यों तो इस तरह के पत्र आते रहते थे और मैं उन्हें अनदेखा करता रहता था, लेकिन इन पत्रों पर गौर करना तब से शुरू कर दिया जब से शहर के एक लेखक ने मित्रमंडली में बताया कि उसे अब तक देश की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से एक हजार सम्मान मिल चुके हैं. मित्र लोग वाहवाह कर उठे. एक दिन मुझ से पूछा, ‘‘तुम्हें कोई सम्मान नहीं मिला आज तक? तुम भी तो काफी समय से लिख रहे हो.’’ उस समय मैं ने स्वयं को अपमानित सा महसूस किया.
मेरे शहर के इस लेखक मित्र के बारे में अकसर अखबार में छपता रहता था कि शहर का गौरव बढ़ाने वाले लेखक को दिल्ली की एक प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था से एक और पुरस्कार. मैं ने अपने लेखक मित्र से पूछा, ‘‘इन पुरस्कारों की क्या योग्यता होती है?’’
उस ने गर्व से कहा, ‘‘मेहनत, लगन और लेखन. इस में कोई भाईभतीजावाद नहीं चलता. जो अच्छा लेखक होता है उसे सम्मान मिलता ही है.’’
मैं ने कहा, ‘‘आप की आयु तो मुझ से बहुत कम है. आप ने शायद मेरे बाद ही लिखना शुरू किया है. अब तक कितना लिख चुके हो.’’
उन्होंने नाराज हो कर कहा, ‘‘ कितना लिखा है, यह जरूरी नहीं है और आयु का लेखन से लेनादेना नहीं है. मेरी 2 किताबें छप चुकी हैं. मैं ने 20 कविताएं और 10 के आसपास कहानियां लिखी हैं. लेकिन लेखन इतना शानदार है कि साहित्यिक संस्थाएं स्वयं को रोक नहीं पातीं मुझे सम्मान देने से.’’
मैंने कहा, ‘‘मुझे भी बताइए कहां से कैसे सम्मान मिलते हैं? क्या करना पड़ता है? पुस्तकें कैसे छपती हैं?’’
उन्होंने कहा, ‘‘आप बड़े स्वार्थी हैं. साहित्य सेवा का काम है. साहित्य से यह उम्मीद मत रखिए कि आप को कुछ मिले. आप को देना ही देना होता है. 2 पुस्तकें मैं ने स्वयं के खर्च पर छपवाई हैं. और सम्मान मिलते हैं योग्यता पर.’’
खैर, दोस्त ने अपना उत्तर दे दिया. मैं ने फिर वे पत्र निकाले जिन्हें मैं अनदेखा करता रहता था. जो पत्र बचे हुए थे, उन्हें पढ़ना शुरू किया. काफी तो मैं फाड़ चुका था, बेकार समझ कर. ठीक वैसे ही जैसे अकसर मोबाइल पर एसएमएस आते रहते हैं कि आप को 10 करोड़ मिलने वाले हैं कंपनी की ओर से. आप इनकम टैक्स और अन्य खर्च के लिए हमारी बैंक की शाखा में फलां नंबर के अकाउंट में 10 हजार रुपए डिपौजिट करवा दें.
बाद में समाचारपत्रों से खबर मिलती है कि इन्हें ठग लिया गया है. इन की रकम डूब चुकी है. बैंक अकाउंट से सारे रुपए निकाल कर इनाम का लालच देने वाले गायब हो चुके हैं. खाता बंद हो चुका है. पुलिस की विवेचना जारी है. ऐसे ठगों से जनता सावधान रहे.
पहले पत्र में लिखा था कि हमारी अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था ने आप को श्रेष्ठ लेखन का पुरस्कार देने का निर्णय लिया है. यदि आप इच्छुक हों तो कृपया अपना पासपोर्ट साइज कलर फोटो, संपूर्ण परिचयपत्र, साहित्यिक उपलब्धियां और 1,500 रुपए का एमओ या नीचे दिए बैंक खाते में राशि जमा करें. एक फौर्म भी संलग्न था. प्रविष्टि भेजने की अंतिम तारीख निकल चुकी थी. दूसरा पत्र भी इसी तरह था. बस, अंतर राशि की अधिकता और पुरस्कार श्रेष्ठ कविता पर था. साथ में पुस्तक की 2 प्रतियां भेजनी थीं. इस की भी अंतिम तिथि निकल चुकी थी.
सम्मान का लोभ हर लेखक को होता है, थोड़ा सा मुझे भी हुआ. मैं ने पत्र के अंत में दिए नंबरों पर बात करने की सोची. पहले को फोन किया, कहा, ‘‘महोदय, आप की संस्था अच्छा कार्य कर रही है. अंतिम तिथि निकल चुकी है. कुछ प्रश्न भी हैं मन में.’’
उन्होंने उधर से कहा, ‘‘आप भेज दीजिए. अंतिम तिथि की चिंता मत कीजिए. हम आप की प्रविष्टि को एडजस्ट कर लेंगे.’’
मैं ने दूसरा प्रश्न किया, ‘‘जनाब, साहित्यिक उपलब्धियों में क्या लिखूं? लिख तो पिछले 20 साल से रहा हूं लेकिन कोई उपलब्धि नहीं हुई. बस, कहानियां, लेख लिख कर अखबार में भेजता रहता हूं. फिर उसी अखबार, जिस में रचना छपी होती है, को खरीदता भी हूं क्योंकि समाचारपत्र वालों से पूछने पर यही उत्तर मिलता है, ‘हम छाप कर एहसान कर रहे हैं. आप 2 रुपए का अखबार नहीं खरीद सकते. हमारे पास और भी काम हैं.’
‘‘‘हम अखबार की प्रति नहीं भेज सकते. आप चाहें तो अपनी रचनाएं न भेजें. हमें कोई कमी नहीं है रचनाओं की. रोज 10-20 लेखकों की रचनाएं आती हैं और हां, भविष्य में रचनाएं छपवाना चाहें तो पहला नियम है कि अखबार की वार्षिक, आजीवन सदस्यता ग्रहण करें. साथ ही, समाचारपत्र में दिया साहित्य वाला कूपन भी चिपकाएं. आजकल नया नियम बना है लेखकों के लिए. आप लोगों को छाप रहे हैं तो अखबार को कुछ फायदा तो पहुंचे.’’’
उधर से साहित्यिक संस्था वाले ने अखबार वालों को कोसा. उन्हें व्यापारी बताया और खुद को लेखकों को प्रोत्साहन देने वाला सच्चा उपासक. ‘‘आप उपलब्धि में जो चाहे लिख कर भेज दीजिए. जैसे, पिछले कई वर्षों से लगातार लेखन कार्य. चाहे तो अखबार में छपी रचनाओं की फोटोकौपी भेज दीजिए. ज्यादा नहीं, दोचार.’’
मैं ने फिर पूछा, ‘‘श्रीमानजी, ये 1,500 रुपए किस बात के भेजने हैं?’’ उन्होंने समझाया. मैं ने समझने की कोशिश की. ‘‘देखिए सर, सम्मानपत्र छपवाने का खर्चा, संस्था के बैनरपोस्टर लगवाने का खर्चा और आप के लिए चायनाश्ता का इंतजाम भी करना होता है. आप को संस्था का स्मृतिचिह्न भी दिया जाएगा. शौल ओढ़ा कर माला पहनाई जाएगी. आप को जो सुंदर आमंत्रणपत्र भेजा है उस की छपवाई से ले कर डाक व्यय तक. फिर मुख्य अतिथि के रूप में बड़े अधिकारी, नेताओं को बुलाना पड़ता है. उन की खातिरदारी, सेवा में लगने वाला व्यय. बहुत खर्चा होता है साहब. जो हौल हम किराए पर लेते हैं उस का भी खर्चा.’’
साहस रोजाना आरुषी को कालेज पहुंचाने और लेने जाने लगा. फिर भी वे लड़के आरुषी को परेशान कर ही रहे थे. आरुषी उन के ध्यान में तो थी, पर साहस ने उन के खिलाफ कालेज में शिकायत कर रखी थी, इसलिए वे ज्यादा कुछ कर नहीं पा रहे थे.
उस दिन आरुषी कालेज के गेट नंबर एक की ओर जा रही थी, तभी कैंटीन में काम करने वाला एक लड़का आरुषी को एक चिट्ठी दे गया. जिस में लिखा था कि आरुषी आज तुम गेट नंबर 2 की ओर आना. वहां बसस्टाप पर मैं तुम्हें मिलूंगा-साहस.
