Hindi Funny Story: क्या हाल है लतखोरीलाल

Hindi Funny Story, लेखक – राजेंद्र कुमार सिंह

आज की राजनीति में लतखोरों और चोरों की कमी नहीं है. जो जहां पर है, जिस को जहां मौका मिला, चौकाछक्का मार कर विकास का चक्का जाम कर हराम के माल पर कमाल करते हुए नमकहराम खुद आराम कर रहा है. जो भविष्य में बनता यही जी का जंजाल है. जनता देख रही जो नेता भलाई करने का संकल्प ले कर मैदान में उतरा, वही विकास के पर कतर मलाई चांप रहा है, मजे से नोट छाप रहा है. इस आड़ में कामयाबी का झठा झंडा गाड़ कर कहता है कि जनता जाए भाड़ में. विकास की चादर समेट बढि़या कमीशन लपेट कर अपना पेट भर निडर हो कर चल रहा है.

सार्वजनिक संपत्ति पर अपने अधिकार से कटौती कर बपौती समझ कर यूज कर रहा है. आज जनता को सजग होते ही इन की करतूतों को देख कहर बन कर टूट रही है. जो सार्वजनिक संपत्ति को अपना समझने की भूल कर रहे थे, उन की कलई खुल रही है. जनता के गुस्से से उन का जोश बेहोश हो कर धराशायी हो गया.

वह कितना बेकल, बेहाल व लाचार है. चल रहा कभी पातपात, तो कभी भाग रहा इस डाल तो उस डाल है. इसी तरह के सांपसीढ़ी के खेल में देश का खस्ताहाल है. पूरे देश में एक अलग स्लोगन चल रहा है. जनता जो सोई थी, अपनी हसरतें जो डुबोई थी, अब वह मचल रही है, रोड पर निकल उछल रही है.

आज लोकतंत्र बिलकुल तंगतंग हो गया है. दूसरे शब्दों में लोकतंग या प्रजातंग कह सकते हैं. सुकून और शांति सत्ता की होड़ में जो पहले से आसन पर बैठ झठा आश्वासन परोस रहा है. सूचना तंत्र इन की साजिश के झंसे में आ गया है. वह भी खापी कर दंड मार रहा है. बोझ से दबा बैठा है. कुछ अजीब तरह की हरकत करते हुए कुंठित हो कर बीचबीच में ऐसा कानून या विधेयक लाता है, मुंह की खाता है. जनता जाग गई लेते हुई अंगड़ाई. अगले अंजाम को तमाम करने के लिए क्वालिफाई कर रही है.

और इसी तरह के जुनून में हमारे महल्ले के उभरते नेता सुखीराम ने भी इस जंग में कूद कर अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया. मौका देख कर चौका मारने में कमाल का महारत हासिल है. जब जान गया कि ऐसेऐसे मौके पर कुछ भेटने वाला है, तो समेटने के लिए निकल पड़ता है. उन के साथ में एक टोली होती है जो अगले की बोली पर ताला लगा देने के लिए जानी जाती है.

यही वजह है कि वे समयसमय पर लतियाए जाते हैं. कभी खूब पिटाते हैं. उस में सब से ज्यादा प्रसाद सुखीराम ही पाते हैं. लोगबाग अब असली नाम के जगह नेता लतखोरीलाल कहते हैं. ये जब जब पिटा कर आए, पड़ोसी होने के नाते पूछ लिया, ‘‘क्या हाल है लतखोरीलाल भाई?’’

क्योंकि ये पक्ष हो या विपक्ष तहसनहस कराने, मामला को बिगाड़ने के लिए मशहूर हैं. हालांकि, हवा का रुख देख कर चलते हैं, इसलिए जबजब सत्ता बदलती है, ये भी बदल जाते हैं. खरीदफरोख्त में मोलतोल करने में इन का जवाब नहीं, महारत हासिल है. सामान तो इनसान भी खरीदते हैं, नेता खरीदने में इन का क्या कहना.

देश की संपत्ति को ये बपौती समझकर आमजन की सुविधाओं में कटौती कर पनौती लगाने के लिए भी जाने जाते हैं, इसलिए जनमानस जैसे ही सड़कों पर उतरा, शायद इन पर मंडराना शुरू हो गया खतरा. अभी जंग जारी है. नया मुद्दा अभी कुछ ज्यादा उछल रहा है किसी आयोग को ले कर. जनता भी पड़ गई है इन के पीछे हाथ धो कर. Hindi Funny Story

Hindi Kahani: बदमाश हिरनी

Hindi Kahani: लाला जनार्दन मोटरसाइकिल से उधार देने और वसूली करने गांवगांव जाया करता था. एक दिन की बात है. दोपहर की उमस भरी गरमी से छुटकारा पाने के लिए जनार्दन ने अपनी मोटरसाइकिल एक खेत के किनारे खड़ी कर दी और वह कुछ गुनगुनाते हुए गन्ने के झुरमुट के बीच से चला जा रहा था.

अचानक जनार्दन ने देखा कि कुएं के पास एक लड़की बैलों की जोड़ी को हांक रही थी.

जनार्दन कुछ पल के लिए सांस रोके उस लड़की को देखता रहा. सिर पर पल्लू डाले हुए वह नईनई ब्याही लड़की जवान और खूबसूरत लग रही थी.

उसे इस तरह अपनी ओर निहारता देख वह लड़की एकाएक हंस पड़ी और बोली, ‘‘प्यास लगी है, तो पानी पी लो.’’

जनार्दन ने चुल्लू में पानी भर कर होंठों से लगाया, जिस से उस का गला तो तर हो गया, पर मन प्यासा रह गया.

लड़की ने दोबारा कुएं से पानी निकाल कर उस की ओर बढ़ा कर कहा, ‘‘और पी लो.’’

जनार्दन बोल उठा, ‘‘पिला दो.’’

उस लड़की ने लोटे से पानी पिलाना शुरू किया. पानी की फुहार से जनार्दन का तनमन जैसे भीग गया था.

वह ठिठका सा खड़ा था कि लड़की बोली, ‘‘रोटी खा लो.’’

जनार्दन के पास रोटी नहीं थी. उस की बीवी तो शहर में परिवार के साथ रहती थी. भरी दोपहर में जैसे उस की बरसों की सोई प्यास जाग उठी. इस के बावजूद वह चुपचाप वहां से लौटने को हुआ.

उस लड़की से रहा न गया. वह बोली, ‘‘यहीं रोटी खा लो…’’

जनार्दन पलभर के लिए रुका. उस ने गौर से देखा कि उस लड़की का टीका चमक रहा था. सूरज की सुनहरी किरणें उस के चंपा जैसे चेहरे को चूम रही थीं.

जनार्दन को झिझकते देख कर वह लड़की फिर बोली, ‘‘गरमी की वजह से मैं ने रोटी खाई नहीं है, तुम खा लो.’’

जनार्दन ने देखा कि वह लड़की महुआ की गंध की तरह मस्त नजर आ रही थी, मानो उस से मनुहार कर रही हो.

जनार्दन ने अपनी कमर में बंधी थैली को टटोला कि कहीं गिर तो नहीं गई है. आज ही तो उसे गिरवी में 2 कंगन मिले थे. उन्हें संभाल कर वह वहीं बैठ गया.

तभी जनार्दन को लड़की के बदन से दूध की सोंधी गंध महसूस हुई. लड़की का पसीने से भीगा आंचल उस के बदन से चिपका था. जनार्दन से दो कौर रोटी भी नहीं तोड़ी जा रही थी.

लड़की जान गई कि झिझक का मारा जनार्दन रोटी नहीं खा पा रहा है, इसलिए उस ने एक लोटा गन्ने का रस उसे पीने को दिया. इसी बीच सूरज डूब गया.

वह भारी मन से उठा. उस का हाथ कमर में बंधी पोटली पर गया. 2 कंगन अभी भी सहीसलामत थे.

जनार्दन की तिजोरी में न जाने कितने गहने पड़े सड़ रहे थे. वह कुछ पल सोच कर बोला, ‘‘इधर आ.’’

वह लड़की जनार्दन के सामने आ कर खड़ी हो गई.

जनार्दन ने कंगन निकाल कर उस की कलाइयों में पहना दिए.

वह लड़की नानुकर करती रही, पर जनार्दन ने उसे मना ही लिया.

जब जनार्दन जाने लगा, तो वह मतवाली लड़की कंगन पहने हाथों को हिला कर उसे विदा कर रही थी. जनार्दन ने उस पर भरपूर नजर डाली और बोला, ‘‘बदमाश हिरनी…’’ Hindi Kahani

Story In Hindi: सतरंगी आसमान

Story In Hindi: अपनी सुहागरात पर साकेत काया के उभारों के बीच उगे बाल देख कर हैरान रह गया और उस का मूड खराब हो गया. इस के बाद साकेत और काया के बीच दूरियां बढ़ गईं. फिर काया की जिंदगी में सुशांतो आया जो उम्र में उस से कम था. आगे क्या हुआ?

सुबह के 7 बज गए थे. साकेत और काया की सुहागरात बीत चुकी थी. साकेत की आंखें खुलीं, तो उस के मन में एक उदासी थी. आमतौर पर लोग सुहागरात बीतने के अगले दिन बहुत खुश नजर आते हैं, पर साकेत का मूड पूरी तरह से उखड़ा हुआ था.

साकेत ने अनमने मन से बिस्तर छोड़ा और बाथरूम में घुस गया. फ्रैश हो कर बाहर आया तो देखा कि उस की पत्नी काया सकुचाई सी ड्रैसिंग टेबल के सामने खड़ी हो कर अपनी बिंदी सही कर रही थी.

साकेत ने काया पर एक उचटी हुई सी नजर डाली और डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ गया, जहां पर साकेत की मां नाश्ता लगा कर उस का इंतजार कर रही थीं.

साकेत ने जल्दीजल्दी नाश्ता किया और बाहर की ओर जाने लगा. मां के पूछने पर साकेत ने बताया कि उसे थोड़ा काम है, इसलिए बाहर जाना पड़ेगा.

साकेत तेजी से गाड़ी ड्राइव कर रहा था. पिछली रात को साकेत और काया की सुहागरात पर साकेत को कुछ ऐसा अनुभव हुआ था, जिस की कल्पना उस ने कभी नहीं की थी.

शादी के बाद पतिपत्नी एकदूसरे में पूरी तरह डूब जाना चाहते हैं, हर अंग को देख और जान लेना चाहते हैं और साकेत भी ऐसे मर्दों में से ही था. उस की आंखें काया की खूबसूरती को पूरी तरह से देख लेना चाहती थीं, पर काया अपने अंगों को बारबार सिकोड़ लेती थी और कमरे की लाइट बंद करने को कह रही थी.

पर साकेत तो टूट कर प्यार करना चाहता था और काया के सभी अंगों को चूम कर अपना प्यार जाहिर करना चाहता था, पर काया लगातार असहज हो रही थी और अपने दोनों हाथों से अपने उभारों को ढक ले रही थी, पर साकेत कुदरत की बनाई हुई इस खूबसूरत चीज के बीच डूब जाना चाहता था.

इसी सब में साकेत ने काया के दोनों हाथों को अपने हाथों के जोर से फैला दिया और काया के उभारों के बीच अपना चेहरा सटा दिया.

साकेत ने अपनी आंखों में काया के रूप को कैद करना शुरू कर दिया था और यही वह समय था, जब साकेत ने देखा कि काया के दोनों उभारों के बीच कुछ रोएं हैं और कुछ कालापन सा है, जो आमतौर पर सभी औरतों में नहीं होता.

पर चूंकि साकेत उस समय जिस्मानी रिश्ता बनाने के लिए उतावला हुआ जा रहा था, इसलिए उस ने कुछ नहीं पूछा, पर जब वह शांत हुआ, तब साकेत का सब से पहला सवाल यही था, ‘‘तुम्हारे उभारों के बीच रोएं और कालेपन का अजीब सा निशान कैसा है? ऐसा जो लगातार शेव करने के बाद आता है…’’

कुछ देर तक तो काया अनसुना कर के लेटी रही, पर जब साकेत बारबार वही सवाल दोहराता रहा, तो काया ने शरमाते हुए साकेत को बताया कि उस के उभारों के बीचोंबीच बाल हैं. उस ने काफी समय पहले यह समस्या अपनी मां से भी शेयर की थी, पर मां ने उसे चुप कराते हुए छोटे गले वाले सूट पहनने को कहा और सम झाया कि धीरेधीरे ये बाल अपनेआप गायब हो जाएंगे.

पर साकेत यह सब सुनना नहीं चाहता था. वह तो काया पर ही धोखाधड़ी का इलजाम लगाने लगा, ‘‘तो मु झे यह बात शादी से पहले क्यों नहीं बताई? मेरे साथ धोखा हुआ है.’’

काया और साकेत के बीच बातचीत में भी अब कड़वाहट घुलने लगी थी, पर काया, जो किशोरावस्था से ही उभारों के बीच बाल होने की समस्या से जूझती आ रही थी, अपने पति के ऐसे रिऐक्शन के लिए मानसिक रूप से पहले से ही तैयार थी.

28 साल की काया पेशे से एक एमबीबीएस डाक्टर थी. उस ने शांत स्वर में साकेत को सम झाया कि शरीर में कई जगह अनचाहे बाल होते हैं. कुछ लोगों में सीने के बीच रोएं होते हैं, तो कुछ में ये बड़े हो कर बाल का रूप धारण कर लेते हैं, जिन से पीछा छुड़ाना आसान नहीं होता, लेकिन आजकल हेयर रिमूवर, वैक्सिंग और लेजर तकनीक द्वारा शरीर के किसी भी हिस्से के अनचाहे बाल हटाए जा सकते हैं और वह भी ऐसा ही कोई साधन अपना लेगी.

साकेत ने काया की बात सुनी तो जरूर थी, पर छाती के बीच बाल वाली काया अब उस की आदर्श पत्नी नहीं रह गई थी.

साकेत और काया को 2 दिन बाद हनीमून के लिए मौरीशस जाना था, पर साकेत ने प्लान कैंसिल कर दिया था. मां ने वजह पूछी, तो साकेत ने काम ज्यादा होने और तबीयत सही न होने का बहाना बना दिया था.

काया ने बहुत सोचा और अपनी छुट्टियां रद्द कर दीं और अगले दिन से ही वह अस्पताल जाने लगी.

काया लखनऊ शहर के दीनदयाल उपाध्याय मैमोरियल अस्पताल में डाक्टर थी और वहां उस की इमेज बहुत अच्छी थी.

आज काया अस्पताल काम पर आई, तो उस ने दिनभर खूब मन से काम किया और रोज से ज्यादा समय दिया. शाम को 7 बजे वह घर चली गई.

रात को बिस्तर पर साकेत मुंह घुमा कर लेटा रहा. काया ने माहौल को नौर्मल करने के लिए उस से बात करना चाहा, पर साकेत शांत ही रहा.

काया ने धीरेधीरे साकेत के शरीर को सहलाना और चूमना शुरू किया. साकेत ने भी काया के शरीर को चूमा, पर ठीक तभी उस की नजर काया के उभारों के बीच के बालों पर पड़ गई और उस का मूड औफ हो गया.

काया के लिए छाती के बीच बालों का होना अब तक एक नौर्मल बात हो चुकी थी, पर साकेत के लिए तो यह एक बदसूरती की निशानी थी और इसीलिए उस ने काया से तलाक ले लेने की बात तक कह दी.

साकेत की यह बात सुन कर काया सन्न रह गई. वह कुछ न बोल सकी. अलबत्ता उस की आंखें जरूर डबडबा आई थीं.

काया के पिता तो उस के बचपन में ही गुजर गए थे. उन की जगह उस की मां ने नौकरी की और काया को पालपोस कर डाक्टर बनाया और उस के बाद कितने अरमानों से उस की शादी कराई थी और आज शादी के कुछ ही दिनों के बाद काया का पति उसे तलाक देने को कह रहा है. क्या गुजरेगी उस की मां पर…

अगली सुबह जब काया अस्पताल जाने के रास्ते में थी कि तभी उस के साथी डाक्टर वासुदेव आनंद का फोन आया, जो काया को जल्दी से अस्पताल आने के लिए कह रहे थे, क्योंकि 2 डाक्टर छुट्टी पर थे और अस्पताल में एक इमर्जैंसी केस आ गया था.

काया जल्दी से अस्पताल पहुंची तो उसे बताया गया कि 24 साल के एक नौजवान की नाक से बहुत खून निकल रहा है. फिलहाल डाक्टर वासुदेव आनंद ने प्राथमिक उपचार दे दिया है, बाकी की जांच और ट्रीटमैंट काया को करना होगा.

वह 24 साल का नौजवान बिस्तर पर लेटा हुआ था और उस के बगल में तकरीबन 50 साल का कोई शख्स खड़ा हुआ था.

काया ने नर्स को मरीज के कुछ जरूरी सैंपल लेने को कहा और मरीज से बातचीत करने लगी. इस बीच डाक्टर वासुदेव आनंद अपने राउंड पर चले गए थे.

काया ने नोटिस किया था कि उस नौजवान का शरीर देखने में काफी मजबूत लग रहा था.

