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Story in Hindi : कौन जीता कौन हारा

Story in Hindi. मम्मीपापा को चाय दे कर मैं आंगन में आई. भाभी काम कर रही थीं, क्योंकि महरी नहीं आई थी.

मैं ने कह दिया, ‘‘भाभी, कभी अपनी खुशी के बारे में भी तो सोचो.’’ ‘‘क्या बात है?’’

‘‘सुना है कि नटराज सिनेमाघर में अच्छी फिल्म लगी है.’’ ‘‘तो सीधे क्यों नहीं कहती कि फिल्म देखने चलना है.’’

‘‘मैं अकेली नहीं जाऊंगी. भैया कभी जाते नहीं. तुम चलो न.’’

‘‘तुम्हारे भैया को नेतागीरी करने से फुरसत मिले तब न. न जाने कैसे कारखाने के मजदूरों ने उन्हें यूनियन का नेता बना दिया है. वे हमेशा उन से ही घिरे रहते हैं. जब देखो तब बाहर…’’

‘‘तो तुम क्यों अंदर हो?’’ मैं बोली. ‘‘चलो, मैं चलती हूं.’’

भाभी तैयार हो गईं. मेरा दिल धड़कने लगा. मैं ने सोचा, ‘इधर से मैं भाभी को ले जाऊंगी, उधर से रमेश माताजी को ले कर पहुंचेगा. हम दोनों को मिला देंगे… इस तरह दोनों परिवारों की दूरियां कम होंगी.’

रमेश दफ्तर में मेरा बौस था, पर बाहर प्यारा साथी.

नटराज सिनेमाघर पहुंचते ही मैं ने कहा, ‘‘भाभी, चाय हो जाए.’’

रैस्टोरैंट में घुसते ही मैं ने नजर घुमाई, रमेश अभी तक नहीं आया था. मैं भाभी के साथ एक कोने में जा बैठी.

मैं मोबाइल पर नंबर मिलाने लगी, पर कामयाब नहीं हो सकी.

भाभी ने कौफी का और्डर दिया और मेरी ओर मुसकरा कर देखने लगीं. उन्होंने पूछा, ‘‘बारबार बाहर क्या देख रही हो? और किसे फोन…’’

‘‘कुछ नहीं,’’ मैं सकपका गई.

बैरा कौफी ले आया, तभी रमेश अकेला आता हुआ दिखा. पास आ कर वह हैरान होते हुए बोला, ‘‘आप यहां?’’

‘‘जी हां, आप कैसे?’’ मैं ने भी नाटक करते हुए भाभी से उसे मिलाया, ‘‘भाभी, आप हैं रमेश. मेरे दफ्तर में ही काम करते हैं.’’

रमेश ने मुसकराते हुए हाथ जोड़ दिए, तो भाभी भी मुसकरा दीं.

मैं ने बैरे को एक कप कौफी और लाने के लिए कहा और इशारे से जानना चाहा कि माताजी क्यों नहीं आईं?

रमेश ने कहा, ‘‘दफ्तर में कई बार सवि आप के बारे में बता चुकी है.’’

भाभी मेरी ओर देखने के बाद बोलीं, ‘‘पर सवि ने आज तक आप के बारे में कुछ नहीं बताया.’’

‘‘दफ्तर में तमाम लोग हैं. मैं किसकिस के बारे में आप को बताती रहूंगी,’’ मैं ने बहाना बनाना चाहा.

भाभी मुसकराईं व बोलीं, ‘‘रमेशजी को बताने की क्या जरूरत थी?’’

यह सुन कर रमेश बोला, ‘‘बात यह है भाभीजी कि खाली समय में हम दफ्तर में घर के बारे में ज्यादा बातें करते हैं.’’

‘‘पर घर में तो सवि चुप रहना पंसद करती है,’’ भाभी ने चुटकी ली.

बैरा कौफी दे गया. मैं पकड़ी न जाऊं, सो मैं ने यों ही पूछ लिया, ‘‘आप इधर कैसे निकल आए रमेश बाबू?’’

‘‘अगले रविवार को मां का जन्मदिन है. उन के लिए साड़ी खरीदनी है. एक जानपहचान वाले घर आ गए थे, इसलिए वे साथ नहीं आ सकीं. वैसे, पार्टी में आप को भी आना होगा.’’

‘‘मैं अपने भैयाभाभी की इजाजत के बगैर कहीं नहीं जाती.’’

‘‘माफ करना. मैं अभी भाभीजी से इजाजत ले लेता हूं.’’

‘‘यह फैसला सवि के भैया लेंगे. वे जरा कड़क हैं,’’ कहते हुए भाभी गंभीर हो गईं.

थोड़ी देर के बाद घर आते ही भाभी ने भैया से सारी बातें बता दीं.

भैया एक नेता की तरह बोले, ‘‘कल सवि को देखने एक औरत आएंगी. उन्होंने पसंद कर लिया, तो सवि को किसी पार्टी में जाना शोभा नहीं देगा.’’

मैं दफ्तर से घर आई, तो भाभी ने कहा, ‘‘तैयार हो जाओ, कोई तुम्हें देखने आने वाला है.’’

मैं झल्ला उठी, ‘‘मैं नुमाइश की चीज नहीं हूं.’’

अगले दिन मम्मीपापा व भैयाभाभी मुझे साधारण कपड़ों में देख कर चौंक गए. उन्हें ऐसी उम्मीद नहीं थी.

मैं ने देखा, एक बूढ़ी औरत आंखों पर चश्मा चढ़ाए सफेद साड़ी में लिपटी बैठी थीं.

भैया ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी इच्छा को समझ रहा हूं सवि. फिर भी आओ. मैं तुम्हें माताजी से मिलाता हूं, जिन्हें तुम्हारी जैसी पढ़ीलिखी बहू चाहिए.’’

मैं ने सोचा था कि साधारण कपड़ों में देख कर वह औरत मुझे पसंद नहीं करेगी, पर उसे तो साधारण बहू ही चाहिए थी.

भाभी ने मुझे अपने पास बैठाया. उस बूढ़ी औरत ने चश्मे की ओट से मुझे घूरते हुए पूछा, ‘‘बेटी, मैं जानना चाहती हूं कि पारिवारिक संबंधों में कड़वाहट न आए, इस के लिए क्या करना चाहिए?’’

‘‘मुझे किसी परिवार में नौकरी नहीं करनी है कि इंटरव्यू देती फिरूं.’’

मेरा यह जवाब सुन कर मम्मीपापा और भैया गंभीर हो उठे.

वह बूढ़ी औरत बोली, ‘‘मुझे अपने परिवार में ले जाने के लिए तुम्हारे विचार जानने होंगे बेटी.’’

‘‘मेरे ही विचार क्यों मांजी?’’ ‘‘तो और किस के?’’ कहते हुए वह बूढ़ी औरत ?ां?ाला उठी.

‘‘अपने बेटे के.’’ ‘‘उसे मैं जानती हूं.’’

‘‘मैं तो नहीं जानती. आप को उन्हें भी साथ लाना चाहिए था. मान लीजिए, आप का बेटा किसी और को बीवी बनाना चाहता है और आप अपनी इच्छा उस पर थोपना चाहती हों, तो सोचिए, मेरा भविष्य कैसा होगा?’’

‘‘न जाने क्या हो गया है इस नौजवान पीढ़ी को, जो सीधे सवाल का सीधा जवाब नहीं देती.’’

‘‘जी हां…’’ भैया ने उस औरत का समर्थन किया, ‘‘कल आप का बेटा भी मेरे किसी भी सवाल का सीधा जवाब नहीं दे रहा था.’’

‘‘मेरी समझ से यह संबंध जोड़ने की बात यहीं छोड़ देनी चाहिए.’’

‘‘जी हां, क्योंकि मैं ने आप को और आप के बेटे ने भैया को उलटा जवाब दे दिया है,’’ मैं ने और चिढ़ाया.

भैया अपनी हार होते देख गंभीर हो गए और बोले, ‘‘अच्छाबुरा मैं समझाता हूं. मैं ने मजदूरों और मालिक के बीच कई समस्याएं सुलझाई हैं. मांजी का परिवार सवि के लिए ठीक है, इसलिए मैं ने इन्हें यहां बुलाया है.’’

‘‘गलत फैसले पर मजदूरों ने आप के खिलाफ नारा भी तो लगाया होगा.’’

भैया मेरी ओर देख कर मुसकराए और बोले, ‘‘तुम्हें सुनयना के यहां जाना है न? इन को भी उधर ही जाना है. रिकशे पर साथ चली जाओ.’’

मैं खुश थी. सुनयना के बहाने रमेश से पार्क में मिलने जो जाना था.

रास्ते में मैं ने उस बुजुर्ग औरत से पूछ लिया, ‘‘क्या आप मुझ से अभी भी नाराज हैं?’’

‘‘तुम्हें इस से क्या? वैसे, मैं परेशान जरूर हूं. मैं नहीं समझा पा रही हूं कि तुम्हारी तरह मेरा बेटा भी क्यों ऐसा हो गया है? वह हर किसी के सवालों के जवाब टेढ़े ही देता है.’’

‘‘वे आदमी ही टेढ़े होंगे.’’   ‘‘नहीं, एक फैक्टरी में वह अफसर है. उस का नाम रमेश वर्मा है.’’

यह सुन कर मेरी आंखें हैरानी से फैल गईं.

‘‘क्या सोचने लगी बेटी?’’   ‘‘जी, मैं रमेशजी को जानती हूं.’’

‘‘अच्छा, तब तो तुम उस के स्वभाव से भी परिचित होगी? पर अब क्या फायदा?’’ यह कह कर जैसे उन्होंने मुझे हराना चाहा.

मैं बोल उठी, ‘‘सुना है, रमेशजी दफ्तर में काम करने वाली एक पागल लड़की से शादी करना चाहते हैं.’’

मांजी का चेहरा देखने लायक था.

‘‘यहीं रोको, सामने ही मेरा घर है…’’ उन मांजी ने रिकशे वाले से कहा.

तभी उस घर से रमेश को स्कूटर पर बाहर निकलते देख मैं चौंक उठी. वह मुझ से मिलने पार्क जा रहा था.

‘‘अरे, तुम… मेरी मां के साथ?’’ रमेश को मुझे वहां देख कर हैरानी हुई.

‘‘मुझे माफ कर दो रमेश… मैं अनजाने में ही मांजी के सवालों के जवाब टेढ़े दे गई.’’

‘‘तो माफी भी मां से ही मांगो…’’ रमेश ने मुझे चिढ़ाया, ‘‘मां, तुम ठीक तो हो न?’’

‘‘नहीं, नाराज हूं. तू दफ्तर की किस पागल लड़की को अपनी बीवी बनाना चाहता है?’’

रमेश बोला, ‘‘तुम उसे अपने साथ ले आई हो मां.’’

यह सुन कर मांजी हैरान रह गईं और बोलीं, ‘‘तो यह बात है? इसीलिए अकुलजी परेशान दिख रहे थे.’’

‘‘वही, जो कल आए थे?’’

‘‘वे इस पागल लड़की के बड़े भैया हैं,’’ मांजी बोलीं.

‘‘मुझे माफ करना सवि… मैं ने भी उन के सवालों के टेढ़े जवाब दिए थे.’’

‘‘मुझ से नहीं, आप भैया से माफी मांगना,’’ मैं ने कहा.

यह सुन कर मांजी हंसते हुए बोलीं, ‘‘मैं समझ नहीं पा रही हूं कि कौन जीता और कौन हारा.’’ Story in Hindi

Relationship Story in Hindi : अवंतिका

Relationship Story in Hindi. बिजनौर की अवंतिका की शादी मेरठ के पौश इलाके गंगानगर के रहने वाले रिटायर्ड जेलर दीपचंद्र सिंह चहल के बड़े बेटे राहुल से तय हुई तो वह खुशी से  झूम उठी. उस की ससुराल वालों का खूब नाम था. पैसे की कोई कमी न थी. बहुओं को सास का बड़ा डर सताता है, यहां तो सास ही नहीं थी. वे बहुत पहले इस दुनिया से कूच कर गई थीं. हां, उस का एक देवर जरूर था लेकिन उसे तो घर की बड़ी बहू बनने का मौका मिल रहा था.

जेलर दीपचंद्र का ज्यादातर समय जेल की कोठरियों को देख कर बीता था. उन की सोच अभी भी जेलर वाली ही थी. इस की  झलक उन के बड़े मकान में दिखाई पड़ती थी. उनके दुमंजिले मकान में जेल की कोठरियों की तरह कमरे ही कमरे थे. घर की मेन एंट्री पर एक बड़ा मजबूत सा लोहे का गेट लगा था. कोई अजनबी उस मकान में घुस जाए तो उसे भूलभुलैया ही सम झ बैठे. उन्होंने उस मकान में किराएदारों को भी ऐसे ही ठूंसठूंस कर रखा हुआ था जैसे जेल में कैदी. हर कमरे में किराएदार ही किराएदार.

जेलर दीपचंद्र ने वहीं बीच में एक औफिसनुमा कमरा बना रखा था जहां से वे पूरे मकान और किराएदारों पर नजर रखते थे. उसी कमरे में वे सुबह नाश्ता पानी करने के बाद बैठ जाया करते थे. किराएदारों वाला रजिस्टर चैक करते थे कि किस का किराया आया और किस का नहीं. वहीं पर वे अपने मेहमानों या दूसरे लोगों से मिला करते थे. सुबह और शाम को पूरे मकान का एक राउंड वे जरूर ही लगाया करते थे.

उन्होंने अपने दोनों बेटों राहुल और सागर को दवाओं के कारोबार में लगा रखा था. एक बड़ा मैडिकल स्टोर मेन रोड पर खुलवा रखा था. उन का बड़ा बेटा राहुल अल्ट्रामौडर्न था. दोस्तों के संग कौकटेल पार्टी, हुक्का पार्टी करना उस का शौक था. पैसे की कोई कमी थी नहीं इसलिए राहुल की मौजमस्ती में भी कोई कमी आड़े नहीं आती थी.

अवंतिका राहुल को पहली ही नजर में भा गई थी. दीपचंद्र का नाम इतना बड़ा था कि उन की शोहरत की आड़ में राहुल के सब ऐब ढक गए थे. जब किसी रिश्तेदार ने अवंतिका के पिता को इशारों ही इशारों में बताया था कि राहुल शराब पीता है तो उन्होंने तपाक से कहा, ‘‘अरे भाई, आजकल शराब कौन नहीं पीता? ये तो बड़े लोगों के शौक हुआ करते हैं.’’

लेकिन यह बात उन्होंने अवंतिका से जानबू झ कर छिपाई. उन्हें डर था कि उन की बेटी की शादी एक अमीर परिवार में हो रही है, राहुल के शराब पीने की बात पर कहीं कोई अड़चन पैदा न हो जाए.

अवंतिका और राहुल की शादी मेरठ के एक बड़े होटल में बड़ी धूमधाम के साथ हो गई. बड़ी नामीगिरामी हस्तियां इस शादी समारोह में शामिल हुईं. पुलिस महकमे के आला अफसर वरवधु को आशीर्वाद देने के लिए पधारे.

अवंतिका को तो अपनी इस शादी पर बड़ा गुमान हो रहा था कि उस का शादी समारोह कितने शानदार ढंग से हो रहा है.

लेकिन सुहागरात को ही अवंतिका के सपने तब चकनाचूर हो गए जब राहुल नशे की हालत में उस के पास पहुंचा. वह बहकीबहकी बातें कर रहा था और होशोहवास में नहीं था. वह तो उस की हालत को देख कर ही घबरा उठी. वह बैड के एक कोने में सिमट कर बैठ गई और वह नशेडि़यों की तरह हरकतें करता रहा और फिर बेसुध हो गया.

सुहागरात को ही अवंतिका के सारे अरमान ताश के पत्तों की तरह बिखर गए. हालांकि, नशा उतरते ही सुबह के समय राहुल ने उस से माफी मांग ली लेकिन अब माफी मांगने से कोई फायदा होने वाला नहीं था. एक लड़की जिस रात को अपनी जिंदगी की सब से खास रात मानती है, वह तो गुजर चुकी थी.

राहुल ने इस की भरपाई करने की बहुत कोशिश की. वह अवंतिका को एक लंबे टूर पर गोवा और अंदमान निकोबार द्वीप समूह ले कर गया. उस की हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश की. अवंतिका ने भी उसे दिल से माफ कर दिया और जीवन में मधुर रस घोलने की कोशिश की. कुछ खट्टेमीठे अनुभवों के साथ 2 साल गुजर गए और वह एक बेटी सान्वी की मां भी बन गई.

अवंतिका के कहने से राहुल ने शराब पीना कम तो कर दिया था, लेकिन बंद नहीं किया था. किसीकिसी दिन तो वह यारदोस्तों के संग इतनी पी लेता था कि उसे संभालना तक मुश्किल हो जाता था. तब अवंतिका को लगता था कि उस की जिंदगी नरक बन गई है.

कोई भी औरत अपने आदमी को बिस्तर पर कभी भी बेसुध देखना नहीं चाहती. उस की भी तो अपनी इच्छाएं होती हैं. एक ओर भरा बंधा यौवन और दूसरी ओर बेसुध पड़ा आदमी. दिनभर का रोमांटिक मूड पलभर में स्वाह. आखिर कौन औरत ऐसा चाहेगी?

लेकिन नशे की आदत कुत्ते की टेढ़ी दुम की तरह होती है. न दुम सीधी होती है और न ही नशा छूटता है. राहुल के साथ भी ऐसा ही था. आएदिन वह नशे की हालत में घर पहुंचता. उस का छोटा भाई सागर ही उसे उठा कर बिस्तर तक लाता. कभीकभी अवंतिका को भी नशे में चूर राहुल को उठाने में सागर की सहायता करनी पड़ती. उस समय सागर के हाथों का स्पर्श उसे अलग ही आनंद देता था.

एक दिन अवंतिका ने सागर से कहा, ‘‘देवरजी, ऐसा कब तक चलेगा? आप अपने भाई को शराब पीने से रोकते क्यों नहीं? इन्हें सम झाते क्यों नहीं?’’

‘‘भाभी, मैं तो बहुत मना करता हूं लेकिन भैया मानते ही नहीं. शाम होते ही इन पर न जाने कौन सा फुतूर सवार हो जाता है कि पिए बिना रहते ही नहीं.’’

