Hindi Family Story: हीरे की अंगूठी – राहुल शहर से दूर क्यों जा रहा था

Hindi Family Story: नैना थी ही इतनी खूबसूरत. चंपई रंग, बड़ीबड़ी आंखें, पतली नाक, छोटेछोटे होंठ. वह हंसती तो लगता जैसे चांदी की छोटीछोटी घंटियां रुनझुन करती बज उठी हों. उस के अंगअंग से उजाले से फूटते थे.

राहुल और नैना दोनों शहर के बीच बहते नाले के किनारे बसी एक झुग्गी बस्ती में रहते थे. नीचे गंदा नाला बहता, ऊपर घने पड़ों की ओट में बने झोंपड़ीनुमा कच्चेपक्के घरों में जिंदगी पलती. बड़े शहर की चकाचौंध में पैबंद सी दिखती इस बस्ती में राहुल अपने मातापिता और छोटी बहन के साथ रहता था और यहीं रहती थी नैना भी.

राहुल के पिता रिकशा चलाते, मां घरघर जूठन धोती. नैना की मां भी यही काम करती और उस के बाबा पकौड़ी की फेरी लगाते.

नैना बड़े चाव से पकौड़ी बनाती, खट्टीमीठी चटनी तैयार करती, दही जमाती, प्याज, अदरक, धनिया महीनमहीन कतरती और सबकुछ पीतल की चमकती बड़ी सी परात में सजा कर बाबा को देती.

बाबा परात सिर पर उठाए गलीगली चक्कर काटते. दही, चटनी, प्याज डाल कर दी गई पकौड़ी हाथोंहाथ बिक जातीं.

नैना के बाबा को अच्छे रुपए मिल जाते, पर हाथ आए रुपए कभी पूरे घर तक न पहुंचते. ज्यादातर रुपए दारू में खर्च हो जाते. फिर नैना के बाबा कभी नाली में लोटते मिलते तो कभी कहीं गिरे पड़े मिलते.

ऐसे गलीज माहौल में पलीबढ़ी नैना की खूबसूरती पर हालात की कहीं कोई छाया तक नहीं झलकती थी. राहुल सबकुछ भूल कर नैना को एकटक देखता रह जाता था.

नैना के दीवानों की कमी न थी. कितने लोग उस के आगेपीछे मंडराया करते, पर उन में राहुल जैसा कोई दूसरा था ही नहीं.

राहुल भी कम सुंदर न था. भला स्वभाव तो था ही उस का. गरीबी में पलबढ़ कर, कमियों की खाद पा कर भी उस की देह लंबी, ताकतवर थी. एक से एक सुंदर लड़कियां उस के इर्दगिर्द चक्कर काटतीं, पर कोई किसी भी तरह उसे रिझा न पाती, क्योंकि उस के मन में तो नैना बसी थी.

नैना के मन में बसी थी हीरे की अंगूठी. उसे बचपन से हीरे की अंगूठी पहनने का चाव था. सोतेजागते उस के आगे हीरे की अंगूठी नाचा करती. अपनी इसी इच्छा के चलते एक दिन नैना ने सारे बंधन झुठला दिए. प्रीति की रीति भुला दी.

बस्ती के एक छोर पर पत्थर की टूटी बैंच पर नैना बैठी थी. काले रंग की छींट की फ्रौक पहने, जिस पर सफेद गुलाबी रंग के गुलाब बने थे. फ्रौक की कहीं सिलाई खुली, कहीं रंग उड़ा, पर वह पैर पर पैर चढ़ाए किसी राजकुमारी की सी शान से बालों में जंगली पीला फूल लगाए बैठी थी. सब उसी को देख रहे थे.

इतराते हुए बड़ी अदा से नैना बोली, ‘‘जो मेरे लिए हीरे की अंगूठी लाएगा, मैं उसी से शादी करूंगी.’’

नैना की ऐसी विचित्र शर्त सुन कर सब की उम्मीदों पर जैसे पानी फिर गया. राहुल को तो अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ.

धन्नो काकी यह तमाशा देख कर ठहरीं और हाथ नचाते हुए बोलीं, ‘‘घर में खाने को भूंजी भांग नहीं, उतरन के कपड़े, मांगे का सम्मान, मां घरघर जूठे बरतन धोए, बाप फेरी लगाए और दारू पीए और ये पहनेंगी हीरे की अंगूठी,’’ ऐसा कह कर वे आगे बढ़ गईं.

रंग में भंग हुआ. शायद नैना का प्रण टूट ही जाता, पर तभी राहुल के मुंह से निकला, ‘‘मैं पहनाऊंगा तुम्हें हीरे की अंगूठी,’’ और सब हैरानी से उसे देखते रह गए.

राहुल, जिस के घर में खाने के भी लाले थे, बीमार पिता की दवा के लिए पूरे पैसे नहीं थे, छत गिर रही थी, एक छोटी बहन ब्याहने को बैठी थी, उस राहुल ने नैना को हीरे की अंगूठी देने का वचन दे दिया. वह भी उसे जो उस का इंतजार करेगी भी या नहीं, यह वह नहीं जानता.

सचमुच राहुल के लिए हीरे की अंगूठी खरीदना और आकाश के तारे तोड़ना एक समान था. अभी तो वह पढ़ रहा है. बड़ा होनहार लड़का है वह. टीचर उसे बहुत प्यार करते हैं. उस की मदद के लिए तैयार रहते हैं.

राहुल पढ़लिख कर कुछ बनना चाहता है. राहुल की मां भी चाहती है कि वह पढ़लिख कर अपनी जिंदगी संवारे, इसीलिए वह हाड़तोड़ मेहनत कर राहुल को पढ़ा रही है.

राहुल की मां 35-36 साल की उम्र में ही 60 साल की दिखने लगी है. उसे लगता है कि उस का बेटा जग से निराला है. एक दिन वह पढ़लिख कर बड़ा आदमी बनेगा और उस की सारी गरीबी दूर हो जाएगी, इसीलिए जब उसे पता चला कि राहुल ने नैना को हीरे की अंगूठी पहनाने का वचन दिया है तो उस के मन को गहरी ठेस लगी. थकी आंखों की चमक फीकी हो कर बुझ सी गई.

राहुल में ही तो उस की मां के प्राण बसते थे. अब तक मन में एक इसी आस के भरोसे कितनी तकलीफ सहती आई है कि राहुल बड़ा होगा तो उस के सारे कष्ट दूर देगा. वह भी जीएगी, हंसेगी, सिर उठा कर चलेगी. आज उस का यह सपना पानी के बुलबुले सा फूट गया.

अब क्या करे? राहुल तो अब ऐसी तलवार की धार पर, कांटों भरी राह पर चल पड़ा है जिस के आगे अंधेरे ही अंधेरे हैं.

मां ने राहुल को समझाने की भरसक कोशिश की और कहा, ‘‘अभी तू इन सब बातों में मत पड़ बेटा. बहुत छोटा है तू. पहले पढ़लिख कर कुछ बन जा, फिर यह सब करना.’’

‘‘मुझे रुपए चाहिए मां.’’

‘‘रुपए पेड़ों पर नहीं फलते. हम लोग तो पहले से ही सिर से पैर तक कर्ज में डूबे हैं.’’

‘‘मां, तुम नहीं समझोगी इन सब बातों को.’’

‘‘मुझे समझना भी नहीं है. मेरे पास बहुतेरे काम हैं. तू अभी…’’ मां की बात पूरी होने से पहले ही राहुल बिफर उठता. अब वह अपनी मां से, अपनों से दूर होता जा रहा था. नैना और हीरे की अंगूठी अब राहुल और उस के अपनों के बीच एक ऐसी दीवार के रूप में खड़ी हो गई थी जो हर पल ऊंची होती जा रही थी. उसे तो एक ही धुन सवार थी कि जल्दी से जल्दी ढेर सारा पैसा कमाना है ताकि हीरे की अंगूठी खरीद सके.

राहुल जबतब किसी सुनार की दुकान के बाहर खड़ा हो कर अंदर देखा करता था. एक दिन उसे अंदर झांकते देख दरबान ने डांट कर भगा दिया. नैना को पाने की ख्वाहिश में वह अपनी हैसियत वगैरह सब भूल गया था.

राहुल को यह भी नहीं समझ आया कि वह नैना को प्यार करता है और नैना हीरे की अंगूठी को प्यार करती है. उस ने तो बस अपनी कामना का उत्सव मनाना चाहा, समर्पण के बजाय अपनी इच्छा को पूरा करने का जरीया बनाना चाहा.

राहुल अपनी पढ़ाई छोड़ इस शहर से बहुत दूर जा रहा था. जाने से पहले नैना से विदा लेने आया वह. भुट्टा खाती, एक छोटी सी मोटी दीवार पर बैठी पैर हिलाती नैना को वह अपलक देखता रहा.

नैना से विदा लेते हुए राहुल की आंखें मानो कह रही थीं, ‘काश, तुम जान सकती, पढ़ सकतीं मेरा मन और देख सकतीं मेरे दिल के भीतर जिस में बस तुम ही तुम हो और तुम्हारे सिवा कोई नहीं और न होगा कभी.

‘मैं ने वादा किया है तुम से, मैं लौट कर आऊंगा और सारे वचन निभाऊंगा. लाऊंगा अपने साथ अंगूठी जो होगी हीरे से जड़ी होगी, जैसी तुम्हारी उजली हंसी है. तुम मेरा इंतजार करना नैना. कहीं और दिल न लगा लेना. मैं जल्दी आ जाऊंगा. तुम मेरा इंतजार करना.’

राहुल अपने परिवार को छोड़ सब के सपने ताक पर रख हीरे की अंगूठी खरीदने के जुगाड़ में चल पड़ा. मां पुकारती रह गई. घर की जिम्मेदारियां गुहार लगाती रहीं. सुनहरा भविष्य पलकें बिछाए बैठा रह गया और राहुल सब को छोड़ कर दूसरी ओर मुड़ गया.

शहर आ कर राहुल ने 18-18 घंटे काम किया. ईंटगारा ढोना, अखबार बांटना, पुताई करना से ले कर न जाने कैसेकैसे काम किए. वहीं उसे प्रकाश मिला था, जो उसे गन्ना कटाई के लिए गांव ले गया. हाथों में छाले पड़ गए. गोरा रंग जल कर काला पड़ गया, पर रुपए हाथ में आते गए. हिम्मत बढ़ती गई.

अंधेरी स्याह रातों में कहीं कोने में गुड़ीमुड़ी सा पड़ा राहुल सोते समय भी सुबह का इंतजार करता रहता. मीलों दूर रहती नैना को देखने के लिए वह छटपटाता रहता.

समय का पहिया घूमता रहा. दिन, हफ्ते, महीने बीतते गए. हीरे की अंगूठी की शर्त लोग भूल गए, पर राहुल नहीं भूला. बड़ी मुश्किल से, कड़ी मेहनत से आखिरकार उस ने पैसे जोड़ कर अंगूठी खरीद ही ली.

इस बीच कितनी बार ये पैसे निकालने की नौबत आई, मां बीमार पड़ी, बहन की शादी तय होतेहोते पैसे की कमी के चलते रुक गई, वह खुद भी बीमार पड़ा, घर के कोने की छत टपकने लगी, पर उस ने इन पैसों पर आंच न आने दी और आज बिना एक पल गंवाए वह हीरे की अंगूठी ले कर जब नैना के घर की ओर चला तो पैर जैसे जमीन पर नहीं पड़ रहे थे.

राहुल शहर से लौट कर सब से पहले अपनी मां के गले कुछ ऐसे लिपटा मानो कह रहा हो, ‘मां, तेरा राहुल जीत गया. अब नैना को तुम्हारी बहू बनाने से कोई नहीं रोक सकता, क्योंकि तेरा राहुल नैना की शर्त पूरी कर के ही लौटा है.’

मां ने उस का ध्यान तोड़ते हुए कहा, ‘‘तुम ठीक हो न बेटा? कहां चले गए थे तुम इतने दिनों तक? क्या तुम्हें अपनी बीमार मातापिता और बहन की याद भी नहीं आई?’’ कहते हुए वह सिसकने लगी.

‘‘मां, अब रोनाधोना बंद करो. अब मैं आ गया हूं न. अपनी नैना को तेरी बहू बना कर लाने का समय आ गया. अब तुम्हें कोई काम नहीं करना पड़ेगा.’’

‘‘हां बेटा, अब काम ही क्या है… तेरे मातापिता अब बूढ़े हो चले हैं. जवान बहन घर में बैठी है. तुम जिस नैना के लिए हीरे की अंगूठी लाए हो न, उसे पहले ही कोई और हीरे की अंगूठी पहना कर ले जा चुका है.’’

‘‘झूठ न बोलो मां. हां, मेरी नैना को कोई नहीं ले जा सकता.’’

‘‘ले जा चुका है बेटा. तेरी नैना को हीरे की अंगूठी से प्यार था, तुझ से नहीं, जो उसे कोई और पहना कर ले गया. तुझे रूपवती लड़की चाहिए थी, गुणवती नहीं और उसे हीरे की अंगूठी चाहिए थी, हीरे जैसा लड़का नहीं.

‘‘उसे हीरे की अंगूठी तो मिल गई, पर हीरे की अंगूठी देने वाला पक्का शराबी है. तुम हो कि ऐसी लड़की के लिए घर, मातापिता और बहन सब छोड़ कर चल दिए.’’

‘‘बस मां, बस करो अब,’’ राहुल रोते हुए कमरे से बाहर निकल गया.

राहुल को लगा कि वह भीड़ भरी राह पर सरपट दौड़ा चला जा रहा है. गाडि़यां सर्र से दाएंबाएं, आगेपीछे से गुजर रही हैं. उसे न कुछ दिखाई दे रहा है, न सुनाई दे रहा है. एकाएक किसी का धक्का लगने से वह गिरा. आधा फुटपाथ पर और आधा सड़क पर. हां, प्यार के पागलपन में कितनाकुछ गंवा दिया, यह समझ आते ही पछतावे से भरा राहुल उठ खड़ा हुआ.

सपना टूटते ही राहुल अपनेआप को सहजता की राह पर चला जा रहा था, अपनी बहन के लिए हीरे जैसे लड़के की तलाश में. Hindi Family Story

Hindi Story: नल पुराण

देवकी के घर के आंगन और पिछवाड़े में बड़ीबड़ी घास और झाडि़यां उग आई थीं. मकान का प्लास्टर भी जगहजगह से उखड़ चुका था. देखने से लगता था जैसे कई महीनों से इस की किसी ने सुध नहीं ली है, पर आज अचानक उस के आंगन में रौनक सी लगी थी. कुछ लोग झाडि़यां साफ कर रहे थे, तो कुछ दीवारों के उखड़े प्लास्टर की मरम्मत में लगे थे. शाम तक रंगवार्निश लगा कर घर को चकाचक कर दिया गया. एक गरीब विधवा के घर की ऐसी कायापलटआखिर ऐसा क्या हो गया था?
‘‘जरा, जल्दीजल्दी हाथ चलाओ भाईऔर कितना टाइम लगाओगे स्टेज बनाने में?’’
‘‘अरे, यह शामियाना कैसे बांध रहे होजरा ढंग से बांधो…’’
‘‘कुरसियों का क्या हुआ? अभी तक नहीं आईं? और वह रैड कार्पेट?’’
‘‘कल सवेरे 8 बजे तक सारा काम पूरा हो जाना चाहिए, बेशक रातभर काम करना पड़े तो करो.’’

जल निगम का जूनियर इंजीनियर मजदूरों को डांटते हुए काम बता रहा था. यही मौका था उस के लिए अपनी अफसरी दिखाने का खासकर जब उस के बड़े अफसर भी साथ खड़े हों. दूसरे दिन ठीक सवेरे 8 बजे जल निगम के बड़े अफसर देवकी के घर पहुंच गए.
‘‘सर, रैड कार्पेट बिछवा दूं क्या? चीफ इंजीनियर साहब, कमिश्नर, डीएम और बाकी औफिसर्स की गाडि़यां नीचे रोड पर गई हैं,’’ जूनियर इंजीनियर ने धीरे से असिस्टैंट इंजीनियर से पूछा.
‘‘हां, बिछवा दो. और हां, नल की टोंटी बदली या नहीं? उस में बढि़या पीतल की टोंटी लगवा दो. ध्यान रहे
कि नल के स्टैंड पोस्ट का प्लास्टर उखड़े नहीं, अभी ताजा है.’’
‘‘पर साहब, बाकी जगह तो हम ने लोहे की टोंटी लगाई थी और स्टैंड पोस्ट भी नहीं बनाया था, बस यों ही लकड़ी का डंडा खड़ा कर के नल उस से बांध दिया था,’’ जूनियर इंजीनियर के बजाय काम पर लगे प्लंबर ने झिझकते हुए बताया.

‘‘चुप बे, तुझ से किस ने पूछा है? जितना कहा जाए, उतना कर, फालतू बोलने की जरूरत नहीं है,’’ असिस्टैंट इंजीनियर ने डांटते हुए कहा.
फिर एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने जूनियर इंजीनियर को इशारे से बुलाया और पूछा, ‘‘जेई साहब, जरा चैक तो करो, नल में पानी भी रहा है कि नहीं?’’
जूनियर इंजीनियर ने नल की टोंटी घुमा कर देखा तो उस की जान हलक में गई, हाथपैर फूल गए. डरते हुए, घबराई आवाज में वह बोला, ‘‘सर, गजब हो गयापानी तो नहीं रहा अबक्या होगा?’’
क्या कह रहे हो?… पानी नहीं रहा,’’ एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को एक झटका सा लगा.
‘‘जी एकदम सही सर…’’ जूनियर इंजीनियर बोला.
यह सुनते ही एग्जीक्यूटिव इंजीनियर का पारा चढ़ गया और वह गुस्से में बोला, ‘‘कल से अभी तक चैक क्यों नहीं किया? अब बता रहे हो कि पानी नहीं रहा है. तुम से एक काम भी ढंग से नहीं हो सकता. एक घंटे के बाद मंत्रीजी आने वाले हैं उद्घाटन के लिए. पानी नहीं आया तो क्या जवाब देंगे? खुद तो सस्पैंड होगे ही, मुझे भी करवाओगे.’’

‘‘सर, कल शाम को तो चैक कर के ही गए थे. तब तो पानी रहा था. पता नही रातोंरात…’’
‘‘…तो रात में क्या हो गया? धरती निगल गई या आसमान खा गयाजो भी हो मुझे आधे घंटे में पानी चाहिए,’’ एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने सख्त लहजे में आदेश दिया.
‘‘ठीक है सर, चैक करता हूं,’’ कह कर जूनियर इंजीनियर ने मोटरसाइकिल उठाई और कैजुअल लाइनमैन को पीछे बिठा कर चल दिया.
इसी बीच इलाके के सभी बड़े अफसर, जल निगम के चीफ इंजीनियर, कमिश्नर, डीएम पंडाल पर पधार चुके थे, साथ ही मंत्रीजी की पार्टी से ब्लौक प्रमुख, भूतपूर्व विधायक, जिला और मंडल स्तर के पार्टी नेता आदि भी चुके थे. इन के अलावा, विपक्षी पार्टी के वर्तमान विधायक और उन के चेलेचपाटे भी पंडाल में पधार चुके थे. इंतजार था तो बस मंत्रीजी का.
अव्वल तो इतने छोटे कार्यक्रम में मंत्रीजी आते नहीं, पर पिछले इलैक्शन में पानी की समस्या को ले कर सत्ता पक्ष को मुंह की खानी पड़ी थी. अब  पार्टी किसी भी तरह अपने खोए वोट बैंक को वापस लाना चाहती थी, इसलिए सरकार ने इलाके की सब से बड़ी समस्या यानी पानी के लिएहर घर जल, हर घर नलका शिगूफा छोड़ दिया था.

2-3 महीने में फिर से इलैक्शन होने वाले थे. सरकार इस से पहले, इलाके के हर गांव में पानी पहुंचाना चाहती थी. इस का जिम्मा जल मंत्री रघुवीर सिंह उर्फजग्गू भैयाको सौंपा दिया गया था. वे खुद अपने हाथों से इस का शुभारंभ करना चाहते थे. जूनियर इंजीनियर और लाइनमैन पाइप लाइन को चैक करते हुए उस जगह पहुंचे जहां से देवकी के घर के लिए मेन लाइन से कनैक्शन दिया गया था. वहां का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. तकरीबन 100 मीटर लंबा पाइप गायब था.
‘‘साहब, अब हम क्या करें? इतनी जल्दी 100 मीटर लंबा पाइप ला कर कैसे जोड़ेंगे?’’ लाइनमैन ने घबराई आवाज में पूछा.
‘‘तेरी नौकरी तो गई बेटा. तेरे साथ मैं भी सस्पैंड होऊंगा,’’ जूनियर इंजीनियर ने घबराहट में माथे से पसीना पोंछते हुए लाइनमैन को धमकाया.
‘‘साहब, इस में मेरा क्या कुसूर है? रात में कोई पाइप उखाड़ कर ले जाएगा, ऐसा कौन सोच सकता था?’’ लाइनमैन ने डरतेडरते सफाई दी.
थोड़ी देर के लिए लगा कि उन दोनों को जैसे सांप सूंघ गया, एकदम चुप रहे.
‘‘खैर, जो भी होगा, देखा जाएगा. एग्जीक्यूटिव इंजीनियर साहब को तो तुरंत बताना ही होगा,’’ कहते हुए जूनियर इंजीनियर ने चुप्पी तोड़ी.

दरअसल, हुआ यों कि गांव में पानी की पाइप लाइन बिछाने की टारगेट डेट कब की निकल चुकी थी, पर जल निगम की लापरवाही और टालमटोली की वजह से अब तक पाइप लाइन नहीं बिछ पाई थी.
अचानक जल विभाग के सचिव का आदेश गया,’’ अगले 2-3 महीने में विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने की उम्मीद है और फिर आचार संहिता लागू हो जाएगी. माननीय जल मंत्री चाहते हैं कि वेहर घर जल, हर घर नलयोजना का अगले हफ्ते अपने करकमलों से शुभारंभ करेंगे. इस के लिए जल्दी ही जरूरी तैयारी की जाए.’’ यह फरमान मिलते ही डिवीजन में हड़कम मच गया था. अभी तक तो गांव में मेन पाइप लाइन भी नहीं बिछी थी, फिर घरों तक पानी कैसे पहुंचाएंगेडिवीजन के सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर ने आननफानन में मीटिंग बुलाई और तय हुआ कि गांव में ऐसा घर ढूंढ़ा जाए जो दूसरे गांव को जा रही मेन पाइप लाइन और रोड के एकदम नजदीक हो.