‘‘आप इन के पिता हैं? जरूर इन की किसी से कोई लड़ाई हुई होगी,’’ काया ने उस पास खड़े आदमी की ओर देखते हुए पूछा, तो ट्रैक सूट पहने हुए उस आदमी ने बताया कि वह इस नौजवान का बौक्सिंग कोच है और सुशांतो नाम के इस लड़के को चोट भी मैच प्रैक्टिस के दौरान लगी थी.

इस बीच नर्स खून का सैंपल लेने आ गई थी. उस के सूई इंजैक्ट करते ही सुशांतो ने बड़ी जोर से मुंह बनाया मानो उसे बहुत दर्द हो रहा हो. उस की इस नाटकीयता पर काया मुसकराए बिना न रह सकी.

‘‘बौक्सिंग करते हो और एक छोटी सी सूई से डरते हो,’’ काया ने कहा.

‘‘अरे मैडम, पंच झेलना आसान है. पंच से डर भी नहीं लगता, मगर यह सूई उस से ज्यादा डराती है,’’ पहली बार सुशांतो कुछ बोला था.

सुशांतो की आवाज काफी भारी और रोबदार थी. काया ने एक बार फिर से सुशांतो के चेहरे की ओर देखा. कितना शांत चेहरा था सुशांतो का, मगर इस चोट ने फिलहाल किस तरह उस के चेहरे को बिगाड़ कर रख दिया था. बातचीत रोक कर काया बाकी की जांच करने लगी थी.

काया ने सुशांतो के कोच को बताया कि उसे सुशांतो को तकरीबन 48 घंटे के लिए अस्पताल में छोड़ना होगा और इस के बाद ही वह पूरी तरह से ठीक हो पाएगा. सुशांतो के कोच पूरी तरह आश्वस्त हो गए थे.

शाम को काया घर वापस आई तो उसे कमरे में बैठे साकेत के उतरे और खिसियाहट भरे चेहरे का सामना करना पड़ा. घर आते ही वही सब परेशानियां और शिकायतें.

अस्पताल में तो इतनी समस्याएं, बीमारियों से लड़ते मरीज और परेशानी झेलते उन के परिजन फिर भी सभी के मन में एक उम्मीद होती है कि एक दिन वे अपने मरीज को ठीक होता देखेंगे और उसे अपने घर ले जा सकेंगे, पर काया की जिंदगी में तो कुछ ऐसी समस्या आ चुकी थी, जिस का इलाज तो फिलहाल काया को भी समझ नहीं आ रहा था.

काया ने 1-2 बार साकेत से बोलने की कोशिश की, पर वह काया से बात नहीं करना चाहता था.

बिस्तर पर भी साकेत करवट ले कर ही लेटा रहा. ने काया के उभारों के बीच बालों की बात को उस के साथ हुआ धोखा सम झ लिया था और उभारों के बीच बालों की मौजूदगी उसे प्यार के समंदर में उतरने से पहले ही पस्त कर दे रही थी.

अगले दिन जब काया अस्पताल में सुशांतो के पास पहुची तो सुशांतो बिस्तर पर लेटा हुआ मोबाइल चला रहा था.

‘‘तुम लोग मोबाइल में कितना लगे रहते हो न…’’ काया ने मुसकराते हुए कहा, तो सुशांतो ने बड़े स्टाइल से झट से मोबाइल को तकिए के नीचे छिपा लिया.

काया और सुशांतो के बीच बातचीत बढ़ने लगी थी. सुशांतो उत्तर प्रदेश के तराई इलाके का रहने वाला था. उस के पिता एक प्राइवेट जौब करते थे. उस के घर में एक छोटी बहन भी थी.

पिता चाहते थे कि सुशांतो कोई नौकरी कर ले जिस से घर का खर्चा चले, पर सुशांतो तो फिटनैस फ्रीक था. उस की लगन देखते हुए उस के कालेज के स्पोर्ट्स टीचर ने उसे लखनऊ जा कर बौक्सिंग में कैरियर बनाने को कहा और तभी से वह लखनऊ में केडी सिंह बाबू स्टेडियम में बौक्सिग सीख रहा था.

‘‘आप के आते ही यह कमरा फूलों की खुशबू से भर जाता है डाक्टर मैडम. यह किस परफ्यूम की खुशबू है?’’ बड़े ही अलग अंदाज में सुशांतो ने यह सवाल पूछा, तो काया को थोड़ा अजीब लगा.

काया ने सुशांतो के चेहरे को देखा तो उस के चेहरे पर एक मासूम भोलापन था.

‘‘मेरा मतलब है कि आप का आना मु झे बहुत अच्छा लगता है और सच कहूं, तो आप भी मु झे बहुत अच्छी लगती हैं,’’ एक सांस में कह गया था सुशांतो.

काया बोली, ‘‘एक शादीशुदा डाक्टर से ऐसी बातें करना अच्छी बात नहीं,’’ कहते हुए वह कमरे से बाहर निकल गई और लौबी में रखे एक्वेरियम के पास आ कर खड़ी हो गई. वह रंगबिरंगी मछलियों को देखने लगी.

सभी मछलियां पानी में तैरती हुईं बिना किसी तनाव के औक्सीजन के बुलबुलों से अठखेलियां कर रही थीं. काया ने एक लंबी सांस छोड़ी और अपने केबिन की ओर बढ़ गई.

सुशांतो को आज डिस्चार्ज होना था. उस के कोच उसे लेने आ गए थे.

‘‘अब तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी. चोट पूरी तरह से ठीक है और अगर समस्या हो तो डायरैक्ट मु झ से बात कर सकते हो,’’ काया ने अपना मोबाइल नंबर देते हुए हुए कहा था.

काया घर आई तो उस की सास ने उसे बताया कि साकत को औफिस के काम से 3-4 दिन के लिए बैंगलुरु जाना पड़ गया.

‘‘अचानक… साकेत कम से कम एक मैसेज तो कर सकता था…’’ काया बुदबुदा उठी.

फिर काया बिस्तर पर लेट गई. उस के जेहन में एक्वेरियम वाली मछलियां घूम रही थीं. तैरती हुईं, आजाद, औक्सीजन के बुलबुलों से अठखेलियां करती हुईं.

अगले दिन ‘डाक्टर्स डे’ था. काया के मोबाइल पर कुछ मैसेज आए थे. काया ने देखा कि ये मैसेज उसे सुशांतो ने किए थे, जिन में उस ने ‘डाक्टर्स डे’ विश करते हुए डाक्टरों की तारीफ के बारे में बहुतकुछ लिखा था… ‘और एक औरत का डाक्टर होना और भी माने रखता है, क्योंकि वह घर और बाहर दोनों जगह के मरीजों को अच्छी तरह से डील करना जानती है…’

काया प्रशांतो का मैसेज पढ़े जा रही थी, जिस में आगे लिखा हुआ था, ‘मेरे बौक्सिंग स्किल से खुश हो कर मेरे कोच आज मु झे नई बाइक दिला रहे हैं. अगर आज आप इस मरीज के लिए थोड़ा समय निकाल सको, तो इस मरीज की तबीयत और भी अच्छी हो जाएगी…’

काया ने मैसेज पढ़ कर खुशी महसूस की और उस का रिप्लाई कर दिया, ‘ओके, आज शाम को 5 बजे मिलते हैं.’

शाम को पौने 5 बजे ही सुशांतो का फोन आ गया. वह बाहर काया का इंतजार कर रहा था.

लाल और काले रंग की स्पोर्ट्स बाइक की सीट पर शान से बैठा हुआ प्रशांतो बहुत हैंडसम दिख रहा था. काया बाइक की सीट पर बैठ गई.

प्रशांतो ने बाइक को थोड़ा आगे बढ़ाया और फिर बाइक की रफ्तार बढ़ा दी. काया के रेशमी बाल हवा में लहराने लगे थे और सड़क पर प्रशांतो सब को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ता जा रहा था.

अचानक से जब भी प्रशांतो को ब्रेक लेना पड़ता, तो काया के उभार प्रशांतो की पीठ से टकरा जा रहे थे. प्रशांतो को भी इस बात का अहसास हो रहा था और शायद इसीलिए अब वह बारबार ब्रेक लगाने लगा था.

कुछ देर बाद प्रशांतो ने ‘विबग्योर म्यूजिकल फाउंटेन’ के पास बाइक रोक दी, जहां रंगबिंरगा पानी संगीत की लय के साथ झूम रहा था. गीत के बोल थे, ‘तेरे हाथ में मेरा हाथ हो, सारी जन्नतें मेरे साथ हों…’

गीत ने रोमांटिक माहौल बना दिया था. प्रशांतो ने काया के नरम हाथों को अपने हाथों में ले लिया और
सहलाने लगा.

काया ने भी कोई विरोध नहीं किया. उस के अंदर की डाक्टर इस समय दरकिनार हो गई थी और उस के अंदर की औरत की इच्छाएं बलवती हो रही थीं. दोनों कुछ देर हाथ में हाथ डाले बैठे रहे, पर अचानक आए फोन ने दोनों की इस प्रेम तंद्रा को भंग किया.

काया झट से खड़ी हो गई. उधर से साकेत की आवाज थी, ‘तुम ने अपने शरीर की इस बीमारी को मु झ से छिपाया और मु झ से शादी कर के मु झे धोखा दिया. मैं तुम्हारे साथ और नहीं रह सकता. मुझे तुम से तलाक चाहिए,’ इस के बाद साकेत ने फोन काट दिया था.

साकेत की कड़वी बातें सुन कर काया काफी दुखी हो गई. उसे इस समय किसी साथी की तलाश महसूस हो रही थी. उसे न जाने क्या महसूस हुआ कि वह अपनी उम्र से छोटे प्रशांतो के सीने से लग गई.

एक डाक्टर और मरीज का रिश्ता अचानक सतरंगी हो चला था. आसपास के लोग अजीब नजरों से प्रशांतो और काया को देख रहे थे, पर उन दोनों को अब किसी की परवाह नहीं थी.

काया को घर जा कर नींद नहीं आई. वह एक दोराहे पर खड़ी थी. एक तरफ उस का पति था जो उस से नफरत करता था, दूसरी तरफ प्यार से लबरेज प्रशांतो था… पर क्या उस से कम उम्र का प्रशांतो अल्हड़ या फिर मौकापरस्त तो नहीं था? काया रातभर सोचती रही थी और सुबह होतेहोते वह किसी नतीजे पर भी पहुंच गई थी.

अगली सुबह अस्पताल से ही काया ने प्रशांतो को मैसेज किया, ‘आज मेरा बर्थडे है. मु झे विश नहीं करोगे?’

यह मैसेज पढ़ते ही प्रशांतो खुशी से झूम उठा और ताबड़तोड़ बधाई संदेश और शेरोशायरी भेजने लगा.
‘इन सब की जरूरत नहीं है, शाम को मिल कर केक काटते हैं,’ काया ने मैसेज किया.

प्रशांतो ने ‘थम्सअप’ का इमोजी देते हुए ‘ओके’ का मैसेज भेज दिया.

शाम को प्रशांतो बाइक ले कर पहले से ही खड़ा था. बाइक पर बैठते ही काया ने प्रशांतो को बाइक होटल ‘गोमती राइम्स’ की तरफ मोड़ने को कहा.

गूगल मैप पर लोकेशन देखने के बाद प्रशांतो ने बाइक को उसी दिशा में मोड़ दिया.

तकरीबन 20 मिनट के बाद वे दोनों होटल ‘गोमती राइम्स’ के अंदर थे, जहां पर काया ने खुद ही केक वगैरह का इंतजाम पहले से करा रखा था. यह एक खूबसूरत सा कमरा था, जो हनीमून कपल्स के लिए रिजर्व रखा जाता है.

उन दोनों ने केक काटा और प्रशांतो ने कुछ लाइनें भी बोलीं, जिन्हें वह पहले से लिख कर लाया था, ‘‘काया, तुम से मिलने के बाद तन्हाइयां मु झे भाती हैं, हर तरफ तुम्हारी परछाइयां नजर आती हैं. तुम दुनिया में सब से खूबसूरत हो, तुम्हारे आगे परियां भी कमतर नजर आती हैं.’’

कविता की लाइनें खत्म होते ही काया रोमांचित हो गई थी और प्रशांतो के गले लग गई और उस के मजबूत बदन को सहलाने लगी.

प्रशांतो की नसों में बहता खून लावा बनने लगा था और उस की सांसें भी तेज चलने लगी थीं. प्रशांतो के होंठ आगे बढ़े और काया के होंठों से टकरा गए. वे दोनों एकदूसरे की सांसों की खुशबू महसूस करने लगे थे.

काया ने पूरी तरह से खुद को प्रशांतो के हवाले कर दिया था. काया के बदन से कपड़े अलग हो चुके थे. प्रशांतो के हाथ कभी काया के उभारों को सहलाते तो कभी उन के बीच उगे रेशमी बालों को. कभीकभार प्रशांतो उन बालों को चूम भी लेता था.

काया ने अधखुली मदहोश आंखों से देखा कि प्रशांतो की नजरें उस के उभारों के बालों पर बारबार जा रही थीं, पर उन नजरों उदासी नहीं थी, बल्कि प्यार झलक रहा था.

कमरा दहक चला था. दोनों ने अपनीअपनी मंजिल पा ली थी.

‘‘मेरे इन बालों से तुम्हे नफरत नहीं हुई?’’ धीरे से काया ने पूछा.

‘‘जहां असली प्यार होता है, वहां नफरत के लिए कोई जगह नही होती. और फिर ये बाल तो तुम्हारे रूप की रेशमी परछाइयां हैं. इन्हें तो और प्यार करने की जरूरत है. इन्हें कभी मत हटाना,’’ प्रशांतो ने बालों को सहलाते हुए कहा.

‘‘शादी करोगे एक तलाकशुदा से?’’ काया ने पूछा.

‘‘मेरे जैसे आदमी को एक डाक्टर से अच्छी पत्नी कहां मिलेगी…’’ प्रशांतो ने कहा.

उस दिन के बाद होटल ‘गोमती राइम्स’ का यह कमरा कई बार उन दोनों के प्यार का गवाह बना.

काया ने अपने उभारों के बालों को किसी भी तरीके से रिमूव करना छोड़ दिया था, क्योंकि प्रशांतो को वह सब पसंद थी. किसी भी हार्मोनल गड़बड़ी के चलते आए जिस्मानी बदलाव को वह कमी नहीं मानता था.

उस दिन काया घर पर थोड़ी देर से पहुंची, तो साकेत घर पर नहीं था. काया ने अपना सामान पैक करना शुरू कर दिया था और मैसेज कर के साकेत को बता दिया कि अब वह उस की नफरत और नही सहेगी, क्योंकि वह उसे तलाक देने के लिए तैयार है.

काया ने अपने मैसेज में लिखा, ‘मैं किसी और रूप में किसी और के साथ अपनी नई जिंदगी की तरफ कदम बढ़ाने जा रही हूं. किसी ऐसे के साथ जो मेरे इन बालों की रेशमी परछाइयों को प्यार करेगा, नफरत नहीं.’

इस के बाद काया ने मैसेज भेज दिया था. काया बाहर खड़े प्रशांतो की बाइक पर आ कर बैठ गई. वे दोनों
अपने अरमानों एक नए आसमान की तरफ बढ़े चले जा रहे थे, एक सतरंगी आसमान की तरफ. Story In Hindi

Hindi News Story: दिल्ली की मेयर और जोहरान ममदानी

Hindi News Story: दिल्ली में गुलाबी ठंड शुरू हो चुकी थी, पर अभी भी दीवाली के बाद की घुटनभरी प्रदूषित हवा का गुबार दिल्ली का पीछा नहीं छोड़ रहा था. ऊपर से लालकिला बम धमाके ने दिल्ली और पूरे देश को दहला दिया था. उधर, जेएनयू छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी के मुकाबले वामपंथी गुट ने चारों सीटें जीत ली थीं. दिल्ली नगरनिगम के उपचुनाव भी खामोशी से आगे बढ़ रहे थे.

अनामिका अपने कमरे की बालकनी में अखबार पढ़ रही थी. कल रात से विजय भी उसी के साथ था. कल की रात उन दोनों ने बड़ी मस्ती के साथ बिस्तर पर गुजारी थी.

विजय अभी भी सो रहा था. अनामिका सोच रही थी कि दिल्ली की इस बदहाली को क्या दिल्ली का मेयर सुधार सकता है? फिर उसे लगा कि वह आईएएस बन सकती है और मौका मिला तो उसे दिल्ली की मेयर की सीट पर भी अपनी नजर रखनी होगी.

यह सोच कर अनामिका जोश में आ गई और सीधा कमरे में गई. उस ने अपनी एक चुन्नी को माइक की तरह पकड़ा और आईने के सामने चिल्लाने लगी, ‘‘अगर मुझे दिल्ली का मेयर बनने का मौका मिला, तो मैं यहां सुधार के तमाम काम करा दूंगी. आप मुझे एक मौका दें…’’

‘‘यह सुबहसुबह क्या नौटंकी है? क्यों मेरी नींद खराब कर रही हो?’’ विजय ने आंख मसलते हुए पूछा.

