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Light-hearted Story: आयुर्वेदिक प्रेम – कैसा था प्रेम का इफैक्ट

Light-hearted Story-

प्रेम, प्यार, मुहब्बत के विषय में हमारी सोच थोड़ी अलग है. सस्ता, सरल और टिकाऊ प्रेम की अवधारणा में हमारी लाजवाब खोज आयुर्वेदिक प्रेम है. भ्रमित न हों, यहां हम चिकित्सा विज्ञान पर चर्चापरिचर्चा नहीं कर रहे हैं. विषय पर टिके रह कर हम प्रेम विषय पर आते हैं. ज्ञानीजन जानते हैं, प्रेम बहुत कठिन है, इस के साइड इफैक्ट्स प्रेमीप्रेमिका को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष रूप से घरपरिवार, आसपड़ोस, गलीमहल्ले, गांवबस्ती, शहर या यों कहें कि पूरे समाज को प्रभावित करते हैं, तो भी गलत नहीं होगा.

प्रत्यक्षतया 2 जीवों से जुड़े लेकिन उन के प्रेम को देख जलन, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, आन, बान, शान जैसे दूसरे अनिवार्य पहलू अन्य लोगों को भी इस में देरसवेर घसीट ही लेते हैं. ‘फटे में पैर न उलझाएं’ ऐसा भला कैसे संभव है? यदि पी नहीं पाए तो उसे लुढ़काने, फैलाने या बिखेर कर औचित्यहीन करना मानव स्वभाव है. सो, प्रेम 2 जीवों तक सीमित रह ही नहीं सकता. यह शाश्वत सत्य है. ‘इश्कमुश्क छिपाए नहीं छिपते,’ इस कहावत को इसीलिए बुजुर्ग गढ़ गए थे.

अब दोबारा आयुर्वेद कौन्सैप्ट पर लौटते हैं. सब जानते हैं कि भारतीय संस्कृति की विश्व को जो भी देन हैं उन में आयुर्वेद काफी महत्त्वपूर्ण है. हींग लगे न फिटकरी, रंग निकले चोखा, चमकदार बनाने का बेहतरीन नुसखा आयुर्वेद में छिपा है. प्रेम की पहली शर्त यही है कि यह सरलता से निबटे, ज्यादा खर्च या इतर प्रभाव पैदा न करे तो आयुर्वेद तकनीक बैस्ट रहेगी. यह हमारे अघोषित शोध का सुपरिणाम है.

आजकल चायनीज लव ज्यादा प्रचलित है जो सस्ता, सरल तो बहुत है, लेकिन टिकाऊपन के मामले में एकदम जीरो है. कब लव हो गया और कब उस की समाप्ति या खात्मा हुआ, कुछ पता ही नहीं चलता. न इति का पता, न आदि का. चायनीज लव कम उम्र के छोकरेछोकरी टाइप के जीवों में ज्यादा उपयोग के कारण उन्हें स्थायित्व से लेनादेना नहीं रहता. यूज ऐंड थ्रो संस्कृति के इस जज्बे को सच्चे प्रेम की श्रेणी में रखा भी नहीं जा सकता.

एलोपैथिक प्रेम भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. यह प्रेम खासतौर पर उस एज ग्रुप में ज्यादा लोकप्रिय है जो इंस्टैंट लव तो चाहते हैं, लेकिन उन में सब्र व धैर्य नाम की चीज नहीं है. चटपट प्रेमानुभूति और पूर्णतया फलदायी प्रक्रिया, इसलिए उन्हें एलोपैथी में प्रेम ज्यादा मुफीद रहता है. एलोपैथी की खासीयत ही यह है कि सबकुछ तुरतफुरत बिना रोग के लक्षणों की सही पहचान के एंटीबायोटिक्स के माध्यम से तुरंत आराम मिल जाता है. यही खूबी इस श्रेणी के प्रेम में भी पाई जाती है.

प्रेमीप्रेमिका को कुछ समय के लिए रिलीफ मिलने की शर्तिया गारंटी हो सकती है, लेकिन उस के साइड इफैक्ट्स का उन के पास कोई उपाय नहीं है. इस विधा के प्रेम के नजारे भी कड़वी टैबलेट्स, इंजैक्शन और औपरेशन जैसे हैं. खुद चीरफाड़ या पोस्टमौर्टम न करें तो प्रेम के दर्शक इस जिम्मेदारी को बिना समय गवांए निबटा देते हैं. जितनी स्पीड से लवेरिया फीवर चढ़ता है उसी तेजी से नीचे भी गिर जाता है. न नब्ज का पता न दिल की धड़कनों का. ऐसे गायब होता है जैसे गधे के सिर से सींग. हम इस तकनीक को कतई लाभप्रद नहीं मानते.

प्रेम में होम्योपैथी तकनीक भी बेकार है. यह स्वीट मगर स्लो तकनीक है. रक्त में शुगर की उपलब्धता पर रोग की पहचान और उपचार करती है, लेकिन इस का धीमा असर उपभोक्ता के मन में कोफ्त पैदा करता है. नौ दिन चले अढ़ाई कोस, किस शख्स में होगा इतना धैर्य? प्रेम जनून है तो जादू भी जो प्रेमाकुल के सिर चढ़ कर बोलता है. तो, इस शर्त पर यह तकनीक भी फिट नहीं बैठती. यह सच है कि होम्योपैथी भी साइड इफैक्ट से मुक्त है, लेकिन ऐसा सोना किस काम का जो समय पर अपनी चमक ही न दिखाए. इसी तरह यूनानी पैथी का हाल है. इस की कमी इस का कड़वापन है. रसायनों के घालमेल में लव कैमेस्ट्री का इंबैलेंस होना स्वाभाविक है.

आयुर्वेद तकनीक ही प्रेम के लिए सौ फीसदी मुफीद नजर आती है. धीमेधीमे ही सही लेकिन रोग के लक्षणों की पूर्णतया पहचान कर तदनुरूप प्रेमव्यवहार से परिपक्व प्रेम की संभावना बढ़ जाती है. ऐसे प्रेम का सब से बड़ा फायदा यह रहता है कि बात बनी तो ठीक, वरना प्रयुक्त जड़ीबूटियां शरीर को निरोगी और मजबूत बनाने के काम में तो आएंगी ही. ऋषिमुनियों की इस नायाब खोज का हम इस रूप में इस्तेमाल करें तो भारतीय संस्कृति के संरक्षण का प्रयास भी लगेहाथों पूरा हो सकता है.

आयुर्वेद में अधिकतर दवाएं शहद के साथ सेवन की जाती हैं. हनी के स्वीट यूज की इस से बढि़या सीख क्या होगी? वात, पित्त और कफ की आधारशिला पर टिका आयुर्वेद प्रेम तनमनधन के समस्त पहलुओं को सोचसमझ कर प्रेमदरिया में डूबने का संदेश देता है. शरीर की नब्ज, दिल और दिमाग की तंदुरुस्ती का खयाल रख कर प्रेम करना और उस से उत्पन्न प्रभावों को झेल लेना इस नायाब तकनीक में संभव है.

सो, भारतीय होने पर गर्व करें और यदि प्रेम कर रहे हैं या करने की तैयारी में हैं, तो इस बिंदु पर एक बार जरूर गौर फरमाएं. स्वदेशी तकनीक इतिहास रचती है, इतिहास स्वदेशी आंदोलनों से भरा पड़ा है. इसलिए, प्रेम के मामले में इसे जरूर अपनाएं, जनहित में रचित. Light-hearted Story

Hasya Vayngye : मैं मायके चली जाऊंगी

Hasya Vayngye. दफ्तर में ज्यादा काम की मार से हमारा कामकाजी दिमाग चरचराया हुआ था. शाम को हम घर को चले तो सोचा कि आज श्रीमतीजी के हाथों की गरमागरम चाय पी कर उन के साथ अपने गमों को साझा करेंगे.

उधर डोरबैल बजाने के बाद भी जब श्रीमतीजी ने दरवाजा नहीं खोला, तो हम ने गुस्से में आ कर दरवाजे को जोर से धकेल दिया. देखा तो वह खुला पड़ा था. सोचा कि श्रीमतीजी अंदर से बंद करना भूल गई होंगी. घर में घुसते ही हम ने इधरउधर नजर दौड़ाई. हमारी श्रीमतीजी हमें कहीं नजर नहीं आईं.

हम घबराए हुए सीधे बैडरूम में जा पहुंचे. वहां श्रीमतीजी अंधेरा किए बैड पर ऐसे फैली पड़ी थीं, जैसे किसी ने उन के कीमती जेवरों पर हाथ साफ कर दिए हों और अब उसी का गम मना रही हों.

हम ने जैसे ही कमरे की बत्ती जलाई, तो श्रीमतीजी ने गुस्से में मोटीमोटी लाललाल आंखें हमें दिखाईं, तो हम तुरंत समझ गए कि आज हमारी शामत आई है.

हम ने धीरे से श्रीमती से पूछा, ‘‘क्या तबीयत खराब है या मायके में कोई बीमार है?’’

वे गुस्से में फट पड़ीं, ‘‘खबरदार, जो मेरी या मेरे मायके वालों की तबीयत खराब होने की बात मुंह से निकाली.’’

श्रीमतीजी बालों को बांधते हुए बैडरूम से निकल कर ड्राइंगरूम में आ कर सोफे पर पसर गईं. हम भी अपने कपड़े बदल कर उन के पास आ कर बैठ गए. फिर उन के शब्दों के बाणों की बौछारें शुरू हो गईं, ‘‘शादी को अभी सालभर भी नहीं हुआ है और तुम ने मुझे इस फ्लैट की चारदीवारी में कैद कर दिया है. तुम न तो मुझे कभी फिल्म दिखाने ले जाते हो, न कहीं घुमाते हो और न ही किसी अच्छे से रैस्टोरैंट में खाना खिलाते हो.

‘‘आज तो तुम को मुझे कहीं न कहीं घुमाने ले जाना पड़ेगा और मेरे नाजनखरों को उठाना पड़ेगा, वरना मैं मायके चली जाऊंगी और फिर कभी वापस नहीं आऊंगी.’’

श्रीमतीजी के मायके जाने की धमकी ने हमारी आंखों को उन के पहलवान पिताजी कल्लू के साक्षात दर्शन करा दिए थे, जिन्होंने अपनी बेटी को विदा करते समय हमें चेतावनी दी थी कि अगर कभी हमारी बेटी यहां रोतीबिलखती आई, तो हम से बुरा कोई न होगा. बेटी राधिका को परेशान करने के एवज में तुम्हें हमारे बेटे भूरा से गांव के वार्षिक दंगल में लड़ना होगा.

भूरा की कदकाठी कुछ ऐसी ही थी कि हाथी भी सामने आ जाए, तो उस सांड़ को देख कर अपना रास्ता बदल ले.

हम ने तुरंत श्रीमतीजी के पैर पकड़ लिए और उन के नाजनखरों को उठाने को तैयार हो गए.

अगले दिन दफ्तर में श्रीमतीजी का फोन आया. वे बोलीं, ‘‘आज हमारा सलमान खान की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ देखने का मन कर रहा है. उस के बाद डिनर भी हम बाहर ही करेंगे.’’

