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बस तुम्हारी हां की देर है

सुगंधा लौट आई -भाग 1: क्या थी सुगंधा की अनिल को छोड़ने की वजह?

शकुंतला सिन्हा

मैं उन दिनों बीबीए के अंतिम सैमेस्टर में था. इरादा तो ग्रैजुएशन के बाद एमबीए करने का था पर इस की हैसियत नहीं थी. पापा रिटायर हो चुके थे और रिटायरमैंट पर पैसे बहुत कम मिले थे. नौकरी के दौरान ही 2 बेटियों की शादी के लिए उन्होंने पीएफ से काफी पैसे निकाल लिए थे. छोटी बेटी की शादी के कुछ महीने बाद मम्मी चल बसीं.

पापा की पेंशन इतनी थी कि मेरी पढ़ाई और घर का खर्र्च आराम से चल जाता था. पापा ने मुझे बीबीए करने को कहा. मैं ने सोचा कि बीबीए के बाद बिजनैस के कुछ गुर सीख लूंगा और नौकरी न भी मिली तो अपना बिजनैस करूंगा. पापा ने कहा कि जरूरत पड़ने पर अपना घर गिरवी रख कर बैंक से कर्ज ले लेंगे. घर क्या था, बंटवारे के बाद पुश्तैनी घर में 3 रूम का एक फ्लैट उन के हिस्से आया था.

एक दिन मैं घर से निकल कर थोड़ी दूर ही गया था कि अचानक मेरे ऊपर पानी की कुछ बूंदें गिरीं. मौसम बरसात का नहीं था और ऊपर नीले आसमान में दूर तक बादल का नामोनिशान भी नहीं था. हां, जाड़े की शुरुआत जरूर थी. फिर दोबारा पानी की कुछ बूंदें मेरे सिर और चेहरे पर आ गिरीं. तब मैं ने देखा कि ठीक ऊपर पहली मंजिल की बालकनी पर खड़ी एक लड़की बालों को झटक रही थी. मैं ने रूमाल से अपने चेहरे से उन बूंदों को पोंछते हुए ऊपर देखा. लड़की थोड़ी सहमी सी लगी, फिर मुसकराई. उस के होंठ से कुछ अनसुने शब्द निकले हालांकि होंठों की मूवमैंट से मैं समझ गया कि वह सौरी बोल रही थी.

मैं ने शरारत से हंसते हुए कहा ‘‘इट्स ओके पर एक बार फिर मुसकरा दो.’’

इस पर वह खिलखिला कर हंस पड़ी और शरमा कर अंदर चली गई. मैं ने महसूस किया कि  गोरे रंग की इस लड़की के मुख में दूधिया दंतपंक्तियां उस की सुंदरता में चार चांद लगा रही थीं.

इस के 2 दिन बाद मैं फिर उस रास्ते से जा रहा था तो उस लड़की की बालकनी की ओर देखने लगा. वह लड़की तो वहीं खड़ी थी पर उस ने बालों में तौलिया बांध रखा था. इस बार मैं मुसकरा पड़ा तो जवाब में वह खिलखिला उठी, मुझे अच्छा लगा. फिर कुछ दिनों तक वह नजर नहीं आई. करीब 2 सप्ताह के बाद मुझे वह बाजार में सब्जी खरीदती मिली. इत्तफाक से मैं भी वहीं गया था. दोनों की नजरें मिलीं, मैं ने हिम्मत कर पूछा ‘‘इधर कुछ दिनों से आप दिखीं नहीं.’’

‘‘हां, छुट्टियां थीं, मैं दीदी के यहां गई थी. आज ही लौटी हूं.’’

मुझे उम्मीद नहीं थी कि वह पहली मुलाकात में इतनी फ्रैंकली बात करेगी. उस ने काफी सामान लिया था और उन्हें 2 थैलों में बांट कर दोनों हाथों में ले कर चलने लगी. मैं एक थैला उस के हाथ से लेना चाहता था, पर वह बोली. ‘‘थैंक्स, मैं खुद ले लूंगी आप क्यों तकलीफ करेंगे. घर ज्यादा दूर भी नहीं है. अगर जरूरत पड़ी तो रिक्शा ले लूंगी.’’

मैं ने उस के हाथ से थैला लगभग छीनते हुए कहा, ‘‘इस में तकलीफ की कोई बात नहीं है. रिक्शा के पैसे बचा कर हम चाय पी लेंगे.’’

चाय की दुकान सामने थी, वहां बैंच पर बैग रख कर बोला. ‘‘भैया 2 स्पैशल चाय बना देना.’’ चाय पीतेपीते थोड़ा परिचय हुआ, उस ने अपना नाम सुगंधा बताया. उस के पिता नहीं थे और वह मां के साथ रहती थी. वह बीसीए कर एक प्राइवेट स्कूल में टीचर थी. मैं ने भी अपनी पढ़ाई और बिजनैस के इरादे के बारे में बताया. मैं ने चाय के पैसे देने के लिए पर्स निकाला तो उस ने रोकते हुए कहा, ‘‘रिक्शा का पैसा मेरा बचा है तो पेमैंट मैं ही करूंगी.’’

मुझे अच्छा नहीं लगा, माना कि अभी नौकरी नहीं थी पर चाय के पैसे तो दे ही सकता था. चाय पी कर टहलते हुए निकले, पहले उस का ही घर पड़ता था. उस ने दूसरा थैला मुझ से ले कर कहा, ‘‘थैंक्स, अनिलजी.’’

मैं और सुगंधा अकसर मिलने लगे थे जहां तक नौकरी का सवाल था वह सैटल्ड थी. मुझे बीबीए करने के बाद भी कोई मन लायक नौकरी नहीं मिल रही थी, जो औफर थे उन के वेतन बहुत कम थे. मैं कुछ अपना ही बिजनैस करने की सोच रहा था. वह मुझे प्रोत्साहित करती रही और ऐसे लोगों के उदाहरण देती जो निरंतर कठिन संघर्ष के बाद सफल हुए.

मेरे पास लैपटौप और इंटरनैट था. मैं दिन भर उसी पर अच्छी नौकरी या वैकल्पिक बिजनैस के अवसर तलाश रहा था. सुगंधा कभीकभी मुझे अपने घर भी ले जाती. उस की मां मुझे बहुत प्यार करती थी. एक दिन सुगंधा मेरे घर आई और उस ने बताया कि उस के स्कूल में कंप्यूटर लगने जा रहा है और फिर बच्चों को कंप्यूटर सिखाना है. उसी सिलसिले में एक प्रोजैक्ट रिपोर्ट और टैंडर बनाना है. वह चाहती थी कि मैं भी अपना टैंडर भरूं. मैं ने कंप्यूटर ऐप्लिकेशन का कोर्स भी किया था और पढ़ाई के दौरान टैंडर, मार्केटिंग की जानकारी भी मिली थी. मेरे पापा भी यही चाहते थे कि इस अवसर को न गवाऊं.

मैं ने टैंडर भरा और इत्तफाक कहें या सौभाग्य मुझे पहला अवसर मिला. सुगंधा के स्कूल की शाखाएं हमारे राज्य के कुछ अन्य शहरों के अतिरिक्त अन्य राज्यों में भी थीं. उस के प्रिंसिपल इस राज्य के स्कूलों में कंप्यूटर प्रोजैक्ट के इंचार्र्ज थे. सुगंधा ने कहा ‘‘अगर तुम्हारे काम से वे खुश हुए तो अन्य स्कूलों में भी तुम्हें काम मिलने की संभावना है.’’

मैं ने कहा ‘‘मैं टीचर नहीं बनना चाहता हूं. कंप्यूटर इंस्टौल कर नैटवर्किंग आदि एक टीचर और कुछ बच्चों को दोचार दिनां में सिखा दूंगा, इस के बाद उसे आगे बढ़ाना तुम लोगों की जिम्मेदारी होगी.’’

‘‘ठीक है, आप मुझे ही बता देना. मैं ने भी कंप्यूटर का कोर्स किया है.’’

मुझे मेरे पहले काम में ही आशातीत सफलता मिली. प्रिंसिपल बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने बाकी 11 स्कूलों के लिए टैंडर भरने को कहा. मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. सुगंधा, उस की मां और पापा सभी बहुत खुश थे. पापा ने तो यहां तक कहा ‘‘इस लड़की के कदम बहुत शुभ हैं. इन के पड़ते ही तुम्हारी जिंदगी में एक खुशनुमा मोड़ आया है, क्यों न तुम दोनों ही मिल कर काम करो, बल्कि मुझे तो यह लड़की बेहद पसंद है. तुम्हारी जीवनसाथी बनने लायक है.’’

सुगंधा की मां के भी कुछ ऐसे ही विचार थे. मुझे एहसास था कि हम दोनों एकदूसरे को चाहने लगे थे पर हम ने अपनी चाहत को मन में ही दबा कर रखा था, खास कर मैं ने क्योंकि अभी तक मैं अपने पैरों पर खड़ा नहीं था. अब तो बड़ों की इजाजत मिल चुकी थी सो खुल्लमखुल्ला मर्यादित और एक दायरे के अंदर इश्क का सिलसिला शुरू हो गया.

मुझे बाकी स्कूल के टैंडर भी मिल गए तब मैं ने अपने घर से ही अपनी निजी कंपनी की शुरूआत की. ‘‘सुनील डौट कौम.’’ पापा ने पूछा ‘‘यह सुनील कौन है जिस के नाम की कंपनी तुम ने खोली है?’’

मैं ने उन्हें कहा ‘‘सु फौर सुगंधा और नील आप के बेटे अनिल का नाम दोनों को मिला कर सुनील रखा है.’’