‘‘तुम यहां सो रहे हो और दिल्ली को उस की नई मेयर मिल गई है,’’ अनामिका ने हंसते हुए कहा. ‘‘अब यह क्या नया शिगूफा है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘यार, मैं सोच रही हूं कि पार्षद का चुनाव लड़ कर दिल्ली की मेयर बन जाऊं,’’ अनामिका बोली.

‘‘मतलब, तुम राजनीति के दलदल में कदम रखना चाहती हो?’’ विजय अब भी हैरान था.

‘‘तो क्या हुआ… मैं पढ़ीलिखी हूं, तर्क के साथ बात करने की तमीज है मुझ में, तो मैं क्यों नहीं दिल्ली की मेयर बन सकती?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘शायद तुम भूल गई हो कि चाहे चुनाव पंच का हो या सांसद का, भारत में आज भी वोट जाति और धर्म के नाम पर दिए जाते हैं,’’ विजय बिस्तर छोड़ कर बोला.

‘‘मतलब?’’ अनामिका हैरान हो कर बोली.

‘‘अरे यार, क्या तुम नहीं जानती अपनी जाति के बारे में… मुझ जैसे कुछ लोग तुम्हें जरूर वोट दे देंगे, पर दूसरे लोगों को जाति और धर्म के प्रपंच से कैसे बाहर निकाल पाओगी?

तुम्हारे बिहार के ही विधानसभा चुनाव देख लो. वहां भी धर्म और जाति का बोलबाला रहा. उम्मीदवार की जाति देख कर टिकट दिए गए,’’ विजय ने कहा.

‘‘पर यार, ऐसे तो अच्छे लोग राजनीति में कभी आ ही नहीं पाएंगे,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर पहले तुम यह तो बताओ कि तुम पर सुबहसुबह दिल्ली की मेयर बनने का भूत कैसे चढ़ गया?’’ विजय ने पूछा.

‘‘जोहरान ममदानी ने मेरा जोश बढ़ाया है. जब से वे न्यूयौर्क के मेयर बने हैं, मुझे भी लगता है कि दिल्ली की मेयर मैं बन जाऊं,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘ओह, तो यह मामला है. न्यूयौर्क से चली हवा दिल्ली तक आ गई है,’’ विजय बोला.

‘‘अरे भई, खरबूजे को देख कर ही तो खरबूजा रंग बदलता है. फिर जोहरान ममदानी में क्या कमी है… बंदा डंके की चोट पर मेयर बना और आते ही उस ने अपने तेवर दिखा दिए हैं,’’ अनामिका बोली.

‘‘तुम जोहरान ममदानी के बारे में जानती ही क्या हो? कौन है वह बंदा जो तुम इतना जोश में आ गई हो?’’ विजय ने चिढ़ते हुए पूछा.

‘‘जोहरान ममदानी के बारे में मैं ने खबरों में काफी खंगाला है. वे एक शिया मुसलिम युगांडाई स्कौलर महमूद ममदानी और भारत की मशहूर फिल्मकार मीरा नायर के बेटे हैं. वैसे, महमूद ममदानी के पूर्वज भी भारतीय हैं. मीरा नायर भारत में एक हिंदू परिवार से हैं.

‘‘तुम ने मीरा नायर की बनाई गई कुछ चुनिंदा फिल्मों के बारे में तो सुना ही होगा, जैसे ‘सलाम बौम्बे’, ‘मानसून वैडिंग’, ‘द नेमसेक’, कामसूत्र-द टेल औफ लव और ‘मिसिसिपी मसाला’. ‘मानसून वैडिंग’ तो मेरी पसंदीदा फिल्मों में आती है,’’ अनामिका बोली.

‘‘और क्या जानती हो तुम जोहरान ममदानी के बारे में? सिर्फ मां के नाम पर तो कोई बड़ा नेता नहीं बन जाता है न…’’ विजय बोला.

‘‘तुम ने सही कहा. चलो, अब तुम्हें मैं जोहरान ममदानी के बारे में थोड़ा तफसील से बताती हूं. उन का जन्म 18 अक्तूबर, 1991 को युगांडा देश के कंपाला इलाके में हुआ था. उन का बचपन युगांडा, दक्षिण अफ्रीका और न्यूयौर्क में बीता.

‘‘अमेरिका में उन्होंने साल 2014 में बौडौइन कालेज से अफ्रीकाना स्टडीज में डिगरी हासिल करने से पहले बैंक स्ट्रीट स्कूल फौर चिल्ड्रन और ब्रोंक्स हाईस्कूल औफ साइंस में पढ़ाई की थी.

‘‘साल 2017 में जोहरान ममदानी राजनीतिक और सामाजिक संगठन ‘डैमोक्रैटिक सोशलिस्ट्स औफ अमेरिका’ में शामिल हो गए थे. उन्होंने साल 2020 में न्यूयौर्क राज्य विधानसभा के लिए चुनाव जीता था, जहां उन्होंने क्वींस के 36वें जिले की नुमाइंदगी की थी.

‘‘फिर वे साल 2022 और साल 2024 के चुनावों में निर्विरोध चुने गए थे. अपने कार्यकाल के दौरान ममदानी ने 20 विधेयकों का समर्थन किया था, जिन में से 3 कानून बन गए थे.

‘‘इतना ही नहीं, जोहरान ममदानी पर अपनी मां मीरा नायर के कला व्यवसाय का भी काफी असर रहा है. वे एक हिपहौप कलाकार भी रह चुके हैं, जो ‘यंग कार्डेमम’ या ‘मिस्टर कार्डेमम’ के नाम से जाने जाते हैं.

‘‘जोहरान ममदानी ने साल 2018 में अमेरिकी नागरिक के रूप में नागरिकता हासिल की थी और इसी साल उन्होंने सीरियाईअमेरिकी कलाकार रमा दुवाजी से शादी की है,’’ अनामिका ने बताया.

थोड़ा रुक कर अनामिका ने आगे बताया, ‘‘34 साल के जोहरान ममदानी ने अपने जबरदस्त अभियान के दम पर यह जीत हासिल की है. वे जब क्वींस से असैंबली मैंबर थे, तब उन्होंने अपने शहर के टैक्सी ड्राइवरों के लिए भूख हड़ताल की थी.

‘‘साल 2021 में 30 साल के ममदानी सिटी हाल पार्क में खड़े हुए और उन्होंने घोषणा की कि वे न्यूयौर्क शहर के टैक्सी ड्राइवरों को कर्ज से राहत दिलाने के लिए शहर के अफसरों पर दबाव डालने के लिए उपवास करेंगे.

‘‘उस समय, उन्हें पद संभाले हुए एक साल से भी कम समय हुआ था. यह हड़ताल टैक्सी मैडेलियन लोन से होने वाले भारी कर्ज के जवाब में की गई थी, जिस ने कई ड्राइवरों को मालीतौर पर बरबाद कर दिया था और कुछ को तो खुदकुशी करने पर भी मजबूर कर दिया था.’’

‘‘तुम्हें पता है न कि जोहरान ममदानी ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में क्या कहा था?’’ विजय ने अनामिका से पूछा.

‘‘क्या उन्होंने कुछ गलत कहा था?’’ अनामिका बोली, ‘‘हां, चुनाव जीतने ने बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के बारे में अपने विचार रखते हुए कहा था कि आप के सामने खड़े हो कर मैं जवाहरलाल नेहरू के शब्दों के बारे में सोचता हूं कि एक ऐसा क्षण आता है, जब हम पुराने से नए की ओर कदम बढ़ाते हैं. जब एक युग का अंत होता है और लंबे समय से दमित राष्ट्र की आत्मा को अभिव्यक्ति मिलती है. आज रात हम ने पुराने से नए युग में कदम रख लिया है.’’

यह सुन कर विजय ने कहा, ‘‘पर जोहरान ममदानी ने न्यूयौर्क शहर के मेयर पद के अपने प्रचार अभियान के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ले कर विवादास्पद बयान दिया था.

‘‘एक मेयर फोरम के दौरान उन्होंने कहा था कि मोदी को उसी तरह देखा जाना चाहिए, जैसे लोग इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को देखते हैं.
‘‘जब उन से यह सवाल पूछा गया कि अगर नरेंद्र मोदी न्यूयौर्क आएं, तो क्या वे उन से मुलाकात करेंगे, तो उन्होंने कहा था कि यह व्यक्ति (नरेंद्र मोदी) एक युद्ध अपराधी है.

‘‘जोहरान ममदानी ने यह भी कहा था कि उन के पिता का परिवार भारत के गुजरात राज्य से है. यह वही राज्य है जहां 2002 में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान तकरीबन 1,000 मुसलमानों की मौत हुई थी.

‘‘उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय मोदी की सरकार ने इन घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए. नरेंद्र मोदी ने गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा को इस हद तक बढ़ावा दिया कि आज कई लोग मानते हैं कि वहां अब मुसलमान बचे ही नहीं हैं.’’

‘‘पर किसी नेता को दूसरे नेता के बारे में अपने विचार रखने का हक है…’’ अनामिका बोली,’’ उन्होंने तो डोनाल्ड ट्रंप पर भी निशाना साधा था. उन्होंने कहा था कि डोनाल्ड ट्रंप को अगर कोई हराने का तरीका दिखा सकता है, तो वह शहर ही है, जिस ने उन्हें जन्म दिया है.

‘‘अगर किसी तानाशाह को डराने का कोई तरीका है, तो वह उन हालात को खत्म करना है, जिन्होंने उसे सत्ता हासिल करने में मदद की. ममदानी ने ट्रंप पर अमेरिका को धोखा देने का आरोप लगाया.

‘‘और तुम यह क्यों नहीं समझ रहे हो कि न्यूयौर्क और न्यूजर्सी वे शहर हैं, जहां भारतीय अच्छीखासी तादाद में रहते हैं. अमेरिका में सब से ज्यादा भारतीय न्यूयौर्क में ही रहते हैं. तुम्हें नहीं लगता कि न्यूयौर्क और न्यूजर्सी जैसे शहरों में हारना डोनाल्ड ट्रंप के लिए सीधा मैसेज है.

‘‘भारतीयों का वोट उन्हें पाना है, तो भारत के प्रति सौफ्ट रहना होगा. ट्रंप अगर यह सोच रहे हैं कि भारत के खिलाफ कड़ा रुख अपना कर वे चुनाव जीत लेंगे, तो यह नहीं हो सकता.’’

‘‘मुझे तो यह दूर के ढोल सुहावने जैसे लगने वाली बात लगती है. डोनाल्ड ट्रंप बहुत ही माहिर खिलाड़ी हैं.
वे जोहरान ममदानी को इतनी आसानी से राजनीति नहीं करने देंगे,’’ विजय बोला.

‘‘तुम जोहरान ममदानी के नाम पर इतना उखड़ क्यों रहे हो? बात मेरे मेयर बनने के सपने को ले कर शुरू हुई थी. वैसे भी जब तक हम सपने नहीं देखेंगे, तब तक उन्हें पूरा करने की ताकत कैसे आएगी?

‘‘माना कि भारत में धर्म और जातिवाद के नाम पर सियासत की जाती है और नेता चुने जाते हैं, पर अभी भी इतना अंधेरा नहीं हुआ है, जितना तुम सोच रहे हो. मैं मेयर बनूं या न बनूं, पर मुझे यह तो समझ आया है कि सियासत की राह कभी भी आसान नहीं होगी.’’

‘‘अनामिका, मेरा वह मतलब नहीं था. तुम बहुत होशियार हो, पढ़ीलिखी हो और तुम में जनता के दुखदर्द को समझ सकने की काबीलियत है, पर यह काम तो तुम आईएएस बन कर भी कर सकती हो,’’ विजय ने कहा.

‘‘तुम्हारी बात में दम है. पर मुझे मौका मिला तो मैं दिल्ली की मेयर जरूर बनूंगी. फिर देखना कैसे मैं दिल्ली का सुधार करती हूं,’’ अनामिका ने हंसते हुए कहा.

‘‘ठीक है, पर अब जरा हम फ्रैश हो कर कौफी पीने चलें, क्योंकि इस गरमागरम बहस के बाद मुझे कौफी पीने की तलब लग गई है,’’ विजय बोला.

‘‘नेकी और पूछपूछ… जल्दी चलो और मुझे भी मस्त सी कौफी पिलवाओ,’’ अनामिका ने विजय के गले में अपनी बांहें डालते हुए कहा और उसे प्यार से चूम लिया. Hindi News Story

Story In Hindi: कोचिंग के पैसे

Story In Hindi: ‘‘तो आप और पैसे नहीं देंगे?’’ अशोक ने पूछा.

‘‘अरे, कहां से ला कर दूं तुम्हें. ये 10,000 रुपए कम हैं क्या… अब तुम अपने खर्च बढ़ा लो, तो मैं क्या कर सकता हूं. और अब हम से नहीं होगा,’’ अशोक के पिताजी ने कहा.

‘‘दे दीजिए न. अब बाहर रहता है, तो खर्चे तो होंगे ही,’’ अशोक की मां मन्नू देवी जब अपने पति बजरंगी बाबू से बोलीं, तो वे मानो गरजने लगे, ‘‘अभी खेती के पीछे इतने खर्चे तुम लोगों को नहीं दिख रहे क्या…

‘‘पहले ही कम बारिश के चलते खेती के पटवन के पीछे डीजल खरीदने में ही हालत खराब थी. भाड़े पर ट्रैक्टर लिया, तो खेत की जुताई हुई.

‘‘फिर बीज और खाद के पीछे अच्छीखासी रकम खर्च हो गई. अभी फसल थोड़ी ठीक लग रही, तो कीड़ों का प्रकोप शुरू हो गया है. उस के लिए भी दवाओं का छिड़काव करना होगा.

‘‘वासंती फसल में जो थोड़ीबहुत रकम आई थी, वह सब इन सब के पीछे स्वाहा हुई जा रही है. भंडार में देख लो जा कर. मुश्किल से 4-6 बोरा अनाज होगा. और शारदीय फसल तैयार होने में 2-4 महीने तो लग ही जाएंगे. यह खेती न हुई, खर्चों का घर हो गया. और इस को शहर की हवा लग रही है…’’

‘‘अभी पढ़ रहा है, तो खर्चे होंगे ही…’’ मन्नू देवी ने भी जवाब दिया, ‘‘यह खर्चा कहां गलत हो रहा है. कल को इस की नौकरी लगी, तो भरभर थैली रुपए बटोरते रहिएगा.’’

‘‘भरभर थैली… इतना आसान है नौकरी, जो मिल जाएगी. देख तो रहा हूं औरों को, पढ़लिख कर मारेमारे फिर रहे हैं,’’ बनारसी बाबू बोले.

‘‘अशुभ क्यों बोलते हैं जी. जो सब के साथ हुआ, वह कोई जरूरी थोड़े ही है कि हमारे साथ भी हो. शुभशुभ बोलो जी,’’ मन्नू देवी ने कहा.

‘‘सही बोल रहा हूं. और जो इस की नौकरी लगी, तो क्या सब हमारी ही जेब में रख जाएगा… इसी गांव में नौकरी करने वालों को भी देख रहा हूं कि वे क्या करते हैं…’’ बनारसी बाबू गुस्से में बोले.

‘‘फिरफिर वही बात. अरे, हम अपना फर्ज निभा दें, यही बहुत है. अभी हमारा जांगर चलता है, फिर बेटों से आस क्या रखना,’’ मन्नू देवी ने कहा.

अंदर कमरे में अपना बैग ठीक करता हुआ अशोक भनभना रहा था, ‘‘जब खर्चा नहीं दे सकते, तो बाहर शहर में पढ़ाने का शौक ही नहीं रखना था. अब वहां खर्चे हैं, तो हैं. उसे वह कैसे रोक सकता है. कुछ तो शहर का स्टैंडर्ड रखना ही होता है. अभी से उधर ध्यान नहीं दिया, तो आगे का भगवान ही मालिक है.’’

‘‘थोड़ा सम झा करो बाबू मेरे,’’ मां मन्नू देवी उसे पुचकारती हुई बोलीं, ‘‘बाप हैं तुम्हारे, कोई दुश्मन नहीं हैं. थोड़ा तुम भी सम झा करो कि वे ठीक कह रहे हैं कि नहीं. हर बाप का शौक होता है कि उस का बेटा खूब पढ़ेलिखे. इस में गलत क्या है?’’

‘‘तो मैं भी गलत कहां हूं मां. वहां शहर में जैसेतैसे तो नहीं रहा जा सकता न… सुमिरन साव के बेटे रतन को देख लो. ठाट से रहता है वहां. उस के जैसा खर्च करना तो मैं सोच भी नहीं सकता. फिर भी ढंग से रहना तो पड़ेगा ही. कोचिंग और पढ़ाई के अलावा खानेपीने, कौपीकिताब, टैंपोभाड़ा के खर्चे को कौन रोक सकता है…’’

अशोक अभी भी तैश में था, ‘‘वहां लड़के ही नहीं, लड़कियां भी साथ पढ़ती हैं. उन के साथ फटेपुराने कपड़े पहन कर तो नहीं रहा जा सकता न. अभी पूजा का मौसम है. मु झे भी नए कपड़े खरीदने ही होंगे. मैं खुद सस्ते में काम चलाता हूं. मगर तुम लोगों को लगता है कि मैं वहां ऐयाशी करता हूं.’’