‘‘देवरजी, ऐसे काम नहीं चलने वाला. कितनी ही रातें तुम्हारे भैया के चक्कर में मु झे जाग कर गुजारनी पड़ती हैं.’’

‘‘तो भाभी, आप जागती क्यों हो? सो जाया करो.’’

‘‘इन्हें इस हालत में छोड़ कर देवरजी, आप सम झो तो सही मु झे नींद ही कैसे आएगी?’’

धीरेधीरे इन बातों का दायरा बढ़ने लगा. अवंतिका को अपने देवर सागर से बातें करने में अजीब सा सुकून मिलता. इस सुकून का दायरा भी धीरेधीरे बढ़ कर बांहों की पनाह तक पहुंच गया. सागर का कमरा बराबर में ही था. जब राहुल बिस्तर पर नशे में चूर पड़ा होता था तब अवंतिका सागर की बांहों में असीम सुकून पा रही होती थी.

ससुर दीपचंद्र को जब इस की भनक लगी तो उन्होंने चुप रहना ही बेहतर सम झा. ये हालात देख कर उन्होंने अपने औफिस को ही अपना बैडरूम बना लिया. घर के अंदर आना कम से कम कर दिया मानो ऐसा कर के वे अवंतिका और सागर के संबंधों को अपनी मौन स्वीकृति दे रहे हों. अब वे अपना ज्यादातर समय वहीं गुजारने लगे.

राहुल को जब अवंतिका और सागर के संबंधों का पता चला तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई लेकिन वह क्या करे गलती खुद उस की थी. लेकिन कौन मर्द होगा जो अपनी पत्नी को दूसरों की बांहों में होने की बात सुन कर चुप रह जाए. वह तो अंदर ही अंदर सुलग रहा था और मौका मिलते ही भड़क उठा, ‘‘अवंतिका, ऐसा नीच काम कोई गिरी हुई औरत ही कर सकती है जो तुम कर रही हो.’’

अवंतिका भी इस लांछन को सुन कर चुप रहने वाली नहीं थी. वह भी फट पड़ी, ‘‘मु झे नीच औरत कहने में तो तुम्हें शर्म नहीं आती लेकिन ये हालात पैदा किस ने किए? रात में शराब के नशे में चूर बिस्तर पर आ कर पड़ जाते हो उस का क्या?’’

‘‘तो तुम यह सब करोगी क्या?’’

‘‘मैं ब्याहता हूं कोई संन्यासिनी नहीं. मेरे बदन को भी भूखप्यास लगती है. अगर नशे में ऐसे ही चूर रहना था तो शादी ही क्यों की?’’

ऐसा कह कर अवंतिका अपनी बिटिया सान्वी को ले कर किचन में चली गई और राहुल सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया. इस बेवफाई से वह बुरी तरह टूट गया. अब तो वह अपना गम भुलाने के लिए कभी भी पीनी शुरू कर देता. न वह दिन देखता, न रात.

अब उस का मन किसी काम में भी नहीं लगता. सारी दुनिया उसे बेगानी सी लगती. हर समय वह अवंतिका को  झिड़कता रहता. उसे दुत्कारता रहता. न जाने क्याक्या बड़बड़ाता रहता. अवंतिका भी उस के प्रति ढीठ बन गई थी. उस ने राहुल की चिंता ही करनी छोड़ दी. वह जोकुछ भी कहता उसे वह एक कान से सुनती दूसरे से निकाल देती.

राहुल को लगता था जैसे उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया हो. उसे पता था कि घर में वह 24 घंटे अपनी पत्नी की निगरानी नहीं कर सकता. सागर की जगह कोई और होता तो शायद वह उसे गोली से ही उड़ा देता, लेकिन छोटे भाई पर वह गोली कैसे चलाए? उस पर गोली चलाने की बात सोच कर ही उस की रूह कांप जाती.

जिस भाई के साथ उस ने इतने साल इतने प्रेम से गुजारे, आज वह उस पर गोली चला कर उस की जान लेले… नहींनहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता. इस से बेहतर तो यही है कि वह खुद अपनी जान देदे. अब उस के जीवन में हताशा और निराशा के सिवा कुछ नहीं बचा था.

दीपचंद्र सबकुछ जान कर भी अनजान बने हुए थे. वे घर की बात को घर में ही रखना चाहते थे. वे जानते थे कि ये हालात इतने खतरनाक और काबू से बाहर हो चुके हैं कि कभी भी कुछ भी हो सकता है.

उन्हें पता था कि राहुल ने अगर शराब पीनी नहीं छोड़ी तो अवंतिका अब कभी उस की नहीं हो सकेगी. राहुल के सामने यही बड़ी समस्या थी कि वह शराब के नशे का दास बन चुका था और दासत्व की बेडि़यों में जकड़ा आदमी कभी कुछ नहीं कर सकता.

दीपचंद्र सोचते बहुत थे, लेकिन करते कुछ नहीं थे. यहां तक कि उन्होंने अवंतिका से भी इस मसले पर कभी खुल कर बात नहीं की. वे तो सागर के लिए आने वाले रिश्तों को भी इसीलिए टालते रहे कि पता नहीं आगे क्या हो.

एक दिन राहुल ने अवंतिका और सागर को एक साथ देख लिया. वह उस समय भी नशे में था लेकिन उन दोनों को साथ देख कर उस का नशा काफूर हो गया. वह अपने ऊपर से कंट्रोल खो बैठा और घर में रखी लाइसैंसी बंदूक उठा लाया.

वह अवंतिका को गोली मारना चाहता था लेकिन सागर के बीच में आ जाने से उस का निशाना चूक गया. फिर भी कुछ छर्रे अवंतिका को लग ही गए.

सागर और दीपचंद्र अवंतिका को तुरंत अस्पताल ले कर गए जहां डाक्टरों ने कड़ी मशक्कत से उस के शरीर में घुसे छर्रों को निकाला. पुलिस केस भी दर्ज हुआ, लेकिन दीपचंद्र ने अपने असर और पैसे से केस ही बदलवा दिया.

अब केस यह बना कि अवंतिका घर की सफाई करते समय बंदूक को एक जगह से उठा कर दूसरी जगह रख रही थी तभी लापरवाही से बंदूक का ट्रिगर दब गया और गोली चल गई, जिस के कारण कुछ  छर्रे अवंतिका को लगे. इस तरह से पुलिस केस रफादफा हो गया.

लेकिन लोग इतने भोले नहीं थे. सच्चाई धीरेधीरे सब को पता चल रही थी. अवंतिका ने सबकुछ हिम्मत से सहन किया. वह अभी भी इस इंतजार में थी कि राहुल संभल जाए तो वह अपने देवर की शादी किसी और से करा दे, लेकिन वह इतनी होशियार भी थी कि अगर उस का पति नहीं सुधरता है तो वह देवर को अपना बना कर रखेगी और उस की शादी में अड़ंगे लगाएगी. किसी भी सूरत में वह उस की शादी नहीं होने देगी.

इस तरह से वह अपने जीवन को सुरक्षित रखेगी भले ही दुनिया कुछ भी कहे. वह सागर को अपने पति की तरह ट्रीट करने लगी थी. कोई क्या कह रहा था उस ने इस की चिंता करनी बंद कर दी थी.

राहुल ने जब से उन दोनों को साथ देखा था तब से वह और ज्यादा टूट गया था. वह खुद को संभाल नहीं पा रहा था. अब दुनिया में उस का एक ही सहारा था और वह थी शराब. अब वह हर समय नशे में डूबा रहता.

उस ने बाहर आनाजाना भी छोड़ दिया था. नशा उतरते ही उस की आंखों के सामने वही घातक दृश्य घूमने लगता जिस में उस ने अपनी पत्नी को सागर के साथ गलबहियां करते देखा था. यह उस के लिए असहनीय था. इस के बाद वह फिर से जाम पर जाम चढ़ाने लगता और अवंतिका को गंदीगंदी गालियां बकने लगता.

अवंतिका पर इन गालियों का रत्तीभर भी असर नहीं होता, बल्कि वह इन गालियों को सुन कर खुद को और मजबूत कर रही होती. उसे तो इस लाचार ओर शराबी आदमी पर तरस ही आता. उसे पता था कि वह शराब पीने और गालियां बकने के अलावा कुछ नहीं कर सकता.

दीपचंद्र ने इन हालात का आकलन कर के मन में बहुतकुछ सोच लिया था. इसी आधार पर वे न तो राहुल को कुछ सम झाते और न ही उसे डाक्टर के पास ले कर जाते. इस मामले में वे बिलकुल निष्क्रिय हो गए थे और अवंतिका के साथ मजबूती से खड़े थे. उन्हें पता था कि राहुल पूरी तरह से बरबाद हो चुका है और इस के लिए वह खुद जिम्मेदार है. उस का इस दुनिया में रहना न रहना बराबर है. इस के लिए उन्होंने अपने कलेजे पर पत्थर रख लिया था, आखिर बेटा तो वह उन्हीं का था.

ज्यादा शराब पीने के चलते आखिरकार राहुल का जिगर जवाब दे गया. अवंतिका और परिवार के दूसरे सदस्यों को इस का अंदाजा पहले से ही था. जब वे उसे अस्पताल ले कर गए तो वह मरने की हालत में पहुंच चुका था. उस का चैकअप कर डाक्टरों ने अपने हाथ खड़े कर दिए. घर पहुंचते ही वह मर गया. वह हड्डियों का ढांचा मात्र बचा था.

दिखाने के लिए सब रोए, लेकिन मन ही मन सब ने चैन की सांस ली कि एक मुसीबत टली. कुदरत ने आखिरकार अपना अनोखा फैसला कर ही दिया था. कमजोर को जाना है, मजबूत को जीवन का आनंद लेना है. प्रकृति की नजर में राहुल कमजोर साबित हुआ और अवंतिका मजबूत.

अब अवंतिका के लिए कोई रोकटोक नहीं थी. राहुल का जाना अवंतिका के लिए ही नहीं सब के लिए अंदरूनी खुशियां ले कर आया था. खराब और कमजोर किसी को बरदाश्त नहीं चाहे परिवार हो समाज हो या कुदरत. दुनिया में रहना तो काबिल बनना ही होगा. नकारा लोग खुद ब खुद हाशिए पर चले जाते हैं.

राहुल की तेरहवीं होते ही दीपचंद्र ने अवंतिका के मातापिता को बुला कर उन से बात की. अवंतिका और सागर से उन्होंने पहले ही बात कर ली थी. सब यही चाहते थे कि घर की दौलत और सम्मान के साथ घर में ही रहे.

दीपचंद्र ने सम झदारी दिखाते हुए एक सादा समारोह आयोजित कर के अवंतिका और सागर को शादी के बंधन में बांध दिया, लेकिन कोर्ट में कानूनी कार्यवाही करना वे नहीं भूले. उन की शादी का रजिस्ट्रेशन करवा कर सर्टिफिकेट हासिल किया जिस से भविष्य में कोई अड़चन न आए.

अवंतिका की जिंदगी में फिर से इतनी मुसीबतों के बाद खुशियों की बहार आ गई थी. वह जिंदगी के नए सवेरे में ताजगी और उमंग भरने के लिए सागर के साथ दिल्ली एयरपोर्ट से स्पेन के लिए उड़ चली जहां उसे अपना हनीमून मनाना था. पुरानी जिंदगी और यादों को दफन करना था और नई जिंदगी को गुलाबों की बगिया की तरह महकाना था. Relationship Story in Hindi

Mobile Phone and Family : मां और मोबाइल

Mobile Phone and Family. ‘‘मेरा मोबाइल कहां है? कितनी बार कहा है कि मेरी चीजें इधरउधर मत किया करो पर तुम सुनती कहां हो,’’ आफिस जाने की हड़बड़ी में मानस अपनी पत्नी रोमा पर बरस पड़े थे.

‘‘आप की और आप के बेटे राहुल के कार्यालय और स्कूल जाने की तैयारी में सुबह से मैं चकरघिन्नी की तरह नाच रही हूं, मेरे पास कहां समय है किसी को फोन करने का जो मैं आप का मोबाइल लूंगी,’’ रोमा खीझपूर्ण स्वर में बोली थी.

‘‘तो कहां गया मोबाइल? पता नहीं यह घर है या भूलभुलैया. कभी कोई सामान यथास्थान नहीं मिलता.’’

‘‘क्यों शोर मचा रहे हो, पापा? मोबाइल तो दादी मां के पास है. मैं ने उन्हें मोबाइल के साथ छत पर जाते देखा था,’’ राहुल ने मानो बड़े राज की बात बताई थी.

‘‘तो जा, ले कर आ…नहीं तो हम दोनों को दफ्तर व स्कूल पहुंचने में देर हो जाएगी…’’

पर मानस का वाक्य पूरा हो पाता उस से पहले ही राहुल की दादी यानी वैदेहीजी सीढि़यों से नीचे आती हुई नजर आई थीं.

‘‘अरे, तनु, मेरे ऐसे भाग्य कहां. हर घर में तो श्रवण कुमार जन्म लेता नहीं,’’ वे अपने ही वार्त्तालाप में डूबी हुई थीं.

‘‘मां, मुझे देर हो रही है,’’ मानस अधीर स्वर में बोले थे.

‘‘पता है, इसीलिए नीचे आ रही हूं. तान्या से बात करनी है तो कर ले.’’

‘‘मैं बाद में बात कर लूंगा. अभी तो मुझे मेरा मोबाइल दे दो.’’

‘‘मुझे तो जब भी किसी को फोन करना होता है तो तुम जल्दी में रहते हो. कितनी बार कहा है कि मुझे भी एक मोबाइल ला दो, पर मेरी सुनता ही कौन है. एक वह श्रवण कुमार था जिस ने मातापिता को कंधे पर बिठा कर सारे तीर्थों की सैर कराई थी और एक मेरा बेटा है,’’ वैदेहीजी देर तक रोंआसे स्वर में प्रलाप करती रही थीं पर मानस मोबाइल ले कर कब का जा चुका था.

‘‘मोबाइल को ले कर क्यों दुखी होती हैं मांजी. लैंडलाइन फोन तो घर में है न. मेरा मोबाइल भी है घर में. मैं भी तो उसी पर बातें करती हूं,’’ रोमा ने मांजी को समझाना चाहा था.

‘‘तुम कुछ भी करो बहू, पर मैं इस तरह मन मार कर नहीं रह सकती. मैं किसी पर आश्रित नहीं हूं. पैंशन मिलती है मुझे,’’ वैदेही ने अपना क्रोध रोमा पर उतारा था पर कुछ ही देर में सब भूल कर घर को सजासंवार कर रोमा को स्नानगृह में गया देख कर उन्होंने पुन: अपनी बेटी तान्या का नंबर मिलाया था.

‘‘हैलो…तान्या, मैं ने तुम से जैसा करने को कहा था तुम ने किया या नहीं?’’ वे छूटते ही बोली थीं.

‘‘वैदेही बहन, मैं आप की बेटी तान्या नहीं उस की सास अलका बोल रही हूं.’’

‘‘ओह, अच्छा,’’ वे एकाएक हड़बड़ा गई थीं.

‘‘तान्या कहां है?’’ किसी प्रकार उन के मुख से निकला था.

‘‘नहा रही है. कोई संदेश हो तो दे दीजिए. मैं उसे बता दूंगी.’’

‘‘कोई खास बात नहीं है, मैं कुछ देर बाद दोबारा फोन कर लूंगी,’’ वैदेही ने हड़बड़ा कर फोन रख दिया था. पर दूसरी ओर से आती खनकदार हंसी ने उन्हें सहमा दिया था.

‘कहीं छोकरी ने बता तो नहीं दिया सबकुछ? तान्या दुनियादारी में बिलकुल कच्ची है. ऊपर से यह फोन. स्थिर फोन में यही तो बुराई है. घरपरिवार को तो क्या सारे महल्ले को पता चल जाता है कि कहां कैसी खिचड़ी पक रही है. मोबाइल फोन की बात ही कुछ और है…किसी भी कोने में बैठ कर बातें कर लो.’ उन की विचारधारा अविरल जलधारा की भांति बह रही थी कि अचानक फोन की घंटी बज उठी थी.

‘‘हैलो मां, मैं तान्या. मां ने बताया कि जब मैं स्नानघर में थी तो आप का फोन आया था. कोई खास बात थी क्या?’’

‘‘खास बात तो कितने दिनों से कर रही हूं पर तुम्हें समझ में आए तब न. अरे, जरा अक्ल से काम लो और निकाल बाहर करो बुढि़या को. जब देखो तब तुम्हारे यहां पड़ी रहती है. कब तक उस की गुलामी करती रहोगी?’’

‘‘धीरे बोलो मां, कहीं मांजी ने सुन लिया तो बुरा मानेंगी.’’

‘‘फोन पर हम दोनों के बीच हुई बात को कैसे सुनेगी वह?’’

‘‘छोड़ो यह सब, शनिवाररविवार को आप से मिलने आऊंगी तब विस्तार से बात करेंगे. जो जैसा चल रहा है चलने दो. क्यों अपना खून जलाती हो.’’

‘‘मैं तो तेरे भले के लिए ही कहती हूं पर तुम लोगों को बुरा लगता है तो आगे से नहीं कहूंगी,’’ वैदेही रोंआसे स्वर में बोली थीं.

‘‘मां, क्यों मन छोटा करती हो. हम सब आप का बड़ा सम्मान करते हैं. यथाशक्ति आप की सलाह मानने का प्रयत्न करते हैं पर यदि आप की सलाह हमारा अहित करे तो परेशानी हो जाती है.’’

‘‘लो और सुनो, अब तुम्हें मेरी बातों से परेशानी भी होने लगी. ठीक है, आज से कुछ नहीं कहूंगी,’’ वैदेही ने क्रोध में फोन पटक दिया था और मुंह फुला कर बैठ गई थीं.

‘‘क्या हुआ, मांजी, सब ठीक तो है?’’ उन्हें दुखी देख कर रोमा ने प्रश्न किया.

‘‘क्यों? तुम्हें कैसे लगा कि सब ठीक नहीं है?’’ वैदेही ने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न ही पूछ लिया.

‘‘आप का मूड देख कर.’’

‘‘मैं सब समझती हूं. छिप कर मेरी बातें सुनते हो तुम लोग. इसीलिए तो मोबाइल लेना चाहती हूं मैं.’’