इस के लिए देवकी का घर सब से मुफीद था, जो कि दूसरे गांव को पानी की सप्लाई करने वाली मेन पाइप लाइन से महज 500 मीटर की दूरी पर था और  रोड के नजदीक भी. तय कार्यक्रम के मुताबिक चुपके से देवकी के घर के लिए दूसरे गांव को पानी सप्लाई करने वाले मेन पाइप से टैंपरेरी कनैक्शन जोड़ दिया गया. गांव के कुछ और घरों में भी दिखावे के लिए नल लगा दिए गए बिना पानी के कनैक्शन के ताकि गांव वाले भरोसे में रहें कि जल्दी उन के घर भी पानी जाएगा. एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को जैसे ही पता चला कि कोई पाइप लाइन ही उखाड़े कर ले गया तो उस पर आसमान टूट पड़ा. हताशा और तनाव में वह मन ही मन भुनभुनाया, ‘‘आज तो मर गए अब कुछ नहीं हो सकता.’’ वह कुछ क्षण माथा पकड़ कर यों ही बैठा रहा, फिर जूनियर इंजीनियर पर सारी भड़ास निकाली, ‘‘इडियटतुम्हारे बस का कुछ नहीं है. मरवा दिया सब को. अब देखते हैं कि कौन बचाता है नौकरी…’’

फिर दौड़ादौड़ा सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर के पास गया और सारी बात बताई. पहले तो सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर गुस्से में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर पर ही चढ़ पड़ा, फिर कुछ देर चुप्पी सी छाई रही. सब सोचने में लगे रहे कि अब क्या किया जाए? मंत्रीजी उद्घाटन के लिए पहुंचने वाले ही थे. तभी असिस्टैंट इंजीनियर को एक तरकीब सूझी. इसे उस ने दूसरे अफसरों के साथ साझा किया. यह सुनते ही सब के चेहरे खिल उठे और वे इस के लिए तुरंत राजी हो गए. पंडाल में जमा भीड़ में अचानक हलचल सी मच गई. कुछ लोग रोड की तरफ भाग रहे थे, तो कुछ अपनी जगह उचक कर देख रहे थे. शांत वातावरण को चीरते हुए सायरन की आवाज अब पंडाल तक रही थी. शायद मंत्रीजी का काफिला रोड के बिलकुल पास पहुंच चुका था.
पंडाल में मौजूद बड़े अफसर और उन के पार्टी के पदाधिकारी और नेता मंत्रीजी की अगवानी के लिए तेजतेज कदमों से रोड की तरफ जा रहे थे.

गाडि़यों के काफिले के बीच से एक सफेद चमचमाती हुई, लाल बत्ती वाली कार प्रकट हुई. उस में से झक सफेद कुरतापाजामा और काली नेहरूकट जैकेट पहने, आंखों पर काला चश्मा और गले में पार्टी का गमछा डाले, मंत्रीजी उतरे. वे किसी फिल्मी नेता से कम नहीं लग रहे थे. आते ही अफसरों और उन के पार्टी के नेताओं ने उन्हें घेर लिया और फूलमालाओं से इस कदर लाद दिया था कि चेहरे के अलावा और कुछ नजर नहीं रहा था. मंत्रीजी धीरेधीरे हाथ जोड़े मंच की ओर बढ़ रहे थे. पीछेपीछे स्थानीय नेता, पार्टी कार्यकर्ता, चेले और चमचे जोरजोर से नारे लगाते चल रहे थे, ‘जग्गू भैया जिंदाबाद. विकास पार्टी जिंदाबाद. अपना नेता कैसा हो, जग्गू भैया जैसा हो…’

मंच पर मंत्रीजी के लिए खास कुरसी मंगवाई गई थी, जिसे मंच के बीचोंबीच लगवाया गया था. मंत्रीजी सब का अभिवादन कर कुरसी पर बैठ गए. उन के दाएं तरफ ब्लौक प्रमुख, भूतपूर्व विधायक और फिर जिला स्तर के नेता बैठे थे. बाएं तरफ कमिश्नर, डीएम, चीफ इंजीनियर और बाकी ऊंचे सरकारी अफसर बैठे थे.
किंतु इस विधानसभा क्षेत्र के वर्तमान विधायक के लिए कुरसी, जो कि विपक्षी पार्टी लोक शक्ति से थे, मंच के एक कोने पर लगाई थी. विधायक अपनी कुरसी मंच एक कोने में देख कर भड़क उठे. इस क्षेत्र के वर्तमान विधायक की हैसियत से उन्हें उम्मीद थी कि उन की कुरसी भी मंच के बीच में मंत्रीजी के साथ लगाई जाएगी. इस को ले कर वे अफसरों से उलझ गए, पर कोई उन की बात सुनने को राजी नहीं था.

विरोध में वे मंच से नीचे उतर कर पंडाल में अपने कार्यकर्ताओं के साथ पीछे खड़े हो गए. पार्टी कार्यकर्ता उन के समर्थन में सरकार के खिलाफहायहायके नारे लगाने लगे. बड़ी मुश्किल से उन्हें चुप कराया गया.
जल निगम के चीफ इंजीनियर उठे और माइक पर जन समूह की ओर मुखातिब हो कर बोले, ‘‘भइयो और बहनो, जिस घड़ी का आप को बेसब्री इंतजार था वह गई है. माननीय मंत्रीजी के अथक प्रयास से आप के गांव तक पानी का नल गया है. मैं माननीय मंत्रीजी से अनुरोध करूंगा कि वे अपने हाथों से इस योजना का शुभारंभ करें.’’ सरकारी अफसर और पार्टी पदाधिकारी मंत्रीजी की अगवानी करते हुए उन्हें नल के पास ले गए. पूरे नल पोस्ट को फूलमालाओं से दुलहन की तरह सजाया गया था.

नल की पीतल की टोंटी सूरज की किरणों में सुनहरी रोशनी बिखेर रही थी. पास ही मेज पर करीने से मेजपोश बिछा कर उस पर एक तांबे का चमचमाता जग, गिलास और एक बड़े से टोकरे में बेसन के लड्डू रखे थे. मंत्रीजी ने नल की टोंटी घुमा कर जग में पानी भरा और लड्डू के साथ एक गिलास पानी पीने के लिए देवकी को दिया. पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. मंत्रीजी वापस मंच पर बैठ गए.
चीफ इंजीनियर ने फिर से मंत्रीजी से अनुरोध किया कि वे गांव वालों को आशीर्वाद के रूप में दो शब्द कहें. साथ ही उद्घोषणा की गई कि इस शुभारंभ की खुशी में सभी लोग लड्डू और नल का पानी ग्रहण करें. सभी लोगों को बारीबारी से एकएक  लड्डू और पीने के लिए पानी दिया जाने लगा. इस बीच नल की टोंटी खुली रही. लोग पीने के साथ साथ हाथ मुंह भी धोने लगे.

मंत्रीजी उबासी लेते हुए उठे. कुरते की सिलवटें ठीक की और धीरेधीरे माइक की तरफ बढ़े. एक नजर जन समूह पर डाली, फिर हाथ जोड़ कर सब का अभिवादन किया और बोलना शुरू  किया, ‘‘भाइयो और बहनो, 70 सालों में पिछली सरकारें जो नहीं कर पाईं, वह हमारी सरकार ने कर दिखाया. ऐसे दुर्गम क्षेत्र में भी हम ने घरघर नल पहुंचा दिया. ‘‘आज हमारे लिए बड़े सौभाग्य और खुशी का दिन है. ‘हर घर जल, हर घर नलका सपना अब पूरा हुआ. अब गांव वालों को खासकर औरतों, बच्चों और बूढ़ों को, पानी के लिए कोसों दूर नहीं जाना पड़ेगा. ‘‘भाइयो और बहनो, अगर आने वाले चुनाव में इस बार आप लोगों ने इस क्षेत्र से विकास पार्टी को भरी वोटों से जिताया, तो इसी तरह और भी बहुत सारी योजनाएं इस गांव के लिए लाऊंगा. आप का गांव प्रदेश में एक आदर्श और उत्कृष्ट गांव बन जाएगा.’’ लोगों का ध्यान भाषण ज्यादा लड्डू पर था. लोग लड्डू पाने की उम्मीद में धक्कामुक्की करने लगे. 2-3 आदमी भीड़ को कंट्रोल करने में लगे थे. लोग आतेजाते मुंहहाथ धोते, गिलास में पानी लेते और लड्डू खाते हुए निकल जाते.

लेकिन यह क्याअभी तकरीबन आधे लोग ही पानी के साथ लड्डू खा पाए होंगे कि अचानक नल से पानी आना बंद हो गया. मंत्रीजी ने घूर कर चीफ इंजीनियर की तरफ देखा मानो कह रहे हों, यह क्या बदतमीजी है. चीफ इंजीनियर ने इशारे से सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर को बुलाया और कान में कुछ फुसफुसाया. सुपरिटैंडिंग इंजीनियर खड़े हुए और भीड़ को संबोधित करते हुए बोले, ‘‘आप सभी सब्र से काम लें. असल में पंपहाउस में बिजली चली गई है, इसलिए कुछ देर के लिए पानी रुक गया है. बिजली आते ही पानी आना शुरू हो जाएगा.’’ उधर एग्जीक्यूटिव इंजीनियर डर और घबराहट के मारे पसीनेपसीने हुए जा रहा था. वह जल्दी से मंच से नीचे उतरा और जूनियर इंजीनियर को फोन किया, ‘‘अबे, मरवाओगे क्यापानी क्यों बंद हो गया?’’ ‘‘सर, जहां से पानी पंप कर रहे हैं, वहां गाड़ी नहीं जा सकती. बड़ी मुश्किल से  500 लिटर का पानी का टैंक लोगों से भरवाया था. उस से ही हम पाइपलाइन में पानी पंप कर रहे थे.

लोगों ने टोंटी शायद खुली छोड़ दी होगी, इसलिए पानी अब खत्म हो गया है. अगर आप कहें फिर पानी भरवा दें. बहुत जल्दी भी करें तो करीब एक घंटा लग जाएगा.’’ ‘‘बेवकूफतुम्हारे बस का कुछ नहीं है. मैं असिस्टैंट इंजीनियर को भेज रहा हूं. उन का ही यह आइडिया था.’’ ‘‘आप का ही यह सुपर आइडिया था ? जाओ अब मुंह क्या ताक रहे होजा कर कुछ करो.’’ असिस्टैंट इंजीनियर चुपचाप उठा और चल दिया. आधा घंटा बीत गया पर पानी नहीं आया. लोगों के सब्र का बांध अब टूट चुका था. लोग हल्ला मचाने लगे. विपक्षी पार्टी के विधायक, नेता और पार्टी कार्यकर्ता ऐसे ही मौके की तलाश में थे. उन्होंने पीछे सेजग्गू भैया, हायहाय, विकास पार्टी मुरदाबादके नारे लगाने शुरू कर दिए. विपक्षी पार्टी का विधायक जोरजोर से भाषण देने लगा, ‘‘भाइयो, मैं पहले ही कहता था कि यह सरकार जनता के साथ धोखधड़ी कर ही है.

यह पानी का नल बस दिखावा है. देखो, आधे घंटे में ही पानी बंद हो गया . अब ऐसी पार्टी को आने वाले चुनाव में फिर से बाहर का रास्ता दिखाना है…’’ भीड़ में सब लोग इन के स्वर में स्वर मिला करहायहाय…’ करने लगे. देखते ही देखते भीड़ कंट्रोल से बाहर हो गई. मंत्री, चीफ इंजीनियर, कमिश्नर, डीएम ने भीड़ को शांत कराने की कोशिश की, पर नाकाम रहे. अब भीड़ भी विपक्षी पार्टी के भड़कावे में कर गालीगलौज पर उतर आई. इतने में ही कुछ शरारती लोगों ने पीछे से सड़े टमाटर और आलू मंच की ओर फेंकने शुरू कर दिए. पुलिस जितना भीड़ को कंट्रोल करने की कोशिश करती, वह उतना ही भड़काऊ होती जा रही थी. टमाटर और आलू के बाद लोगों ने अब टूटे जूते और चप्पलें उछालनी  शुरू कर दीं.
एक जूता मंत्रीजी के सिर पर कर  टकराया. फिर क्या था, मंत्रीजी की पार्टी के कार्यकर्ताओं का गुस्सा भी फूट पड़ा. पक्ष और विपक्ष पार्टी के लोग एकदूसरे पर टूट पड़े. पहले लातघूंसों से गुत्थमगुत्था हुए और फिर खूब लाठियां और डंडे चले.

भीड़ भी 2 खेमों में बंट गई, पक्ष और विपक्ष. जिस के हाथ जो लग रहा था उसे ले कर एकदूसरे पर बरसाने लगते. करीब एक घंटे तक यह सब चलता रहा. आखिर में हालात को बेकाबू होता देख कर डीएम ने लाठीचार्ज का आदेश दिया. दंगाई भीड़ पुलिस को लाठी भांजते देख कर चुपचाप गायब हो गईरह गए तो बस सीधेसादे गांव वाले, औरतें, बच्चे और बूढ़े. उन्हें पुलिस ने दौड़ादौड़ा कर खूब पीटा. मंत्रीजी को अफसर और पुलिस वाले चुपके से मंच के पीछे से दंगा होने से पहले ही खिसका कर ले गए और वे गाड़ी के काफिले के साथ राजधानी की तरफ रवाना हो चुके थे. दूसरे दिन के सभी लोकल और बड़े अखबारों की हैडलाइन थी किजल मंत्री के उद्घाटन समारोह में दंगा : 2 मारे गए ओर 10 गंभीर रूप से घायल’. सभी टीवी चैनल्स की भी ये ब्रेकिंग न्यूज थी. एंकर चिल्लाचिल्ला कर इस घटना को मिर्चमसाला लगा कर परोस रहे थे. सोशल मीडिया प्लेटफार्म भी इस घटना से भरे पड़े थे.

मंत्रीजी यह खबर देखते ही बौखला गए. तुरंत जल विभाग, बिजली विभाग और पुलिस विभाग के बड़े  अफसरों को अपने औफिस में तलब किया. शाम तक सभी विभागों के अफसर मंत्री के औफिस में हाजिर हो गए थे. आधी रात तक मैराथन मीटिंग चली. पूरे समय सभी विभाग के अफसर एकदूसरे पर बस आरोप लगाते रहे, पर असली वजह का कुछ भी पता नहीं चला. अब चूंकि कुछ तो एक्शन लेना ही था यानी किसी को तो बलि का बकरा बनाना ही था. तय हुआ कि जल विभाग और बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर और उस इलाके के दारोगा को तुरंत सस्पैंड किया जाए. लाइनमैन और पंप आपरेटर को नौकरी से बरखास्त कर दिया जाए, क्योंकि ये दोनों कौन्ट्रैक्ट पर थे. संबंधित एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर और डीएसपी को कारण बताओ नोटिस दिया जाए. उस जिले के डीएम को आदेश दिया गया
कि घटना की निष्पक्ष जांच कर के एक महीने में रिपोर्ट दे.

विपक्षी दलों खासकर लोक शक्ति पार्टी ने इसे चुनावी मुद्दा बना कर  सरकार के खिलाफ मोरचा खोल दिया. जल मंत्री पर इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने के लिए दबाव बनाने लगे. उधर सरकार और  जल मंत्री ने इस घटना की पूरी  जिम्मेदारी लोक शक्ति पार्टी के विधायक पर थोप दी.
सरकार का आरोप था कि लोक शक्ति पार्टी के विधायक और नेताओं ने ही लोगों को उपद्रव करने के लिए उकसाया, पर पक्के सुबूतों की कमी में अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई थी. वैसे भी कहीं इस का चुनाव पर उलटा असर पड़ जाए, यह सोच कर कुछ समय के लिए टाल दिया गया. हर चुनावी सभा में इस मुद्दे पर दोनों पार्टियां ने एकदूसरे पर खूब कीचड़ उछाला. चुनाव में सब से ज्यादा सीटें विकास पार्टी को ही मिली थीं और उस ने जोड़तोड़ कर किसी तरह फिर से सरकार बना ली, पर इस घटना की वजह से उसे इस विधानसभा क्षेत्र से फिर से हार का सामना करना पड़ा.

मंत्रीजी के मीटिंग से वापस आते हीअफसरों ने पहला काम दोनों जूनियर इंजीनियर और इलाके के दारोगा को सस्पैंड करने और लाइनमैन और पंप आपरेटर को बरखास्त करने का किया, क्योंकि यही काम सब से आसान था. जल विभाग के जूनियर इंजीनियर और दारोगा को तो इस की उम्मीद ही थी इसलिए उन्होंने चुपचाप सस्पैंशन लैटर ले लिया. पर बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर के लिए यह आदेश हैरान कर देने वाला था, इसलिए वह मिमियाने लगा, ‘‘सर, यह क्यामुझे सस्पैंशन लैटर क्यों दिया जा रहा है? आखिर मेरा कुसूर क्या है?’’
‘‘जल विभाग का कहना कि जब मंत्रीजी नल का उद्घाटन कर रहे थे तो तुम ने उस इलाके की बिजली काट दी जिस से पानी का पंप चलना बंद हो गया और नल में पानी आना भी बंद हो गया,’’ सस्पैंशन लैटर देने वाले अफसर ने समझाया.
‘‘नहीं सर, यह एकदम झूठ है. आप इलाके में किसी से भी पूछ सकते हैं. उस समय कोई बिजली कटौती नहीं की गई थी,’’ जूनियर इंजीनियर ने बताया.

‘‘देखो भई, यह सच है या झूठ, यह तो इन्कवायरी के बाद ही पता चलेगा. ऊपर से आदेश है तो हमें पालन करना ही पड़ेगा. वैसे भी सस्पैंशन से कोई नौकरी थोड़े ही जा रही है… 2-3 महीने घर पर आराम करो, फिर सस्पैंशन वापस ले लेंगे, वह भी बैक डेट से और सारी सैलरी भी मिल जाएगी एरियर के साथ,’’ अफसर ने जूनियर इंजीनियर को दिलासा देते हुए कहा. बरखास्तगी का आदेश सुन कर लाइनमैन और पंप आपरेटर भी हाथ जोड़ के गिड़गिड़ाने लगे, ‘साहब, नौकरी से मत निकालिए. बड़ी मुश्किल से जुगाड़ लगा कर यह नौकरी मिली थी.’ ‘‘तुम्हारा दर्द हम समझते है भाई, पर क्या करें, मजबूर हैं. ऊपर से ऐसा ही आदेश है. अभी जाओ. तुम लोगों के बारे में भी कुछ सोचेंगे,’’ अफसर ने दोनों को समझाते हुए घर वापस भेज दिया. जब से पता चला कि डीएम को घटना की जांच के आदेश दिए गए हैं, जल, बिजली और पुलिस विभाग के बड़े अफसर डीएम के इर्दगिर्द चक्कर काटने लगे ताकि जांच की आंच उन तक पाए.

यहां तक कि जल निगम के सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर ने तो बर्थडे के बहाने अपने घर पर पार्टी का इंतजाम भी तक कर डाला. इस में डीएम और बाकी बड़े अफसरों को भी बुलाया गया. सब लोग डीएम से मिन्नतें करने लगे कि वे जांच की गोलमोल रिपोर्ट बनाएं, ताकि किसी बड़े अफसर पर गाज गिरे. भला डीएम भी नमक खा कर नमकहलाली कैसे करता. उस ने जानबूझ कर रिपोर्ट सौंपने में देरी की, ताकि तक लोग इस घटना के बारे में भूल जाएं. अब तक टीवी चैनल और सोशल मीडिया भी ठंडे पड़ चुके थे. डीएम ने पूरी घटना की जिम्मेदारी विपक्षी लोक शक्ति पार्टी के विधायक और नेताओं पर डाल दी और बाकी विभागों की भूमिका के बराबर बताई. रिपोर्ट भी तय समय एक महीने के बजाय 3 महीने में इस टिप्पणी के साथ भेजी गई किप्राकृतिक आपदा के काम में व्यस्तता की वजह से समय नहीं मिला’. रिपोर्ट जल विभाग के सचिवालय में कई महीनों तक यों ही ठंडे बस्ते में पड़ी रही. खानापूरी हो गई थी बस, अब किसी को इस से कोई मतलब था. इस तरह  और 6 महीने कट गए.

इस बीच गांव वालों ने इस घटना पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं होने पर आवाज उठानी शुरू कर दी. विपक्षी दलों को भी सरकार को घेरने का अच्छा मुद्दा मिल गया और उन के नेताओं ने तो आग में घी काम किया. मुद्दा एक बार फिर से गरमा गया. आननफानन में सरकार को रिपोर्ट सार्वजनिक करनी पड़ी.
रिपोर्ट पढ़ कर विपक्षी दल खासकरलोक शक्ति पार्टीके नेता और कार्यकर्ता भड़क उठे. वे उस इलाके के गांव वालों को ले कर सड़कों पर उतर आए. उन का कहना था कि रिपोर्ट झूठी है. सरकार घटना की सीबीआई से जांच करवाए. जल निगम के सभी कुसूरवार अफसरों को बरखास्त कर उन पर मुकदमा चलाया जाए और जल मंत्री तुरंत इस्तीफा दे. फिर से यह मुद्दा देशप्रदेश में सुर्खियों में छाने लगा. प्रदेश के दूसरे हिस्सों से भी लोग इस आंदोलन में जुड़ने लगे. पानी सिर के ऊपर से गुजरता देख कर, सरकार ने इस घटना की जांच के लिए हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जस्टिस की अध्यक्षता में एक हाई लैवल कमेटी बना दी, जिस को 6 महीने में अपनी रिपोर्ट देनी थी.