‘‘अच्छा तो बात यहां तक पहुंच गई है तब तो मुझे सुगंधा की मां से बात करनी होगी.’’

सुगंधा को भी मेरी कंपनी का नाम सुन कर आश्चर्य हुआ. मैं ने जब उसे इस का मतलब समझाया तो वह हंसने लगी. पापा ने उस की मां से मिल कर हम दोनों की चट मंगनी पट शादी करा दी.

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और रिश्ते टूट गए – निशि की मौसीजी ने उसका कौनसा राज खोल दिया?

Raghavendra Saini

‘‘सभी मौसियां राधास्वामी मत को मानने वाली बनी फिरती हैं, अक्ल धेले की नहीं है,’’ निशि, मेरी साली की बेटी के उक्त शब्द पास से गुजरते जब मेरे कानों में पड़े तो मेरे तनबदन में आग लग गई. सर्दी की इस उफनती रात में भी भीतर के कोप के कारण मैं ने स्वयं को अत्यंत उग्र पाया. इस का जवाब दिया जाना चाहिए. जैसे ही मैं पीछे को मुड़ा, मेरी पत्नी सरला मेरे मुड़ने का आशय समझ गई. सरला ने मुझे रोकते हुए कहा, ‘‘नहीं, इस समय नहीं. इस समय हम किसी के समारोह में आए हुए हैं, मैं नहीं चाहती, कुछ अप्रिय हो.’’

‘‘एक बच्ची हो कर उसे इस बात का खयाल नहीं है कि बड़ों से कैसे बात की जाती है या की जानी चाहिए, तो उसे इस बात का प्रत्युत्तर मिलना चाहिए. इस को उस की स्थिति का संज्ञान करवाना आवश्यक है. बस, तुम देखती जाओ.’’

मैं निशि के पास जा कर बैठ गया. उस के सासससुर भी बैठे हुए थे. मैं ने कहा, ‘‘निशि बेटा, क्या कहा तुम ने?’’ उस का ढीठपना तो देखो, उस ने वही बात दोहरा दी. उसे सासससुर का भी लिहाज नहीं रहा.

‘‘तुम ऐसा क्यों कह रही हो?’’ मेरे स्वर में तीखापन था.

‘‘देखो न बडे़ मौसा, परसों मेरे फूफा की मृत्यु उपरांत उठाला था. कोई मौसी नहीं आई,’’ वह हमेशा मुझे बड़े मौसा कह कर बुलाती थी.

‘‘क्यों, तुम ने अपने मम्मीपापा से नहीं पूछा?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘कुछ भी कहने से पहले तुम्हें उन से पूछना चाहिए था. नहीं पूछा तो कोई बात नहीं. वैसे तो तुम बच्ची हो, तुम्हें बड़ों की बातों में नहीं पड़ना चाहिए था. अब तुम पड़ ही गई हो तो तुम्हें हमारे मन के भीतर के तीखेपन का भी अनुभव करना पड़ेगा,’’ मैं अल्प समय के लिए रुका, फिर कहा, ‘‘तुम्हें अपने मायके के परिवार के बुजुर्गों की कहां तक याद है?’’

‘‘मुझे याद है जब पापा की चाची की मृत्यु हुई थीं.’’

‘‘तो फिर तुम्हें यह भी याद होगा कि हम सब यानी तुम्हारी मौसियां, मौसा तुम्हारे पापा की चाची, चाचा और मां यानी तुम्हारी दादी की मृत्यु पर कब हाजिर नहीं हुए? यहां तक कि आजादपुर मंडी के पास डीडीए फ्लैट में, मुझे नहीं पता वे तुम्हारे पापा के क्या लगते थे, हम वहां भी हाजिर थे. नोएडा में भी पता नहीं किस की मृत्यु हुई थी, हम पूछपूछ कर वहां भी हाजिर हुए थे. इतनी दूर फरीदाबाद से इन स्थानों पर जाना कितना मुश्किल होता है, तुम जैसी लड़की को इस बात का अनुभव हो ही नहीं सकता.’’

मैं ने अपने जज्बातों को काबू में किया और फिर बोला, ‘‘पिछले वर्ष मेरी मां की मृत्यु हुई थी. अपने भाई संग हरिद्वार में उन के फूल प्रवाहित करने के बाद जब घर लौटा तो सभी जाने कहांकहां से अफसोस करने आए थे. अपने पापा से पूछना, वे आए थे? अरे, आना तो दूर अफसोस का टैलीफोन तक नहीं किया.’’

‘‘मुझे याद है, उन दिनों पापा के घुटनों में दर्द था,’’ निशि ने सफाई देनी चाही.

‘‘सब बकवास है. टैलीफोन करने में घुटनों में दर्द होता है? उस के 2 रोज बाद तुम्हारे मामा ससुर की मृत्यु हुई थी. वहां 6 घंटे का सफर कर के श्रीगंगानगर अफसोस प्रकट करने गए थे, तब उन के घुटनों में दर्द नहीं हुआ? तब ये तुम्हारे फूफाजी भी जीवित थे. क्या उन का मेरी मां की मृत्यु पर अफसोस करना नहीं बनता था? तब वे कहां गए थे? तुम्हारे मम्मीपापा ने उन को बताया ही नहीं होगा, नहीं तो वे तुम्हारी तरह, तुम्हारे मम्मीपापा की तरह असभ्य नहीं हैं. मैं उन को तुम्हारे पापा की शादी के पहले से जानता हूं.

‘‘और जिन मौसियों के लिए तुम इस प्रकार के असभ्य शब्दों का प्रयोग कर रही हो उन्होंने भी तुम्हारे लिए बहुत कुछ किया है. वह सब तुम भूल गईं? याद करो, तुम्हारी पंजाबी बाग वाली मौसी और मौसा, जिन को आज तुम नमस्ते करना भी गंवारा नहीं समझतीं, तुम्हारे ब्याह की सारी मार्केटिंग उन्होंने ही करवाई. घर पर बुला कर न केवल तुम्हें बल्कि तुम्हारे ससुराल वालों को खाना खिलाया, शगुन भी दिए. न केवल इस मौसी ने बल्कि सभी मौसियों ने ऐसा ही किया. उन के बहूबेटों को किस ने खाना खिलाया अथवा शगुन दिए? तुम्हारी बेटी होने पर पंजाबी बाग वाली मौसी ने 9-9 किलो की देसी घी की पंजीरी अपने पल्ले से बना कर दी. तुम इतनी जल्दी भूल गईं. एहसानफरामोश कहीं की…अपने पापा की तरह.’’

‘‘आप को मेरे और मेरे पापा के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करने का कोई अधिकार नहीं है.’’

‘‘और तुम्हें ‘धेले की अक्ल नहीं है’ कहने का अधिकार है? मैं बताता हूं, तुम्हारे पापा एहसानफरामोश कैसे हैं. तुम्हें याद होगा, तुम्हारे पापा के दिल का औपरेशन हो रहा था. नए वाल्व पड़ने थे.’’

‘‘जी, याद है.’’

‘‘औपरेशन के लिए 9 यूनिट खून चाहिए था. वह पूरा नहीं हो रहा था. तुम्हारे इसी पंजाबी बाग वाले मौसा ने और मैं ने अपना खून दे कर उस कमी को पूरा किया था. याद आया?’’

‘‘जी.’’

‘‘आज तक अनेक विसंगतियां होने के बावजूद हम मूक रहे तो केवल इसलिए कि हम खूनदान जैसे पवित्र कार्य को लज्जित नहीं करना चाहते थे. लेकिन तुम्हारे और तुम्हारे पापा के खराब व्यवहार ने हमें मजबूर कर दिया. यह नहीं है कि तुम्हारी मम्मी इस तरह के व्यवहार से अछूती हैं. जानेअनजाने में वे भी तुम्हारे पापा संग खड़ी हैं. न खड़ी हों तो मार खाएं, क्यों? यह तुम बड़ी अच्छी तरह से जानती हो.’’

निशि ने मेरी बातों का कोई उत्तर नहीं दिया. शायद उस के पास कोई उत्तर था ही नहीं. परंतु मैं प्रहार करने से नहीं चूका, ‘‘अरे छोड़ो, तुम्हारे पापा को हमारे दुख से दुख तो क्या हमारी खुशी से भी कोई खुशी नहीं थी. तुम्हें याद होगा, हमारी 25वीं मैरिज ऐनीवर्सरी में तुम किस प्रकार अंतिम क्षणों में पहुंचीं. तुम्हारे पापा फिर भी न आए जबकि तुम्हें पता है, तुम्हारे पापा को स्वयं मैं ने कितने प्यार और सम्मान से बुलाया था.

‘‘तुम्हारी मम्मी ने न आने के लिए कितना घटिया बहाना बनाया था, शायद तुम्हें याद न हो? वहां चोरियां हो रही हैं, इसलिए वे नहीं आए. क्या तुम अपने समारोहों में इस प्रकार के बहाने स्वीकार कर लेतीं? सत्य बात तो यह है, वे हमारी खुशी में कभी शामिल ही नहीं होना चाहते थे. कभी हुए भी तो मन से नहीं. यह तुम भी जानती हो और हम भी. यह बात अलग है, तुम इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार न कर सको.