‘‘मैं ने आज तक कभी किसी का फोन वार्त्तालाप नहीं सुना. आप को दुखी देख कर पूछ लिया था. आगे से ध्यान रखूंगी,’’ रोमा तीखे स्वर में बोली और अपने काम में व्यस्त हो गई.

वैदेही बेचैनी से तान्या के आने की प्रतीक्षा करती रही कि कब तान्या आए और कब वे उस से बात कर के अपना मन हलका करें पर जब सांझ ढलने लगी और तान्या नहीं आई तो उन का धीरज जवाब देने लगा. मानस सुबह से अपने मोबाइल से इस तरह चिपका था कि उन्हें तान्या से बात करने का अवसर ही नहीं मिल रहा था.

‘‘मुझे अपनी सहेली नीता के यहां जाना है, मांजी. मैं सुबह से तान्या दीदी की प्रतीक्षा में बैठी हूं पर लगता है कि आज वे नहीं आएंगी. आप कहें तो मैं थोड़ी देर के लिए नीता के घर हो आऊं. उस का बेटा बीमार है,’’ रोमा ने आ कर वैदेही से अनुनय की तो वे मना न कर सकीं.

रोमा को घर से निकले 10 मिनट भी नहीं बीते होंगे कि तान्या ने कौलबेल बजाई.

‘‘लो, अब समय मिला है तुम्हें मां से मिलने आने का? सुबह से दरवाजे पर टकटकी लगाए बैठी हूं. आंखें भी पथरा गईं.’’

‘‘इस में टकटकी लगा कर बैठने की क्या बात थी, मां?’’ मानस बोल पड़ा, ‘‘आप मुझ से कहतीं मैं तान्या दीदी से फोन कर के पूछ लेता कि वे कब तक आएंगी.’’

‘‘लो और सुनो, सुबह से पता नहीं किसकिस से बात कर रहा है तेरा भाई. सारे काम फोन कान से चिपकाए हुए कर रहा है. बस, सामने बैठी मां से बात करने का समय नहीं है इस के पास.’’

‘‘क्या कह रही हो मां. मैं तो सदासर्वदा आप की सेवा में मौजूद रहता हूं. फिर राहुल है, रोमा है जितनी इच्छा हो उतनी बात करो,’’ मानस हंसा.

‘‘2 बेटों, 2 बेटियों का भरापूरा परिवार है मेरा पर मेरी सुध लेने वाला कोई नहीं है. यहां आए 2 सप्ताह हो गए मुझे, तान्या को आज आने का समय मिला है.’’

‘‘मेरा बस चले तो दिनरात आप के पास बैठी रहूं. पर आजकल बैंक में काम बहुत बढ़ गया है. मार्च का महीना है न. ऊपर से घर मेहमानों से भरा पड़ा है. 3-4 नौकरों के होने पर भी अपने किए बिना कुछ नहीं होता,’’ तान्या ने सफाई दी थी.

‘‘इसीलिए कहती हूं अपने सासससुर से पीछा छुड़ाओ. सारे संबंधी उन से ही मिलने तो आते हैं.’’

‘‘क्या कह रही हो मां, कहीं मांजी ने सुन लिया तो गजब हो जाएगा. बहुत बुरा मानेंगी.’’

‘‘पता नहीं तुम्हें कैसे शीशे में उतार लिया है उन्होंने. और 2 बेटे भी तो हैं, वहां क्यों नहीं जा कर रहतीं?’’

‘‘जौय और जोषिता को मांजी ने बचपन से पाल कर बड़ा किया है. अब तो स्थिति यह है कि बच्चे उन के बिना रह ही नहीं पाते. दोचार दिन के लिए भी कहीं जाती हैं तो बच्चे बीमार पड़ जाते हैं.’’

‘‘तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को कठपुतली बना कर रखा है उन्होंने. जैसा चाहते हैं वैसा नचाते हैं दोनों. सारा वेतन रखवा लेते हैं. दुनिया भर का काम करवाते हैं. यह दिन देखने के लिए ही इतना पढ़ायालिखाया था तुम्हें?’’

‘‘किसी ने जबरदस्ती मेरा वेतन कभी नहीं छीना है मां. उन के हाथ में वेतन रखने से वे लोग भी प्रसन्न हो जाते हैं और मेरे सासससुर भी वह पैसा अपनी जेब में नहीं रख लेते बल्कि उन्हें हमारे पर ही खर्च कर देते हैं. जो बचता है उसे निवेश कर देते हैं. ’’

‘‘पर अपना पैसा उन के हाथ में दे कर उन की दया पर जीवित रहना कहां की समझदारी है?’’

‘‘मां, आप क्यों तान्या दीदी के घर के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करती हैं,’’ इतनी देर से चुप बैठा मानस बोला था.

‘‘अरे, वाह, अपनी बेटी के हितों की रक्षा मैं नहीं करूंगी तो कौन करेगा. पर मेरी बेटी तो समझ कर भी अनजान बनी हुई है.’’

‘‘मां, मैं आप के सुझावों का बहुत आदर करती हूं पर साथ ही घर की सुखशांति का विचार भी करना पड़ता है.’’

‘‘वही तो मैं कह रहा हूं. अपनी समस्याएं क्या कम हैं, जो आप तान्या दीदी की समस्याएं सुलझाने लगीं? और मां, आप ने तो दीदी के आते ही अपने सुझावों की बमबारी शुरू कर दी. न चाय, न पानी…कुछ तो सोचा होता,’’ मानस ने मां को याद दिलाया.

‘‘रोमा अभी तक लौटी नहीं जबकि उसे पता था कि तान्या आने वाली है. फोन करो कि जल्दी से घर आ जाए.’’

‘‘फोन करने की जरूरत नहीं है. वह स्वयं ही आ जाएगी. उस की मां आई हुई हैं, उन से मिलने गई है.’’

‘‘मां आई हुई हैं? मुझ से तो कह कर गई है कि नीता का बेटा बीमार है. उसे देखने जा रही है.’’

‘‘उसे भी देखने गई है. कई दिनों से सोच रही थी पर जा नहीं पा रही थी. नीता के घर के पास रोमा के दूर के रिश्ते के मामाजी रहते हैं. वे बीमार हैं और रोमा की मम्मी उन्हें देखने आई हुई हैं.’’

‘‘ठीक है, सब समझ में आ गया. मां से मिलने जा रही हूं यह भी तो कह कर जा सकती थी, झूठ बोल कर जाने की क्या आवश्यकता थी. रोमा अपना फोन तो ले कर गई है?’’

‘‘हां, ले गई है.’’

‘‘ला, अपना फोन दे तो मैं उस से बात करूंगी.’’

‘‘क्या बात करेंगी आप? वह अपनेआप आ जाएगी,’’ मानस ने तर्क दिया.

‘‘फोन कर दूंगी तो जल्दी आ जाएगी. तान्या आई है तो खाना खा कर ही जाएगी न…’’

‘‘आप चिंता न करें मां, मैं खाना नहीं खाऊंगी. आप को जो खाना है मैं बना देती हूं,’’ तान्या ने उन्हें बीच में ही टोक दिया.

‘‘फोन तो दे मानस, रोमा से बात करनी है,’’ वैदेही जिद पर अड़ी थीं.

‘‘एक शर्त पर मोबाइल दूंगा कि आप रोमा से कुछ नहीं कहेंगी. बेचारी कभीकभार घर से बाहर निकलती है. दिनभर घर के काम में जुटी रहती है.’’

‘‘ठीक है, रोमा को कुछ नहीं कहूंगी, उस की मां से बात करूंगी. कहूंगी आ कर मिल जाएं. बहुत लंबे समय से मिले नहीं हम दोनों.’’

मां को फोन थमा कर मानस और तान्या रसोईघर में जा घुसे थे.

‘‘हैलो रोमा, तुम नीता के बीमार बेटे से मिलने की बात कह कर गई थीं. सौदामिनी बहन के आने की बात तो साफ गोल कर गईं तुम,’’ वैदेही बोलीं.

‘‘नहीं मांजी, ऐसा कुछ नहीं था. मुझे लगा, आप नाराज होंगी,’’ रोमा सकपका गई.

‘‘लो भला, मांबेटी के मिलने से भला मैं क्यों नाराज होने लगी? सौदामिनी बहन को फोन दो जरा. उन से बात किए हुए तो महीनों बीत गए,’’ वैदेहीजी का अप्रत्याशित रूप से मीठा स्वर सुन कर रोमा का धैर्य जवाब देने लगा था. उस ने तुरंत फोन अपनी मां सौदामिनी को थमा दिया था.

‘‘नमस्ते, सौदामिनी बहन. आप तो हमें भूल ही गईं,’’ उन्होंने उलाहना दिया.

‘‘आप को भला कैसे भूल सकती हूं दीदी, पर दुनिया भर के पचड़ों से समय ही नहीं मिलता.’’

‘‘तो यहां तक आ कर क्या हम से मिले बिना चली जाओगी? मेरा तो सब से मिलने को मन तरसता रहता है. इसीलिए बच्चों से कहती हूं एक मोबाइल ला दो, कम से कम सब से बात कर के मन हलका कर लूंगी.’’

रसोईघर में भोजन का प्रबंध करते मानस और तान्या हंस पड़े थे, ‘‘मां फिर मोबाइल पुराण ले कर बैठ गईं, लगता है उन्हें मोबाइल ला कर देना ही पड़ेगा.’’

‘‘मैं ने भी कई बार सोचा पर डरती हूं अपना मोबाइल मिलते ही वे हम भाईबहनों का तो क्या, अपने खानेपीने का होश भी खो बैठेंगी.’’

‘‘मुझे दूसरा ही डर है. फोन पर ऊलजलूल बात कर के कहीं कोई नया बखेड़ा न खड़ा कर दें.’’

‘‘जो भी करें, उन की मर्जी है. पर लगता है कि अपने अकेलेपन से जूझने का इन्होंने नया ढंग ढूंढ़ निकाला है.’’

‘‘चलो, तान्या दीदी, आज ही मां के लिए मोबाइल खरीद लाते हैं. इन का इस तरह फोन के लिए बारबार आग्रह करना अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘चाय तैयार है. चाय पी कर चलते हैं, भोजन लौट कर करेंगे,’’ तान्या ने स्वीकृति दी थी.

‘‘मैं रोमा और जीजाजी दोनों को फोन कर के सूचित कर देता हूं कि हम कुछ समय के लिए बाहर जा रहे हैं.’’

‘‘कहां जा रहे हो तुम दोनों?’’ वैदेही ने अपना दूरभाष वार्त्तालाप समाप्त करते हुए पूछा.

‘‘हम दोनों नहीं, हम तीनों. चाय पियो और तैयार हो जाओ, आवश्यक कार्य है,’’ मानस ने उन का कौतूहल शांत करने का प्रयत्न किया.

वे उन्हें मोबाइल की दुकान पर ले गए तो उन की प्रसन्नता की सीमा न रही. मानो कोई मुंह में लड्डू ठूंस दे और उस का स्वाद पूछे.

वैदेहीजी के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे लंबे समय से अपने मनपसंद खिलौने के लिए मचलते बच्चे को उस का मनपसंद खिलौना मिल गया हो.

उन्होंने अपनी पसंद का अच्छा सा मोबाइल खरीदा जिस से अच्छे छायाचित्र खींचे जा सकते थे. घर के पते आदि का सुबूत देने के बाद उन के फोन का नंबर मिला तो उन का चेहरा खिल उठा.

‘‘आप को अपना फोन प्रयोग में लाने के लिए 24 घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी,’’ सेल्समैन ने बताया तो वे बिफर उठीं.

‘‘यह कौन सी दुकान पर ले आए हो तुम लोग मुझे? इन्हें तो फोन चालू करने में ही 24 घंटे लगते हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं है, मां जहां आप ने इतने दिनों तक प्रतीक्षा की है एक दिन और सही,’’ तान्या ने समझाना चाहा.

‘‘तुम नहीं समझोगी. मेरे लिए तो एक क्षण भी एक युग की भांति हो गया है,’’ उन्होंने उत्तर दिया.

घर पहुंचते ही फोन को डब्बे से निकाल कर उस के ऊपर मोमबत्ती जलाई गई. फिर बुला कर सब में मिठाई बांटी, मानो मोबाइल का जन्म उन्हीं के हाथों हुआ था और उस के चालू होने की प्रतीक्षा की जाने लगी.

यह कार्यक्रम चल ही रहा था कि रोमा, सौदामिनी और अपने मामा आलोक बाबू के साथ आ पहुंची.

वैदेही का नया फोन आना ही सब से बड़ा समाचार था. उन्होंने डब्बे से निकाल कर सब को अपना नया मोबाइल फोन दिखाया.

‘‘कितना सुंदर फोन है,’’ राहुल तो देखते ही पुलक उठा.

‘‘दादी मां, मुझे भी दिया करोगी न अपना मोबाइल?’’

‘‘कभीकभी, वह भी मेरी अनुमति ले कर. छोटे बच्चों पर नजर रखनी पड़ती है न सौदामिनी बहन.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ सौदामिनी ने सिर हिला दिया था.

‘‘सच कहूं, तो आज कलेजा ठंडा हो गया. यों तो राहुल को छोड़ कर सब के पास अपनेअपने मोबाइल हैं. पर अपनी चीज अपनी ही होती है. आयु हो गई है तो क्या हुआ, मैं ने तो साफ कह दिया कि मुझे तो अपना मोबाइल फोन चाहिए ही. मैं क्या किसी पर आश्रित हूं? मुझे पैंशन मिलती है,’’ वे देर तक सौदामिनी से फोन के बारे में बातें करती रही थीं.

कुछ देर बाद सौदामिनी और आलोक बाबू ने जाने की अनुमति मांगी थी.

‘‘आप ने फोन किया तो लगा कि यहां तक आ कर आप से मिले बिना जाना ठीक नहीं होगा,’’ सौदामिनी बोलीं.

‘‘यही तो लाभ है मोबाइल फोन का. अपनों को अपनों से जोड़े रखता है,’’ वैदेही ने उत्तर दिया.

‘‘चिंता मत करना. अब मेरे पास अपना फोन है. मैं हालचाल लेती रहूंगी.’’

‘‘मैं भी आप को फोन करती रहूंगी. आप का नंबर ले लिया है मैं ने,’’ सौदामिनी ने आश्वासन दिया था.

हाथ में अपना मोबाइल फोन आते ही वैदेही का तो मानो कायाकल्प ही हो गया. उन का मोबाइल अब केवल वार्त्तालाप का साधन नहीं है. उन के परिचितों, संबंधियों और दोस्तों के जवान बेटेबेटियों का सारा विवरण उन के मोबाइल में कैद है. वे चलताफिरता मैरिज ब्यूरो बन गई हैं. पहचान का दायरा इतना विस्तृत हो गया है कि किसी का भी कच्चा चिट्ठा निकलवाना हो तो लोग उन की ही शरण में आते हैं.

‘‘इस बुढ़ापे में भी अपने पांवों पर खड़ी हूं मैं. साथ में पैंशन भी मिलती है,’’ वे शान से कहती हैं. और एक राज की बात. उन के पास अब एक नहीं 5 मोबाइल फोन हैं जो पहले दूरभाष पर उन के लंबे वार्त्तालाप का उपहास करते थे अब उसी गुण के कारण उन का सम्मान करने लगे हैं. Mobile Phone and Family

Hindi Story : दाढ़ी की आड़ में – क्या मिल पाया शेखू मियां को औलाद का सुख

Hindi Story. शेखू मियां के घर पर ठहरे मौलाना ने बताया कि हर मुसलिम को शौक के साथ दाढ़ी रखना लाजिम है. यह खुदा का नूर है. इस से मोमिन की अलग पहचान होती है.

‘बात हक और सच की है,’ कहते हुए सभी ने हां में हां मिलाई.

मौलाना रोज शरीअत की बातें बताते. धीरेधीरे यह बात फैली और आसपास के लोग इकट्ठा हो कर उन की हर बात ध्यान से सुनते और उन पर अमल करते.

जब भी उन के चाहने वालों ने उन से उन का नामपता जानना चाहा, तो वे बात को टाल देते. खुद शेखू मियां को नहीं मालूम कि वे कहां से आए?

शेखू मियां के औलाद नहीं थी. गांव के आसपास के इलाकों में उन की काफी शोहरत थी. वे नौकरचाकर, खेती को देखते और 5 वक्त की नमाज करते. मौलाना की बातों से वे उन के दीवाने हो गए.

मौलाना ने कहा, ‘‘मेरा दुनिया में कोई नहीं. दो वक्त का खाना और कपड़े, सिर छिपाने के लिए छत और इबादत… इस के सिवा मुझे कुछ नहीं चाहिए.’’

मौलाना की बात पर यकीन कर शेखू मियां ने उन्हें मसजिद में रख लिया.

‘‘शादाब बेटा, तुम्हें हम आलिम बनाना चाहते हैं,’’ अब्बू ने कहा. ‘‘ठीक है अब्बू, मैं मदरसे में जाने को तैयार हूं.’’ ‘‘तो ठीक है,’’ अब्बा ने कहा.

2 दिन बाद शादाब के अब्बू शहर के मदरसे में उसे भरती करा आए.

‘‘देखो बेगम, तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं. मैं ने खाने व रहने का बंदोबस्त मदरसे में ही कर दिया है. वहां और भी लड़के हैं, जो तालीम ले रहे हैं,’’ मौलाना ने बीवी को सम?ाया.

उन का बेटा शादाब शहर में तालीम पाने लगा. अभी उस की तालीम पूरी भी नहीं हो पाई थी कि एक सड़क हादसे में उस के अब्बूअम्मी का इंतकाल हो गया. शादाब पढ़ाई छोड़ कर घर आ गया.

घर पर उस के चाचाचाची, 2 बच्चे थे. शादाब वहीं उन के साथ रहने लगा. शादाब की चाची पढ़ीलिखी, निहायत खूबसूरत, चुस्तचालाक व आजाद खयालों की औरत थी.

वह शादाब से खूब हंसीमजाक करती, उस के आसपास मंडराती रहती. घर पर उस का ही हुक्म चलता.

‘‘सुनो शादाब मियां, जवानी में बु?ाबु?ा सा चेहरा, दाढ़ी अच्छी नहीं लगती. नए जमाने के साथ चलो. अब कौन मदरसे में पढ़ाई कर रहे हो.’’