सो, इंटरनैट के जरीए हम ने ‘बजरंगी भाईजान’ के 2 टिकट बुक करा दिए. शाम को जब हम घर पहुंचे, तो श्रीमतीजी दरवाजे पर तैयार खड़ी गुस्से से कलाई घड़ी की तरफ देख रही थीं. उधर गरमी के मारे हमारी हालत बुरी थी.

सकपकाते हुए हम धीरे से घर के अंदर घुसे. फिर फ्रिज से हम ने ठंडा पानी निकाला और 2-4 घूंट पानी गले में डाला, जल्दी से कपड़े बदले और श्रीमतीजी के साथ स्कूटर पर निकल पड़े.

मगर रास्ते में ही स्कूटर ने धोखा दे दिया. उधर श्रीमतीजी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. स्कूटर का पिछला पहिया पंक्चर हो गया.

हम ने श्रीमतीजी के तमतमाए चेहरे की तरफ देखा और फिर घड़ी में समय देखा, तो शाम के 7 बज चुके थे. एक घंटे का शो पहले ही निकल चुका था. जब तक हम पंक्चर लगवा कर सिनेमाघर तक पहुंचे, तब तक रात के 9 बज चुके थे. लोग सिनेमाघर से बाहर निकल रहे थे.

अब हमारा दिल डर के मारे बुरी तरह धड़क रहा था.

हम ने श्रीमतीजी को समझाया, ‘‘कल हम तुम्हें मौर्निंग शो में फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ दिखा लाएंगे. इस के एवज में हम कल ड्यूटी पर भी नहीं जाएंगे.’’

यह सुन कर श्रीमतीजी के चेहरे पर गुस्से की लकीरें थोड़ी कम होने लगी थीं. फिर वहीं पास ही के एक अच्छे से रैस्टोरैंट में श्रीमतीजी को ले गए. वहां हम दोनों ने लजीज खाने का लुत्फ उठाया. जब पैसे देने का समय आया, तो हमारी जेब से पर्स गायब था.

हम ने रैस्टोरैंट के मालिक को बहुत समझाया. आखिरकार हमें अपना स्कूटर उन के पास बतौर गिरवी छोड़ना पड़ा और पैदल ही घर जाना पड़ा.

अभी हमारी मुसीबत कम नहीं हुई थी, क्योंकि सुनसान सड़क पर चलती हुई हमारी श्रीमतीजी सोने के जेवरों से दमक रही थीं. जब हम ने उन्हें समझाया कि पल्लू से अपने गहनों को ढक लो, तो वे अकड़ते हुए बोलीं, ‘‘मैं कल्लू पहलवान की बेटी हूं. चोरउचक्कों से डर तुम जैसे शहरियों को लगता होगा. मैं एक धोबीपछाड़ दांव में अच्छेअच्छों को पटक दूंगी और अपनी हिफाजत मैं खुद कर लूंगी.’’

श्रीमतीजी की बहादुरी से हमारे हौसले भी बढ़ चुके थे कि तभी वही हो गया, जिस का हमें डर था. 2 लुटेरों ने हमें धरदबोचा. चाकूपिस्तौल देख हमारी हालत पतली हुई जा रही थी, तभी एक लुटेरा हमारी श्रीमतीजी के गहनों पर झपट पड़ा.

इस के बाद श्रीमतीजी ने उन दोनों की जो हालत बनाई, वह नजारा हम अपनी जिंदगी में कभी भूल नहीं सकते हैं.

कुछ ही देर में पुलिस की एक गाड़ी वहां आ पहुंची. उन दोनों इनामी बदमाशों को पकड़वाने के एवज में श्रीमतीजी को 50 हजार रुपए का चैक बतौर इनाम मिला.

हम ने उन रुपयों से एक सैकंडहैंड कार ले ली है. अब तो हम हर शाम श्रीमतीजी के साथ कार में घूमने जाते हैं. इस बात की उम्मीद करते हैं कि दोबारा किसी लुटेरे गैंग से हमारी श्रीमतीजी की भिड़ंत हो जाए और उसे पकड़वाने के एवज में इनाम के तौर पर फिर कोई चैक मिल जाए. Hasya Vayngye

Hindi Comedy : चक्कर 4 का – कहां से आया है ये चार का चक्कर

Hindi Comedy. सच पूछें, तो हमें आज तक नहीं पता चला कि यह ‘चार’ का चक्कर क्या है? जिधर जाओ चौक्का, बात ‘चार’ की. ‘चार’ से शुरू ‘चार’ पर खत्म.

दरअसल, हमारी अक्ल तो बहुत मोटी है या यों कहें कि हर वक्त घास चरने चली जाती है, इसलिए ‘चार’ दिन की जिंदगी का गहरा राज ‘चार’ दिन में कैसे समझें?

महंगाई ‘चारों’ खाने चित किए रहती है, इसलिए काजूबादामकिशमिश की बात तो छोडि़ए, आजकल तो आलूटमाटर खाने के भी लाले पड़े हैं. दालरोटी के लिए भी हमारी कलम को ‘चार’ गुना जद्दोजेहद करनी पड़ती है, ताकि शांति से जुगाड़ बैठता रहे, ‘चार’ पैसे कमाते रहें.

मुद्दे से न भटक कर दोबारा अपनी बात पर आते हैं. देश के हालात के फेर में पड़े, तो खो जाने का डर है.

हमारा लाख टके का सवाल ‘चार’ को ले कर है. आखिर क्या वजह है कि हर भारतीय ‘चार’ की ही बात करता है? हमें याद आता है कि अकसर हमारे पिताजी हमें समझाते हुए कहते थे, ‘बेटा, कभी कोई बुरा काम मत करना, वरना ‘चार’ लोग क्या कहेंगे.’

उस समय भी हम नादान थे, सो तुरंत निकल पड़ते थे कि आखिर वे ‘चार’ लोग कौन हैं, जो हर वक्त हम पर आंखें गड़ाए रहते हैं. न तो हम उस समय उन ‘चार’ की खोजखबर ले पाए और न ही आज तक उन के दर्शन मुमकिन हुए.

पिताजी कभी ऐसे भी डांटते थे, ‘चार’ किताबें क्या पढ़ लीं कि खुद को इतना बड़ा स्याना समझने लगे?’

हम हिसाब लगाते कि ‘चार’ किताबें तो दूसरीतीसरी जमात में ही पूरी हो गई थीं. अब तो तादाद 40 के पार पहुंच चुकी, फिर भी पिताजी ‘चार’ पर ही क्यों अटके रहते हैं?

‘चार’ पैसे कमाओगे तो पता चलेगा,’ यह बात कभी न कभी सब को सुननी पड़ी होगी. हमारे मन में तो स्कूलकालेज के दिनों से यह वाक्य समाया हुआ है. बात वहीं की वहीं, ढाक के तीन पात, ‘चार’ पैसे भला क्या हुआ?

कभी पिताजी ज्यादा गुस्सा हो जाते, तो कह बैठते, ‘आजकल ईमानदारी ‘चारचार’ आने में बिकती है…’

सच पूछें, तो हम उन के समझाने से समझे हों, ऐसा दावा आज भी नहीं कर सकते. वजह, कुछ काम की बात समझते, उस से पहले ही यह ‘चार’ का आंकड़ा सारा गुड़ गोबर कर देता.

‘चार’ लोगों में हमारी भी इज्जत है’ जैसा मन को भाने वाला वाक्य हमें थोड़ा संतोष तो देता है, पर गड़बड़ यह हो जाती है कि इज्जत केवल ‘चार’ लोगों में क्यों है, बाकी के लोगों में क्यों नहीं? और जिन ‘चार’ लोगों में है, वे मुए हैं कौन से? भरेपूरे महल्ले में केवल ‘चार’ लोग? जरूर कोई जादुईचमत्कारी लोग रहे होंगे.

हमारी दादी अकसर हमारी माताजी को झिड़कतीं, ‘‘चार’ लोग सुनेंगे, तो क्या सोचेंगे?’

गई भैंस पानी में. फिर से ‘चार’ लोग. ये कौन हैं, जो सिर्फ हमें ही नजर नहीं आते हैं? दुनिया के सब लोग उन से डरते हैं और हम उन के दर्शन तक नहीं कर पाते?

हमारी दादी का एक और पसंदीदा जुमला था, ‘‘चार’ दिनों की आई बहू के ऐसे नखरे…’ हम गिनती कर के हिसाब लगाते कि मां को ब्याह कर आए तो 20 साल हो गए हैं, फिर भी ‘चार’ दिन?

जरा बड़े हुए, तो ‘चार’ का चमत्कार और बड़ा होने लगा. हमारी बेरोजगारी, जो अकसर आवारागर्दी के रूप में दिखाई पड़ने लगी थी, हमारे पिताजी, फूफाजी, ताऊजी, चाचाजी को बड़ी खलती थी. सब एक सुर में नसीहतें बिखेरते, ‘‘चार’ दिन टिक कर बैठोगे, तो काम मिलेगा… समझे?’

लो कर लो बात. घर में बैठो तो आलसी, बाहर जाओ टिक कर बैठो.

अकसर हम ने अपनी माताजी को पिताजी से ऐसा भी कहते सुना, ‘वह आई और ‘चार’ बातें सुना कर चली गई.’

‘चार’ बातें? क्या मां ने डायरीपैन ले कर कुशल स्टैनो की तरह हमारी बूआजी की डांट को नोट किया था, जो गिनती में ‘चार’ ही ठहरी? कुछ समझ नहीं आया.

आज भी हमारी श्रीमतीजी हमें रोज उलाहना देती हैं, ‘एक मैं ही हूं, जो आप की ‘चार’ बातें सहन कर जाती हूं. कोई और होती, तो आप की अक्ल ठिकाने लगा देती?

हम सोचने लग जाते कि हमारी ‘चार’ बातें कौन सी हैं, जो श्रीमतीजी रोज सहन करती हैं? शादीशुदा जिंदगी का राज शायद ही कभी किसी को समझ आया हो, इसलिए हम क्या समझ पाए.

पत्नीजी के साथ कभी घूमने जाते हैं, तो हमारे मुंह से भी निकल जाता है, ‘‘‘चार’ कदम भी नहीं चला जाता क्या? बड़ी नाजुक हो, जो ‘चार’ मिनट में थक गईं?’

मतलब ‘चार’ की बीमारी में हम भी जकड़े हुए हैं.

देखिए, कैसा गजब है कि हम यह लेख लिख रहे हैं, तो टैलीविजन पर मधुर गीत दिखाईसुनाई पड़ रहा है, ‘‘चार’ बोतल वोदका, काम मेरा रोज का…’

लग गए न ‘चार’ चांद. अब आप ही बताइए कि हम ‘चार’ के चक्कर से कैसे पीछा छुड़ाएं?