‘‘और मेरे बेटे सोमू की शादी में क्या हुआ? मौसा की मिलनी थी. बड़े मौसा होने के नाते मिलनी का अधिकार तुम्हारे पापा को था. कुछ समय पहले वे वहीं खड़े थे. हम ने आवाजें भी दीं परंतु वे जानबूझ कर वहां से खिसक गए. मिलनी तुम्हारे पंजाबी बाग वाले मौसा को करनी पड़ी. और उन की शराफत देखो, यह नहीं कि जो पैसे और कंबल मिला अपने पास रख लें बल्कि उस सब को तुम्हारे मम्मीपापा को दे दिया क्योंकि यह उन्हीं का अधिकार समझा गया. तुम्हारी शादी में मेरे साथ क्या हुआ? मिलनी के लिए 4 बार पगड़ी पहनाई गई, 4 बार उतारी गई और मिलनी फिर भी न करवाई गई. हम ने तो मिलनी करवाने के लिए नहीं कहा था. इस प्रकार बेइज्जत करने का अधिकार तुम्हारे मम्मीपापा को किस ने दिया?  इस प्रश्न का उत्तर है तुम्हारे मायके वालों के पास?

‘‘कालांत में सोचा था, तुम सब इस योग्य ही नहीं जिन से किसी प्रकार का संबंध रखा जाए, लेकिन तुम्हारे पापा तो अपनी हरकतों से बाज नहीं आए. क्या तुम अथवा तुम्हारी मम्मी इस के प्रति नहीं जानतीं? जानती हैं परंतु इसे दूसरों के समक्ष स्वीकार नहीं करना चाहतीं.

‘‘उसी शादी में तुम्हारे पापा ने कहा था कि मैं ने खाना ही नहीं खाया. जब वीडियो रील बन कर आई तो उस में प्लेट भर कर खाना खाते देखा गया. अपने पापा की इस हरकत को तुम किस संज्ञा का नाम दोगी? यह नहीं है कि तुम्हें, तुम्हारी मम्मी और तुम्हारे भाई को इस के प्रति पता नहीं है. बस, उक्त कारणों से तुम सब स्पष्ट स्वीकार नहीं कर पाते.’’

निशि ने फिर भी मेरी बातों का कोई उत्तर नहीं दिया या मुझे यह समझना चाहिए कि वह मेरे समक्ष निरुत्तर हो गई है परंतु मेरी बात अभी समाप्त नहीं हुई थी, ‘‘तुम्हारे भाई ने कार ली, हम सब ने बधाई दी. हमारे बच्चों ने भी कारें लीं, हमें किस ने बधाई दी? यह तीखा प्रश्न आज भी मेरे समक्ष मुंहबाए खड़ा है.

‘‘पिछले दिनों मैं और सरला अमृतसर में थे, तुम्हारे नानानानी के पास. तभी तुम्हारी मम्मी का टैलीफोन आया था कि कार लेने की इन को बधाई दे दो और कहना कि वे ब्यास गए हुए थे इसलिए बधाई देने में देर हो गई. बधाई दे दी गई. सभी तो चुप रहे पर तुम्हारी मामी बोली थीं कि जब कभी निशा दीदी यानी तुम्हारी मम्मी उन के सामने होगी तो वे पूछेंगी कि उन के भाई ने जाने कैसेकैसे अपना घर बनाया, उस को बधाई किस ने दी? मैं जानता हूं, उस समय इस प्रश्न का उत्तर न तुम्हारी मम्मी के पास होगा और न तुम्हारे पापा के पास. मुझे आश्चर्य नहीं होगा, उस समय इस प्रश्न से बचने के लिए तुम्हारे पापा जानबूझ कर कहीं खिसक जाएं जैसा वे अकसर करते हैं.

‘‘मामू के गृहप्रवेश में तुम्हारे भाई के जाने तक बात नहीं बनती थी बल्कि तुम्हारे मम्मीपापा का टैलीफोन पर बधाई देना भी बनता था. पूछना, बधाई दी थी? क्या औरों से ऐसी आशा करना मूर्खता नहीं है जो वे स्वयं नहीं कर सकते?

‘‘तुम्हें याद होगा निशि, अपने पापा की एक और बेमानी हरकत का? एक मौसी की बेटी की शादी में वे नहीं आए थे. जब तुम्हारी शादी हुई, सब के समझाने पर तुम्हारी वह मौसी न केवल स्वयं उपस्थित हुईं बल्कि अपने परिवार को ले कर आईं, यह सोच कर कि यदि एक व्यक्ति गलत है तो उसे खुद को गलत नहीं होना है. जानती हो…तुम भी तो वहीं थीं, प्रसंग उठने पर किस प्रकार तुम्हारे पापा ने उन की बेइज्जती करने में एक क्षण भी नहीं लगाया था, ‘हम ने कौन सा बुलाया है.’ उस समय मेरे मन में बड़े तीखे रूप से आया था कि तुम सब ऐसे हो ही नहीं जिन से किसी प्रकार का संबंध रखा जाए.

‘‘तुम्हें अफसोस होगा कि कल तुम्हारी मैरिज ऐनीवर्सरी थी और मौसियों ने तुम्हें बधाई नहीं दी. तुम मौसियों को ‘धेले की अक्ल नहीं है’ कहती हो और तुम्हारा भाई उन के राज खोलने की बात करता है. क्या तुम समझती हो ऐसी स्थिति में तुम से, तुम्हारे भाई से, तुम्हारे मम्मीपापा से किसी प्रकार के संबंध रखे जा सकते हैं? बल्कि यह कहने की आवश्यकता है कि हमें माफ करो, भविष्य में तुम्हें हमारे दुखसुख से कुछ लेनादेना नहीं है और न ही हमें. मुझे एक कहावत स्मरण हो रही है कि सांप के बच्चे सपोलिए.’’

मैं मूक हो गया था. शायद मेरे पास और कुछ कहने को शेष नहीं था. निशि भी मूक थी. उस का मुंह खुला का खुला रह गया था. अपने मायके वालों के ऐक्सपोज हो जाने से वह अवाक् थी. निशि के सासससुर भी मूक और भावशून्य बैठे थे. शायद वे भी अपनी बहू की बदतमीजी और बदजबानी के प्रति जानते थे. मुझे नहीं लगता है कि निकट भविष्य में कोई इन टूटते रिश्तों को बचा पाएगा.

कहीं मेला कहीं अकेला

पूनम अहमद

‘‘यह रिश्ता मुझे हर तरह से ठीक लग रहा है. बस अब तनु आ जाए तो इसे ही फाइनल करेंगे,’’ गिरीश ने अपनी पत्नी सुधा से कहा.

‘‘पहले तनु हां तो करे, परेशान कर रखा है उस ने, अच्छेभले रिश्ते में कमी निकाल देती है…संयुक्त परिवार सुन कर ही भड़क जाती है. अब की बार मैं उस की बिलकुल नहीं सुनूंगी और फिर यह रिश्ता उस की शर्तों पर खरा ही तो उतर रहा है. पता नहीं अचानक क्या जिद चढ़ी है कि बड़े परिवार में विवाह नहीं करेगी, क्या हो गया है इन लड़कियों को,’’ सुधा ने कहा.

‘‘तुम्हें तो पता ही है न, यह सब उस की बैस्ट फ्रैंड रिया का कियाधरा है… ऐसी कहां थी हमारी बेटी पर आजकल के बच्चों पर तो दोस्तों का प्रभाव इतना ज्यादा रहता है कि पूछो मत,’’ गिरीशजी बोले.

दोनों पतिपत्नी चिंतित और गंभीर मुद्रा में बातें कर ही रहे थे कि तनु औफिस से

आ गई. मातापिता का गंभीर चेहरा देख चौंकी, फिर हंसते हुए बोली, ‘‘फिर कोई रिश्ता आ गया क्या?’’

उस के कहने के ढंग पर दोनों को हंसी आ गई. पल भर में माहौल हलकाफुलका हो गया. तीनों ने साथ बैठ कर चाय पी. फिर गिरीश का इशारा पा कर सुधा ने कहा, ‘‘इस रिश्ते में कोई कमी नहीं लग रही है, यहीं लखनऊ में ही लड़के के मातापिता अपने बड़े बेटेबहू के साथ रहते हैं. छोटा बेटा मुंबई में ही कार्यरत है, वह दवा की कंपनी में प्रोडक्ट मैनेजर है.’’

तनु पल भर सोच कर मुसकराती हुई बोली, ‘‘अच्छा, वहां अकेला रहता है?’’

‘‘हां.’’

‘‘फिर यह तो ठीक है. बस, उस के मातापिता बारबार मुंबई न पहुंच जाएं.’’

‘‘क्या बकवास करती हो तनु,’’ सुधा को गुस्सा आ गया, ‘‘उन का बेटा है, क्या वे वहां नहीं जा सकते? कैसी हो गई हो तुम? ये सब क्या सीख लिया है? हम आज भी तरसते हैं कोई बड़ा हमारे सिर पर होता तो कितना अच्छा होता पर सब का साथ सालों पहले छूट गया और एक तुम हो… क्या ससुराल में बस पति से मतलब होता है? बाकी रिश्ते भी होते हैं, उन की भी एक मिठास होती है.’’

‘‘नहीं मां, मुझे घबराहट होती है, रिया बता रही थी…’’

सुधा गुस्से में  खड़ी हो गईं, ‘‘मुझे उस लड़की की कोई बात नहीं सुननी… उस लड़की ने हमारी अच्छीभली बेटी का दिमाग खराब कर दिया है…हमारे परिवार में हम 3 ही हैं. थोड़े दिन पहले तुम जौइंट फैमिली में हर रिश्ते का आनंद उठाना चाहती थी पर इस रिया ने अपनी नैगेटिव बातों से तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया है.’’

तनु को भी गुस्सा आ गया. वह भी पैर पटकती हुई अपने रूम में चली गई.

गिरीश और सुधा सिर पकड़े बैठे रह गए.