वैसे, विपक्षी दल सीबीआई से जांच की मांग पर अड़े हुए थे. इस घटना को बीते पूरे 2 साल हो चुके थे. कुसूरवार लोगों पर कार्रवाई तो दूर अभी तक हाई लैवल कमेटी की जांच रिपोर्ट भी सार्वजनिक नहीं हुई थी. गांव वाले जब भी जल निगम के अफसरों से पूछते है कि उन के घर पर लगे नल में पानी कब आएगा? तो उन का सपाट से जवाब होता है, ‘‘अभी जांच चल रही है. जब जांच पूरी हो जाएगी तब पानी भी जाएगा.’’ देवकी के आंगन में फिर से बड़ीबड़ी घास और झाडि़यां उग आई हैं. पीतल की टोंटी कोई खोल के ले गया, शायद जल निगम के मुलाजिम ही ले गए होंगे. नल का स्टैंड पोस्ट टूट चुका है. देवकी रोज सवेरे जमीन पर पड़े नल को इस उम्मीद से देखती है कि शायद कभी पानी जाए, फिर निराश हो कर गगरी लिए पानी की तलाश में दूर निकाल जाती है.                           
दिनेश चंद्र कबडाल

 

Hindi Family Story: लाड़ली – आराधना की मौत कैसे हुई

Hindi Family Story, लेखक- स्निग्धा श्रीवास्तव

‘‘चाची, आप को तो आना ही पड़ेगा… आप ही तो अकेली घर की बुजुर्ग हैं… और बुजुर्गों के आशीर्वाद के बिना शादीब्याह के कार्यक्रम अपूर्ण ही होते हैं,’’ जेठ के बेटेबहू के इस अपनापन से भरे आग्रह को सावित्री टाल न सकी पर अंदर ही अंदर जिस बात से वह डरती थी वही हुआ. न चाहते हुए भी वहां स्वस्तिका से सावित्री

का सामना हो गया. यद्यपि स्वस्तिका सावित्री की रिश्ते में नातिन थी फिर भी वह उस की आंख की किरकिरी बन गई थी.

आराधना की मौत हुए अभी साल भर भी पूरा नहीं हुआ था पर स्वस्तिका के चेहरे पर अपनी मां की मौत का तनिक भी अफसोस नहीं था बल्कि वह तो अपने पति की बांहों में बांहें डाले हंसती हुई सावित्री के सामने से निकल गई थी. यह देख कर उन का मन बेचैन हो उठा और तबीयत ठीक न होने का बहाना कर वह घर लौट आई थीं.

सावित्री की जल्दबाजी से प्रकाश और विभा को भी घर लौटना पड़ा. घर पहुंचते ही प्रकाश झल्ला पड़ा, ‘‘मां, तुम भी कमाल करती हो…जब स्वस्तिका से अपना कोई संबंध ही नहीं रहा तो उस के होने न होने से हमें क्या फर्क पड़ता है.’’

विभा ने भी समझाना चाहा, ‘‘मम्मी- जी, कब तक यों स्वयं को कष्ट देंगी आप. जिसे दुखी होना चाहिए वह तो सरेआम हंसतीखिलखिलाती घूमती है…’’

सावित्री बेटेबहू की बातों पर चुप ही रही. क्या कहती? प्रकाश और विभा गलत भी तो नहीं थे.

कपड़े बदल कर वह बिस्तर पर निढाल सी लेट गईं पर अशांत मन चैन नहीं पा रहा था. बारबार स्वस्तिका के चेहरे में झलकती आराधना की तसवीर आंखों में तैर जाती.

सहसा सावित्री के विचारों में स्वस्तिका की उम्र वाली आराधना याद हो आई. आराधना भी बिलकुल ऐसी ही मस्तमौला थी पर तुनकमिजाज…जिद्दी ऐसी कि 2-2 दिनों तक भूखी रहती थी पर अपनी बात मनवा के दम लेती.

शेखर कहते भी थे कि बेटी को जरूरत से ज्यादा सिर चढ़ाओगी तो पछताओगी, सावित्री. पर कब ध्यान दिया सावित्री ने उन बातों पर. सावित्री के लाड़प्यार की शह में तो आराधना बिगड़ैल बनती गई.

पिताजी का डर था जो थोड़ीबहुत आराधना की लगाम कस के रखता था, वह भी उन की अचानक मौत के बाद जाता रहा. अब वह सुबह से नाश्ता कर कालिज निकल जाती तो बेलगाम हो कर दिन भर सहेलियों के साथ घूमती रहती.

सावित्री कुछ कहती तो आराधना झल्ला पड़ती. उस का समयअसमय आना- जाना जरूरत से ज्यादा बढ़ता जा रहा था.

प्रकाश भी अब किशोर से जवान हो रहा था. उसे दीदी का देर रात तक घूमनाफिरना और रोज अलगअलग पुरुष मित्रों का घर तक छोड़ने आना अटपटा लगता पर क्या कहता वह? कहता तो छोटे मुंह बड़ी बात होती.

1-2 बारप्रकाश ने मां से कहने की कोशिश भी की पर आराधना ने घुड़क दिया, ‘तुम अपना मन पढ़ाई में लगाओ, मेरी चिंता मत करो. मैं कोई नासमझ नहीं हूं, अपना भलाबुरा अच्छी तरह समझती हूं.’

प्रकाश ने मां की ओर देखा पर वह भी बेटी का समर्थन करते हुए बोलीं, ‘प्रकाश, तुम छोटे हो अभी. आराधना बड़ी हो चुकी है, वह जानती है कि उस के लिए क्या सही है क्या गलत.’

सावित्री ने आराधना को नाराज होने से बचाने के लिए प्रकाश को चुप तो कर दिया पर मन ही मन वह भी आराधना की इन हरकतों से चिंतित थीं. फिर भी मन के किसी कोने में यह विश्वास था कि नहीं…मेरी बेटी गलत कदम कभी नहीं उठाएगी.

पर कोरे निराधार विश्वास ज्यादा समय तक कहां टिक पाते हैं? आखिर वही हुआ जिस की आशंका सावित्री को थी.

एक दिन आराधना बदले रूप के साथ घर लौटी. साथ में खड़े व्यक्ति का परिचय कराते हुए बोली, ‘मां, ये हैं डा. मोहन शर्मा.’

आराधना के शरीर पर लाल सुर्ख साड़ी, भरी मांग देख सावित्री को सारा माजरा समझ में आ गया पर घर आए मेहमान के सामने बेटी पर चिल्लाने के बजाय अगले ही पल उलटे कदमों अपने कमरे में आ गईं.

आराधना भी अपनी मां के पीछेपीछे कमरे में आ गई, ‘मां, सुनो तो…’

‘अब क्या सुना रही हो, आराधना?’ सावित्री लगभग रोते हुए बोलीं, ‘तू ने तो एक पल को भी अपनी मां की भावनाओं के बारे में नहीं सोचा. अरे, एक बार कहती तो मुझ से…तेरी खुशी के लिए मैं खुद तैयार हो जाती.’

‘मां, मोहन ने ऐसी जल्दी मचाई कि वक्त ही नहीं मिला.’

आराधना की बात पूरी होने से पहले ही सावित्री के मन को यह बात खटक गई, ‘जल्दी मचाई…क्यों? शादीब्याह के कार्य जल्दबाजी में निबटाने के लिए नहीं होते, आराधना… और यह डा. मोहन कौन है, कहां का है…इस का घरपरिवार, अतापता कुछ जानती भी है तू या नहीं?’

‘मां, डा. मोहन बहुत अच्छे इनसान हैं. बस, मैं तो इतना जानती हूं. मेडिकल कालिज के परिसर में इन का क्वार्टर है, जहां यह अकेले रहते हैं. रही बाकी परिवार की बात तो अब शादी की है तो वह भी पता चल जाएगा. मां, मैं तो एक ही बात जानती हूं, जिस का वर्तमान अच्छा है उस का भविष्य भी अच्छा ही होगा….तुम नाहक चिंता न करो. अब उठो भी, मोहन बैठक में अकेले बैठे हैं.’

यह तो ठीक है कि वर्तमान अच्छा है तो भविष्य भी अच्छा ही होगा है पर इन दोनों का आधार तो अतीत ही होता है न. किसी का पिछला इतिहास जाने बिना इस तरह आंखें मूंद कर विश्वास कर लेना मूर्खता ही तो है. सावित्री चाह कर भी नहीं समझा पाई आराधना को और अब समझाने से लाभ भी क्या था.

सावित्री ने खुद के मन को ही समझा लिया कि चलो, आराधना ने कम से कम ऐरेगैरे से तो विवाह नहीं रचाया. डाक्टर है लड़का. आर्थिक परेशानी की तो बात नहीं रहेगी.

2 वर्ष भी नहीं बीत पाए और एक दिन वही हुआ जिस का डर सावित्री को था. आराधना मोहन द्वारा मार खाने के बाद 6 माह की स्वस्तिका को ले कर मायके आ गई थी.

मोहन पहले से विवाहित, 2 बच्चों का बाप था. आराधना से उस ने विवाह मंदिर में रचाया था जिस का न कोई प्रमाण था न ही कोई प्रत्यक्षदर्शी. बिना पूर्व तलाक के जहां यह विवाह अवैध सिद्ध हो गया वहीं स्वस्तिका का जन्म भी अवैधता की श्रेणी में आ गया.

आज सावित्री को शेखर अक्षरश: सत्य नजर आ रहे थे. उस का अंत:करण स्वयं को धिक्कार उठा, ‘मेरा आवश्यकता से अधिक लाड़, बारबार आराधना की गलतियों पर प्रेमवश परदा डालने का प्रयास, उस की नाजायज जिद का समर्थन वीभत्स रूप में बदल कर ही तो मेरे समक्ष खड़ा हो मुझे मुंह चिढ़ा रहा है.’

आराधना ने नौकरी ढूंढ़ ली. स्वस्तिका को संभालने का जिम्मा अब सावित्री का था.

जो भूल आराधना के साथ की वह स्वस्तिका के साथ नहीं दोहराऊंगी, मन ही मन तय किया था सावित्री ने, पर जैसजैसे स्वस्तिका बड़ी होती जा रही थी आराधना के लाड़प्यार ने उसे बिगाड़ना शुरू कर दिया था. सावित्री कुछ समझाती तो बजाय बात को समझने के आराधना बेटी का पक्ष ले कर अपनी मां से लड़ पड़ती. पिता के प्यार की भरपाई भी आराधना अपनी ओर से कर डालना चाहती थी और इसी प्रयास में वह स्वयं का ही प्रतिरूप तैयार करने की भूल कर बैठी.

आराधना के मामलों में तो सावित्री हरदम प्रकाश की अनसुनी कर दिया करती थी पर अब प्रकाश उन्हें शेखर की तरह ही संजीदा व सही प्रतीत होता.

स्वस्तिका की 10वीं की परीक्षा थी. गणित में कमजोर होने के कारण आराधना एक दिन सतीश नाम के एक ट्यूटर को घर ले आई और बोली, ‘कल से यह स्वस्तिका को गणित पढ़ाने आएगा.’

22 साल का सतीश प्रकाश के मन को खटक गया लेकिन आराधना दीदी के स्वभाव को जानते हुए वह चुप ही रहा.

जब भी सतीश स्वस्तिका को पढ़ाने आता प्रकाश की नजरें उन के क्रियाकलापों का जायजा लेती रहतीं. कान सचेत हो कर उन के बीच हो रही बातचीत पर ही लगे रहते. प्रकाश को भय था कि आराधना दीदी की तरह ही कहीं स्वस्तिका का हश्र न हो.

एक दिन प्रकाश ने स्वस्तिका को सतीश के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखा तो उसे धक्के मार कर घर से बाहर निकाल दिया.

शाम को आराधना के दफ्तर से आते ही स्वस्तिका फफक कर रोने लगी, ‘मम्मी, प्रकाश मामा को समझा दो. हर समय हमारी जासूसी करते हैं. आज जरा सी बात पर सर को धक्का दे कर घर से निकाल दिया.’

‘क्यों प्रकाश? यह किस तरह का बरताव है?’ बिना अपनी लाड़ली की गलती जानेसमझे आराधना अपनी आदत के अनुसार गरज पड़ी.

‘दीदी, वह जरा सी बात क्या है यह अपनी लाड़ली से नहीं पूछोगी?’ प्रकाश भी तमतमा गया.

आराधना ने इसे अहं का विषय बना डाला, ‘ओह, तो अब हम मांबेटी तुम लोगों को भारी पड़ने लगे हैं, लेकिन यह मत भूलो कि कमाती हूं, घर में पैसे भी देती हूं. इसलिए हक से रहती हूं. तुम्हें पसंद नहीं तो हम अलग रह लेंगे, एक मकान लेने की हैसियत है मुझ में.’

बात बिगड़ती देख सावित्री ने दोनों को समझाना चाहा पर आराधना ठान चुकी थी. हफ्ते भर में नया मकान देख स्वस्तिका को ले कर चली गई. सतीश फिर उसे पढ़ाने आने लगा. न चाहते हुए भी सावित्री व प्रकाश चुप रहे. कहते भी तो सुनता कौन?

उन्हीं दिनों अचानक आराधना का स्वास्थ्य खराब रहने लगा. स्थानीय डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए. मुंबई अथवा दिल्ली के बड़े चिकित्सा संस्थानों में दिखाने के लिए कहा गया. प्रकाश पुराने गिलेशिकवे भुला कर दीदी को मुंबई ले गया. आखिर भाई था वह और उस के सिवा और कोई पुरुष था भी तो नहीं घर में जो आराधना के साथ बड़े शहरों के बड़ेबड़े अस्पतालों में चक्कर काटता.

डाक्टरों ने बताया कि आराधना को कैंसर है जो अंतिम अवस्था तक पहुंच चुका है. जीवन की डोर को केवल 6 माह तक और खींचा जा सकता है. वह भी केवल दवाइयों व इंजेक्शनों के आधार पर.

ऐसे हालात में सावित्री व प्रकाश का आराधना के साथ रहना निहायत जरूरी हो गया था. साथ रहते हुए प्रकाश को स्वस्तिका व सतीश की नाजायज हरकतें पुन: नजर आने लगीं. पर बात का बतंगड़ न बन जाए यह सोच कर वह चुप रहा, केवल मां से ही बात की. मौका देख कर सावित्री ने आराधना को इस बारे में सचेत करना चाहा. इस बार आराधना ने भी हंगामा नहीं मचाया बल्कि स्वस्तिका को बुला कर इस बारे में बात की.

स्वस्तिका शायद अवसर की खोज में ही थी इसलिए साफ शब्दों में उस ने कह दिया कि वह सतीश से प्यार करती है और वह भी उसे चाहता है.

अगले दिन आराधना ने सावित्री व प्रकाश को अपना निर्णय सुना दिया, ‘प्रकाश, तुम पर बड़ी जिम्मेदारी डाल रही हूं. इसी माह स्वस्तिका की शादी सतीश से करनी है. उस के घर वालों से बात कर लो व शादी की तैयारी शुरू कर दो. सुविधा के लिए मैं अपने बैंक खाते को तुम्हारे नाम के साथ संयुक्त कर देती हूं ताकि पैसा निकालने में तुम्हें सुविधा हो. तुम पैसे की चिंता बिलकुल मत करना. मैं चाहती हूं अपने जीतेजी बेटी को ब्याह कर जाऊं.’

शायद यह खुद के विधिविधान से विवाह संस्कार न हो पाने की अधूरी चाह थी जिसे आराधना स्वस्तिका के रूप में देखना चाहती थी.

सब कुछ आराधना की इच्छानुसार हो गया. सतीश के दामाद बनते ही स्वस्तिका ने नए तेवर दिखाना शुरू कर दिए, ‘मम्मी, अब मैं और सतीश तो हैं न तुम्हारी देखभाल करने के लिए….नानी और मामा को वापस अपने घर भेज दो.’

प्रकाश ने सुना तो खुद ही सावित्री को साथ ले कर अपने घर लौट आया. सावित्री घर आ कर बारबार दवाई व इंजेक्शनों के समय पर बेचैन हो जातीं कि पता नहीं स्वस्तिका ठीक समय पर दवाई दे पाती है या नहीं. अभी 2 हफ्ते भी नहीं गुजरे थे कि एक शाम सतीश का फोन आया, ‘नानीजी, जल्दी आ जाइए, मम्मीजी हमें छोड़ कर चली गईं.’

‘क्या?’ सावित्री सुन कर अवाक् रह गईं.

सावित्री को साथ ले कर बदहवास सा प्रकाश आराधना के घर पहुंचा पर तब तक तो सारा खेल खत्म हो चुका था.

सभी अंतिम क्रियाकर्म प्रकाश ने ही पूरा किया. अस्थि कलश के विसर्जन का समय आया तो स्वस्तिका आ गई, ‘मामाजी, पहले उस संयुक्त खाते का हिसाबकिताब साफ कर दीजिए उस के बाद कलश को हाथ लगाइएगा.’

रिश्तेदारों का लिहाज न होता तो स्वस्तिका व सतीश को उन की इस धृष्टता का प्रकाश अच्छा सबक सिखाता पर रिश्तेदारों के सामने कोई तमाशा न हो यह सोच कर अपने क्रोध को किसी तरह दबा लिया और स्वस्तिका की इच्छानुसार कार्य करते हुए अपने सारे कर्तव्य पूरे कर दिए.

सावित्री वापस लौटने वाली थीं. आराधना के कमरे की सफाई करते समय अचानक उन की नजर अलमारी में पड़े दवा के डब्बे पर गई जो स्वस्तिका के विवाह के बाद घर लौटने से पहले प्रकाश ने ला कर रखा था. खोल कर देखा तो सारी दवाइयां व इंजेक्शन उसी तरह पैक ही रखे थे.

सावित्री का माथा ठनका. तो क्या स्वस्तिका ने पिछले दिनों आराधना को दवाइयां दी ही नहीं? यह सोच कर सावित्री ने स्वस्तिका को आवाज लगाई.

‘क्या है, नानी?’

खुला डब्बा दिखाते हुए सावित्री ने पूछा, ‘स्वस्तिका, तुम ने अपनी मम्मी को दवाइयां नहीं दीं?’

‘हां, नहीं दीं…तो? क्या गलत किया मैं ने? तकलीफ में थीं वह…और आज नहीं तो 4 माह बाद जाने ही वाली थीं न हमें छोड़ कर…तो अभी चली गईं…क्या फर्क पड़ गया?’

‘बेशरम, मेरी बेटी की जान लेने वाली तू डाइन है…पूरी डाइन.’

पसीने से तरबतर सावित्री हड़बड़ा कर बिस्तर से उठ बैठीं…अतीत की वे यादें आज भी उन्हें बेचैन कर देती हैं. न जाने उस दिन कौनकौन सी गालियां दे कर सावित्री ने हमेशा के लिए स्वस्तिका से रिश्ता तोड़ दिया था. सावित्री का सिर भारी हो गया.

सुना तो यही था कि बेटियां मां का दर्द बांटती हैं फिर स्वस्तिका बेटी हो कर भी अपनी मां के प्रति इतनी कठोर कैसे बन गई. शायद आराधना की शिक्षा में ही कोई कसर रह गई थी…आखिर बेटी अपनी मां से ही तो संस्कार पाती है. नहींनहीं…फिर तो पूरी गलती आराधना की भी नहीं है…गलत तो मैं ही थी…आराधना ने तो वही संस्कार स्वस्तिका को दिए जो मुझ से पाए थे.

काश, मैं ने आराधना को सहेज कर रखा होता तो आज उस की संतान में उस कुटिल व्यक्ति का कलुषित खून न होता जो आज उस का पिता न हो कर भी पिता था. काश, मैं ने आराधना की नाजायज बातों पर प्रेमवश परदा डालने के बजाय उसे ऊंचनीच का ज्ञान कराया होता, उस की हर गलत बात पर किए गए मेरे समर्थन का नतीजा ही तो था जो आराधना स्वभाव से अक्खड़ बन गई थी. आराधना ने भी वही सब स्वस्तिका को दिया जो मैं ने परवरिश में उस की झोली में डाला था.

जब भी स्वस्तिका से सावित्री का सामना होता वह अपने इन्हीं विचारों के अनसुलझे मकड़जाल में फंस कर रह जाती. अपने लाड़ के अतिरेक से ही तो अपनी लाड़ली को खो चुकी थी वह और शायद लाड़ली की लाड़ली को भी. Hindi Family Story

Hindi Story: हिंदी की दुकान-क्या पूरा हुआ सपना

मेरे रिटायरमेंट का दिन ज्योंज्यों नजदीक आ रहा था, एक ही चिंता सताए जा रही थी कि इतने वर्षों तक बेहद सक्रिय जीवन जीने के बाद घर में बैठ कर दिन गुजारना कितना कष्टप्रद होगा, इस का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. इसी उधेड़बुन में कई महीने बीत गए. एक दिन अचानक याद आया कि चंदू चाचा कुछ दिन पहले ही रिटायर हुए हैं. उन से बात कर के देखा जा सकता है, शायद उन के पास कोई योजना हो जो मेरे भावी जीवन की गति निर्धारित कर सके.

यह सोच कर एक दिन फुरसत निकाल कर उन से मिला और अपनी समस्या उन के सामने रखी, ‘‘चाचा, मेरे रिटायरमेंट का दिन नजदीक आ रहा है. आप के दिमाग में कोई योजना हो तो मेरा मार्गदर्शन करें कि रिटायरमेंट के बाद मैं अपना समय कैसे बिताऊं?’’

मेरी बात सुनते ही चाचा अचानक चहक उठे, ‘‘अरे, तुम ने तो इतने दिन हिंदी की सेवा की है, अब रिटायरमेंट के बाद क्या चिंता करनी है. क्यों नहीं हिंदी की एक दुकान खोल लेते.’’

‘‘हिंदी की दुकान? चाचा, मैं समझा नहीं,’’ मैं ने अचरज से पूछा.

‘‘देखो, आजकल सभी केंद्र सरकार के कार्यालयों, बैंकों और सार्वजनिक उपक्रमों में हिंदी सेल काम कर रहा है,’’ चाचा बोले, ‘‘सरकार की ओर से इन कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग करने और उसे बढ़ावा देने के लिए तरहतरह के प्रयास किए जा रहे हैं. कार्यालयों के आला अफसर भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं. इन दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों को समयसमय पर प्रशिक्षण आदि की जरूरत तो पड़ती ही रहती है और जहां तक हिंदी का सवाल है, यह मामला वैसे ही संवेदनशील है. इसी का लाभ उठाते हुए हिंदी की दुकान खोली जा सकती है. मैं समझता हूं कि यह दुकानदारी अच्छी चलेगी.’’

‘‘तो मुझे इस के लिए क्या करना होगा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘करना क्या होगा,’’ चाचा बोले, ‘‘हिंदी के नाम पर एक संस्था खोल लो, जिस में राजभाषा शब्द का प्रयोग हो. जैसे राजभाषा विकास निगम, राजभाषा उन्नयन परिषद, राजभाषा प्रचारप्रसार संगठन आदि.’’

