दलितों की बदहाली

सुप्रीम कोर्ट भी किस तरह दलितों को जलील करता है इस के उदाहरण उस के फैसलों में मिल जाएंगे. देशभर में दलितों को बारबार एहसास दिलाया जाता है कि संविधान में उन्हें बहुत सी छूट दी हैं पर यह कृपा है और उस के लिए उन्हें हर समय नाक रगड़ते रहनी पड़ेगी. महाराष्ट्र म्यूनिसिपल टाउनशिप ऐक्ट में यह हुक्म दिया गया है कि अगर दलित या पिछड़ा चुनाव लड़ेगा तो उस को अपनी जाति का सर्टिफिकेट नौमिनेशन के समय या चुने जाने के 6 महीने में देना होगा.

यह अपनेआप में उसी तरह का कानून है जैसा एक जमाने में दलितों को घंटी बांध कर घूमने के लिए बना था ताकि वे ऊंची जातियों को दूर से बता सकें कि वे आ रहे हैं. यह वैसा ही है जैसा केरल की नीची जाति की नाडार औरतों के लिए था कि वे अपने स्तन ढक नहीं सकतीं ताकि पता चल सके कि वे दलित अछूत हैं. दोनों मामलों में इन लोगों से जी भर के काम लिया जा सकता था पर दूरदूर रख कर.

ये भी पढ़ें- न करें सेना का इस्तेमाल

कानून यह भी कहता है कि हर समय अपना जाति प्रमाणपत्र रखो. क्यों? ब्राह्मणों को तो हर समय या कभी भी अपना जाति सर्टिफिकेट नहीं चाहिए होता तो पिछड़े दलित ही क्यों लगाएं? क्यों वे कलेक्टर, तहसीलदार से अपना सर्टिफिकेट बनवाएं? उन्होंने किसी आरक्षित सीट के लिए कह दिया कि वे पिछड़े या दलित हैं तो मान लिया जाए. आज 150 साल की अंगरेजी पढ़ाई, बराबरी के नारों के बावजूद भी क्यों जाति का सवाल उठ रहा है? क्या पढ़ेलिखे विद्वानों के लिए 150 साल का समय कम था कि वे जाति का सवाल ही नहीं मिटा सकते थे? जब हम मुगलों और ब्रिटिशों के राज से छुटकारा पा सकते थे तो क्या दलित पिछड़े के तमगों से नहीं निकल सकते थे?

यहां तो उलट हो रहा है. शंकर देवरे पाटिल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उस कानून को सही ठहराया है जिस ने यह जबरन कानून थोप रखा है कि आरक्षित सीट पर खड़े होना है तो सर्टिफिकेट लाओ. यह अपमानजनक है. यह दलितों, पिछड़ों को एहसास दिलाने के लिए है कि वे निचले, गंदे, पैरों की धूल हैं. यह बराबरी के सिद्धांत के खिलाफ है.

ये भी पढ़ें- जनता का समय

दलितों और पिछड़ों को जो भी छूट मिले उन्हें बिना किसी प्रमाणपत्र लटकाए मिलनी चाहिए. अगर ऊंची जाति का कोई उस का गलत फायदा उठाए तो उस के लिए सजा हो, दलित पिछड़े के लिए नहीं. वैसे भी ऊंची जाति का कोई दलित पिछड़े को दोस्त तक नहीं बनाता, वह उन की जगह कैसे लेगा? ऊंची जातियों का आतंक इतना है कि नीची जाति वाले तो हर समय चेहरे पर ही वैसे ही अपने सर्टिफिकेट गले में लटकाए फिरते हैं. नरेंद्र मोदी कहते रहें कि हिंदू आतंकवादी नहीं हैं पर लठैतों के सहारे दलितों और पिछड़ों पर जो हिंदू आतंक 150 साल में नई हवा के बावजूद भी बंद नहीं हुआ, वह सुप्रीम कोर्ट की भी मोहर इसी आतंकवाद की वजह से पा जाता है.

गरीबी बनी एजेंडा

राहुल गांधी का नया चुनावी शिगूफा कि यदि वे जीते तो देश के सब से गरीब 20 फीसदी लोगों को 72,000 रुपए साल यानी 6,000 रुपए प्रति माह हर घर को दिए जाएंगे, कहने को तो नारा ही है पर कम से कम यह राम मंदिर से तो ज्यादा अच्छा है. भारतीय जनता पार्टी का राम मंदिर का नारा देश की जनता को, कट्टर हिंदू जनता को भी क्या देता? सिर्फ यही साबित करता न कि मुसलमानों की देश में कोई जगह नहीं है. इस से हिंदू को क्या मिलेगा?

लोगों को अपने घर चलाने के लिए धर्म का झुनझुना नहीं चाहिए चाहे यह सही हो कि पिछले 5,000 सालों में अरबों लोगों को सिर्फ और सिर्फ धर्म की खातिर मौत की नींद सुलाया गया हो. लोगों को तो अपने पेट भरने के लिए पैसे चाहिए.

यह कहना कि सरकार इस तरह का पैसा जमा नहीं कर सकती, अभी तक साबित नहीं हुआ है. 6,000 रुपए महीने की सहायता देना सरकार के लिए मुश्किल नहीं है. अगर सरकार अपने सरकारी मुलाजिमों पर लाखों करोड़ रुपए खर्च कर सकती है, उस के मुकाबले यह रकम तो कुछ भी नहीं है. यह कहना कि इस तरह का वादा हवाहवाई है तो गलत है, पर सवाल दूसरा है.

सवाल है कि देश की 20 फीसदी जनता को इतनी कम आमदनी पर जीना ही क्यों पड़ रहा है? इस में जितने नेता जिम्मेदार उस से ज्यादा वह जाति प्रथा जिम्मेदार है जिस की वजह से देश की एक बड़ी आबादी को पैदा होते ही समझा दिया जाता है कि उस का तो जन्म ही नाली में कीड़े की तरह से रहने के लिए हुआ है. उन लोगों के पास न घर है, न खेती की जमीन, न हुनर, न पढ़ाई, न सामाजिक रुतबा. वे तो सिर्फ ऊंची जातियों के लिए इतने में काम करने को मजबूर हैं कि जिंदा रह सकें.

देश का ढांचा ही ऐसा है कि इन गरीबों की न आवाज है, न इन के नेता हैं जो इन की बात सुना सकें. उन को समझाने वाला कोई नहीं. गनीमत बस यही है कि 1947 के बाद बने संविधान में इन्हें जानवर नहीं माना गया.

1947 से पहले तो ये जानवर से भी बदतर थे. अमेरिका के गोरे मालिक अपने नीग्रो काले गुलामों की ज्यादा देखभाल करते थे, क्योंकि वे उन के लिए काम करते थे और बीमार हो जाएं या मर जाएं तो मालिक को नुकसान होता था. हमारे ये गरीब तो किसी के नहीं हैं, खेतों के बीच बनी पगडंडी हैं जिस की कोई सफाई नहीं करता. हर कोई इस्तेमाल कर के भूल जाता है.

इन को 72,000 रुपए सालाना दिया जा सकता है. कैसे दिया जाएगा, पैसा कहां से आएगा यह पूछा जाएगा, पर कम से कम इन की बात तो होगी. ऊंची जातियों के लिए यह झकझोरने वाली बात है कि 25 करोड़ लोग ऐसे हैं जो आज इस से भी कम में जी रहे हैं. क्यों, यह सवाल तो उठा है. असली राष्ट्रवाद यही है, मंदिर की रक्षा नहीं.

मोदी जी की सेना कहने पर सैनिक हुए खफा

चुनावी माहौल के बीच देश में जिस तरह से फर्जी देशभक्ति का रंग भरा गया है उस से भारतीय जनता पार्टी कठघरे में आ गई है. हाल ही में पुलवामा कांड के बाद की गई तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक से देश में जिस तरह से सेना के कामों को भुनाया गया है वह गंभीर चिंता की बात है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो कई कदम आगे निकल गए. गाजियाबाद में की गई एक चुनावी रैली में उन्होंने भारतीय सेना को ‘मोदी जी की सेना’ बता दिया था. तब उन्होंने कहा था कि ‘कांग्रेस के लोग आतंकवादियों को बिरयानी खिलाते हैं और ‘मोदीजी की सेना’ उन्हें सिर्फ गोली और गोला देती है. यह अंतर है.’

इस कथन पर बवाल मच गया. विरोधियों की तो छोड़िए खुद भाजपाई और कभी सेना जुड़े रहे जनरल वीके सिंह ने इस कथन पर एतराज किया. उन्होंने कहा कि ‘अगर कोई कहता है कि भारत की सेना ‘मोदी जी की सेना’ है तो वह गलत ही नहीं है देशद्रोही भी है.’

चुनाव आयोग ने भी योगी आदित्यनाथ को चेतावनी देने के अंदाज में कहा कि योगी आदित्यनाथ को सेना से जुड़े संदर्भों का राजनीतिक उद्देश्यों हेतु प्रयोग न करने और भविष्य में सचेत रहने की सलाह दी जाती है.

योगी आदित्यनाथ के इस बयान पर सैनिक भी नाराज दिखे. वे भाजपा द्वारा सेना के नाम पर वोट मांगने को किसी भी नजरिए से सही नहीं ठहरा रहे थे.

इस सिलसिले में सेना के वरिष्ठ लोगों जैसे जनरल एसएफ रोड्रिग्स, जनरल शंकर रॉय चौधरी और जनरल दीपक कपूर ने 11 अप्रैल 2019 को भारत के राष्ट्रपति और सेना के सर्वोच्च कमांडर राम नाथ कोविंद को एक चिट्ठी लिखी जिस में उन्होंने सेना को चुनाव के प्रचार में इस्तेमाल किए जाने पर आपत्ति जताई.

उन्होंने अपनी सेना को शांति के समय या युद्ध के दौर में दी गई सेवाओं का जिक्र किया और सेना के धर्मनिरपेक्ष होने का हवाला देते हुए कहा कि सेना का हर सैनिक, चाहे वह युद्धभूमि में हो या न हो, अपने फर्ज के प्रति ईमानदार होता है और भारत के संविधान को सर्वोच्च मानते हुए बिना किसी पक्षपात के अपने सीनियर के आदेश का पालन करता है. यही वजह है कि भारत के राष्ट्रपति को सेना का अध्यक्ष बनाया गया है.

आप इस बात से परिचित हैं कि सेना में किसी भी पद पर तैनात कोई भी व्यक्ति, चाहे वह पुरुष हो या महिला, किसी ऐसे विषय पर भी टिप्पणी नहीं करता है जो उस के हितों के कितना भी विपरीत क्यों न हो या हो सकता है.

लेकिन आज हम सब की दुखती रग पर उंगली रखी गई है तो सेना का अध्यक्ष होने के नाते हम आप को अवगत कराना चाहते हैं कि कुछ नेताओं ने सेना के किए गए कामों जैसे बौर्डर पार स्ट्राइक को सरकार की उपलब्धि बताते हुए भारतीय सेना को ‘मोदीजी की सेना’ बता डाला है. कई नेता और कार्यकर्ता तक सेना की वरदी में लोगों के बीच देखे गए हैं. इस के अलावा सेना को राजीतिक पार्टियों के पोस्टरों में भी इस्तेमाल किया गया है खासकर भारतीय वायु सेना के विंग कमांडर अभिनदंन वर्थमान बहुत सी जगह नजर आए.

हमारे कुछ दूसरे सीनियर रिटायर्ड अफसरों ने भी इस सब के खिलाफ एतराज जताया है जिस की हम सराहना करते हैं. भारतीय जल सेना के एक भूतपूर्व चीफ ने भी इस सिलसिले में चुनाव आयोग को अपने विचार लिखे थे.  बाद में एक अधिसूचना भी जारी की गई थी जिस में सेना को ले कर कही गई ऐसी राजनीतिक टिप्पणियों, जिस में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का बयान भी शामिल था, पर सफाई मांगी गई थी. लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि इतना सब होने के बाद भी जमीनी स्तर पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा है.

अभी चुनावी माहौल है लेकिन कई राजनीतिक दल और नेता आचार संहिता का पालन नहीं कर रहे हैं जिस से हमें यह अंदेशा है कि आने वाले दिनों में ऐसी घटनाओं में बढ़ोतरी होती जाएगी.