तनु की बैस्ट फ्रैंड रिया का विवाह 6 महीने पहले ही दिल्ली में हुआ था. उस की ससुराल में सासससुर और पति अनुज थे, समृद्ध परिवार था. रिया भी अच्छी जौब में थी. तनु से ही रिया के हालचाल मिलते रहते थे. दिन भर दोनों व्हाट्सऐप पर चैट करती थीं. अकसर छुट्टी वाले दिन दोनों की बातें सुधा के कानों में पड़ती थीं तो वे मन ही मन बेचैन हो उठती थीं. उन्होंने अंदाजा लगा लिया था कि रिया सासससुर की, यहां तक कि अनुज की भी कमियां निकाल कर तनु को किस्से सुनाती रहती है. वह तनु की बैस्ट फ्रैंड थी,  जिस के खिलाफ एक शब्द भी सुनना तनु को मंजूर नहीं था. तनु को हर बात सुधा से भी शेयर करने की आदत थी इसलिए वह कई बातें उन्हें खुद ही बताती रहती थी.

कभी तनु कहती, ‘‘आज रिया का मूड खराब है मम्मी, उसे अनुज ने मौर्निंग वाक के लिए उठा दिया, उसे सोना था, बेचारी अपनी मरजी से सो भी नहीं सकती.’’

एक दिन तनु ने बताया, ‘‘रिया की सास हैल्थ पर बहुत ध्यान देती हैं… उसे वही बोरिंग टिफिन खाना पड़ता है.’’

सुधा ने पूछा, ‘‘उस की सास ही टिफिन बनाती हैं?’’

‘‘हां, रिया औफिस जाती है तो वे ही घर का सारा काम देखती हैं. उन के यहां कुक है पर उस की सास अपनी निगरानी में ही सब खाना तैयार करवाती हैं.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है. रिया को खुश होना चाहिए, इस में शिकायत की क्या बात है?’’

क्या खुश होगी बेचारी, उसे वह टिफिन अच्छा नहीं लगता. वह किसी और को खिला देती है. अपने लिए कुछ मनचाहा और्डर करती है बेचारी.

‘‘इस में बेचारी की क्या बात है? उस की सास हैल्दी खाना बनवा कर क्या गलत कर रही है?’’

तनु को गुस्सा आ गया, ‘‘आप उस की परेशानी क्यों नहीं समझतीं?’’

‘‘यह कोई परेशानी नहीं है. बेकार के किस्से सुना कर तुम्हारा टाइम और दिमाग दोनों खराब करती है वह लड़की.’’

2 दिन तो तनु चुप रही, फिर आदतन तीसरे दिन ही शुरू हो गई, ‘‘रिया के सारे रिश्तेदार दिल्ली में ही रहते हैं. कभी किसी के यहां कोई फंक्शन होता है, तो कभी किसी के यहां. पता नहीं  कितने तो रिश्ते के देवर, ननदें हैं, जो छुट्टी वाले दिन टाइमपास के प्रोग्राम बनाते रहते हैं. रिया थक जाती है बेचारी.’’

सुधा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. रिया की बातें सुनसुन कर थक गई थीं. तनु की सोच बिलकुल बदल गई थी. अच्छीखासी स्नेहमयी मानसिकता की जगह नकारात्मकता ने ले ली थी.

कुछ दिन बाद तनु के उसी रिश्ते की बात को आगे बढ़ाया गया. तनु और रजत मिले. दोनों ने एकदूसरे को पसंद किया. सब कुछ सहर्ष तय कर दिया गया. रजत मुंबई में अकेला रह रहा था, इसलिए उस के मातापिता गौतम और राधा को उस के विवाह की जल्दी थी. विवाह अच्छी तरह से संपन्न हो गया था.

रिया भी अनुज के साथ आई थी. वह तनु से कह रही थी, ‘‘तुम्हारी तो मौज हो गई तनु. सब से दूर अकेले पति के साथ रहोगी. काश, मुझे भी यही लाइफ मिलती पर वहां तो मेला ही लगा रहता है.’’

इस बात को सुन कर सुधा को गुस्सा आया था. सब रस्में संपन्न होने के बाद 1 हफ्ते बाद तनु और रजत मुंबई जाने की तैयारी कर रहे थे. तनु के औफिस की ब्रांच मुंबई में भी थी. उस की योग्यता को देखते हुए उस का ट्रांसफर मुंबई ब्रांच में कर दिया गया. रजत के भाई विजय, भाभी रेखा और 3 साल का भतीजा यश और स्नेह लुटाते सासससुर सब के साथ तनु का समय बहुत अच्छा बीता था.

बीचबीच में  रिया भी निर्देश देती रहती थी, ‘‘मुंबई आने के लिए कहने की फौर्मैलिटी में मत पड़ना, नहीं तो वहां सब डट जाएंगे आ कर.’’ भरपूर स्नेह और आशीर्वाद के साथ दोनों परिवार उन्हें एअरपोर्ट तक छोड़ने आए.

तनु ने मुंबई पहुंच कर रजत के साथ नया जीवन शुरू किया. रजत के साथ ने उस का जीवन खुशियों से भर दिया. दोनों सुबह निकलते रात को आते. वीकैंड में ही दोनों को थोड़ी राहत रहती. सुबह लताबाई आ कर घर का सारा काम कर जाती. तनु फटाफट किचन का काम देखते हुए तैयार होती. 2 जनों का काम ज्यादा नहीं था पर रात को लौट कर किचन में घुसना अखर जाता.

रजत ने कई बार कहा भी था, ‘‘डिनर के लिए भी किसी बाई को रख लेते हैं.’’

‘‘पर हमारा कोई आने का टाइम तय नहीं है न और फिर घर की चाबी देना भी सेफ नहीं रहेगा.’’

‘‘चलो, ठीक है, मिल कर कुछ कर लिया करेंगे.’’ तनु की रिया से अब भी लगातार चैट चलती रहती थी. रिया उस के आजाद जीवन पर आंहें भरती थी. 5 महीने बीत रहे थे. रजत को 1 हफ्ते की ट्रैनिंग के लिए सिंगापुर भेजा जा रहा था. उस ने कहा, ‘‘अकेली कैसे रहोगी? लखनऊ से मातापिताजी को बुला लेते हैं…वैसे भी अभी तक घर से कोई नहीं आया.’’

‘‘नहीं, अकेली कहां, रिया का बहुत मन कर रहा है आने का, वह आ जाएगी… मातापिताजी को तुम्हारे लौटने के बाद बुला लेंगे,’’ तनु ने अपनी तरफ से बात टालने की कोशिश की तो रजत मान गया.

तनु ने मौका मिलते ही रिया को फोन किया, ‘‘अपना प्रोग्राम पक्का रखना, कोई बहाना नहीं.’’

‘‘अरे, पक्का है. मैं पहुंच जाऊंगी. मुझे भी इस भीड़ से छुट्टी मिलेगी. तेरे पास शांति से रहूंगी 1 हफ्ता.’’

जिस दिन रजत गया, उसी दिन शाम तक रिया भी मुंबई पहुंच गई. दोनों सहेलियां गले मिलते हुए चहक उठी थीं. बातें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं. देर रात तक रिया के किस्से चलते रहे. सासससुर की बातें, देवरननदों में हंसीमजाक के किस्से, रिश्तेदारों के फंक्शनों के किस्से.

अगले दिन तनु ने छुट्टी ले ली थी. दोनों खूब घूमीं, मूवी देखी, शौपिंग की, रात को ही घर वापस आईं.

रिया ने कहा, ‘‘हाय, ऐसा लग रहा है दूसरी दुनिया में आ गई हूं. तेरे घर में कितनी शांति है तनु, दिल खुश हो गया यहां आ कर.’’

तनु मुसकरा दी, ‘‘अब थक गई हैं, सोती हैं. कल औफिस जाऊंगी, शाम को जल्दी आ जाऊंगी. सुबह मेड आ कर सब काम कर देगी, अपने टिफिन के साथ तेरा खाना भी बना कर रख दूंगी, आराम से उठना कल.’’

अगले दिन सब काम कर के तनु औफिस चली गई. बारह बजे रिया का फोन आया, ‘‘तनु, क्या बताऊं, मजा आ गया अभी सो कर उठी हूं, कितनी शांति है तेरे घर में, कोई आवाज नहीं, कोई शोर नहीं.’’

थोड़ी देर बातें कर रिया ने फोन काट दिया. तनु सुधा को भी रिया के आने का प्रोगाम बता चुकी थी. सुधा ने कहा था, ‘‘कितने अच्छे लोग हैं, बहू को आराम से 1 हफ्ते के लिए फ्रैंड से मिलने भेज रखा है, फिर भी रिया कद्र नहीं करती उन का.’’

रिया ने आराम से फ्रैश हो कर खाना खाया, टीवी देखा, फिर सो गई. शाम को तनु आई तो दोनों ने चाय पीते हुए ढेरों बातें कीं. रिया की बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं.

अचानक रिया ने कहा, ‘‘तू भी तो बता कुछ…कुछ किस्से सुना.’’

‘‘बस, किस की बात बताऊं, हम दोनों ही तो हैं यहां, सुबह जा कर रात को आते हैं, पूरा हफ्ता ऐसे ही भागतेदौड़ते बीत जाता है, वीकैंड पर ही आराम मिलता है. घर में तो कोई बात करने के लिए भी नहीं होता.’’

‘‘हां कितनी शांति है यहां. वहां तो घर में घुसते ही सासूमां चाय, नाश्ता, खाने की पूछताछ करने लगी हैं. मैं तो थक गई हूं वहां. आए दिन कुछ न कुछ चलता रहता है.’’

