्त थे, मगर कहां का जवाब मुझे नहीं मिल रहा था. क्या मेरे घर में? मगर मैं तो अनाथ आश्रम में रहता हूं. तो क्या फिर उस के घर में? मगर उस का घर तो मुझे पता ही नहीं. तो कहां? फिर उसी ने बताया कि स्कूल के पास वाले बाग में मिलना. मेरे अंदर के सवालों का तूफान थाम दिया था उस के इस जवाब ने.

इम्तिहान खत्म हुए. हम मिले, हम फिर मिले, हम बारबार मिले. एक अजीब सी, मगर बहुत प्यारी सी धुन लग गई थी दोनों को एकदूसरे के साथ की. फिर एक दिन मैं ने उसे बताया कि मैं अनाथ हूं, तो जवाब मिला कि वह भी अनाथ है.

मेरी तो यह जान कर जैसे सांसें ही थम गई थीं कि इतनी प्यारी लड़की  के मांबाप नहीं हैं.

बला की खूबसूरत लड़की इस नोच खाने वाले समाज में अपना वजूद बनाए हुए थी. समझ आ गया था मुझे  कि उस की आंखें क्या बोलती थीं और क्यों वह इतनी नरम मिजाज थी.

मुझे  आज उन सवालों के जवाब भी मिल गए थे, जिन सवालों को मैं ने कभी सोचा भी नहीं था.

फिर कुछ देर चुप रहने के बाद मैं ने बड़ी हसरत से उस से पूछा, ‘‘क्या अब तक तुम्हारा कभी कोई दोस्त रहा है?’’

वह हथेली भर के सूखे पत्ते ले आई और बोली, ‘‘ये हैं मेरे दोस्त.’’

मुझे  कुछ समझ  नहीं आ रहा था कि सरोज क्या बोल रही है. मैं हंस भी नहीं सकता था, क्योंकि उस के चेहरे पर हंसी  नहीं दिख रही थी.

‘‘सरोज, मैं कुछ समझा नहीं?’’ मैं ने बहुत जिज्ञासा से पूछा.

जब उस की आंखें सबकुछ बोलती ही थीं, तो क्यों आज मैं उस की जबान का बोला हुआ शब्द समझ नहीं पा रहा था. वह चाह रही थी कि उस का यह दोस्त उस की आंखें पढ़ कर जान जाए कि क्यों ये सूखे पत्ते उस के दोस्त थे. मगर उस ने नहीं बताया और मैं ने भी मान लिया कि शायद दुनिया में कहीं उस का भरोसा टूटा होगा, इसलिए वह ऐसी बातें करती है.

हमारी बातों के सिलसिले अब काफी बढ़ गए थे और हम धीरेधीरे बहुत करीब आ गए थे. एक लगाव था, एक अधूरापन था, जो साथ रह कर ही पूरा होता था. मैं जानना चाहता था उस का और उस के सूखे पत्तों का रिश्ता. मैं इतना करीब तो था उस के, मगर उस के दोस्त अब भी सूखे पत्ते ही थे.

फिर एक दिन मेरे मन में यह सवाल उठा कि स्कूल से पढ़ाई खत्म होने के बाद हम कैसे मिलेंगे? मगर यह सवाल मैं उस से सुनना चाहता था और यह भी जानता था कि वह नहीं पूछेगी, क्योंकि उसे मुझ से ज्यादा उन सूखे पत्तों से जो लगाव था.

स्कूल की पढ़ाई खत्म हो गई. उस से मिले हुए काफी दिन गुजर गए. अकेलापन महसूस होने लगा था और यह अकेलापन मुझे काटने को दौड़ता था. सरोज लौट गई थी अपनी दुनिया में, अपने उन सूखे पत्तों के पास या फिर कहीं और.

फिर एक दिन मैं ने स्कूल जा कर पता किया. कितना बेवकूफ था मैं. इतना वक्त साथ रहे, मगर कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह रहती कहां थी. मैं अपने टीचर के पास गया और सरोज का पता पूछा.

टीचर बोले, ‘‘राघव, पता तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर सरोज तुम्हारे लिए एक चिट्ठी छोड़ गई है.’’

मैं बहुत खुश हुआ, मगर न जाने क्यों मेरे हाथ कांप रहे थे उस चिट्ठी को खोलने में. जिंदगी में पहली बार किसी ने मुझ अनाथ को चिट्ठी लिखी थी.

टीचर बोले, ‘‘अरे, यह क्या? जो राघव हमेशा पढ़ने में अव्वल रहा, आज उस के हाथ इस मामूली सी चिट्ठी को लेने में कांप क्यों रहे हैं?’’

‘‘पता नहीं, सर. मगर यह मामूली नहीं है,’’ इतना कह कर मैं वहां से बहुत तेजी से भाग निकला. और क्या भागा यह मैं भी नहीं जानता. शायद मुझ में हिम्मत नहीं थी उस वक्त का सामना करने की.

मैं बहुत भागा और न जाने क्यों मेरे कदम उस बाग की ओर बढ़ते चले गए, जहां हम अकसर मिलते थे.

मेरी सांसें बहुत तेज चल रही थीं. थकने की वजह से नहीं, डर की वजह से. और डर था उसे खो देने का. डर था मुझे  कि यह चिट्ठी पढ़ते ही मैं उसे खो दूंगा. या उस का मेरे लिए पहला और आखिरी खत था. क्या करूं, कुछ समझ  ही नहीं आ रहा था. अभी पढ़ूं कि नहीं.

मन में हजारों बुरे खयाल आ रहे थे. सांसें भी थमने का नाम नहीं ले रही थीं. फिर सोचा, ‘शायद उस ने इस में अपना नया पता लिखा हो.’

बहुत हिम्मत कर के मैं ने वह खत खोल ही दिया और वह कुछ यों था:

‘प्यारे दोस्त राघव,

‘मैं जानती हूं कि यह खत पढ़ने से पहले तुम ने हजार बार सोचा होगा. तुम्हारे हाथ कांपे होंगे, धड़कनों का शोर कुछ ज्यादा हो गया होगा. मन में हजारों तरह के खयाल आ रहे होंगे और उन में सब से बड़ा सवाल यह होगा कि मेरे दोस्त सूखे पत्ते ही क्यों?

‘राघव, मैं ने तुम्हें कभी नहीं बताया, पर अब बताती हूं. मैं अपने मातापिता की एकलौती लड़की थी. जिस घर में मैं पैदा हुई, वहां लड़की का पैदा होना जुर्म माना जाता था. जब मैं 4 साल की थी, तब मेरे पिता ने मुझे छत से नीचे फेंक दिया था. मैं आंगन में रखे उन सूखे पत्तों के ढेर पर गिरी थी, जिसे कुछ देर पहले मेरी मां ने जमा किया था. तब मैं तो बच गई, मगर मेरा पैर टूट गया था.

‘पिताजी की ऐसी गिरी हुई हरकत देख कर मां ने वहीं पर रखी कुल्हाड़ी से उन की जान ले ली. उन्होंने मुझे  बहुत प्यार से गले लगाया, खूब रोईं. मैं भी रो रही थी. फिर मां ने मुझे  छोड़ा और घर बंद कर के खुद को आग लगा ली. मां भी मर गईं और मैं छोटी सी लड़की 4 साल की उम्र में ही अनाथ हो गई.

‘किसी रिश्तेदार ने मेरी जिम्मेदारी नहीं ली. जिस उम्र में औलाद को उस की मां के सहारे की सब से ज्यादा जरूरत होती है, वह सहारा मुझ  से छिन गया था. मां के आंचल में खेलने की उम्र में मुझे अनाथालय वाले ले गए.

‘वहां जब मैं गई, तो हर बार बस अपना गिरना याद आता था. उस वक्त मुझे बचाने वोल वे सूखे पत्ते ही थे, जिन से मैं ने कभी बात तक नहीं की थी. उन बेजबानों ने मुझे  एक नई जिंदगी दे दी थी. मेरा पैर हमेशा के लिए खराब हो गया था.

‘मैं आज भी हर रोज जब सड़कों पर गिरे सूखे पत्ते देखती हूं, तो मुझे वही ढेर याद आता है. मैं उन का कुछ इसी तरह एहसान मानती हूं कि जब मेरा अपना पिता मेरा अपना नहीं हो सका, तब इन गैर और बेजबान पत्तों ने मुझे सहारा दिया.

‘मुझे  जब भी इस बेहया दुनिया से डर लगता है, मैं अकसर इन्हें खत लिखती हूं. मैं इन का एक ढेर बनाती हूं, फिर एक हवा का झोका आता है और उस ढेर के सब पत्तों को मेरे चारों ओर फैला कर कहता है कि भरोसा रखना सरोज… ये सूखे पत्ते हमेशा तेरे साथ हैं… हमेशा.

‘मैं जानती हूं राघव कि तुम यह खत अभी उसी बाग में बैठ कर पढ़ रहे हो, और तुम्हारी आंखें भीग गई हैं. मुझे माफ कर देना तुम्हें चुपचाप छोड़ कर जाने के लिए. मगर महसूस कर के देखना… मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं, इन सूखे पत्तों की तरह.

‘तुम्हारी सरोज.’

मेरी आंखें सच में भर आई थीं. एक आह निकल गई थी मेरे दिल से. आज समझ आ गया था कि क्यों हैं ये सूखे पत्ते उस के दोस्त… कितना जानती थी वह मुझे .. उसे पता था कि मैं यह खत उस बाग में ही पढ़ूंगा. अब समझ आया कि क्यों मेरे पैर भागतेभागते मुझे  इस बाग में ले आए थे.

मैं सरोज के दोस्तों को ले कर बनाए हुए ढेर में सरोज की दुनिया को बड़े गौर से देख रहा था कि न जाने कहां से अचानक एक हवा का झोका आया, जिस ने उन पत्तों को मेरे चारों ओर फैला दिया और मुझे सच में एहसास होने लगा कि सरोज मेरे बहुत करीब है… बहुत ही करीब…

Family Story : पत्नी की पगार

Family Story. ‘‘अब आप इतना परेशान मत होइए, धीरेधीरे समय के साथसाथ सब अच्छा हो जाएगा… और जब मैं ने कह दिया कि आप के सामने कैसे भी हालात आ जाएं, मैं हमेशा हर कदम पर आप के साथ हूं, तो फिर आप क्यों इतना सोचविचार करने में उलझे हुए हैं?’’ यह कहते हुए प्रिया ने चाय का प्याला शिशिर के हाथ में थमा दिया.

प्रिया के होंठों से फूटने वाले ये शब्द थकेहारे और सच कहें तो हालात के चलते कहीं न कहीं हताशा के घेरे में आ चुके शिशिर को एक बड़ा संबल देने वाले थे.

‘‘…हां, लेकिन अगर मैं इतने पांव न पसारता, तो शायद आज इस मानसिक परेशानी का मुझे मुंह नहीं देखना पड़ता,’’ शिशिर ने धीरे से कहा.

दरअसल, शिशिर ने शहर में एक मकान लिया था. चूंकि मकान शहर की जानीमानी हाई क्लास कालोनी में था, सो उस की कीमत भी हाई क्लास ही थी.

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मकान खरीदते ही बैंक के कर्ज की एक अच्छीखासी मासिक किस्त शिशिर के पल्ले पड़ गई और यहीं से शुरू हो गया रोजाना के तनाव और मानसिक अशांति का एक सिलसिला.

शिशिर की पगार का एक बड़ा भाग लोन की किस्त खा जाती थी. बचेखुचे पैसों में तमाम दूसरे खर्चे होते थे, जो मुश्किल से ही निबट पाते थे.

शिशिर की पत्नी प्रिया एक बहुत ही समझदार औरत थी. शिशिर को परेशान देख कर वह सब्र से उसे समझाने की कोशिश करती थी, लेकिन धीरेधीरे उसे लगने लगा कि कहीं न कहीं घर के खर्चों को पूरा करने में पैसे की कमी आड़े आ रही है.

एक दिन प्रिया ने शिशिर से कहा, ‘‘सुनिए, कुछ दिन अगर हम लोग अपने खर्चों को कंट्रोल कर लें, तो समय बीतने पर सबकुछ ठीक हो जाएगा.’’

प्रिया की बात पूरी नहीं हुई थी कि शिशिर ने झुंझला कर कहा, ‘‘मैं ने आज तक कभी अपने खर्चों पर कंट्रोल नहीं किया, तो आज कैसे कर लूं… ‘‘सिर्फ और सिर्फ एक मकान की वजह से मुझे  इतनी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. तुम क्या जानो, मुझ  पर क्या गुजर रही है. जाओ और जा कर अपना काम करो.’’

आज शिशिर के ये शब्द प्रिया को कहीं न कहीं चुभ गए थे, क्योंकि हकीकत तो यह थी कि प्रिया के कहने पर ही शिशिर ने शहर में वह मकान खरीदा था.

अब प्रिया ने मन ही मन ठान लिया कि वह शिशिर की पैसे से मदद कर के रहेगी. लेकिन उस ने अपनी योजना का जिक्र किसी से नहीं किया. आसपास के कई स्कूलों में उस ने इंटरव्यू दिए और आखिरकार एक स्कूल में 15,000 रुपए की मासिक पगार पर उस ने नौकरी जौइन कर ली. जब उस ने यह सूचना शिशिर को दी, तो शिशिर के होंठों पर उम्मीद से भरी मुसकराहट छा गई.

अगले ही दिन से प्रिया काफी बिजी रहने लगी थी. सुबह 4 बजे उठना, पूरे घर का खाना बनाना, साफसफाई करना और उस के बाद स्कूल के लिए तैयार होना. दोपहर को 3 बजे तक वापस आना और फिर घर के कामकाज, रात में पढ़ाई करना और फिर 11 बजे सोना, यह उस का रोज का काम हो चला था.