‘‘संस्था का उद्देश्य क्या होगा?’’

‘‘संस्था का उद्देश्य होगा राजभाषा का प्रचारप्रसार, हिंदी का प्रगामी प्रयोग तथा कार्यालयों में राजभाषा कार्यान्वयन में आने वाली समस्याओं का समाधान. पर वास्तविक उद्देश्य होगा अपनी दुकान को ठीक ढंग से चलाना. इन सब के लिए विभिन्न प्रकार की कार्यशालाओं का आयोजन किया जा सकता है.’’

‘‘चाचा, इन कार्यशालाओं में किनकिन विषय पर चर्चाएं होंगी?’’

‘‘कार्यशालाओं में शामिल किए जाने वाले विषयों में हो सकते हैं :राजभाषा कार्यान्वयन में आने वाली कठिनाइयां और उन का समाधान, वर्तनी का मानकीकरण, अनुवाद के सिद्धांत, व्याकरण एवं भाषा, राजभाषा नीति और उस का संवैधानिक पहलू, संसदीय राजभाषा समिति की प्रश्नावली का भरना आदि.’’

‘‘कार्यशाला कितने दिन की होनी चाहिए?’’ मैं ने अपनी शंका का समाधान किया.

‘‘मेरे खयाल से 2 दिन की करना ठीक रहेगा.’’

‘‘इन कार्यशालाओं में भाग कौन लोग लेंगे?’’

‘‘केंद्र सरकार के कार्यालयों, बैंकों तथा उपक्रमों के हिंदी अधिकारी, हिंदी अनुवादक, हिंदी सहायक तथा हिंदी अनुभाग से जुड़े तमाम कर्मचारी इन कार्यशालाओं में भाग लेने के पात्र होंगे. इन कार्यालयों के मुख्यालयों एवं निगमित कार्यालयों को परिपत्र भेज कर नामांकन आमंत्रित किए जा सकते हैं.’’

‘‘परंतु उन के वरिष्ठ अधिकारी इन कार्यशालाओं में उन्हें नामांकित करेंगे तब न?’’

‘‘क्यों नहीं करेंगे,’’ चाचा बोले, ‘‘इस के लिए इन कार्यशालाओं में तुम्हें कुछ आकर्षण पैदा करना होगा.’’

मैं आश्चर्य में भर कर बोला, ‘‘आकर्षण?’’

‘‘इन कार्यशालाओं को जहांतहां आयोजित न कर के चुनिंदा स्थानों पर आयोजित करना होगा, जो पर्यटन की दृष्टि से भी मशहूर हों. जैसे शिमला, मनाली, नैनीताल, श्रीनगर, ऊटी, जयपुर, हरिद्वार, मसूरी, गोआ, दार्जिलिंग, पुरी, अंडमान निकोबार आदि. इन स्थानों के भ्रमण का लोभ वरिष्ठ अधिकारी भी संवरण नहीं कर पाएंगे और अपने मातहत कर्मचारियों के साथसाथ वे अपना नाम भी नामांकित करेंगे. इस प्रकार सहभागियों की अच्छी संख्या मिल जाएगी.’’

‘‘इस प्रकार के पर्यटन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थानों पर कार्यशालाएं आयोजित करने पर खर्च भी तो आएगा?’’

‘‘खर्च की चिंता तुम्हें थोड़े ही करनी है. अधिकारी स्वयं ही खर्च का अनुमोदन करेंगे/कराएंगे… ऐसे स्थानों पर अच्छे होटलों में आयोजन से माहौल भी अच्छा रहेगा. लोग रुचि ले कर इन कार्यशालाओं में भाग लेंगे. बहुत से सहभागी तो अपने परिवार के साथ आएंगे, क्योंकि कम खर्च में परिवार को लाने का अच्छा मौका उन्हें मिलेगा.’’

‘‘इन कार्यशालाओं के लिए प्रतिव्यक्ति नामांकन के लिए कितना शुल्क निर्धारित किया जाना चाहिए?’’ मैं ने पूछा.

चाचा ने बताया, ‘‘2 दिन की आवासीय कार्यशालाओं का नामांकन शुल्क स्थान के अनुसार 9 से 10 हजार रुपए प्रतिव्यक्ति ठीक रहेगा. जो सहभागी खुद रहने की व्यवस्था कर लेंगे उन्हें गैर आवासीय शुल्क के रूप में 7 से 8 हजार रुपए देने होंगे. जो सहभागी अपने परिवारों के साथ आएंगे उन के लिए 4 से 5 हजार रुपए प्रतिव्यक्ति अदा करने होंगे. इस शुल्क में नाश्ता, चाय, दोपहर का भोजन, शाम की चाय, रात्रि भोजन, स्टेशनरी तथा भ्रमण खर्च शामिल होगा.’’

‘‘लेकिन चाचा, सहभागी अपनेअपने कार्यालयों में इन कार्यशालाओं का औचित्य कैसे साबित करेंगे?’’

‘‘उस के लिए भी समुचित व्यवस्था करनी होगी,’’ चाचा ने समझाया, ‘‘कार्यशाला के अंत में प्रश्नावली का सत्र रखा जाएगा, जिस में प्रथम, द्वितीय, तृतीय के अलावा कम से कम 4-5 सांत्वना पुरस्कार विजेताओं को प्रदान किए जाएंगे. इस में ट्राफी तथा शील्ड भी पुरस्कार विजेताओं को दी जा सकती हैं. जब संबंधित कार्यालय पुरस्कार में मिली इन ट्राफियों को देखेंगे, तो कार्यशाला का औचित्य स्वयं सिद्ध हो जाएगा. विजेता सहभागी अपनेअपने कार्यालयों में कार्यशाला की उपयोगिता एवं उस के औचित्य का गुणगान स्वयं ही करेंगे. इसे और उपयोगी साबित करने के लिए परिपत्र के माध्यम से कार्यशाला में प्रस्तुत किए जाने वाले उपयोगी लेख तथा पोस्टर व प्रचार सामग्री भी मंगाई जा सकती है.’’

‘‘इन कार्यशालाओं के आयोजन की आवृत्ति क्या होगी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘वर्ष में कम से कम 2-3 कार्य-शालाएं आयोजित की जा सकती हैं.’’

‘‘कार्यशाला के अतिरिक्त क्या इस में और भी कोई गतिविधि शामिल की जा सकती है?’’

मेरे इस सवाल पर चाचा बताने लगे, ‘‘दुकान को थोड़ा और लाभप्रद बनाने के लिए हिंदी पुस्तकों की एजेंसी ली जा सकती है. आज प्राय: हर कार्यालय में हिंदी पुस्तकालय है. इन पुस्तकालयों को हिंदी पुस्तकों की आपूर्ति की जा सकती है. कार्यशाला में भाग लेने वाले सहभागियों अथवा परिपत्र के माध्यम से पुस्तकों की आपूर्ति की जा सकती है. आजकल पुस्तकों की कीमतें इतनी ज्यादा रखी जाती हैं कि डिस्काउंट देने के बाद भी अच्छी कमाई हो जाती है.’’

‘‘लेकिन चाचा, इस से हिंदी कार्यान्वयन को कितना लाभ मिलेगा?’’

‘‘हिंदी कार्यान्वयन को मारो गोली,’’ चाचा बोले, ‘‘तुम्हारी दुकान चलनी चाहिए. आज लगभग 60 साल का समय बीत गया हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिले हुए. किस को चिंता है राजभाषा कार्यान्वयन की? जो कुछ भी हिंदी का प्रयोग बढ़ रहा है वह हिंदी सिनेमा व टेलीविजन की देन है.

‘‘उच्चाधिकारी भी इस दिशा में कहां ईमानदार हैं. जब संसदीय राजभाषा समिति का निरीक्षण होना होता है तब निरीक्षण तक जरूर ये निष्ठा दिखाते हैं, पर उस के बाद फिर वही ढाक के तीन पात. यह राजकाज है, ऐसे ही चलता रहेगा पर तुम्हें इस में मगजमारी करने की क्या जरूरत? अगर और भी 100 साल लगते हैं तो लगने दो. तुम्हारा ध्यान तो अपनी दुकानदारी की ओर होना चाहिए.’’

‘‘अच्छा तो चाचा, अब मैं चलता हूं,’’ मैं बोला, ‘‘आप से बहुत कुछ जानकारी मिली. मुझे उम्मीद है कि आप के अनुभवों का लाभ मैं उठा पाऊंगा. इतनी सारी जानकारियों के लिए बहुतबहुत धन्यवाद.’’

चंदू चाचा के घर से मैं निकल पड़ा. रास्ते में तरहतरह के विचार मन को उद्वेलित कर रहे थे. हिंदी की स्थिति पर तरस आ रहा था. सोच रहा था और कितने दिन लगेंगे हिंदी को अपनी प्रतिष्ठा व पद हासिल करने में? कितना भला होगा हिंदी का इस प्रकार की दुकानदारी से?

Hindi Story: सही फैसला

मिन्नी कम उम्र की एक शहीद की विधवा थी और बच्ची की मां भी. इधर मेहुल भी पत्नी की मौत के बाद अपने बच्चों को अकेले पाल रहा था. फिर होली आई और गलती से मेहुल ने मिन्नी को रंग लगा दिया. आगे क्या हुआ? मिन्नी का पूरा नाम मीनाक्षी था. मेहुल जबजब दिव्या के घर जाता था, मिन्नी दिखाई पड़ जाती थी. उस को शुरूशुरू में मिन्नी को ले कर उत्सुकता थी, लेकिन दिव्या भाभी से मिन्नी की दुखी जिंदगी के बारे में जो कहानी सुनी थी, उस से उस को सारी बातें पता चली थीं. मिन्नी दिव्या के बड़े ताऊ की एकलौती बेटी थी. मांबाप बहुत पहले ही मर गए थे, लिहाजा उस का लालनपालन दिव्या के घर में ही हुआ था. उस के पिता 2 भाई थे. बहुत सारी जमीन थी. घर में मनों अनाज होता था. रुपएपैसे की कोई कमी नहीं थी.
मांबाप के मरने के बाद मिन्नी की पढ़ाईलिखाई उस के चाचाजी ने एक पिता की तरह से ही की थी. उन्होंने मिन्नी को कभी किसी बात की कमी महसूस नहीं होने दी थी.

मिन्नी पढ़नेलिखने में भी होशियार थी. हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आती थी. बचपन बीतने के बाद और पढ़ाईलिखाई करने के बाद चाचाजी ने उस की शादी कर दी. शादी के तुरंत बाद ही मिन्नी के पति की मौत हो गई थी. सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए सचिन शहीद हो गया था. पति की मौत के बाद मिन्नी गांव के स्कूल में पढ़ाने लगी थी. वह अपने पैरों पर खड़ी औरत थी. आज के समय की औरत. चुनौतियों से लोहा लेने वाली. पढ़ीलिखी स्वाभिमानी औरत. जबजब मेहुल की नजर मिन्नी पर पड़ती तो वह बस देखता ही रह जाता. मेहुल पास में ही रहता था और दिव्या के घर में उस का आनाजाना था. मिन्नी का गोरा चेहरा, पतली लंबी नाक, भरा हुआ बदन. कोई चाहता भी तो मिन्नी को देख कर नजरअंदाज नहीं कर सकता था, फिर तो मेहुल आदमी था. वह 77 साल का था. उस की पत्नी हेमा जिस की उम्र जब महज 25 साल थी. दूसरे बच्चे को जन्म देते समय चल बसी थी. इस का दुख मेहुल को हमेशा दिल में सालता रहता था.

लेकिन? इधर मिन्नी के में जैसी आवाज ही नहीं थी. सचिन की मौत से उस को सदमा सा लगा था. वह हंसना जैसे भूल गई थी. गोद में एक बच्ची थी. उस का दुख और उस के भविष्य के बारे में सोचती तो दिल में जैसे नश्तर से चुभते थे. मिन्नी की शादी भी 24 साल की उम्र में हो गई थी. शादी के महज सालभर बाद ही सचिन की मौत हो गई थी. मिन्नी की कहानी वह दिव्या भाभी के मुंह से सुन चुका था. बेचारी मिन्नी ने इतनी कम उम्र में विधवा होने का दर्द ?ोला था. एक कली जो ठीक से फूल भी नहीं बन सकी थी, मुर?ाई हुई सी रहने लगी थी. ऐसा जबतब बतियाते हुए दिव्या भाभी की रुलाई फूट पड़ती थी. इस बार दिव्या के पति संतोष उसे लिवाने नहीं आए थे. दुकान के काम से सूरत चले गए थे. होली सिर पर थी. मेहुल का अब इस दुनिया में 2 बच्चों के सिवा कोई नहीं था. घर पर दोनों भाभियों और मां के भरोसे उस ने बच्चों को छोड़ रखा था और दिव्या भाभी को लिवाने बनारस चला आया था.

दिव्या भाभी बतातीं कि दुनिया में कोई किसी का नहीं होता है. जब मिन्नी के पति की मौत हो गई तो ससुराल वालों ने मिन्नी को बहुत बुराभला कहा. यहां तक कि मनहूस तक कह दिया. उस को घर से निकाल दिया. दिव्या भाभी के मांबाप  और भाई सब लोग समझते रहे. इस में मिन्नी की क्या गलती है भला. लेकिन वे मिन्नी को घर से निकाल कर ही माने. मायके में चाचा चाची और भाई तो हालांकि कुछ कहते, लेकिन भाभियों को वह फूटी आंख नहीं सुहाती थी. यही वजह थी कि मिन्नी घर में सब से किनारे के कमरे में रहती थी. वह मुफ्त में खाना नहीं खाती थी, बदले में घर बरतन कर देती थी, कपड़े धो देती थी, ताकि उस को कोई मुफ्तखोर कहे. लेकिन इतना करने के बाद भी कोई किसी का मुंह थोड़े ही पकड़ सकता है. जिस के जो मन में आता, वही कह देता. मेहुल यह सब सुन कर दुखी हो जाता था. अगले दिन होली थी. मेहुल मन बना कर आया था कि वह इस बार दिव्या के साथ जम कर होली खेलेगा. बैठक में पकवान बन रहे थे. मेहुल बाहर गया तो चौपाल पर महफिल सजी थी. मेहुल भी बैठ गया. खूब भांग पी.

दोपहर हो गई. मेहुल को भूख लग गई थी. वह वापस घर गया तो देखा कि दिव्या अपनी भाभियों के साथ होली खेल रही थीइसी बीच मेहुल ने दिव्या से कहा, ‘‘भाभी कुछ नमकीन ले कर आओ.’’ दिव्या ने नहीं सुना, लेकिन मिन्नी बाहर ही बैठी थी. वह प्लेट में नमकीन लाने चली गई. इधर मेहुल कमरे में जा कर हथेली पर रंग मलने लगा. सामने ही रंगों से भरा हुआ ड्रम रखा था, जिस में घोला हुआ रंग पड़ा था.
इसी बीच मिन्नी कमरे में नमकीन देने मेहुल के पास चली गई. मेहुल को लगा शायद भाभी नमकीन ले कर आई है. मेहुल ने हथेली पर मला हुआ रंग मिन्नी के गालों पर मल दिया. धोखा दिव्या और मिन्नी के कपड़ों से हुआ था. दोनों ने एक ही रंग के कपड़े पहन रखे थे. तब तक दिव्या भी कमरे में गई थी. वह हंसते हुए बोली, ‘‘क्यों देवरजी, खा गए धोखा.’’ मेहुल बोला, ‘‘भाभी, आप दोनों ने एकजैसे कपड़े पहन रखे थे, इसलिए धोखा हो गया.’’

मिन्नी के चेहरे पर मिलेजुले भाव थे. एक तरफ खुश थी कि कई सालों के बाद किसी ने उस पर रंग डाला था और दुखी सामाजिक मर्यादा को ले कर थी कि भला समाज और लोग क्या कहेंगे. दिव्या ने छेड़ा, ‘‘अच्छा बच्चू, भाभी को छोड़ कर भाभी की बहन से होली खेली जा रही है.’’ ‘‘अभी आप की शिकायत दूर किए देता हूंरुकिए,’’ और हाथ में बचा हुआ गुलाल उस ने दिव्या के गालों पर मल दिया. मिन्नी ने भी ड्रम में पड़ा हुआ रंग मेहुल पर पिचकारी से दे मारा. इस तरह भाभी और मिन्नी के साथ वह बहुत देर तक रंग और गुलाल से होली खेलता रहा. शाम के समय लोग अबीर खेल रहे थे. बैठक में सब लोग बैठे हुए थे. मिन्नी ठंडाई ले कर आई. अचानक मेहुल के मुंह से निकला, ‘‘दिव्या भाभी, मैं एक बात कहना चाहता हूं. हेमा के मरने के बाद से मेरी जिंदगी तहसनहस हो गई है. मैं बच्चों की परवरिश ठीक से नहीं कर पा रहा हूं. घरबाहर दोनों जगह आखिर मैं कैसे संभालूंगा

जब तक मां हैं, चल रहा हैउस के बाद सोचता हूं, तो कलेजा मुंह को आने लगता है. मैं चाहता हूं कि मिन्नी से शादी कर लूं.’’ दिव्या के पिताजी को हैरानी हुई. वे बोले, ‘‘बेटा, मिन्नी हमारी बेटी है. लेकिन तुम्हें मैं अंधेरे में नहीं रखना चाहता. बेटा, मिन्नी विधवा है. उस को एक बेटी है, फिर भी तुम उस से शादी करना चाहते हो…’’ दिव्या बोली, ‘‘पिताजी, कई बार मेरे मन में भी यह खयालआया था, लेकिन देवरजी से कहते डरती थी. पता नहीं वे क्या सोचेंगे. लेकिन आज मैं ने होली खेलते हुए देख लिया कि मेहुल का मन कितना पवित्र है. ‘‘दरअसल, मैं ने और मिन्नी ने एक ही रंग के कपड़े पहन रखे थे. मेहुलजी को धोखा हो गया.  मिन्नी पर रंग डाल दिया था. तब से अपनी गलती का पछतावा करना चाह रहे हैं. ऐसा भला आदमी कहां मिलेगा. इन की भलमनसाहत है कि  मिन्नी से माफी मांगने लगे थे.
‘‘जब से यह घटना हुई है, ये आंख नहीं मिला पा रहे हैं.  खैर इन का रिश्ता बनता है, लेकिन अब ये मिन्नी से शादी करना चाहते हैं.’’

मेहुल बोला, ‘‘हां पिताजी, मिन्नी विधवा हो गई तो इस में भला उस की क्या गलती है. लोगों को उस को भला ताने देना का हक किस ने दे दिया है. यह तो गर्व की बात है कि वह एक शहीद की विधवा है, जिस ने देश के लिए अपनी जान की कुरबानी दी है, लेकिन लोग शहीद की विधवा से कैसा बरताव कर रहे हैं, देख लीजिए. ‘‘क्या किसी विधवा को समाज में जीने का हक नहीं है? क्या किसी विधवा को खुश रहने का हक नहीं है? अगर नहीं है तो मैं परवाह नहीं करता ऐसे समाज की, जिस की जड़ें खोखली हों. ‘‘इस के अलावा 3-3 बच्चों की जिम्मेदारियों के बारे में भी सोचिए. उन की परवरिश करने का भी तो सवाल है. आखिर ये बच्चे कैसे पलेंगे, इस के बारे में भी सोचिए जरा. इन तीनों बच्चों की जिंदगी में खुशियां लौट आएंगी.’’

‘‘ठीक है बेटा, जब तुम ने और दिव्या ने फैसला कर ही लिया है, तो इस से बड़ी खुशी की बात भला और क्या होगी. होली के बाद किसी दिन लगन रखवाता हूं,’’ मिन्नी के पिताजी बोले. आज मिन्नी के पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे. वह बहुत खुश थी. आज से कोई उस को मनहूस नहीं कहेगा. उस का भी कोई चाहने वाला होगा. उस का भी अब कोई अपना घर होगा. मिन्नी की मांग भरने वाली थी. उस की वीरान जिंदगी में बहार आने वाली थी. एक शहीद पिता की बच्ची को एक नए पिता मिल गए थे. आज आसमान में इंद्रधनुष निकला था. सात रंगों का चमकीला इंद्रधनुष.                  

Hindi Story: ममता की जीत

Hindi Story: 3 बच्चों की विधवा मां राधा की वीरान जिंदगी में विजय  बहार बन कर आए. दुनिया की परवाह करते हुए उन्होंने राधा से शादी की. राधा खुश हो गईं. पर क्या राधा की जिंदगी में वाकई बहार आई थी? विजय का असली मकसद क्या थागंगा के किनारे बसे छोटे से कसबे इटावा में, जहां नदियां पुरानी लोककथाएं गाती हैं और खेतों की हवा में सोने सी धूप नाचती है, एक घर था जो कभी खट्टीमीठी हंसी से गूंजता था. वह घर था राधा कालकड़ी की पुरानी दीवारें और छत पर चढ़ी जूही की लताएं, जो हर सुबह भीनी खुशबू देती थीं.


राधा एक साधारण, सांवली औरत थीं. उम्र 40 के करीब, लेकिन जीवन ने उन के चेहरे पर गहरी और कठोर झुर्रियां उकेर दी थीं. उन के पति हरि प्रसाद एक मेहनती और सिद्धांतवादी किसान थे, जो खेतों में दिनरात खटते, भविष्य के सपने बोते थे. 5 साल पहले, उन की जिंदगी एक झटके में थम गई. हरि प्रसाद की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हो गई. ट्रैक्टर पर बाजार जाते वक्त एक तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें कुचल दिया. इटावा के छोटे अस्पताल में डाक्टर केवल निराशा में सिर हिला सके.


हरि प्रसाद की मौत के बाद, राधा ने टूट कर भी हिम्मत बांधी. वे अपने 3 बच्चों… 2 बेटियां और एक बेटाके साथ अपने मायके लौट आई थीं. मायका कानपुर के बाहरी इलाके में बसा एक शांत, कृषिप्रधान गांव हरिपुरा, जहां राधा देवी की मां सरला और पिता रामलाल रहते थे. हरिपुरा हराभरा था. गेहूं की सुनहरी फसल हवा में लहराती थी और शाम को गायें अपने खुरों की आवाज के साथ घर लौटती थीं. राधा को लगा था कि इस ममता की छांव में उन्हें और बच्चों को शांति मिलेगी. बच्चे स्कूल जाएंगे और वे छोटेमोटे काम कर के घर चलाएंगी.