‘‘ये कौन कह रहा है रे. 10,000 में आजकल क्या होता है…’’ मन्नू देवी उसे पुचकारती हुई बोलीं, ‘‘मैं अपने राजा बेटा को नहीं जानती क्या कि कितने कम खर्च में वह काम चलाता है.’’

‘‘साफसाफ कह देता हूं कि इस बार जो नए कपड़े नहीं खरीद पाया, तो छठ और दीवाली पर नहीं आऊंगा,’’ अशोक ने कहा.

मन्नू देवी के तो हाथपैर फूल गए. बाप रे, दीवाली और छठ जैसे पर्व में यह नहीं आया, तो किस के बूते वह इसे पार घाट लगाएगी. घर की साफसफाई से ले कर, छठ त्योहार का सारा इंतजाम तक यही दौड़दौड़ कर पूरा करता है. 2 साल पहले एक बार नहीं था, तो उन्हें कितनी परेशानी हुई थी.

इस के बाबूजी को तो जैसे कोई मतलब ही नहीं कि घर की साफसफाई कैसे होगी, और कि क्याक्या सामान चाहिए. उस के दोनों बच्चे अरुण और नन्ही इतने छोटे हैं कि उन्हें बाहर भेजने में डर लगता है. खेत से पूजा के लिए गन्ना लाने से ले कर, पूजा के लिए मौसमी फलों तक के इंतजाम अशोक कितनी तेजी से कर जाता है.

छठपूजा के समय तो मन्नू देवी घर में तकरीबन 2 दिनों तक पूजा के पकवान, ठेंकुआ वगैरह बनाने में बिजी हो जाती हैं कि बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिलता. ऐसे में निर्जला उपवास किए बाहर निकलने की ताकत भी कहां रह जाती है.

घर से घाट और घाट से घर दौरा को सिर पर रख कर 3 किलोमीटर दूर नदी तक आनाजाना मामूली बात है क्या. वहां भी इतनी भीड़ और गहमागहमी रहती है. मन्नू देवी यह रिस्क तो नहीं ही ले सकतीं. ऐसे में अशोक नहीं आया, तो उन का मरण हो जाएगा.

बजरंगी बाबू खेतों की ओर जा रहे थे. मन्नू देवी दोबारा पति के पास आ कर निहोरा करने लगीं, तो वे चिल्ला कर बोले, ‘‘मेरे पास अभी नकद कुछ नहीं है. उस को कहो कि एक मन अनाज निकाल कर बेच आए और पैसा ले जाए.’’

अब यहां कौन सा तराजूबटखरा रखा था, जो कोई एक मन अनाज तुलवाता. मन्नू देवी आननफानन बगल में रह रहे भगलू राम को बुला लाईं. उस के सिर पर एक बोरा अनाज रखवाया और अशोक को आवाज देने लगीं, ‘‘अशोक, जरा इधर आना. यह अनाज ले कर सुमिरन साव के आढ़त पर तुलवा कर पैसे ले आना.

बाकी बचा अनाज यहीं रखवा देना.’’

अशोक सारी बातें सुन चुका था, इसलिए बैग में कपड़े रखना छोड़ बाहर निकल आया.

‘‘बाबूजी ने एक मन अनाज बेचने को कहा है… मन्नू देवी बोलीं, ‘‘बाकी अनाज इसी भगलू के सिर पर रख कर वापस ले आना.’’

बाजार में आढ़त पर बोरे का मुंह खुलवा कर गेहूं के दानों को देख कर सुमरिन साव मुंह बनाते हुए बोले, ‘‘घटिया माल है. इस को तो 15 रुपए किलो की दर से ही लेना होगा.’’

‘‘अरे, अभी तो यह 20 रुपए किलो की दर से चल रहा है,’’ अशोक ने हैरत से कहा.

‘‘इस सरकार ने फ्री राशन बांट कर सारा धंधा मंदा कर दिया है,’’ सुमिरन साव अपने चिड़चिड़े अंदाज में बोला, ‘‘हम भी कौन सा खैरात खाने वाले हैं.’’

‘‘खैरात खाने की तुम्हें क्या जरूरत. ऐसे ही नहीं तुम ने बिल्डिंगें और गोदाम बना लिया है…’’ अशोक बुदबुदाया, यही अनाज शहरों में आटे के रूप में 40 रुपए किलो की दर से उसे खरीदना होता है. लेकिन गांव में कोई ढंग का खरीदार भी तो नहीं. 40 किलो अनाज के 600 रुपए अशोक के हाथ में आए, तो वह भुनभुनाया, ‘‘इन 600 रुपए में क्या होगा. एक जींस पैंट ही 1,000 रुपए में आती है. उस पर 3-4 टीशर्ट लेनी हैं, वे भी 1,000 रुपए की पड़ जाएंगी. एक नए डिजाइन का जूता भी लेना है.

‘‘इस के अलावा बाकी के खर्चे अपनी जगह. सैलून में हेयर कटिंग, 3-4 तरह के इत्र, शैंपू, साबुनतेल वगैरह के भी तो खर्चे हैं.’’

अभी तो अशोक ने अपने खर्चे में कौपीकलम और किताब को जोड़ा ही नहीं. 1-1 गाइड ही 500 में आती है. उस ने एक स्टडी लाइब्रेरी में एडमिशन ले रखा है, जिस का मासिक किराया ही 1,000 है. फिर लौज के कमरे का 4,500 का किराया है. ढाबे पर जो वह नियमित दोनों टाइम भोजन करता है, उसे 3,000 महीना देना होता है.

कोचिंग आनेजाने के लिए जो टैंपो का भाड़ा है, उस में भी 1,000 रुपए निकल जाते हैं. इतना तब है, जब वह कितनी कंजूसी के साथ काम चलाता है. और बाप है कि 10,000 से एक रुपया ज्यादा देने को तैयार नहीं है.

अशोक ने तत्काल सारे गेहूं तुलवा दिए. कोई 100 किलो थे. सुमिरन साव ने उसे 1,500 सौ पकड़ा दिए.

घर वापस आ कर अशोक ने देखा, मां काम पर लगी थीं. भगलू अभी भी वहीं खड़ा था. उसे 20 रुपए उस के मेहनताने के देने थे.

अचानक अशोक ने भगलू से कहा, ‘‘एक बोरा अनाज और निकालो और मेरे साथ चलो.’’

सुमिरन साव के यहां वह अनाज तुलवा कर उस ने पैसे लिए. अब उस के पास 3,000 रुपए थे.

बाबूजी ने अशोक को मासिक खर्च के 10,000 पहले ही दे दिए थे. अब ये 3,000 और हैं. उस ने विचार किया कि इतने पैसे से उस का ऐक्स्ट्रा काम चल जाएगा.

अशोक भगलू को 50 का नोट थमाते हुए बोला, ‘‘मां और बाबूजी को मत बताना कि हम ने एक बोरा अनाज और निकाला है. वे यहां कौन गिनती करने आएंगे कि कितने बोरा अनाज निकला है. इतना अनाज तो यहां चूहे और कीड़े खा जाते हैं.’’

भगलू कुछ समझा, कुछ नहीं समझा. उसे जल्दीजल्दी ताड़ीखाने जो जाना था. उस के हाथ में 50 का एक करारा नोट फड़फड़ा रहा था. Story In Hindi

Best Hindi Story: ब्रा

Best Hindi Story: ‘‘उफ, इन औनलाइन शौपिंग वालों ने तो हमारा सारा कामधंधा ही चौपट कर दिया है,’’ सिलाई मशीन के पायदान पर पैर रखे हुए नौरीन अपनेआप से बुदबुदाते हुए बोल रही थी.

नौरीन की परेशानी की वजह यह थी कि अब उस के पास लोग कपड़े सिलवाने कम आते थे. हर हाथ में मोबाइल है. बस, मोबाइल उठाया और अपनी पसंद के कपड़े औनलाइन मंगवा लिए.

भारत और नेपाल की सीमा पर बसा हुआ यह कसबा रौनक से भरा रहता था. सीमा पर बसे होने के चलते चहलपहल बराबर बनी रहती थी. इस कसबे में जरूरत की सारी चीजें बड़ी आसानी से मिला करती थीं.

इस कसबे के जहीन बाग नामक महल्ले में नौरीन और उस की छोटी बहन रोशनआरा रहती थीं. नौरीन 22 साल की हो गई थी और सिलाई का काम कर के घर का खर्चा चलाती थी. कई बार तो उस ने सोचा कि सिलाई का काम बंद कर के कोई परचून की दुकान ही खोल ली जाए, कम से कम बोहनी तो हो जाया करेगी.

सिलाई के काम में तो कभीकभार कोई ग्राहक आता ही नहीं और घर से सिलाई का काम करने वाली नौरीन के पास कपड़े सिलवाने के ग्राहक के रूप में रजिया, फातिमा, सुनीता जैसे आसपास के दूसरे लोग ही आते थे. इन में से बहुत सी औरतें तो इतनी शर्मीली होती थीं कि कुरती का नाप देने में भी शर्म करती थीं.

इस बात पर नौरीन मुसकराते हुए कहती, ‘‘घबराओ मत भाभी, घर में कोई मर्द नहीं है और न ही कोई कैमरा लगा हुआ है, आराम से नाप दो.’’

नौरीन ने 12वीं तक पढ़ाई करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी, क्योंकि घर का खर्चा चलाने के लिए उस का कमाना जरूरी था, इसलिए उस ने सिलाई के काम में अपनी अम्मी का हाथ बंटाना शुरू कर दिया. पहले तो अम्मी के पास खूब काम आता था. सलवारसूट, ब्लाउज के अलावा छोटे बच्चों की कमीजें तक सिलती थीं अम्मी.

कितनी लगन से नौरीन ने सिलाई का काम सीखा और जब अम्मी कमर दर्द से दोहरी हो जातीं, तो नौरीन उन्हें आराम करने को कहती और खुद मशीन के पायदान पर पैर जमा कर बैठ जाती और हलकेहलके पैर चला कर सिलाई करती.

उम्र के 22वें साल में नौरीन के कुंआरे और गोरे चेहरे पर चमक आने लगी. तभी उस की जिंदगी में अहमद की मुहब्बत ने दस्तक दी.

अहमद 25 साल का एक नौजवान था, जो लखीमपुर शहर का रहने वाला था और डिलीवरी बौय का काम करता था. काम के सिलसिले में नौरीन से निगाहें मिलीं और दोनों कब इश्क में गिरफ्तार हो गए, पता ही नहीं चला.

हालांकि, नौरीन की अम्मी को भी इन दोनों के फलतेफूलते इश्क का अहसास हो गया था, पर उन्होंने कभी कोई रोकटोक नहीं लगाई.

‘‘नौरीन के अब्बू नहीं रहे, भला इस उम्र में मैं कहां लड़का ढूंढ़ने जाऊंगी… अच्छा है बच्चे अपने मन से ही अपना साथी चुन लें तो…’’ अपनेआप से अकसर कह उठती थीं नौरीन की अम्मी.

दिन का 10 बजने को थे. नौरीन के मोबाइल पर अहमद का फोन आया, ‘शहर जा रहा हूं. मेरा दोस्त राज जिस होटल में काम करता है, वहां पर बड़े लोगों का सैमिनार है. हम दोनों चलते हैं. मुझे शहर में कुछ देर का काम है, फिर हम दोनों सैमिनार में बैठेंगे, खापी कर शाम तक वापस आ जाएंगे,’ अहमद ने एक सांस में यह बात कह दी थी.

मौसम भी सुहावना था और अहमद के साथ घूमने जाने की बात सुन कर नौरीन का मन भी मचल उठा था.
नौरीन ने अम्मी को बता दिया था कि वह अहमद के साथ शहर तक जा रही है, शाम तक वापस आ जाएगी.

अम्मी ने नौरीन के अहमद के साथ जाने पर कोई एतराज नहीं जताया और कहा, ‘‘अपना ध्यान रखना और शाम को जल्दी वापस आना.’’

अहमद और नौरीन बाइक पर बैठ कर शहर की ओर जाने लगे. शहर यहां से 30 किलोमीटर दूर था, पर नौरीन सोच रही थी कि काश शहर कभी न आए, बस वह यों ही अहमद के पीछे बैठ कर सफर करती रहे.

‘ग्रैंड रौयल्स’ नाम के एक होटल में वे दोनों पहुंच गए थे. अहमद ने अपने दोस्त राज से मुलाकात की और फिर वे तीनों उस हाल में गए, जहां पर सैमिनार चल रहा था. अहमद और नौरीन एकसाथ बैठ गए थे.

मंच पर 35 साल की एक खूबसूरत सी महिला ने बोलना शुरू किया, ‘‘हमारे इस सैमिनार का विषय कुछ हट कर है. दरअसल, यह कार्यक्रम महिलाओं की ‘ब्रा’ पर है. शहर में तो महिलाएं जागरूक हैं, पर हमारा अभियान गांव और कसबों की महिलाओं के बीच जागरूकता फैलाने का है, जो शर्म के चलते या तो ब्रा नहीं खरीदती हैं या फिर गलत ढंग की ब्रा पहनती हैं, जिस के चलते उन्हें पीठ दर्द तक का सामना करना पड़ता है…’’

नौरीन यह सब सुन कर पहले तो शरमाने लगी, पर जब उस महिला ने आगे काम की बातें बतानी शुरू कीं, तो उसे अच्छा लगने लगा.

‘‘हमें कसबों और गांवों की महिलाओं के मन से ब्रा के लिए छिपी शर्म निकालनी होगी. अरे भई, ब्रा महज कुछ कपड़ों का जोड़ ही तो है, जिसे हम अपने शरीर को सपोर्ट देने के लिए कुरती या ब्लाउज के अंदर पहनते हैं. अब भला इसे छिपा कर सुखाना या फिर इस की स्ट्रिप को दिख जाने से रोकना, इस में भला झिझकने की क्या बात है?’’ वह महिला बड़े अच्छे ढंग से समझा रही थी.

नौरीन गौर किया कि पीछे के बैनर पर उन की संस्था का नाम ‘नारी मन’ लिखे होने के साथ एक संदेश भी लिखा हुआ था, ‘हमारी ब्रा, हमारा शरीर, एक अभियान है. कब बदलेगा समाज, सवाल अनजान है’.

नौरीन ने बैनर पर लिखा हुआ मैडम की संस्था का मोबाइल नंबर नोट कर लिया और अहमद और नौरीन चाय और नाश्ता करने के बाद वापस कसबे की ओर चल दिए.

शाम को जब नौरीन घर पहुंची, तो उस ने अपनी अम्मी से उन की पुरानी संदूकची खोलने को कहा, तो अम्मी जरा चौंकीं, ‘‘अब भला तुझे उस संदूकची से क्या काम पड़ गया?’’

बदले में नौरीन ने मुसकराते हुए उस संदूकची को बिस्तर के नीचे से घसीटते हुए बाहर निकाला और खोलने लगी. उस संदूकची में अम्मी की उन की जवानी के दिनों की सैटिन की ब्रा लपेट कर रखी हुई थी.

नौरीन ने उस ब्रा को खोला और उलटपलट कर देखने लगी. उसे ऐसा करते देख कर अम्मी शर्म से गड़ गईं, ‘‘अरे मुई, यह तुझे क्या हो गया?’’ अम्मी अब भी शर्म से लाल थीं.

अम्मी को पुरानी बात याद आई, जब यह ब्रा नौरीन के अब्बू बाजार से खरीद कर लाए थे और कई बार अकेले में इसे पहन कर दिखाने के लिए कहा था, मगर उस जमाने में संयुक्त परिवार में रहने वाली अम्मी के लिए ऐसी डिजाइनर और सुर्ख लाल रंग की ब्रा को पहनने के बाद धोने और सुखाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता था, इसलिए नौरीन की अम्मी कभी भी यह ब्रा पहन नहीं सकीं और कपड़ों के बीच लपेट कर इस संदूकची में रख दिया था.

नौरीन ने अम्मी की लाल ब्रा पकड़ कर हवा में लटका दी और उसे चारों तरफ से देखने लगी. उस की यह हरकत अब अम्मी को नागवार गुजर रही थी. उन्होंने अब नौरीन को डांटना चाहा, पर नौरीन बोल पड़ी, ‘‘अम्मी, मैं सोच रही हूं कि क्यों न हम ब्रा सिलने का ही काम शुरू कर दें…’’

नौरीन की यह बात सुन कर अम्मी ने अपना माथा पीट लिया, पर नौरीन ने उन्हें समझाया कि हमारे कसबे में रेडीमेड कपड़ों सभी दुकानों पर मर्द बैठे हैं. ज्यादातर महिलाएं उन से ब्रा खरीदते समय इतनी संकोच से भरी रहती हैं कि वे खरीदते समय ब्रा का साइज और क्वालिटी देखती तक नहीं और गलत साइज की ब्रा पहनते रहने से उन के शरीर का आकार खराब हो जाता है और कई बार वे पीठ दर्द से भी परेशान रहती हैं.