चाची के कहने पर उस ने दाढ़ी साफ करा ली. नए फैशन के कपड़े पहनना शुरू कर दिया. वह चाची का दिल नहीं तोड़ना चाहता था, बल्कि वह चाची को मन ही मन चाहने लगा था.

चाचा को शादाब की यह हरकत बिलकुल पसंद नहीं थी कि वह उस की बीवी के पास रहे.

तभी एक दिन नौकरानी ने कहा, ‘‘अंदर जा कर देखिए… क्या तमाशा हो रहा है?’’

इधर एक कचरा उड़ कर शादाब की चाची की आंख में चला गया था.

‘‘शादाब देखना… मेरी आंख में कचरा चला गया है, जरा निकाल दो,’’ कह कर वह पलंग पर लेट गई और शादाब ?ाक कर उस की आंख से कचरा निकालने लगा.

शादाब का पूरा जिस्म चाची पर ?ाका देख कर चाचा जोर से चिल्लाया, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’

‘‘कुछ नहीं, आंख में कचरा चला गया था. शादाब से निकालने को कहा… और क्या?’’ कह कर वह पलंग से उठ कर खड़ी हो गई.

चाचा शादाब की खोटी नीयत को पहचान गया. उस ने गांव वालों के साथ मिल कर ऐसी चाल चली कि उस की खूबसूरत बीवी शादाब की बुरी नीयत से बच जाए और शादाब की जायदाद भी हड़पी जा सके.

‘‘क्यों मियां, मदरसे में यही तालीम मिली है कि तुम मदरसा छोड़ते ही दाढ़ीमूंछ रखना भूल जाओ? कौन कहेगा तुम्हें आलिमहाफिज?’’

खोटी नीयत, नए पहनावे, बगैर दाढ़ी के पा कर पंचायत ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. पंचायत में मौजूद मुल्लामौलवी ने शादाब को गांव से बाहर रहने का तालिबानी हुक्म सुना दिया.

शादाब भटकता हुआ शेखू मियां के गांव पहुंचा. उस ने सालभर में नमाजियों की तादाद बढ़ा ली. उस के चाहने वालों की तादाद में इजाफा होता गया. इसी बीच उस ने ऐसी शैतानी हरकत की, जिसे सुन कर इनसानियत भी शर्मसार हो गई.

वह शेखू मियां को भाई साहब और उस की बीवी को भाभीजान कहता था.

एक दिन उस ने शेखू मियां से कहा, ‘‘भाभी बीमारी से परेशान हैं. इन्हें दवा के साथ दुआ की भी जरूरत है. भाभी जल्दी ठीक हो जाएंगी.’’

‘‘वह तो ठीक है. आदमी ढूंढ़ना पड़ेगा,’’ शेखू ने कहा.

‘‘उस की जरूरत नहीं. मैं जो हूं…’’ शादाब ने कहा, ‘‘आप कहें, तो मैं कल से भाभीजान के लिए तावीज फूंकने का इंतजाम करा दूं.’’

‘‘ठीक है,’’ शेखू मियां ने कहा.

अगले दिन शादाब ने भाभीजान को तावीज दिया. इस से शेखू की बीवी को आराम लगने लगा. उन्होंने राहत की सांस ली.

अब दवा और दुआ दोनों साथसाथ चलने लगीं.

शेखू मियां की खूबसूरत बीवी के बदन पर सोने के गहने को देख कर शादाब के अंदर का शैतान जाग उठा. वह भूल गया कि मदरसे में बच्चों को तालीम देने के साथसाथ नमाज भी पढ़ता है. नमाजी परहेजी मौलाना है. लोग उस की इज्जत करते हैं.

‘‘मौलाना, आज मेरा पूरा जिस्म दर्द कर रहा है. सीने में जलन हो रही है,’’ शेखू मियां की बीवी ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं राख से ?ाड़ देता हूं,’’

और फिर हाथ में कुछ राख ले कर शादाब बुदबुदाया. फिर राख को ही बेगम की बांहों पर मलने लगा. पराए मर्द के हाथ लगाते ही उसे अजीब सा महसूस हुआ, पर उसे अच्छा लगा शादाब का जिस्म छूना.

और फिर सिलसिला चल पड़ा. दोनों करीब आते गए और उन में जिस्मानी ताल्लुकात बन गए.

दोनों के बीच सालभर रंगरलियां चलीं. धीरेधीरे उन के बीच इतनी मुहब्बत बढ़ गई कि वे दुनिया को भूल बैठे.

यह खबर शेखू मियां तक पहुंची, पर वह मौलाना को नेकनीयत, काबिल इनसान, नमाजीपरहेजी सम?ा कर इसे सिर्फ बदनाम करने की साजिश सम?ा बैठा और जब बात हद से ज्यादा गुजर गई, तो उस ने इस की आजमाइश करनी चाही.

‘‘सुनो बेगम, मैं एक हफ्ते के लिए बाहर जा रहा हूं. तुम घरखेती पर नजर रखना. नौकर भी मेरे साथ जा रहा है. हफ्तेभर की तो बात है,’’ शेखू ने कहा.

‘‘जी, आप बेफिक्र रहें, मैं सब संभाल लूंगी,’’ बेगम ने कहा.

‘‘देखो मौलाना, अब हम एक हफ्ते के लिए बेफिक्र हैं. तुम्हारे भाई साहब एक हफ्ते बाद लौटेंगे, तब तक हम जी भर के मिलेंगे. डर की कोई बात नहीं,’’ बेगम ने मौलाना शादाब से कहा.

अब शेखू की गैरहाजिरी में दिल खोल कर मिलनेजुलने का सिलसिला चला. तीसरे दिन शेखू मियां अचानक रात में घर आ पहुंचे.

अपनी बीवी को मौलाना की गिरफ्त में देख कर शेखू मियां का खून खौल उठा. गवाही के लिए नौकर को भी बुला कर अपनी मालकिन का नजारा दिखा दिया. फिर चुपके से वह खेत के घर में जा कर सो गए.

सुबह गांव की पंचायत शेखू के बुलावे पर जमा हुई. कानाफूसी का दौर चला.

‘‘पंचायत की कार्यवाही शुरू की जाए,’’ एक बुजुर्ग ने कहा.

‘‘अरे भई, मौलाना को तो आने दो,’’ एक सदस्य ने कहा.

‘‘उन की ही तो पंचायत है,’’ एक नौजवान ने कहा.

‘वह कैसे?’ सभी एकसाथ कह उठे.

शेखू मियां ने तफसील से बात पंचों को बताई. लोगों का शक ठीक था.

‘‘बीवी का शौहर रहते हुए पराए मर्द से हमबिस्तरी करना, दाढ़ी की आड़ में एक नमाजी का मसजिदमदरसे में तालीम के नाम पर वहशीपन करना मजहब की आड़ में घिनौनी साजिश है.’’

‘‘अनपढ़ औरतें जल्दी ही मजहब के नाम पर ढोंग, अंधविश्वास, तांत्रिक के बहकावे में तावीज, गंडे, ?ाड़नेफूंकने के नाम पर अपना सबकुछ लुटा देती हैं, इसलिए औरतमर्द का पढ़ालिखा, सम?ादार होना जरूरी है, ताकि वे धर्म के इन ठेकेदारों, शैतानों के बहकावे में न आ सकें,’’ कह कर शेखू चुप हो गए.

तभी एक बुजुर्ग ने कहा, ‘‘दोनों को पंचायत में बुलाया जाए.’’

जमात के कहने पर 2 आदमी मौलाना और शेखू की बीवी को लेने गए.

लौट के आ कर उन्होंने बताया कि मसजिद में न तो मौलाना है और न घर पर शेखू की बेगम Hindi Story

Hindi Family Story : अंत भला तो सब भला – नन्द-भाभी की लड़ाई में कौन जीता

Hindi Family Story. संगीता को यह एहसास था कि आज जो दिन में घटा है, उस के कारण शाम को रवि से झगड़ा होगा और वह इस के लिए मानसिक रूप से तैयार थी. लेकिन जब औफिस से लौटे रवि ने मुसकराते हुए घर में कदम रखा तो वह उलझन में पड़ गई.

‘‘आज मैं बहुत खुश हूं. तुम्हारा मूड हो तो खाना बाहर खाया जा सकता है,’’ रवि ने उसे हाथ से पकड़ कर अपने पास बैठा लिया.

‘‘किस कारण इतना खुश नजर आ रहे हो ’’ संगीता ने खिंचे से स्वर में पूछा.

‘‘आज मेरे नए बौस उमेश साहब ने मुझे अपने कैबिन में बुला कर मेरे साथ दोस्ताना अंदाज में बहुत देर तक बातें कीं. उन की वाइफ से तो आज दोपहर में तुम मिली ही थीं. उन्हें एक स्कूल में इंटरव्यू दिलाने मैं ही ले गया था. मेरे दोस्त विपिन के पिताजी उस स्कूल के चेयरमैन को जानते हैं. उन की सिफारिश से बौस की वाइफ को वहां टीचर की जौब मिल जाएगी. बौस मेरे काम से भी बहुत खुश हैं. लगता है इस बार मुझे प्रमोशन जरूर मिल जाएगी,’’ रवि ने एक ही सांस में संगीता को सारी बात बता डाली. संगीता ने उस की भावी प्रमोशन के प्रति कोई प्रतिक्रिया जाहिर करने के बजाय वार्त्तालाप को नई दिशा में मोड़ दिया, ‘‘प्रौपर्टी डीलर ने कल शाम जो किराए का मकान बताया था, तुम उसे देखने कब चलोगे ’’

‘‘कभी नहीं,’’ रवि एकदम चिड़ उठा.

‘‘2 दिन से घर के सारे लोग बाहर गए हुए हैं और ये 2 दिन हम ने बहुत हंसीखुशी से गुजारे हैं. कल सुबह सब लौट आएंगे और रातदिन का झगड़ा फिर शुरू हो जाएगा. तुम समझते क्यों नहीं हो कि यहां से अलग हुए बिना हम कभी खुश नहीं रह पाएंगे…हम अभी उस मकान को देखने चल रहे हैं,’’ कह संगीता उठ खड़ी हुई.

‘‘मुझे इस घर को छोड़ कर कहीं नहीं जाना है. अगर तुम में जरा सी भी बुद्धी है तो अपनी बहन और जीजा के बहकावे में आना छोड़ दो,’’ गुस्से के कारण रवि का स्वर ऊंचा हो गया था. ‘‘मुझे कोई नहीं बहका रहा है. मैं ने 9 महीने इस घर के नर्क में गुजार कर देख लिए हैं. मुझे अलग किराए के मकान में जाना ही है,’’ संगीता रवि से भी ज्यादा जोर से चिल्ला पड़ी. ‘‘इस घर को नर्क बनाने में सब से ज्यादा जिम्मेदार तुम ही हो…पर तुम से बहस करने की ताकत अब मुझ में नहीं रही है,’’ कह रवि उठ कर कपड़े बदलने शयनकक्ष में चला गया और संगीता मुंह फुलाए वहीं बैठी रही.

उन का बाहर खाना खाने का कार्यक्रम तो बना ही नहीं, बल्कि घर में भी दोनों ने खाना अलगअलग और बेमन से खाया. घर में अकेले होने का कोई फायदा वे आपसी प्यार की जड़ें मजबूत करने के लिए नहीं उठा पाए. रात को 12 बजे तक टीवी देखने के बाद जब संगीता शयनकक्ष में आई तो रवि गहरी नींद में सो रहा था. अपने मन में गहरी शिकायत और गुस्से के भाव समेटे वह उस की तरफ पीठ कर के लेट गई. किराए के मकान में जाने के लिए रवि पर दबाव बनाए रखने को संगीता अगली सुबह भी उस से सीधे मुंह नहीं बोली. रवि नाश्ता करने के लिए रुका नहीं. नाराजगी से भरा खाली पेट घर से निकल गया और अपना लंच बौक्स भी मेज पर छोड़ गया. करीब 10 बजे उमाकांत अपनी पत्नी आरती, बड़े बेटे राजेश, बड़ी बहू अंजु और 5 वर्षीय पोते समीर के साथ घर लौटे. वे सब उन के छोटे भाई के बेटे की शादी में शामिल होने के लिए 2 दिनों के लिए गांव गए थे.

फैली हुई रसोई को देख कर आरती ने संगीता से कुछ तीखे शब्द बोले तो दोनों के बीच फौरन ही झगड़ा शुरू हो गया. अंजु ने बीचबचाव की कोशिश की तो संगीता ने उसे भी कड़वी बातें सुनाते हुए झगड़े की चपेट में ले लिया. इन लोगों के घर पहुंचने के सिर्फ घंटे भर के अंदर ही संगीता लड़भिड़ कर अपने कमरे में बंद हो गई थी. उस की सास ने उसे लंच करने के लिए बुलाया पर वह कमरे से बाहर नहीं निकली. ‘‘यह संगीता रवि भैया को घर से अलग किए बिना न खुद चैन से रहेगी, न किसी और को रहने देगी, मम्मी,’’ अंजु की इस टिप्पणी से उस के सासससुर और पति पूरी तरह सहमत थे. ‘‘इस की बहन और मां इसे भड़काना छोड़ दें तो सब ठीक हो जाए,’’ उमाकांत की विवशता और दुख उन की आवाज में साफ झलक रहा था.

‘‘रवि भी बेकार में ही घर से कभी अलग न होने की जिद पर अड़ा हुआ है. शायद किराए के घर में जा कर संगीता बदल जाए और इन दोनों की विवाहित जिंदगी हंसीखुशी बीतने लगे,’’ आरती ने आशा व्यक्त की.‘‘किराए के घर में जा कर बदल तो वह जाएगी ही पर रवि को यह अच्छी तरह मालूम है कि उस के घर पर उस की बड़ी साली और सास का राज हो जाएगा और वह इन दोनों को बिलकुल पसंद नहीं करता है. बड़े गलत घर में रिश्ता हो गया उस बेचारे का,’’ उमाकांत के इस जवाब को सुन कर आरती की आंखों में आंसू भर आए तो सब ने इस विषय पर आगे कोई बात करना मुनासिब नहीं समझा.

शाम को औफिस से आ कर रवि उस से पिछले दिन घटी घटना को ले कर झगड़ा करेगा, संगीता की यह आशंका उस शाम भी निर्मूल साबित हुई. रवि परेशान सा घर में घुसा तो जरूर पर उस की परेशानी का कारण कोई और था. ‘‘मुझे अस्थाई तौर पर मुंबई हैड औफिस जाने का आदेश मिला है. मेरी प्रमोशन वहीं से हो जाएगी पर शायद यहां दिल्ली वापस आना संभव न हो पाए,’’ उस के मुंह से यह खबर सुन कर सब से ज्यादा परेशान संगीता हुई.

‘‘प्रमोशन के बाद कहां जाना पड़ेगा आप को ’’ उस ने चिंतित लहजे में पूछा.

‘‘अभी कुछ पता नहीं. हमारी कंपनी की कुछ शाखाएं तो ऐसी घटिया जगह हैं, जहां न अच्छा खानापीना मिलता है और न अस्पताल, स्कूल जैसी सुविधाएं ढंग की हैं,’’ रवि के इस जवाब को सुन कर उस का चेहरा और ज्यादा उतर गया.

‘‘तब आप प्रमोशन लेने से इनकार कर दो,’’ संगीता एकदम चिड़ उठी, ‘‘मुझे दिल्ली छोड़ कर धक्के खाने कहीं और नहीं जाना है.’’ ‘‘तुम पागल हो गई हो क्या  मैं अपनी प्रमोशन कैसे छोड़ सकता हूं ’’ रवि गुस्सा हो उठा.

‘‘तब इधरउधर धक्के खाने आप अकेले जाना. मैं अपने घर वालों से दूर कहीं नहीं जाऊंगी,’’ अपना फैसला सुना कर नाराज नजर आती संगीता अपने कमरे में घुस गई.

आगामी शनिवार को रवि हवाईजहाज से मुंबई चला गया. उस के घर छोड़ने से पहले ही अपनी अटैची ले कर संगीता मायके चली गई थी. रवि के मुंबई चले जाने से संगीता की किराए के अलग घर में रहने की योजना लंगड़ा गई. उस के भैयाभाभी तो पहले ही से ऐसा कदम उठाए जाने के हक में नहीं थे.

उस की दीदी और मां रवि की गैरमौजूदगी में उसे अलग मकान दिलाने का हौसला अपने अंदर पैदा नहीं कर पाईं. विवाहित लड़की का ससुराल वालों से लड़झगड़ कर अपने भाईभाभी के पास आ कर रहना आसान नहीं होता, यह कड़वा सच संगीता को जल्द ही समझ में आने लगा. कंपनी के गैस्टहाउस में रह रहा रवि उसे अपने पास रहने को बुला नहीं सकता था और संगीता ने अपनी ससुराल वालों से संबंध इतने खराब कर रखे थे कि वे उसे रवि की गैरमौजूगी में बुलाना नहीं चाहते थे.

सब से पहले संगीता के संबंध अपनी भाभी से बिगड़ने शुरू हुए. घर के कामों में हाथ बंटाने को ले कर उन के बीच झड़पें शुरू हुईं और फिर भाभी को अपनी ननद की घर में मौजूदगी बुरी तरह खलने लगी. संगीता की मां ने अपनी बेटी की तरफदारी की तो उन का बेटा उन से झगड़ा करने लगा. तब संगीता की बड़ी बहन और जीजा को झगड़े में कूदना पड़ा. फिर टैंशन बढ़ती चली गई. ‘‘हमारे घर की सुखशांति खराब करने का संगीता को कोई अधिकार नहीं है, मां. इसे या तो रवि के पास जा कर रहना चाहिए या फिर अपनी ससुराल में. अब और ज्यादा इस की इस घर में मौजूदगी मैं बरदाश्त नहीं करूंगा,’’ अपने बेटे की इस चेतावनी को सुन कर संगीता की मां ने घर में काफी क्लेश किया पर ऐसा करने के बाद उन की बेटी का घर में आदरसम्मान बिलकुल समाप्त हो गया. बहू के साथ अपने संबंध बिगाड़ना उन के हित में नहीं था, इसलिए संगीता की मां ने अपनी बेटी की तरफदारी करना बंद कर दिया. उन में आए बदलाव को नोट कर के संगीता उन से नाराज रहने लगी थी.