शिशिर की परेशानी पर प्रिया ने अपना सुकून और आराम न्योछावर कर दिया था. उसे मशीन की तरह काम करते देख कर शिशिर कभीकभी अंदर से दुखी हो जाता और कहता, ‘‘तुम नौकरी छोड़ दो, जो होगा वह देखा जाएगा.’’

लेकिन प्रिया भी बहुत जिद्दी स्वभाव की थी. उस ने ठान लिया था कि जब तक हालात ठीक नहीं हो जाते, तब तक वह शिशिर की मदद करती रहेगी.

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और एक दिन वह आया जब प्रिया ने कड़क चाय के प्याले के साथ शिशिर को एक सफेद लिफाफा थमाया. शिशिर ने लिफाफा खोल कर देखा, तो उस में 15,000 रुपए रखे हुए थे.

यह प्रिया की पहली पगार थी. आज दोनों की खुशी का कोई ठिकाना न था. सच तो यह था कि शिशिर को अपनी पगार आने से कई गुना ज्यादा खुशी और सुकून प्रिया के दिए हुए उस सफेद लिफाफे में रखे 500 के 30 नोटों को छू कर मिला था.

शिशिर ने उन पैसों को एक अलग गुल्लक में डाल दिया और उस पर लिख दिया ‘पत्नी की पगार’.

प्रिया की पहली पगार के साथ ही मानो कुछ चमत्कार सा होने लगा. शिशिर जो अब तक परेशान रहता था, धीरेधीरे सुकून की ओर बढ़ने लगा. वक्त बीतता गया और उस के साथ ही शिशिर के सिर पर से कर्ज का बोझ  भी धीरेधीरे कम होने लगा.

तकरीबन 10 साल की उतारचढ़ाव भरी जिंदगी के बाद आखिरकार शिशिर की प्रमोशन हुई और अब उस की पगार अच्छीखासी हो गई थी. कुछ ही सालों में उस ने बैंक का सारा कर्ज चुकता कर दिया. बैंक से लोन अदायगी का सर्टिफिकेट पा कर उसे ऐसा लग रहा था मानो किसी बंधन से छुटकारा मिल गया हो.

खुशी से झुमता हुआ शिशिर घर पहुंचा. आज प्रिया भी अपने स्कूल से जल्दी आ गई थी. शिशिर कुछ सोच ही रहा था कि चाय के प्याले के साथ एक सफेद लिफाफा उस की ओर बढ़ाते हुए प्रिया ने कहा, ‘‘मैं जानती हूं कि अब आप के लिए इस छोटी सी मदद का कोई मोल नहीं है, लेकिन मैं इसे अपने पास नहीं रख सकती, क्योंकि मेरे लिए सब से खाद आप की खुशी और सुकून है,’’ यह कहते हुए प्रिया की आंखों में आंसू छलक आए.

शिशिर ने प्रिया को अपने पास बिठाया और आंसू पोछते हुए कहा, ‘‘शायद तुम नहीं जानतीं कि मेरे सब से मुश्किल दिनों में इसी सफेद लिफाफे ने मुझे  मेरा मानसिक सुकून लौटाया था. आज भी मैं अपनी पगार से कई गुना ज्यादा इज्जत इस सफेद लिफाफे को देता हूं, इसलिए मेरी तुम से विनती है कि भविष्य में कभी ऐसे शब्द मत बोलना.’’

प्रिया का सिर शिशिर के कंधे पर टिका था और दोनों मुसकराते हुए सामने देख रहे थे. सामने रखा गुल्लक मानो प्रिया के सफेद लिफाफे का बेसब्री से इंतजार कर रहा था.

इतने पुराने गुल्लक पर शिशिर के लिखे हुए शब्द आज भी उम्मीद की खुशबू बिखेरते हुए साफ चमक रहे थे और वे जादुई शब्द थे ‘पत्नी की पगार’.

लेखक :  शिशिर शुक्ला

Hindi Story : दामाद

Hindi Story.साधारण परिवार के अमित की सरकारी नौकरी क्या लगी, उस के लिए अमीर व्यापारी की बेटी का रिश्ता आ गया. शादी के बाद अमित को कुछ ऐसा पता चला कि उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई.

जि  ला बदायूं के एक छोटे से गांव में, जहां सड़कें धूल भरी और घर मिट्टी के थे, वहां अमित कुमार का जन्म हुआ था. उस के पिता, रामनिवास, एक साधारण किसान थे, जिन के पास 5 बीघे की जोत थी और मां, सुमित्रा देवी, घर की चारदीवारी में सिमटी एक मजबूत औरत.

अमित बचपन से ही होशियार था और गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ते हुए भी वह जिले में टौप करता रहा. उस की मेहनत ने उसे दिल्ली यूनिवर्सिटी तक पहुंचाया और वहां से एक सरकारी नौकरी तक का सफर पूरा हुआ.

नौकरी लगते ही गांव में अमित की इज्जत बढ़ गई. रिश्तों की बाढ़ आ गई. हर कोई अपनी बेटी इस होनहार नौजवान से ब्याहना चाहता था, लेकिन अमित की इच्छा साधारण थी. एक ऐसी पत्नी, जो उस के बूढ़े मातापिता की सेवा कर सके, जो उस की साधारण बैकग्राउंड को समझे.

गांव के पंडित हरिनारायण शर्मा, जो अमित के पिता के विश्वासपात्र थे, ने एक दिन रामनिवासजी को बुलाया, ‘‘रामनिवासजी, मैं ने आप के लिए सोना ढूंढ़ निकाला है…’’ उन्होंने राज भरे अंदाज में कहा, ‘‘शहर के एक बड़े व्यापारी मोहनलाल अग्रवाल की बेटी आशा. परिवार बहुत अमीर है, दहेज में आप को जो चाहिए वह मिलेगा.’’

रामनिवास ने कहा, ‘‘पर पंडितजी, हमारे और उन के बीच तो सामाजिक और पैसे की बहुत बड़ी खाई है.’’

पंडितजी ने सम?ाया, ‘‘आजकल जमाना बदल गया है. अमीर परिवार पढ़ालिखा और सरकारी नौकरी वाला दामाद चाहते हैं. आप अमित की शादी इस लड़की से करवा दीजिए, पूरे गांव में आप की इज्जत बढ़ेगी.’’

अमित ने जब इस रिश्ते के बारे में सुना तो वह सहमत नहीं था. उस ने अपने पिता से कहा, ‘‘पिताजी, मैं उस लड़की को देखे बिना, उस से बात किए बिना शादी नहीं कर सकता.’’

लेकिन रामनिवास पर पंडितजी की बातों का जादू चल चुका था. उन्होंने अमित को डांटते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शादी के बाद खूब देखने का मौका मिलेगा. अभी तुम्हारा काम पढ़ाई और नौकरी करना है.’’

सुमित्रा देवी ने बीच में पड़ कर कहा, ‘‘कम से कम अमित को लड़की से एक बार मिल लेने दो.’’

लेकिन रामनिवास अड़े रहे, ‘‘नहीं, शादी तय हो चुकी है. अग्रवाल परिवार जल्दी शादी चाहता है.’’

शादी की तैयारियां जोरशोर से शुरू हुईं. अग्रवाल परिवार ने शानदार इंतजाम किया… बरात पांचसितारा होटल में ठहरी, भोजन विदेशी व्यंजनों से सजा था. दहेज में अमित के लिए एक नई कार भी थी, जिसे उस ने साफ शब्दों में लेने से मना कर दिया, ‘‘मैं दहेज के खिलाफ हूं,’’ पर पिता के दबाव में उसे दूसरे सामान स्वीकार करने पड़े.

सुहागरात पर अमित को एक ?ाटका लगा. आशा, उस की पत्नी, ने न केवल उस से दूरी बनाई, बल्कि उस के मातापिता के प्रति भी उदासीनता दिखाई. अगले 2 दिन तक वह किसी से ठीक से बात नहीं करती रही, घर के कामों से भी दूर रही.

अमित ने एकांत में आशा से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारी शादी मु?ा से जबरदस्ती हुई है? क्या तुम कुछ कहना चाहती हो?’’ आशा ने कोई जवाब नहीं दिया, केवल खिड़की से बाहर देखती रही.

तीसरे दिन, गांव की परंपरा के मुताबिक, अमित आशा को उस के मायके छोड़ने गया. ट्रेन से यात्रा के दौरान भी आशा चुप रही. स्टेशन से पैदल चलते हुए, अचानक आशा ने चलने की रफ्तार बढ़ा दी और अमित से आगे निकल गई.

तभी एक मोटरबाइक पर 2 नौजवान आते दिखे. आशा को देखते ही वे रुक गए. अमित ने पहली बार आशा के चेहरे पर मुसकान देखी. उन दोनों ने आशा से कुछ कहा और वह और भी खुश हो गई.

अमित के पास पहुंचने तक वे दोनों नौजवान चले गए थे. आशा ने इस घटना का कोई जिक्र नहीं किया और अमित ने भी नहीं पूछा, पर उस के मन में सवालों की लहर उठने लगी.

अग्रवाल परिवार का घर भव्य था. तिमंजिला हवेली, बगीचा, गाडि़यां, पर अमित का स्वागत ठंडा था. आशा की मां उसे उसे तुरंत अंदर ले गईं, जबकि अमित को बरामदे में छोड़ दिया गया.

शाम को अमित को पहली मंजिल के एक कमरे में ठहराया गया. थकान के मारे वह सो गया. रात के 9 बजे, नीचे से आती हंसी की आवाज से उस की नींद खुली.

झांक  कर देखा तो मोहनलाल अग्रवाल और 2 दोस्त शराब पी रहे थे. मोहनलाल नशे में चूर थे, ‘‘देखा मेरी अक्ल का कमाल…’’ वे चिल्लाए, ‘‘सब कहते थे मेरी बिगड़ी बेटी से कौन शादी करेगा? मैं ने एक गरीब लड़के से करवा दी.’’

दोस्तों में से एक ने हंसते हुए कहा, ‘‘सचमुच मोहनलाल, तुम तो जैकपौट हिट कर गए.’’

अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई. तभी आशा की मां आईं और मोहनलाल के कान में कुछ कहा. वे तुरंत अंदर चले गए.

अमित चुपचाप नीचे उतरा और अंदर के कमरे के दरवाजे पर पहुंचा. वहां का सीन उस के लिए चौंकाने वाला था.

आशा एक कोने में बैठी थी. उस के सामने मोहनलाल खड़े थे. ‘‘बता, किस के साथ मुंह काला करवाया है?’’ मोहनलाल चिल्ला रहे थे, ‘‘मैं ने तेरी हर गलती माफ की, तेरी शादी करवाई, और तू…’’

तभी आशा की मां ने उस के बाल पकड़े और उसे पीटना शुरू कर दिया. आशा विरोध नहीं कर रही थी, मानो यह सजा उसे स्वीकार थी.

अमित खुद को रोक नहीं पाया. वह कमरे में घुसा और आशा की मां का हाथ पकड़ लिया, ‘‘बस करिए…’’ उस की आवाज में गुस्सा था. मोहनलाल और उन की पत्नी घबरा गए. मोहनलाल की नशा उतर चुका था. उन्हें एहसास हो गया कि अमित ने सबकुछ सुन लिया है.

मोहनलाल रोने लगे, ‘‘अमित, माफ कर दो. आशा… आशा ने एक गलती की थी. हम ने सोचा था कि शादी करवा देंगे तो सब ठीक हो जाएगा.’’ आशा की मां ने रोते हुए कहा, ‘‘यह पेट से है अमित. उस लड़के ने इसे छोड़ दिया. हमें लगा कि तुम्हारी इस से शादी करवा दें तो…’’

मोहनलाल अचानक उठे और कमरे से एक दोनाली बंदूक ले आए, ‘‘मैं इस की हर गलती माफ करता रहा…’’ वे आशा की तरफ बंदूक तानते हुए बोले, ‘‘लेकिन अब नहीं. यह हमारे कुल का नाम डुबो चुकी है.’’

अमित ने तेजी से आगे बढ़ कर बंदूक छीन ली और एक तरफ फेंक दी, ‘‘बस…’’ उस की आवाज में मजबूती थी, ‘‘आशा, चलो मेरे साथ. हम अपने घर चलते हैं.’’ सब चौंक गए. आशा ने पहली बार अमित की तरफ देखा.

‘‘अमित…’’ मोहनलाल ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘तुम… तुम इसे अपने साथ ले जाना चाहते हो? इस की इस हालत के बावजूद?’’

अमित ने गहरी सांस ली और तेज आवाज में कहा, ‘‘जी, गलती आशा की नहीं, आप की है. आप ने उसे वह प्यार नहीं दिया, वह संस्कार नहीं दिए जो एक बच्चे को चाहिए. आप ने पैसे और इज्जत को परिवार से ऊपर रखा…’’

अमित थोड़ा रुका, फिर बोला, ‘‘और आशा की सजा यही है कि इसे अब मेरे साथ, एक साधारण परिवार में, मेरी पत्नी बन कर रहना पड़ेगा. इसे सीखना पड़ेगा कि प्यार क्या होता है, इज्जत क्या होती है.’’

मोहनलाल अमित के पैरों पर गिर पड़े, ‘‘तुम महान हो अमित.’’  अमित ने उन्हें उठाया, ‘‘नहीं, मैं केवल एक इनसान हूं जो समझता है कि हर गलती के पीछे एक कहानी होती है.’’

अमित ने आशा का हाथ पकड़ा और घर से बाहर निकल गया. आशा उस के पीछेपीछे चल रही थी, उस की आंखों से आंसू बह रहे थे… शायद पहली बार राहत के आंसू.