तनु आज अपने ही मनोभावों पर चौंकी. उस ने दिल में एक उदासी सी महसूस की. उस ने रिया की बातें सुनते हुए डिनर तैयार किया, बीचबीच में रिया के पति और उस के सासससुर फोन पर बातें करते रहे थे.

दोनों जब सोने लेटीं तो दोनों के मन में अलगअलग तरह के भाव उत्पन्न हो रहे थे. रिया सोच रही थी वाह, क्या बढि़या लाइफ जी रही है तनु. घर में कितनी शांति है, न कोई शोरआवाज, न किसी की दखलंदाजी कि क्या खाना है, कहां जाना है, अपनी मरजी से कुछ भी करो. वाह, क्या लाइफ है. उधर तनु सोच रही थी रिया इतने दिनों से ससुराल का रोना रो रही है कि काश, वह अकेली रह पाती पर मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि अकेले रहने में क्या सुख है? यहां तो हम दोनों के अलावा सुबह बस बाई दिखती है जो मशीन की तरह काम कर के चली जाती है. हमारी चिंता करने वाला तो कोई भी नहीं यहां. मायके में भी हम 3 ही थे, कितना शौक था मुझे संयुक्त परिवार की बहू बन कर हर रिश्ते का आनंद उठाने का. यहां हर वीकैंड में किसी मौल में या कोई मूवी देख कर छुट्टी बिता लेते हैं. घर आते हैं तो थके हुए. कोई भी अपना नहीं दिखता. इस अकेले संसार में ऐसा क्या सुख है, जिस के लिए रिया तरसती रहती है. ऐसे अकेलेपन का क्या फायदा जहां न देवर की हंसीठिठोली हो न ननद की छेड़खानी और न सासससुर की डांट और उन का स्नेह भरा संरक्षण.

दोनों सहेलियां एकदूसरे के जीवन के बारे में सोच रही थीं. पर तनु मन ही मन फैसला कर चुकी थी कि वह कल सुबह ही लखनऊ फोन कर ससुराल से किसी न किसी को आने के लिए जरूर कहेगी. उसे भी जीवन में हर रिश्ते की मिठास को महसूस करना है. अचानक उस की नजर रिया की नजरों से मिली तो दोनों हंस दीं.

रिया ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही थी?’’

‘‘तुम्हारे बारे में और तुम?’’

‘‘तुम्हारे बारे में,’’ और फिर दोनों हंस पड़ीं, पर तनु की हंसी में जो रहस्यभरी खनक थी वह रिया की समझ से परे थी.

अज्ञातवास: भाग 1

सोशल मीडिया की यदि बहुत सी बुराइयां हम गिना सकते हैं तो फायदे भी इस के कम नहीं. राधा ने मुझे जब फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी तो मैं ने उसे एक्सैप्ट कर लिया. वह मेरे पीहर के शहर की थी तो अपनेआप अपनत्व आ जाना स्वाभाविक है. कहते हैं न, पीहर का कुत्ता भी प्यारा होता है. इस उम्र में भी पीहर का मोह नहीं छूटता.

राधा सरकारी अफसर से रिटायर हुई है. उस में पढ़नेलिखने की बहुत रुचि थी. मैं भी थोड़ीबहुत पत्रपत्रिकाओं में लिख लेती हूं. चांस की बात है, उसे मेरी कहानियां पसंद आईं. वह मेरी फैन हो गई. मैं ने कहा, ‘‘तुम मुंबई कैसे पहुंच गईं.’’ ‘‘रिटायरमैंट के बाद बेटा मुंबई में नौकरी करता है तो मैं उस के साथ ही रहती हूं.’’ फिर इधरउधर की गप हम अकसर करने लगे. ‘‘तुम लोग भी ग्वालियर में रहे हो न,’’ मैं ने पूछा.

‘‘हां, थाटीपुर में रहे हैं.’’

‘‘हम भी वहीं रहते थे. फिर तो तुम अर्चना को जानती होगी.’’

‘‘अर्चना को तो मैं जानती हूं क्योंकि वह हमारे पड़ोस में ही रहती थी पर वह मेरे से सीनियर थी, सो बात नहीं होती थी.’’

‘‘अर्चना मेरी खास सहेली थी. हम साथसाथ पढ़ते थे. तुम्हारे पास उसका नंबर है?’’

‘‘नहीं, उस से मेरा कौन्टैक्ट नहीं है. परंतु उन के रिश्तेदार से मेरा कौन्टैक्ट है. आप कहें तो मैं उस से नंबर ले कर दे दूं.’’

अर्चना से मिले 60 साल हो गए थे. शादी के बाद कभी नहीं मिली. उस के बारे में भी मुझे कोई खबर नहीं थी. उस के नंबर देते ही मैं ने अर्चना से कौन्टैक्ट किया.

‘‘मैं नीरा बोल रही हूं.’’

‘‘कौन सी नीरा?’’

‘‘यार अर्चना, हम नागपुर और ग्वालियर में साथसाथ पढ़े हैं. याद आया, हम ने 1960 में 10वीं का एग्जाम भी साथसाथ दिया.’’

‘‘अरे नीरा, तुम… इतने साल बाद,

60 साल हो गए तुम से मिले. आज फोन किया? मेरा फोन नंबर कहां से मिला? मुझे तो बहुत आश्चर्य हो रहा है. आज यह क्या सरप्राइज है. तुम ऐसे कैसे प्रकट हो गईं?’’

‘‘मेरी तो छोड़, अर्चना तुम्हें खोजने की मैं ने बहुत कोशिश की पर तुम कहीं नहीं मिलीं. तुम तो जैसे अंर्तधान हो गईं. तुम अभी कहां हो?’’

‘‘मेरी छोड़ो नीरा, अपनी बताओ कहां व कैसी हो? बच्चे सैटल हो गए?’’

‘‘मेरा तो सब ठीक है. 77 साल की उम्र है. इस उम्र में जैसे होते हैं, वैसी ही हूं. मैं तो राजस्थान में हूं. तुम अपनी कहानी सुनाओ? तुम्हारे बारे में जानने के लिए मैं बहुत उत्सुक हूं. तुम कहां गायब हो गईं?’’

‘‘मेरी कहानी सुन कर नीरा तुम बहुत दुखी होगी. क्या सुनाऊं, अपनी गलती बताऊं, दूसरों का धोखा बताऊं, समय का खेल कहूं? तुम तो जानती हो कि बचपन में ही मेरे मांबाप गुजर गए थे पर मैं हमेशा खुश रहती थी. हमेशा हंसती रहती थी. नीरा, अभी भी मैं हमेशा हंसती रहती हूं.’’

‘‘मैं तो अर्चना तुम्हें जानती हूं. तुम तो बड़ीबड़ी बातों को भी हंस कर टाल देती थीं. ठहाके मार कर हंसना तो कोई तुम से ही सीखे. इस के बावजूद तुम्हारे साथ क्या हुआ जो तुम अज्ञातवास में चली गईं? मैं ने तुम्हारे बारे में जानने की बहुत कोशिश की, पर सब व्यर्थ गया.’’

‘‘तुम्हें मेरा नंबर कैसे मिला?’’

‘‘यह कमाल सोशल मीडिया का है. पहले तो राधा ने तुम्हारे रिश्तेदार से नंबर मांगा तो उन्होंने नहीं दिया, फिर पता नहीं क्या सोच कर दे दिया. खैर, तुम मुझे अपनी कहानी सुनाओ.’’

‘‘सुनाती हूं बाबा, मैं ने आज तक अपनी कहानी किसी को नहीं सुनाई पर तुम्हें जरूर सुनाऊंगी. मुझे भी अपना मन हलका करना है. इस समय नहीं. रात को 8 बजे डिनर के बाद. तुम तो फ्री होगी न उस समय?’’

‘‘मैं तो हमेशा फ्री हूं. मैं तो अकेली रहती हूं. इसीलिए तुझे कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है. बिना किसी रोकटोक के तुम अपनी कहानी और सच्ची कहानी सुना देना क्योंकि 60 साल मैं ने बहुत सब्र किया पर तुम्हारे बारे में कुछ भी पता न चला. आज रात सो नहीं पाए तो कोई बात नहीं. आज तो तुम्हारी कहानी सुननी ही है. मैं बड़ी उत्सुकता से रात के 8 बजे का इंतजार करूंगी. बाय, बाय.’’

रात को जल्दी से खाना खा कर मैं अर्चना के फोन का इंतजार कर रही थी. क्या बात हुई होगी? अर्चना ने मन बदल लिया होगा क्या? बड़े पसोपेश में मन जाने कहांकहां भटक गया. एक बार को मुझे लगा कि मुझे उस से उस की कहानी नहीं पूछनी थी. शायद मुझसे बात नहीं करेगी. देखा, तो घड़ी में

9 बज गए. मैं कुछ निराश हो गई. तभी फोन की घंटी बजी. अर्चना का ही फोन था.

‘‘हैलो अर्चना.’’‘‘हैलो नीरा, मैं ने तुम्हें बहुत इंतजार करवाया. मुझे गलत मत समझ  ना. मेरी एक सहेली है यहां पर. उस को कोई परेशानी थी. वह मुझे ही सबकुछ मानती है. सो मैं उस से बात करने लगी और उस की समस्या का समाधान भी कर दिया.’’

‘‘अरे वाह, अर्चना तुम तो दूसरों की समस्या का समाधान भी कर रही हो. बहुत अच्छी बात है.’’

‘‘नीरा, मैं कभी दूसरों के भरोसे थी. अब मैं दूसरों की मदद करती हूं. जब हम सक्षम हैं तो दूसरों की मदद करनी ही चाहिए. तू तो शुक्र मना नीरा, तू इस हालत में मुझसे से मिल रही है. वरना पहले मिलती तो मेरा बहुत बुरा हाल था.’’