आरुषी गेट नंबर 2 के पास बने बसस्टाप पर खड़ी हो कर साहस का इंतजार करने लगी. तभी वे गुंडे मोटरसाइकिल से आ कर आरुषी को घेर कर उस के साथ छेड़छाड़ करने लगे.
गेट नंबर 2 की ओर कोई आताजाता नहीं था, इसलिए वहां सुनसान रहता था. इसीलिए उन गुंडों ने साहस के नाम से फरजी चिट्ठी लिख कर कैंटीन के लड़के को भेज कर आरुषी को धोखे से वहां बुलाया था.
रोज की तरह साहस गेट नंबर एक पर खड़े हो कर आरुषी का इंतजार कर रहा था. पर जब आरुषी को आने में देर होने लगी तो वह कालेज के अंदर जा कर आरुषी को खोजने लगा.
दूसरी ओर आरुषी को अपनी सुंदरता पर बड़ा घमंड है, कह कर वे लड़के आरुषी को डराधमका रहे थे. अंत में जो लड़का आरुषी को काफी समय से प्रपोज कर रहा था, उस ने आरुषी के चेहरे पर एसिड फेंकते हुए कहा, ‘‘अगर तू मेरी नहीं हुई तो मैं तुझे किसी और की भी नहीं होने दूंगा.’’
इस के बाद सभी गुंडे मोटरसाइकिल से भाग गए. आरुषी दर्द और जलन से जोरजोर चीखते हुए जमीन पर पड़ी तड़प रही थी. पर उन गुंडों के डर और धाक की वजह से कोई मदद के लिए आगे नहीं आ रहा था. साहस को आरुषी की चीख सुनाई दी तो वह गेट नंबर 2 की ओर भागा. आरुषी की हालत देख कर उस के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई.
आरुषी को उस ने अपनी गाड़ी से नजदीक के अस्पताल पहुंचाया, जहां तत्काल उस का इलाज शुरू किया गया. उस की आंखें तो बच गईं, पर उस का नाजुक कोमल चेहरा भयानक हो चुका था. मम्मीपापा की परी अब परी नहीं रही.
जितना हो सका, उतनी सर्जरी कर के आरुषी को घर लाया गया. अपने कमरे में लगे आईने में अपना चेहरा देख कर आरुषी जिंदा लाश बन गई. आईने के सामने घंटों बैठने वाली आरुषी अब आईने के सामने जाने से डरने लगी थी. अब वह सब से दूर भागने लगी थी.
आरुषीकी हालत देख कर साहस भी परेशान रहने लगा था. आरुषी पर एसिड अटैक करने वाले सभी के सभी लड़कों को साहस ने जेल भिजवा दिया था, साथ ही साथ आरुषी को भी संभाल रहा था.
आरव जो आरुषी को चिढ़ाने के लिए चुहिया कहता था, अब उसी तरह आरुषी चूहे की तरह कोने में छिप गई थी. जो लड़की हाथ पर दाल गिरने से मां से लिपट कर रोने लगी थी, अब वही असह्य पीड़ा सहते हुए मां के पास बैठी रोती रहती थी.
आरुषी और साहस की शादी की तारीख नजदीक आती जा रही थी. एक दिन साहस ने आरुषी के पास आ कर कहा, ‘‘आरुषी शादी की तारीख नजदीक आ गई है, चलो आज थोड़ी शौपिग कर आते हैं. अभी तक हम ने शादी की कोई तैयारी नहीं की है.’’
आरुषी जोरजोर से रोने लगी. उस ने साहस से शादी के लिए मना कर दिया और कहा कि वह किसी दूसरी सुंदर लड़की से शादी कर ले. इस के बाद वह साहस से दूर रहने लगी, जो साहस से सहन नहीं हो रहा था.
आरुषी के इस व्यवहार से दुखी हो कर एक दिन साहस ने कहा, ‘‘आरुषी, तुम मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रही हो? मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम देखने में कैसी लगती हो. मैं ने तुम्हें पहली बार देखा था, तभी तुम्हारा भोलापन मुझे बहुत भा गया था. उसी समय तुम मेरे दिल में उतर गई थी. तुम अपनी ही कही बात भूल गई?
‘‘तुम ने ही तो कहा था कि अपना जीवनसाथी खूब प्यार करने वाला होना चाहिए. प्रेम करना आसान है, पर किसी का प्रेम पाना बहुत मुश्किल है. आरुषी, मैं सचमुच तुम्हें बहुत प्यार करता हूं. जितना तुम मुझे करती हो, उस से भी बहुत ज्यादा. इसी तरह का जीवनसाथी चाहती थीं न तुम?’’
‘‘साहस, तब की बात अलग थी. अब मैं तुम्हारे लायक नहीं रही.’’ आरुषी ने कहा.
‘‘ऐसा क्यों कहती हो आरुषी? अगर यही घटना मेरे साथ घटी होती तो..? तो क्या तुम मुझे छोड़ देती? अगर शादी के बाद ऐसा होता तो… जवाब दो?’’
‘‘साहस, तुम समझने की कोशिश करो. अब मैं पहले जैसी नहीं रही.’’ आरुषी ने साहस को समझाने की कोशिश की.
आरुषी के इस व्यवहार से नाराज हो कर साहस वहां से चला गया. उस के जाने के लगभग एक घंटे बाद आरुषी के यहां फोन आया. आरुषी सहित घर के सभी लोग तुरंत अस्पताल भागे. अस्पताल पहुंच कर पता चला कि साहस ने लोहे का सरिया गरम कर के अपना चेहरा उतना ही दाग लिया था, जितना आरुषी का जला था. आरुषी ने साहस के पास जा कर उस का हाथ पकड़ कर रोते हुए कहा, ‘‘साहस, तुम ने यह क्या किया?’’
‘‘अब तो हम दोनों एक जैसे हो गए हैं न? अब मैं तुम्हारे लायक हो गया न? अब तो तुम शादी के लिए मना नहीं करोगी न?’’ साहस ने कहा.
‘‘सौरी साहस, तुम सचमुच मुझे बहुत प्यार करते हो. मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूं, तुम से भी ज्यादा. मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूंगी, कभी नहीं.’’
इस दृश्य को देख कर दोनों ही परिवारों के सभी लोगों की आंखें भर आईं. शायद इसे ही सच्चा प्यार कहते हैं. प्यार सुंदरता का मात्र आकर्षण नहीं होना चाहिए, प्यार तो एक दिल से दूसरे दिल तक पहुंचने का कठिन जरिया है.
नंदिता ने अंदाजा लगाया संजय से ही बात कर रही होगी, ”नहीं, अब एग्जाम्स के बाद ही मिलेंगे, बहुत मुश्किल है पहली बार में पास होना, बहुत मेहनत करेंगे.‘’
संजय ने क्या कहा, वह तो नंदिता कैसे सुनती, पर कान पीहू की बात की तरफ लगे थे जो कह रही थी, ”नहीं, नहीं, मैं इतना हलके में नहीं ले सकती पढ़ाई. मुझे पहली बार में ही पास होना है. तुम भी सब छोड़ कर पढ़ाई में ध्यान लगाओ.”
नंदिता जानती थी कि उस ने हमेशा पीहू को स्वस्थ माहौल दिया है. वह अपने पेरैंट्स से कुछ भी, कभी भी कह सकती थी. यह बात भी पीहू नंदिता को बताने आ गई, बोली, ”मुझे अभी बहुत गुस्सा आया संजय पर, कह रहा है कि सीए के एग्जाम्स तो कितने भी दे सकते हैं. फेल हो जाएंगें तो दोबारा दे देंगे.” और फिर अपने रूम में जा कर पढ़ने बैठ गई.
नंदिता पीहू की हैल्थ का पूरा ध्यान रखती, देख रही थी, रातदिन पढ़ाई में लग चुकी है पीहू. संजय कभी घर आता तो भी उस से सीए के चैप्टर्स, बुक, पेपर्स की ही बात करती रहती. संजय इन बातों से बोर हो कर जल्दी ही जाने लगा. वह कहीं आइसक्रीम खाने की या ऐसे ही बाहर चलने की ज़िद करता तो कभी पीहू चली भी जाती तो जल्दी ही लौट आती. जैसेजैसे परीक्षा के दिन नजदीक आने लगे. वह बिलकुल किताबों में खोती गई. और सब के जीवन में वह ख़ुशी का दिन आ भी गया जब पीहू ने पहली बार में ही सीए पास कर लिया. संजय बुरी तरह फेल हुआ था. पीहू को उस पर गुस्सा आ रहा था, बोली, “मम्मी, देखा आप ने, अब भी उसे कुछ फर्क नहीं पड़ा, कह रहा है कि अगली बार देखेगा, नहीं तो अपना दूसरा कैरियर सोचेगा.”
