तीन युग – भाग 3 : क्या थी आसिफ की कहानी

तब नईमा बी झूठी मुसकान चेहरे पर सजा लेतीं, ‘‘अरे, मैं खाली बैठ कर क्या करूं, तबीयत घबराने लगती है… कामकाज से दिल बहला रहता है. फिर दुलहन के अभी अरमानों भरे दिन हैं, बाद में तो उसे ही अपना घरबार संभालना है.’’ लेकिन बुढ़ापा और गम दोनों ही नईमा बी को भीतर ही भीतर घुन की तरह चाटते गए. कोई अपना नहीं था, जिस से वह अपना दुखदर्द कहतीं.

तसल्ली के दो बोल बोलने वाला कोई नहीं था. नजमा जब तक यहां रही, मां का दुख हलका करने की कोशिश करती रही, पर जल्दी ही वह अपने पति के पास दुबई चली गई. आखिरकार अंदर ही अंदर गम सहते हुए नईमा बी बिस्तर पर पड़ गईं. शुरूशुरू में दिखावे को आसिफ ने मां का इलाज करवाया, पर उन के दिल के जख्मों को कोई न भर सका. वे सुबह से ही कुछ उदास सी थीं.

बच्चे स्कूल जा चुके थे. घर में सन्नाटा था. आसिफ तैयार हो कर दुकान पर जा रहा था, तभी दालान में पड़ी नईमा बी बोलीं, ‘‘बेटा, इस दवा से भी कोई फायदा नहीं हुआ. डाक्टर से कहना, कोई अच्छी दवा लिख दे…’’ ‘‘कहां तक बूढ़ी जान पर पैसा खर्च करेंगे आप? अरे, आज मरे, कल दूसरा दिन… यह हिसाब होता है बूढ़ों का. मेरी मानिए, दवादारू का चक्कर छोडि़ए. आखिर हमें भी तो अपने बच्चों के लिए सोचना है… उन की जिंदगी बनानी है…’’ नईमा बी की बात काटते हुए बहू आगे बढ़ आई थी और आसिफ बिना कोई जवाब दिए बाहर निकल गया.

इस तरह उन का इलाज भी उस दिन से बंद हो गया. मौत के इंतजार में वे टूटी खाट पर पड़ी पलपल गिना करतीं. दो रोटी सुबह और दो शाम को मिल जाती, पेट का दोजख भरने को. दूसरी किसी चीज की जरूरत भी कहां रह गई थी भला उसे. कूड़े की तरह कोने में पड़ी रहतीं नईमा बी. एक नईमा बी खुद, दूसरे शौहर, तीसरा बेटा… जिंदगी का कल, आज और कल. बचपन, जवानी और बुढ़ापा तीनों युगों ने ठगा था उन्हें. अचानक मुंडेर पर बैठा कौआ जोर से कांवकांव करने लगा. नईमा बी टूटी खाट पर पड़ी गुजरे जमाने की उलझी डोर को बीच में ही छोड़ कर गीली आंखों को पोंछने लगीं. फिर आसमान की तरफ देखते हुए वे सोचने लगीं, ‘शायद जिंदगी इसी को कहते हैं.’

तीन युग – भाग 2 : क्या थी आसिफ की कहानी

‘‘भई, अब तो नईमा अप्पी भी परवीन बाजी की तरह खूब चमचमाती साडि़यां पहना करेंगी. झुमके, झाले और पता नहीं क्याक्या, इन की बराबरी भला कहां कर पाएंगे हम लोग…’’ नईमा बनावटी ठंडी सांस भर फिर से गोटा टांकने लगी. ‘‘अप्पी, हम से मिलने रोज आना दूल्हा भाई के साथ,’’ छोटी नाजिया की बात पर सब बहनें हंस पड़ीं. ‘‘परवीन बाजी तो रोज आती हैं अपने दूल्हा के साथ… तुम क्यों नहीं आओगी?’’ नाजिया बेचारी खिसिया कर बोली.

‘‘आऊंगी नाजो, मैं भी आया करूंगी रोज,’’ गालों पर शर्म की लाली बिखेरती नईमा ने जवाब दिया. उस की आंखों में परवीन का चेहरा चमक गया, ‘वाकई परवीन की तरह मैं भी खूब सजधज कर मायके आया करूंगी, बल्कि उस से भी ज्यादा.’ परवीन नईमा के पड़ोस में रहती थी. दोनों बचपन की सहेलियां थीं. परवीन के घर काफी पैसा था. उस के बाप की कपड़े की दुकान थी. परवीन का घर भी शानदार था. पैसे की रेलपेल थी, सो छोटी सी उम्र में उस के लिए अच्छेअच्छे पैगाम आने लगे थे. पढ़ाई के बीच ही उस की शादी भी हो गई. वह तीसरेचौथे रोज सजधज कर अपने पति के साथ गाड़ी में मायके आती थी. ‘मैं भी उन के साथ खूब घूमा करूंगी,’

नईमा हर समय खोई रहती थी. पर सपने कभी सच नहीं होते. इस बात का एहसास नईमा को शादी के चंद दिनों बाद ही होने लगा था. नईमा के पति की बिजली के सामान की छोटी सी दुकान थी, जिस में वह दिनरात खटता रहता. उस से 2 छोटे भाई थे. एक मोटर का काम सीख रहा था, दूसरा पढ़ने जाता था. बाप अपने जमाने के बेहतरीन कारीगर थे, पर अब नजर बेकार हो जाने के चलते कुछ नहीं करते थे. इस तरह सारे घर की जिममेदारी जाकिर मियां पर थी, जिस से वह अकसर परेशान और चिढ़चिढ़ा रहता था. एक सास थी, जिन की जबान दिनभर चलती रहती थी और निशाना बेचारी नईमा बनती. उन की मिलने वाली कोईर् न कोई रोज आ जाती और बूढ़ी सास तेरीमेरी बहूबेटियों के बहाने नईमा को सौ बातें सुनाती रहतीं. इन्हीं तानों की मार के डर से बेचारी नईमा कई कई महीनों तक मायके जाने का नाम न लेती. सुबह से रात तक बावर्चीखाने में जुटी रहती.