‘‘अर्चना, अब यह बात रहने दे मुझे तो अपनी इस अचानक गायब होने की कहानी सुना. अभी तुम कहां हो?’’

‘‘मैं तो अनाथाश्रम में हूं.’’

मैं चौंक गई, ‘‘क्या बक रही है अर्चना? ऐसा क्या हुआ? कैसे हुआ?’’

‘‘मैं सही कह रही हूं नीरा? शायद मेरे जीवन में यही लिखा था.’’

‘‘क्या कह रही है तू? तेरा भाई तो बहुत बड़ा अफसर था.’’

‘‘हां, वे तो मुझे अच्छी तरह रखते थे. मुझसे ही गलती हुई जिस का दंड मैं ने भुगता.’’

‘‘तुझे तो पता था नीरा, मेरे मम्मीपापा बचपन में ही मर गए थे जब मैं तीसरी में पढ़ती थी. यह तो तुम्हारे सामने की बात है. पहले मम्मी गईं, एक साल बाद पापा चले गए. बड़े भैया के साथ ही मैं रही. ग्वालियर से जब तुम लोग भोपाल चले गए, उसी समय भैया का ट्रांसफर हो गया और हम इंदौर आ गए.’’

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वाइट पैंट – जब 3 सहेलियों के बीच प्यार ने दी दस्तक

लेखिका- सरिता पंथी

इस बार जब मायके आई तो घूमते हुए कालेज के आगे से गुजरना हुआ. तभी अनायास ही वह सफेद पैंट पहना हुआ शख्स आंखों के आगे लहरा गया जिस का नाम ही हम लोगों ने वाइट पैंट रखा हुआ था. और सोचते हुए कालेज के दिन चलचित्र जैसे आंखों के आगे नाचने लगे.

बात तब की है जब हम ने कालेज में नयानया ऐडमिशन लिया था. उस जमाने में कालेज जाना ही बहुत बड़ी बात होती थी. हर कोई स्कूल के बाद कालेज तक नहीं पहुंच पाता था. तो हम खुद को बहुत खुशनसीब समझते थे जो कालेज की चौखट तक पहुंचे थे. इंटर कालेज के कठोर अनुशासन के बाद कालेज का खुलापन और रंगबिरंगे परिधान एक अलग ही दुनिया की सैर कराते थे.

हमारे लिए हर दिन नया दिन होता था. कालेज हमें कभी बोर नहीं करता था. हम 3 सहेलियां थीं सरिता, सुमित्रा और सुदेश. हम हमेशा साथसाथ रहती थीं, इसीलिए सभी लोग हमें त्रिमूर्ति भी कहते थे.

हम तीनों अकसर क्लास खत्म होने के बाद खुले मैदान में बैठ कर घंटों गपें लड़ाती थीं. इसी क्रम में हम तीनों ने महसूस किया कि कोई हमारे आसपास खड़ा हो कर हम पर नजर रखता है और इस बात को हम तीनों ने ही नोट किया. हम ने देखा मध्यम कदकाठी का एक लड़का, जो बहुत खूबसूरत नहीं था, उस के गेहुएं रंग में सिल्की बाल अच्छे ही लग रहे थे. शर्ट जैसी भी पहने था. लेकिन पैंट वह हमेशा सफेद ही पहनता था. रोजरोज उसे सफेद पैंट में देखने के कारण हम ने उस का नाम ही वाइट पैंट रख दिया था जिस से हमें उस के बारे में बात करने में आसानी रहती थी.

हमारा काम था क्लास के बाद मैदान में बैठ कर टाइम पास करना और उस का काम एक निश्चित दूरी से हम को देखते रहना. जब यह क्रम काफी दिनों तक चलता रहा तो हमें भी कुतूहल हुआ कि आखिर यह हम तीनों में से किसे पसंद करता है. सो, हम तीनों ने सोचा क्यों न इस बात का पता लगाया जाए. तो इत्तफाक से एक दिन सुदेश नहीं आई लेकिन हम ने देखा कि वाइट पैंट फिर भी हमारे आसपास उपस्थित है. तो इतना तो पक्का हो गया कि सुदेश वह लड़की नहीं है जिस के लिए वह हमारा ग्रुप ताकता है. कुछ समय बाद सुमित्रा उपस्थित न रही. फिर भी उस का हमें ताकना बदस्तूर जारी रहा. अब सुमित्रा भी इस शक के घेरे से बाहर थी. अब रह गई थी एकमात्र मैं और फिर किसी कारणवश मैं ने भी छुट्टी ली तो अगले दिन कालेज जाने पर पता चला कि मेरे न होने पर भी उस का ताकना जारी था.

अब तो हम तीनों को गुस्सा आने लगा. लेकिन कर भी क्या सकते थे. हम कहीं भी जा कर बैठते, उसे अपने आसपास ही पाते. हम ने कई बार अपने बैठने की जगह भी बदली, मगर उसे अपने ग्रुप के आसपास ही पाया. तीनों में मैं थोड़ी साहसी और निडर थी. हम रोज उसे देख कर यही सोचते कि इसे कैसे मजा चखाया जाए. लेकिन हमारे पास कोई आइडिया नहीं था और वैसे भी, इतने महीनों तक न उस ने कुछ बात की और न ही कभी कोई गलत हरकत. इसलिए भी हम कुछ नहीं कर सके. लेकिन उस का हमेशा हमारे ही ग्रुप को ताकना हमें किसी बोझ से कम नहीं लगता था. एक दिन हमारे बैठते ही जब वह भी आ गया तो मैं ने कहा चलो, आज इसे मजा चखाते हैं. तो दोनों बोलीं, ‘कैसे?’

?मैं ने कहा, ‘यह रोज हमारा पीछा करता है न, तो चलो आज हम इस का पीछा करते हैं.’ वे दोनों बोलीं, ‘कैसे?’ मैं ने कहा, ‘तुम दोनों सिर्फ मेरा साथ दो. जैसा मैं कहती हूं, बस, मेरे साथसाथ वैसे ही चलना.’ उन दोनों ने हामी भर दी. फिर हम वहीं बैठे रहे. हम ने देखा लगभग एक घंटे बाद वह लाइब्रेरी की तरफ गया तो मैं ने दोनों से कहा कि चलो अब मेरे साथ इस के पीछे. आज हम इस का पीछा करेंगे और इसे सताएंगे. मेरी बात सुन कर वे दोनों खुश हो गईं. और हम तीनों उस के पीछेपीछे लाइब्रेरी पहुंच गए. जितनी दूरी पर वह खड़ा होता था, लगभग उतनी ही दूरी बना कर हम तीनों खड़े हो गए. जब उस की नजर हम पर पड़ी तो वह हमें देख कर चौंक गया और हलके से मुसकरा कर अपने काम में लग गया.

उस के बाद वह पानी पीने वाटरकूलर के पास गया तो हम भी उस के पीछेपीछे वहीं पहुंच गए. अब तक वह हम से परेशान हो चुका था. फिर वो नीचे आया और मैदान के दूसरे छोर पर बने विज्ञान विभाग की तरफ चल दिया. हम भी उस के पीछेपीछे चल दिए. वह विज्ञान विभाग के अंदर गया और काफी देर तक बाहर नहीं आया. हम बाहर ही मैदान में बैठ कर उस के बाहर आने का इंतजार करने लगे.

लगभग 35 मिनट के बाद वह चोरों की तरह झांकता हुआ बाहर निकला, तो उस ने हम तीनों को उस के इंतजार में बैठे पाया. 10 बजे से इस चूहेबिल्ली के खेल में 2 बज चुके थे. वह हम से भागतेभागते बुरी तरह थक चुका था. वह कालेज से बाहर निकला और ऋषिकेश की तरफ पैदल चलने लगा. हम भी उस के पीछे हो लिए. वह मुड़मुड़ कर हमें देखता और आगे चलता जाता. जब थकहार कर उसे हम किसी भी तरह टलते नहीं दिखे तो आखिर में वह हरिद्वार जाने वाली बस में चढ़ गया और हमारे सामने से हमें टाटा करते हुए मुसकराते हुए निकल गया. हम तीनों अपनी इस जीत पर पेट पकड़ कर हंसती रहीं और फिर उस दिन के बाद कभी दोबारा हम ने वाइट पैंट को अपने आसपास नहीं देखा.

छुटकी नहीं…बड़की : भाग -1

नीरज कुमार मिश्रा

फजल और हिना की शादी को 7 साल हो गए थे, पर उन्हें अभी तक एक भी औलाद नहीं हो सकी थी. लखनऊ के नामीगिरामी डाक्टरों का इलाज करवाया जा चुका था. हजारों रुपए के टैस्ट करवाए गए, पर सब फुजूल…

डाक्टरों ने हिना और फजल दोनों के टैस्ट की रिपोर्ट आने के बाद यही बताया था कि दोनों की जिस्मानी हालत बिलकुल ठीक नहीं है. हालांकि वे दोनों बच्चा पैदा करने में पूरी तरह से काबिल हैं, पर अगर फिर भी बच्चा नहीं हो रहा है तो सही समय का इंतजार करें. फजल के घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी. वह घर में मंझला भाई था. बड़े भाई के 3 बच्चे थे, 2 बेटे और एक बेटी. फजल का एक छोटा भाई हैदर था, जिस का हाल ही में निकाह हुआ था.

फजल की कमाई का जरीया उस की आरा मशीन थी, जो घर से कुछ ही दूरी पर लगी हुई थी. उस पर इतना काम आता कि काम बंद करतेकरते ही रात के 9 भी बज जाते थे. तकरीबन 15 आरा मशीन पर नौकर लगे हुए थे, जो बड़ी ईमानदारी से काम करते थे.