लेकिन विधवा होना, खासकर एक छोटे गांव में, आसान नहीं होता. गांव वाले इशारे करते. उन के कानाफूसी भरे शब्द तीर बन कर राधा के आत्मसम्मान को भेदते थे. गांव की औरतें इशारों में कहतीं, ‘‘अरे राधा, अब तो बड़ी बेटी को ब्याह दोवरना दुनिया की बातें सुनसुन कर जीना मुश्किल हो जाएगा. जवान विधवा का क्या भरोसा?’’ राधा चुपचाप सब सहतीं. उन के पास विरोध करने की शक्ति नहीं थी, केवल सहनशक्ति थी. बड़ा बेटा छोटू सिर्फ 10 साल का था, पर पिता की तरह खेतों में बड़ों के साथ मदद करता. बेटियां सीता (8 साल की) और गीता (6 साल की) डर कर मां की गोद में सिर छिपातीं.


राधा दिनभर घर संभालतीं. खेतों में काम करतीं. रात को बच्चों को पुरानी लोककथाएं सुनातीं और लोरी गातीं. लेकिन अंदर का खालीपन हर रात उन की नींद और मन की शांति चुरा लेता था. वे अकसर तकिए में मुंह छिपा कर रोती थीं. एक दिन गांव के मेले में राधा की नजर एक अजनबी पर पड़ी. उन का नाम विजय था, जो लखनऊ के बाहरी इलाके के रहने वाले थे और एक ठेकेदार थे. लंबा कद, गोरा रंग और उन की मुसकान इतनी भोली थी कि राधा का बेजान दिल भी एक पल के लिए धड़क उठा.


विजय मिट्टी के बरतनों के स्टौल पर खड़े थे. राधा ने वहां से रंगबिरंगा दीया खरीदा. विजय ने दीया लपक कर पैक किया और शरारती हंसी के साथ बोले, ‘‘दीया जला दो बहनजीलेकिन इस रोशनी में खुद को भी देखना, कहीं अंधेरा छिप जाए. जिंदगी में उजाला रखना जरूरी है.’’ राधा मुसकराईं. यह सालों बाद पहली बार था कि वे दिल से मुसकराई थीं. बात बन गई. विजय ने बताया कि वे विधुर हैं, उन की पत्नी लंबी बीमारी से चल बसीं और उन के कोई बच्चे नहीं हैं. विजय ने अपनी जादुई बातों का सिलसिला जारी रखा, ‘‘जीवन छोटा है बहनजीहंसते रहो, रोते रहोगे तो आंसू भी थक जाएंगे. हर दिन एक नया मौका होता है.’’


विजय की बातों की मिठास, उन की हमदर्दी और स्नेह राधा के तड़पते दिल को सालों बाद छू गया. वे उन्हें अपने जीवन में एक नई आशा जैसे लगे. धीरेधीरे विजय हरिपुरा आने लगे. वे बच्चों के लिए फल ले कर आते, छोटी बच्चियों के लिए खिलौने लाते. वे छोटू से खेती की बातें करते. राधा की मां सरला को शक हुआ. उन्होंने राधा को टोका, ‘‘बेटी, गांव में बातें हो रही हैं. यह बारबार क्यों आता है?’’ राधा ने अपनी मां सरला को समझाया, ‘‘मां, हमारी बस दोस्ती हैइस खाली दिल को थोड़ी सी गरमाहट मिलती है. वे बहुत नेक इनसान हैं.


लेकिन दोस्ती रुकती कहां है, जब दिल प्यार और सहारे के लिए तरस रहा हो. एक शाम तेज बारिश हो रही थी. घर सो चुका था. तभी अचानक विजय आए. विजय ने राधा का हाथ पकड़ा, उन की आंखों में देखा और गंभीर स्वर में कहा, ‘‘राधामैं तुम्हें इस अकेलेपन में तड़पते नहीं देख सकता. यह तुम्हारे लिए नहीं है. शादी कर लो मुझ सेमैं तुम्हारे बच्चों को अपना नाम दूंगा. मैं तुम्हें वह खुशी दूंगा जो सालों से खो गई है. तुम्हारी हर सांस में खुशबू भर दूंगा.’’


राधा का दिल पूरी ताकत से धड़का. वे डर और उत्साह के बीच फंसी थीं. विधवा हो कर दोबारा शादी, गांव क्या कहेगा, बच्चे क्या सोचेंगे. लेकिन विजय की आंखों में सच्चा वादा था. 6 महीने बाद, सामाजिक विरोधों के बावजूद, उन्होंने सादे विवाह में सात फेरे लिए. राधा की मां सरला ने आंसू भरी आंखों से आशीर्वाद दिया. सरला ने कहा, ‘‘बेटीखुश रहना. अपना जीवन फिर से शुरू कर.’’ शादी के बाद विजय का काम लखनऊ में था, जबकि राधा बच्चों की पढ़ाई और गांव की जमीन के कारण हरिपुरा में ही थीं. विजय हफ्ते में 2-3 बार आते.


शुरुआत में सब अच्छा था. प्यार, हंसी और भविष्य की योजनाएं. लेकिन जल्द ही असली रंग दिखने लगे. पहले प्यार, फिर झगड़े. विजय ने एक शाम गुस्से में भर कर कहा, ‘‘तेरे बच्चेमेरे गले की फांस बन गए हैं. मैं यहां आता हूं, तो मुझे आराम नहीं मिलता, बस उन की देखभाल करनी पड़ती है. मुझे आजादी चाहिए.’’ राधा का दिल टूट कर बिखर गया. उन की आंखें अचानक नम हो गईं. उन्होंने हिम्मत बांध कर कहा, ‘‘विजयजीये मेरे कलेजे के टुकड़े हैं, निर्दोष हैं. आप ने शादी से पहले वादा किया था.


एक रात झगड़ा सीमा लांघ गया. विजय ने हिंसा का सहारा लिया और हाथ उठाया. राधा का गाल लाल हो गया. अंदर असहनीय दर्द की लहर दौड़ गई, लेकिन वे चुपचाप सह गईं. दूसरा रिश्ता भी टूटना नहीं चाहिए, इसी डर ने उन्हें जकड़ लिया. विजय का गुस्सा कम होने के बजाय बढ़ता गया. वे चिल्लाए, ‘‘मैं नया जीवन चाहता हूंएक नया परिवार. इन पुरानी जंजीरों से आजादी…’’ राधा हर तरह से विजय को मनाने की कोशिश करती रहीं. वे उन का मनपसंद खाना बनातीं, उन के कपड़े धोतीं, घर साफ रखतीं. लेकिन विजय शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से और दूर होते गए.


एक साल बाद, राधा गर्भवती हुईं. उन के दिल में खुशी की लहर दौड़ी. यह विजय का अपना बच्चा था.
राधा ने उम्मीद से भर कर कहा, ‘‘विजयजीहमारा बच्चा होगा, हमारा अपना. अब सब ठीक हो जाएगा.’’
विजय का चेहरा काला पड़ गया. उन की आंखें गुस्से से लाल थीं. वे चीखे, ‘‘क्या बकवास है यह?
मैं नहीं चाहता यह बोझ. मेरे पास पहले से 3-3 बच्चे हैं. मुझे यह जिम्मेदारी नहीं चाहिए.’’ राधा का दिल धक से रह गया. आंसू छलक आए. उन्होंने डरते हुए, प्यार से कहा, ‘‘लेकिनयह हमारा है, हमारी खुशी की निशानी है.’’ विजय गुस्से में घर छोड़ कर चले गए और पूरे हफ्ते नहीं आए. जब लौटे तो धमकी भरे लहजे में बोले, ‘‘अगर यह बच्चा पैदा हुआ तोमैं तुम्हें और इन चारों बच्चों को छोड़ कर घर छोड़ दूंगा सब छोड़ दूंगा. मैं तुम्हें तलाक दूंगा.


राधा सिसकियां रोक नहीं पाईं. उन्होंने अकेले ही अपना गर्भ संभाला. मां सरला ने ममता और नैतिकता का सहारा दिया. सरला ने उसे दिलासा दिया, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा, बस हिम्मत मत हारना. तू अकेली नहीं है.’’ राधा रातें रोते काटतीं. विजय आतेजाते रहते, पर प्यार नहीं. वे मानसिक रूप से राधा को तंग
करते रहे. विजय ने दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए कहा, ‘‘मैं बाहर देख रहा हूंएक लड़की हैयुवा, बिना किसी बोझ की. मैं उस के साथ शादी करूंगा.’’ राधा चुप रहीं. उन का दिल हर पल चुभता. गर्भ के महीने कटे, पेट बढ़ा, और दर्द भी. गांव वालीं ताने मारतीं.


गांव की औरतें कहतीं, ‘‘राधा, संभल करविधवा हो कर दोबारा शादी, अब यह सब. इस नए बच्चे का क्या होगा? क्या पता क्या होगा आगे.’’ राधा मुसकरातीं, अंदर ही अंदर जलतीं और अपने आंसू पी जातीं. वे अपने अजन्मे बच्चे के लिए मजबूत बनी रहीं. 20 अक्तूबर की सुबह तेज प्रसव पीड़ा हुई. मां सरला ने पुरानी दाई बुलाई. घर में अचानक हलचल मच गई. छोटू अपनी मां को तड़पते देख कर रोया.
दाई ने खुशी से कहा, ‘‘लड़का होगासेहतमंद, मजबूत.’’ दोपहर को सेहतमंद बेटा जनमा. राधा ने उसे गोद में लिया. असीम खुशी के आंसू लुढ़क आए.


राधा ने फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘मेरा बेटातू मेरा सहारा है, मेरी जिंदगी. तेरा नाम छोटे हरि होगा.’’
नाम रखा गया छोटे हरि. विजय शाम को आए, पर उन का चेहरा उदासी और असंतोष से भरा था.
विजय ने ठंडे स्वर में कहा, ‘‘अच्छा हैलेकिन अब क्या होगा? अब जिम्मेदारी और बढ़ गई.’’
राधा ने टूटे दिल से उम्मीद जताते हुए कहा, ‘‘परिवार पूरा हो गयाअब सब ठीक हो जाएगा. खुश हो जाओ हमारे लिए.’’ विजय की हंसी कड़वी निकली. वे बोले, ‘‘खुश? यह बोझ और बढ़ गयामेरे सपनों पर, मेरे भविष्य पर.

मैं इस सब को नहीं सहूंगा.’’ राधा का सीना दुखा. विजय उसी रात गुस्से में चले गए. अगली सुबह विजय लौटे. उन के हाथ में एक थैला था. राधा बच्चे को दूध पिला रही थीं. विजय ने बच्चे को देखा और तुरंत घबराए हुए स्वर में कहा, ‘‘बच्चा कमजोर लग रहा हैबुखार है, गंभीर. इसे तुरंत डाक्टर के पास ले जाना है.’’ राधा घबरा गईं. उन का दिल जोरों से धड़कने लगा. वे बोलीं, ‘‘क्या हुआ? मैं भी चलूंगीअपने बेटे के साथ.’’ विजय ने झूठा बहाना बनाया, ‘‘नहींतुम थकी हो, आराम करो. कानपुर का बड़ा अस्पतालआईसीयू में रखना पड़ेगा. 2-4 दिन की बात हैचिंता मत करो.’’


राधा ने कांपते हाथों से बच्चा विजय को सौंपा. उन की आंखें डर और अविश्वास से भरी थीं.
राधा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘सावधान रहना जीयह मेरी जान है. इसे कुछ नहीं होना चाहिए.’’
विजय ने रूखेपन से कहा, ‘‘हांमैं हूं .’’ विजय बाइक पर चले गए. राधा खिड़की से उन्हें देखती रहीं. उन की बेचैनी बढ़ती गई. पहले दिन फोन आया. विजय ने कहा, ‘‘निमोनिया हैगंभीर. 2 दिन और लगेंगेडाक्टर कह रहे हैं.’’ राधा का कलेजा मुंह को आया. वे आंसू बहाती रहीं. उन्होंने दोबारा पूछा, ‘‘मैं जाऊंअपने बेटे के पास…’’


विजय का जवाब था, ‘‘नहींइंफैक्शन फैलेगा, तुम्हें भी हो जाएगा. तुम घर पर इंतजार करो.’’
दूसरे दिन फोन आया. विजय बोले, ‘‘अब ठीक हैलेकिन औब्जर्वेशन में रखा है.’’
राधा रातदिन रोतीं. सरला ने सांत्वना दी, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा. खुद पर भरोसा रखो.
तीसरा दिन फोन नहीं आया. राधा ने फोन किया, नंबर बंद रहा. उन का दिल बैठता गया.
चौथे दिन विजय घर आए. उन का चेहरा पीला पड़ा था, लेकिन वे शांत दिख रहे थे.
विजय ने कहा, ‘‘बच्चाअब ठीक है. अस्पताल में ही छोड़ा हैकल ले आएंगे. उस की हालत अब सुधर
गई है.’’


राधा गले लगीं, खुशी के आंसू छलके, ‘‘धन्यवाद जीमेरी जान बचाई आप ने.’’ लेकिन विजय की आंखें झूठी लगीं. वे डर और छिपाव से भरी थीं. दिन बीतते गए, विजय के बहाने चलते रहे, ‘‘डाक्टर ने कहाएक हफ्ता और.’’ राधा का दूध सूख गया. उन की ममता उफनती रही. वे रोईं, ‘‘मेरा बेटा भूखा होगामां का दूध मांगेगा. मैं उसे कब देखूंगी?’’ गांव की औरतें कानाफूसी करतीं, ‘‘बच्चा कहां है राधा? इतने दिनों तक अस्पताल में क्यों?’’ राधा झूठा आत्मविश्वास दिखाती, ‘‘अस्पताल मेंठीक हो रहा है. जल्दी आएगा.’’
शक बढ़ता गया. एक रात राधा ने डर समाए पूछा, ‘‘सच बताओ जीमेरा बेटा ठीक है ? आप झूठ तो नहीं बोल रहे?’’


विजय चिल्लाए, ‘‘चुप रहोसब ठीक है, बस चुप. ज्यादा सवाल मत पूछो.’’ राधा कांप उठीं. सरला ने राधा को अलग बुलाया. सरला बोलीं, ‘‘बेटीकुछ गड़बड़ है, मेरा दिल कह रहा है. पता करोजल्दी.’’
29 अक्तूबर की शाम, भयानक हलचल मच गई. गांव का एक लड़का दौड़ादौड़ा आया. लड़का बोला, ‘‘मां जीतालाब के पास कुछ मिला है. किसी बच्चे की लाश…’’ हरिपुरा के बाहर 300 मीटर दूर एक सूखा तालाब था, जहां झाडि़यां उग आई थीं. गाय चराने वाले ने एक पौलीथिन में लिपटा हुआ कुछ देखा था. उस ने खोला. नवजात बच्चे का शव निकला. गांव वाले जमा हो गए.


कोई बोला, ‘‘ओह, कौन सा बच्चा है यह?’’ किसी ने पहचान लिया, ‘‘राधा का तो गायब है.’’ सरला तुरंत दौड़ीं, ‘‘बेटीतालाब चल, जल्दी.’’राधा गईं. उन के पैर लड़खड़ाए. भीड़ जमा थी. पौलीथिन खुली पड़ी थी. छोटा शरीर, नीला पड़ गया था. राधा चीखीं. उन की चीख से पूरी दुनिया थम गई. राधा आह भरते हुए बोलीं, ‘‘मेरा बेटामेरा छोटे हरि.’’ राधा दौड़ीं छू ने, लेकिन गांव वालों ने दर्द से रोका. कोई चाचा बोले, ‘‘नहीं राधापुलिस को बुलाओ. इसे छूना नहीं.’’ राधा सिसकती रहीं, ‘‘कौनकौन कर सकता है यह? मेरा मासूमकिस शैतान ने?’’


सरला ने राधा को गले लगाया, ‘‘बेटीसंभाल खुद को. तू अकेली नहीं है.’’ 112 पर फोन किया गया. पुलिस आई. इंस्पैक्टर राजेश सिंह. शव को कवर किया गया. राधा को थाने ले गए. थाने में राधा बैठी थीं. उन की आंखें सूजी थीं, दिल टूट चुका था. इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘‘क्या हुआ थासब बताओ. हमें सच जानना है.’’ राधा बयान देती रहीं. उन का गला रुंधता गया. राधा बोलीं, ‘‘साहबविजय ने किया, मेरे पति. वे नहीं चाहते थे बच्चाबोझ कहता था. उन्होंने मुझे झूठ कहा कि वह अस्पताल में है…’’ इंस्पैक्टर बोला, ‘‘तहरीर लिखाओसब लिखो. हम तुम्हें इंसाफ दिलाएंगे.’’ राधा ने कांपते हाथों से दस्तखत किए. पुलिस तलाश में निकली.


राधा घर लौटीं. छोटू ने पूछा, ‘‘मांभाई कहां है?’’ राधा ने टूटे स्वर में कहा, ‘‘नहीं रहा.’’ राधा रातभर जागीं, दर्द से करवटें बदलती रहीं. सुबह विजय पकड़े गए. कानपुर हाईवे पर भागते हुए. उन के खून लगे कपड़े मिले. वे टूट गए. विजय ने स्वीकार किया, ‘‘हांमैं ने मार डाला. वह रातभर रो रहा थामुझे बोझ लग रहा था. मैं ने राधा को झांसा दिया थाअब सब खत्म. मैं आजाद होना चाहता था.’’ पोस्टमार्टम हुआगला दबा कर हत्या निकली. कोर्ट चला. राधा गवाह बनीं. उन की आंखों में आग सुलगती रही. राधा ने कहा, ‘‘वह मेरा पति थालेकिन शैतान निकला. उस ने मेरी ममता को मारा.’’ विजय को सजा सुनाई गई. उम्रकैद. राहत मिली, पर दर्द नहीं गया.


राधा हरिपुरा में, अकेले बच्चों को पालती रहीं. वे तालाब जातीं, फूल चढ़ातीं, आंसू बहातीं. राधा बोलीं, ‘‘बेटामां के पास आया कर, सपनों में ही सही.’’ जीवन चला, लेकिन छाया रही. विधवा की, मां की, टूटे सपनों में जीती. सुबह सूरज उगता, गंगा बहती. राधा खेत जातीं, बच्चों को स्कूल भेजतीं. शाम को घर संभालतीं. रात को लोरी सुनातीं, छोटा सा कोना खाली रहता. छोटू बड़ा होता, बेटियां पढ़तीं. राधा मुसकरातीं, दर्द छिपातीं. गांव चुप, हमदर्दी देता. विजय जेल में था. वहां से चिट्ठी भेजता… ‘माफ कर दोअब पछता रहा हूं.’


राधा चिट्ठी फाड़ देतीं, ‘‘कभी नहींकभी नहीं.’’ सरला बूढ़ी हो गईं, रामलाल चल बसे. राधा ने सब संभाल लिया. छोटू ने कहा, ‘‘मांमैं डाक्टर बनूंगा, बच्चों को बचाऊंगा. कोई मासूम बच्चा नहीं मरेगा.’’
राधा की नम आंखें, गर्व से भर गईं, ‘‘हां, बेटाबिलकुल बनो, मेरे छोटे हरि की तरह.’’ राधा की बेटियां बोलीं, ‘मैं टीचरमैं पुलिस…’ राधा गले लगाई, खुशी के आंसू बहे, ‘‘सब बनोमेरे सपने बनो.’’ छोटू अब 20 साल का था. कानपुर मैडिकल कालेज में एमबीबीएस कर रहा था. छोटे हरि की मौत ने उसे इतना झकझोर दिया कि उस ने कसम खाई कि कोई मासूम नवजात उस की वजह से नहीं मरेगा.


छोटू रातदिन पढ़ता, गरीब बच्चों का मुफ्त इलाज करता. गांवदेहात के इलाकों में कैंप लगाता, मां की तरह दर्द समझता. उस का सपना था, हरिपुरा में छोटा क्लिनिक खोलेगाछोटे हरि की याद में.
सीता अब 18 की थी, कानपुर यूनिवर्सिटी में बीएड कर रही थी. वह गांव की लड़कियों को पढ़ाती, महिला समिति में सक्रिय थी. मां की तरह मजबूत, तानों से नहीं डरती. वह स्कूल टीचर बनेगी, जहां विधवाओं के बच्चों को मुफ्त तालीम देगी.


गीता 16 की थी, पुलिस की तैयारी कर रही थी. दौड़ती, जिम जाती, कानून की किताबें रटती. विजय की हैवानियत ने उसे सिखायाइंसाफ खुद लड़ कर लेना पड़ता है. वह इंस्पैक्टर बनेगी, हर राधा की आवाज बनेगी. तालाब साफ हुआ, राधा पौधे लगातीं, छोटे हरि की याद में. फूल खिलते गए. राधा बोलीं, ‘‘बेटा देखतेरी मां जी रही है, तेरे लिए.’’ झुर्रियां बढ़ीं, हिम्मत नहीं टूटी. गांव की औरतें सम्मान से देखतीं.
बारिश की शाम, छत पर खड़ीं. याद आईविजय की पहली बारिश. सपना रह गया. अंदर गईं, लोरी सुनाई, सो गईं. सपने में छोटे हरि आया, मुसकराया, ‘‘मांमैं ठीक हूं, तुम मुसकराओ.’’ सुबह नम आंखें, मुसकान आई, उम्मीद जगी. हरिपुरा बदला. राधा महिला समिति में हौसला देतीं, ‘‘मजबूत रहोटूटना नहीं. बच्चों के लिएसब सहना.’’


सपने पूरे हुए. छोटू मैडिकल में टौप कर रहा था, सीता कालेज में गोल्ड मैडलिस्ट, गीता पुलिस भरती में सिलैक्ट. राधा गर्व करतीं, आंसू खुशी के. ‘‘मेरा छोटे हरितुम सब में जी रहा है. मेरे बच्चेमेरी दुनिया, मेरी ताकत.’’ समय बीता, राधा अब 70 पार कर चुकी थीं. बाल सफेद, कद झुका, लेकिन आंखों में वही चमक. छोटू ने हरिपुरा मेंछोटे हरि मैमोरियल क्लिनिकखोला. सीता नेराधा देवी विद्या मंदिरशुरू किया. गीता कानपुर में इंस्पैक्टर बनी. राधा अब गंगा को निहारतीं. तालाब अब बगीचा बन चुका था. गांव वालेराधा मांकहते. आखिरी सर्दी में, राधा बीमार पड़ीं. बिस्तर पर लेटीं, बच्चों ने घेरा. छोटे हरि सपने में आया, हाथ बढ़ाया.