संगीता की बड़ी बहन को भी अपने इकलौते भाई को नाराज करने में अपना हित नजर नहीं आया था. रवि की प्रमोशन हो जाने की खबर मिलते ही उस ने अपनी छोटी बहन को सलाह दी, ‘‘संगीता, तुझे रवि के साथ जा कर ही रहना पड़ेगा. भैया के साथ अपने संबंध इतने ज्यादा मत बिगाड़ कि उस के घर के दरवाजे तेरे लिए सदा के लिए बंद हो जाएं. जब तक रवि के पास जाने की सुविधा नहीं हो जाती, तू अपनी ससुराल में जा कर रह.’’ ‘‘तुम सब मेरा यों साथ छोड़ दोगे, ऐसी उम्मीद मुझे बिलकुल नहीं थी. तुम लोगों के बहकावे में आ कर ही मैं ने अपनी ससुराल वालों से संबंध बिगाड़े हैं, यह मत भूलो, दीदी,’’ संगीता के इस आरोप को सुन कर उस की बड़ी बहन इतनी नाराज हुई कि दोनों के बीच बोलचाल न के बराबर रह गई. रवि के लिए संगीता को मुंबई बुलाना संभव नहीं था. संगीता को बिन बुलाए ससुराल लौटने की शर्मिंदगी से हालात ने बचाया.

दरअसल, रवि को मुंबई गए करीब 2 महीने बीते थे जब एक शाम उस के सहयोगी मित्र अरुण ने संगीता को आ कर बताया, ‘‘आज हमारे बौस उमेश साहब के मुंह से बातोंबातों में एक काम की बात निकल गई, संगीता… रवि के दिल्ली लौटने की बात बन सकती है.’’

‘‘कैसे ’’ संगीता ने फौरन पूछा.

अनुंकपा के आधार पर उस की पोस्टिंग यहां हो सकती है.’’

‘‘मैं कुछ समझी नहीं ’’ संगीता के चेहरे पर उलझन के भाव उभरे.

‘‘मैं पूरी बात विस्तार से समझाता हूं. देखो, अगर रवि यह अर्जी दे कि दिल के रोगी पिता की देखभाल के लिए उस का उन के पास रहना जरूरी है तो उमेश साहब के अनुसार उस का तबादला दिल्ली किया जा सकता है.’’ ‘‘लेकिन रवि के बड़े भैयाभाभी भी तो मेरे सासससुर के पास रहते हैं. इस कारण क्या रवि की अर्जी नामंजूर नहीं हो जाएगी ’’

‘‘उन का तो अपना फ्लैट है न ’’

‘‘वह तो है.’’

‘‘अगर वे अपने फ्लैट में शिफ्ट हो जाएं तो रवि की अर्जी को नामंजूर करने का यह कारण समाप्त हो जाएगा.’’

‘‘यह बात तो ठीक है.’’

‘‘तब आप अपने जेठजेठानी को उन के फ्लैट में जाने को फटाफट राजी कर के उमेश साहब से मिलने आ जाओ,’’ ऐसी सलाह दे कर अरुण ने विदा ली. संगीता ने उसी वक्त रवि को फोन मिलाया.

‘‘तुम जा कर भैयाभाभी से मिलो, संगीता. मैं भी उन से फोन पर बात करूंगा,’’ रवि सारी बात सुन कर बहुत खुश हो उठा था. संगीता को झिझक तो बड़ी हुई पर अपने भावी फायदे की बात सोच कर वह अपनी ससुराल जाने को 15 मिनट में तैयार हो गई. रवि के बड़े भाई ने उस की सारी बात सुन कर गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘संगीता, इस से ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है कि रवि का तबादला दिल्ली में हो जाए पर मुझे अपने फ्लैट को किराए पर मजबूरन चढ़ाना पढ़ेगा. उस की मासिक किस्त मैं उसी किराए से भर पाऊंगा.’’ रवि और संगीता के बीच फोन पर 2 दिनों तक दसियों बार बातें हुईं और अंत में उन्हें बड़े भैया के फ्लैट की किस्त रवि की पगार से चुकाने का निर्णय मजबूरन लेना पड़ा.

सप्ताह भर के अंदर बड़े भैया का परिवार अपने फ्लैट में पहुंच गया और संगीता अपना सूटकेस ले कर ससुराल लौट आई. रवि ने कूरियर से अपनी अर्जी संगीता को भिजवा दी. उसे इस अर्जी को रवि के बौस उमेश साहब तक पहुंचाना था. संगीता ने फोन कर के उन से मिलने का समय मांगा तो उन्होंने उसे रविवार की सुबह अपने घर आने को कहा. ‘‘क्या मैं आप से औफिस में नहीं मिल सकती हूं, सर ’’ संगीता इन शब्दों को बड़ी कठिनाई से अपने मुख ने निकाल पाई.

‘‘मैं तुम्हें औफिस में ज्यादा वक्त नहीं दे पाऊंगा, संगीता. मैं घर पर सारे कागजात तसल्ली से चैक कर लूंगा. मैं नहीं चाहता हूं कि कहीं कोई कमी रह जाए. यह मेरी भी दिली इच्छा है कि रवि जैसा मेहनती और विश्वसनीय इनसान वापस मेरे विभाग में लौट आए. क्या तुम्हें मेरे घर आने पर कोई ऐतराज है ’’

‘‘न… नो, सर. मैं रविवार की सुबह आप के घर आ जाऊंगी,’’ कहते हुए संगीता का पूरा शरीर ठंडे पसीने से नहा गया था. उस के साथ उमेश साहब के घर चलने के लिए हर कोई तैयार था पर संगीता सारे कागज ले कर वहां अकेली पहुंची. उन के घर में कदम रखते हुए वह शर्म के मारे खुद को जमीन में गड़ता महसूस कर रही थी. उमेश साहब की पत्नी शिखा का सामना करने की कल्पना करते ही उस का शरीर कांप उठता था. रवि के मुंबई जाने से कुछ दिन पूर्व ही वह शिखा से पहली बार मिली थी. उस मुलाकात में जो घटा था, उसे याद करते ही उस का दिल किया कि वह उलटी भाग जाए. लेकिन अपना काम कराने के लिए उसे उमेश साहब के घर की दहलीज लांघनी ही पड़ी.

अचानक उस दिन का घटना चक्र उस की आंखों के सामने घूम गया. उस दिन रवि शिखा को एक स्कूल में इंटरव्यू दिलाने ले जा रहा था. रवि का बैंक उस स्कूल के पास ही था. उसे बैंक में कुछ पर्सनल काम कराने थे. जितनी देर में शिखा स्कूल में इंटरव्यू देगी, उतनी देर में वह बैंक के काम करा लेगा, ऐसा सोच कर रवि कुछ जरूरी कागज लेने शिखा के साथ अपने घर आया था. संगीता उस दिन अपनी मां से मिलने गई हुई थी. वह उस वक्त लौटी जब शिखा एक गिलास ठंडा पानी पी कर उन के घर से अकेली स्कूल जा रही थी. वह शिखा को पहचानती नहीं थी, क्योंकि उमेश साहब ने कुछ हफ्ते पहले ही अपना पदभार संभाला था.

‘‘कौन हो तुम  मेरे घर में किसलिए आना हुआ ’’ संगीता ने बड़े खराब ढंग से शिखा से पूछा था.

‘‘रवि और मेरे पति एक ही औफिस में काम करते हैं. मेरा नाम शिखा है,’’ संगीता के गलत व्यवहार को नजरअंदाज करते हुए शिखा मुसकरा उठी थी.

‘मेरे घर मेें तुम्हें मेरी गैरमौजूदगी में आने की कोई जरूरत नहीं है… अपने पति को धोखा देना है तो कोई और शिकार ढूंढ़ो…मेरे पति के साथ इश्क लड़ाने की कोशिश की तो मैं तुम्हारे घर आ कर तुम्हारी बेइज्जती करूंगी,’’ उसे यों अपमानित कर के संगीता अपने घर में घुस गई थी. तब उसे रोज लगता था कि रवि उस के साथ उस के गलत व्यवहार को ले कर जरूर झगड़ा करेगा पर शिखा ने रवि को उस दिन की घटना के बारे में कुछ बताया ही नहीं था. अब रवि की दिल्ली में बदली कराने के लिए उसे शिखा के पति की सहायता चाहिए थी. अपने गलत व्यवहार को याद कर के संगीता शिखा के सामने पड़ने से बचना चाहती थी पर ऐसा हो नहीं सका.

उन के ड्राइंगरूम में कदम रखते ही संगीता का सामना शिखा से हो गया.

‘‘मैं अकारण अपने घर आए मेहमान का अपमान नहीं करती हूं. तुम बैठो, वे नहा रहे हैं,’’ उसे यह जानकारी दे कर शिखा घर के भीतर चल दी.

‘‘प्लीज, आप 1 मिनट मेरी बात सुन लीजिए,’’ संगीता ने उसे अंदर जाने से रोका.

‘‘कहो,’’ अपने होंठों पर मुसकान सजा कर शिखा उस की तरफ देखने लगी.

‘‘मैं…मैं उस दिन के अपने खराब व्यवहार के लिए क्षमा मांगती हूं,’’ संगीता को अपना गला सूखता लगा.

‘‘क्षमा तो मैं तुम्हें कर दूंगी पर पहले मेरे एक सवाल का जवाब दो…यह ठीक है कि तुम मुझे नहीं जानती थीं पर अपने पति को तुम ने चरित्रहीन क्यों माना ’’ शिखा ने चुभते स्वर में पूछा.

‘‘उस दिन मुझ से बड़ी भूल हुई…वे चरित्रहीन नहीं हैं,’’ संगीता ने दबे स्वर में जवाब दिया.

‘‘मेरी पूछताछ का भी यही नतीजा निकला था. फिर तुम ने हम दोनों पर शक क्यों किया था ’’

‘‘उन दिनों मैं काफी परेशान चल रही थी…मुझे माफ कर…’’

‘‘सौरी, संगीता. तुम माफी के लायक नहीं हो. तुम्हारी उस दिन की बदतमीजी की चर्चा मैं ने आज तक किसी से नहीं की है पर अब मैं सारी बात अपने पति को जरूर बताऊंगी.’’

‘‘प्लीज, आप उन से कुछ न कहें.’’

‘‘मेरी नजरों में तुम कैसी भी सहायता पाने की पात्रता नहीं रखती हो. मुझे कई लोगों ने बताया है कि तुम्हारे खराब व्यवहार से रवि और तुम्हारे ससुराल वाले बहुत परेशान हैं. अपने किए का फल सब को भोगना ही पड़ता है, सो तुम भी भोगो. शिखा को फिर से घर के भीतरी भाग की तरफ जाने को तैयार देख संगीता ने उस के सामने हाथ जोड़ दिए, ‘‘मैं आप से वादा करती हूं कि मैं अपने व्यवहार को पूरी तरह बदल दूंगी…अपनी मां और बहन का कोई भी हस्तक्षेप अब मुझे अपनी विवाहित जिंदगी में स्वीकार नहीं होगा…मेंरे अकेलेपन और उदासी ने मुझे अपनी भूल का एहसास बड़ी गहराई से करा दिया है.’’

‘‘तब रवि जरूर वापस आएगा… हंसीखुशी से रहने की नई शुरुआत के लिए तुम्हें मेरी शुभकामनाएं संगीता…आज से तुम मुझे अपनी बड़ी बहन मानोगी तो मुझे बड़ी खुशी होगी.’’ Hindi Family Story

‘‘थैंक यू, दीदी,’’ भावविभोर हो इस बार संगीता उन के गले लग कर खुशी के आंसू बहाने लगी थी. उमेश साहब के प्रयास से 4 दिन बाद रवि के दिल्ली तबादला होने के आदेश निकल गए. इस खबर को सुन कर संगीता अपनी सास के गले  लग कर खुशी के आंसू बहाने लगी थी. उसी दिन शाम को रवि के बड़े भैया उमेश साहब का धन्यवाद प्रकट करने उन के घर काजू की बर्फी के डिब्बे के साथ पहुंचे.

‘‘अब तो सब ठीक हो गया न राजेश ’’

‘‘सब बढि़या हो गया, सर. कुछ दिनों में रवि बड़ी पोस्ट पर यहीं आ जाएगा. संगीता का व्यवहार अब सब के साथ अच्छा है. अपनी मां और बहन के साथ उस की फोन पर न के बराबर बातें होती हैं. बस, एक बात जरा ठीक नहीं है, सर.’’

‘‘कौन सी, राजेश ’’

‘‘सर, संयुक्त परिवार में मैं और मेरा परिवार बहुत खुश थे. अपने फ्लैट में हमें बड़ा अकेलापन सा महसूस होता है,’’ राजेश का स्वर उदास हो गया.

‘‘अपने छोटे भाई के वैवाहिक जीवन को खुशियों से भरने के लिए यह कीमत तुम खुशीखुशी चुका दो, राजेश. अपने फ्लैट की किस्त के नाम पर तुम रवि से हर महीने क्व10 हजार लेने कभी बंद मत करना. यह अतिरिक्त खर्चा ही संगीता के दिमाग में किराए के मकान में जाने का कीड़ा पैदा नहीं होने देगा.’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं, सर. वैसे रवि से रुपए ले कर मैं नियमित रूप से बैंक में जमा कराऊंगा. भविष्य में इस मकान को तोड़ कर नए सिरे से बढि़या और ज्यादा बड़ा दोमंजिला मकान बनाने में यह पैसा काम आएगा. तब मैं अपना फ्लैट बेच दूंगा और हम दोनों भाई फिर से साथ रहने लगेंगे,’’ राजेश भावुक हो उठा. ‘‘पिछले दिनों रवि को मुंबई भेजने और तुम्हारे फ्लैट की किस्त उस से लेने की हम दोनों के बीच जो खिचड़ी पकी है, उस की भनक किसी को कभी नहीं लगनी चाहिए,’’ उमेश साहब ने उसे मुसकराते हुए आगाह किया. ‘‘ऐसा कभी नहीं होगा, सर. आप मेरी तरफ से शिखा मैडम को भी धन्यवाद देना. उन्होंने रवि के विवाहित जीवन में सुधार लाने का बीड़ा न उठाया होता तो हमारा संयुक्त परिवार बिखर जाता.’’

‘‘अंत भला तो सब भला,’’ उमेश साहब की इस बात ने राजेश के चेहरे को फूल सा खिला दिया था. Hindi Family Story

Rakhi Special : एक बहन की चिट्ठी शहीद भाई के नाम

Rakhi Special –

हमारे प्रिय भैया,

आप मेरी चिट्ठी की बड़ी बेताबी से राह देखा करते हैं, यह मुझे मालूम है, क्योंकि लौटने पर आप ने खुद कहा था, ‘इस बार मेरे दोस्तों ने जब तक मुझ से पार्टी नहीं ले ली, मुझे तेरी राखी नहीं दी.’

उस नादान उम्र में भी मैं सोचा करती थी कि इस एक राखी ने भैया का कितना खर्च करवा दिया. पर, मैं जानती थी कि राखी बंधवाने की खुशी में आप कितने चहक उठते हैं.

जब आप यहां होते थे, तो राखियां और तोहफे भी आप ही ले आते थे. आप के चेहरे पर खिलखिलाती खुशी उस वक्त मेरी समझ से परे थी, पर आज उन्हीं पलों की याद में आंखों से आंसू निकल पड़ते हैं.

आप कुछ दिनों की छुट्टी लेकर आए थे. आप ने जिद की थी, ‘चल, तेरी राखी की नई ड्रैस ले लें.’

तब मैं ने कहा था, ‘भैया, आप लौट आइए, फिर दिलवा देना.’

आप को पुलिस कमांडो की पोस्ट के लिए अकोला का ट्रांसफर और्डर मिल चुका था. हम बहुत खुश थे कि बस कुछ ही दिनों में आप फिर से हमारे साथ होंगे.

भैया, आप का चुलबुला स्वभाव सारे घर को हिला देता था. आप के आने पर सारा घर खुशी से झूम उठता था. आप ने कई पुरस्कार जीते थे. आप की दमदार आवाज में वह रचना तो मेरे दिलोदिमाग में बस सी गई है, जिस पर तालियों की आवाज गूंज उठी थी, ‘तन समर्पित, मन समर्पित, जीवन का कणकण समर्पित, चाहता हूं देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूं…’

देश पर कुरबान होने की चाह कई बार आप के मुंह से निकल जाया करती थी और आप की वह चाह पूरी भी हुई.

हम उन 13 दिनों का इंतजार कर रहे थे, जब आप लौट कर आने वाले थे. यही सोच कर मैं ने आप को चिट्ठी भी नहीं लिखी कि आप आने वाले ही तो हैं. पूरे घर में आप का पलपल इंतजार हो रहा था. आप के लौट आने में सिर्फ 2-3 दिन बाकी थे.

उस दिन सुबहसुबह आप के छोटे भाई घर आए और अब्बू की गोद में सिर रख कर रोने लगे. हमें लगा कि आप के घर पर कुछ हुआ है, शायद आप की मां या बाबूजी… पर, उन की भर्राई आवाज निकली, ‘राजू अब इस दुनिया में नहीं रहा,’ कानों पर यकीन नहीं हो रहा था, पर वे रोतेरोते कहे जा रहे थे.

गढ़चिरोली के अहेरी में पुलिस चौकी के उद्घाटन के लिए जाते समय सुरंग लगा कर नक्सलवादियों ने आप के ग्रुप की 3 जीपों को उड़ा दिया था, जिन में शहीद हुए 7-8 जवानों में से एक आप भी थे.

भैया, मैं तो आप की धर्म बहन हूं, आप के दोस्त की बहन. जब इन 20-22 सालों में हम आप को नहीं भुला पाए, तो सोचिए कि आप के बिना आप के मांबाबूजी की क्या हालत रही होगी? फर्ज की सूली पर चढ़ कर आप की आरजू पूरी हो गई… लेकिन, आप के साथ जीने की हमारी आरजू का क्या?

भैया, हमें नाज है कि आप ने अपने वतन की खातिर अपनी जान कुरबान की. उन लोगों को कौन समझए, जो इस तरह किसी की जान से भी प्यारों को बिना किसी गुनाह के अपनों से दूर कर देते हैं? क्यों उन्हें एहसास नहीं होता कि किसी अपने के चले जाने के बाद उस के परिवार वालों की हालत क्या होती होगी?