पुराने लखनऊ में तिमंजिला मकान होना अपनेआप में बहुत बड़ी बात थी और चारपहियों की 2 गाडि़यां भी फजल के दरवाजे पर खड़ी रह कर शान बढ़ाती थीं. फजल के पास न तो काम की कमी थी और न ही पैसे की… उस की और हिना की जिंदगी में एक औलाद की कमी जरूर थी और यह कमी फजल को अब और भी खलने लगी, जब छोटे भाई हैदर के निकाह के साल के अंदर ही वह भी एक चांद जैसी बेटी का बाप बन गया.

‘‘जी… शादी के 2 सालों तक औलाद नहीं हुई तो अब हमें औलाद क्या होगी, इसीलिए मैं चाहती हूं कि हम कोई बच्चा गोद ले लें,’’ एक दिन हिना ने कहा. ‘‘तुम भी क्या बेकार की बात करती हो… डाक्टर ने कहा है कि मेरी मर्दानगी में कोई कमी नहीं है और न ही तुम में कोई कमी है और फिर 2 सालों में तुम्हें 2 बार बच्चा ठहर भी तो चुका है…

‘‘अब यह अलग बात है कि तुम उन्हें संभाल नहीं पाई और तुम को 2 महीने पर ही गर्भपात हो गया… हम फिर से कोशिश करेंगे और हमें औलाद जरूर होगी,’’ फजल ने हिना को समझाया.

हिना की बच्चे को गोद लेने वाली बात से शायद फजल के आत्मसम्मान को ठेस लग गई थी, इसीलिए वह हिना पर झल्ला उठा था. हिना उस समय तो फजल की बात का कोई जवाब नहीं दे पाई, पर एक औलाद न होने के गम में वह अंदर ही अंदर घुटने लगी और परेशान रहने लगी.

2 साल का समय और गुजर गया. अब भी हिना मां नहीं बन पाई थी और एक दिन अचानक वह बहुत बीमार पड़ गई. उसे डाक्टरों को दिखाया गया. ‘‘देखिए, इन्हें अंदरूनी कमजोरी है और ब्लड प्रैशर बढ़ा हुआ है… आप लोग इन्हें ज्यादा से ज्यादा खुश रखने की कोशिश कीजिए… इन की बीमारी अपनेआप ठीक हो जाएगी,’’ डाक्टर कह कर चला गया.

फजल को पता था कि हिना खुश क्यों नहीं रह पा रही है. शादी के इतने साल बाद भी वह मां नहीं बन पाई है. परेशान हालत में वह अपनी आरा मशीन पर बैठा हुआ लकडि़यों के एक ठूंठ को देख रहा था.

‘‘सब खैरियत तो है फजल बाबू,’’ आरा मशीन पर काम करने वाले सज्जाद मुंशी ने पूछा.

‘‘अरे कहां सज्जाद भाई… मेरी दिक्कतें तो आप को पता ही हैं… पर, अब हिना ने मां न बन पाने की बात को अपने जेहन की गहराइयों में बिठा लिया है… लिहाजा, बीमार हो कर वह बिस्तर पर पड़ी है…

‘‘हां, एक बार उस ने एक बच्चा गोद लेने की फरमाइश जरूर की थी, पर मैं ने उसे मना कर दिया, क्योंकि मुझे लगता है कि मेरे भाइयों के बच्चे भी तो मेरे बच्चे हैं… तो भला बच्चा गोद लेने की जरूरत है?’’ फजल उसे बता रहा था.

‘‘तो इस में परेशानी क्या है… आप किसी बच्चे को गोद ले सकते हैं,’’ सज्जाद मुंशी ने कहा.

‘‘ऐसे हर किसी राह चलते का बच्चा तो गोद नहीं लिया जा सकता न सज्जाद भाई… कोई ऐसा हो, जिसे हम जानते हों… उस के परिवार को जानते हों… उन के परिवार में कोई ऐब न हो तो ही ठीक है… वरना हम बेऔलाद ही मर जाएं तो बेहतर होगा,’’ फजल ने लंबी सांस भरते हुए कहा.

‘‘ऐसी बात मत कहिए हुजूर… वैसे, अगर आप चाहें तो इस नाचीज का बच्चा गोद ले सकते हैं. अभी मेरी बीवी ने कोई 10 दिन पहले ही एक बेटी को जन्म दिया है. आप तो जानते ही हैं कि मेरे पहले से ही 3 लड़कियां हैं… एक लड़के की चाह में मेरा परिवार बड़ा होता गया…

‘‘अब इतनी महंगाई के दौर में 4 लड़कियों को पालना… मेरे लिए भी मुश्किल होगा शुरुआत से आप बच्ची को साथ रखेंगे, तो वह आप को अब्बू और हिना को अम्मी ही समझेगी,’’ सज्जाद मुंशी ने कहा.

‘‘तुम्हारी बेटी को मैं गोद ले लूं, पर क्या तुम्हारी बीवी इस के लिए राजी हो जाएगी?’’ फजल ने पूछा.

‘‘मेरी अपनी बीवी को तो मैं मना लूंगा… और फिर मेरा बच्चा आप जैसे शरीफ आदमी के घर पलेगा तो इस से बड़ी सुकून देने वाली बात मेरे लिए और क्या होगी… यह हम 2 लोगों की जबान का मामला है… न इस में किसी कोर्ट की जरूरत होगी और न ही किसी कागजी कार्यवाही की…

‘‘मैं कसम खाता हूं कि इस बच्चे को आप को सौंपने के बाद उस पर कभी हक नहीं जताऊंगा,’’ सज्जाद ने कहा.

सज्जाद मुंशी की बातों में फजल को सचाई नजर आ रही थी और उस की बातों से एक नया हौसला भी मिल रहा था.

उसे यों सोच में पड़ा देख सज्जाद मुंशी बोला, ‘‘इतनी भी कोई जल्दी नहीं है… आप घर जा कर अच्छी तरह सोच लेना… घर पर सलाह कर लेना, तब मुझे बताना.’’

घर आ कर फजल ने एक बच्ची को गोद लेने वाली बात हिना से कही.फजल की बातें सुन कर हिना की सूनी आंखों में मानो रोशनी आ गई. वह बिस्तर पर से उठ कर बैठ गई और बोली, ‘‘तो क्या मुझे भी कोई अम्मी कह कर पुकारेगा? मैं भी किसी को गोद में ले सकूंगी,’’ हिना की आंखों से आंसू छलक पड़े थे.

काफी अच्छी तरह सोचविचार करने के बाद फजल सज्जाद मुंशी के घर जा कर उस की दुधमुंही बच्ची को अपने घर ले आया. दुनिया की कोई भी मां अपने दुधमुंहे बच्चे को अपने से अलग नहीं करना चाहती है, पर जब सज्जाद मुंशी ने अपनी बीवी को यह बात समझाई कि उस की बेटी इतने बड़े घर में जाएगी और वे लोग भी तुम्हारी बेटी को कितना लाड़ करेंगे, तब जा कर कहीं हामी भरी थी सज्जाद की बीवी ने.

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Holi Special: अधूरी चाह- भाग 3

अब शालिनी जो पैसे कमाने के चक्कर में नौकरी करने लगी थी, वह अब पति यानी संजय की जमापूंजी खत्म कर रही है. कभी संजय से 50,000 तो कभी एक लाख रुपए लेती, किसी न किसी काम के बहाने. घर के खर्चों और बच्चों के खर्चों की संजय को बिलकुल भी जानकारी नहीं थी, इसलिए जितना वह मांगती संजय दे देता.

इस तरह कई साल बीत गए, लेकिन कोई भी राज कहां तक राज रह सकता है. आखिरकार यह राज भी जगजाहिर हो गया. बात उठी है तो न जाने कितने कानों तक पहुंचेगी. जाहिर सी बात है कि संजय के कानों तक भी तो पहुंचनी ही थी, पहुंच गई.

संजय ने पूछा, तो शालिनी ने साफ इनकार कर दिया, लेकिन संजय को जहां से भी खबर मिली थी, वह खबर पक्की थी.

संजय को यह फिक्र थी कि बच्चे अब बड़े हैं, सम?ादार हैं, हर बात को सम?ाते हैं, उन के सामने वह कोई तमाशा नहीं करना चाहता था. बस, शालिनी को सम?ाता कि वह यह सब छोड़ दे या उसे छोड़ वहीं जा कर बसे, लेकिन शालिनी सच स्वीकार न करती.

इस बात को अब 11 साल बीत गए. शालिनी का वही रूटीन है. संजय अपनी नौकरी और ऐक्स्ट्रा काम में बिजी है, क्योंकि केवल नौकरी से घर का गुजारा नहीं चल रहा था.

शालिनी तकरीबन संजय का पैसा सब खत्म कर चुकी है और संजय ने औफिस से लोन भी लिया हुआ है. शालिनी जान गई कि संजय के साथ कोई भविष्य नहीं. वह संजय को तलाक के कागज थमा कर कहती है कि उसे तलाक चाहिए. संजय उसे तलाक दे देता है. शालिनी अजय से शादी कर लेती है.

शालिनी बच्चों को साथ ले जाती है अजय के घर. संजय अकेला बैठा सोच रहा है कि उस ने कहां क्या गलती की?

हां, याद आता है संजय को वह हर पल जबजब वह शालिनी के साथ हमबिस्तर हुआ, उस ने कभी शालिनी के इमोशन को नहीं सम?ा और जाना, बस केवल अपनी हवस शांत की और सो गया.