आप हमारी इस बात से पूरी तरह सहमत होंगे कि भारत के संविधान और देश के राष्ट्रपति के अधीन भारतीय सेना का इस तरह का गलत इस्तेमाल हर वर्दीधारी, चाहे वह पुरुष हो या महिला, की नैतिकता और उस की सेवाओं पर प्रतिकूल असर डालेगा. इस का देश की सुरक्षा और एकता पर भी सीधा असर पड़ सकता है इसलिए हमारा आप से निवेदन है कि आप यह सुनिश्चित करें कि सेना की धर्मनिरपेक्षता और राजनीतिक चरित्र बना रहे.

निवेदन है कि इस के लिए आप वे सब जरूरी कदम उठाएं जिस से सभी राजनीतिक दल अपने एजेंडा को साधने के लिए सेना का किसी भी तरह से इस्तेमाल न करने पाएं.
सेना के इन वरिष्ठ अफसरों ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग के सामने भी इसी चिट्ठी के माध्यम से अपनी बात रखी है.

लेकिन अगले ही दिन भाजपा के खिलाफ राष्ट्रपति को लिखी गई चिट्ठी पर सेना के पूर्व अफसर बंटे
दिखाई दिए. पूर्व आर्मी चीफ एसएफ रोड्रिग्स ने कहा, ‘मैं नहीं जानता कि यह सब क्या है. मैं अपनी पूरी जिंदगी राजनीति से दूर रहा हूं…’

एसएफ रोड्रिग्स का नाम वायरल हो रही चिट्ठी में पहले नंबर पर है. उन्होंने कहा कि यह फेक न्यूज़ का क्लासिक उदाहरण है. राष्ट्रपति भवन के सूत्रों ने भी ऐसी कोई चिट्ठी मिलने से इनकार किया है. वैसे, पूर्व आर्मी चीफ शंकर रौय चौधरी ने चिट्ठी लिखे जाने की बात स्वीकारी है.

अब चिट्ठी पर मचे बवाल से यह सवाल उठता है कि क्या पूर्व आर्मी चीफ किसी के दबाव में तो ऐसा नहीं बोल रहे हैं? अगर ऐसा है तो यह और भी ज्यादा चिंता की बात है.

भाजपा के लिए चुनौती हैं प्रियंका

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने चुनावी प्रचार का शुभारम्भ ‘गंगा यात्रा’ से करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. इस बार का लोकसभा चुनाव सीधे-सीधे कांग्रेस और भाजपा के बीच होने वाला महायुद्ध नजर आ रहा है. प्रयागराज के मनैया घाट से अपनी तीन दिन की ‘गंगा-यात्रा’ का आगाज करके प्रियंका ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं. वही गंगा, काशी में जिसके तट पर खड़े होकर 2014 में नरेन्द्र मोदी ने ललकार लगायी थी – ‘मुझे मां गंगा ने बुलाया है…’ वही गंगा, जिसके घाट पर 56 इंच की छाती ठोंक कर नरेन्द्र मोदी ने उसे प्रदूषण-मुक्त करने की शपथ उठायी थी और आजतक गंगा को प्रदूषण-मुक्त न कर सके, प्रयागराज में उसी गंगा की गोद में बैठ कर काशी तक 140 किलोमीटर का रास्ता बोट से तय करके प्रियंका गांधी वाड्रा ने भाजपा और मोदी की नींद उड़ा दी है. गंगा तट पर खड़े होकर उन्होंने गंगा मय्या में दूध अर्पित करते वक्त कहा – ‘मैं गंगा की बेटी हूं और मां का दर्द बेटी ही समझ सकती है.’ प्रियंका की यह भावनात्मक बात मोदी के दंभ और दावे पर भारी पड़ती है. वहीं गंगा तट पर घने बसे अत्यन्त पिछड़ी जाति के लोगों से सीधा सम्वाद स्थापित करके उन्होंने बसपा नेत्री मायावती का ब्लडप्रेशर भी बढ़ा दिया है. गंगा तट पर बसे केवट और मछुआरों को ही नहीं, बल्कि गैर यादव, गैर कुर्मी और गैर जाटव जातियों को अपने पाले में लाने की कोशिश में प्रियंका मोदी के ‘मन की बात’ सरीखी एकतरफा संवाद के विपरीत लोगों से जिस तरह आमने-सामने बातचीत कर रही हैं, उसके परिणाम कांग्रेस के हित में सिद्ध होंगे, इसमें दोराय नहीं है. गौरतलब है कि अत्यन्त पिछड़ी जातियों की संख्या उत्तर प्रदेश में करीब 34 फीसदी है, जिसमें निषाद, मछुआरा, बिंद, चौहान, धोबी, कुम्हार, केवट आदि शामिल हैं. यह जातियां गंगा के किनारे वाले इलाकों में बहुतायत से बसी हैं और  मिर्जापुर, जौनपुर, इलाहाबाद, लखीमपुर खीरी, फतेहपुर, मुजफ्फरनगर, अंबेडकर नगर, भदोही, बनारस जैसी सीटों पर इनका खासा प्रभाव है. इस तबके को जहां भाजपा की ’सवर्ण-मानसिकता’ अपने निकट भी फटकने नहीं देती, वहीं बसपा के सत्ता में रहने पर भी इस तबके को कभी कोई खास फायदा नहीं मिला है. प्रियंका की नजर उत्तर प्रदेश के मछुआरों और निषादों पर खासतौर पर है, जो पिछले चुनावों में भाजपा को वोट करते रहे हैं. पूरे सूबे में इन जातियों की आबादी करीब 12 फीसदी है. दरअसल, गोरखपुर उपचुनाव के परिणामों के बाद निषाद सूबे में एक बड़ी ताकत बनकर उभरे थे. निषादों को अपने पाले में बनाये रखने के लिए भाजपा भी जीतोड़ मेहनत कर रही है. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तो निषादराज की भव्य प्रतिमा बनवाने का ऐलान कर चुकी है. निषादों को साथ लाने के लिए प्रियंका ने संगम के पास छतनाग से ‘गंगा यात्रा’ शुरू करने के बजाय मनैया के घाट को चुना क्योंकि मनैया निषादों द्वारा बसाया गया गांव है. कहना गलत न होगा कि प्रियंका की ‘गंगा यात्रा’ के निहितार्थ गहरे हैं, होमवर्क पूरा है और शायद यही वजह है कि किसी भी गठबंधन से दूर कांग्रेस ने पूरे देश में अपने दम पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है.

घिर गये हैं चौकीदार

खुद को देश का चौकीदार घोषित करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जनता से संवाद के वक्त बॉडीलैंग्वेज जहां अहंकार, कठोरता, कटुता, व्यंग्य, अतिश्योक्तियों और लड़ने-मरने जैसे भाव प्रदर्शित करती है, वहीं उससे बिल्कुल उलट प्रियंका के भाषणों में जमीन से जुड़ी, किसानों-मजदूरों की परेशानियों से जुड़ी, युवाओं के रोजगार से जुड़ी इमोशनल बातें लोगों को ज्यादा प्रभावित कर रही हैं. प्रियंका के वाक्यों पर गौर करें – ‘देश संकट में है, इसलिए मुझे घर से निकलना पड़ा… मैं काफी वर्षों से घर में थी, लेकिन अब देश संकट में है… आज किसानों को फसलों का सही दाम नहीं मिल रहा है… पिछले पांच साल में देश में बेरोजगारी बढ़ी है…’ इन वाक्यों से आमजन खुद का ज्यादा जुड़ा हुआ पाता है. और सबसे बड़ा और तीखा हमला तो प्रियंका ने मोदी पर यह कह कर किया है कि – ‘चौकीदार तो अमीरों के होते हैं….’. ऐसा कह कर प्रियंका ने मोदी को उन्हीं के नारे ‘मैं भी चौकीदार’ में घेर दिया है. मोदी सिर्फ अपने खास और अमीर उद्योगपति अडानी-अम्बानी के चौकीदार हैं, प्रियंका के कथन में छिपी इस बात को समझना जनता के लिए मुश्किल नहीं है.

संभ्रांत और सेक्युलर छवि

भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी संगठन अक्सर प्रियंका को ईसाई बता कर उन पर निशाना साधते रहे हैं, लेकिन संगम तट पर लेटे हुए हनुमान जी के दर्शन और पूजा-अर्चना के बाद ‘गंगा-यात्रा’ की शुरुआत करके उन्होंने साफ कर दिया है कि उनकी रगों में हिन्दू का खून भी है. प्रियंका ने उसी जगह पर पूजा की, जहां कभी उनकी दादी इंदिरा गांधी ने पूजा की थी. ऐसा करके जहां उन्होंने इंदिरा की यादों को लोगों के दिलों में ताजा किया, वहीं उन्हें हिन्दू विरोधी कहने वालों के मुंह पर भी ताला जड़ दिया है. रोजी-रोटी के सवालों से जूझ रही और देश में शान्ति-अमन की चाह रखने वाली जनता प्रियंका की इस सेक्युलर छवि से काफी प्रभावित है और इसका फायदा चुनाव में कांग्रेस को मिलेगा, इसमें कोई शक नहीं है.

वहीं, अब तक जो मुसलमान बसपा, सपा और भाजपा के बीच बंट गया था, वह भी अब कांग्रेस के पक्ष में एकजुट होता नजर आ रहा है. बीते पांच सालों में मोदी-राज में गोरक्षा और लवजिहाद के नाम पर जो कत्लेआम मचा उससे अल्पसंख्यकों में डर का माहौल है, ऐसे में प्रियंका की सेक्युलर छवि उन्हें आकर्षित कर रही है. इसमें दोराय नहीं है कि इस बार मुसलमान कांग्रेस के पक्ष में एकजुट होगा. वहीं अति पिछड़ी जातियों से सीधा संवाद स्थापित करके प्रियंका ने सपा और बसपा के दिल में भी धुकधुकी पैदा कर दी है.

मेरठ में जिस तरह प्रियंका भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद को देखने अस्पताल पहुंचीं, उससे बसपा नेत्री मायावती की झुंझलाहट बढ़ गयी है. भीम आर्मी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे मजबूत है. यहां के लोग मायावती से बड़ा नेता युवा और जोश से लबालब चंद्रशेखर को मानते हैं, जो लम्बे समय से मजदूरों के हक में आवाज बुलंद कर रहे हैं. दलित समुदाय के युवा खुद को चंद्रशेखर से जुड़ा महसूस करते हैं. ऐसे में प्रियंका का उनसे मिलना एक सीधा सियासी गणित है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एससी वोटों पर अच्छी पकड़ रखने वाले चंद्रशेखर आजाद के साथ गठबंधन कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित होगा.

ठीक वक्त पर एंट्री

नजरें लक्ष्य पर, सौम्य-सधी आवाज और बातचीत में एकदम अपनों जैसा प्यार… इन विशेषताओं के साथ प्रियंका गांधी वाड्रा अन्तत: चुनाव मैदान में हैं. सालों से पर्दे के पीछे रह कर काम करने वाली प्रियंका को राजनीति में प्रत्यक्ष उतारने की मांग बहुत लम्बे समय से होती रही है, मगर निजी कारणों का हवाला देकर इतने सालों तक उन्हें इससे अलग रखा गया. एक तो उनके बच्चे छोटे थे और दूसरा उनके भाई राहुल गांधी का करियर डांवाडोल था. अब ऐसे वक्त में प्रियंका की एंट्री हुई है, जब बच्चे भी समझदार हो गये हैं और राहुल गांधी भी ‘पप्पू’ वाली छवि तोड़ कर बतौर पार्टी-अध्यक्ष कांग्रेस की झोली में तीन राज्यों की सरकारें डालने में कामयाब रहे हैं. अब सदन के भीतर-बाहर राहुल धाराप्रवाह भाषण करते हैं. उनके अचानक अटैक और प्यार की झप्पी से तो प्रधानमंत्री मोदी तक हतप्रभ हो चुके हैं. इसलिए अब ऐसा कहना कि प्रियंका के आने से राहुल का करियर चौपट हो जाएगा, गलत है. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो प्रत्यक्ष राजनीति में प्रियंका की एंट्री से कांग्रेस दोहरी मजबूती के साथ चुनाव मैदान में है. एक और एक ग्यारह की ताकत के साथ राहुल-प्रियंका 2019 की लोकसभा की वैतरणी पार करेंगे.