सच कहती हूं भैया, याद आप की बहुत आती है. छलक पड़ते हैं आंखों से आंसू, जब कोई बात आप की याद आती है.

आप की बहन,

अर्जिन.

Rakhi Special

Family drama : बदनसीब बाप – साबिर क्यों था अपने बेटों का कुसूरवार

Family drama.साबिर बिजनौर जिले के एक शहर में अपने परिवार के साथ रहता था. घर में बीवी शबनम और 2 बेटों तसलीम और शमीम के अलावा कोई और नहीं था.

साबिर का लकड़ी पर नक्काशी करने का कारोबार था. वह लकड़ी की जूलरी बनाता और उन पर नक्काशी कर के खूबसूरत डिजाइन तैयार करता था, जिसे वह ऐक्सपोर्ट कर के अच्छाखासा पैसा कमा लेता था.

घर में किसी चीज की कोई कमी न थी. उस के दोनों बेटे भी बड़े होशियार थे और बचपन से ही उस के काम में हाथ बंटाते थे. यही वजह थी कि जवान होतेहोते वे भी अच्छे कारीगर बन गए थे.

साबिर बचपन से ही अपने बड़े बेटे तसलीम से ज्यादा प्यार करता था. इस की वजह यह थी कि छोटा बेटा शमीम पिछले कुछ समय से आवारा लड़कों की संगत में रहता था और खूब फुजूलखर्ची करता था, जबकि तसलीम अपने बाप की हर बात मानता था और बिना उन की मरजी के कोई काम नहीं करता था.

ज्योंज्यों छोटा बेटा शमीम बड़ा होता जा रहा था, उस के खर्चे भी बढ़ते जा रहे थे. आवारा दोस्तों ने उसे निकम्मा बना दिया था. बाप की डांटडपट से तंग आ कर वह अपने दोस्तों के साथ मुरादाबाद चला गया और काफी अरसे तक वहीं रहा. वह जो कमाता था उसे अपने आवारा दोस्तों के साथ रह कर घूमनेफिरने पर खर्च कर देता था.

बड़ा बेटा तसलीम अपने अब्बा के साथ रह कर उन के हर काम में हाथ बंटाता था, जिस की वजह से उन का कामधंधा जोरों पर था और खूब तरक्की हो रही थी. अब्बा ने अपने भाई की बेटी सायरा से तसलीम का रिश्ता तय कर दिया था.

कुछ महीनों के बाद तसलीम की शादी थी, इसलिए छोटा बेटा शमीम भी घर आया हुआ था. घर में खुशी का माहौल था, पर शमीम मुरादाबाद जा कर और ज्यादा बिगड़ गया था. वह बदचलन भी हो गया था.

घर में मेहमानों का आनाजाना शुरू हो गया था. शादी में कुछ दिन बाकी रह गए थे. शमीम अपने चाचा के घर अपनी होने वाली भाभी सायरा से मिलने गया था.

जब शमीम घर पहुंचा, तो घर पर कोई नहीं था. बस, सायरा ही अकेली वहां थी, बाकि सब लोग शादी की खरीदारी के लिए बाजार गए थे.

सायरा शमीम को जानती थी, इसलिए उस ने शमीम को अंदर आने दिया और उसे बैठा कर चाय बनाने रसोईघर में चली गई.

कुछ देर बाद जब सायरा चाय बना कर वापस आई, तो पसीने की बूंदें उस के चेहरे पर मोतियों की तरह चमक रही थीं. रसोईघर की गरमी की वजह से उस का चेहरा सुर्ख हो गया था. गुलाबी होंठ ऐसे खिल रहे थे, जैसे कोई गुलाब हो.

शमीम सायरा को एकटक देखता रहा. इतनी हसीन लड़की को देख कर उस के अंदर का शैतान जाग उठा.

शमीम के दिल में हलचल मच चुकी थी. उस ने बिना वक्त गंवाए सायरा को अपनी बांहों में भर लिया और उस के होंठों पर चुंबनों की बौछार कर दी. उस की यह हरकत देख कर सायरा ने शोर मचाना शुरू कर दिया.

आवाज सुन कर आसपास के लोग आ गए और शमीम को पकड़ कर उस के घर ले गए और पूरा वाकिआ साबिर को बताना शुरू कर दिया.

साबिर ने शमीम को डांटते हुए घर से धक्के मार कर भगा दिया और बाद में अपनी जायदाद से भी बेदखल कर दिया. उस ने अपना घर अपने बड़े बेटे तसलीम के नाम कर दिया.

अगले दिन तसलीम की बरात जाने वाली थी. घर के सभी लोग अपनेअपने काम में मसरूफ थे कि तभी घर के पास एक गली से तसलीम के चीखने की आवाज आई.

लोग उधर दौड़े तो देखा कि तसलीम खून में लथपथ पड़ा कराह रहा था और उस के पास हाथ में चाकू लिए शमीम खड़ा हुआ चिल्ला रहा था, ‘‘मेरा हिस्सा तू कैसे ले सकता है? यह घर मेरा भी है. तू अकेला इस का मालिक कैसे बन सकता है? मैं अपने हिस्से के लिए किसी की भी जान ले सकता हूं…’’

किसी ने फौरन पुलिस को फोन कर दिया और कुछ लोगों ने हिम्मत कर के शमीम को पकड़ लिया.

तसलीम को अस्पताल में भरती कराया गया, पर कुछ ही देर में ही उस ने दम तोड़ दिया.

शमीम को पुलिस ने गिरफ्तार कर हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया.

बदनसीब बाप की दोनों औलादें उस से जुदा हो गईं. एक जेल पहुंच गया और दूसरा दुनिया ही छोड़ कर चला गया.

साबिर इस घटना के लिए खुद को कुसूरवार मान रहा था और लोगों से कहता फिरता था, ‘‘मैं ने खुद अपने बेटे को मार डाला. छोटे बेटे का हिस्सा अगर बड़े बेटे के नाम न करता, तो आज वह उस के खून का प्यासा न होता और ऐसा कदम न उठाता…’’Family drama

Family Story in Hindi – बेटी के लिए : पिता की इच्छा का संसार

Family Story in Hindi. शिवचरण अग्रवाल बाजार से लौटते ही कुरसी पर पसर गए. मलीन चेहरा, शिथिल शरीर देख पत्नी माया ने घबरा कर माथा छुआ, ‘‘क्या हुआ… क्या तबीयत खराब लग रही है. भलेचंगे बाजार गए थे…अचानक से यों…’’

कुछ देर मौन रख वह बोले, ‘‘लौटते हुए अजय की दुकान पर उस का हालचाल पूछने चला गया था. वहां उस ने जो बताया उसे सुन कर मन खट्टा हो गया.’’

‘‘ऐसा क्या बता दिया अजय ने जो आप की यह हालत हो गई?’’ माया ने पंखा झलते हुए पूछा.

‘‘वह बता रहा था कि कुछ दिन पहले उस की दुकान पर समधीजी का एक रिश्तेदार आया था…उसे यह पता नहीं था कि अजय मेरा भांजा है. बातोंबातों में मेरा जिक्र आ गया तो वह कहने लगा, ‘अरे, उन्हें तो मैं जानता हूं…बड़े चालाक और घटिया किस्म के इनसान हैं… दरअसल, मेरे एक दूर के जीजाजी के घर उन की लड़की ब्याही है…जीजाजी बता रहे थे कि शादी में जो तय हुआ था उसे तो दबा ही लिया, साथ ही बाद में लड़की के गहनेकपडे़ भी दाब लेने की पूरी कोशिश की…क्या जमाना आ गया है लड़की वाले भी चालू हो गए…’ रिश्तेदारी का मामला था सो अजय कुछ नहीं बोला मगर वह बेहद दुखी था…उसे तो पता ही है कि मैं ने मीनू की शादी में कैसे दिल खोल कर खर्च किया है, जो कुछ तय था उस से बढ़चढ़ कर ही दिया, फिर भी मीनू के ससुर मेरे बारे में ऐसी बातें उड़ाते फिरते हैं… लानत है….’’

तभी उन की छोटी बेटी मधु कालिज से वापस आ गई. उन की उतरी सूरत देख उस का मूड खराब न हो अत: दोनों ने खुद को संयत कर किसी दूसरे काम में उलझा लिया.

आज का मामला कोई नया नहीं था. साल भर ही हुआ था मीनू की शादी को मगर आएदिन कुछ न कुछ फेरबदल के साथ ऐसे मामले दोहराए जाते पर शिवचरण चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे…इन हालात के लिए वह स्वयं को ही दोषी मानते थे.

आज शिवचरण की आंखों के सामने बारबार वह दृश्य घूम रहा था जब कपूर साहब ने उन से अपने बड़े बेटे के लिए मीनू का हाथ मांगा था.

रजत कपूर उन के नजदीकी दोस्त एवं पड़ोसी दीनदयाल गुप्ता के बिजनेस पार्टनर थे. बेहद सरल, सहृदय और जिंदादिल. दीनदयाल के घर शिवचरण की उन से आएदिन मुलाकातें होती रहीं. जैसे वह थे वैसा ही उन का परिवार था. 2 बेटों में बड़ा बेटा कंप्यूटर इंजीनियर था और छोटा एम.बी.ए. पूरा कर अपने पिता का बिजनेस में हाथ बंटा रहा था. एक ऐसा हंसताखेलता परिवार था जिस में अपनी लड़की दे कर कोई भी पिता अपनी जिंदगी को सफल मानता. ऐसे परिवार से खुद रिश्ता आया था मीनू के लिए.

कपूर साहब भी अपने बड़े बेटे के लिए देखेभाले परिवार की लड़की चाह रहे थे और उन की नजर मीनू पर जा पड़ी. उन्होंने बड़ी विनम्रता से निवेदन किया था, ‘शिवचरण भाईसाहब, बेटी जैसे अब तक आप के घर रह रही है वैसे ही आगे हमारे घर रहेगी. बस, तन के कपड़ों में विदा कर दीजिए, मेरे घर में बेटी नहीं है, उसे ही बेटी समझ कर दुलार करूंगा.’

इतना अपनापन से भरा निवेदन सुन कर शिवचरण गद्गद हो उठे थे. कितनी धुकधुक रहती है पिता के मन में जब वह अपनी प्यारी बेटी को पराए हाथों में सौंपता है. मन आशंकाओं से भरा रहता है. रातदिन यही चिंता लगी रहती है कि पता नहीं बेटी सुखी रहेगी या नहीं, मानसम्मान मिलेगा या नहीं…मगर इस आग्रह में सबकुछ कितना पारदर्शी… शीशे की तरह साफ था.

शिवचरण ने जब इस बात पर अपनी पत्नी के साथ बैठ कर विचार किया तो धीरेधीरे कुछ प्रश्न मुखरित हो उठे. मसलन, ‘परिवार और लड़का तो वाकई लाखों में एक है मगर… हम वैश्य और वह पंजाबी…घर वालों को कैसे राजी करेंगे…’

यह सचमुच एक गंभीर समस्या थी. शिवचरण का भरापूरा कुटुंब था जिस में इस रिश्ते का जिक्र करने का मतलब था सांप की पूंछ पर पैर रखना. वैसे तो सभी तथाकथित पढे़लिखे समकालीन भद्रजन थे मगर जब किसी के शादीब्याह की बात आती तो एकएक पुरातन रीतिरिवाज खोजखोज कर निकाले जाते. मसलन, जाति, गोत्र, जन्मपत्री, मांगलिक-अमांगलिक…और यहां तो बात विजातीय रिश्ते की थी.

बेटी के सुखद भविष्य के लिए शिवचरण ने तो एक बार सब को दरकिनार करने की सोच भी ली थी मगर माया नहीं मानी.

‘शादीब्याह के मसले पर घरपरिवार को साथ ले कर चलना ही पड़ता है. अगर अभी नजरअंदाज कर दिया तो सारी उम्र ताने सुनते रहेंगे…तुम्हें कोई कुछ न बोले मगर मैं तो घर की बड़ी बहू हूं. तुम्हारी अम्मां मुझे नहीं बख्शेंगी.’

और अम्मां से पूछने पर जो कुछ सुनने को मिला वह अप्रत्याशित नहीं था.

‘क्या हमारी बिरादरी में कोई अच्छा लड़का नहीं मिला जो दूसरी बिरादरी का देखने चल दिया.’

‘नहीं, अम्मां, खुद ही रिश्ता आया था. बेहद भले लोग हैं. कोई दानदहेज भी नहीं लेंगे.’

‘तो क्या पैसे बचाने को ब्याह रहा है वहां? तेरे पास न हों तो मुझ से ले लेना…अरे, बेटी के ब्याह पर तो खर्च होता ही है…और मीनू घर की बड़ी लड़की है, अगर उसे वहां ब्याह दिया तो सब यही समझेंगे कि लड़की तेज होगी, खुद से पसंद कर ब्याह कर बैठी. फिर छोटी को कहीं ब्याहना भी मुश्किल हो जाएगा.’

अम्मां ने तिवारीजी को भी बुलवा लिया. लंबा तिलक लगाए वह आए तो अम्मां ने खुद ही उन के पांव नहीं छुए, सब से छुआए. 4 कचौड़ी, 6 पूरी और 2 रसगुल्लों का नाश्ता करने के बाद समस्या पर विचार कर के वह बोले, ‘यजमान, यह आप की मरजी है कि आप विवाह कहां करें पर आप ने जाति के बाहर विवाह किया तो मैं आप के घर में पैर नहीं रखूंगा. आखिर सनातन प्रथा है यह जाति की. आप जैसे नए लोग तोड़ते हैं तभी तो तलाक होते हैं. न कुंडली मिली, न अपनी जाति का, न घर के रीतिरिवाज का पता. आप सोच भी कैसे सकते हैं.’

अम्मां और तिवारीजी के आगे शिवचरण के सभी तर्क विफल हो गए और उन्हें इस रिश्ते को भारी मन से मना करना पड़ा. दीनदयाल ने यह बात विफल होती देख वहां अपनी भतीजी की बात चला दी और आज वह कपूर साहब के घर बेहद सुखी थी.

जब शिवचरण मीनू के लिए सजातीय वर खोजने निकले तो उन्हें एहसास हुआ कि दूल्हामंडी में से एक अदद दूल्हा खरीदना कितना कठिन कार्य था. जो लड़का अच्छा लगता उस के दाम आसमान को छूते और जिस का दाम कम था वह मीनू के लायक नहीं था. कपूर साहब के रिश्ते पर चर्चा के समय जिन सगेसंबंधियों ने मीनू के लिए सुयोग्य वर खोज लाने और हर तरह का सहयोग देने की बात की थी इस

समय वे सभी पल्ला झाड़ कहीं गायब हो गए थे.

भागदौड़ कर के अंत में एक जगह बात पक्की हुई. रिश्ता तय होते समय लड़के के मातापिता का रवैया ऐसा था जैसे लड़की पसंद कर उन्होंने लड़की वालों पर एहसान किया है. उस समय शिवचरण को कपूर साहब का नम्र निवेदन बहुत याद आ रहा था. उस दिन जो उन के कंधे झुके तो आज तक सीधे नहीं हुए थे.

अतीत की यादों में खोए शिवचरण को तब झटका लगा जब पत्नी ने आ कर कहा कि दीनदयाल भाई साहब आए थे और आप के लिए एक निमंत्रण कार्ड दे गए हैं.

उस दिन दीनदयाल के घर एक पारिवारिक समारोह में शिवचरण की मुलाकात उन के बड़े भाई से हो गई जो अब कपूर साहब के समधी थे. उन की बात चलने पर वह गद्गद हो कर बोले, ‘‘बस, क्या कहें, हमारी बिटिया को तो बहुत अच्छा घरवर मिल गया. ऐसे सज्जन लोग कहां मिलते हैं आजकल…उसे हाथों पर उठा कर रखते हैं…बेटी ससुराल में खुश हो, एक बाप को और क्या चाहिए भला…’’ शिवचरण के चेहरे पर एक दर्द भरी मुसकान तैर आई.

घर आ कर मन और अधिक अपराधबोध से ग्रसित हो गया. वह खुद पर बेहद नाराज थे. बारबार स्वयं को कोस रहे थे कि क्यों मैं उस समय जातिवाद की ओछी मानसिकता से उबर नहीं पाया…क्यों सगेसंबंधियों और बिरादरी की कहावत से डर गया…अपनी बेटी का भला देखना मेरी अपनी जिम्मेदारी थी, बिरादरी की नहीं. दीनदयाल भी तो हमारी जाति के ही हैं. उन्हें तो कोई फर्क नहीं पड़ा वहां रिश्ता करने से…उन का मानसम्मान उसी तरह बरकरार है…सच तो यह है कि आज के भागदौड़ भरे जीवन में किसी के पास इतना समय नहीं कि रुक कर किसी दूसरे के बारे में सोचे…‘लोग क्या कहेंगे’ जैसी बातें पुरानी हो चुकी हैं. जो इन्हें छोड़ आगे नहीं बढ़ते, आगे चल कर वे मेरी ही तरह रोते हैं.

शिवचरण अखबार पढ़ रहे थे तभी दीनदयाल उन से मिलने आए तो बातोंबातों में वह अपनी व्यथा कह बैठे, ‘‘क्या बताऊं भाईजी, कपूर साहब जैसा समधी खोने का दर्द अभी तक दिल में है…एक विचार आया है मन में…अगर उन के छोटे बेटे के लिए मधु का रिश्ता ले कर जाऊं तो…जब वह आए थे तो मैं ने इनकार कर दिया था, न जाने अब मेरे जाने पर कैसा बरताव करेंगे, यही सोच कर दिल घबरा रहा है.’’

‘‘नहीं, भाई साहब, उन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूं, दिल में किसी के लिए मैल नहीं रखते…वह तो खुशीखुशी आप का रिश्ता स्वीकारते मगर आप ने यह फैसला लेने में जरा सी देर कर दी. अभी 2 दिन पहले ही उन के छोटे बेटे का रिश्ता तय हुआ है.’’

एक बार फिर शिवचरण खुद को पराजित महसूस कर रहे थे.

वह अपनी गलती का प्रायश्चित्त करना चाह रहे थे मगर उन्हें मौका न मिला. सच ही है, कुछ भूलें ऐसी होती हैं जिन को भुगतना ही पड़ता है.

‘‘फोन की घंटी बज रही थी. शिवचरण ने फोन उठाया, ‘‘हैलो.’’