Humor : थाईलैंड की यात्रा

Humor. अगर आप बूढ़े नहीं हैं तो बीचबीच में थाईलैंड जाते रहिए. अगर आप बीचबीच में थाईलैंड नहीं जाते हैं तो लोग आप को यकीनन बूढ़ा मान लेंगे. जिस तरह मार्केट में तरहतरह के जैल और गोलियां आ गई हैं और अगर आप उन का इस्तेमाल करते हैं, बावजूद इस के अगर आप बीचबीच में एकदो बार थाईलैंड की यात्रा कर लेते हैं तो लोग आप को बूढ़ा मानने से इनकार कर देंगे यानी अगर आप मर्द हैं तो बीचबीच में थाईलैंड की यात्रा पर जाते रहें.

इस से आप की बूढ़ापे में भी मर्दानगी बची रहेगी, ऐसा एहसास कम से कम लोगों को तो जरूर होगा. अगर आप सालभर में दोचार बार थाईलैंड आतेजाते रहते हैं.

थाईलैंड जाने के फायदे :

* आप अभी बिलकुल जवान हैं.

* आप अपनेआप खुराफाती हो जाएंगे.

* आप का चेहरा सवाना के घास के मैदान की तरह हरा हो जाएगा.

* आप के शरीर के कसबल ढीले नहीं पड़े हैं.

* पड़ोसी खासकर मर्द जो थाईलैंड जा कर मजा लेना चाहते हैं, वे जलभुन कर रह जाएंगे.

* आप गोलियां ले रहे हों, जैल का इस्तेमाल करते हों यानी अगर आप 60-70 साल के हो गए हैं, तब भी एक बार थाईलैंड हो कर आइए. लोग मान लेंगे कि आप जवान हैं.

* अगर आप 50 साल के हैं और आप बारबार थाईलैंड जा रहे हैं, तो सैक्सोलौजी के मुताबिक आप की उम्र 25 साल की है.

थाईलैंड का नाम सुनते ही हम मर्दों के मन में गुदगुदी मच जाती है. इतनी खुशी होती है, इतनी खुशी होती है कि उसे शब्दों में बता पाना नामुमकिन है. थाईलैंड और उस की कुदरती खूबसूरती, वहां के नजारे, वहां के पहाड़, वहां की नदियां…

खैर, हम कुदरती खूबसूरती को देख रहे होते हैं, वहीं पत्नियों के दिमाग में बस उसी का खयाल आता है, जिस के बारे में लोग थाईलैंड को जानते हैं. सब को लगता है कि हम मर्द बस उसी के लिए थाईलैंड की यात्रा करना चाहते हैं.

थाईलैंड का नाम सुनते ही सब से पहले पत्नियों के कान खड़े हो जाते हैं. थाईलैंड बवासीर की बीमारी की तरह है. जैसे अगर आप को बवासीर की बीमारी है तो केवल और केवल आप को और आप के डाक्टर को ही पता होनी चाहिए. अगर दूसरे ईष्ट मित्रों को पता चल जाए तो आप हंसी के पात्र हो जाते हैं.

अगर आप थाईलैंड जा रहे हैं तो आप को अपने घर में यही बताना है कि आप किसी दूसरे एशियाई देश जैसे जावा, सुमात्रा की यात्रा पर जा रहे हैं. और थाईलैंड तो बिलकुल भी नहीं जा रहे हैं.

थाईलैंड का नाम लेते ही लोग आप को उस नजर से देखने लगते हैं. क्या कोई आदमी अपने घर में बता कर जा सकता है कि वह थाईलैंड जा रहा है? औरत अगर किसी काम से थाईलैंड जाए तो चल सकता है. यह बहुत मामूली बात है. लेकिन मर्द जाए तो बस वही बात है कि थाईलैंड जहां पैट्रोल है, वहीं मर्द आग है. थाईलैंड अगर मांस का टुकड़ा है तो मर्द बाघ. बाघ के भरोसे कोई मांस नहीं छोड़ सकता.

वहीं अगर मर्द थाईलैंड जा रहा है तो घर वालों के कान खड़े हो जाते हैं. अड़ोसियोंपड़ोसियों को अगर पता चल जाए कि आप थाईलैंड जा रहे हैं तो पूछिए ही मत. बस वे आप को देख कर मुसकराते हैं. यकीन मानिए उन की मुसकराहट तब इतना बेइज्जत करती है कि पूछिए ही मत.

आप को कोई घर से धक्के मार कर निकाल दे तब भी उतना दुख नहीं होगा  जितना थाईलैंड का नाम सुन कर लोग आप को मुसकरा कर देखते हैं. आप की कोई जूतमपैजार कर दे. तब भी उतना दुख नहीं होगा जितना दुख आप को तब होगा जब आप थाईलैंड की यात्रा पर जा रहे हैं और आप को देख कर आप का कोई पड़ोसी मुसकरा भर दे. लगता है जैसे किसी ने घड़ों पानी उड़ेल दिया हो.

थाईलैंड की यात्रा अगर मर्द कर रहा है तो लोगों के मन में पटाया के बीच और खूबसूरत थाई लड़कियां आने लगती हैं. अगर आदमी थाईलैंड चला जाए और आ कर गंगा में डुबकी लगा कर भी यह कहे कि उस ने थाईलैंड में जा कर डुबकी नहीं लगाई है तो लोग मानने को तैयार नहीं होते. दरअसल, हमारी मर्द जाति के लोगों ने हमारा चरित्र कुछ ऐसा बिगाड़ दिया है कि लोग हमें शक की नजरों से देखते हैं.

पत्नियां और जगह तो हमें अकेला जाने की इजाजत दे देती हैं लेकिन थाईलैंड जाने की बात सुनते ही उन के कान खड़े हो जाते हैं. थाईलैंड की यात्रा ऐसी है कि आप किसी को बता भी नहीं सकते.

इधर मैं औफिस के काम से थाईलैंड जाने को तैयार हुआ. तय समय पर मुझे  टिकट भी मिल गया और अगले दिन मु?ो थाईलैंड की यात्रा पर जाना था. दोतीन दिन का काम था. मैं ने यह बात हालांकि सब से छिपा कर रखी थी कि मैं थाईलैंड की यात्रा पर जा रहा हूं पर कैसे न कैसे यह बात मेरी पत्नीजी को पता चल गई, लिहाजा पत्नीजी की मुझ  से ठन गई.

वे बोलीं, ‘‘थाईलैंड में ऐसा भला कौन सा काम है जो आप को जाना है? मैं भी साथ चलूंगी.’’

मैं ने समझाया, ‘‘औफिस के काम से जाना है. मेरा टूर एंड ट्रैवल का काम है. कभीकभी जाना पड़ता है वहां. साल में जा कर एक बार हिसाबकिताब करना पड़ता है. लेनदेन का मामला होता है.’’

पत्नीजी बोलीं, ‘‘मैं खूब समझ  रही हूं इस लेनदेन को. तुम टेस्ट बदलने जा रहे हो. घर में आलू और साग खा कर बोर हो गए हो, इसलिए चोरों की तरह बाहर जा कर चिकन और बिरयानी खाने जा रहे हो. लेकिन तुम्हारा यहां चलने वाला कोई जोर नहीं है. या तो मुझे  साथ ले चलो या टिकट कैंसिल करवाओ.’’

खैर, काम जरूरी था, इसलिए मेरा थाईलैंड जाना जरूरी था. पत्नीजी गुस्सा हो कर नाकमुंह फुला चुकी थीं. दोतीन दिन के बाद थाईलैंड से लौटना था.

मैं थाईलैंड से 3 दिन बाद लौट आया. औफिस गया तो सब दोस्त मुझे  देख कर मुसकरा रहे थे. कोई कुछ कह नहीं रहा था, लेकिन मैं उस मुसकराहट का मतलब समझ रहा था.  Humor

Hindi Story – सफेद बाल मुरदाबाद : कैसे फंस गया मैं

Hindi Story. जैसे ही उन के जनरल प्रोविडैंट फंड के कागज आए, वैसे ही वे दफ्तर की फाइलों की ओर से भी लापरवाह हो गए. ऐसी लापरवाही कि फाइलों से उन का जैसे कभी कोई रिश्ता ही न रहा हो. उन की मेज पर फाइलों का ढेर हर रोज उन के कद से ऊंचा होता जा रहा था, पर वे बेफिक्र. जो आएगा, वह उन के इकट्ठा किए गए गंद में सड़ता रहेगा.

वे सुबह ठुमकठुमक करते दोपहर के 12 बजे तक दफ्तर पहुंचते और जिस किसी को भी सीट पर तनिक गरदन उठाए देखते, उसी के पास गपें मारने हो लेते. किसी का उन के साथ गपें मारने का मन हो या न हो, इस से उन्हे कोई लेनादेना न होता.

जिन फाइलों की उलटापलटी की बदौलत उन्होंने बाबू होने के बाद भी शहर में 4-4 प्लौट खरीदे, बीसियों कंपनियों के हिस्से खरीदे, उन फाइलों से उन की बेरुखी देखने के काबिल थी.

जैसे ही 1 बजता, वे सब से पहले कैंटीन में आ जाते और इंतजार करते रहते कि कोई आए, तो वे उस को 4 बजे तक जैसेतैसे अपनी गपों में लगाए रखें.

आज उन के जाल में शायद मेरा फंसना लिखा था. दफ्तर आतेआते बिल्ली रास्ता काट गई थी, सो जान तो मैं पहले ही गया था कि आज दफ्तर में कुछ अनहोनी होगी, पर मेरे साथ इतना बुरा होगा, ऐसा मैं ने कभी नहीं सोचा था.

कैंटीन में फंसा मैं जब भी उन के पास से उठने की नाकाम कोशिश करता, तो वे कुछ खाने को मंगवा देते और सरकारी लालची कबूतर एक बार फिर पेट भरा होने के बाद भी दाने के लालच में उन के जाल में जा फंसता.

जब मेरा पेट हद से ज्यादा भर गया, तो और मेरे कान उन की बेहूदा बातें सुन कर पक गए, तो मैं ने कैंटीन के दरवाजे की ओर देखा कि कोई दफ्तर से चाय पीने आता, तो मैं उसे इन के हवाले कर इन से छुटकारा पाता.

पर जब दफ्तर से कोई आता न दिखा, तो सच कहूं कि पहली बार मुझे अपने हाल पर रोना आया और मैं ने उन को हद से ज्यादा झेलने के बाद उन से यों ही पूछ लिया, ‘‘मोहनजी, अब रिटायरमैंट के बाद आप का क्या करने का इरादा है? रिटायरमैंट के बाद आप को कोई याद आए या न आए, पर आप की सीट पर काम कराने आने वाले आप को बेहद याद आएंगे. बेचारों को आप ने इस तरह निचोड़ा है कि अगले कई जनमों तक अगर वे इसी देश में पैदा होंगे, तो किसी सरकारी दफ्तर में जाने से पहले सौ बार सोचेंगे.’’

‘‘करूंगा क्या? अब इश्कविश्क करने से तो रहा. घुटने तो घुटने, दिल तक को गठिया हो गया है. यह तो थोड़ाबहुत दफ्तर में…

अब बीवी की सेवा करूंगा, ताकि मरने से पहले उस के कर्ज से छुटकारा पा जाऊं. बेचारी ने किसी भी मन से सही, मेरी बहुत सेवा की है. कहीं ऐसा न हो कि अगले जनम में भी उसी से पाला पड़े,’’  कह कर उन्होंने ऐसा मुंह बनाया, मानो उन के मुंह में किसी ने नीम के पत्तों का गिलास भर रस उड़ेल दिया हो.