हलकी आवाज में राधा बोलीं, ‘‘ रही हूं बेटा…’’ आंखें बंद हुईं, मुसकान बरकरार. राधा मां नहीं रहीं.
अंतिम संस्कार गंगा तट पर हुआ. तालाब पर पत्थर लगा, ‘राधा मां : मां, योद्धा, प्रेरणा’. 20 अक्तूबर कोराधा स्मृति दिवसमनाया जाता है. उस रात गंगा की लहरें ऊंची उठीं. हवा में लोरी गूंजी. राधा की आत्मा बच्चों में, फूलों में, गंगा में समा गई. दर्द खत्म हुआ, प्यार अमर हो गया. राधा मां चली गईं, लेकिन उन की कहानी हर मां के दिल में धड़कती रहेगीटूट कर भी टूटने की, खो कर भी जीतने की.                    Hindi Story

Hindi Story: 3 मौत और कोरियन चक्रव्यूह

Hindi Story: फरवरी महीना आते ही दिल्ली की सर्दी पर वैलेंटाइन डे की गरमी चढ़ने लगी थी. इस बार विजय और अनामिका ने सूरजकुंड मेला देखने का प्लान बनाया था. पर अचानक से अनामिका ने अपना मोबाइल फोन औफ कर दिया था. पहले तो विजय को लगा कि कोई खास वजह होगी, पर जब 2 दिन हो गए तो उसे थोड़ी चिंता हुई.


‘‘मम्मी, अनामिका मेरा फोन नहीं उठा रही है. क्या उस ने आप से कुछ कहा था?’’ विजय ने अपनी मम्मी
से पूछा. ‘‘नहीं तो. क्या हुआ?’’ मम्मी ने रसोई में सब्जी छोंकते हुए कहा. ‘‘ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है. वह अगर अपने घर मम्मीपापा से भी मिलने जाती है तो मु? बता देती है. फोन तो वह कभी औफ करती नहीं है,’’ विजय ने चिंता जताई.
‘‘तुम उस के घर क्यों नहीं चले जाते?’’ पापा ने विजय से कहा.
‘‘लेकिन पापा, मु? तो एक हफ्ते के लिए दिल्ली से बाहर जाना है. आज
1 तारीख है, मैं 7 तारीख तक वापस जाऊंगा,’’ विजय ने कहा.
‘‘पर तुम्हें एक बार उस का हालचाल ले लेना चाहिए,’’ मम्मी ने कहा.
‘‘मैं उसे फोन कर लूंगा,’’ विजय ने कहा और जयपुर चला गया.
विजय ने वहां से अनामिका को कई बार फोन किया, पर उस से बात
हो पाई. जैसे ही वह 7 तारीख को दिल्ली वापस आया तो सीधा अनामिका के घर गया.
घर पर कोई नहीं था, पर दरवाजे पर ताला भी नहीं लगा था. विजय ने कई बार डोरबैल बजाई, पर कोई दरवाजे पर नहीं आया.


लेकिन विजय का मन नहीं मान रहा था. उसे महसूस हो रहा था कि अनामिका घर पर ही है और उस के साथ कुछ सही नहीं हुआ है. वह एक खिड़की के रास्ते उस के घर में घुसने की कोशिश कर रहा था. बड़ी मुश्किल से वह घर में दाखिल हुआ. भीतर अंधेरा था. अनामिका के बैडरूम का दरवाजा भी बंद था. विजय ने खटखटाया, तो काफी देर के बाद अनामिका ने दरवाजा खोला, पर विजय को देखते है उस ने दरवाजा बंद करने की कोशिश की. विजय ने धक्का दे कर दरवाजा खोला और गुस्से में अनामिका से पूछा, ‘‘क्या हुआ है तुम्हें? तुम मेरे फोन का जवाब क्यों नहीं दे रही?’’


‘‘तुम से मतलबमु? अकेला छोड़ दो. मैं कुछ दिन किसी से बात नहीं करना चाहती,’’ अनामिका बोली.
‘‘पर तुम ऐसा क्यों कर रही हो? हुआ क्या है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘मु? कुछ नहीं हुआ है, बस मु? अकेले रहना है,’’ अनामिका बोली. ‘‘सब करो अपनी मरजी. मैं भी अपनी मरजी करता हूं और इस बालकनी से छलांग लगा देता हूं,’’ कह कर विजय अनामिका की बालकनी की रेलिंग पर चढ़ने लगा.
यह सुन कर अनामिका डर गई. उस ने विजय को कस कर पकड़ लिया और बोली, ‘‘तुम ऐसा सोच भी कैसे सकते होआज के बाद कभी ऐसा मत करना.’’
‘‘क्यों नहीं कर सकता ऐसागाजियाबाद में भी तो 3 लड़कियों ने खुदकुशी कर ली. सब जगह यही तो
हो रहा है. जरा सा मन उदास हुआ नहीं कि दे दो अपनी जान,’’ विजय झल्ला कर बोला.
‘‘गाजियाबाद में क्या हुआ है?


तुम वहां की क्यों बात कर रहे हो?’’ अनामिका ने हैरान हो कर पूछा.
विजय थोड़ा रुक गया. उस के चेहरे पर अभी भी परेशानी के भाव थे. एक ठंडी सांस ले कर उस ने बताया, ‘‘गाजियाबाद की भारत सिटी सोसाइटी में चेतन अपनी 2 पत्नियों और 5 बच्चों के साथ रहते थे. 4 फरवरी, 2026 की रात को उन की 15 साल की बड़ी बेटी निशिका, 14 साल की मं?ाली बेटी प्राची और 11 साल की छोटी बेटी पाखी ने अपने अपार्टमैंट की 9वीं मंजिल से कूद कर खुदकुशी कर ली थी.’’
‘‘यह तो बहुत बुरा हुआ. कहीं
यह किसी की साजिश तो नहीं थी?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘खबरों के मुताबिक, ट्रांस हिंडन जोन के डीसीपी निमिष पाटिल ने बताया कि पुलिस ने मौके की जगह पर सीन रिक्रिएट कर के यह परखा था कि कहीं बच्चियों को जबरन धक्का देने या नीचे फेंके जाने की संभावना तो नहीं थी.


‘‘जांच में सामने आया कि जिस स्लाइडिंग खिड़की से कूदने की बात सामने आई, वहां से एक समय में केवल एक शख्स ही बाहर निकल सकता था. इस से यह साफ हुआ कि तीनों बहनों ने बारीबारी से छलांग लगाई. हालांकि, यह साफ नहीं हो सका था कि सब से पहले किस बहन ने छलांग लगाई थी.’’
‘‘यह तो बहुत ही दर्दनाक हादसा है. पुलिस ने और क्या बताया?’’ अनामिका ने चिंता जताई.
‘‘डीसीपी निमिष पाटिल ने आगे बताया कि कमरे के अंदर संघर्ष या जबरदस्ती के कोई निशान नहीं मिले थे. कमरा अंदर से बंद था, जिसे पुलिस को तोड़ कर खोलना पड़ा. खिड़की के शीशे और पूजा घर से फिंगरप्रिंट लिए गए, जिन्हें फोरैंसिक जांच के लिए भेजा गया.


‘‘पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि कमरा काफी सलीके से सजाया गया था. फर्श पर परिवार के साथ लड़कियों की तसवीरें सजा कर रखी गई थीं. कमरे से एक डायरी और मोबाइल फोन अलग रखे हुए मिले थे. खिड़की तक पहुंचने के लिए प्लास्टिक के स्टूल का इस्तेमाल किया गया था.’’
‘‘उस डायरी में क्या लिखा था?’’ अनामिका ने जानना चाहा.
‘‘पुलिस के मुताबिक, डायरी में मिले सुसाइड नोट से लड़कियों के मानसिक तनाव की ?ालक मिली थी. नोट में लिखा था, ‘मार खाने से बेहतर मर जाना है’. डायरी में शादी को ले कर डर और तनाव का भी जिक्र था.


‘‘पुलिस का कहना था कि पिता द्वारा मोबाइल फोन छीने जाने और कोरियन ड्रामा देखने को ले कर हुए विवाद ने भी बच्चियों को गहरे मानसिक दबाव में डाल दिया था.’’
‘‘यह कोरियन ड्रामा क्या बला है?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘मैं ने बीबीसी की रिपोर्ट में पढ़ा था, जिस में डीसीपी निमिष पाटिल ने बताया था कि इस मामले की शुरुआती जांच में यह सम? आया कि फोन और कोरियाई संस्कृति के प्रति लड़कियों का जुनून इस घटना की मेन वजह हो सकती है.’’


‘‘कोरियाई संस्कृति का मतलब?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘पुलिस के मुताबिक वे तीनों लड़कियां कोरियाई संगीत, ड्रामा, हस्तियों, जापानी फिल्मों औरडोरेमोनके अलावाशिन चैनजैसे कार्टूनों
के साथसाथ औनलाइन गेम्स की
शौकीन थीं.
‘‘साथ ही वे कोरियाई कल्चर से इस हद तक प्रभावित थीं कि उन्होंने अपने नाम भी बदल लिए थे. लेकिनब्लू व्हेलजैसे टास्क देने से जुड़े गेम को
इस घटना की एकमात्र या मेन वजह नहीं माना जा सकता.


‘‘पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में बताया गया कि तीनों बच्चियों की मौत शरीर से ज्यादा खून निकलने और चोट से हुई. ऊंचाई से गिरने के चलते कई हड्डियां टूटी हुई थीं. ‘‘डीसीपी निमिष पाटिल ने आगे कहा कि सुसाइड नोट में एक लाइन मारपीट की थी, लेकिन पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में ऐसी कोई चोट नहीं मिली है. यह परिवार पैसे की तंगी की मार ?ोल रहा था और घर में मची कलह ने भी चीजें मुश्किल बना दी थीं.
‘‘कोविड के बाद परिवार को पैसे का भारी नुकसान उठाना पड़ा और
काफी कर्ज में गया. कुछ साल
पहले लड़कियों को परिवार ने स्कूल से निकाल लिया था.


‘‘परिवार में ?ागड़े भी होते थे. पिता बेटियों को ले कर बहुत कड़ाई बरतते थे. शुरू में इन बच्चियों के पास 2 मोबाइल थे, जिसे वे सा? करती थीं. लेकिन पैसे के दबाव के चलते पिता ने 6 महीने पहले एक मोबाइल को बेच दिया. फिर दूसरा मोबाइल घटना के 10-15 दिन पहले बेच दिया था.’’
‘‘क्या इस परिवार को पैसे की तंगी थी? इस मामले में आसपास के लोग क्या बोल रहे हैं?’’ अनामिका ने पूछा.


‘‘जब पैसे की तंगी के बारे में इन मारी गई लड़कियों के पिता चेतन कुमार से पत्रकारों ने सवाल पूछा, तो उन का कहना था, ‘‘मु? 20-30 लाख रुपए का नुकसान जरूर हुआ था, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि बच्चे खुदकुशी जैसा कदम उठा लें. बच्चों ने अपने नाम तक बदल लिए थे.
‘‘पुलिस ने बताया कि चेतन कुमार की 2 पत्नियां हैं, जो आपस में सगी बहनें हैं. घर में उन के साथ उन की एक साली भी रहती हैं. अपनी दोनों पत्नियों से उन के कुल 5 बच्चे हैं.
‘‘चेतन पेशे से स्टौक ब्रोकर हैं. उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि उन की बेटियां कहती थीं कि पापा हम कोरिया जाएंगी. उन्हें भारतीय नामों से चिढ़ होने लगी थी.


‘‘बीबीसी ने स्थानीय लोगों से इस घटना के बारे में बात की तो सोसाइटी में इन बच्चियों के घर से ठीक 2 फ्लोर नीचे रहने वाले आरके सिंघानिया की उस रात नींद एक धमाके की आवाज से टूटी. ‘‘आवाज सुनने के बाद सोसाइटी के लोग घर से बाहर आने लगे और देखा कि जमीन पर 3 बच्चियों के शव थे, जिस के बाद पुलिस को सूचना दी गई. ‘‘सोसाइटी के सचिव राहुल कुमार ? ने बीबीसी न्यूज हिंदी को बताया कि जब मैं प्राइमरी एविडैंस के तौर पर ऊपर गया, तो वह कमरा अंदर से बंद था. इसी कमरे से बच्चियों के कूदने की बात कही जा रही है. पुलिस ने उस दरवाजे को तोड़ा. अंदर फैमिली की तसवीरें पूरे फर्श पर बिखरी हुई थीं और कमरे में एक सुसाइड नोट भी मिला, जिस मेंसौरी पापालिखा हुआ था.’’
‘‘यह तो बहुत उल? हुआ मामला है. वहां तो दहशत का माहौल बन गया होगा?’’ अनामिका बोली.
‘‘इस घटना के बाद बच्चों के बीच फोन एडिक्शन को ले कर फिर चर्चाएं तेज हो गई हैं. उस सोसाइटी की रहने वाली कुसुम ने मीडिया को बताया कि हमारे बच्चे रात को सो नहीं पा रहे हैं. वे इतने डरे हुए हैं. मैं मानती हूं कि कम से कम मांबाप को पता होना चाहिए कि बच्चे फोन में क्या चला रहे हैं.


‘‘वैसे, डीसीपी निमिष पाटिल ने इस मामले में बताया कि बच्चियों के सुसाइड नोट में गेमिंग ऐप्स का भी जिक्र था, जो उन की दिमागी सेहत पर नैगेटिव असर डाल रहे थे.’’
‘‘कौन से गेमिंग ऐप्स?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘बताया जा रहा है कि ये गेम्सपौपी प्लेटाइम’, ‘ बेबी इन यैलो’, ‘ईविल नन’, ‘आइसक्रीम मैनहैं.’’
‘‘इन गेम्स में क्या है?’’ अनामिका ने हैरान हो कर पूछा.
‘‘पौपी प्लेटाइम एक डरावने माहौल का खेल है, जो बच्चों को एक सुनसान खिलौना फैक्टरी में ले जाता है, जहां अजीबोगरीब गुडि़या, अंधेरे कोने और अचानक डराने वाले सीन मौजूद होते हैं.
‘‘इस का किरदारहगी वगीभले ही टीनएजर्स को ध्यान में रख कर बनाया गया हो लेकिन माहिर मानते हैं कि यह कंटैंट बड़े बच्चों के लिए भी मानसिक रूप से भारी पड़ सकता है.
‘‘ बेबी इन यैलो नाम का यह गेम जितना मासूम लगता है, असल में उतना ही खौफनाक है. इस में खिलाड़ी एक ऐसे बच्चे की देखभाल करता है जिस के साथ धीरेधीरे अलौकिक घटनाएं जुड़ती जाती हैं.
‘‘मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों की देखभाल जैसे सामान्य विषय को हौरर से जोड़ना छोटे बच्चों के लिए भरम और डर पैदा कर सकता है.


‘‘ईवल नन गेम में खिलाड़ी को एक डरावने स्कूल में बंद कर दिया जाता है, जहां से एक खतरनाक नन से बच कर निकलना होता है, जबकि आइस स्क्रीम गेम में एक आइसक्रीम बेचने वाले विलेन की कहानी है, जो बच्चों का अपहरण करता है. भले ही इन गेम्स का ग्राफिक्स कार्टून जैसा हो लेकिन इन
के विषय डर, कैद और अपहरण संवेदनशील बच्चों में चिंता और डर को बढ़ा सकते हैं.’’
‘‘सरकार इस बारे में क्या कर रही है?’’ अनामिका ने पूछा.


‘‘पुलिस ने उत्तर प्रदेश सरकार से सिफारिश की है कि इन गेम्स पर तुरंत बैन लगाया जाए, साथ ही यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भी भेजा जाएगा. ‘‘घटना की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बबीता सिंह चौहान ने पीडि़त परिवार से मुलाकात की. उन्होंने जिलाधिकारियों को निर्देश देने की बात कही है कि स्कूलों को जमात 5 तक के बच्चों को मोबाइल फोन पर प्रोजैक्ट या असाइनमैंट भेजने से रोका जाए, ताकि बच्चों की मोबाइल लत को कम किया जा सके.’’ ‘‘कह तो तुम सही रहे हो. बच्चे क्या हम बड़े भी मोबाइल के फेर में फंसे हुए हैं. अगर थोड़ी देर के लिए भी मोबाइल देखें तो ऐसा लगता है कि कुछ छूट रहा है. हम लोग किताबों और पत्रिकाओं से दूर हो रहे हैं, जबकि उन्हें पढ़ने की आदत हमें डालनी होगी


‘‘सरकार को ऐसे गेम्स पर लगाम लगानी चाहिए, जो बच्चों को हिंसक बना रहे हैं, टास्क क्लियर करने के
नाम पर उन्हें बरगलाया जा रहा है,’’ अनामिका ने अपनी बात रखी. ‘‘और तुम ने भी मु? डरा दिया था. कोई इस तरह दुनिया से कटता है क्या, जो तुम पिछले इतने दिन से गायब सी हो गई थी,’’ विजय ने कहा.
‘‘सौरी विजय, हो सके तो मु? माफ कर देना. मेरी हरकत वाकई बचकाना थी. मैं आगे से ध्यान रखूंगी,’’ अनामिका ने इतना कहा और विजय के गले से लग गई.   Hindi Story                 
    

Hindi Story: समाधान

Hindi Story: ‘‘मैं ने पहचाना नहीं आप को,’’ असीम के मुंह से निकला.

‘‘अजी जनाब, पहचानोगे भी कैसे…खैर मेरा नाम रूपेश है, रूपेश मनकड़. मैं इंडियन बैंक में प्रबंधक हूं,’’ आगुंतक ने अपना परिचय देते हुए कहा.

‘‘आप से मिल कर बड़ी खुशी हुई. कहिए, आप की क्या सेवा करूं?’’ दरवाजे पर खड़ेखड़े ही असीम बोला.

‘‘यदि आप अंदर आने की अनुमति दें तो विस्तार से सभी बातें हो जाएंगी.’’

‘‘हांहां आइए, क्यों नहीं,’’ झेंपते हुए असीम बोला, ‘‘इस अशिष्टता के लिए माफ करें.’’

ड्राइंगरूम में आ कर वे दोनों सोफे पर आमनेसामने बैठ गए.

‘‘कहिए, क्या लेंगे, चाय या फिर कोई ठंडा पेय?’’

‘‘नहींनहीं, कुछ नहीं, बस आप का थोड़ा सा समय लूंगा.’’

‘‘कहिए.’’

‘‘कुछ दिन पहले आप के बड़े भाई साहब मिले थे. हम दोनों ही ‘सिकंदराबाद क्लब’ के सदस्य थे और कभीकभी साथसाथ गोल्फ भी खेल लेते…’’

‘‘अच्छा…यह तो बहुत ही अच्छी बात है कि आप से उन की मुलाकात हो जाती है वरना वह तो इतने व्यस्त रहते हैं कि हम से मिले महीनों हो जाते हैं,’’ असीम ने शिकायती लहजे में कहा.

‘‘डाक्टरों की जीवनशैली तो होती ही ऐसी है, पर सच मानिए उन्हें आप की बहुत चिंता रहती है. बातोंबातों में उन्होंने बताया कि 3 साल पहले आप की पत्नी का आकस्मिक निधन हो गया था. आप का 4 साल का एक बेटा भी है…’’

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‘‘जी हां, वह दिन मुझे आज भी याद है. मेरी पत्नी आभा का जन्मदिन था. टैंक चौराहे के पास सड़क पार करते समय पुलिस की जीप उसे टक्कर मारती निकल गई थी. मेरा पुत्र अनुनय उस की गोद में था. उसे भी हलकी सी खरोंचें आई थीं, पर आभा तो ऐसी गिरी कि फिर उठी ही नहीं…’’

‘‘मुझे बहुत दुख है, आप की पत्नी के असमय निधन का, पर मैं यहां किसी और ही कारण से आया हूं.’’

‘‘हांहां, कहिए न,’’ असीम अतीत को बिसारते बोला.

‘‘जी, बात यह है कि मेरी ममेरी बहन मीता ऐसी ही हालत में विवाह के ठीक 2 माह बाद अपना पति खो बैठी थी. मैं ने सोचा यदि आप दोनों एकदूसरे का हाथ थाम लें तो जीवन में पहले जैसी खुशियां पुन: लौट सकती हैं,’’ कह कर रूपेश तो चुप हो गया, मगर असीम को किंकर्तव्यविमूढ़ कर गया.

‘‘देखिए रूपेश बाबू, मैं ने तो दूसरे विवाह के संबंध में कभी कुछ सोचा ही नहीं. पहले भी कई प्रस्ताव आए पर मैं ने अस्वीकार कर दिए. मैं नहीं चाहता कि मेरे पुत्र पर सौतेली मां का साया पड़े,’’ कहते हुए असीम ने अपना मंतव्य स्पष्ट किया.

‘‘मैं अपनी बहन की तारीफ केवल इसलिए नहीं कर रहा हूं कि मैं उस का भाई हूं बल्कि इसलिए कि उस का स्वभाव इतना मोहक है कि वह परायों को भी अपना बना ले. फिर भी मैं आप पर कोई जोर नहीं डालना चाहता. आप दोनों एकदूसरे से मिल लीजिए, जानसमझ लीजिए. यदि आप दोनों को लगे कि आप एकदूसरे का दुखसुख बांट सकते हैं, तभी हम बात आगे बढ़ाएंगे,’’ कहते हुए रूपेश ने अपनी जेब से एक कागज निकाल कर असीम को थमा दिया, जिस में मीता का जीवनपरिचय था. मीता नव विज्ञान विद्यालय में भौतिकी की व्याख्याता थी.

फिर रूपेश एक प्याला चाय पी कर असीम से विदा लेते हुए बोला, ‘‘आप जब चाहें मुझ से फोन पर संपर्क कर सकते हैं,’’ कह कर वह चला गया.

इस मामले में ज्यादा सोचविचार के लिए असीम के पास समय नहीं था. उसे तैयार हो कर कार्यालय पहुंचना था, इस जल्दी में वह रूपेश और उस की बहन मीता की बात पूरी तरह भूल गया.