दो मोर्चों पर मजबूती से खड़ी हैं प्रियंका

प्रियंका गांधी वाड्रा आज देश और परिवार दोनों ही मोर्चों पर मजबूती से खड़ी हैं. गौरतलब है कि उनके राजनीति में उतरने की सुगबुगाहट के साथ ही भाजपा चौकन्नी हो गयी थी. जैसे ही यह ऐलान हुआ कि प्रियंका को कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया जा रहा है, पांच साल तक राबर्ट वाड्रा के अवैध रूप से प्रॉपर्टी खरीद मामले में खामोशी ओढ़े पड़ी जांच एजेंसियों में अचानक हलचल देखी जाने लगी और फिर प्रवर्तन निदेशालय ने राबर्ट वाड्रा को कथित रूप से अवैध सम्पत्ति और मनी लांड्रिग मामले में पूछताछ के लिए ठीक उसी दिन तलब कर लिया, जिस दिन प्रियंका को बतौर कांग्रेस महासचिव अपना पद ग्रहण करना था. आशंका व्यक्त की जा रही थी कि इसके खिलाफ कांग्रेसी हो-हल्ला मचाएंगे, मगर राबर्ट और प्रियंका दोनों ने शालीनता और सहयोग का परिचय दिया और रॉबर्ट वाड्रा पूछताछ का सामना करने के लिए एजेंसी के सामने हाजिर हो गये. चुनावी तैयारियों और रैलियों के अतिव्यस्त कार्यक्रम के बीच प्रियंका अपने पति राबर्ट को पूरा सपोर्ट करती नजर आयीं. कांग्रेस महासचिव की कुर्सी पर बैठने से पहले वे पति को लेकर प्रवर्तन निदेशालय पहुंचीं और फिर वहां से कांग्रेस आॅफिस जाकर उन्होंने कार्यभार संभाला. यही नहीं, जब राबर्ट वाड्रा को पूछताछ के लिए जयपुर तलब किया गया, तब भी प्रियंका लखनऊ में रैली पूरी करने के बाद सीधी जयपुर पहुंचीं. इन बातों से प्रियंका ने साफ कर दिया है कि वह देश और परिवार दोनों ही मोर्चों पर लड़ने के लिए मजबूती से कमर कस के खड़ी हैं और उनके यही तेवर भाजपा खेमे को डरा रहे हैं.

गौरतलब है कि 2014 में जब मोदी सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब राबर्ट वाड्रा को जेल भेजने की बातें खूब करते थे, मगर सत्ता में आने के बाद पांच साल तक वह इस मामले में खामोशी ओढ़े रहे. जैसे ही यह खबर आयी कि प्रियंका गांधी राजनीति में पदार्पण करने वाली हैं, केन्द्र के अधीन जांच एजेंसियां अचानक नींद से जाग पड़ीं. ऐसा क्यों हुआ यह सवाल सबकी जुबां पर है. प्रियंका ने एक लाइन में इस सवाल का जवाब दिया है – ‘सबको पता है, क्या हो रहा है?’ वहीं प्रियंका की तारीफ करते हुए पति रॉबर्ट वाड्रा ने सोशल मीडिया पर लिखा – ‘प्रिय पी, तुम एक सच्ची दोस्त, परफेक्ट वाइफ और मेरे बच्चों के लिए बेस्ट मां साबित हुई हो. आज के दिन दुर्भाग्यपूर्ण राजनीतिक माहौल है, मुझे पता है तुम अपनी जिम्मेदारी को सही से निभाओगी. हम प्रियंका को देश के हवाले करते हैं. भारत की जनता इनका ध्यान रखे.’ राबर्ट के इस इमोशनल मैसेज से प्रियंका तो प्रभावित हुर्इं ही, कांग्रेसी खेमे में इस मैसेज ने संजीवनी का काम किया.

खून में दौड़ती राजनीति

राजनीति प्रियंका के खून में है. लम्बे समय से वह अमेठी और रायबरेली में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की रैलियों के आयोजन का कार्यभार संभालती रही हैं. उनकी कार्यशैली अनूठी है. वे अजनबियों के साथ पलक झपकते ही स्नेहिल सम्बन्ध बना लेती हैं. उनकी खूबसूरती और मोहक मुस्कान सामने वाले को सम्मोहित कर लेती है. अपने राजनीतिक दौरों के दौरान कभी प्रियंका किसी बूढ़ी महिला का हाथ थाम कर बैठ जाती हैं, कभी उनके साथ परांठा-अचार का नाश्ता करती हैं, तो कभी रिक्शे पर अपने बच्चों को घुमाती हैं. उनका यह व्यवहार क्षेत्र के लोगों को उनसे गहरे जोड़ता है. हालांकि वे थोड़ी गुस्सैल स्वभाव की भी हैं. मगर कार्यकर्ताओं का मानना है कि उनका गुस्सा उन लोगों पर ही प्रकट होता है, जो पार्टी का काम ठीक से नहीं करते हैं. ऐसा ही आचरण उनकी दादी इंदिरा गांधी का भी था. दरअसल प्रियंका में लोगों को इंदिरा की ही छवि नजर आती है. खासतौर पर उनकी हेयर स्टाइल और लम्बी नाक. तमाम समानताओं के साथ एक समानता यह भी है कि प्रियंका गांधी का करियर भी इंदिरा गांधी की तरह ही शुरू हुआ है. प्रियंका की तरह इंदिरा भी शुरू से ही स्मार्ट थीं, लेकिन उन्हें राजनीति से दूर रखा गया था. जवाहर लाल नेहरू ने कभी उन्हें अपनी उत्तराधिकारी के रूप में नहीं देखा. ये अलग बात थी कि राजनीति उन्हें विरासत में मिली थी. शुरू में गूंगी गुड़िया के रूप में मशहूर इंदिरा के राजनीतिक तेवर पिता की मृत्यु के बाद राजनीति में पदार्पण के साथ देश-दुनिया ने देखे. वैसे ही तेवर प्रियंका के हैं. महज 16 साल की उम्र में, प्रियंका गांधी ने अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया था. तब से वह कई राजनीतिक जुलूसों, रैलियों और सम्मेलनों में हिस्सा लेती रही हैं.

अपनी बात मनवाने में माहिर हैं प्रियंका

रायबरेली के पुराने लोग प्रियंका में हमेशा इंदिरा को देखते हैं. इंदिरा की तरह वे भी सीधी और भावुक बातें करके लोगों को वह करने पर मजबूर कर देती हैं, जो वह चाहती हैं. यह बात तो रायबरेली की पहली ही जनसभा में ही साबित हो गयी थी. वह 1999 का लोकसभा चुनाव था. कांग्रेस ने रायबरेली सीट से कैप्टन सतीश शर्मा को खड़ा किया था. भाजपा ने जवाब में राजीव गांधी के ममेरे भाई अरुण नेहरू को टिकट दिया था. अरुण नेहरू और राजीव गांधी में रिश्ते बिगड़ गये थे. वे कांग्रेस छोड़ भाजपा में आ गये थे. अरुण नेहरू मजबूत नेता थे. वहीं कैप्टन सतीश शर्मा सोनिया परिवार के घरेलू मित्र थे. प्रियंका उन्हें अंकल कहती थीं. कैप्टन रायबरेली से लगभग हारे हुए कैंडिडेट नजर आ रहे थे. उन्होंने प्रियंका से आग्रह किया कि वह उनकी एक चुनावी सभा में आ जाएं. तब प्रियंका सिर्फ 27 साल की थीं. रायबरेली में उनकी पहली जनसभा थी. प्रियंका ने वहां सिर्फ एक लाइन बोली – ‘मेरे पापा के साथ जिसने गद्दारी की. पीठ में छुरा भोंका, ऐसे आदमी को आपने यहां घुसने कैसे दिया? उनकी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई?’ भीड़ ने प्रियंका की डांट सुनी. एक सन्नाटा खिंच गया चारों ओर. प्रियंका को लगा कि कुछ ज्यादा हो गया. उन्होंने बात संभाली और बोलीं – ‘मेरी मां ने ये कह कर भेजा था कि कभी किसी की बुराई मत करना. लेकिन मैं आपसे भी अगर अपने दिल की बात नहीं कहूंगी, तो किससे कहूंगीं.’ और प्रियंका के इस इमोशनल सम्बोधन के बाद पूरा चुनाव ही पलट गया. कैप्टन सतीश शर्मा जीत गये और अरुण नेहरू का राजनीतिक करियर खत्म हो गया. कैप्टन खुद मानते थे कि ये चुनाव उन्हें अकेली प्रियंका की एक मीटिंग ने जिता दिया था.

27 साल की तब की प्रियंका और 47 साल की आज की प्रियंका में कोई ज्यादा फर्क नहीं आया है. वे आज भी उसी तरह इमोशनल बातें करके लोगों का दिल जीत जीतने में उस्ताद हैं, मगर कोई कार्यकर्ता काम से जी चुराये तो डांट-डपट भी करने से नहीं चूकतीं. राजनीति उनके खून में है और मेच्योरिटी लेवल भाई राहुल गांधी से कहीं ज्यादा. यही वजह रही कि इतने साल तक सोनिया ने उन्हें राजनीति से दूर रखा ताकि राहुल ठीक तरह से स्थापित हो सकें.

भय्याजी के नाम से मशहूर हैं प्रियंका

राहुल और सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र अमेठी और रायबरेली में प्रियंका बचपन से ही काफी सक्रिय रही हैं. क्षेत्र के लोग राहुल गांधी के साथ-साथ प्रियंका को भी ‘भय्याजी’ के सम्बोधन से पुकारते हैं. इन दोनों जगहों को प्रियंका अपने घर के रूप में देखती हैं. प्रियंका की खासियत है कि वो लोगों से जल्दी जुड़ जाती हैं. इस बात के गवाह कई लोग हैं कि रायबरेली में प्रियंका गांधी कभी भी अचानक ही बीच सड़क पर रुककर किसी भी कार्यकर्ता को नाम से पुकार लेती थीं और उसका हालचाल लेती थीं. वर्ष 2004 के आम चुनाव में उन्होंने रायबरेली में सोनिया गांधी के लिए अभियान प्रबंधक के रूप में जबरदस्त काम किया था. वहीं अमेठी में भाई राहुल गांधी के अभियान की निगरानी भी उन्होंने की. वर्ष 2004 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत का परचम लहराया तो पार्टी में प्रियंका का कद बढ़ गया. हालांकि वह एक उम्मीदवार के रूप में या प्रचारक के रूप में पार्टी की चुनावी जीत में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं निभाती थीं, लेकिन वह इसके पीछे थीं.

2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में, जब राहुल गांधी अपने राज्यव्यापी अभियान में व्यस्त थे, प्रियंका ने अमेठी-रायबरेली क्षेत्र की दस सीटों पर अपनी ऊर्जा और प्रयास केन्द्रित किया. आम चुनाव 2009 और 2014 में, प्रियंका गांधी ने अमेठी और रायबरेली के निर्वाचन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर प्रचार किया और अपने भाई और मां के लिए जीत हासिल करने में मदद की.

प्रियंका गांधी की छवि और कार्यशैली में उनकी दादी इंदिरा की छाप और असर है. कांग्रेस पार्टी में प्रियंका से बड़ा स्टार प्रचारक कोई नहीं है. अबकी लोकसभा में कांग्रेस की नय्या पार लगाने की पूरी जिम्मेदारी प्रियंका पर है. गांधी परिवार की इस सदस्या के सक्रिय राजनीति में उतरने की राह लोग काफी समय से देख रहे थे. प्रियंका गांधी वाड्रा का लक्ष्य भी हालांकि सत्ता प्राप्त करना है, मगर यह सत्ता वह अपने भाई राहुल गांधी के लिए पाना चाहती हैं. वह लम्बे समय से पार्टी और राहुल के लिए काम कर रही हैं. मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के तमाम राजनीतिक कार्यक्रमों में संयोजक के तौर पर उनकी भूमिका हमेशा प्रभावशाली रही है. उनकी तेजी और स्मरण शक्ति गजब की है. अमेठी और रायबरेली में वह अपने कार्यकर्ताओं को बकायदा नाम से पुकारती हैं. उनकी यह खूबी उन्हें कार्यकर्ताओं से सीधे जोड़ती है. 2019 के चुनाव में उनका उतरना विपक्षी दलों के लिए चिन्ता का विषय है.