‘‘नमस्ते, मामाजी,’’ दूसरी ओर से अजय की आवाज आई, ‘‘वह जो आप ने मधु के लिए वैवाहिक विज्ञापन देने को कहा था, उसी का मैटर कनफर्म करने को फोन किया है…पढ़ता हूं…कोई सुधार करना हो तो बताइए :

‘‘अग्रवाल, उच्च शिक्षित, 23, 5 फुट 4 इंच, गृहकार्य दक्ष, संस्कारी कन्या हेतु सजातीय वर चाहिए.’’

‘‘बाकी सब ठीक है, अजय. बस, ‘अग्रवाल’ लिखना जरूरी नहीं और ‘सजातीय’ शब्द की जगह लिखो, ‘जातिधर्म बंधन नहीं.’’’

‘‘मगर मामाजी, क्या आप ने सगेसंबंधियों से इस बारे में…’’

‘‘सगेसंबंधी जाएं भाड़ में….’’ शिवचरण फोन पर चीख पडे़.

‘‘और मामीजी…’’

‘‘तेरी मामी जाए चूल्हे में…अब मैं वही करूंगा जो मेरी बेटी के लिए सही होगा.’’

शिवचरण ने फोन रख दिया…फोन रख कर उन्हें लगा जैसे आज वह खुल कर सांस ले पा रहे हैं और अपने चारों तरफ लिपटे धूल भरे मकड़जाल को उन्होंने उतार फेंक. Family Story in Hindi

Story in Hindi : ऊपर उठ कर

Story in Hindi. लक्ष्मी अपने कालेज के सहपाठी राजेश से प्यार करती थी. पर वह दलित था और लक्ष्मी ऊंची जाति की. लक्ष्मी ने जब राजेश के बारे में अपने घर में बताया, तो मानो भूचाल आ गया. आगे क्या हुआ?

लक्ष्मी 3 दिन से भीतर ही भीतर परेशान लग रही थी. उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. वह अपने मातापिता से कुछ कहना चाहती थी, मगर कह नहीं पा रही थी.

लक्ष्मी कालेज में बीए कर रही थी. उसी की क्लास में सेठ धरमदास का बेटा राजेश भी पढ़ रहा था दोनों में कब प्यार हुआ पता नहीं चला. वह राजेश को बहुत चाहती थी. राजेश भी उसे चाहता था.

राजेश के पिता का बीच बाजार में जूतों का बड़ा शोरूम था. खूब आमदनी होती थी. जब भी वे दोनों पार्क में मिलते थे, तब घंटों बतियाते थे.

लक्ष्मी के पिता का नाम दीनदयाल था. वे ऊंची जाति के थे. वे कभी नहीं चाहते थे एक एससी लड़के को अपना दामाद बनाएं. जाति की दीवार उन के सामने थी.

लक्ष्मी राजेश के घर कई बार गई थी. उस के घर वाले उसे बहू बनाने को तैयार थे. मगर राजेश के पिता धरमदास का कहना था, ‘‘जाति की दीवार तुम दोनों के बीच खड़ी है. क्या तुम्हारे मातापिता इस शादी के लिए तैयार हैं? उन्हें इस शादी के लिए राजी करना तुम्हारा काम है. हम तुम्हारे पिता से हाथ मांगने नहीं जाएंगे.’’

पर लक्ष्मी तो लड़की थी. वह कैसे करती अपनी शादी की बात. वैसे भी दूल्हा नहीं मिल रहा था. जैसे ही दूल्हा मिल जाएगा, उस का कालेज छुड़वा दिया जाएगा.

आज लक्ष्मी ने पूरा मन बना लिया था. कि वह बात कर के रहेगी. मां अकेली बैठ कर गेहूं बीन रही थीं. उस के आसपास न पिता थे, न भाईबहन.

लक्ष्मी ने हिम्मत कर के अपनी मां से कहा, ‘‘मां, मुझे तुम से एक बात कहनी है.’’ ‘‘क्या बात है?’’ मां ने पूछा.

‘‘पहले मुझे वचन दो, आप नाराज तो नहीं होंगी…’’ कह कर लक्ष्मी चुप हो गई. ‘‘कह दे क्या कहना चाहती है,’’ मां ने लक्ष्मी को भरोसा दिलाते हुए कहा.

‘‘मां, तुम इनकार नहीं करोगी.’’ ‘‘अरे, पहले बात तो बता. पहले से कह रही है कि नाराज मत होना,’’ मां बोलीं.

‘‘बस मां, मुझे  पूरा यकीन है कि आप सुन कर नाराज नहीं होंगी,’’ तब निश्चिंत हो कर लक्ष्मी बोली, ‘‘मां, मैं कालेज में अपने साथ पढ़ रहे राजेश से शादी करना चाहती हूं.’’

‘‘क्या कहा… तू राजेश से शादी करना चाहती है…कौन है राजेश? स जाति का है वह?’’ मां नाराज हो कर बोलीं.

‘‘मां, तुम भी जानती होंगी. बाजार में सेठ धरमदास के जूतेचप्पल की बहुत बड़ी दुकान है. राजेश उन्हीं का बेटा है,’’ जब लक्ष्मी ने यह बात कही तब गुस्से से मां बोलीं, ‘‘तू उस मोची की बात कह रही है?’’

‘‘हां मां…,’’ लक्ष्मी गरदन हिलाती हुई बोली, ‘‘उन्हीं का बेटा राजेश है.’’ ‘‘मगर लक्ष्मी, मैं उस मोची के बेटे से तेरी शादी नहीं करा सकती.’’

मांबेटी की इस बात को पिता दीनदयाल ने आड़ में रह कर सुन लिया था. इस समय उन का आना उसे ऐसा लगा जैसे कोई बीच में विलेन आ गया हो. फिर भी लक्ष्मी हिम्मत कर के बोली, ‘‘पापा, राजेश में क्या बुराई है?’’

‘‘बुराई… वह मोची का बेटा है. जूतों की बहुत बड़ी दुकान है उन की, तो इस का मतलब यह नहीं है कि तुम दलित के यहां ब्याह कर के अपनी जाति पर धब्बा लगा दो.’’

‘‘पर पापा, दलित भी तो इनसान होते हैं,’’ लक्ष्मी ने जब यह बात कही तब दीनदयाल गुस्से में आ कर बोले, ‘‘मैं ने कब कहा कि दलित इनसान नहीं होते हैं.’’ ‘‘फिर आप को एतराज क्यों हो रहा है पापा?’’

‘‘देख लक्ष्मी, कान खोल कर सुन ले…’’ गुस्से से दीनदयाल बोले, ‘‘तेरी शादी वहीं होगी, जहां मैं चाहूंगा. समझ  और कल से तेरा कालेज जाना बंद.’’

दीनदयाल का फैसला सुन कर लक्ष्मी की मां बोलीं, ‘‘देखोजी, इस का कालेज जाना बंद मत कीजिए.’’

‘‘तुम इस का पक्ष मत लो. कालेज क्या भेजा, खानदान पर बट्टा लगा रही है,’’ अपनी पत्नी को डांटते हुए दीनदयाल बोले, ‘‘गैरसमाज के लड़के से शादी करने की बोल रही है. समाज में अपने मांबाप की पगड़ी उछालेगी क्या?’’

दीनदयाल का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था. उन का भाषण चालू था, जो बंद होने का नाम नहीं ले रहा था. लक्ष्मी पापा की आदत को जानती थी. जब वे चालू हो जाते थे, फिर नहीं रुकते थे.

मां भी उस समय खामोश थीं. वैसे भी लक्ष्मी मांपापा से डर कर ही रहती थी. अगर इसी बीच पापा के दोस्त मदनलाल न आते, तो न जाने कितनी देर तक उन का भाषण चालू रहता.

मदनलाल ने धीरे से पूछा, ‘‘क्या हुआ दीनदयाल, क्यों परिवार पर इतना चिल्ला रहे हो? अरे, लक्ष्मी कैसे तुम्हारी नाक कटवाने पर तुली है? मैं समझा नहीं.’’

‘‘अरे मदनलाल, इसे कालेज में पढ़ने क्या भेजा, यह उस मोची के बेटेसे शादी करना चाहती है.’’ ‘‘किस मोची का बेटा?’’ मदनलाल ने पूछा.

‘‘अरे वही मोची धरमदास, जिस की बाजार में चप्पलजूतों की बहुत बड़ी दुकान है. उसी का लड़का इस के साथ कालेज में पढ़ रहा है. कह रही है शादी करूंगी तो उसी से ही.’’

‘‘क्यों बेटी लक्ष्मी, तुम्हारे पापा जो कह रहे हैं, वह सही है?’’ जब मदनलाल ने लक्ष्मी से यह पूछा, तब लक्ष्मी गरदन हिलाती हुई बोली, ‘‘हां अंकल, यह सही है.’’

‘‘वह भी तुम से शादी करना चाहता है?’’ ‘‘हां अंकल, उस का पूरा परिवार मुझे  बहू बनाना चाहता है,’’ लक्ष्मी ने अपनी बात कह कर गेंद मदनलाल के पाले में डाल दी.

तब मदनलाल बोले, ‘‘दीनदयाल, तुम्हें क्यों एतराज हो रहा है?’’ ‘‘अरे, तुम कैसी बात करते हो मदनलाल…’’ जरा नाराज हो कर दीनदयाल बोले, ‘‘एक मोची के घर में मैं अपनी लड़की कैसे ब्याह दूं. वह निचली जाति का मैं ऊंची जाति का.’’

‘‘यह ऊंचनीच को छोेड़ो दीनदयाल…’’ समझाते हुए मदनलाल बोले, ‘‘ये सब तो पुराने ढकोसले हैं. आजकल यह सब खत्म हो रहा है. वह जमाना भी गया, जब मांबाप जहां कराते थे, वहीं शादी होती है. जब दोनों के मन मिल गए, तब इन की शादी कराना ही अच्छा है.’’

‘‘मेरी कितनी बेइज्जती होगी, यह सोचा है.’’ ‘‘थोड़े दिन महल्ले वाले, रिश्तेदार कह लेंगे. फिर सब चुप हो जाएंगे,’’ समझाते हुए मदनलाल बोले.

इस पर दोनों की काफी बहस हुई. न दीनदयाल कमजोर पड़ रहे थे और न ही मदनलाल. आखिर में जातेजाते मदनलाल कह गए, ‘‘इस बात को गांठ बांध कर सुन ले दीनदयाल, अगर इन की शादी नहीं करेगा तो ये भाग कर शादी कर लेंगे, क्योंकि दोनों बालिग हैं. तब तुम्हारी नाक नहीं कटेगी… इसलिए समझदारी इसी में है कि इन दोनों की आपस में शादी करवा दो, ताकि उम्रभर के लिए दोनों परिवार का रिश्ता बना रहे. इस के बावजूद तुम अपनी जिद पर अड़े हो तो अड़े रहो, नुकसान तुम्हारा होना है,’’ कह कर वे चले गए.

दीनदयाल माथा पकड़ कर बहुत देर तक इस पर सोचते रहे. रहरह कर मदनलाल की आखिरी बात उन के कानों में गूंजती रही. काफी देर बाद वे लक्ष्मी को आवाज देते हुए बोले, ‘‘लक्ष्मी, जरा बाहर आना.’’

‘‘क्या पापा?’’ लक्ष्मी के साथ उस की मां भी आईं. ‘‘राजेश के साथ तुम्हारी शादी मुझे मंजूर है…’’ दीनदयाल बोले, ‘‘मुझे धरमदास के पास ले जाना, ताकि उन से मैं शादी की बात कर सकूं.’’

‘‘सच पापा,’’ कहते हुए खुशी से लक्ष्मी का चेहरा खिल उठा.

Emotional Family Story : त्रिशंकु

Emotional Family Story. नवीन को बाजार में बेकार घूमने का शौक कभी नहीं रहा, वह तो सामान खरीदने के लिए उसे मजबूरी में बाजारों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. घर की छोटीछोटी वस्तुएं कब खत्म होतीं और कब आतीं, उसे न तो कभी इस बात से सरोकार रहा, न ही दिलचस्पी. उसे तो हर चीज व्यवस्थित ढंग से समयानुसार मिलती रही थी.

हर महीने घर में वेतन दे कर वह हर तरह के कर्तव्यों की इतिश्री मान लेता था. शुरूशुरू में वह ज्यादा तटस्थ था लेकिन बाद में उम्र बढ़ने के साथ जब थोड़ी गंभीरता आई तो अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझने लगा था.

बाजार से खरीदारी करना उसे कभी पसंद नहीं आया था. लेकिन विडंबना यह थी कि महज वक्त काटने के लिए अब वह रास्तों की धूल फांकता रहता. साइन बोर्ड पढ़ता, दुकानों के भीतर ऐसी दृष्टि से ताकता, मानो सचमुच ही कुछ खरीदना चाहता हो.

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दफ्तर से लौट कर घर जाने को उस का मन ही नहीं होता था. खाली घर काटने को दौड़ता. उदास मन और थके कदमों से उस ने दरवाजे का ताला खोला तो अंधेरे ने स्वागत किया. स्वयं बत्ती जलाते हुए उसे झुंझलाहट हुई. कभी अकेलेपन की त्रासदी यों भोगी नहीं थी. पहले मांबाप के साथ रहता था, फिर नौकरी के कारण दिल्ली आना पड़ा और यहीं विवाह हो गया था.

पिछले 8 वर्षों से रुचि ही घर के हर कोने में फुदकती दिखाई देती थी. फिर अचानक सबकुछ उलटपुलट हो गया. रुचि और उस के संबंधों में तनाव पनपने लगा. अर्थहीन बातों को ले कर झगड़े हो जाते और फिर सहज होने में जितना समय बीतता, उस दौरान रिश्ते में एक गांठ पड़ जाती. फिर होने यह लगा कि गांठें खुलने के बजाय और भी मजबूत सी होती गईं.

सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए नवीन ने फ्रिज खोला और बोतल सीधे मुंह से लगा कर पानी पी लिया. उस ने सोचा, अगर रुचि होती तो फौरन चिल्लाती, ‘क्या कर रहे हो, नवीन, शर्म आनी चाहिए तुम्हें, हमेशा बोतल जूठी कर देते हो.’

तब वह मुसकरा उठता था, ‘मेरा जूठा पीओगी तो धन्य हो जाओगी.’ ‘बेकार की बकवास मत किया करो, नाहक ही अपने मुंह की सारी गंदगी बोतलों में भर देते हो.’

यह सुन कर वह चिढ़ जाता और एकएक कर पानी की सारी बोतलें निकाल जूठी कर देता. तब रुचि सारी बोतलें निकाल उन्हें दोबारा साफ कर, फिर भर कर फ्रिज में रखती.

जब बच्चे भी उस की नकल कर ऐसा करने लगे तो रुचि ने अपना अलग घड़ा रख लिया और फ्रिज का पानी पीना ही छोड़ दिया. कुढ़ते हुए वह कहती, ‘बच्चों को भी अपनी गंदी आदतें सिखा दो, ताकि बड़े हो कर वे गंवार कहलाएं. न जाने लोग पढ़लिख कर भी ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं?’

बच्चों का खयाल आते ही उस के मन के किसी कोने में हूक उठी, उन के बिना जीना भी कितना व्यर्थ लगता है.

रुचि जब जाने लगी थी तो उस ने कितनी जिद की थी, अनुनय की थी कि वह बच्चों को साथ न ले जाए. तब उस ने व्यंग्यपूर्वक मुंह बनाते हुए कहा था, ‘ताकि वे भी तुम्हारी तरह लापरवाह और अव्यवस्थित बन जाएं. नहीं नवीन, मैं अपने बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती. मैं उन्हें एक सभ्य व व्यवस्थित इंसान बनाना चाहती हूं. फिर तुम्हारे जैसा मस्तमौला आदमी उन की देखभाल करने में तो पूर्ण अक्षम है. बिस्तर की चादर तक तो तुम ढंग से बिछा नहीं सकते, फिर बच्चों को कैसे संभालोगे?’

नवीन सोचने लगा, न सही सलीका, पर वह अपने बच्चों से प्यार तो भरपूर करता है. क्या जीवन जीने के लिए व्यवस्थित होना जरूरी है?

रुचि हर चीज को वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करने की आदी थी.

विवाह के 2 वर्षों बाद जब स्नेहा पैदा हुई थी तो वह पागल सा हो गया था. हर समय गोदी में लिए उसे झुलाता रहता था. तब रुचि गुस्सा करती, ‘क्यों इस की आदत बिगाड़ रही हो, गोदी में रहने से इस का विकास कैसे होगा?’

रुचि के सामने नवीन की यही कोशिश रहती कि स्नेहा के सारे काम तरतीब से हों पर जैसे ही वह इधरउधर होती, वह खिलंदड़ा बन स्नेहा को गुदगुदाने लगता. कभी घोड़ा बन जाता तो कभी उसे हवा में उछाल देता.

वह सोचने लगता कि स्नेहा तो अब 6 साल की हो गई है और कन्नू 3 साल का. इस साल तो वह कन्नू का जन्मदिन भी नहीं मना सका, रुचि ने ही अपने मायके में मनाया था. अपने दिल के हाथों बेबस हो कर वह उपहार ले कर वहां गया था पर दरवाजे पर खड़े उस के पहलवान से दिखने वाले भाई ने आंखें तरेरते हुए उसे बाहर से ही खदेड़ दिया था. उस का लाया उपहार फेंक कर पान चबाते हुए कहा था, ‘शर्म नहीं आती यहां आते हुए. एक तरफ तो अदालत में तलाक का मुकदमा चल रहा है और दूसरी ओर यहां चले आते हो.’

‘मैं अपने बच्चों से मिलना चाहता हूं,’ हिम्मत जुटा कर उस ने कहा था.

‘खबरदार, बच्चों का नाम भी लिया तो. दे क्या सकता है तू बच्चों को,’ उस के ससुर ने ताना मारा था, ‘वे मेरे नाती हैं, राजसी ढंग से रहने के अधिकारी हैं. मेरी बेटी को तो तू ने नौकरानी की तरह रखा पर बच्चे तेरे गुलाम नहीं बनेंगे. मुझे पता होता कि तेरे जैसा व्यक्ति, जो इंजीनियर कहलाता है, इतना असभ्य होगा, तो कभी भी अपनी पढ़ीलिखी, सुसंस्कृत लड़की को तेरे साथ न ब्याहता, वही पढ़ेलिखे के चक्कर में जिद कर बैठी, नहीं तो क्या रईसों की कमी थी. जा, चला जा यहां से, वरना धक्के दे कर निकलवा दूंगा.’