पर तारीफ के दो बोल तक उस की झोली में न आते. मायके की याद आती, भाईबहन, मांबाप सब याद आते, लेकिन सास की जहरीली बातें याद कर वह कांप जाती कि पता नहीं कब उन पर या उन के मायके वालों पर भी कोई इलजाम लग जाए. कभीकभी जाकिर मियां ही जब मूड में होते तो 1-2 दिन के लिए बीवी को मायके छोड़ आते. पर बुढि़या जल्दी ही किसी न किसी बहाने से बुलवा लेती. सारा घर जो चौपट हो जाता था. रात तक नईमा थकहार कर आंखें बंद करती तो दिल किसी नन्हे बच्चे की तरह मचल उठता, ‘‘कहां हैं वे सुनहरे सुख, जिन के सपने देखे थे?’’

ऐसे में परवीन का हंसता हुआ चेहरा उस के सामने आ जाता. परवीन तो खूबसूरत भी नहीं थी, पढ़ाई भी अधूरी थी. फिर कैसे जिंदगी की सारी खुशियां उस की झोली मे उतर आई थीं, सौगात बन कर. दूसरी ओर खुद उन में क्या कमी थी, जो दुखों के सिवा उस के दामन में कुछ भी नहीं था. मोतियों की लड़ी टूट कर उस की आंखों से बिखरने लगती,

‘‘आखिर मेरी जिंदगी में ही अरमानों का खून क्यों लिखा है?’’ वह खुद से सवाल कर बैठती. वक्त का पहिया अपनी रफ्तार से चलता रहा. नईमा के आंगन के 2 फूल आसिफ और नजमा अब जवान हो चुके थे. सासससुर गुजर चुके थे. दोनों देवर अपने कदम जमा कर घरगृहस्थी चला रहे थे. जाकिर मियां की दिनरात की मेहनत रंग लाई थी.

उन की छोटी सी बिजली की दुकान काफी बड़ी बन चुकी थी. कई आदमी उन के पास नौकरी करते थे. जाकिर मियां की शुमार पैसे वालों में होने लगी थी. लेकिन वह तहेदिल से नईमा की मेहनत और कुरबानी के कायल थे. नईमा खुद भी अब नमकीन चेहरे वाली सलोनी न रह गई थी. अपनी जवानी उन्होंने पति और बच्चों पर कुरबान कर दी थी, शायद इस उम्मीद के सहारे कि यह कुरबानी कभी बेकार नहीं जाएगी. सारी जिंदगी खूनपसीना बहा कर जो पूंजी उन्होंने जमा की है, वह अनमोल है. कभीकभी नईमा सोचती कि चलो, तमाम जिंदगी कड़ी धूप में झुलसने के बाद अब वह बेटे के सहारे ठंडी छाया में जिंदगी के बचे दिन गुजार देगी. काफी पैसा आ जाने के बाद भी नईमा ने उसी तरह गुजरबसर कर घर में अपनी हैसियत ऊंची की थी. दहेज दे कर बड़े चाव से अपनी बेटी नजमा की शादी बड़े घर में की थी.

अपनी नाकाम तमन्नाएं अपनी बेटी के रूप में पूरी की. मुंहमांगा दहेज दे कर बेटी की ससुराल वालों का नईमा ने हमेशा के लिए मुंह बंद कर दिया था, ताकि उस की बेटी पर कभी दुखों का साया भी न पड़े. नजमा की शादी कर उस ने सुख की सांस लेनी चाही, पर सुख हमेशा की तरह दूर थे, उस की पहुंच से. जाकिर मियां अचानक बीमार पड़ गए. ऐसे पलंग से लगे कि जल्दी ही दुनिया छोड़ दी. गम का पहाड़ नईमा पर आ गिरा. पर जल्दी ही खुद को संभाला.

बाप का साया सिर पर से उठने के बाद कहीं आसिफ गलत राहों पर न चल दे, इसलिए अपने गमों को भुला कर उस ने बेटे के लिए लड़की की तलाश करना शुरू कर दिया. लोगों ने उस की ऊंची हैसियत के मुताबिक बड़ेबड़े घरों के एक से बढ़ कर एक लड़कियों के रिश्ते बताए.

लेकिन नईमा को अपने बीते दिन याद थे. उस ने अच्छी से अच्छी बड़े घर की लड़कियों को ठुकरा कर गरीब घर की लड़की अपनाई. ब्याह कर घर लाते ही अपनी कुल जमापूंजी उस की झोली में डालते हुए कहा, ‘‘दुलहन, यह सबकुछ आज से तुम्हारा है.’’ पर शायद नईमा बी की जिंदगी में सुख था ही नहीं, बहू ने जो पैसे की चमक देखी तो अपनी औकात ही भूल गई. चंद दिनों में ही आसिफ को ऐसी पट्टी पढ़ाई कि मां की सूरत देखना भी भूल गया. बेचारी नईमा बी सारा दिन बावर्चीखाने में घुटती रहती, पर बेटा पलट कर न पूछता कि मां तुम क्यों काम कर रही हो? पड़ोस की औरतें कहतीं, ‘अरे खाला, अब तो बहू ले आई हो, कुछ तो बुढ़ापे में आराम कर लो.’

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