इस के बाद नौरीन बोली, ‘‘अम्मी, क्या हम घर पर इसी सिलाई मशीन से रेडीमेड जैसी दिखने वाली ब्रा सिल सकती हैं?’’

नौरीन ने पूछा तो अम्मी ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘अगर घर पर कुछ जरूरी सामान जैसे इलास्टिक, हुक और प्लाटिक के कुंडे वगैरह खरीद लिए जाएं, तो घर पर रेडीमेड जैसी ब्रा बनाई जा सकती हैं, क्योंकि कुछ कपड़ों की खास तरह की कटिंग को जब सफाई से सिला जाता है, तो ब्रा तैयार हो जाती है और इस में और ज्यादा खूबसूरती लाने के लिए इस के कपड़े पर फूलबूटे और चिकन की कढ़ाई तक की जा सकती है.’’

अम्मी को भी नौरीन की बातें अब जंच तो रही थीं, पर उन के मन में शक था कि ये ब्रा उन से औरतें खरीदेंगी भी या नहीं?

‘‘अरे अम्मी, क्यों नहीं खरीदेंगी? जब उन को अच्छे कपड़े की ब्रा हमारे पास ही मिलेगी, जिसे वे कमरे में आराम से पहन कर आगेपीछे से चैक कर लेंगी और अपने बदन पर आराम महसूस करेंगी, तो भला कौन नहीं खरीदना चाहेगा…’’ नौरीन ने उम्मीदभरी बातों से अम्मी का मन मोह लिया था.

नौरीन ने अब उस ‘नारी मन’ संस्था की आंचल मैडम को फोन लगाया और अपने और अपने कसबे के बारे में सबकुछ बताते हुए उन्हें ब्रा के बिजनैस के बारे में बताया.

नौरीन का आइडिया सुन कर आंचल मैडम बहुत खुश हुईं और उन्होंने नौरीन को खूब सराहा और ब्रा सिलने के सामान से ले कर हरमुमकिन मदद देने का वादा किया.

नौरीन ने अपने पते पर ब्रा सिलने का कुछ सामान मंगवा लिया था. बस, अब चुनौती थी कि इन सब सामान को साथ ले कर बढि़या और आरामदायक ब्रा कैसे बनाई जाए. सो, इस के लिए नौरीन ने सिलाईकढ़ाई विशेषांक की पुरानी पत्रिकाएं पढ़ीं, कुछ मदद इंटरनैट से ली और बाकी का काम नौरीन की अम्मी ने आसान कर दिया.

दिनरात की मेहनत के बाद कुछ ब्रा झने कपड़े की तो कुछ कौटन की तैयार हो गई थीं. अब बारी थी कस्टमर ढूंढ़ने की, तो इस के लिए नौरीन ने एक तार पर ब्रा को लटका दिया और बड़े अक्षरों में लिख दिया, ‘यहां महिलाओं की पसंद के अनुसार हर साइज की ब्रा बनाई जाती हैं’.

जब भी कसबे की औरतें अपने सूट वगैरह का नाप देने आतीं, तो उन की नजर इस वाक्य पर जरूर पड़ती.

‘‘तो क्या आप ब्रा भी सिलती हैं?’’ एक दिन फरजाना ने हिम्मत कर के पूछ ही लिया.

फरजाना 40 साल की मोटी औरत थी और अभी तक की जिंदगी में मारे शर्म के वह सही ब्रा का चुनाव नहीं कर पाई थी, इसलिए उस का शरीर हमेशा ढलकाढलका रहता था.

नौरीन फरजाना अंदर कमरे में ले गई और एक आदमकद शीशे के सामने खड़ा कर दिया और ढेर सारी ब्रा उस के सामने रख दीं.

‘‘हमारे यहां आप बेखटक अपनी पसंद की ब्रा पहन कर ट्राई करो और पसंद आए तभी खरीदो,’’ नौरीन ने कहा और कमरे से बाहर चली गई.

फरजाना को यह अहसास पहली बार मिल रहा था. कितना हलकापन सा महसूस हो रहा था उसे जब उस ने अपने पसंदीदा गुलाबी रंग की ब्रा को अपने तन पर कसा और हुक लगाने के बाद चारों तरफ से अपने मोटे शरीर को निहारा. आज पहली बार उस की पीठ और कंधों को आराम मिल रहा था. उस ने शीशे में पहली बार अपना यह रूप देखा और शरमा गई. कितनी खूबसूरत लग रही थी वह इस गुलाबी ब्रा में.

फरजाना के द्वारा नौरीन के काम की तारीफ सुन कर और भी औरतें नौरीन के पास पहुंचीं और धीरेधीरे ब्रा बेचने का काम तेजी से चल निकला. अब तो जो औरत सिलाई करवाने आती कम से कम 2-3 ब्रा तो जरूर ही खरीदती.

नौरीन और उस की अम्मी बराबर सिलाई करती रहतीं, पर फिर भी नौरीन को इतना काम और उस से होने वाली आमदनी भी 3 लोगों का परिवार चलाने के लिए काफी नहीं लग रही थी.

इस के लिए नौरीन ने अहमद की मदद ली और कुछ छोटेछोटे परचे छपवाए और कसबे में या लखीमपुर शहर में जहां भी अहमद डिलीवरी करने जाता, तो ये परचे भी डिलीवरी करते समय ग्राहक को पकड़ा देता और मुसकरा कर कहता, ‘‘जी हमारे घर की औरतों ने काम शुरू किया है. एक बार सेवा का मौका जरूर दें.’’

यह कदम तो काफी आशावादी था, पर नौरीन को इस का फायदा तब दिखा, जब उस की दुकान में औरतों की तादाद में इजाफा दिखा.

अब तो अम्मी सिलाई मशीन पर बैठी रहतीं और नौरीन बराबर औरतों के ब्रा का नाप लेती रहतीं. यहां पर औरतों को बड़ा फायदा यह मिल रहा था कि वे अपने पसंद की ब्रा सिलवा सकती थीं. मसलन कपड़े और रंग का चुनाव, सीने पर आने वाले कप का चुनाव और स्ट्रिप की मोटाई और पतलापन… ये सब वे अपनी पसंद के मुताबिक बनवा सकती थीं.

अब तो नौरीन ने अपनी दुकान का नाम भी रख दिया था और यह नाम था ‘34 बी’.

यह एक ब्रा के साइज का नंबर होता है, इसलिए पहलेपहल तो नौरीन के काम का मजाक बना. अम्मी ने भी नौरीन से कहा कि वह कम से कम नाम तो कुछ ढंग का रख ले, महल्ले वाले क्या कहेंगे?

पर नौरीन ने अपनी बात रखते हुए कहा, ‘‘यह नाम मुझे महिलाओं की सोच बदलने में मदद करेगा. ब्रा पहनना या ब्रा का दिख जाना कोई गलत बात तो नहीं, जो इसे छिपाया जाए.’’

नौरीन ने अपना काम फैलाने और जागरूकता जगाने के लिए कसबे के ‘कन्या पाठशाला’ की प्रिंसिपल के साथ मिल कर लड़कियों और टीचरों के साथ एक गोष्ठी का आयोजन किया और लड़कियों को सही साइज की ब्रा पहनने के लिए बढ़ावा दिया.

बुटीक नंबर ‘34 बी’ का नाम अब कसबे और कसबे के बाहर भी फैल रहा था.

अम्मी ने एक बार फिर से नौरीन से बुटीक का नाम बदलने के लिए भी कहा पर नौरीन नहीं मानी. ‘34 बी’ नाम रखना तो एक बहाना है, असली मकसद तो औरतों की झिझक को बाहर भगाना है.

नौरीन और अम्मी के इस बुटीक की धूम चारों ओर छा चुकी थी. इसी बीच नौरीन के पास आंचल मैडम का फोन आया कि नौरीन और उस की अम्मी को उन की संस्था ने महिलाओं की शर्म और झिझक खत्म करने का अभियान चलाने के लिए सम्मानित करने का निश्चय किया है और इस महीने की 10 तारीख को उन दोनों लोगों को लखीमपुर में ‘इंदिरा आडिटोरियम’ में पहुंचना है, जहां पर उन्हें सम्मानित किया जाएगा.

नौरीन के लिए तो यह अनुभव नया था ही, पर इस से भी ज्यादा खुशी उस की अम्मी को मिल रही थी.

उन्होंने एक ऐसे समय को जिया था, जब किसी के लिए ब्रा बोलना या ब्रा को खुले में सुखाना बड़ी शर्म की बात मानी जाती थी और आज उन की बेटी की छोटी सी कोशिश ने खुद उके लिए तो रोजगार ढूंढ़ा ही है, साथ ही साथ बहुत सारी महिलाओं की झिझक खत्म करने में मदद की है और इस बात के लिए उन्हें सम्मानित किया जा रहा है.

आडिटोरियम में तालियों की गूंज थी. अहमद ने भी आज काम से छुट्टी ले ली, ताकि वह नौरीन को सम्मानित होते हुए देख सके. नौरीन की छोटी बहन रोशनआरा को भी अहमद साथ ले आया था.

नौरीन का नाम पुकारा गया और उसे सम्मानित किया गया. उसे माइक पर कुछ बोलने को कहा गया. नौरीन ने एक कविता सुनाई :

‘‘ये स्तन नहीं, ये संकल्प हैं.

ये बोझ नहीं, ये अधिकार हैं.

ये ब्रा खुद अपनी भाषा हैं,

जहां औरत खुद अपनी परिभाषा है.

छिपाने की नहीं, अब दिखाने की बारी है.

ये ब्रा नहीं हमारी इंकलाबी सवारी हैं.’’

तालियां लगातार बज रही थीं. नौरीन का एक छोटा सा कदम कसबे की औरतों और पूरी नारी जाति के लिए एक बड़ी छलांग थी. Best Hindi Story

Hindi Romantic Story: एक औरत का प्रेम मुकाम

Hindi Romantic Story: ‘झपाट… तड़… तड़ाक…’ उस घर के अहाते से रोज ऐसी ही मारपीट की आवाज सुनाई पड़ती थी. वह नया किराएदार था. शुरू में पड़ोसियों ने किसी के घरेलू मामले से दूर रहना ही बेहतर समझा. यही सोच कर कि किराएदार शराबी होगा. शाम को शराब पी कर आता होगा और अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता होगा. लेकिन जब रोजरोज ऐसा होने लगा, तो पड़ोसियों का सब्र जवाब देने लगा.

दुनिया की रीत है कि अपने आंगन में क्या हो रहा है, इस को कोई नहीं देखता, लेकिन दूसरे के घर में एक बरतन भी खड़क जाए, तो सब के कान खड़े हो जाते हैं.

मामले को जानने के लिए किसी पड़ोसी ने दीवार के ऊपर से झांक कर देखा, तो किसी ने छत पर खड़े हो कर. मामले को जान कर कोई हंसा, तो कोई अचंभे से मुंह खोल कर रह गया. चटकारों का बाजार गरम हो गया.

पर यह मामला तो बिलकुल उलटा था. यह आदमी नहीं, बल्कि औरत थी, जो हर शाम को अपने आदमी की कुटाई करती थी. इस में अचंभे की बात यह भी थी कि आदमी इस कुटाई का कोई विरोध नहीं करता था.

वह सिर झुका कर अपनी पत्नी की ज्यादती को ऐसे सहन करता था, जैसे उस की पत्नी को उसे इस तरह पीटने का ‘सर्वाधिकार सुरक्षित’ हो, जैसे किसी लेखक और प्रकाशक का किसी किताब पर होता है.

पड़ोसियों को बैठेठाले हंसनेहंसाने, चटकारे लेने और मनोरंजन का काम कम से कम कुछ दिनों के लिए मुफ्त में ही मिल गया था. आज तक उन्होंने पतियों के द्वारा पत्नियों की पिटाई होने के किस्से बहुत सुने और देखे थे, लेकिन पत्नी के द्वारा पति की पिटाई होते वे पहली बार देख रहे थे. वह भी एकाध दिन नहीं, रोजाना शाम को तय समय पर और पिटाई के बाद निपट निल बटा सन्नाटा, जैसे कुछ हुआ ही न हो.

ये पति पत्नी कोई और नहीं, सुधाकर और सविता थे. सुधाकर अपने मातापिता की एकलौती औलाद था. वह हरियाणा के यमुनानगर की थापर पेपर मिल में अपने पिता की सिफारिश पर लैब असिस्टैंट की नौकरी पा गया था.

उस की तनख्वाह कम थी, लेकिन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में नौकरी पक्की थी, इसलिए उस की एमए पास पढ़ीलिखी लड़की सविता से शादी हो गई थी.

सविता देखने में सुंदर, सुशील और मासूम दिखाई पड़ती थी, लेकिन जल्दी ही पता चल गया कि असल में वह ऐसी थी नहीं. सासबहू के झगड़े वैसे तो आम बात है, लेकिन सविता ने तो जैसे ससुराल में आते ही इस जंग का आगाज कर दिया हो.

सुधाकर ने हरमुमकिन तरीके से सविता को समझाने की कोशिश की, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. वह यह समझाने में नाकाम रहा कि सविता आखिर उस की मां से लड़ती ही क्यों है. वह कोई न कोई बहाना ढूंढ़ कर उस की मां से भिड़ जाती थी, फिर तो दोनों तरफ से जबानी जंग शुरू हो जाती थी.

सुधाकर समझ नहीं पाया कि आखिर सविता चाहती क्या है? वह मां को समझाता तो तड़ाक से जवाब मिलता, ‘‘औरत के गुलाम, पिट्ठू. शर्म नहीं आती तुझे. अपनी औरत को तो समझाने से गया, मुझ बुढि़या को समझाने चला है, नालायक, कलयुगी.’’

यह सुन कर सुधाकर सहम जाता. अपनी औरत को समझाता, तो वह उसे उलटे हाथों लेती, ‘‘जाओ, मां के पेटीकोट में जा कर छिप जाओ. वहां से बाहर निकले ही क्यों थे? पूरी जिंदगी वहीं रहते.’’

सुधाकर मां और पत्नी के बीच चक्की के 2 पाटों के बीच जैसा पिसता. घर की इस कलह के बीच सुधाकर
2 बच्चों का पिता बन गया, एक बेटी और एक बेटा.

लेकिन जब घर में कलह की हद हो गई तो एक दिन उस के पिता ने समझाया, ‘‘सुधाकर, तेरी मां और बहू की खटपट से मैं तंग आ गया हूं. तू तो ड्यूटी पर चला जाता है, लेकिन मेरा जीना मुहाल हो जाता है. तू हमें कहीं किराए पर कमरा ले कर दे दे, जिस से यह बुढ़ापा चैन से कटे.’’

यह सुन कर सुधाकर सोच में पड़ गया. वह बोला, ‘‘पिताजी, आप ये कैसी बातें कर रहे हो? यह मकान दादाजी और आप के खूनपसीने की कमाई का पुश्तैनी मकान है. आप किराए के मकान में जा कर क्यों रहोगे? किराए पर रहने की जरूरत पड़ेगी तो हम जा कर रहेंगे.’’

‘‘बेटा, तू कुछ भी कर… अब इन सासबहू का एकसाथ रहना मुश्किल है.’’

सुधाकर को पता नहीं था कि बापबेटे की बात को सविता ने कान लगा कर सुन लिया है. जैसे ही वह अपने कमरे में पहुंचा, सविता ने उसे आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘क्या कह रहा था बुड्ढा?’’

‘‘सविता, जबान संभाल कर. गुस्से और नफरत में तहजीब नहीं खोते.’’

‘‘ऐसी तहजीब रखो अपने पास, मेरी जूती पर. बुड्ढे को बुड्ढा नहीं कहूंगी, तो क्या जवान कहूंगी. गोद में ले कर खिला लो, दूध पीता बच्चा है तुम्हारा बाप.’’

‘‘सविता, तुम हदें पार कर रही हो.’’

‘‘मैं तो हदें पार कर ही रही हूं. तुम ध्यान से सुन लो… अब इस घर में या तो तुम्हारे मांबाप रहेंगे या फिर हम रहेंगे. और यह मेरा आखिरी फैसला है.’’

अगले दिन से ही सविता ने जिन्ना की तरह घर को दो फाड़ करने का डायरैक्ट ऐक्शन शुरू कर दिया. सुधाकर घर की कलह से कांग्रेस के नेताओं की तरह घबरा गया. उस ने घर में किसी अनहोनी के डर से किराए का मकान तलाशना शुरू कर दिया.

मौडल टाउन में सुधाकर को एक ऐसा मकान किराए पर मिल गया, जिस का अहाता खास बड़ा था और जिस का मकान मालिक दूर जींद जिले में रहता था.

किराए के मकान में आ कर सुधाकर को लगा कि सविता के बरताव में बदलाव आ जाएगा, लेकिन जल्दी ही उसे एहसास हो गया कि सविता में रंचमात्र भी फर्क नहीं आया है. अब उस का सारा गुस्सा उस की तरफ डायवर्ट हो गया है. अब सविता का सारा गुस्सा उसे अपने ऊपर झेलना पड़ता.