नंदिता ने गंभीर बन कर कहा, ”देखो, हम बहुत खुश हैं, तुम ने मेरी बात मान कर पढ़ाई पर ध्यान दिया. अब हमारी बारी है तुम्हारी बात मानने की. बोलो, संजय के पेरैंट्स से मिलने हम कब उस के घर जाएं?”
”अभी रुको, मम्मी, अब तो प्रौपर जौब शुरू हो जाएगा मेरा उसी बिग फोर कंपनी में जहां मैं आर्टिकलशिप कर रही थी. अब औफिस जाने में अलग ही मजा आएगा. ओह्ह, मम्मी, मैं आप दोनों को बड़ी पार्टी देने वाली हूं.”
पीहू नंदिता और विनय से लिपट गई.
अगले कुछ दिन पीहू बहुत व्यस्त रही. अब जौब शुरू हो गया था. अच्छी सैलरी हाथ में आने की जो ख़ुशी थी, उस से चेहरे की चमक अलग ही दिखती. फोन पर ‘माय लव’ की जगह संजय नाम ने ले ली थी. संजय अब पीहू की छुट्टी के दिन ही आता. दोनों साथसाथ मूवी देखने भी जाते, खातेपीते, पर अब नंदिता को वह बेटी का ख़ास बौयफ्रैंड नहीं, एक अच्छा दोस्त ही लग रहा था. पीहू अब उस से शादी की बात कभी न करती. उलटा, ऐसे कहती, ”मम्मी, संजय बिलकुल सीरियस नहीं है अपने कैरियर में. मुझे तो लगता है इन की फेमिली बहुत ही लापरवाह है. कोई भी सैट ही नहीं होता. कोई भी कभी कुछ करता है, कभी कुछ. इन के घर जाओ तो सब अस्तव्यस्त दिखता है. मेरा तो मन ही घबरा जाता है. फौरन ही आने के लिए खड़ी हो जाती हूं.‘’
नंदिता सब सुन कर बहुतकुछ सोचने लगी. सीए के एग्जाम्स 6 महीने बाद फिर आए. संजय ने फिर पढ़ाई में कमी रखी, फिर फेल हुआ. पीहू को संजय पर बहुत गुस्सा आया, बोली, ”बहुत लापरवाह है, इस से नहीं होगा सीए. अब बोल रहा है, फिर 6 महीने में एग्जाम्स तो देगा पर बहुत ज्यादा मेहनत नहीं कर पाएगा.’’
नंदिता ने यों ही हलके से मूड में कहा, ”अब इसे शादी की जल्दी नहीं, पीहू?”
”है, अब भी बहुत ज़िद करता है, शादी कर लेते हैं, मैं पढ़ता रहूंगा बाद में.”
विनय ने पूछा, ”तुम क्या सोचती हो?”
”अभी मुझे समय चाहिए. पहले यह देख लूं कि यह अपनी लाइफ को ले कर कितना सीरियस है. बाकी तो बाद की बातें हैं.”
उस रात नंदिता को ख़ुशी के मारे नींद नहीं आ रही थी. पीहू तो बहुत समझदार है, प्यार भी किया है तो एकदम दीवानी बन कर नहीं घूमी, होशोहवास कायम रखे हुए, गलत फैसले के मूड में नहीं है पीहू. नंदिता को पीहू पर रहरह कर प्यार आ रहा था, सोच रही थी कि अच्छा है, आज का इश्क थोड़ा सयाना, प्रैक्टिकल हो गया है, थोड़ा अलर्ट हो गया है, यह जरूरी भी है.
पीहू रात में लेटीलेटी ठंडे दिमाग से सोच रही थी, संजय की बेफिक्री, उस के कूल नैचर पर फ़िदा हो कर ही उस के साथ जीवन में आगे नहीं बढ़ा जा सकता. संजय और उस का पूरा परिवार लापरवाह है. मैं ने पढ़ाई में बहुत मेहनत की है. इस प्यार मोहब्बत में कहीं अपना कोई नुकसान न कर के बैठ जाऊं. संजय अच्छा दोस्त हो सकता है पर लाइफपार्टनर तो बिलकुल भी नहीं.
और ऐसा भी नहीं है कि संजय उस से शादी न करने के मेरे फैसले से मजनू बन कर घूमता रहेगा. उसे लाइफ में बस टाइमपास से मतलब है, यह भी मैं समझ चुकी हूं. ऐसा भी नहीं है कि मैं कोई वादा तोड़ रही हूं और उसे धोखा दे रही हूं. वह खुद ही तो कहता है कि वह लाइफ में किसी भी बात को सीरियसली नहीं लेगा. फिर क्यों बंधा जाए ऐसे इंसान से. अब वह जमाना भी नहीं कि सिर्फ भावनाओं के सहारे भविष्य का कोई फैसला लिया जाए. मैं कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाऊंगी जिस से मुझे कभी बाद में पछताना पड़े. जल्दबाजी में फैसला ले कर रोज न जाने कितनी ही लड़कियां अपना नुकसान कर बैठती हैं. न, न, अब जब भी इश्क होगा, सयाना होगा, कोई बेवकूफी नहीं करेगा.
साहस को देखते ही आरुषी के मम्मीपापा के मन में बेटी की शादी का विचार आ गया. आखिर आता क्यों न. साहस राजकुमार की तरह सुंदर था. फिर वह डाक्टर भी था. शादी में शामिल होने के लिए साहस के मम्मीपापा भी आए थे.
साहस ने आरुषी के मम्मीपापा से अपने मम्मीपापा को मिलवाया. बातचीत में उन लोगों का काफी पुराना परिचय निकल आया. साहस और आरुषी की शादी की बात चल निकली. 2 दिन बाद साहस अपनी मम्मीपापा के साथ शादी की बात करने आरुषी के घर आ पहुंचा.
उस दिन आरुषी और साहस बहुत खुश थे. सभी ने दोनों को बात करने के लिए घर के बाहर लौन में भेज दिया. लौन में लगे झूले पर बैठते हुए साहस ने पूछा, ‘‘अब तुम्हारा हाथ कैसा है आरुषी?’’
‘‘अब तो काफी ठीक है. आप ने बहुत सही समय पर बर्फ ला कर लगा दी थी, इसलिए ज्यादा तकलीफ नहीं हुई.’’ आरुषी ने कहा.
‘‘जरा अपना हाथ दिखाओ, देखूं तो कैसा है?’’
खूब शरमाते हुए आरुषी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया तो बहुत ही आराम से उस का हाथ पकड़ कर साहस देखने लगा. साहस के हाथ पकड़ने से आरुषी कुछ अलग तरह का रोमांच अनुभव कर रही थी, जिसे शायद साहस ने महसूस कर लिया था.
इस के बाद अपना दूसरा हाथ उस के हाथ पर रख कर सहलाने लगा. आरुषी ने अपनी नजरें झुका लीं. पर अपना हाथ साहस के हाथों से छुड़ाने की कोशिश नहीं की.
उसे साहस का स्पर्श अच्छा लग रहा था. इसी छोटी सी मुलाकात में साहस ने आरुषी के दिल की स्थिति समझ ली थी. उस ने पूछा, ‘‘आरुषी तुम्हें कैसा जीवनसाथी चाहिए?’’
‘‘बस, इस तरह का कि जितना प्यार मैं उस से करूं, वह उस से ज्यादा मुझे प्यार करे.’’ आरुषी ने कहा.
‘‘मैं समझा नहीं,’’ साहस ने कहा.
‘‘किसी को प्यार करना आसान है. पर किसी का प्यार पाना उतना ही मुश्किल है. आप किसी को प्यार करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते हैं. इसलिए मुझे इस तरह का जीवनसाथी चाहिए, जो मुझे बहुत ज्यादा प्यार करे. मैं जैसी हूं, मुझे उसी रूप में अपना सके.
‘‘मेरा रूप देख कर कोई मेरी ओर आकर्षित हो, मैं इसे जरा भी प्यार नहीं समझती. यह सुंदरता जीवन भर साथ थोड़े ही साथ देने वाली है. जो जीवनसाथी मुझे बदले बगैर प्यार कर सके, वही सच्चा प्यार है. मैं सुंदरता में जरा भी विश्वास नहीं करती. चेहरे की सुंदरता के बजाय हृदय सुंदर होना चाहिए.’’ आरुषी ने दिल की बात कह दी.