‘‘अगर बुरा न मानो, तो मैं आप को रिटायरमैंट के बाद एक बेहतर धंधे की सलाह दे सकता हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘यार प्रदीप, बहुत कर लिया दफ्तर में रहते हुए धंधा. यह 35 सालों तक मैं ने धंधे के सिवा और किया ही क्या है?’’

‘‘मेरी मानो, तो अपने महल्ले में मोबाइल रीचार्ज की दुकान खोल लेना. सारा दिन आराम से कट जाएगा और इस बहाने जाती जवानी भी रुक जाएगी.’’

‘‘हमारे महल्ले में पहले से ही 4-4 रिटायरी इस धंधे में जमे हैं. ऐसे में मुझे नहीं लगता कि…’’

‘‘तो ऐसा करो कि हेयर डाई की दुकान खोल लेना. वैसे भी मैं ने नोट किया है कि ज्योंज्यों हम जैसों की उम्र के बंदों के गाल अंदर को धंसते जा रहे हैं, वे सिर से ऐसे दिखते हैं मानो उन के सिर पर अभीअभी बाल आने शुरू हुए हैं. आज के सिर हैं कि उन्हें अपने पर एक भी सफेद बाल पसंद ही नहीं.

‘‘आज के जमाने का कोई सब से बड़ा दुश्मन है, तो वे हैं सफेद बाल. आज का आदमी उतना परेशान किसी से नहीं, जितना इन सफेद बालों से है. वह मौत का सामना खुशी से कर सकता है, पर सफेद बालों के आगे अपनेआप को बहुत कमजोर पाता है.

‘‘आदमी को उतनी परेशानी रोटी न मिलने पर भी नहीं होती, जितनी परेशानी आईने के आगे खड़े हुए अचानक सिर पर एक सफेद बाल दिखने पर होती है. सिर में एक सफेद बाल दिखते ही उसे लगता है, मानो उस पर मुसीबतों का एक पहाड़ नहीं टूटा, बल्कि कई टूट पड़े हैं,’’ किसी बाबा की तरह उपदेश देते हुए मेरा गला सूख गया था, सो पानी का घूंट ले कर मैं ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘मोहनजी, इधर सफेद बाल सिर में दिखा और उधर डाई बनानेबेचने वालों की फसल कटनी शुरू. कई तो मैं ने ऐसे भी देखे हैं, जो सिर पर बाल न होने के बाद भी गंजे सिर पर ही कालिख मल लेते हैं.

‘‘ये अपने साहब देखे? सिर के तो सिर के, छाती तक के बाल काले कर के दफ्तर आने लगे हैं, ताकि अपनी शर्ट के बटन दिसंबर में भी खुले रख कर खुद को जवान होने के एहसास में डुबोए रहें. उन के दाढ़ीमूंछों के रंगे बालों को देख कर तो नौजवानों के ओरिजनल काले बालों तक को शर्म आ जाती है.

‘‘मैं जब आप की बेटी की शादी में गया था, तो अपनी दादी की उम्र की आप की महल्ले वालियों के रंगे बालों को देख कर दंग रह गया था. लगा था, आप का महल्ला तो जैसे जवानों का महल्ला हो. उन के बूढ़ी होने का पता तब चला था, जब वे कमर पर हाथ रख कर जैसेतैसे वरवधू को आशीर्वाद देने के लिए उठी थीं.

‘‘सच कहूं, आज के आदमी के पास रोटी के लिए पैसे हों या न हों, पर वह बाल डाई करने के लिए पैसे का जोड़तोड़ कर ही लेता है.

‘‘मेरा बस चले तो मैं टांगों तक के सफेद बाल रंग कर ही सांस लूं. आने वाले दिनों में देखना जो बिना डाई किए बालों के मरेंगे, उन्हें स्वर्ग के तो स्वर्ग के नरक तक के ताले नहीं खुलेंगे मिलेंगे. पता है पिछले हफ्ते अपने महल्ले में क्या हुआ था?’’

‘‘क्या हुआ था?’’ यह पूछते हुए मोहनजी का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘महल्ले के सौ साल के एक बुजुर्ग गुजर गए.’’

‘‘तो क्या डाक्टरों के मरा बताने के बाद भी वे दोबारा जिंदा हो उठे?’’

‘‘नहीं, अब हम डाक्टरों पर विश्वास कम ही करते हैं… जब उन्हें देवभूत लेने आए, तो उन के सफेद बालों को देख कर उन्हें ले जाने से साफ मुकरते हुए बोले, ‘माफ करना, हम इन्हें नहीं ले जा सकते.’

‘‘गाड़ी अपनी कर दें क्या भैया? तुम ऊपर बिल अपना दे देना,’’ हम ने उन के आगे गिड़गिड़ाते हुए कहा. सभी को अपनेअपने घर जाने को देर जो हो रही थी. अब यहां लोगों के पास जिंदों के लिए वक्त नहीं, तो मरे हुए के साथ कौन रहे?

‘‘देवभूतों ने चाय पीतेपीते कहा. ‘ये नहीं चलेंगे. नरक में भी नहीं,’

‘‘क्यों नहीं चलेंगे? सौ साल का बंदा ऊपर ही तो चलता है.’’

‘‘यह सुन कर वे बोले, ‘तो ऐसा करो, अगर तुम इन से छुटकारा पाना चाहते हो, तो पहले इन के सफेद बाल डाई कराओ. साहब तक को सफेद बाल वालों से सख्त नफरत है.

‘‘‘जब हम कोई सफेद बाल वाली आत्मा ले जाते हैं, तो वे हमें न सुनने लायक गालियां यह कहते हुए देने लग जाते हैं कि मृत्युलोक से क्या गंद उठा लाए. कितनी बार कहा कि खूबसूरती भी कोई चीज होती है कि नहीं?’’’

इतना सुन कर मोहनजी ने मेरी पीठ थपथपाई और खुद ही मेरे पास से उठ कर मंदमंद मुसकराते हुए घर की ओर हो लिए.Hindi Story

Political Satire : हे! भैंसजी… : बनवारी ने पाली भैंस

Political Satire. बनवारी ने घर में लोन ले कर भैंस पाल रखी है. पर दूध के लिए नहीं, भैंस गोबर और भैंस मूत्र के लिए. आजकल न सरकार दूध देती है, न भैंस. पर भाई साहब, इस का मतलब यह बिलकुल नहीं हो जाता कि सरकार और भैंस को पालना बंद कर दो. कुछ काम नफेनुकसान की सोचने के बदले परंपरा निभाने के लिए भी करने पड़ते हैं.

वैसे, जब से बाजार में शुद्ध नकली दूध आया है, दूध हर जगह खत्म सा हो गया है. भैंस का गोबर बनवारी स्वदेशी अगरबत्तियां बनाने के लिए बेच देते हैं तो भैंस का मूत्र घर की शुद्धी के लिए फर्श क्लीनर बनाने के लिए.

आजकल देश में हर जगह स्वदेशी का परचम लहरा रहा है. जिसे देखो वही बाहर के माल पर स्वदेशी की छाप लगा कर लाखोंकरोड़ों रुपए कमा रहा है.

इसी परचम की नाक तले लोग शान से भैंस के गोबर को गाय का बता कर स्वदेशियों को उल्लू बनाते फिरें तो बनाते फिरें, इस से बनवारी को क्या. इस देश को कभी विदेशियों के तो कभी स्वदेशियों के हाथों उल्लू बनना ही लिखा है.

कल बनवारी ने अपने नहाने के पानी से खुद के नहाने के बजाय अपनी प्रिय भैंस नहलाधुला कर आंगन में बांधी ही थी कि कहीं से वे अचानक आ टपके.

बनवारी तो उस वक्त उन्हें पहचान नहीं पाए, पर भैंस उन को पहली ही नजर में पहचान गई. उन्हें सामने से आता देख वह इस तरह चारा खाने लगी जिस तरह नेता को आते देख जनता अपनी थाली का रूखासूखा दनादन खाने लगती है.

उन को सामने से आता देख भैंस अपने चारे को दबादब अपने पेट में छिपाने की कोशिश करने लगी मानो वह बरसों से जनता की तरह भूखी हो.

यह देख कर बनवारी परेशान, ‘हद है यार, इस भैंस को अपने मुंह का निवाला भी खिलाता हूं और यह उस के बाद भी भूखी की भूखी…’

भैंस को चारे के 4-4 ग्रासों का एक ग्रास करते देखा तो बनवारी ने भैंस से पूछा, ‘‘हे भैंस, यह क्या? इस देश में चारा खत्म तो नहीं हुआ जा रहा है जो तू इस तरह…’’

‘‘देखते नहीं सामने से कौन आ रहा है?’’ कह कर भैंस ने उसी तरह से चारा खाना जारी रखा तो बनवारी को बहुत गुस्सा आया, ‘हद है यार, इस देश में किसी को कितना भी खिला लो, पर उस का पेट है भरता ही नहीं.’

‘‘वह देखो मेरा चारा खाने वाला आ रहा है. डर है कि इस बार भी कहीं यह… इस से पहले कि यह आ कर मेरे मुंह का भी चारा न खा ले…’’ भैंस चिल्लाई.

भैंस की अक्ल तो बनवारी से भी बड़ी निकली. उन्होंने कुछ देर तक अपना दिमाग धुना, तब जा कर उन्हें पहचान पाए.

कल तक जो दूसरों की आंखों में आंसुओं का सैलाब रखते थे, आज उन की आंखों में लबालब आंसू.

बनवारी ने तो सोचा था कि सब की आंखों में आंसू हो सकते हैं, पर उन के कारनामों के चलते उन की आंखों में तो उन की आने वाली 7 पुश्तों तक की आंखों में आंसू नहीं आ सकते.

आते ही उन्होंने आव देखा न ताव और भैंस के पैर पकड़ लिए. बनवारी ने उन्हें भैंस के पैरों के पास से उठाने की बहुत कोशिश की, पर वे भैंस के पैरों से ऐसे चिपक गए जैसे भक्त भगवान के पैरों से चिपक जाता है.

तब बनवारी ने उन से कहा, ‘‘हे नेताजी, पैर पकड़ने हैं तो उन के पकड़ो. हो सकता है, सजा के चक्करों से भवसागर पार हो जाओ.

‘‘लोकतंत्र में भैंस के पैरों से ज्यादा जनता द्वारा गच्चा खा चुकों के पैर

होते हैं.’’

पर वे नहीं माने तो नहीं माने.

बस, भैंस के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहते रहे, ‘‘हे परमादरणीय

सुश्री भैंसजी, मैं थकाहारा तुम्हारे चरणों में आया हूं. लगातार हो रही सजाओं से मैं तंग आ गया हूं. अब तो मुझे माफ कर दो प्लीज. मैं ने तुम्हें बहुत कष्ट दिए हैं. तुम से छीन कर बहुत चारा खाया, पर अब इस

की सजा बहुत नहीं हो गई क्या? मैं तुम्हारे चरणों में पड़ कर अपने किए की तुम से माफी मांगता हूं.