कार्यालय पहुंचते ही ‘नीलिमा’ उस के सामने पड़ गई. हालांकि वह उस से बच कर निकल जाना चाहता था.

‘‘कहिए महाशय, कहां रहते हैं आजकल? आज सुबह पूरे आधे घंटे तक बस स्टाप पर लाइन में खड़ी आप का इंतजार करती रही,’’ नीलिमा ने शिकायती लहजे में कहा.

‘‘यानी मुझ में और बस में कोई अंतर ही नहीं है…’’ कहते हुए असीम मुसकराया.

‘‘है, बहुत बड़ा अंतर है. बस तो फिर भी ठीक समय पर आ गई थी पर श्रीमान असीम नहीं पधारे थे.’’

‘‘बहुत नाराज हो? चलो, आज सारी नाराजगी दूर कर दूंगा. आज अच्छी सी एक फिल्म देखेंगे और रात का खाना भी अच्छे से एक रेस्तरां में…’’ असीम बोला.

‘‘नहीं, आज नहीं. इंदौर से मेरे मांपिताजी आए हुए हैं. 3 दिन तक यहीं रुकेंगे. उन के जाने के बाद ही मैं तुम्हारे साथ कहीं जा पाऊंगी.’’

‘‘अरे वाह, तुम तो अपने पति और सासससुर तक की परवा नहीं करतीं फिर मांपिताजी…’’ असीम ने व्यंग्य में कहा.

‘‘मांपिताजी की परवा करनी पड़ती है. तुम तो जानते ही हो कि देर से जाने पर सवालों की झड़ी लगा देंगे. परिवार के सम्मान और समाज की दुहाई देंगे. फिर 3 दिन की ही तो बात है, क्यों खिटपिट मोल लेना. पति और सासससुर भी कहतेसुनते रहते हैं, पर सदा साथ ही रहना है, लिहाजा, मैं चिंता नहीं करती,’’ कहती हुई नीलिमा हंसी.

‘‘पता नहीं, तुम्हारे तर्क तो बहुत ही विचित्र होते हैं. पर नीलू आज शाम की चाय साथ पिएंगे, तुम से जरूरी बात करनी है,’’ असीम बोला.

‘‘नहीं, तुम्हारे साथ चाय पी तो मेरी बस निकल जाएगी. दोपहर का भोजन साथ लेंगे. आज तुम्हारे लिए विशेष पकवान लाई हूं.’’

‘‘ठीक है, आशा करता हूं उस समय कोई मीटिंग न चल रही हो.’’

‘‘देर हो भी गई तो मैं इंतजार करूंगी,’’ कहती हुई नीलिमा अपने केबिन की ओर बढ़ गई.

कार्यालय की व्यस्तता में असीम भोजन की बात भूल ही गया था पर भोजनावकाश में दूसरों को जाते देख उसे नीलिमा की याद आई तो वह लपक कर कैंटीन में जा पहुंचा.

‘‘यह देखो, गुलाबजामुन और मलाईकोफ्ता…’’ नीलिमा अपना टिफिन खोलते हुए बोली.’’

‘‘मेरे मुंह में तो देख कर ही पानी आ रहा है. मैं तो आज केवल डबलरोटी और अचार लाया हूं. समय ही नहीं मिला,’’ असीम कोफ्ते के साथ रोटी खाते हुए बोला.

‘‘ऐसा क्या करते रहते हो जो अपने लिए कुछ बना कर भी नहीं ला सकते? सच कहूं, तुम्हें कैंटिन के भोजन की आदत पड़ गई है.’’

‘‘तुम जो ले आती हो रोजाना कुछ न कुछ…पर सुनो, आज बहुत ही अजीब बात हुई. एक अजनबी आ टपका. रूपेश नाम था उस का, उम्र में मुझ से 1-2 साल का अंतर होगा. कहने लगा, मेरे भाई डाक्टर उत्तम से उस का अच्छा परिचय है,’’ असीम ने बताया.

‘‘अरे, तो कह देते तुम्हें कार्यालय जाने को देर हो रही है.’’

‘‘बात इतनी ही नहीं थी नीलू, वह अपनी ममेरी बहन का विवाह प्रस्ताव लाया था. विवाह के कुछ माह बाद ही बेचारी के पति का निधन हो गया था.’’

‘‘तुम ने कहा नहीं कि दोबारा से ऐसा साहस न करें.’’

‘‘नहीं, मैं ने ऐसा कुछ नहीं कहा बल्कि मैं ने तो कह दिया कि विवाह प्रस्ताव पर विचार करूंगा.’’

‘‘देखो असीम, फिर से वही प्रकरण दोहराने से क्या फायदा है. मैं ने कहा था न कि तुम ने दूसरे विवाह की बात भी की तो मैं आत्महत्या कर लूंगी,’’ कहती हुई नीलिमा तैश में आ गई.

‘‘हां, याद है. पिछली बार तुम ने नींद की गोलियां भी खा ली थीं. मैं ने भी तुम से कहा था कि ऐसी हरकतें मुझे पसंद नहीं हैं. तुम्हारा पति है, बच्चे हैं भरापूरा परिवार है. हम मित्र हैं, इस का मतलब यह तो नहीं कि तुम इतनी स्वार्थी हो जाओ कि मेरा जीना ही मुश्किल कर दो…’’ कहते हुए असीम का स्वर इतना ऊंचा हो गया कि कैंटीन में मौजूद लोग उन्हीं को देखने लगे.

‘‘मैं सब के सामने तमाशा करना नहीं चाहती, पर तुम मेरे हो और मेरे ही रहोगे. यदि तुम ने किसी और से विवाह करने का साहस किया तो मुझ से बुरा कोई न होगा,’’ कहती हुई नीलिमा अपना टिफिन बंद कर के चली गई और असीम हक्काबक्का सा शून्य में ताकता बैठा रह गया.

‘‘क्या हुआ मित्र? आज तो नीलिमाजी बहुत गुस्से में थीं?’’ तभी कुछ दूर बैठा भोजन कर रहा उस का मित्र सोमेंद्र उस के सामने आ बैठा.

‘‘वही पुराना राग सोमेंद्र, मैं उस से अपना परिवार छोड़ कर विवाह करने को कहता हूं तो परिवार और समाज की दुहाई देने लगती है, पर मेरे विवाह की बात सुन कर बिफरी हुई शेरनी की तरह भड़क उठती है,’’ असीम दुखी स्वर में बोला.

‘‘बहुत ही विचित्र स्त्री है मित्र, पर तुम भी कम विचित्र नहीं हो,’’ सोमेंद्र गंभीर स्वर में बोला.

‘‘वह कैसे?’’ कहता हुआ असीम वहां से उठ कर अपने कक्ष की ओर जाने लगा.

‘‘उस के कारण तुम्हारी कितनी बदनामी हो रही है, क्या तुम नहीं जानते? अपने हर विवाह प्रस्ताव पर उस से चर्चा करना क्या जरूरी है? ऐसी दोस्ती जो जंजाल बन जाए, शत्रुता से भी ज्यादा घातक होती है…’’ सोमेंद्र ने समझाया.

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‘‘शायद तुम ठीक कह रहे हो, तुम ने तो मुझे कई बार समझाया भी पर मैं ही अपनी कमजोरी पर नियंत्रण नहीं कर पाया,’’ कहता हुआ असीम मन ही मन कुछ निर्णय ले अपने कार्य में व्यस्त हो गया.

उस के बाद घटनाचक्र इतनी तेजी से घूमा कि स्वयं असीम भी हक्काबक्का रह गया.

रूपेश ने न केवल उसे मीता से मिलवाया बल्कि उसे समझाबुझा कर विवाह के लिए तैयार भी कर लिया.

विवाह समारोह के दिन शहनाई के स्वरों के बीच जब असीम मित्रों व संबंधियों की बधाइयां स्वीकार कर रहा था, उसे रूपेश और नीलिमा आते दिखाई दिए. एक क्षण को तो वह सिहर उठा कि न जाने नीलिमा क्या तमाशा खड़ा कर दे.

‘‘असीम बाबू, इन से मिलिए यह है मेरी पत्नी नीलिमा. आप के ही कार्यालय में कार्य करती है. आप तो इन से अच्छी तरह परिचित होंगे ही, अलबत्ता मैं रूपेश नहीं सर्वेश हूं. मैं ने आप से थोड़ा झूठ बोला अवश्य था, पर अपने परिवार की सुखशांति बचाने के लिए. आशा है आप माफ कर देंगे,’’ रूपेश बोला.

‘‘कैसी बातें कर रहे हैं आप, माफी तो मुझे मांगनी चाहिए. आप की सुखी गृहस्थी में मेरे कारण ही तो भूचाल आया था,’’ असीम धीरे से बोला.

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‘‘आप व्यर्थ ही स्वयं को दोषी ठहरा रहे हैं, असीम बाबू. हमारे पारिवारिक जीवन में तो ऐसे अनगिनत भूचाल आते रहे हैं, पर अपनी संतान के भविष्य के लिए मैं ने हर भूचाल का डट कर सामना किया है. इस में आप का कोई दोष नहीं है. अपना ही सिक्का जब खोटा हो तो परखने वाले का क्या दोष?’’ कहते हुए सर्वेश ने बधाई दे कर अपना चेहरा घुमा लिया. असीम भी नहीं देख पाया था कि उस की आंखें डबडबा आई थीं. वह नीलिमा पर हकारत भरी नजर डाल कर अन्य मेहमानों के स्वागत में व्यस्त हो गया. Hindi Story

लेखक- शकुंतला शर्मा

Hindi Story: नारी की बारी

चौथी अटैची का नंबर आतेआते लीना का पारा उतर कर थोड़ा  नीचे आ गया था, सो उसे खोल कर उस में रखे अपने कपड़ों को निकाल कर उन्हें बेड पर फेंका और अलमारी खोल कर उस में रखे कपड़ों को अटैची में भरना शुरू कर दिया.

‘‘कहीं जा रही हो क्या?’’ होंठों पर शहद घोल कर मैं ने पूछा, ‘‘देखो, कल रात की बात को भूल जाओ. ज्यादा गुस्सा सेहत के लिए ठीक नहीं होता.’’

लीना ने गरदन को कुछ इस अंदाज में झटका जैसे मदारी के कहने पर बंदरिया मायके जाने को मना करती है.

‘‘अच्छा, यह बताओ, इस घर को छोड़ कर तुम कहां जाओगी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं नहीं…तुम जा रहे हो,’’ लीना जल कर बोली.

‘‘मैं जा रहा हूं, पर कहां?’’ मेरा मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘यह तुम जानो…मगर घर छोड़ कर अब तुम्हें जाना ही पड़ेगा.’’

‘‘यह क्या कह रही हो? मैं भला अपना घर छोड़ कर क्यों जाऊं?’’

‘‘क्योंकि अब एक छत के नीचे हम दोनों एकसाथ नहीं रह सकते,’’ लीना ने फैसला सुनाया.

बात मामूली सी थी. कल रात खाना खाते हुए मैं ने लीना को सब्जी में थोड़ा सा नमक डालने को कहा था. लीना टेलीविजन पर अपना पसंदीदा धारा- वाहिक देख रही थी. वह उस में इतना खोई हुई थी कि मुझे नमक के लिए कई बार कहना पड़ा. अपने मनोरंजन में विघ्न लीना को गवारा न हुआ. वह एक झटके में टेलीविजन के सामने से उठी, किचन में गई और नमकदानी ला कर उस का सारा नमक मेरी सब्जी व दाल की कटोरियों में उलट कर नमकदानी मेज पर पटक दी.

‘और भी जो कुछ मंगवाना है उस की सूची बोलते जाओ,’ लीना अपने कूल्हों पर हाथ रख तन कर खड़ी हो गई.

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‘अब यह दालसब्जी मेरे सिर पर डाल दो,’ मुझे भी गुस्सा आ गया था, ‘टेलीविजन पर आने वाले किसी भी धारावाहिक का एक भी दृश्य मिस होते ही तुम्हारा पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है.’

‘तुम्हें भी तो मुझे डिस्टर्ब करने में मजा आता है. जरा सा उठ कर रसोई से नमक उठा लाते तो क्या हाथपांव में मोच आ जाती या घिस कर छोटे हो जाते?’ लीना की आवाज ऊंची हो गई.

‘टीवी ही तो देख रही थीं न, कौन सा कशीदा काढ़ रही थीं,’ मैं भी उबल पड़ा, ‘दिन ढला नहीं और तुम्हारा टीवी चला नहीं.’

‘तुम को तो बस, मेरे टेली-विजन देखने से चिढ़ है. रातदिन टीवी का ताना देते रहते हो. जरा देर के लिए टीवी खोला नहीं कि तुम्हारे पेट  में मरोड़ होने लगती है,’ कह कर लीना एक झटके से मुड़ी और टीवी का स्विच आफ कर बेडरूम में घुस कर धड़ाम से दरवाजा बंद कर लिया.

अब शेरनी की मांद में जाने की हिम्मत भला मुझ में कहां. बेडरूम में सोने के बजाय ड्राइंगरूम के एक सोफे पर रात गुजारने में ही मैं ने अपनी भलाई समझी.

जब जरा आंख लगी तो बेडरूम में अटैचियों की उठापटक से आंख खुल गई. मैं उठा और लीना के पास जा पहुंचा.

‘‘बताओबताओ, भला मैं अपना घर छोड़ कर क्यों जाऊं?’’ मैं ने अपना सवाल दोहराया.

‘‘क्योंकि अब मैं और तुम एक टीवी के सामने…मेरा मतलब…एक छत के नीचे नहीं रह सकते,’’ लीना ने अटैची बंद करते हुए कहा, ‘‘यह अपनी अटैची उठाओ और यहां से चलते बनो.’’

‘‘भला आज तक किसी पति ने घर छोड़ा है जो मैं छोड़ कर जाऊं. घर से पत्नी ही जाती है…चाहे अपने मायके जाए या भाई के घर,’’ मैं ने लीना के लहजे की नकल उतारी.

‘‘वह जमाने लद गए जब पत्नियां घर छोड़ कर जाती थीं. आज के टीवी धारावाहिकों ने औरतों की आंखें खोल दी हैं. हमें पता चल गया है कि हमारे क्या अधिकार हैं. पति की तरह हम पत्नियों को भी अपनी मरजी से जिंदगी जीने का हक है. पति को घर से  बेदखल करने का हमें पूरा-पूरा हक है.’’

लीना के इस टीवी ज्ञान को देख कर कुछ सोच पाता कि उस की आवाज ‘कपड़े इस अटैची में रख दिए हैं,’ फिर से कानों में गूंजने लगी, ‘‘अपना टूथब्रश और शेविंग का सामान बाथरूम से उठा लो और फौरन यह घर खाली कर के चलते बनो वरना 10 मिनट बाद पुलिस आ कर तुम को घर से निकाल देगी.’’

‘‘अरे वाह, यह क्या जबरदस्ती है. मेरे ही घर से मुझे तुम कैसे निकाल सकती हो?’’ मैं ने तर्क रखा.

‘‘पति जब पत्नी को पहने हुए कपड़ों में घर से निकाल सकता है तो पत्नी उसे क्यों नहीं निकाल सकती? मैं तो तुम्हें कपड़ों से भरी अटैची दे रही हूं.’’

तभी बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई. साथ ही किसी ने बाहर का दरवाजा खटखटाया.

‘‘लो, पहुंच गई पुलिस,’’ लीना चहक उठी और आगे बढ़ कर दरवाजा खोला.

दरवाजे से लीना के भैया बलदेव और ताऊजी कमरे में दाखिल हुए. उन के पीछे मेरी माताजी भी थीं. सभी के चेहरों पर घबराहट छाई हुई थी.

‘‘तुम्हारे पड़ोसी गोपालजी ने मुझे फोन कर के बताया है कि कल रात से तुम दोनों के बीच कुछ खटपट चल रही है,’’ लीना के भैया बोले.

‘‘मुझ से रहा न गया. मैं मनोज की माताजी को भी साथ ले कर आया हूं,’’ ताऊजी ने उखड़े स्वर में कहा.

‘‘मनोज बेटे, क्या बात हुई? यह घर का सारा सामान कैसे बिखरा पड़ा है?’’ माताजी ने मेरी बांह हिलाई.

‘‘मम्मीजी, इन से क्या पूछती हैं, मैं बतलाती हूं. यह सदा के लिए घर छोड़ कर जा रहे हैं.’’

‘‘लड़के, तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया. घर में थोड़ाबहुत लड़ाईझगड़ा हुआ तो क्या तुम घर छोड़ कर भाग जाओगे?’’ मां ने मुझे लताड़ा.

‘‘मां, मैं घर छोड़ कर नहीं भाग रहा बल्कि लीना मुझे घर से निकाल रही है.’’

‘‘लीना तुम्हें घर से निकाल रही है?’’ तीनों ने सम्मिलित स्वर में पूछा.

‘‘लड़की, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?’’ ताऊजी गुर्राए.

‘‘मेरा दिमाग ठीक है,’’ लीना ने ढिठाई से कहा, ‘‘आप जैसे बूढ़ों ने ही हम लड़कियों की ब्रेन वाश्ंिग कर रखी थी कि ससुराल में लड़की की डोली जाती है और वहां से उस की अरथी निकलती है. आज इस का जादू टूट चुका है.’’

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‘‘क्या अनापशनाप बके जा रही है,’’ भैया बलदेव का स्वर क्रोध से कांप रहा था, ‘‘न लाज न शरम जो मुंह में आता है बोले जा रही है. बस, अब यह ड्रामा खत्म करो.’’

‘‘भैया, अब तो ऐसे ड्रामे हर उस पति के घर में होंगे जो बीवी को पैर की जूती समझते हैं. हम नारियों की बुद्धि तो आप जैसे अपनों ने भ्रष्ट कर रखी थी,’’ लीना भैया पर बरसी, ‘‘भला हो इन टेलीविजन धारावाहिकों के निर्माताओं का, जिन्होंने अपने धारावाहिकों से हम नारियों की आंखें खोल दी हैं. हम औरतों को भी अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने का हक है.’’

‘‘ओ निर्लज्ज, कुछ शरम कर,’’ ताऊजी चिलाए, ‘‘क्यों खानदान की नाक कटवाने पर तुली है.’’

‘‘ताऊजी, आप को तो अपनी

इस बेटी पर गुमान होना चाहिए जो इतना बोल्ड कदम उठा कर पति के घर में तिलतिल कर मरती लड़कियों को एक राह दिखा रही है. पति को उसी के घर से किक आउट करने का मेरा यह कारनामा दुनिया के सामने जब आएगा तो सैकड़ोंहजारों मजलूम बहुआें की जिंदगी की धारा ही बदल जाएगी,’’ लीना ने गरदन अकड़ाई.

‘‘बसबस, अब एक भी शब्द और मुंह से निकाला तो…’’ ताऊजी गुस्से से कांपने लगे थे. मां बोलीं, ‘‘भाई साहब, आप हमारे घर के मामले में न बोलें. अपनी बेटी को मैं समझाती हूं,’’ फिर मां ममता भरे स्वर में लीना से बोलीं, ‘‘मेरी अच्छी बेटी, अगर मनोज से कुछ भूल हो गई है तो उस की तरफ से मैं तुम से माफी मांगती हूं… गुस्सा थूक दे मेरी समझदार बेटी… हमारे घर को बरबाद मत कर.’’

माताजी ने लीना के सिर पर प्यार से हाथ फेरना चाहा तो लीना बिदक कर दूर हट गई.

‘‘बसबस, रहने दीजिए. मुझे अच्छी तरह से पता चल गया है कि सासूजी लोग कितनी मीठी छुरी होती हैं. बहू लाख सोने की बन जाए पर सास को तो उस में खोट ही खोट नजर आता है,’’ लीना ने कड़वे स्वर में कहा, ‘‘आप की बहू आप के बेटे को घर से निकाल रही है तो कैसे आप के शब्दों से शहद टपक रहा है. अगर यही काम आप का बेटा करता तो आप उस की पीठ ठोंकतीं.’’

‘‘बसबस, बहुत हो चुका,’’ मां के इस अपमान से मेरा खून खौल उठा, ‘‘मैं घर छोड़ कर जा रहा हूं…और मैं अपना यह टेलीविजन भी अपने साथ ले कर जा रहा हूं,’’ मैं ने टेलीविजन से केबल का तार अलग करते हुए कहा, ‘‘न तो यह टेलीविजन तुम्हें दहेज में मिला है न स्त्री धन के तौर पर दिया गया है.’’

‘‘अरेअरे, यह क्या गजब ढा रहे हैं आप,’’ लीना ने जल्दी से टेलीविजन के ऊपर हाथ टिका दिया, ‘‘भला मैं इतनी जल्दी टीवी वाले प्रेमी का इंतजाम कैसे कर सकती हूं, मेरा मतलब नए टीवी का इंतजाम कैसे कर सकती हूं.’’

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‘‘तो?’’ मैं ने लीना के चेहरे पर आंखें गड़ा दीं.

‘‘जब तक टीवी का प्रबंध नहीं हो जाता, आप इस घर में मेरे साथ रह सकते हैं,’’ लीना ने प्यार भरी नजरों से मुझे देखा.

लेखक-लाज ठाकुर

Hindi Story: बबली की व्यथा… बब्बन की प्रेमकथा

अपने त्रिलोकीनाथ मामाजी परेशान हैं. उन से भी ज्यादा परेशान मामी त्रिदेवी हैं, जो अपनेआप को श्रीदेवी से कभी कम नहीं समझतीं. हां, तो मामामामी दोनों इसलिए परेशान हैं कि उन के भांजे की धर्मपत्नी बबली परेशान है और इस समय रात के 10 बजे उन के घर बिना भांजे को साथ लिए आ पहुंची है.

मामी की परेशानी बढ़ती जा रही है क्योंकि ‘बबली रात को यहीं रुकेगी’ का डर उन के बदन में कंपकंपी पैदा कर रहा है. वैसे मामामामी दोनों बबली और बब्बन से दो हाथ दूर रहने में ही अपनी सलामती समझते हैं पर आफत कभी फोन कर के तो आती नहीं.

मामी को आज तसल्ली इस बात की है कि हमेशा मामाजी के गले लग कर हंसने वाली बबली मामी के गले लग कर रो रही है.