साहस एकटक आरुषी को ताकता रहा. अभी दोनों के हाथ एकदूसरे के हाथ में ही थे. दोनों में से किसी ने भी हाथ छुड़ाने की कोशिश नहीं की थी. अपने दिल की बात कहने के बाद आरुषी ने पूछा, ‘‘तुम्हें कैसा जीवनसाथी चाहिए?’’
साहस ने छूटते ही कहा, ‘‘तुम्हारे जैसा.’’
‘‘क्या?’’ आरुषी चौंकी.
दोनों एकदूसरे की आंखों में आंखें डाल कर एकदूसरे को ताकते रहे. तभी आरुषी और साहस की मम्मी दोनों को बुलाने लौन में आ गईं. दोनों के हाथों में एकदूसरे के हाथ देख कर वे समझ गईं कि इन के जवाब क्या होंगे. दोनों ही एकदूसरे की ओर देख कर मुसकराईं. इस के बाद आरुषी की मम्मी ने कहा, ‘‘आरुषी बेटा अंदर आओ, नाश्ता करने.’’
आरुषी और साहस ने जल्दी से अपनेअपने हाथ अलग किए और सामान्य होने की कोशिश करने लगे. थोड़ा सामान्य होने के बाद आरुषी बोली, ‘‘हां मम्मी, आप चलें, हम आते हैं.’’
आरुषी झूले से उठ कर घर के अंदर जातेजाते पलट कर साहस की ओर देख कर शरमा गई. दोनों को ही एकदूसरे का जवाब मिल चुका था. दोनों के मातापिता को भी उन के जवाब मिल गए थे. 10 दिन बाद उन की सगाई की तारीख रख दी गई.
दोनों के ही घर यह पहला शुभ प्रसंग था, इसलिए उन की सगाई खूब धूमधाम से हुई. अपने पापा की परी आरुषी उस दिन सचमुच परी सी लग रही थी. बड़ी खुशी और शांति के साथ आरुषी और साहस की सगाई की रस्म संपन्न हो गई थी. सभी बहुत खुश थे.
सगाई हो जाने के बाद आरुषी और साहस अकसर मिलने लगे थे. एक दिन आरुषी एक कैफे में बैठी साहस का इंतजार कर रही थी, तभी उस के कालेज के 4 लड़के उस के अगलबगल बैठ कर उस से छेड़छाड़ करने लगे. तभी साहस आ गया और उन लड़कों की हरकत देख कर गुस्से में बोला, ‘‘तुम लोग यहां क्या कर रहे हो, किसी लड़की से कोई इस तरह की हरकत करता है?’’
उन लड़कों में से एक लड़के ने कहा, ‘‘तू कौन है बे, जो बीच में आ टपका. हम आरुषी को 4 साल से जानते हैं.’’
‘‘मेहरबानी कर के ढंग से बात करो. तुम जिस तरह बात कर रहे हो, यह क्या कोई बात करने का तरीका है?’’ साहस ने कहा, ‘‘आरुषी, तुम इन लोगों को जानती हो?’’
‘‘हां, ये मेरे कालेज के गुंडे हैं. 4 साल से मुझे परेशान कर रहे हैं. मुझे अकेली देख कर यहां भी मुझे परेशान करने आ गए.’’
इस के बाद तो साहस और उन गुंडों के बीच हाथापाई शुरू हो गई. अंत में पुलिस को सूचना दी गई. पुलिस के आने पर मामला शांत हुआ. जातेजाते वे गुंडे आरुषी को धमका गए. उस दिन पहली बार जिस सुंदरता पर आरुषी को घमंड था, उस पर उसे अफसोस हुआ.
आरुषी बहुत डर गई. साहस ने उसे तसल्ली दी. आरुषी ने कहा, ‘‘साहस इन लड़कों में एक लड़का मुझे बहुत दिनों से प्रपोज कर रहा था. पर मैं ने कभी उस की ओर ध्यान नहीं दिया. इसलिए अब वह गुंडागर्दी और धमकी पर उतर आया है.’’
‘‘आरुषी इन लोगों से डरने की जरूरत नहीं है. ये लोग तुम्हारा कुछ नहीं कर सकते.’’ साहस ने कहा.
‘‘साहस, ये ऐसेवैसे लड़के नहीं हैं. बहुत ही खतरनाक लोग हैं. सभी के सभी बड़े बाप की बिगड़ी औलादें हैं. हम लोग घर पहुंचेंगे, उस के पहले ही ये थाने से छूट जाएंगे. अब मैं कालेज नहीं जाऊंगी.’’ आरुषी ने कहा.
‘‘डरने की कोई बात नहीं है आरुषी. मैं तुम्हें कालेज से ले आने और ले जाने रोजाना आऊंगा.’’ साहस ने कहा.
‘‘मैं भी तुम सब के साथ ही लंबा सफर कर के आई हूं. मैं भी इनसान हूं, इसलिए थकान मुझे भी होती है, पर तुम लोगों के हिसाब से आराम करने का हक मुझे नहीं है. तुम लोगों की सोच यह है कि बाहर बिखरे सारे काम निबटाना मुझ अकेली की जिम्मेदारी है. इसलिए मैं ने भी अब तय कर लिया है कि अब आगे से मैं तुम लोगों के साथ कहीं भी आनेजाने का प्रोग्राम नहीं बनाऊंगी. प्रोग्राम बनाने में तो तुम तीनों आगे रहते हो पर जाने के समय की तैयारी में न कोई हाथ बंटाने को तैयार होता है और न ही आने के बाद बिखरे कामों को समेटने में. जाते वक्त अपने कपड़े तक छांट कर नहीं देते हो तुम सब कि कौनकौन से रखूं. ऊपर से वहां पहुंच कर नखरे दिखाते हो कि मम्मा, यह शर्ट क्यों रख ली. यह तो मुझे बिलकुल पसंद नहीं, यह जींस क्यों रख ली यह तो टाइट होती है. वापस आने के बाद इस समय कितने काम हैं करने को, जिन में तुम लोग मेरी मदद कर सकते हो पर तुम में से किसी के कान पर जूं नहीं रेंग रही है. तुम सब को आराम चाहिए. तुम सब को एसी चाहिए पर क्या मुझे जरूरत महसूस नहीं हो रही इन चीजों की?’’
मेरी बात का तीनों पर तुरंत असर पड़ा. गौरव तुरंत टीवी बंद कर के उठ गया. पति भी एसी बंद कर बाहर आ गए. उन दोनों की देखादेखी छोटा भी अनमना सा चादर फेंक कर हाल में आ कर खड़ा हो गया.
तीनों ही अपने करने लायक काम की तलाश में इधरउधर नजर डाल ही रहे थे कि अचानक मेरा सेलफोन बज उठा. गुस्से की वजह से मेरा फोन उठाने का मन नहीं कर रहा था पर मम्मी का नाम देख कर फोन उठाने को मजबूर हो गई.
‘‘हैलो बबीता, तुझे खुशखबरी देनी थी. आयूष की शादी पक्की हो गई है. लड़की वाले अभी यहीं बैठे हैं. हम सगाई और शादी की तारीख तय कर रहे हैं. तय होते ही तुम्हें दोबारा फोन करूंगी. तारीख बहुत जल्दी की तय करेंगे, इसलिए बस तुम फटाफट आने की तैयारी शुरू कर दो, क्योंकि जब तक तुम नहीं आओगी मैं कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाऊंगी,’’ कह कर मम्मी ने फोन रख दिया.
मम्मी के फोन रखते ही मैं चहक उठी, ‘‘सुनो, आयूष की शादी पक्की हो गई है और शादी की बहुत जल्दी की तारीख भी निकलने वाली है. मम्मी ने हमें तैयारी शुरू कर देने को कहा है.’’
‘‘पर मम्मा आप जाएंगी क्या मामा की शादी में?’’ छोटे बेटे ने बड़ी मासूमियत से कहा.
‘‘हां, क्यों नहीं जाऊंगी? क्या तुम लोगों को नहीं जाना मामा की शादी में?’’ मैं ने आश्चर्य से ऋतिक की ओर देखा.