भाजपाइयों में उत्साह नदारद

भाजपा का सीधा मुकाबला इस बार कांग्रेस से है, यह बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनका गोदी-मीडिया भलीभांति समझ रहा है. प्रियंका के आने के बाद कांग्रेस पार्टी मजबूती से खड़ी हुई है, इस बात से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी इत्तेफाक रखते हैं. कांग्रेस का सपा और बसपा से गठबंधन न करना यह साफ जाहिर करता है कि प्रियंका की लीडरशिप में अबकी बार पार्टी पूरे कॉन्फिडेंस में है. विरोधी खेमा प्रियंका-प्रलय का आंकलन करने में जुटा है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कुम्भ स्नान के बाद से ही हवा का रुख भांपने में लगे हैं. पुलवामा में सीआरपीएफ के चालीस जवानों की शहादत और पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक कर मोदी-शाह जनता पर ‘भाजपा की देशभक्ति’ का रौब गालिब करने में उस तरह सफल नहीं हो पाये, जैसा कि उनकी सोच थी. उलटे वह कई संगीन और संवेदनशील सवालों के घेरे में आ फंसे हैं. कई जवानों के परिजनों ने यह सवाल उठा दिये हैं कि पुलवामा में एक आतंकी इतना विस्फोटक लेकर पहुंचा कैसे? सुरक्षा में इतनी बड़ी खामी आखिर किसकी गलती से हुई? पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक कर सेना के कारनामे को अपना कारनामा बताने वाली केन्द्र की भाजपा सरकार ने आखिर अब तक पुलवामा हमले की जांच क्यों नहीं करवायी? यह तमाम सवाल चारों ओर से उठ रहे हैं और ऐसे में प्रियंका गांधी वाड्रा का अनेक शहीद जवानों के परिजनों से जाकर मिलना और उनसे संवाद स्थापित करना मोदी-शाह की मुश्किलें बढ़ा रहा है.

अबकी बार भाजपा कार्यकर्ताओं में भी जोश 2014 के मुकाबले जरा कम ही नजर आ रहा है. संघ के भीतर से भी कई बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर अलग-अलग मत सामने आ चुके हैं. 2014 में जहां भाजपा के दिग्गज नेताओं ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को स्वीकारा था और संघ की पूरी ताकत उनके पीछे थी, वहीं अबकी बार यह ताकत कुछ कम दिख रही है. ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ या ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ जैसा कोई प्रभावी नारा भी अभी तक जनता के कानों में नहीं पड़ा है. ‘मैं भी चौकीदार’ मुहिम भी टांय-टांय फिस्स ही दिख रही है. प्रधानमंत्री मोदी की इस मुहिम में शामिल होकर जब पंकजा मुंडा ने ट्वीट किया – ‘मैं भी चौकीदार’ तो इस पर उनको मिला एक मजेदार जवाब – ‘चिक्की कौन खाया?’

पार्टी कार्यकर्ताओं में ही नहीं, बल्कि भाजपा के धुरंधर नेताओं में भी इस बार जोश नदारद है. राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, उमा भारती, शाहनवाज हुसैन, मुख्तार अब्बास नकवी, अरुण जेटली जैसे कई दिग्गज भाजपाई खामोशी ओढ़े बैठे हैं, तो वहीं पुराने भाजपाई कलराज मिश्र, सैयद शाहनवाज हुसैन अपने टिकट कटने से नाराज दिख रहे हैं. ऐसे में चुनाव प्रचार उस गर्मजोशी से परवान चढ़ेगा, जैसा कि 2014 में था, ऐसा लगता नहीं है.

किसके चौकीदार हैं साहेब?

2014 के चायवाले ने 2019 में खुद को चौकीदार घोषित कर दिया है. वजह है लोकसभा चुनाव. पिछली बार तो वह खुद ही चायवाला बना, बाकी सबको बनाने की कोशिश नहीं की, मगर इस बार तो वह न सिर्फ खुद चौकीदार बन गया, बल्कि पूरे देश को चौकीदार बनाने की मुहिम में लग गया है, मगर चौकीदार किसका बनना है, मालिक कौन है, चौकीदारी किस चीज की करनी है, किससे करनी है, यह बातें साफ नहीं बता रहा है.

हरदोई के बसरी गांव का किसान मुछई कह रहा है हमारे पास क्या धरा है जो हमें चौकीदार रखना पड़े? बित्ते भर का खेत है, कभी कुछ उग जाता है, कभी खाली पड़ा रहता है. उसके लिए चौकीदार रखें तो क्यों रखें और रख भी लें तो उसे पगार कहां से दें? खुद खाने के लाले पड़े हैं, बच्चे भूखे मर रहे हैं, बीवी बिना इलाज मर गयी. हम तो उन 15 लाख रुपयों की बाट ही जोहते रहे गये जो साहेब ने भेजने को कहा था. 15 लाख आते तो जिन्दगी में अच्छे दिन आते. अब मुछई को कौन समझाये कि 15 लाख और अच्छे दिन की बात तो बस सपनों के सौदागर का झुनझुना था, अब उसी झुनझुने से चौकीदार…चौकीदार… का शोर निकल रहा है.

सोशल मीडिया पर ‘मैं भी चौकीदार’ के लिए सिर-फुटव्वल शुरू हो चुकी है. सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, अमित शाह, निर्मला सीतारमण जैसे धुरंधरों समेत पूरी मोदी-कैबिनेट चौकीदार बन गयी है. पांच साल तक चोरों की फौज तैयार करते रहे, जनता का पैसा देश से बाहर भेजते रहे और अब चौकीदार बन गये. कोई पूछे कि अब किस बात की चौकीदारी भाई! माल तो सारा मोदी, माल्या, चौकसी ले उड़े!
राहुल बाबा बिना लाग-लपेट के खरी बात कहते हैं कि- ‘चौकीदार चोर है’. उनकी बात में दम है. भाजपा नेत्री पंकजा मुंडे ने जब मारे उत्साह के साहेब के ट्वीट पर ट्वीट किया कि- ‘मैं भी चौकीदार’ तो एक मीडियाकर्मी ने तुरंत पूछ लिया- ‘तो चिक्की कौन खाया?’ अब पंकजा मुंडे चुप हैं. 206 करोड़ रुपये की चिक्की जो आदिवासी बच्चों के लिए खरीदी गयी थी, आखिर कहां गयी, इसका जवाब चौकीदारनी के पास नहीं है.

प्रियंका गांधी वाड्रा ने तो स्पष्ट कह दिया है- ‘चौकीदार तो अमीरों के होते हैं.’ सच बात है. अब गरीब आदमी को चौकीदार की क्या जरूरत? अमीरों को ही अपने धन की रक्षा के लिए चौकीदार रखने होते हैं. अब प्रधानमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति अगर चौकीदार बना है तो जाहिर है देश के सबसे बड़े अमीरों का ही बना होगा. और देश के सबसे बड़े अमीर कौन हैं, ये कौन नहीं जानता. ट्विटर पर एक यूजर जसवीर सिंह ग्रोवर ने तो पूछ भी लिया है कि- ‘कृपया मोदी जी से उनको नौकरी देने वाले का नाम उजागर करने को कहा जाए.’ वहीं एक अन्य यूजर सौरभ सिंह इस मुहिम से झल्लाए हुए हैं. वे कहते हैं, ‘ये प्रधानमंत्री पद की घोर बेइज्जती है.’ एक फेसबुक यूजर इदरिस शेख कहते हैं, ‘वह सिर्फ प्रधानमंत्री पद की बेइज्जती कर रहे हैं. इससे भी ज्यादा वह सिर्फ भारतीयों की भावनाओं से खेल रहे हैं. वह अच्छी तरह जानते हैं कि अगर वह सभी भारतीयों को चौकीदार बना देंगे तो कोई भी उनसे सवाल नहीं करेगा.’

जनता तो भोली है, वह क्या जाने चौकीदार बनने के खेल में क्या क्या खेल हो गये और क्या क्या हो रहे हैं. बड़े चौकीदार के लेफ्टिनेंट ने तो पांच साल में 50 हजार रुपये से 80 करोड़ रुपये बना लिये, वाह री चौकीदारी का कमाल! इससे बेहतरीन नौकरी तो हो ही नहीं सकती. इतना मुनाफा अमित शाह के बेटे जय शाह की कम्पनी उसी हालत में कमा सकती है, जब चोरों ने चोरी का माल वहां जमा किया हो. राहुल गांधी को शाहजादा बोलने वाले शाह के जादे से ये गुप्त रहस्य जानने की जरूरत है कि बाप के चौकीदार होने पर क्या-क्या फायदे किस-किस तरह से उठाये जा सकते हैं.

बहनजी का तो जवाब नहीं, उन्होंने तो चौकीदार को खूब पटक-पटक कर धोया है. साहेब चौकीदार बने तो बहनजी ने ट्वीट किया, ‘राफेल सौदे की गोपनीय फाइल चौकीदार के रहते अगर चोरी हो गयी तो गम नहीं, लेकिन देश में रोजगार की घटती दर और बढ़ती बेरोजगारी, गरीबी, श्रमिकों की दुर्दशा, किसानों की बदहाली के सरकारी आंकड़े पब्लिक नहीं होनी चाहिए. वोट और इमेज की खातिर उन्हें छिपाये रखना है. क्या देश को ऐसा ही चौकीदार चाहिए?’

मोदी के ‘मैं भी चौकीदार’ कैंपेन पर सबसे बड़ा सवाल एक मां ने उठाया है. नाम बदलने में माहिर प्रधानमंत्री की इस नई मुहिम पर सबसे तीखा सवाल जेएनयू से लापता हुए छात्र नजीब अहमद की मां फातिमा नफीस ने पूछा है. उन्होंने ट्वीट करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा है, ‘अगर आप चौकीदार हैं तो मेरा बेटा कहां है?’ उन्होंने पूछा है, ‘एबीवीपी के आरोपी गिरफ़्तार क्यों नहीं किये जा रहे हैं? मेरे बेटे की तलाश में देश की तीन टॉप एजेंसी विफल क्यों हो गयी हैं?

देश की जनता पहली बार एक ऐसा लोकसभा चुनाव देख रही है, जिसमें देश का प्रधान नेता नाम बदलने की कलाबाजियां दिखाने में मशगूल है. जिसमें जनता से जुड़े मुद्दे नदारद हैं. बिजली, पानी, रोटी, रोजगार, गरीबी, बेरोजगारी, दवा, अस्पताल, शिक्षा किसी मुद्दे पर कोई बात ही नहीं हो रही है. बात हो रही है तो बस चौकीदारी की. आन्दोलन चल रहा है सबको चौकीदार बनाने का. उधर असल चौकीदारों की जमात सोच रही है कि ये सारे बड़े लोग अगर चौकीदार बन गये तो हमारी नौकरियों का क्या होगा? बड़ी मुश्किल से तो एक नौकरी मिली थी, किसी तरह रो-रोकर गुजारा चल रहा था, अब क्या मोदी जी ये नौकरी भी खा जाएंगे.

कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक प्रियंका गांधी

राजनीति की चुनावी रणभेरी अब बज चुकी है. 2019 का आम चुनाव कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों के लिए ही जीने मरने का सवाल बन गया है. 3 राज्यों में मिली जीत से कांग्रेस में जोश है. वह इस जोश को पार्टी और वोटर दोनों के लिए इस्तेमाल करना चाहती है. यही वजह है कि कांग्रेस ने भी प्रियंका गांधी को मैदान में उतार कर अपना सब से अहम किरदार सामने कर दिया है.

कांग्रेस के पक्ष में बन रही हवा को इस ‘मास्टर स्ट्रोक’ से केवल चुनावी फायदा ही नहीं मिलेगा, बल्कि चुनाव के बाद उपजे हालात में नए तालमेल बनाने में भी खासा मदद मिलेगी. ‘शाहमोदी’ खेमे में भी इस से बेचैनी बढ़ गई है. ऐसे में एक बार फिर से प्रियंका गांधी को ले कर नएनए मैसेज वायरल होने लगे हैं.

12 जनवरी, 1972 को जनमी प्रियंका गांधी 47 साल की हो चुकी हैं. जनता उन में प्रधानमंत्री रह चुकी इंदिरा गांधी की छवि देखती है. इसी वजह से वे हमेशा ही कांग्रेस की स्टार प्रचारक मानी जाती रही हैं. समयसमय पर कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता प्रियंका गांधी के राजनीति में आने को ले कर मांग भी करते रहे हैं. कई चुनावों में अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के चुनाव प्रचार में उन्होंने हिस्सा भी लिया है.

अभी तक प्रियंका गांधी अमेठी और रायबरेली सीटों पर ही प्रचार अभियान को संभालती रही हैं या फिर परदे के पीछे रह कर काम करती रही हैं, पर साल 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने प्रियंका गांधी को राष्ट्रीय महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है. पहली बार प्रियंका गांधी अमेठी और रायबरेली से बाहर निकल कर चुनाव प्रचार करेंगी.