रोती हुईर् बबली की तरफ देख कर मामाजी दहाड़े, ‘‘तो बब्बन की यह हिम्मत? अपनी सोने जैसी बीवी को छोड़ कर कोयले जैसी काम वाली का हाथ पकड़ता है?’’

‘‘हां मामाजी, सिर्फ हाथ ही नहीं पकड़ता बल्कि चोटी भी पकड़ता है और उसे पे्रमा कह कर बुलाता है. और भी बहुत कुछ कहता है…’’ कहतेकहते बबली रुक गई.

‘‘क्या कहता है वह भूतनीका?’’ मामी ने बब्बन के बहाने अपनी ननद को भी लपेटा. ननदभाभी के बीच होगी कोई पुरानी रंजिश.

‘‘देवी,’’ मामाजी बोले, ‘‘दीदी का इस में क्या दोष? बब्बन के घर तो होलीदीवाली के सिवा आती भी नहीं और हमारे घर आए तो 2-3 साल हो ही गए.’’

वह बहन के बारे में और कुछ कह डालें इस से पहले मामी फिर बोल उठीं, ‘‘अरे वाह, वह कितनी चटोरी हैं ये तो मैं ही जानती हूं. सारी कढ़ी चट कर जाती थीं और नाम मेरा आता था.’’

बबली उन दोनों के बीच कूदते हुए बोली, ‘‘वैसे माताजी तो अच्छी हैं पर मेरे से उन की सेवा नहीं होती है. उन की मरजी का खाना मैं पका नहीं सकती और बेचारी भूखी रह जाती हैं इसलिए जेठानी के घर रहती हैं. गलती मेरी ही है. काश, मैं उन के लिए बढि़या खाना पकाती कुछ नहीं तो कढ़ी ही अच्छी बना लेती तो वह मेरे यहां रहतीं और बब्बन की हिम्मत न पड़ती कि वह काम वाली की राहों में फूल बिछाएं और प्यार में पागल हो जाएं.’’

कल की ही बात है मामाजी, सुनिए, वे बाजार से फूल

खरीद कर लाए थे. सुबह दरवाजे

पर डालते हुए कहने लगे कि प्रेमा के आने का समय हो गया है उस की राहों में फूल बिछा रहा हूं. उस के बिना मेरे दिल को सुकून कहां? दुनिया चाहे इधर की उधर हो जाए…मैं उस का साथ नहीं छोडूंगा. मेरी सुबह, दोपहर और शाम उसी के साथ गुजरेगी. उस जानेमन के बगैर अब चैन कहां रे…’’

‘‘लेकिन बबली, बब्बन की सुबह, दोपहर और शाम उस कलूटी प्रेमवल्ली के साथ गुजरेगी यह बब्बन ने कह दिया लेकिन रात के लिए तो कुछ नहीं कहा,’’ मामी ने ऐसी शक्ल बनाते हुए कहा जैसे बहुत बड़ी ‘रिसर्च’ की हो.

‘‘देवी, तुम्हारा भी जवाब नहीं. मेरे साथ रह कर सोचनेसमझने की शक्ति तुम में भी आ गई, यह बहुत अच्छा हुआ,’’

‘‘अजी, सोचनेसमझने की शक्ति  यदि पहले आ गई होती तो आप से शादी कभी न करती,’’ मामी ने कहा और मामाजी चुप हो गए.

बबली ने बात का सिरा फिर पकड़ लिया और बोली, ‘‘रात अब तक तो मेरे साथ ही गुजर रही है पर कल का क्या पता,’’ कहते हुए बबली ने मामाजी के कंधे का सहारा लिया तो मामी ने फिर उसे अपनी तरफ खींचा.

समस्या वाकई गंभीर थी. आपस में लड़ाईझगड़ा करने का समय नहीं था. बबली और बब्बन की ओछी हरकतों से हमेशा मुसीबत  में फंसने वाले मामामामी आज बबली का साथ दे रहे

थे. कहीं बब्बन

ने बबली को तलाक दे दिया और प्रेमवल्ली के साथ घर

बसा लिया तो रिश्तेदारों में मामामामी की नाक कट जाने का डर था. सभी रिश्तेदार उन्हीं से जवाबतलब करेंगे कि इतना सबकुछ हुआ तो शहर में होते हुए भी आप क्या कर रहे थे?

हुआ यह था कि घर के कामों से जी चुराने वाली बबली ने घर की साफसफाई के साथ खाना बनाने, कपड़े धोने और बाजार से सब्जी आदि लाने के काम के लिए एक काम वाली का सहारा लिया था. उस का पति बब्बन काल सेंटर की नौकरी पर लग गया था. पैसे अच्छे मिल रहे थे. दिन भर वह घर पर ही रहता था. रात को ड्यूटी पर जाता था. बबली या तो किटी पार्टियों में या फिर महल्ले के भजनकीर्तनों में चली जाती थी. घर पर रहती तो टेलीविजन पर आने वाले धारावाहिकों में खोई रहती थी. बब्बन के लिए उस के पास समय ही कहां बचता था. अब दिन भर घर में रह कर बब्बन सोएगा भी कितना? वह चाहता था कि बबली उस के पास बैठे. दो मीठी बातें करे, बढि़या खाना खिलाए, चाय के साथ कभी पकौड़े तो कभी समोसे खिलाए, बाजार घूमने जाए…पर बबली इस में से कुछ भी करती नहीं थी और बब्बन को मन मार कर दिन गुजारना पड़ता था.

एक दिन बबली को लगा कि बब्बन अब पहले से खुश रहने लगा है. वह जब  भी रेडियो पर रोमांटिक गाने आते उन्हें आवाज तेज कर सुनने लगा है. बाजार खरीदारी भी करने जाने लगा है. उस की खुशी का कारण बबली को जल्दी ही पता चल गया. एक दिन बबली ने देखा कि वह बाजार से खरीदारी कर के आ रहा था और उस के स्कूटर के पीछे प्रेमवल्ली हाथ में सब्जी का थैला पकड़े बैठी हुई थी जो अब स्कूटर के रुकते नीचे उतर रही थी. यह दृश्य देखते ही बबली के तनमन में आग लग गई.

‘‘प्रेमवल्ली को स्कूटर पर बैठा कर बाजार क्यों गए?’’ घर में घुसते ही बबली ने सवाल किया.

‘‘पता है, प्रेमवल्ली सब्जीभाजी के बहाने बीच में से कितने पैसे मार लेती है? इसलिए उस को साथ ले कर खुद ही सब्जी लेने चला गया,’’ बब्बन के पास जवाब ‘रेडी’ था.

अब प्रेमवल्ली को घर जाने में देर हो जाती थी तो बब्बन स्कूटर पर बैठा कर उसे छोड़ने भी जाने लगा. बबली के पूछने पर कहता, ‘‘जमाना कितना खराब है. जवान लड़की को इस तरह रात में अकेले कैसे जाने दूं. आखिर हमारी भी तो कुछ जिम्मेदारी बनती है.’’

बबली ने एक दिन बहाने से प्रेमवल्ली को हटा कर दूसरी बूढ़ी काम वाली रख ली लेकिन 2 दिन काम कर के वह चली गई, क्योंकि प्रेमवल्ली ने उस से झगड़ा किया कि मेरा घर तू ने कैसे ले लिया. उस के बाद कोई काम वाली काम करने के लिए राजी नहीं हुई और हार कर बबली को दोबारा प्रेमवल्ली को ही तनख्वाह बढ़ा कर काम पर रखना पड़ा.

अब बब्बन को किसी बहाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. वह रसोई में खड़ा रह कर प्रेमवल्ली से कौफी बनवाता था और वहीं खड़ाखड़ा उस के साथ हंसीठठोली करता हुआ पीता था. खाना भी वहीं खड़ा हो कर अपनी पसंद का बनवाता था और बबली के सामने बैठ कर खाता हुआ उस की तारीफ के पुल बांधता था.

यह सब देखते हुए बबली का घर से निकलना कम हो गया. उधर टेलीविजन पर सीरियल चल रहा होता था पर बबली की आंख और कान घर में चल रहे धारावाहिक की ओर ही होते थे. धीरेधीरे बबली का ध्यान धारावाहिकों से इतना हट गया कि वह सास को बहू और बहू को सास समझ बैठी.

उस दिन तो हद हो गई. बब्बन के पीछे स्कूटर पर बैठी प्रेमवल्ली नीचे उतर रही थी कि ऊंची एड़ी की सैंडिल की वजह से संतुलन खो बैठी और गिरने ही वाली थी कि बब्बन ने उसे कंधे से पकड़ कर संभाल लिया. बबली पहले से ही आगबबूला थी. जब प्रेमवल्ली मटकती हुई घर में घुसी तो बबली चिल्लाई…

‘‘मेरी सैंडिल पहनने की तेरी हिम्मत कैसे हो गई?’’

‘‘अय्यो अम्मां, यह आप का सैंडिल नई है, ये तो बब्बनजी ने मुझ को खरीद के दिया. जा के कमरे में देख लें मैडम, आप का सैंडल वहीं पड़ा होगा.’’

‘‘रहने दे…रहने दे. ज्यादा बकवास मत कर. जा कर अपना काम कर,’’ बबली ने बात छोटी करनी चाही पर बब्बन तो अपने पूरे मूड में था. कहने लगा, ‘‘बबली, आज तो प्रेमा ने कमाल किया. 700 वाली सैंडिल सेल में इस ने 500 रुपए में खरीदी है.’’

‘‘क्या कहा? प्रेमा…अब काम वाली को ‘प्रेमा’ कहा जाने लगा. उसे सब्जी की खरीदारी के बहाने बाजार की सैर करानी शुरू कर दी आज 500 रुपए की मेरे जैसी सैंडिल ले कर दी और वह भी आप को साहब की जगह बब्बनजी कह रही है. यह सब क्या है?’’ बबली दहाड़ी. बब्बन ने बबली को कोई जवाब नहीं दिया और बाथरूम से हाथमुंह धो कर जो निकला तो सीधा रसोई में कौफी पीने चला गया. बबली आने वाले संकट को भांप कर कांप उठी.

उस दिन छुट्टी होने की वजह से बब्बन रात में घर पर ही था. बेडरूम में उस के साथ प्यार से पेश आती बबली उस के बालों को सहलाती हुई कहने लगी, ‘‘हम पहलेपहल प्रयाग में संगम पर मिले थे. कितनी भीड़ थी. कुंभ का मेला था पर दो दिलों का मिलन तो गंगायमुना की तरह हो कर ही रहा. क्यों न हम अपने पहले प्यार को याद करने प्रयाग चले जाएं.’’

‘‘प्रेमा से पूछना पड़ेगा. उस की अम्मां शायद मना कर दे,’’ बब्बन को इस समय भी प्रेमा याद आई.

‘‘यह कैसा मजाक मेरे साथ कर रहे हो?’’ बबली अपने गुस्से पर काबू रखते हुए बोली.

‘‘यह मजाक नहीं है बबलीजी. आप की कसम, मैं सचमुच ही प्रेमा से प्रेम करने लगा हूं. उस की बलखाती लंबी नागिन सी चोटी जब हाथ में लेता हूं तो लगता है इस से बढ़ कर कोई और सहारा क्या होगा? और उस के बालों में अटका फूलों का गजरा तो मुझे इस दुनिया से उठा कर उस दुनिया की सैर कराता है. मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि मैं अब तक उस के बगैर जिंदा कैसे रहा. आप के साथ जो प्यार हुआ था वह प्यार नहीं था बबलीजी, एक धोखा था, बेकार में हम उसे प्यार समझ बैठे. भूल जाइए वह सब और सो जाइए,’’ कहते हुए बब्बन सो गया.

आखिर में यह सोच कर कि गृहस्थी में लगी हुई आग को बुझाने का काम केवल मामाजी ही कर सकते हैं क्योंकि उन के पास हर समस्या का हल होता है,  सोच कर बबली उन की शरण में आ पहुंची थी. रात का समय था, बब्बन नाइट शिफ्ट में चला गया था. आधी रात तो बबली ने बब्बन की प्रेम कहानी सुनाने में ही निकाल दी. प्रेमवल्ली के साथ बब्बन के प्रेमप्रसंग को वह कभी आंखों में आंसू भर कर तो कभी गुस्से की लाली भर कर सुनाती रही. नींद के झोंके आ रहे थे फिर भी मामी जागने की जीतोड़ कोशिश करती रहीं क्योंकि मामाजी का भरोसा नहीं था वह कब बबली के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे अपनी गोदी में सुला दें. जब कहीं मामाजी ही सोने चले गए तब मामी बबली के साथ ड्राइंग रूम में ही सो गईं.

सुबह जब बब्बन घर लौटा और लटकते हुए ताले ने उस का स्वागत किया तो सोचने में ज्यादा समय खर्च किए बगैर वह सीधा मामाजी के यहां चला आया. उस का यहां ठंडा स्वागत हुआ. सुबह का समय था पर किसी ने चाय तक नहीं पूछी. बबली तो अभी तक सो रही थी. बब्बन ढीठ था सीधा रसोई में गया और 3 कप चाय बना लाया. मामामामी को चाय का एकएक कप पकड़ा कर वह खुद भी पीने बैठ गया, साथ में अखबार भी पढ़ने लगा.

‘‘क्यों आया बब्बन?’’ मामाजी ने चुप्पी तोड़ी.

‘‘बबली आ सकती है तो क्या मैं नहीं आ सकता?’’ बब्बन ने अखबार पलटते हुए जवाब दिया.

‘‘तो तू जानता है कि बबली यहां आई है,’’ मामी आड़ातिरछा मुंह बनाते हुए बोलीं.

‘‘आप से ज्यादा मैं बबली को जानता हूं,’’ बब्बन ने अखबार मामाजी को पकड़ाया.

इतने में बबली भी आ धमकी और मामाजी की कुरसी के डंडे पर बैठने लगी थी पर मामी ने पकड़ कर उसे दूसरी कुरसी पर बिठाया. थोड़ी देर खामोशी छाई रही.

‘‘बब्बन, तू अपनेआप को समझता क्या है?’’ मामाजी ने बब्बन की तरफ मोरचा खोला.

‘‘बब्बन ही समझता हूं मामाजी, कोई और नहीं,’’ बब्बन बबली की तरफ देख कर बोला.

‘‘उस कामवल्ली…क्या नाम…प्रेम- वल्ली को इतना मुंह क्यों लगाया है?’’ मामाजी सीधे मुद्दे पर आ गए.

‘‘क्या प्यार करना गुनाह है और आप को पता भी है कि वह मेरी कितनी देखभाल करती है, उस के हाथ का बना इडलीसांबर, करारा डोसा और आलू के परांठे मामाजी खा कर तो देखिए, आप भी उस से प्यार करने लगेंगे,’’ बब्बन ने कहा और उधर मामाजी के मुंह में पानी  आ गया.

‘‘बस कर भूतनीके…’’ मामी ने कहा तो इस बार मामाजी को अपनी बहन की याद नहीं आई. वह मन ही मन प्रेमवल्ली का रेखाचित्र बना रहे थे और उस में इडली का सफेद, सांबर का मटमैला और डोसे का सुनहरा रंग भर रहे थे. आलू के परांठे का बैकग्राउंड उन्हें मनोहारी लग रहा था.

मामाजी की मौन साधना को देख कर मामी आगे बढ़ीं…

‘‘बब्बन, तेरी अक्ल को क्या काठ मार गया? घर में सुंदर, शरीफ, खानदानी बीवी के होते हुए तेरी नजर काम वाली पर कैसे टिक गई नमूने? बेचारी बबली अच्छा हुआ कि यहां चली आई, नहीं तो तेरी इन हरकतों से वह आत्महत्या भी कर सकती थी.’’

‘‘आत्महत्या तो एक बार मामाजी भी करने चले थे…की तो नहीं,’’ बब्बन ने मामाजी पर कटाक्ष किया.

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‘‘बब्बन, तू अपनी हद से गुजर रहा है. मैं आत्महत्या करूं या न करूं, इस से तुझे क्या? तू अपने घर की सोच. घर फूंक कर तमाशा मत देख. माना कि प्रेमवल्ली अच्छा खाना बनाती है, घर साफसुथरा रखती है, बरतनचौका सबकुछ करती है पर उस की बराबरी पत्नी से तो नहीं हो सकती, फिर बबली तुझे कितना प्यार करती है,’’ मामाजी ने समझाने के अंदाज में बब्बन से कहा.

‘‘पत्नी के सिर्फ मन ही मन प्यार करने से या मैं तुम से प्यार करती हूं, कह देने से पेट तो नहीं भरता मामाजी, सुखी गृहस्थी के लिए और भी बहुत कुछ चाहिए होता है. घर का वातावरण आनंददायक होना चाहिए. घर व्यवस्थित होना चाहिए. पति काम पर से घर लौटे तो टीवी बंद कर के पति को चायनाश्ता पूछना चाहिए. कुछ अपनी बातें बतानी चाहिए, कुछ उस की पूछनी चाहिए. अगर अपने हाथ का बना कोई व्यंजन पति को पत्नी प्रेम से खिलाती है तो उसे भी लगता है कि घर में उस का चाहने वाला कोई है.

 

आप ने एक बार कहा था कि किसी के दिल तक पहुंचने का रास्ता पेट से हो कर गुजरता है. बस, प्रेमा उस रास्ते से मेरे दिल तक पहुंच चुकी है. अब बबली के लिए कोई गुंजाइश नहीं है,’’ बब्बन बोला और बबली ने माथा पीट लिया.

‘‘बबली, तू यहां आ कर बैठ. कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा,’’ मामाजी ने बबली को अपनी कुरसी के डंडे पर बिठाया. मामी तिलमिला कर रह गईं.

‘‘देख बब्बन, अगर बबली बढि़या खाना बना कर खिलाए, तेरे साथ गुटरगूं करे और घर में व्यवस्था पूरी तरह बनाए रखे तो क्या तू उस प्रेमवल्ली को दिल से बाहर निकाल सकता है?’’ मामाजी ने पूछा.

‘‘छोडि़ए मामाजी, इस के लिए थोड़े ही बबली राजी होगी?’’ बब्बन तिरछी नजरों से बबली की तरफ देख रहा था.

‘‘मैं तो सबकुछ करने के लिए तैयार हूं मामाजी, यह तो आप की इज्जत का सवाल है. कल को हमारी गृहस्थी धूलमिट्टी में मिल जाती है तो रिश्तेदारी में नाक तो आप ही की कटेगी. मैं ऐसा नहीं होने दूंगी. अच्छा खाना बनाना मुश्किल काम थोड़े ही है, जरा सा ध्यान देना पड़ेगा. मामाजी, आप की इज्जत की खातिर मैं वह सारे व्यंजन बना कर इन को खिलाऊंगी जो प्रेमवल्ली बनाती है. मामाजी सिर्फ…’’ बबली ने गिरने के बाद भी अपनी टांग ऊपर रखी.

‘‘तो काम वाली की कल से छुट्टी?’’ मामाजी ने बब्बन से पूछा.

‘‘उस बेचारी के पेट पर लात क्यों मारनी मामाजी, वह सफाई, बरतन करती रहे.’’ बब्बन ने इस आखिरी दृश्य में सच से परदा उठाते हुए कहा, ‘‘मैं सिर्फ बबली को डराने के लिए ही उस से प्यार करने का दिखावा कर रहा था ताकि वह अपनी जिम्मेदारी समझे.’’

बब्बन ने बबली की तरफ देख कर कहना शुरू किया, ‘‘मामाजी, प्रेमा को मैं सिर्फ महल्ले के नुक्कड़ तक ही स्कूटर पर बैठा कर ले जाता था और वहीं से वापस ले आता था. हां, 500 रुपए की सैंडिल जरूर खरीद कर दी जिस के 250 रुपए वह अपनी तनख्वाह से कटवाने को राजी हुई है, मैं ने न तो कभी उस की चोटी पकड़ी, न तो उस का गजरा सहलाया.

इस तरह बबली के ऊपर आए हुए संकट के बादल छंट गए. ऐसे में मामी और बब्बन ने पिकनिक पर जाने का कार्यक्रम बनाया. मामाजी के बच्चे अब तक कहीं दुबक कर बैठे तमाशा देख रहे थे, वे भी पिकनिक का नाम सुनते ही प्रकट हो गए. पर मामाजी को दाल में कुछ काला नजर आ रहा था. उन के मन में यह आशंका जोर पकड़ती गई कि इस नाटक का कलाकार भले ही बब्बन हो लेकिन लेखक कोई और ही है.

‘‘अभी आ रहा हूं,’’ कह कर मामाजी श्रीमती खोटे के घर आ धमके.

‘‘भाभीजी, सचसच बताइए क्या बब्बन कभी यहां आया था?’’ मामाजी श्रीमती खोटे को घूरते हुए बोले.

‘‘हां, पिछले माह जब आप सपरिवार पर्यटन पर गए हुए थे तब आप के घर पर ताला देख कर वह यहां आया था. बस 5-10 मिनट बैठा था…’’ श्रीमती खोटे मामाजी को बताने लगीं.

‘‘बसबस, मैं समझ गया. ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है कि वह कितनी देर बैठा था,’’ बड़बड़ाते हुए मामाजी चले गए. काफी गुस्से में लग रहे थे.

थोड़ी ही देर में मामाजी के घर का दरवाजा खुला और गरजदार आवाज गूंज उठी, ‘‘निकल जा मेरे घर से…नासपीटे.’’

 

‘‘पर मामाजी, आप के दरवाजे पर ताला देख कर मैं मिसेज खोटे के यहां पूछने गया था…’’

‘‘मैं कुछ सुनना नहीं चाहता. मेरे होते हुए मेरे पड़ोसियों से सलाह लेता है तू?’’ मामाजी बरस रहे थे.

‘‘आप भी तो वहीं से सलाह ले कर मुझे देते. इसलिए मैं सीधे चला गया,’’ बब्बन मिनमिनाया.

‘‘उलटा जवाब देता है, भूतनीके…’’ कह कर मामाजी रुक गए. शायद बहन की याद आ गई.

‘‘अजी, पहले पिकनिक हो आते हैं, बब्बन को तो बाद में भी घर से निकाल सकते हैं,’’ मामी बाहर निकलते हुए बोलीं.

‘‘ठीक है, पिकनिक के बाद तू सीधा अपने घर चला जाएगा,’’ मामाजी का आदेश था.

‘‘बबली भी तेरे साथ ही जाएगी, यहां नहीं आएगी समझे,’’ मामी को डर था शायद बबली वापस आ जाए.

 

डा. अरुणा कपूर

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