सविता की नाराजगी अब यह थी कि सुधाकर अपने मांबाप के पास क्यों जाता है. वह सुधाकर के घर आते ही उस पर फट पड़ती थी. अब तो वह गालीगलौज से पेश आती थी और मारपीट पर भी उतर आती थी.

‘‘हरामखोर, यहां आता ही क्यों है? उन्हीं बुड्ढेबुढि़या की गोद में जा कर मर, जिन के बिना तुझ से रहा नहीं जाता. मुझ से शादी ही क्यों की थी, जब तुझे उन के साथ ही रहना था?’’

सुधाकर को समझमें नहीं आता था कि आखिर सविता को हो क्या गया है? कुछ भी हो पुश्तैनी घर में उस ने उस से कभी ‘तूतड़ाक’ से बात नहीं की थी और न ही अपने प्रति उसने आज तक इतनी नफरत देखी थी. आखिर यह नफरत उस के मन में आई कैसे?

सुधाकर कोई तमाशा नहीं खड़ा करना चाहता था. उस ने यह मकान ही किराए के लिए इसलिए पसंद किया था कि इस में मकान मालिक नहीं रहता था. ऐसे मकान मिलने बड़ी मुश्किल होते हैं. अगर उस ने तमाशा खड़ा किया और पड़ोसियों ने मकान मालिक से शिकायत कर दी, तो फिर ऐसा किराए का मकान मिलना मुश्किल हो जाएगा, इसलिए न चाह कर भी सुधाकर उस के जुल्म को सहता गया. मार खा कर भी वह चुप रहता, क्योंकि एक उम्मीद बाकी थी.

अपनी भड़ास उतारने के बाद सविता आश्चर्यजनक रूप से सामान्य हो जाती थी. सविता का यह राज भी आज तक उसे समझमें नहीं आया था. सविता का गुस्सा और नाराजगी उस के लिए पहेली बने हुए थे.

एक दिन सविता की कालेज के समय की सहेली सुदीक्षा उसे ‘सरप्राइज’ करने के लिए बिना सूचना दिए उस से मिलने के लिए उस का घर तलाशती हुई तकरीबन उसी समय उस के घर पर पहुंची, जब सुधाकर के घर वापस आने का समय था.

अभी सुदीक्षा दरवाजे पर पहुंची ही थी कि उसे घर के अंदर से ‘झपाट… तड़… तड़ाक…’ और गालीगलौच की आवाज सुनाई दी. ऐसे में वह घर के अंदर कैसे जाए? वह उलटे पांव वापस लौटी. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि सविता अपने पति के साथ ऐसा भी कर सकती है. रातभर वह सविता के बारे में सोचती रही.

सुदीक्षा सविता को कालेज के दिनों से जानती थी और उस की नजर में उस की प्यारी सहेली सविता बिलकुल भी ऐसी नहीं थी. वह जितना उस के बारे में सोचती, उस का कौतूहल उतना ही बढ़ता जाता.

अगले दिन सुदीक्षा सविता से ऐसे समय मिलने पहुंची, जब उस का पति औफिस में और बेटी स्कूल गई हुई थी. बेटा तो सविता का अभी छोटा ही था.

सुदीक्षा को देखते ही सविता खुश हो गई. उस ने उसे गले लगा लिया. फिर दोनों बैठ कर बतियाने लगीं.

चाय पीते हुए चालाकी से बातों ही बातों में सुदीक्षा ने कल वाली बात छेड़ दी. पहले तो सविता बचती रही, फिर लंबी सांस खींच कर बोली, ‘सुदीक्षा, अब तुझसे क्या बताऊं और क्या छिपाऊं? तू तो मेरी कालेज लाइफ के बारे में सबकुछ जानती ही है.’’

‘‘हां, वह तो मैं अच्छे से जानती हूं. वरुण से तेरे लव अफेयर के बारे में भी,’’ सुदीक्षा ने चुटकी लेते हुए कहा.

‘‘तुझेतो पता ही है सुदीक्षा. मैं वरुण से कितना प्यार करती थी. हम दोनों ने साथ जीनेमरने की कसमें तक खा रखी थीं.’’

‘‘हांहां, मैं सब जानती हूं.’’

‘‘लेकिन सुदीक्षा, मैं उस समय ठहरी एक संस्कारी लड़की. मैं चाहती और जैसा वरुण चाहता भी था कि दूसरी बिगड़ी हुई लड़कियों की तरह खूब मौजमस्ती करती और गुलछर्रे उड़ा सकती थी. बहुत सी बिगड़ी लड़कियां तो अपने यारों के साथ कालेज के खाली पड़े क्लासरूम या फिर किसी कोने में ही…

‘‘उन दिनों सीसीटीवी कैमरे का चलन तो था ही नहीं. कुछ लड़कियां तो रोज ही किसी न किसी के साथ, लेकिन मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया.’’

‘‘सही कह रही हो.’’

‘‘लेकिन मेरे मांबाप ने सबकुछ जानते हुए भी सुधाकर से मेरी शादी कर दी और मैं कोई विद्रोह न कर सकी. सारी कसमें धरी की धरी रह गईं. मैं तो वरुण की नजरों में बेवफा हो गई और सुधाकर को कभी मन से अपना न सकी. यह अपराधबोध मुझेदिनरात सताता है.’’

कुछ देर सुदीक्षा माथा पकड़ कर बैठी रही, फिर कुछ सोच कर बोली, ‘‘मेरी प्यारी लैला, क्या इस अपराधबोध और वरुण के प्यार को जिंदगीभर बंदरिया के मरे हुए बच्चे की तरह सीने से चिपटाए रखेगी?

ये लैला बनने के दिन नहीं, यह मौडर्न जमाना है… जरा कुछ सोच.’’

‘‘सुदीक्षा, तुम कुछ भी कहो. मुझेहमेशा लगता है कि मैं ने वरुण के साथ बहुत गलत किया. मैं इस के लिए खुद को कुसूरवार मानती हूं और गुस्से से भर उठती हूं. अपने बस में नहीं रहती. पहले यह गुस्सा अपने सासससुर पर निकालती थी और अब वह गुस्सा सुधाकर पर निकालती हूं. उस का चेहरा देख कर ही मैं तमतमा उठती हूं.’’

‘‘लेकिन सुधाकर तो बहुत अच्छे हैं, उन पर गुस्सा क्यों करती है?’’

‘‘सुदीक्षा, देख तू भी एक औरत है. एक औरत ही दूसरी औरत के दिल की बात को समझसकती है कोई मर्द नहीं. एक औरत का दिल जिस पर आता है, वह कभी उसे भुला नहीं सकती.

‘‘वरुण की कमी शादी के बाद मुझेबहुत खलने लगी. आज भी वह मेरे रोमरोम में बसा हुआ है. सुधाकर हीरे का भी क्यों न बन जाए, वह वरुण की जगह नहीं ले सकता.’’

‘‘अरे सविता, तू तो इस जमाने की हीर बन रही है, बुलाऊं क्या तेरे रांझवरुण को यहीं पर,’’ सुदीक्षा ने हंसते हुए उस के कंधे पर हाथ रखा.

‘‘चल पगली कहीं की. वह तो बेचारा मेरी याद में न जाने कहां तड़प रहा होगा. काश, वह एक बार आ जाता तो मैं उस के पैरों में गिर कर उस से माफी मांग लेती.’’

‘‘अच्छा चल, वरुण की बात बाद में करेंगे, यह बता इस सब में सुधाकर की क्या गलती है?’’

‘‘सुधाकर की इस में यह गलती है कि वह इस दुनिया में जनमा ही क्यों? न वह इस दुनिया में होता और न मेरी उस से शादी होती. फिर शायद मैं वरुण की ही होती.’’

सुदीक्षा यह सुन कर अपना सिर पकड़कर बैठ गई, फिर हंसते हुए और अफसोस जताते हुए बोली, ‘‘सविता, हम औरतें इसी कारण से इस दुनिया में लांछित हैं. यह दुनिया एक औरत के प्रेम मुकाम को नहीं समझपाती. तुम्हारे पिताजी ने तुम्हारी शादी वरुण से कर दी होती तो यह सबकुछ न होता, जो तुम्हारे घर में हो रहा है.

‘‘लेकिन मर्द औरतों की भावनाओं को नहीं समझपाते. वे बेदर्द हो कर हमारी भावनाओं को कुचलते हैं और हम पर राज करने की कोशिश में लगे रहते हैं, इसलिए बहुत सी औरतों को विद्रोह भी करना पड़ता है. लेकिन कई बार हम भी मर्दों को नहीं समझपाती हैं.’’

‘‘मतलब?’’ सविता ने पूछा.

‘‘जिस वरुण के लिए सविता तू मरी जा रही है और अपने परिवार मैं तू ने उस के लिए इतनी उथलपुथल मचा रखी है, उस की करतूतों को सुन कर तेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाएगी.’’

‘‘यह क्या कह रही है सुदीक्षा. मेरा वरुण ऐसा कुछ नहीं कर सकता, जो मैं न सुन पाऊं. दुनिया में उस से अच्छा आदमी हो ही नहीं सकता.’’

‘‘तेरा सोचना कुछ भी गलत नहीं है. सब लैलाओं को अपना मजनूं ऐसा ही लगता है. ले अब सुन अपने रांझवरुण की करतूत. तेरी शादी के कुछ महीने बाद ही वह अपने पड़ोस की शादीशुदा भाभी को भगा ले गया, फिर वह कई दिन जेल में रहा.’’

‘‘नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता,’’ सविता ने अपने कानों पर हाथ धरते हुए कहा.

‘‘अब अनजान मत कर. अपने रोमियो की हकीकत सुन. बहुत बन ली तू जुलियट, अपने परिवार में टैंशन कर के. पता है आजकल वह एक नहीं 2-2 बिगड़ी लड़कियों के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा है और तू कहती है वह कुंआरा ही तेरी याद में तड़प रहा होगा. यह मर्द जात है कहीं भी मुंह मार देती है, बस मौका मिला चाहिए.’’

‘‘तू झठ बोल रही है,’’ सविता ने कहा.

‘‘मैं झठ बोल रही हूं, तो ले यह देख, मैं सुबूत साथ लाई हूं.’’

जब सुदीक्षा ने अपने मोबाइल में वरुण और उस की प्रेमिकाओं के फोटो और उस की जेल जाने की तसवीरें दिखाईं, तो सविता का प्रेम भूत एक झटके में उतर गया. उसे तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था, लेकिन वह हकीकत को भी तो झठला नहीं सकती थी.

प्रेम भूत उतरते ही सविता को सुधाकर वरुण से लाख अच्छा लगने लगा था.

‘‘सुदीक्षा, तू ने तो सच में मेरी आंखें खोल दीं. मैं वरुण के प्रेम में डूब कर अपना घर तबाह कर रही थी.’’

‘‘मैं तो तुझसे केवल वैसे ही मिलने आई थी, लेकिन तेरे हालात ने मुझेतेरे सामने हकीकत लाने को मजबूर कर दिया. वरुण की करतूतों के बारे में तो मुझेबहुत पहले ही पता चल गया था, लेकिन मुझेयह नहीं पता था कि तू उस के प्रेम की यादों को अभी तक सीने से चिपकाए बैठी है.’’

कुछ देर और रुकने के बाद सुदीक्षा वहां से चली गई. अगली बार जब सुदीक्षा उस से मिलने आई, तो उस ने सविता को पुश्तैनी मकान में अपने सासससुर के साथ सुख से रहते पाया. यह देख कर उस के चेहरे पर भी मुसकान खिल गई. Hindi Romantic Story

Hindi Romantic Story: कार पूल – शेयरिंग कैब में भिड़े दो दिल

Hindi Romantic Story: अर्पित अहमदाबाद एक संभ्रांत परिवार का लड़का था. लड़का क्या, नवयुवक था. सरकारी नौकरी करते हुए 6 माह हो चुके थे. उस के पास स्वयं की कार थी, लेकिन वह पूल वाली कैब से औफिस जाना पसंद करता था. शहर में कैब की सर्विस बहुत अच्छी थी.

अर्पित खुशमिजाज इनसान था. कैब में सहयात्रियों और कैब चालक से बात करना उस को अच्छा लगता था.

उस दिन भी वह औफिस से घर वापसी आते हुए रोज की तरह शेयरिंग वाली कैब से आ रहा था. रास्ते में श्रेया नाम की एक और सवारी उस कैब में सवार होनी थी.

अर्पित की आदत थी कि शेयरिंग कैब में वह पीछे की सीट पर जिस तरफ बैठा होता था, उस तरफ का गेट लौक कर देता था. उस दिन भी ऐसा ही था. श्रेया को लेने जब कैब पहुंची, तो उस ने अर्पित वाली तरफ के गेट को खोल कर बैठने की कोशिश की, पर गेट लौक होने के कारण उस का गेट खोलने में असफल रही श्रेया झल्ला कर कार की दूसरी तरफ से गेट खोल कर बैठ गई. युद्ध की स्थिति तुरंत ही बन गई और सारे रास्ते अर्पित और श्रेया लड़ते हुए गए.

घर आने पर अर्पित उतर गया. श्रेया के लिए ये वाकिआ बरदाश्त के बाहर था. असल में श्रेया को अपने लड़की होने का बहुत गुरूर था. आज तक उस ने लड़को को अपने आसपास चक्कर काटते ही देखा था. कोई लड़का इतनी बुरी तरह से उस से पहली बार उलझा था. श्रेया के तनबदन में आग लगी हुई थी.

अर्पित का घर श्रेया ने उस दिन देख ही लिया था. नामपते की जानकारी से श्रेया ने अर्पित के बारे में सबकुछ पता कर लिया और तीसरे ही दिन अर्पित के घर से 50 मीटर दूर आ कर लगभग उसी समय के अंदाजे के साथ कैब बुकिंग का प्रयास किया. जब अर्पित सुबह औफिस के लिए निकलता था.

श्रेया का भाग्य कहिए या अर्पित का दुर्भाग्य, श्रेया को अर्पित वाली कैब में ही बुकिंग मिल गई, एक कुटिल मुसकान कैब वाले एप पर ‘‘अर्पित के साथ पूल्ड‘‘ देख कर श्रेया के चेहरे पर तैर गई.

जिस तरफ श्रेया खड़ी थी, उसी तरफ कैब आती होने के कारण श्रेया को पिक करती हुई कैब अर्पित के घर के सामने रुकी. अर्पित बेखयाली में ड्राइवर के बगल वाली सीट पर सवार हो गया, तभी उसे पीछे से खनकती हुई आवाज आई, ‘‘कैसे हो अर्पितजी ?”

अर्पित ने चैंकते हुए पीछे मुड़ कर देखा, तो श्रेया सकपका गई, क्योंकि 3 दिन पुराना वाकिआ उसे याद आ गया लेकिन आज श्रेया के बात की शुरुआत करने का अंदाज ही अलग था, सो धीरेधीरे श्रेया और अर्पित की बातचीत दोस्ती में बदल गई.

दोनों का गंतव्य अभी बहुत दूर था. अर्पित कैब को रुकवा कर पीछे वाली सीट पर श्रेया के बगल में जा कर बैठ गया. एकदूसरे के फोन नंबर लिएदिए गए. अर्पित अपना औफिस आने पर उतर गया और श्रेया ने गरमजोशी से हाथ मिला कर उस को विदा किया.

अर्पित के मानो पंख लग गए. औफिस में अर्पित सारे दिन चहकाचहका रहा. दोपहर में श्रेया का फोन आया, तो अर्पित का तनबदन झूम उठा. श्रेया ने उस को लंच साथ करने का प्रस्ताव रखा, जो उस ने सहर्ष स्वीकार कर लिया.

दोपहर तकरीबन 1 बजे दोनों अर्पित के औफिस से थोड़ी दूर एक रेस्तरां में मिले और साथ लंच लिया.

अब तो यह लगभग रोज का ही किस्सा बन गया. औफिस के बाद शाम को भी दोनों मिलने लगे और साथसाथ घूमतेफिरते दोनों के बीच में जैसे प्यार के अंकुर फूट के खिलने लगे.

एक दिन श्रेया ने अंकुर को दोपहर में फोन कर के बताया कि शाम तक वह घर में अकेली है और अगर अर्पित उस के घर आ जाए, तो दोनों ‘अच्छा समय‘ साथ बिता सकते हैं. अर्पित के सिर पर प्यार का भूत पूरी तरह से चढ़ा हुआ था. अपने बौस को तबीयत खराब का बहाना बना कर अर्पित श्रेया के घर के लिए निकल पड़ा.

आने वाले किसी भी तूफान से बेखबर, मस्ती और वासना में चूर अर्पित श्रेया के घर पहुंचा और डोरबैल बजाई. एक मादक अंगड़ाई लेते हुए श्रेया ने अपने घर का दरवाजा खोला.

श्रेया के गीले और खुले बाल और नाइट गाउन में ढंका बदन देख कर अर्पित की खुमारी और परवान चढ़ गई. श्रेया ने अर्पित को अंदर ले कर गेट बंद कर दिया.