‘‘अगले जन्म में तुम्हारा चारा खाना तो दूर अपना चारा भी तुम्हें ही दिया करूंगा. पर मुझे अब इन लगातार हो रही सजाओं से छुटकारा दिला दो…’’

Hasya Vyangya – झूठ बोलना सीखें : ऐसी पुस्तकें जरूर पढ़ें

Hasya Vyangya. आप ने रेलवेस्टेशनों, बसअड्डों, पैसेंजर गाडि़यों और महानगरों के फुटपाथों पर 10 रुपए में इंगलिश सिखाने का दावा करने वाली पुस्तकें खरीदी भले ही न हों मगर देखी जरूर होंगी. इन्हें अपनी जेब के अनुकूल, अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप पा सर्वसाधारण अपनी जेब ढीली करने को उत्सुक नजर आता है. और इस तरह यह धंधा चलता रहता है. .

समय की मार खाए गरीब बेचारे कभी यों 10 रुपए में अंगरेजी तो नहीं सीख पाते किंतु अपनी तरफ से पूरी कोशिश करने की आत्मसंतुष्टि उन्हें जरूर मिल जाती है. उस पुस्तक ने उन का कितना अंगरेजी ज्ञान बढ़ाया, यह तो नहीं कहा जा सकता.

यह शोध का विषय है लेकिन चिंतनमननमंथन द्वारा मानसिक वादविवाद का आयोजन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि दरअसल इस सर्वसाधारण के जीवन को उन्नत करने के लिए अंगरेजी नहीं झूठ बोलना कैसे सीखें नामक पुस्तक की सख्त आवश्यकता है. सर्वशिक्षा अभियान के तहत अगर इसे बढ़ावा मिले तो अतिउत्तम. अनिवार्य पठनीय पुस्तक का दरजा मिले तो वाहवाह.

सत्यं वद प्रियं. वद न वद सत्यम अप्रियम, यह पाठ हिंदुस्तान की हर पाठशाल में पढ़ाया जाता रहा है और इस के सदके में हमारे जैसे झूठ बोलने में अक्षम लोगों का जमावड़ा हिंदुस्तान की धरती पर हो गया, जिन्हें आजादी के सठिया जाने के बाद भी मिडिल क्लास कह कर खूब लताड़ा गया. अब तो सब से बड़ा अड़ंगा है हमारी प्रगति में, वह यही है, हमारी मिडिल क्लास सत्यवादी सोच. इसलिए शरीर पर टैटू सा गुदा मिडिल क्लास रहनसहन, मिडिल क्लास भाषा.

यह तो मानी बात है कि कोई आदमी सच बोल कर प्रिय नहीं बना रह सकता. सच तो प्रकृति से ही कड़वा होता है, एकदम करेला, ऊपर से नीम चढ़ा जैसा. करेला तो जानते हैं न, छिलका उतार भी दिया जाए तब भी कड़वाहट अंदर पोरपोर तक भरी ही रहती है.

अभी तक हम ने तो सुना नहीं कि करेले को चाशनी में डुबो कर किसी ने बारहमासी रसगुल्ला बनाने में सफलता प्राप्त की हो, किसी को यह कला आई भी हो तो खानदानी शाही दवाखाना की तरह निश्चित ही चांदनी चौक की किसी गली में चुपचाप चल रही होगी. यों पटरियों पर तो वह न बिक रही होगी. यह हमारा सच तो होली पर बनने वाली गुझिया सी साख भी नहीं जुटा पाया कि चलो, सालाना जलसे में ही उस का कुछ जलवा हो. मगर वहां भी बुरा न मानो होली है का वरक लपेटा जाए तब जा कर कुछ बात बने.

इधर, झूठ की दादागीरी एकदम निराली है, बासमती चावल सी उस की महक आ ह ह हा…एकएक दाना एकदम खिला हुआ ताजगी से भरपूर. सब को मजा देने वाला. सब की इज्जत बचाने वाला. झूठ की खासीयत है वह हमेशा आराम से मेजपोश की तरह बिछा रहता है, खूबसूरत परदे की तरह लटका रहता है. सब की नंगई ढकी रहती है. सो, सब को समझ लेना चाहिए कि झूठ बोलना कितना आवश्यक है.

दुनिया तो, जी, झूठ से चलती है, सामने वाले की झूठी तारीफ करिए, आराम से रहिए. हंसिए, बोलिए चैन की नींद सोइए. वरना धरती सुंघाऊ , पानी पिलाने वाले, धूल चटाने वाले, दिन में तारे दिखाने वाले, छठी का दूध याद दिलाने वाले, चारों खाने चित्त कर देने वाले सत्य की मार के लिए स्वयं भी तैयार रहिए क्योंकि सामने वाला व्यक्ति सांप काटे की तरह पहला मौका हाथ आते ही आप पर वार करने से चूकेगा नहीं. फिर चाहे वह कोई रामदेव हो या कोई बालकृष्ण.

जनाब, बात तो धार्मिक व दलीय भावनाओं की है और सच के साथ वही सब से पहले आहत होती है. अब देखिए आप अपनेआप चलते कहीं गिर पड़ते हैं ठोकर खा कर, तो न अफसोस होता है न दर्द, बस उठे और फिर चल दिए. किंतु, सत्य का कोड़ा पड़े तो पीठ पर उभार छोड़ जाता है. इसलिए जनाब जानिए और समझिए अब हम रह रहे हैं ग्लोबल विलेज में, और राजनीतिज्ञों की सफलता के पांव तले दबेदबे सांस ले रहे हैं. उन के सफल घोटालों की अनवरत दास्तान कानफोड़ू कीर्तन की तरह धाड़धाड़ बज रही है वातावरण में. यह किस का कमाल है, मिथ्या वचन ना.

जिस के आगे 10 रुपए की बांसुरी से सच की कितनी भी मीठी तान निकले, झूठ के औरकैस्ट्रा के आगे टिक नहीं पाती. इस पर भी अगर हम सत्य को पकड़ कर बैठे रहेंगे तो विलुप्त होते देर न लगेगी. सो, आवश्यक है कि हमारी संतानें, भावी पीढ़ी झूठ बोलना सीखें. यों तो यह कार्य पाठ्यक्रम में बदलाव कर के सरकार भी कर सकती है किंतु जैसे बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा इत्यादि के मामले में सरकार से हम सीख चुके हैं  आत्मनिर्भर रहना, वैसे ही हम इस में भी आत्मनिर्भर हो जाएं.

इसी अभियान के अंतर्गत हम ने ‘झूठ बोलना कैसे सीखें’ नामक पुस्तक बाजार में उतारी है, इस से हमारी चार पैसे की आमदनी हो जाएगी और आप झूठ बोलना बड़ी आसानी से सीख जाएंगे.

हमें यह जान लेना चाहिए कि कंप्यूटर की तरह इसे पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करना आवश्यक है लेकिन जब तक यह औपचारिक शक्ल अख्तियार करे तब तक प्राइवेट ट्यूशन से सफलता की ओर कदम बढ़ा देना चाहिए. वैसे भी यदि सभी सीख जाएंगे तो झूठ की सफलता के क्षेत्र में बड़ा कंपीटिशन हो जाएगा बिलकुल आईआईटी सा.

आज की तारीख में यह पाठ किसी पाठशाला की किसी पाठ्यपुस्तक में पढ़ाया नहीं जाता. बस, बच्चा अनुभव से फेल होहो कर इसे धीरेधीरे सीखता है. उस पर तुर्रा यह कि सच की जड़ बड़ी गहरी होती है, बेशरम के झाड़ की तरह बेतरतीब यहां से काटें तो वहां से सिर उठा लेगी. अमरबेल सी जीवन का सब रस चूस लेगी. बरसात में सड़ेगी, अकाल में सूखेगी, सर्दी में ठिठुरेगी मगर गले पड़ी रहेगी. इसलिए एक बार सच की लत पड़ जाए तो बीड़ीसिगरेटशराब की तरह इस के नशे में आदमी सबकुछ लुटा बैठता है राजा हरिश्चंद्र की तरह.

जीवन में सफलता का राज दरअसल आप की झूठ बोलने की क्षमता पर निर्भर करता है या यों कहिए कि गोलमाल करने के प्रतिबद्धता पर टिका रहता है तो कुछ अतिशयोक्ति न होगी. झूठ बोलना एक कला है जिसे कुंगफू जैसी मेहनत से आम आदमी को सीखना पड़ता है, कराटे किड की तरह रोजमर्रा के जीवन में सुबहसवेरे से देर शाम तक इस का अभ्यास करना पड़ता है तब जा कर कहीं यह आम आदमी के जीवन में उतरती है और उसे खास बनाती है. हां, राजनीतिज्ञों और पंडेपुजारियों के जीन में यह होती है वंशानुगत, पैदाइशी, कोयल की कूक सी जिसे संगीत सीखना नहीं पड़ता. वे झूठ की विरासत लिए होते हैं, पैदा होते ही नेता और पंडित बन जाते हैं.

झूठ अपनी संरचना में ही लुभावना व प्रिय लगने वाला होता है व रक्तबीज सा अपनी फसल धड़ाधड़ काटता है. एक झूठ से 100 झूठ पैदा होते देर नहीं लगती. उस की बेल अपनी गति से हौलेहौले परवान चढ़ने लगती है. जबकि सच न बढ़ता है, न घटता है. बस, उतने का उतना ही बना रहता है. सो, उस की प्रगति की संभावना भी स्थिर सी रहती है.

झूठा सहारा ही आप की जिंदगी को बेहद आसान बना देता है. आप का खड़ूस बौस आप से हंसहंस कर करने लगेगा बात. जैसे वजन कम करने के लिए कमर कसनी होती है वैसे ही झूठ बोलना सीखने के लिए तैयार होना पड़ता है. वरना आप झूठ बोल नहीं पाते. सच की इस बीमारी को शुरुआत में ही संभाल लेना चाहिए वरना सच का कैंसर बड़ा भयंकर दर्द देता है. न जीने देता है न मरने देता है. राजा हरिश्चंद्र सा डोम बना कर छोड़ता है जो अपने बेटे का भी दाह नहीं कर पाता. सो, सच से दूर रहें. सच डरने की चीज है, अपनाने की नहीं.

अब झूठ की तारीफों के पुल क्या बांधना. पूरा का पूरा तंत्र बाकायदा इस के सहारे चल रहा है. सच को खोजना पड़ता है भूसे के ढेर से सूई की तरह. समंदर में डूबे खजाने की तरह, सच अन्वेषण की चीज है, इसलिए आप कृपया इस का दैनिक सार्वजनिक उपयोग बंद करें. यह बातबात पर दन्न से उगलने वाली चीज नहीं. यह कीमती चीज है, इसे इस की कीमत मिलने पर ही उपलब्ध कराएं. बताओ भला, यह भी कोई बात हुई कि इधर घर में आया मेहमान, गले मिले नहीं, कि बोल पड़े, ‘कैसे बेढब लग रहे हो.’ आ गया पतीले में उबाल. लो, पकड़ो अपने सच का ढक्कन.