वह अपमान का घूंट पी कर बच्चों की तड़प मन में लिए लौट आया था. वैसे भी झगड़ा किस आधार पर करता, जब रुचि ने ही उस का साथ छोड़ दिया था. वैसे उस के साथ रहते हुए रुचि ने कभी यह नहीं जतलाया था कि वह अमीर बाप की बेटी है, न ही वह कभी अपने मायके जा कर हाथ पसारती थी.

रुचि पैसे का अभाव तो सह जाती थी, लेकिन जब जिंदगी को मस्त ढंग से जीने का सवाल आता तो वह एकदम उखड़ जाती और सिद्धांतों का पक्ष लेती. उस वक्त नवीन का हर समीकरण, हर दलील उसे बेमानी व अर्थहीन लगती. रुचि ने जब अपने लिए घड़ा रखा तो नवीन को महसूस हुआ था कि वह चाहती तो अपने पिता से कह कर अलग से फ्रिज मंगा सकती थी पर उस ने पति का मान रखते हुए कभी इस बारे में सोचा भी नहीं.

नवीन ने रुचि की व्यवस्थित ढंग से जीने की आदत के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश की पर हर बार वह हार जाता. बचपन से ही मां, बाबूजी ने उसे अपने ऊपर इतना निर्भर बना कर रखा था कि वह अपनी तरह से जीना सीख ही न पाया. मां तो उसे अपनेआप पानी भी ले कर नहीं पीने देती थीं. 8 वर्षों के वैवाहिक जीवन में वह उन संस्कारों से छुटकारा नहीं पा सका था.

वैसे भी नवीन, रुचि को कभी संजीदगी से नहीं लेता था, यहां तक कि हमेशा उस का मजाक ही उड़ाया करता था, ‘देखो, कुढ़कुढ़ कर बालों में सफेदी झांकने लगी है.’

तब वह बेहद चिढ़ जाती और बेवजह नौकर को डांटने लगती कि सफाई ठीक से क्यों नहीं की. घर तब शीशे की तरह चमकता था, नौकर तो उस की मां ने जबरदस्ती कन्नू के जन्म के समय भेज दिया था.

सुबह की थोड़ी सब्जी पड़ी थी, जिसे नवीन ने अपने अधकचरे ज्ञान से तैयार किया था, उसी को डबलरोटी के साथ खा कर उस ने रात के खाने की रस्म पूरी कर ली. फिर औफिस की फाइल ले कर मेज पर बैठ गया. बहुत मन लगाने के बावजूद वह काम में उलझ न सका. फिर दराज खोल कर बच्चों की तसवीरें निकाल लीं और सोच में डूब गया, ‘कितने प्यारे बच्चे हैं, दोनों मुझ पर जान छिड़कते हैं.’

एक दिन स्नेहा से मिलने वह उस के स्कूल गया था. वह तो रोतेरोते उस से चिपट ही गई थी, ‘पिताजी, हमें भी अपने साथ ले चलिए, नानाजी के घर में तो न खेल सकते हैं, न शोर मचा सकते हैं. मां कहती हैं, अच्छे बच्चे सिर्फ पढ़ते हैं. कन्नू भी आप को बहुत याद करता है.’

अपनी मजबूरी पर उस की पलकें नम हो आई थीं. इस से पहले कि वह जीभर कर उसे प्यार कर पाता, ड्राइवर बीच में आ गया था, ‘बेबी, आप को मेम साहब ने किसी से मिलने को मना किया है. चलो, देर हो गई तो मेरी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी.’

उस के बाद तलाक के कागज नवीन के घर पहुंच गए थे, लेकिन उस ने हस्ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया था. मुकदमा उन्होंने ही दायर किया था पर तलाक का आधार क्या बनाते? वे लोग तो सौ झूठे इलजाम लगा सकते थे, पर रुचि ने ऐसा करने से मना कर दिया, ‘अगर गलत आरोपों का ही सहारा लेना है तो फिर मैं सिद्धांतों की लड़ाई कैसे लड़ूंगी?’

तब नवीन को एहसास हुआ था कि रुचि उस से नहीं, बल्कि उस की आदतों से चिढ़ती है. जिस दिन सुनवाई होनी थी, वह अदालत गया ही नहीं था, इसलिए एकतरफा फैसले की कोई कीमत नहीं थी. इतना जरूर है कि उन लोगों ने बच्चों को अपने पास रखने की कानूनी रूप से इजाजत जरूर ले ली थी. तलाक न होने पर भी वे दोनों अलगअलग रह रहे थे और जुड़ने की संभावनाएं न के बराबर थीं.

नवीन बिस्तर पर लेटा करवटें बदलता रहा. युवा पुरुष के लिए अकेले रात काटना बहुत कठिन प्रतीत होता है. शरीर की इच्छाएं उसे कभीकभी उद्वेलित कर देतीं तो वह स्वयं को पागल सा महसूस करता. उसे मानसिक तनाव घेर लेता और मजबूरन उसे नींद की गोली लेनी पड़ती.

उस ने औफिस का काफी काम भी अपने ऊपर ले लिया था, ताकि रुचि और बच्चे उस के जेहन से निकल जाएं. दफ्तर वाले उस के काम की तारीफ में कहते हैं, ‘नवीन साहब, आप का काम बहुत व्यवस्थित होता है, मजाल है कि एक फाइल या एक कागज, इधरउधर हो जाए.’

वह अकसर सोचता, घर पहुंचते ही उसे क्या हो जाया करता था, क्यों बदल जाता था उस का व्यक्तित्व और वह एक ढीलाढाला, अलमस्त व्यक्ति बन जाता था?

मेजकुरसी के बजाय जब वह फर्श पर चटाई बिछा कर खाने की फरमाइश करता तो रुचि भड़क उठती, ‘लोग सच कहते हैं कि पृष्ठभूमि का सही होना बहुत जरूरी है, वरना कोई चाहे कितना पढ़ ले, गांव में रहने वाला रहेगा गंवार ही. तुम्हारे परिवार वाले शिक्षित होते तो संभ्रांत परिवार की झलक व आदतें खुद ही ही तुम्हारे अंदर प्रकट हो जातीं पर तुम ठहरे गंवार, फूहड़. अपने लिए न सही, बच्चों के लिए तो यह फूहड़पन छोड़ दो. अगर नहीं सुधर सकते तो अपने गांव लौट जाओ.’

उस ने रुचि को बहुत बार समझाने की कोशिश की कि ग्वालियर एक शहर है न कि गांव. फिर कुरसी पर बैठ कर खाने से क्या कोई सभ्य कहलाता है.

‘देखो, बेकार के फलसफे झाड़ कर जीना मुश्किल मत बनाओ.’ ‘अरे, एक बार जमीन पर बैठ कर खा कर देखो तो सही, कुरसीमेज सब भूल जाओगी.’

नवीन ने चम्मच छोड़ हाथ से ही चावल खाने शुरू कर दिए थे.

‘बस, बहुत हो गया, नवीन, मैं हार गई हूं. 8 वर्षों में तुम्हें सुधार नहीं पाई और अब उम्मीद भी खत्म हो गई है. बाहर जाओ तो लोग मेरी खिल्ली उड़ाते हैं, मेरे रिश्तेदार मुझ पर हंसते हैं. तुम से तो कहीं अच्छे मेरी बहनों के पति हैं, जो कम पढ़ेलिखे ही सही, पर शिष्टाचार के सारे नियमों को जानते हैं. तुम्हारी तरह बेवकूफों की तरह बच्चों के लिए न तो घोड़े बनते हैं, न ही बर्फ की क्यूब निकाल कर बच्चों के साथ खेलते हैं. लानत है, तुम्हारी पढ़ाई पर.’

नवीन कभी समझ नहीं पाया था कि रुचि हमेशा इन छोटीछोटी खुशियों को फूहड़पन का दरजा क्यों देती है? वैसे, उस की बहनों के पतियों को भी वह बखूबी जानता था, जो अपनी टूटीफूटी, बनावटी अंगरेजी के साथ हंसी के पात्र बनते थे, पर उन की रईसी का आवरण इतना चमकदार था कि लोग सामने उन की तारीफों के पुल बांधते रहते थे.

शादी से पहले उन दोनों के बीच 1 साल तक रोमांस चला था. उस अंतराल में रुचि को नवीन की किसी भी हरकत से न तो चिढ़ होती थी, न ही फूहड़पन की झलक दिखाई देती थी, बल्कि उस की बातबात में चुटकुले छोड़ने की आदत की वह प्रशंसिका ही थी. यहां तक कि उस के बेतरतीब बालों पर वह रश्क करती थी. उस समय तो रास्ते में खड़े हो कर गोलगप्पे खाने का उस ने कभी विरोध नहीं किया था.

नींद की गोली के प्रभाव से वह तनावमुक्त अवश्य हो गया था, पर सो न सका था. चिडि़यों की चहचहाहट से उसे अनुभव हुआ कि सवेरा हो गया है और उस ने सोचतेसोचते रात बिता दी है.

चाय का प्याला ले कर अखबार पढ़ने बैठा, पर सोच के दायरे उस की तंद्रा को भटकाने लगे. प्लेट में चाय डालने की उसे इच्छा ही नहीं हुई, इसलिए प्याले से ही चाय पीने लगा.

शादी के बाद भी सबकुछ ठीक था. उन के बीच न तो तनाव था, न ही सामंजस्य का अभाव. दोनों को ही ऐसा नहीं लगा था कि विपरीत आदतें उन के प्यार को कम कर रही हैं. नवीन भूल से कभी कोई कागज फाड़ कर कचरे के डब्बे में फेंकने के बजाय जमीन पर डाल देता तो रुचि झुंझलाती जरूर थी पर बिना कुछ कहे स्वयं उसे डब्बे में डाल देती थी. तब उस ने भी इन हरकतों को सामान्य समझ कर गंभीरता से नहीं लिया था.

अपने सीमित दायरे में वे दोनों खुश थे. स्नेहा के होने से पहले तक सब ठीक था. रुचि आम अमीर लड़कियों से बिलकुल भिन्न थी, इसलिए स्वयं घर का काम करने से उसे कभी दिक्कत नहीं हुई.

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हां, स्नेहा के होने के बाद काम अवश्य बढ़ गया था पर झगड़े नहीं होते थे. लेकिन इतना अवश्य हुआ था कि स्नेहा के जन्म के बाद से उन के घर में रुचि की मां, बहनों का आना बढ़ गया था. उन लोगों की मीनमेख निकालने की आदत जरूरत से ज्यादा ही थी. तभी से रुचि में परिवर्तन आने लगा था और पति की हर बात उसे बुरी लगने लगी थी. यहां तक कि वह उस के कपड़ों के चयन में भी खामियां निकालने लगी थी.

उन का विवाह रुचि की जिद से हुआ था, घर वालों की रजामंदी से नहीं. यही कारण था कि वे हर पल जहर घोलने में लगे रहते थे और उन्हें दूर करने, उन के रिश्ते में कड़वाहट घोलने में सफल हो भी गए थे.

काम करने वाली महरी दरवाजे पर आ खड़ी हुई तो वह उठ खड़ा हुआ और सोचने लगा कि उस से ही कितनी बार कहा है कि जरा रोटी, सब्जी बना दिया करे. लेकिन उस के अपने नखरे हैं. ‘बाबूजी, अकेले आदमी के यहां तो मैं काम ही नहीं करती, वह तो बीबीजी के वक्त से हूं, इसलिए आ जाती हूं.’

नौकर को एक बार रुचि की मां ले गई थी, फिर वापस भेजा नहीं. तभी रुचि ने यह महरी रखी थी नवीन के बाबूजी को गुजरे 7 साल हो गए थे. मां वहीं ग्वालियर में बड़े भाई के पास रहती थीं. भाभी एक सामान्य घर से आई थीं, इसलिए कभी तकरार का प्रश्न ही न उठा. उस के पास भी मां मिलने कई बार आईं, पर रुचि का सलीका उन के सरल जीवन के आड़े आने लगा. वे हर बार महीने की सोच कर हफ्ते में ही लौट जातीं. वह तो यह अच्छा था कि भाभी ने उन्हें कभी बोझ न समझा, वरना ऐसी स्थिति में कोई भी अपमान करने से नहीं चूकता.

वैसे, रुचि का मकसद उन का अपमान करना कतई नहीं होता था, लेकिन सभ्य व्यवहार की तख्ती अनजाने में ही उन पर यह न करो, वह न करो के आदेश थोपती तो मां हड़बड़ा जातीं. इतनी उम्र कटने के बाद उन का बदलना सहज न था. वैसे भी उन्होंने एक मस्त जिंदगी गुजारी थी, जिस में बच्चों को प्यार से पालापोसा था, हाथ में हर समय आदेश का डंडा ले कर नहीं.

रुचि के जाने के बाद उस ने मां से कहा था कि वे अब उसी के पास आ कर रहें, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया था, ‘बेटा, तेरे घर में कदम रखते डर लगता है, कोई कुरसी भी खिसक जाए तो…न बाबा. वैसे भी यहां बच्चों के बीच अस्तव्यस्त रहते ज्यादा आनंद आता है. मैं वहां आ कर क्या करूंगी, इन बूढ़ी हड्डियों से काम तो होता नहीं, नाहक ही तुझ पर बोझ बन जाऊंगी.’

रुचि के जाने के बाद नवीन ने उस के मायके फोन किया था कि वह अपनी आदतें बदलने की कोशिश करेगा, बस एक बार मौका दे और लौट आए. पर तभी उस के पिता की गर्जना सुनाई दी थी और फोन कट गया था. उस के बाद कभी रुचि ने फोन नहीं उठाया था, शायद उसे ऐसी ही ताकीद थी. वह तो बच्चों की खातिर नए सिरे से शुरुआत करने को तैयार था पर रुचि से मिलने का मौका ही नहीं मिला था.

शाम को दफ्तर से लौटते वक्त बाजार की ओर चला गया. अचानक साडि़यों की दुकान पर रुचि नजर आई. लपक कर एक उम्मीद लिए अंदर घुसा, ‘हैलो रुचि, देखो, मैं तुम्हें कुछ समझाना चाहता हूं. मेरी बात सुनो.’

पर रुचि ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहती. तुम अपनी मनमानी करते रहे हो, अब भी करो. मैं वापस नहीं आऊंगी. और कभी मुझ से मिलने की कोशिश मत करना.’

‘ठीक है,’ नवीन को भी गुस्सा आ गया था, ‘मैं बच्चों से मिलना चाहता हूं, उन पर मेरा भी अधिकार है.’

‘कोई अधिकार नहीं है,’ तभी न जाने किस कोने से उस की मां निकल कर आ गई थी, ‘वे कानूनी रूप से हमारे हैं. अब रुचि का पीछा छोड़ दो. अपनी इच्छा से एक जाहिल, गंवार से शादी कर वह पहले ही बहुत पछता रही है.’

‘मैं रुचि से अकेले में बात करना चाहता हूं,’ उस ने हिम्मत जुटा कर कहा. ‘पर मैं बात नहीं करना चाहती. अब सबकुछ खत्म हो चुका है.’

उस ने आखिरी कोशिश की थी, पर वह भी नाकामयाब रही. उस के बाद कभी उस के घर, बाहर, कभी बाजार में भी खूब चक्कर काटे पर रुचि हर बार कतरा कर निकल गई.

नवीन अकसर सोचता, ‘छोटीछोटी अर्थहीन बातें कैसे घर बरबाद कर देती हैं. रुचि इतनी कठोर क्यों हो गई है कि सुलह तक नहीं करना चाहती. क्यों भूल गई है कि बच्चों को तो बाप का प्यार भी चाहिए. गलती किसी की भी नहीं है, केवल बेसिरपैर के मुद्दे खड़े हो गए हैं.

‘तलाक नहीं हुआ, इसलिए मैं दोबारा शादी भी नहीं कर सकता. बच्चों की तड़प मुझे सताती रहेगी. रुचि को भी अकेले ही जीवन काटना होगा. लेकिन उसे एक संतोष तो है कि बच्चे उस के पास हैं. दोनों की ही स्थिति त्रिशंकु की है, न वापस बीते वर्षों को लौटा सकते हैं न ही दोबारा कोशिश करना चाहते हैं. हाथ में आया पछतावा और अकेलेपन की त्रासदी. आखिर दोषी कौन है, कौन तय करे कि गलती किस की है, इस का भी कोई तराजू नहीं है, जो पलड़ों पर बाट रख कर पलपल का हिसाब कर रेशेरेशे को तौले.

वैसे भी एकदूसरे पर लांछन लगा कर अलग होने से तो अच्छा है हालात के आगे झुक जाएं. रुचि सही कहती थी, ‘जब लगे कि अब साथसाथ नहीं रह सकते तो असभ्य लोगों की तरह गालीगलौज करने के बजाय एकदूसरे से दूर हो जाएं तो अशिक्षित तो नहीं कहलाएंगे.’

रुचि को एक बरस हो गया था और वह पछतावे को लिए त्रिशंकु की भांति अपना एकएक दिन काट रहा था. शायद अभी भी उस निपट गंवार, फूहड़ और बेतरतीब इंसान के मन में रुचि के वापस आने की उम्मीद बनी हुई थी.

वह सोचने लगा कि रुचि भी तो त्रिशंकु ही बन गई है. बच्चे तक उस के खोखले सिद्धांतों व सनक से चिढ़ने लगे हैं. असल में दोषी कोई नहीं है, बस, अलगअलग परिवेशों से जुड़े व्यक्ति अगर मिलते भी हैं तो सिर्फ सामंजस्य के धरातल पर, वरना टकराव अनिवार्य ही है.

क्या एक दिन रुचि जब अपने एकांतवास से ऊब जाएगी, तब लौट आएगी? उम्मीद ही तो वह लौ है जो अंत तक मनुष्य की जीते रहने की आस बंधाती है, वरना सबकुछ बिखर नहीं जाता. प्यार का बंधन इतना कमजोर नहीं जो आवरणों से टूट जाए, जबकि भीतरी परतें इतनी सशक्त हों कि हमेशा जुड़ने को लालायित रहती हों. कभी न कभी तो उन का एकांतवास अवश्य ही खत्म होगा. Emotional Family Story

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