‘‘जाना तो था पर अभीअभी तो आप ने भीष्म प्रतिज्ञा की है कि अब आप हम लोगों के साथ कहीं आनेजाने का प्रोग्राम नहीं बनाएंगी, तो मैं नानी को फोन कर के बता देता हूं कि मम्मा मामा की शादी में नहीं आ पाएंगी. आप हम लोगों का इंतजार न करें.’’
बस फिर क्या था. अपूर्व को भी मौका मिल गया बच्चों के साथ मिल कर मेरी टांग खींचने का. उन्होंने ऋतिक के हाथ से फोन ले लिया और कहने लगे कि बेटा मेरे होते हुए तुम नानी को यह खबर दो, कुछ ठीक नहीं लगता. लाओ, मैं ठीक से समझा कर बता देता हूं नानी को कि वे अपनी प्यारीदुलारी बेटी का इंतजार न करें शादी में.
थोड़ी देर पहले ही मेरे गुस्से का जो असर तीनों पर पड़ा था और तीनों ही मेरी मदद के लिए आ गए थे उस पर मम्मी के फोन से पानी फिर गया.
मेरा मूड अच्छा हुआ देख थोड़ाबहुत इधरउधर कर के दोबारा फिर सब टीवी के सामने जा बैठे. अब दोबारा चीखनेचिल्लाने के बजाय मैं ने अकेले ही काम में जुट जाना बेहतर समझा.
दूसरे दिन से अपूर्व अपने औफिस और बच्चे स्कूल में व्यस्त हो गए. मैं भी बिखरे काम समेटने के साथसाथ आयूष की शादी की कल्पना में जुट गई.
लेकिन जब आयूष की शादी में जाने और शादी की तैयारी के बारे में सोचना शुरू किया तो जाने के पहले की तैयारी और आने के बाद के बिखरे काम के बारे में सोच कर मेरा मानसिक तनाव फिर से बढ़ गया.
अपूर्व और बच्चों के असहयोगात्मक रवैए के कारण कहीं आनेजाने के नाम पर सचमुच मुझे घबराहट होने लगी थी. मुझे दिलोजान से चाहने वाले मेरे पति और बच्चे कहीं भी आनेजाने की तैयारी में कोई भी मदद नहीं करते थे. सब से अधिक परेशानी मुझे होती है सब के कपड़ों के चयन में. कब और किस अवसर पर तीनों कौनकौन से कपड़े पहनेंगे यह भी मुझे अकेले ही तय करना पड़ता है. बच्चों को साथ बाजार चल कर पसंद के कपड़े लेने को कहती हूं तो जवाब मिलता है, ‘‘प्लीज मम्मा, तुम ले आओ. हमें शौपिंग पर जाना बिलकुल पसंद नहीं है. जब कहती हूं कि बेटा मुझे तुम लोगों की पसंदनापसंद समझ में नहीं आती है तो कहते हैं कि आप व्हाट्सऐप पर फोटो भेज देना हम बता देंगे कि पसंद हैं या नहीं.’’
मैं जब हार कर अपनी पसंद के कपड़े ले जाती तो कभी किसी को रंग पसंद नहीं आता तो कभी डिजाइन. मैं गुस्सा हो कर कहती कि इसीलिए कहती हूं कि अपने कपड़े खरीदने मेरे साथ चला करो पर कोई मेरी बात नहीं मानता. अब कल चलो मेरे साथ और इन्हें बदल कर अपनी पसंद के लेना.उन्हें क्या पता कि मां जब तक अपने बच्चों को नए कपड़े नहीं पहना लेती खुद अपने तन पर नए कपड़े नहीं डालती. बच्चों का पहनावा और संस्कार मां की परवरिश और सुघड़ता को उजागर करते हैं, इसलिए मेरे बच्चे और पति का पहनावा हर अवसर पर सलीकेदार हो, इस का मैं विशेष ध्यान रखती हूं
पिछले एक घंटे से ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठी आरुषी अभी सज ही रही थी. उस के पूरे कमरे में कपड़े ही कपड़े बिखरे हुए थे. अचानक किसी ने कमरे का दरवाजा खटखटाया. पलट कर दरवाजे की ओर देखते हुए आरुषी ने पूछा, ‘‘कौन है?’’
दरवाजे के बाहर से आवाज आई, ‘‘बेटा मैं हूं, तुम्हारी मम्मी, अभी और कितनी देर लगेगी?’’
‘‘मम्मी अंदर आ जाइए, दरवाजा खुला है.’’ आरुषी ने ड्रेसिंग टेबल में लगे आईने में खुद को निहारते हुए कहा.
आरुषी के कमरे के अंदर आ कर इधरउधर देखते हुए मम्मी ने कहा, ‘‘यह क्या है आरुषी, कमरे की हालत तो देखो, किस तरह अस्तव्यस्त कर रखा है. अभी तुम शीशे के सामने ही बैठी हो. हमें 10 बजे तक शादी में पहुंचना था. घड़ी तो देखो, साढ़े 10 बज रहे हैं. इतनी सुंदर तो हो, फिर इतना सजने की क्या जरूरत है. इतने कपड़े पहनपहन कर फेंके हैं, तुम्हें थकान नहीं लगी?’’
आरुषी मम्मी के सामने आ कर दाहिने हाथ से आगे आई बाल की लट को पीछे धकेलते हुए बोली, ‘‘सांस ले लो मम्मी, मैं सारे कपड़े तह कर के रख दूंगी. तुम इस की चिंता मत करो. जरा यह बताओ, मैं कैसी लग रही हूं?’’
मम्मी ने आगे बढ़ कर ड्रेसिंग टेबल पर रखी काजल की डिब्बी से अंगुली में काजल लगा कर आरुषी के कान के पीछे टीका लगा दिया. मम्मी का हाथ पकड़ कर हटाते हुए आरुषी ने कहा, ‘‘मम्मी, तुम ने तो मेरे बाल ही खराब कर दिए, अब ये फिर से संवारने पड़ेंगे.’’
‘‘अब बस करो बेटा, देर हो रही है.’’
मम्मी की बात पूरी ही हुई थी कि आरुषी का छोटा भाई आरव उस के कमरे के बाहर आ कर चीखते हुए कहने लगा, ‘‘अभी कितनी देर लगेगी चुहिया दीदी, तुम्हारी वजह से पापा मुझ पर नाराज हो रहे हैं. जल्दी करो न दीदी.’’
‘‘चलो आ रही हूं. पापा मुझे कुछ नहीं कहेंगे. मैं तो लाडली हूं उन की. तुम ने कोई कांड किया होगा, इसलिए तुझ पर खीझे होंगे. कौवा कहीं का.’’
आरव कमरे के अंदर आ कर बोला, ‘‘मम्मी इस चुहिया से कह दो मुझे कौवा न कहे. इस के मुकाबले मेरा रंग थोड़ा गहरा जरूर है, पर कौवे की तरह तो नहीं है. सुन चुहिया, तेरी शादी नहीं है, जो इस तरह सज रही है. अरे, अपने रिश्तेदार की शादी है, जल्दी कर न.’’
आरुषी जल्दी से भाग कर पापा के पास पहुंची. पापा की आंखों में झांकते हुए बोली, ‘‘मैं कैसी लग रही हूं पापा?’’
‘‘तू तो मेरा चांद है मेरी लाडली. भगवान ने तुझे फुरसत में बनाया है बेटा.’’
‘‘पापा चांद में तो दाग है. आप की लाडली के चेहरे पर तो एक खरोंच तक नहीं है.’’ आरुषी ने कहा.
पापा ने आरुषी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘नाराज हो गई मेरी बेटी, तू तो मेरी परी है. एक दिन कोई राजकुमार आ कर मेरी लाडली को अपने साथ ले जाएगा.’’
‘‘बस, पापा बस,’’ आरुषी ने पैर पटकते हुए कहा, ‘‘मैं आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाने वाली समझ गए न. और हां, मम्मी और आप का बेटा आरव कितनी देर लगा रहे हैं तैयार होने में.’’
दरवाजे से बाहर आते हुए आरव ने आरुषी की बात सुन ली थी. वह वहीं से चिल्लाया, ‘‘पापा, दीदी एकदम झूठ बोल रही है. यही एक घंटे से शीशे के सामने बैठ कर तैयार हो रही थी. और अब मेरा और मम्मी का नाम लगा रही है… चुहिया.’’
‘‘आरव बड़ी बहन को कोई इस तरह कहता है.’’ पापा ने कहा.
आरुषी खुश हो कर पापा न देख पाएं इस तरह जीभ निकाल कर आरव को चिढ़ाया. इस के बाद सभी कार में सवार हो कर जहां शादी हो रही थी, वहां के लिए रवाना हो गए.