आज की तारीख में जो झूठ नहीं बोल पाता वह सफलता की सीढि़यां नहीं चढ़ पाता. झूठ के साथ बस यही बड़ी खराबी है कि यह दिल पर बोझ बन जाता है. एक सच्चा झूठ बोलने वाला वही होता है जो कैसा भी झूठ बोले मगर वह न तो उस के दिल पर बोझ बने न चेहरे पर शिकन डाले. बस, जिस दिन आप को यह तरीका आ गया, आप महान हो गए. सच तो एक पैदाइशी तत्त्व है खानापीनासोना जैसा, उस में क्या शिक्षा, क्या ज्ञान की आवश्यकता. झूठ बोलना एक फन है और सोचिए, आप कैसे फनकार हैं.

सच के बारे में ऐसी धारणा है कि वही अंतिम विजेता होता है. चलिए मान लिया. मगर अंत का क्या? रास्ते का महत्त्व नहीं. अंत तो मृत्यु भी है, फिर क्या जीवन, कुछ भी नहीं. मौत तो एक पल में हो जानी है. सांसें तो जीवनभर चलनी हैं. सो, मंजिल से अधिक रास्ते का महत्त्व है. झूठ बोलनासीखना परमआवश्यक पाठ है. इस से अधिक इस विषय में कहना झूठ की तौहीन खास है.

अब हम आप को बताने जा रहे हैं कि हमारी झूठ बोलना सीखें नामक पुस्तक की हाईलाइट्स क्या हैं. इंगलिश स्पीकंग कोर्स की तर्र्ज पर ही हम ने अपने यहां 3 तरह के  कोर्स मय कोर्स मैटीरयल व सीडी के उपलब्ध कराएं हैं. रैगुलर व कौरेस्पौंडैस कोर्र्स दोनों की सुविधाएं हैं. रैपीडेक्स क्रैश कोर्स, नियमित रैगुलर व सस्ता शौर्टकट भी आप की जेब व हस्ती के अनुसार आप की आकंक्षाओं व इच्छाओं के अनुरूप उपलब्ध हैं.

उपलब्ध पुस्तक के की नोट्स अर्थात कुछ टिप्स यानी कि कुछ मारक तत्त्व निम्नांकित हैं. कृपया वृहद वर्णन के लिए पुस्तक खरीदें. संपूर्ण पुस्तक के लिए मनीऔर्डर करें या इंटरनैट के जरिए कैश औन डिलीवरी सुविधा का उपयोग करें.

झूठ बोलना सीखने के लिए निम्नांकित 10 नियमों का पालन करें. आप 10 दिनों में ही झूठ बोलना सीख जाएंगे, फिर आप की पौ बारह –

–    झूठ बोलने की शुरुआत अपने घर से करें.

–    घर में भी उस व्यक्ति से करें जिसे आप अपने सब से करीब पाते हैं.  यह कठिन होगा मगर सचमुच कारगर होगा.

–    झूठ सकुचाते हुए नहीं, धड़ल्ले से बोलें.

–    झूठ आंखों में आंखें डाल कर बोलें.

–    झूठ बोलते समय चेहरे पर पसीना न आने दें, आ जाए तो उसे रूमाल से पोंछने की गलती न करें. आप को अभ्यास की आवश्यकता होगी.

–    झूठ बोलने का अभ्यास सुबह के पहले घंटे से ही करें जैसे रातभर सोने के बाद कहें, ‘रात नींद ही नहीं आई’ या ‘रात को एक सपना देखा’ और फिर दिल की बात एक सपने के माध्यम से बयान करें जिसे वास्तव में आप ने देखा ही नहीं.

–    अपने झूठ को दैनिक दैनंदिनी में लिखें.

–    एक दिन में कम से कम 5 झूठ बिना आवश्यकता के बोलें, जब आप लगातार 5 झूठ बोल लें तो एक सच बोलने की छूट है. शुरुआत खाने की तारीफ से भी की जा सकती है, यह आसान है.

–    दफ्तर में देर से पहुंचने पर बोला, हुआ झूठ या छुट्टी के आवेदन में लिखा गया झूठ इस अभ्यास में शामिल नहीं किया जाएगा.

–    यदि आप का झूठ पकड़ा जाए तो न गलती मानें, न माफी मांगें. पकड़े जाने पर मुल्ला नसीरुद्दीन की पनाह में जाएं यानी कोईर् तीसरी स्थिति पैदा करें, जहां न सच टिके, न झूठ यों आप को झूठ बोलने का सफर दिलचस्प होता जाएगा और पाठ आसान.

याद रखिए झूठ बोलना सीखें यानी झूठ स्पीकिंग कोर्स द्वारा यह सब संभव है मात्र 3 महीनों में. पुस्तक को पढ़ते ही बस 1 महीने में आप फर्राटेदार झूठ बोलने लग जाएंगे और अपना जिंदगीभर का सत्यवचन का पाठ भूल जाएंगे. इस के बाद आप हमेशा झूठ के पक्ष में झंडा उठाए दिखाई देंगे. गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिए कम मूल्य पर हमारा एक 15 दिनों का सस्ता व आसान कोर्स भी उपलब्ध है. जो आप की सोच बदल देगा, जीने का नजरिया बदल देगा. वह भी आज के जमाने में आप की सफलता सुनिश्चित करेगा. यह ऐसा कोर्स है जिस में बेहतरीन झूठ बोलना सिखाया जाता है जो बड़ेबड़े राजनीतिज्ञों को मात कर सकता है. बस, एक बार आजमाएं तो.

कृपया अपने बच्चों को सिखाएं, आज की दुनिया में सत्य जानलेवा बीमारी है जिस में आदमी सिर्फ दालरोटी खा सकता है, मक्खनमलाईर् का स्वाद कभी पहचान भी नहीं सकता. अगर भूले से कभी उस के आगे कोईर् रसगुल्ला पड़ जाए तो उस का हाजमा खराब हो जाता है, शौच करकर के वह बदहाल हो जाता है. तो फिर ऐसा शारीरिक सौष्ठव ले कर क्या करेंगे आप. 6 व 8 पैक्स छाती के जमाने में. क्या चुल्लूभर पानी में डूब मरेंगे. और डूबना भी चाहेंगे तो डूबेंगे कैसे. सच बोलने वाले के नसीब में पानी कहां? स्विमिंग पूल तो मिलने से रहा चार दिनों में आए टैंकर में.

आप के हिस्से में इतना जल कहां. हमारी पुस्तक इस रोग के प्रतिक्षक टीके की तरह है. ‘जिंदगी की दो बूंद’ का स्लोगन और पोलियो से छुटकारा जैसे. सो इसे अपनाएं, खुशहाली पाएं. Hasya Vyangya

Humor Story :जुमे का दिन और मिर्जा की मिजाजपुरसी

Humor Story. जुमे का दिन था और मैं भी मूड में था, इसलिए सोचा कि चलो, कुछ देर मिर्जा के साथ गपें लड़ाएं. हो सकता है कि लंच से पहले एक टी पार्टी भी हो जाए.

मैं ने जल्दी से नहाधो कर शेरवानी पहनी, गुलाब का बढि़या इत्र लगाया, पीतल जड़ी नक्काशी वाली बेंत हाथ में ली, सुबह के 11 बजे घर से निकल कर सीधे मिर्जा के घर का रुख किया.

मैं जैसे ही मिर्जा के घर के करीब पहुंचा, तभी मुझ पर अचानक जैसे तड़ाक से बिजली सी गिर गई. दिमाग बिजली की तरह कौंधा और पलभर में हजारों बुरे खयालात दिमाग के एक कोने से दूसरे कोने तक कौंध गए.

देखा कि मिर्जा की बैठक का दरवाजा खुला था. बाहर धूपछांव में एक टूटे से खटोले पर कोई… शायद मिर्जा एक मैली सी चादर ओढ़े लेटे थे. गली के आसपास के दोचार बड़ेबूढ़े भी पास ही बैठे थे.

यह मंजर देख कर मेरी तो जैसे रूह ही निकल गई और टांगें तो जैसे वाइब्रेशन मोड पर आ गई थीं. मेरी बेंत ने मुझ गिरते हुए को सहारा दिया.

मैं ने बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए कांपती आवाज में पूछा, ‘‘यह जनाजा किस… क्या… मिर्जा…?’’

तभी वहां बैठे एक शख्स, जिन्हें गली के लड़के ‘चचा मुकुंदा’ कहते थे और जो चारपाई के सिरहाने बैठे थे, ने अपने मुंह पर उंगली रख कर इशारे से मुझे चुप रह कर बैठने का इशारा किया.

थोड़ी देर बाद वे दबी आवाज में बोले, ‘‘जनाब, आप को खबर भी है कि मिर्जा को चोट लगी है. नींद की दवा दे रखी है, ताकि दर्द का एहसास कम हो.’’

मेरे मुंह से एक हमदर्दी भरी चीख निकलने को हुई, मगर वह जैसे गले में घुट कर रह गई.

मैं ने सवाल पूछा, ‘‘क्या किसी मोटरसाइकिल वाले ने साइड मार दी?’’

‘‘नहीं…’’

‘‘तो क्या फिसल कर सीढि़यों से लुढ़क गए?’’

‘‘नहीं…’’

तभी वहां बैठे सभी लोगों के होंठों पर हलकी सी मुसकान तैर गई. यह देख कर मेरा दिमाग 360 डिगरी पर घूम गया.

‘‘तो क्या माजरा है…’’ मेरे मुंह से निकल पड़ा, ‘‘मिर्जा को चोट लगी है और आप बेशर्मों की तरह मुसकराते हो. कुछ तो शर्म करो. बेशर्मी की भी हद होती है.’’

तभी चचा मुकुंदा ने अपना हाथ मेरी गरदन पर रख कर मुझे अपनी तरफ खींचा और मेरा कान अपने मुंह के पास ले गए.

मैं डर गया कि शायद कहीं मेरा कान ही न चबा डालें. फिर भी मैं ने न जाने क्यों अपना कान उन के मुंह के सामने कर दिया.

चचा मुकुंदा मेरे कान में कुछ फुसफुसाए, जो बस मुझे ही सुनाई दिया.

मेरे मुंह से निकला, ‘‘क्या… ऐसा हुआ… क्यों?’’

मैं ने पूरे जोश के साथ मिर्जा के कफन… माफ कीजिए चादर को मुंह से पैर तक खींच कर साइड में डाल दिया और मिजाजपुरसी की रस्म अदा करते हुए हमदर्दी के तौर पर उन्हें हिलाया.

मैं ने देखा कि मिर्जा के दाहिने हाथ पर किसी ने बांस की खपच्चियां रख कर पट्टी लपेटी हुई थी. उन की बाईं आंख सूज कर काली पड़ गई थी और भौंह के ऊपर माथे को ढके हुए सिर के चारों तरफ पट्टी लिपटी थी, जिस पर लाल दवा के निशान थे, जो सूख कर काले पड़ने लगे थे.