स्टेशन जाते समय, वही 2 नौजवान फिर मिले. उन में से एक, जो शायद आशा का प्रेमी था, मुसकराते हुए बोला, ‘‘आओ आशा डार्लिंग, चलो हम तुम्हारे पेट के बच्चे को गिरवा देते हैं, फिर मजे करेंगे…’’ इतना कह कर उस ने आशा का हाथ पकड़ने की कोशिश की.

तभी अमित ने उसे जोरदार घूंसा मारा. दूसरा लड़का आगे बढ़ा तो आशा ने खुद आगे बढ़ कर उसके बाल पकड़े और उसे जमीन पर गिरा दिया. ‘‘तुम लोगों ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी…’’ आशा ने पहली बार तेज आवाज में कहा, ‘‘लेकिन अब खत्म. जाओ, और कभी मेरे सामने मत आना.’’

वे दोनों नौजवान भाग खड़े हुए. अमित ने आशा को गले लगाया, ‘‘शाबाश, तुम में लड़ने की ताकत है.’’

अमित ने अपने मातापिता को कुछ नहीं बताया. आशा ने धीरेधीरे घर संभालना शुरू किया. वह सुमित्रा देवी की मदद करती, रामनिवासजी की सेवा करती. उस का बरताव पूरी तरह बदल गया था।

एक दिन आशा ने अमित से कहा, ‘‘मैं… मैं इस बच्चे को गिरवाना चाहती हूं. यह तुम्हारा नहीं है.’’ अमित ने आशा की ओर देखा, ‘‘पर इस में इस मासूम की क्या गलती है आशा? यह तो बेकुसूर है.’’

आशा अमित के पैरों पर गिर पड़ी, ‘‘तुम… तुम इसे अपनाओगे? मेरी इस गलती को?’’ अमित ने आशा को उठाया, आंखों में देखा, ‘‘आशा, तुम्हारे ये पछतावे के आंसू… यही तो तुम्हारी पवित्रता है..हम इस बच्चे को पालेंगे, अपने बच्चे की तरह.’’

एक साल बीत गया. आशा ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रेहान  रखा गया. अमित ने उसे अपनी गोद में लिया और कहा, ‘‘यह मेरा बेटा है आशा. हमारा बेटा.’’

आशा ने फिर से रोना शुरू कर दिया, पर इस बार खुशी के आंसू थे. अमित के मातापिता ने बच्चे को अपना पोता मान लिया. गांव में कोई नहीं जानता था कि यह बच्चा अमित का नहीं है.

एक शाम, आशा ने अमित से पूछा, ‘‘तुम ने मुझे क्यों स्वीकार किया? मैं तो…’’ अमित ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘क्योंकि मैं ने तुम में वह आशा देखी जो तुम्हारे नाम का मतलब है. प्यार का मतलब ही है स्वीकार करना.’’

बाहर, शाम का सूरज डूब रहा था, नई सुबह के इंतजार में. एक ऐसी सुबह जो नए विश्वास, नए प्यार और नई जिंदगी की कहानी ले कर आएगी.  Hindi Story

Success Story : हमेशा अपना लक्ष्य याद रखा – नूर फातिमा

Success Story : इंगलिश में 100 में से 99, कंप्यूटर में 97, हिंदी में 96, सामाजिक विज्ञान में 95, विज्ञान में 93. पलवल कैंप के वीरांगना झलकारी बाई सरकारी उच्चतर माध्यमिक कन्या विद्यालय की नूर फातिमा के 10वीं क्लास के ये नंबर किसी का भी सीना गर्व से ऊंचा कर सकते हैं. हो भी क्यों न, अपने स्कूल में टौप करना कोई हंसीखेल नहीं है.

15 साल की नूर फातिमा के पिता का नाम मोहम्मद फरियाद और मां का नाम अजिमा खातून है. नूर की 2 बहनें हैं. एक साधारण परिवार की इस बच्ची ने किस तरह पढ़ाई की और खुद को कैसे इम्तिहान के लिए तैयार किया, ऐसी ही कुछ बातें जानने की कोशिश की गईं. पेश हैं, नूर फातिमा से हुई बातचीत के खास अंश :

सब से पहले तो आप को बधाई. आप अपने परिवार के बारे में कुछ और बताएं.

बहुतबहुत शुक्रिया. मेरे परिवार में मेरे अम्मीपापा और हम 3 बहनें हैं. हमारे घर में पढ़ाई पर बहुत जोर दिया जाता है. मेरे परिवार ने हमेशा मुझे  मेहनत करने, खुद पर भरोसा रखने और आगे बढ़ने के लिए बढ़ावा दिया. उन की सपोर्ट की वजह से ही मैं यह मुकाम हासिल कर पाई हूं.

अमूमन ऐसा मान लिया जाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी होती है. अगर ऐसा है तो आप ने इस गैप कैसे पाटा?

मेरे स्कूल में पढ़ाई के लिए अच्छे संसाधन उपलब्ध थे. हमारे टीचर्स बहुत अच्छा पढ़ाते हैं और हर बच्चे पर ध्यान देते हैं. मैं ने स्कूल में जो पढ़ाया जाता था, उसे नियमित रूप से फौलो किया और उसी से मुझे काफी मदद मिली.

पढ़ाई को ले कर आप का रोज का रूटीन क्या था?

मैं ने कभी यह नहीं सोचा कि मुझे  रोज इतने घंटे ही पढ़ना है. मैं बस कोशिश करती थी कि अपना रोज का छोटाछोटा टारगेट पूरा करूं. और अगर कुछ रह जाता था तो उसे अगले दिन पूरा करने की कोशिश करती थी.

जब आप को 10वीं क्लास में टौप करने का पता चला तो आप का पहला रिएक्शन क्या था?

मुझे उम्मीद थी कि मेरे अच्छे नंबर आएंगे, लेकिन जब 96 पर्सैंट आने का पता चला तो बहुत खुशी और राहत महसूस हुई. सब से पहले मैं ने यह बात अपनी अम्मी को बताई.

घर या स्कूल में किस ने सब से पहले मिठाई खिलाई?

हम ने घर पर मिठाई नहीं बांटी, बल्कि उसी दिन परिवार के साथ बाहर जा कर डिनर कर के सैलिब्रेट किया.

10वीं क्लास में आप को सब से मुश्किल सब्जैक्ट कौन सा लगा और उसे आप ने ‘आसान’ कैसे बनाया?

मुझे  मैथ्स सब से मुश्किल लगता था, इसलिए मैं ने आसान चैप्टर्स से शुरुआत की, ताकि मेरा कौन्फिडैंस बढ़े और धीरेधीरे यह सब्जैक्ट मुझे आसान लगने लगा.

क्या आप ने कहीं बाहर से भी कोचिंग ली थी? अगर हां, तो कितना खर्च आया? आप अपने डाउट्स कैसे क्लियर करती थीं?

मैं ने कोई औफलाइन कोचिंग नहीं ली. मैं ने लगभग 5,000 रुपए का एक औनलाइन बैच लिया था. डाउट्स मैं अपने टीचर्स, दोस्तों और यूट्यूब की मदद से क्लियर करती थी.

क्या आप को कभी लगा कि ‘मैं नहीं कर पाऊंगी’? अगर हां तो इस ‘नैगेटिव सोच’ को आप ने कैसे हराया?

हां, कभीकभी थकान की वजह से ऐसा लगता था. लेकिन मैं हमेशा खुद को अपने लक्ष्य की याद दिलाती थी और पौजिटिव सोचने की कोशिश करती थी.

आप अपनी उम्र की दूसरी लड़कियों के लिए क्या मैसेज देना चाहेंगी?

मैं यही कहना चाहूंगी कि खुद पर भरोसा रखें और मेहनत करती रहें. अगर आप लगातार कोशिश करती रहें, तो कोई भी लक्ष्य मुश्किल नहीं होता.

आप के परिवार खासकर मातापिता ने पढ़ाई के लिए क्या सलाह दी? आप उन का एक सपना जो पूरा करना चाहती हैं?

मेरे अम्मीपापा ने हमेशा कहा कि मेहनत से पढ़ाई करो और खुद को बेहतर बनाते रहो. उन्होंने कभी मु?ा पर ज्यादा प्रैशर नहीं डाला. अगर कभी नंबर कम भी आए, तो उन्होंने हमेशा यही कहा कि और मेहनत करो, तुम इस से भी अच्छा कर सकती हो.

उन का सपना है कि मैं एक सफल इनसान बनूं और अपने पैरों पर खड़ी होऊं, जिसे मैं पूरा करना चाहती हूं.

11वीं क्लास में आप क्या स्ट्रीम लेंगी? आप की डाक्टर, इंजीनियर या कुछ ‘लीक से हट कर’ बनने की इच्छा है?

मैं 11वीं में साइंस मैडिकल स्ट्रीम लेने वाली हूं. मेरा सपना डाक्टर बनना है और आगे चल कर यूपीएससी की तैयारी भी करना चाहती हूं.

स्कूल की टीचरों ने आप को सब से ज्यादा प्रोत्साहन कैसे दिया?

हमारे टीचर्स बहुत अच्छा पढ़ाते हैं और हमेशा हम सब छात्राओं को मोटिवेट करते हैं. वे नियमित टैस्ट लेते हैं और हमें अच्छा स्कोर करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. उन्होंने हमेशा हम पर भरोसा किया और हमारा आत्मविश्वास बढ़ाया.

स्कूल प्रिंसिपल ने आप का कैसे हौसला बढ़ाया?

हमारी प्रिंसिपल मैम पढ़ाई के साथसाथ डिसिप्लिन और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज पर भी ध्यान देती हैं. वे असैंबली में बच्चों को मोटिवेट करती हैं और हमेशा हमें हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं.

सोशल मीडिया, रील्स, खेलने की इच्छा… इन सब के बीच आप ने पढ़ाई पर कैसे फोकस रखा?

मैं ने सोशल मीडिया का बहुत सीमित इस्तेमाल किया. मैं ने अपना ज्यादा समय पढ़ाई और अपने हैल्थ का ध्यान रखने में लगाया, क्योंकि एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है. बोर्ड परीक्षा के समय मैं ने पूरी तरह पढ़ाई पर फोकस किया.

Family Story : यार पापा ‘प्रैक्टिकल बनो’

Family Story. वैसे तो मुंबई की जिंदगी में एक पूरे दिन की थकान का मतलब होता है पूरी तरह से निचुड़ जाना, पर उस दिन की शाम कुछ अलग सी थी मानो वह पूरी आबादी की थकान को अपने भीतर छिपाए बैठी हो. ट्रैफिक की आवाज दूर तक सुनाई पड़ रही थी, मगर आयान की बालकनी में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी, जबकि उस का घर बिलकुल मेन रोड से लगा हुआ था.

आयान को लग रहा था कि किसी ने उसे पूरी तरह निचोड़ लिया है. उस के हाथ में कौफी का मग जरूर था, पर उसे ऐसा लग रहा था, जैसे वह केवल शाम में कौफी लेने की आदत निभा रहा हो. फोन की स्क्रीन पर उस ने दोबारा वही मैसेज पढ़ा, जो उस ने टाइप कर के डिलीट कर दिया था कि ‘यार पापा, प्रैक्टिकल बनो’.

आयान मुसकराया भी और उदास भी हुआ. यह वह वाक्य था जो वह अब तक नहीं बोल पाया था, पर मन में इतने दिनों से यही भरा था. तभी मोबाइल फोन बजा. स्क्रीन पर लिखा था ‘पापा कालिंग’. आयान ने फोन उठाया और बोला, ‘‘हैलो, पापा.’’ दूसरी तरफ वही परिचित सी आवाज आई, ‘‘बेटा, औफिस से आ गए? कुछ खाया कि नहीं?’’ आयान ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘हां पापा. बस, अभीअभी आया हूं.’’

‘‘अच्छा. तुम ठीक तो हो न? तुम्हारी आवाज थोड़ी ढीली लग रही है आज…’’ ‘‘नहीं पापा, सब ठीक है. बस, थोड़ा थका हुआ हूं.’’ ‘‘अरे, थकान से क्या घबराना? मेहनत करोगे तो थकान होगी ही. देखना, एक दिन बहुत बड़े आदमी बनोगे तुम.’’

आयान की आंखों में चुभन सी उठी. वही उम्मीदें. वही बातें पर जिन्हें वह अब सच नहीं मान पाता था. वह चुप हो गया. पापा बोले, ‘‘अरे, कुछ बोलोगे भी? क्या हुआ?’’ ‘‘कुछ नहीं पापा. बस, अच्छा नहीं लग रहा,’’ आयान बोला. ‘‘अरे बेटा, परेशान मत हुआ करो. सब ठीक होगा.’’

आयान चुप रहा. दरअसल, उस चुप्पी में कितना कुछ था, जिसे पापा सुन नहीं पा रहे थे. ‘‘ठीक है बेटा, बाद में बात करते हैं. अपनी पसंद का खाना खा लेना. सेहत अच्छी रहनी चाहिए,’’ पापा बोले और फोन कट गया.

आयान का मन भारी था. क्यों पापा उस की बातों के पीछे छिपे दर्द को नहीं समझ पा रहे? आयान देर तक बालकनी में बैठा रहा और बारबार बस यही सोचता रहा कि ‘काश, एक बार कह पाता, ‘पापा, कभीकभी प्रैक्टिकल भी बना करो’.