कुछ ही देर में दोनों एकदूसरे के आगोश में आ गए और एक प्यार भरे रास्ते पर निकल पड़े.

अर्पित ने श्रेया के बदन से कपड़े जुदा करने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई. उस ने श्रेया के पूरे बदन पर मादकता से फोरप्ले करते हुए समूचे जिस्म को प्यार से सहलाया.

धीरेधीरे अब अर्पित श्रेया के बदन से कपड़े जुदा करने लगा. एकाएक ही श्रेया जोरजोर से चिल्लाने लगी. अर्पित को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह चिल्ला क्यों रही है. कुछ ही पलों में अड़ोसपड़ोस के बहुत से लोग जमा हो गए और श्रेया के घर के अंदर आ गए.

श्रेया ने चुपचाप मेन गेट पहले ही खोल दिया था. श्रेया ने सब को बताया कि अर्पित जबरदस्ती घर में घुस कर उस का बलात्कार करने की कोशिश कर रहा था. उन मे से एक आदमी ने पुलिस को फोन कर दिया. ये सब इतनी जल्दी हुआ कि अर्पित को सोचनेसमझने का मौका नहीं मिला. थोड़ी ही देर बाद अर्पित सलाखों के पीछे था.

श्रेया ने उस दिन की छोटी सी लड़ाई का विकराल बदला ले डाला था.

जेल में 48 घंटे बीतने के साथ ही अर्पित को नौकरी से सस्पैंड किया जा चुका था. अर्पित को अपना पूरा भविष्य अंधकरमय नजर आने लगा और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था.

कोर्ट में कई बार पेश किए जाने के उपरांत आज जज ने उस के लिए सजा मुकर्रर करने की तारीख रखी थी. अंतिम सुनवाई के उपरांत जज साहिबा जैसे ही अपना फैसला सुनाने को हुईं, अचानक ही इंस्पैक्टर प्रकाश ने कोर्ट मे प्रवेश करते हुए जज साहिबा से एक सुबूत पेश करने की इजाजत मांगी. मामला संगीन था और जज साहिबा बड़ी सजा सुनाने के मूड में थीं, इसलिए उन्होंने इंस्पैक्टर प्रकाश को अनुमति दे दी.

इंस्पैक्टर प्रकाश के साथ अर्पित का सहकर्मी विकास था और विकास के मोबाइल में अर्पित और श्रेया के बीच हुए प्रेमालाप की और श्रेया के मादक आहें भरने और अर्पित की वासना को और भड़काने के लिए प्रेरित करने की समूची औडियो रिकौर्डिंग मौजूद थी. दरअसल, जिस समय दोनों का प्रेमालाप शुरू होने वाला था, उसी समय विकास ने अर्पित की तबीयत पूछने के लिए उस को फोन मिलाया था और अर्पित ने गलती से फोन काटने के बजाय रिसीव कर के बेड के एक तरफ रख दिया था. विकास ने सारी काल रिकौर्ड कर ली थी.

श्रेया और अर्पित के बीच हुआ सारा वार्तालाप और श्रेया की वासना भरी आहें व अर्पित को बारबार उकसाने का प्रमाण उस सारी रिकौर्डिंग से सर्वविदित हो गया.

अदालत के निर्णय लिए जाने वाले दिन पूर्व में श्रेया द्वारा रूपजाल में फंसाए हुए अनिल ने भी अदालत में श्रेया के खिलाफ बयान दिया, जिस से श्रेया का ऐयाश होना और पुख्ता हो गया.

अदालत ने तमाम सुबूतों को मद्देनजर रखते हुए यह संज्ञान लिया कि श्रेया एक ऐयाश लड़की थी और भोलेभाले नौजवानों को अपने रूपजाल में फंसा कर उन के पैसों पर मौजमस्ती और ऐश करती थी. एक बेगुनाह नौजवान की जिंदगी बरबाद होने से बच गई. श्रेया को चरित्रहीनता और झूठे आरोप लगा कर युवक को बरबाद करने का प्रयास करने का आरोपी करार देते हुए जज ने जम कर फटकार लगाई. जज ने श्रेया को भविष्य में कुछ भी गलत करने पर सख्त सजा की चेतावनी देते हुए अर्पित को बाइज्जत बरी करने के आदेश दिए.

अर्पित ने मन ही मन ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करते हुए भविष्य में एक सादगी भरी जिंदगी जीने का निर्णय लिया. Hindi Romantic Story

Hindi Story: फरेब – कौन किस से कर रहा था दगाबाजी?

Hindi Story: ‘‘आज फिर मालकिन रात को देर से आएंगी क्या साहब?’’ कमला ने डिनर के बाद बरतन उठा कर सिंक में रखते हुए बाईं आंख दबा कर होंठ का कोना दांत से काटते हुए मुसकरा कर पूछा.

कमला की इस अदा पर जितेंद्र कुरसी से उठा और उसे पीछे से बांहों में भरते हुए धीरे से उस के कान में बोला, ‘‘हां जानेमन. उस के बैंक में क्लोजिंग चल रही है, तो कुछ दिन देर रात तक ही लौटेगी. बहुत हिसाबकिताब करना होता है न बैंक वालों को. और मैनेजर पर सब से ज्यादा जिम्मेदारी होती है.’’

‘‘अच्छा है साहब, फिर हम भी कुछ हिसाबकिताब कर लेंगे. वैसे, आप हिसाब बहुत अच्छा करते हैं साहब. बस, किसी दिन मेमसाहब पूरी रात बाहर रहें तो मैं आप से ब्याज भी वसूल कर लूं,’’ कमला ने जितेंद्र की ओर घूमते हुए कहा और उस के ऐसा करने से जितेंद्र के होंठ कमला के होंठों के सामने आ गए, जिन्हें कमला ने थोड़ा सा और आगे हो कर अपने होंठों से चिपका लिया.

जितेंद्र की सांसें तेज होने लगी थीं. वह अब कमला से पूरी तरह चिपकने लगा था कि तभी कमला एक झटके से घूम कर जितेंद्र से अलग हो गई और बोली, ‘‘छोडि़ए साहब, देखते नहीं कितना काम पड़ा है. और फिर मुझे घर जा कर अपने मरद को भी हिसाब देना होता है. आप के साथ हिसाब करने लगी तो फिर मेरे मरद के हिसाब में कमी हो जाएगी और वह मुझ पर शक करेगा.

‘‘वैसे भी पिछली बार जब मैं आप के साथ चिपक कर गई थी तो वह सवाल कर रहा था कि यह जमीन में इतनी नमी क्यों है. वह तो मैं ने किसी तरह उसे यह कह कर संभाल लिया कि बहुत दिन से कुछ हुआ नहीं तो आज तुम्हारे हाथ लगाने से ज्यादा ही जोश आ गया है और वह मान गया, नहीं तो मेरा भेद खुल ही जाना था उस दिन.’’

जितेंद्र जो अब पूरी तरह मूड में आ चुका था, कमला को ऐसे दूर जाते देख कर झटका खा गया. वह अब किसी भी हालत में कमला का साथ चाहता था, तो वह आगे बढ़ कर फिर से कमला को बांहों में भरते हुए बोला, ‘‘अरे कमला, क्या तुम्हें मेरा प्यार कम लगता है? किसी को कुछ नहीं पता चलेगा, बस तुम मुझ से दूर मत जाओ. कमला, मैं सच में तुम्हें चाहता हूं. तुम्हारा साथ मुझे बहुत अच्छा लगता है.

‘‘तुम जैसे मुझे प्यार करती हो न, ऐसा तो कभी तुम्हारी मेमसाहब भी नहीं करतीं. सच कहूं तो निर्मला को प्यार करना आता ही नहीं है,’’ जितेंद्र ने कमला को बांहों में भर कर उस के होंठों की तरफ होंठ ले जाते हुए कहा.

‘‘नहीं साहब, आप झूठ बोलते हैं. आप को मुझ से कोई प्यारव्यार नहीं है, आप तो बस अपनी जरूरत पूरी करते हो. मैं ही आप से प्रेम करने लगी थी साहब, लेकिन मैं अब समझ गई हूं कि आप बस मेरे साथ फरेब करते हो.

‘‘आप को मेरे जिस्म से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए. आप का प्रेम बस इतना सा ही है. अभी मैं आप के साथ बिस्तर पर चली जाऊंगी आप का काम हो जाएगा और आप मुझे भूल जाओगे बस,’’ कमला फिर अपनेआप को छुड़ाते हुए बोली.

‘‘नहींनहीं, ऐसा नहीं है कमला. मैं तुम से सच में प्यार करता हूं. अच्छा बताओ, मेरा प्यार सच्चा है, इसे साबित करने के लिए मैं तुम्हें क्या दूं?’’ जितेंद्र ने अब कमला को बांहों में उठा लिया था. हवस का जोश अब जितेंद्र के संभालने से बाहर हो रहा था.

जितेंद्र ने कमला को बिस्तर पर बिठाया और उस के सामने खड़े हो कर अपनी शर्ट के बटन खोलते हुए बोला, ‘‘बताओ न, क्या चाहिए तुम्हें?’’

‘‘साहब, आप सच कह रहे हैं. सच में आप मुझे प्यार करते हैं,’’ कमला ने बिस्तर पर लेट कर अपने पैर से जितेंद्र के सीने के बालों को सहला कर होंठ काटते हुए पूछा.

‘‘हां सच कमला, तुम एक बार मांग कर तो देखो, जो कहोगी, मैं तुम्हें दे दूंगा,’’ जितेंद्र ने आगे बढ़ते हुए कहा. उस की आवाज हवस में बहक रही थी. कमला अपनी अदाओं से उस के जिस्म की आग को और बल दे रही थी.

‘‘क्या आप को नहीं लगता कि ऐसे छिपछिप कर मिलने से हमारे प्यार की अच्छे से भरपाई भी नहीं हो पाती और हमारे पकड़े जाने का डर रहता है सो अलग.

‘‘अब मान लो कि अभी हम प्यार शुरू ही कर रहे हैं और आप की पत्नी आ जाए तब? या फिर मेरा मरद ही मुझे ढूंढ़ता हुआ आ जाए तब? क्या ऐसे अच्छे से प्यार हो सकता है?’’ कमला ने एकएक शब्द सोच कर बोला.

‘‘नहीं हो सकता कमला, तभी तो कह रहा हूं कि आओ हम जल्दी से प्यार कर लें, उस के बाद तुम आराम से काम खत्म कर के अपने घर चली जाना,’’ जितेंद्र ने कमला के ऊपर झुकते हुए कहा.

‘‘कुछ ऐसा नहीं हो सकता साहब कि हम लोग जब मन करे प्यार करें और हमें रोकनेटोकने वाला कोई न हो?’’ कमला ने जितेंद्र के गले में बांहें डाल कर उस की आंखों में देखते हुए बहुत मीठे शब्दों में कहा.

‘‘कैसे हो सकता है बताओ कमला? बताओ, मैं तुम्हारे लिए कुछ भी करने को तैयार हूं,’’ जितेंद्र ने अपनी उंगलियां कमला के ब्लाउज के बटनों में उलझाते हुए पूछा.

‘‘आप अपना ‘बोरीवली’ वाला वन रूम सैट मेरे नाम कर दो साहब. फिर जब आप का मन करे दिन या रात

कभी भी हम उस फ्लैट में आराम से प्यार करेंगे. वहां कोई हमें डिस्टर्ब नहीं करेगा साहब.’’

‘‘लेकिन, तुम्हारा मरद?’’ जितेंद्र ने कमला का कंधा सहलाते हुए कहा.

‘‘उस की फिक्र आप न करो साहब ऐसे तो वह 12-12 घंटे गार्ड की नौकरी करता है, कभी दिन, तो कभी रात. हमारे पास बहुत समय होगा अकेले में मिलने का, जब वह काम पर होगा.

‘‘और फिर मैं उसे बताऊंगी ही नहीं कि फ्लैट आप ने मेरे नाम पर किया है. मैं उस से कहूंगी कि मालिक ने तरस खा कर यह फ्लैट हमें रहने के लिए दिया है, इसलिए साहब जब चाहे यहां आ सकते हैं बस,’’ कमला ने जितेंद्र की पीठ पर हाथ चलाते हुए कहा.

‘‘लेकिन कमला, उस के लिए फ्लैट तुम्हारे नाम करने की क्या जरूरत है? उस में तो तुम ऐसे भी जा कर रह सकती हो?’’ जितेंद्र ने एक सवाल पूछा कि तभी कमला ने आगे बढ़ कर उस के होंठों को अपने होंठों में दबा कर एक लंबा सा चुम्मा किया और बोली, ‘‘तुम सोचते बहुत हो साहब, अभी तो कह रहे थे कि अपना प्यार साबित करने के लिए कुछ भी कर सकते हो और अब कुछ पेपर पर तनिक सा पैन घिसने में तुम्हारे पैन की स्याही खत्म होने लगी. फिर

तुम हमारे प्यार की कहानी कैसे लिखोगे साहब?’’

कमला ने जितेंद्र की आंखों में मुसकराते हुए देखा और अपने हाथ उस की पैंट की ओर बढ़ा दिए.

कमला की इस हरकत पर जितेंद्र के मुंह से हलकी ‘आह’ निकल गई और मस्ती से उस की आंखें बंद होने लगीं.

‘‘आप का पैन तो एकदम तैयार है साहब, तनिक इन पेपरों पर चला कर देखिए तो क्या यह हमारे प्रेम की कहानी लिख पाएगा…’’ कमला ने तकिए के नीचे से कुछ पेपर निकाल कर जितेंद्र के सामने रखे और उस के हाथ में एक कलम दे कर बोली, ‘‘यहां दस्तखत कीजिए साहब.’’

ऐसा कहने के साथ ही कमला के हाथ जितेंद्र की पैंट में हरकत करने लगे, उस से जितेंद्र की आंखें बंद हो गईं और वह बोला, ‘‘लेकिन, कमला…’’

‘‘ओहो… आप कितना सोचते हो साहब. बस जरा सा पैन ही तो चलाना है, फिर जी भर कर हम अपने प्यार की कहानी लिखेंगे. आप सोचिए मत. बस, दस्तखत कीजिए, तब तक मैं चैक करती हूं कि क्या आप की कलम मेरे प्रेम की किताब पर कोई कहानी लिख भी पाएगी या फिर…?’’ कह कर कमला ने अपने होंठ ‘उधर’ बढ़ा दिए.

अब जितेंद्र आगे कुछ नहीं कह पाया और उस ने कांपती उंगलियों से उन पेपरों पर दस्तखत कर दिए.

दस्तखत होने के बाद कमला को जैसे जितेंद्र के अंदर उमड़ रहे तूफान को शांत करने की बहुत जल्दी थी. उस ने अपनी हरकतों को और बढ़ा दिया और 3-4 मिनट में ही जितेंद्र निढाल हो कर बिस्तर पर लुढ़क गया.

कमला ने उठ कर अपना मुंह साफ किया और अपने कपड़े ठीक करते हुए गेट बंद कर के फ्लैट से बाहर निकल आई.

‘‘हो गया न काम?’’ नीचे आते ही चौकीदार की वरदी पहने खंभे की आड़ में खड़े एक आदमी ने उस से पूछा.

जवाब में कमला ने मुसकराते हुए पेपर उस के हाथ में रख दिए.

‘‘वाह मेरी जान, खूब फरेब में फंसाया तुम ने इस रईस को,’’ वह चौकीदार कमला को गले लगाते हुए खुश हो कर बोला.

‘‘फरेब तो इस ने किया था मेरे साथ, मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि अपने मरद के अलावा किसी को हाथ भी लगाने दूंगी, लेकिन उस दिन पार्टी के बाद इस कमीने ने मुझे जूस में न जाने क्या मिला कर पिलाया कि मैं इस की बांहों में गिर पड़ी और उस मदहोशी की हालत में इस की किसी भी हरकत का विरोध न कर सकी.

‘‘बस, आज मैं ने भी वही किया. और यह भी मदहोशी में मेरी किसी भी मांग का विरोध नहीं कर पाया. लेकिन इस ने जो काम मुझे ड्रग्स दे कर किया था. वह मैं ने केवल अपने हुस्न और अदाओं से कर दिया.

‘‘अच्छा, अब चलो यहां से. किसी ने देख लिया, तो गजब हो जाएगा. बस, कल सुबह ही ये पेपर ले कर वकील के पास चले जाना. एक बार 40 लाख

का वह फ्लैट अपने नाम हो जाए, फिर इसे लात मार कर भगा दूंगी,’’ कमला ने हंसते हुए कहा और दोनों वहां से चले गए.

‘‘कमला, तुम पिछले 5-6 दिन से काम पर क्यों नहीं आई? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न? तुम मेरा फोन भी नहीं उठा रही हूं और न ही तुम्हारा पति

फोन उठा रहा है. क्या हुआ? कोई बात है तो मुझे बताओ?’’ जितेंद्र ने सुबहसुबह फ्लैट पर पहुंच कर कमला से सवाल किया.