शालिनी कहती, ‘मु?ो तुम्हारा तन नहीं मन चाहिए. मु?ो केवल प्यार चाहिए, सैक्स ही जिंदगी की धुरी नहीं, जिंदगी का मतलब तो प्यार है.’’

लेकिन संजय इन बातों पर ध्यान न देता, क्योंकि उसे अपनी जवानी पर नाज था, फख्र था कि उस पर हजारों लड़कियां मरती हैं, यही घमंड उस की रगरग में बस चुका था. उस की नजर में औरत का प्यार कोई माने नहीं रखता, औरत केवल बिस्तर की शोभा ही बन सकती है.

शालिनी, जो जब तक संजय के साथ थी, सच्चे प्यार को तरसती रही, लेकिन उसे वह प्यार अजय श्रीवास्तव ने दिया. वह उस की दीवानी हो गई. कहते हैं कि औरत जब कुरबान करने पर आती है, तो अपनी जान की भी परवाह नहीं करती.

आज शालिनी अपनी जान देना चाहती है, संजय या अजय के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि अब उसे एहसास हो गया कि उस ने कितना गलत कदम उठाया था, लेकिन उसे इस बात का सुकून है कि उसे थोड़े समय के लिए ही सही, अजय से सच्चा प्यार तो मिला था. अब अजय ने बेशक शादी कर ली उस से, लेकिन वह उसे वह खुशी नहीं दे रहा, क्योंकि उस के सिर से शालिनी नाम का भूत उतर चुका है.

वह अब सम?ा चुका है कि शालिनी के पास अब कोई धनदौलत नहीं, वह तो केवल पैसों का भूखा निकला, शालिनी के लिए तो उस का प्यार चंद महीनों में ही खत्म हो गया था. अब उस ने शालिनी को भी पैसेपैसे के लिए मुहताज कर दिया है, बच्चे भी परेशान हैं.

संजय बच्चों को अपने पास लाना चाहता है, मगर बच्चे जानते हैं कि मां परेशान हैं. अब उन्हें छोड़ कर नहीं जा सकते वरना मां डिप्रैशन में न चली जाएं कहीं.

शालिनी अपने किए पर शर्मिंदा है और संजय को अब अपनी गलती का एहसास हो रहा है, लेकिन अब इस समस्या का समाधान नहीं है.

संजय ने कश्मीर छोड़ दिया हमेशा के लिए, करता भी क्या वहां रह कर. सिर पर कर्ज है लोगों का, जो लेले कर शालिनी की ख्वाहिशें पूरी करता रहा और किस तरह शालिनी को अपने सामने गैर के साथ देखता. रातोंरात भाग आया दिल्ली अपने भाइयों के पास. दोनों अपनी गलतियों पर पछता रहे हैं, लेकिन इन सब में बच्चों का भविष्य कहीं सुखद दिखाई नहीं देता.

पश्चात्ताप- भाग 3: सुभाष ध्यान लगाए किसे देख रहा था?

Writer- डा. अनुसूया त्यागी

मैं सांत्वना देने का प्रयास कर रहा हूं, ‘आप का बेटा बिलुकल ठीक हो जाएगा, आप चिंता मत कीजिए,’ बाकी औरतों की आवाज से कैजुअल्टी गूंजने लगती है.

मैं वार्डब्वाय को आवाज दे कर इशारे से कहता हूं कि इन सब औरतों को बाहर निकाल दो, लड़के की मां को छोड़ कर. सब से भी प्रार्थना करता हूं कि आप सब कृपा कर के बाहर चली जाएं और हमें अपना काम करने दें. सभी महिलाएं चुपचाप बाहर निकल जाती हैं. केवल लड़के की मां रह जाती है. मैं उस के बेटे के ठीक होने का विश्वास दिलाता हूं और वह संतुष्ट दिखाई देती है. दूसरे युवक पर मेरा ध्यान जाता है. उस की ओर इशारा कर के मैं पूछता हूं, ‘यह कौन है? यह युवक भी तो आप के बेटे के साथ ही आया है?’

वह औरत चौंकती है दूसरे युवक को देख कर, ‘अरे, यह तो शिरीष का दोस्त है, अनिल, कैसा है बेटा तू?’ वह उठ कर उस के पास पहुंचती है. मैं ने देखा वह दर्द से बेचैन था. मैं डाक्टर विमल को आवाज देता हूं, ‘डाक्टर , प्लीज, इस युवक का जल्दी एक्सरे करवाइए या मुझे निरीक्षण करने दीजिए. इसे चैस्ट पेन हो रहा है. मैं शिरीष की ओर इशारा कर के कहता हूं, ‘आप इसे संभालिए, मैं उसे देख लेता हूं.’ मुझे कोई जवाब मिले, इस से पहले ही सर्जन आ जाते हैं और मुझ से कहते हैं, ‘डाक्टर प्लीज, आप को ऐसे ही हमारे साथ औपरेशन थिएटर तक चलना होगा. आप अगर अंगूठा हटाएंगे अभी, तो फिर काफी खून बहेगा,’ और मैं उन के साथ युवक की ट्राली के साथसाथ औपरेशन थिएटर की ओर चल पड़ता हूं.

जातेजाते मैं देखता हूं कि डाक्टर विमल उस युवक को एक्सरे के लिए रवाना कर रहे हैं. ‘इस की वैट फिल्म (गीली एक्सरे) मंगवा लेना’, मैं जोर दे कर कहता हूं और रवाना हो जाता हूं. आधा घंटा औपरेशन थिएटर में लगा कर लौटता हूं और ज्यों ही कैजुअल्टी के पास पहुंचता हूं, मुझे एक हृदयविदारक चीख सुनाई देती है. मेरे पैरों की गति तेज हो गई है.

मैं दौड़ कर कैजुअल्टी पहुंचता हूं. ‘यह कौन चीख रहा था?’ मैं सिस्टर से पूछा रहा हूं. उस ने बैड की ओर इशारा किया और मैं ने देखा कि डा. विमल अपना स्टेथस्कोप लगा कर उस युवक के दिल की धड़कन सुनने का प्रयास कर रहे हैं, ‘ही इज डैड, डाक्टर, ही इज डैड,’ ओफ, यह क्या हो गया? जिस बात से मैं डर रहा था, वही हुआ. कार्डियक मसाज, इंजैक्शन कोरामिन, इंजैक्शन एड्रीनलीन, कोई भी उसे पुनर्जीवित नहीं कर पा रहा है. डा. विमल इस की वैट फिल्म के लिए कहते हैं, ‘अरे लक्ष्मण, तू एक्सरे नहीं लाया?’

‘जाता हूं साहब, यहां एक मिनट तो फुरसत नहीं मिलती,’ वैट फिल्म आई और जब मैं ने उसे देखा तो मेरे मुंह से एक आह निकल गई. डा. विमल ने पूछा, ‘क्या हुआ डाक्टर?’

हम इसे बचा सकते थे, इसे तो निमोथोरेक्स था. फेफड़े में छेद हो गया था, जिस से बाहरी हवा तेजी से घुस कर उस पर दबाव डाल रही थी और मरीज को सांस लेने में कठिनाई हो रही थी. काश, मैं ने इस का निरीक्षण किया होता. एक मोटी सूई डालने से ही इमरजैंसी टल सकती थी और बाद में फिर एक रबर ट्यूब डाल दी जाती मोटी सी. तो मरीज नहीं मरता.

‘काश, मैं इसे समय पर देख पाता तो यह यों ही नहीं चला गया होता,’ मेरे स्वर में पश्चात्ताप था. पर मैं अब कुछ नहीं कर सकता था. यही अनुताप मेरे मन को और व्यथित कर रहा था. तभी शिरीष की मां आई. वह शायद कुछ भूल गई थी. पूछा, ‘कैसा हैवह शिरीष का दोस्त?’ और मेरा वेदनायुक्त चेहरा तथा मरीज के ऊपर ढकी हुई सफेद चादर अनकही बात को कह रही थी.

‘ओह, यह तो अपनी विधवा मां का अकेला लड़का था. बहुत बुरा हुआ. शिरीष सुनेगा तो पागल हो उठेगा,’ उस की मां कह रही थी. मेरी कैजुअल्टी में एक पल भी ठहरने की इच्छा नहीं हुई. डा. विमल दूसरे डाक्टर को मरीजों के औवर दे रहे थे. हमारी ड्यूटी समाप्त हो चुकी थी, मेरे पैर दरवाजे की ओर बढ़ गए. पर एक घंटे बाद ही मुझे वापस लौटना पड़ा अपना स्टेथस्कोप लेने के लिए. इच्छा तो नहीं थी, पर जाना पड़ा.

अंदर घुसते ही आंखें स्वत: ही उस युवक के बैड की ओर मुड़ गईं. ऐसा ही जड़वत चेहरा, जैसा अर्जुन की मां का है, वही भावशून्य आंखें ले कर एक अधेड़ औरत बैठी थी. उस की अपनी मां, वही दृश्य जो मैं ने 25 वर्षों पहले देखा था. आज उस की पुनरावृत्ति हो रही थी.

कुछ देर पहले मैं उस ड्राइवर के लिए सजा की तजवीज कर रहा था. क्या दंड मिलना चाहिए उसे, यह  सोच रहा था. पर काश, अपने व डा. विमल के लिए भी कोई सजा सोच पाता, सिवा इस पश्चात्ताप की अग्नि में जलने के. मेरा मन हाहाकार कर उठता है. कब मैं निगम बोध घाट पहुंच गया हूं. पता नहीं चला. सामने अर्जुन की चिता जल रही है. धूधू करती लाश, यह तो कुछ देर में बुझ जाएगी, पर क्या मेरे मन की आग बुझ सकेगी कभी?

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