आरुषी विवाह स्थल पर पहुंच कर जैसे ही कार से निकल कर बाहर खड़ी हुई, सभी की नजरें उसी पर टिक गईं.
रूप का अंबार, पापा की परी आरुषी अब शादी लायक हो चुकी थी. इसलिए हर कोई आरुषी को अपने घर की बहू बनाना चाहता था. और हर युवा दिल तो उसे देख कर अपनी धड़कन बना लेना चाहता था.
एक ओर विवाह की रस्में हो रही थीं तो दूसरी ओर खाना चल रहा था. आरुषी को बहुत जोर की भूख लगी थी. आरुषी खाना खाने के लिए प्लेट ले कर लाइन में लग गई. एक अंजान लड़का उस के पीछे आ कर खड़ा हो गया. आरुषी उसे नजरअंदाज करते हुए खाने की चीजें उठाउठा कर प्लेट में रखती जा रही थी.
दाल काफी गरम थी. चमचा भर कर दाल वह प्लेट में डालने लगी तो चमचा पलट गया और सारी दाल उस के हाथ पर गिर गई. उस के मुंह से जोर की चीख निकल गई.
पीछे खड़ा लड़का दौड़ कर शरबत के काउंटर से बर्फ ले आया और आरुषी के हाथ पर रगड़ने लगा. आरुषी को थोड़ा आराम हुआ तो उस ने उस लड़के का आभार व्यक्त करते हुए उसे धन्यवाद कहा. इस के बाद उस लड़के ने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘हाय, आई एम साहस. आई एम ए डाक्टर.’’
‘‘साहसजी, आप का बहुतबहुत आभार.’’ आरुषी ने कहा.
तभी आरुषी के मम्मीपापा आ गए. आरुषी छोटे बच्चे की तरह मम्मी से लिपट कर रोते हुए बताने लगी कि वह दाल से जल गई है. मम्मी ने उस के आंसू पोंछते हुए उसे सांत्वना दी तो वह शांत हुई. इस के बाद उस ने अपने मम्मीपापा से साहस का परिचय कराया.
बहनों की बात को ले कर उस ने राजकुमारी से पूछा, ‘‘सीधी सी बात है कि बहनों की शादी के बाद तुम शादी करोगी. करोगी न…?’’ राजकुमारी ने एक मीठी सी मुसकान के साथ कहा, ‘‘जी हां.’’ ‘‘यह तो तुम देख रही हो कि मैं ने अब तक शादी नहीं की. तुम्हें देखने के बाद शादी करना चाहता हूं. मुझे एक ऐसी ही पत्नी की तलाश थी.’’ ‘‘मुझ से…? मैं तो…’’ राजकुमारी का गला सूख गया. निर्मल कुमार ने मुसकराते हुए आगे कहा, ‘‘जब तुम मेरी बीवी बन जाओगी, तो जोकुछ मेरा है, वह तुम्हारा होगा. एक शानदार जिंदगी तुम्हारे सामने है. तुम्हारे लिए कोई परेशानी बाकी नहीं रहेगी.
मकान छुड़ा लेना, बहनों की शादी पर जितना चाहे खर्च करना, मुझे कोई एतराज नहीं होगा.’’ राजकुमारी ने फौरन हामी नहीं भरी और इनकार भी नहीं किया. निर्मल कुमार ने उसे देखते हुए कहा, ‘‘इस बात का जवाब आराम से देना…’’ ‘‘हांहां, सोच लो, आराम से सोचो और तब मुझे बताओ. वैसे, मेरा यकीन है कि मेरी बात को तुम ठुकराओगी नहीं, मंजूर कर लोगी. अच्छा, चलो तुम्हें छोड़ते चलते हैं.’’ घर आ कर राजकुमारी रातभर सो नहीं सकी. वह बारबार बिस्तर से उठती और पानी पीती… इसी तरह सवेरे के 6 बज गए. एक तरफ राजेश था, जिस से वह बेहद प्यार करती थी. वह रातोंरात चाहे राजेश के साथ रही हो, पर उस ने कभी भी जिस्मानी संबंध नहीं बनाए थे.
वह निर्मल कुमार से कम उम्र का भी था और सुंदर भी. वह उसे बहुत चाहती थी. पर राजेश के साथ भी लगभग यही परेशानियां थीं. इन दोनों ने शादी इसीलिए नहीं की थी कि इस से घर वालों पर असर पड़ता था. दूसरी ओर निर्मल कुमार एक करोड़पति था. उस की सारी उलझनें चुटकी बजाते ही हल हो सकती थीं. दूसरे दिन वह दिनभर इन्हीं खयालों में गुम रही. वह दफ्तर भी नहीं गई. 2-3 रोज बाद जब राजेश से मिली, तो उसे सारी बातें बता दीं. राजेश उन दिनों काफी बिजी रहने लगा था. वह कहता था कि शादी के लिए पैसा जमा करने के लिए उस ने 2 पार्टटाइम नौकरियां पकड़ी हैं. राजेश ने पूछा, ‘‘फिर, तुम ने क्या फैसला किया?’’ राजकुमारी ने जमीन की ओर नजरें करते हुए कहा, ‘‘मैं सोच रही हूं, अपने परिवार के लिए यह कुरबानी दे ही दूं… तुम्हें कोई एतराज तो नहीं होगा?’’ सुनते ही राजेश का चेहरा पीला पड़ गया. लेकिन जल्दी ही उस ने अपनेआप पर काबू पा लिया.
राजकुमारी किसी मुजरिम की तरह नजरें नीचे किए बैठी थी, इसलिए वह राजेश का चेहरा नहीं देख पाई थी. राजेश ने धीरे से कहा, ‘‘मुझे भला क्या इनकार हो सकता है? इस ‘सच’ को मान लेना चाहिए तुम्हें.’’ राजकुमारी बोली, ‘‘लेकिन, मैं ने फैसला कर लिया है, जो मैं तुम्हें 2-3 रोज में बताऊंगी. प्लीज, उस दौरान मुझ से कुछ पूछना नहीं.’’ ‘‘छोड़ो इन बातों को,’’ राजेश हंसते हुए बोला, ‘‘तुम निर्मल कुमार की बात मान लो. मेरा क्या, मां कहीं से गांव की लड़की पकड़ कर ब्याह कर देगी.’’ दोनों जब उठे तो राजकुमारी एक फैसले पर पहुंच चुकी थी. राजकुमारी निर्मल कुमार की होने को तैयार हो गई थी और दोनों अपनीअपनी मंजिल की ओर चल पड़े. उस रात वह बहुत खुश थी. फिर भी करवटें बदलती रही. दूसरे दिन भी वह दफ्तर नहीं गई. उसे बुखार हो गया. इसी तरह 4 दिन बीत गए. छठे दिन जब वह दफ्तर जा रही थी, तो उस के दिमाग में हलचल मच गई.
उसे आज निर्मल कुमार को अपना फैसला सुनाना था. निर्मल कुमार को लगा कि वह राजेश के लिए कहीं चली न गई हो. उस के घर पर जा कर देखा, तो राजकुमारी का कमरा खुला दिखा. एक घंटे तक न कोई आया और न कोई गया तो वह चुपचाप घर चला गया. राजकुमारी किसी भी कीमत पर राजेश को खोना नहीं चाहती थी. उस की मुहब्बत के आगे निर्मल कुमार की दौलत कुछ भी नहीं थी. उस के दिल की धड़कन तेज हो गई और राजेश की मुहब्बत रंग लाने लगी. उस ने जब दफ्तर में प्रवेश किया, तो पता चला कि निर्मल साहब आ चुके हैं. वह उन के कमरे में गई और थोड़ी मुसकान के बाद बोली, ‘‘सर, आप बहुत महान हैं कि आप ने मुझे अपनाने का फैसला किया था. पर, मैं अपना दिल तो राजेश को दे चुकी हूं. मैं आप से शादी नहीं कर सकती. यह मेरा इस्तीफा है. मैं राजेश से शादी करूंगी.’’ निर्मल कुमार बोला, ‘‘तुम उस राजेश से बात कर रही हो न, जो इंपैक्ट इंडस्ट्री में काम करता है. उस के मालिक ने अपनी सांवली लड़की के लिए राजेश को तैयार कर लिया था. पर, मैं ने उन्हें बता दिया है कि राजेश और तुम कितनी ही रातें एक कमरे में गुजार चुके हो.
