Family Story. वैसे तो मुंबई की जिंदगी में एक पूरे दिन की थकान का मतलब होता है पूरी तरह से निचुड़ जाना, पर उस दिन की शाम कुछ अलग सी थी मानो वह पूरी आबादी की थकान को अपने भीतर छिपाए बैठी हो. ट्रैफिक की आवाज दूर तक सुनाई पड़ रही थी, मगर आयान की बालकनी में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी, जबकि उस का घर बिलकुल मेन रोड से लगा हुआ था.
आयान को लग रहा था कि किसी ने उसे पूरी तरह निचोड़ लिया है. उस के हाथ में कौफी का मग जरूर था, पर उसे ऐसा लग रहा था, जैसे वह केवल शाम में कौफी लेने की आदत निभा रहा हो. फोन की स्क्रीन पर उस ने दोबारा वही मैसेज पढ़ा, जो उस ने टाइप कर के डिलीट कर दिया था कि ‘यार पापा, प्रैक्टिकल बनो’.
आयान मुसकराया भी और उदास भी हुआ. यह वह वाक्य था जो वह अब तक नहीं बोल पाया था, पर मन में इतने दिनों से यही भरा था. तभी मोबाइल फोन बजा. स्क्रीन पर लिखा था ‘पापा कालिंग’. आयान ने फोन उठाया और बोला, ‘‘हैलो, पापा.’’ दूसरी तरफ वही परिचित सी आवाज आई, ‘‘बेटा, औफिस से आ गए? कुछ खाया कि नहीं?’’ आयान ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘हां पापा. बस, अभीअभी आया हूं.’’
‘‘अच्छा. तुम ठीक तो हो न? तुम्हारी आवाज थोड़ी ढीली लग रही है आज...’’ ‘‘नहीं पापा, सब ठीक है. बस, थोड़ा थका हुआ हूं.’’ ‘‘अरे, थकान से क्या घबराना? मेहनत करोगे तो थकान होगी ही. देखना, एक दिन बहुत बड़े आदमी बनोगे तुम.’’
आयान की आंखों में चुभन सी उठी. वही उम्मीदें. वही बातें पर जिन्हें वह अब सच नहीं मान पाता था. वह चुप हो गया. पापा बोले, ‘‘अरे, कुछ बोलोगे भी? क्या हुआ?’’ ‘‘कुछ नहीं पापा. बस, अच्छा नहीं लग रहा,’’ आयान बोला. ‘‘अरे बेटा, परेशान मत हुआ करो. सब ठीक होगा.’’
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