अगली सुबह डोरबैल बजी. आयान ने दरवाजा खोला तो सामने पापा खड़े थे. छोटा सा बैग, चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट. ‘‘अरे पापा… आप?’’ कहते हुए आयान चौंक गया. पापा बोले, ‘‘कल की बात अधूरी रह गई थी. सोचा कि खुद ही आ जाऊं. बेटे से मिलने के लिए पापा को इजाजत थोड़ी लेनी पड़ती है.’’

आयान थोड़ा असहज सा हो कर बोला, ‘‘आप ने बताया क्यों नहीं?’’ पापा भीतर आते हुए बोले, ‘‘तुम्हें रोकते हुए अच्छा नहीं लगता. वैसे भी मैं तुम्हारे ही शहर में था, सोचा मिल लूं.’’

वे दोनों सोफे पर बैठ गए. कमरे में एक लंबी,  बोझिल चुप्पी उतर आई. पापा ने धीरे से पूछा, ‘‘कल बहुत परेशान लग रहे थे. क्या बात है बेटा?’’ आयान ने नजरें झुकाईं, ‘‘कुछ नहीं पापा. बस, काम का थोड़ा तनाव है.’’ ‘‘तनाव तो हर किसी को होता है बेटा. पर तुम इतना क्यों सोचते हो? मेहनत करोगे तो सब ठीक हो जाएगा.’’

आयान ने पहली बार पापा की ओर सीधे देखा और बोला, ‘‘पापा, यह ‘सब ठीक हो जाएगा’ वाली बात हमेशा काम नहीं करती.’’ पापा कुछ पल चुप रहे, फिर बोले, ‘‘क्या मतलब?’’ आयान की आवाज टूट रही थी, ‘‘मतलब आजकल चीजें उतनी आसान नहीं हैं, जितनी आप के समय में थीं. आप की बातें अच्छी लगती हैं, पर असलियत अलग है पापा.’’

पापा ने धीरे से कहा, ‘‘तो तुम्हें लगता है कि मैं प्रैक्टिकल नहीं हूं?’’ आयान ने गहरी सांस ली, ‘‘हां पापा, कभीकभी लगता है,’’ संवादों में उतरते सच को दोनों ने महसूस किया.

पापा थोड़ी देर चुप रहे, फिर बोले, ‘‘ठीक है, चलो आज खुल कर बात करते हैं. तुम बताओ कि तुम्हे क्यों लगता है कि मैं प्रैक्टिकल नहीं हूं?’’ ‘‘क्योंकि आप हर समस्या का हल ‘हिम्मत रखो’, ‘मेहनत करो’, ‘सब ठीक हो जाएगा’. यही बताते हैं. पर पापा, दुनिया बदल चुकी है. आज नौकरी टिकती नहीं. आज महंगाई पकड़ में नहीं आती. आज सपने बेचने वाली बातें काम नहीं करतीं.’’

‘‘तो तुम चाहते हो मैं क्या कहूं? कि दुनिया मुश्किल है? कि हालात खराब हैं? कि डरो? अगर मैं ऐसा कहूंगा, तो क्या तुम बेहतर हो जाओगे?’’ आयान ने बड़ी संजीदगी से कहा, ‘‘नहीं पापा, पर थोड़ी सच्चाई, थोड़ा प्रैक्टिकल होना बस, वही चाहिए.’’

पापा के होंठों में हलकी सी कंपन हुई. उन्होंने बड़ी धीमी आवाज में कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें हमेशा सच्चाई बताई है. बस शायद तुम से कभी अपना दर्द शेयर नहीं किया.’’ आयान ने चौंकते हुए कहा, ‘‘आप का दर्द?’’

‘‘हां बेटा, मेरा दर्द. तुम सोचते हो कि तुम्हारा तनाव, तुम्हारी लड़ाइयां बड़ी हैं, पर आयान हमारे समय की लड़ाइयां भी आसान नहीं थीं.’’ आयान धीरे से बोला, ‘‘लेकिन आप ने कभी बताया नहीं.’’ ‘‘क्योंकि पिता का काम बोझ  बांटना नहीं, कम करना होता है. मैं नहीं चाहता था कि तुम मेरे संघर्षों की छाया में बड़े हो…’’

कुरसी पर बैठेबैठे पापा थोड़े पीछे टिक गए. उन की आवाज अब बूढ़ी नहीं, थकी हुई लग रही थी, ‘‘तुम्हें पता है बेटा  जब मैं तुम्हारी उम्र का था तो, नौकरी ढूंढ़ने के लिए रोज 10-10 इंटरव्यू देता था. कई बार बिना पैसे के चलता था. एक दिन भूखे पेट लौटा और दादी ने बस इतना कहा कि ‘कल फिर जाना हिम्मत नहीं हारना मेरे बेटे’. उस के बाद कई रातें रोया भी, पर सुबह फिर निकल पड़ता था.’’

आयान की आंखें भर आईं. पापा ने थोड़ा रुक कर कहा, ‘‘पर मैं ने कभी यह नहीं चाहा कि तुम भी वही झेलो जो मैं ने झेला, इसलिए हमेशा कहा करता हूं कि सब ठीक होगा, क्योंकि मुझे डर था कि कहीं तुम्हारा हौसला न टूट जाए.’’ कमरा अब सन्नाटे से भर गया था.

2 पीढि़यों का एक ही डर. आयान धीरे से बोला, ‘‘पापा, मैं भी डरता हूं कि कहीं नाकाम न हो जाऊं. कहीं आप की उम्मीदों पर खरा न उतरूं. कहीं मुझे देख कर आप यह न सोचें कि मैं आप की मेहनत का हकदार नहीं.’’

पापा ने आयान का हाथ पकड़ लिया और कहा, ‘‘तुम्हें पता है कि मैं ने सब से ज्यादा किस से डरना सीखा? न तो गरीबी से न ही नाकामी से. मैं ने सब से ज्यादा डरना सीखा है अपने बेटे के डर से.’’

आयान चौंक कर बोला, ‘‘मेरे डर से. पर क्यों?’’ ‘‘हां बेटे…’’ पापा बोले, ‘‘जब तुम परेशान होते हो, जब तुम हार मानने जैसा महसूस करते हो, तो मैं खुद को कमजोर महसूस करता हूं. ‘‘मैं पिता हूं तुम्हारा सहारा हूं अगर मैं ही हार मान लूंगा तो तुम्हें कौन थामेगा?’’

आयान की आंखों से आंसू बह निकले, ‘‘पापा मैं अकेला नहीं हूं. आप हो, यही बहुत है. मैं बस चाहता हूं कि आप भी मेरी दुनिया को थोड़ा समझे पापा…’’

‘‘और मैं चाहता हूं कि तुम मेरी दुनिया को थोड़ा मत भूलो…’’ पापा ने तुरंत कहा, ‘‘देखो बेटा, समय बदल गया यह मैं भी जानता हूं, लेकिन कुछ चीजें कभी नहीं बदलती हैं और ये हैं हिम्मत, सब्र और उम्मीद. वही तुम्हें बचाएंगी न कि प्रैक्टिकल फार्मूले.’’

आयान ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तो हम दोनों गलत नहीं बस अधूरे हैं?’’ पापा ने भी हंसते हुए कहा, ‘‘शायद तुम्हें थोड़ी उम्मीद की जरूरत है और मुझे थोड़ा प्रैक्टिकल होने की.’’

दोनों हंस पड़े. लंबे समय बाद यह हंसी आई थी. रिश्ता धीरेधीरे ठीक जो हो रहा था. शाम तक बातें चलती रहीं. कभी हलकी, कभी गंभीर, कभी बिलकुल बच्चों की तरह. ‘‘बेटा, तुम ने कभी मुझ से खुल कर बात क्यों नहीं की?’’ पापा ने सहजता से पूछा.

‘‘क्योंकि मैं ने आप को हमेशा मजबूत देखा है. मुझे लगा कि मेरी कमजोरी देख कर आप कहीं निराश न हो जाएं,’’ आयान ने धीरे से कहा. पापा मुसकराए और कहा, ‘‘पिता जितना अपने बच्चे पर गर्व करता है, उतना कोई नहीं कर सकता. तुम हार भी जाओ न, फिर भी मेरा गर्व कम नहीं होगा. हां, दुख जरूर होगा कि तुम अकेले लड़ रहे थे.’’

आयान धीरे से सिर झुका का कर बोला, ‘‘अब अकेले नहीं लड़ूंगा पापा.’’ पापा ने प्यार से कहा, ‘‘और अब मैं भी सिर्फ सपने नहीं बेचूंगा. थोड़ा प्रैक्टिकल भी बनूंगा.’’ आयान हंसा, ‘‘तो सौदा पक्का?’’ ‘‘एकदम पक्का,’’ पापा ने मुसकराते हुए कहा.

जब पापा जाने लगे तो आयान ने दरवाजा खोले बिना पूछा, ‘‘पापा, एक बात बताइए कि अगर मैं कल कह दूं कि मैं बहुत डर रहा हूं, तो आप क्या कहेंगे?’’

पापा ने आयान की आंखों में देखा और बोले, ‘‘मैं कहूंगा कि डर मत, मैं हूं न. और फिर कहूंगा कि चलो, डर को प्रैक्टिकल तरीके से हल करते हैं.’’ आयान हंस पड़ा, ‘‘देखा, आप वाकई बदल रहे हैं.’’ ‘‘तुम बदलो, मैं बदलूं तभी तो रिश्ता टिकता है.’’

पापा जा चुके थे. दरवाजा धीरे से बंद हुआ, पर आयान के भीतर कुछ खुल गया था, कुछ बहुत गहरा, बहुत शांत.

उस रात आयान ने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा, ‘यार पापा, अब सम?ा गया हूं कि आप का प्रैक्टिकल होना भी जरूरी है और आप का भावुक होना भी. मैं भी सीख जाऊंगा बस, आप साथ रहना.’  Family Story

Women’s Empowerment Story : अस्तित्व

Women’s Empowerment Story.

चैप्टर 1 : कांच की दीवारें

माया के लिए सुबह का मतलब सूरज की पहली किरण नहीं, बल्कि किचन में बजने वाली बरतनों की आवाज थी. 32 साल की माया, जो कभी अपने कालेज में ‘बैस्ट डिबेटर’ हुआ करती थी, अब एक आदर्श बहू, पत्नी और मां के सांचे में पूरी तरह ढल चुकी थी.

शहर के एक मिडिल क्लास परिवार में माया की शादी विवेक से हुई थी. विवेक बुरा इनसान नहीं था, लेकिन वह उन मर्दों में से था, जिन्हें लगता है कि घर के कामों में हाथ बंटाना उन की ‘मर्दानगी’ के खिलाफ है और पत्नी का सपना सिर्फ एक अच्छी ‘हौबी’ तक सीमित होना चाहिए.

‘‘माया, मेरी नीली शर्ट कहां है?’’ विवेक ने बैडरूम से आवाज लगाई. ‘‘अलमारी के दाहिने कोने में टंगी है,’’ माया ने रोटी बेलते हुए जवाब दिया. ‘‘मिल नहीं रही, तुम ही आ कर देख लो.’’

माया ने गैस धीमी की और बैडरूम की तरफ भागी. यही उस की जिंदगी का सार था, अपनी गति छोड़ कर दूसरों की सुविधा के लिए दौड़ना. शर्ट विवेक के सामने ही थी, बस उस ने उठाने की जहमत नहीं की थी.

उस दिन दोपहर में, जब घर के सब लोग काम पर और बच्चे स्कूल जा चुके थे, माया ने पुराने स्टोररूम की सफाई करने की सोची. वहां धूल भरी किताबों के बीच उसे अपनी पुरानी पेंटिंग किट और एक अधूरी डायरी मिली.

डायरी का पहला पन्ना खुला, जिस पर लिखा था, ‘मैं उड़ना चाहती हूं, उस आसमान में, जहां मेरी अपनी पहचान हो.’

माया की आंखों में आंसू आ गए. वह पहचान कहीं खो गई थी.

चैप्टर 2 : पुरानी यादें,नई कसक

उस शाम माया की सहेली अदिति का फोन आया. अदिति अब एक कामयाब आर्किटैक्ट थी.

‘‘माया, अगले महीने हमारे कालेज का रीयूनियन है. तुझे आना ही होगा,’’ अदिति ने उत्साह से कहा. माया हिचकिचाई, ‘‘अदिति, घर पर कैसे… विवेक और मम्मीजी शायद नहीं मानेंगे.’’ ‘‘कब तक दूसरों की मरजी से जिएगी माया? तू क्या थी और क्या बन गई है, कभी आईने में खुद को देखा है?’’ अदिति के इन शब्दों ने माया के दिल पर चोट लगी.

उस रात डिनर टेबल पर माया ने दबी आवाज में विवेक से कहा, ‘‘विवेक, अगले महीने कालेज का रीयूनियन प्रोग्राम है. मैं दिल्ली जाना चाहती हूं, 2 दिन के लिए.’’ पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. विवेक की मां ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, ‘‘2 दिन? घरगृहस्थी वाली औरतों को बाहर जाना शोभा नहीं देता. और बच्चों का क्या?’’ विवेक ने बिना सिर उठाए कहा, ‘‘छोड़ो न माया, क्या करोगी वहां जा कर? घर पर सब ठीक तो है.’’

माया को उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि वह इस घर का हिस्सा तो है, लेकिन उस की अपनी कोई इच्छा, कोई वजूद नहीं है. वह बस एक मशीन है, जिसे रिमोट से चलाया जाता है.

चैप्टर 3 : विद्रोह की पहली किरण

अगले कुछ दिन माया बहुत शांत रही. वह अपना काम करती, लेकिन उस की आंखों में एक नई चमक थी. एक फैसला. उस ने स्टोररूम से अपनी पेंटिंग किट निकाली और उसे साफ किया. उस ने तय किया कि वह अपनी अधूरी पेंटिंग पूरी करेगी.

एक दोपहर, जब उस की सास सो रही थी, माया ने कैनवास पर रंग बिखेरना शुरू किया. उस ने एक पिंजरे का चित्र बनाया, जिस का दरवाजा खुला था, लेकिन पंछी अभी भी अंदर बैठा था, शायद बाहर की दुनिया के डर से.

अचानक आवाज आई, ‘‘यह क्या कूड़ा फैला रखा है?’’ सासू मां दरवाजे पर खड़ी थीं, ‘‘माया, यह सब करने की उम्र है तुम्हारी? जाओ, शाम की चाय की तैयारी करो.’’ माया ने इस बार नजरें नीची नहीं कीं. उस ने शांत स्वर में कहा, ‘‘मांजी, यह कूड़ा नहीं है. यह मेरा शौक है और चाय 10 मिनट बाद बन जाएगी, तब तक मैं यह रंग सुखाना चाहती हूं.’’

सासू मां अवाक रह गईं. माया के लहजे में बदतमीजी नहीं थी, पर एक ऐसी मजबूती थी जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी. उस रात माया ने डायरी में लिखा, ‘पिंजरा खुला है, बस पंखों को फड़फड़ाने की आदत डालनी है.’’

चैप्टर 4 : सपनों की उड़ान

दिल्ली जाने की तारीख नजदीक आ रही थी. घर में तनाव का माहौल साफ महसूस किया जा सकता था. विवेक ने माया से बात करना लगभग बंद कर दिया था और सासू मां हर बात पर ताना मार रही थीं. लेकिन इस बार माया के भीतर कुछ बदल गया था. उसे अब अपराधी जैसा महसूस नहीं हो रहा था.

रीयूनियन वाली सुबह, माया ने अपनी साड़ी पहनी, हलका मेकअप किया और अपना बैग उठाया. विवेक ड्राइंगरूम में बैठा अखबार पढ़ रहा था. ‘‘मैं निकल रही हूं,’’ माया ने शांति से कहा.

विवेक ने अखबार नीचे किया. उस की आंखों में गुस्सा और हैरानी थी, ‘‘तुम सच में जा रही हो? घर और बच्चों को इस हाल में छोड़ कर?’’ ‘‘बच्चे अब बड़े हो गए हैं विवेक, और मम्मी जी भी यहां हैं. मैं ने फ्रिज में 2 दिन का खाना बना कर रख दिया है. बस 2 दिन की ही तो बात है,’’ माया ने सूझ बूझ के साथ जवाब दिया.

जब माया टैक्सी में बैठी, तो उस के हाथ कांप रहे थे, लेकिन दिल में एक अजीब सी शांति थी. जैसे ही ट्रेन ने स्टेशन छोड़ा, उसे लगा कि उस के ऊपर से बरसों पुराना कोई बोझ उतर गया है. वह दिल्ली सिर्फ अपनी सहेलियों से मिलने नहीं, बल्कि अपनी खुद से ही मिलने जा रही थी.

चैप्टर 5 : दिल्ली की वह शाम

दिल्ली के एक आलीशान होटल में पुरानी सहेलियों का जमघट लगा था. कोई जज बन चुकी थी, कोई बड़ी कंपनी की मालकिन. जब माया वहां पहुंची, तो सब उसे देख कर खुशी से झूम उठीं.

बातोंबातों में अदिति ने माया की पेंटिंग वाली बात छेड़ दी, ‘‘तुम्हें पता है, माया कालेज में सब से अच्छी पेंटर थी. माया, तुम ने वह पिंजरे वाली पेंटिंग पूरी की?’’ माया ने झिझकते हुए अपने फोन में वह अधूरी पेंटिंग की फोटो दिखाई.

वहां मौजूद एक महिला, जो आर्ट गैलरी चलाती थीं, पेंटिंग देख कर दंग रह गईं और बोलीं, ‘‘माया, इस पेंटिंग में जो दर्द और जो उम्मीद है, वह कमाल की है. क्या तुम इसे मेरी एग्जीबिशन के लिए पूरा कर सकती हो?’’ माया की आंखों में चमक आ गई. सालों बाद किसी ने उसे उस के काम के लिए सराहा था.

उस रात, होटल के कमरे में बैठ कर माया ने महसूस किया कि वह सिर्फ एक ‘मशीन’ नहीं है. उस के पास एक हुनर है, जिसे दुनिया देखना चाहती है.

माया ने अदिति से कहा, ‘‘मैं वापस जा कर अपनी जिंदगी को फिर से पेंट करूंगी.’’

चैप्टर 6 : वापसी और टकराव

2 दिन बाद जब माया घर लौटी, तो घर का नजारा बदला हुआ था. सिंक में जूठे बरतन पड़े थे, ड्राइंगरूम में सामान बिखरा था और विवेक चिड़चिड़ाया हुआ था. ‘‘आ गईं तुम? देख लिया अपना रीयूनियन प्रोग्राम? यहां देखो क्या हाल हो रखा है,’’ विवेक चिल्लाया.

माया ने चुपचाप अपना बैग रखा और रसोई में जाने के बजाय सोफे पर बैठ गई और बोली, ‘‘विवेक, 2 दिन में अगर घर बिखर गया, तो सोचो मैं पिछले 10 सालों से इसे कैसे संभाल रही हूं और अब से चीजें ऐसी नहीं रहेंगी.’’ ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ सासू मां कमरे से बाहर आते हुए बोलीं.

‘‘मतलब यह कि अब मैं अपनी पेंटिंग को समय दूंगी. मुझे एक गैलरी से औफर मिला है. मैं घर के काम करूंगी, लेकिन अब मैं खुद को नहीं मारूंगी.’’ विवेक हंसने लगा, ‘‘पेंटिंग? उस से घर चलेगा? यह पागलपन छोड़ो और चाय बनाओ.’’

माया उठी, लेकिन रसोई की तरफ नहीं, बल्कि अपने स्टोररूम की तरफ गई. उस ने मुड़ कर कहा, ‘‘चाय खुद बना लीजिए विवेकजी, मुझे अपना कैनवास तैयार करना है.’’

विवेक और उस की मां अवाक रह गए. यह वह माया नहीं थी, जो हर बात पर ‘जी’ कहती थी. यह वह औरत थी, जिस ने अपने अस्तित्व को पहचान लिया था.

चैप्टर 7 : खामोश जंग

अगले कुछ हफ्ते घर में एक ‘कोल्ड वार’ जैसा माहौल रहा. विवेक ने माया से दूरी बना ली थी और सासू मां हर छोटे काम के लिए उसे ताना मारती रहतीं. लेकिन माया ने एक बात गांठ बांध ली थी कि वह अब सफाई नहीं देगी, बल्कि कर के दिखाएगी.

माया सुबह जल्दी उठ कर घर का सारा काम निबटाती, बच्चों को स्कूल भेजती और फिर दोपहर के 2 घंटे अपनी पेंटिंग के लिए सुरक्षित रखती. उन 2 घंटों में वह दुनिया को भूल जाती. उस ने उस ‘खुले पिंजरे’ वाली पेंटिंग को पूरा किया और उस का नाम रखा, ‘रिहाई’.

अदिति को फोन पर पेंटिंग का पूरा हो जाने का खबर दे दी गई और इस पेंटिंग को अदिति का ठिकानों में पोस्ट के जरीए भेज दिया.

एक दिन अदिति का फोन आया, ‘‘माया, तुम्हारी पेंटिंग मैं ने गैलरी के मालिक को दिखाई थी. उन्होंने अगले हफ्ते एक आर्ट फेयर में तुम्हारी पेंटिंग के लिए जगह बुक की है. तुम्हें जरूर आना होगा.’’

माया का दिल जोर से धड़का. यह सिर्फ एक पेंटिंग नहीं थी, यह उस की 10 सालों की खामोश चीख थी. उस ने धीरे से कहा, ‘‘मैं आऊंगी अदिति, चाहे कुछ भी हो जाए.’’

चैप्टर 8 : सफलता की पहली दस्तक

आर्ट फेयर का दिन आ गया. माया ने अपनी सब से सुंदर नीली साड़ी पहनी. जब वह हाल में पहुंची, तो अपनी पेंटिंग को एक खूबसूरत फ्रेम में दीवार पर टंगा देख उस की आंखों में आंसू आ गए.

लोग वहां आ रहे थे, पेंटिंग देख रहे थे और माया के बारे में चर्चा कर रहे थे. तभी एक बुजुर्ग आदमी, जो खुद एक मशहूर पेंटर थे, माया के पास आए और कहा, ‘‘बेटी, इस पेंटिंग में जो रंगों का तालमेल है, वह तो अच्छा है ही, लेकिन जो भाव है, वह दर्द और आजादी की कशमकश, वह दिल को छू लेती है. बहुत खूब… बहुत खूब…’’

शाम होतेहोते खबर मिली कि माया की पेंटिंग एक बड़े बिजनैसमैन ने ऊंचे दाम पर खरीद ली है. उसे एक चैक मिला, जिस पर लिखी रकम विवेक की 5 साल की सैलरी के बराबर थी. माया को उस कागज के टुकड़े से ज्यादा उस सम्मान की खुशी थी, जो उसे वहां मिल रहा था.

जब माया घर लौटी, तो विवेक सोफे पर बैठा इंतजार कर रहा था, ‘‘कहां थी इतनी देर? घर की कोई फिक्र है या नहीं?’’  माया ने शांति से वह चैक विवेक के सामने टेबल पर रख दिया. ‘‘यह क्या है?’’ विवेक ने हैरानी से पूछा. ‘‘यह मेरी मेहनत की कमाई है विवेक. उसी ‘कूड़े’ से मिली है, जिसे तुम ‘पागलपन’ कह रहे थे.’’

विवेक चैक देख कर सन्न रह गया. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि माया, जो कल तक एकएक रुपए के लिए उस से पूछती थी, आज खुद कमा रही है.

चैप्टर 9 : दीवारें ढहने लगीं

चैक की रकम ने घर का माहौल बदल दिया, लेकिन माया का मकसद पैसा नहीं था. सासू मां, जो अब तक बातबात पर टोकती थीं, अचानक शांत हो गई थीं. शायद पैसे की ताकत ने उन्हें चुप करा दिया था, लेकिन माया को बुरा लग रहा था कि उस का सम्मान उस की कला से ज्यादा उस चैक से जुड़ा था.

एक रात विवेक बिस्तर पर लेटा हुआ था. उस ने अचानक कहा, ‘‘माया, मुझे माफ कर दो. मुझे लगा था कि तुम बस बोरियत मिटाने के लिए यह सब कर रही हो. मुझे नहीं पता था कि तुम इतनी काबिल हो.’’

माया ने खिड़की के बाहर चांद को देखते हुए कहा, ‘‘विवेक, मुझे तुम्हारे माफी की जरूरत नहीं है, सिर्फ साथ की जरूरत थी. काबिल मैं हमेशा से थी, बस तुम ने कभी मुझे एक इनसान की तरह देखा ही नहीं. तुम ने मुझे सिर्फ एक ‘पत्नी’ और ‘बहू’ के सांचे में देखा.’’

विवेक खामोश रहा. उस रात उसे पहली बार एहसास हुआ कि उस ने अपनी पत्नी के सपनों का गला घोंट कर अपनी सुखसुविधाओं की दीवार खड़ी की थी.

अगले दिन विवेक खुद बाजार से माया के लिए नए ब्रशेस और रंगों का सैट ले कर आया. उस ने उन्हें टेबल पर रखते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी अगली एग्जीबिशन में हम सब साथ चलेंगे.’’

माया की आंखों में उम्मीद की एक नई किरण थी. उस ने समझ लिया था कि बदलाव रातोंरात नहीं आता, लेकिन अगर आप खुद को न बदलें, तो दुनिया कभी नहीं बदलेगी.

चैप्टर 10 : सपनों की कार्यशाला

विवेक के बरताव में आया बदलाव माया के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था. लेकिन माया जानती थी कि यह सिर्फ शुरुआत है. उस ने तय किया कि वह अब घर के उस अंधेरे स्टोररूम में नहीं, बल्कि एक ऐसी जगह पेंटिंग करेगी जहां रोशनी और उम्मीद दोनों हों.

माया ने घर के पास ही एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया और उसे अपना ‘स्टूडियो’ बनाया. उस का नाम रखा, ‘अस्तित्व आर्ट स्टूडियो’. शुरुआत में महल्ले के लोगों ने तरहतरह की बातें कीं, ‘‘देखो, 2 बच्चों की मां अब दुकान खोल कर बैठेगी.’’ ‘‘घर के काम कौन करेगा?’’

लेकिन माया ने इन बातों पर ध्यान देना छोड़ दिया था. अब उस के बच्चे स्कूल से आ कर सीधा उस के स्टूडियो पहुंचते और अपनी मां को रंगों से खेलते देख गर्व महसूस करते.

एक दिन माया ने अपनी सासू मां को स्टूडियो आने का न्योता दिया. सासू मां हिचकिचाते हुए आईं, लेकिन जब उन्होंने वहां माया का बनाया हुआ उन का खुद का एक पोट्रेट (चित्र) देखा, तो उन की आंखें भर आईं. उस पेंटिंग में माया ने उन की ?ार्रियों को कमजोरी नहीं, बल्कि अनुभव की सुंदरता के रूप में दिखाया था.

उस दिन पहली बार सासू मां ने माया का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘बहू, मैं ने तुझे कभी समझा ही नहीं.’’