उन के पास तुम्हारे घर के वीडियो पहुंच चुके हैं. उन्होंने आज ही राजेश को धक्के दे कर नौकरी से निकल दिया है. ‘‘राजेश तुम्हें धोखा देता रहा है. तुम जैसी लड़की से मैं भी अब शादी करने से इनकार करता हूं. इंपैक्ट इंडस्ट्री के मालिक ने राजेश को मेरे भेजे वीडियो के आधार पर उस के खिलाफ मुकदमा भी कर दिया है. वह अब जेल में है. जाओ, जेल में मिल आओ.’’ राजकुमारी उस से आगे एक लफ्ज भी नहीं सुन सकी. उस के हाथ से कागज छूट कर गिर पड़े. राजकुमारी की दुनिया उजड़ चुकी थी. न निर्मल साथ रहा, न राजेश.
”कुछ तो है, गेस करो.‘’
”तुम ही बताओ.‘’
”तुम्हारी बेटी को शायद प्यार हो गया है.‘’
विनय जोर से हंसे, ”इतनी खुश हो रही हो. उस ने खुद बताया है या अंदाजा लगाती घूम रही हो.‘’
”नहीं, उस ने तो नहीं बताया, मेरा अंदाजा है.”
”अच्छा, उस ने नहीं बताया?”
”नहीं.‘’
”तो फिर पहले उसे बताने दो.‘’
”नहीं, मैं सही सोच रही हूं.‘’
”देखते हैं.‘’
पर बात इतनी सरल रूप में भी सामने नहीं आई जैसे नंदिता और विनय ने सोचा था. एक संडे पीहू ने सुबह कहा, ”मम्मी, पापा, आज मेरा एक दोस्त घर आएगा.‘’
नंदिता और विनय ने एकदूसरे को देखा, नंदिता ने आंखों ही आंखों में जैसे विनय से कहा, देखा, मेरा अंदाजा!”
विनय मुसकराए, ”अच्छा, कौन है?”
”संजय, वह भी सीए कर रहा है. बस, में ही साथ आतेजाते दोस्ती हुई. मैं चाहती हूं आप दोनों उस से मिल लें.‘’
नंदिता मुसकराई, ”क्यों नहीं, जरूर मिलेंगे.”
इतने में पीहू का फोन बजा तो नंदिता ने कनखियों से देखा, ‘माय लव’ का ही फोन था. वह विनय को देख हंस दी, पीहू दूसरे रूम में फोन करने चली गई.
शाम को संजय आया. नंदिता तो पीहू के फोन में उस दिन किचन में ही इस ‘माय लव’ की फोटो देख चुकी थी. संजय जल्दी ही नंदिता और विनय से फ्री हो गया. नंदिता को वह काफी बातूनी लगा. विनय को ठीक ही लगा. बहुत देर वह बैठा रहा. उस ने अपनी फेमिली के बारे में कुछ इस तरह बताया, ”पापा ने जौब छोड़ कर अपना बिजनैस शुरू किया है. किसी जौब में बहुत देर तक नहीं टिक रहे थे. अब अपना काम शुरू कर दिया है तो यहां तो उन्हें टिकना ही पड़ेगा. मम्मी को किट्टी पार्टी से फुरसत नहीं मिलती, बड़ी बहन को बौयफ्रैंड्स से.’’
नंदिता और विनय इस बात पर एकदूसरे का मुंह देखने लगे. पर संजय जो भी था, मेहमान था, पीहू उसे कुर्बान हो जाने वाली नजरों से देखती रही थी. चायनाश्ते के साथ गपें चलती रहीं. संजय के जाने के बाद पीहू ने नंदिता के गले में बांहें डाल दीं, ”मम्मी, कैसा लगा संजय?”
”ठीक है.‘’
”मम्मी, मैं चाहती हूं आप एक बार उस के पेरैंट्स से भी जल्दी मिल लें.‘’
”क्यों?”
”मैं उस से शादी करना चाहती हूं.‘’
अब नंदिता को एक झटका लगा, ”अभी तो सीए फाइनल के एक्जाम्स बाकी हैं, बहुत मेहनत के दिन हैं ये तो. और अभी उम्र ही क्या है तुम्हारी.”
”ओह्ह, मम्मी, पढ़ाई तो हम साथ रह कर भी कर लेंगे. आप को तो पता ही है मैं अपने कैरियर को ले कर सीरियस हूं.‘’
”सीरियस हो तो बेटा, इस समय सिर्फ पढ़ाई के ही दिन हैं, अभी शादी के लिए रुका जा सकता है.‘’
”पर संजय अभी शादी करना चाहता है, और मैं भी. मम्मी, आप को पता है, लड़कियां उस के कूल ऐटिट्यूड की दीवानी हैं, सब जान देती हैं उस के बेफिक्र नेचर पर.’’
”चलो, अभी तुम कुछ पढ़ लो, फिर बात करते हैं,” किसी तरह अपने गुस्से पर कंट्रोल रखते हुए नंदिता कह कर किचन की तरफ चली गई.
अब तक विनय बिलकुल चुप थे. वे अल्पभाषी थे. अभी मांबेटी के बीच में बोलना उन्हें ठीक नहीं लगा. नंदिता पीहू से बात कर ही रही है, तो ठीक है. दोनों एकसाथ शुरू हो जाएंगे तो बात बिगड़ सकती है. यह सोच कर वे बस अभी तक सुन ही रहे थे. अब जब नंदिता किचन में और पीहू पैर पटकते अपने रूम में चली गई तो वे किचन में गए और कुछ बिना कहे बस अपना हाथ नंदिता के कंधे पर रख दिया. नंदिता इस मौन में छिपे हुए उन के मन के भाव भी समझ गई.
अब पीहू अलग ही मूड में रहती. कभी भी ज़िद करने लगती कि आप लोग संजय के पेरैंट्स से कब मिलोगे, जल्दी मिल कर हमारी शादी की बात करो. संजय भी कभी कभी घर आने लगा था. पीहू उस के आने पर खिलीखिली घूमती. अकेले में विनय ने नंदिता से कहा, ”हमें पीहू की पसंद पर कोई आपत्ति नहीं है, पर पहले पढ़ तो ले. सीए की फाइनल परीक्षा का टाइम है, इसे क्या हो गया है, कैसे पढ़ेगी, ध्यान इतना बंट गया है.”
विनय की चिंता जायज थी. नंदिता ने मन ही मन बहुतकुछ सोचा और एक दिन बहुत हलकेफुलके मूड में पीहू के पास जा कर लेट गई. पीहू भी अच्छे मूड में थी. नंदिता ने बात शुरू की, ”पीहू, हमें संजय पसंद है, पर तुम भी हमारी इकलौती बेटी हो और तुम आज तक अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे कर अपना कैरियर बनाने की बात करती रही हो जो हमें गर्व से भर देता था. संजय को पसंद करना, उस से शादी करने की इच्छा होना, इस में कुछ भी गलत नहीं.” फिर नंदिता ने अपने उसी ख़ास स्टाइल में मजाक करना शुरू किया जिस स्टाइल से मांबेटी अब तक बात करती आई थीं, ”तुम्हारी उम्र में प्यार नहीं होगा तो क्या हमारी उम्र में होगा. मेरी बेटी को प्यार फाइनली हो ही गया किसी से, इस बात को तो मैं एंजौए कर रही हूं पर पीहू, मेरी जान, इस हीरो को भी तो अपने पैरों पर खड़े हो जाने दो. अपने पापा से पैसे मांग मांग कर थोड़े ही तुम्हारे शौक पूरे करेगा और अभी तो उस के पापा ही सैट नहीं हुए,” नंदिता के यह कहने के ढंग पर पीहू को हंसी आ गई. नंदिता ने आगे कहा, ”देखो, हम संजय के पेरैंट्स से जल्दी ही जरूर मिलेंगे. तुम जहां कहोगी, हम तुम्हारी शादी कर देंगे. पर तुम्हें हमारी एक बात माननी पड़ेगी.‘’
पीहू इस बात पर चौकन्नी हुई तो नंदिता हंस दी. पीहू ने पूछा, ”कौन सी बात?”