मिर्जा ने अपनी दाईं आंख धीरे से खोली और एक बेबसी वाला गुस्सा मेरी तरफ बम की तरह फेंका.

मैं ने हमदर्दी दिखाते हुए मिर्जा के सिर के नीचे अपना एक हाथ रखा और दूसरा हाथ उन की कमर के नीचे रख कर सहारा दिया और उन का सिर

अपनी गोद में रख कर उन से पूछा, ‘‘यह सब क्या…’’

मिर्जा का गला रुंध गया और वे कुछ न बोल सके. तब मौके की नजाकत को भांपते हुए मैं ने ही पूछा, ‘‘यार मिर्जा, यह बेलन की बात तो अकसर तुम्हारे साथ होती ही रहती थी, पर ये प्लेटेंगिलास, चम्मच के चौकेछक्के कब से? अगर कहीं तुम्हारी आंख फूट जाती तो…?’’

मिर्जा, जो अब तक कुछ सामान्य हो चुके थे, बोले, ‘‘मैं खाना खा रहा था. गले में निवाला फंस गया था. पानी मांगा था, तभी बेगम ने गुस्से में खाली गिलास मेरे ऊपर फेंका और बोलीं, ‘ले, पी पानी.’

‘‘गिलास से तो मैं ने अपनेआप को साइड में झुक कर बचा लिया, लेकिन निशाना खाली जाने से बेगम तिलमिला गईं और फिर एकदम से एक प्लेट अर्जुन के तीर की तरह फेंकी, जो मेरी आंख पर लग जाती, तो आंख ही फूट गई होती.

‘‘इतने पर भी जब वे नहीं रुकीं, तो जो हाथ में आया फेंक कर मारती गईं. उन के इन तीरों की बौछार से बचने के लिए मैं हड़बड़ा कर बाहर की तरफ भागा कि तभी न जाने कमबख्त कौन से साहबजादे ने केला खाया होगा और छिलका दरवाजे में डाल दिया. मेरा पैर उस पर पड़ा और धड़ाम से जमीन पर. अब कुहनी का फ्रैक्चर न जाने कब ठीक होगा.’’

मैं ने मिर्जा को हिम्मत दी और नकली हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘बस… इतना ही. अरे यार मिर्जा, तुम तो खुशकिस्मत हो, जो बीवी से पिटे… मुबारक हो…’’

तभी मिर्जा के चेहरे पर ऐसे भाव आए, जैसे वे मुझे कच्चा ही चबा जाएंगे, पर बेबस थे.

वे धीरे से बोले, ‘‘ठीक है… तुम भी उड़ा लो मजाक… जिस दिन पिटोगे, तब सब पता चल जाएगा.’’

मैं ने कहा, ‘‘यार मिर्जा, तुम जो गरीबी का रोना रोते हो, वह अब दूर होने वाली है. तुम बड़े आदमी बनने वाले हो. इतने बड़े कि… जैसे…’’

तभी मिर्जा बोल पड़े, ‘‘क्या मैं अमेरिका का राष्ट्रपति बन रहा हूं? क्यों तू मेरे जख्मों पर नमक छिड़क रहा है? एक तू ही तो था, जिस से मैं मन की बात कर लेता था. और अब तू भी… ठीक है, उड़ा ले मेरी हंसी… जिस दिन भाभी की मार पड़ेगी, तब पता चलेगा.’’

मैं ने मिर्जा से ऐसे दिखावटी हमदर्दी जताई, जैसे मैं उन पर दुनिया का सब से बड़ा एहसान कर रहा हूं.

मिर्जा से मुखातिब होते हुए मैं ने कहा, ‘‘नहीं यार मिर्जा, ऐसी बात भूल कर भी अपने दिमाग में मत लाना. मैं तुम्हारा सच्चा हमदर्द हूं. कभी शक की गुंजाइश मत रखना.

‘‘देखो मिर्जा, ध्यान से सुनो. वे हैं न हमारे… अरे, वे ही जनाब अमेरिका के बिल क्लिंटन साहब. क्या वे बड़े आदमी नहीं बने, वे भी ऐसे देश के जो पूरी दुनिया को तिगनी का नाच नचाता है…

‘‘तो…’’ मिर्जा बीच में ही बोल पड़े, ‘‘मेरा मिस्टर बिल से क्या ताल्लुक?’’

मैं ने मिर्जा को टोका, ‘‘यार, यही तो कमी है तुम्हारी सोच में? अबे, वे भी अपनी बीवी से पिट कर ही इतने बड़े आदमी बने हैं. उन पर बीवी की मिसाइलों जैसे गिलासप्लेट, चम्मच से अनेक बार हमले हुए हैं.

‘‘जैसे सोना तप कर और पिट कर कुछ बनता है, ऐसे ही हमारे चचा क्लिंटन साहब भी अपनी बीवी के मिसाइलोंबमों से पिट कर अमेरिका के राष्ट्रपति बने…

‘‘यह तो भला हो उन की सहायक का, जिस ने दुनिया के सभी मर्दों को बड़ा बनने का राज दुनिया के सामने खोल दिया, वरना…’’

यह सुनते ही मिर्जा कुछ देर के लिए शांत हुए और एक लंबी उबासी ली, जैसे सचमुच ही अमेरिका के राष्ट्रपति बनने जा रहे हों. अब तक उन की नींद की गोली का असर शायद खत्म हो चुका था, तभी वे और भड़क उठे और बोले, ‘‘क्या बकवास करते हो… वह अमेरिका है और यह हिंदुस्तान… यहां ऐसा कभी नहीं हो सकता.’’

मैं ने मिर्जा को फिर झूठी तसल्ली देने की कोशिश की और कहा, ‘‘यार, चचा क्लिंटन की बात छोड़ो. अगर तुम गलीमहल्ले के नेता भी बन गए, तो भी तुम गुजरबसर लायक अमीर तो बन ही सकते हो.’’

शायद यह बात मिर्जा को जंच गई थी. उन्होंने राहत की लंबी सांस ली और फिर करवट बदल कर खर्राटे लेने शुरू कर दिए, जैसे अमीरी के ख्वाबों की दुनिया में पहुंच गए हों.

दोपहर के साढ़े 12 बज चुके थे. मैं ने मिर्जा का सिर धीरे से तकिए पर रखा और कहीं दोपहर का खाना खाने के लिए रैस्टोरैंट ढूंढ़ने लगा. मिर्जा के यहां तो लंच की उम्मीद ही नहीं थी. Humor Story

Hindi comedy story: सवाल 2 रुपए का

Hindi comedy story. यह बात उन दिनों की है, जब महंगाई ज्यादा नहीं थी. महज 10 रुपए में आधा किलो दही आ जाता था. राजनगर नाम के एक महल्ले में रमानाथ नाम के एक रिटायर प्रोफैसर छोटे से मकान में अकेले रहते थे. वे बहुत ही सीधे, सरल, परंतु भुलक्कड़ स्वभाव के थे. वे हर समय किसी न किसी खयाल में खोए रहते थे.

एक दिन की बात है. रात के 8 बजे वे खाना खाने बैठे तो देखा कि दही नहीं है. फिर क्या था? वे हाथ में डब्बा और जेब में 10 रुपए का नोट ले कर बाजार की ओर चल पड़े.

डेरी की दुकानें अकसर जल्दी बंद हो जाती हैं. रमानाथजी बाजार में बहुत घूमे, पर सभी दुकानें बंद हो चुकी थीं. आखिर में उन्हें एक दुकान खुली मिल ही गई. दुकान वाला दुकान बंद कर ही रहा था कि रमानाथजी वहां पहुंच गए.

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‘‘भाई साहब, आधा किलो दही दे दीजिए,’’ रमानाथजी ने दुकानदार के हाथ में डब्बा देते हुए कहा.

‘‘बाबूजी, दही आधा किलो से कुछ कम है… 8 रुपए दे दीजिए,’’ दुकानदार ने डब्बे में दही डालते हुए कहा.

‘‘ठीक है, यह लीजिए 10 रुपए का नोट.’’

‘‘बाबूजी, 2 रुपए तो छुट्टे नहीं हैं. कल सुबह आप बाजार में सब्जियां खरीदने आएंगे, तो अपने 2 रुपए ले लीजिएगा.’’

‘‘ठीक है, कोई बात नहीं. 2 रुपए कल ले जाऊंगा,’’ रमानाथजी ने दही का डब्बा पकड़ कर जाते हुए कहा.

अचानक वे रुके, पीछे मुड़ कर सोचने लगे, ‘मैं भुलक्कड़ हूं. दुकान कहां है, जरा निशान तो देख लूं…

‘हां, दुकान के सामने एक सफेद सांड़ बैठा जुगाली कर रहा है. दुकानदार 60 साल का बूढ़ा है. उस के सिर पर एक भी बाल नहीं है. चेहरे पर दाढ़ीमूंछ भी नहीं है. कुलमिला कर आलू की तरह चिकना.’

रमानाथजी घर पहुंचे, खाना खाया और सो गए. फिर वे सुबह उठे, नहाएधोए, चाय बना कर पी और अखबार देखने लगे. अचानक उन्हें 2 रुपए का खयाल आया.

गरमी के दिन थे. कंधे पर छतरी लटका कर रमानाथजी घर से निकल पड़े. वे बाजार में बहुत घूमे, पर उन्हें आलू की तरह चिकने सिर वाला कोई दुकानदार नहीं मिला. तब उन्हें याद आया कि दुकान के सामने सफेद सांड़ बैठा था.

रमानाथजी सांड़ की तलाश में बाजार में घूमने लगे. सूरज सिर पर आ गया था. धूप तेज होने लगी थी. प्यास से गला सूख रहा था. एक होटल में उन्होंने 10 रुपए का चायनाश्ता कर लिया. इस तरह 10 रुपए का चूना लग गया. मगर वह कमबख्त सांड़ कहां मर गया? रमानाथजी माथे का पसीना पोंछते हुए सोच रहे थे.

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सुबह होते ही सांड़ उठ कर सब्जी मंडी में मुंह मारने चला गया था. सब्जियां खाखा कर उस का पेट भर गया और दुकानदारों के डंडे खाखा कर उस की मोटी चमड़ी में जलन होने लगी. ऊपर से धूप भी तेज हो गई थी. तब वह एक नीम के पेड़ की छाया में बैठ कर जुगाली करने लगा. वहां नाई की दुकान थी. नाई की दाढ़ीमूंछ और सिर के बाल बढ़े हुए थे.

‘‘मिल गया सांड़, मिल गया. अब मैं दही वाले दुकानदार से 2 रुपए मांग लूंगा…’’ खुशी से चहकते हुए रमानाथजी नाई की दुकान में चले गए.

नाई को एक ग्राहक की हजामत बनाते देख रमानाथजी हैरानी से बोले, ‘‘वाह बेटा, जिंदगी में पहली बार देख रहा हूं कि एक रात… केवल एक रात में आलू जैसा चिकना सिर भालू बन गया है.’’

‘‘साहब, आप साफसाफ बोलें. यह आलू और भालू की भाषा मेरी समझ में नहीं आ रही है,’’ नाई ने कहा.

‘‘ऐ मिस्टर, मेरे 2 रुपए निकालिए,’’ रमानाथजी बोले.

‘‘2 रुपए… साहब, क्या आप चंदा मांगने आए हैं?’’

‘‘जी नहीं, रात को मैं ने 8 रुपए का दही खरीदा था. मैं ने आप को 10 रुपए का नोट दिया था. रात को आप के पास छुट्टा नहीं था. सो, अब मैं 2 रुपए लेने आया हूं.’’

‘‘आलू, भालू, दही, 2 रुपए… क्या है यह सब… लगता है, मैं पागल हो जाऊंगा,’’ नाई ने अपने सिर के बाल खुजाते हुए कहा.

‘‘घोर कलयुग आ गया है… अरे, आप ने केवल 2 रुपए मारने के लिए रातोंरात अपना धंधा ही बदल दिया. दाढ़ीमूंछ और सिर के बाल बढ़ा लिए. इतना ही नहीं, 60 साल का बुढ़ापा छोड़ 40 साल का जवान बन गए.

‘‘हाय रे घोर कलयुग, नीम के नीचे बैठा सांड़ सुबूत है कि मैं सच बोल रहा हूं,’’ रमानाथजी हैरानी से बाहर देखते हुए बोले.

रमानाथजी के पैरों तले जमीन खिसक गई, क्योंकि वहां अब सांड़ नहीं था. वे झट बाहर निकल कर बोले, ‘‘अरे, अभी तो यहां सांड़ बैठा हुआ था. लगता है, मुझे भरम हो गया था. बेकार ही तुम्हें बेईमान कह दिया.’’

रमानाथजी फिर से सांड़ की तलाश में धूप में छतरी लगा कर घूमने लगे. वे भूखप्यास से बेहाल हो गए. फिर से 10 रुपए का नाश्ता किया.

अब धूप में चलना मुश्किल था. रमानाथजी ने घर जाने के लिए 10 रुपए का रिकशा किया. रिकशा उन के घर की ओर चल पड़ा. वे मन ही मन अपने को कोसने लगे, ‘केवल 2 रुपए के लिए 30 रुपए का चूना…’

अचानक रिकशे वाले को उन्होंने रुकने को कहा. एक मकान के नीचे सांड़ आराम कर रहा था. वह नेताजी का मकान था. चमचों से घिरे नेताजी गद्दी पर बैठे चुनाव की बातें कर रहे थे कि रमानाथजी वहां पहुंच गए.

‘‘कहिए मतदाता महोदय, मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं? महल्ले में पक्की नालियों का इंतजाम, बिजली, नल…’’ नेताजी बोले.

‘‘नेताजी, अब मैं क्या कहूं? आप तो आप हैं. जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों डकारने वाला केवल 2 रुपए मार सकता है? नहींनहीं, वह दही वाला कोई और ही था. अब मैं नहीं कहूंगा कि एक दही बेचने वाला रातोंरात नेता बन गया. वह भी केवल 2 रुपए मारने के लिए.

‘‘जाइए, आप पर 2 रुपए छोड़ दिए. नमस्कार,’’ रमानाथजी जल्दी से निकलते हुए बोले.

नेताजी और उन के चमचे कुछ समझ नहीं पाए और वे सब रमानाथजी को देखते रह गए.

रमानाथजी सांड़ की ओर देखते हुए रिकशे में बैठ गए. वे सोच रहे थे, ‘मुझे 30 रुपए की बरबादी का गम नहीं है. मुझे तो केवल 2 रुपए नहीं मिलने का दुख ज्यादा है.

Funny Hindi Story : हाईटैक

Funny Hindi Story. जयपुर को ‘गुलाबी नगरी’ के रूप में जाना जाता है. गरीब दास को इस गुलाबी नगरी का एक और रंग नजर आया और वह रंग सुनहरा है. यह रंग कोई साधारण रंग नहीं, बल्कि हाईटैक रंग है.

हुआ यों कि कल वे दफ्तर से घर जा रहे थे. किंग्स रोड से गुजरते हुए एक ट्रैफिक पुलिस ने उन्हें रुकने का इशारा किया.

गरीब दास ने अपनी मोटरसाइकिल को सड़क किनारे ला कर खड़ा किया.

‘‘क्या बात है?’’ उन्होंने सिपाही से पूछा. ‘‘आप की मोटरसाइकिल की रफ्तार इतनी ज्यादा क्यों थी?’’ उस सिपाही ने सवाल के जवाब में सवाल किया.

‘‘रफ्तार तो ज्यादा नहीं थी. मैं खुद ही ज्यादा रफ्तार से नहीं चलता. हो सकता है, थोड़ी ज्यादा हो गई हो. दरअसल, मोटरसाइकिल का स्पीडोमीटर आज ही खराब हो गया है,’’ गरीब दास ने वजह बताई.

‘‘निकालो 8 सौ रुपए,’’ सिपाही ने आदेश किया. गरीब दास को जैसे 440 वोल्ट का झटका लगा. 8 सौ रुपए तो क्या, उन के पास सौ रुपए का ही एक नोट था.

‘‘सिपाहीजी, मुझे माफ कीजिए. अभी ट्रैफिक कम है, इसलिए थोड़ी रफ्तार बढ़ गई होगी. मैं आगे से ध्यान रखूंगा,’’ गरीब दास मिमियाए.

‘‘जाओ, साहब से बात करो,’’ सिपाही ने एक ओर इशारा किया. गरीब दास ने देखा कि साहब वरदी में सजे जिप्सी से सटे हुए खड़े थे.

गरीब दास साहब के पास पहुंचे और अपनी समस्या बता कर माफ करने को कहा. साहब ने उन्हें अपने पीछे आने को कहा और जिप्सी के पीछे ले जा कर उस में बैठे एक और सिपाही के जिम्मे कर दिया.

सिपाही ने उन्हें पहले तो घूरा और जिप्सी में रखे कंप्यूटर के स्क्रीन पर देखने को कहा. गरीब दास ने स्क्रीन पर देखा. उन्होंने स्क्रीन पर खुद को मोटरसाइकिल से आते हुए देखा.

वे इस नजारे को देख कर सपनों में जाने ही वाले थे कि सिपाही ने स्क्रीन के उस भाग को दिखाया, जो उन की मोटरसाइकिल की रफ्तार को दिखा रहा था. उन की मोटरसाइकिल 42 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से जा रही थी, जबकि तय रफ्तार 40 किलोमीटर प्रति घंटा थी.

उस सिपाही ने गरीब दास से पूछा, ‘‘आप की मोटरसाइकिल की रफ्तार तय रफ्तार से ज्यादा क्यों है?’’

‘‘लेकिन यह तो सिर्फ 2 किलोमीटर ही ज्यादा है. आगे से मैं खयाल रखूंगा,’’ गरीब दास बोले.

इस बीच गरीब दास ने देखा कि कुछ मोटरसाइकिलें तो इतनी तेज रफ्तार से जा रही थीं कि उन की रफ्तार किसी भी हाल में 60 किलोमीटर प्रति घंटा से कम न होगी. पर पता नहीं क्यों उन को रोकने की जरूरत वे पुलिस वाले नहीं समझ  रहे थे.

इस के अलावा कई गाडि़यां बहुत ज्यादा धुआं भी छोड़ रही थीं. कुछ गाडि़यां तो ट्रैफिक के सही ढंग से चलने में रुकावट भी पहुंचा रही थीं, पर इस से भी ट्रैफिक वालों पर कोई असर नहीं पड़ रहा था.

उन की निगाहें 2 तरह के लोगों पर ज्यादा टिकी थीं. पहले वे दोपहिया चलाने वाले, जो हैलमैट नहीं पहने थे और वे कार चालक, जो सीट बैल्ट नहीं बांधे हुए थे. इस तरह के लोग उन के लिए आमदनी का अच्छा जरीया थे.

गरीब दास हैलमैट पहने हुए थे. इस के बावजूद उन्हें रोका गया था, तो शायद इस की वजह उन की मोटरसाइकिल का नंबर था, जो किसी और राज्य का था, जहां से गरीब दास तबादला हो कर आए थे. बाहरी राज्य के सवार भी ट्रैफिक पुलिस के लिए आसान शिकार होते हैं.

‘‘अब आप का चालान होगा और कोर्ट से आप गाड़ी छुड़ा लेना,’’ सिपाही ने कहा.

यह सुन कर गरीब दास बेचैन हो गए. कोर्ट का चक्कर? बाप रे बाप, अब क्या किया जाए?

उन की दिमागी हालत को देख कर सिपाही समझ  गया कि लोहा गरम हो गया है, हथौड़ा चलाने का यही सही समय है.

‘‘4 सौ रुपए निकालो, चालान भी नहीं करूंगा और सारे रिकौर्ड्स भी डिलीट कर दूंगा,’’ सिपाही ने कहा.

‘‘पर मेरे पास 4 सौ रुपए नहीं हैं,’’ रोंआसा होते हुए गरीब दास ने कहा.

‘‘अच्छा, चलो 2 सौ रुपए दे दो,’’ सिपाही झुंझला कर बोला. उसे दूसरे ग्राहकों को भी देखना था, जो अपना नंबर लगाए खड़े थे.

‘‘लेकिन मेरे पास तो सौ रुपए का एक नोट है,’’ गरीब दास ने कहा. सिपाही खीज कर बोला, ‘‘चलो, वही दो और दफा हो जाओ.’’

गरीब दास ने झिझकते हुए पर्स से सौ रुपए का एकलौता नोट निकाला और उस सिपाही के हवाले कर दिया. उस सिपाही ने गरीब दास को मोटरसाइकिल ले जाने की इजाजत दे दी.

गरीब दास सिर पर पांव रख कर भागे, पर रिश्वतखोरी में हाईटैक को देख कर हैरान रह गए. उन्होंने सुना था कि ट्रैफिक पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले इस तरह के वाहन को ‘इंटर्सेप्टर’ कहते हैं. सरकारी खजाने को जाने वाले कोष को ये ‘इंटर्सेप्ट’ कर अपनी जेब में रख कर इस नाम को सच साबित कर रहे थे.

सब से खास बात यह कि इस ‘इंटर्सेप्टर ह्वीकल’ को ऐसी जगह पर रखा जाता था, जहां भीड़ कम हो और वाहन चालक थोड़ी ज्यादा रफ्तार से गाड़ी चलाए. साथ ही, ऐसे मोड़ पर किनारे कर इस ह्वीकल को खड़ा किया जाता कि वाहन चालकों की निगाह उस ओर न जाए.

घर पहुंचने पर गरीब दास की पत्नी ने पूछा, ‘‘लाइटर लाए?’’

‘‘नहीं. दरअसल, पैसे एक हाईटैक शो देखने में खत्म हो गए,’’ गरीब दास ने जवाब दिया.

पत्नी कुछ समझ तो नहीं पाईं, पर गरीब दास के चेहरे पर शाम 6 बजे ही 12 बजते देख कर चुप रहीं.

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