चैप्टर 11 : समाज और सवाल

जैसेजैसे माया का नाम बढ़ने लगा, चुनौतियां भी बढ़ती गईं. शहर की एक बड़ी आर्ट काउंसिल ने उसे ‘वुमन औफ द ईयर’ के पुरस्कार के लिए चुना. यह खबर अखबारों में छपी, तो विवेक के कुछ रिश्तेदारों ने नाकभौं सिकोड़ना शुरू कर दिया.

एक पारिवारिक समारोह में विवेक के चाचाजी ने तंज कसा, ‘‘विवेक, अब तो तुम्हारी पत्नी सैलिब्रिटी बन गई है. सुना है, अब वह घर पर खाना भी नहीं बनाती?’’

विवेक गुस्से से लाल हो गया, लेकिन उस से पहले ही माया ने मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘चाचाजी, खाना तो मैं अभी भी बनाती हूं, बस अब उस खाने में और मेरी जिंदगी में स्वाद बढ़ गया है, क्योंकि अब मैं खुश हूं. और क्या खुशी बांटना गलत है?’’

उस दिन माया को समझ आया कि समाज को एक सफल औरत से उतनी दिक्कत नहीं होती, जितनी एक ‘आजाद’ और ‘आत्मविश्वासी’ औरत से होती है. उस ने तय किया कि वह अपनी कला के जरीए उन औरतों की आवाज बनेगी, जो अभी भी बंद दरवाजों के पीछे अपने सपनों को दम तोड़ते देख रही हैं.

चैप्टर 12 : अस्तित्व की गूंज

माया के स्टूडियो में अब सिर्फ पेंटिंग्स नहीं बनती थीं, बल्कि वहां आसपास की महिलाएं भी आने लगी थीं. कोई सिलाईकढ़ाई में माहिर थी, तो किसी को लिखने का शौक था. माया ने अपने स्टूडियो का एक हिस्सा उन महिलाओं के लिए खोल दिया.

एक दिन एक कम उम्र की लड़की, रश्मि, माया के पास आई. उस की आंखों में वही डर और बेबसी थी, जो सालों पहले माया की आंखों में हुआ करती थी. रश्मि ने कहा, ‘‘दीदी, मुझे पढ़ना है, लेकिन मेरी ससुराल वाले कहते हैं कि पढ़ाई सिर्फ लड़कियों की शादी तक के लिए होती है.’’

माया ने रश्मि का हाथ थामा और उसे अपनी वही ‘रिहाई’ वाली पेंटिंग दिखाई और कहा, ‘‘रश्मि, पिंजरा कभी बाहर से बंद नहीं होता, वह हमारे मन के अंदर बंद होता है. अगर तुम ठान लो, तो कोई तुम्हें नहीं रोक सकता.’’

माया ने रश्मि की पढ़ाई का जिम्मा उठाया और उसे अपने पास पार्टटाइम काम दिया. धीरेधीरे, माया का वह छोटा सा स्टूडियो एक आंदोलन बन गया. अब वह सिर्फ एक पेंटर नहीं थी, वह एक ‘उम्मीद’ बन चुकी थी.

विवेक अब गर्व से लोगों को बताता, ‘‘मैं माया का पति हूं,’’ उस के शब्दों में अब अधिकार नहीं, बल्कि सम्मान था.

चैप्टर 13 : क्षितिज के पार

समय का पहिया तेजी से घूम रहा था. माया की पेंटिंग्स अब सिर्फ स्थानीय गलियारों तक सीमित नहीं थीं. एक सुबह उसे एक ईमेल मिला, जिस ने उस की दुनिया बदल दी. लंदन की एक मशहूर आर्ट गैलरी ने उसे अपनी ‘इंटरनैशनल विमेन आर्टिस्ट्स’ प्रदर्शनी के लिए मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था.

यह माया के लिए एक सपना जैसा था. लेकिन इस बार वह डरी हुई नहीं थी. जब उस ने यह खबर विवेक और अपनी सासू मां को सुनाई, तो घर में उत्सव का माहौल हो गया.

‘‘तुम्हें जाना चाहिए माया, यह तुम्हारा हक है,’’ विवेक ने गर्मजोशी से कहा. ‘‘लेकिन विवेक, घर और बच्चे?’’ माया ने मुसकराते हुए पूछा, जैसे वह उस की पुरानी यादों को कुरेद रही हो.

विवेक ने माया का हाथ थामते हुए कहा, ‘‘घर हम संभाल लेंगे. तुम ने 10 साल हमें संभाला है, क्या हम 10 दिन तुम्हें अपनी उड़ान भरने के लिए नहीं दे सकते?’’

जब माया लंदन के उस विशाल हाल में खड़ी थी, जहां दुनियाभर के दिग्गज कलाकार मौजूद थे, उसे अपना वह छोटा सा किचन और वह धूल भरा स्टोररूम याद आया. उस ने महसूस किया कि ‘अस्तित्व’ की तलाश में सब से बड़ा कदम घर की दहलीज पार करना नहीं, बल्कि अपने मन के डर को पार करना था.

चैप्टर 14 : विरासत

लंदन से लौटने के बाद माया सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन चुकी थी. उस के स्टूडियो में अब सैकड़ों लड़कियां और महिलाएं अपनी कला और अपने सपनों के साथ आती थीं.

एक दिन माया ने देखा कि उस की 12 साल की बेटी, जो पहले सिर्फ पढ़ाई और मोबाइल में बिजी रहती थी, कोने में बैठ कर एक कैनवास पर कुछ उकेर रही थी.

माया चुपचाप उस के पीछे जा कर खड़ी हो गई. बेटी ने एक मजबूत पेड़ बनाया था, जिस की जड़ें जमीन में गहरी थीं, लेकिन उस की टहनियां आसमान को छू रही थीं.

‘‘यह क्या है बेटा?’’ माया ने पूछा. ‘‘मम्मी, यह आप हो. आप घर को भी संभालती हो और आसमान को भी छूती हो. मैं भी बड़ी हो कर आप के जैसा बनना चाहती हूं,’’ बेटी ने गर्व से कहा.

माया की आंखों में खुशी के आंसू आ गए. उसे सम?ा आया कि उस की सफलता सिर्फ पुरस्कारों और पैसों में नहीं थी, बल्कि उस आत्मविश्वास में थी जो उस ने अपनी अगली पीढ़ी को विरासत में दिया था. उस ने एक ऐसी राह बना दी थी, जिस पर उस की बेटी को कभी अपनी पहचान के लिए समझोता नहीं करना पड़ेगा.

चैप्टर 15 : नया सवेरा

कहानी वहीं पहुंच गई थी जहां से शुरू हुई थी. एक सुबह की पहली किरण. लेकिन आज किचन में बरतनों की आवाज के साथसाथ एक मधुर संगीत भी बज रहा था. विवेक आज खुद चाय बना रहा था और बच्चे अपना नाश्ता खुद तैयार कर रहे थे.

माया बालकनी में खड़ी उगते हुए सूरज को देख रही थी. उस के हाथ में वही पुरानी डायरी थी. उस ने डायरी का वह आखिरी पन्ना खोला, जो खाली था और उस पर लिखा, ‘अस्तित्व किसी और की दी हुई पहचान नहीं है, यह वह आग है जो हमारे भीतर जलती है. हम औरतें त्याग की मूरत नहीं, बल्कि असीम संभावनाओं का सागर हैं. पिंजरा अब नहीं है, क्योंकि मैं ने उड़ना सीख लिया है.’

आज माया के चेहरे पर वह उदासी नहीं थी, जो कांच की दीवारों के पीछे कैद औरतों के चेहरे पर होती है. आज उस के पास उस की अपनी दुनिया थी, अपना नाम था और अपना सम्मान था. वह अब सिर्फ ‘विवेक की पत्नी’ या ‘बच्चों की मां’ नहीं थी, वह ‘माया’ थी, एक पूर्ण, सशक्त और स्वतंत्र स्त्री.

सूरज की रोशनी माया के चेहरे पर पड़ रही थी और वह मुसकरा रही थी. एक नए सफर की शुरुआत के लिए.  Women’s Empowerment Story

लेखक : अशोक नंदन

Social Story : तीसरा

Social Story. गांव के लोग नए कलक्टर से गांव के बांध का उद्घाटन कराना चाहते थे, पर कलक्टर ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया. इस से गांव वाले हैरान थे. पर जब उन्हें नए कलक्टर के बारे में पता चला, तो उन की आंखें फटी की फटी रह गईं. क्या था कलक्टर की जिंदगी का राज?

कुरुक्षेत्र शहर से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर पिहोवा रोड पर गांव मुर्तजापुर गांव में बहुत बड़ा बांध बनाया गया. वहां बहती नदी पर खूबसूरत और चौड़ा पुल बनाया गया जिस से कि गांव के अंदर से आने और बाहर से निकलने वाले ट्रैफिक की वजह से ज्यादा परेशानी न हो.

अब बाहर से जाने वाला ट्रैफिक पुल से निकल जाएगा और गांव में गाडि़यों की भीड़ भी जमा नहीं होगी. साथ ही, बांध बनाने से किसानों को बारिश में फसल खराब होने का खतरा भी नहीं और सूखा पड़ने पर पानी का भी इंतजाम हो गया.

गांव वाले आज खुशी से फूले नहीं समा रहे. गांव की तो मानो काया ही पलट गई. सब आपस में बातें कर रहे थे कि नए कलक्टर ने तो गांव की सूरत ही बदल डाली. पंचायत ने गुजारिश की कि इस पुल और बांध का उद्घाटन भी कलक्टर के हाथों कराया जाए.

आखिर वह दिन भी आ गया. कलक्टर साहब आए और सीधे रैस्टहाउस में चले गए. सभी गांव वाले उन का धन्यवाद करना चाहते थे लेकिन कलक्टर साहब ने किसी से मिलना तो दूर अपनी शक्ल तक न दिखाई.

आखिर 2 दिन बाद उद्घाटन की पूरी तैयारी हो गई. कलक्टर साहब को न्योता भेजा गया कि उद्घाटन उन्हीं के शुभ हाथों से होगा. सरपंच खुद कलक्टर साहब से मिलने गए, तो बाहर ही उन का पीए मिल गया, ‘‘भाई, ये आप के सरजी का पूरा नाम क्या है, क्योंकि बाहर तो केवल एससी लिखा है? आप पूरा नाम बता दो ताकि इस निमंत्रण पर उन का पूरा नाम लिख दें.’’

‘‘सरपंचजी, पूरा नाम तो मैं भी नहीं जानता, मुझे भी केवल एससी ही पता है. आप एससी ही लिख दीजिए और यह निमंत्रण पत्र मुझे दे दीजिए, मैं उन्हें दे दूंगा. कलक्टर साहब आराम कर रहे हैं. इस समय उन से कोई नहीं मिल सकता.’’ ‘‘अगर कलक्टर साहब अभी आराम फरमा रहे हैं, तो हम बाद में आ जाएंगे. हम चाहते हैं कि हम गांव के कुछ लोग खुद उन्हें न्योता दें.’’ ‘‘देखिए सरपंचजी, कलक्टर साहब आज बहुत बिजी रहेंगे, इसलिए आज मिलना मुमकिन न होगा. आप फिक्र मत कीजिए, मैं आप लोगों का संदेश उन्हें दे दूंगा. वैसे भी कल आप सब ही मिल लीजिएगा उन्हें,’’ कहते हुए पीए ने टाल दिया.

अगले दिन उद्घाटन वाली जगह पर पूरा गांव खुशी से झूमता हुआ जमा था. कलक्टर साहब काली पैंट, सफेद दूधिया सी शर्ट पर डार्क रौयल ब्लू रंग का कोट पहने, सिर पर घुंघराले मैगी जैसे बाल, आंखों पर धूप का काला चश्मा, चेहरे पर मास्क लगाया हुआ, रोबीली चाल से चलते हुए आए और गांव के कुछ खास लोग उन्हें फूलमाला पहनाने लगे, लेकिन कलक्टर साहब ने हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया.

रिबन काट कर उद्घाटन किया गया. उस के बाद सरपंच ने कलक्टर साहब को फूलमाला पहनाने की कोशिश की, कलक्टर साहब ने हाथ रोक दिया और नत्थूलाल को स्टेज पर बुला कर कहा कि यह सम्मान उन्हें दिया जाए. ‘‘कलक्टर साहब, यह सम्मान आप के लिए है. आप ने नत्थूलाल भाई को क्यों बुलाया? मैं इस का कुछ मतलब नहीं समझा ?’’ सरपंच ने हैरानी से पूछा. नत्थूलाल चुपचाप खड़ा यह सब देख रहा था.

तब कलक्टर साहब ने अपने चेहरे से चश्मा तथा मास्क हटाया और पूरे गांव वालों के सामने जोर की आवाज में बोले, ‘‘गांव वालो, जरा गौर से देखो मुझे. क्या आप में से कोई जानता है मुझे? कोई पहचानता है मुझे? क्योंकि मैं इसी गांव की पैदाइश हूं. इस सम्मान पर मेरा हक नहीं (नत्थूलाल की तरफ इशारा कर के), बल्कि इन का हक है, इसलिए यह सम्मान इन्हें दिया जाए.’’

सभी हैरान हो कर यह सब सुन और देख रहे थे, लेकिन किसी की समझा में कुछ नहीं आ रहा था. हां, तभी बचनी दौड़ीदौड़ी स्टेज की तरफ आई और कलक्टर साहब को गले से लगा लिया. उस की आंखें आंसुओं का साथ ही नहीं छोड़ रही थीं. सरपंच हैरान से खड़े यह सब देख रहे थे. कुछ न सम?ा पाने पर वे बोले, ‘‘कलक्टर साहब….आप इस गांव की पैदाइश हैं… कौन? हैं आप और बचनी भाभी और नत्थूलाल को कैसे जानते हैं आप?’’