”अभी सब तरफ से ध्यान हटा कर सीए की तैयारी में लगा दो, बैठ जाओ पढ़ने. फिर जो कहोगी, हो जाएगा. सीए करते ही शादी कर लेना, हम खुश ही होंगे.‘’
पीहू ने इस बात पर सहमति दे दी तो नंदिता ने चैन की सांस ली और विनय को भी यह बातचीत बताई तो उन की भी चिंता कम हुई. पीहू फिर सचमुच रातदिन पढ़ाई में जुट गई. वह हमेशा यही कहती थी कि वह एक ही बार में सीए क्लियर करने के लिए जीतोड़ मेहनत करेगी, बारबार वही चीज नहीं पढ़ती रहेगी. नंदिता ने सुना, पीहू फोन पर कह रही थी
अपूर्व और बच्चों को मेरी टांग खींचने का अच्छा मौका मिल गया था. सब से पहले छोटे बेटे ऋतिक ने मोबाइल हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘लाओ मम्मा, मैं नानी को फोन कर के बता देता हूं कि आप मामा की शादी में नहीं आ पाएंगी, क्योंकि आप ने भीष्म प्रतिज्ञा की है कि आप हम लोगों के साथ अब कहीं नहीं जाओगी.’’
ऋतिक की बात पूरी होते ही अपूर्व ने उस के हाथ से फोन लेते हुए कहा, ‘‘अरे बेटा, मेरे होते हुए तुम नानी से बात करो यह मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है. लाओ फोन मुझे दो. मैं नानी को ठीक से समझा देता हूं कि वे साले साहब की शादी की सारी तैयारी अकेले ही कर लें, क्योंकि उन की लाडली ने कहीं भी न जाने की प्रतिज्ञा कर ली है.’’
मेरे दिमाग के गरम पारे पर मां के फोन से पानी की जो ठंडी फुहार पड़ी थी वह पुन: इन लोगों की चुहलबाजी से ज्वलंत होने लगी.
हुआ यों था कि शिमला में 1 सप्ताह तक छुट्टियां बिता कर हम बस घंटा भर पहले ही घर आए थे. घर में घुसते ही अपूर्व और बच्चे एसी और टीवी औन कर के बैठ गए और फिर 1-1 कर के फरमाइशें शुरू कर दीं, ‘‘बबीता, फटाफट 1 कप चाय पिलाओ… होटल की चाय पी कर मन खराब हुआ पड़ा है.’’
‘‘मम्मा, प्लीज साथ में प्याज के पकौड़े भी बना देना. रास्ते में कहीं पकौड़े बन रहे थे. उन की महक मेरी नाक में ऐसी समाई कि मैं ने वहीं तय कर लिया था कि घर पहुंच कर सब से पहले मम्मा से पकौड़े बनवाऊंगा, बड़े बेटे गौरव ने अपनी इच्छा जताई.’’
‘‘मम्मा, आप ने मुझ से वादा किया था कि घर पहुंचते ही मुझे नूडल्स खिलाओगी. अब मुझ से सब्र नहीं हो रहा है. फटाफट अपना वादा पूरा करो,’’ छोटे बेटे ऋतिक ने भी उन दोनों के सुर में सुर मिलाया.
मेरे कानों में उन तीनों की बातें पड़ तो रही थीं पर ध्यान घर में बिखरे काम पर था.
बालकनी में सप्ताह भर के पेपर्स के बंडल बिखरे पड़े थे, जिन्हें हमारी गैरमौजूदगी में भी पेपर वाला डालता गया था, क्योंकि उसे हम मना करना भूल गए थे. उन्हें उठा कर खोल कर अलमारी में रखना था. सामने और पीछे दोनों तरफ की बालकनियों के गमलों के पौधे 1 सप्ताह में पानी के अभाव में झुलस से गए थे. उन में पानी डालना था. घर में इतनी धूल दिखने लगी थी कि फर्श पर चप्पलों के निशान बन रहे थे. कामवाली तो कल सुबह ही आएगी. अत: झाड़ूपोंछा भी करना ही पड़ेगा. सारे कमरों की बैडशीटें बदलनी हैं. किचन समेत पूरे घर की डस्टिंग करनी पड़ेगी. सूटकेस और बैग्स को खाली कर के धूप दिखा कर ऊपर की अलमारी में रखना है. सब से बढ़ कर तो गंदे कपड़ों के अंबार से निबटना है. कपड़े मशीन में धुलने डालने हैं. धुलने के बाद सूखने डालना और फिर सूखने के बाद उठा कर अंदर लाने हैं.
इस सब के अलावा सप्ताह भर बाहर का खाना खा कर ऊब चुके अपूर्व और बच्चों की दिली तमन्ना कि आज घर का बना स्वादिष्ठ खाना खाने को मिलेगा, बिना कहे ही मैं समझ रही थी.
2-4 दिन के लिए भी घर छोड़ कर कहीं चले जाओ तो आने के बाद काम का अंबार देख कर मन इतना घबरा जाता है कि यह सोचने लग जाती हूं कि गई ही क्यों? अपूर्व और बच्चे तो बस सूटकेस और बैग्स को घर के अंदर पहुंचा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं. उन्हें किसी और काम से मतलब नहीं रह जाता. मैं अकेली सारे काम निबटातेनिबटाते अधमरी हो जाती हूं.
अपूर्व और बच्चे तो अपनीअपनी फरमाइशें मुझे सुना कर टीवी के सामने बैठ गए और मैं किचन में खड़ी सोचने लगी कि कहां से काम शुरू करूं.
मुझे पता था कि जब तक तीनों की खानेपीने की फरमाइशें पूरी नहीं कर दूंगी तब तक ये शोर मचाते रहेंगे और मैं कोई भी काम ढंग से नहीं कर पाऊंगी. हालांकि लंबे सफर से आने के बाद नहाए बिना कुछ करने का मन नहीं कर रहा था, पर नहाने का इरादा त्याग कर जल्दीजल्दी प्याज काटने में जुट गई. गैस पर एक तरफ 2 कप चाय चढ़ा दी और दूसरी तरफ भगौने में नूडल्स बनने रख दी. तीसरे आंच पर कड़ाही में तेल गरम होते ही फटाफट पकौड़े तल कर सारा सामान ट्रे में लगा कर उन के पास पहुंच गई.
सब के साथ खुद भी सफर की थकान कम करने के इरादे से बैठ कर मैं ने भी चाय पी और उस के बाद पल्लू कमर में ठूंस कर काम निबटाने उठ गई.
सोचा सब से पहले कपड़ों को मशीन में डाल दूं. मशीन में कपड़े अपनेआप धुलते रहेंगे और मैं उस दौरान दूसरे काम करती रहूंगी.
मशीन लगाने के नाम पर मुझे पानी का खयाल आया कि पता नहीं टंकी में कितना पानी है? पर जब मैं ने ऋतिक से कहा कि जा कर देख कर आ कि टंकी में कितना पानी है ताकि मैं अपना काम उसी हिसाब से शुरू करूं तो वह मुंह तक चादर ओढ़ कर सो गया और अपने बड़े भाई की ओर इशारा कर के मुझे सलाह दे डाली कि इसे भेज दो.
उस की हरकत पर गुस्सा तो बहुत आया पर मैं बिना कुछ कहे चुपचाप वहां से बाहर निकल आई.
गौरव ने शायद मेरी नाराजगी को महसूस कर लिया. अत: उस ने बिना मेरे कुछ कहे ही उठते हुए कहा, ‘‘मम्मा, मैं देख कर आता हूं.’’
‘शुक्र है, किसी को तो दया आई मुझ पर,’ सोचते हुए मैं ने सूटकेस और बैग खाली करना शुरू कर दिए.
‘‘मम्मा, टंकी पूरी भरी हुई है… अब प्लीज कम से कम 1 घंटे तक आप मुझ से कोई काम करने को मत कहिएगा,’’ कहते हुए वह फिर से टीवी के सामने बैठ गया.
मैं अकेली इतने सारे कामों को ले कर परेशान हो रही हूं पर मेरे पति और बच्चों को इस की कोई परवाह नहीं है. कोई झूठमूठ भी मदद के लिए नहीं उठ रहा है. कहीं जाने का प्रोग्राम बनाने में तो तीनों ही बहुत तेज रहते हैं पर जाने से पहले की तैयारी में न कोई हाथ बंटाने को तैयार होता है और न ही वापस आने के बाद फैले कामों को समेटने में.
‘बस अब बहुत हो गया. ये सब मेरे सीधेपन का ही नतीजा है. मैं तो हरेक की सुविधा के लिए खटती रहती हूं पर इन्हें मेरी रत्ती भर भी परवाह नहीं रहती. अब तो इन्हें इन की गलती का और घर के प्रति जिम्मेदारियों का एहसास कराना ही पड़ेगा,’ यह सोचते हुए मैं कमरे में पहुंच गई.