‘‘कुछ नहीं हुआ साहब, मेरे मरद ने अब मुझे लोगों के घरों में जा कर काम करने से मना किया है, तो आप दूसरी बाई ढूंढ़ लो. मैं अब काम नहीं करूंगी. अब मेरा मरद कमाएगा और मैं बैठ कर खाऊंगी बस,’’ कमला ने बहुत ही रूखे स्वर में जवाब दिया.

‘‘कैसी बात करती हो कमला? मैं किसी के घर काम की नहीं कह रहा हूं, लेकिन हमारे अपने घर…? क्या तुम्हारा प्यार खत्म हो गया, जो तुम मुझ से मिलने भी नहीं आईं और जैसी कि हमारी बात हुई थी कि इस फ्लैट में मैं और तुम साथ रहेंगे और प्यार करेंगे. क्या तुम वह भी भूल गईं?’’ जितेंद्र ने सवाल किया.

‘‘कौन सा प्यार साहब? वह तो बस एक सौदा था, उस में कुछ मैं ने अपना लुटाया और कुछ आप ने अपना. सौदा पूरा हुआ, साहब सब व्यापार खत्म,’’ कमला ने उसी रूखेपन से कहा.

‘‘तो क्या तुम्हारा प्यार सच में बस एक फरेब था कमला? क्या तुम ने मेरा मकान हड़पने के लिए मुझ से प्रेम का नाटक किया था?’’ जितेंद्र ने गुस्से से भर कर पूछा.

‘‘हाहाहा… फरेब… हां साहब, फरेब ही था वह. फरेब जो आप ने मेरे साथ किया था मेरे जूस में ड्रग्स मिला कर. फरेब जो आप ने अपनी पत्नी के साथ किया था पत्नी होते हुए भी मेरे साथ संबंध बना कर.

‘‘फरेब, जो आप ने अपने खुद के साथ किया था हवस में अंधे हो कर, यह मकान मेरे नाम कर के. अब

आप यहां से चले जाइए साहब, कहीं ऐसा न हो कि मैं आप की पत्नी को आप के फरेब के बारे में बता दूं और आप उन्हें भी खो दो. अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है साहब, रोक दो इस फरेब को और बचा लो अपने असली घर को टूटने से.

‘‘मुझे भी अपना घर बचाने दो साहब. मेरा मरद बस आता ही होगा और मैं नहीं चाहती कि वह फिर मेरी गीली होती हुई देखे आंखें,’’ कमला ने कहा और जितेंद्र के मुंह पर फ्लैट का दरवाजा बंद कर दिया.

जितेंद्र खड़ाखड़ा सोच रहा था कि फरेब किस ने किया? फरेबी कौन है? Hindi Story

Hindi Romantic Story: बेईमान बनाया प्रेम ने – क्या हुआ था पुष्पक के साथ

Hindi Romantic Story: अगर पत्नी पसंद न हो तो आज के जमाने में उस से छुटकारा पाना आसान नहीं है. क्योंकि दुनिया इतनी तरक्की कर चुकी है कि आज पत्नी को आसानी से तलाक भी नहीं दिया जा सकता. अगर आप सोच रहे हैं कि हत्या कर के छुटाकारा पाया जा सकता है तो हत्या करना तो आसान है, लेकिन लाश को ठिकाने लगाना आसान नहीं है. इस के बावजूद दुनिया में ऐसे मर्दों की कमी नहीं है, जो पत्नी को मार कर उस की लाश को आसानी से ठिकाने लगा देते हैं. ऐसे भी लोग हैं जो जरूरत पड़ने पर तलाक दे कर भी पत्नी से छुटकारा पा लेते हैं. लेकिन यह सब वही लोग करते हैं, जो हिम्मत वाले होते हैं. हिम्मत वाला तो पुष्पक भी था, लेकिन उस के लिए समस्या यह थी कि पारिवारिक और भावनात्मक लगाव की वजह से वह पत्नी को तलाक नहीं देना चाहता था. पुष्पक सरकारी बैंक में कैशियर था. उस ने स्वाति के साथ वैवाहिक जीवन के 10 साल गुजारे थे. अगर मालिनी उस की धड़कनों में न समा गई होती तो शायद बाकी का जीवन भी वह स्वाति के ही साथ बिता देता.

उसे स्वाति से कोई शिकायत भी नहीं थी. उस ने उस के साथ दांपत्य के जो 10 साल बिताए थे, उन्हें भुलाना भी उस के लिए आसान नहीं था. लेकिन इधर स्वाति में कई ऐसी खामियां नजर आने लगी थीं, जिन से पुष्पक बेचैन रहने लगा था. जब किसी मर्द को पत्नी में खामियां नजर आने लगती हैं तो वह उस से छुटकारा पाने की तरकीबें सोचने लगता है. इस के बाद उसे दूसरी औरतों में खूबियां ही खूबियां नजर आने लगती हैं. पुष्पक भी अब इस स्थिति में पहुंच गया था. उसे जो वेतन मिलता था, उस में वह स्वाति के साथ आराम से जीवन बिता रहा था, लेकिन जब से मालिनी उस के जीवन में आई, तब से उस के खर्च अनायास बढ़ गए थे. इसी वजह से वह पैसों के लिए परेशान रहने लगा था. उसे मिलने वाले वेतन से 2 औरतों के खर्च पूरे नहीं हो सकते थे. यही वजह थी कि वह दोनों में से किसी एक से छुटकारा पाना चाहता था. जब उस ने मालिनी से छुटकारा पाने के बारे में सोचा तो उसे लगा कि वह उसे जीवन के एक नए आनंद से परिचय करा कर यह सिद्ध कर रही है. जबकि स्वाति में वह बात नहीं है, वह हमेशा ऐसा बर्ताव करती है जैसे वह बहुत बड़े अभाव में जी रही है. लेकिन उसे वह वादा याद आ गया, जो उस ने उस के बाप से किया था कि वह जीवन की अंतिम सांसों तक उसे जान से भी ज्यादा प्यार करता रहेगा.

पुष्पक इस बारे में जितना सोचता रहा, उतना ही उलझता गया. अंत में वह इस निर्णय पर पहुंचा कि वह मालिनी से नहीं, स्वाति से छुटकारा पाएगा. वह उसे न तो मारेगा, न ही तलाक देगा. वह उसे छोड़ कर मालिनी के साथ कहीं भाग जाएगा.

यह एक ऐसा उपाय था, जिसे अपना कर वह आराम से मालिनी के साथ सुख से रह सकता था. इस उपाय में उसे स्वाति की हत्या करने के बजाय अपनी हत्या करनी थी. सच में नहीं, बल्कि इस तरह कि उसे मरा हुआ मान लिया जाए. इस के बाद वह मालिनी के साथ कहीं सुख से रह सकता था. उस ने मालिनी को अपनी परेशानी बता कर विश्वास में लिया. इस के बाद दोनों इस बात पर विचार करने लगे कि वह किस तरह आत्महत्या का नाटक करे कि उस की साजिश सफल रहे. अंत में तय हुआ कि वह समुद्र तट पर जा कर खुद को लहरों के हवाले कर देगा. तट की ओर आने वाली समुद्री लहरें उस की जैकेट को किनारे ले आएंगी. जब उस जैकेट की तलाशी ली जाएगी तो उस में मिलने वाले पहचानपत्र से पता चलेगा कि पुष्पक मर चुका है.

उसे पता था कि समुद्र में डूब कर मरने वालों की लाशें जल्दी नहीं मिलतीं, क्योंकि बहुत कम लाशें ही बाहर आ पाती हैं. ज्यादातर लाशों को समुद्री जीव चट कर जाते हैं. जब उस की लाश नहीं मिलेगी तो यह सोच कर मामला रफादफा कर दिया जाएगा कि वह मर चुका है. इस के बाद देश के किसी महानगर में पहचान छिपा कर वह आराम से मालिनी के साथ बाकी का जीवन गुजारेगा.

लेकिन इस के लिए काफी रुपयों की जरूरत थी. उस के हाथों में रुपए तो बहुत होते थे, लेकिन उस के अपने नहीं. इस की वजह यह थी कि वह बैंक में कैशियर था. लेकिन उस ने आत्महत्या क्यों की, यह दिखाने के लिए उसे खुद को लोगों की नजरों में कंगाल दिखाना जरूरी था. योजना बना कर उस ने यह काम शुरू भी कर दिया. कुछ ही दिनों में उस के साथियों को पता चला गया कि वह एकदम कंगाल हो चुका है. बैंक कर्मचारी को जितने कर्ज मिल सकते थे, उस ने सारे के सारे ले लिए थे. उन कर्जों की किस्तें जमा करने से उस का वेतन काफी कम हो गया था. वह साथियों से अकसर तंगी का रोना रोता रहता था. इस हालत से गुजरने वाला कोई भी आदमी कभी भी आत्महत्या कर सकता था.

पुष्पक का दिल और दिमाग अपनी इस योजना को ले कर पूरी तरह संतुष्ट था. चिंता थी तो बस यह कि उस के बाद स्वाति कैसे जीवन बिताएगी? वह जिस मकान में रहता था, उसे उस ने भले ही बैंक से कर्ज ले कर बनवाया था. लेकिन उस के रहने की कोई चिंता नहीं थी. शादी के 10 सालों बाद भी स्वाति को कोई बच्चा नहीं हुआ था. अभी वह जवान थी, इसलिए किसी से भी विवाह कर के आगे की जिंदगी सुख और शांति से बिता सकती थी. यह सोच कर वह उस की ओर से संतुष्ट हो गया था.

बैंक से वह मोटी रकम उड़ा सकता था, क्योंकि वह बैंक का हैड कैशियर था. सारे कैशियर बैंक में आई रकम उसी के पास जमा कराते थे. वही उसे गिन कर तिजोरी में रखता था. उसे इसी रकम को हथियाना था. उस रकम में कमी का पता अगले दिन बैंक खुलने पर चलता. इस बीच उस के पास इतना समय रहता कि वह देश के किसी दूसरे महानगर में जा कर आसानी से छिप सके. लेकिन बैंक की रकम में हेरफेर करने में परेशानी यह थी कि ज्यादातर रकम छोटे नोटों में होती थी. वह छोटे नोटों को साथ ले जाने की गलती नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने सोचा कि जिस दिन उसे रकम का हेरफेर करना होगा, उस दिन वह बड़े नोट किसी को नहीं देगा. इस के बाद वह उतने ही बड़े नोट साथ ले जाएगा, जितने जेबों और बैग में आसानी से जा सके. पुष्पक का सोचना था कि अगर वह 20 लाख रुपए भी ले कर निकल गया तो उन्हीं से कोई छोटामोटा कारोबार कर के मालिनी के साथ नया जीवन शुरू करेगा. 20 लाख की रकम इस महंगाई के दौर में कोई ज्यादा बड़ी रकम तो नहीं है, लेकिन वह मेहनत से काम कर के इस रकम को कई गुना बढ़ा सकता है. जिस दिन उस ने पैसे ले कर भागने की तैयारी की थी, उस दिन रास्ते में एक हैरान करने वाली घटना घट गई. जिस बस से वह बैंक जा रहा था, उस का कंडक्टर एक सवारी से लड़ रहा था. सवारी का कहना था कि उस के पास पैसे नहीं हैं, एक लौटरी का टिकट है. अगर वह उसे खरीद ले तो उस के पास पैसे आ जाएंगे, तब वह टिकट ले लेगा. लेकिन कंडक्टर मना कर रहा था.

पुष्पक ने झगड़ा खत्म करने के लिए वह टिकट 50 रुपए में खरीद लिया. उस टिकट को उस ने जैकेट की जेब में रख लिया. आत्महत्या के नाटक को अंजाम तक पहुंचाने के बाद वह फोर्ट पहुंचा और वहां से कुछ जरूरी चीजें खरीद कर एक रेस्टोरैंट में बैठ गया. चाय पीते हुए वह अपनी योजना पर मुसकरा रहा था. तभी अचानक उसे एक बात याद आई. उस ने आत्महत्या का नाटक करने के लिए अपनी जो जैकेट लहरों के हवाले की थी, उस में रखे सारे रुपए तो निकाल लिए थे, लेकिन लौटरी का वह टिकट उसी में रह गया था. उसे बहुत दुख हुआ. घड़ी पर नजर डाली तो उस समय रात के 10 बज रहे थे. अब उसे तुरंत स्टेशन के लिए निकलना था. उस ने सोचा, जरूरी नहीं कि उस टिकट में इनाम निकल ही आए इसलिए उस के बारे में सोच कर उसे परेशान नहीं होना चाहिए. ट्रेन में बैठने के बाद पुष्पक मालिनी की बड़ीबड़ी कालीकाली आंखों की मस्ती में डूब कर अपने भाग्य पर इतरा रहा था. उस के सारे काम बिना व्यवधान के पूरे हो गए थे, इसलिए वह काफी खुश था.

फर्स्ट क्लास के उस कूपे में 2 ही बर्थ थीं, इसलिए उन के अलावा वहां कोई और नहीं था. उस ने मालिनी को पूरी बात बताई तो वह एक लंबी सांस ले कर मुसकराते हुए बोली, ‘‘जो भी हुआ, ठीक हुआ. अब हमें पीछे की नहीं, आगे की जिंदगी के बारे में सोचना चाहिए.’’

पुष्पक ने ठंडी आह भरी और मुसकरा कर रह गया. ट्रेन तेज गति से महाराष्ट्र के पठारी इलाके से गुजर रही थी. सुबह होतेहोते वह महाराष्ट्र की सीमा पार कर चुकी थी. उस रात पुष्पक पल भर नहीं सोया था, उस ने मालिनी से बातचीत भी नहीं की थी. दोनों अपनीअपनी सोचों में डूबे थे. भूत और भविष्य, दोनों के अंदेशे उन्हें विचलित कर रहे थे. दूर क्षितिज पर लाललाल सूरज दिखाई देने लगा था. नींद के बोझ से पलकें बोझिल होने लगी थीं. तभी मालिनी अपनी सीट से उठी और उस के सीने पर सिर रख कर उसी की बगल में बैठ गई. पुष्पक ने आंखें खोल कर देखा तो ट्रेन शोलापुर स्टेशन पर खड़ी थी. मालिनी को उस हालत में देख कर उस के होंठों पर मुसकराहट तैर गई. हैदराबाद के होटल के एक कमरे में वे पतिपत्नी की हैसियत से ठहरे थे. वहां उन का यह दूसरा दिन था. पुष्पक जानना चाहता था कि मुंबई से उस के भागने के बाद क्या स्थिति है. वह लैपटौप खोल कर मुंबई से निकलने वाले अखबारों को देखने लगा.

‘‘कोई खास खबर?’’ मालिनी ने पूछा.

‘‘अभी देखता हूं.’’ पुष्पक ने हंस कर कहा.

मालिनी भी लैपटौप पर झुक गई. दोनों अपने भागने से जुड़ी खबर खोज रहे थे. अचानक एक जगह पुष्पक की नजरें जम कर रह गईं. उस से सटी बैठी मालिनी को लगा कि पुष्पक का शरीर अकड़ सा गया है. उस ने हैरानी से पूछा, ‘‘क्या बात है डियर?’’

पुष्पक ने गूंगों की तरह अंगुली से लैपटौप की स्क्रीन पर एक खबर की ओर इशारा किया. समाचार पढ़ कर मालिनी भी जड़ हो गई. वह होठों ही होठों में बड़बड़ाई, ‘‘समय और संयोग. संयोग से कोई नहीं जीत सका.’’

‘‘हां संयोग ही है,’’ वह मुंह सिकोड़ कर बोला, ‘‘जो हुआ, अच्छा ही हुआ. मेरी जैकेट पुलिस के हाथ लगी, जिस पुलिस वाले को मेरी जैकेट मिली, वह ईमानदार था, वरना मेरी आत्महत्या का मामला ही गड़बड़ा जाता. चलो मेरी आत्महत्या वाली बात सच हो गई.’’

इतना कह कर पुष्पक ने एक ठंडी आह भरी और खामोश हो गया.

मालिनी खबर पढ़ने लगी, ‘आर्थिक परेशानियों से तंग आ कर आत्महत्या करने वाले बैंक कैशियर का दुर्भाग्य.’ इस हैडिंग के नीचे पुष्पक की आर्थिक परेशानी का हवाला देते हुए आत्महत्या और बैंक के कैश से 20 लाख की रकम कम होने की बात लिखते हुए लिखा था—‘इंसान परिस्थिति से परेशान हो कर हौसला हार जाता है और मौत को गले लगा लेता है. लेकिन वह नहीं जानता कि प्रकृति उस के लिए और भी तमाम दरवाजे खोल देती है. पुष्पक ने 20 लाख बैंक से चुराए और रात को जुए में लगा दिए कि सुबह पैसे मिलेंगे तो वह उस में से बैंक में जमा कर देगा. लेकिन वह सारे रुपए हार गया. इस के बाद उस के पास आत्महत्या करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा, जबकि उस के जैकेट की जेब में एक लौटरी का टिकट था, जिस का आज ही परिणाम आया है. उसे 2 करोड़ रुपए का पहला इनाम मिला है. सच है, समय और संयोग को किसी ने नहीं देखा है.’ Hindi Romantic Story

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