फिर नत्थूलाल और बचनी की तरफ मुखातिब होते हुए सरपंच बोले, ‘‘क्या आप पहचानते हैं कलक्टर साहब को?’’ लेकिन वे दोनों चुप रहे. कलक्टर साहब ने बोलना शुरू किया, ‘‘काकी, दाई अम्मां, रानी चाची, बिमला मौसी…’’ इस तरह कई नाम लिए. सब अपनाअपना नाम सुन कर हैरानी से देखने लगे कि कौन हैं ये.

‘‘क्या अभी भी आप लोगों ने नहीं पहचाना मुझे? दाई अम्मां, आप तो नहीं भूल सकती मुझे. याद करो वह दिन जब मेरा जन्म हुआ था.मुझे देखते ही मेरी नाल तक नहीं काटी थी आप ने. ‘मेरी मां खून से लथपथ पड़ी थीं और मैं नाल से मां के साथ बंधी वहीं गंदगी में पड़ी रो रही थी. मुझे साफ कर के गोद में लेना तो दूर रहा, बल्कि हाथों में से ऐसे पटका जैसे हाथों पर बिच्छू हो, जिस ने काट खाया हो.

‘‘हां… मैं वही हूं, वही तीसरा. आप तो जानते हो न तीसरा कौन? मैं वही तीसरा एससी मतलब सुशीला चौधरी. नत्थूलाल के बेटे मन्नु की औलाद, जिसे आप लोगों ने तीसरा कह कर कहीं फेंक आने के लिए मेरे दादादादी को कहा था, पर जब वे नहीं माने तो गांव वालों ने क्याक्या नहीं उन्हें कहा, कैसीकैसी धमकियां उन्हें दी गईं.

‘‘क्या कुछ नहीं मेरे मातापिता और दादादादी को सहन करना पड़ा मेरी वजह से, लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी. न केवलमुझे दूसरे भाईबहनों की तरह पाला बल्कि उन से ज्यादा प्यार दिया और मेरे भाईबहनों ने कभी मुझे अहसास नहीं होने दिया कि मैं उन के जैसी या जैसा नहीं, बल्कि तीसरा जैंडर हूं. उन्होंने हमेशा मुझे अपने जैसा ही समझा. हमेशा मुझे बड़ी बहन का ओहदा दिया.

‘‘आज मैं जोकुछ भी हूं, इस परिवार की वजह से हूं वरना न जाने मेरा भविष्य क्या होता. अब तक मन्नु और मुनिया और उन के चारों बच्चे भी स्टेज तक आ चुके थे. बचनी ने जोर दे कर कहा, ‘‘तू कोई तीसरावीसरा नहीं है, तू मेरी बच्ची है मेरी. मेरी सब से बड़ी और सब से लाड़ली पोती है तू.’’ आंखों में आंसू लिए बचनी ने नत्थूलाल से पूछा, ‘‘आप ने मुझे बताया क्यों नहीं?’’

‘‘लेकिन फिर भी तुम ने बिना बताए जान लिया… वह कैसे?’’ ‘‘मां का दिल है न. 2 दिन से बहुत बेचैनी हो रही थी. आप से कहा भी कि मेरी बात करा दो लेकिन आप टालते रहे और मैं अंदर ही अंदर परेशान होती रही.’’

‘‘मैं समझ रहा था तेरी परेशानी, मगर मैं तुम सब के चेहरों पर यह रौनक देखना चाहता था, इसलिए मैं ने किसी को कुछ नहीं बताया. मैं ने ही सुशीला से गांव की परेशानियों का जिक्र किया था.और सुशीला ने गांव की परेशानियों का हल निकाल कर खुद भी यहां हमारे साथ रहने के लिए अपनी पोस्टिंग कुछ समय के लिए यहां करा ली.’’

सब गांव वालों को अपनी वे बातें याद आने लगीं कि कैसे उन्होंने इस बच्ची को दुत्कारा था, किस तरह से उस के मातापिता और दादादादी को इसे गांव से निकालने के लिए कहा करते थे. दाई को भी याद आ गया वह दिन जब इस बच्ची का जन्म हुआ था.

दरअसल, यह बात है आज से 26-27 साल पहले की, जब कुरुक्षेत्र से तकरीबन 20 किलोमीटर पिहोवा रोड पर मुर्तजापुर गांव के एक किसान परिवार नत्थूलाल के बेटे मन्नु की शादी गांव के ही आसाराम की बेटी मुनिया से हुई. शादी के तकरीबन एक महीने बाद ही मुनिया के पांव भारी हो गए. घर में सब परिवार, जो कि लेदे कर मातापिता, मन्नु, मुनिया और मन्नु की छोटी बहन गुडि़या, बहुत ही खुश थे? घर में नया मेहमान जो आने वाला था.

मुनिया की खूब सेवा होती, खूब लाड़ लड़ाए जाते, खूब खयाल रखा जाता. सभी बेसब्री से आने वाले मेहमान का इंतजार कर रहे थे, लेकिन एक दिन जब मुनिया को दर्द शुरू हो गया तो मुनिया की सास बचनी देवी ने झट से मुनिया को गरम दूध में कैस्ट्रौल डाल कर पिलाया और उसे ऊपर छत पर 4-5 चक्कर काटने को कहा. 2-4 घंटे के भीतर ही दर्द बढ़ गया और मुनिया को एक छोटे से अलग कमरे में लिटा दिया गया और सास दौड़ कर दाई को बुला लाई.

शाम को अंधियारा छाने लगा था कि बच्चे के रोने की आवाज आई. कमरे के बाहर खड़े सब लोग खुशी से उछल पड़े. सब एकदूसरे को बधाई देते हुए गले लगाने लगे. अब उत्सुकता यह थी कि हुआ क्या है बेटा या बेटी? सब लोग टकटकी लगा कर दरवाजे की ओर देख रहे थे कि इतने में मुंह लटकाए हुए दाई बाहर आई.

नत्थूलाल ने पूछा, ‘‘अरे भाभी, लाओ… बच्चा सब से पहले मेरी गोद में देना.’’ बचनी बोली, ‘‘न जी न, पहला हक तो दादी का है,’’ कहते हुए जैसे ही वह दाई से बच्चा लेने को पलटी, लेकिन दाई के खाली हाथ देख कर एक पल के लिए सहम गई, ‘‘भाभी, बच्चा कहां है? बच्चा लाओ और अपना नेग लो.’’

दाई को खामोश देख कर नत्थूलाल भी बोला, ‘‘हांहां भाभी, आज तो मुंहमांगा नेग मिलेगा, लेकिन लाओ पहले हमारे कुलदीपक के दर्शन तो कराओ.’’ ‘‘काहे का कुलदीपक… मैं तो उसे अंदर ही पटक आई,’’ कहते हुए दाई ने मुंह बना लिया.

दाई की बात सुन कर नत्थूलाल को गुस्सा आ गया और वह बोला, ‘‘अंदर पटक आई का क्या मतलब हुआ भाभी, लड़का हो या लड़की हमारे लिए तो कुलदीपक ही है. आज के समय में लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं. जैसे लड़का कुल का दीपक है तो लड़की भी तो कुल की ज्योति है न, तो हुए न दोनों कुलदीपक.

‘‘हमारी बहू का पहला बच्चा, जो भी है हमारा खून है. लाओ, हमारी गुडि़या या हमारा गुड्डू जो भी है ला कर हमारी झोली में दे दो और हमारे कलेजे को ठंडक पहुंचाओ.’’ ‘‘काहे का लड़का और काहे की लड़की भाई, वह तो तीसरा है तीसरा. मैं तो चली. बचनी, तू ही संभाल अपनी बहू को और बच्चे को फेंक आ कहीं जा के,’’ कहते हुए दाई घर से बाहर जाने के लिए कदम उठाने लगी.

‘‘तीसरा… बच्चे को फेंक आई… भाभी, क्या कह रही हो तुम, हमें कुछ समझा नहीं आ रहा,’’ नत्थूलाल बोला. ‘‘अरे भाई, तीसरा नहीं समझाते हो? वही…..जिस को सब नीची नजर से देखते हैं.’’

बचनी दौड़ती हुई अंदर गई. देखा तो मुनिया खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी. बच्चा जारजार रोए जा रहा था, क्योंकि बच्चे के पैदा होते ही दाई उसे मुनिया की टांगों के बीच में लिटा कर सफाई किए बिना और बच्चे की नाल काटे बिना ही जाने की जो ठान ली थी.

बचनी ने अंदर का हाल देखा तो दौड़ी आई और दाई का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘भाभी, इस में बहू और बच्चे का क्या दोष? आप चल कर नाल काट कर बहू और बच्चे को संभालो. ऐसा न हो कोई अधर्म हो जाए हमारे हाथों से…’’ कहते हुए बचनी दाई के हाथपैर जोड़ने लगी.

अब तक नत्थूलाल भी समझ चुका था कि क्या हुआ है. उस ने झट से जेब से बिना देखे, बिना गिने मुठ्ठी भर कर रुपए निकाले और दाईं को देते हुए बोले, ‘‘भाभी, मेरी बहू और बच्चे को कुछ न होने देना.’’

नोटों से भरी मुठ्ठी देख दाई के मुंह में पानी आ गया. वह बोली, ‘‘भाई, बहू से तो मेरी को दुश्मनी न है, पर यह बच्चा कहीं भी जा के फेंक आ, नहीं तो यह गांव तुझे जीने नहीं देगा,’’ कहते हुए कमरे में जा कर बच्चे की नाल काट कर मुनिया के बदन की सफाई कर के ठीकठाक किया. लेकिन बच्चे को फिर हाथ तक न लगाया. उसे बचनी ने खुद से साफ कर के कपड़े में लपेटा.

जब दाई जाने लगी तो नत्थूलाल ने एक मुट्ठी नोटों की और थमा दी और बोला, ‘‘भाभी, किसी से कोई जिक्र न करना, आप को हमारी लाज का वास्ता. अभी हम सोचते हैं कुछ कि बच्चे का क्या करना है.’’

इतनी बात बचनी के कानों में पड़ी तो वह कमरे से बाहर आ गई. उस की गोद में बच्चा था. वह बोली, ‘‘क्यों जी, क्यों न जिक्र करें? जो भी कुदरत ने दिया इसे अस्वीकार कर दें क्या? यह भी इनसान ही है. हमारी बहू ने इनसान का बच्चा जना है, जानवर का नहीं, जो हम छिपाते फिरें,’’ कहते हुए उस ने बच्चे को सीने से लगा लिया.

नत्थूलाल भी सोचने पर मजबूर हो गया, ‘‘बचनी, कह तो तुम सही रही हो. इस में बहू और बच्चे का क्या कुसूर है,’’ और दाईं से बोला, ‘‘भाभी, मु?ो किसी की कोई चिंता नहीं. गांव वाले जब जो कहेंगे तब हम देख लेंगे.’’

अब तक मन्नु शांत खड़ा अचरज से यह सब देखसुन रहा था. मां ने उस की ?ाली में बच्चे को डालते हुए कहा, ‘‘मन्नु, इस तरह चुप क्यों है? देख अगर तू ही इसे नहीं स्वीकारेगा, तो दुनिया तो तेरे से पहले ही इसे दुत्कारेगी, इसलिए हम से पहले तु?ो इस सच को स्वीकारना होगा. ले… ले अपने बच्चे को गोद में ले कर प्यार कर.’’

मां की बात सुन कर मन्नु में भी जोश भर गया. उस ने बच्चे को गोद में ले कर प्यार किया और सीने से लगा लिया. पैसे के लालच में दाई ने अपना सारा काम तो कर दिया, मगर कहीं न कहीं उस के दिल में डर था कि इस बच्चे का ये क्या करेंगे? क्या इसे अपनाएंगे या कहीं किसी को दे आएंगे या यों ही फेंक देंगे?

खैर, दाई अपना कम निबटा कर, अपनी मेहनत से भी ज्यादा पैसे ले कर खुशी से अपने घर चली गई. अब उसे नत्थूलाल ने कहा था कि किसी से कुछ न कहे, मगर एक दिन दाई के मुंह से बात निकली और एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे के कान तक जा पहुंची.

पूरे गांव को खबर हो गई कि नत्थूलाल के बेटे मन्नु की बीवी मुनिया ने तीसरे को जन्म दिया. आसपड़ोस की औरतें पहुंच गई नत्थूलाल के घर इस बात को पुख्ता करने. उन में से एक काकी आते ही लगीं आवाज लगाने, ‘‘बचनी, अरी ओ बचनी.’’ ‘‘आओ काकी, आओ. बड़े दिनों बाद आई हो. आओ बैठो. मैं जरा बच्चे को उस की मां को पकड़ा कर आती हूं,’’ बचनी जानती थी कि इन सब को पता चल चुका है कि मुनिया का बच्चा हो गया है, तो फिर छिपाए क्यों?

‘‘न बचनी न, बैठने का समय कहां है री. पहले तो यह बता… मैं क्या सुन के आई हूं… तेरी कुलछनी बहू ने क्या जन दिया…’’ ‘‘काकी, बुरा मत मानो. मेरी सुलछनी बहू के बारे में कुछ मत कहो और रही बच्चे की बात तो जो कुदरत ने दिया वह सिरमाथे पर. अब भला इस में बहू या बच्चे का क्या दोष?’’

बचनी की बात सुन कर काकी और दूसरी औरतें चुप हो गईं, लेकिन जातेजाते काकी एक बात बचनी के कानों में डाल गईं, ‘‘देख बचनी, यह तो सही है कि जो दिया कुदरत ने दिया इस में बहू का क्या दोष, लेकिन कुदरत के किए को हम संभाल तो सकते हैं न, इस बच्चे को कहीं छोड़ आओ या इन्हीं की बिरादरी में दे दो वरना ऐसा न हो कल को गांव में तुम लोगों का हुक्कापानी ही बंद हो जाए.’’