शानदार रुतबा

लोकसभा में सब से ज्यादा सीटें होने के चलते उत्तर प्रदेश बहुत अहम हो जाता है. उम्मीद की जा रही है कि प्रियंका गांधी अपनी मां सोनिया गांधी की संसदीय सीट रायबरेली से चुनाव लड़ेंगी. प्रियंका का लंबा छरहरा कद, छोटे बाल और साड़ी पहनने का लुक उन्हें दादी इंदिरा गांधी के काफी करीब लाता है.

प्रियंका गांधी के अंदर संगठन की क्षमता, राजनीतिक चतुराई और बोलने की कला सब से अलग है. लोगों से बात करते समय खिलखिला कर हंसना और अपनी बात बच्चों की तरह जिद कर के मनवाने की कला प्रियंका गांधी को दूसरों से अलग करती है.

वैसे, प्रियंका गांधी जरूरत पड़ने पर अपने तेवर तल्ख करना भी जानती हैं. इस से कार्यकर्ता अनुशासन में रहते हैं. वे देश के सब से बड़े सियासी परिवार की होने के बाद भी सियासी बातें कम करती हैं. विरोधी दल के नेता उन के बारे में कुछ भी कहें, पर वे कभी इन नेताओं पर कमैंट नहीं करती हैं. कभी मीडिया कमैंट करने के लिए कहती भी है तो वे मुसकरा कर बात को टाल जाती हैं.

जोश में है कांग्रेस

प्रियंका गांधी को ले कर कई तरह के नारे कार्यकर्ताओं के बीच बहुत मशहूर हैं. इन में ‘अमेठी का डंका बेटी प्रियंका’ और ‘प्रियंका नहीं यह आंधी है नए युग की इंदिरा गांधी है’ सब से खास हैं.

साल 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रियंका गांधी जब साल 2012 के विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए आई थीं तो सब से पहले इतने दिन बाद आने के लिए माफी मांगी थी. वे औरतों और बच्चों से बेहद करीब से बात करती हैं. उम्रदराज औरतें जब उन के पैर छूने के लिए आगे बढ़ती हैं तो उन्हें वे रोक लेती हैं. उन के हाथ अपने सिर पर रख लेती हैं.

प्रियंका गांधी के इस प्यार भरे बरताव से गांव की औरतें निहाल हो जाती हैं. कईकई दिन तक वे प्रियंका गांधी की बातें करती नहीं अघाती हैं.

खूब चला जादू

साल 2007 के विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी ने अमेठी व रायबरेली इलाके में चुनाव प्रचार किया था. उत्तर प्रदेश के इन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने पूरे प्रदेश की 402 विधानसभा सीटों में से 22 सीटें जीती थीं.

अमेठी रायबरेली क्षेत्र में कुल

10 विधानसभा की सीटें थीं. इन में से 7 सीटें कांग्रेस ने जीत ली थीं. इन में बछरांवा से राजाराम, संताव से शिव गणेश लोधी, सरेनी से अशोक सिंह, डलमऊ से अजय पाल सिंह, सलोन से शिवबालक पासी, अमेठी से रानी अमिता सिंह और जगदीशपुर से रामसेवक कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए थे. 10 में से 7 सीटें जीतना कांग्रेस के लिए चमत्कार जैसा था. कांग्रेस के लिए यह चमत्कार प्रियंका गांधी वाड्रा ने किया था.

प्रियंका गांधी ने इस के पहले साल 2004 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली संसदीय सीट पर चुनाव लड़ रही अपनी मां सोनिया गांधी के चुनाव संचालन को संभाला था, वहीं 2009 के लोकसभा चुनाव में भी प्रियंका गांधी ने रायबरेली और अमेठी तक अपने को समेट कर रखा था.

प्रियंका गांधी के इस सहयोग से राहुल और सोनिया को पूरे प्रदेश में पार्टी के प्रचार का मौका मिला. इस से कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में 22 सीटों पर जीत हासिल हुई थी.

प्रियंका गांधी को कांग्रेस का प्रचार प्रचारक माना जाता है. इसी वजह से उन को राजनीति में सीधेतौर पर उतरने की मांग कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के द्वारा होती रहती है. चुनावी राजनीति से दूर रहते हुए प्रियंका गांधी कांग्रेस का प्रचार करती रही हैं.

कामयाबी की धुरी

प्रियंका गांधी की शादी रौबर्ट वाड्रा से हुई है. उन के एक बेटा रेयान और बेटी मिरिया हैं.

प्रियंका जब चुनाव प्रचार में जाती हैं तो आमतौर पर बच्चे उन के साथ होते हैं. वे पौलिटिक्स के साथ अपने परिवार का पूरा ध्यान रखती हैं. वे अपनी मां और भाई के सहयोगी की भूमिका में अपने को रखती रही हैं.

कई बार प्रियंका गांधी बिना कहे ही सारी बात कह जाती हैं. उन का यही अंदाज राहुल गांधी से जुदा लगता है.

राहुल गांधी अपनी बात कहने के लिए भाषण का सहारा लेते हैं. प्रियंका गांधी जब नाराज होती हैं या किसी बात से सहमत नहीं होती हैं तो उन के हावभाव से पता चल जाता है. गुस्से में प्रियंका का चेहरा तमतमा कर लाल हो जाता है.

जानकार लोग कहते हैं कि ऐसे मौके कम ही आते हैं. कार्यकर्ताओं का गुस्सा कम करने के लिए प्रियंका गांधी अपनी मुसकान का सहारा लेती हैं. वे अपने ऊपर भी गुस्सा हो जाती हैं. उन की यह अदा देख कर कार्यकर्ता सबकुछ भूल कर वापस प्रियंका गांधी की बात सुनने लगते हैं.

प्रियंका गांधी की यही सफलता विरोधी दलों के लिए सोचने का विषय बन जाता है. सभी दलों को लगता है कि अगर प्रियंका गांधी ने चुनाव प्रचार की कमान संभाल ली तो उन के सामने मुश्किल खड़ी हो जाएगी.

भाजपा के राज में सामाजिक विकास नहीं ब्राह्मणवाद का ढोंग बढ़ा?

छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में 15-15 साल, गुजरात में 20 साल और राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड जैसे राज्यों में राज कर चुकी भारतीय जनता पार्टी के समय में भले कुछ और न हुआ हो, वह दलित, पिछड़ी जातियों का हिंदूकरण कराने में जरूर कामयाब हुई है. निचली और पिछड़ी जातियों में हिंदुत्व का उभार हुआ है.

मिडिल क्लास में हिंदू धार्मिकता बढ़ रही है. इस के देशभर में प्रचारप्रसार में भाजपा के राज वाले राज्यों का बड़ा योगदान रहा है. निचली, पिछड़ी जातियों के हिंदूकरण की वजह से ऊंची जातियों में भाजपा के प्रति नाराजगी जाहिर होने लगी थी.

गुजरात दंगों ने गुजराती समाज का हिंदूकरण करा दिया था. भाजपा ने हिंदुत्व विचारधारा को घरघर पहुंचाया. दलित, पिछड़ों को मूर्तियां दी जा रही हैं.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके शिवराज सिंह चौहान ने अपने 15 साल के राज में सब से ज्यादा धार्मिक यात्राएं कराईं. वे खुद पिछड़े तबके से होते हुए भी हवनयज्ञ, तीर्थयात्राएं, मंदिर परिक्रमा करते रहे और गौ व ब्राह्मण महिमा का गुणगान करते रहे.

शिवराज सिंह चौहान ने दलितों को कुंभ स्नान कराने के पीछे इस तबके का शुद्धीकरण कर उसे ब्राह्मण बनाया था. हिंदू रीतिरिवाजों से जोड़ कर हिंदू धर्म में संस्कारित कराया था ताकि दलित तबका ब्राह्मणों की सेवा कर सके और दानदक्षिणा दे.

मुख्यमंत्री द्वारा सांसारिक सुखों का त्याग का दावा करने करने वाले 5 साधुओं तक को मंत्री बना दिया गया.

दलित, पिछड़े नेताओं की मूर्तियां लगाई गईं और इन तबके के लोगों को मूर्ति पूजा की ओर धकेलने की कोशिशें की गईं. चुनावों में हनुमान को दलित, वंचित जाति का बता कर इस तबके को हनुमान की पूजा करने और मंदिर बनाने का संदेश दिया गया.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आएदिन हिंदू धर्म की बात करते रहते हैं. राजस्थान में वसुंधरा राजे मंदिरों की परिक्रमा करती रहीं. दलितों और पिछड़ों का शुद्धीकरण कर उन्हें ब्राह्मण बनाने की कोशिश होती रही.

यह अलग बात है कि दलितों और मुसलिमों पर हमले जारी रहे. दलित और पिछड़े तबके वाले हिंदू धर्म के संस्कारों को अपनाने में हिचकिचाते थे या डरते थे, उन्हें भाजपा सरकार ने हौसला दिया.

भाजपा के पार्टी दफ्तरों में दलित, पिछड़े तबके के नेता, कार्यकर्ता माथे पर तिलक, भगवा जैकेट, कुरतापाजामा पहने नजर आने लगे. मौब लिंचिंग की घटनाओं में पिछड़े और दलित जातियों के नौजवान ज्यादा भागीदार पाए गए. पिछड़ी जातियों के नौजवान गौ रक्षक बना दिए गए.

उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक नामक शख्स के घर में घुस कर भीड़ ने लाठी और ईंटों से हमला किया गया और फिर उस की हत्या कर दी गई.

अखलाक का बेटा दानिश उन्हें बचाने आया तो उसे घायल कर दिया गया. आरोपी पिछड़ी जातियों के निकले. इन जातियों के कुछ नौजवानों ने अखलाक पर गौ मांस खाने और घर में रखने का आरोप लगाया और गांव के मंदिर में लाउडस्पीकर से ऐलान कर के भीड़ को इकट्ठा किया गया.

सहारनपुर में दलित बस्ती में तोड़फोड़ की गई और आगजनी का मामला भी दलितों पर हमले की बड़ी घटना थी. यहां महाराणा प्रताप जयंती पर जुलूस निकाला गया और उन्हें हिंदू धर्म का रक्षक बताया गया. यह जुलूस दलित बस्ती से निकला तो दोनों समुदायों का झगड़ा हो गया. बाद में दलितों के घर जला दिए गए और उन के घरों में तोड़फोड़ की गई.

इसी तरह राजस्थान के अलवर में गौ गुंडों द्वारा 55 साल के पहलू खान की हत्या कर दी गई. पहलू खान गायों को ले कर अपने घर जा रहा था.

इन्हीं दिनों शंभूलाल रैगर ने अफराजुल नामक युवक की लव जिहाद के नाम पर हत्या कर दी थी. शंभूलाल रैगर ने अफराजुल को न केवल मौत के घाट उतारा, बल्कि इस दिल दहला देने वाले अपराध का वीडियो बना कर उसे सोशल मीडिया पर अपलोड भी किया.

सरकारों का ऐसी घटनाओं को समर्थन मिलता रहा और आरोपियों का बचाव किया गया. सहारनपुर घटना में दलित युवा नेता चंद्रशेखर को देशद्रोह का मामला बना कर जेल भेज दिया गया.

टैलीविजन चैनलों पर शनि की दशा पर प्रवचन देने और उपाय बताने वाले मदन दाती को महामंडलेश्वर बना दिया गया.

मदन दाती राजस्थान के पाली के मेघवाल जाति के दलित समुदाय से हैं. यह बात अलग है कि अब वे अपने आश्रम में रह रही एक युवती के साथ बलात्कार मामले में फंसे हुए हैं और अपने सहयोगियों के साथ पैसों के लेनदेन मामले में विवादों में भी हैं.

मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जो विधायक चुन कर आ रहे हैं, वे अब पिछड़े, दलित नहीं, ब्राह्मण बन चुके हैं. ज्यादातर की 2-3 पीढि़यां सामाजिक और माली तौर पर बदल गई हैं.

लेकिन अभी भी इन तबकों का माली, सामाजिक विकास नहीं हो पाया. भाजपा ने इसे सामाजिक समरसता का नाम जरूर दिया, पर दलित दूल्हों को घोड़ी से उतारे जाने की सब से ज्यादा वारदातें भाजपा के राज वाले राज्यों में ही हुईं.

भाजपा के राज वाले राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मामलों में पिछड़े हुए हैं. इन राज्यों में  निचली व पिछड़ी जातियों के लड़केलड़कियों की स्कूल छोड़ने की दर सब से ज्यादा है.  इन तबकों के हाथों में ‘गीता’, ‘रामायण’ तो थमाईर् जा रही है, पर पढ़ाईलिखाई, रोजगार का इंतजाम कर के असली सामाजिक, माली विकास से अभी भी कोसों दूर हैं.

मसूद अजहर को छोड़ना भारत की सबसे बड़ी गलती थी

पुलवामा में सीआरपीएफ काफिले पर आतंकी हमले के बाद पूरा देश आक्रोशित है, 38 जवानो के शवों को देखकर हर आंख भीगी है. हर जुबान से बस यही निकल रहा है कि बस अब बहुत हुआ… अब इन्हे छोड़ना नहीं है. जिस वक़्त देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने शहीद जवान के ताबूत को कंधा दिया वो पल पूरे देश को रुला गया. पुलवामा की घटना और इससे पहले हुई कई घटनाएं ना घटतीं अगर हमने मसूद अज़हर जैसे खूंखार आतंकी को अपने चंगुल से ना निकलने दिया होता. बहुत बड़ी गलती हो गई जब कंधार विमान हाईजैक के दौरान आतंकी मसूद अजहर को छोड़ा गया. अगर उसको उस वक़्त शूट कर दिया जाता तो शायद संसद, उरी, पठानकोट और अब पुलवामा में आतंकी हमले न होते.

पुलवाम की साजिश रचने वाला जैश-ए-मुहम्मद का सरगना मौलाना मसूद अजहर वही आतंकी है, जिसे कंधार विमान हाईजैक के दौरान रिहा करना पड़ा था. मसूद अजहर की रिहाई के बाद पाकिस्तान चौड़ा हो गया और उसकी शह पाकर ही मसूद ने आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद को जन्म दिया. इसमें कोई शक नहीं कि मसूद के आतंकी संगठन को जहां पाकिस्तानी सेना का पूरा सपोर्ट है वहीं चीन भी उसको पूरा सपोर्ट करता है और उसका इस्तेमाल भारत को परेशान करने के लिए करता है.

मसूद अजहर को साल 1994 में पहली बार गिरफ्तार किया गया था. कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन का सदस्य होने के आरोप में उस वक्त उसकी श्रीनगर से गिरफ्तारी हुई. मौलाना मसूद अजहर की गिरफ्तारी के बाद, जो कुछ हुआ उसका शायद किसी को अंदाजा भी नहीं था. अज़हर को छुड़ाने के लिए आतंकियों ने 24 दिसंबर, 1999 को 180 यात्रियों से भरे एक भारतीय विमान को नेपाल से अगवा कर लिया और विमान को कंधार ले गए. भारतीय इतिहास में यह घटना ‘कंधार विमान कांड’ के नाम से दर्ज है. कंधार विमान कांड के बाद भारतीय जेलों में बंद आतंकी मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक जरगर और शेख अहमद उमर सईद की रिहाई की मांग की गई और यात्रियों की जान बचाने के लिए छह दिन बाद 31 दिसंबर को आतंकियों की शर्त मानते हुए भारत सरकार ने मसूद अजहर समेत तीनों आतंकियों को छोड़ दिया. इसके बदले में कंधार एयरपोर्ट पर अगवा रखे गए विमान के बंधकों समेत सभी को छोड़ दिया गया.

यहीं से शुरू हुई जैश की कहानी 

जेल से छूटने के बाद मसूद अजहर ने फरवरी 2000 में जैश-ए-मुहम्मद आतंकी संगठन की नींव रखी, जिसका मकसद था भारत में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देना और कश्मीर को भारत से अलग करना. उस वक्त सक्रिय हरकत-उल-मुदाहिददीन और हरकत-उल-अंजाम जैसे कई आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद में शामिल हो गए. खुद मसूद अजहर भी हरकत-उल-अंसार का महासचिव रह चुका है. साथ ही हरकत-उल-मुजाहिदीन से भी उसके संपर्क थे.

संसद, पठानकोट, उरी से लेकर पुलवामा हमले में जैश का हाथ

यह कोई पहली बार नहीं है, जब जैश ने भारत को दहलाने की कोशिश की हो. साल 2001 में संसद हमले से लेकर उरी और पुलवामा हमले में जैश का हाथ रहा है. अपनी रिहाई और आतंकी संगठन की स्थापना के दो महीने के भीतर ही जैश ने श्रीनगर में बदामी बाग स्थित भारतीय सेना के स्थानीय मुख्यालय पर आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी ली थी.

बड़े आतंकी हमले में जैश का हाथ

28 जून, 2000:

जम्मू कश्मीर सचिवालय की इमारत पर हमला. जैश ने ली हमले की जिम्मेदारी.

14 मई, 2002:

जम्मू-कश्मीर के कालूचक में हुए हमले में 36 जवान शहीद हो गए, जबकि तीन आतंकी मारे गए.

1, अक्टूबर 2008:

जैश के तीन आत्मघाती आतंकी विस्फोटक पदार्थों से भरी कार लेकर जम्मू-कश्मीर विधानसभा परिसर में घुस गए. इस घटना में 38 लोग मारे गए.

26/11 मुंबई हमला:

26/11 मुंबई आतंकी हमले को भी जैश ने अंजाम दिया था. 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में समुद्र के रास्ते आए 10 आतंकियों ने 72 घंटे तक खूनी तांडव किया था. इस हमले में 166 लोग मारे गए थे, जबकि कई घायल हो गए थे. इस हमले का मास्टर माइंड भी मसूद अजहर रहा है. मुंबई हमले में 9 आतंकी भी मारे गए थे. इस में एक जिंदा आतंकी आमिर अजमल कसाब को भी पकड़ा गया था, जिसे बाद में फांसी की सजा दी गई.

संसद हमला

13 दिसंबर, 2001 को भारतीय संसद पर हुए हमले के पीछे भी लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद के आतंकियों का हाथ. इस हमले में 6 पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे, जबकि तीन संसद भवन कर्मी भी मारे गए. संसद हमले का दोषी अफजल गुरु भी जैश से जुड़ा था. उसे 10 फरवरी 2013 में फांसी दी गई थी.

पठानकोट हमला

जनवरी 2016 को पंजाब के पठानकोट स्थित वायु सेना ठिकाने पर हमले के लिए भी ज़िम्मेदार. इस हमले में वायुसेना और एनएसजी के कुल सात सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे. दो दिनों की मुठभेड़ के बाद सभी आतंकियों को मार गिराया गया था.

उरी हमला

18 सितंबर, 2016 में कश्मीर के उरी स्थित सैन्य ठिकाने पर हुए हमले में भी जैश का हाथ रहा है. उरी हमले में 18 सैनिक शहीद हो गए थे. इस हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी और पीओके में घुसकर कई आतंकी ठिकानों का खात्मा कर दिया था.

आतंकी संगठनों की सूची में शामिल ‘जैश’

जैश-ए-मुहम्मद को भारत ने ही नहीं बल्कि ब्रिटेन, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र भी आतंकी संगठनों की सूची में शामिल कर चुका है. हालांकि अमेरिका के दबाव के बाद पाकिस्तान ने भी साल 2002 में इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया था, मगर अंदर ही अंदर सेना का पूरा सपोर्ट जैश को मिलता रहा. भारत मसूद अज़हर के प्रत्यर्पण की पाकिस्तान से कई बार मांग कर चुका है, लेकिन पाकिस्तान हर बार सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए इस मांग को नामंजूर कर देता है. इसके लिए उसे चीन की मदद भी बराबर मिल रही है. चीन ने तो मसूद अज़हर को आतंकी मानने तक से इंकार कर दिया है.

भारत को अब अपने पड़ोसी देशों – पकिस्तान और चीन से टक्कर लेने और और उनको कड़ा सबक सिखाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए. सांप को दूध पिलाने से वो अपनी प्रवृत्ति नहीं छोड़ देगा, पुलवामा के बाद तो हमें ये बाद अच्छी तरह समझ में आ जानी चाहिए.

सपा-बसपा गठबंधन के सियासी मायने

सपा बसपा के गठबंधन से जमीनी स्तर पर भले ही कोई बड़ा सामाजिक बदलाव न हो पर इसके सियासी मायने फलदायक हो सकते हैं. सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस भले ही शामिल ना हो पर इस गठबंधन से मिलने वाले सियासी लाभ में उसका हिस्सा भी होगा. 2019 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस होगी. ऐसे में सरकार बनाने ही हालत में कांग्रेस ही सबसे आगे होगी. सपा-बसपा ही नहीं दूसरे क्षेत्रिय दल भी भारतीय जनता पार्टी की नीतियों से परेशान हैं. ऐसे में वह केन्द्र से भाजपा को हटाने के लिये कांग्रेस के खेमे में खड़े हो सकते हैं.

भाजपा के लिये परेशानी का कारण यह है कि उसका एक बडा वोटबैंक पार्टी से बिदक चुका है. उत्तर प्रदेश में पार्टी 2 साल के अंदर ही सबसे खराब हालत में पहुंच चुकी है. सत्ता में रहते हुए भाजपा एक भी उपचुनाव नहीं जीती है. उत्तर प्रदेश के अलावा हिन्दी भाषी क्षेत्रों में भाजपा खराब दौर से गुजर रही है. राजस्थान, छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार से विपक्षी दलों को ताकत दे दी है. ऐसे में सबसे पार्टी की जीत का सबसे अधिक दारोमदार उत्तर प्रदेश पर ही टिका है.

लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की 80 सीटें काफी महत्वपूर्ण हो जाती हैं. 2014 के चुनाव में 73 सीटें भाजपा और उनके सहयोगी दलों को मिली थी. 7 सीटे सपा और कांग्रेस के खाते में थी. बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी. 2019 के लोकसभा चुनावों में बसपा-सपा के एक होने से सियासी परिणाम बदल सकते हैं. 2014 की जीत में मोदी लहर और कांग्रेस का विरोध भाजपा को सत्ता में लाने का सबसे बड़ा कारण था. नरेन्द्र मोदी ने जनता से जो वादे किये उसे वह पूरा नहीं कर पाए. अपनी कमियों को छिपाने के लिये अपने धर्म के एजेंडे को आगे बढ़ाते गये. पार्टी के नेताओं के स्वभाव में एक अक्खडपन आ गया.

राजस्थान, छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार ने बता दिया कि मोदी मैजिक अब पार्टी का जीत दिलाने में सफल नहीं होगा. ऐसे में पार्टी की नीतियों से ही जीत का मार्ग निकलता है. भाजपा जमीनी स्तर पर जातियों के साथ तालमेल कर चलने में तो असफल रही ही, अपने कोर वोटर को भी कोई सुविधा नहीं दे सकी. मध्यमवर्गीय कारोबारी सबसे अधिक परेशान हो रहा है.ऐसे में वह पार्टी से अलग थलग पड़ गया है. इस वजह से ही भाजपा अब सवर्ण आरक्षण के मुद्दे को लेकर आई.

वरिष्ठ पत्राकार शिवसरन सिंह कहते है ‘2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावो में प्रदेश ही जनता ने भाजपा के विकास की नीतियों से प्रभावित होकर भाजपा को वोट देकर बहुमत की सरकार बनाई थी. सरकार बनाने के बाद भाजपा राज में जिस तरह से मंहगाई, बेराजगारी, जीएसटी और नोटबंदी का दबाव आया लोग परेशान हो गये. यह भाजपा के लिये सबसे बड़ा नुकसान का कारण है. जातीय स्तर पर जिस समरसता की उम्मीद भाजपा से प्रदेश की जनता को थी वह पूरी नहीं हुई. ऐसे में जिस तरह से सभी जातियों ने भाजपा का साथ दिया था वह उससे दूर जाने लगी. दलित और पिछड़ी जातियां सपा-बसपा और सवर्ण कांग्रेस का दामन थामने को मजबूर हैं. भाजपा के लिए यह खराब संदेश है.’

2019 के फाइनल में कांग्रेस

सत्ता का सैमीफाइनल माने जाने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में सब से बड़े 230 सीटों वाले राज्य मध्य प्रदेश में 15 सालों से राज कर रही भारतीय जनता पार्टी के हाथ से सत्ता की डोर तो उसी वक्त फिसलती दिखने लगी थी जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘नमामि देवी नर्मदे’ नाम से नर्मदा यात्रा शुरू की थी. यह यात्रा दिसंबर, 2016 में शुरू हो कर मई, 2017 में खत्म हुई थी.