काकी की इस तरह की सीधीसीधी धमकी से एक पल के लिए तो बचनी के प्राण कंठ में आ गए, लेकिन दूसरे ही पल हिम्मत कर के वह बोली, ‘‘काकी, कल किस ने देखा है, जो होगा देखा जाएगा.’’ इसके बाद जैसे ही नत्थूलाल और मन्नु अपने काम से घर आए तो बचनी ने सारी बात कह सुनाई.

नत्थूलाल बोला, ‘‘बचनी, तू चिंता मत कर. देखना इस बच्चे को मैं क्या से क्या बनाऊंगा. गांव वाले जो कहते हैं, करते हैं उन्हें उन का काम करने दो और हमें हमारा.’’

वह बच्चा उस परिवार में पलने लगा. उस का नाम सुशीला रखा गया. सुशीला के बाद उस के 2 भाई और 2 बहनें और हुईं. सब को पढ़ायालिखाया गया. पहले तो सुशीला को स्कूल में एडमिशन देने से मना किया गया, लेकिन नत्थूलाल और मन्नु ने भागदौड़ कर के सरकारी कागज बनवाए, जिस में साफसाफ परमिशन दी गई थी कि तीसरे जैंडर के बच्चे भी आम बच्चों के साथ पढ़ सकते हैं.

सुशीला भी अब आम बच्चों के साथ पढ़ रही थी. 10वीं के बाद जिस तरह से बाकी बच्चों को बड़े स्कूल और फिर कालेज भेजा गया, तब सुशीला को उन से अलग कर दिया गया. उसे कहां और क्यों भेजा गया, यह नत्थूलाल के सिवा कोई नहीं जानता था. आज वही बच्ची एक कलक्टर बन कर जिस गांव में जिल्लत सही, उसी गांव की भलाई के लिए दिनरात कोशिश कर रही है.

यह सब सुन कर गांव वाले जो शर्म से आंखें नीची किए खड़े थे, एकजुट हो गए. एक बुजुर्ग बोले, ‘‘सुशीला बेटी, हमें माफ कर दो. हम ने खुद को बड़ा बना कर कुदरत की रचना में भी नुक्स निकालना चाहा. अनजाने में हम से बहुत बड़ी गलती हो गई.

‘‘अब तुम थोड़े समय के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए यहीं रहोगी. इसी गांव में और हमें अपने किए का पछतावा करने का मौका दोगी.’’

हिजड़ा कहो या किन्नर या फिर तीसरा जैंडर, देखने में बिलकुल साधारण इनसान जैसे होते हैं. वे भी एक आम इनसान की तरह जीना चाहते हैं, मगर समाज उन्हें बारबार तीसरा जैंडर या अलग तरह के होने का एहसास दिलाता है, उन्हें अपने से अलगथलग रख कर भेदभाव करता है. पर कुदरत के दिए गए तोहफे से भेदभाव कैसा?

लेखक : प्रेम बजाज

Love Story : रंग इश्क का

Love Story. होली के दिन ज्यादातर स्टाफ छुट्टी पर था, जिस कारण सुहाना को ओवरटाइम ड्यूटी करनी पड़ रही थी. स्टेशन से गुजरती ट्रेन की बाहरी दीवारों पर रंग और कीचड़ के छींटे देख कर वह अनायास ही 3 साल पहले की होली में लौट गई, अपनी शादीशुदा जिंदगी की पहली होली में.

सुबह उठते ही जब सुहाना ने आईने में चेहरा देखा था, तो वह डर गई थी. चेहरा काले रंग से पूरी तरह पुता हुआ था. आईने के कोने में लिपस्टिक से लिखा था, ‘हैप्पी होली डियर.’ सुहाना समझ गई थी कि यह उस के पति प्रतीक की शरारत है, जो उस पर होली की रंग चढ़ा कर मौर्निंग शिफ्ट की ड्यूटी के लिए सैक्शन निकल चुका था.

बाथरूम में नहाने के लिए जैसे ही सुहाना ने शौवर खोला, लाल रंग की बौछार ने पूरे बदन को रंगीन कर  दिया. सुहाना को गुस्सा भी आया और प्यार भी.

शाम को प्रतीक बाजार से गुझिया ले कर लौटा था. अपने हाथों से ‘हैप्पी होली’ कहते हुए जब उस ने गुझिया  खिलाई, तो गुझिया के भीतर पीली गुलाल भरी थी. प्रतीक के इस प्रैंक में छिपे प्यार और शरारत भरे मजाक पर सुहाना ने उस की छाती पर हलके से हाथ मारते हुए नाराजगी जताई और फिर हंस पड़ी.

‘‘मैम, बेगूसराय की एक टिकट’’ एक मुसाफिर की आवाज ने सुहाना को वर्तमान में लौटा दिया. वह कुरसी पर बैठ कर यूटीएस से टिकट काटने लगी. वैसे भी होली के चलते मुसाफिरों की तादाद नाममात्र की थी. समस्तीपुर की रहने वाली सुहाना के मातापिता ने 3 साल पहले भारतीय रेलवे के दानापुर डिवीजन में इंजीनियरिंग सैक्शन के सुपरवाइजर पद पर नौकरी कर रहे प्रतीक से उस की शादी तय कर दी थी.

दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद मुखर्जी नगर में रह कर सिविल सेवा की तैयारी कर रही सुहाना की शादी में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. वह यूपीएससी क्रैक कर आईएएस बनना चाहती थी. उस ने विरोध भी किया, पर घर वालों के भावनात्मक दबाव में झुक गई.

शुरुआत में मन में खटास रही, पर शादी के बाद सुहाना की शादीशुदा जिंदगी धीरेधीरे आसान होती चली गई. उस का जीवन रंगोली सा सज गया था. चांदी सी सफेद सुहाना की सिंदूरी मांग, हरी चूडि़यों की खनक, आंखों में काजल, होंठों पर लाली, गुलाबी गालों पर पीली हया… कुलमिला कर कुदरत के सारे रंग उस की जिंदगी में उतर आए थे.

प्रतीक की माता बचपन में ही गुजर चुकी थीं और 2 साल पहले पिता की मौत के बाद प्रतीक का सुहाना के अलावा कोई अपना नहीं था. वह जितना अपनी विभागीय जिम्मेदारियों के प्रति सजग था, उतनी ही निष्ठा से शादीशुदा जिंदगी भी निभाता था. हर 6 महीने में रेलवे पास पर वह सुहाना के साथ पर्यटक स्थलों पर घूमने निकल जाता.

त्योहारों पर उस का प्यार खुल कर सामने आता, दीवाली में अनार जलाना, करवाचौथ पर लोटे से जल पिलाना, दशहरे में कन्या भोज… सबकुछ साथसाथ. सभी मौकों पर प्रतीक का सुहाना के प्रति प्यार रेलवे कालोनी वालों को भी दिख जाता था.

धीरेधीरे सुहाना भी गृहस्थी में रम गई. 2 साल बाद बेटी सुप्रिया ने उस की जिंदगी को जैसे पूरा कर दिया. सबकुछ ठीक चल रहा था कि पिछले साल दिसंबर महीने की दूसरी तारीख को घटित एक घटना ने सुहाना की जिंदगी में उथलपुथल मचा दी.

2 दिसंबर की घने कोहरे वाली सुबह सुहाना की जिंदगी में धुंध बन कर छा गई. रेलवे ट्रैक के रखरखाव के दौरान प्रतीक की ट्रौली सामने से आ रही ट्रेन से टकरा गई. ट्रौली पर सवार ट्रैकमैन को तो मामूली चोटें आईं, लेकिन रेलवे ट्रैक के पास रखी कंक्रीट स्लीपर से सिर टकराने के चलते प्रतीक की मौके पर ही मौत हो गई.

यह खबर सुनते ही सुहाना टूट गई. एक पल में उस की दुनिया उजड़ गई. कुछ समय बाद अनुकंपा के आधार पर उस की नियुक्ति दानापुर स्टेशन पर टिकट बुकिंग क्लर्क के रूप में हो गई. वह बिजी रहना चाहती थी, पर प्रतीक की कमी हर पल सालती रहती थी. ड्यूटी के दौरान सुप्रिया और रेलवे कर्मियों के साथ किसी तरह समय गुजर जाता, किंतु रात का अकेलापन और प्रतीक की यादें उसे काटने को दौड़तीं. उस की जिंदगी की रंगोली पर विधवा होने की सफेदी पूरी तरह जम गई थी.

टिकट देने के बाद सुहाना अपनी बेटी सुप्रिया के साथ प्लेटफार्म के शैड के नीचे बैठ कर फर्श को निहारती हुई यादों में खो गई. थोड़ी देर में प्लेटफार्म नंबर 2 पर इंटरसिटी एक्सप्रैस ट्रेन आ कर रुकी. कुछ मुसाफिर उतरे और कुछ चढ़े. ‘‘मैम, बिहटा वाली ट्रेन कितने बजे आएगी?’’ सैनिक की वरदी में ट्रेन से उतरे एक जवान की आवाज ने सुहाना का ध्यान भंग किया.

‘‘तकरीबन 2 बजे, एक घंटा देर से चल रही है,’’ अनमना सा जवाब देते हुए जैसे ही सुहाना ने नजर उठाई, वह चौंक गई, ‘‘अरे, वैभव… तुम?’’  ‘‘सु… सुहाना…’’ दिल्ली कालेज के दिन जैसे दानापुर स्टेशन पर लौट आए. वैभव सुहाना का पुराना दोस्त था.

वाराणसी के वैभव और समस्तीपुर की सुहाना की पहचान दिल्ली कालेज में हुई थी. दोनों बैचमेट थे और समय के साथ अच्छे दोस्त बन गए थे. दोनों एकदूसरे को पसंद भी करते थे, पर कभी किसी ने इजहार नहीं किया.

ग्रेजुएशन के बाद वैभव का चयन इंडियन एयरफोर्स में हो गया और वह ट्रेनिंग में चला गया, जबकि सुहाना यूपीएससी की तैयारी में लग गई. इसी बीच संपर्क टूट गया और उस की शादी भी हो गई. ‘‘अरे यार, तुम दानापुर में कैसे?’’ सुहाना ने वैभव के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा. ‘‘दरअसल, मेरी पोस्टिंग अगले 3 साल के लिए बिहटा एयरफोर्स स्टेशन पर हो गई है. वहीं योगदान देने जा रहा हूं. सहयात्री ने बताया कि दानापुर से बिहटा के लिए पैसेंजर ट्रेन मिल जाती है, इसलिए यहां उतर गया. और बताओ… यूपीएससी छोड़ कर यह रेलवे की नौकरी कब कर ली?’’ वैभव ने हैरानी से भरी खुशी से पूछा.

सुहाना ने मुखर्जी नगर से दानापुर तक की पूरी दास्तान वैभव को सुनाई. उस की कहानी सुन कर वैभव की आंखें नम हो गईं. वैभव ने सुहाना के पास बैठी सुप्रिया के सिर पर हाथ फेर कर हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘सुहाना, अगर बुरा न मानो, तो कुछ कहना चाहता हूं… मैं 5 साल से एक बात दिल में दबाए बैठा हूं. कालेज के दिनों में कई बार कहने की कोशिश की, लेकिन कह नहीं पाया आई लव यू.’’

वैभव की बात सुन कर सुहाना खामोश रह गई. कालेज के दिनों में वह भी वैभव को पसंद करती थी, लेकिन प्रतीक से जुड़ने के बाद उन भावनाओं को उस ने कभी याद नहीं किया. ‘‘सुहाना, मेरा यकीन करो. मैं तुम्हें और सुप्रिया को हमेशा खुश रखूंगा. सच कहूं तो तुम्हारे लिए ही मैं ने अब तक शादी नहीं की. सोचा था ट्रेनिंग से लौट कर तुम्हें प्रपोज करूंगा, लेकिन लौटने पर तुम से संपर्क नहीं हो पाया. बहुत ढूंढ़ा, सोशल मीडिया पर भी सर्च किया, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली. बस इतना पता था कि तुम समस्तीपुर से हो.

‘‘बिहार में रह कर तुम्हें तलाश सकूं, इसलिए बिहटा पोस्टिंग की रिक्वैस्ट डाली. और देखो, तुम मिल भी गईं मुझ से शादी करोगी? ‘‘बोलतेबोलते वैभव का गला रुंध गया. ‘‘सुहाना, इस की बात मान लो,’’ यह आवाज स्टेशन मास्टर की थी, जो अनजाने में उन की बातें सुन चुके थे. उन की आवाज सुन कर सुहाना और वैभव दोनों चौंक गए.

‘‘सुहाना, प्रतीक मुझे सर या बड़ा बाबू के बजाय हमेशा ‘अंकल’ पुकारता था. वह हमेशा तुम्हें हंसते हुए देखना चाहता था. लेकिन उस के जाने के बाद तुम मुसकराना ही भूल गई. महीनों बाद आज तुम फिर मुसकरा रही हो. ‘‘इस लड़के में मुझे प्रतीक सा अपनापन और सच्चाई दिखती है. एक अभिभावक के रूप में मेरी यही सलाह है कि इसे स्वीकार कर लो और अपनी बदरंग जिंदगी में फिर से रंग भर लो.’’

स्टेशन मास्टर इस बात से सुहाना की आंखों में आंसू थे और होंठों पर मुसकान. उस ने आंसू पोंछते हुए वैभव को गले लगा लिया.  Love Story

लेखक : विनोद कुमार विक्की

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