लंबी और धर्मकर्म वाली इस नर्मदा यात्रा का भाजपा ने ऐसे होहल्ला मचाया था मानो विधानसभा चुनाव में उसे जनता नहीं, बल्कि नर्मदा नदी जिताएगी.

इस यात्रा पर सरकार के कितने करोड़ या अरब रुपए स्वाहा हुए थे, इस का साफसाफ ब्योरा आज तक भाजपा पेश नहीं कर सकी है.

शिवराज सिंह चौहान इस यात्रा की आड़ में जब मंदिरों और घाटों पर पूजापाठ करते और पंडों को दानदक्षिणा देते नजर आए थे, तो लोग मायूस हो उठे थे कि ये कैसी उपलब्धियां हैं जिन में हजारों की तादाद में छोटेबड़े नामी और बेनामी संत दानदक्षिणा से अपनी जेबें भर रहे हैं.

बाद में शिवराज सिंह चौहान ने 4 बाबाओं को मंत्री का दर्जा भी दे दिया था. इस से लोगों में यह संदेशा गया था कि अब साधुसंत सरकार चलाएंगे और दोबारा वर्ण व्यवस्था व ब्राह्मण राज कायम हो जाएगा. दूसरी तरफ मध्य प्रदेश में ही 15 सालों से सत्ता वापसी की कोशिश कर रही कांग्रेस आधी लड़ाई उस वक्त जीत गई थी जब कांगे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री रह चुके दिग्विजय सिंह को हाशिए पर धकेलते हुए छिंदवाड़ा से सांसद और धाकड़ कांग्रेसी नेता कमलनाथ को प्रदेश का अध्यक्ष बनाया था और गुना के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनावी मुहिम की कमान सौंपी थी.

इन दोनों नेताओं को आगे लाने का राहुल गांधी का एक मकसद साल 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी अपनी पकड़ बनाने का था. कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाना एक समझदारी भरा फैसला था, जिस का फायदा भी कांग्रेस को मिला.

यों बिगड़ा भाजपा का खेल

अकेले मध्य प्रदेश में ही नहीं, बल्कि राजस्थान में भी राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत के साथ युवा सचिन पायलट को भी चुनावी मुहिम में लगा दिया, तो कांग्रेस वहां भी दौड़ में आ गई.

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री रह चुके अजीत जोगी को कांग्रेस पहले ही बाहर का रास्ता दिखा चुकी थी जिन की बिगड़ी इमेज नतीजों के आईने में भी दिखी. वहां कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल के साथ 2 धाकड़ नेताओं टीएस सिंह देव और चरणदास महंत को भी कांग्रेस ने चुनाव में उतारा.

इन तीनों राज्यों में कांगे्रस शुरू में कहीं गिनती में नहीं थी. एक साल पहले तक यह कहा जा रहा था कि भाजपा इन तीनों राज्यों में फिर से भगवा फहराने में कामयाब हो जाएगी लेकिन महज एक साल में ऐसा कौन सा चमत्कार हो गया कि मध्य प्रदेश में वह 114, राजस्थान में 99 और छत्तीसगढ़ में रिकौर्ड 65 सीटें ले गई? इस का भाजपा के धर्मकर्म और तीनों मुख्यमंत्रियों के कामकाज से गहरा ताल्लुक है.

धर्मकर्म के मामले में न तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह पीछे रहे और न ही महारानी के खिताब से नवाजी जाने वाली राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, जो मतगणना वाले दिन सुबह से ही बांसवाड़ा के त्रिपुरा सुंदरी मंदिर में देवी की मूर्ति के सामने जा कर बैठ गई थीं लेकिन भगवान ने उन की एक न सुनी और राजस्थान में भाजपा को महज 73 सीटों पर लटका कर रख दिया.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने तो उस वक्त हद ही कर दी थी, जब भगवा कपड़ों वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुनाव प्रचार करने के लिए छत्तीसगढ़ पहुंचे थे. तब रायपुर में उन्होंने योगी आदित्यनाथ के पैरों में लोट लगाई थी.

वहां की एक सभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बेतुकी बात यह कही थी कि चूंकि छत्तीसगढ़ रामलला का ननिहाल है, इसलिए यहां भी उन का मंदिर बनना चाहिए.

इस बात से वहां के लोग घबरा उठे थे कि अब हिंदूवादी संगठन जबरन आदिवासियों को पूजापाठ में धकेलने की अपनी कोशिशें तेज करेंगे.

न केवल तीनों मुख्यमंत्रियों, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का भी ब्लडप्रैशर उस वक्त बढ़ना शुरू हो गया था जब इन राज्यों में राहुल गांधी की रैलियों में भीड़ उमड़ने लगी थी और लोग संजीदगी से उन की बातें सुनने लगे थे.

राहुल गांधी ने चालाकी दिखाते हुए भाजपा के हथियार का उन्हीं पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया तो भगवा खेमा और ज्यादा तिलमिला उठा. उज्जैन के महाकाल मंदिर में पूजा और शिव अभिषेक कर उन्होंने चुनाव प्रचार शुरू किया तो भाजपाइयों ने बारबार वही गलती दोहराई जो राहुल गांधी उन से चाहते थे. हालांकि इस के पहले भी उन के धर्म प्रेम को ले कर काफी हल्ला मच चुका था लेकिन चुनाव के वक्त यह बढ़ा तो भाजपा को लेने के देने पड़ने लग गए.

राहुल गांधी खुद को शिवभक्त और जनेऊधारी ब्राह्मण तो बताते रहे, पर उन्होंने मंदिरों की तारीफ नहीं की. दूसरी तरफ जनसभाओं में उन्होंने पुरजोर तरीके से आम लोगों के हितों से जुड़े मुद्दों पर जोर दिया. तीनों ही राज्यों

में उन्होंने बेरोजगारों, रसोई गैस, पैट्रोलडीजल की बढ़ती कीमतों और किसानों की बदहाली पर खासा फोकस किया, किसी देवीदेवता पर नहीं.

मजा तो तब आया जब भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा ने भोपाल में राहुल गांधी से उन का गोत्र पूछ डाला. भाजपाइयों से और उम्मीद भी नहीं की जा सकती. सदियों से जातियों का नाम ले कर ही वे अपना काम चलाते रहे हैं.

जवाब में राहुल गांधी ने राजस्थान के मशहूर पुष्कर मंदिर में जा कर पंडित से पूछ कर अपना गोत्र दत्तात्रेय और खुद को कौल ब्राह्मण साबित कर डाला.

इस मंदिर के नीचे झूठ का सदा प्रचार होता है. यहां बड़ेबड़े बोर्ड लगे हैं कि जूते मुफ्त रखें, पर बदले में 500 रुपए की चढ़ावे की डाली खरीदनी जरूरी है जो बोर्डों पर नहीं लिखा होता. हालांकि इस सब से साबित यही हुआ था कि किसी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या तहसीलदार के मुकाबले पंडेपुजारी द्वारा जारी जाति प्रमाणपत्र लोग ज्यादा सटीक मानते हैं.

फ्लौप हुए मोदी

जब माहौल बिगड़ने लगा और कांग्रेस की हवा तीनों राज्यों में बंधने लगी तो भाजपा को अपने हीरो नरेंद्र मोदी से उम्मीदें बंधीं कि अब वे ही नैया पार लगाएंगे.

अपनी चुनावी सभाओं में राहुल गांधी ने मुख्यमंत्रियों से ज्यादा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा. इंदौर की एक सभा में राफेल डील को ले कर उन्होंने ‘चौकीदार’ अपने मुंह से बोल कर और ‘चोर है’ जनता से कहलवाया तो राजनीति के जानकारों का यह अहसास यकीन में बदलने लगा कि राहुल गांधी की ‘पप्पू’ वाली इमेज गए कल की बात हो गई है और भाजपा उन का मजाक बना कर खुद का ही नुकसान कर रही है.

नरेंद्र मोदी के लिए इन राज्यों में चुनाव प्रचार एक चुनौती बन गया था. एक तो उन की सभाओं में पहले की तरह भीड़ नहीं उमड़ रही थी, दूसरे महंगाई, नोटबंदी और जीएसटी के फैसले पर वे राहुल गांधी के सवालों और हमलों का कोई तसल्ली वाला जवाब नहीं दे पा रहे थे.

जनता नरेंद्र मोदी से उम्मीद कर रही थी कि वे राफेल डील की कीमतों का खुलासा कर के राहुल गांधी के आरोपों का करारा और सटीक जवाब दें, लेकिन वजहें चाहे राष्ट्रहित की हों, 2 देशों के करार की हों या फिर कोई और, उन्होंने ऐसा नहीं किया तो धर्म, जाति और गोत्र के मसले की तरह राहुल गांधी उन पर भारी पड़ते नजर आए और यह सोचने का मौका भी लोगों को मिल ही गया कि आखिरकार नोटबंदी से किसे और क्या हासिल हुआ और जीएसटी से देश कौन सा मालामाल हो गया? इस के उलट व्यापारियों का ही नुकसान हुआ जिन को नरेंद्र मोदी ने यह अहसास करा दिया था कि वे टैक्स चोर हैं.

भारी पड़े ये मुद्दे

न केवल मध्य प्रदेश और राजस्थान के नतीजे हैरान कर देने वाले आए, बल्कि छत्तीसगढ़ के नतीजे तो इस लिहाज से चौंका देने वाले हैं कि वोटर ने यहां कांग्रेस की झोली लबालब भर दी है. लेकिन अगर राजस्थान और मध्य प्रदेश में 1-1 सीट के लिए तरसा कर रख दिया तो इस की वजह लोकल मुद्दों का भारी पड़ना है.

मध्य प्रदेश में तो 2 अप्रैल की दलित हिंसा के बाद ही भाजपा और शिवराज सिंह चौहान को समझ आ गया था कि बाजी हाथ से जा रही है. एट्रोसिटी ऐक्ट के बवाल से राजस्थान भी अछूता नहीं रहा जहां के ऊंची जाति वाले भाजपा से नाराज दिखे, लेकिन छत्तीसगढ़ में इस मुद्दे का खास असर नहीं देखा गया.

गौरतलब है कि इस मुद्दे पर भाजपा संसद में दलितों के आगे झुक गई थी और उस ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदल दिया था. इस से सवर्ण खासा नाराज थे. मध्य प्रदेश में तो दलितों के बाद सवर्णों ने भी जम कर बवाल मचाया था और अपनी अलग पार्टी सपाक्स भी बना ली थी.

उम्मीद के मुताबिक सपाक्स भाजपा को नुकसान नहीं पहुंचा पाई तो यह शिवराज सिंह चौहान की खूबी थी जिन्होंने धीरेधीरे पुचकार कर सवर्णों को मना लिया था, लेकिन इतना नहीं कि भाजपा चौथी बार भी बाजी मार ले जाती.

राजस्थान की हालत उलट थी जहां छोटे दल और निर्दलीय 25 सीटें ले गए. यहां नई बनी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को बराबरी से नुकसान पहुंचाया लेकिन उस से भी ज्यादा नुकसान पहुंचाया भाजपा के बगावती उम्मीदवारों ने जो टिकट न मिलने पर या तो दूसरी पार्टी से चुनाव लड़े या फिर निर्दलीय मैदान में उतरे.

तीनों विधानसभा चुनाव अपनी इस दिलचस्पी के चलते भी याद किए जाएंगे कि राजस्थान के उलट मध्य प्रदेश में भाजपा के बगावती कोई खास करिश्मा नहीं दिखा पाए.

भाजपा छोड़ कर कांग्रेस में आए पूर्व मंत्री सरताज सिंह होशंगाबाद सीट से विधानसभा अध्यक्ष सीताराम शर्मा के हाथों हारे तो शिवराज सिंह चौहान के साले संजय सिंह तो कांग्रेस के टिकट पर वारासिवनी सीट से तीसरे नंबर पर रहे.

यह बात भी कम हैरत की नहीं कि मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों को लगभग बराबर 41-41 फीसदी वोट मिले लेकिन सीटों के मामले में भाजपा कांग्रेस से 5 सीटों के अंतर से पिछड़ कर सत्ता से बाहर हो गई.

दूरगामी फर्क पड़ेगा

अब यह भाजपा के सोचने की बात और बारी है कि कोई राम, कृष्ण या दूसरा भगवान उसे नहीं जिता सकता, क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता की चाबी नीचे वाली जनता के हाथ में होती है, ऊपर वाले भगवान के हाथ में नहीं.

राम मंदिर निर्माण का जिन जिंदा कर रही और देश में बड़ीबड़ी मूर्तियां गढ़ रही भाजपा के लिए तीनों राज्यों के नतीजे सबक देने वाले हैं कि अगर उसे साल 2019 के लोकसभा चुनाव में हिंदीभाषी राज्यों में साल 2014 के मुकाबले आधी सीटें भी चाहिए, तो रामनाम जपना छोड़ना होगा. राहुल गांधी के धर्म, जाति और गोत्र जैसे सवालों को भी छोड़ना होगा, नहीं तो जनता उसे छोड़ देगी.

भाजपा की एक दिक्कत यह भी है कि उस के पास उपलब्धियों के नाम पर गिनाने के लिए कुछ खास नहीं है. ऐसे में वोट अब वह किस मुद्दे पर मांगेगी, यह बात उस के रणनीतिकार भी शायद ही तय कर पाएं. अमित शाह तय करें, साधुसंत तय करें या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दूसरे हिंदूवादी संगठन तय करें, इन सभी को यह समझ आ रहा है कि धर्म का कार्ड 3 अहम भगवा गढ़ों से खारिज हो चुका है.

अब अगर राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को भाजपा हवा देती है या चुनावी मुद्दा बनाती है तो इन नतीजों के मद्देनजर उसे भारी नुकसान होना तय दिख रहा है.

दूसरी तरफ कांग्रेसियों के हौसले बुलंद हैं. कांग्रेसी खेमे में 3 राज्यों की जीत से नया जोश आया है जिस से लोकसभा चुनाव में भी उसे फायदा होगा. कांग्रेस के लिहाज से एक अच्छी बात जो उस की वापसी की वजह बनी, वह उस की एकता है, नहीं तो अब तक इन राज्यों में वह आपसी फूट के चलते ज्यादा हारती रही थी.

तीनों राज्यों में मुख्यमंत्रियों के चुनाव में थोड़ी कलह दिखी, पर मध्य प्रदेश में कमलनाथ को, राजस्थान में अशोक गहलोत को और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बना दिया गया. यह कलह 4 दिन में शांत हो गई. 2019 के चुनाव परिणाम अभी आने हैं.

इन जीतों का सियासी असर दिखना भी शुरू हो गया है. भाजपा विरोधी दलों को एक आस बंधी है कि भाजपा कोई अपराजेय पार्टी नहीं है. अगर मिलजुल कर लड़ा जाए तो उसे हराया भी जा सकता है.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बेहद आक्रामक अंदाज में हमलावर हो रहे हैं कि अब उन की उलटी गिनती शुरू हो गई है.

मजबूत होती कांग्रेस को अब इस बात का फायदा होना तय दिख रहा है कि अगर महागठबंधन बना तो दूसरी पार्टियों को उस की छत के नीचे आना पड़ेगा.

अब बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में सीटों की हिस्साबांटी में उस पर ज्यादा दबाव नहीं बना पाएंगे और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल को भी उस के पीछे चलने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जहां अमित शाह पहले ही नीतीश कुमार से फिफ्टीफिफ्टी का सौदा कर चुके हैं.

वैसे, कांग्रेस को भी वोटर ने पूरी आजादी नहीं दी है, बल्कि बाउंड्री पर बांध कर रखा है. जाहिर है कि उस के नए मुख्यमंत्रियों को बेहतर प्रदर्शन करना पड़ेगा, नहीं तो जनता का मूड बदलने में अब देर नहीं लगती.

अगर राहुल गांधी यह सोच रहे होंगे कि वे कथित जनेऊधारी ब्राह्मण होने के नाते या फिर देवीदेवताओं के आशीर्वाद से कांग्रेस की वापसी कराने में कामयाब हुए हैं, तो यह उन की गलतफहमी ही साबित होगी.

कांग्रेस की 3 राज्यों में जीत की वजहें पंडावाद और मूर्तिवाद के अलावा इन राज्यों में बढ़ती बेरोजगारी को ले कर नौजवानों की भड़ास और लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही खेतीकिसानी ज्यादा है जिस के चलते किसानों ने इस बार उस से तोबा कर ली.

महंगाई, बढ़ते भ्रष्टाचार और बिगड़ती कानून व्यवस्था से लोग आजिज आ गए थे, पर इन से भी ज्यादा अहम बात जो दिख नहीं रही, वह दलितों और आदिवासियों की बढ़ती बदहाली थी. भाजपा इन तबकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई. अब अगर कांग्रेस भी इसी राह पर चलती है, तो एक बात इन्हीं नतीजों से साबित हुई है कि वोटर अब किसी एक पार्टी के खूंटे से बंधा नहीं रह गया है, इसलिए जो भी सत्ता संभालेगा उसे इन तबकों के लिए ठोस काम तो करने ही पड़ेंगे.

किसे महंगी पड़ी दलितों की गैरत

तीनों राज्यों के नतीजों से भाजपा से बड़ा सबक बसपा को मिला है और उस की विदाई भी हो चुकी है. मायावती ने यह कहते हुए तीनों राज्यों में कांग्रेस से गठबंधन ठुकरा दिया था कि कांग्रेस बसपा को खत्म करना चाहती है जिस की अपनी गैरत है. दलितों की गैरत की बात करने वाली मायावती को फायदा तो कुछ नहीं हुआ, पर नुकसान उम्मीद से ज्यादा हुआ है.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बसपा 2-2 सीटों पर सिमट कर रह गई जबकि मायावती यह उम्मीद लगाए बैठी थीं कि वे मध्य प्रदेश में अपने दम पर 8-10 सीटें ला कर जीतने वाली पार्टी को बसपा की मुहताज कर देंगी और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के साथ भी यही समीकरण दोहराएंगी लेकिन इन दोनों ही राज्यों में बसपा का वोट 5 फीसदी का आंकड़ा भी नहीं छू पाया.

सौदेबाजी में माहिर मायावती छत्तीसगढ़ में गच्चा खा गईं, जहां बसपा के वोट तो जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ को मिले लेकिन उस के वोट बसपा को नहीं मिले क्योंकि उस का कोई वोट बैंक था ही नहीं. हैरत तो यह देख कर हुई कि अकलतरा से बसपा के टिकट पर लड़ीं अजीत जोगी की बहू रिचा जोगी भी चुनाव हार गईं.

राजस्थान में जरूर बसपा सम्मानजनक सीटें ले गई लेकिन वहां हालात ऐसे बने कि 4 फीसदी वोट और 6 सीटें ले जा कर भी मायावती कांग्रेस की राह का रोड़ा या जरूरत नहीं बन पाईं. इशारा साफ है कि दलित अब बसपा का वोट बैंक नहीं रह गया है.

दलितों की गैरत का दूसरा पहलू भी बड़ा दिलचस्प है कि मध्य प्रदेश में उस ने गरीब सवर्णों के साथ खड़ा होने से इनकार कर दिया. चुनाव के 3 महीने पहले शिवराज सिंह चौहान ने जिस संबल योजना को लागू किया था, दरअसल वह दलितों को लुभाने की कोशिश थी.

गरीबों के भले वाली इस योजना का दलितों ने फायदा तो उठाया लेकिन यह बात उन्हें रास नहीं आई कि योजना अलग से उन्हीं के लिए क्यों नहीं बनाई गई. पर इस का ढिंढोरा इस तरह पीटा गया मानो दलित तबका मालामाल हो गया हो.

हकीकत तो यह है कि दलित समाज आज भी अपनी झोली खोले खड़ा है. जब उसे समझ आ गया कि भाजपा इस से ज्यादा कुछ नहीं दे पाएगी तो उस ने कांग्रेस का पल्लू थाम लिया, जिस से और ज्यादा खैरात मिले. बात कम हैरत की नहीं जो आगे की राजनीति पर बड़ा फर्क डालेगी कि दलित समुदाय चाहता है कि गरीब सवर्ण और दलित में फर्क कर उस की थाली में दालरोटी डाली जाती रहे. कांग्रेस इस बार उसे मुफीद लगी तो उस ने पाला बदलने में देर नहीं की.

हालांकि एट्रोसिटी ऐक्ट को ले कर भी दलित समुदाय भाजपा से खफा था लेकिन यह मुद्दा वोटिंग के वक्त तक गायब हो चुका था और उस की जगह इस ख्वाहिश ने ली थी कि कौन उसे ज्यादा दे सकता है.

लोकसभा चुनाव 2019 में अब इन बातों के मद्देनजर मायावती पर दलित ज्यादा भरोसा करेगा, ऐसा लग नहीं रहा. उत्तर प्रदेश की राजनीति पर इन नतीजों ने गहरा असर डाला है. अब वहां भी कांग्रेस दलितों को अपने पाले में लाने की कोशिश करेगी. और हैरानी नहीं होनी चाहिए, अगर मायावती वहां भी देखती रह जाएं, क्योंकि अब वाकई उन के पास दलितों को देने के लिए कुछ बचा ही नहीं है.

भाजपा की नजर में तो दलितों की गैरत के कभी कोई माने ही नहीं रहे. इस बात का खुलासा उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ ने बीकानेर की एक सभा में यह कहते हुए किया था कि हनुमान दलित थे यानी भाजपा की नजर में दलितों की हैसियत बंदरों सरीखी है.

बरकरार रहा टीआरएस का करिश्मा

119 सीटों वाले तेलंगाना में इस बार भी मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव यानी केसीआर का जादू बरकरार है जिन की पार्टी टीआरएस यानी तेलंगाना राष्ट्र समिति 88 सीटें जीत गई. कांग्रेस और तेलुगुदेशम पार्टी का गठबंधन नाकाम साबित हुआ और 21 सीटों पर सिमट कर रह गया. इस से भी बड़ा झटका 2014 में 5 सीटें ले जाने वाली भाजपा को लगा जिसे सिर्फ एक सीट से ही तसल्ली करना पड़ी. ओवैसी की एआईएमएआई ने 7 सीटें जीत कर अपनी साख बरकरार रखी.

तेलंगाना में केसीआर ने विधानसभा भंग करते हुए वक्त से पहले चुनाव कराने पर तवज्जुह दी थी जिस का फायदा भी उन्हें मिला. उन की कल्याणकारी योजनाएं जनता ने पसंद कीं जिस में गरीबों की शादी और मकान के लिए पैसा देने वाली बातें लोगों को खूब पसंद आईं.

तेलंगाना में किसानों को 4,000 रुपए प्रतिमाह प्रति एकड़ देने की योजना टीआरएस की बड़ी जीत की अहम वजह बनी. 2019 के लोकसभा चुनाव में भी टीआरएस भारी पड़ेगी क्योंकि केसीआर की लोकप्रियता आज भी बरकरार है.

केसीआर वैसे उतने ही अंधविश्वासी हैं जितने 1947 के बाद कांग्रेसी राजेंद्र प्रसाद और वल्लभभाई पटेल थे या आज मोदीयोगी हैं, पर फिर भी वे दलितमुसलिम विरोधी नहीं हैं.

पंजे से छूटा मिजोरम

हिंदीभाषी राज्यों में पहली सी पैठ बना चुकी कांग्रेस का उत्तरपूर्वी भारत में पूरी तरह सूपड़ा साफ हो गया है. 40 सीटों वाले छोटे से राज्य मिजोरम की सत्ता उस से एमएनएफ यानी मिजो नैशनल फ्रंट ने छीन ली है. यहां कांग्रेस हैरतअंगेज तरीके से 5 सीटों पर सिमट गई जबकि एमएनएफ ने 26 सीटें जीत कर सत्ता हासिल कर ली.

10 साल से राज कर रही कांग्रेस के मुख्यमंत्री लल थनहवला दोनों सीटों से हारे तो साफ हो गया कि मिजोरम में भी सत्ता विरोधी लहर थी. वहां देहाती और बाहरी दोनों इलाकों से कांग्रेस बुरी तरह हारी. भाजपा इस राज्य में भी कुछ हासिल नहीं कर पाई जिस ने बड़ी उम्मीदों से सभी 40 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन जीत उसे एक सीट पर ही मिली.

भाजपा इस पट्टी में लगातार कामयाब होती रही थी लेकिन मिजोरम के नतीजे उस का असर कम करने वाले साबित हुए.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें